वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1. "शिक्षण पुनर्बलन की आकस्मिकताओं का क्रम है।" यह परिभाषा है—
(a) एन. एल. गेज
(b) बी. एफ. स्किनर
(c) बी. ओ. स्मिथ
(d) के. पी. पाण्डेय
उत्तर: (b) बी. एफ. स्किनर।
व्याख्या: स्किनर के व्यवहारवादी दृष्टिकोण में शिक्षण को पुनर्बलन की आकस्मिकताओं की व्यवस्था के रूप में देखा गया है। उचित पुनर्बलन द्वारा वांछित व्यवहार को सुदृढ़ किया जाता है।
प्रश्न 2. शिक्षण का मूलभूत सिद्धान्त है—
(a) क्रियाशीलता का सिद्धान्त
(b) अन्वेषण का सिद्धान्त
(c) आगमन विधि का सिद्धान्त
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (a) क्रियाशीलता का सिद्धान्त।
व्याख्या: प्रभावी शिक्षण में विद्यार्थी की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। क्रियाशीलता का सिद्धान्त बालक को स्वयं कार्य करके सीखने पर बल देता है।
प्रश्न 3. शिक्षण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य है—
(a) बालक का स्वास्थ्य ठीक रखना
(b) उपयोगी ज्ञान प्रदान कर सर्वांगीण विकास करना
(c) पर्यावरण की शिक्षा देना
(d) जनसंख्या शिक्षा देना
उत्तर: (b) उपयोगी ज्ञान प्रदान कर सर्वांगीण विकास करना।
व्याख्या: शिक्षण का उद्देश्य केवल तथ्यात्मक ज्ञान देना नहीं है, बल्कि बालक की क्षमताओं, कौशलों, अभिवृत्तियों तथा व्यक्तित्व का समग्र विकास करना भी है।
प्रश्न 4. वैयक्तिक सम्प्रेषण का उद्देश्य है—
(a) छात्रों में व्यक्तिगत विभिन्नताएँ होती हैं
(b) बालकों की विशिष्ट योग्यताओं और व्यक्तित्व का विकास होता है
(c) साधारण बालकों के लिए व्यक्तिगत शिक्षण आवश्यक
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (d) उपर्युक्त सभी।
व्याख्या: वैयक्तिक सम्प्रेषण में विद्यार्थियों की वैयक्तिक भिन्नताओं, आवश्यकताओं और विशिष्ट योग्यताओं को ध्यान में रखकर व्यक्तिगत सहायता एवं मार्गदर्शन दिया जाता है।
प्रश्न 5. 'पूर्ण से अंश की ओर' का शिक्षण-सूत्र आधारित है—
(a) गेस्टाल्ट मनोविज्ञान पर
(b) बाल मनोविज्ञान पर
(c) प्राणी विज्ञान पर
(d) जीव विज्ञान पर
उत्तर: (a) गेस्टाल्ट मनोविज्ञान पर।
व्याख्या: गेस्टाल्ट मनोविज्ञान सम्पूर्णता पर बल देता है। इसके अनुसार व्यक्ति पहले सम्पूर्ण वस्तु या परिस्थिति को ग्रहण करता है और बाद में उसके अंशों को समझता है।
प्रश्न 6. 'बचाव निदान का उच्चतम स्तर है', यह कथन है—
(a) रॉस का
(b) नन का
(c) स्मिथ का
(d) मॉरिस का
उत्तर: (b) नन का।
व्याख्या: यह कथन टी. पी. नन से सम्बन्धित माना जाता है। इसका आशय है कि शिक्षण में कठिनाइयों के उत्पन्न होने से पूर्व उनकी रोकथाम करना अधिक प्रभावी है।
प्रश्न 7. 'क्रियापरक शिक्षण-विधि' का अर्थ है—
(a) शिक्षक के शिक्षण द्वारा सीखना
(b) छात्र का अपनी स्वयं की क्रिया के द्वारा ज्ञान प्राप्त करना
(c) गृहकार्य के द्वारा सीखना
(d) भ्रमण के द्वारा सीखना
उत्तर: (b) छात्र का अपनी स्वयं की क्रिया के द्वारा ज्ञान प्राप्त करना।
व्याख्या: क्रियापरक शिक्षण में विद्यार्थी स्वयं गतिविधियों में भाग लेकर सीखता है। यह 'करके सीखने' के सिद्धान्त पर आधारित है।
प्रश्न 8. 'प्रस्तावना' कौशल का प्रमुख घटक है—
(a) प्रश्नों की संरचना
(b) लेखन की स्पष्टता
(c) उचित श्रृंखलाबद्धता
(d) कथनों में तारतम्यता
उत्तर: (c) उचित श्रृंखलाबद्धता।
व्याख्या: प्रस्तावना कौशल में प्रश्नों, कथनों और विचारों को उचित क्रम में प्रस्तुत किया जाता है, ताकि विद्यार्थी के पूर्वज्ञान को नवीन पाठ से जोड़ा जा सके।
प्रश्न 9. कहानी कहने में 'क्रमबद्ध घटनाओं के वर्णन' पर ध्यान रखा जाता है, यह किस प्रकार की शिक्षण प्रविधि है?
(a) प्रश्नोत्तर प्रविधि
(b) वर्णन प्रविधि
(c) विवरण प्रविधि
(d) व्याख्यान प्रविधि
उत्तर: (c) विवरण प्रविधि।
व्याख्या: विवरण प्रविधि में किसी घटना, प्रसंग या विषय को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया जाता है। कहानी-कथन में घटनाओं का क्रम विशेष महत्त्व रखता है।
प्रश्न 10. गणित किट का उपकरण है—
(a) डोमिनोज
(b) बीकर
(c) क्लैम्प
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (a) डोमिनोज।
व्याख्या: डोमिनोज गणित किट की उपयोगी सामग्री है। इसका प्रयोग संख्या-बोध, गणना, मिलान तथा अन्य प्रारम्भिक गणितीय अवधारणाओं के अभ्यास में किया जा सकता है।
प्रश्न 11. तर्कात्मक क्रम से शिक्षण कराने से स्थायी एवं ठोस होता है—
(a) स्मृति
(b) शिक्षण
(c) अधिगम
(d) व्याख्यान
उत्तर: (c) अधिगम।
व्याख्या: विषय-वस्तु को तार्किक एवं क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करने से विद्यार्थी अवधारणाओं के बीच सम्बन्ध समझ पाता है, जिससे अधिगम अधिक स्पष्ट एवं स्थायी बनता है।
प्रश्न 12. सम्प्रेषण के लिए कक्षा का वातावरण होना चाहिए—
(a) सौहार्दपूर्ण
(b) नीरस
(c) अनुशासनात्मक
(d) प्रकाशपूर्ण
उत्तर: (a) सौहार्दपूर्ण।
व्याख्या: सौहार्दपूर्ण एवं भयमुक्त वातावरण में विद्यार्थी अपने विचार और कठिनाइयाँ स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर पाते हैं, जिससे सम्प्रेषण अधिक प्रभावी होता है।
प्रश्न 13. शिक्षण प्रक्रिया में समाहित प्रक्रिया होती है—
(a) दो
(b) तीन
(c) चार
(d) पाँच
उत्तर: (b) तीन।
व्याख्या: शिक्षण प्रक्रिया की तीन प्रमुख अवस्थाएँ मानी जाती हैं—पूर्व-सक्रिय अवस्था, अन्तःक्रियात्मक अवस्था तथा पश्च-सक्रिय अवस्था।
प्रश्न 14. बच्चों से कदमताल कराना, हाथ ऊपर-नीचे कराना तथा दाएँ-बाएँ मुड़ने के लिए कहना, ये गतिविधियाँ हैं—
(a) शारीरिक गतिविधि
(b) मानसिक गतिविधि
(c) शारीरिक व मानसिक दोनों गतिविधियाँ
(d) न तो शारीरिक न ही मानसिक गतिविधि
उत्तर: (c) शारीरिक व मानसिक दोनों गतिविधियाँ।
व्याख्या: इन क्रियाओं में निर्देश को समझने एवं उसका पालन करने के लिए मानसिक सक्रियता तथा शरीर को संचालित करने के लिए शारीरिक सक्रियता—दोनों की आवश्यकता होती है।
प्रश्न 15. 'उपचारात्मक शिक्षण' का प्रमुख कार्य है—
(a) लेख में सुधार करना
(b) दोषपूर्ण अध्ययन एवं अध्यापन के प्रभाव को दूर करना
(c) सुलेख पर बल देना
(d) गृहकार्य देना
उत्तर: (b) दोषपूर्ण अध्ययन एवं अध्यापन के प्रभाव को दूर करना।
व्याख्या: उपचारात्मक शिक्षण में विद्यार्थी की अधिगम-कठिनाइयों तथा त्रुटियों का निदान करके उपयुक्त शिक्षण द्वारा उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाता है।
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अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 16. शिक्षण की कोई एक परिभाषा लिखिए।
उत्तर: रायन्स के अनुसार, दूसरों को सीखने के लिए दिशा-निर्देश देने तथा निर्देशित करने की प्रक्रिया को शिक्षण कहते हैं।
प्रश्न 17. शिक्षण की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: (1) शिक्षण उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है। (2) शिक्षण शिक्षक एवं शिक्षार्थी के बीच अन्तःक्रियात्मक प्रक्रिया है।
प्रश्न 18. सम्प्रेषण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: विचारों, सूचनाओं, भावनाओं अथवा संदेशों के एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक आदान-प्रदान की प्रक्रिया सम्प्रेषण कहलाती है।
प्रश्न 19. खेल पर आधारित शिक्षण विधि के दो सोपान लिखिए।
उत्तर: (1) उपयुक्त खेल का चयन एवं योजना। (2) खेल का संचालन तथा अधिगम-परिणाम का मूल्यांकन।
प्रश्न 20. रुचिपूर्ण शिक्षण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: जिस शिक्षण में बालक की रुचि, जिज्ञासा और सक्रियता को ध्यान में रखकर सीखने को आनन्ददायी बनाया जाए, उसे रुचिपूर्ण शिक्षण कहते हैं।
प्रश्न 21. दक्षता आधारित शिक्षण विधि के दो सोपान लिखिए।
उत्तर: (1) पूर्व तैयारी—उद्देश्य एवं अपेक्षित दक्षता निर्धारित करना। (2) विषय-वस्तु का प्रस्तुतीकरण।
प्रश्न 22. उत्तम शिक्षण-अधिगम सामग्री की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: (1) सामग्री शिक्षण-उद्देश्यों एवं विषय-वस्तु के अनुरूप हो। (2) यह विद्यार्थियों की आयु एवं मानसिक स्तर के अनुकूल हो।
प्रश्न 23. शिक्षण-अधिगम सामग्री को कितने भागों में वर्गीकृत किया गया है?
उत्तर: तीन भागों में—श्रव्य सामग्री, दृश्य सामग्री और श्रव्य-दृश्य सामग्री।
प्रश्न 24. शिक्षण के संज्ञानात्मक क्षेत्र का बालक की किन क्रियाओं से सम्बन्ध होता है?
उत्तर: संज्ञानात्मक क्षेत्र का सम्बन्ध जानने, समझने, प्रयोग करने, विश्लेषण करने, संश्लेषण करने तथा मूल्यांकन जैसी मानसिक क्रियाओं से है।
प्रश्न 25. पुनर्बलन कौशल से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: विद्यार्थियों के वांछित व्यवहार या सही प्रतिक्रिया को सुदृढ़ करने के लिए उचित प्रशंसा, स्वीकृति अथवा संकेतों का प्रयोग पुनर्बलन कौशल कहलाता है।
प्रश्न 26. सहभागी शिक्षण के दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर: (1) विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करना। (2) सहयोगपूर्ण एवं स्थायी अधिगम को बढ़ावा देना।
प्रश्न 27. शिक्षण की आगमन विधि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: जिस विधि में विशिष्ट उदाहरणों एवं तथ्यों से सामान्य नियम या निष्कर्ष तक पहुँचा जाता है, उसे आगमन विधि कहते हैं।
प्रश्न 28. ज्ञात से अज्ञात की ओर शिक्षण सूत्र किस तथ्य पर आधारित है?
उत्तर: यह इस मनोवैज्ञानिक तथ्य पर आधारित है कि नया ज्ञान विद्यार्थी के पूर्वज्ञान से जोड़कर अधिक सरलता से सिखाया जा सकता है।
प्रश्न 29. शिक्षण में 'अभिप्रेरणा का सिद्धान्त' से क्या आशय है?
उत्तर: अभिप्रेरणा का सिद्धान्त बालक में सीखने की इच्छा, रुचि और सक्रियता उत्पन्न करके उसे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित करने पर बल देता है।
प्रश्न 30. 'अध्यापन आदेशात्मक न होकर निर्देशात्मक होना चाहिए' इस कथन से क्या आशय है?
उत्तर: शिक्षक को बालक पर आदेश थोपने के बजाय उचित मार्गदर्शन देकर उसे स्वयं सक्रिय होकर सीखने के अवसर प्रदान करने चाहिए।
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लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 31. 'सम्प्रेषण की कक्षा अध्यापन में क्या उपयोगिता है', स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: कक्षा-शिक्षण में सम्प्रेषण शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच ज्ञान, विचार एवं भावनाओं के प्रभावी आदान-प्रदान का माध्यम है। इसकी प्रमुख उपयोगिताएँ निम्नलिखित हैं—
- विषय-वस्तु को स्पष्ट एवं बोधगम्य बनाता है।
- विद्यार्थियों में रुचि, जिज्ञासा एवं सक्रिय सहभागिता बढ़ाता है।
- शिक्षक को विद्यार्थियों की कठिनाइयों एवं समझ का पता चलता है।
- प्रश्नोत्तर एवं प्रतिपुष्टि को सम्भव बनाता है।
- भयमुक्त एवं सहयोगपूर्ण कक्षा-वातावरण के निर्माण में सहायता करता है।
प्रश्न 32. शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षण सूत्रों का क्या महत्व है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर: शिक्षण सूत्र शिक्षक को विषय-वस्तु को मनोवैज्ञानिक, सरल और क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत करने की दिशा प्रदान करते हैं। इनके प्रयोग से शिक्षण बालक की समझ एवं पूर्वज्ञान के अनुरूप बनता है।
प्रमुख महत्त्व—
- शिक्षण को सरल, स्पष्ट एवं बोधगम्य बनाते हैं।
- नए ज्ञान को पूर्वज्ञान से जोड़ने में सहायता करते हैं।
- विषय-वस्तु को उचित क्रम में प्रस्तुत करने में सहायता करते हैं।
- विद्यार्थियों की रुचि एवं समझ बढ़ाते हैं।
उदाहरण: ज्ञात से अज्ञात की ओर, सरल से कठिन की ओर, मूर्त से अमूर्त की ओर तथा विशिष्ट से सामान्य की ओर।
प्रश्न 33. 'प्रयोग प्रदर्शन युक्ति' से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: जिस शिक्षण युक्ति में शिक्षक किसी प्रयोग, वस्तु या प्रक्रिया को विद्यार्थियों के सामने करके दिखाता है और उसके आधार पर तथ्य एवं सिद्धान्त स्पष्ट करता है, उसे प्रयोग-प्रदर्शन युक्ति कहते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ—
- विद्यार्थियों को प्रत्यक्ष निरीक्षण का अवसर मिलता है।
- अमूर्त वैज्ञानिक तथ्यों को स्पष्ट एवं मूर्त बनाया जा सकता है।
- ज्ञान अधिक स्थायी एवं प्रभावी बनता है।
- निरीक्षण, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होता है।
प्रश्न 34. 'बाल-केन्द्रित शिक्षण' तथा 'शिक्षक-केन्द्रित शिक्षण' में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
| शिक्षक-केन्द्रित शिक्षण | बाल-केन्द्रित शिक्षण |
|---|---|
| शिक्षक शिक्षण प्रक्रिया का मुख्य केन्द्र होता है। | बालक शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का मुख्य केन्द्र होता है। |
| शिक्षक ज्ञान एवं निर्देश देने में प्रमुख भूमिका निभाता है। | शिक्षक मार्गदर्शक एवं सहायक की भूमिका निभाता है। |
| विद्यार्थियों की सक्रियता अपेक्षाकृत कम रहती है। | विद्यार्थी सक्रिय होकर गतिविधियों एवं अनुभवों द्वारा सीखते हैं। |
| सभी विद्यार्थियों के लिए प्रायः समान शिक्षण-पद्धति अपनाई जाती है। | वैयक्तिक भिन्नताओं, रुचियों एवं आवश्यकताओं को महत्त्व दिया जाता है। |
प्रश्न 35. बहुकक्षा शिक्षण क्या है? शिक्षण में इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: जब एक शिक्षक एक ही समय में दो या दो से अधिक कक्षाओं अथवा स्तरों के विद्यार्थियों को पढ़ाता है, तो इसे बहुकक्षा शिक्षण कहते हैं। यह विशेष रूप से कम शिक्षक संख्या वाले विद्यालयों में उपयोगी होता है।
उपयोगिता—
- सीमित शिक्षकों की उपलब्धता में भी विभिन्न कक्षाओं का शिक्षण सम्भव बनाता है।
- विद्यार्थियों में स्वाध्याय एवं स्वतंत्र रूप से कार्य करने की आदत विकसित करता है।
- बड़े विद्यार्थी छोटे विद्यार्थियों की सहायता कर सकते हैं, जिससे सहपाठी अधिगम को बढ़ावा मिलता है।
- समूह कार्य, सहयोग एवं सामाजिक गुणों का विकास होता है।
- विभिन्न स्तरों के अनुसार गतिविधियाँ देकर सीखने की निरन्तरता बनाए रखी जा सकती है।
प्रश्न 36. शिक्षण कौशलों के एकीकरण का क्या अर्थ है? शिक्षण में इसकी उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: सूक्ष्म शिक्षण में अलग-अलग सीखे गए शिक्षण कौशलों को वास्तविक कक्षा-शिक्षण में आवश्यकता के अनुसार संयुक्त एवं समन्वित रूप से प्रयोग करना शिक्षण कौशलों का एकीकरण कहलाता है।
उपयोगिता—
- शिक्षक विभिन्न कौशलों का परिस्थितिनुसार प्रभावी प्रयोग करना सीखता है।
- सूक्ष्म शिक्षण में अर्जित कौशलों को सामान्य कक्षा-शिक्षण में लागू किया जा सकता है।
- शिक्षण अधिक स्वाभाविक, प्रभावशाली और उद्देश्यपूर्ण बनता है।
- प्रस्तावना, प्रश्न, व्याख्या, पुनर्बलन, श्यामपट्ट आदि कौशलों में समन्वय स्थापित होता है।
- विद्यार्थियों की सहभागिता एवं अधिगम की गुणवत्ता बढ़ती है।
प्रश्न 37. अपेक्षित अधिगम स्तर की प्राप्ति हेतु किए गये प्रयासों को समझाइए।
उत्तर: अपेक्षित या न्यूनतम अधिगम स्तर का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने वाला प्रत्येक बालक निर्धारित न्यूनतम ज्ञान एवं दक्षताएँ प्राप्त करे। इसके विकास के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए गए—
- NCERT ने UNICEF के सहयोग से 1978 से प्राथमिक शिक्षा में अपेक्षित अधिगम परिणामों एवं न्यूनतम अधिगम स्तरों से सम्बन्धित कार्य प्रारम्भ किया।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में प्रत्येक स्तर पर आवश्यक न्यूनतम अधिगम सुनिश्चित करने पर विशेष बल दिया गया।
- सन् 1990 में भारत सरकार ने प्रो. आर. एच. दवे की अध्यक्षता में समिति गठित की।
- दवे समिति ने प्राथमिक स्तर पर भाषा, गणित और पर्यावरण अध्ययन के न्यूनतम अधिगम स्तरों का निर्धारण किया।
- इन अधिगम स्तरों के अनुरूप पाठ्यक्रम, शिक्षण-अधिगम गतिविधियाँ, मूल्यांकन तथा उपचारात्मक शिक्षण पर बल दिया गया।
इन प्रयासों का उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना तथा प्रत्येक विद्यार्थी को आवश्यक न्यूनतम दक्षताओं तक पहुँचाना था।
प्रश्न 38. शिक्षण अधिगम सामग्री से आप क्या समझते हैं? शिक्षण में दृश्य उपकरणों की उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षक द्वारा प्रयोग की जाने वाली ऐसी सामग्री जो विषय-वस्तु को स्पष्ट, सरल, रोचक और प्रभावी बनाने में सहायता करे, शिक्षण-अधिगम सामग्री (TLM) कहलाती है।
दृश्य उपकरणों की उपयोगिता—
- विषय की स्पष्टता— चार्ट, मानचित्र, मॉडल, चित्र आदि जटिल विषयों को सरल बनाते हैं।
- रुचि एवं ध्यान— दृश्य सामग्री विद्यार्थियों का ध्यान आकर्षित करती है और रुचि बनाए रखती है।
- ज्ञान की स्थायित्व— देखकर सीखी गई सामग्री को समझना एवं याद रखना अपेक्षाकृत आसान होता है।
- प्रत्यक्ष अनुभव— मॉडल एवं वास्तविक वस्तुएँ विद्यार्थियों को विषय का अधिक ठोस अनुभव प्रदान करती हैं।
- समय की बचत— चित्र एवं आरेख कई बातों को कम समय में स्पष्ट कर सकते हैं।
प्रश्न 39. 'अध्यापक के लिए श्यामपट्ट सर्वाधिक महत्वपूर्ण सहायक सामग्री है।' आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं? कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: श्यामपट्ट कक्षा-शिक्षण की अत्यन्त उपयोगी, सरल एवं सुलभ दृश्य सहायक सामग्री है। शिक्षक आवश्यकतानुसार तत्काल विषय-वस्तु को लिखकर, रेखाचित्र बनाकर तथा उदाहरण देकर स्पष्ट कर सकता है।
इसकी प्रमुख उपयोगिताएँ—
- मुख्य शब्दों, सूत्रों एवं शिक्षण-बिन्दुओं को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है।
- रेखाचित्र, तालिका, आकृति और उदाहरण तत्काल बनाए जा सकते हैं।
- विद्यार्थियों का ध्यान विषय-वस्तु की ओर केन्द्रित रहता है।
- शिक्षण क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित बनाया जा सकता है।
- यह कम खर्चीली तथा बार-बार प्रयोग की जा सकने वाली सामग्री है।
अतः उचित श्यामपट्ट-लेखन शिक्षण को अधिक स्पष्ट, प्रभावी और बोधगम्य बनाता है।
प्रश्न 40. उपचारात्मक शिक्षण से आप क्या समझते हैं? मन्द बुद्धि छात्रों के लिए किस प्रकार उपचारात्मक शिक्षण किया जाना चाहिए?
उत्तर: विद्यार्थी की अधिगम-कठिनाइयों का निदान करके उन्हें दूर करने के लिए आवश्यक अतिरिक्त एवं सुधारात्मक शिक्षण प्रदान करना उपचारात्मक शिक्षण कहलाता है।
कम बौद्धिक क्षमता वाले विद्यार्थियों के लिए उपचारात्मक शिक्षण—
- कठिनाई का निदान— सबसे पहले यह पता लगाया जाए कि विद्यार्थी को किस विषय, अवधारणा या कौशल में कठिनाई है।
- सरल एवं छोटे सोपान— विषय-वस्तु को छोटे-छोटे एवं सरल चरणों में प्रस्तुत किया जाए।
- व्यक्तिगत गति— विद्यार्थी को उसकी सीखने की गति के अनुसार पर्याप्त समय दिया जाए।
- मूर्त एवं बहु-संवेदी सामग्री— चित्र, मॉडल, वस्तुओं और गतिविधियों का अधिक प्रयोग किया जाए।
- पुनरावृत्ति एवं अभ्यास— आवश्यक विषय का नियमित अभ्यास कराया जाए।
- सकारात्मक पुनर्बलन— छोटी-छोटी सफलताओं पर भी प्रशंसा एवं प्रोत्साहन दिया जाए।
- भयमुक्त वातावरण— विद्यार्थी की तुलना या उपहास न करके आत्मविश्वास विकसित किया जाए।
Semester 1 की Complete तैयारी
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