जैव-विविधता: परिचय, आवश्यकता एवं महत्त्व
जैव-विविधता (Biodiversity)
जैव-विविधता शब्द का शाब्दिक अर्थ जीवों की विविधता है। पृथ्वी के जीवमण्डल में विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षी, जीव-जन्तु तथा वनस्पतियाँ पाई जाती हैं।
इन जीवों में शारीरिक तथा आनुवंशिक स्तर पर अनेक प्रकार की भिन्नताएँ पाई जाती हैं।
विश्व अथवा किसी विशेष क्षेत्र में एक साथ पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं एवं वनस्पतियों की विविधता को जैव-विविधता कहते हैं।
जैव-विविधता का व्यापक अर्थ
जैव-विविधता केवल जीवों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें विभिन्न प्रकार के जीवों, उनकी प्रजातियों तथा उनके बीच पाए जाने वाले पारस्परिक सम्बन्धों को भी सम्मिलित किया जाता है।
जैव-विविधता को बनाए रखने के लिए प्राकृतिक पर्यावरण की स्थिति तथा उसके सन्तुलन को बनाए रखना आवश्यक है।
जैव-विविधता के प्रमुख आधार
जैव-विविधता विभिन्न जीवों के परस्पर सम्बन्ध तथा उनके पर्यावरण के साथ सामंजस्य से जुड़ी होती है।
- प्रजातियों के बीच पारस्परिक सम्बन्ध
- जगत का विस्तार
- सजीव प्राणियों का सामूहिक एकीकरण
- पारितन्त्र की सुरक्षा
- जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का विकास
- जीवमण्डल एवं वातावरण का सन्तुलन
जैविक संसाधन (Biological Resources)
जैव-विविधता को जैविक संसाधन के रूप में भी देखा जाता है।
जैविक संसाधनों में जीव-जगत के वे सजीव घटक सम्मिलित होते हैं जिनका उपयोग मानव कल्याण के लिए किया जाता है।
इनमें प्रमुख रूप से—
- आनुवंशिक संसाधन
- प्राणी वर्ग
- जनसंख्या
- पारितन्त्र के सजीव घटक
सम्मिलित किए जाते हैं।
जैव-विविधता की आवश्यकता एवं महत्त्व
जैव-विविधता हमारे दैनिक जीवन तथा पर्यावरण के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसके कारण जीव-जगत तथा पर्यावरण के विभिन्न घटकों के बीच सन्तुलन बना रहता है।
जैव-विविधता की आवश्यकता एवं महत्त्व को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है—
- पारितन्त्र को स्थायित्व प्रदान करना— जैव-विविधता पारिस्थितिकी तन्त्र को स्थायित्व प्रदान करती है।
- नवीनता प्रदान करना— जैव-विविधता हमारे व्यक्तित्व में नवीनता लाती है।
- पारम्परिक शैलियों से सम्बन्ध— यह हमारी पारम्परिक शैलियों से सम्बन्ध जोड़ने में सहायक होती है।
- आवश्यक तथ्यों की उपलब्धता— जैव-विविधता हमें आवश्यक तथ्यों की जानकारी प्रदान करती है।
- पृथ्वी की स्वच्छता— जैव-विविधता पृथ्वी की स्वच्छता बनाए रखने में सहायक होती है।
- पृथ्वी की सुरक्षा— यह हमारे ग्रह पृथ्वी की सुरक्षा में सहायक होती है।
- जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में वृद्धि— जैव-विविधता जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वृद्धि एवं विकास में सहायता करती है।
- आर्थिक समृद्धि— जैव-विविधता आर्थिक समृद्धि प्रदान करने में भी सहायक होती है।
जैव-विविधता एक नजर में
| आधार | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| अर्थ | जीवों की विविधता |
| क्षेत्र | जीव-जन्तु, पशु-पक्षी एवं वनस्पतियाँ |
| भिन्नता | शारीरिक एवं आनुवंशिक स्तर पर |
| मुख्य आधार | प्रजातियों के बीच पारस्परिक सम्बन्ध एवं पर्यावरणीय सन्तुलन |
| जैविक संसाधन | आनुवंशिक संसाधन, प्राणी वर्ग, जनसंख्या एवं पारितन्त्र के सजीव घटक |
| प्रमुख महत्त्व | पारितन्त्र का स्थायित्व, पृथ्वी की सुरक्षा एवं आर्थिक समृद्धि |
- जैव-विविधता का अर्थ जीवों की विविधता है।
- विश्व या किसी विशेष क्षेत्र में पाए जाने वाले विभिन्न जीव-जन्तुओं एवं वनस्पतियों की विविधता को जैव-विविधता कहते हैं।
- जीवों में शारीरिक तथा आनुवंशिक स्तर पर भिन्नताएँ पाई जाती हैं।
- जैव-विविधता पर्यावरण एवं जीवमण्डल के सन्तुलन को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण है।
- जैव-विविधता में प्रजातियों के पारस्परिक सम्बन्ध तथा पारितन्त्र की सुरक्षा भी सम्मिलित है।
- जैव-विविधता को जैविक संसाधन भी कहा जाता है।
- जैविक संसाधनों में आनुवंशिक संसाधन, प्राणी वर्ग, जनसंख्या तथा पारितन्त्र के सजीव घटक सम्मिलित होते हैं।
- जैव-विविधता पारितन्त्र को स्थायित्व प्रदान करती है।
- यह पृथ्वी की स्वच्छता, सुरक्षा तथा जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की वृद्धि में सहायक है।
- जैव-विविधता आर्थिक समृद्धि प्रदान करने में भी सहायक होती है।
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अकोशिकीय, एककोशिकीय एवं बहुकोशिकीय जीव
कोशिकीय संगठन के आधार पर जीव
जीवों के शरीर में पाई जाने वाली कोशिकाओं के आधार पर उन्हें अकोशिकीय, एककोशिकीय तथा बहुकोशिकीय रूप में समझा जा सकता है।
1. अकोशिकीय जीव (Acellular Organisms)
ऐसे जीव जिनमें कोई कोशिका नहीं पाई जाती है, अकोशिकीय जीव कहलाते हैं।
उदाहरण—
- विषाणु
- जीवाणु
2. एककोशिकीय जीव (Unicellular Organisms)
ऐसे जीव जो केवल एक कोशिका के बने होते हैं, एककोशिकीय जीव कहलाते हैं।
इन जीवों में जीवन की आवश्यक क्रियाएँ एक ही कोशिका द्वारा सम्पन्न की जाती हैं।
3. बहुकोशिकीय जीव (Multicellular Organisms)
ऐसे जीव जिनमें एक या एक से अधिक कोशिकाएँ पाई जाती हैं, बहुकोशिकीय जीव कहलाते हैं।
इन जीवों का संगठन एककोशिकीय जीवों की अपेक्षा अधिक विकसित होता है।
अकोशिकीय, एककोशिकीय एवं बहुकोशिकीय जीव एक नजर में
| प्रकार | मुख्य विशेषता |
|---|---|
| अकोशिकीय जीव | कोई कोशिका नहीं पाई जाती |
| एककोशिकीय जीव | एक कोशिका के बने होते हैं |
| बहुकोशिकीय जीव | एक या एक से अधिक कोशिकाएँ पाई जाती हैं |
कोशिकीय प्राणियों का वर्गीकरण
कोशिकीय प्राणियों को कोशिका की संरचना के आधार पर मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है—
- प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell)
- यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell)
1. प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell)
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में अविकसित एवं आदिम कोशिकाएँ पाई जाती हैं।
इनका आकार बहुत छोटा होता है।
इन कोशिकाओं में केन्द्रक एवं केन्द्रक द्रव्य नहीं पाया जाता, बल्कि केवल एक क्रोमोसोम पाया जाता है।
इनके कोशिकांग भी कोशिका भित्ति से घिरे हुए नहीं पाए जाते हैं।
प्रोकैरियोटिक जीवों में कोशिका विभाजन असूत्री विभाजन द्वारा होता है।
प्रोकैरियोटिक जीवों के उदाहरण—
- जीवाणु
- नील-हरित शैवाल (सायनोबैक्टीरिया)
प्रोकैरियोटिक कोशिका की प्रमुख विशेषताएँ
- कोशिकाएँ अविकसित एवं आदिम होती हैं।
- आकार बहुत छोटा होता है।
- केन्द्रक एवं केन्द्रक द्रव्य नहीं पाया जाता।
- केवल एक क्रोमोसोम पाया जाता है।
- कोशिका विभाजन असूत्री विभाजन द्वारा होता है।
2. यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell)
यूकैरियोटिक कोशिकाओं में विकसित एवं नवीन कोशिकाएँ पाई जाती हैं।
इनका आकार प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं की अपेक्षा बहुत बड़ा होता है।
इनमें केन्द्रक, केन्द्रक द्रव्य तथा एक से अधिक क्रोमोसोम पाए जाते हैं।
इनके कोशिकांग भी कोशिका भित्ति से घिरे हुए पाए जाते हैं।
यूकैरियोटिक कोशिकाओं में कोशिका विभाजन समसूत्री विभाजन तथा अर्धसूत्री विभाजन द्वारा होता है।
यूकैरियोटिक कोशिका की प्रमुख विशेषताएँ
- कोशिकाएँ विकसित एवं नवीन होती हैं।
- इनका आकार अपेक्षाकृत बड़ा होता है।
- केन्द्रक एवं केन्द्रक द्रव्य पाए जाते हैं।
- एक से अधिक क्रोमोसोम पाए जाते हैं।
- कोशिका विभाजन समसूत्री तथा अर्धसूत्री विभाजन द्वारा होता है।
प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिका में अन्तर
| आधार | प्रोकैरियोटिक कोशिका | यूकैरियोटिक कोशिका |
|---|---|---|
| प्रकृति | अविकसित एवं आदिम | विकसित एवं नवीन |
| आकार | बहुत छोटा | बहुत बड़ा |
| केन्द्रक | केन्द्रक एवं केन्द्रक द्रव्य नहीं पाया जाता | केन्द्रक एवं केन्द्रक द्रव्य पाए जाते हैं |
| क्रोमोसोम | एक क्रोमोसोम | एक से अधिक क्रोमोसोम |
| कोशिका विभाजन | असूत्री विभाजन | समसूत्री एवं अर्धसूत्री विभाजन |
- जिन जीवों में कोई कोशिका नहीं पाई जाती है, वे अकोशिकीय जीव कहलाते हैं।
- एक कोशिका से बने जीव एककोशिकीय जीव कहलाते हैं।
- कोशिकीय प्राणियों को प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक दो भागों में बाँटा जाता है।
- प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ अविकसित, आदिम तथा आकार में बहुत छोटी होती हैं।
- प्रोकैरियोटिक कोशिका में केन्द्रक एवं केन्द्रक द्रव्य नहीं पाया जाता तथा एक क्रोमोसोम होता है।
- जीवाणु एवं नील-हरित शैवाल प्रोकैरियोटिक जीवों के उदाहरण हैं।
- यूकैरियोटिक कोशिकाएँ विकसित एवं आकार में बड़ी होती हैं।
- यूकैरियोटिक कोशिकाओं में केन्द्रक, केन्द्रक द्रव्य तथा एक से अधिक क्रोमोसोम पाए जाते हैं।
- प्रोकैरियोटिक जीवों में असूत्री विभाजन होता है।
- यूकैरियोटिक कोशिकाओं में समसूत्री एवं अर्धसूत्री विभाजन होता है।
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संगठन के स्तर एवं जीव-जगत का वर्गीकरण
संगठन के आधार पर जीवों का वर्गीकरण
सभी जीवों का एक निश्चित आकार तथा भौतिक एवं रासायनिक संगठन होता है, जिसे वे अपने जनकों से वंशानुगत रूप में प्राप्त करते हैं।
संगठन की जटिलता के आधार पर जीवों में विभिन्न स्तर पाए जाते हैं।
संगठन के प्रमुख स्तर निम्नलिखित हैं—
- जीवद्रव्य स्तर (Protoplasmic Level)
- कोशिकीय स्तर (Cellular Level)
- कोशिका-ऊतकीय स्तर (Cell Tissue Level)
- अंग स्तर (Organ Level)
- अंग-तंत्र स्तर (Organ System Level)
1. जीवद्रव्य स्तर (Protoplasmic Level)
जीवद्रव्य स्तर संगठन का प्रारम्भिक स्तर है।
इस स्तर में ऐसी पादप, जीवाणु अथवा कवक कोशिका का उल्लेख किया जाता है जिसकी कोशिका भित्ति को किसी यांत्रिक या रासायनिक विधि द्वारा पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से हटा दिया गया हो।
प्रोटोजोआ का शारीरिक संगठन जीवद्रव्य स्तर का होता है।
2. कोशिकीय स्तर (Cellular Level)
कोशिकीय स्तर पर सभी कोशिकाएँ स्वतंत्र रूप से अपना कार्य सम्पन्न करती हैं।
इस स्तर के शारीरिक संगठन वाले जीव बहुकोशिकीय होते हैं, परन्तु इनमें कोशिकीय ऊतक का निर्माण नहीं होता है।
अर्थात्—
कोशिकाएँ उपस्थित → कोशिकाएँ स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं → ऊतक का निर्माण नहीं
3. कोशिका-ऊतकीय स्तर (Cell Tissue Level)
समान संरचना तथा समान कार्य करने वाली कोशिकाएँ मिलकर एक समूह बनाती हैं। ऐसे कोशिका-समूह को ऊतक कहा जाता है।
इस स्तर पर कोशिकाएँ एक निश्चित कार्य के लिए समूह के रूप में संगठित होती हैं।
हाइड्रा में ऊतकीय स्तर का संगठन पाया जाता है।
ऊतक क्या है?
समान संरचना तथा समान कार्य करने वाली कोशिकाओं के समूह को ऊतक कहते हैं।
4. अंग स्तर (Organ Level)
जीवों में विभिन्न प्रकार के ऊतक मिलकर एक अंग का निर्माण करते हैं।
प्रत्येक अंग का अपना एक विशेष कार्य होता है।
अर्थात्—
अनेक प्रकार के ऊतक → अंग → विशेष कार्य
5. अंग-तंत्र स्तर (Organ System Level)
जटिल संरचना वाले जीवों में समान कार्य से सम्बन्ध रखने वाले अनेक अंग मिलकर एक तंत्र का निर्माण करते हैं।
अर्थात्—
सम्बन्धित अंगों का समूह → अंग-तंत्र
संगठन के स्तर एक नजर में
| संगठन का स्तर | मुख्य विशेषता |
|---|---|
| जीवद्रव्य स्तर | प्रारम्भिक संगठन; प्रोटोजोआ में पाया जाता है |
| कोशिकीय स्तर | कोशिकाएँ स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं तथा ऊतक नहीं बनता |
| कोशिका-ऊतकीय स्तर | समान संरचना एवं कार्य वाली कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं |
| अंग स्तर | विभिन्न प्रकार के ऊतक मिलकर अंग बनाते हैं |
| अंग-तंत्र स्तर | समान कार्य से सम्बन्धित अंग मिलकर तंत्र बनाते हैं |
जीव-जगत का वर्गीकरण
जीवों में अनेक प्रकार की भिन्नताएँ पाई जाती हैं। कोशिकाओं की संरचना, पोषण तथा अन्य लक्षणों के आधार पर जीवों का वर्गीकरण किया जाता है।
आर. एच. व्हिटेकर ने जीवों को पाँच जगतों में विभाजित किया—
- मोनेरा जगत (Monera Kingdom)
- प्रोटिस्टा जगत (Protista Kingdom)
- प्लांटी जगत (Plantae Kingdom)
- कवक जगत (Fungi Kingdom)
- जन्तु जगत (Animalia Kingdom)
1. मोनेरा जगत (Monera Kingdom)
मोनेरा जगत में आदिम प्रकार के जीव सम्मिलित किए जाते हैं।
इनमें प्रोकैरियोटिक कोशिका तथा अविकसित केन्द्रक पाया जाता है।
इसके प्रमुख उदाहरण—
- जीवाणु
- नील-हरित शैवाल
2. प्रोटिस्टा जगत (Protista Kingdom)
प्रोटिस्टा जगत में एककोशिकीय जीव पाए जाते हैं।
इनमें विकसित केन्द्रक वाली यूकैरियोटिक कोशिकाएँ पाई जाती हैं।
इस जगत के जीव स्वपोषी तथा विषमपोषी दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
अमीबा इसका उदाहरण है।
3. प्लांटी जगत (Plantae Kingdom)
समस्त हरे रंग के बहुकोशिकीय यूकैरियोटिक जीवों को पादप जगत में रखा जाता है।
इनकी कोशिकाओं में रिक्तिकाएँ भी पाई जाती हैं।
4. कवक जगत (Fungi Kingdom)
कवक जगत में सभी प्रकार के कवकों को रखा जाता है।
ये यूकैरियोटिक होते हैं तथा इनमें पर्णहरिम का अभाव होता है।
कवकों में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया नहीं होती है।
5. जन्तु जगत (Animalia Kingdom)
सभी प्रकार के बहुकोशिकीय जन्तुओं को जन्तु जगत में रखा जाता है।
इस जगत के जीव यूकैरियोटिक होते हैं।
ये अपना भोजन पौधों अथवा अन्य जन्तुओं से प्राप्त करते हैं।
पाँच जगत एक नजर में
| जगत | मुख्य विशेषता | उदाहरण / तथ्य |
|---|---|---|
| मोनेरा | आदिम, प्रोकैरियोटिक कोशिका एवं अविकसित केन्द्रक | जीवाणु, नील-हरित शैवाल |
| प्रोटिस्टा | एककोशिकीय एवं यूकैरियोटिक | अमीबा; स्वपोषी एवं विषमपोषी दोनों |
| प्लांटी | हरे, बहुकोशिकीय एवं यूकैरियोटिक | कोशिकाओं में रिक्तिकाएँ |
| कवक | यूकैरियोटिक तथा पर्णहरिम रहित | प्रकाश-संश्लेषण नहीं होता |
| जन्तु | बहुकोशिकीय एवं यूकैरियोटिक | भोजन पौधों या अन्य जन्तुओं से प्राप्त करते हैं |
संगठन और वर्गीकरण को सरल रूप में समझें
जीवों में संगठन सरल स्तर से जटिल स्तर की ओर बढ़ता है। कोशिकाएँ समूह बनाकर ऊतक, विभिन्न ऊतक अंग तथा सम्बन्धित अंग मिलकर अंग-तंत्र बनाते हैं।
इसे इस प्रकार याद कर सकते हैं—
जीवद्रव्य स्तर → कोशिकीय स्तर → कोशिका-ऊतकीय स्तर → अंग स्तर → अंग-तंत्र स्तर
जीव-जगत के पाँच प्रमुख वर्गों को इस क्रम में याद किया जा सकता है—
मोनेरा → प्रोटिस्टा → प्लांटी → कवक → जन्तु
- संगठन के आधार पर जीवों में जीवद्रव्य, कोशिकीय, कोशिका-ऊतकीय, अंग एवं अंग-तंत्र स्तर पाए जाते हैं।
- प्रोटोजोआ में जीवद्रव्य स्तर का संगठन पाया जाता है।
- कोशिकीय स्तर पर कोशिकाएँ स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं तथा ऊतक का निर्माण नहीं होता।
- समान संरचना एवं कार्य करने वाली कोशिकाओं के समूह को ऊतक कहते हैं।
- हाइड्रा में ऊतकीय स्तर का संगठन पाया जाता है।
- अनेक प्रकार के ऊतक मिलकर अंग तथा समान कार्य से सम्बन्धित अंग मिलकर अंग-तंत्र बनाते हैं।
- आर. एच. व्हिटेकर ने जीवों को पाँच जगतों—मोनेरा, प्रोटिस्टा, प्लांटी, कवक एवं जन्तु—में विभाजित किया।
- मोनेरा में प्रोकैरियोटिक तथा प्रोटिस्टा में एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव पाए जाते हैं।
- प्लांटी जगत में हरे बहुकोशिकीय यूकैरियोटिक जीव तथा कवक जगत में पर्णहरिम रहित यूकैरियोटिक जीव रखे जाते हैं।
- जन्तु जगत में बहुकोशिकीय यूकैरियोटिक जन्तु सम्मिलित होते हैं।
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हार्मोन्स: परिचय एवं शरीर में उनकी भूमिका
हार्मोन्स (Hormones)
हार्मोन्स शरीर में प्रेरक का कार्य करते हैं। ये कार्बनिक यौगिक होते हैं तथा शरीर में बहुत कम मात्रा में स्रावित होते हैं।
इनकी अत्यन्त सूक्ष्म मात्रा भी शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं के नियंत्रण एवं समन्वय के लिए पर्याप्त होती है।
हार्मोन्स ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं जो शरीर की विभिन्न जैविक एवं रासायनिक क्रियाओं को नियंत्रित, नियमित तथा समन्वित करते हैं।
हार्मोन्स की प्रमुख विशेषताएँ
- ये शरीर में बहुत कम मात्रा में स्रावित होते हैं।
- ये विभिन्न जैविक क्रियाओं का नियंत्रण एवं समन्वय करते हैं।
- तन्त्रिकीय समन्वय की अपेक्षा इनका प्रभाव अपेक्षाकृत धीरे उत्पन्न होता है।
- इनके द्वारा उत्पन्न प्रभाव अधिक समय तक बना रह सकता है।
- इनकी कमी अथवा अधिकता होने पर शरीर में कार्यात्मक रोग उत्पन्न हो सकते हैं।
हार्मोन्स एवं रासायनिक समन्वय
शरीर में अनेक रासायनिक क्रियाएँ लगातार होती रहती हैं। कुछ हार्मोन्स इन क्रियाओं का समन्वय तथा नियंत्रण करते हैं।
हार्मोन्स द्वारा होने वाले इस प्रकार के समन्वय को रासायनिक समन्वय (Chemical Co-ordination) कहा जाता है।
अर्थात्—
हार्मोन → रासायनिक क्रियाओं का नियंत्रण → विभिन्न अंगों के कार्यों में समन्वय
हार्मोन शरीर की क्रियाओं को कैसे नियंत्रित करते हैं?
हार्मोन्स शरीर में होने वाली रासायनिक क्रियाओं को प्रारम्भ करने के स्थान पर मुख्य रूप से उनका नियमन एवं नियंत्रण करते हैं।
इस प्रकार वे शरीर के आन्तरिक वातावरण को सामान्य बनाए रखने तथा विभिन्न अंगों की क्रियाओं में समन्वय स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हार्मोन्स के प्रभाव के दो प्रमुख तरीके
1. प्रोटीन हार्मोन्स का प्रभाव
प्रोटीन हार्मोन्स कोशिका कला में उपस्थित एडीनाइल साइक्लेज (Adenyl Cyclase) एन्जाइम को सक्रिय करते हैं।
यह एन्जाइम कोशिकाद्रव्य में उपस्थित ATP को चक्रीय एडीनोसिन मोनोफॉस्फेट में परिवर्तित करता है, जिससे कोशिका की क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है।
2. स्टेरॉयड हार्मोन्स का प्रभाव
स्टेरॉयड हार्मोन्स सीधे कोशिका के सम्पर्क में आकर जीन की क्रिया को प्रभावित करते हैं।
ये आवश्यकता के अनुसार सक्रिय जीन को निष्क्रिय अथवा सुप्त जीन को सक्रिय कर सकते हैं, जिससे प्रोटीन संश्लेषण प्रभावित होता है।
शरीर में हार्मोन्स की भूमिका
हार्मोन्स शरीर की विभिन्न क्रियाओं की कार्यात्मक गति को बनाए रखने में सहायता करते हैं।
इनका महत्त्व निम्न प्रमुख क्रियाओं में देखा जाता है—
- वृद्धि एवं विकास का नियंत्रण
- शरीर की रासायनिक क्रियाओं का नियमन
- लैंगिक लक्षणों का विकास
- लैंगिक परिपक्वता का नियंत्रण
- जनन सम्बन्धी क्रियाओं का नियंत्रण
- बाहरी वातावरण में परिवर्तन होने पर शरीर के आन्तरिक वातावरण को सामान्य बनाए रखने में सहायता
तन्त्रिकीय एवं हार्मोनल नियंत्रण
शरीर की जैविक क्रियाओं के नियंत्रण में तन्त्रिकीय नियंत्रण तथा हार्मोनल नियंत्रण एक-दूसरे के सहयोगी एवं नियामक के रूप में कार्य करते हैं।
इस प्रकार शरीर की विभिन्न क्रियाएँ केवल एक तन्त्र के द्वारा नहीं, बल्कि तन्त्रिका तन्त्र तथा हार्मोन्स के समन्वित प्रभाव से नियंत्रित होती हैं।
अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ (Endocrine Glands)
हार्मोन स्रावित करने वाली ग्रन्थियों को नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ अथवा अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ कहा जाता है।
इन ग्रन्थियों में वाहिकाएँ नहीं होतीं और ये अपना स्राव सीधे रक्त में छोड़ती हैं।
रक्त के साथ हार्मोन शरीर के किसी विशिष्ट स्थान पर पहुँचता है और वहाँ विशिष्ट परिवर्तन उत्पन्न करता है।
इसे सरल क्रम में इस प्रकार समझ सकते हैं—
अन्तःस्रावी ग्रन्थि → हार्मोन का स्राव → रक्त → विशिष्ट स्थान → विशिष्ट प्रभाव
अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के उदाहरण
मानव शरीर की प्रमुख अन्तःस्रावी ग्रन्थियों में—
- थायरॉयड ग्रन्थि
- अधिवृक्क ग्रन्थि
- पीयूष ग्रन्थि
- पीनियल ग्रन्थि
- थाइमस ग्रन्थि
आदि सम्मिलित हैं।
हार्मोन्स एक नजर में
| आधार | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| प्रकृति | कार्बनिक यौगिक |
| मात्रा | बहुत कम मात्रा में स्रावित |
| मुख्य कार्य | जैविक एवं रासायनिक क्रियाओं का नियंत्रण और समन्वय |
| समन्वय | हार्मोन्स द्वारा होने वाला समन्वय रासायनिक समन्वय कहलाता है |
| स्राव करने वाली ग्रन्थियाँ | अन्तःस्रावी अथवा नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ |
| स्राव का माध्यम | सीधे रक्त में |
- हार्मोन्स कार्बनिक यौगिक होते हैं तथा बहुत कम मात्रा में स्रावित होते हैं।
- हार्मोन्स शरीर की जैविक क्रियाओं को नियंत्रित, नियमित एवं समन्वित करते हैं।
- हार्मोन्स द्वारा होने वाले समन्वय को रासायनिक समन्वय कहते हैं।
- तन्त्रिकीय समन्वय की अपेक्षा हार्मोन्स का प्रभाव धीरे उत्पन्न होता है, परन्तु अधिक समय तक रह सकता है।
- हार्मोन्स की कमी अथवा अधिकता से शरीर में कार्यात्मक रोग उत्पन्न हो सकते हैं।
- हार्मोन्स वृद्धि, विकास, लैंगिक लक्षणों, लैंगिक परिपक्वता तथा जनन आदि का नियंत्रण करते हैं।
- तन्त्रिकीय तथा हार्मोनल नियंत्रण शरीर में एक-दूसरे के सहयोगी के रूप में कार्य करते हैं।
- हार्मोन स्रावित करने वाली नलिकाविहीन ग्रन्थियों को अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ कहते हैं।
- अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ अपना स्राव सीधे रक्त में छोड़ती हैं।
- रक्त द्वारा हार्मोन विशिष्ट स्थान तक पहुँचकर विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न करता है।
मानव शरीर की प्रमुख अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ एवं हार्मोन्स
अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ (Endocrine Glands)
हार्मोन स्रावित करने वाली ग्रन्थियों को नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ या अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ कहते हैं।
इनमें वाहिकाएँ नहीं होतीं तथा ये अपना स्राव सीधे रक्त में छोड़ती हैं। रक्त के माध्यम से हार्मोन्स शरीर के विशिष्ट स्थानों तक पहुँचकर वहाँ विशेष प्रभाव उत्पन्न करते हैं।
मानव शरीर में पाई जाने वाली प्रमुख अन्तःस्रावी ग्रन्थियों में पीयूष या पिट्यूटरी ग्रन्थि, थायरॉयड, पैराथायरॉयड, अधिवृक्क, पीनियल, जनन ग्रन्थि तथा अग्न्याशय आदि सम्मिलित हैं।
1. थायरॉयड ग्रन्थि (Thyroid Gland)
थायरॉयड ग्रन्थि मनुष्य की गर्दन में स्थित होती है।
इस ग्रन्थि से थायरॉक्सिन हार्मोन स्रावित होता है।
थायरॉक्सिन का कार्य
- शारीरिक उपापचयी क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
- इसकी कमी होने पर हृदय की गति धीमी हो जाती है।
- शरीर में सुस्ती तथा मानसिक दुर्बलता उत्पन्न हो सकती है।
- इसकी अधिकता से चिड़चिड़ापन, घबराहट तथा आँखें बड़ी होकर बाहर निकलने जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
2. पैराथायरॉयड ग्रन्थि (Parathyroid Gland)
पैराथायरॉयड ग्रन्थि भी मनुष्य की गर्दन में स्थित होती है।
इससे पैराथार्मोन स्रावित होता है।
पैराथार्मोन का कार्य
- शरीर में कैल्शियम की निश्चित मात्रा बनाए रखने में सहायता करता है।
- हड्डियों की वृद्धि तथा दाँतों के बनने का नियमन करता है।
- इसकी अधिकता से हड्डियाँ कोमल तथा टेढ़ी हो सकती हैं।
3. अधिवृक्क ग्रन्थि (Adrenal Gland)
अधिवृक्क ग्रन्थि वृक्क के ऊपर स्थित होती है।
इस ग्रन्थि से अनेक हार्मोन्स स्रावित होते हैं, जिनमें कॉर्टिन या कॉर्टिसोन, कॉर्टिकोस्टेरोन तथा एड्रीनलिन प्रमुख हैं।
कॉर्टिन या कॉर्टिसोन
- इसकी कमी से भूख कम लगती है।
- यह प्रोटीन को शर्करा में बदलने में सहायता करता है।
कॉर्टिकोस्टेरोन
यह स्त्री तथा पुरुष के गौण लैंगिक लक्षणों को नियंत्रित करता है।
पुरुषों में इसकी कमी होने पर स्तन निकल सकते हैं तथा स्त्रियों में दाढ़ी-मूँछ निकलने जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
एड्रीनलिन
एड्रीनलिन रुधिर दाब को नियंत्रित करता है।
4. पिट्यूटरी या पीयूष ग्रन्थि (Pituitary Gland)
पिट्यूटरी ग्रन्थि मनुष्य के सिर में स्थित होती है।
इसे मास्टर ग्रन्थि (Master Gland) भी कहा जाता है।
इससे लगभग 13 हार्मोन स्रावित होते हैं। इसके प्रमुख हार्मोन्स में वृद्धि हार्मोन, फॉलिकल उत्तेजक हार्मोन, थायरॉयड उत्तेजक हार्मोन, ऑक्सीटोसिन तथा प्रोलैक्टिन सम्मिलित हैं।
वृद्धि हार्मोन (Growth Hormone - GH)
यह शरीर की वृद्धि को प्रभावित करता है।
- इसकी कमी से व्यक्ति बौना रह सकता है।
- इसकी अधिकता से व्यक्ति असामान्य रूप से अधिक लम्बा हो सकता है।
फॉलिकल उत्तेजक हार्मोन (FSH)
स्त्रियों में यह फॉलिकल की वृद्धि तथा पुरुषों में वृषण को प्रभावित करता है, जिससे शुक्राणुओं के उत्पादन में सहायता मिलती है।
थायरॉयड उत्तेजक हार्मोन (TSH)
यह थायरॉयड ग्रन्थि को थायरॉक्सिन हार्मोन बनाने के लिए उत्तेजित करता है।
ऑक्सीटोसिन हार्मोन
यह शिशु के जन्म के समय गर्भाशय की दीवार में संकुचन उत्पन्न करता है।
प्रोलैक्टिन हार्मोन (PRL)
यह स्तनों में दुग्ध स्राव में सहायक होता है।
5. अग्न्याशय ग्रन्थि (Pancreas Gland)
अग्न्याशय ग्रन्थि ग्रहणी के पास स्थित होती है।
इससे इन्सुलिन स्रावित होता है।
इन्सुलिन का प्रमुख कार्य रुधिर में शर्करा की मात्रा का नियमन करना है।
6. पीनियल ग्रन्थि (Pineal Gland)
पीनियल ग्रन्थि से मेलाटोनिन हार्मोन स्रावित होता है।
यह वृषण तथा अण्डाशय की वृद्धि को प्रभावित करता है।
7. वृषण ग्रन्थि (Testes Gland)
वृषण की लेडिग कोशिकाओं से टेस्टोस्टेरोन हार्मोन स्रावित होता है।
टेस्टोस्टेरोन के प्रभाव से पुरुषों में गौण लैंगिक लक्षण विकसित होते हैं।
इन लक्षणों में प्रमुख रूप से—
- दाढ़ी-मूँछ का आना
- पुरुषों के स्वभाव एवं अन्य गौण लैंगिक लक्षणों का विकास
सम्मिलित हैं।
प्रमुख अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ एवं हार्मोन्स एक नजर में
| ग्रन्थि | प्रमुख हार्मोन | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| थायरॉयड | थायरॉक्सिन | शारीरिक उपापचयी क्रियाओं का नियमन |
| पैराथायरॉयड | पैराथार्मोन | कैल्शियम, हड्डियों एवं दाँतों का नियमन |
| अधिवृक्क | कॉर्टिन/कॉर्टिसोन, कॉर्टिकोस्टेरोन, एड्रीनलिन | शर्करा निर्माण, गौण लैंगिक लक्षण तथा रुधिर दाब का नियंत्रण |
| पिट्यूटरी | GH, FSH, TSH, ऑक्सीटोसिन, प्रोलैक्टिन | वृद्धि, जनन सम्बन्धी क्रियाएँ तथा अन्य ग्रन्थियों का नियमन |
| अग्न्याशय | इन्सुलिन | रुधिर में शर्करा का नियमन |
| पीनियल | मेलाटोनिन | वृषण एवं अण्डाशय की वृद्धि को प्रभावित करना |
| वृषण | टेस्टोस्टेरोन | पुरुषों में गौण लैंगिक लक्षणों का विकास |
- अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ नलिकाविहीन होती हैं और अपना स्राव सीधे रक्त में छोड़ती हैं।
- थायरॉयड ग्रन्थि से थायरॉक्सिन स्रावित होता है, जो शारीरिक उपापचयी क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
- पैराथायरॉयड से पैराथार्मोन स्रावित होता है, जो कैल्शियम तथा हड्डियों और दाँतों के विकास का नियमन करता है।
- अधिवृक्क ग्रन्थि वृक्क के ऊपर स्थित होती है तथा इससे कॉर्टिन/कॉर्टिसोन, कॉर्टिकोस्टेरोन और एड्रीनलिन स्रावित होते हैं।
- पिट्यूटरी को मास्टर ग्रन्थि भी कहा जाता है और इससे लगभग 13 हार्मोन स्रावित होते हैं।
- वृद्धि हार्मोन शरीर की वृद्धि को प्रभावित करता है।
- TSH थायरॉयड ग्रन्थि को थायरॉक्सिन बनाने के लिए उत्तेजित करता है।
- ऑक्सीटोसिन गर्भाशय की दीवार में संकुचन तथा प्रोलैक्टिन दुग्ध स्राव में सहायक होता है।
- अग्न्याशय से इन्सुलिन स्रावित होता है, जो रुधिर में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करता है।
- वृषण की लेडिग कोशिकाओं से टेस्टोस्टेरोन स्रावित होता है, जो पुरुषों के गौण लैंगिक लक्षणों के विकास में सहायक है।
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पादप हार्मोन्स एवं उनके कार्य
पादप हार्मोन्स (Plant Hormones)
पौधों में वृद्धि तथा विकास को नियंत्रित करने वाले विशिष्ट रासायनिक पदार्थों को पादप हार्मोन अथवा वृद्धि नियामक (Growth Regulators) कहते हैं।
पादप हार्मोन्स मुख्यतः विभज्योतक कोशिकाओं, नई पत्तियों तथा फलों में बनते हैं।
ये जटिल कार्बनिक पदार्थ होते हैं, जो पौधे के निश्चित स्थानों पर बनकर संवहन ऊतकों द्वारा शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचते हैं तथा वहाँ वृद्धि एवं विकास को नियंत्रित करते हैं।
पादप हार्मोन्स की प्रमुख विशेषताएँ
- इन्हें पौधों से निष्कासित किया जा सकता है।
- ये जड़, तना तथा कलिका के शीर्षस्थ विभज्योतक में बनते हैं और फ्लोएम द्वारा अन्य अंगों तक पहुँचते हैं।
- ये पौधे के विभिन्न भागों में पहुँचकर वृद्धि का नियंत्रण करते हैं।
- इनकी प्रकृति कार्बनिक होती है।
- ये अल्प मात्रा में ही प्रभावशाली होते हैं।
- ये पादप वृद्धि तथा वृद्धि-रोधन दोनों को नियंत्रित कर सकते हैं।
- इनकी मात्रा कम या अधिक होने पर इनका प्रभाव विपरीत भी हो सकता है।
1. ABA हार्मोन
ABA का पूरा नाम एब्सिसिक एसिड (Abscisic Acid) है। यह पौधों में पाया जाने वाला विशिष्ट हार्मोन है।
यह पौधों की विभिन्न विकास प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है, जिनमें बीज एवं कलियों की प्रसुप्ति, अंगों का आकार तथा रन्ध्रों का नियंत्रण प्रमुख हैं।
सूखी मिट्टी, ठंड-सहनशीलता, गर्मी तथा तनाव जैसी परिस्थितियों में भी इसका विशेष महत्त्व होता है।
ABA के प्रमुख कार्य
- यह तने की वृद्धि की गति को मंद करता है।
- यह रन्ध्रों के खुलने-बन्द होने को नियंत्रित करके पौधे में होने वाले वाष्पोत्सर्जन को कम करता है।
- इसकी उपस्थिति पत्तियों के झड़ने की क्रिया की दर को बढ़ाती है।
2. ऑक्सिन (Auxin)
ऑक्सिन ऐसे पदार्थ हैं जो प्ररोह की कोशिकाओं में दीर्घीकरण (Elongation) की क्रिया को प्रेरित करते हैं।
इनमें इण्डोल एसीटिक एसिड प्रमुख है।
प्राकृतिक रूप से पौधों में पाए जाने वाले ऑक्सिन के अतिरिक्त समान व्यवहार तथा रासायनिक संरचना वाले संश्लेषित पदार्थ भी ज्ञात हैं।
ऑक्सिन के प्रमुख कार्य
- ऑक्सिन अनुवर्तन गतियों को नियंत्रित करता है। प्रकाश तथा गुरुत्वाकर्षण आदि के प्रभाव से जड़ एवं तने में होने वाली अनुवर्तन क्रियाएँ ऑक्सिन की सान्द्रता से प्रभावित होती हैं।
- ऑक्सिन की सान्द्रता तने की वृद्धि को प्रेरित करती है तथा जड़ की वृद्धि को प्रभावित करती है।
- यह कोशिकीय दीर्घीकरण तथा सम्पूर्ण वृद्धि-दर को प्रभावित करता है।
- ऊतक तथा अंगों के विकास से सम्बन्धित बागवानी कार्यों में ऑक्सिन का उपयोग किया जाता है।
- तने के शीर्ष पर उपस्थित शीर्षस्थ कलिका के कारण पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि बाधित होती है।
- ऑक्सिन कलिकाओं की वृद्धि में अवरोध उत्पन्न करता है, इसलिए आलू के संचय के समय इसका उपयोग लाभकारी होता है।
- पत्तियों एवं फलों के विलगन (Abscission) को रोकने के लिए ऑक्सिन का उपयोग किया जाता है।
- फल निर्माण तथा अनिषेकफलन (Parthenocarpy) के लिए पुष्पन के पश्चात् पौधों पर ऑक्सिन छिड़का जाता है।
3. जिबरेलिन्स (Gibberellins)
जिबरेलिन्स पौधों की वृद्धि को प्रभावित करने वाले महत्त्वपूर्ण पादप हार्मोन्स हैं।
इनके प्रभाव से तने के पर्व (Internodes) लम्बे होते हैं।
इसके अतिरिक्त ये पत्ती का फलक बढ़ाने, पार्श्व कलिकाओं तथा पौधे की वृद्धि से सम्बन्धित अनेक क्रियाओं को प्रभावित करते हैं।
जिबरेलिन्स के प्रमुख कार्य
- कोशिका दीर्घीकरण को बढ़ाते हैं।
- कैम्बियम की सक्रियता को बढ़ाते हैं।
- बिना निषेचन के अण्डाशय से फल के विकास में सहायता करते हैं।
- प्रसुप्ति को भंग करते हैं तथा बीजों में अंकुरण बढ़ाते हैं।
- पुष्प एवं फलों के विकास में सहायक होते हैं।
- द्विवर्षी पौधों को एकवर्षी तथा आनुवंशिक रूप से बौने पौधों को लम्बा करने में प्रभाव डालते हैं।
- अंगूरों का आकार तथा गुच्छों की लम्बाई बढ़ाने में भी इनका प्रयोग किया जाता है।
4. साइटोकाइनिन अथवा कैलिन्स (Cytokinin or Calins)
साइटोकाइनिन को सर्वप्रथम यीस्ट से प्राप्त किया गया। बाद में मक्का के बीज तथा नारियल में भी इसे पाया गया।
काइनेटिन तथा जियेटिन साइटोकाइनिन के उदाहरण हैं।
साइटोकाइनिन के प्रमुख कार्य
- कोशिका विभाजन की गति को तेज करता है।
- पौधों के अंगों के निर्माण को नियंत्रित करता है।
- इसके प्रयोग से पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि तेज होती है।
- यह प्रसुप्ति काल को कम करता है।
- साइटोकाइनिन की सहायता से जीर्णता को रोका जा सकता है।
- ऑक्सिन और साइटोकाइनिन की मात्रा के अनुपात को बदलकर जड़ अथवा तने के विकास को प्रभावित किया जा सकता है।
कैलिन्स के प्रकार
कैलिन्स को उनके कार्य के आधार पर निम्न प्रकार से बताया गया है—
1. राइजोकैलिन (Rhizocaline)
राइजोकैलिन ऐसे हार्मोन्स हैं जो जड़ों में होने वाले विकास को नियंत्रित करते हैं।
2. फाइलोकैलिन (Phyllocaline)
फाइलोकैलिन का सम्बन्ध पत्तियों की वृद्धि एवं विकास से होता है।
ये बीजों के बीजपत्रों में बनते हैं।
3. कॉलोकैलिन (Caulocaline)
यह जड़ों में बनने वाला हार्मोन है, जो ऑक्सिन की सहायता से तनों की वृद्धि तथा पार्श्व कलिकाओं के निर्माण में सहायक होता है।
5. काइनिन्स (Kinins)
काइनिन्स कार्बनिक रासायनिक यौगिक होते हैं। काइनेटिन (Kinetin) इसका एक उदाहरण है।
काइनिन्स के प्रमुख कार्य
- ये वृद्धि से सम्बन्धित हार्मोन्स हैं तथा कोशिकाद्रव्य विभाजन में सहायक होते हैं।
- RNA तथा प्रोटीन के निर्माण में सहायता करते हैं।
- कोशिका वृद्धि में सहायक होते हैं।
- ऑक्सिन की उपस्थिति में तनों एवं पर्णवृन्तों की वृद्धि तथा पत्तियों के प्रसरण में सहायता करते हैं।
- पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि प्रारम्भ करने में सहायक होते हैं।
- बीज-अंकुरण को प्रेरित करते हैं।
6. फ्लोरिजेन्स (Florigens)
फ्लोरिजेन्स ऐसे हार्मोन हैं जो फूलों के खिलने में सहायता करते हैं।
इनका निर्माण पत्तियों में होता है।
7. ट्रॉमेटिन (Traumatin)
ट्रॉमेटिन का निर्माण घायल कोशिकाओं में होता है।
यह एक प्रकार का जैवकोशिकीय जेल है तथा घावों को भरने एवं ठीक करने में सहायक होता है।
प्रमुख पादप हार्मोन्स एक नजर में
| हार्मोन | प्रमुख कार्य |
|---|---|
| ABA | वृद्धि को मंद करना, रन्ध्रों का नियंत्रण एवं वाष्पोत्सर्जन कम करना |
| ऑक्सिन | कोशिका दीर्घीकरण, अनुवर्तन गति तथा वृद्धि का नियमन |
| जिबरेलिन्स | पर्वों की लम्बाई, कोशिका दीर्घीकरण एवं बीज-अंकुरण को बढ़ाना |
| साइटोकाइनिन | कोशिका विभाजन एवं पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि |
| राइजोकैलिन | जड़ों के विकास का नियंत्रण |
| फाइलोकैलिन | पत्तियों के विकास में सहायता |
| कॉलोकैलिन | तने एवं पार्श्व कलिकाओं के विकास में सहायता |
| काइनिन्स | कोशिका वृद्धि, प्रोटीन निर्माण एवं बीज-अंकुरण में सहायता |
| फ्लोरिजेन्स | फूलों के खिलने में सहायता |
| ट्रॉमेटिन | घायल कोशिकाओं एवं घावों को ठीक करने में सहायता |
- पौधों में वृद्धि एवं विकास का नियंत्रण करने वाले विशिष्ट रासायनिक पदार्थ पादप हार्मोन्स या वृद्धि नियामक कहलाते हैं।
- पादप हार्मोन्स कार्बनिक प्रकृति के होते हैं तथा अल्प मात्रा में प्रभावशाली होते हैं।
- ABA तने की वृद्धि को मंद करता है तथा रन्ध्रों को नियंत्रित कर वाष्पोत्सर्जन कम करता है।
- ऑक्सिन कोशिका दीर्घीकरण, अनुवर्तन गति तथा वृद्धि-दर को प्रभावित करता है।
- जिबरेलिन्स तने के पर्वों को लम्बा करते हैं तथा बीज-अंकुरण एवं फल-विकास में सहायक होते हैं।
- साइटोकाइनिन कोशिका विभाजन तथा पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि को बढ़ाता है।
- राइजोकैलिन जड़ों, फाइलोकैलिन पत्तियों तथा कॉलोकैलिन तनों के विकास से सम्बन्धित हैं।
- काइनिन्स कोशिका वृद्धि, RNA एवं प्रोटीन निर्माण तथा बीज-अंकुरण में सहायक होते हैं।
- फ्लोरिजेन्स फूलों के खिलने में सहायता करते हैं।
- ट्रॉमेटिन घायल कोशिकाओं में बनता है तथा घाव भरने में सहायक होता है।
नियंत्रण, समन्वय एवं समस्थिति
नियंत्रण तथा समन्वय (Control and Co-ordination)
जीवों के शरीर में अनेक प्रकार की क्रियाएँ लगातार होती रहती हैं। कुछ क्रियाएँ हमारी इच्छा के अनुसार होती हैं, जबकि अनेक आन्तरिक क्रियाएँ बिना हमारी इच्छा के स्वतः होती रहती हैं।
चलना-फिरना, उठना-बैठना तथा बात करना ऐसी क्रियाएँ हैं जिन्हें हम अपनी इच्छा के अनुसार करते हैं।
इसके विपरीत रक्त का परिवहन, भोजन का पाचन, ऊर्जा की प्राप्ति, शारीरिक वृद्धि तथा श्वसन जैसी क्रियाएँ शरीर के आन्तरिक अंगों द्वारा सम्पन्न होती रहती हैं।
इन सभी क्रियाओं को सुव्यवस्थित रूप से चलाने के लिए शरीर में नियंत्रण एवं समन्वय आवश्यक होता है।
बाह्य एवं आन्तरिक अंगों में समन्वय
हाथ, पैर तथा संवेदी अंग जैसे बाह्य अंग हमारी इच्छा के अनुसार कार्य कर सकते हैं।
इन बाह्य अंगों के कार्य करने के साथ-साथ उनसे सम्बन्धित आन्तरिक अंग भी अपने-अपने कार्य करते रहते हैं।
इसी प्रकार पौधों में भी बाह्य अंग पाए जाते हैं, जैसे—
- पत्तियाँ
- जड़ों में उपस्थित रोम
- फूलों में उपस्थित जनन अंग
पौधों के आन्तरिक अंग भी उनकी विभिन्न जैविक क्रियाओं को सम्पन्न करते हैं।
जीव विज्ञान
जीवधारियों के अध्ययन से सम्बन्धित विज्ञान की शाखा को जीव विज्ञान कहते हैं।
सजीवों में वृद्धि, प्रचलन, श्वसन, पोषण तथा प्रजनन जैसी विशिष्ट क्रियाएँ पाई जाती हैं, जो निर्जीव वस्तुओं में नहीं पाई जातीं।
समस्थिति (Homeostasis)
जीवों के शरीर पर बाहरी तथा भीतरी वातावरण में होने वाले परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है।
जीवों में बाह्य तथा भीतरी वातावरण के बीच सन्तुलन बनाए रखने की क्षमता को समस्थिति अथवा होमियोस्टेसिस कहा जाता है।
शरीर की सामान्य स्थिति को बनाए रखने के लिए विभिन्न अंगों एवं संरचनाओं के कार्यों में समन्वय आवश्यक होता है।
नियंत्रण प्रणाली की भूमिका
नियंत्रण प्रणाली शरीर के विभिन्न घटकों के कार्यों को व्यवस्थित करती है।
नियंत्रण केन्द्र किसी प्रेरणा या उद्दीपन के अनुसार उपयुक्त प्रतिक्रिया निर्धारित करता है।
मांसपेशियाँ, अंग तथा अन्य संरचनाएँ नियंत्रण केन्द्र से संकेत प्राप्त कर उसके अनुसार कार्य कर सकती हैं।
इसे सरल रूप में इस प्रकार समझ सकते हैं—
उद्दीपन → नियंत्रण केन्द्र → संकेत → अंग या मांसपेशी → प्रतिक्रिया
एककोशिकीय जन्तुओं में समन्वयन
सरल एककोशिकीय जीवों, जैसे अमीबा, में समन्वय एवं नियंत्रण के लिए किसी विशेष तन्त्र की आवश्यकता नहीं होती।
इनमें एक ही कोशिका आवश्यक समन्वय की क्रियाओं को सम्पन्न कर लेती है।
एककोशिकीय जीव उद्दीपन के प्रति प्रतिक्रिया भी प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरण के लिए ये भोजन जैसे उद्दीपन स्रोत की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
अर्थात्—
एक कोशिका → आवश्यक क्रियाओं का समन्वय → उद्दीपन के प्रति प्रतिक्रिया
बहुकोशिकीय जन्तुओं में समन्वयन
बहुकोशिकीय जन्तुओं के शरीर में अनेक अंग होते हैं और विभिन्न अंग अलग-अलग प्रकार की जैविक क्रियाएँ सम्पन्न करते हैं।
इन क्रियाओं का समन्वय रासायनिक तथा भौतिक स्तर पर होता है।
बहुकोशिकीय जन्तुओं में तन्त्रिका तन्त्र तथा अन्तःस्रावी तन्त्र विभिन्न अंगों की क्रियाओं का नियमन करते हैं और उनमें समन्वय बनाए रखते हैं।
बहुकोशिकीय जीव भी उद्दीपन के प्रति प्रतिक्रिया प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरण के लिए वे अधिक ताप अथवा विद्युत जैसे उद्दीपन स्रोत से दूर हट सकते हैं।
एककोशिकीय एवं बहुकोशिकीय जीवों में समन्वयन
| आधार | एककोशिकीय जीव | बहुकोशिकीय जीव |
|---|---|---|
| उदाहरण | अमीबा | जटिल बहुकोशिकीय जन्तु |
| समन्वय | एक ही कोशिका आवश्यक समन्वय करती है | विभिन्न अंगों के बीच समन्वय आवश्यक होता है |
| विशेष तन्त्र | विशेष समन्वय तन्त्र की आवश्यकता नहीं | तन्त्रिका तन्त्र एवं अन्तःस्रावी तन्त्र कार्य करते हैं |
| उद्दीपन के प्रति प्रतिक्रिया | भोजन जैसे स्रोत की ओर आकर्षित हो सकते हैं | अधिक ताप एवं विद्युत जैसे उद्दीपन से दूर हट सकते हैं |
नियंत्रण, समन्वय एवं समस्थिति एक नजर में
| अवधारणा | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| नियंत्रण | शरीर की विभिन्न क्रियाओं का नियमन |
| समन्वय | विभिन्न अंगों एवं क्रियाओं के बीच तालमेल |
| समस्थिति | बाह्य एवं भीतरी वातावरण के बीच सन्तुलन बनाए रखना |
| एककोशिकीय जीव | एक ही कोशिका आवश्यक समन्वय करती है |
| बहुकोशिकीय जीव | तन्त्रिका एवं अन्तःस्रावी तन्त्र समन्वय करते हैं |
- शरीर की विभिन्न क्रियाओं को व्यवस्थित रखने के लिए नियंत्रण एवं समन्वय आवश्यक है।
- रक्त परिवहन, पाचन, ऊर्जा प्राप्ति, वृद्धि और श्वसन जैसी अनेक आन्तरिक क्रियाएँ स्वतः चलती रहती हैं।
- जीवधारियों के अध्ययन से सम्बन्धित विज्ञान की शाखा को जीव विज्ञान कहते हैं।
- बाह्य तथा भीतरी वातावरण के बीच सन्तुलन बनाए रखने की क्षमता को समस्थिति या होमियोस्टेसिस कहते हैं।
- नियंत्रण केन्द्र उद्दीपन के अनुसार उचित प्रतिक्रिया निर्धारित करता है।
- अमीबा जैसे एककोशिकीय जीवों में विशेष समन्वय तन्त्र की आवश्यकता नहीं होती।
- एककोशिकीय जीव में एक ही कोशिका आवश्यक समन्वय करती है।
- बहुकोशिकीय जीवों में विभिन्न अंग अलग-अलग जैविक क्रियाएँ करते हैं।
- बहुकोशिकीय जन्तुओं में तन्त्रिका तन्त्र एवं अन्तःस्रावी तन्त्र नियंत्रण और समन्वय में सहायता करते हैं।
- जीव उद्दीपन के प्रति प्रतिक्रिया प्रदर्शित करते हैं।
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जन्तुओं एवं पौधों में रासायनिक समन्वयन एवं नियंत्रण
रासायनिक समन्वयन एवं नियंत्रण
सभी जीवों में अनेक जैविक क्रियाएँ निरन्तर होती रहती हैं। जीव अपने बाह्य तथा आन्तरिक वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को अनुभव करते हैं और उनके अनुसार प्रतिक्रिया प्रदर्शित करते हैं।
शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं को व्यवस्थित रखने तथा विभिन्न अंगों के कार्यों में तालमेल बनाए रखने के लिए समन्वयन एवं नियंत्रण आवश्यक होता है।
उद्दीपन एवं अनुक्रिया
वातावरण में होने वाला ऐसा परिवर्तन, जिसके प्रति जीव प्रतिक्रिया प्रदर्शित करता है, उद्दीपन के रूप में कार्य करता है।
वातावरण में होने वाले परिवर्तन अथवा उद्दीपन के प्रति दिखाई गई प्रतिक्रिया को अनुक्रिया (Response) कहते हैं।
इसे सरल रूप में समझें—
उद्दीपन → जीव द्वारा परिवर्तन का अनुभव → अनुक्रिया
जन्तुओं में रासायनिक समन्वयन
बहुकोशिकीय जन्तुओं में शरीर की जटिलता बढ़ने के साथ-साथ विभिन्न अंगों के बीच समन्वय एवं नियंत्रण की आवश्यकता भी बढ़ती है।
जन्तुओं के शरीर में विभिन्न अंगों के कार्यों को नियंत्रित एवं समन्वित करने में तन्त्रिका तन्त्र तथा हार्मोन्स महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
तन्त्रिका तन्त्र की भूमिका
तन्त्रिका तन्त्र शरीर के विभिन्न अंगों के बीच समन्वय बनाए रखता है।
मानव शरीर में तन्त्रिका तन्त्र का जाल फैला होता है। इसके द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों एवं मस्तिष्क के बीच संदेशों का आदान-प्रदान होता है।
तन्त्रिका तन्त्र द्वारा होने वाला नियंत्रण शीघ्र गति से सम्पन्न होता है।
हार्मोन्स द्वारा रासायनिक समन्वयन
कशेरुकी जन्तुओं में अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से विशिष्ट रासायनिक पदार्थ हार्मोन्स स्रावित होते हैं।
ये हार्मोन्स बहुत सूक्ष्म मात्रा में स्रावित होकर रक्त के माध्यम से शरीर की लक्ष्य कोशिकाओं तक पहुँचते हैं।
लक्ष्य कोशिकाओं तक पहुँचकर हार्मोन्स उनकी क्रियाओं का नियंत्रण एवं नियमन करते हैं।
इसे सरल क्रम में समझें—
अन्तःस्रावी ग्रन्थि → हार्मोन → रक्त → लक्ष्य कोशिका → क्रिया का नियंत्रण
जन्तुओं में नियंत्रण के दो प्रमुख माध्यम
| माध्यम | मुख्य भूमिका |
|---|---|
| तन्त्रिका तन्त्र | शरीर के विभिन्न अंगों के बीच शीघ्र समन्वय एवं संदेशों का आदान-प्रदान |
| हार्मोन्स | रक्त द्वारा लक्ष्य कोशिकाओं तक पहुँचकर क्रियाओं का नियंत्रण एवं नियमन |
पौधों में रासायनिक समन्वयन
पौधों में भी जैविक क्रियाओं का नियंत्रण एवं समन्वयन पाया जाता है।
जन्तुओं में इसके लिए संवेदी अंग तथा तन्त्रिका तन्त्र पाए जाते हैं, परन्तु पौधों में न तो तन्त्रिका तन्त्र होता है और न ही विशेष संवेदी अंग।
इसके बावजूद पौधे वातावरण में होने वाले उद्दीपनों के प्रति स्पष्ट अनुक्रिया प्रदर्शित करते हैं।
पौधों में उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया के उदाहरण
1. सूरजमुखी
सूरजमुखी के पौधे के फूल सूर्य की दिशा के साथ-साथ घूमते हुए दिखाई देते हैं।
2. छुई-मुई
छुई-मुई के पौधे की पत्तियों को धीरे से छूने पर वे मुड़ने लगती हैं।
3. अंकुरित बीज में वृद्धि
जब अंकुरित बीज का छोटा पौधा वृद्धि करता है, तो उसकी जड़ नीचे की ओर तथा तना ऊपर की ओर बढ़ता है।
पौधों में दिखाई देने वाली गतियाँ वृद्धि से जुड़ी अथवा वृद्धि पर आधारित हो सकती हैं।
जन्तुओं एवं पौधों में समन्वयन की तुलना
| आधार | जन्तु | पौधे |
|---|---|---|
| तन्त्रिका तन्त्र | पाया जाता है | नहीं पाया जाता |
| विशेष संवेदी अंग | पाए जाते हैं | नहीं पाए जाते |
| रासायनिक नियंत्रण | हार्मोन्स द्वारा | रासायनिक समन्वयन द्वारा |
| उद्दीपन की अनुक्रिया | विभिन्न अंगों एवं तन्त्रों द्वारा | वृद्धि एवं अन्य गतियों के रूप में दिखाई देती है |
| उदाहरण | तन्त्रिका एवं हार्मोन द्वारा नियंत्रण | सूरजमुखी, छुई-मुई तथा जड़-तने की वृद्धि |
- जीव बाह्य एवं आन्तरिक वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को अनुभव करके उनके प्रति प्रतिक्रिया प्रदर्शित करते हैं।
- उद्दीपन के प्रति दिखाई गई प्रतिक्रिया को अनुक्रिया कहते हैं।
- बहुकोशिकीय जन्तुओं में विभिन्न अंगों के बीच समन्वय एवं नियंत्रण आवश्यक होता है।
- जन्तुओं में तन्त्रिका तन्त्र तथा हार्मोन्स नियंत्रण एवं समन्वय का कार्य करते हैं।
- तन्त्रिका तन्त्र शरीर के अंगों एवं मस्तिष्क के बीच संदेशों का आदान-प्रदान कराता है तथा शीघ्र कार्य करता है।
- अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से स्रावित हार्मोन्स रक्त द्वारा लक्ष्य कोशिकाओं तक पहुँचकर उनकी क्रियाओं का नियंत्रण करते हैं।
- पौधों में तन्त्रिका तन्त्र तथा विशेष संवेदी अंग नहीं पाए जाते।
- फिर भी पौधे उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया प्रदर्शित करते हैं।
- सूरजमुखी का सूर्य की दिशा में घूमना तथा छुई-मुई की पत्तियों का स्पर्श पर मुड़ना पौधों की अनुक्रिया के उदाहरण हैं।
- अंकुरित बीज में जड़ नीचे तथा तना ऊपर की ओर बढ़ता है।
शरीर की क्रियाएँ, पेशियों की भूमिका एवं पेशियों के प्रकार
शरीर की क्रियाओं में पेशियों की भूमिका
मानव शरीर का ढाँचा हड्डियों से बना होता है, परन्तु हड्डियों को गति प्रदान करने की शक्ति पेशियाँ देती हैं।
शरीर का ढाँचा ऐच्छिक अथवा कंकालीय पेशियों से ढका रहता है। ये पेशियाँ सन्धियों पर एक हड्डी को दूसरी हड्डी से जोड़ने और शरीर में गति उत्पन्न करने में सहायता करती हैं।
पेशियों के सिकुड़ने पर हड्डियाँ मुड़ती हैं तथा पेशियों के फैलने पर पुनः सीधी हो जाती हैं।
इसी कारण पेशियाँ खड़े रहने, चलने-फिरने, दौड़ने तथा वजन उठाने जैसी अनेक क्रियाओं में सहायता करती हैं।
कंकालीय पेशियों की संख्या एवं भार
मानव शरीर में लगभग 600 कंकालीय पेशियाँ होती हैं। इन पेशियों के सामूहिक रूप को पेशी संस्थान कहा जाता है।
युवकों में कंकालीय पेशियों का भार शरीर के कुल भार का लगभग 40 से 50 प्रतिशत तथा युवतियों में लगभग 30 से 40 प्रतिशत होता है।
पेशियों से हड्डियों में गति कैसे उत्पन्न होती है?
बाँह की कोहनी के ऊपर दो प्रमुख पेशियाँ पाई जाती हैं—
- द्विशिरस्का पेशी (Biceps Muscles)
- त्रिशिरस्का पेशी (Triceps Muscles)
ये पेशियाँ कन्धे की हड्डी से जुड़ी रहती हैं तथा इनके दूसरे सिरे अग्रबाहु की हड्डियों से जुड़े होते हैं।
जब कोई पेशी संकुचित होती है तो वह जिस अस्थि से बँधी होती है, उसे अपनी ओर खींचती है।
पेशियों के संकुचन एवं शिथिलन से जोड़ी के रूप में कार्य करने वाली पेशियाँ शरीर में समन्वित गति उत्पन्न करती हैं।
अर्थात्—
पेशी का संकुचन → अस्थि पर खिंचाव → सन्धि पर गति
शरीर की अन्य गतियों में पेशियाँ
टाँगों की पेशियाँ भी संकुचन एवं शिथिलन द्वारा टाँगों को मोड़ने तथा सीधा करने में सहायता करती हैं।
आँखों में उपस्थित बहुत छोटी एवं सूक्ष्म पेशियाँ नेत्र गोलकों को घुमाने का कार्य करती हैं।
चेहरे की अनेक छोटी पेशियाँ अपनी गति के द्वारा चेहरे पर विभिन्न भाव उत्पन्न करती हैं। इनके कारण क्रोध, भय तथा प्रसन्नता जैसे भाव दिखाई देते हैं।
शरीर के रोमों को खड़ा करने जैसी क्रियाओं में भी छोटी-छोटी पेशियाँ कार्य करती हैं।
पेशी तन्तु
पेशियाँ लम्बी कोशिकाओं से बनी होती हैं। इन लम्बी पेशीय कोशिकाओं को पेशी तन्तु कहा जाता है।
पेशी तन्तुओं में संकुचन एवं उत्तेजनशीलता के गुण पाए जाते हैं।
पेशियों के प्रकार
पेशियों को मुख्य रूप से तीन प्रकारों में बाँटा जाता है—
- कंकाल पेशियाँ (Skeletal Muscles)
- अरेखित पेशियाँ (Unstripped Muscles)
- हृदय या कार्डियक पेशियाँ (Heart or Cardiac Muscles)
1. कंकाल पेशियाँ
कंकाल पेशियाँ अस्थियों से जुड़ी रहती हैं, इसलिए इन्हें कंकाल पेशियाँ कहा जाता है।
इन्हें रेखित, पट्टित अथवा ऐच्छिक पेशियाँ भी कहा जाता है।
ये पेशियाँ मस्तिष्क या रीढ़ रज्जु के नियंत्रण में कार्य करती हैं।
प्रत्येक पेशी तन्तु में एक्टिन तथा मायोसिन फिलामेन्ट पाए जाते हैं और पेशी तन्तुओं में अनुप्रस्थ रूप से व्यवस्थित पट्टियाँ दिखाई देती हैं।
कंकाल पेशियाँ चलने तथा शरीर की अन्य ऐच्छिक गतियों को बल प्रदान करती हैं।
ये मुख्य रूप से हाथ, पैर, गर्दन तथा आँख आदि में पाई जाती हैं।
कंकाल पेशियों में थकान
अधिक व्यायाम अथवा अधिक कार्य करने पर इन पेशियों में लैक्टिक अम्ल का निर्माण हो जाता है, जिससे थकान अनुभव होने लगती है।
2. अरेखित पेशियाँ
अरेखित पेशियों को अनैच्छिक अथवा चिकनी पेशियाँ भी कहा जाता है।
ये मुख्य रूप से—
- आहार नाल
- रुधिर वाहिनियों
- अन्य आन्तरिक अंगों
में पाई जाती हैं।
इनका अस्थियों से सम्बन्ध नहीं होता। आन्तरिक अंगों से सम्बन्धित होने के कारण इन्हें आन्तरिक पेशियाँ भी कहा जाता है।
अरेखित पेशियाँ हमारी इच्छा के अनुसार कार्य नहीं करतीं, इसलिए इन्हें अनैच्छिक पेशियाँ कहा जाता है।
आहारनाल में भोजन की गति तथा नलिकाओं का खुलना और बन्द होना अनैच्छिक पेशीय क्रियाओं के उदाहरण हैं।
इन पेशियों का संकुचन धीरे-धीरे होता है, परन्तु ये अधिक समय तक संकुचित रह सकती हैं।
क्रमाकुंचक गति
अरेखित पेशियों के कारण नलिकाओं में अभिलाक्षणिक क्रमाकुंचक गतियाँ उत्पन्न होती हैं।
इस गति में पेशियों के संकुचन एवं शिथिलन की आवर्ती तरंगें उत्पन्न होती हैं।
ऐसी क्रमाकुंचक गतियाँ जठरान्त्र नली तथा पुंजनन नली में पाई जाती हैं।
3. हृदय या कार्डियक पेशियाँ
हृदय का मध्य स्तर मायोकार्डियम हृदय पेशियों से बना होता है।
हृदय पेशियाँ संरचना में रेखित पेशियों जैसी होती हैं, परन्तु कार्य की दृष्टि से अनैच्छिक होती हैं।
मानव में हृदय स्पन्दन की दर लगभग 72 प्रति मिनट होती है।
हृदय को लगातार संकुचन एवं शिथिलन करना पड़ता है और इसके लिए ऊर्जा ATP से प्राप्त होती है।
हृदय पेशियाँ जीव की इच्छा से स्वतंत्र होकर अपने आप, बिना थके तथा बिना रुके एक निश्चित दर एवं क्रम अर्थात् लय में जीवनभर संकुचन और शिथिलन करती रहती हैं।
तीनों प्रकार की पेशियों में अन्तर
| आधार | कंकाल पेशी | अरेखित पेशी | हृदय पेशी |
|---|---|---|---|
| दूसरा नाम | रेखित, पट्टित, ऐच्छिक | चिकनी, अनैच्छिक | कार्डियक पेशी |
| नियंत्रण | ऐच्छिक | अनैच्छिक | अनैच्छिक |
| मुख्य स्थान | अस्थियों से जुड़ी | आहार नाल, रुधिर वाहिनियाँ एवं आन्तरिक अंग | हृदय |
| संरचना | रेखित | अरेखित | रेखित जैसी |
| मुख्य कार्य | चलन एवं अन्य ऐच्छिक गतियाँ | आन्तरिक अंगों की अनैच्छिक गतियाँ | हृदय का लयबद्ध संकुचन एवं शिथिलन |
- हड्डियों को गति प्रदान करने की शक्ति पेशियाँ देती हैं।
- मानव शरीर में लगभग 600 कंकालीय पेशियाँ होती हैं।
- पेशियों के संकुचन एवं शिथिलन से हड्डियों और सन्धियों में गति उत्पन्न होती है।
- द्विशिरस्का एवं त्रिशिरस्का पेशियाँ बाँह की गति में सहायता करती हैं।
- लम्बी पेशीय कोशिकाओं को पेशी तन्तु कहते हैं।
- पेशियाँ मुख्यतः कंकाल, अरेखित तथा हृदय पेशियाँ तीन प्रकार की होती हैं।
- कंकाल पेशियाँ अस्थियों से जुड़ी होती हैं तथा ऐच्छिक गति उत्पन्न करती हैं।
- अरेखित पेशियाँ आहार नाल, रुधिर वाहिनियों एवं आन्तरिक अंगों में पाई जाती हैं तथा अनैच्छिक होती हैं।
- अरेखित पेशियों के कारण क्रमाकुंचक गति उत्पन्न होती है।
- हृदय पेशियाँ संरचना में रेखित परन्तु कार्य में अनैच्छिक होती हैं और लयबद्ध रूप से संकुचन एवं शिथिलन करती रहती हैं।
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पेशियों का कार्यात्मक वर्गीकरण एवं जीव-जन्तुओं के तंत्र
कार्य के आधार पर पेशियों का वर्गीकरण
पेशियों को उनके द्वारा उत्पन्न होने वाली गति अथवा कार्य के आधार पर भी विभिन्न प्रकारों में बाँटा जाता है।
कार्य के आधार पर प्रमुख पेशियाँ निम्नलिखित हैं—
- घूर्णी पेशियाँ (Rotator Muscles)
- उन्नयनी तथा अवनयनी पेशियाँ (Lavator and Depressor Muscles)
- टेंसर पेशियाँ एवं प्रोनेटर (Tensor Muscles and Pronators)
- फ्लेक्सर तथा एक्स्टेन्सर पेशियाँ (Flexor and Extensor Muscles)
- एब्डक्टर तथा एड्क्टर पेशियाँ (Abductor and Adductor Muscles)
1. घूर्णी पेशियाँ
घूर्णी पेशियों के कार्य करने पर उनसे जुड़ी अस्थि अपनी धुरी पर घूमती है।
अर्थात्—
घूर्णी पेशी → अस्थि का अपनी धुरी पर घूमना
2. उन्नयनी तथा अवनयनी पेशियाँ
इन पेशियों के कार्य करने से उनसे जुड़ी अस्थि अथवा अंग ऊपर उठता या नीचे गिरता है।
- उन्नयनी पेशी — अंग को ऊपर उठाने में सहायता करती है।
- अवनयनी पेशी — अंग को नीचे करने में सहायता करती है।
3. टेंसर पेशियाँ एवं प्रोनेटर
टेंसर पेशियों के सिकुड़ने पर उनसे जुड़ी संरचना में अधिक तनाव या खिंचाव उत्पन्न होता है।
प्रोनेटर पेशियाँ हथेली को नीचे की ओर घुमाने का कार्य करती हैं।
4. फ्लेक्सर तथा एक्स्टेन्सर पेशियाँ
फ्लेक्सर पेशियों के सिकुड़ने पर उनसे जुड़ी अस्थियाँ अन्दर की ओर खिंचती हैं, जिससे वे एक-दूसरे के पास आती हैं।
इससे सन्धि पर कोण कम होता है और अंग मुड़ता है।
एक्स्टेन्सर पेशियाँ फ्लेक्सर पेशियों के विपरीत कार्य करती हैं।
इनके कार्य से अंग सीधा होता है तथा सन्धि पर कोण बढ़ता है।
अर्थात्—
फ्लेक्सर → मोड़ना
एक्स्टेन्सर → सीधा करना
5. एब्डक्टर तथा एड्क्टर पेशियाँ
एब्डक्टर पेशियों के सिकुड़ने पर अस्थि अथवा अंग शरीर की मध्य रेखा से दूर जाता है।
एड्क्टर पेशियाँ इसके विपरीत कार्य करती हैं और अंग को मध्य रेखा की ओर लाती हैं।
अर्थात्—
एब्डक्टर → मध्य रेखा से दूर
एड्क्टर → मध्य रेखा की ओर
कार्य के आधार पर पेशियाँ एक नजर में
| पेशी | मुख्य कार्य |
|---|---|
| घूर्णी | अस्थि को अपनी धुरी पर घुमाना |
| उन्नयनी / अवनयनी | अंग को ऊपर उठाना / नीचे करना |
| टेंसर | संरचना में तनाव या खिंचाव उत्पन्न करना |
| प्रोनेटर | हथेली को नीचे की ओर घुमाना |
| फ्लेक्सर / एक्स्टेन्सर | अंग को मोड़ना / सीधा करना |
| एब्डक्टर / एड्क्टर | मध्य रेखा से दूर ले जाना / मध्य रेखा की ओर लाना |
जीव-जन्तुओं के तंत्र एवं उनके कार्य
जीव-जन्तुओं के शरीर में विभिन्न जैविक क्रियाओं को सम्पन्न करने के लिए अनेक तंत्र कार्य करते हैं।
इन तंत्रों की संरचना जन्तुओं तथा वनस्पतियों में अलग-अलग हो सकती है, परन्तु इनका सम्बन्ध जीवन की आवश्यक क्रियाओं से होता है।
1. श्वसन तंत्र
जन्तुओं में श्वसन क्रिया त्वचा, गिल्स तथा नासिका छिद्र आदि के माध्यम से हो सकती है।
मनुष्य के श्वसन तंत्र में नासा मार्ग, ग्रसनी, कण्ठ, श्वासनाल तथा फेफड़े प्रमुख अंग हैं।
इस तंत्र का प्रमुख कार्य ऑक्सीजन को शरीर के भीतर लेना तथा प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाने में सहायता करना है।
पौधों में अलग श्वसन अंग नहीं होते, फिर भी उनमें श्वसन होता है। पत्तियों में उपस्थित रन्ध्रों द्वारा गैसों का आदान-प्रदान होता है।
2. उत्सर्जन तंत्र
जन्तुओं में उत्सर्जन त्वचा तथा गुर्दों द्वारा होता है।
इसके अन्तर्गत पसीना निकलना तथा मूत्र का निर्माण जैसी क्रियाएँ सम्मिलित हैं।
वनस्पतियों में उत्सर्जन से सम्बन्धित क्रियाओं में तनों पर उपस्थित छोटे छिद्र तथा वाष्पोत्सर्जन आदि की भूमिका होती है।
3. वृद्धि तंत्र
जन्तुओं में शरीर की वृद्धि हार्मोन्स द्वारा नियंत्रित होती है।
इसका प्रमुख परिणाम शरीर के विभिन्न अंगों का विकास है।
वनस्पतियों में वृद्धि कलिकाओं तथा वृद्धि करने वाली कोशिकाओं के कारण होती है। इनके बढ़ने से शाखाओं तथा पौधे की लम्बाई में वृद्धि होती है।
4. परिसंचरण तंत्र
जन्तुओं में शरीर के विभिन्न पदार्थों का एक स्थान से दूसरे स्थान तक परिवहन परिसंचरण तंत्र द्वारा किया जाता है।
इस तंत्र के प्रमुख अंग—
- हृदय
- रक्त
- रक्त वाहिनियाँ
हैं।
इस तंत्र द्वारा गैसें, हार्मोन्स तथा अन्य आवश्यक या अपशिष्ट पदार्थ शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाए जाते हैं।
वनस्पतियों में अवशोषित अथवा निर्मित पदार्थों का परिवहन जाइलम तथा फ्लोएम द्वारा पौधे के विभिन्न भागों तक किया जाता है।
5. पोषण एवं पाचन तंत्र
जन्तुओं में पोषण एवं पाचन का कार्य पाचन तंत्र द्वारा होता है।
मनुष्य के पाचन तंत्र के प्रमुख अंग क्रमशः—
मुँह → ग्रसनी → भोजननली → पेट → छोटी आँत → बड़ी आँत → मलद्वार
हैं।
पौधों में पोषण प्रकाश-संश्लेषण द्वारा होता है तथा जड़ें मिट्टी से खनिज लवणों का अवशोषण करती हैं।
6. जनन तंत्र
जन्तुओं में नर तथा मादा जनन अंग पाए जाते हैं। इनका प्रमुख कार्य अपने ही समान जीव उत्पन्न करना है।
नर जनन तंत्र में वृषण प्रमुख अंगों में से एक है।
वनस्पतियों में पुष्प प्रमुख जनन अंग होता है।
पुष्प में पुंकेसर तथा स्त्रीकेसर जैसे जनन भाग पाए जाते हैं। परागण के पश्चात् नर तथा मादा युग्मक के मिलने से युग्मनज बनता है।
प्रमुख तंत्र एवं उनके कार्य एक नजर में
| तंत्र | जन्तुओं में मुख्य कार्य | पौधों में सम्बन्धित कार्य |
|---|---|---|
| श्वसन तंत्र | ऑक्सीजन ग्रहण करना एवं कोशिकाओं तक पहुँचाना | रन्ध्रों द्वारा गैसों का आदान-प्रदान |
| उत्सर्जन तंत्र | पसीना, मूत्र आदि द्वारा उत्सर्जन | छिद्रों एवं वाष्पोत्सर्जन से सम्बन्धित क्रियाएँ |
| वृद्धि तंत्र | शरीर एवं अंगों का विकास | कलिकाओं एवं वृद्धि करने वाली कोशिकाओं द्वारा वृद्धि |
| परिसंचरण तंत्र | पदार्थों का संवहन एवं स्थानान्तरण | जाइलम एवं फ्लोएम द्वारा पदार्थों का परिवहन |
| पोषण एवं पाचन तंत्र | भोजन का ग्रहण एवं पाचन | प्रकाश-संश्लेषण एवं जड़ों द्वारा खनिज लवणों का अवशोषण |
| जनन तंत्र | अपने समान जीव उत्पन्न करना | पुष्प के जनन अंगों द्वारा जनन |
- घूर्णी पेशियाँ उनसे जुड़ी अस्थि को अपनी धुरी पर घुमाती हैं।
- उन्नयनी एवं अवनयनी पेशियाँ अंग को क्रमशः ऊपर उठाने तथा नीचे करने में सहायता करती हैं।
- प्रोनेटर हथेली को नीचे की ओर घुमाती है।
- फ्लेक्सर पेशियाँ अंग को मोड़ती हैं, जबकि एक्स्टेन्सर पेशियाँ उसे सीधा करती हैं।
- एब्डक्टर अंग को शरीर की मध्य रेखा से दूर तथा एड्क्टर मध्य रेखा की ओर लाती हैं।
- जन्तुओं के प्रमुख तंत्रों में श्वसन, उत्सर्जन, वृद्धि, परिसंचरण, पोषण-पाचन तथा जनन तंत्र सम्मिलित हैं।
- मनुष्य के श्वसन तंत्र में नासा मार्ग, ग्रसनी, कण्ठ, श्वासनाल तथा फेफड़े प्रमुख हैं।
- परिसंचरण तंत्र के प्रमुख अंग हृदय, रक्त एवं रक्त वाहिनियाँ हैं।
- पौधों में जाइलम एवं फ्लोएम पदार्थों के परिवहन का कार्य करते हैं।
- वनस्पतियों में पुष्प प्रमुख जनन अंग है तथा परागण के पश्चात् नर एवं मादा युग्मक के मिलने से युग्मनज बनता है।