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Home Study Material Semester 3 विज्ञान दाब तथा वैज्ञानिक यंत्र
Chapter 2 • विज्ञान

दाब तथा वैज्ञानिक यंत्र

UP DELED Semester 3 विज्ञान विषय के इस अध्याय में दाब की अवधारणा, क्रिया-प्रतिक्रिया नियम, रॉकेट के उड़ने का सिद्धान्त, वायुमण्डलीय दाब, वायु दाबमापी, वायुमण्डलीय दाब के उपयोग, द्रव में दाब, गलनांक एवं क्वथनांक, प्लवन, उत्प्लावन बल, आर्किमिडीज का सिद्धान्त, घनत्व तथा विभिन्न वैज्ञानिक यंत्रों का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

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Notes
Topic 1 दाब की अवधारणा, सूत्र एवं क्रिया-प्रतिक्रिया नियम

दाब की अवधारणा, सूत्र एवं क्रिया-प्रतिक्रिया नियम

दाब की अवधारणा (Concept of Pressure)

यदि किसी सतह पर उसके लम्बवत कोई बल लगाया जाता है, तो वह बल उस सतह पर दाब उत्पन्न करता है।

किसी सतह के एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले लम्बवत बल को दाब कहते हैं।

अर्थात् दाब इस बात पर निर्भर करता है कि किसी निश्चित क्षेत्रफल पर कितना बल लगाया जा रहा है।

दाब का सूत्र

दाब को निम्न सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है—

P = F / A

जहाँ—

  • P = दाब
  • F = सतह पर लगने वाला लम्बवत बल
  • A = सतह का क्षेत्रफल

इस सूत्र से स्पष्ट है कि समान बल के लिए क्षेत्रफल कम होने पर दाब अधिक तथा क्षेत्रफल अधिक होने पर दाब कम होता है।

दाब का मात्रक

एम.के.एस. पद्धति में दाब का मात्रक न्यूटन प्रति वर्ग मीटर (N/m2) है।

एस.आई. पद्धति में दाब का मात्रक पास्कल (Pa) होता है।

सी.जी.एस. पद्धति में दाब का मात्रक डाइन प्रति वर्ग सेंटीमीटर (dyne/cm2) है।

1 पास्कल = 1 न्यूटन/मीटर2

तथा,

1 न्यूटन/मीटर2 = 10 डाइन/सेमी2

दाब एक अदिश राशि है।

क्षेत्रफल और दाब का सम्बन्ध

किसी वस्तु का सम्पर्क क्षेत्रफल जितना कम होगा, समान बल की स्थिति में वह सतह पर उतना ही अधिक दाब डालेगी।

इसी प्रकार सम्पर्क क्षेत्रफल अधिक होने पर दाब कम हो जाता है।

स्थिति परिणाम
क्षेत्रफल कम दाब अधिक
क्षेत्रफल अधिक दाब कम

दैनिक जीवन में दाब के उदाहरण

1. दलदल में फँसे व्यक्ति का लेटना

दलदल में फँसे व्यक्ति को लेट जाने की सलाह दी जाती है। लेटने पर शरीर का अधिक क्षेत्रफल दलदल के सम्पर्क में आ जाता है।

क्षेत्रफल बढ़ने के कारण शरीर द्वारा दलदल पर लगाया जाने वाला दाब कम हो जाता है और व्यक्ति के अधिक धँसने की सम्भावना कम होती है।

2. कील का नुकीला सिरा

कील के एक सिरे को नुकीला बनाया जाता है। नुकीले सिरे का क्षेत्रफल बहुत कम होता है, इसलिए उस पर लगाया गया बल अधिक दाब उत्पन्न करता है।

इसी कारण कील को ठोंकने पर वह आसानी से लकड़ी या अन्य सतह में प्रवेश कर जाती है।

क्रियाकलाप — क्षेत्रफल का दाब पर प्रभाव

  1. एक पात्र में लगभग 5 सेमी ऊँचाई तक बालू भरें।
  2. एक ईंट को पहले बालू में खड़ा रखें।
  3. इसके बाद उसी ईंट को बालू पर लिटाकर रखें।
  4. दोनों स्थितियों में ईंट के बालू में धँसने की गहराई की तुलना करें।

खड़ी ईंट का सम्पर्क क्षेत्रफल लेटी हुई ईंट की अपेक्षा कम होता है, इसलिए खड़ी ईंट बालू पर अधिक दाब डालती है और अधिक गहराई तक धँसती है।

कम क्षेत्रफल → अधिक दाब → अधिक धँसाव

क्रिया-प्रतिक्रिया नियम (Action-Reaction Law)

न्यूटन के गति के तृतीय नियम के अनुसार जब दो पिण्ड परस्पर क्रिया करते हैं, तो एक पिण्ड द्वारा दूसरे पिण्ड पर लगाया गया बल उतने ही परिमाण का बल विपरीत दिशा में उत्पन्न करता है।

इसे सरल रूप में इस प्रकार समझ सकते हैं—

प्रत्येक क्रिया के बराबर परिमाण की तथा विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।

इस नियम को न्यूटन का गति का तृतीय नियम तथा क्रिया-प्रतिक्रिया नियम भी कहा जाता है।

क्रिया-प्रतिक्रिया के उदाहरण

  1. बन्दूक से गोली चलाने पर बन्दूक चलाने वाले व्यक्ति को पीछे की ओर धक्का लगता है।
  2. रॉकेट से गैसों को पीछे की ओर तीव्र गति से बाहर निकालने पर रॉकेट आगे की ओर बढ़ता है।
  3. फुटबॉल को पैर से जोर से मारने पर पैर पर भी विपरीत दिशा में बल का अनुभव होता है।

रॉकेट के उड़ने का सिद्धान्त

रॉकेट का उड़ना न्यूटन के गति के तृतीय नियम अर्थात् क्रिया-प्रतिक्रिया नियम पर आधारित है।

रॉकेट के भीतर एक कक्ष में ठोस या तरल ईंधन को ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलाया जाता है। इससे उच्च दाब वाली गैसें उत्पन्न होती हैं।

ये गैसें रॉकेट के पीछे स्थित संकरे मुख से अत्यन्त तेज गति से बाहर निकलती हैं।

गैसों के पीछे की ओर निकलने की क्रिया के परिणामस्वरूप विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया बल उत्पन्न होता है, जो रॉकेट को आगे की ओर गति प्रदान करता है।

इसे सरल क्रम में इस प्रकार समझ सकते हैं—

ईंधन का दहन → उच्च दाब की गैसें → गैसें पीछे की ओर बाहर निकलती हैं → विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया बल → रॉकेट आगे बढ़ता है

दाब एवं क्रिया-प्रतिक्रिया एक नजर में

अवधारणा मुख्य तथ्य
दाब एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाला लम्बवत बल
सूत्र P = F/A
SI मात्रक पास्कल (Pa)
क्षेत्रफल कम होने पर दाब बढ़ता है
क्षेत्रफल अधिक होने पर दाब घटता है
क्रिया-प्रतिक्रिया नियम क्रिया के बराबर तथा विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है
रॉकेट न्यूटन के गति के तृतीय नियम पर आधारित
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • किसी सतह के एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले लम्बवत बल को दाब कहते हैं।
  • दाब का सूत्र P = F/A है।
  • दाब का SI मात्रक पास्कल (Pa) है और 1 पास्कल = 1 न्यूटन/मीटर2 होता है।
  • दाब एक अदिश राशि है।
  • समान बल के लिए क्षेत्रफल कम होने पर दाब अधिक तथा क्षेत्रफल अधिक होने पर दाब कम होता है।
  • दलदल में लेटने से शरीर का सम्पर्क क्षेत्रफल बढ़ता है और दाब कम हो जाता है।
  • कील का नुकीला सिरा कम क्षेत्रफल के कारण अधिक दाब उत्पन्न करता है।
  • न्यूटन के तृतीय गति नियम को क्रिया-प्रतिक्रिया नियम भी कहा जाता है।
  • प्रत्येक क्रिया के बराबर परिमाण की तथा विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।
  • रॉकेट का उड़ना क्रिया-प्रतिक्रिया नियम पर आधारित है।

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Topic 2 वायुमण्डलीय दाब

वायुमण्डलीय दाब

वायुमण्डलीय दाब (Atmospheric Pressure)

पृथ्वी के चारों ओर वायु का एक विशाल आवरण उपस्थित है, जिसे वायुमण्डल कहा जाता है। वायु में भार होने के कारण यह पृथ्वी की सतह पर दाब डालती है।

पृथ्वी की सतह पर प्रति इकाई क्षेत्रफल पर वायु के भार द्वारा लगाए गए बल को वायुमण्डलीय दाब कहते हैं।

समुद्र तल पर वायुमण्डलीय दाब

समुद्र तल पर औसत वायुमण्डलीय दाब लगभग 1013.2 मिलीबार होता है।

वायुमण्डलीय दाब को पास्कल, न्यूटन प्रति वर्ग मीटर तथा बार में व्यक्त किया जा सकता है।

1 बार (Bar) = 105 पास्कल

अथवा,

1 बार = 105 न्यूटन/मीटर2

इस प्रकार लगभग 105 पास्कल वायुमण्डलीय दाब एक बार के बराबर होता है।

वायुमण्डलीय दाब और ऊँचाई का सम्बन्ध

पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर वायुमण्डलीय दाब का मान कम होता जाता है।

अर्थात्—

ऊँचाई बढ़ती है → वायुमण्डलीय दाब घटता है

समुद्र तल पर वायुमण्डलीय दाब अधिक होता है, जबकि ऊँचे स्थानों पर इसका मान कम हो जाता है।

ऊँचाई पर दाब कम होने के प्रभाव

ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में वायुमण्डलीय दाब कम होने के कारण खाना बनाने में कठिनाई होती है।

इसी प्रकार वायुयान में ऊँचाई पर जाने पर वायुमण्डलीय दाब में परिवर्तन के कारण फाउन्टेन पेन से स्याही रिसने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

वायुमण्डलीय दाब का मापन

वायुमण्डलीय दाब को मापने के लिए बैरोमीटर (Barometer) का प्रयोग किया जाता है।

बैरोमीटर की सहायता से वायुमण्डलीय दाब में होने वाले परिवर्तन का पता लगाया जा सकता है।

वायुमण्डलीय दाब एक नजर में

तथ्य विवरण
वायुमण्डलीय दाब पृथ्वी की सतह पर प्रति इकाई क्षेत्रफल पर वायु के भार द्वारा लगाया गया बल
समुद्र तल पर औसत दाब लगभग 1013.2 मिलीबार
1 बार 105 पास्कल
ऊँचाई बढ़ने पर वायुमण्डलीय दाब घटता है
मापन यंत्र बैरोमीटर

दाब परिवर्तन एवं मौसम

वायुमण्डलीय दाब में होने वाले परिवर्तन से मौसम के बारे में भी अनुमान लगाया जा सकता है।

  • बैरोमीटर का पाठ्यांक अचानक नीचे गिरने पर आँधी आने की सम्भावना होती है।
  • पाठ्यांक धीरे-धीरे नीचे गिरने पर वर्षा होने की सम्भावना होती है।
  • पाठ्यांक धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने पर दिन साफ रहने की सम्भावना होती है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पृथ्वी की सतह पर प्रति इकाई क्षेत्रफल पर वायु के भार द्वारा लगाए गए बल को वायुमण्डलीय दाब कहते हैं।
  • समुद्र तल पर औसत वायुमण्डलीय दाब लगभग 1013.2 मिलीबार होता है।
  • 1 बार = 105 पास्कल = 105 न्यूटन/मीटर2 होता है।
  • पृथ्वी की सतह से ऊँचाई बढ़ने पर वायुमण्डलीय दाब कम होता जाता है।
  • ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में कम वायुमण्डलीय दाब के कारण खाना बनाने में कठिनाई होती है।
  • वायुमण्डलीय दाब मापने के लिए बैरोमीटर का प्रयोग किया जाता है।
  • बैरोमीटर के पाठ्यांक में परिवर्तन से मौसम सम्बन्धी अनुमान लगाया जा सकता है।
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Topic 3 वायु दाबमापी एवं उसके प्रकार

वायु दाबमापी एवं उसके प्रकार

वायु दाबमापी (Barometer)

वायुमण्डलीय दाब को मापने वाले यंत्र को वायु दाबमापी या बैरोमीटर (Barometer) कहते हैं।

बैरोमीटर की सहायता से वायुदाब में होने वाले परिवर्तन का पता लगाया जाता है। वायुदाब के परिवर्तन से मौसम सम्बन्धी अनुमान लगाने में भी सहायता मिलती है।

पारे द्वारा वायुदाब का मापन

पारे से भरी लगभग एक मीटर लम्बी काँच की नली को पारे से भरे पात्र में उल्टा खड़ा करने पर नली में पारे का स्तम्भ लगभग 76 सेमी की ऊँचाई पर स्थिर हो जाता है।

नली में स्थित पारे के स्तम्भ का भार, पात्र में पारे की खुली सतह पर लगने वाले वायुमण्डलीय दाब के बराबर होता है।

इस प्रकार पारे के स्तम्भ की ऊँचाई द्वारा वायुमण्डलीय दाब का मान ज्ञात किया जाता है।

समुद्र तल पर पारे के स्तम्भ की औसत ऊँचाई ≈ 76 सेमी

बैरोमीटर में निर्वात

काँच की नली के ऊपरी भाग में पारे के ऊपर खाली स्थान रह जाता है। इस स्थान को निर्वात माना जाता है।

नली के भीतर पारे के स्तम्भ की ऊँचाई वायुमण्डलीय दाब को प्रदर्शित करती है।

पारे द्वारा वायुमण्डलीय दाब का मापन
पारे की नली में लगभग 76 सेमी ऊँचा स्तम्भ वायुमण्डलीय दाब को प्रदर्शित करता है

वायुदाब की प्रचलित इकाइयाँ

वायुदाब को अलग-अलग रूपों में व्यक्त किया जाता रहा है। इसके लिए प्रमुख रूप से—

  • इंच
  • मिलीमीटर
  • मिलीबार

का प्रयोग किया जाता है।

मिलीबार वायुदाब व्यक्त करने की प्रमुख इकाइयों में से एक है।

वायु दाबमापी के प्रकार

वायु दाबमापी मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—

  1. फोर्टिन बैरोमीटर (Fortin Barometer)
  2. निर्द्रव वायु दाबमापी (Aneroid Barometer)

1. फोर्टिन बैरोमीटर (Fortin Barometer)

फोर्टिन बैरोमीटर सामान्य पारे वाले बैरोमीटर का अधिक सुधरा हुआ रूप है।

इसमें पारे से भरी नली के निचले भाग को एक पेंच की सहायता से ऊपर या नीचे किया जा सकता है।

नली के साथ एक वर्नियर पैमाना (Vernier Scale) भी लगा रहता है, जिसकी सहायता से पारे के स्तम्भ की ऊँचाई को अधिक स्पष्टता से पढ़ा जा सकता है।

फोर्टिन बैरोमीटर में मापन की प्रक्रिया

  1. पहले पेंच की सहायता से पारे की सतह को निर्धारित बिन्दु के पास समायोजित किया जाता है।
  2. पारे की सतह उचित स्थिति में आने के बाद वर्नियर पैमाने की सहायता से पारे के स्तम्भ की ऊँचाई पढ़ी जाती है।
  3. पारे के स्तम्भ की ऊँचाई से वायुमण्डलीय दाब ज्ञात किया जाता है।

फोर्टिन बैरोमीटर की विशेषता

वर्नियर पैमाने के प्रयोग के कारण फोर्टिन बैरोमीटर में पारे के स्तम्भ की ऊँचाई को अधिक सूक्ष्मता से पढ़ा जा सकता है।

2. निर्द्रव वायु दाबमापी (Aneroid Barometer)

निर्द्रव वायु दाबमापी एक ऐसा बैरोमीटर है जिसमें वायुदाब मापने के लिए किसी द्रव का प्रयोग नहीं किया जाता।

यह फोर्टिन बैरोमीटर की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक ढंग से प्रयोग किया जा सकता है।

इस यंत्र में धातु की बनी एक चपटी एवं लहरदार सतह वाली बंद डिब्बीनुमा संरचना होती है। इसके भीतर की वायु को पम्प द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

निर्द्रव वायु दाबमापी की कार्य-विधि

बाहरी वायुदाब में परिवर्तन होने पर धातु की चपटी डिब्बी की सतह ऊपर या नीचे होती है।

यह परिवर्तन उत्तोलकों (Levers) की सहायता से एक सूई तक पहुँचाया जाता है।

सूई डायल (Dial) पर घूमती है और वायुदाब का मान प्रदर्शित करती है।

इसे सरल क्रम में इस प्रकार समझ सकते हैं—

वायुदाब में परिवर्तन → धातु की सतह में परिवर्तन → उत्तोलकों की गति → सूई घूमती है → डायल पर वायुदाब ज्ञात होता है

निर्द्रव वायु दाबमापी में मौसम संकेत

निर्द्रव वायु दाबमापी के डायल पर वर्षा, आँधी, शुष्क तथा आर्द्र आदि मौसम सम्बन्धी संकेत बनाए जा सकते हैं।

सूई की स्थिति देखकर वायुदाब के साथ-साथ मौसम की स्थिति का अनुमान भी लगाया जा सकता है।

इसे निर्द्रव बैरोमीटर क्यों कहते हैं?

इस यंत्र में वायुदाब मापने के लिए पारा या अन्य किसी द्रव का उपयोग नहीं किया जाता। इसी कारण इसे निर्द्रव वायु दाबमापी कहा जाता है।

फोर्टिन एवं निर्द्रव वायु दाबमापी में अन्तर

आधार फोर्टिन बैरोमीटर निर्द्रव बैरोमीटर
मुख्य आधार पारे के स्तम्भ की ऊँचाई धातु की बंद डिब्बी में होने वाला परिवर्तन
द्रव का प्रयोग पारे का प्रयोग होता है किसी द्रव का प्रयोग नहीं होता
पाठ्यांक पारे के स्तम्भ एवं वर्नियर पैमाने से डायल पर घूमती सूई से
विशेषता पारे की ऊँचाई का सूक्ष्म मापन प्रयोग में अधिक सुविधाजनक

स्थान की ऊँचाई के साथ वायुदाब में परिवर्तन

पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर वायुमण्डलीय दाब कम होता जाता है।

लगभग 150 मीटर ऊपर जाने पर वायुदाब के कारण पारे के स्तम्भ की ऊँचाई लगभग 1 सेमी कम हो जाती है।

उदाहरण के लिए यदि किसी पहाड़ की समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 2000 मीटर हो, तो वहाँ वायुदाब के कारण पारे के स्तम्भ की ऊँचाई लगभग 80 सेमी के आसपास बताई गई है।

इससे स्पष्ट होता है कि स्थान की ऊँचाई बदलने पर वायुदाब भी बदलता है।

ऊँचाई बढ़ती है → वायुमण्डलीय दाब घटता है

बैरोमीटर एक नजर में

तथ्य उत्तर
वायुदाब मापने का यंत्र बैरोमीटर
समुद्र तल पर पारे की ऊँचाई लगभग 76 सेमी
मुख्य प्रकार फोर्टिन एवं निर्द्रव बैरोमीटर
फोर्टिन बैरोमीटर पारे एवं वर्नियर पैमाने का प्रयोग
निर्द्रव बैरोमीटर द्रव के बिना वायुदाब मापन
ऊँचाई बढ़ने पर वायुदाब कम होता है
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वायुमण्डलीय दाब मापने वाले यंत्र को बैरोमीटर कहते हैं।
  • समुद्र तल पर पारे के स्तम्भ की औसत ऊँचाई लगभग 76 सेमी होती है।
  • बैरोमीटर मुख्यतः फोर्टिन बैरोमीटर और निर्द्रव वायु दाबमापी दो प्रकार के होते हैं।
  • फोर्टिन बैरोमीटर में पारा तथा वर्नियर पैमाने का प्रयोग किया जाता है।
  • निर्द्रव वायु दाबमापी में किसी द्रव का प्रयोग नहीं किया जाता।
  • निर्द्रव बैरोमीटर में वायुदाब के कारण धातु की सतह में होने वाला परिवर्तन उत्तोलकों द्वारा सूई तक पहुँचता है।
  • सूई डायल पर वायुदाब का मान प्रदर्शित करती है।
  • ऊँचाई बढ़ने पर वायुमण्डलीय दाब कम होता जाता है।
  • बैरोमीटर की सहायता से वायुदाब के परिवर्तन तथा मौसम की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।

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Topic 4 वायुमण्डलीय दाब के उपयोग

वायुमण्डलीय दाब के उपयोग

वायुमण्डलीय दाब के उपयोग

वायुमण्डलीय दाब का उपयोग दैनिक जीवन में अनेक यंत्रों के कार्य करने में होता है। जल पम्प, फुटबॉल पम्प तथा साइकिल पम्प ऐसे प्रमुख उदाहरण हैं, जिनकी कार्य-विधि में वायु के दाब की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

1. जल पम्प (Water Pump)

जल पम्प का उपयोग कुएँ अथवा अन्य जल स्रोत से पानी ऊपर खींचकर बाहर निकालने के लिए किया जाता है।

जल पम्प में मुख्य रूप से हैंडल, पिस्टन तथा वाल्व होते हैं।

जल पम्प की कार्य-विधि

जब जल पम्प के हैंडल को ऊपर उठाया जाता है, तो पिस्टन नीचे की ओर जाता है। इस समय पिस्टन का वाल्व खुल जाता है और वायु बाहर निकल जाती है।

इसके बाद हैंडल को नीचे करने पर पिस्टन ऊपर उठता है। पिस्टन के नीचे वायुदाब कम होने लगता है और नली का वाल्व खुल जाता है।

बाहर का वायुमण्डलीय दाब जल की सतह पर कार्य करता है, जिससे जल नली के माध्यम से ऊपर चढ़कर पम्प के बेलन में पहुँच जाता है।

इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराने पर जल ऊपर चढ़ता है और अन्ततः टोंटी से बाहर निकलने लगता है।

इसे सरल क्रम में इस प्रकार समझ सकते हैं—

पिस्टन की गति → पम्प के भीतर वायुदाब में परिवर्तन → नली का वाल्व खुलना → वायुमण्डलीय दाब से जल ऊपर चढ़ना → टोंटी से जल बाहर निकलना

जल पम्प में वायुमण्डलीय दाब की भूमिका

जब पिस्टन के नीचे दाब कम होता है, तब बाहर का वायुमण्डलीय दाब जल की सतह पर दबाव डालकर जल को नली में ऊपर की ओर चढ़ाता है।

2. फुटबॉल पम्प (Football Pump)

फुटबॉल पम्प एक यांत्रिक युक्ति है, जिसका उपयोग फुटबॉल आदि में हवा भरने के लिए किया जाता है।

पम्प की पतली पाइप के नुकीले सिरे को फुटबॉल के नोजल से जोड़ दिया जाता है।

फुटबॉल पम्प की कार्य-विधि

जब पम्प को ऊपर की ओर खींचा जाता है, तो चमड़े का वॉशर सिकुड़ जाता है और बाहर की वायु पम्प के बेलन में प्रवेश कर जाती है।

जब पम्प को नीचे की ओर दबाया जाता है, तो पम्प के भीतर वायुदाब बढ़ जाता है। दबाव के कारण चमड़े का वॉशर फैलकर बेलन की दीवार से सट जाता है।

बेलन के भीतर वायु का दाब बढ़ने पर नली में लगी छोटी गोली अपने स्थान से हट जाती है और वायु पाइप से होकर फुटबॉल के ब्लैडर में पहुँच जाती है।

इस प्रकार पम्प को बार-बार ऊपर-नीचे करने पर फुटबॉल के भीतर पर्याप्त वायु भर जाती है।

हैंडल ऊपर → बाहर की वायु बेलन में → हैंडल नीचे → वायु का दाब बढ़ता है → वायु ब्लैडर में पहुँचती है

3. साइकिल पम्प (Cycle Pump)

साइकिल पम्प की संरचना एक बेलन की भाँति होती है। इसके ऊपर की ओर एक हत्था लगा रहता है तथा नीचे एक ट्यूब जुड़ी होती है।

इस ट्यूब को साइकिल के टायर की ट्यूब से जोड़ दिया जाता है।

साइकिल पम्प की कार्य-विधि

साइकिल की ट्यूब में हवा भरने के लिए पम्प की सबसे निचली सतह पर लगी पट्टी को पैर द्वारा दबाकर पम्प को स्थिर किया जाता है।

जब पम्प के हत्थे को ऊपर खींचा जाता है, तो पम्प के भीतर वायुदाब कम होता है और वायु पिस्टन के ऊपर से होकर वॉशर के नीचे बेलन में भर जाती है।

इसके बाद हत्थे को नीचे दबाने पर बेलन के भीतर वायु का दाब बढ़ जाता है।

दबी हुई वायु रबर की नली से होकर साइकिल की ट्यूब में प्रवेश करती है।

हत्थे को बार-बार ऊपर-नीचे करने से पर्याप्त मात्रा में वायु साइकिल की ट्यूब में भर जाती है।

हत्था ऊपर → बेलन में वायु भरती है → हत्था नीचे → वायुदाब बढ़ता है → वायु ट्यूब में पहुँचती है

जल पम्प, फुटबॉल पम्प एवं साइकिल पम्प में वायुदाब का उपयोग
जल पम्प, फुटबॉल पम्प और साइकिल पम्प में दाब के उपयोग की तुलनात्मक कार्य-विधि

तीनों पम्प एक नजर में

यंत्र मुख्य कार्य वायुदाब की भूमिका
जल पम्प जल को नीचे से ऊपर लाना कम दाब बनने पर वायुमण्डलीय दाब जल को नली में ऊपर चढ़ाता है
फुटबॉल पम्प फुटबॉल में वायु भरना वायु को दबाकर उसका दाब बढ़ाया जाता है और उसे ब्लैडर में पहुँचाया जाता है
साइकिल पम्प साइकिल की ट्यूब में वायु भरना बेलन में वायु का दाब बढ़ाकर उसे ट्यूब में भेजा जाता है

पम्पों में दाब का सामान्य सिद्धान्त

इन पम्पों में पिस्टन अथवा हत्थे की गति के कारण भीतर की वायु के दाब में परिवर्तन होता है। दाब के इसी अन्तर के कारण वायु अथवा जल एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर गति करता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जल पम्प, फुटबॉल पम्प और साइकिल पम्प दाब के उपयोग के प्रमुख उदाहरण हैं।
  • जल पम्प में पिस्टन के नीचे वायुदाब कम होने पर बाहर का वायुमण्डलीय दाब जल को नली में ऊपर चढ़ाने में सहायता करता है।
  • जल पम्प में पिस्टन एवं वाल्व की गति से जल बेलन में चढ़ता है और टोंटी से बाहर निकलता है।
  • फुटबॉल पम्प में हैंडल को ऊपर खींचने पर वायु बेलन में प्रवेश करती है।
  • फुटबॉल पम्प को नीचे दबाने पर वायु का दाब बढ़ता है और वायु ब्लैडर में पहुँचती है।
  • साइकिल पम्प में हत्थे को ऊपर खींचने पर वायु बेलन में भरती है।
  • हत्थे को नीचे दबाने पर वायु का दाब बढ़ता है और वायु रबर की नली से साइकिल की ट्यूब में पहुँचती है।
  • पम्पों में वायु के दाब में परिवर्तन के कारण जल अथवा वायु की गति होती है।
Topic 5 द्रव में दाब एवं द्रव-दाब के नियम

द्रव में दाब एवं द्रव-दाब के नियम

द्रव में दाब (Pressure in Liquid)

द्रव के अणु जिस पात्र में रखे जाते हैं, उसकी दीवारों तथा तली पर बल लगाते हैं।

द्रव के अणुओं द्वारा पात्र की दीवार अथवा तली पर प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगाए गए बल को द्रव का दाब कहते हैं।

द्रव के भीतर किसी बिन्दु पर उत्पन्न दाब उस बिन्दु की गहराई, द्रव के घनत्व तथा गुरुत्वीय त्वरण पर निर्भर करता है।

द्रव-दाब का सूत्र

द्रव में किसी बिन्दु पर दाब निम्न सूत्र से ज्ञात किया जाता है—

P = h × d × g

जहाँ—

  • P = द्रव का दाब
  • h = द्रव की सतह से बिन्दु की गहराई
  • d = द्रव का घनत्व
  • g = गुरुत्वीय त्वरण

द्रव के दाब को पास्कल (Pa) में मापा जाता है।

द्रव-दाब किन कारकों पर निर्भर करता है?

सूत्र P = h × d × g से स्पष्ट है कि द्रव का दाब मुख्य रूप से निम्न कारकों पर निर्भर करता है—

  1. गहराई (h)
  2. द्रव का घनत्व (d)
  3. गुरुत्वीय त्वरण (g)

1. गहराई का प्रभाव

द्रव की सतह से किसी बिन्दु की गहराई जितनी अधिक होती है, उस बिन्दु पर द्रव-दाब उतना ही अधिक होता है।

अर्थात्—

गहराई बढ़ती है → द्रव-दाब बढ़ता है

2. घनत्व का प्रभाव

किसी निश्चित गहराई पर अधिक घनत्व वाले द्रव द्वारा अधिक दाब लगाया जाता है।

अर्थात्—

द्रव का घनत्व बढ़ता है → द्रव-दाब बढ़ता है

द्रव में दाब के नियम

स्थिर द्रव में दाब से सम्बन्धित प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं—

नियम 1 — समान क्षैतिज तल पर दाब समान होता है

स्थिर द्रव में एक ही क्षैतिज तल पर स्थित सभी बिन्दुओं पर दाब समान होता है।

अर्थात् समान गहराई पर स्थित बिन्दुओं पर द्रव-दाब का मान समान होता है।

नियम 2 — दाब प्रत्येक दिशा में बराबर होता है

स्थिर द्रव के भीतर किसी निश्चित बिन्दु पर दाब प्रत्येक दिशा में बराबर होता है।

इसी कारण द्रव पात्र की तली के साथ-साथ उसकी दीवारों पर भी दाब डालता है।

नियम 3 — दाब गहराई के अनुक्रमानुपाती होता है

द्रव के भीतर किसी बिन्दु पर दाब, उस बिन्दु की द्रव की स्वतंत्र सतह से गहराई के अनुक्रमानुपाती होता है।

अर्थात्—

P ∝ h

इसलिए गहराई बढ़ने पर द्रव-दाब भी बढ़ता है।

नियम 4 — दाब द्रव के घनत्व पर निर्भर करता है

किसी बिन्दु पर द्रव का दाब उसके घनत्व पर भी निर्भर करता है।

अधिक घनत्व वाले द्रव द्वारा अधिक दाब लगाया जाता है।

अर्थात्—

P ∝ d

द्रव-दाब के नियम एक नजर में

नियम मुख्य तथ्य
समान क्षैतिज तल सभी बिन्दुओं पर दाब समान होता है
दिशा किसी निश्चित बिन्दु पर दाब प्रत्येक दिशा में बराबर होता है
गहराई गहराई बढ़ने पर दाब बढ़ता है
घनत्व घनत्व बढ़ने पर दाब बढ़ता है

क्रियाकलाप — द्रव सभी दिशाओं में दाब डालता है

यदि किसी टिन के डिब्बे में समान ऊँचाई पर कई छिद्र बनाकर उसमें पानी भरा जाए, तो सभी छिद्रों से पानी बाहर निकलता है।

इससे स्पष्ट होता है कि द्रव सभी दिशाओं में दाब डालता है।

क्रियाकलाप — गहराई के साथ द्रव-दाब

यदि किसी डिब्बे में अलग-अलग ऊँचाइयों पर छिद्र बनाए जाएँ और उसमें पानी भरा जाए, तो नीचे वाले छिद्र से पानी अधिक दूरी तक जाता है, जबकि ऊपर वाले छिद्र से कम दूरी तक जाता है।

इससे स्पष्ट होता है कि गहराई बढ़ने के साथ द्रव-दाब बढ़ता है।

द्रव में दाब और गहराई के साथ दाब में परिवर्तन
द्रव सभी दिशाओं में दाब डालता है तथा गहराई बढ़ने पर द्रव-दाब बढ़ता है

उदाहरण — 60 मीटर गहरे समुद्र की तली पर दाब

यदि समुद्र की गहराई 60 मीटर, समुद्री जल का घनत्व 1.01 × 103 kg/m3 तथा गुरुत्वीय त्वरण 10 m/s2 हो, तो समुद्र की तली पर दाब ज्ञात कीजिए।

दिया है—

  • h = 60 m
  • d = 1.01 × 103 kg/m3
  • g = 10 m/s2

सूत्र—

P = h × d × g

मान रखने पर—

P = 60 × 1.01 × 103 × 10

P = 606 × 103 Pa

अतः समुद्र की तली पर दाब 606 × 103 पास्कल होगा।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • द्रव द्वारा पात्र की दीवार या तली पर प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगाए गए बल को द्रव-दाब कहते हैं।
  • द्रव-दाब का सूत्र P = h × d × g है।
  • द्रव-दाब का मात्रक पास्कल (Pa) है।
  • स्थिर द्रव में समान क्षैतिज तल पर स्थित सभी बिन्दुओं पर दाब समान होता है।
  • द्रव के भीतर किसी निश्चित बिन्दु पर दाब प्रत्येक दिशा में बराबर होता है।
  • द्रव की गहराई बढ़ने पर दाब बढ़ता है।
  • द्रव का घनत्व अधिक होने पर दाब भी अधिक होता है।
  • 60 मीटर गहरे समुद्र में दिए गए मानों के लिए दाब 606 × 103 Pa प्राप्त होता है।

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Topic 6 गलनांक एवं क्वथनांक

गलनांक एवं क्वथनांक

गलनांक (Melting Point)

गलनांक किसी पदार्थ का एक लाक्षणिक गुण (Characteristic Property) है। इसका उपयोग पदार्थ की शुद्धता की जाँच करने तथा अज्ञात पदार्थ की पहचान करने में किया जाता है।

किसी ठोस पदार्थ का वह निश्चित तापमान, जिस पर वह ठोस अवस्था से द्रव अवस्था में परिवर्तित होने लगता है, उसका गलनांक कहलाता है।

गलनांक को द्रवणांक भी कहा जाता है।

ठोस पदार्थ के गलने की प्रक्रिया

जब किसी ठोस पदार्थ को गर्म किया जाता है, तो उसके कण ऊष्मा के रूप में ऊर्जा ग्रहण करते हैं।

ऊर्जा प्राप्त करने से कणों की गतिज ऊर्जा बढ़ती है और उनका कम्पन अधिक होने लगता है।

तापमान बढ़ते-बढ़ते एक निश्चित अवस्था पर ठोस पदार्थ पिघलना प्रारम्भ कर देता है। जिस तापमान पर यह परिवर्तन प्रारम्भ होता है, वही उस पदार्थ का गलनांक है।

इसे सरल क्रम में इस प्रकार समझ सकते हैं—

ठोस को गर्म करना → कण ऊर्जा ग्रहण करते हैं → कणों की गति बढ़ती है → ठोस पिघलता है → द्रव अवस्था

गलनांक का उपयोग

  • पदार्थ की शुद्धता की जाँच करने में
  • अज्ञात पदार्थ की पहचान करने में
  • विभिन्न ठोस पदार्थों के गुणों की तुलना करने में

गलनांक पर दाब का प्रभाव

दाब में परिवर्तन से कुछ ठोस पदार्थों के गलनांक में भी परिवर्तन होता है।

1. गलने पर फैलने वाले पदार्थ

जो ठोस पदार्थ गलने पर फैलते हैं, उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर बढ़ जाता है

उदाहरण—

  • मोम
  • घी

अर्थात्—

दाब बढ़ता है → गलनांक बढ़ता है

2. गलने पर सिकुड़ने वाले पदार्थ

जो ठोस पदार्थ गलने पर सिकुड़ते हैं, उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर घट जाता है

इसका प्रमुख उदाहरण बर्फ है।

अर्थात्—

दाब बढ़ता है → बर्फ का गलनांक घटता है

शुद्धता एवं गलनांक का सम्बन्ध

किसी मिश्रण का गलनांक सामान्यतः शुद्ध ठोस पदार्थ के गलनांक से कम होता है।

यदि किसी पदार्थ में अशुद्धियाँ मिला दी जाएँ, तो उसका गलनांक कम हो जाता है।

इसलिए गलनांक की सहायता से किसी पदार्थ की शुद्धता की जाँच की जा सकती है।

गलनांक से सम्बन्धित मुख्य तथ्य

स्थिति प्रभाव
गलने पर फैलने वाला ठोस दाब बढ़ने पर गलनांक बढ़ता है
गलने पर सिकुड़ने वाला ठोस दाब बढ़ने पर गलनांक घटता है
अशुद्धियाँ मिलाने पर गलनांक कम हो जाता है
मिश्रण गलनांक शुद्ध ठोस की अपेक्षा कम होता है

क्वथनांक (Boiling Point)

वह निश्चित तापमान जिस पर कोई द्रव उबलकर द्रव अवस्था से वाष्प अवस्था में परिवर्तित हो जाता है, उस द्रव का क्वथनांक कहलाता है।

एक वायुमण्डलीय दाब पर जल का क्वथनांक 100°C होता है।

क्वथन की अवस्था

जब किसी द्रव को लगातार गर्म किया जाता है, तो उसका तापमान बढ़ता है।

एक निश्चित तापमान पर द्रव तेजी से वाष्प में परिवर्तित होने लगता है। इस अवस्था को क्वथन कहा जाता है और उस तापमान को क्वथनांक कहते हैं।

इसे सरल क्रम में समझें—

द्रव को गर्म करना → तापमान बढ़ना → निश्चित तापमान पर उबलना → वाष्प अवस्था

क्वथनांक पर दाब का प्रभाव

क्वथनांक पर द्रव का वाष्प दाब, वायुमण्डलीय दाब के बराबर हो जाता है।

दाब बढ़ने पर द्रव का क्वथनांक भी बढ़ जाता है।

अर्थात्—

दाब बढ़ता है → क्वथनांक बढ़ता है

गलनांक एवं क्वथनांक में अन्तर

आधार गलनांक क्वथनांक
अवस्था परिवर्तन ठोस → द्रव द्रव → वाष्प
अर्थ जिस तापमान पर ठोस पिघलता है जिस तापमान पर द्रव उबलता है
दूसरा नाम द्रवणांक
उदाहरण बर्फ का पिघलना एक वायुमण्डलीय दाब पर जल का 100°C पर उबलना
गलनांक एवं क्वथनांक पर दाब का प्रभाव
गलनांक एवं क्वथनांक पर दाब के प्रभाव का तुलनात्मक चित्र

दाब का प्रभाव एक नजर में

स्थिति दाब बढ़ाने का प्रभाव
मोम, घी आदि गलनांक बढ़ता है
बर्फ गलनांक घटता है
द्रव का क्वथनांक क्वथनांक बढ़ता है
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • किसी ठोस का वह निश्चित तापमान जिस पर वह ठोस से द्रव अवस्था में बदलता है, गलनांक कहलाता है।
  • गलनांक को द्रवणांक भी कहा जाता है।
  • गलनांक का उपयोग पदार्थ की शुद्धता जाँचने तथा अज्ञात पदार्थ की पहचान करने में किया जाता है।
  • मोम एवं घी जैसे गलने पर फैलने वाले पदार्थों का गलनांक दाब बढ़ने पर बढ़ता है।
  • बर्फ जैसे गलने पर सिकुड़ने वाले पदार्थ का गलनांक दाब बढ़ने पर घटता है।
  • अशुद्धियाँ मिलाने पर पदार्थ का गलनांक कम हो जाता है।
  • जिस निश्चित तापमान पर द्रव उबलकर वाष्प में बदलता है, उसे क्वथनांक कहते हैं।
  • एक वायुमण्डलीय दाब पर जल का क्वथनांक 100°C होता है।
  • क्वथनांक पर द्रव का वाष्प दाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर हो जाता है।
  • दाब बढ़ने पर द्रव का क्वथनांक बढ़ता है।
Topic 7 प्लवन एवं प्लवन का सिद्धान्त

प्लवन एवं प्लवन का सिद्धान्त

प्लवन (Flotation)

जब किसी वस्तु को किसी द्रव में रखा जाता है, तो उस पर मुख्य रूप से दो विपरीत बल कार्य करते हैं—

  • वस्तु का भार (W) — नीचे की ओर कार्य करता है।
  • द्रव का उत्प्लावन बल (W₁) — ऊपर की ओर कार्य करता है।

इन दोनों बलों के परस्पर सम्बन्ध के आधार पर यह निर्धारित होता है कि वस्तु द्रव में डूबेगी, पूरी तरह डूबी हुई तैरेगी अथवा सतह पर तैरेगी।

प्लवन के प्रमुख नियम

प्लवन के अन्तर्गत दो महत्त्वपूर्ण नियम बताए गए हैं—

नियम 1

सन्तुलित अवस्था में तैरने पर वस्तु अपने भार के बराबर भार का द्रव विस्थापित करती है।

अर्थात् तैरती हुई वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव का भार, वस्तु के भार के बराबर होता है।

नियम 2

तैरती हुई ठोस वस्तु का गुरुत्व केन्द्र तथा उसके द्वारा हटाए गए द्रव का गुरुत्व केन्द्र एक ही ऊर्ध्वाधर रेखा में होने चाहिए।

द्रव में वस्तु पर कार्य करने वाले बल

किसी वस्तु को द्रव में डुबाने पर—

वस्तु का भार W → नीचे की ओर

और

उत्प्लावन बल W₁ → ऊपर की ओर

कार्य करता है।

प्लवन की तीन अवस्थाएँ

वस्तु के भार W तथा उत्प्लावन बल W₁ के आधार पर तीन स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं—

1. जब W > W₁

यदि वस्तु का भार उत्प्लावन बल से अधिक हो, तो नीचे की ओर कार्य करने वाला बल अधिक होगा।

इस स्थिति में वस्तु द्रव में पूरी तरह डूब जाएगी

W > W₁ → वस्तु डूब जाती है

2. जब W = W₁

यदि वस्तु का भार और उत्प्लावन बल बराबर हों, तो दोनों विपरीत बल एक-दूसरे को सन्तुलित कर देते हैं।

इस स्थिति में वस्तु द्रव में पूर्णतः डूबी हुई तैरती रहती है

W = W₁ → वस्तु पूर्णतः डूबी हुई तैरती है

3. जब W < W₁

यदि वस्तु का भार उत्प्लावन बल से कम हो, तो ऊपर की ओर कार्य करने वाला बल अधिक होगा।

इस स्थिति में वस्तु ऊपर की ओर उठती है और द्रव की सतह पर तैरने लगती है।

वस्तु का कुछ भाग द्रव के भीतर तथा शेष भाग द्रव की सतह के ऊपर रहता है।

W < W₁ → वस्तु सतह पर तैरती है

प्लवन की तीन अवस्थाएँ
वस्तु के भार W और उत्प्लावन बल W₁ के सम्बन्ध के अनुसार डूबने तथा तैरने की अवस्थाएँ

प्लवन की तीन अवस्थाएँ एक नजर में

बलों का सम्बन्ध वस्तु की अवस्था
W > W₁ वस्तु द्रव में पूरी तरह डूब जाती है
W = W₁ वस्तु पूर्णतः डूबी हुई तैरती रहती है
W < W₁ वस्तु द्रव की सतह पर तैरती है

प्लवन का सिद्धान्त

जब कोई वस्तु द्रव की सतह पर तैरती है, तो उस पर कार्य करने वाला उत्प्लावन बल, वस्तु द्वारा विस्थापित द्रव के भार के बराबर होता है।

तैरने की सन्तुलित अवस्था में वस्तु का भार भी उत्प्लावन बल के बराबर होता है।

अतः—

वस्तु का भार = उत्प्लावन बल = वस्तु द्वारा विस्थापित द्रव का भार

इसे प्लवन का सिद्धान्त कहते हैं।

प्लवन को सरल रूप में समझें

यदि नीचे की ओर लगने वाला वस्तु का भार अधिक है, तो वस्तु डूबती है। यदि ऊपर की ओर लगने वाला उत्प्लावन बल वस्तु के भार के बराबर हो जाता है, तो वस्तु सन्तुलित होकर तैर सकती है।

इसे सरल क्रम में इस प्रकार याद कर सकते हैं—

भार अधिक → डूबना
दोनों बराबर → सन्तुलित तैरना
उत्प्लावन बल अधिक → ऊपर उठना / सतह पर तैरना

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • द्रव में रखी वस्तु पर वस्तु का भार नीचे तथा उत्प्लावन बल ऊपर की ओर कार्य करता है।
  • सन्तुलित अवस्था में तैरती वस्तु अपने भार के बराबर भार का द्रव विस्थापित करती है।
  • तैरती वस्तु का गुरुत्व केन्द्र और विस्थापित द्रव का गुरुत्व केन्द्र एक ही ऊर्ध्वाधर रेखा में होने चाहिए।
  • यदि W > W₁ हो, तो वस्तु द्रव में पूरी तरह डूब जाती है।
  • यदि W = W₁ हो, तो वस्तु पूर्णतः डूबी हुई तैरती रहती है।
  • यदि W < W₁ हो, तो वस्तु ऊपर उठकर द्रव की सतह पर तैरती है।
  • प्लवन की सन्तुलित अवस्था में वस्तु का भार उत्प्लावन बल के बराबर होता है।
  • तैरती वस्तु का भार उसके द्वारा विस्थापित द्रव के भार के बराबर होता है।

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Topic 8 उत्प्लावन बल एवं आर्किमिडीज का सिद्धान्त

उत्प्लावन बल एवं आर्किमिडीज का सिद्धान्त

उत्प्लावन बल (Buoyant Force)

जब किसी वस्तु को किसी द्रव में डुबाया जाता है, तो द्रव उस वस्तु पर ऊपर की ओर एक बल लगाता है।

इस ऊपर की ओर लगने वाले बल को उत्प्लावन बल, उत्क्षेप बल अथवा उत्प्लावक बल कहते हैं।

इसी बल के कारण द्रव में डूबी वस्तु का भार हमें उसके वास्तविक भार से कम प्रतीत होता है।

उत्प्लावन बल को उदाहरण से समझें

यदि किसी खाली प्लास्टिक के डिब्बे को पानी में दबाया जाए, तो वह ऊपर की ओर आने का प्रयास करता है।

इसी प्रकार किसी कॉर्क को पानी में दबाने पर पानी उसे ऊपर की ओर धकेलता है।

वस्तु को ऊपर की ओर धकेलने वाला यही बल उत्प्लावन बल है।

उत्प्लावन केन्द्र

उत्प्लावन बल उस बिन्दु पर कार्य करता है जो वस्तु द्वारा विस्थापित किए गए द्रव का गुरुत्व केन्द्र होता है।

इस बिन्दु को उत्प्लावन केन्द्र कहा जाता है।

उत्प्लावन बल उत्पन्न होने का कारण

द्रव में डूबी वस्तु के अलग-अलग भाग अलग-अलग गहराइयों पर होते हैं।

द्रव में गहराई बढ़ने पर दाब बढ़ता है। इसलिए वस्तु के निचले भाग पर लगने वाला दाब उसके ऊपरी भाग पर लगने वाले दाब की अपेक्षा अधिक होता है।

ऊपरी तथा निचले भाग पर लगने वाले दाब के इस अन्तर के कारण वस्तु पर एक परिणामी बल ऊपर की ओर कार्य करता है।

यही परिणामी ऊर्ध्व बल उत्प्लावन बल कहलाता है।

इसे सरल क्रम में इस प्रकार समझ सकते हैं—

नीचे अधिक गहराई → नीचे अधिक दाब → ऊपर और नीचे के दाब में अन्तर → ऊपर की ओर परिणामी बल → उत्प्लावन बल

द्रव में उत्प्लावन बल उत्पन्न होने का कारण
वस्तु के निचले भाग पर अधिक दाब के कारण ऊपर की ओर उत्प्लावन बल उत्पन्न होता है

उत्प्लावन बल की विशेषताएँ

उत्प्लावन बल के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं—

  1. द्रव के घनत्व का प्रभाव— समान आयतन की वस्तु को अधिक घनत्व वाले द्रव में डुबाने पर उत्प्लावन बल अधिक होता है।
  2. डूबे हुए आयतन का प्रभाव— वस्तु का जितना अधिक आयतन द्रव में डूबता है, उस पर लगने वाला उत्प्लावन बल उतना ही अधिक होता है।
  3. दिशा— उत्प्लावन बल वस्तु पर ऊपर की दिशा में कार्य करता है।
  4. कार्य-बिन्दु— उत्प्लावन बल उत्प्लावन केन्द्र पर कार्य करता है, जो विस्थापित द्रव का गुरुत्व केन्द्र होता है।

आर्किमिडीज का सिद्धान्त (Principle of Archimedes)

जब किसी वस्तु को किसी द्रव में पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से डुबाया जाता है, तो उसके भार में कमी का आभास होता है।

वस्तु के भार में प्रतीत होने वाली यह कमी, उस वस्तु द्वारा विस्थापित किए गए द्रव के भार के बराबर होती है।

इसे आर्किमिडीज का सिद्धान्त कहते हैं।

आभासी भार

द्रव में डुबाने पर किसी वस्तु का जो भार मापा जाता है, वह उसके वास्तविक भार से कम दिखाई देता है।

यह अन्तर उत्प्लावन बल के कारण होता है।

अतः—

आभासी भार = वास्तविक भार − उत्प्लावन बल

उत्प्लावन बल एवं विस्थापित द्रव

आर्किमिडीज के सिद्धान्त के अनुसार—

उत्प्लावन बल (U) = विस्थापित द्रव का भार

अथवा,

U = डूबे हुए भाग का आयतन × द्रव का घनत्व × g

यदि डूबे हुए भाग का आयतन V, द्रव का घनत्व ρ तथा गुरुत्वीय त्वरण g हो, तो—

U = ρVg

वायु तथा द्रव में वस्तु के भार का सम्बन्ध

यदि किसी वस्तु का वायु में भार W₁ तथा द्रव में डुबाने पर भार W₂ हो, तो द्रव में डुबाने पर भार में कमी होगी—

भार में कमी = W₁ − W₂

आर्किमिडीज के सिद्धान्त के अनुसार यह कमी विस्थापित द्रव के भार के बराबर होती है।

अतः—

W₁ − W₂ = ρVg

जहाँ—

  • ρ = द्रव का घनत्व
  • V = विस्थापित द्रव का आयतन
  • g = गुरुत्वीय त्वरण

आर्किमिडीज सिद्धान्त का सरल उदाहरण

यदि पानी से पूरा भरा हुआ एक पात्र लिया जाए और उसमें कोई वस्तु डुबाई जाए, तो पात्र से कुछ पानी बाहर निकल जाता है।

वस्तु को पानी में डुबाने पर उसके भार में जितनी कमी दिखाई देती है, वह बाहर निकले हुए पानी के भार के बराबर होती है।

अर्थात्—

वस्तु के भार में कमी = विस्थापित द्रव का भार

क्रियाकलाप — आर्किमिडीज सिद्धान्त का प्रदर्शन

  1. एक ऐसे पात्र में पानी भरें जिसमें ऊपर की ओर टोंटी लगी हो।
  2. टोंटी के नीचे एक अन्य पात्र रखें, ताकि बाहर निकलने वाला पानी उसमें एकत्र हो सके।
  3. एक वस्तु को तुला से लटकाकर पहले उसका भार ज्ञात करें।
  4. अब उसी वस्तु को धीरे-धीरे पानी में डुबाएँ।
  5. वस्तु के डूबने पर टोंटी से बाहर निकलने वाले जल को एकत्र करें।
  6. द्रव में वस्तु के भार में आई कमी तथा विस्थापित जल के भार की तुलना करें।

वस्तु के भार में होने वाली कमी, विस्थापित जल के भार के बराबर प्राप्त होती है।

उत्प्लावन बल का एक और प्रदर्शन

यदि एक सन्तुलित छड़ के दोनों सिरों पर समान भार की वस्तुएँ बाँधी जाएँ और उनमें से एक वस्तु को पानी में डुबा दिया जाए, तो पानी में डूबी वस्तु वाला सिरा ऊपर उठने लगता है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पानी में डूबी वस्तु पर ऊपर की ओर उत्प्लावन बल कार्य करता है और उसका आभासी भार कम हो जाता है।

आर्किमिडीज के सिद्धान्त के अनुप्रयोग

आर्किमिडीज का सिद्धान्त अनेक व्यावहारिक कार्यों में उपयोगी है—

  1. आपेक्षिक घनत्व ज्ञात करने में— पदार्थों का आपेक्षिक घनत्व ज्ञात करने में इस सिद्धान्त का प्रयोग किया जाता है।
  2. हाइड्रोमीटर में— द्रवों का घनत्व ज्ञात करने वाला हाइड्रोमीटर आर्किमिडीज के सिद्धान्त पर आधारित होता है।
  3. लैक्टोमीटर में— दूध की शुद्धता ज्ञात करने के लिए प्रयुक्त लैक्टोमीटर भी इसी सिद्धान्त पर आधारित होता है।
  4. जहाज एवं पनडुब्बी के निर्माण में— जहाजों तथा पनडुब्बियों के डिजाइन में आर्किमिडीज के सिद्धान्त का उपयोग किया जाता है।

उत्प्लावन बल और आर्किमिडीज सिद्धान्त एक नजर में

अवधारणा मुख्य तथ्य
उत्प्लावन बल द्रव द्वारा डूबी वस्तु पर ऊपर की ओर लगाया गया बल
उत्प्लावन बल का कारण वस्तु के ऊपरी एवं निचले भाग पर दाब का अन्तर
उत्प्लावन केन्द्र विस्थापित द्रव का गुरुत्व केन्द्र
आर्किमिडीज सिद्धान्त भार में कमी = विस्थापित द्रव का भार
आभासी भार वास्तविक भार − उत्प्लावन बल
उत्प्लावन बल U = ρVg
भार में कमी W₁ − W₂ = ρVg
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • द्रव में डूबी वस्तु पर ऊपर की ओर लगने वाले बल को उत्प्लावन बल कहते हैं।
  • वस्तु के निचले भाग पर अधिक तथा ऊपरी भाग पर कम दाब होने के कारण उत्प्लावन बल उत्पन्न होता है।
  • उत्प्लावन बल उत्प्लावन केन्द्र पर कार्य करता है, जो विस्थापित द्रव का गुरुत्व केन्द्र होता है।
  • द्रव का घनत्व अधिक होने पर समान आयतन के लिए उत्प्लावन बल अधिक होता है।
  • वस्तु का अधिक आयतन द्रव में डूबने पर उत्प्लावन बल बढ़ता है।
  • आर्किमिडीज के सिद्धान्त के अनुसार द्रव में वस्तु के भार में होने वाली कमी, विस्थापित द्रव के भार के बराबर होती है।
  • आभासी भार = वास्तविक भार − उत्प्लावन बल।
  • उत्प्लावन बल U = ρVg होता है।
  • यदि वायु में भार W₁ तथा द्रव में भार W₂ हो, तो W₁ − W₂ = ρVg होता है।
  • आर्किमिडीज सिद्धान्त का उपयोग हाइड्रोमीटर, लैक्टोमीटर, जहाज तथा पनडुब्बियों में किया जाता है।
Topic 9 घनत्व

घनत्व

घनत्व (Density)

विभिन्न पदार्थों में भारीपन अथवा हल्केपन की मात्रा अलग-अलग होती है। उदाहरण के लिए लोहा एल्युमिनियम की अपेक्षा भारी होता है तथा जल एल्कोहॉल की अपेक्षा भारी होता है।

किसी पदार्थ के भारीपन या हल्केपन को वैज्ञानिक रूप से व्यक्त करने के लिए घनत्व का प्रयोग किया जाता है।

किसी पदार्थ के प्रति इकाई आयतन में उपस्थित द्रव्यमान को उस पदार्थ का घनत्व कहते हैं।

घनत्व का सूत्र

घनत्व को निम्न सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है—

घनत्व = पदार्थ का द्रव्यमान / पदार्थ का आयतन

यदि घनत्व को ρ, द्रव्यमान को m तथा आयतन को V से दर्शाएँ, तो—

ρ = m / V

घनत्व को सरल रूप में समझें

समान आयतन वाले दो पदार्थों में जिस पदार्थ का द्रव्यमान अधिक होगा, उसका घनत्व भी अधिक होगा।

अर्थात् किसी निश्चित आयतन में जितना अधिक द्रव्यमान उपस्थित होगा, पदार्थ उतना अधिक घना होगा।

इसे सरल रूप में इस प्रकार समझ सकते हैं—

समान आयतन + अधिक द्रव्यमान → अधिक घनत्व

घनत्व का SI मात्रक

द्रव्यमान का SI मात्रक किलोग्राम (kg) तथा आयतन का SI मात्रक घन मीटर (m3) है।

अतः घनत्व का SI मात्रक—

किलोग्राम प्रति घन मीटर (kg/m3)

होता है।

इसे kg m-3 के रूप में भी लिखा जा सकता है।

घनत्व से भारी और हल्के पदार्थों की तुलना

घनत्व की सहायता से विभिन्न पदार्थों के भारीपन अथवा हल्केपन की तुलना की जा सकती है।

तुलना मुख्य तथ्य
लोहा एवं एल्युमिनियम लोहा एल्युमिनियम की अपेक्षा भारी होता है
जल एवं एल्कोहॉल जल एल्कोहॉल की अपेक्षा भारी होता है

हीलियम गैस और घनत्व

गुब्बारों में हीलियम गैस भरी जाती है। हीलियम गैस वायु की अपेक्षा हल्की होती है और उसका घनत्व वायु के घनत्व से कम होता है।

इसी कारण हीलियम से भरा गुब्बारा ऊपर की ओर उठने लगता है।

अर्थात्—

हीलियम का घनत्व < वायु का घनत्व → गुब्बारा ऊपर उठता है

घनत्व और हीलियम गुब्बारे का उदाहरण हीलियम का घनत्व वायु से कम होने के कारण हीलियम से भरा गुब्बारा ऊपर उठता है /figcaption>

घनत्व एक नजर में

तथ्य उत्तर
घनत्व का अर्थ प्रति इकाई आयतन में द्रव्यमान
सूत्र ρ = m/V
द्रव्यमान का SI मात्रक किलोग्राम (kg)
आयतन का SI मात्रक घन मीटर (m3)
घनत्व का SI मात्रक kg/m3
हीलियम वायु की अपेक्षा कम घनत्व वाली गैस
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • किसी पदार्थ के प्रति इकाई आयतन में उपस्थित द्रव्यमान को उसका घनत्व कहते हैं।
  • घनत्व का सूत्र ρ = m/V है।
  • समान आयतन में अधिक द्रव्यमान वाला पदार्थ अधिक घनत्व वाला होता है।
  • द्रव्यमान का SI मात्रक किलोग्राम तथा आयतन का SI मात्रक घन मीटर है।
  • घनत्व का SI मात्रक किलोग्राम प्रति घन मीटर (kg/m3) है।
  • लोहा एल्युमिनियम की अपेक्षा भारी तथा जल एल्कोहॉल की अपेक्षा भारी होता है।
  • हीलियम गैस का घनत्व वायु से कम होता है, इसलिए हीलियम से भरा गुब्बारा ऊपर उठता है।

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Topic 10 वैज्ञानिक यंत्र: परिचय, आवश्यकता एवं प्रकार

वैज्ञानिक यंत्र: परिचय, आवश्यकता एवं प्रकार

वैज्ञानिक यंत्र (Scientific Instruments)

विज्ञान के क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के यंत्रों और उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। ये यंत्र वैज्ञानिक कार्यों को सरल बनाने तथा विभिन्न राशियों और घटनाओं का मापन एवं अध्ययन करने में सहायता करते हैं।

वैज्ञानिक प्रगति के साथ अनेक ऐसे यंत्र विकसित किए गए हैं जिनकी सहायता से कठिन कार्यों को भी सरलता से किया जा सकता है।

वैज्ञानिक यंत्रों की आवश्यकता

वैज्ञानिक यंत्रों की आवश्यकता मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से होती है—

  1. अवधारणाओं को स्पष्ट करने के लिए— वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से विद्यार्थियों को विभिन्न वैज्ञानिक अवधारणाओं और विचारों को अधिक स्पष्ट एवं विस्तृत रूप से समझाया जा सकता है।
  2. प्रयोगशाला में प्रयोग करने के लिए— वैज्ञानिकों तथा विद्यार्थियों को प्रयोगशाला में विभिन्न प्रयोगों को करने के लिए वैज्ञानिक यंत्रों की आवश्यकता होती है।
  3. कार्य एवं कार्यक्षमता के मापन के लिए— किसी यंत्र की कार्यप्रणाली तथा कार्यक्षमता का अध्ययन एवं मापन करने में भी वैज्ञानिक यंत्र उपयोगी होते हैं।

प्रमुख वैज्ञानिक यंत्र एवं उनके उपयोग

विभिन्न वैज्ञानिक यंत्र अलग-अलग प्रकार के मापन तथा वैज्ञानिक कार्यों के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

क्र. वैज्ञानिक यंत्र उपयोग
1 अल्टीमीटर ऊँचाई मापने के लिए
2 अमीटर विद्युत धारा मापने के लिए
3 एनीमोमीटर वायु का वेग मापने के लिए
4 बैरोमीटर वायुमण्डलीय दाब मापने के लिए
5 क्रेस्कोग्राफ पौधों की वृद्धि का अभिलेखन करने के लिए
6 क्रोनोमीटर जहाजों में खगोलीय नौ-संचालन के लिए प्रयुक्त घड़ी
7 कार्डियोग्राफ हृदय की गति एवं क्रियाओं का मापन करने के लिए
8 डायनेमोमीटर इंजन की शक्ति अथवा आउटपुट मापने के लिए
9 एपिडायस्कोप फिल्मों को पर्दे पर प्रक्षेपित करने के लिए
10 फैदोमीटर समुद्र की गहराई मापने के लिए
11 गैल्वेनोमीटर अत्यन्त कम विद्युत धारा मापने के लिए
12 ओडोमीटर वाहन के पहिए द्वारा तय की गई दूरी मापने के लिए
13 पेरिस्कोप पानी के भीतर से बाहर की वस्तुओं को देखने के लिए
14 फोटोमीटर प्रकाश की तीव्रता मापने के लिए
15 पाइरोमीटर बहुत अधिक तापमान मापने के लिए
16 रेडियोमीटर विद्युतचुम्बकीय विकिरण के विकिरण फ्लक्स को मापने के लिए
17 सीस्मोमीटर भूकम्प, ज्वालामुखी विस्फोट आदि से उत्पन्न भूमि की गति का मापन करने के लिए
18 सेक्सटेन्ट दो वस्तुओं के बीच कोणीय दूरी मापने के लिए
19 ट्रांसफॉर्मर प्रत्यावर्ती विद्युत धारा की वोल्टता में परिवर्तन करने के लिए
20 टेलीप्रिन्टर टेलीग्राफ द्वारा भेजे गए संदेशों को स्वतः मुद्रित करने के लिए
21 टैकोमीटर घूर्णनशील शाफ्ट की कोणीय गति मापने के लिए
22 टेलीस्कोप दूर स्थित वस्तुओं को देखने के लिए
23 ग्रैविमीटर दो स्थानों के गुरुत्वाकर्षण बल के अन्तर को मापने के लिए
24 ग्रामोफोन ध्वनि को रिकॉर्ड करने तथा पुनः सुनने के लिए
25 कैलिपर्स वर्नियर कैलिपर्स द्वारा व्यास एवं सूक्ष्म मापन करने के लिए
26 कैलोरीमीटर रासायनिक अभिक्रिया में ऊष्मा की मात्रा मापने के लिए
27 कम्पास दिशा ज्ञात करने के लिए
28 कम्यूटेटर प्रत्यावर्ती धारा को दिष्ट धारा में बदलने के लिए
29 एक्टिनोमीटर विकिरण की तापीय शक्ति मापने के लिए
30 एयरोमीटर वायु तथा अन्य गैसों का घनत्व मापने के लिए
31 ऑसिलोस्कोप इलेक्ट्रॉनिक संकेतों की तरंगों को प्रदर्शित एवं विश्लेषित करने के लिए
32 स्टेथोस्कोप शरीर के भीतर उत्पन्न ध्वनियों को सुनने के लिए
33 डेनियल सेल विद्युत परिपथ में विद्युत ऊर्जा प्रदान करने के लिए
34 डिक्टाफोन वार्तालाप को रिकॉर्ड करने तथा पुनः सुनने के लिए
35 थर्मामीटर तापमान मापने के लिए
36 हाइप्सोमीटर ऊँचाई मापने के लिए
37 हाइड्रोमीटर द्रव का घनत्व मापने के लिए
38 हाइड्रोफोन पानी के भीतर ध्वनि तरंगों का पता लगाने के लिए
39 वोल्टमीटर विद्युत परिपथ में विभवान्तर मापने के लिए
40 रेन गेज वर्षा के जल को एकत्र कर वर्षा की मात्रा मापने के लिए
41 रेडिएटर ऊष्मा विनिमय के लिए
42 रेफ्रिजरेटर खाद्य पदार्थों को ठण्डा रखने के लिए
43 माइक्रोमीटर बहुत कम दूरी का मापन करने के लिए
44 मेगाफोन ध्वनि को दूर तक पहुँचाने के लिए
45 बैटरी विद्युत ऊर्जा को आवेशों के रूप में संग्रहित करने के लिए

महत्त्वपूर्ण यंत्र एक नजर में

क्या मापना है? यंत्र
वायुमण्डलीय दाब बैरोमीटर
वायु का वेग एनीमोमीटर
विद्युत धारा अमीटर
अत्यन्त कम विद्युत धारा गैल्वेनोमीटर
विभवान्तर वोल्टमीटर
समुद्र की गहराई फैदोमीटर
द्रव का घनत्व हाइड्रोमीटर
तापमान थर्मामीटर
बहुत अधिक तापमान पाइरोमीटर
वर्षा की मात्रा रेन गेज
पौधों की वृद्धि क्रेस्कोग्राफ
वाहन द्वारा तय दूरी ओडोमीटर
प्रमुख वैज्ञानिक यंत्र एवं उनके उपयोग
प्रमुख वैज्ञानिक यंत्र एवं उनके उपयोग

परीक्षा में यंत्र पहचानने की सरल विधि

प्रश्नों में प्रायः किसी मापी जाने वाली राशि या कार्य को देकर यंत्र का नाम पूछा जाता है। इसलिए यंत्र के नाम के साथ उसका उपयोग याद करना अधिक उपयोगी है।

उदाहरण—

  • वायुदाब → बैरोमीटर
  • वायु वेग → एनीमोमीटर
  • समुद्र की गहराई → फैदोमीटर
  • पौधों की वृद्धि → क्रेस्कोग्राफ
  • विद्युत धारा → अमीटर
  • विभवान्तर → वोल्टमीटर
  • द्रव का घनत्व → हाइड्रोमीटर
  • वर्षा की मात्रा → रेन गेज
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वैज्ञानिक यंत्र वैज्ञानिक कार्यों, प्रयोगों तथा मापन को सरल बनाते हैं।
  • वैज्ञानिक यंत्र अवधारणाओं को स्पष्ट करने, प्रयोगशाला में प्रयोग करने तथा कार्यक्षमता के मापन में उपयोगी होते हैं।
  • अल्टीमीटर ऊँचाई तथा एनीमोमीटर वायु का वेग मापता है।
  • अमीटर विद्युत धारा तथा वोल्टमीटर विभवान्तर मापता है।
  • बैरोमीटर वायुमण्डलीय दाब तथा फैदोमीटर समुद्र की गहराई मापता है।
  • क्रेस्कोग्राफ पौधों की वृद्धि का अभिलेखन करता है।
  • फोटोमीटर प्रकाश की तीव्रता तथा पाइरोमीटर बहुत अधिक तापमान मापता है।
  • हाइड्रोमीटर द्रव का घनत्व तथा एयरोमीटर वायु एवं अन्य गैसों का घनत्व मापता है।
  • रेन गेज वर्षा की मात्रा मापता है।
  • हाइड्रोफोन पानी के भीतर ध्वनि तरंगों का पता लगाने तथा मेगाफोन ध्वनि को दूर तक पहुँचाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

दाब का मात्रक है—

व्याख्या: दाब का SI मात्रक पास्कल है। 1 पास्कल = 1 न्यूटन/मीटर² होता है।
Q 2

दाब का सूत्र है—

व्याख्या: किसी सतह के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाला लम्बवत बल दाब कहलाता है। इसलिए P = F/A होता है।
Q 3

एक वायुमण्डलीय दाब लगभग बराबर होता है—

व्याख्या: एक वायुमण्डलीय दाब का मान लगभग 101325 पास्कल होता है।
Q 4

क्रेस्कोग्राफ का उपयोग किया जाता है—

व्याख्या: क्रेस्कोग्राफ का उपयोग पौधों की वृद्धि का अभिलेखन करने के लिए किया जाता है।
Q 5

प्रत्यावर्ती धारा की वोल्टता में परिवर्तन करने के लिए किस यंत्र का प्रयोग किया जाता है?

व्याख्या: ट्रांसफॉर्मर का उपयोग प्रत्यावर्ती विद्युत धारा की वोल्टता में परिवर्तन करने के लिए किया जाता है।
Q 6

किसी पृष्ठ के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाला बल कहलाता है—

व्याख्या: किसी सतह के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाले लम्बवत बल को दाब कहते हैं।
Q 7

वोल्टमीटर का उपयोग किया जाता है—

व्याख्या: वोल्टमीटर का प्रयोग विद्युत परिपथ के दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर मापने के लिए किया जाता है।
Q 8

समान व्यक्ति द्वारा जमीन पर सबसे अधिक दाब किस स्थिति में लगाया जाएगा?

व्याख्या: एक पैर पर खड़े होने से सम्पर्क क्षेत्रफल सबसे कम होता है। समान बल के लिए क्षेत्रफल कम होने पर दाब अधिक होता है।
Q 9

किसी तल पर दाब का बल तथा क्षेत्रफल से सम्बन्ध है—

व्याख्या: P = F/A के अनुसार दाब बल के अनुक्रमानुपाती तथा क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
Q 10

यदि कोई वस्तु द्रव में पूर्णतः डूबी है और उस पर उत्प्लावन बल उसके भार के बराबर है, तो वस्तु—

व्याख्या: जब वस्तु का भार W और उत्प्लावन बल W₁ बराबर होते हैं, तब दोनों बल संतुलित हो जाते हैं और वस्तु पूर्णतः डूबी हुई संतुलित रहती है।
Q 11

समुद्र की गहराई मापने के लिए किस यंत्र का प्रयोग किया जाता है?

व्याख्या: फैदोमीटर का उपयोग समुद्र की गहराई मापने के लिए किया जाता है।
Q 12

वायुमण्डलीय दाब मापने वाला यंत्र है—

व्याख्या: वायुमण्डलीय दाब को मापने के लिए बैरोमीटर का प्रयोग किया जाता है।
Q 13

द्रव का घनत्व मापने के लिए प्रयुक्त यंत्र है—

व्याख्या: हाइड्रोमीटर का प्रयोग द्रव का घनत्व मापने के लिए किया जाता है।
Q 14

बहुत अधिक तापमान मापने के लिए किस यंत्र का प्रयोग किया जाता है?

व्याख्या: बहुत अधिक तापमान के मापन के लिए पाइरोमीटर का प्रयोग किया जाता है।
Q 15

आर्किमिडीज के सिद्धान्त के अनुसार द्रव में डूबी वस्तु के भार में होने वाली कमी बराबर होती है—

व्याख्या: आर्किमिडीज के सिद्धान्त के अनुसार वस्तु के भार में प्रतीत होने वाली कमी उसके द्वारा विस्थापित द्रव के भार के बराबर होती है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 3 के विषय विज्ञान के अध्याय दाब तथा वैज्ञानिक यंत्र से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

आर्किमिडीज के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।

Q 2

चार प्रमुख वैज्ञानिक यंत्रों के नाम लिखिए।

Q 3

दाब की अवधारणा दीजिए।

Q 4

द्रवों में दाब के नियम लिखिए।

Q 5

गलनांक तथा क्वथनांक को परिभाषित कीजिए।

Q 6

वायुमण्डलीय दाब से क्या तात्पर्य है?

Q 7

वैज्ञानिक यंत्रों के नाम तथा उनके उपयोग लिखिए।

Q 8

साइकिल पम्प तथा जल पम्प का सचित्र वर्णन कीजिए।

Q 9

प्लवन के सिद्धान्त को उदाहरण सहित समझाइए।

Q 10

वैज्ञानिक यंत्रों की कोई दो आवश्यकताएँ बताइए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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