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Home Study Material Semester 3 शैक्षिक मूल्यांकन, क्रियात्मक शोध एवं नवाचार सतत एवं व्यापक मूल्यांकन
Chapter 2 • शैक्षिक मूल्यांकन, क्रियात्मक शोध एवं नवाचार

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन

UP DELED Semester 3 के विषय शैक्षिक मूल्यांकन, क्रियात्मक शोध एवं नवाचार के इस अध्याय में दक्षता आधारित मूल्यांकन, सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का अर्थ, विशेषताएँ, उद्देश्य, कार्यप्रणाली, क्षेत्र, प्रकार, रणनीतियाँ, अपेक्षित आकलन परिणाम तथा मूल्यांकन के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

12
Topics
15
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10+
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Notes
Topic 1 दक्षता आधारित मूल्यांकन

दक्षता आधारित मूल्यांकन

दक्षता आधारित मूल्यांकन में विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त न्यूनतम अधिगम-दक्षताओं का नियमित आकलन और विश्लेषण किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक विद्यार्थी अपनी आयु और कक्षा के अनुरूप अपेक्षित ज्ञान, कौशल तथा व्यवहार प्राप्त कर सके।

किसी कक्षा के अन्त तक विद्यार्थी से जिस निश्चित ज्ञान, कौशल या व्यवहार की अपेक्षा की जाती है, उसे अधिगम-दक्षता कहते हैं। न्यूनतम अधिगम स्तर का अर्थ है वह आवश्यक योग्यता, जिसे कक्षा के प्रत्येक विद्यार्थी को प्राप्त करना चाहिए।

उदाहरण के लिए, कक्षा 1 के विद्यार्थी में गणित से सम्बन्धित निम्न दक्षताएँ अपेक्षित हो सकती हैं—

  • अंकों एवं संख्याओं की पहचान करना।
  • अंकों एवं संख्याओं को लिखना।
  • संख्याओं को निश्चित क्रम में व्यवस्थित करना।

इसी प्रकार कक्षा 5 के विद्यार्थी से तीन अंकों वाली संख्याओं का गुणा करने और दैनिक जीवन में रुपये-पैसे का हिसाब लगाने जैसी दक्षताओं की अपेक्षा की जाती है।

दक्षता आधारित मूल्यांकन से शिक्षक यह जान सकता है कि विद्यार्थी ने अपेक्षित अधिगम स्तर प्राप्त किया है या नहीं। यदि विद्यार्थी किसी दक्षता को प्राप्त नहीं कर पाता, तो शिक्षक उसकी कठिनाई के कारणों की पहचान करके आवश्यक सुधारात्मक शिक्षण प्रदान करता है।

विद्यार्थियों में दक्षताओं का क्रमिक विकास करने के लिए समय-समय पर मूल्यांकन आवश्यक है। दक्षता आधारित मूल्यांकन को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षक को सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का प्रयोग करना चाहिए, जिससे अधिगम की कमियों को समय रहते दूर किया जा सके।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • दक्षता आधारित मूल्यांकन विद्यार्थियों की न्यूनतम अधिगम-दक्षताओं का आकलन और विश्लेषण करता है।
  • कक्षा के अन्त तक अपेक्षित ज्ञान, कौशल और व्यवहार को अधिगम-दक्षता कहा जाता है।
  • इससे विद्यार्थी की अधिगम-कठिनाइयों और अपेक्षित स्तर तक न पहुँचने के कारणों का पता चलता है।
  • प्राप्त परिणामों के आधार पर सुधारात्मक शिक्षण देकर विद्यार्थी की दक्षताओं का विकास किया जाता है।
  • दक्षता आधारित मूल्यांकन की सफलता के लिए सतत एवं व्यापक मूल्यांकन आवश्यक है।
Topic 2 सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का अर्थ एवं संकल्पना

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का अर्थ एवं संकल्पना

शिक्षा और मूल्यांकन साथ-साथ चलने वाली प्रक्रियाएँ हैं। विद्यार्थी के ज्ञान के साथ उसकी रुचियों, कौशलों, आदतों, मूल्यों और व्यवहार में होने वाले विकास का नियमित आकलन करना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की संकल्पना विकसित हुई।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन को संक्षेप में CCE कहा जाता है। इसमें विद्यार्थी की शैक्षिक तथा सहशैक्षिक प्रगति का पूरे शैक्षिक सत्र में विभिन्न साधनों द्वारा आकलन किया जाता है। एनसीईआरटी ने सन् 2010 में पाठ्य-पुस्तकों को इस व्यवस्था के अनुरूप संशोधित किया।

इस व्यवस्था में शैक्षिक सत्र को दो सेमेस्टरों में बाँटा गया तथा प्रत्येक सेमेस्टर में दो संरचनात्मक आकलन और एक समेकित आकलन की व्यवस्था की गई। संरचनात्मक आकलन के लिए परियोजना-कार्य, दत्तकार्य, मौखिक गतिविधियाँ और लिखित परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है। सहशैक्षिक क्षेत्रों का आकलन पूरे वर्ष चलता रहता है।

सतत मूल्यांकन का अर्थ

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के साथ नियमित और निरन्तर रूप से किए जाने वाले मूल्यांकन को सतत मूल्यांकन कहते हैं। इसके द्वारा विद्यार्थी के ज्ञान, उपलब्धि, व्यवहार और अधिगम-अनुभवों में होने वाले परिवर्तनों का समय-समय पर पता लगाया जाता है।

सतत मूल्यांकन केवल सत्र के अन्त में होने वाली परीक्षा नहीं है। इसमें पाठ या इकाई के शिक्षण के दौरान और उसके बाद मौखिक प्रश्न, लिखित कार्य, कक्षा-कार्य, गृहकार्य, गतिविधियों तथा परीक्षणों के माध्यम से यह जाँचा जाता है कि विद्यार्थी ने पढ़ाई गई सामग्री को समझा है या नहीं।

इसका प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थी की प्रगति का निरन्तर लेखा रखना, उसकी अधिगम-कठिनाइयों की शीघ्र पहचान करना तथा समय रहते सुधारात्मक शिक्षण प्रदान करना है।

व्यापक मूल्यांकन का अर्थ

विद्यार्थी के ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक पक्षों सहित उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों का आकलन करना व्यापक मूल्यांकन कहलाता है। इसमें शैक्षिक उपलब्धियों के साथ सहशैक्षिक व्यवहार, रुचि, अभिवृत्ति, कौशल और मूल्यों को भी सम्मिलित किया जाता है।

व्यापक मूल्यांकन के लिए केवल लिखित परीक्षा पर्याप्त नहीं होती। इसमें मौखिक परीक्षा, अवलोकन, परियोजना, गतिविधि, साक्षात्कार तथा अन्य उपयुक्त उपकरणों और तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की संकल्पना

सतत और व्यापक दोनों अवधारणाओं को संयुक्त करने पर CCE की संकल्पना बनती है। इसका अर्थ है—पूरे शिक्षण-सत्र में विद्यार्थी के शैक्षिक तथा सहशैक्षिक विकास का नियमित, बहुआयामी और समग्र आकलन करना।

इसके द्वारा विद्यार्थी को अपनी शक्तियों और कमजोरियों का ज्ञान होता है। शिक्षक भी अपने शिक्षण की प्रभावशीलता को समझकर आवश्यक सुधार कर सकता है। प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को संवर्धनात्मक अवसर, सामान्य विद्यार्थियों को सहयोगात्मक अधिगम तथा कमजोर विद्यार्थियों को निदानात्मक एवं उपचारात्मक शिक्षण दिया जा सकता है।

अतः सतत एवं व्यापक मूल्यांकन विद्यार्थी की वह समग्र रूपरेखा प्रस्तुत करता है, जो पूरे अधिगम-काल में उसके शैक्षिक और सहशैक्षिक विकास के नियमित आकलन से प्राप्त होती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सतत एवं व्यापक मूल्यांकन को संक्षेप में CCE कहा जाता है।
  • सतत मूल्यांकन शिक्षण-अधिगम के साथ नियमित और निरन्तर चलता है।
  • व्यापक मूल्यांकन विद्यार्थी के ज्ञानात्मक, भावात्मक, क्रियात्मक तथा सहशैक्षिक पक्षों का आकलन करता है।
  • CCE में मौखिक, लिखित, परियोजना, गतिविधि और अवलोकन जैसे विविध साधनों का प्रयोग किया जाता है।
  • इससे विद्यार्थी की कठिनाइयों का शीघ्र निदान तथा शिक्षक की शिक्षण-योजना में सुधार सम्भव होता है।
  • CCE विद्यार्थी के पूरे सत्र की शैक्षिक और सहशैक्षिक प्रगति का समग्र विवरण प्रस्तुत करता है।
Topic 3 सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की विशेषताएँ, उद्देश्य, आवश्यकता एवं महत्त्व

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की विशेषताएँ, उद्देश्य, आवश्यकता एवं महत्त्व

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की विशेषताएँ

  1. यह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का अभिन्न अंग है और मूल्यांकन को शिक्षण के साथ निरन्तर चलाता है।
  2. इसमें विद्यार्थी के शैक्षिक एवं सहशैक्षिक पक्षों का आकलन करके उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास पर ध्यान दिया जाता है।
  3. इसके द्वारा अधिगम-कठिनाइयों की समय रहते पहचान की जाती है तथा उनके निदान और उपचारात्मक शिक्षण की व्यवस्था की जाती है।
  4. यह परम्परागत परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था के स्थान पर नियोजित, प्रभावी और विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षण को प्रोत्साहित करता है।
  5. इससे विद्यार्थी को अपनी प्रगति की प्रतिपुष्टि मिलती है और शिक्षक को अपनी शिक्षण-योजना एवं विधियों में सुधार करने का अवसर प्राप्त होता है।
  6. यह केवल बाह्य परीक्षा पर आधारित न होकर पूरे सत्र में विभिन्न विषयों, गतिविधियों और व्यवहारों का नियमित आकलन करता है, इसलिए अधिक व्यापक और विश्वसनीय होता है।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के उद्देश्य

  1. विद्यार्थियों की नियमित तथा बहुआयामी जाँच करना।
  2. शैक्षिक और सहशैक्षिक क्षेत्रों के विकास में उचित संतुलन स्थापित करना।
  3. विषय और पाठ्यक्रम पर आधारित सामूहिक कार्य एवं सहभागितापूर्ण अधिगम को प्रोत्साहित करना।
  4. विद्यार्थियों में अच्छी आदतों, अनुशासन और सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास करना।
  5. विद्यार्थी की प्रगति की जानकारी अभिभावकों तक पहुँचाना तथा शिक्षक और अभिभावक के सहयोग को बढ़ाना।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता एवं महत्त्व

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में विद्यार्थी के विषयगत ज्ञान के साथ उसकी रुचियों, क्षमताओं, आदतों, मूल्यों और सहशैक्षिक विकास का भी अध्ययन किया जाता है। इससे विद्यार्थी की वास्तविक प्रगति का समग्र चित्र प्राप्त होता है।

  1. यह पाठ्यविषयों के साथ सहशैक्षिक गतिविधियों, व्यक्तित्व-विशेषताओं, रुचियों, मनोवृत्तियों और मूल्यों के आकलन को भी सम्मिलित करता है।
  2. नियमित मूल्यांकन विद्यार्थियों को समयबद्ध, उत्तरदायी और नियमित अध्ययन करने के लिए प्रेरित करता है।
  3. इसके द्वारा गृहकार्य, कक्षाकार्य और अन्य अधिगम-गतिविधियों की प्रगति का निरन्तर आकलन किया जाता है।
  4. विद्यार्थी की समस्याओं को समय रहते पहचानने से अनुशासनहीनता और नकारात्मक व्यवहार को कम किया जा सकता है।
  5. यह विद्यार्थियों को नियमित रूप से कार्य करने तथा अपनी उपलब्धि में सुधार करने की प्रेरणा देता है।
  6. अधिगम-कठिनाइयों का शीघ्र निदान करके आवश्यक सुधारात्मक एवं उपचारात्मक शिक्षण दिया जा सकता है।
  7. इससे विद्यार्थियों की आवश्यकताओं, रुचियों, क्षमताओं और योग्यताओं की पहचान करके उनके विकास का उचित मार्ग निर्धारित किया जाता है।
  8. निरन्तर और सहयोगपूर्ण मूल्यांकन परीक्षा-भय तथा तनाव को कम करके विद्यार्थियों में आत्मविश्वास विकसित करता है।
  9. विद्यार्थी को अपनी शक्तियों और कमजोरियों की वास्तविक जानकारी मिलती है, जिससे वह अध्ययन की अच्छी आदतें विकसित कर सकता है और अपनी गलतियों को सुधार सकता है।

इस प्रणाली में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच नियमित संवाद तथा आत्मीयता विकसित होती है। फलस्वरूप सीखने की प्रक्रिया अधिक सहज होती है और विद्यार्थियों के विद्यालय छोड़ने की सम्भावना भी कम होती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • CCE शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का निरन्तर, व्यापक और अभिन्न अंग है।
  • यह विद्यार्थी के शैक्षिक, सहशैक्षिक और व्यक्तित्व सम्बन्धी सभी पक्षों का आकलन करता है।
  • इसका उद्देश्य प्रगति की नियमित जाँच, कठिनाइयों का निदान और शिक्षण में सुधार करना है।
  • यह परीक्षा-भय कम करके आत्मविश्वास, नियमितता और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करता है।
  • CCE शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक के बीच सहयोग स्थापित करता है।
Topic 4 सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की कार्यप्रणाली एवं सोपान

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की कार्यप्रणाली एवं सोपान

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की कार्यप्रणाली

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का अभिन्न और निरन्तर चलने वाला अंग है। इसके द्वारा यह जाना जाता है कि विद्यार्थी ने निर्धारित शिक्षण-उद्देश्यों को किस सीमा तक प्राप्त किया, अधिगम-अनुभव कितने प्रभावी रहे और उसके व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन हुआ या नहीं।

नार्मन ई. ग्रोनलुंड के अनुसार— मूल्यांकन विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त किए गए शिक्षण-उद्देश्यों की सीमा ज्ञात करने की एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है।

मूल्यांकन की कार्यप्रणाली में शिक्षण और परीक्षण साथ-साथ चलते हैं। इसका उद्देश्य केवल विषय-ज्ञान की जाँच करना नहीं, बल्कि शिक्षण के सभी पक्षों और विद्यार्थी के सम्पूर्ण विकास का आकलन करना है।

मूल्यांकन प्रक्रिया के प्रमुख अंग

मूल्यांकन प्रक्रिया में तीन प्रमुख अंग परस्पर सम्बन्धित रहते हैं—

  1. शिक्षण-उद्देश्य।
  2. अधिगम-क्रियाएँ अथवा सीखने के अनुभव।
  3. विद्यार्थी के व्यवहार में परिवर्तन।

पहले शिक्षण-उद्देश्य निर्धारित किए जाते हैं। उनकी प्राप्ति के लिए उपयुक्त अधिगम-अनुभव एवं गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं। इसके बाद विद्यार्थी के वास्तविक व्यवहार की तुलना अपेक्षित व्यवहार से करके मूल्यांकन किया जाता है।

सतत मूल्यांकन प्रक्रिया के सोपान

1. शिक्षण-उद्देश्यों का निर्धारण एवं परिभाषीकरण

मूल्यांकन आरम्भ करने से पहले यह निश्चित किया जाता है कि शिक्षण के बाद विद्यार्थी में कौन-सा ज्ञान, कौशल, अभिवृत्ति अथवा व्यवहार विकसित होना चाहिए। उद्देश्य स्पष्ट, व्यावहारिक और मापनीय होने चाहिए।

सामान्य उद्देश्य

सामान्य उद्देश्य ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक विकास से सम्बन्धित व्यापक तथा दीर्घकालीन लक्ष्य होते हैं। इनकी प्राप्ति में अधिक समय लगता है और इनका निर्धारण सामान्यतः शिक्षा-विशेषज्ञों तथा शिक्षा-प्रशासकों द्वारा किया जाता है।

विशिष्ट उद्देश्य

विशिष्ट उद्देश्य किसी पाठ या विषय के शिक्षण के बाद विद्यार्थी में होने वाले अपेक्षित व्यवहार-परिवर्तन को स्पष्ट करते हैं। शिक्षक इन्हें कक्षा-शिक्षण के दौरान प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त और माप सकता है।

2. उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु अधिगम-अनुभवों का आयोजन

शिक्षण-उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विद्यार्थियों को उपयुक्त अधिगम-अनुभव प्रदान किए जाते हैं। इनमें शिक्षण-विधियाँ, गतिविधियाँ, पाठ्यपुस्तकें, सहायक सामग्री, गृहकार्य और अन्य शैक्षिक साधन सम्मिलित होते हैं।

प्रभावी अधिगम-अनुभवों के लिए शिक्षक विषय-वस्तु का चयन करता है, उपयुक्त शिक्षण-क्रियाएँ आयोजित करता है तथा सीखने के बिन्दु निर्धारित करता है। इससे विद्यार्थियों की क्षमताओं का क्रमिक विकास सम्भव होता है।

3. व्यवहार-परिवर्तन के आधार पर मूल्यांकन

अधिगम-अनुभवों के बाद विद्यार्थी के ज्ञान, कौशल, अभिवृत्ति और व्यवहार में हुए परिवर्तन का आकलन किया जाता है। इसके लिए मौखिक एवं लिखित परीक्षण, अवलोकन, गतिविधि, परियोजना और अन्य मूल्यांकन-विधियों का प्रयोग किया जाता है।

मूल्यांकन से प्राप्त परिणामों के आधार पर विद्यार्थी को पृष्ठपोषण दिया जाता है। शिक्षक भी आवश्यकतानुसार अपनी शिक्षण-विधि में सुधार करके अधिगम-क्रियाओं को पुनः आयोजित करता है।

सतत मूल्यांकन की कार्यप्रणाली के दो पक्ष

1. संज्ञानात्मक पक्ष का सतत एवं व्यापक मूल्यांकन

संज्ञानात्मक पक्ष में विषय-ज्ञान, समझ, अनुप्रयोग और शैक्षिक उपलब्धि का मूल्यांकन किया जाता है। इसके लिए निम्न साधनों का प्रयोग किया जाता है—

  • प्रत्येक पाठ से सम्बन्धित अभ्यास-कार्य, कक्षाकार्य और दत्तकार्य की जाँच।
  • इकाई के शिक्षण के बाद शिक्षक द्वारा कक्षा-परीक्षण।
  • अर्द्धवार्षिक तथा वार्षिक परीक्षाएँ।

इन साधनों द्वारा शिक्षक विद्यार्थियों की विषयगत कमजोरियों और कठिनाइयों की पहचान करके सुधारात्मक शिक्षण प्रदान करता है।

2. संज्ञान-सहगामी पक्ष का सतत एवं व्यापक मूल्यांकन

संज्ञान-सहगामी पक्ष में विद्यार्थी के व्यक्तित्व, रुचियों, मूल्यों, आदतों और सहशैक्षिक गतिविधियों से सम्बन्धित विकास का आकलन किया जाता है। प्राथमिक स्तर पर निम्न क्षेत्रों को विशेष रूप से सम्मिलित किया जाता है—

  1. कार्यानुभव।
  2. कला।
  3. संगीत।
  4. शारीरिक शिक्षा, खेल, व्यायाम, योगासन, स्काउटिंग एवं गाइडिंग।
  5. नैतिक शिक्षा।
  6. स्वच्छता।
  7. सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सहभागिता और उपलब्धि।
  8. उल्लेखनीय रुचियाँ तथा प्रतिभाएँ।

इन क्षेत्रों में नकारात्मक टिप्पणी देने के स्थान पर विद्यार्थियों की प्रगति को श्रेणियों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में वांछित व्यक्तित्व-गुणों का विकास करना है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सतत एवं व्यापक मूल्यांकन शिक्षण-अधिगम के साथ निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।
  • इसके तीन प्रमुख अंग शिक्षण-उद्देश्य, अधिगम-अनुभव और व्यवहार-परिवर्तन हैं।
  • इसके प्रमुख सोपान उद्देश्य-निर्धारण, अधिगम-अनुभवों का आयोजन और व्यवहार-परिवर्तन का मूल्यांकन हैं।
  • मूल्यांकन से प्राप्त पृष्ठपोषण के आधार पर शिक्षक शिक्षण-विधि में आवश्यक सुधार करता है।
  • सतत मूल्यांकन में संज्ञानात्मक तथा संज्ञान-सहगामी दोनों पक्षों का आकलन किया जाता है।
Topic 5 सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का क्षेत्र

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का क्षेत्र

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का क्षेत्र केवल विद्यार्थियों की विषयगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। इसमें उनके शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, व्यक्तित्व सम्बन्धी तथा शैक्षिक विकास का नियमित और समग्र आकलन किया जाता है।

विद्यालयी मूल्यांकन का उद्देश्य यह जानना है कि विद्यार्थी ने निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों को किस सीमा तक प्राप्त किया है और उसके व्यवहार, आदतों, क्षमताओं तथा व्यक्तित्व में अपेक्षित विकास हुआ है या नहीं।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं—

1. शारीरिक विकास का मूल्यांकन

शारीरिक विकास के मूल्यांकन में विद्यार्थी के स्वास्थ्य, शारीरिक क्षमता, वृद्धि तथा शारीरिक दोषों का अध्ययन किया जाता है। अरस्तू के अनुसार स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का विकास सम्भव है। इसलिए मानसिक और शैक्षिक विकास के लिए विद्यार्थी का शारीरिक रूप से स्वस्थ होना आवश्यक है।

  1. प्रत्येक शैक्षिक सत्र में कम से कम एक बार योग्य चिकित्सक द्वारा विद्यार्थियों की शारीरिक जाँच कराई जानी चाहिए।
  2. किसी विद्यार्थी में शारीरिक दोष अथवा असामान्यता पाए जाने पर उसका व्यवस्थित अभिलेख रखा जाना चाहिए।
  3. निश्चित समय-अन्तराल पर विद्यार्थियों की शारीरिक क्षमता और विकास का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
  4. किसी असामान्यता की स्थिति में अभिभावकों को तत्काल सूचना देकर उचित चिकित्सा की सलाह दी जानी चाहिए।
2. मानसिक स्वास्थ्य का मूल्यांकन

मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ मन को स्वस्थ, प्रसन्न और विकारों से मुक्त रखना है। अच्छा मानसिक स्वास्थ्य विद्यार्थी के व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास करता है और उसे जीवन की विभिन्न परिस्थितियों से समायोजन करने योग्य बनाता है।

शिक्षक को विद्यार्थियों में भय, चिन्ता, निराशा, कुण्ठा और अन्य मानसिक समस्याओं के संकेतों का अवलोकन करना चाहिए। इन समस्याओं की पहचान करके सहयोग, परामर्श और अनुकूल वातावरण द्वारा उनका समाधान किया जाना चाहिए।

3. सामाजिक विकास का मूल्यांकन

विद्यालय में विद्यार्थी शिक्षकों तथा सहपाठियों के सम्पर्क में रहकर अनुशासन, सहानुभूति, सहयोग और सहभागिता जैसे सामाजिक गुणों का विकास करता है। सामाजिक विकास का मूल्यांकन विद्यार्थी के सामाजिक व्यवहार, सम्बन्धों और समायोजन के आधार पर किया जाता है।

  1. प्रार्थना-सभा, खेलकूद, भाषण, गाइडिंग, स्काउटिंग तथा अन्य दैनिक गतिविधियों में विद्यार्थी की सहभागिता और व्यवहार का अवलोकन किया जाए।
  2. सहपाठियों, मित्रों और शिक्षकों के प्रति उसके दृष्टिकोण, सहयोग, अनुशासन तथा व्यवहार का अध्ययन किया जाए।

सामाजिक कौशल के मूल्यांकन द्वारा यह जाना जाता है कि विद्यार्थी समाज के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है या उसमें असमायोजन, उपेक्षा अथवा आक्रामकता जैसी प्रवृत्तियाँ हैं।

4. व्यक्तित्व के विकास का मूल्यांकन

व्यक्तित्व व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक गुणों का गतिशील संगठन है। इसमें बुद्धि, रुचि, अभिवृत्ति, चरित्र, सृजनात्मकता, स्वभाव, शारीरिक गठन, वेशभूषा और वाणी जैसी अनेक विशेषताएँ सम्मिलित होती हैं।

विद्यालय को विद्यार्थियों में सकारात्मक गुणों का विकास करना चाहिए तथा आवश्यकतानुसार व्यक्तित्व-परीक्षण, प्रश्नावली, साक्षात्कार और अवलोकन के माध्यम से उनकी विशेषताओं और समस्याओं की पहचान करनी चाहिए।

व्यक्तित्व मूल्यांकन के प्रमुख पक्ष
  1. वैयक्तिक रुचियों का मापन अभिरुचि-परीक्षण, प्रश्नावली और साक्षात्कार द्वारा किया जाता है।
  2. अभिक्षमता के मूल्यांकन से विद्यार्थी की भावी सफलता तथा किसी विशेष कार्य को सीखने की सम्भावना का अनुमान लगाया जाता है।
  3. सृजनात्मकता के मूल्यांकन द्वारा विद्यार्थी की नवीन विचार उत्पन्न करने और समस्याओं का मौलिक समाधान करने की क्षमता का अध्ययन किया जाता है।
  4. पारिवारिक रुचियों और वातावरण का अध्ययन करके विद्यार्थी के व्यवहार पर परिवार के प्रभाव को समझा जाता है।
  5. विद्यार्थी की त्रुटियों का विश्लेषण करके उनके कारणों की पहचान तथा आवश्यक सुधार की व्यवस्था की जाती है।
5. शैक्षिक उपलब्धियों का मूल्यांकन

शैक्षिक उपलब्धि से आशय किसी विषय में विद्यार्थी द्वारा प्राप्त ज्ञान, कौशल, योग्यता और दक्षता से है। विद्यार्थी विभिन्न विषयों का अध्ययन करते हैं, इसलिए उनकी उपलब्धि की समय-समय पर जाँच करना आवश्यक है।

शैक्षिक उपलब्धियों के मूल्यांकन से यह ज्ञात होता है कि विद्यार्थी ने पाठ्यवस्तु को किस सीमा तक समझा है। इसके आधार पर उसकी अधिगम-सम्बन्धी समस्याओं की पहचान करके सुधारात्मक शिक्षण दिया जाता है और उसके सर्वांगीण विकास में सहायता की जाती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • CCE का क्षेत्र विद्यार्थी के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, व्यक्तित्व तथा शैक्षिक विकास तक विस्तृत है।
  • शारीरिक मूल्यांकन में स्वास्थ्य, शारीरिक क्षमता और शारीरिक दोषों की जाँच की जाती है।
  • मानसिक स्वास्थ्य के मूल्यांकन में भय, चिन्ता, निराशा और कुण्ठा जैसी समस्याओं की पहचान की जाती है।
  • सामाजिक विकास का मूल्यांकन अनुशासन, सहयोग, सहानुभूति, सहभागिता और सामाजिक समायोजन के आधार पर होता है।
  • व्यक्तित्व मूल्यांकन में रुचि, अभिक्षमता, सृजनात्मकता, पारिवारिक प्रभाव और विद्यार्थी की त्रुटियाँ सम्मिलित होती हैं।
  • शैक्षिक उपलब्धियों के मूल्यांकन से विषयगत दक्षता और अधिगम-कठिनाइयों की जानकारी प्राप्त होती है।
Topic 6 सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के प्रकार

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के प्रकार

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में विद्यार्थी की प्रगति का आकलन विद्यालय के भीतर तथा विद्यालय से बाहर दोनों स्तरों पर किया जाता है। पुस्तक में इसके दो प्रमुख प्रकार—आन्तरिक मूल्यांकन और बाह्य मूल्यांकन—बताए गए हैं। संरचनात्मक और समेकित मूल्यांकन भी इसके महत्त्वपूर्ण रूप हैं।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के प्रमुख प्रकार

1. आन्तरिक मूल्यांकन

विद्यार्थी को नियमित रूप से पढ़ाने वाले शिक्षकों द्वारा विद्यालय और कक्षा के भीतर किए जाने वाले मूल्यांकन को आन्तरिक मूल्यांकन कहते हैं। इसमें पूरे सत्र के दौरान विद्यार्थी की शैक्षिक प्रगति, व्यवहार, रुचि, सहभागिता और सहशैक्षिक विकास का आकलन किया जाता है।

आन्तरिक मूल्यांकन निरन्तर और सुधारात्मक प्रकृति का होता है। इससे शिक्षक को विद्यार्थी की कमियों और सफलताओं की समय-समय पर जानकारी मिलती रहती है तथा वह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में आवश्यक परिवर्तन कर सकता है।

आन्तरिक मूल्यांकन के प्रमुख साधन
  • वर्षभर किया जाने वाला नियमित अवलोकन।
  • साक्षात्कार और मौखिक प्रश्नोत्तर।
  • मनोवैज्ञानिक एवं अन्य उपयुक्त मूल्यांकन-उपकरण।
  • कक्षा-परीक्षण और औपचारिक परीक्षाएँ।
  • कक्षाकार्य, गृहकार्य, परियोजना और गतिविधियाँ।
आन्तरिक मूल्यांकन की उपयोगिता
  1. विद्यार्थी की प्रगति का नियमित अभिलेख प्राप्त होता है।
  2. अधिगम-कठिनाइयों और कमजोरियों की शीघ्र पहचान होती है।
  3. शिक्षक आवश्यक पृष्ठपोषण, परामर्श और उपचारात्मक शिक्षण दे सकता है।
  4. विद्यार्थी को अपनी शैक्षिक उपलब्धि में सुधार करने के अवसर मिलते हैं।
  5. शिक्षक अपनी शिक्षण-विधि और कार्ययोजना की प्रभावशीलता जाँच सकता है।
2. बाह्य मूल्यांकन

विद्यालय के नियमित शिक्षकों के अतिरिक्त बाहरी परीक्षकों अथवा निर्धारित परीक्षा-संस्था द्वारा किया जाने वाला मूल्यांकन बाह्य मूल्यांकन कहलाता है। यह प्रायः सत्र या पाठ्यक्रम की समाप्ति पर औपचारिक रूप से किया जाता है।

बाह्य मूल्यांकन में विद्यार्थी की सम्प्राप्ति का आकलन मौखिक, लिखित और प्रयोगात्मक परीक्षाओं द्वारा किया जा सकता है। परीक्षा का संचालन प्रश्नपत्रों और निर्धारित नियमों के अनुसार बाह्य परीक्षकों या संस्था द्वारा किया जाता है।

बाह्य मूल्यांकन के प्रमुख उद्देश्य
  1. विद्यार्थी को अगली कक्षा में पदोन्नत करना।
  2. पाठ्यक्रम पूर्ण करने पर प्रमाण-पत्र प्रदान करना।
  3. रोजगार और चयन-प्रक्रिया के लिए योग्यता निर्धारित करना।
  4. उच्च कक्षाओं अथवा उच्च स्तरीय पाठ्यक्रमों में प्रवेश देना।
  5. विद्यार्थियों की उपलब्धि का समान मानकों पर आकलन करना।

संरचनात्मक एवं समेकित मूल्यांकन

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में आन्तरिक और बाह्य मूल्यांकन के साथ संरचनात्मक तथा समेकित मूल्यांकन का भी प्रयोग किया जाता है।

संरचनात्मक मूल्यांकन

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के दौरान विद्यार्थी की प्रगति, कठिनाइयों और कमजोरियों की पहचान करने के लिए किया जाने वाला मूल्यांकन संरचनात्मक मूल्यांकन कहलाता है। इसका उद्देश्य विद्यार्थी की निष्पत्ति तथा व्यक्तित्व में सुधार लाना है।

इसके परिणामों के आधार पर शिक्षक पृष्ठपोषण, परामर्श, निर्देशन और उपचारात्मक शिक्षण प्रदान करता है।

समेकित मूल्यांकन

किसी इकाई, सत्र या पाठ्यक्रम की समाप्ति पर विद्यार्थी की समग्र उपलब्धि का निर्णय करने के लिए किया जाने वाला मूल्यांकन समेकित मूल्यांकन कहलाता है। इसके परिणामों का उपयोग श्रेणी, पदोन्नति, प्रमाण-पत्र और अन्तिम उपलब्धि निर्धारित करने में किया जाता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • CCE के दो प्रमुख प्रकार आन्तरिक और बाह्य मूल्यांकन हैं।
  • आन्तरिक मूल्यांकन नियमित शिक्षक द्वारा पूरे सत्र में किया जाता है और इसकी प्रकृति सुधारात्मक होती है।
  • बाह्य मूल्यांकन बाहरी परीक्षकों या परीक्षा-संस्था द्वारा प्रायः सत्र के अन्त में किया जाता है।
  • संरचनात्मक मूल्यांकन शिक्षण के दौरान कठिनाइयों की पहचान और सुधार के लिए होता है।
  • समेकित मूल्यांकन इकाई या सत्र के अन्त में विद्यार्थी की कुल उपलब्धि का निर्णय करता है।
Topic 7 CCE की रणनीतियाँ एवं उनका क्रियान्वयन

CCE की रणनीतियाँ एवं उनका क्रियान्वयन

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में विद्यार्थी की केवल लिखित परीक्षा नहीं ली जाती, बल्कि उसके ज्ञान, कौशल, रुचि, सहभागिता, सृजनात्मकता और व्यवहार का आकलन करने के लिए विविध रणनीतियों का प्रयोग किया जाता है। इन रणनीतियों का चयन अधिगम-उद्देश्यों, विषय-वस्तु और विद्यार्थियों की आयु के अनुसार किया जाना चाहिए।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की प्रमुख रणनीतियाँ

1. प्रोजेक्ट कार्य

प्रोजेक्ट किसी उद्देश्यपूर्ण कार्य को निर्धारित समय-सीमा में पूरा करने वाली गतिविधि है। इसके माध्यम से विद्यार्थी सामग्री एकत्र करने, आँकड़ों का विश्लेषण एवं व्याख्या करने, निष्कर्ष निकालने और अपने कार्य को प्रस्तुत करने की क्षमता विकसित करते हैं।

प्रोजेक्ट का सम्बन्ध विद्यालय के आसपास के वास्तविक जीवन और स्थानीय वातावरण से होना चाहिए। सामूहिक प्रोजेक्ट से सहयोग, अनुभवों के आदान-प्रदान, एक-दूसरे से सीखने और प्रजातान्त्रिक मूल्यों के विकास का भी मूल्यांकन किया जा सकता है।

2. छात्र-प्रोफाइल

छात्र-प्रोफाइल में विद्यार्थी द्वारा किए गए कार्यों, गतिविधियों और उपलब्धियों का क्रमबद्ध विवरण रखा जाता है। विद्यार्थी को स्वयं अपनी प्रोफाइल तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

इससे विद्यार्थी अपनी प्रगति से परिचित रहता है और आवश्यकता पड़ने पर शिक्षक, अभिभावक या पर्यवेक्षक से सहायता प्राप्त कर सकता है। शिक्षक भी प्रोफाइल के आधार पर विद्यार्थी के सुधार के लिए उपयुक्त योजना बना सकता है।

3. प्रदत्त कार्य

अपेक्षित दक्षताओं की प्राप्ति के लिए विद्यार्थियों को विभिन्न विषयों में अभ्यास-कार्य दिए जाते हैं। ये कार्य पाठ्यपुस्तक तक सीमित न होकर बाहरी वातावरण और जीवन की वास्तविक परिस्थितियों पर भी आधारित हो सकते हैं।

प्रदत्त कार्य द्वारा विद्यार्थी की सृजनात्मकता, अधिगम-उपलब्धि, विश्लेषण, विचार, चर्चा और प्रतिक्रिया व्यक्त करने की क्षमता का मूल्यांकन किया जाता है।

4. अवलोकन

विद्यार्थी जब कोई कार्य कर रहा हो, तब शिक्षक उसकी रुचि, कार्य-गति, सहभागिता और अधिगम-स्तर का ध्यानपूर्वक अवलोकन करता है। किसी एक अवसर के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए, बल्कि अलग-अलग परिस्थितियों में बार-बार अवलोकन करना चाहिए।

मौखिक तथा लिखित दोनों प्रकार के कार्यों का अवलोकन करके ही निर्णय लिया जाना चाहिए। आवश्यकता होने पर शिक्षक प्रारम्भ में सहायता देकर बाद में विद्यार्थी के स्वतन्त्र कार्य के आधार पर उसका मूल्यांकन करता है।

5. युग्म मूल्यांकन

युग्म मूल्यांकन में दो विद्यार्थी परस्पर एक-दूसरे के कार्य और प्रदर्शन का मूल्यांकन करते हैं। इससे विद्यार्थियों में सहयोग, उत्तरदायित्व, निष्पक्षता और स्वयं की त्रुटियों को समझने की क्षमता विकसित होती है।

6. भ्रमण

शैक्षिक भ्रमण के बाद विद्यार्थियों से उनके अनुभवों पर चर्चा, विवरण अथवा प्रस्तुतीकरण कराया जाता है। इनके आधार पर उनकी अवलोकन-क्षमता, समझ, अभिव्यक्ति और प्राप्त ज्ञान का मूल्यांकन किया जा सकता है।

7. चित्रों पर चर्चा

पाठ्यपुस्तक, चार्ट अथवा अन्य उपलब्ध चित्रों पर विद्यार्थियों से बातचीत की जाती है। उनके उत्तरों और विचारों से निरीक्षण, समझ, कल्पना तथा मौखिक अभिव्यक्ति की क्षमता का आकलन किया जाता है।

8. व्यक्तिगत प्रस्तुतीकरण एवं अभिव्यक्ति

किसी प्रकरण पर विद्यार्थी द्वारा किए गए व्यक्तिगत प्रस्तुतीकरण या अभिव्यक्ति के आधार पर उसके विषय-ज्ञान, आत्मविश्वास, भाषा, विचारों की स्पष्टता और प्रस्तुतीकरण-कौशल का मूल्यांकन किया जाता है।

9. लिखित एवं मौखिक परीक्षा

लिखित और मौखिक परीक्षण विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि के मूल्यांकन के महत्त्वपूर्ण आधार हैं। लिखित परीक्षा से ज्ञान को व्यवस्थित रूप में व्यक्त करने की क्षमता तथा मौखिक परीक्षा से समझ, तत्परता और अभिव्यक्ति का आकलन किया जाता है।

10. गतिविधियाँ एवं क्रियाकलाप

पाठ्यवस्तु पर आधारित और पाठ्येतर गतिविधियों में विद्यार्थी की सक्रिय सहभागिता का अवलोकन किया जाता है। इससे उसके कौशल, रुचि, सहयोग, उत्तरदायित्व और व्यवहार का मूल्यांकन किया जा सकता है।

11. संग्रह एवं संकलन

विद्यार्थियों द्वारा तैयार किए गए संग्रह, संकलन और उनसे सम्बन्धित प्रदत्त कार्यों के आधार पर उनकी जानकारी एकत्र करने, वर्गीकरण करने, सामग्री व्यवस्थित करने और उसे प्रस्तुत करने की क्षमता का मूल्यांकन किया जाता है।

रणनीतियों के क्रियान्वयन में ध्यान रखने योग्य बातें

  1. रणनीति का चयन निर्धारित अधिगम-उद्देश्य और अपेक्षित दक्षता के अनुसार किया जाए।
  2. एक ही साधन पर निर्भर न रहकर विभिन्न मूल्यांकन-विधियों का प्रयोग किया जाए।
  3. विद्यार्थी के प्रदर्शन का आकलन एक से अधिक अवसरों पर किया जाए।
  4. प्राप्त परिणामों का व्यवस्थित अभिलेख रखा जाए और विद्यार्थी को समय पर पृष्ठपोषण दिया जाए।
  5. मूल्यांकन के परिणामों के आधार पर आवश्यक सुधारात्मक तथा उपचारात्मक कार्य किया जाए।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • CCE में विद्यार्थी के बहुआयामी विकास के मूल्यांकन के लिए विभिन्न रणनीतियों का प्रयोग किया जाता है।
  • प्रोजेक्ट, छात्र-प्रोफाइल, प्रदत्त कार्य और अवलोकन विद्यार्थी की प्रगति तथा कौशल की नियमित जानकारी देते हैं।
  • युग्म मूल्यांकन सहयोग और आत्म-मूल्यांकन की क्षमता विकसित करता है।
  • भ्रमण, चित्र-चर्चा और प्रस्तुतीकरण से समझ, निरीक्षण तथा अभिव्यक्ति का आकलन होता है।
  • लिखित-मौखिक परीक्षा, गतिविधियों और संकलन का संयुक्त प्रयोग मूल्यांकन को अधिक व्यापक बनाता है।
Topic 8 सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के अपेक्षित आकलन परिणाम

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के अपेक्षित आकलन परिणाम

सतत मूल्यांकन एवं अपेक्षित आकलन परिणाम

केवल छमाही या वार्षिक परीक्षा के आधार पर विद्यार्थी की वास्तविक प्रगति का पता लगाना कठिन होता है। इन परीक्षाओं के बीच अधिक समय होने के कारण अधिगम-कठिनाइयों की पहचान और उनका समय पर समाधान नहीं हो पाता।

सतत मूल्यांकन में विद्यार्थी की प्रगति का नियमित आकलन किया जाता है। इससे शिक्षक को यह जानने में सहायता मिलती है कि विद्यार्थी ने पढ़ाई गई सामग्री को कितना समझा है और उसे किस क्षेत्र में पुनः शिक्षण या अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता है।

1. इकाई परीक्षा

पाठ्यपुस्तक के किसी अध्याय या इकाई का शिक्षण पूरा होने के बाद आयोजित परीक्षा को इकाई परीक्षा कहते हैं। इसके द्वारा यह जाना जाता है कि विद्यार्थियों ने पढ़ाई गई इकाई को ठीक प्रकार से समझा है या नहीं।

यदि विद्यार्थी अपेक्षित अधिगम-स्तर तक नहीं पहुँचते, तो शिक्षक कठिन अंशों को दोबारा समझाकर पुनः मूल्यांकन करता है। इस प्रकार इकाई परीक्षा अधिगम-कठिनाइयों के त्वरित निदान और सुधार में सहायक होती है।

2. मासिक परीक्षा

एक माह के दौरान पढ़ाई गई पाठ्यवस्तु के आकलन के लिए मासिक परीक्षा आयोजित की जाती है। इससे विद्यार्थी की नियमित प्रगति तथा एक महीने में प्राप्त अधिगम का पता चलता है।

मासिक परीक्षा में कमी मिलने पर शिक्षक सम्बन्धित विषय-वस्तु का पुनः शिक्षण कर सकता है। इससे कठिनाइयाँ आगे बढ़ने से पहले ही दूर की जा सकती हैं।

3. सत्र परीक्षा

विद्यालय में अन्य परीक्षाओं के अतिरिक्त सत्र परीक्षाओं की व्यवस्था भी की जाती है। पुस्तक के अनुसार एक सत्र परीक्षा सितम्बर और दूसरी फरवरी में आयोजित की जाती है।

इन परीक्षाओं का आयोजन जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान के नेतृत्व में कराया जाता है। सत्र परीक्षाओं में प्राप्त अंकों को वार्षिक परीक्षा के उत्तीर्ण अंकों में सम्मिलित किया जाता है।

4. सेमेस्टर मूल्यांकन

उच्च कक्षाओं और व्यावसायिक शिक्षा में सामान्यतः छह महीने की सेमेस्टर-पद्धति अपनाई जाती है। प्रत्येक सेमेस्टर के अन्त में विद्यार्थी की उस अवधि की उपलब्धि का मूल्यांकन किया जाता है।

सेमेस्टर प्रणाली में पाठ्यक्रम अपेक्षाकृत छोटे भागों में विभाजित होता है। इसलिए विद्यार्थी को समय पर अपनी कमियों का पता चल जाता है और अगला सत्र सेमेस्टर-परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा किए बिना प्रारम्भ किया जा सकता है।

व्यापक मूल्यांकन एवं आकलन परिणामों का प्रतिवेदन

विद्यार्थी का विकास केवल विषयगत ज्ञान तक सीमित नहीं होता। उसके जीवन और अधिगम को प्रभावित करने वाले प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तथा सूक्ष्म पक्षों का आकलन करना भी आवश्यक है। विद्यार्थी के इन सभी पक्षों का समग्र आकलन व्यापक मूल्यांकन कहलाता है।

व्यापक मूल्यांकन में विद्यार्थी के ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक पक्षों का आकलन किया जाता है। इसके लिए लिखित परीक्षा के अतिरिक्त मौखिक परीक्षा, अवलोकन, गतिविधि, परियोजना तथा अन्य उपयुक्त उपकरणों और तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।

इसमें शैक्षिक योग्यताओं के साथ रुचि, व्यवहार, सहभागिता, कौशल, मूल्यों और सहशैक्षिक उपलब्धियों की प्रगति भी दर्ज की जाती है। इन परिणामों का व्यवस्थित प्रतिवेदन विद्यार्थी के समग्र विकास की वास्तविक स्थिति प्रस्तुत करता है।

5. वार्षिक परीक्षा

प्रत्येक शैक्षिक वर्ष के अन्त में सम्पूर्ण पाठ्यवस्तु के आधार पर वार्षिक परीक्षा आयोजित की जाती है। इसका उद्देश्य केवल विद्यार्थी की वार्षिक प्रगति का अभिलेख रखना नहीं, बल्कि यह निर्णय लेना भी है कि वह अगली कक्षा में जाने योग्य है या नहीं।

अगली कक्षा में पदोन्नति तभी उचित होती है, जब विद्यार्थी की वार्षिक उपलब्धि सन्तोषजनक हो और वह निर्धारित मात्रात्मक मानकों को पूरा करता हो।

सतत एवं व्यापक आकलन के अपेक्षित परिणाम

  1. विद्यार्थी की प्रगति का नियमित और व्यवस्थित अभिलेख प्राप्त होता है।
  2. अधिगम-कठिनाइयों की समय रहते पहचान और उनका सुधार सम्भव होता है।
  3. शिक्षक को पुनः शिक्षण और उपचारात्मक कार्य की दिशा प्राप्त होती है।
  4. विद्यार्थी के ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक विकास की समग्र जानकारी मिलती है।
  5. पदोन्नति और अन्य शैक्षिक निर्णय अधिक विश्वसनीय आधार पर लिए जा सकते हैं।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सतत मूल्यांकन में इकाई, मासिक, सत्र और सेमेस्टर परीक्षाओं द्वारा विद्यार्थी की नियमित प्रगति जाँची जाती है।
  • इकाई और मासिक परीक्षाएँ अधिगम-कठिनाइयों के शीघ्र निदान तथा पुनः शिक्षण में सहायक होती हैं।
  • पुस्तक के अनुसार सत्र परीक्षाएँ सितम्बर और फरवरी में आयोजित की जाती हैं।
  • व्यापक मूल्यांकन में ज्ञानात्मक, भावात्मक, क्रियात्मक तथा सहशैक्षिक पक्षों का समग्र आकलन होता है।
  • वार्षिक परीक्षा सम्पूर्ण पाठ्यवस्तु पर आधारित होती है और अगली कक्षा में पदोन्नति का आधार प्रदान करती है।
Topic 9 मूल्यांकन का ज्ञानात्मक पक्ष

मूल्यांकन का ज्ञानात्मक पक्ष

ज्ञानात्मक पक्ष का अर्थ

ज्ञानात्मक अथवा संज्ञानात्मक पक्ष का सम्बन्ध विद्यार्थी की बौद्धिक योग्यताओं, ज्ञान, समझ, चिन्तन, तर्क और समस्या-समाधान की क्षमता से होता है। इसके मूल्यांकन द्वारा यह जाना जाता है कि विद्यार्थी को कितनी जानकारी होनी चाहिए और उसने वास्तव में कितना ज्ञान प्राप्त किया है।

शिक्षा-जगत में मूल्यांकन को व्यवस्थित रूप देने का श्रेय डॉ. बी. एस. ब्लूम को दिया जाता है। उन्होंने व्यवहारगत उद्देश्यों को ज्ञानात्मक, भावात्मक और कौशलात्मक पक्षों में विभाजित किया।

ब्लूम ने ज्ञानात्मक उद्देश्यों को सरल से कठिन तथा स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ने वाले छह क्रमिक स्तरों में बाँटा—

  1. ज्ञान
  2. बोध
  3. प्रयोग
  4. विश्लेषण
  5. संश्लेषण
  6. मूल्यांकन

ज्ञानात्मक पक्ष के स्तर

1. ज्ञान

ज्ञान संज्ञानात्मक पक्ष का प्रथम और सबसे निम्न स्तर है। इसमें विद्यार्थी सीखी गई विषय-वस्तु, तथ्यों, पदों, परम्पराओं, वर्गों, सूत्रों और संकेतों का स्मरण तथा पहचान करता है।

ज्ञान-स्तर में मुख्यतः निम्न प्रकार की जानकारियाँ सम्मिलित होती हैं—

  • पदों और विशिष्ट तथ्यों का ज्ञान।
  • परम्पराओं, प्रचलनों और क्रम का ज्ञान।
  • वर्गीकरण, श्रेणियों, कसौटियों और विधियों का ज्ञान।
  • सिद्धान्तों, नियमों और सामान्यीकरणों का ज्ञान।
2. बोध

बोध ज्ञान के बाद आने वाला स्तर है। इसमें विद्यार्थी केवल जानकारी को याद नहीं करता, बल्कि उसका अर्थ समझता है, उसकी व्याख्या करता है और उसे अपने शब्दों में व्यक्त कर सकता है।

बोध के अन्तर्गत ज्ञान और सूचनाओं का पुनःस्मरण, पहचान, अर्थग्रहण तथा तथ्यों की व्याख्या सम्मिलित होती है। पुस्तक में इसके तीन भाग बताए गए हैं—

  • अनुवाद करना—किसी तथ्य या विचार को एक रूप, स्तर अथवा भाषा से दूसरे रूप में व्यक्त करना।
  • व्याख्या करना—प्राप्त ज्ञान का अर्थ स्पष्ट करना तथा तथ्यों के बीच सम्बन्ध बताना।
  • उल्लेख करना—समस्या के उत्पन्न होने से उसके समाधान तक की स्थिति को स्पष्ट करना।
3. प्रयोग

प्रयोग के स्तर पर विद्यार्थी अपने ज्ञान और समझ का उपयोग वास्तविक जीवन, नई परिस्थितियों अथवा भिन्न समस्याओं के समाधान में करता है। यह स्तर ज्ञान और बोध की प्राप्ति के बाद आता है।

प्रयोग के प्रमुख रूप हैं—

  • सामान्यीकरण करना।
  • निदान करना।
  • नई परिस्थितियों में ज्ञान का प्रयोग करना।
4. विश्लेषण

विश्लेषण उच्च स्तर का संज्ञानात्मक उद्देश्य है। इसमें किसी विषय-वस्तु, विचार या समस्या को उसके विभिन्न भागों में विभाजित करके उनके स्वरूप और पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

विश्लेषण के तीन प्रमुख स्तर हैं—

  • तत्त्वों का विश्लेषण।
  • सम्बन्धों का विश्लेषण।
  • नियमों अथवा सिद्धान्तों का विश्लेषण।
5. संश्लेषण

संश्लेषण में विद्यार्थी विभिन्न तत्त्वों, विचारों और तथ्यों को नए ढंग से व्यवस्थित करके एक नवीन रचना, योजना अथवा संरचना का निर्माण करता है। इस स्तर पर उसका व्यवहार सृजनात्मक होता है और वह अमूर्त सम्बन्धों की खोज करता है।

संश्लेषण की प्रमुख अवस्थाएँ हैं—

  • नवीन सम्प्रेषण का उत्पादन।
  • नई योजना का निर्माण।
  • अमूर्त सम्बन्धों के समुच्चय का निर्माण।
6. मूल्यांकन

मूल्यांकन ज्ञानात्मक पक्ष का अन्तिम और सर्वोच्च स्तर है। इसमें विद्यार्थी किसी वस्तु, विचार, तथ्य, घटना अथवा सिद्धान्त की उपयोगिता और उपादेयता के सम्बन्ध में निर्धारित मानदण्डों के आधार पर निर्णय करता है।

इस स्तर पर गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों प्रकार के निर्णय लिए जा सकते हैं। मूल्य-निर्धारण के दो प्रमुख आधार हैं—

  • आन्तरिक साक्ष्यों के आधार पर मूल्य-निर्धारण।
  • बाह्य कसौटियों के आधार पर मूल्य-निर्धारण।

इस स्तर पर विद्यार्थी यह निर्णय लेने योग्य बनता है कि उसने जो ज्ञान प्राप्त किया है, वह किसी परिस्थिति या उद्देश्य की दृष्टि से उपयोगी है या नहीं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • ज्ञानात्मक पक्ष का सम्बन्ध ज्ञान, समझ, चिन्तन, तर्क और समस्या-समाधान से है।
  • डॉ. बी. एस. ब्लूम ने ज्ञानात्मक उद्देश्यों को छह क्रमिक स्तरों में विभाजित किया।
  • इनका क्रम ज्ञान, बोध, प्रयोग, विश्लेषण, संश्लेषण और मूल्यांकन है।
  • ज्ञान सबसे निम्न तथा मूल्यांकन ज्ञानात्मक पक्ष का सर्वोच्च स्तर है।
  • विश्लेषण में विषय को भागों में बाँटा जाता है, जबकि संश्लेषण में विभिन्न तत्त्वों को मिलाकर नई रचना की जाती है।
  • मूल्यांकन में आन्तरिक साक्ष्यों और बाह्य कसौटियों के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
Topic 10 मूल्यांकन का भावात्मक पक्ष

मूल्यांकन का भावात्मक पक्ष

भावात्मक पक्ष का अर्थ

भावात्मक पक्ष का सम्बन्ध विद्यार्थी की भावनाओं, रुचियों, अभिवृत्तियों, मूल्यों, आदर्शों और मनोवृत्तियों से होता है। शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थी में अपेक्षित भावों और मूल्यों का विकास किस सीमा तक हुआ है, इसका आकलन भावात्मक मूल्यांकन द्वारा किया जाता है।

भावात्मक विकास विद्यार्थी के वर्तमान व्यवहार के साथ उसके भावी आचरण को भी प्रभावित करता है। इसलिए मूल्यांकन में यह जानना आवश्यक है कि विद्यार्थी किसी विचार, मूल्य, निर्देश या सामाजिक परिस्थिति को किस प्रकार ग्रहण करता है और उसके प्रति कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।

ब्लूम तथा उनके सहयोगियों क्रथवाल एवं मारिया ने सन् 1964 में भावात्मक उद्देश्यों को क्रमिक स्तरों में वर्गीकृत किया। पुस्तक के अनुसार भावात्मक पक्ष के छह स्तर हैं—

  1. आग्रहण या ध्यान देना
  2. अनुक्रिया करना
  3. अनुमूल्यन
  4. धारणा या प्रत्ययीकरण
  5. संगठन या व्यवस्थापन
  6. मूल्यों का चारित्रीकरण

भावात्मक पक्ष के स्तर

1. आग्रहण या ध्यान देना

यह भावात्मक पक्ष का प्रथम स्तर है। इसमें यह देखा जाता है कि विद्यार्थी माता-पिता, शिक्षक अथवा अन्य व्यक्तियों द्वारा दी गई शिक्षा, सूचना या निर्देश को कितनी रुचि और गम्भीरता से ग्रहण करता है।

किसी मूल्य को ग्रहण करने के लिए पहले उसके प्रति चेतना उत्पन्न होना, उसे स्वीकार करने की इच्छा होना और उस पर ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है।

आग्रहण के तीन स्तर हैं—

  • चेतना
  • ग्रहण करने की इच्छा-शक्ति
  • नियन्त्रित ध्यान
2. अनुक्रिया करना

अनुक्रिया भावात्मक पक्ष का दूसरा स्तर है। इसमें विद्यार्थी किसी गतिविधि या मूल्य को केवल ग्रहण ही नहीं करता, बल्कि उसके प्रति सक्रिय प्रतिक्रिया और सहभागिता भी व्यक्त करता है।

इस स्तर पर विद्यार्थी स्वेच्छा से शैक्षिक गतिविधियों में भाग लेता है और प्रतिक्रिया व्यक्त करने से सन्तोष अनुभव करता है।

अनुक्रिया के तीन स्तर हैं—

  • अनुक्रिया-सहमति
  • अनुक्रिया करने की इच्छा
  • अनुक्रिया करने में सन्तुष्टि
3. अनुमूल्यन

जब विद्यार्थी किसी वस्तु, विचार या व्यवहार को महत्त्वपूर्ण मानकर उसके प्रति आकर्षण और प्रतिबद्धता व्यक्त करता है, तो इसे अनुमूल्यन कहते हैं। इस स्तर पर वह किसी मूल्य को स्वीकार करके उसके पालन में निरन्तर रुचि दिखाता है।

अनुमूल्यन के तीन स्तर हैं—

  • किसी मूल्य की स्वीकृति
  • किसी मूल्य के प्रति अधिक लगाव
  • मूल्य के प्रति प्रतिबद्धता
4. धारणा या प्रत्ययीकरण

इस स्तर पर विद्यार्थी विभिन्न मूल्यों के बीच समानता, भिन्नता और सम्बन्ध को समझकर उनके विषय में स्पष्ट धारणा बनाता है। वह अलग-अलग मूल्यों का विश्लेषण करके उन्हें अपने विचारों से जोड़ता है।

धारणा-निर्माण के द्वारा विद्यार्थी यह समझने लगता है कि विभिन्न परिस्थितियों में कौन-सा मूल्य अधिक उपयोगी और उचित है।

5. संगठन या व्यवस्थापन

संगठन के स्तर पर विद्यार्थी विभिन्न व्यक्तिगत और सामाजिक मूल्यों को एक व्यवस्थित मूल्य-प्रणाली में संगठित करता है। जब अलग-अलग मूल्यों में विरोध उत्पन्न होता है, तो वह उनकी प्राथमिकता निश्चित करके उचित समायोजन करता है।

इसके दो प्रमुख स्तर हैं—

  • समान मूल्यों को एक प्रणाली में संगठित करना।
  • मूल्यों के पारस्परिक सम्बन्धों का निर्धारण करना।
6. मूल्यों का चारित्रीकरण

चारित्रीकरण भावात्मक पक्ष का सर्वोच्च स्तर है। इसमें विद्यार्थी द्वारा स्वीकार किए गए मूल्य उसके व्यवहार और व्यक्तित्व का स्थायी अंग बन जाते हैं। वह विभिन्न परिस्थितियों में उन्हीं मूल्यों के अनुरूप आचरण करता है।

विद्यार्थी की व्यक्तिगत और सामाजिक मूल्य-व्यवस्था उसके चरित्र की पहचान बन जाती है। इस स्तर पर मूल्य केवल विचार नहीं रहते, बल्कि नियमित व्यवहार के रूप में प्रकट होते हैं।

चारित्रीकरण के दो स्तर हैं—

  • मूल्यों का सामान्यीकरण करना।
  • मूल्यों के आधार पर चरित्र का निर्माण करना।

भावात्मक पक्ष के मूल्यांकन का महत्त्व

  1. विद्यार्थी की रुचियों, अभिवृत्तियों और मूल्यों की जानकारी प्राप्त होती है।
  2. यह ज्ञात होता है कि विद्यार्थी सामाजिक और नैतिक मूल्यों को किस सीमा तक स्वीकार करता है।
  3. विद्यार्थी के व्यवहार, सहभागिता और प्रतिबद्धता का आकलन किया जा सकता है।
  4. शिक्षक को उचित गतिविधियों और परिस्थितियों द्वारा भावात्मक विकास करने की दिशा मिलती है।
  5. विद्यार्थी में स्थायी मूल्य-व्यवस्था और सशक्त चरित्र के निर्माण में सहायता मिलती है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • भावात्मक पक्ष का सम्बन्ध भावना, रुचि, अभिवृत्ति, मूल्य और आदर्शों से होता है।
  • पुस्तक के अनुसार ब्लूम, क्रथवाल और मारिया ने सन् 1964 में भावात्मक उद्देश्यों का वर्गीकरण किया।
  • भावात्मक पक्ष के स्तर आग्रहण, अनुक्रिया, अनुमूल्यन, धारणा, संगठन और चारित्रीकरण हैं।
  • आग्रहण इसका प्रथम तथा चारित्रीकरण सर्वोच्च स्तर है।
  • संगठन में विभिन्न मूल्यों को एक मूल्य-प्रणाली में व्यवस्थित किया जाता है।
  • चारित्रीकरण में मूल्य विद्यार्थी के स्थायी व्यवहार और व्यक्तित्व का अंग बन जाते हैं।
Topic 11 मूल्यांकन का क्रियात्मक अथवा मनोचालक पक्ष

मूल्यांकन का क्रियात्मक अथवा मनोचालक पक्ष

क्रियात्मक अथवा मनोचालक पक्ष का अर्थ

क्रियात्मक अथवा मनोचालक पक्ष का सम्बन्ध विद्यार्थी की शारीरिक क्रियाओं, गामक योग्यताओं और व्यावहारिक कौशलों के विकास से होता है। इसमें यह देखा जाता है कि विद्यार्थी किसी कार्य को कितनी दक्षता, शुद्धता, गति और समन्वय के साथ कर सकता है।

इस पक्ष का सम्बन्ध मुख्यतः मांसपेशियों, शारीरिक अंगों और मानसिक नियन्त्रण के समन्वित प्रयोग से है। लेखन, चित्र बनाना, प्रयोग करना, उपकरण चलाना, खेलना और हस्तकौशल से सम्बन्धित कार्य इसके उदाहरण हैं।

पुस्तक के अनुसार सिम्पसन ने सन् 1969 में क्रियात्मक उद्देश्यों का वर्गीकरण प्रस्तुत किया। इसके प्रमुख स्तर हैं—

  1. उद्दीपन अथवा उत्तेजना
  2. कार्य करना अथवा क्रियान्वयन
  3. नियन्त्रण
  4. समायोजन
  5. स्वाभावीकरण
  6. आदत-निर्माण

क्रियात्मक पक्ष के स्तर

1. उद्दीपन अथवा उत्तेजना

यह क्रियात्मक पक्ष का प्रथम चरण है। इसमें विद्यार्थी के भीतर किसी कार्य को करने की आवश्यकता, प्रेरणा अथवा उत्तेजना उत्पन्न की जाती है। विद्यार्थी किसी कार्य को देखकर या निर्देश प्राप्त करके उसे करने के लिए तैयार होता है।

इसके दो प्रमुख स्तर हैं—

  • अनुकरण—विद्यार्थी किसी व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य को देखकर उसी प्रकार करने का प्रयास करता है।
  • बाह्य पुनरावृत्ति—विद्यार्थी बाहरी निर्देश अथवा उदाहरण के आधार पर किसी क्रिया को बार-बार दोहराता है।
2. कार्य करना अथवा क्रियान्वयन

इस स्तर पर विद्यार्थी प्राप्त उद्दीपन या निर्देश के आधार पर किसी कार्य का वास्तविक सम्पादन करता है। वह कौशल में निहित विभिन्न क्रियाओं को उचित क्रम में पूरा करना सीखता है।

इसके तीन स्तर हैं—

  • निर्देशों का पालन करना।
  • उपयुक्त क्रिया या विधि का चयन करना।
  • चुनी गई क्रिया को स्थिर एवं नियमित रूप से करना।
3. नियन्त्रण

प्रत्येक कौशल के लिए शरीर की ऊर्जा और क्रियाओं का नियन्त्रित प्रयोग आवश्यक होता है। इस स्तर पर विद्यार्थी कार्य करते समय अपनी गतिविधियों, गति और शारीरिक अंगों पर नियन्त्रण रखना सीखता है।

इसके दो प्रमुख स्तर हैं—

  • शुद्धता—कार्य को कम त्रुटियों और अधिक परिशुद्धता के साथ करना।
  • पुनर्निर्माण—सीखी हुई क्रिया को उचित रूप से दोबारा प्रस्तुत करना।
4. समायोजन

समायोजन का अर्थ विभिन्न क्रियाओं और शारीरिक गतिविधियों के बीच उचित समन्वय स्थापित करना है। विद्यार्थी अपनी क्रियाओं पर नियन्त्रण रखते हुए कार्य के अलग-अलग भागों को एक-दूसरे से जोड़ता है।

इसके दो प्रमुख रूप हैं—

  • क्रमबद्धता—विभिन्न क्रियाओं को उचित क्रम में करना।
  • संगति—क्रियाओं के बीच सामंजस्य और एकरूपता स्थापित करना।
5. स्वाभावीकरण

स्वाभावीकरण क्रियात्मक पक्ष का उच्च स्तर है। इसमें विद्यार्थी किसी कार्य को इतना अधिक अभ्यास कर लेता है कि वह उसे सहज, स्वाभाविक और बिना विशेष प्रयास के करने लगता है।

इस स्तर पर कार्य करने की एक निश्चित शैली विकसित हो जाती है और क्रिया धीरे-धीरे उसकी आदत का रूप ग्रहण कर लेती है।

6. आदत-निर्माण

निरन्तर अभ्यास और स्वाभावीकरण के परिणामस्वरूप कोई कौशल विद्यार्थी के स्थायी व्यवहार का अंग बन जाता है। वह उस कार्य को नियमित, सहज और अपेक्षित दक्षता के साथ कर पाता है। इसे आदत-निर्माण की अवस्था कहा जाता है।

क्रियात्मक पक्ष के मूल्यांकन के साधन

  • विद्यार्थी को कार्य करते हुए प्रत्यक्ष देखना।
  • प्रयोगात्मक एवं व्यावहारिक परीक्षा लेना।
  • प्रदर्शन, परियोजना और गतिविधियों का अवलोकन करना।
  • कार्य की गति, शुद्धता, क्रम और समन्वय का आकलन करना।
  • तैयार उत्पाद अथवा सम्पन्न कार्य की गुणवत्ता जाँचना।

विभिन्न मूल्यांकन-पक्षों के ज्ञान से शिक्षक को लाभ

  1. शिक्षक प्रश्नपत्र में ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक सभी पक्षों को सम्मिलित कर सकता है।
  2. विद्यार्थी के व्यक्तित्व और विकास का अधिक गहराई से मूल्यांकन किया जा सकता है।
  3. जिन पक्षों में विद्यार्थी कमजोर है, उनकी पहचान करके आवश्यक सुधार किया जा सकता है।
  4. शिक्षण के समय विभिन्न उद्देश्यों और पक्षों के बीच उचित समन्वय स्थापित किया जा सकता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • क्रियात्मक पक्ष का सम्बन्ध शारीरिक क्रियाओं, गामक योग्यताओं और व्यावहारिक कौशलों से है।
  • पुस्तक के अनुसार सिम्पसन ने सन् 1969 में क्रियात्मक उद्देश्यों का वर्गीकरण प्रस्तुत किया।
  • इसके प्रमुख स्तर उद्दीपन, क्रियान्वयन, नियन्त्रण, समायोजन, स्वाभावीकरण और आदत-निर्माण हैं।
  • नियन्त्रण में शुद्धता तथा पुनर्निर्माण और समायोजन में क्रमबद्धता तथा संगति सम्मिलित हैं।
  • स्वाभावीकरण में विद्यार्थी अभ्यास के कारण कार्य को सहज और स्वाभाविक रूप से करने लगता है।
  • क्रियात्मक मूल्यांकन में कार्य की गति, शुद्धता, क्रम, समन्वय और दक्षता का आकलन किया जाता है।
Topic 12 सामाजिक, यांत्रिक, गणितीय एवं भाषायी कौशल का मूल्यांकन

सामाजिक, यांत्रिक, गणितीय एवं भाषायी कौशल का मूल्यांकन

विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास के लिए केवल विषयगत ज्ञान का मूल्यांकन पर्याप्त नहीं है। उसके सामाजिक व्यवहार, यांत्रिक दक्षता, गणितीय योग्यता और भाषायी कौशल का आकलन भी आवश्यक है। इन कौशलों का मूल्यांकन विद्यार्थी की वास्तविक क्षमताओं, रुचियों और व्यवहार को समझने में सहायता करता है।

सामाजिक कौशल का मूल्यांकन

सामाजिक कौशल से आशय समाज के प्रति विद्यार्थी के दृष्टिकोण, व्यवहार और समायोजन से है। इसके अन्तर्गत वातावरण सम्बन्धी ज्ञान, सामाजिक एवं नागरिक जीवन की समझ, आर्थिक गतिविधियों का ज्ञान, मानव और पर्यावरण के बीच सम्बन्ध तथा देश, संस्कृति एवं सभ्यता के प्रति कर्तव्य-बोध सम्मिलित हैं।

विद्यार्थी कभी-कभी डर, दबाव या अन्य सामाजिक कारणों से समाज में अपेक्षित व्यवहार नहीं कर पाता। उसका दृष्टिकोण नकारात्मक, आक्रामक या उपेक्षापूर्ण हो सकता है। सामाजिक कौशल के मूल्यांकन द्वारा ऐसे कुसमायोजन या असमायोजन की पहचान की जाती है।

सामाजिक कौशल के मूल्यांकन के उपकरण
  1. समाजमितीय मैट्रिक्स—समूह के सदस्यों के बीच सामाजिक सम्बन्धों और पारस्परिक पसन्द का सारणीबद्ध विवरण प्रस्तुत करता है।
  2. सोशियोग्राम—समूह में विद्यार्थियों के आपसी सम्बन्धों, स्वीकृति और अस्वीकृति को चित्रात्मक रूप में प्रदर्शित करता है।
  3. समाजमितीय गुणांक—समूह में किसी विद्यार्थी की सामाजिक स्थिति और स्वीकार्यता को संख्यात्मक रूप में व्यक्त करता है।

यांत्रिक कौशल का मूल्यांकन

यांत्रिक कौशल के मूल्यांकन द्वारा विद्यार्थी के यन्त्रों सम्बन्धी ज्ञान, रुचि और उन्हें प्रयोग करने की क्षमता का पता लगाया जाता है। यह कौशल विद्यार्थी की सृजनात्मक तथा रचनात्मक प्रवृत्ति से भी सम्बन्धित होता है।

इसके अन्तर्गत किसी कार्य को उचित ढंग से करना, वस्तुओं का निर्माण करना, शारीरिक कार्य करना तथा विभिन्न यन्त्रों और मशीनों का प्रयोग एवं रखरखाव करना सम्मिलित है। आधुनिक समय में कम्प्यूटर और इंटरनेट के प्रयोग तथा मशीनों के संचालन सम्बन्धी दक्षताओं का मूल्यांकन भी इसी क्षेत्र में किया जाता है।

यांत्रिक कौशल के मूल्यांकन का उपकरण

विद्यार्थी को यन्त्र या मशीन चलाने का अवसर देकर उसके कार्य का प्रत्यक्ष अवलोकन किया जाता है। प्राप्त परिणाम की शुद्धता, कार्य-विधि, गति और सावधानी के आधार पर उसकी यांत्रिक दक्षता की श्रेणी निर्धारित की जाती है।

गणितीय कौशल का मूल्यांकन

गणितीय कौशल में शीघ्रता और शुद्धता से गणना करने, तार्किक रूप से विचार करने, क्रम तथा आकृतियों को पहचानने, उनमें अन्तर करने और दैनिक जीवन की समस्याओं में गणितीय प्रत्ययों का प्रयोग करने की योग्यता सम्मिलित होती है।

प्राथमिक स्तर पर अपेक्षित गणितीय कौशल
  1. गणित के महत्त्व और उपयोगिता से परिचित होना।
  2. दैनिक एवं व्यावहारिक जीवन की गणितीय समस्याओं को हल करना।
  3. शीघ्रता और शुद्धता से गणना करना।
  4. गणितीय संक्रियाओं का ज्ञान तथा उनका प्रयोग करना।
  5. बिन्दु और रेखा जैसी मूल ज्यामितीय अवधारणाओं का ज्ञान होना।
  6. शून्य की अवधारणा को समझना।
गणितीय कौशल के मूल्यांकन के उपकरण
  1. सम्बन्धित प्रश्नावली के माध्यम से विद्यार्थी के गणितीय ज्ञान और कौशल का मूल्यांकन करना।
  2. लेन-देन तथा क्रय-विक्रय से सम्बन्धित व्यावहारिक परिस्थितियाँ देकर गणितीय व्यवहार-कौशल की जाँच करना।
  3. आयत, वर्ग, चतुर्भुज और कोण के आकार वाली वस्तुओं का प्रयोग करके ज्यामितीय कौशल का मूल्यांकन करना।

भाषायी कौशल का मूल्यांकन

भाषायी कौशल से आशय विद्यार्थी में भाषा सम्बन्धी क्षमताओं का विकास करने से है। भाषा बालक के विचार, अनुभव और भावनाओं की अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम है। इसलिए सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना जैसे कौशलों का विकास अत्यन्त आवश्यक है।

भाषायी कौशल का मूल्यांकन केवल पाठ्यपुस्तक के अभ्यासों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। विद्यालय की विभिन्न गतिविधियों और सामाजिक परिस्थितियों में विद्यार्थी द्वारा भाषा के वास्तविक प्रयोग का भी आकलन किया जाना चाहिए।

भाषायी कौशल के मूल्यांकन के प्रमुख आधार
  • निर्देशों, कथनों और वार्तालाप को ध्यानपूर्वक सुनने की क्षमता।
  • विचारों और अनुभवों को स्पष्ट तथा शुद्ध रूप से बोलने की क्षमता।
  • लिखित सामग्री को पढ़कर उसका अर्थ समझने की क्षमता।
  • विचारों को क्रमबद्ध, शुद्ध और अर्थपूर्ण भाषा में लिखने की क्षमता।
  • विद्यालयी और सामाजिक परिस्थितियों में भाषा का उचित प्रयोग करने की क्षमता।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सामाजिक कौशल का सम्बन्ध विद्यार्थी के सामाजिक दृष्टिकोण, व्यवहार और समायोजन से है।
  • सामाजिक कौशल के प्रमुख उपकरण समाजमितीय मैट्रिक्स, सोशियोग्राम और समाजमितीय गुणांक हैं।
  • यांत्रिक कौशल में यन्त्रों का ज्ञान, संचालन, निर्माण-क्षमता और कार्य की शुद्धता सम्मिलित है।
  • गणितीय कौशल में गणना, तार्किक चिन्तन, संक्रियाओं, आकृतियों और व्यावहारिक समस्याओं का ज्ञान शामिल है।
  • भाषायी कौशल के चार प्रमुख अंग सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना हैं।
  • इन सभी कौशलों का मूल्यांकन वास्तविक गतिविधियों और व्यावहारिक परिस्थितियों में किया जाना चाहिए।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन योजना में एनसीईआरटी ने एक शैक्षिक सत्र को कितने सेमेस्टरों में विभाजित किया है?

व्याख्या: एनसीईआरटी की सतत एवं व्यापक मूल्यांकन योजना में एक शैक्षिक सत्र को दो सेमेस्टरों में विभाजित किया गया है।
Q 2

मूल्यांकन सम्बन्धित होता है—

व्याख्या: मूल्यांकन में विद्यार्थी के संज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक तीनों पक्षों का आकलन किया जाता है।
Q 3

शिक्षा एवं मूल्यांकन दोनों कैसी चलने वाली प्रक्रियाएँ हैं?

व्याख्या: शिक्षण-अधिगम और मूल्यांकन एक-दूसरे से जुड़े हैं तथा दोनों साथ-साथ चलते हैं।
Q 4

भावात्मक पक्ष के स्तर से सम्बन्धित हैं—

व्याख्या: ग्रहण करना, अनुक्रिया करना और मूल्य से सम्बन्धित स्तर भावात्मक पक्ष में सम्मिलित होते हैं।
Q 5

डॉ. बी. एस. ब्लूम ने संज्ञानात्मक पक्ष के उद्देश्यों को कितने वर्गों में वर्गीकृत किया है?

व्याख्या: ब्लूम ने संज्ञानात्मक उद्देश्यों को ज्ञान, बोध, प्रयोग, विश्लेषण, संश्लेषण और मूल्यांकन—इन छह वर्गों में बाँटा है।
Q 6

विश्लेषण का सम्बन्ध किस पक्ष से है?

व्याख्या: विश्लेषण ब्लूम के ज्ञानात्मक अथवा संज्ञानात्मक पक्ष का एक स्तर है।
Q 7

ज्ञानात्मक पक्ष का उच्चतम स्तर कौन-सा है?

व्याख्या: ब्लूम के वर्गीकरण में ज्ञान सबसे निम्न और मूल्यांकन ज्ञानात्मक पक्ष का उच्चतम स्तर है।
Q 8

डॉ. ब्लूम तथा उनके सहयोगियों ने भावात्मक पक्ष के शैक्षिक उद्देश्यों को कितने वर्गों में बाँटा है?

व्याख्या: पुस्तक के अनुसार भावात्मक पक्ष के शैक्षिक उद्देश्यों को छह वर्गों में बाँटा गया है।
Q 9

अनुक्रिया के कितने स्तर हैं?

व्याख्या: अनुक्रिया के तीन स्तर माने गए हैं—अनुक्रिया सहमति, अनुक्रिया करने की इच्छा और अनुक्रिया में सन्तुष्टि।
Q 10

उद्दीपन या उत्तेजना किसका प्रथम चरण है?

व्याख्या: उद्दीपन अथवा उत्तेजना क्रियात्मक या कौशलात्मक पक्ष का प्रथम चरण है।
Q 11

मूल्यांकन प्रक्रिया में कौन-कौन से अंग होते हैं?

व्याख्या: मूल्यांकन प्रक्रिया में शिक्षण-उद्देश्य, अधिगम-अनुभव तथा व्यवहार-परिवर्तन तीनों सम्मिलित होते हैं।
Q 12

CCE का पूर्ण रूप क्या है?

व्याख्या: CCE का पूर्ण रूप Continuous and Comprehensive Evaluation अर्थात सतत एवं व्यापक मूल्यांकन है।
Q 13

विद्यालय में नियमित रूप से पढ़ाने वाले शिक्षक द्वारा किए गए मूल्यांकन को क्या कहते हैं?

व्याख्या: नियमित शिक्षक द्वारा पूरे सत्र में किया गया मूल्यांकन आन्तरिक मूल्यांकन कहलाता है।
Q 14

किसी अध्याय या इकाई का शिक्षण पूरा होने के बाद सामान्यतः कौन-सी परीक्षा आयोजित की जाती है?

व्याख्या: इकाई परीक्षा अध्याय या इकाई विशेष के शिक्षण के बाद विद्यार्थियों की समझ की जाँच के लिए होती है।
Q 15

निम्नलिखित में से सामाजिक कौशल के मूल्यांकन का एक उपकरण कौन-सा है?

व्याख्या: सोशियोग्राम सामाजिक सम्बन्धों तथा समूह में स्वीकृति-अस्वीकृति का अध्ययन करने का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है।

पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 3 के विषय शैक्षिक मूल्यांकन, क्रियात्मक शोध एवं नवाचार के अध्याय सतत एवं व्यापक मूल्यांकन से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की चार विशेषताएँ लिखिए।

Q 2

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए।

Q 3

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।

Q 4

मूल्यांकन के ज्ञानात्मक पक्ष का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

Q 5

मूल्यांकन के भावात्मक पक्ष को स्पष्ट कीजिए।

Q 6

मूल्यांकन के कौशलात्मक पक्ष को स्पष्ट कीजिए।

Q 7

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के लिए आप किस प्रकार रणनीतियाँ निर्धारित करेंगे?

Q 8

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के प्रकार बताइए।

Q 9

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का क्षेत्र बताइए।

Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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