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Home Study Material Semester 3 शैक्षिक मूल्यांकन, क्रियात्मक शोध एवं नवाचार मूल्यांकन के विविध प्रकार
Chapter 3 • शैक्षिक मूल्यांकन, क्रियात्मक शोध एवं नवाचार

मूल्यांकन के विविध प्रकार

UP DELED Semester 3 के विषय शैक्षिक मूल्यांकन, क्रियात्मक शोध एवं नवाचार के इस अध्याय में मूल्यांकन के परिमाणात्मक एवं गुणात्मक प्रकार, मौखिक, लिखित और प्रयोगात्मक परीक्षाएँ, निबन्धात्मक, लघु उत्तरीय एवं वस्तुनिष्ठ प्रश्न, साक्षात्कार, निरीक्षण, प्रश्नावली, निर्धारण मापनी, जाँच सूची तथा संरचनात्मक एवं योगात्मक मूल्यांकन का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

13
Topics
15
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10+
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Notes
Topic 1 मूल्यांकन के प्रकार एवं परिमाणात्मक मूल्यांकन

मूल्यांकन के प्रकार एवं परिमाणात्मक मूल्यांकन

मूल्यांकन के प्रकार

मूल्यांकन के अन्तर्गत विद्यार्थी के व्यवहार, उपलब्धि और विकास से सम्बन्धित सूचनाओं का मात्रात्मक तथा गुणात्मक दोनों रूपों में अध्ययन किया जाता है। विद्यार्थी के व्यवहार के अलग-अलग पक्षों का मूल्यांकन करने के लिए उपयुक्त परीक्षणों, मापनियों और अन्य प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है।

विद्यार्थी के ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक व्यवहार एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। इसलिए इन सभी पक्षों का मूल्यांकन किसी एक साधन से नहीं किया जा सकता। प्रत्येक पक्ष के लिए उसकी प्रकृति के अनुसार अलग मूल्यांकन-उपकरणों का प्रयोग आवश्यक होता है।

1. ज्ञानात्मक व्यवहार का मूल्यांकन

ज्ञानात्मक व्यवहार का सम्बन्ध विद्यार्थी के ज्ञान, समझ, चिन्तन, तर्क, निर्णय और समस्या-समाधान की क्षमता से होता है। इसके मूल्यांकन के लिए मुख्यतः निम्न साधनों का प्रयोग किया जाता है—

  • मौखिक परीक्षा।
  • लिखित परीक्षा।
  • निरीक्षण।
  • साक्षात्कार।
2. भावात्मक व्यवहार का मूल्यांकन

भावात्मक व्यवहार का सम्बन्ध विद्यार्थी की रुचियों, अभिवृत्तियों, मूल्यों, भावनाओं और सामाजिक सम्बन्धों से होता है। इसके मूल्यांकन के लिए निम्न साधन उपयोगी होते हैं—

  • रुचि-परीक्षण।
  • अभिवृत्ति मापनी।
  • मूल्य-परीक्षण।
  • समाजमिति।
  • निरीक्षण।
3. क्रियात्मक व्यवहार का मूल्यांकन

क्रियात्मक व्यवहार का सम्बन्ध विद्यार्थी के व्यावहारिक कार्यों, शारीरिक क्रियाओं और कौशलों से होता है। इसके मूल्यांकन के लिए निरीक्षण तथा प्रयोगात्मक परीक्षा का प्रयोग किया जाता है।

इस प्रकार उपयुक्त मूल्यांकन-उपकरणों की सहायता से विद्यार्थी के ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक तीनों पक्षों का समग्र अध्ययन किया जा सकता है।

मूल्यांकन का प्रमुख वर्गीकरण

मूल्यांकन द्वारा प्राप्त सूचनाओं को व्यक्त करने के आधार पर इसके दो प्रमुख प्रकार हैं—

1. परिमाणात्मक मूल्यांकन

जिस मूल्यांकन में विद्यार्थी की उपलब्धि, योग्यता या व्यवहार को अंक, प्राप्तांक, प्रतिशत, श्रेणी अथवा अन्य संख्यात्मक रूप में व्यक्त किया जाता है, उसे परिमाणात्मक मूल्यांकन कहते हैं।

उदाहरण के लिए, किसी विद्यार्थी द्वारा परीक्षा में 50 में से 38 अंक प्राप्त करना, किसी कार्य को पूरा करने में 10 मिनट लगना अथवा प्रयोगात्मक कार्य में 80 प्रतिशत दक्षता प्राप्त करना परिमाणात्मक परिणाम हैं।

पुस्तक के अनुसार परिमाणात्मक मूल्यांकन अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय, उपयोगी और वैध माना जाता है। इसमें विद्यार्थी के प्रदर्शन को निश्चित अंकों या मानकों में व्यक्त किया जाता है, जिससे उसकी उपलब्धि की तुलना और व्याख्या करना सरल हो जाता है।

परिमाणात्मक मूल्यांकन के प्रकार
  1. मौखिक परीक्षा—विद्यार्थी से मौखिक रूप में प्रश्न पूछकर उसके ज्ञान, अभिव्यक्ति और आत्मविश्वास का मूल्यांकन किया जाता है।
  2. लिखित परीक्षा—विद्यार्थी द्वारा लिखे गए उत्तरों के आधार पर उसकी विषयगत उपलब्धि, समझ और अभिव्यक्ति का मूल्यांकन किया जाता है।
  3. प्रयोगात्मक अथवा प्रायोगिक परीक्षा—विद्यार्थी को वास्तविक कार्य या प्रयोग कराकर उसके व्यावहारिक ज्ञान और कौशल का मूल्यांकन किया जाता है।
2. गुणात्मक मूल्यांकन

जिस मूल्यांकन में विद्यार्थी के व्यवहार, रुचि, अभिवृत्ति, व्यक्तित्व, आदतों और अन्य विशेषताओं का वर्णन गुणों के आधार पर किया जाता है, उसे गुणात्मक मूल्यांकन कहते हैं। इसके परिणाम केवल अंकों में व्यक्त न होकर वर्णन, श्रेणी या व्यवहारगत विशेषताओं के रूप में भी प्रस्तुत किए जाते हैं।

गुणात्मक मूल्यांकन के लिए साक्षात्कार, निरीक्षण, प्रश्नावली, निर्धारण मापनी और जाँच सूची जैसी प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है।

परिमाणात्मक एवं गुणात्मक मूल्यांकन का सम्बन्ध

विद्यार्थी के सम्पूर्ण विकास का मूल्यांकन करने के लिए परिमाणात्मक और गुणात्मक दोनों प्रकार के मूल्यांकन आवश्यक हैं। परिमाणात्मक मूल्यांकन उपलब्धि की मात्रा बताता है, जबकि गुणात्मक मूल्यांकन विद्यार्थी के व्यवहार और विशेषताओं के स्वरूप को स्पष्ट करता है।

उदाहरण के लिए, किसी विद्यार्थी के 80 प्रतिशत अंक उसकी उपलब्धि का परिमाणात्मक विवरण हैं, जबकि उसे परिश्रमी, सहयोगी और अनुशासित बताना उसका गुणात्मक विवरण है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मूल्यांकन में विद्यार्थी के व्यवहार की मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों प्रकार से व्याख्या की जाती है।
  • ज्ञानात्मक व्यवहार के मूल्यांकन में मौखिक परीक्षा, लिखित परीक्षा, निरीक्षण और साक्षात्कार का प्रयोग किया जाता है।
  • भावात्मक व्यवहार के मूल्यांकन में रुचि-परीक्षण, अभिवृत्ति मापनी, मूल्य-परीक्षण, समाजमिति और निरीक्षण उपयोगी हैं।
  • क्रियात्मक व्यवहार का मूल्यांकन निरीक्षण और प्रयोगात्मक परीक्षा द्वारा किया जाता है।
  • मूल्यांकन के दो प्रमुख प्रकार परिमाणात्मक और गुणात्मक मूल्यांकन हैं।
  • परिमाणात्मक मूल्यांकन में उपलब्धि को अंक, प्रतिशत या श्रेणी के रूप में व्यक्त किया जाता है।
  • परिमाणात्मक मूल्यांकन के प्रमुख प्रकार मौखिक, लिखित और प्रयोगात्मक परीक्षा हैं।
  • विद्यार्थी के समग्र मूल्यांकन के लिए परिमाणात्मक और गुणात्मक दोनों मूल्यांकन आवश्यक हैं।
Topic 2 मौखिक परीक्षा—अर्थ, प्रयोजन, महत्त्व, गुण एवं दोष

मौखिक परीक्षा—अर्थ, प्रयोजन, महत्त्व, गुण एवं दोष

मौखिक परीक्षा का अर्थ

मौखिक परीक्षा वह परीक्षा है जिसमें परीक्षक विद्यार्थी से बोलकर प्रश्न पूछता है और विद्यार्थी मौखिक रूप से उत्तर देता है। इसके द्वारा विद्यार्थी के विषय-ज्ञान, समझ, स्मरण-शक्ति, अभिव्यक्ति, उच्चारण, तत्परता और आत्मविश्वास का मूल्यांकन किया जाता है।

पुस्तक के अनुसार मौखिक परीक्षा का प्रारम्भ ग्लेडाइज ने किया तथा सुकरात ने इसे विशेष महत्त्व प्रदान किया। यह परीक्षा मुख्यतः वैयक्तिक होती है और शिक्षण में लिखित परीक्षा की पूरक के रूप में प्रयुक्त की जाती है।

मौखिक परीक्षा द्वारा शिक्षक यह भी जान सकता है कि विद्यार्थी ने किसी सिद्धान्त या तथ्य को वास्तव में समझा है अथवा केवल याद किया है। अस्पष्ट उत्तर मिलने पर परीक्षक सहायक प्रश्न पूछकर विद्यार्थी की समझ की गहराई का पता लगा सकता है।

मौखिक परीक्षा के प्रयोजन

  1. विद्यार्थियों में विचार-शक्ति और कल्पना-शक्ति का विकास करना।
  2. स्मरण-शक्ति को विकसित एवं सक्रिय बनाना।
  3. विद्यार्थियों में रचनात्मकता, एकाग्रता और तत्परता का विकास करना।
  4. तेजी और शुद्धता के साथ उत्तर देने तथा कार्य करने की आदत विकसित करना।
  5. अध्ययन किए गए पाठ का अभ्यास और पुनरावृत्ति कराना।
  6. विद्यार्थी की मौखिक अभिव्यक्ति, भाषा और उच्चारण की जाँच करना।
  7. उत्तर के आधार पर विद्यार्थी की वास्तविक समझ और अधिगम-कठिनाइयों का पता लगाना।

मौखिक परीक्षा का महत्त्व

  1. मौखिक रूप से उत्तर देने में लिखित उत्तर की अपेक्षा कम समय और कम परिश्रम लगता है। इसलिए थोड़े समय में अधिक विद्यार्थियों से प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
  2. विद्यार्थी तथ्यों और उत्तरों को याद करके शीघ्रता से प्रस्तुत करना सीखता है, जिससे उसकी कार्य-गति में वृद्धि होती है।
  3. प्रश्नों के तत्काल उत्तर देने से विचारों में स्पष्टता, शुद्धता और तर्कपूर्ण अभिव्यक्ति का विकास होता है।
  4. विद्यार्थी समस्या का उत्तर स्वयं प्रस्तुत करता है। उचित उत्तर देने पर उसका आत्मविश्वास और उत्साह बढ़ता है।
  5. अध्ययन के समय तथ्यों को ध्यानपूर्वक समझने और याद रखने से स्मरण तथा कल्पना-शक्ति का विकास होता है।
  6. शिक्षक तत्काल यह जान सकता है कि विद्यार्थी ने पाठ को कितना समझा है और किस बिन्दु पर उसे सहायता की आवश्यकता है।

मौखिक परीक्षा के गुण

  1. यह निदानात्मक कार्य के लिए उपयोगी है तथा विद्यार्थी की कठिनाइयों का शीघ्र पता लगाती है।
  2. यह विद्यार्थियों में आत्मविश्वास और बोलने का साहस विकसित करती है।
  3. उच्चारण, वाक्पटुता, मौखिक अभिव्यक्ति और संवाद-कौशल जैसी योग्यताओं का मूल्यांकन सम्भव होता है।
  4. विद्यार्थी की समझ और उत्तर की सत्यता की तत्काल जाँच की जा सकती है।
  5. यह मुख्यतः वैयक्तिक होती है, इसलिए विद्यार्थी के ज्ञान और व्यवहार को निकटता से समझने में सहायता करती है।
  6. जहाँ लिखित परीक्षा कराना सम्भव या उपयुक्त नहीं होता, वहाँ मौखिक परीक्षा विशेष रूप से उपयोगी होती है।
  7. इसे नियमित शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सरलतापूर्वक सम्मिलित किया जा सकता है।
  8. उत्तर अस्पष्ट होने पर पूरक प्रश्न पूछकर विद्यार्थी की वास्तविक समझ ज्ञात की जा सकती है।

मौखिक परीक्षा के दोष

  1. सभी विद्यार्थियों के लिए प्रश्नों का कठिनाई-स्तर और परिस्थितियाँ समान रखना कठिन होता है। इसलिए इसमें विश्वसनीयता और वैधता की कमी हो सकती है।
  2. प्रत्येक विद्यार्थी की अलग-अलग परीक्षा लेने के कारण बड़ी कक्षा में अधिक समय और श्रम लगता है।
  3. समस्त विषयों और सभी शैक्षिक स्तरों पर इसका समान रूप से प्रयोग नहीं किया जा सकता।
  4. परीक्षक के व्यक्तिगत विचार, मनोदशा और पूर्वाग्रह परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
  5. इसमें पक्षपात और व्यक्तिनिष्ठ निर्णय की सम्भावना अधिक रहती है।
  6. कुछ विद्यार्थी ज्ञान होने के बावजूद संकोच, भय या घबराहट के कारण उचित उत्तर नहीं दे पाते।
  7. केवल मौखिक उत्तरों के आधार पर विद्यार्थी का व्यापक और सम्पूर्ण मूल्यांकन सम्भव नहीं होता।
  8. उत्तरों का स्थायी लिखित अभिलेख न होने से बाद में पुनः जाँच और तुलना करना कठिन होता है।

निष्कर्ष

मौखिक परीक्षा विद्यार्थी के ज्ञान, अभिव्यक्ति, उच्चारण और आत्मविश्वास की जाँच के लिए उपयोगी है। परन्तु इसकी व्यक्तिनिष्ठता और सीमित विश्वसनीयता के कारण इसे अकेले प्रयोग करने के बजाय लिखित तथा अन्य मूल्यांकन-विधियों के साथ पूरक साधन के रूप में प्रयोग करना अधिक उचित है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मौखिक परीक्षा में प्रश्न और उत्तर दोनों मौखिक रूप से होते हैं।
  • इसके द्वारा ज्ञान, समझ, स्मरण, उच्चारण, अभिव्यक्ति और आत्मविश्वास का मूल्यांकन किया जाता है।
  • पुस्तक के अनुसार इसका प्रारम्भ ग्लेडाइज ने किया और सुकरात ने इसे विशेष महत्त्व दिया।
  • इसके प्रमुख प्रयोजन विचार-शक्ति, स्मरण, रचनात्मकता, एकाग्रता और शुद्ध अभिव्यक्ति का विकास करना हैं।
  • यह निदानात्मक, वैयक्तिक और लिखित परीक्षा की पूरक परीक्षा है।
  • इसमें समय की बचत, तत्काल प्रतिक्रिया और पूरक प्रश्न पूछने की सुविधा होती है।
  • विश्वसनीयता की कमी, पक्षपात, अधिक समय और परीक्षक के प्रभाव की सम्भावना इसके प्रमुख दोष हैं।
  • व्यापक मूल्यांकन के लिए मौखिक परीक्षा का प्रयोग अन्य मूल्यांकन-विधियों के साथ करना चाहिए।
Topic 3 लिखित परीक्षा एवं निबन्धात्मक प्रश्न

लिखित परीक्षा एवं निबन्धात्मक प्रश्न

लिखित परीक्षा का अर्थ

जिस परीक्षा में विद्यार्थियों से प्रश्नों के उत्तर लिखित रूप में प्राप्त करके उनकी उपलब्धि, ज्ञान, समझ और अभिव्यक्ति का मूल्यांकन किया जाता है, उसे लिखित परीक्षा कहते हैं। वर्तमान समय में शैक्षिक मूल्यांकन के लिए लिखित परीक्षाओं का व्यापक प्रयोग किया जाता है।

लिखित परीक्षा के प्रश्न निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों, विद्यार्थियों की आयु, रुचि, मानसिक स्तर और पाठ्यक्रम के अनुसार बनाए जाते हैं। प्रश्नों का स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि उनके द्वारा विद्यार्थियों के ज्ञान के साथ उनकी समझ, तर्क, चिन्तन और अभिव्यक्ति का भी मूल्यांकन किया जा सके।

लिखित परीक्षा के प्रमुख प्रकार
  1. निबन्धात्मक प्रश्न।
  2. लघु उत्तरीय प्रश्न।
  3. वस्तुनिष्ठ प्रश्न।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों में विद्यार्थी से विषय का विस्तृत और वर्णनात्मक उत्तर अपेक्षित होता है, जबकि लघु उत्तरीय प्रश्नों में किसी निश्चित तथ्य या विचार का संक्षिप्त एवं स्पष्ट उत्तर देना होता है।

निबन्धात्मक प्रश्न का अर्थ

जिन प्रश्नों के उत्तर विद्यार्थी को अपने ज्ञान, विचार और भाषा-शैली के अनुसार विस्तारपूर्वक लिखने होते हैं, उन्हें निबन्धात्मक प्रश्न कहते हैं। इसमें उत्तर की विषय-वस्तु, संगठन, विस्तार और अभिव्यक्ति पर विद्यार्थी का पर्याप्त नियन्त्रण रहता है।

पुस्तक के अनुसार निबन्धात्मक परीक्षाओं का प्रयोग अत्यन्त प्राचीन समय से होता आया है तथा लगभग 2000 ईसा पूर्व चीन में भी इनका प्रचलन था। लम्बे समय तक लिखित मूल्यांकन का यही प्रमुख माध्यम रहा, इसलिए इसे परम्परागत परीक्षा भी कहा जाता है।

निबन्धात्मक प्रश्नों का निर्माण अपेक्षाकृत सरल होता है, परन्तु इनके उत्तरों का अंकन पूर्णतः वस्तुनिष्ठ नहीं होता। किसी उत्तर को दिए जाने वाले अंक कुछ सीमा तक परीक्षक के व्यक्तिगत निर्णय, दृष्टिकोण और अपेक्षाओं से प्रभावित हो सकते हैं।

निबन्धात्मक प्रश्नों की विशेषताएँ

  1. इनके प्रश्नपत्र का निर्माण सरल होता है और एक ही समय में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की परीक्षा ली जा सकती है।
  2. उत्तरों के माध्यम से विद्यार्थी के अर्जित ज्ञान की व्यापकता और गहराई का पता लगाया जा सकता है।
  3. उत्तर लिखते समय स्मरण, चिन्तन, तर्क, विश्लेषण और विचार-संगठन जैसी मानसिक शक्तियों का प्रयोग होता है।
  4. प्रश्नों को पाठ्यक्रम के विस्तृत भाग से सम्बन्धित बनाया जा सकता है।
  5. विद्यार्थी को अपने विचारों को अपनी भाषा और शैली में स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने का अवसर मिलता है।
  6. विद्यार्थी सीखे हुए ज्ञान को नई परिस्थितियों और समस्याओं से जोड़कर प्रस्तुत कर सकता है।
  7. इनके निर्माण के लिए विशेष तकनीकी प्रशिक्षण या जटिल उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती।
  8. उत्तर लिखने से क्रमबद्धता, शुद्धता, प्रवाह, स्पष्टता और तारतम्यता का विकास होता है।
  9. प्रश्नपत्र तैयार करने में वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की अपेक्षा कम समय, श्रम और धन व्यय होता है।

निबन्धात्मक प्रश्नों के गुण

  1. प्रश्नों की संख्या कम होने तथा निर्माण सरल होने के कारण प्रश्नपत्र शीघ्र तैयार किया जा सकता है।
  2. आलोचनात्मक चिन्तन, तार्किक अभिव्यक्ति, विश्लेषण, संश्लेषण और मूल्यांकन जैसी उच्च मानसिक योग्यताओं की जाँच सम्भव होती है।
  3. विद्यार्थी का अपनी भाषा पर नियन्त्रण तथा विचारों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने की क्षमता ज्ञात होती है।
  4. तथ्यों और सूचनाओं को उचित दिशा देकर क्रमबद्ध एवं संगठित रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है।
  5. विद्यार्थी अपने विचारों को मौलिक रूप में लिख सकता है, जिससे उसकी सृजनात्मकता और मौलिकता का पता चलता है।

निबन्धात्मक प्रश्नों के दोष

  1. इनमें विद्यार्थी सम्पूर्ण पाठ्यक्रम का अध्ययन करने के स्थान पर कुछ सम्भावित प्रश्नों को रटकर परीक्षा देने की प्रवृत्ति विकसित कर सकता है।
  2. इनसे मुख्यतः पुस्तकीय ज्ञान की जाँच होती है; व्यवहार, रुचि, भावना, कौशल और ज्ञान के व्यावहारिक प्रयोग का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हो पाता।
  3. प्रश्नों का निर्माण कई बार स्पष्ट शैक्षिक उद्देश्यों के आधार पर नहीं किया जाता, जिससे वास्तविक उद्देश्यों की प्राप्ति का मूल्यांकन कठिन हो जाता है।
  4. प्रश्नपत्र के मुद्रण, उत्तर-पुस्तिकाओं और उनके मूल्यांकन में अधिक समय तथा धन व्यय हो सकता है।
  5. अंकन के लिए पूर्णतः निश्चित एवं वस्तुनिष्ठ मानदण्ड बनाना कठिन होता है।
  6. यह परीक्षा विद्यार्थी की वास्तविक स्थिति जानने का एक साधन है, परन्तु इसे ही शिक्षा का अन्तिम लक्ष्य मान लेना उचित नहीं है।
  7. भाषा-शैली और लेखन-गति का प्रभाव अंकों पर पड़ता है। अच्छा ज्ञान होने पर भी कमजोर अभिव्यक्ति वाला विद्यार्थी कम अंक प्राप्त कर सकता है।
  8. यह विद्यार्थियों को स्थायी और व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए पर्याप्त प्रेरणा नहीं देती।
  9. उच्च स्तर के अनुप्रयोग, विश्लेषण और संश्लेषण की जाँच तभी सम्भव होती है, जब प्रश्नों का निर्माण सावधानीपूर्वक किया गया हो।
  10. कम प्रश्न पूछे जाने के कारण पाठ्यक्रम का सीमित प्रतिनिधित्व होता है और परीक्षा संयोग पर निर्भर हो सकती है।
  11. अलग-अलग परीक्षकों द्वारा एक ही उत्तर को भिन्न अंक दिए जा सकते हैं, इसलिए परिणामों की विश्वसनीयता कम हो सकती है।
  12. पुराने प्रश्नों की पुनरावृत्ति और अनुमानित प्रश्नों की तैयारी रटने तथा अनुचित परीक्षा-प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे सकती है।

निबन्धात्मक प्रश्नों के उपयोग

अनेक सीमाओं के बावजूद उचित परिस्थितियों और सावधानीपूर्वक निर्माण के साथ निबन्धात्मक प्रश्न शैक्षिक मूल्यांकन में उपयोगी सिद्ध होते हैं।

  1. जब परीक्षार्थियों की संख्या कम हो और प्रश्नों का दोबारा उपयोग न करना हो।
  2. जब विद्यार्थियों की लिखित भाषा और अभिव्यक्ति-क्षमता का विकास एवं मापन करना हो।
  3. जब विषयगत उपलब्धि के साथ विद्यार्थियों की अभिवृत्ति और दृष्टिकोण की जानकारी प्राप्त करनी हो।
  4. जब शिक्षक विद्यार्थियों के उत्तरों का स्वयं सावधानीपूर्वक और विश्वसनीय अंकन कर सकता हो।
  5. जब प्रश्नपत्र बनाने के लिए समय कम और उत्तरों के मूल्यांकन के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध हो।
  6. जब सृजनात्मकता, विश्लेषण, संश्लेषण, मूल्यांकन और विस्तृत अभिव्यक्ति जैसी उच्च मानसिक योग्यताओं का परीक्षण करना हो।

निष्कर्ष

निबन्धात्मक प्रश्न विद्यार्थियों के ज्ञान, विचार-संगठन, मौलिकता और लिखित अभिव्यक्ति की जाँच के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। इनकी व्यक्तिनिष्ठता और सीमित पाठ्यक्रम-प्रतिनिधित्व को कम करने के लिए प्रश्न स्पष्ट उद्देश्यों पर आधारित हों तथा अंकन के लिए पूर्व निर्धारित उत्तर-संकेत और मानदण्ड बनाए जाएँ।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • लिखित परीक्षा में विद्यार्थियों से प्रश्नों के उत्तर लिखित रूप में प्राप्त किए जाते हैं।
  • लिखित परीक्षा के तीन प्रमुख प्रकार निबन्धात्मक, लघु उत्तरीय और वस्तुनिष्ठ प्रश्न हैं।
  • निबन्धात्मक प्रश्नों में विद्यार्थी को उत्तर विस्तार से और अपनी भाषा-शैली में लिखने की स्वतंत्रता होती है।
  • इनसे ज्ञान, तर्क, चिन्तन, विश्लेषण, सृजनात्मकता और लिखित अभिव्यक्ति का मूल्यांकन किया जा सकता है।
  • इनका प्रश्नपत्र बनाना सरल है, परन्तु उत्तरों का वस्तुनिष्ठ और समान अंकन कठिन होता है।
  • रटने पर बल, सीमित पाठ्यक्रम-प्रतिनिधित्व, परीक्षक का प्रभाव और कम विश्वसनीयता इनके प्रमुख दोष हैं।
  • उच्च मानसिक योग्यताओं और भाषा-अभिव्यक्ति के मूल्यांकन में निबन्धात्मक प्रश्न विशेष रूप से उपयोगी हैं।
Topic 4 लघु उत्तरीय प्रश्न—अर्थ, विशेषताएँ, लाभ एवं सीमाएँ

लघु उत्तरीय प्रश्न—अर्थ, विशेषताएँ, लाभ एवं सीमाएँ

लघु उत्तरीय प्रश्न का अर्थ

जिन प्रश्नों के उत्तर कम शब्दों में, निश्चित तथ्यों और स्पष्ट बिन्दुओं के आधार पर दिए जाते हैं, उन्हें लघु उत्तरीय प्रश्न कहते हैं। इनके उत्तर निबन्धात्मक प्रश्नों की अपेक्षा छोटे होते हैं, परन्तु वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की तरह केवल एक शब्द या विकल्प तक सीमित नहीं होते।

लघु उत्तरीय परीक्षा को निबन्धात्मक परीक्षा का परिमार्जित रूप माना जाता है। इसके विकास का उद्देश्य निबन्धात्मक परीक्षा में पाई जाने वाली कम विश्वसनीयता, सीमित पाठ्यक्रम-प्रतिनिधित्व और अंकन की व्यक्तिनिष्ठता को कम करना है।

इन प्रश्नों में विद्यार्थी को किसी निश्चित तथ्य, कारण, विशेषता, अन्तर अथवा संक्षिप्त व्याख्या को सीमित शब्दों में लिखना होता है। इसलिए उत्तर अधिक स्पष्ट, व्यवस्थित और निश्चित होते हैं तथा कम समय में अधिक प्रश्न पूछे जा सकते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नों के उदाहरण

  1. भारत के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  2. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा रचित किन्हीं दो रचनाओं के नाम लिखिए।
  3. जनसंख्या शिक्षा का महत्त्व बताइए।
  4. आय और व्यय के प्रमुख स्रोत लिखिए।
  5. अर्थशास्त्र के प्रमुख क्षेत्र बताइए।

लघु उत्तरीय प्रश्नों की विशेषताएँ

  1. ये प्रश्न स्पष्ट और निश्चित होते हैं। विद्यार्थी को उत्तर देने के लिए एक निर्धारित दिशा प्राप्त होती है तथा उससे किसी निश्चित तथ्य या सूचना के विषय में पूछा जाता है।
  2. इनमें निबन्धात्मक परीक्षा की अपेक्षा अधिक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। इससे परीक्षा की विश्वसनीयता और अंकन की वस्तुनिष्ठता में अपेक्षाकृत वृद्धि होती है।
  3. प्रश्नों को पाठ्यक्रम के विभिन्न भागों से बनाया जा सकता है। इसलिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम का अधिक व्यापक प्रतिनिधित्व सम्भव होता है।
  4. ये विद्यार्थी की केवल उत्तर-पुस्तिका भरने के लिए अनावश्यक रूप से लम्बा लिखने की प्रवृत्ति को कम करते हैं।
  5. लघु उत्तरीय परीक्षा निबन्धात्मक परीक्षा की अपेक्षा अधिक वैध मानी जाती है, क्योंकि इसमें अधिक उद्देश्यों और पाठ्यवस्तु का परीक्षण किया जा सकता है।
  6. इनके द्वारा तर्क, चिन्तन, समझ और संक्षिप्त अभिव्यक्ति जैसी मानसिक क्षमताओं का मूल्यांकन किया जा सकता है।
  7. विद्यार्थी के उत्तरों के आधार पर उसका वर्गीकरण और उसकी उपलब्धि की तुलना करना अपेक्षाकृत सरल होता है।
  8. इनमें विभेदकारिता का गुण पाया जाता है। इनके द्वारा अच्छे, औसत और कमजोर विद्यार्थियों के प्रदर्शन में अन्तर किया जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्नों के लाभ

  1. इनके उत्तर लगभग निश्चित और सीमित होते हैं। इसलिए उत्तरों की जाँच और अंकन में अधिक समानता तथा विश्वसनीयता प्राप्त होती है।
  2. कम समय में अधिक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। इससे पाठ्यक्रम के अधिकांश भागों का प्रतिनिधित्व सम्भव होता है।
  3. इन प्रश्नों की रचना सरल और स्वाभाविक होती है तथा इन्हें स्पष्ट भाषा में आसानी से बनाया जा सकता है।
  4. उत्तर सीमित और निश्चित होने के कारण अंकन में वस्तुनिष्ठता निबन्धात्मक प्रश्नों की अपेक्षा अधिक होती है।
  5. विद्यार्थियों को बहुत लम्बा उत्तर नहीं लिखना पड़ता। इसलिए समय और श्रम की बचत होती है।
  6. विद्यार्थी की उपलब्धि का अपेक्षाकृत व्यापक और सटीक मूल्यांकन करने में ये प्रश्न अधिक उपयोगी होते हैं।
  7. इनके द्वारा स्मरण के साथ समझ, संक्षिप्त व्याख्या, कारण बताने और अन्तर स्पष्ट करने की क्षमता का परीक्षण किया जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्नों की सीमाएँ

  1. इनके द्वारा विद्यार्थी की उच्च मानसिक क्षमता, विस्तृत तर्क, गहन चिन्तन और विचार-शक्ति का पूर्ण मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
  2. छोटे उत्तरों के कारण विद्यार्थी की भाषा-शैली, प्रवाह और विस्तृत लिखित अभिव्यक्ति का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता।
  3. ये प्रश्न पूर्णतः वैध नहीं माने जा सकते, क्योंकि सभी प्रकार के शैक्षिक उद्देश्यों और व्यवहारों की जाँच इनसे सम्भव नहीं है।
  4. जटिल, समस्यात्मक और विस्तृत विषयों की गहन जाँच के लिए ये प्रश्न पर्याप्त उपयोगी नहीं होते।
  5. विद्यार्थी निश्चित और छोटे उत्तरों को रट सकता है। इसलिए ये रटने की प्रवृत्ति को पूरी तरह समाप्त नहीं करते।
  6. इनके अंकन पर परीक्षक का दृष्टिकोण कुछ सीमा तक प्रभाव डाल सकता है, विशेषकर जब अपेक्षित उत्तर पहले से स्पष्ट न हो।
  7. अस्पष्ट प्रश्नों और असावधानीपूर्ण अंकन से परीक्षक तथा परीक्षार्थी दोनों द्वारा अनुचित व्यवहार की सम्भावना हो सकती है।
  8. इनमें विद्यार्थी को अपने विचारों को स्वतंत्र और विस्तारपूर्वक व्यक्त करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता।

लघु उत्तरीय प्रश्नों के निर्माण में सावधानियाँ

  1. प्रश्न की भाषा सरल, स्पष्ट और निश्चित होनी चाहिए।
  2. एक प्रश्न में केवल एक प्रमुख तथ्य या विचार पूछा जाना चाहिए।
  3. उत्तर की अपेक्षित सीमा अथवा शब्द-संख्या स्पष्ट कर देनी चाहिए।
  4. प्रश्नों को पाठ्यक्रम के विभिन्न भागों और निर्धारित शिक्षण-उद्देश्यों पर आधारित होना चाहिए।
  5. अंकन के लिए पहले से आदर्श उत्तर अथवा आवश्यक उत्तर-बिन्दु निर्धारित कर लेने चाहिए।
  6. ऐसे प्रश्नों से बचना चाहिए जिनके अनेक अस्पष्ट अथवा विवादास्पद उत्तर सम्भव हों।

निष्कर्ष

लघु उत्तरीय प्रश्न निबन्धात्मक और वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के बीच का उपयोगी माध्यम हैं। इनके द्वारा कम समय में पाठ्यक्रम के व्यापक भाग से प्रश्न पूछे जा सकते हैं तथा उत्तरों का अपेक्षाकृत विश्वसनीय और वस्तुनिष्ठ अंकन किया जा सकता है। फिर भी उच्च मानसिक क्षमताओं और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मूल्यांकन के लिए इनका प्रयोग निबन्धात्मक तथा अन्य प्रश्नों के साथ करना अधिक उचित है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • लघु उत्तरीय प्रश्नों के उत्तर कम शब्दों में, निश्चित और स्पष्ट रूप में दिए जाते हैं।
  • इन्हें निबन्धात्मक परीक्षा का परिमार्जित रूप माना जाता है।
  • इनमें कम समय में अधिक प्रश्न पूछे जा सकते हैं, जिससे पाठ्यक्रम का व्यापक प्रतिनिधित्व होता है।
  • इनके प्रमुख गुण स्पष्टता, विश्वसनीयता, वस्तुनिष्ठता, वैधता और विभेदकारिता हैं।
  • इनसे समय और श्रम की बचत होती है तथा उत्तरों का अंकन अपेक्षाकृत सरल होता है।
  • गहन चिन्तन, विस्तृत अभिव्यक्ति और जटिल समस्याओं के मूल्यांकन में इनकी उपयोगिता सीमित होती है।
  • अच्छे लघु उत्तरीय प्रश्न स्पष्ट, उद्देश्यपूर्ण और निश्चित उत्तर-बिन्दुओं पर आधारित होने चाहिए।
Topic 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न—अर्थ, विशेषताएँ, गुण एवं दोष

वस्तुनिष्ठ प्रश्न—अर्थ, विशेषताएँ, गुण एवं दोष

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का अर्थ

जिन प्रश्नों का उत्तर निश्चित, संक्षिप्त और प्रायः एक शब्द, संकेत, रिक्त स्थान, सत्य-असत्य अथवा दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनकर दिया जाता है, उन्हें वस्तुनिष्ठ प्रश्न कहते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में विद्यार्थी को लम्बा उत्तर नहीं लिखना पड़ता। प्रत्येक प्रश्न का सही उत्तर पहले से निश्चित होता है, इसलिए उत्तरों की जाँच परीक्षक के व्यक्तिगत विचार, भाषा-शैली अथवा मनोदशा से प्रभावित नहीं होती।

निबन्धात्मक परीक्षाओं में पाई जाने वाली व्यक्तिनिष्ठता और कम विश्वसनीयता को दूर करने के लिए वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को विशेष महत्त्व दिया गया। इनके द्वारा विद्यार्थी के विषय-ज्ञान, सत्य-असत्य की पहचान, समझ, निर्णय तथा बौद्धिक उपलब्धि का मापन किया जाता है।

वस्तुनिष्ठ परीक्षण में प्रश्नों की संख्या अधिक होती है और उत्तर संक्षिप्त होते हैं। इसलिए कम समय में पाठ्यक्रम के विस्तृत भाग का मूल्यांकन किया जा सकता है। इसी कारण इसे एक वैज्ञानिक परीक्षण-विधि माना जाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की विशेषताएँ

  1. इनमें प्रश्नों की संख्या अधिक रखी जा सकती है, जिससे सम्पूर्ण पाठ्यक्रम का पर्याप्त प्रतिनिधित्व और नमूनाकरण सम्भव होता है।
  2. इनके अंकन में व्यक्तिनिष्ठता का अभाव होता है। परीक्षक की मनोदशा, व्यक्तिगत निर्णय और भाषा-शैली का परिणामों पर प्रभाव नहीं पड़ता।
  3. एक प्रश्न का सामान्यतः एक निश्चित सही उत्तर होता है। इसलिए बार-बार जाँच किए जाने पर भी परिणाम लगभग समान रहता है।
  4. प्रश्न निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों के अनुरूप बनाए जाते हैं। इस कारण इनमें वैधता का गुण पाया जाता है।
  5. उत्तर देने और उत्तर-पुस्तिकाओं की जाँच करने में कम समय लगता है। इसलिए ये परीक्षाएँ मितव्ययी होती हैं।
  6. इनके प्रशासन और अंकन की प्रक्रिया सरल होती है तथा सभी विद्यार्थियों के लिए समान अंकन सम्भव होता है।
  7. प्रश्नों की संख्या अधिक होने के कारण विद्यार्थी केवल कुछ सम्भावित प्रश्नों को रटकर सफल नहीं हो सकता। उसे सम्पूर्ण पाठ्यक्रम का अध्ययन करना पड़ता है।
  8. इनके द्वारा विद्यार्थियों की पारस्परिक तुलना और पुनर्मूल्यांकन सरलतापूर्वक किया जा सकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के गुण

  1. ये सम्पूर्ण पाठ्यक्रम के व्यापक भाग का मापन करते हैं।
  2. इनका अंकन शीघ्र, सरल और समान रूप से किया जा सकता है।
  3. विद्यार्थी में केवल कुछ प्रश्नों को रटने की प्रवृत्ति कम होती है।
  4. उत्तरों का मूल्यांकन शुद्ध और वस्तुनिष्ठ होता है।
  5. ये प्रश्न विद्यार्थियों के लिए रुचिकर होते हैं और उन्हें कम समय में अधिक प्रश्न हल करने का अवसर देते हैं।
  6. निर्धारित शिक्षण-उद्देश्यों की प्राप्ति की जाँच करने में सहायक होते हैं।
  7. इनका प्रयोग, प्रशासन और मूल्यांकन सरलतापूर्वक किया जा सकता है।
  8. इनके परिणाम अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय होते हैं।
  9. परिणामों के आधार पर विद्यार्थी की उपलब्धि के सम्बन्ध में भविष्यवाणी की जा सकती है।
  10. परीक्षक की आत्मनिष्ठता, पक्षपात और व्यक्तिगत निर्णय का अंकन पर प्रभाव नहीं पड़ता।
  11. यह मूल्यांकन की निष्पक्ष और संक्षिप्त विधि है।
  12. बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की परीक्षा और उत्तरों का मूल्यांकन कम समय में किया जा सकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के दोष

  1. इनमें विद्यार्थी को अपने विचारों को मौलिक और विस्तृत रूप में व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता।
  2. ये मुख्यतः तथ्यों और सूचनाओं के ज्ञान पर अधिक बल देते हैं।
  3. विद्यार्थी कभी-कभी वास्तविक ज्ञान के स्थान पर अनुमान लगाकर सही उत्तर दे सकता है।
  4. इनके कारण विद्यार्थी विषय-वस्तु का गहन, क्रमबद्ध और सम्बन्धपरक अध्ययन करने में कम रुचि ले सकता है।
  5. बहुविकल्पीय अथवा सत्य-असत्य प्रश्नों में अनुमान और नकल की सम्भावना बढ़ सकती है।
  6. इनसे उच्च स्तर की बौद्धिक योग्यताओं, जैसे मौलिक चिन्तन, विस्तृत विश्लेषण, संश्लेषण और आलोचनात्मक अभिव्यक्ति की पूर्ण जाँच नहीं हो पाती।
  7. इनके द्वारा विद्यार्थी की भाषा-शैली, लेखन-कौशल और विचारों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता का मूल्यांकन सम्भव नहीं होता।
  8. अच्छे वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का निर्माण कठिन होता है और इसके लिए दक्ष, अनुभवी तथा प्रशिक्षित प्रश्न-निर्माता की आवश्यकता होती है।
  9. इनके द्वारा विद्यार्थी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व, भावनाओं और व्यवहारगत विशेषताओं का पर्याप्त अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
  10. बहुत अधिक प्रश्न होने पर उनके परिणामों की सांख्यिकीय गणना और विश्लेषण में त्रुटि की सम्भावना रहती है।
  11. विद्यार्थी को अपने उत्तर की व्याख्या करने और विचारों का औचित्य सिद्ध करने का अवसर नहीं मिलता।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की उपयोगिता

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का प्रयोग उस समय विशेष रूप से उपयोगी होता है, जब बड़ी संख्या में विद्यार्थियों का कम समय में निष्पक्ष मूल्यांकन करना हो, सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को परीक्षा में सम्मिलित करना हो तथा उत्तरों की शीघ्र और विश्वसनीय जाँच आवश्यक हो।

सामाजिक अध्ययन जैसे विषयों में भी सत्य-असत्य, तथ्यों, विचारों, ज्ञान, समझ और निर्णय की जाँच के लिए वस्तुनिष्ठ प्रश्न उपयोगी माने जाते हैं। फिर भी सम्पूर्ण मूल्यांकन के लिए इन्हें निबन्धात्मक, लघु उत्तरीय और अन्य मूल्यांकन-विधियों के साथ प्रयोग करना उचित है।

निष्कर्ष

वस्तुनिष्ठ प्रश्न निष्पक्षता, विश्वसनीयता, व्यापक पाठ्यक्रम-प्रतिनिधित्व और सरल अंकन की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी हैं। इनकी प्रमुख सीमा यह है कि इनके द्वारा विद्यार्थी की मौलिक अभिव्यक्ति और उच्च मानसिक क्षमताओं का पूर्ण मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। अतः संतुलित प्रश्नपत्र में वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के साथ अन्य प्रकार के प्रश्न भी सम्मिलित किए जाने चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का उत्तर निश्चित, संक्षिप्त और पहले से निर्धारित होता है।
  • इनमें परीक्षक के व्यक्तिगत निर्णय और भाषा-शैली का प्रभाव नहीं पड़ता।
  • इनके द्वारा कम समय में सम्पूर्ण पाठ्यक्रम के व्यापक भाग का मूल्यांकन किया जा सकता है।
  • वस्तुनिष्ठता, विश्वसनीयता, वैधता, मितव्ययिता और सरल अंकन इनकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।
  • इनसे रटने की प्रवृत्ति कम होती है और विद्यार्थियों की पारस्परिक तुलना सरल होती है।
  • अनुमान से उत्तर देना, मौलिकता का अभाव और उच्च मानसिक क्षमताओं की सीमित जाँच इनके प्रमुख दोष हैं।
  • सम्पूर्ण मूल्यांकन के लिए वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का प्रयोग निबन्धात्मक और लघु उत्तरीय प्रश्नों के साथ करना चाहिए।
Topic 6 निबन्धात्मक एवं वस्तुनिष्ठ परीक्षणों का तुलनात्मक अध्ययन

निबन्धात्मक एवं वस्तुनिष्ठ परीक्षणों का तुलनात्मक अध्ययन

निबन्धात्मक एवं वस्तुनिष्ठ परीक्षणों की तुलना

निबन्धात्मक और वस्तुनिष्ठ परीक्षण लिखित परीक्षा के दो प्रमुख रूप हैं। निबन्धात्मक परीक्षण में विद्यार्थी अपने उत्तर को स्वतंत्र रूप से और विस्तारपूर्वक लिखता है, जबकि वस्तुनिष्ठ परीक्षण में उसे निश्चित उत्तर अथवा दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनना होता है।

दोनों परीक्षणों की रचना, प्रशासन, अंकन, विश्वसनीयता, वैधता और विद्यार्थी को मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में पर्याप्त अन्तर होता है। इनका तुलनात्मक अध्ययन निम्न प्रकार है—

तुलना का आधार निबन्धात्मक परीक्षण वस्तुनिष्ठ परीक्षण
रचना इसकी रचना सरल होती है तथा प्रश्नपत्र तैयार करने में अपेक्षाकृत कम समय लगता है। इसकी रचना कठिन होती है तथा प्रश्न तैयार करने में अधिक समय, धन और मानसिक श्रम की आवश्यकता होती है।
प्रश्नों का प्रकार इसमें सामान्य प्रकृति के प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें प्रश्नों की प्रकृति विशिष्ट और निश्चित होती है।
प्रशासन इसका प्रशासन सरल होता है और सामान्यतः विशेष निर्देशों की आवश्यकता नहीं होती। इसके प्रशासन के लिए स्पष्ट एवं विशिष्ट निर्देश देना आवश्यक होता है, इसलिए इसका प्रशासन अपेक्षाकृत कठिन होता है।
भाषा तथा सुलेख इसमें भाषा, अभिव्यक्ति और सुलेख का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। इसमें भाषा और सुलेख का विशेष महत्त्व नहीं होता, क्योंकि उत्तर पहले से निश्चित होते हैं।
अनुमान का प्रभाव सामान्यतः अनुमान से पूरा उत्तर नहीं लिखा जा सकता, यद्यपि नकल की सम्भावना हो सकती है। इसमें विद्यार्थी अनुमान के आधार पर भी सही उत्तर चुन सकता है।
वस्तुनिष्ठता यह कम वस्तुनिष्ठ होता है और अंकन में परीक्षक की व्यक्तिगत त्रुटियों की सम्भावना अधिक रहती है। यह वस्तुनिष्ठ होता है और इसके अंकन में व्यक्तिगत त्रुटियाँ अपेक्षाकृत कम होती हैं।
विश्वसनीयता इसकी विश्वसनीयता अपेक्षाकृत कम होती है तथा मापन की चर त्रुटियाँ अधिक होती हैं। इसकी विश्वसनीयता अधिक होती है तथा मापन की चर त्रुटियाँ अपेक्षाकृत कम होती हैं।
वैधता यह अपेक्षाकृत कम वैध होता है और इसमें मापन की स्थिर त्रुटियाँ अधिक हो सकती हैं। यह अपेक्षाकृत अधिक वैध होता है तथा इसमें मापन की स्थिर त्रुटियाँ कम होती हैं।
मानक इसके मानक तैयार करना कठिन होता है, इसलिए व्याख्यात्मक त्रुटियों की सम्भावना अधिक रहती है। इसके मानक तैयार करना सरल होता है, जिससे व्याख्यात्मक त्रुटियाँ कम होती हैं।
उत्तर की दीर्घता विद्यार्थी को उत्तर स्वयं नियोजित करने और अपने शब्दों में विस्तारपूर्वक लिखने की स्वतंत्रता होती है। विद्यार्थी को दिए गए निश्चित विकल्पों में से किसी एक उत्तर का चयन करना होता है।
प्रश्नों की संख्या इसमें प्रश्नों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है, परन्तु उनके उत्तर बड़े होते हैं और प्रश्न सामान्य प्रकृति के होते हैं। इसमें प्रश्नों की संख्या अधिक होती है तथा प्रश्न विशिष्ट प्रकृति के होते हैं। कभी-कभी उत्तर प्रश्न से भी छोटा होता है।
चिन्तन-स्तर विद्यार्थी अपना अधिकांश समय चिन्तन करने और उत्तर लिखने में लगाता है। विद्यार्थी मुख्यतः प्रश्न को पढ़ने, समझने और सही उत्तर चुनने में चिन्तन करता है।
अंकन इसकी गुणवत्ता परीक्षक की अंक देने की योग्यता पर निर्भर करती है। प्रश्न बनाना सरल, परन्तु समान और निश्चित अंक देना कठिन होता है। इसकी गुणवत्ता प्रश्न-निर्माता की योग्यता पर निर्भर करती है। प्रश्न बनाना कठिन, परन्तु अंक देना सरल और सुनिश्चित होता है।
वैयक्तिकता इसमें प्रश्न-निर्माता को अपनी रुचि व्यक्त करने तथा विद्यार्थी को अपने विचार स्वतंत्र रूप से लिखने की पर्याप्त स्वतंत्रता होती है। इसमें प्रश्न-निर्माता को पर्याप्त स्वतंत्रता होती है, परन्तु विद्यार्थी को अपने विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अवसर नहीं मिलता।
अपेक्षित व्यवहार विद्यार्थी से क्या अपेक्षा की जाती है और उसे किस प्रकार उत्तर देना है, यह हमेशा स्पष्ट शब्दों में व्यक्त नहीं होता। इसमें विद्यार्थी से अपेक्षित व्यवहार और उत्तर देने की विधि स्पष्ट रूप से निर्धारित होती है।
अनुमान अथवा छल का प्रभाव पुस्तक के अनुसार यह सामान्यतः बात को घुमाकर अथवा छलपूर्ण ढंग से उत्तर देने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित कर सकता है। यह सामान्यतः अनुमान के आधार पर उत्तर चुनने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित कर सकता है।

दोनों परीक्षणों की उपयोगिता

निबन्धात्मक परीक्षण विद्यार्थी की भाषा, विचार-संगठन, मौलिकता और विस्तृत अभिव्यक्ति की जाँच में उपयोगी है। दूसरी ओर, वस्तुनिष्ठ परीक्षण कम समय में पाठ्यक्रम के विस्तृत भाग, निश्चित ज्ञान और निर्णय-क्षमता का अधिक निष्पक्ष एवं विश्वसनीय मूल्यांकन करता है।

दोनों परीक्षणों की अपनी-अपनी विशेषताएँ और सीमाएँ हैं। इसलिए अच्छे प्रश्नपत्र में केवल एक ही प्रकार के प्रश्नों पर निर्भर न रहकर निबन्धात्मक, लघु उत्तरीय और वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का संतुलित प्रयोग करना चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • निबन्धात्मक प्रश्न बनाना सरल, जबकि वस्तुनिष्ठ प्रश्न बनाना कठिन होता है।
  • निबन्धात्मक परीक्षण में उत्तर लिखने की स्वतंत्रता होती है, जबकि वस्तुनिष्ठ परीक्षण में निश्चित उत्तर चुनना होता है।
  • निबन्धात्मक परीक्षण में भाषा और सुलेख महत्त्वपूर्ण होते हैं, जबकि वस्तुनिष्ठ परीक्षण में इनका विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।
  • वस्तुनिष्ठ परीक्षण निबन्धात्मक परीक्षण की अपेक्षा अधिक वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय और वैध होता है।
  • निबन्धात्मक परीक्षण में प्रश्न कम और उत्तर विस्तृत होते हैं, जबकि वस्तुनिष्ठ परीक्षण में प्रश्न अधिक और उत्तर संक्षिप्त होते हैं।
  • निबन्धात्मक परीक्षण मौलिकता और अभिव्यक्ति की जाँच करता है, जबकि वस्तुनिष्ठ परीक्षण व्यापक पाठ्यक्रम के निष्पक्ष मूल्यांकन में उपयोगी है।
  • समग्र मूल्यांकन के लिए दोनों प्रकार के परीक्षणों का संतुलित प्रयोग करना चाहिए।
Topic 7 प्रयोगात्मक परीक्षा—अर्थ, प्रकार एवं सुधार के सुझाव

प्रयोगात्मक परीक्षा—अर्थ, प्रकार एवं सुधार के सुझाव

प्रयोगात्मक परीक्षा का अर्थ

जिस परीक्षा में विद्यार्थी को किसी कार्य, प्रयोग अथवा गतिविधि को स्वयं करके दिखाना होता है और उसके कार्य-प्रदर्शन के आधार पर उसकी योग्यता का मूल्यांकन किया जाता है, उसे प्रयोगात्मक अथवा प्रायोगिक परीक्षा कहते हैं।

प्रयोगात्मक परीक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी के सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यवहार में प्रयोग करने की क्षमता की जाँच करना है। इसके अन्तर्गत केवल यह नहीं देखा जाता कि विद्यार्थी किसी विषय के बारे में कितना जानता है, बल्कि यह भी देखा जाता है कि वह उस ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग कितनी कुशलता से करता है।

प्रयोग के समय विद्यार्थी को आवश्यक निर्देश, उपकरण और सामग्री प्रदान की जाती है। वह निर्धारित कार्य को स्वयं करता है तथा शिक्षक या निरीक्षक उसकी कार्य-विधि, उपकरणों के प्रयोग, सावधानी, गति, शुद्धता और प्राप्त परिणाम का निरीक्षण करता है।

प्रयोगात्मक परीक्षा की प्रक्रिया

  1. विद्यार्थी को किए जाने वाले कार्य अथवा प्रयोग के सम्बन्ध में आवश्यक निर्देश दिए जाते हैं।
  2. उसे प्रयोग से सम्बन्धित उपकरण और सामग्री उपलब्ध कराई जाती है।
  3. विद्यार्थी स्वयं प्रयोग अथवा कार्य को पूरा करता है।
  4. परीक्षक विद्यार्थी की कार्य-विधि और गतिविधियों का निरन्तर निरीक्षण करता है।
  5. कार्य की शुद्धता, कौशल, सावधानी और परिणाम के आधार पर विद्यार्थी का मूल्यांकन किया जाता है।

प्रयोगात्मक परीक्षा का महत्त्व

  • यह विद्यार्थी के सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यावहारिक कार्य में बदलने की क्षमता की जाँच करती है।
  • इसके द्वारा कार्य-कौशल, उपकरणों के प्रयोग और समस्या-समाधान की योग्यता का मूल्यांकन किया जाता है।
  • विद्यार्थी स्वयं कार्य करते हुए सीखता है, जिससे उसका ज्ञान अधिक स्पष्ट और स्थायी बनता है।
  • प्रयोगात्मक शिक्षण में विद्यार्थी निरन्तर सक्रिय रहते हैं, जिससे वे सजग और रुचिशील बने रहते हैं।
  • इसके माध्यम से विद्यार्थियों के शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास में सहायता मिलती है।
  • यह वास्तविक जीवन में ज्ञान के उपयोग की क्षमता को विकसित करती है।

प्रयोगात्मक मूल्यांकन के प्रकार

1. आन्तरिक प्रयोग

जब विद्यार्थी किसी सूत्र, सिद्धान्त अथवा अवधारणा को प्रयोगशाला में सामग्री और उपकरणों की सहायता से प्रयोग करके उसकी सफलता या असफलता की जाँच करता है, तो उसे आन्तरिक प्रयोग कहते हैं।

इस प्रकार का प्रयोग मुख्यतः विज्ञान विषयों में किया जाता है। इसमें विद्यार्थी की प्रयोगशाला-कुशलता, उपकरणों के प्रयोग, निरीक्षण, परिणाम निकालने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मूल्यांकन किया जाता है।

2. बाह्य प्रयोग

जब विद्यार्थी सीखे हुए ज्ञान और सिद्धान्तों का वास्तविक जीवन या बाहरी परिस्थितियों में व्यवहारिक प्रयोग करता है, तो उसे बाह्य प्रयोग कहते हैं।

जैसे—दौड़ लगाना, सत्य बोलना, चित्र बनाना, मिट्टी से वस्तु बनाना तथा दैनिक जीवन से सम्बन्धित अन्य कार्य करना। इस प्रकार का मूल्यांकन शारीरिक शिक्षा, गृह विज्ञान, कला, नैतिक शिक्षा और कृषि विज्ञान जैसे विषयों में किया जाता है।

प्रयोगात्मक परीक्षा में सुधार के सुझाव

  1. प्रवेश से पहले विद्यार्थियों की योग्यता और सीखने की गति का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
  2. विद्यार्थियों के दैनिक कार्यों का मूल्यांकन प्रयोगात्मक परीक्षा के रूप में किया जाना चाहिए, जिससे उनकी प्रगति की नियमित जानकारी मिलती रहे।
  3. अन्तिम मूल्यांकन भी किया जाए, परन्तु उसे अत्यधिक महत्त्व न देकर सतत मूल्यांकन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  4. प्रयोगात्मक परीक्षाएँ निरन्तर आयोजित की जानी चाहिए और विद्यार्थियों की प्रगति का नियमित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
  5. प्रयोगात्मक परीक्षा वास्तविक परिस्थितियों और जीवनोपयोगी कार्यों पर आधारित होनी चाहिए।
  6. केवल अन्तिम परिणाम को ही नहीं, बल्कि विद्यार्थी द्वारा अपनाई गई सम्पूर्ण प्रक्रिया को भी महत्त्व दिया जाना चाहिए।
  7. परीक्षक और परीक्षार्थी के बीच मधुर तथा सहयोगपूर्ण सम्बन्ध होना चाहिए।
  8. प्रयोगात्मक कार्यों का सम्बन्ध विद्यार्थियों के दैनिक जीवन से होना चाहिए, ताकि वे सीखे हुए ज्ञान का वास्तविक जीवन में उपयोग कर सकें।

निष्कर्ष

प्रयोगात्मक परीक्षा विद्यार्थी के व्यावहारिक ज्ञान, कार्य-कौशल और वास्तविक जीवन में ज्ञान के प्रयोग की क्षमता के मूल्यांकन का महत्त्वपूर्ण साधन है। इसे अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए परीक्षा को निरन्तर, जीवनोपयोगी, निष्पक्ष और प्रक्रिया-आधारित बनाना आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्रयोगात्मक परीक्षा में विद्यार्थी को किसी कार्य या प्रयोग को स्वयं करके दिखाना होता है।
  • इसका उद्देश्य सैद्धान्तिक ज्ञान के व्यावहारिक प्रयोग की क्षमता का मूल्यांकन करना है।
  • परीक्षक विद्यार्थी की कार्य-विधि, उपकरणों के प्रयोग, शुद्धता और परिणाम का निरीक्षण करता है।
  • प्रयोगात्मक मूल्यांकन के दो प्रकार आन्तरिक प्रयोग और बाह्य प्रयोग हैं।
  • आन्तरिक प्रयोग मुख्यतः प्रयोगशाला में किया जाता है, जबकि बाह्य प्रयोग वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से सम्बन्धित होता है।
  • प्रयोगात्मक परीक्षा विद्यार्थी को सक्रिय, कुशल और जीवनोपयोगी ज्ञान से सम्पन्न बनाती है।
  • इसके सुधार के लिए सतत मूल्यांकन, वास्तविक कार्य, सम्पूर्ण प्रक्रिया और दैनिक जीवन से सम्बन्ध को महत्त्व देना चाहिए।
Topic 8 गुणात्मक मूल्यांकन एवं साक्षात्कार विधि

गुणात्मक मूल्यांकन एवं साक्षात्कार विधि

गुणात्मक मूल्यांकन का अर्थ

जिस मूल्यांकन में विद्यार्थी के व्यवहार, रुचि, अभिवृत्ति, व्यक्तित्व, आदतों, भावनाओं और अन्य गुणों का वर्णनात्मक रूप से अध्ययन किया जाता है, उसे गुणात्मक मूल्यांकन कहते हैं। इसके परिणाम केवल अंकों में व्यक्त न होकर विद्यार्थी के गुणों और व्यवहारगत विशेषताओं के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं।

विद्यालय में विद्यार्थी के आन्तरिक गुणों और व्यवहार का मूल्यांकन करने के लिए विभिन्न गुणात्मक प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है।

गुणात्मक मूल्यांकन की प्रमुख प्रविधियाँ
  1. साक्षात्कार।
  2. प्रेक्षण अथवा निरीक्षण।
  3. प्रश्नावली।
  4. निर्धारण मापनी अथवा रेटिंग स्केल।
  5. जाँच सूची।

साक्षात्कार का अर्थ

साक्षात्कार का अंग्रेजी रूप Interview है। यह शब्द Inter और View से मिलकर बना है। Inter का अर्थ आन्तरिक तथा View का अर्थ अवलोकन करना है। इस प्रकार साक्षात्कार का शाब्दिक अर्थ आन्तरिक अवलोकन करना है।

साक्षात्कार एक ऐसी व्यवस्थित विधि है जिसमें साक्षात्कारकर्ता और उत्तरदाता आमने-सामने मौखिक वार्तालाप करते हैं। इसके माध्यम से उन अनुभवों, विचारों, भावनाओं और सूचनाओं का ज्ञान प्राप्त किया जाता है जिन्हें केवल बाहरी निरीक्षण द्वारा समझना कठिन होता है।

साक्षात्कार का प्रयोग मूल्यांकन के साथ-साथ अनुसन्धान में भी सूचना और आँकड़े एकत्र करने के लिए किया जाता है। यह केवल साधारण बातचीत नहीं, बल्कि निश्चित उद्देश्य से की जाने वाली एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है।

साक्षात्कार की प्रमुख परिभाषाएँ

वैपलिन के अनुसार, साक्षात्कार आमने-सामने होने वाला ऐसा वार्तालाप है जिसका उद्देश्य तथ्यपूर्ण सूचना प्राप्त करना होता है।

गुडे एवं हाट के अनुसार, मौलिक रूप से साक्षात्कार सामाजिक अन्तःक्रिया की एक प्रक्रिया है।

पी. वी. यंग के अनुसार, साक्षात्कार एक व्यवस्थित विधि है जिसके द्वारा अनुसन्धानकर्ता अपेक्षाकृत अपरिचित व्यक्ति के आन्तरिक जीवन के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करता है।

वाइटलेस के अनुसार, साक्षात्कार वह सम्मेलन है जो साक्षात्कार लेने वाले और साक्षात्कार देने वाले के बीच सम्पन्न होता है।

मैकोबी एवं मैकोबी के अनुसार, साक्षात्कार आमने-सामने होने वाला पारस्परिक मौखिक आदान-प्रदान है, जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को सूचना या विचार व्यक्त करने के लिए प्रेरित करता है।

साक्षात्कार की विशेषताएँ

  1. साक्षात्कार में कम-से-कम दो व्यक्ति होते हैं—एक साक्षात्कारकर्ता और दूसरा उत्तरदाता। आवश्यकता के अनुसार दोनों पक्षों में एक से अधिक व्यक्ति भी हो सकते हैं।
  2. इसमें वार्तालाप के साथ आवश्यक तथ्यों और आँकड़ों का संग्रह किया जाता है। इन्हें लिखित रूप में अथवा उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक साधनों की सहायता से सुरक्षित किया जा सकता है।
  3. यह एक क्रमबद्ध प्रविधि है जिसके द्वारा अध्ययन-विषय से सम्बन्धित प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष और आन्तरिक सूचनाएँ प्राप्त की जाती हैं।
  4. इसमें साक्षात्कारकर्ता और उत्तरदाता परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया करते हुए अपनी-अपनी भूमिकाएँ पूरी करते हैं।
  5. प्रत्येक साक्षात्कार का एक निश्चित उद्देश्य होता है। उसी उद्देश्य के अनुसार प्रश्न पूछे जाते हैं और नवीन तथ्यों की खोज की जाती है।

साक्षात्कार के प्रकार

1. संरचना के आधार पर
  • संरचित साक्षात्कार।
  • असंरचित साक्षात्कार।
  • अर्द्ध-संरचित अथवा केन्द्रित साक्षात्कार।
2. औपचारिकता के आधार पर
  • औपचारिक साक्षात्कार।
  • अनौपचारिक साक्षात्कार।
3. उद्देश्य के आधार पर
  • निदानात्मक साक्षात्कार।
  • उपचारात्मक साक्षात्कार।
  • अनुसन्धान साक्षात्कार।
4. सम्पर्क के स्वरूप के आधार पर
  • अल्पकालिक साक्षात्कार।
  • दीर्घकालिक साक्षात्कार।
  • पुनरावृत्ति साक्षात्कार।
5. उत्तरदाताओं की संख्या के आधार पर
  • व्यक्तिगत अथवा वैयक्तिक साक्षात्कार।
  • सामूहिक साक्षात्कार।

साक्षात्कार विधि के गुण

  1. इसके द्वारा जटिल घटनाओं के संयुक्त स्वरूप और उनके विभिन्न पक्षों का सरलतापूर्वक अध्ययन किया जा सकता है।
  2. साक्षात्कार के माध्यम से किसी व्यक्ति, समूह अथवा सामाजिक परिस्थिति का गहन अध्ययन सम्भव होता है।
  3. अभिवृत्ति, विचार, अनुभव, भावना और मूल्य जैसी अमूर्त तथा अदृश्य घटनाओं के अध्ययन में यह विशेष रूप से उपयोगी है।
  4. साक्षात्कार विधि में पर्याप्त लचीलापन होता है। आवश्यकता के अनुसार प्रश्नों का क्रम बदला जा सकता है और पूरक प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं।
  5. इसके द्वारा गोपनीय अनुभवों और घटनाओं के सम्बन्ध में ऐसी जानकारी प्राप्त की जा सकती है जो अन्य विधियों से सरलता से नहीं मिलती।
  6. उत्तरदाता के अतीत से सम्बन्धित घटनाओं और अनुभवों का अध्ययन भी इस विधि द्वारा किया जा सकता है।

साक्षात्कार विधि की सीमाएँ

  1. साक्षात्कारकर्ता के व्यक्तिगत विचार, अभिवृत्ति और पक्षपात प्राप्त परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे आँकड़ों की विश्वसनीयता और वैधता कम हो सकती है।
  2. उत्तरदाता की भावनात्मक स्थिति स्थिर न होने पर उसके उत्तर असन्तुलित और वास्तविकता से भिन्न हो सकते हैं।
  3. सभी उत्तरदाताओं के लिए एक जैसी मानकीकृत परिस्थितियाँ बनाए रखना कठिन होता है, इसलिए अध्ययन की वैज्ञानिकता प्रभावित हो सकती है।
  4. साक्षात्कार की प्रक्रिया हमेशा कठोर और पूर्णतः वस्तुपरक नहीं होती, इसलिए प्राप्त सूचना की विश्वसनीयता पर संदेह बना रह सकता है।
  5. साक्षात्कारकर्ता और उत्तरदाता के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध न होने अथवा उत्तरदाता के संकोची होने पर कृत्रिम और अवैध उत्तर मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है।
  6. विभिन्न क्षेत्रों और समूहों की स्थानीय भाषाओं का पर्याप्त ज्ञान न होने पर साक्षात्कारकर्ता को प्रश्न समझाने तथा सही आँकड़े प्राप्त करने में कठिनाई होती है।

निष्कर्ष

साक्षात्कार गुणात्मक मूल्यांकन की एक महत्त्वपूर्ण और विकसित प्रविधि है। इसके द्वारा विद्यार्थी अथवा उत्तरदाता के विचारों, भावनाओं, अनुभवों और आन्तरिक व्यवहार का गहन अध्ययन किया जा सकता है। विश्वसनीय परिणाम प्राप्त करने के लिए साक्षात्कार को निश्चित उद्देश्य, निष्पक्ष दृष्टिकोण, उपयुक्त प्रश्नों और मैत्रीपूर्ण वातावरण के साथ आयोजित किया जाना चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • गुणात्मक मूल्यांकन में विद्यार्थी के गुणों और व्यवहारगत विशेषताओं का वर्णनात्मक अध्ययन किया जाता है।
  • साक्षात्कार, निरीक्षण, प्रश्नावली, निर्धारण मापनी और जाँच सूची गुणात्मक मूल्यांकन की प्रमुख प्रविधियाँ हैं।
  • साक्षात्कार का शाब्दिक अर्थ आन्तरिक अवलोकन करना है।
  • यह साक्षात्कारकर्ता और उत्तरदाता के बीच निश्चित उद्देश्य से होने वाला मौखिक वार्तालाप है।
  • साक्षात्कार एक क्रमबद्ध, अन्तरवैयक्तिक और तथ्य-संग्रह की प्रविधि है।
  • साक्षात्कार के प्रकारों का वर्गीकरण संरचना, औपचारिकता, उद्देश्य, सम्पर्क और उत्तरदाताओं की संख्या के आधार पर किया जाता है।
  • गहन अध्ययन, लचीलापन तथा अमूर्त और गोपनीय घटनाओं की जानकारी प्राप्त करना इसके प्रमुख गुण हैं।
  • पक्षपात, असन्तुलित उत्तर, मानकीकृत परिस्थितियों का अभाव और स्थानीय भाषा की कठिनाई इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं।
Topic 9 प्रेक्षण अथवा निरीक्षण—अर्थ, विशेषताएँ एवं सीमाएँ

प्रेक्षण अथवा निरीक्षण—अर्थ, विशेषताएँ एवं सीमाएँ

प्रेक्षण अथवा निरीक्षण का अर्थ

प्रेक्षण अथवा निरीक्षण वह विधि है जिसमें किसी व्यक्ति के व्यवहार और आचरण को वास्तविक परिस्थितियों में ध्यानपूर्वक देखकर उससे सम्बन्धित तथ्यों का अध्ययन किया जाता है। इसमें निरीक्षक व्यक्ति की गतिविधियों, प्रतिक्रियाओं, रुचियों, आदतों और संवेगात्मक व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन करता है।

पुस्तक के अनुसार निरीक्षण करते समय प्रायः प्रयोज्य को इस बात की जानकारी नहीं होती कि उसके व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा है। इससे उसके स्वाभाविक व्यवहार को समझने में सहायता मिलती है।

निरीक्षक अपने अवलोकन के आधार पर एक व्यवस्थित रिपोर्ट तैयार करता है। उस रिपोर्ट का विश्लेषण करके विद्यार्थी के व्यवहार के सम्बन्ध में निष्कर्ष निकाला जाता है।

निरीक्षण की प्रक्रिया

  1. अध्ययन किए जाने वाले व्यवहार या घटना का स्पष्ट निर्धारण किया जाता है।
  2. व्यक्ति के व्यवहार को अलग-अलग समय और परिस्थितियों में ध्यानपूर्वक देखा जाता है।
  3. देखे गए व्यवहार और घटनाओं का क्रमबद्ध रूप में अभिलेखन किया जाता है।
  4. आवश्यक होने पर एक ही व्यवहार का निरीक्षण कई निरीक्षकों द्वारा किया जाता है।
  5. प्राप्त तथ्यों और अभिलेखों का विश्लेषण करके निश्चित निष्कर्ष निकाला जाता है।

जब किसी विद्यार्थी के व्यवहार का निरीक्षण विभिन्न समयों और परिस्थितियों में किया जाता है तथा एक से अधिक निरीक्षक मिलकर उसका अध्ययन करते हैं, तो निष्कर्ष अधिक वस्तुनिष्ठ बनाए जा सकते हैं। इसी कारण इस विधि को वस्तुनिष्ठ निरीक्षण विधि भी कहा जाता है।

निरीक्षण की प्रमुख परिभाषाएँ

चार्ल्स गिडे के अनुसार, निरीक्षण वह मार्ग है जिस पर चलकर सत्य की खोज की जाती है।

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार, घटनाओं को उनके प्राकृतिक रूप में तथा उनके कार्य-कारण या पारस्परिक सम्बन्धों की दृष्टि से देखना निरीक्षण कहलाता है।

पी. वी. यंग के अनुसार, निरीक्षण का प्रयोग सामूहिक व्यवहार, जटिल सामाजिक संस्थाओं तथा किसी सम्पूर्ण घटना की अलग-अलग इकाइयों के सावधानीपूर्ण अध्ययन के लिए किया जा सकता है।

गुडे तथा हाट के अनुसार, विज्ञान निरीक्षण से प्रारम्भ होता है और अपने तथ्यों की पुष्टि के लिए अन्त में निरीक्षण का ही सहारा लेता है।

मोजर के अनुसार, निरीक्षण वैज्ञानिक जाँच की एक श्रेष्ठ विधि है, जिसमें कानों और वाणी की अपेक्षा आँखों का अधिक प्रयोग किया जाता है।

निरीक्षण की विशेषताएँ

  1. इसके द्वारा विद्यार्थियों में गम्भीर चिन्तन, तर्क और निर्णय करने की शक्ति का विकास होता है।
  2. निरीक्षण के समय ज्ञानेन्द्रियाँ सक्रिय रहती हैं, जिससे विद्यार्थी अनुभव के आधार पर सीखता है।
  3. इससे विद्यार्थियों में तुलनात्मक, विश्लेषणात्मक और संश्लेषणात्मक क्षमता का विकास होता है।
  4. इसके माध्यम से विद्यार्थी विषय से सम्बन्धित प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते हैं।
  5. विद्यार्थी को विषय-वस्तु से सम्बन्धित प्रारम्भिक और वास्तविक जानकारी सरलता से प्राप्त होती है।
  6. निरीक्षण के निरन्तर अभ्यास से विद्यार्थियों में अन्वेषण और खोज की प्रवृत्ति का विकास होता है।

निरीक्षण की सीमाएँ

  1. निरीक्षण द्वारा प्रत्येक प्रकार के व्यवहार का अध्ययन नहीं किया जा सकता। अपराधी व्यवहार, वैवाहिक जीवन से सम्बन्धित निजी व्यवहार और अन्य गोपनीय घटनाएँ प्रत्यक्ष निरीक्षण के लिए उपलब्ध नहीं होतीं।
  2. निरीक्षक की पूर्वधारणाएँ, आवश्यकताएँ और व्यक्तिगत दृष्टिकोण उसके अवलोकन को प्रभावित कर सकते हैं। इससे निरीक्षण आत्मनिष्ठ हो सकता है तथा निष्कर्षों की वैधता और विश्वसनीयता कम हो सकती है।
  3. अध्ययन की गुणवत्ता निरीक्षक की योग्यता और क्षमता पर निर्भर करती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव, पूर्वाग्रह, व्यक्तिगत अभिवृत्ति और अभिलेखन की त्रुटियाँ अध्ययन को सीमित कर सकती हैं।
  4. अनेक घटनाओं का निरीक्षण उनके घटित होने पर ही सम्भव होता है। इसलिए शोधकर्ता को कभी-कभी घटना के होने तक लम्बे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।

निरीक्षण करते समय सावधानियाँ

  • अध्ययन के लिए व्यवहार और परिस्थितियों का सावधानीपूर्वक चयन करना चाहिए।
  • व्यक्ति के व्यवहार का अलग-अलग समय और स्थितियों में निरीक्षण करना चाहिए।
  • देखे गए तथ्यों को तत्काल, स्पष्ट और क्रमबद्ध रूप में लिखना चाहिए।
  • निरीक्षक को व्यक्तिगत पूर्वाग्रह और पक्षपात से बचना चाहिए।
  • सम्भव होने पर एक ही व्यवहार का एक से अधिक निरीक्षकों द्वारा अध्ययन कराना चाहिए।

निष्कर्ष

प्रेक्षण अथवा निरीक्षण विद्यार्थी के वास्तविक और स्वाभाविक व्यवहार का अध्ययन करने की उपयोगी विधि है। इससे व्यवहार के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त होती है, परन्तु विश्वसनीय निष्कर्ष के लिए निरीक्षण को योजनाबद्ध, निष्पक्ष, क्रमबद्ध और विभिन्न परिस्थितियों में किया जाना आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • निरीक्षण में व्यक्ति के व्यवहार और आचरण का वास्तविक परिस्थितियों में प्रत्यक्ष अध्ययन किया जाता है।
  • निरीक्षक देखे गए व्यवहार की रिपोर्ट बनाकर उसका विश्लेषण करता है और निष्कर्ष निकालता है।
  • विभिन्न समय, परिस्थितियों और अनेक निरीक्षकों द्वारा किया गया निरीक्षण अधिक वस्तुनिष्ठ होता है।
  • प्रत्यक्ष ज्ञान, ज्ञानेन्द्रियों की सक्रियता, तार्किक चिन्तन और अन्वेषण-प्रवृत्ति का विकास इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।
  • सभी व्यवहारों का निरीक्षण सम्भव न होना, निरीक्षक का पूर्वाग्रह और सीमित विश्वसनीयता इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं।
  • वैज्ञानिक निरीक्षण के लिए सावधानी, निष्पक्षता, सही अभिलेखन और विभिन्न परिस्थितियों में पुनः निरीक्षण आवश्यक है।
Topic 10 प्रश्नावली—अर्थ, विशेषताएँ, प्रकार एवं सीमाएँ

प्रश्नावली—अर्थ, विशेषताएँ, प्रकार एवं सीमाएँ

प्रश्नावली का अर्थ

प्रश्नावली मापन और तथ्य-संग्रह की एक ऐसी प्रविधि है जिसमें अध्ययन-विषय से सम्बन्धित प्रश्नों की एक क्रमबद्ध सूची तैयार की जाती है। इस सूची को उत्तरदाताओं के पास भेजा जाता है और वे सामान्यतः प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखकर देते हैं।

सामाजिक विज्ञान और शैक्षिक अनुसन्धान में प्रश्नावली का विशेष महत्त्व है। जब अध्ययन का क्षेत्र विस्तृत हो तथा अनेक व्यक्तियों से एक ही प्रकार की जानकारी प्राप्त करनी हो, तब इस विधि का उपयोग किया जाता है।

प्रश्नावली केवल प्रश्नों का साधारण समूह नहीं होती। इसका निर्माण अध्ययन के उद्देश्य, अध्ययन-समस्या, उत्तरदाताओं की योग्यता और आवश्यक सूचनाओं को ध्यान में रखकर किया जाता है।

प्रश्नावली की प्रमुख परिभाषाएँ

अकोलकर महोदय के अनुसार, प्रश्नावली विचारपूर्वक और निश्चित रूप से चुने गए शब्दों वाले प्रश्नों की एक सूची है। इसे डाक द्वारा लोगों के पास भेजा जा सकता है अथवा साक्षात्कारकर्ता इसके प्रश्नों को ध्यान में रखकर बातचीत को आगे बढ़ा सकता है।

लुण्डबर्ग के अनुसार, मूल रूप में प्रश्नावली उद्दीपकों का एक समूह है, जिसका प्रयोग शिक्षित व्यक्तियों द्वारा उन उद्दीपकों के प्रति किए गए शाब्दिक व्यवहार के अध्ययन के लिए किया जाता है।

गुडे एवं हाट के अनुसार, प्रश्नावली किसी रूप में प्रस्तुत प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने का एक साधन है, जिसे उत्तरदाता स्वयं भरता है।

इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि प्रश्नावली उद्देश्यपूर्ण, क्रमबद्ध और सुनियोजित प्रश्नों की सूची है, जिसके माध्यम से अध्ययन-समस्या से सम्बन्धित आँकड़े प्राप्त किए जाते हैं।

एक अच्छी प्रश्नावली की विशेषताएँ

  1. प्रत्येक प्रश्नावली के साथ एक प्राथमिक अथवा परिचय-पत्र होना चाहिए। इसमें अनुसन्धानकर्ता, सम्बन्धित संस्था तथा अनुसन्धान के उद्देश्य का स्पष्ट परिचय दिया जाना चाहिए।
  2. प्रश्नावली भरने के निर्देश और उत्तर देने की विधि सरल, स्पष्ट तथा पूर्ण रूप में लिखी होनी चाहिए। विशेष शब्दों की उचित व्याख्या भी दी जानी चाहिए।
  3. प्रश्नों की संख्या अनावश्यक रूप से अधिक नहीं होनी चाहिए, परन्तु प्रश्न इतने अवश्य हों कि अध्ययन की सभी आवश्यक सूचनाएँ प्राप्त हो सकें।
  4. प्रश्नावली में ऐसे प्रश्नों को शामिल नहीं करना चाहिए जिनकी जानकारी अन्य साधनों से सरलतापूर्वक प्राप्त की जा सकती हो।
  5. प्रश्नावली देखने में सुन्दर, सुव्यवस्थित और मुद्रण सम्बन्धी त्रुटियों से मुक्त होनी चाहिए।
  6. ऐसे प्रश्न नहीं पूछने चाहिए जो उत्तरदाता में ईर्ष्या, क्रोध अथवा अन्य तीव्र संवेग उत्पन्न करें।
  7. प्रश्नों को विषय और प्रकृति के अनुसार उचित वर्गों में व्यवस्थित करना चाहिए, जिससे उत्तरदाता को उत्तर देने में सुविधा हो।

प्रश्नावली के प्रकार

1. अप्रतिबन्धित प्रश्नावली

जिस प्रश्नावली में उत्तरदाता को अपने विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने की सुविधा होती है, उसे अप्रतिबन्धित अथवा खुली प्रश्नावली कहते हैं। इसमें उत्तर देने के लिए निश्चित विकल्प नहीं दिए जाते।

इसके प्रश्नों के उत्तर उत्तरदाता अपनी भाषा, अनुभव और विचारों के अनुसार विस्तार से लिख सकता है।

उदाहरण—

  • कक्षा-कक्ष में सकारात्मक पुनर्बलन का प्रभाव अधिक स्थायी क्यों होता है?
  • वर्तमान शिक्षा-प्रणाली के मूल्यांकन में कौन-कौन से दोष हैं?
  • विद्यालयी गतिविधियों में विद्यार्थियों की घटती सहभागिता के क्या कारण हैं?
2. प्रतिबन्धित प्रश्नावली

जिस प्रश्नावली में उत्तरदाता को दिए गए विकल्पों में से ही उत्तर चुनना होता है, उसे प्रतिबन्धित अथवा बन्द प्रश्नावली कहते हैं। इसमें उत्तर देने की स्वतंत्रता सीमित होती है।

इसके उत्तर प्रायः हाँ या नहीं, अथवा दिए गए विकल्पों में से किसी एक का चयन करके दिए जाते हैं।

उदाहरण—

  • विज्ञान विषय में आपकी रुचि कैसी है—कम, सामान्य अथवा बहुत अधिक?
  • विद्यालयी कार्यक्रमों में आपकी भागीदारी कैसी रहती है—कम, सामान्य अथवा बहुत अधिक?
  • क्या आप विज्ञान शिक्षक से डरते हैं—हाँ अथवा नहीं?
3. चित्रात्मक प्रश्नावली

जिस प्रश्नावली में प्रश्नों अथवा उत्तर-विकल्पों को चित्रों, फोटोग्राफ या रेखाचित्रों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसे चित्रात्मक प्रश्नावली कहते हैं।

उत्तरदाता प्रस्तुत चित्रों में से अपने उत्तर के अनुरूप चित्र का चयन करता है। इस प्रकार की प्रश्नावली विशेष रूप से अशिक्षित व्यक्तियों, भिन्न भाषा बोलने वाले लोगों और छोटे बच्चों के लिए उपयोगी होती है।

प्रश्नावली विधि की सीमाएँ

  1. इस विधि का प्रयोग मुख्यतः शिक्षित व्यक्तियों के अध्ययन के लिए किया जा सकता है। प्रश्नों को पढ़ने और लिखित उत्तर देने की क्षमता के अभाव में अशिक्षित व्यक्तियों पर इसका प्रयोग कठिन होता है।
  2. प्रश्नावली से प्राप्त प्रतिदर्श पक्षपातपूर्ण हो सकता है। केवल शिक्षित व्यक्तियों का चयन करने तथा बहुत कम प्रश्नावलियाँ वापस प्राप्त होने के कारण प्रतिदर्श सम्पूर्ण जनसमूह का सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पाता।
  3. विभिन्न भाषाओं वाले विस्तृत क्षेत्र के लिए ऐसे सार्वभौमिक प्रश्न बनाना कठिन होता है जिनका अर्थ सभी उत्तरदाताओं के लिए समान हो। अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही शब्द के भिन्न अर्थ हो सकते हैं।
  4. प्रश्नावली से अनेक बार अपर्याप्त और अधूरे उत्तर प्राप्त होते हैं। कठिन प्रश्न, भाषा की समस्या, रुचि का अभाव, अत्यधिक व्यस्तता और विस्तृत उत्तर लिखने में अनिच्छा इसके प्रमुख कारण हैं।
  5. यह विधि गहन और सतत अध्ययन के लिए उपयुक्त नहीं होती। इसका स्वरूप अपेक्षाकृत औपचारिक, अवैयक्तिक और यान्त्रिक होता है तथा इसमें व्यक्तिगत सम्पर्क और भावनात्मक सम्बन्ध का अभाव रहता है।
  6. एक ही विषय पर बार-बार प्रश्नावली भेजने से उत्तरदाता ऊब सकता है तथा उत्तर देने से बचने का प्रयास कर सकता है।
  7. उत्तरदाता प्रश्न का अर्थ न समझने पर स्पष्टीकरण प्राप्त नहीं कर सकता। इससे गलत या अपूर्ण उत्तर मिलने की सम्भावना रहती है।
  8. प्रश्नावली में उत्तरदाता के चेहरे के भाव, संकोच, स्वर और अन्य गैर-मौखिक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

प्रश्नावली विस्तृत क्षेत्र और बड़ी संख्या में उत्तरदाताओं से कम समय में जानकारी प्राप्त करने की उपयोगी विधि है। इसकी सफलता स्पष्ट प्रश्नों, उचित क्रम, सरल भाषा और उत्तरदाताओं की प्रकृति के अनुसार सही प्रकार की प्रश्नावली चुनने पर निर्भर करती है। गहन और विश्वसनीय अध्ययन के लिए प्रश्नावली के साथ साक्षात्कार या निरीक्षण जैसी अन्य प्रविधियों का प्रयोग भी किया जा सकता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्रश्नावली अध्ययन-विषय से सम्बन्धित उद्देश्यपूर्ण और क्रमबद्ध प्रश्नों की सूची होती है।
  • इसके प्रश्नों के उत्तर सामान्यतः उत्तरदाता स्वयं लिखता है।
  • अच्छी प्रश्नावली सरल, स्पष्ट, संक्षिप्त, सुव्यवस्थित और अध्ययन के उद्देश्यों पर आधारित होनी चाहिए।
  • प्रश्नावली के तीन प्रमुख प्रकार अप्रतिबन्धित, प्रतिबन्धित और चित्रात्मक प्रश्नावली हैं।
  • अप्रतिबन्धित प्रश्नावली में स्वतंत्र उत्तर और प्रतिबन्धित प्रश्नावली में निश्चित विकल्प दिए जाते हैं।
  • चित्रात्मक प्रश्नावली छोटे बच्चों, अशिक्षित और भिन्न भाषा बोलने वाले व्यक्तियों के लिए उपयोगी होती है।
  • शिक्षित व्यक्तियों तक सीमित प्रयोग, पक्षपातपूर्ण प्रतिदर्श, अधूरे उत्तर और गहन अध्ययन में अनुपयुक्तता इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं।
Topic 11 निर्धारण मापनी—अर्थ, विशेषताएँ, प्रकार एवं सीमाएँ

निर्धारण मापनी—अर्थ, विशेषताएँ, प्रकार एवं सीमाएँ

निर्धारण मापनी का अर्थ

निर्धारण मापनी अथवा रेटिंग स्केल आँकड़ों के संग्रह और मूल्यांकन की ऐसी विधि है, जिसके द्वारा किसी व्यक्ति के गुणों, विचारों, अभिवृत्तियों और व्यवहार को क्रमबद्ध श्रेणियों अथवा निश्चित बिन्दुओं पर मापा जाता है।

इसका प्रयोग सामान्यतः शिक्षक, अभिभावक और प्रशासक किसी विद्यार्थी या व्यक्ति के निष्पादन, व्यवहार, कार्यक्षमता तथा व्यक्तित्व-विशेषताओं का मूल्यांकन करने के लिए करते हैं।

भौतिक वस्तुओं का मापन इंच, ग्राम और मिनट जैसी निश्चित इकाइयों में किया जा सकता है, परन्तु ईमानदारी, सहयोग, अनुशासन, रुचि और सक्रियता जैसे मानवीय गुणों का प्रत्यक्ष मापन सम्भव नहीं होता। ऐसे गुणों के मूल्यांकन के लिए निर्धारण मापनी का प्रयोग किया जाता है।

निर्धारण मापनी की परिभाषाएँ

बेस्ट के अनुसार, निर्धारण मापनी किसी वस्तु के सीमित पक्षों अथवा किसी व्यक्ति के गुणों का गुणात्मक विवरण प्रस्तुत करती है।

करलिंगर के अनुसार, निर्धारण मापनी वह मापन-उपकरण है जिसमें निर्धारक मूल्यांकित वस्तुओं को श्रेणियों में रखता है अथवा एक सातत्य पर उन्हें संख्यात्मक स्वरूप प्रदान करता है।

निर्धारण मापनी का उदाहरण

किसी विद्यार्थी के निष्पादन का मूल्यांकन निम्न श्रेणियों के आधार पर किया जा सकता है—

  • सर्वोत्तम।
  • अति उत्तम।
  • उत्तम।
  • सामान्य।
  • सामान्य से निम्न।
  • असन्तोषजनक।
  • अत्यन्त असन्तोषजनक।

निर्धारक विद्यार्थी के निष्पादन को देखकर इनमें से किसी एक उपयुक्त श्रेणी का चयन करता है।

निर्धारण मापनी की विशेषताएँ

  1. यह वर्णनात्मक तथ्यों को संख्यात्मक अथवा परिमाणात्मक रूप में व्यक्त करती है।
  2. इसमें वस्तुओं, व्यक्तियों और घटनाओं के मूल्यों का वर्णन एक क्रमबद्ध सातत्य पर किया जाता है।
  3. इसके सामान्यतः दो सिरे होते हैं, जो एक-दूसरे के विपरीत गुणों अथवा स्थितियों को व्यक्त करते हैं।
  4. इसके द्वारा व्यक्तियों के विचारों और मतों का अपेक्षाकृत शुद्ध एवं क्रमबद्ध मापन किया जा सकता है।
  5. इसके माध्यम से निर्धारित गुणों और विशेषताओं का व्यावहारिक मूल्यांकन किया जाता है।
  6. इससे व्यक्तिगत गुणों, शीलगुणों और व्यवहार के कम प्रत्यक्ष अथवा कम बोधात्मक लक्षणों का अंकन किया जा सकता है।
  7. निर्धारण मापनी समवर्ती भी हो सकती है, अर्थात एक ही समय में विभिन्न गुणों का मूल्यांकन किया जा सकता है।

निर्धारण मापनी के प्रकार

1. आंकिक निर्धारण मापनी

इस मापनी में प्रत्येक गुण या प्रश्न के सामने संख्यात्मक बिन्दु दिए जाते हैं। निर्धारक व्यक्ति के व्यवहार अथवा निष्पादन के अनुसार किसी एक बिन्दु का चयन करता है।

पुस्तक के अनुसार उद्दीपक मूल्यांकन विधि गाल्टन की देन है। बाद में मेज़र ने 1895 में और लॉनियर ने 1941 में इस पर कार्य किया। आंकिक मापनी में सामान्यतः तीन से ग्यारह तक बिन्दु हो सकते हैं, परन्तु पाँच अथवा सात बिन्दुओं वाली मापनी का प्रयोग अधिक किया जाता है।

पाँच बिन्दुओं वाली मापनी का उदाहरण—

  • 5 — अधिक पसन्द।
  • 4 — पसन्द।
  • 3 — तटस्थ।
  • 2 — नापसन्द।
  • 1 — अत्यधिक नापसन्द।

इसके द्वारा विद्यार्थी की क्रियाशीलता, उपलब्धि-स्तर और सहपाठियों के प्रति व्यवहार जैसे गुणों का मूल्यांकन किया जा सकता है।

2. ग्राफीय निर्धारण मापनी

ग्राफीय मापनी में एक सरल रेखा को कुछ निश्चित भागों में विभाजित किया जाता है। रेखा के दोनों सिरों पर दो विपरीत विशेषताएँ लिखी जाती हैं और निर्धारक उपयुक्त स्थान पर चिह्न लगाता है।

इस मापनी में सामान्यतः पाँच अथवा सात बिन्दु रखे जाते हैं। उदाहरण के लिए विद्यार्थी की क्रियाशीलता का मापन अत्यन्त सक्रिय से अत्यन्त निष्क्रिय तक किया जा सकता है।

3. मानक निर्धारण मापनी

मानक निर्धारण मापनी में किसी व्यक्ति के गुणों की तुलना पहले से निर्धारित मानकों अथवा व्यक्तियों से की जाती है। इसके दो प्रमुख रूप हैं—

व्यक्ति-व्यक्ति मापनी

इसमें व्यक्तियों के नाम लिखकर उन्हें गुणों के आधार पर उच्च से निम्न श्रेणी में व्यवस्थित किया जाता है। पुस्तक के अनुसार इसमें प्रायः 15 व्यक्तियों को श्रेणीबद्ध किया जाता था। इसका प्रयोग तुलनात्मक अध्ययन में किया जाता है।

इस मापनी का विकास प्रथम विश्वयुद्ध के समय अमेरिका में सैनिकों के अध्ययन के लिए किया गया था।

चित्रात्मक तुलना मापनी

इस मापनी में विभिन्न गुणों और विशेषताओं को व्यक्त करने वाले चित्र निर्धारक के सामने रखे जाते हैं। निर्धारक चित्रों की पहचान करके मूल्यांकित व्यक्ति से उनका मिलान करता है।

पुस्तक के अनुसार चित्रात्मक तुलना मापनी का विकास हार्टशोर्न और मे ने किया। एक ही गुण वाले अनेक व्यक्तियों का चयन होने पर उनके प्राप्त निर्धारणों का औसत निकाला जाता है।

4. संचित बिन्दु मापनी

इस मापनी में व्यक्ति के विभिन्न गुणों अथवा विशेषताओं को निश्चित अंक दिए जाते हैं। इन अंकों का कुल योग उस व्यक्ति में पाए जाने वाले गुणों की मात्रा को व्यक्त करता है।

संचित बिन्दु मापनी की दो प्रमुख विधियाँ हैं—

  • चिह्नांकन सूची विधि—इसका प्रयोग बच्चों के चारित्रिक गुणों और व्यावसायिक विशेषताओं के अध्ययन में किया जाता है।
  • बूझो कौन प्रविधि—पुस्तक के अनुसार इसका विकास हार्टशोर्न एवं मे ने बच्चों के अध्ययन के लिए किया था। इसके द्वारा बड़े व्यक्तियों का भी अध्ययन किया जा सकता है।
5. बलात् चयन मापनी

इस मापनी में निर्धारक को उपलब्ध विकल्पों में से किसी एक विकल्प का अनिवार्य रूप से चयन करना होता है। व्यक्ति को यह बताना पड़ता है कि उसकी कौन-सी विशेषता अधिक है अथवा दो वस्तुओं या क्रियाओं में से उसे कौन-सी अधिक पसन्द है।

पुस्तक के अनुसार इसका प्रथम प्रयोग व्हेरी ने व्यक्तित्व-प्रपत्र के रूप में किया था। बाद में इसका प्रयोग मापन-उपकरण के रूप में होने लगा। ट्रेवर्स के अनुसार इसका विकास होर्स्ट के विचारों पर हुआ और इसकी निर्माण-विधि की व्याख्या सिसन ने की।

इस मापनी को प्रभामण्डल प्रभाव और उदारता सम्बन्धी त्रुटियों से अपेक्षाकृत मुक्त माना जाता है। कुडर प्रेफरेंस रिकॉर्ड तथा एडवर्ड पर्सनल प्रेफरेंस शेड्यूल का निर्माण भी इसी मापनी के आधार पर किया गया।

निर्धारण मापनी की सीमाएँ एवं सावधानियाँ

  1. जिस गुण का मूल्यांकन करना हो, उसे स्पष्ट रूप से परिभाषित करना चाहिए, ताकि सभी निर्धारक उसका समान अर्थ समझें।
  2. गुण की मात्रा व्यक्त करने वाली सभी श्रेणियों और बिन्दुओं को स्पष्ट रूप से निर्धारित करना चाहिए। सामान्यतः तीन, पाँच अथवा सात बिन्दुओं वाले सातत्य का प्रयोग करना उचित होता है।
  3. बहुत अधिक बिन्दु रखने से उनके बीच सूक्ष्म अन्तर करना कठिन हो जाता है। अप्रशिक्षित निर्धारकों के लिए कम बिन्दुओं वाली मापनी अधिक उपयुक्त होती है।
  4. किसी एक निर्धारक का निर्णय पक्षपातपूर्ण हो सकता है। इसलिए अनेक निर्धारकों द्वारा दिए गए निर्णयों का मध्यमान अथवा मध्यांक लेना चाहिए।
  5. निर्धारक के मानसिक विकास, बौद्धिक स्तर, पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत सम्बन्धों का उसके निर्णय पर प्रभाव पड़ सकता है।
  6. कुछ निर्धारक सभी व्यक्तियों को मध्यम श्रेणी में रखते हैं, जबकि कुछ आवश्यकता से अधिक उदार अथवा कठोर निर्णय देते हैं।
  7. गोपनीयता भंग होने के भय से निर्धारक किसी व्यक्ति के विषय में नकारात्मक मूल्यांकन देने से बच सकता है।
  8. सामाजिक रूप से स्वीकार्य गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर और अस्वीकार्य गुणों को छिपाकर प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति भी परिणामों को प्रभावित कर सकती है।
  9. बाहरी व्यवहार से दिखाई देने वाले गुणों का निर्धारण अपेक्षाकृत विश्वसनीय होता है, परन्तु आन्तरिक गुणों का सही मूल्यांकन कठिन होता है।

निष्कर्ष

निर्धारण मापनी व्यक्तित्व और व्यवहारगत गुणों के मापन का उपयोगी साधन है। इसका निर्माण और प्रशासन अपेक्षाकृत सरल होता है, परन्तु निष्पक्ष परिणामों के लिए गुणों की स्पष्ट परिभाषा, उपयुक्त बिन्दुओं का चयन तथा प्रशिक्षित एवं निष्पक्ष निर्धारकों का होना आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • निर्धारण मापनी द्वारा व्यक्तियों के गुणों, विचारों, अभिवृत्तियों और व्यवहार का क्रमबद्ध मूल्यांकन किया जाता है।
  • इसमें गुणों को श्रेणियों अथवा निश्चित संख्यात्मक बिन्दुओं पर व्यक्त किया जाता है।
  • इसके प्रमुख प्रकार आंकिक, ग्राफीय, मानक, संचित बिन्दु और बलात् चयन मापनी हैं।
  • मानक निर्धारण मापनी के प्रमुख रूप व्यक्ति-व्यक्ति मापनी और चित्रात्मक तुलना मापनी हैं।
  • संचित बिन्दु मापनी में विभिन्न गुणों को दिए गए अंकों का योग किया जाता है।
  • बलात् चयन मापनी में निर्धारक को दिए गए विकल्पों में से एक का अनिवार्य चयन करना होता है।
  • पक्षपात, अस्पष्ट गुण, अधिक बिन्दु, उदारता और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं।
  • विश्वसनीय परिणाम के लिए स्पष्ट मानदण्ड, उचित सातत्य और अनेक प्रशिक्षित निर्धारकों का प्रयोग करना चाहिए।
Topic 12 जाँच सूची—अर्थ, आवश्यकता, लाभ, हानियाँ एवं निर्माण

जाँच सूची—अर्थ, आवश्यकता, लाभ, हानियाँ एवं निर्माण

जाँच सूची का अर्थ

जाँच सूची एक सरल एवं सामान्य मूल्यांकन-उपकरण है, जिसका प्रयोग तथ्यों, व्यवहारों, गुणों या क्रियाओं की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति की जाँच करने के लिए किया जाता है। इसमें अध्ययन से सम्बन्धित कथनों, प्रश्नों या मदों की एक क्रमबद्ध सूची तैयार की जाती है।

मूल्यांकनकर्ता अथवा अनुसन्धानकर्ता प्रत्येक मद को देखकर यह निश्चित करता है कि सम्बन्धित गुण, व्यवहार या तथ्य व्यक्ति में उपस्थित है अथवा नहीं। सामान्यतः उत्तर को सही का चिह्न, हाँ या नहीं, सही या गलत अथवा दिए गए विकल्प का चयन करके दर्ज किया जाता है।

जाँच सूची से प्राप्त सूचनाओं को सारणीबद्ध करके उनका विश्लेषण किया जाता है। इसका प्रयोग विद्यार्थियों के व्यवहार, रुचियों, आदतों, व्यक्तिगत गुणों और विभिन्न गतिविधियों के अध्ययन में किया जा सकता है।

जाँच सूची तैयार करने की विधियाँ

1. उपयुक्त मद पर सही का चिह्न लगाना

उत्तरदाता को विभिन्न कार्यों या कथनों की सूची दी जाती है। वह अपनी पसन्द अथवा अपने ऊपर लागू होने वाले मद के सामने सही का चिह्न लगाता है।

उदाहरण—अपने पसन्दीदा कार्य का चयन कीजिए—

  • बागवानी ( )
  • टिकट एकत्र करना ( )
  • क्ले मॉडलिंग ( )
  • एक्वेरियम की देख-रेख ( )
2. हाँ अथवा नहीं में उत्तर देना

उत्तरदाता को कोई कथन दिया जाता है और उससे हाँ अथवा नहीं में उत्तर देने को कहा जाता है।

उदाहरण—क्या आप मानते हैं कि भारत 2020 तक महाशक्तिशाली राष्ट्र बन जाएगा? हाँ ( ) नहीं ( )

3. परिस्थिति के अनुसार सही अथवा गलत का चयन

उत्तरदाता को कोई सकारात्मक या व्यवहारगत कथन दिया जाता है। वह अपनी परिस्थिति और अनुभव के अनुसार उसके सही अथवा गलत होने का निर्णय करता है।

उदाहरण—अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने के लिए सही तरीका उन्हें माता-पिता के साथ साझा करना है। सही ( ) गलत ( )

4. दिए गए विकल्पों में से उपयुक्त उत्तर चुनना

किसी तथ्य अथवा व्यवहार के सम्बन्ध में कई विकल्प दिए जाते हैं। उत्तरदाता उनमें से सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन करता है।

उदाहरण—कक्षा 10A का उपलब्धि-स्तर है—

  • खराब।
  • सामान्य।
  • उत्तम।
  • अति उत्तम।

जाँच सूची की आवश्यकता

  1. सम्भावित व्यक्तिगत कारकों और व्यवहारों का निरीक्षण करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।
  2. साक्षात्कार के माध्यम से प्राप्त व्यक्तिगत सूचनाओं को व्यवस्थित करने में यह सहायक होती है।
  3. पुस्तक के अनुसार जाँच सूची को मानवीय मूल्य प्रदान करने में इसका उपयोग होता है।
  4. किसी व्यवहार या तथ्य से सम्बन्धित शंकाओं को दूर करने में यह सहायता करती है।
  5. साक्षात्कार विधि में पाई जाने वाली कुछ कमियों को दूर करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।
  6. पुस्तक के अनुसार अनुसूची में अप्रत्यक्ष, अवैयक्तिक और स्पष्ट प्रश्नों को सम्मिलित करने में यह सहायक होती है।

जाँच सूची के लाभ

  1. जाँच सूची का प्रयोग सरल होता है तथा आवश्यकता के अनुसार इसमें आसानी से परिवर्तन या संशोधन किया जा सकता है।
  2. इसके प्रयोग के लिए मूल्यांकनकर्ता को किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती।
  3. आवश्यकता पड़ने पर यह अनुसन्धानकर्ता अथवा मूल्यांकनकर्ता को सरलता से उपलब्ध हो जाती है।
  4. यह विभिन्न प्रकार के आकलन और अध्ययन की दृष्टि से लचीली होती है।
  5. इसके द्वारा अनेक व्यवहारों और गुणों का क्रमबद्ध अभिलेख तैयार किया जा सकता है।
  6. इसके परिणामों को सारणी के रूप में व्यवस्थित करके उनका विश्लेषण करना सरल होता है।

जाँच सूची की हानियाँ

  1. विस्तृत जाँच सूची तैयार करने और प्रत्येक मद की जाँच करने में अधिक समय लग सकता है।
  2. शिक्षण और मूल्यांकन की दैनिक प्रक्रिया में जाँच सूची को नियमित रूप से अपनाना शिक्षक के लिए कठिन हो सकता है।
  3. बहुत अधिक जाँच सूचियाँ होने पर उनके साथ प्राप्त सूचनाओं का अभिलेख रखना और उनका प्रबन्ध करना कठिन हो जाता है।
  4. पुस्तक के अनुसार अनेक शिक्षक इसे वैध मापन की प्रक्रिया में सम्मिलित नहीं करते।
  5. जाँच सूची विद्यार्थी के किसी व्यवहार या गुण की उपस्थिति तो बताती है, परन्तु उसके उपलब्धि-स्तर की पूर्ण जानकारी नहीं देती।
  6. केवल हाँ या नहीं जैसे उत्तरों के कारण किसी व्यवहार की तीव्रता या मात्रा का विस्तृत मापन नहीं हो पाता।

जाँच सूची तैयार करने के दिशा-निर्देश

  1. सफल शोधार्थियों और मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा प्रयुक्त जाँच सूचियों का अध्ययन एवं परीक्षण करना चाहिए।
  2. जाँच सूची तैयार करने से पहले विषय से सम्बन्धित उपलब्ध साहित्य का अध्ययन करना चाहिए।
  3. यह भी निश्चित कर लेना चाहिए कि किन परिस्थितियों और उद्देश्यों के लिए जाँच सूची का प्रयोग लाभदायक होगा।
  4. जिन तथ्यों और सूचनाओं की आवश्यकता हो, उन पर सावधानीपूर्वक विचार करके एक क्रमबद्ध सूची बनानी चाहिए।
  5. जाँच सूची के मदों का क्रम अध्ययन के उद्देश्य और अनुसन्धानकर्ता की सुविधा के अनुसार निर्धारित करना चाहिए।
  6. एक विषय या मद से सम्बन्धित सभी सूचनाओं को एक ही वर्ग में रखा जाना चाहिए।
  7. प्रत्येक सम्बन्धित वर्ग में आवश्यकता के अनुसार एक से अधिक स्पष्ट प्रश्न या कथन रखे जा सकते हैं।
  8. प्रत्येक मद की भाषा सरल, स्पष्ट, संक्षिप्त और एकार्थी होनी चाहिए।

निष्कर्ष

जाँच सूची विद्यार्थियों के व्यवहार, गुणों और गतिविधियों का क्रमबद्ध अध्ययन करने का सरल उपकरण है। इसके माध्यम से किसी विशेष व्यवहार या तथ्य की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति का पता लगाया जाता है। विश्वसनीय परिणामों के लिए जाँच सूची के उद्देश्य, मद, भाषा और क्रम को स्पष्ट तथा सुव्यवस्थित रखना आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जाँच सूची तथ्यों, गुणों और व्यवहारों की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति की जाँच करने का उपकरण है।
  • इसमें अध्ययन से सम्बन्धित प्रश्नों, कथनों या मदों की क्रमबद्ध सूची होती है।
  • उत्तर सही के चिह्न, हाँ-नहीं, सही-गलत अथवा दिए गए विकल्प के चयन द्वारा दर्ज किए जाते हैं।
  • व्यक्तिगत कारकों के निरीक्षण, शंकाओं को दूर करने और सूचनाओं को व्यवस्थित करने के लिए जाँच सूची आवश्यक है।
  • सरल प्रयोग, विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता न होना और लचीलापन इसके प्रमुख लाभ हैं।
  • अधिक समय, अभिलेख-प्रबन्धन की कठिनाई और उपलब्धि-स्तर की पूर्ण जानकारी न मिलना इसकी प्रमुख हानियाँ हैं।
  • अच्छी जाँच सूची सरल, स्पष्ट, उद्देश्यपूर्ण, क्रमबद्ध और विषयानुसार वर्गीकृत होनी चाहिए।
Topic 13 संरचनात्मक एवं योगात्मक मूल्यांकन

संरचनात्मक एवं योगात्मक मूल्यांकन

संरचनात्मक एवं योगात्मक मूल्यांकन का परिचय

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में मूल्यांकन का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को अंक देना नहीं, बल्कि उनकी प्रगति जानना, सीखने की कठिनाइयों को पहचानना और शिक्षण में आवश्यक सुधार करना भी है। मूल्यांकन के समय और उद्देश्य के आधार पर इसे मुख्यतः संरचनात्मक तथा योगात्मक मूल्यांकन में बाँटा जाता है।

पुस्तक के अनुसार माइकल स्क्रीवेन ने सन् 1967 में मूल्यांकन की भूमिका पर चर्चा करते हुए इसे दो भागों में विभाजित किया—

  1. संरचनात्मक अथवा रचनात्मक मूल्यांकन।
  2. योगात्मक अथवा आंकलित मूल्यांकन।

संरचनात्मक मूल्यांकन का अर्थ

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के दौरान विद्यार्थियों की प्रगति, कठिनाइयों और आवश्यक सुधारों की जानकारी प्राप्त करने के लिए किए जाने वाले मूल्यांकन को संरचनात्मक मूल्यांकन कहते हैं। इसे अधिगम के लिए मूल्यांकन भी कहा जाता है।

शिक्षण-विषय को छोटी-छोटी इकाइयों में बाँटकर पढ़ाने तथा प्रत्येक इकाई के बाद विद्यार्थी की उपलब्धि की जाँच करने की प्रक्रिया संरचनात्मक मूल्यांकन का रूप है। इससे शिक्षक को यह पता चलता है कि विद्यार्थी ने क्या सीखा, कहाँ कठिनाई है और आगे शिक्षण में क्या परिवर्तन करना चाहिए।

पुस्तक के अनुसार माइकल स्क्रीवेन ने सन् 1967 में संरचनात्मक एवं योगात्मक मूल्यांकन का प्रत्यय दिया। सन् 1968 में बेंजामिन ब्लूम ने अपनी पुस्तक Learning for Mastery में इसे विद्यार्थियों के अधिगम-सुधार के साधन के रूप में स्पष्ट किया।

संरचनात्मक मूल्यांकन शिक्षक द्वारा शिक्षण के दौरान किया जाता है। इसके परिणाम विद्यार्थी के अन्तिम ग्रेड या अंक का भाग नहीं होते, बल्कि इनका उपयोग अधिगम और समझ में सुधार के लिए सकारात्मक प्रतिपुष्टि देने में किया जाता है।

संरचनात्मक मूल्यांकन की प्रमुख विधियाँ
  • प्रश्नावली।
  • सर्वेक्षण।
  • स्व-मूल्यांकन एवं सहपाठी मूल्यांकन।
  • निरीक्षण।
  • परीक्षण।

संरचनात्मक मूल्यांकन की विशेषताएँ

  1. यह निरन्तर और सुधारात्मक प्रकृति का होता है।
  2. यह विद्यार्थी को प्रभावी प्रतिपुष्टि प्रदान करता है।
  3. यह विद्यार्थियों को स्वयं सीखने में सक्रिय भागीदारी का अवसर देता है।
  4. यह शिक्षक को मूल्यांकन के परिणामों के अनुसार शिक्षण में परिवर्तन करने में सहायता करता है।
  5. यह विद्यार्थी की प्रेरणा, आत्मसम्मान और अधिगम पर प्रभाव डालने वाले कारणों की पहचान करता है।
  6. यह विद्यार्थियों को स्व-मूल्यांकन और अपने कार्य में सुधार करने की आवश्यकता समझाता है।
  7. यह नए विषय की योजना बनाने के लिए विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान और अनुभव को आधार बनाता है।
  8. यह क्या और कैसे पढ़ाया जाना चाहिए, इसके निर्धारण में विभिन्न अधिगम-शैलियों को ध्यान में रखता है।
  9. यह विद्यार्थियों को कार्य के मूल्यांकन-मानदण्ड समझने के लिए प्रोत्साहित करता है।
  10. यह प्रतिपुष्टि मिलने के बाद विद्यार्थियों को अपना कार्य सुधारने का अवसर देता है।
  11. यह विद्यार्थियों को अपने सहपाठियों की सहायता करने और उनसे सहायता लेने के लिए प्रेरित करता है।

पुस्तक के अनुसार केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, 2009 ने संरचनात्मक मूल्यांकन की उपर्युक्त विशेषताओं को विशेष महत्त्व दिया है।

संरचनात्मक मूल्यांकन के उद्देश्य

  1. अध्यापकों को विद्यार्थियों की प्रगति के सम्बन्ध में प्रतिपुष्टि प्रदान करना।
  2. विद्यार्थियों को अपने ज्ञानात्मक स्तर में सुधार करने के उपाय बताना।
  3. विद्यार्थियों को उच्च स्तर का अधिगम प्राप्त करने में सहायता देना।
  4. विद्यार्थियों में सकारात्मक विश्वास और आत्मसम्मान विकसित करना।
  5. अध्यापक को ऐसी सूचनाएँ देना जिनके आधार पर शिक्षण में आवश्यक सुधार किया जा सके।

संरचनात्मक मूल्यांकन की आवश्यकता

  1. यह विद्यार्थियों की उपलब्धि में वृद्धि करने तथा कक्षा की कमियों को दूर करने में सहायक होता है।
  2. यह शिक्षकों को अधिक व्यावसायिक सन्तुष्टि देता है और विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रोत्साहित करता है।
  3. यह शिक्षक और विद्यार्थी के बीच शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक पारस्परिक और सहयोगपूर्ण बनाता है।
  4. इससे विद्यार्थी की प्रगति का निरन्तर मापन होता है, जिससे उसकी प्रेरणा बढ़ती है।
  5. यह शिक्षक और विद्यार्थी के बीच अवरोधों को कम करके निरन्तर संवाद का अवसर देता है।
  6. यह बताता है कि विद्यार्थी क्या सीख रहा है और उसमें सुधार किस प्रकार किया जा सकता है।

संरचनात्मक मूल्यांकन के प्रयोग-क्षेत्र

  • गणित शिक्षण।
  • द्वितीय अथवा विदेशी भाषा का शिक्षण।
  • प्रारम्भिक शिक्षा।
  • विज्ञान की कक्षाएँ।
  • क्रियात्मक कार्य।
  • कम्प्यूटर द्वारा दी जाने वाली शिक्षा।

संरचनात्मक मूल्यांकन के लाभ

अध्यापकों के लिए
  1. अध्यापक यह जान सकता है कि विद्यार्थी ने कितना ज्ञान अर्जित किया है।
  2. अध्यापक यह निश्चित कर सकता है कि विद्यार्थियों को समझाने के लिए शिक्षण में क्या परिवर्तन आवश्यक है।
  3. अध्यापक विद्यार्थियों के लिए सामूहिक और व्यक्तिगत दोनों प्रकार के परीक्षण बना सकता है।
  4. अध्यापक विद्यार्थियों को उनकी प्रगति के विषय में जानकारी देकर लक्ष्य-प्राप्ति में सहायता कर सकता है।
विद्यार्थियों के लिए
  1. विद्यार्थी अधिक सीखने के लिए प्रेरित होते हैं।
  2. वे स्व-अधिगम के लिए तैयार होते हैं।
  3. वे अध्यापक के साथ मूल्यांकन की प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
  4. वे स्व-मूल्यांकन, स्व-आकलन और लक्ष्य-निर्धारण जैसे जीवनोपयोगी कौशल सीखते हैं।

संरचनात्मक मूल्यांकन के दोष

  1. इसके द्वारा व्यक्तित्व के सभी पक्षों का पूर्ण मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
  2. विद्यार्थी की विचार-शक्ति का मूल्यांकन करना सरल नहीं होता।
  3. केवल प्रारम्भिक स्तर के मूल्यांकन से विद्यार्थी के भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।
  4. इसका क्षेत्र अपेक्षाकृत संकुचित होता है।
  5. इसके आधार पर विद्यार्थी के विषय में हमेशा ठोस और अन्तिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

योगात्मक मूल्यांकन का अर्थ

किसी पाठ्यक्रम, इकाई, सेमेस्टर या शैक्षिक सत्र के अन्त में विद्यार्थी की समग्र उपलब्धि का निर्णय करने के लिए किए जाने वाले मूल्यांकन को योगात्मक मूल्यांकन कहते हैं। इसे अधिगम का मूल्यांकन भी कहा जाता है।

पुस्तक के अनुसार माइकल स्क्रीवेन ने सन् 1967 में Summative अर्थात योगात्मक या आंकलित मूल्यांकन का प्रत्यय दिया। Summative शब्द का सम्बन्ध Summation से है, जिसका अर्थ योग होता है।

इसमें विभिन्न इकाइयों के अध्ययन के बाद अन्त में परीक्षा आयोजित की जाती है। प्राप्त सूचनाओं का संकलन और विश्लेषण करके विद्यार्थी की सफलता, उपलब्धि और शिक्षण-उद्देश्यों की प्राप्ति का निर्णय किया जाता है।

योगात्मक मूल्यांकन का उद्देश्य पहले से निर्धारित शिक्षा-नीति, पाठ्यवस्तु, शिक्षण-विधि, शिक्षण-सामग्री अथवा मूल्यांकन-विधि की उपयोगिता की जाँच करना भी है। इसके आधार पर यह निर्णय लिया जाता है कि सम्बन्धित व्यवस्था को यथावत रखा जाए अथवा उसमें परिवर्तन किया जाए।

प्रो. एस. के. दुबे के अनुसार, योगात्मक मूल्यांकन एक व्यापक प्रक्रिया है जो विद्यार्थियों के शैक्षिक, व्यक्तिगत एवं व्यावहारिक पक्षों का मूल्यांकन करके उनके विकास-स्तर को स्पष्ट करती है।

योगात्मक मूल्यांकन की प्रमुख विधियाँ
  • अध्याय अथवा इकाई परीक्षण।
  • प्रोजेक्ट।
  • पोर्टफोलियो।
  • सेमेस्टर परीक्षा।

योगात्मक मूल्यांकन के गुण

  1. यह व्यापक मूल्यांकन होता है।
  2. इसमें विद्यार्थी के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं।
  3. इसके द्वारा पहले से निर्धारित शिक्षा-नीति और शिक्षण-विधि की उपयोगिता का निर्णय किया जाता है।
  4. इसमें साक्षात्कार, प्रश्नावली और श्रेणी-मापनी जैसे विशेषज्ञ उपकरणों का प्रयोग किया जा सकता है।
  5. सूचना-संग्रह के लिए वैध और विश्वसनीय साधनों का प्रयोग किया जाता है।
  6. इसके द्वारा विद्यार्थी के ज्ञान और उपलब्धि-स्तर का मूल्यांकन किया जाता है।

योगात्मक मूल्यांकन के दोष

  1. सम्पूर्ण पक्षों के मूल्यांकन के कारण सूचनाओं का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत हो जाता है और अधिक समय लगता है।
  2. आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करने में अधिक धन व्यय हो सकता है।
  3. प्राथमिक स्तर पर यह मूल्यांकन अपेक्षाकृत कम प्रभावशाली माना जाता है।
  4. यह पाठ्यक्रम या सत्र के अन्त में किया जाता है, इसलिए शिक्षण के दौरान तत्काल सुधार का अवसर सीमित रहता है।
  5. यह विद्यार्थी के अन्तिम परिणाम पर अधिक बल देता है और सीखने की प्रक्रिया की निरन्तर कठिनाइयों को समय रहते स्पष्ट नहीं कर पाता।

संरचनात्मक एवं योगात्मक मूल्यांकन में अन्तर

संरचनात्मक मूल्यांकन योगात्मक मूल्यांकन
इसे शिक्षण-नीति या शिक्षण-विधि को लागू करने से पहले अथवा शिक्षण के प्रारम्भिक और मध्य चरणों में किया जाता है। इसे अन्तिम निर्णय लेने के लिए पाठ्यक्रम, इकाई या शिक्षण-सत्र की समाप्ति पर किया जाता है।
इससे विद्यार्थी के वर्तमान ज्ञान-स्तर, प्रगति और कठिनाइयों का पता चलता है। इससे विद्यार्थी और अध्यापक को पाठ्यवस्तु से सम्बन्धित अन्तिम उपलब्धि की जानकारी मिलती है।
इसके परिणामों के आधार पर विद्यार्थी को आगे के लिए निर्देश और सुधार के अवसर दिए जाते हैं। इसके परिणाम के रूप में अंक, ग्रेड या श्रेणी प्रदान की जाती है।
प्रश्न पूछना, लघु परीक्षण, कक्षा-कार्य और लेखन-असाइनमेंट इसके उदाहरण हैं। अन्तिम प्रोजेक्ट, मध्यावधि परीक्षा, सेमेस्टर परीक्षा और वार्षिक परीक्षा इसके उदाहरण हैं।
यह शिक्षण की प्रक्रिया के दौरान होता है और तत्काल प्रतिपुष्टि प्रदान करता है। यह शिक्षण की समाप्ति पर होता है और दीर्घकालीन निर्णय लेने में सहायता करता है।
इसका मुख्य उद्देश्य अधिगम में सुधार करना है। इसका मुख्य उद्देश्य अधिगम की अन्तिम उपलब्धि का निर्णय करना है।

निष्कर्ष

संरचनात्मक और योगात्मक मूल्यांकन परस्पर विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं। संरचनात्मक मूल्यांकन शिक्षण के दौरान विद्यार्थी की कमियों को पहचानकर तत्काल सुधार में सहायता करता है, जबकि योगात्मक मूल्यांकन पाठ्यक्रम या सत्र के अन्त में उसकी समग्र उपलब्धि का निर्णय करता है। प्रभावी मूल्यांकन के लिए दोनों का संतुलित प्रयोग आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • माइकल स्क्रीवेन ने सन् 1967 में संरचनात्मक और योगात्मक मूल्यांकन के प्रत्यय दिए।
  • संरचनात्मक मूल्यांकन शिक्षण के दौरान किया जाता है और इसका उद्देश्य अधिगम में सुधार करना है।
  • इससे विद्यार्थी की प्रगति, कठिनाइयों और सुधार की आवश्यकता का पता चलता है।
  • योगात्मक मूल्यांकन पाठ्यक्रम, सेमेस्टर या सत्र के अन्त में किया जाता है।
  • योगात्मक मूल्यांकन के आधार पर विद्यार्थी को अंक, ग्रेड या श्रेणी प्रदान की जाती है।
  • प्रश्नावली, निरीक्षण और स्व-मूल्यांकन संरचनात्मक मूल्यांकन की प्रमुख विधियाँ हैं।
  • इकाई परीक्षण, प्रोजेक्ट, पोर्टफोलियो और सेमेस्टर परीक्षा योगात्मक मूल्यांकन की प्रमुख विधियाँ हैं।
  • संरचनात्मक मूल्यांकन तत्काल सुधार में और योगात्मक मूल्यांकन अन्तिम निर्णय में सहायक होता है।
  • विद्यार्थी के समग्र मूल्यांकन के लिए दोनों प्रकार के मूल्यांकन का संतुलित प्रयोग आवश्यक है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

परिमाणात्मक मूल्यांकन के अन्तर्गत क्या आता है?

व्याख्या: परिमाणात्मक मूल्यांकन के अन्तर्गत मौखिक, लिखित तथा प्रयोगात्मक तीनों प्रकार की परीक्षाएँ आती हैं।
Q 2

प्रायोगिक मूल्यांकन को कितने भागों में बाँटा जा सकता है?

व्याख्या: प्रायोगिक मूल्यांकन को आन्तरिक प्रयोग और बाह्य प्रयोग—दो भागों में बाँटा जाता है।
Q 3

गुणात्मक मूल्यांकन के अन्तर्गत क्या शामिल है?

व्याख्या: गुणात्मक मूल्यांकन में प्रश्नावली, जाँच सूची, साक्षात्कार, निरीक्षण तथा निर्धारण मापनी जैसी प्रविधियाँ शामिल होती हैं।
Q 4

उत्तरदाताओं की संख्या के आधार पर साक्षात्कार कितने प्रकार का होता है?

व्याख्या: उत्तरदाताओं की संख्या के आधार पर साक्षात्कार दो प्रकार का होता है—व्यक्तिगत और सामूहिक साक्षात्कार।
Q 5

“साक्षात्कार आमने-सामने होने वाला वह वार्तालाप है जिसका उद्देश्य तथ्यपूर्ण सूचना प्राप्त करना होता है।” यह कथन किसका है?

व्याख्या: साक्षात्कार को तथ्यपूर्ण सूचना प्राप्त करने वाला आमने-सामने का वार्तालाप वैपलिन ने कहा है।
Q 6

उद्देश्यों के आधार पर साक्षात्कार कितने प्रकार का होता है?

व्याख्या: उद्देश्य के आधार पर साक्षात्कार निदानात्मक, उपचारात्मक और अनुसन्धान साक्षात्कार—तीन प्रकार का होता है।
Q 7

आंकलित मूल्यांकन का दूसरा नाम क्या है?

व्याख्या: आंकलित मूल्यांकन को योगात्मक मूल्यांकन भी कहा जाता है। इसमें अन्तिम उपलब्धि का आकलन किया जाता है।
Q 8

रचनात्मक मूल्यांकन को अन्य किस नाम से जाना जाता है?

व्याख्या: रचनात्मक मूल्यांकन का दूसरा नाम संरचनात्मक मूल्यांकन है। इसका प्रयोग शिक्षण के दौरान सुधार के लिए किया जाता है।
Q 9

‘बूझो कौन’ प्रविधि का विकास किसने किया था?

व्याख्या: पुस्तक के अनुसार ‘बूझो कौन’ प्रविधि का विकास हार्टशोर्न एवं मे ने बच्चों के अध्ययन के लिए किया था।
Q 10

निर्धारण मापनी मुख्यतः कितने प्रकार की होती है?

व्याख्या: निर्धारण मापनी के पाँच प्रमुख प्रकार हैं—आंकिक, ग्राफीय, मानक, संचित बिन्दु और बलात् चयन मापनी।
Q 11

“निर्धारण मापनी किसी वस्तु के सीमित पक्षों अथवा व्यक्ति के गुणों का गुणात्मक विवरण प्रस्तुत करती है।” यह कथन किसका है?

व्याख्या: निर्धारण मापनी की यह परिभाषा बेस्ट ने दी है।
Q 12

“मूल रूप में प्रश्नावली उद्दीपकों का एक समूह है, जिसका प्रयोग शिक्षित व्यक्तियों पर उनके शाब्दिक व्यवहार के अध्ययन के लिए किया जाता है।” यह कथन किसका है?

व्याख्या: प्रश्नावली को उद्दीपकों का समूह मानने वाली यह परिभाषा लुण्डबर्ग ने दी है।
Q 13

“निरीक्षण विधि उस मार्ग को दर्शाती है, जिस पर चलकर सत्य की खोज की जाती है।” यह कथन किसका है?

व्याख्या: निरीक्षण को सत्य की खोज का मार्ग चार्ल्स गिडे ने कहा है।
Q 14

संरचनात्मक मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

व्याख्या: संरचनात्मक मूल्यांकन शिक्षण के दौरान किया जाता है और इसका मुख्य उद्देश्य प्रतिपुष्टि देकर विद्यार्थी के अधिगम में सुधार करना है।
Q 15

योगात्मक मूल्यांकन सामान्यतः कब किया जाता है?

व्याख्या: योगात्मक मूल्यांकन पाठ्यक्रम, इकाई, सेमेस्टर या शैक्षिक सत्र के अन्त में विद्यार्थी की समग्र उपलब्धि जानने के लिए किया जाता है।

पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 3 के विषय शैक्षिक मूल्यांकन, क्रियात्मक शोध एवं नवाचार के अध्याय मूल्यांकन के विविध प्रकार से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

मौखिक परीक्षा के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिए।

Q 2

मौखिक परीक्षाओं के गुण एवं दोषों पर प्रकाश डालिए।

Q 3

निबन्धात्मक प्रश्नों की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।

Q 4

निबन्धात्मक प्रश्नों के गुण लिखिए।

Q 5

निबन्धात्मक परीक्षा के दोष बताइए।

Q 6

निबन्धात्मक परीक्षा में सुधार हेतु आप क्या सुझाव देंगे?

Q 7

लघु उत्तरीय प्रश्नों की विशेषताएँ लिखिए।

Q 8

लघु उत्तरीय प्रश्नों की सीमाएँ लिखिए।

Q 9

निबन्धात्मक एवं वस्तुनिष्ठ परीक्षणों का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।

Q 10

वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के गुण एवं दोषों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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