शैक्षिक मापन की संकल्पना, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, अर्थ एवं परिभाषाएँ
शैक्षिक मापन की संकल्पना
आधुनिक युग में जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में मापन का प्रयोग किया जाता है। वैज्ञानिक प्रगति का आधार भी मापन है। किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना अथवा गुण की मात्रा का निश्चित मानकों के आधार पर पता लगाना मापन कहलाता है।
भार, दूरी, तापमान और आयतन जैसी भौतिक विशेषताओं को किलोग्राम, मीटर, थर्मामीटर और लीटर जैसे निश्चित मानकों से मापा जाता है। शिक्षा, मनोविज्ञान और सामाजिक विज्ञान में बुद्धि, उपलब्धि, योग्यता, रुचि, अभिवृत्ति और व्यक्तित्व जैसी विशेषताओं का प्रत्यक्ष मापन सम्भव नहीं होता। इसलिए इनका मापन परीक्षणों, प्रश्नावलियों और अन्य उपयुक्त साधनों द्वारा किया जाता है।
रॉस के अनुसार— यदि मापन के समस्त यन्त्र और साधन समाप्त कर दिए जाएँ, तो आधुनिक सभ्यता बालू की दीवार के समान ढह जाएगी।
शिक्षा में मापन और मूल्यांकन एक ही प्रक्रिया के दो सम्बन्धित पक्ष हैं। मापन द्वारा विद्यार्थी की उपलब्धियों और योग्यताओं को संख्यात्मक रूप दिया जाता है, जबकि मूल्यांकन द्वारा उन परिणामों के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
शैक्षिक मापन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मापन का प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है, परन्तु एक स्वतन्त्र वैज्ञानिक क्षेत्र के रूप में इसका व्यवस्थित विकास लगभग पिछले सौ वर्षों में हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी में प्रयोगात्मक मनोविज्ञान, मानसिक क्रियाओं और वैयक्तिक भिन्नताओं के अध्ययन ने शैक्षिक एवं मनोवैज्ञानिक मापन की नींव रखी।
शैक्षिक एवं मनोवैज्ञानिक मापन के विकास की प्रमुख घटनाएँ
- फ्रांस में टेसिवियुरेल तथा सेगुइन ने मानसिक क्रियाओं और असामान्य व्यक्तियों के अध्ययन से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
- उनके कार्यों से प्रभावित होकर वेबर तथा फेकनर ने सन् 1879 में मनोदैहिक कार्यक्रम आरम्भ किया और प्रयोगात्मक मनोविज्ञान पर विशेष बल दिया।
- वुण्ट ने सन् 1880 में लिपजिग में मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला स्थापित की।
- फ्रांसिस गाल्टन ने सन् 1884 में वैयक्तिक भिन्नताओं का अध्ययन किया और मापन को उच्च स्तर तक पहुँचाया।
- बिने और साइमन ने सन् 1905 में बुद्धि-मापन के लिए परीक्षण का निर्माण किया।
- स्टर्न ने सन् 1912 में मानसिक आयु और वास्तविक आयु के सम्बन्ध को व्यक्त करने वाला सूत्र प्रस्तुत किया। बाद में टर्मन ने बुद्धिलब्धि की संज्ञा दी।
- बच्चों की मानसिक योग्यता मापने के लिए डॉ. चिले ने कुछ प्रभावीकृत परीक्षणों का निर्माण किया।
- कैटेल ने मापन के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया तथा मानसिक आयु प्रत्यय का प्रयोग किया।
- कैटेल और गाल्टन के कार्यों से प्रभावित होकर जेस्ट्रो, एहन तथा एबिंगहास जैसे मनोवैज्ञानिकों ने मापन के क्षेत्र में योगदान दिया।
- स्टोन ने गणितीय परीक्षण, बॉकिंघम ने शब्द-विन्यास परीक्षण और थॉर्नडाइक ने हस्तलेख मापनी का निर्माण किया।
- कार्नेगी इंस्टीट्यूट ने रुचि-मापन तथा मुनस्टरबर्ग ने अभिक्षमता-मापन के क्षेत्र में कार्य किया।
भारत में शैक्षिक मापन का विकास
- भारत में बुद्धि-परीक्षणों के विकास का श्रेय लाहौर के डॉ. सी. एच. राइस को दिया जाता है।
- सन् 1922 में उन्होंने बिने के बुद्धि-परीक्षण पर आधारित हिन्दुस्तानी बिने परफॉर्मेंस पॉइंट प्रकाशित किया।
- सन् 1927 में इलाहाबाद के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज के जे. मोरे ने भारतीय वातावरण के अनुकूल शाब्दिक समूह-परीक्षण तैयार किए।
- भारतीय बुद्धि-परीक्षण निर्माताओं में लज्जा शंकर झा, आर. आर. कुमारिया, एल. के. शाह, सी. टी. फिलिप्स, सोहनलाल, डॉ. एस. जलोटा, जोशी एवं त्रिपाठी के नाम उल्लेखनीय हैं।
शैक्षिक मापन का अर्थ
शिक्षा में मापन का अर्थ विद्यार्थी में निहित योग्यताओं, क्षमताओं, गुणों और उपलब्धियों को निश्चित नियमों के अनुसार मात्रात्मक रूप में व्यक्त करना है। इसके लिए परीक्षा, परीक्षण, अभ्यास-कार्य और अन्य मापन-साधनों का प्रयोग किया जाता है।
शैक्षिक मापन से यह पता चलता है कि विद्यार्थी में कोई योग्यता या विशेषता कितनी मात्रा में उपस्थित है। मापन से प्राप्त परिणामों द्वारा विद्यार्थियों की कमजोरियों और कठिनाइयों की पहचान की जाती है तथा आगे मूल्यांकन और सुधार किया जाता है।
गुणात्मक एवं मात्रात्मक मापन
- गुणात्मक मापन— जब किसी व्यक्ति या वस्तु के गुण का वर्णन बिना संख्यात्मक मात्रा बताए किया जाता है, तो उसे गुणात्मक मापन कहते हैं। जैसे किसी व्यक्ति को पुरुष या महिला कहना।
- मात्रात्मक मापन— जब किसी गुण या विशेषता की मात्रा को संख्यात्मक रूप में व्यक्त किया जाता है, तो उसे मात्रात्मक मापन कहते हैं। जैसे किसी व्यक्ति की लम्बाई 5 फुट 5 इंच होना।
थॉर्नडाइक के अनुसार प्रत्येक वस्तु, जिसका अस्तित्व है, किसी-न-किसी मात्रा में विद्यमान होती है और जिसकी मात्रा होती है उसका मापन सम्भव है। मैककाल ने भी माना कि यदि कोई वस्तु किसी परिमाण में अस्तित्व रखती है, तो उसका मापन किया जा सकता है।
शैक्षिक मापन की प्रमुख परिभाषाएँ
- एस. एस. स्टीवेन्स के अनुसार— निश्चित एवं स्वीकृत नियमों के अनुसार वस्तुओं को अंक प्रदान करने की प्रक्रिया मापन है।
- क्लास मेयर एवं गुडविन के अनुसार— शैक्षिक मापन विद्यार्थी के अधिगम, शिक्षण की प्रभावशीलता अथवा किसी अन्य शैक्षिक पक्ष की मात्रा, विस्तार और कोटि के निर्धारण से सम्बन्धित है।
- गैरिसन के अनुसार— मापन वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा शिक्षक विद्यार्थी की किसी विशेषता को क्रम अथवा संख्यात्मक मूल्य प्रदान करता है।
- जी. सी. हेल्मस्टेडर के अनुसार— मापन किसी व्यक्ति या वस्तु में निहित विशेषता के विस्तार का संख्यात्मक वर्णन प्राप्त करने की प्रक्रिया है।
- ब्रेडफील्ड तथा मोरडॉक के अनुसार— मापन की प्रक्रिया में किसी घटना या तथ्य के विभिन्न आयामों के लिए प्रतीक निश्चित किए जाते हैं, जिससे उसके सम्बन्ध में यथार्थ निर्णय लिया जा सके।
- जे. सी. नन के अनुसार— वस्तुओं को संख्या प्रदान करने के उन नियमों को मापन कहते हैं, जिनसे उनकी विशेषताओं का परिमाण निर्धारित होता है।
परिभाषाओं से स्पष्ट होने वाले प्रमुख तथ्य
- मापन में वस्तुओं, घटनाओं और तथ्यों को निश्चित नियमों के अनुसार अंक प्रदान किए जाते हैं।
- मापन में वस्तु का सम्पूर्ण मापन नहीं, बल्कि उसके किसी गुण या विशेषता का मापन किया जाता है।
- मापन के परिणाम को परिमाणात्मक अथवा संख्यात्मक रूप में व्यक्त किया जाता है।
- किसी गुण या विशेषता को निश्चित नियमों के अनुसार संख्यात्मक रूप देना मापन कहलाता है।
- शैक्षिक मापन विद्यार्थी की योग्यता, क्षमता, उपलब्धि और अन्य शैक्षिक विशेषताओं का मात्रात्मक वर्णन करता है।
- वुण्ट ने सन् 1880 में लिपजिग में मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला स्थापित की।
- फ्रांसिस गाल्टन ने वैयक्तिक भिन्नताओं तथा बिने-साइमन ने बुद्धि-मापन पर कार्य किया।
- स्टर्न ने मानसिक आयु और वास्तविक आयु का सम्बन्ध स्थापित करने वाला सूत्र प्रस्तुत किया तथा टर्मन ने बुद्धिलब्धि की संज्ञा दी।
- भारत में बुद्धि-परीक्षणों के विकास का श्रेय डॉ. सी. एच. राइस को दिया जाता है।
- एस. एस. स्टीवेन्स ने मापन को स्वीकृत नियमों के अनुसार वस्तुओं को अंक प्रदान करने की प्रक्रिया कहा।
- मापन वस्तु का नहीं, बल्कि उसमें उपस्थित किसी विशेष गुण या विशेषता का किया जाता है।
- मापन गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों प्रकार का हो सकता है।
शैक्षिक मापन की विशेषताएँ एवं उद्देश्य
शैक्षिक मापन की विशेषताएँ
- यह मूल्यांकन करने में सहायता प्रदान करता है।
- यह विद्यार्थी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के स्थान पर किसी निश्चित गुण या योग्यता का आंशिक वर्णन करता है।
- बुद्धि, योग्यता और उपलब्धि जैसी विशेषताओं का मापन परीक्षणों एवं अन्य साधनों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।
- किसी एक परीक्षा द्वारा विद्यार्थी की सम्पूर्ण उपलब्धि या क्षमता का मापन सम्भव नहीं है।
- शैक्षिक मापन में निरपेक्ष शून्य-बिन्दु नहीं होता। शून्य अंक का अर्थ ज्ञान का पूर्ण अभाव नहीं है।
- मापन के परिणाम अंक, संख्या, श्रेणी या संकेत के रूप में व्यक्त किए जाते हैं।
- यह शैक्षिक अनुसंधान, तुलना और शिक्षण-सुधार का आधार प्रदान करता है।
- मूल्यांकन की तुलना में मापन अपेक्षाकृत सरल और कम खर्चीला होता है।
शैक्षिक मापन के उद्देश्य
- शिक्षण और अनुदेशन की प्रभावशीलता का पता लगाना।
- विद्यार्थियों की उपलब्धि, योग्यता और प्रगति की जानकारी प्राप्त करना।
- विद्यार्थियों के विकास में बाधक कठिनाइयों की पहचान करना।
- वैयक्तिक आवश्यकताओं के अनुरूप शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
- उपयुक्त शिक्षण-विधियों और शिक्षण-योजनाओं का विकास करना।
- विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में सहायता करना।
- अधिगम को सरल, प्रभावी और आनन्ददायक बनाना।
- योग्यता के आधार पर विद्यार्थियों का वर्गीकरण एवं मार्गदर्शन करना।
- शैक्षिक मापन किसी निश्चित गुण या योग्यता का संख्यात्मक एवं आंशिक वर्णन करता है।
- इसमें निरपेक्ष शून्य-बिन्दु नहीं होता और सम्पूर्ण क्षमता का मापन सम्भव नहीं है।
- मापन का उद्देश्य प्रगति जानना, कठिनाइयाँ पहचानना तथा शिक्षण में सुधार करना है।
- यह विद्यार्थियों के वर्गीकरण, मार्गदर्शन और वैयक्तिक शिक्षा में सहायक है।
शैक्षिक मापन के स्तर एवं चर
शैक्षिक मापन के स्तर
एस. एस. स्टीवेन्स ने मापन की यथार्थता के आधार पर इसके चार स्तर बताए हैं—
1. नामित स्तर
इसमें व्यक्तियों या वस्तुओं को किसी गुण के आधार पर केवल अलग-अलग वर्गों में रखा जाता है। इन वर्गों में कोई क्रम या मात्रात्मक सम्बन्ध नहीं होता। जैसे—विद्यार्थियों को कला, विज्ञान एवं वाणिज्य वर्ग में बाँटना।
2. क्रमित स्तर
इसमें व्यक्तियों या वस्तुओं को उनकी योग्यता अथवा गुण की मात्रा के अनुसार एक निश्चित क्रम दिया जाता है। जैसे—प्रथम, द्वितीय, तृतीय अथवा श्रेष्ठ, औसत और कमजोर। इसमें क्रम ज्ञात होता है, परन्तु दो क्रमों के बीच का अन्तर निश्चित नहीं होता।
3. अन्तरित स्तर
इसमें क्रम के साथ दो क्रमागत मानों के बीच समान अन्तर होता है, परन्तु वास्तविक शून्य नहीं होता। इसमें जोड़ और घटाव सम्भव है, लेकिन गुणा और भाग का प्रयोग उचित नहीं होता। जैसे—परीक्षा प्राप्तांक, बुद्धिलब्धि और तापमान।
4. आनुपातिक स्तर
यह मापन का सर्वाधिक परिशुद्ध स्तर है। इसमें क्रम, समान अन्तर और वास्तविक शून्य तीनों होते हैं। इसलिए जोड़, घटाव, गुणा, भाग तथा अनुपात की गणना की जा सकती है। जैसे—लम्बाई, भार, दूरी और आयु।
शैक्षिक मापन के चर
किसी समूह के सदस्यों में अलग-अलग रूप या मात्रा में पाई जाने वाली विशेषता को चर कहते हैं। जैसे—बुद्धि, उपलब्धि, आयु, लम्बाई, भार और आर्थिक स्थिति।
1. गुणात्मक चर
ये किसी गुण के विभिन्न प्रकारों या वर्गों को व्यक्त करते हैं। जैसे—लिंग, धर्म, निवास-स्थान तथा अध्ययन-विषय।
2. मात्रात्मक चर
ये किसी विशेषता की मात्रा को संख्याओं में व्यक्त करते हैं। जैसे—प्राप्तांक, आयु, भार, लम्बाई और विद्यार्थियों की संख्या।
सतत चर
सतत चर दो मानों के बीच कोई भी मूल्य ग्रहण कर सकता है। जैसे—किसी व्यक्ति का भार 60.5 किलोग्राम या लम्बाई 165.7 सेंटीमीटर हो सकती है।
असतत चर
असतत चर केवल निश्चित पूर्ण संख्यात्मक मान ग्रहण करता है। जैसे—परिवार में बच्चों की संख्या, कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या और पुस्तक में पृष्ठों की संख्या।
- स्टीवेन्स ने मापन के चार स्तर—नामित, क्रमित, अन्तरित और आनुपातिक—बताए।
- नामित स्तर में केवल वर्गीकरण तथा क्रमित स्तर में वर्गीकरण के साथ क्रम होता है।
- अन्तरित स्तर में समान अन्तर होता है, लेकिन वास्तविक शून्य नहीं होता।
- आनुपातिक स्तर में वास्तविक शून्य होता है तथा सभी मूल गणितीय क्रियाएँ सम्भव हैं।
- चर मुख्यतः गुणात्मक और मात्रात्मक होते हैं।
- मात्रात्मक चर सतत तथा असतत दो प्रकार के होते हैं।
शैक्षिक मापन के आवश्यक तत्त्व, महत्त्व एवं प्रकार
शैक्षिक मापन के आवश्यक तत्त्व
किसी शैक्षिक गुण का मापन करने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस गुण को मापना है, वह किन व्यवहारों से प्रकट होता है और प्राप्त परिणाम को किस रूप में व्यक्त किया जाएगा। शैक्षिक मापन के तीन आवश्यक तत्त्व हैं—
1. गुण की व्याख्या
जिस गुण का मापन करना है, उसका अर्थ स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाता है। एक ही गुण की अलग-अलग व्याख्याएँ हो सकती हैं। जैसे बुद्धि को सीखने, तर्क करने, समस्या हल करने अथवा परिस्थितियों से समायोजन करने की योग्यता माना जा सकता है।
2. गुण की क्रियात्मक परिभाषा
गुण को ऐसे प्रत्यक्ष व्यवहारों या क्रियाओं में परिभाषित किया जाता है, जिन्हें देखा और मापा जा सके। जैसे हिन्दी भाषा की उपलब्धि को शब्द पहचानने, शुद्ध लिखने, वाक्य बनाने और गद्यांश समझने की योग्यता के आधार पर मापा जा सकता है।
3. गुण को इकाइयों में व्यक्त करना
मापन के परिणाम को अंक, प्राप्तांक, श्रेणी, प्रतिशत अथवा अन्य निश्चित इकाई में व्यक्त किया जाता है। जैसे किसी उपलब्धि-परीक्षण में विद्यार्थी द्वारा 50 में से 38 अंक प्राप्त करना।
शैक्षिक मापन का महत्त्व
- विद्यार्थियों की बुद्धि, योग्यता, उपलब्धि, रुचि, अभिवृत्ति और कौशल की जानकारी प्राप्त होती है।
- विद्यार्थी अपनी प्रगति और कमजोरियों को पहचानकर आत्म-मूल्यांकन कर सकता है।
- शिक्षक को शिक्षण की प्रभावशीलता और अपनी शिक्षण-पद्धति की कमियों का पता चलता है।
- पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधियों और शैक्षिक कार्यक्रमों में आवश्यक सुधार किया जा सकता है।
- विद्यार्थियों के चयन, वर्गीकरण, पदोन्नति और समूह-निर्माण में सहायता मिलती है।
- सीखने में आने वाली कठिनाइयों की पहचान करके उपचारात्मक शिक्षण दिया जा सकता है।
- विद्यार्थियों को शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन और परामर्श देने में सहायता मिलती है।
- शैक्षिक योजनाओं और कार्यक्रमों की सफलता तथा उपयोगिता का पता लगाया जा सकता है।
शैक्षिक मापन के प्रकार
1. मानसिक या सामान्यीकृत मापन
इसमें बुद्धि, उपलब्धि, अभिक्षमता, रुचि, अभिवृत्ति और व्यक्तित्व जैसे मानसिक गुणों का परीक्षणों के माध्यम से अप्रत्यक्ष मापन किया जाता है। इसमें कोई निश्चित भौतिक इकाई अथवा वास्तविक शून्य नहीं होता। परिणामों की व्याख्या समूह, औसत अथवा मानकों के सन्दर्भ में की जाती है।
उदाहरण के लिए, किसी विद्यार्थी के गणित में 30 अंक प्राप्त करने का अर्थ तभी स्पष्ट होगा, जब प्रश्नपत्र के पूर्णांक, कठिनाई-स्तर और अन्य विद्यार्थियों के प्राप्तांकों की जानकारी हो। शून्य अंक का अर्थ यह नहीं है कि विद्यार्थी में गणित का ज्ञान पूर्णतः नहीं है।
2. भौतिक या निरपेक्ष मापन
इसमें लम्बाई, भार, दूरी और ऊँचाई जैसे भौतिक गुणों का निश्चित तथा सर्वमान्य इकाइयों द्वारा प्रत्यक्ष मापन किया जाता है। इसमें वास्तविक शून्य पाया जाता है और परिणामों की तुलना अनुपात के रूप में की जा सकती है।
उदाहरण के लिए, 60 किलोग्राम भार को 30 किलोग्राम भार का दोगुना कहा जा सकता है। इसी प्रकार शून्य मीटर दूरी का अर्थ दूरी का वास्तविक अभाव है।
3. इप्सेटिव मापन
इसमें व्यक्ति को दिए गए कथनों, मूल्यों या विकल्पों को अपनी वरीयता के अनुसार क्रम देना होता है। एक विकल्प को दिया गया स्थान अन्य विकल्पों के स्थान को प्रभावित करता है, इसलिए इसे बाध्य चयन मापन भी कहा जाता है। इप्सेटिव शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम रेमण्ड कैटेल ने किया था।
उदाहरण के लिए, किसी विद्यार्थी को सत्य, ईमानदारी, मैत्रीभाव और सहयोग को 1 से 4 तक वरीयता-क्रम देने के लिए कहा जाए। यदि वह सत्य को प्रथम स्थान देता है, तो वही स्थान किसी दूसरे मूल्य को नहीं दिया जा सकता।
- शैक्षिक मापन के आवश्यक तत्त्व—गुण की व्याख्या, क्रियात्मक परिभाषा तथा परिणाम को इकाइयों में व्यक्त करना हैं।
- शैक्षिक मापन विद्यार्थियों की क्षमताओं, उपलब्धियों और कठिनाइयों की पहचान में सहायक होता है।
- यह शिक्षण-सुधार, चयन, वर्गीकरण, निर्देशन और उपचारात्मक शिक्षण का आधार प्रदान करता है।
- मानसिक मापन अप्रत्यक्ष और सापेक्ष होता है, जबकि भौतिक मापन प्रत्यक्ष तथा निरपेक्ष होता है।
- इप्सेटिव मापन वरीयता-क्रम एवं बाध्य चयन पर आधारित होता है।
शैक्षिक मापन के कार्य एवं सीमाएँ
शैक्षिक मापन के कार्य
1. भविष्यवाणी करना
विद्यार्थी की वर्तमान योग्यता, रुचि और उपलब्धि के आधार पर उसके भावी शैक्षिक विकास और सम्भावित सफलता का अनुमान लगाया जाता है। जैसे—प्राप्तांकों और रुचि के आधार पर उपयुक्त विषय या कार्यक्षेत्र की सम्भावना जानना।
2. तुलना करना
मापन से प्राप्त अंकों द्वारा एक विद्यार्थी की तुलना दूसरे विद्यार्थियों से अथवा उसकी वर्तमान उपलब्धि की तुलना पूर्व उपलब्धि से की जा सकती है। इसके लिए मानकीकृत और उपलब्धि परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है।
3. नए निष्कर्ष प्राप्त करना
परीक्षणों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण करके शैक्षिक समस्याओं से सम्बन्धित नए तथ्य और निष्कर्ष प्राप्त किए जाते हैं। इसलिए शैक्षिक अनुसंधान में मापन का विशेष महत्त्व है।
4. परामर्श देना
विद्यार्थी की रुचि, योग्यता, अभिक्षमता और उपलब्धि का मापन करके उसे उचित विषय, पाठ्यक्रम तथा व्यवसाय के चयन में शैक्षिक एवं व्यावसायिक परामर्श दिया जाता है।
5. निदान करना
निदानात्मक परीक्षणों द्वारा विद्यार्थी की अधिगम सम्बन्धी कठिनाइयों और कमजोरियों का पता लगाया जाता है। इसके आधार पर उसे आवश्यक उपचारात्मक शिक्षण प्रदान किया जाता है।
शैक्षिक मापन की सीमाएँ
- शैक्षिक मापन के लिए विश्वसनीय, वैध और मानकीकृत परीक्षणों की आवश्यकता होती है, जो सभी क्षेत्रों में सरलता से उपलब्ध नहीं होते।
- मापन का क्षेत्र सीमित होता है। एक समय में विद्यार्थी के केवल कुछ गुणों या व्यवहारों का ही मापन किया जा सकता है, सम्पूर्ण व्यक्तित्व का नहीं।
- बुद्धि, रुचि, अभिवृत्ति और व्यक्तित्व जैसे शैक्षिक एवं मनोवैज्ञानिक गुणों का मापन भौतिक गुणों जितना शुद्ध और प्रत्यक्ष नहीं होता।
- मापन केवल संख्यात्मक सूचना प्रदान करता है; वह स्वयं किसी गुण के उचित-अनुचित अथवा अच्छे-बुरे होने का निर्णय नहीं देता।
- मापन के परिणाम परीक्षण की गुणवत्ता, परीक्षक, वातावरण और विद्यार्थी की तत्कालीन मानसिक एवं शारीरिक स्थिति से प्रभावित हो सकते हैं।
- शैक्षिक मापन के प्रमुख कार्य भविष्यवाणी, तुलना, अनुसंधान, परामर्श और निदान हैं।
- निदानात्मक मापन विद्यार्थी की कठिनाइयों की पहचान और उपचारात्मक शिक्षण में सहायक होता है।
- मापन सम्पूर्ण व्यक्तित्व के स्थान पर कुछ चयनित गुणों का ही संख्यात्मक वर्णन करता है।
- मापन केवल सूचना देता है; अन्तिम निर्णय के लिए मूल्यांकन आवश्यक होता है।
शैक्षिक मूल्यांकन की संकल्पना, अर्थ एवं परिभाषाएँ
शैक्षिक मूल्यांकन की संकल्पना
मूल्यांकन शिक्षा-प्रक्रिया का एक अनिवार्य और निरन्तर अंग है। इसके द्वारा यह ज्ञात किया जाता है कि निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति किस सीमा तक हुई है तथा शिक्षण के परिणाम कितने उपयोगी और वांछनीय हैं।
मापन केवल किसी गुण, योग्यता या उपलब्धि को अंकों में व्यक्त करता है, जबकि मूल्यांकन उन प्राप्तांकों की उद्देश्यों के सन्दर्भ में व्याख्या करके निर्णय देता है। जैसे—विद्यार्थी के 50 में से 35 अंक प्राप्त करना मापन है, लेकिन उसकी उपलब्धि को संतोषजनक या असंतोषजनक मानना मूल्यांकन है।
मूल्यांकन का क्षेत्र मापन से अधिक व्यापक है। इसमें विद्यार्थी के ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक विकास के साथ-साथ पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधि, शिक्षण-सामग्री तथा सम्पूर्ण शैक्षिक व्यवस्था की उपयोगिता का भी अध्ययन किया जाता है।
मूल्यांकन का अर्थ
मूल्यांकन शब्द मूल्य और अंकन से मिलकर बना है। इसका अर्थ किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थिति या शैक्षिक उपलब्धि के गुण-दोषों का विवेचन करके उसके वास्तविक मूल्य, उपयोगिता और वांछनीयता के सम्बन्ध में निर्णय करना है।
शिक्षा के क्षेत्र में मूल्यांकन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार में आए गुणात्मक और मात्रात्मक परिवर्तनों की जाँच की जाती है तथा यह निर्धारित किया जाता है कि शिक्षण के उद्देश्यों को किस सीमा तक प्राप्त किया गया है।
मूल्यांकन की प्रमुख परिभाषाएँ
रेमर्स और गेज
व्यक्ति या समाज की दृष्टि से जो वस्तु उत्तम और वांछनीय मानी जाती है, उसका मूल्य निर्धारित करना मूल्यांकन है।
डांडेकर
मूल्यांकन यह बताता है कि बालक ने निर्धारित उद्देश्यों को किस सीमा तक प्राप्त किया है।
क्विलिन तथा हन्ना
विद्यालय द्वारा बालक के व्यवहार में हुए परिवर्तन से सम्बन्धित प्रमाणों का संग्रह और उनकी व्याख्या करना मूल्यांकन है।
कोठारी आयोग
मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया और सम्पूर्ण शिक्षा-प्रणाली का अभिन्न अंग है, जिसका शिक्षण-उद्देश्यों से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।
एनसीईआरटी
मूल्यांकन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा यह ज्ञात किया जाता है कि शैक्षिक उद्देश्य किस सीमा तक प्राप्त हुए तथा कक्षा में दिए गए अधिगम-अनुभव कितने प्रभावशाली रहे।
जेम्स एम. ली
मूल्यांकन विद्यालय, कक्षा और स्वयं विद्यार्थी द्वारा निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के सम्बन्ध में उसकी प्रगति की जाँच है।
वेस्ले
मूल्यांकन इच्छित परिणामों के गुण, महत्त्व और प्रभावशीलता का निर्णय करने के लिए प्रमाणों तथा निरीक्षण का समन्वित प्रयोग है।
- मूल्यांकन शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति और परिणामों की वांछनीयता का निर्णय करता है।
- मापन प्राप्तांकों को व्यक्त करता है, जबकि मूल्यांकन उनकी व्याख्या करके निर्णय देता है।
- मूल्यांकन का क्षेत्र मापन से व्यापक तथा इसकी प्रक्रिया सतत होती है।
- इसमें विद्यार्थी के ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक विकास का अध्ययन किया जाता है।
- मूल्यांकन शिक्षण, पाठ्यक्रम, विधियों और सम्पूर्ण शिक्षा-व्यवस्था में सुधार का आधार है।
मूल्यांकन की विशेषताएँ एवं उद्देश्य
मूल्यांकन की विशेषताएँ
- मूल्यांकन एक व्यापक प्रक्रिया है। इसमें विद्यार्थी की उपलब्धि के साथ शिक्षण-विधि, पाठ्यक्रम, शिक्षण-सामग्री और सम्पूर्ण शैक्षिक व्यवस्था का अध्ययन किया जाता है।
- यह निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके द्वारा विद्यार्थी की प्रगति और शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति का समय-समय पर पता लगाया जाता है।
- मूल्यांकन में अधिगम-परिणामों का मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों रूपों में अध्ययन किया जाता है।
- इसके द्वारा विद्यार्थी के भावी विकास और सफलता के सम्बन्ध में सार्थक भविष्यवाणी की जा सकती है।
- यह शिक्षक को अपनी शिक्षण-व्यवस्था की प्रभावशीलता जानने और उसमें आवश्यक सुधार करने का अवसर देता है।
- मूल्यांकन शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का अभिन्न अंग है और इसका शैक्षिक उद्देश्यों से सीधा सम्बन्ध होता है।
- इसके परिणामों के आधार पर शिक्षक, विद्यार्थी, शिक्षण-विधि तथा सम्पूर्ण शिक्षा-प्रणाली की गुणवत्ता में सुधार किया जाता है।
- यह अधिगम-अनुभवों और सीखी गई सामग्री की उपयोगिता तथा व्यावहारिक सार्थकता का निर्णय करता है।
- मूल्यांकन केवल परीक्षाओं तक सीमित नहीं है। इसमें निरीक्षण, साक्षात्कार, परियोजना, अभिलेख और अन्य बहुआयामी साधनों का भी प्रयोग किया जा सकता है।
- इसके द्वारा निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति तथा शिक्षक, शिक्षार्थी, शिक्षण-विधि और शैक्षिक व्यवस्था की गुणवत्ता की जाँच सम्भव होती है।
मूल्यांकन के उद्देश्य
- विद्यार्थियों की अधिगम सम्बन्धी कठिनाइयों की पहचान करके उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करना।
- यह ज्ञात करना कि विद्यार्थियों ने निर्धारित ज्ञान और शैक्षिक उद्देश्यों को किस सीमा तक प्राप्त किया है तथा उनका विकास कितना हुआ है।
- शिक्षण-विधियों और सहायक शिक्षण-सामग्री की उपयोगिता जाँचकर उनमें आवश्यक सुधार करना।
- विद्यार्थियों की शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और वैयक्तिक भिन्नताओं का पता लगाना।
- विद्यार्थियों के कमजोर क्षेत्रों और अधिगम-दोषों का निदान करके उन्हें आगे बढ़ने में सहायता देना।
- विद्यार्थियों की प्रगति का प्रमाण प्रस्तुत करना तथा आवश्यकता के अनुसार प्रमाण-पत्र प्रदान करना।
- पाठ्यक्रम की उपयोगिता जाँचकर उसमें आवश्यक परिवर्तन और सुधार करना।
- परीक्षा-प्राप्तांकों की उचित व्याख्या के लिए उपयोगी मानकों का निर्माण करना।
- विद्यार्थियों को उपयुक्त शैक्षिक और व्यावसायिक निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करना।
- शिक्षण-विधियों की प्रभावशीलता का आकलन करना तथा उपयोगी पाठ्यपुस्तकों और विद्यार्थियों का चयन करना।
- विद्यार्थियों का योग्यता के आधार पर वर्गीकरण करना तथा उनकी पदोन्नति, उत्तीर्णता और अनुत्तीर्णता के सम्बन्ध में निर्णय लेना।
- परीक्षा-प्रणाली और शैक्षिक मानकों में सुधार के लिए आवश्यक आधार प्रदान करना।
- मूल्यांकन व्यापक, निरन्तर, उद्देश्यपूर्ण और बहुआयामी प्रक्रिया है।
- इसमें अधिगम-परिणामों का गुणात्मक तथा मात्रात्मक दोनों रूपों में अध्ययन किया जाता है।
- यह विद्यार्थी की प्रगति के साथ शिक्षण-विधि, पाठ्यक्रम और शिक्षा-व्यवस्था की गुणवत्ता की भी जाँच करता है।
- इसके प्रमुख उद्देश्य अधिगम-कठिनाइयों का निदान, शिक्षण-सुधार, निर्देशन, वर्गीकरण और शैक्षिक निर्णय लेना हैं।
मूल्यांकन की आवश्यकता एवं शैक्षिक उपयोगिता
मूल्यांकन की आवश्यकता
मूल्यांकन शिक्षा-प्रक्रिया की धुरी है। यह शैक्षिक उद्देश्यों, शिक्षण-विधियों, अधिगम-अनुभवों तथा विद्यार्थियों की उपलब्धियों के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है। इसके द्वारा केवल उपलब्धि का मापन नहीं किया जाता, बल्कि कमियों की पहचान करके सुधार भी किया जाता है।
शिक्षा आयोग के अनुसार, मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया है, जो सम्पूर्ण शिक्षा-प्रणाली का अभिन्न अंग तथा शैक्षिक लक्ष्यों से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है।
- निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति का स्तर जानने के लिए मूल्यांकन आवश्यक है।
- विद्यार्थियों की प्रगति, योग्यता, रुचि, उपलब्धि और अधिगम-कठिनाइयों की पहचान के लिए इसकी आवश्यकता होती है।
- शिक्षण-विधियों, पाठ्यक्रम और शिक्षण-सामग्री की उपयोगिता जानकर उनमें सुधार किया जा सकता है।
- विद्यार्थियों के चयन, वर्गीकरण, पदोन्नति तथा शैक्षिक निर्णयों के लिए मूल्यांकन आवश्यक है।
- शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन, उपचारात्मक शिक्षण और भविष्यवाणी के लिए मूल्यांकन आधार प्रदान करता है।
मूल्यांकन की शैक्षिक उपयोगिता
शैक्षिक मूल्यांकन विद्यार्थी के बौद्धिक, सामाजिक, संवेगात्मक और व्यक्तित्व-विकास का अध्ययन करता है। यह शिक्षण आरम्भ होने से लेकर उसके पूर्ण होने तक निरन्तर चलता है। दैनिक कार्य, मौखिक प्रश्न, कक्षा-गतिविधियाँ, मासिक, अर्द्धवार्षिक और वार्षिक परीक्षाएँ इसके प्रमुख साधन हैं।
1. संस्थागत मूल्यांकन
इसके द्वारा विद्यालय के उद्देश्यों, योजनाओं, संसाधनों, प्रशासन, शिक्षण-व्यवस्था और उपलब्धियों की जाँच की जाती है। यह कार्य प्रशिक्षित शिक्षकों, प्रशासकों और विशेषज्ञों की समिति द्वारा योजनाबद्ध तथा निष्पक्ष रूप से किया जाना चाहिए।
संस्थागत मूल्यांकन से विद्यालय की समस्याओं की पहचान, आवश्यक सूचनाओं का संग्रह, सुधार-योजनाओं का निर्माण, निर्णयों का क्रियान्वयन तथा उनके परिणामों की जाँच सम्भव होती है।
2. कक्षागत मूल्यांकन
कक्षागत मूल्यांकन में शिक्षक विद्यार्थियों के ज्ञान, समझ, अनुप्रयोग, कौशल और व्यवहार में होने वाली प्रगति का नियमित अध्ययन करता है। इसके लिए परीक्षा के साथ अवलोकन, साक्षात्कार, प्रश्नोत्तर और सहभागिता जैसी विधियों का प्रयोग किया जाता है।
इससे शिक्षक को अपने शिक्षण की सफलता, विद्यार्थियों की कठिनाइयों और आवश्यक सुधारों की जानकारी मिलती है।
3. पृष्ठपोषण
पृष्ठपोषण से विद्यार्थी को अपनी उपलब्धियों और कमजोरियों का ज्ञान होता है तथा शिक्षक को अपनी पाठयोजना, शिक्षण-विधि और शिक्षण-सामग्री में सुधार करने की दिशा मिलती है। सकारात्मक पृष्ठपोषण विद्यार्थी को आगे सीखने के लिए प्रेरित करता है।
4. प्रशासनिक उपयोगिता
मूल्यांकन द्वारा विद्यार्थियों के शैक्षिक स्तर की जाँच, विभिन्न कक्षाओं एवं पाठ्यक्रमों में प्रवेश, कर्मचारियों का चयन, पदोन्नति, वर्गीकरण तथा प्रमाण-पत्र प्रदान करने सम्बन्धी निर्णय लिए जाते हैं।
यह विद्यार्थियों को उनकी योग्यता, रुचि और उपलब्धि के अनुसार उपयुक्त विषय तथा व्यवसाय चुनने में भी सहायता देता है।
5. वैयक्तिक एवं उपचारात्मक शिक्षण
उपलब्धि और निदानात्मक परीक्षणों से विद्यार्थियों की व्यक्तिगत तथा सामूहिक कठिनाइयों का पता लगाया जाता है। इनके कारणों को जानकर कमजोर विद्यार्थियों के लिए उपचारात्मक शिक्षण की व्यवस्था की जाती है।
6. शैक्षिक अनुसंधान में उपयोगिता
शैक्षिक अनुसंधान में मूल्यांकन द्वारा नवीन उद्देश्यों, पाठ्यक्रमों और शिक्षण-विधियों की उपयोगिता तथा अनुसन्धान की सफलता का निर्णय किया जाता है। इससे शैक्षिक समस्याओं के समाधान के लिए प्रमाणित निष्कर्ष प्राप्त होते हैं।
7. सामाजिक उपयोगिता
सामाजिक दृष्टि से मूल्यांकन शिक्षा के स्तर, विद्यालयी गतिविधियों, सामाजिक एवं नैतिक गुणों, संस्कृति तथा शिक्षा के सामाजिक प्रभाव की जाँच करता है। इससे शिक्षा-व्यवस्था को समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने में सहायता मिलती है।
- मूल्यांकन शिक्षा-प्रक्रिया का सतत एवं अभिन्न अंग है।
- यह उद्देश्यों की प्राप्ति, विद्यार्थी की प्रगति और शिक्षण की प्रभावशीलता का निर्णय करता है।
- संस्थागत और कक्षागत मूल्यांकन शिक्षा-व्यवस्था तथा कक्षा-शिक्षण में सुधार लाते हैं।
- पृष्ठपोषण विद्यार्थी को अपनी कमजोरी तथा शिक्षक को अपने शिक्षण की कमी जानने में सहायता देता है।
- मूल्यांकन प्रशासन, निर्देशन, उपचारात्मक शिक्षण, अनुसंधान और सामाजिक सुधार में उपयोगी है।
मूल्यांकन का महत्त्व एवं सीमाएँ
मूल्यांकन का महत्त्व
मूल्यांकन द्वारा विद्यार्थियों की शैक्षिक प्रगति, शिक्षण की प्रभावशीलता और निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति का ज्ञान होता है। यह विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों तथा प्रशासकों को आवश्यक निर्णय लेने और शिक्षा-प्रक्रिया में सुधार करने का आधार प्रदान करता है।
- शिक्षण के उद्देश्यों को स्पष्ट करने तथा उनकी प्राप्ति का स्तर जानने में सहायता करता है।
- विद्यार्थियों की शैक्षिक प्रगति, उपलब्धि और कमजोरियों की जानकारी देता है।
- शिक्षण-विधियों, पाठ्यक्रम और सहायक शिक्षण-सामग्री की उपयोगिता जाँचकर उनमें आवश्यक सुधार करने में सहायक होता है।
- विद्यार्थियों को अध्ययन के लिए प्रेरित करता है तथा उनमें आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की इच्छा विकसित करता है।
- विद्यार्थियों की रुचियों, अभिरुचियों, क्षमताओं, योग्यताओं, दृष्टिकोणों और व्यवहारों की जानकारी प्रदान करता है।
- विभिन्न शैक्षिक कार्यक्रमों की सफलता और उपयोगिता का निर्णय करने में सहायता करता है।
- शिक्षक को अपनी शिक्षण-पद्धति की कमियाँ जानने और कक्षा-शिक्षण में सुधार करने का अवसर देता है।
- शिक्षण को व्यवस्थित, प्रभावी और रुचिकर बनाने में सहायता करता है।
- विद्यार्थियों को उनकी योग्यता और रुचि के अनुसार शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन प्रदान करने में उपयोगी होता है।
- चयन, वर्गीकरण, पदोन्नति, प्रमाण-पत्र प्रदान करने और अन्य शैक्षिक निर्णय लेने का आधार प्रस्तुत करता है।
मूल्यांकन की सीमाएँ
- मूल्यांकन के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण को अनिवार्य नहीं माना जाता, इसलिए अप्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा किए गए मूल्यांकन के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
- विद्यार्थी के सभी गुणों, व्यवहारों और उपलब्धियों के मूल्यांकन के लिए पूर्णतः प्रामाणिक तथा सर्वमान्य मापदण्ड उपलब्ध नहीं होते।
- मूल्यांकन में व्यक्तिगत निर्णय और व्यक्तिनिष्ठता का समावेश हो सकता है, जिससे परिणामों की निष्पक्षता प्रभावित होती है।
- यह एक व्यापक और समय लेने वाली प्रक्रिया है, इसलिए अनेक शिक्षक इसे नियमित रूप से करने में रुचि नहीं लेते।
- मूल्यांकन विद्यार्थियों की प्रगति और शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति का ज्ञान देता है।
- यह पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधि, शिक्षण-सामग्री और कक्षा-शिक्षण में सुधार का आधार है।
- मूल्यांकन प्रेरणा, निर्देशन, वर्गीकरण और शैक्षिक निर्णय लेने में सहायक होता है।
- सर्वमान्य मापदण्डों का अभाव, व्यक्तिनिष्ठता तथा व्यापक प्रक्रिया होना इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं।
मापन, परीक्षण एवं मूल्यांकन में सम्बन्ध और अन्तर
मापन एवं मूल्यांकन में सम्बन्ध
मापन और मूल्यांकन शिक्षा-प्रक्रिया के परस्पर सम्बन्धित अंग हैं। मापन द्वारा विद्यार्थी की उपलब्धि या किसी गुण को अंकों में व्यक्त किया जाता है, जबकि मूल्यांकन उन प्राप्तांकों की शैक्षिक उद्देश्यों के सन्दर्भ में व्याख्या करके निर्णय देता है।
उदाहरण के लिए, किसी विद्यार्थी का 50 में से 35 अंक प्राप्त करना मापन है। इन अंकों के आधार पर उसकी उपलब्धि को संतोषजनक, औसत अथवा असंतोषजनक बताना मूल्यांकन है। अतः मापन, मूल्यांकन का एक आवश्यक अंग है।
मापन एवं मूल्यांकन में समानताएँ
- दोनों शिक्षा-प्रक्रिया के महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य अंग हैं।
- दोनों में प्रश्नों, परीक्षणों तथा अन्य शैक्षिक साधनों का प्रयोग किया जाता है।
- दोनों विद्यार्थियों की प्रगति और गुणात्मक शिक्षा में सहायक होते हैं।
- दोनों का उद्देश्य विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास करना है।
- दोनों में प्रयुक्त अधिकांश उपकरण समान हो सकते हैं।
मापन एवं मूल्यांकन में अन्तर
| मापन | मूल्यांकन |
|---|---|
| मापन, मूल्यांकन का एक सीमित अंग है। | मूल्यांकन व्यापक प्रक्रिया है, जिसमें मापन भी सम्मिलित होता है। |
| यह विषय-वस्तु और प्राप्तांकों पर केन्द्रित होता है। | यह अधिगम-परिणामों और उद्देश्यों की प्राप्ति पर केन्द्रित होता है। |
| इसमें गुण या उपलब्धि को संख्यात्मक रूप दिया जाता है। | इसमें संख्यात्मक तथा गुणात्मक सूचनाओं के आधार पर निर्णय लिया जाता है। |
| यह बताता है कि विद्यार्थी ने कितने अंक प्राप्त किए। | यह बताता है कि निर्धारित उद्देश्य किस सीमा तक प्राप्त हुए। |
| इसका क्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित होता है। | इसका क्षेत्र व्यापक होता है और यह सम्पूर्ण व्यक्तित्व से सम्बन्धित हो सकता है। |
| यह सूचना और आँकड़े प्रदान करता है। | यह सूचनाओं की व्याख्या करके स्पष्ट शैक्षिक निर्णय प्रदान करता है। |
| मापन के आधार पर अकेले सार्थक भविष्यवाणी करना कठिन होता है। | मूल्यांकन द्वारा विद्यार्थी की भावी सफलता के सम्बन्ध में भविष्यवाणी की जा सकती है। |
| इसकी प्रक्रिया अपेक्षाकृत कम लचीली होती है। | मूल्यांकन की प्रक्रिया अधिक व्यापक और लचीली होती है। |
परीक्षण एवं मापन में सम्बन्ध
परीक्षण वह साधन या प्रक्रिया है जिसके माध्यम से विद्यार्थी की योग्यता, उपलब्धि, बुद्धि या अन्य विशेषताओं से सम्बन्धित प्रतिक्रियाएँ प्राप्त की जाती हैं। इन प्रतिक्रियाओं को नियमों के अनुसार अंक प्रदान करना मापन कहलाता है।
इस प्रकार परीक्षण मापन से पहले की प्रक्रिया है। परीक्षण सामग्री उपलब्ध कराता है, जबकि मापन उसके परिणामों को संख्यात्मक स्वरूप देता है।
परीक्षण एवं मापन में समानताएँ
- दोनों का प्रयोग विद्यार्थियों की उपलब्धि और योग्यता जानने के लिए किया जाता है।
- दोनों शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के महत्त्वपूर्ण अंग हैं।
- दोनों में विद्यार्थी और शिक्षक की सक्रिय भूमिका होती है।
- दोनों मूल्यांकन के लिए आवश्यक आधार प्रस्तुत करते हैं।
परीक्षण एवं मापन में अन्तर
| परीक्षण | मापन |
|---|---|
| परीक्षण मापन से पूर्व की प्रक्रिया है। | मापन परीक्षण से प्राप्त परिणामों को संख्यात्मक रूप देता है। |
| इसमें प्रश्न, पद, कथन अथवा कार्य प्रस्तुत किए जाते हैं। | इसमें प्रतिक्रियाओं को निश्चित नियमों के अनुसार अंक दिए जाते हैं। |
| यह किसी गुण, उपलब्धि या योग्यता की जाँच का साधन है। | यह उस गुण या उपलब्धि की मात्रा निर्धारित करने की प्रक्रिया है। |
| इसका क्षेत्र किसी विशेष योग्यता या विषय तक सीमित हो सकता है। | मापन का प्रयोग अनेक प्रकार की विशेषताओं को संख्यात्मक रूप देने में किया जाता है। |
| परीक्षण स्वयं एक मापन-उपकरण हो सकता है। | मापन करने के लिए परीक्षण और अन्य उपकरणों की आवश्यकता होती है। |
परीक्षण, मापन एवं मूल्यांकन का पारस्परिक सम्बन्ध
परीक्षण, मापन और मूल्यांकन एक क्रमबद्ध प्रक्रिया के तीन चरण हैं। परीक्षण द्वारा विद्यार्थी की प्रतिक्रियाएँ प्राप्त की जाती हैं, मापन द्वारा उन्हें अंकों में व्यक्त किया जाता है और मूल्यांकन द्वारा उन अंकों की निर्धारित उद्देश्यों के सन्दर्भ में व्याख्या करके निर्णय लिया जाता है।
उदाहरण के लिए, गणित का प्रश्नपत्र परीक्षण है, उसमें प्राप्त 40 अंक मापन हैं और उन अंकों के आधार पर विद्यार्थी की उपलब्धि को अच्छा या सुधार योग्य बताना मूल्यांकन है।
मानक-सन्दर्भित एवं मानदण्ड-सन्दर्भित परीक्षण
1. मानक-सन्दर्भित परीक्षण
इसमें विद्यार्थी के प्रदर्शन की तुलना उसी परीक्षण में सम्मिलित अन्य विद्यार्थियों या किसी मानक समूह से की जाती है। इसका उद्देश्य यह जानना होता है कि विद्यार्थी समूह के अन्य सदस्यों की अपेक्षा किस स्तर पर है।
उदाहरण के लिए, किसी प्रतियोगी परीक्षा में विद्यार्थी की रैंक या प्रतिशतक उसके प्रदर्शन की अन्य परीक्षार्थियों से तुलना प्रस्तुत करता है।
2. मानदण्ड-सन्दर्भित परीक्षण
इसमें विद्यार्थी के प्रदर्शन की तुलना किसी पूर्व निर्धारित मानदण्ड या अधिगम-उद्देश्य से की जाती है। इसका उद्देश्य यह जानना होता है कि विद्यार्थी ने अपेक्षित ज्ञान या कौशल को किस सीमा तक प्राप्त किया है।
उदाहरण के लिए, यदि विद्यार्थी 20 में से कम से कम 15 प्रश्न सही करके किसी कौशल में दक्ष माना जाता है, तो उसका परिणाम निर्धारित मानदण्ड के आधार पर तय होगा।
दोनों परीक्षणों में प्रमुख अन्तर
| मानक-सन्दर्भित परीक्षण | मानदण्ड-सन्दर्भित परीक्षण |
|---|---|
| विद्यार्थी की तुलना अन्य विद्यार्थियों से की जाती है। | विद्यार्थी की तुलना निर्धारित उद्देश्यों या मानदण्ड से की जाती है। |
| यह विद्यार्थी की सापेक्ष स्थिति बताता है। | यह विद्यार्थी की वास्तविक दक्षता या उपलब्धि बताता है। |
| इसका उपयोग चयन, वर्गीकरण और रैंक निर्धारित करने में होता है। | इसका उपयोग अधिगम-उद्देश्यों की प्राप्ति और कौशल-दक्षता जाँचने में होता है। |
| प्रश्नों का उद्देश्य विद्यार्थियों के बीच अन्तर स्पष्ट करना होता है। | प्रश्न निर्धारित शिक्षण-उद्देश्यों और पाठ्यवस्तु पर आधारित होते हैं। |
- परीक्षण प्रतिक्रियाएँ प्राप्त करता है, मापन उन्हें अंक देता है और मूल्यांकन उनकी व्याख्या करके निर्णय देता है।
- मापन, मूल्यांकन का एक अंग है; मूल्यांकन का क्षेत्र मापन से अधिक व्यापक है।
- मापन संख्यात्मक सूचना देता है, जबकि मूल्यांकन गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों आधारों पर निर्णय करता है।
- मानक-सन्दर्भित परीक्षण में विद्यार्थी की तुलना समूह से की जाती है।
- मानदण्ड-सन्दर्भित परीक्षण में विद्यार्थी की तुलना पूर्व निर्धारित उद्देश्य या दक्षता से की जाती है।