अनुसन्धान—अर्थ एवं परिभाषाएँ
अनुसन्धान का अर्थ
अनुसन्धान वर्तमान ज्ञान का परिमार्जन करने तथा नवीन ज्ञान की खोज करने की एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसके माध्यम से किसी समस्या का तथ्यपूर्ण अध्ययन करके उसके उचित समाधान तक पहुँचने का प्रयास किया जाता है।
अनुसन्धान केवल नई जानकारी प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। इसके द्वारा पहले से उपलब्ध ज्ञान, सिद्धान्तों और तथ्यों की पुनः जाँच करके उनमें आवश्यक संशोधन भी किया जाता है।
Research शब्द का अर्थ
अनुसन्धान का अंग्रेजी रूप Research है। यह Re अर्थात बार-बार तथा Search अर्थात खोज से मिलकर बना है। इस प्रकार Research का शाब्दिक अर्थ है—किसी तथ्य या समस्या की बार-बार और गहराई से खोज करना।
हिन्दी का अनुसन्धान शब्द संस्कृत से लिया गया है। इसका अर्थ किसी निर्धारित लक्ष्य की ओर क्रमबद्ध और व्यवस्थित प्रयास करते हुए सत्य या नवीन ज्ञान की खोज करना है।
RESEARCH शब्द के अक्षरों का अर्थ
पुस्तक में Research की प्रकृति को उसके प्रत्येक अक्षर के माध्यम से भी स्पष्ट किया गया है—
- R – Rational way of thinking: तार्किक ढंग से चिन्तन करना।
- E – Exhaustive treatment: विषय पर परिश्रमपूर्वक और गहराई से कार्य करना।
- S – Search for solutions: समस्या के समाधान की खोज करना।
- E – Exactness: अध्ययन में शुद्धता और निश्चितता बनाए रखना।
- A – Analytic view: तथ्यों का विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से अध्ययन करना।
- R – Relationship of facts: विभिन्न तथ्यों के बीच सम्बन्ध स्थापित करना।
- C – Critical observation: आलोचनात्मक और सावधानीपूर्वक निरीक्षण करना।
- H – Honesty in work: अनुसन्धान कार्य में ईमानदारी बनाए रखना।
अनुसन्धान के समानार्थक शब्द
अनुसन्धान के लिए शोध, गवेषणा, अन्वेषण, परिपृच्छा, खोज और जाँच जैसे शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है। इन सभी में किसी तथ्य, समस्या या सत्य की व्यवस्थित खोज का भाव निहित रहता है।
अनुसन्धान की वैज्ञानिक आधारशिला
अनुसन्धान में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है। पुस्तक के अनुसार वैज्ञानिक अनुसन्धान की आधारशिला निम्न पाँच गुणों पर आधारित है—
1. वस्तुनिष्ठता
अनुसन्धान तथ्यों पर आधारित होना चाहिए और शोधकर्ता के व्यक्तिगत विचार, पूर्वाग्रह या भावनाएँ उसके निष्कर्षों को प्रभावित नहीं करनी चाहिए।
2. निश्चयात्मकता
अनुसन्धान की समस्या, प्रक्रिया और निष्कर्ष स्पष्ट तथा निश्चित होने चाहिए। अस्पष्टता के स्थान पर व्यवस्थित और सुनिश्चित तथ्यों को महत्त्व दिया जाता है।
3. सत्यसाधनीयता
अनुसन्धान से प्राप्त तथ्यों और निष्कर्षों की पुनः जाँच की जा सकनी चाहिए। अन्य शोधकर्ता भी समान परिस्थितियों में उनकी सत्यता की पुष्टि कर सकें।
4. सार्वभौमिकता
जहाँ सम्भव हो, अनुसन्धान से प्राप्त ज्ञान केवल एक परिस्थिति तक सीमित न रहकर समान परिस्थितियों में व्यापक रूप से उपयोगी होना चाहिए।
5. पूर्व-कथन क्षमता
वैज्ञानिक तथ्यों और सम्बन्धों के आधार पर भविष्य में सम्भावित घटनाओं या परिणामों के विषय में अनुमान लगाने की क्षमता अनुसन्धान का महत्त्वपूर्ण आधार है।
अनुसन्धान की प्रमुख परिभाषाएँ
जॉन डब्ल्यू. बेस्ट के अनुसार
अनुसन्धान नियंत्रित प्रेक्षणों के व्यवस्थित और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण तथा अभिलेखन की प्रक्रिया है। इसके द्वारा सामान्यीकरण, नियम और सिद्धान्त विकसित करने में सहायता मिलती है।
मुनरो के अनुसार
अनुसन्धान समस्याओं के अध्ययन की ऐसी विधि है जिसमें तथ्यों के आधार पर उनके समाधान को आंशिक अथवा पूर्ण रूप से प्रस्तुत किया जाता है।
वेबस्टर न्यू इंटरनेशनल डिक्शनरी के अनुसार
अनुसन्धान केवल सत्य की खोज नहीं, बल्कि एक दीर्घकालीन, गहन और उद्देश्यपूर्ण खोज है। इसमें किसी विषय को समझने के लिए लगातार और व्यवस्थित प्रयास किया जाता है।
क्रॉफोर्ड के अनुसार
अनुसन्धान चिन्तन की एक व्यवस्थित और परिष्कृत तकनीक है। इसमें विशेष उपकरणों और प्रणालियों की सहायता से ऐसी समस्याओं का समाधान खोजा जाता है जिन्हें सामान्य साधनों से हल करना कठिन होता है।
करलिंगर के अनुसार
वैज्ञानिक अनुसन्धान प्राकृतिक घटनाओं के बीच सम्भावित सम्बन्धों से सम्बन्धित परिकल्पनाओं की व्यवस्थित, नियंत्रित, आनुभविक और समालोचनात्मक जाँच है।
रेडमैन तथा मोरी के अनुसार
नवीन ज्ञान की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले व्यवस्थित प्रयास को अनुसन्धान कहा जाता है।
अनुसन्धान की मूल प्रकृति
उपर्युक्त अर्थ और परिभाषाओं से स्पष्ट है कि अनुसन्धान किसी अर्थपूर्ण समस्या के समाधान के लिए किया गया व्यवस्थित, वस्तुनिष्ठ, उद्देश्यपूर्ण, तार्किक और आनुभविक प्रयास है। इसमें वैज्ञानिक विधि का प्रयोग करके प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष प्राप्त किए जाते हैं।
अनुसन्धान की प्रक्रिया स्व-संशोधनीय, पुनरावृत्ति योग्य तथा जहाँ सम्भव हो सार्वभौमिक प्रकृति की होती है। इसलिए अनुसन्धान ज्ञान के विकास और समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान का महत्त्वपूर्ण माध्यम है।
- अनुसन्धान वर्तमान ज्ञान के परिमार्जन और नवीन ज्ञान की खोज की वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित प्रक्रिया है।
- Research का शाब्दिक अर्थ किसी तथ्य या समस्या की बार-बार और गहराई से खोज करना है।
- अनुसन्धान की वैज्ञानिक आधारशिला वस्तुनिष्ठता, निश्चयात्मकता, सत्यसाधनीयता, सार्वभौमिकता और पूर्व-कथन क्षमता है।
- अनुसन्धान में समस्या का अध्ययन तथ्यों, प्रमाणों, निरीक्षण और वैज्ञानिक विधि के आधार पर किया जाता है।
- जॉन डब्ल्यू. बेस्ट ने अनुसन्धान को व्यवस्थित एवं वस्तुनिष्ठ विश्लेषण से जोड़ा है, जबकि रेडमैन तथा मोरी ने इसे नवीन ज्ञान प्राप्त करने का व्यवस्थित प्रयास माना है।
- अनुसन्धान मूलतः व्यवस्थित, वस्तुनिष्ठ, उद्देश्यपूर्ण, तार्किक, आनुभविक और वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
अनुसन्धान की विशेषताएँ एवं महत्त्व
अनुसन्धान साधारण रूप से तथ्यों को एकत्र करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि किसी समस्या का वैज्ञानिक, व्यवस्थित और वस्तुनिष्ठ अध्ययन है। इसकी कुछ निश्चित विशेषताएँ इसे सामान्य खोज या निरीक्षण से अलग करती हैं।
अनुसन्धान की विशेषताएँ
1. अन्वेषण प्रक्रिया
अनुसन्धान मूलतः एक अन्वेषण प्रक्रिया है। इसके द्वारा नए ज्ञान की खोज की जाती है अथवा पहले से उपलब्ध ज्ञान की सत्यता की जाँच की जाती है।
जब अनुसन्धान का उद्देश्य नवीन ज्ञान खोजना होता है तो वह अन्वेषणात्मक शोध कहलाता है, जबकि पुराने ज्ञान की जाँच करने वाला अनुसन्धान सत्यापन शोध के रूप में जाना जाता है।
2. मितव्ययिता
अनुसन्धान में समय, धन और श्रम का आवश्यकतानुसार उचित उपयोग किया जाना चाहिए। किसी प्राकृतिक घटना की व्याख्या यथासम्भव सरल तरीके से और कम संसाधनों में करने वाला अनुसन्धान मितव्ययी माना जाता है।
अत्यधिक खर्चीला और अनावश्यक रूप से समय लेने वाला अनुसन्धान व्यावहारिक दृष्टि से कम उपयोगी हो सकता है। इसलिए उपलब्ध साधनों का कुशल प्रयोग आवश्यक है।
3. वैज्ञानिक अभिकल्प
अनुसन्धान एक निश्चित वैज्ञानिक योजना या अभिकल्प के आधार पर किया जाता है। इसमें पहले से निर्धारित किया जाता है कि अनुसन्धान कैसे किया जाएगा तथा आवश्यक प्रदत्तों का संग्रह किस प्रकार किया जाएगा।
इसके अन्तर्गत उपकरणों एवं परीक्षणों का चयन, प्रदत्त-संग्रह की विधि तथा प्राप्त प्रदत्तों के विश्लेषण की प्रक्रिया निर्धारित की जाती है।
4. सुव्यवस्थित अध्ययन
अनुसन्धान एक व्यवस्थित और क्रमबद्ध अध्ययन है। इसमें शोधकर्ता किसी समस्या से सम्बन्धित तथ्यों का योजनाबद्ध तरीके से अध्ययन करके नए ज्ञान की खोज अथवा पुराने ज्ञान की जाँच करता है।
शोधकर्ता पहले सम्भावित सम्बन्धों के विषय में परिकल्पना बनाता है और फिर आवश्यक उपकरणों की सहायता से उसकी जाँच करके नियम अथवा सिद्धान्त तक पहुँचता है।
5. सत्यापन
अनुसन्धान से प्राप्त परिणाम ऐसे होने चाहिए जिनकी सत्यता की पुनः जाँच की जा सके। दूसरा अनुसन्धानकर्ता भी समान अध्ययन करके प्राप्त निष्कर्षों की पुष्टि कर सके, तो परिणाम अधिक विश्वसनीय माने जाते हैं।
सत्यापन का गुण अनुसन्धान में वहाँ तक सम्भव होता है जहाँ तक अध्ययन में उचित नियन्त्रण और स्पष्ट प्रक्रिया उपलब्ध होती है।
6. आनुभविक अध्ययन
अनुसन्धान अनुभव, निरीक्षण और प्रयोग से प्राप्त वास्तविक तथ्यों पर आधारित होता है। शोधकर्ता केवल कल्पना के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालता, बल्कि उपलब्ध प्रमाणों की व्यवस्थित जाँच करता है।
उदाहरण के लिए, न्यूटन ने प्राकृतिक घटना के निरीक्षण के आधार पर गुरुत्वाकर्षण से सम्बन्धित नियम प्रतिपादित किया।
7. विशिष्ट उपकरणों का प्रयोग
अनुसन्धान को पूरा करने के लिए समस्या की प्रकृति के अनुसार विशेष उपकरणों और प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है। इनका चयन शोधकर्ता अपनी तत्काल आवश्यकता के अनुसार करता है।
प्रदत्त-संग्रह के लिए निरीक्षण, साक्षात्कार, प्रश्नावली तथा विभिन्न प्रकार के परीक्षण जैसी प्रविधियों का प्रयोग किया जा सकता है।
8. वस्तुनिष्ठता
अनुसन्धान में समस्या या विषय-वस्तु का अध्ययन व्यक्तिगत पक्षपात, पूर्वधारणा और रूढ़ धारणाओं से मुक्त होकर किया जाना चाहिए। निष्कर्ष शोधकर्ता की व्यक्तिगत इच्छा के बजाय उपलब्ध तथ्यों पर आधारित होने चाहिए।
चैपलिन के अनुसार वस्तुनिष्ठता का आशय पक्षपात, पूर्वधारणा और आत्मनिष्ठ व्याख्या से मुक्त होना है।
9. प्रतिकृति
प्रतिकृति का अर्थ अनुसन्धान की पुनरावृत्ति करना है। शोधकर्ता अपने निष्कर्षों की सत्यता जाँचने के लिए उसी अध्ययन को समान परिस्थितियों में दोबारा कर सकता है।
बार-बार समान परिणाम मिलने पर अनुसन्धान की विश्वसनीयता बढ़ती है। यदि परिणामों में स्थिरता न मिले तो अनुसन्धान प्रक्रिया का पुनरावलोकन आवश्यक हो जाता है।
10. परिमाण
अनुसन्धान में जहाँ तक सम्भव हो प्राप्त तथ्यों और परिणामों को संख्यात्मक रूप में व्यक्त किया जाता है। विशेष रूप से मनोवैज्ञानिक अनुसन्धान में प्राप्तांकों के विश्लेषण के लिए सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग किया जाता है।
परिमाणीकरण से तथ्यों की तुलना, विश्लेषण और व्याख्या अधिक स्पष्ट तथा व्यवस्थित रूप से की जा सकती है।
अनुसन्धान का महत्त्व
अनुसन्धान ज्ञान-वृद्धि के साथ-साथ सामाजिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक समस्याओं के समाधान में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेष रूप से विकासशील समाज में बदलती परिस्थितियों को समझने और उचित निर्णय लेने के लिए अनुसन्धान आवश्यक है।
1. मानव ज्ञान के विकास में सहायक
अनुसन्धान के द्वारा नवीन वैज्ञानिक तथ्यों, नियमों और सिद्धान्तों की खोज की जाती है। पहले से स्थापित ज्ञान की पुनः जाँच और आवश्यक परिवर्तन के कारण मानव ज्ञान का निरन्तर विकास होता है।
2. विभिन्न विज्ञानों की प्रगति की शक्तिशाली कुंजी
अनुसन्धान ने भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जन्तु विज्ञान, शिक्षाशास्त्र, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान जैसे अनेक क्षेत्रों की प्रगति में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
वैज्ञानिक और व्यावहारिक दोनों प्रकार के ज्ञान का विस्तार अनुसन्धान के माध्यम से सम्भव होता है।
3. व्यावहारिक समस्याओं के समाधान का साधन
अनुसन्धान सामाजिक, औद्योगिक, शैक्षिक, मनोवैज्ञानिक और चिकित्सा सम्बन्धी अनेक व्यावहारिक समस्याओं के समाधान में सहायक होता है।
समस्या से सम्बन्धित तथ्यों का वैज्ञानिक अध्ययन करके उसके कारणों और सम्भावित समाधान का पता लगाया जा सकता है।
4. पूर्वाग्रहों के निदान एवं निराकरण में सहायक
समाज में प्रचलित अनेक पूर्वाग्रहों और धारणाओं की वैज्ञानिक जाँच अनुसन्धान के माध्यम से की जा सकती है। तथ्यात्मक प्रमाण प्राप्त होने पर निराधार धारणाओं को दूर करना सम्भव होता है।
5. प्रशासक के लिए मार्गदर्शक
प्रशासक को सामाजिक, शैक्षिक और औद्योगिक क्षेत्रों की प्रत्येक समस्या तथा उससे सम्बन्धित लोगों की भावनाओं और प्रतिक्रियाओं का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं हो सकता। अनुसन्धान उसे आवश्यक और विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराता है।
इस जानकारी के आधार पर प्रशासक बेहतर निर्णय ले सकता है और उचित नीतियों का निर्धारण कर सकता है।
6. वस्तुनिष्ठता लाता है
अनुसन्धान में विभिन्न तथ्यों का संग्रह करने के बाद उनकी विश्वसनीयता और वैधता की जाँच की जाती है। वैज्ञानिक विधियों से उनका क्रमबद्ध अध्ययन करने पर अधिक वस्तुनिष्ठ निष्कर्ष प्राप्त होते हैं।
7. वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है
अनुसन्धान रूढ़ विचारों और व्यवहारों की वैज्ञानिक जाँच करके उनमें आवश्यक सुधार लाता है। इससे विभिन्न समस्याओं और निर्णयों को अधिक वैज्ञानिक आधार प्राप्त होता है।
8. कुशलता में वृद्धि करता है
अनुसन्धान के दौरान व्यक्ति तथ्य-संग्रह, निरीक्षण, चिन्तन और विश्लेषण की प्रक्रियाओं का अभ्यास करता है। इससे उसकी चिन्तन, सृजन, कल्पना और विश्लेषण सम्बन्धी क्षमताओं का विकास होता है।
इन क्षमताओं के विकास से व्यक्ति अनुसन्धान कार्य को अधिक व्यवस्थित और कुशलतापूर्वक करने में सक्षम होता है।
- अनुसन्धान एक अन्वेषणात्मक, वैज्ञानिक, सुव्यवस्थित और आनुभविक प्रक्रिया है।
- मितव्ययिता के अनुसार अनुसन्धान में समय, धन और श्रम का उचित तथा न्यूनतम उपयोग किया जाना चाहिए।
- अनुसन्धान में सत्यापन, वस्तुनिष्ठता, प्रतिकृति और परिमाणीकरण जैसे गुण महत्त्वपूर्ण हैं।
- अनुसन्धान के लिए निरीक्षण, साक्षात्कार, प्रश्नावली और परीक्षण जैसे विशिष्ट उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।
- अनुसन्धान मानव ज्ञान और विभिन्न विज्ञानों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
- यह व्यावहारिक समस्याओं तथा पूर्वाग्रहों के वैज्ञानिक समाधान में सहायक होता है।
- अनुसन्धान प्रशासक को उचित निर्णय और नीति-निर्धारण के लिए आवश्यक जानकारी प्रदान करता है।
- अनुसन्धान से वस्तुनिष्ठता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और कार्य-कुशलता का विकास होता है।
अनुसन्धान के प्रकार एवं परम्परागत व क्रियात्मक अनुसन्धान में अन्तर
अनुसन्धान की प्रकृति उस समस्या और उद्देश्य पर निर्भर करती है जिसका अध्ययन शोधकर्ता करना चाहता है। समस्या के स्वरूप और अनुसन्धान के उद्देश्य के आधार पर पुस्तक में अनुसन्धान के तीन प्रमुख प्रकार बताए गए हैं—मौलिक अनुसन्धान, प्रयुक्त अनुसन्धान और क्रियात्मक अनुसन्धान।
अनुसन्धान के प्रकार
1. मौलिक अथवा आधारभूत अनुसन्धान
मौलिक अनुसन्धान को विशुद्ध या आधारभूत अनुसन्धान भी कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य तत्काल किसी व्यावहारिक समस्या का समाधान करना नहीं, बल्कि नवीन ज्ञान, तथ्यों, नियमों और सिद्धान्तों की खोज करना होता है।
इसमें “ज्ञान के लिए ज्ञान” की भावना प्रमुख रहती है और सामान्यीकरण पर विशेष बल दिया जाता है। ऐसे अनुसन्धान प्रायः नियंत्रित परिस्थितियों या प्रयोगशालाओं में किए जाते हैं।
मौलिक अनुसन्धान की तत्काल उपयोगिता अपेक्षाकृत कम हो सकती है, परन्तु इसके द्वारा विकसित सिद्धान्त और ज्ञान भविष्य में प्रयुक्त अनुसन्धान के लिए आधार प्रदान करते हैं।
2. प्रयुक्त अनुसन्धान
प्रयुक्त अनुसन्धान को प्रायोगिक अनुसन्धान भी कहा जाता है। इसका सम्बन्ध वर्तमान समय की व्यावहारिक समस्याओं के समाधान से होता है और इससे प्राप्त निष्कर्षों का उपयोग वास्तविक परिस्थितियों में किया जाता है।
प्रयुक्त अनुसन्धान में मौलिक अनुसन्धान की अनेक विशेषताएँ पाई जाती हैं, परन्तु इसका एक निश्चित और व्यावहारिक उद्देश्य होता है। इसमें प्रतिचयन प्रविधियों का प्रयोग करके प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर जनसंख्या के सम्बन्ध में अनुमान लगाया जा सकता है।
मौलिक और प्रयुक्त अनुसन्धान एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। मौलिक अनुसन्धान सिद्धान्तों और सामान्य नियमों का निर्माण करता है, जबकि प्रयुक्त अनुसन्धान उन सिद्धान्तों का प्रयोग दैनिक जीवन की समस्याओं के समाधान में करता है।
3. क्रियात्मक अनुसन्धान
क्रियात्मक अनुसन्धान वह अनुसन्धान है जिसमें किसी क्षेत्र के कार्यकर्ता अपनी तत्काल और व्यावहारिक समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन करके अपने कार्य में सुधार लाने का प्रयास करते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक या अन्य विद्यालयी कार्यकर्ता कक्षा तथा विद्यालय की कार्यप्रणाली में सुधार लाने के लिए क्रियात्मक अनुसन्धान करते हैं। इसी प्रकार सामाजिक और औद्योगिक क्षेत्रों की समस्याओं के निदान एवं सुधार के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान का मुख्य उद्देश्य सैद्धान्तिक ज्ञान के आधार पर व्यावहारिक समस्या का समाधान करना और कार्य-पद्धति को अधिक प्रभावी बनाना है।
परम्परागत एवं क्रियात्मक अनुसन्धान में अन्तर
मौलिक और प्रयुक्त अनुसन्धान को व्यापक रूप से परम्परागत अनुसन्धान के अन्तर्गत रखा जाता है। परम्परागत अनुसन्धान का क्षेत्र सामान्यतः व्यापक होता है और इसका उद्देश्य नए तथ्यों, सिद्धान्तों तथा सामान्यीकरणों का विकास करना होता है, जबकि क्रियात्मक अनुसन्धान स्थानीय एवं तत्काल समस्याओं के समाधान और सुधार पर केन्द्रित रहता है।
| आधार | परम्परागत अनुसन्धान | क्रियात्मक अनुसन्धान |
|---|---|---|
| 1. उद्देश्य | नए तथ्यों और सिद्धान्तों की खोज एवं प्रतिपादन करना। | कक्षा एवं विद्यालय की कार्यप्रणाली में सुधार लाना। |
| 2. समस्या की प्रकृति | समस्या व्यापक, जटिल तथा सामान्य महत्त्व की हो सकती है। | समस्या मुख्यतः कक्षा और विद्यालय की दैनिक एवं तत्काल परिस्थितियों से सम्बन्धित होती है। |
| 3. शोध अभिकल्प | अभिकल्प पूर्व-निश्चित एवं अपेक्षाकृत कठोर होता है और उसका व्यवस्थित पालन किया जाता है। | अभिकल्प लचीला होता है तथा आवश्यकता के अनुसार उसमें परिवर्तन किया जा सकता है। |
| 4. प्रशिक्षण | अनुसन्धानकर्ता को विशेष शोध-प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। | सामान्यतः विशेष उच्चस्तरीय शोध-प्रशिक्षण आवश्यक नहीं माना जाता। |
| 5. परिणामों का सामान्यीकरण | प्राप्त परिणामों का व्यापक या सार्वभौमिक सामान्यीकरण करने का प्रयास किया जाता है। | परिणाम स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित होते हैं, इसलिए सामान्यीकरण नहीं किया जाता। |
| 6. अनुसन्धानकर्ता | अनुसन्धानकर्ता सामान्यतः शोध-प्रशिक्षण प्राप्त शैक्षणिक व्यक्ति होता है। | अनुसन्धानकर्ता प्रायः वही शिक्षक या कार्यकर्ता होता है जिसका समस्या से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। |
| 7. क्षेत्र | इसका क्षेत्र अधिक व्यापक और विस्तृत होता है। | इसका क्षेत्र संकुचित, सीमित और स्थानीय होता है, जैसे एक कक्षा या एक विद्यालय। |
| 8. परिकल्पना | स्पष्ट और विशिष्ट परिकल्पनाओं का निर्माण किया जाता है। | परिकल्पना अपेक्षाकृत कम विशिष्ट होती है और समस्या-समाधान से सम्बन्धित क्रियात्मक कथन के रूप में हो सकती है। |
| 9. प्रतिचयन | न्यादर्श के चयन तथा प्रतिचयन प्रविधियों का ज्ञान आवश्यक होता है। | कक्षा या विद्यालय ही प्रायः न्यादर्श होता है, इसलिए प्रतिचयन की विशेष समस्या नहीं रहती। |
| 10. प्रदत्तों का विश्लेषण | विश्लेषण में उच्च स्तर की सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग किया जा सकता है। | सामान्यतः सरल सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग किया जाता है। |
| 11. प्रदत्तों का संकलन | वैध, प्रामाणिक और विश्वसनीय उपकरणों द्वारा प्रदत्त एकत्र किए जाते हैं। | निरीक्षण प्रणाली तथा शिक्षक-निर्मित उपकरणों का प्रयोग किया जा सकता है। |
| 12. परिणामों का उपयोग | परिणामों का उपयोग वर्तमान एवं भविष्य में व्यापक मानव-कल्याण और ज्ञान-वृद्धि के लिए किया जाता है। | परिणामों का तत्काल उपयोग कक्षा या विद्यालय की क्रियाओं में सुधार के लिए किया जाता है। |
| 13. समयावधि | परम्परागत अनुसन्धान में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। | क्रियात्मक अनुसन्धान अपेक्षाकृत कम समय में पूरा किया जाता है। |
| 14. धन | इसमें अधिक धन की आवश्यकता हो सकती है। | इसमें अपेक्षाकृत बहुत कम धन की आवश्यकता होती है। |
| 15. श्रम | इसमें अपेक्षाकृत अधिक श्रम की आवश्यकता होती है। | इसमें अपेक्षाकृत कम श्रम की आवश्यकता होती है। |
| 16. सम्बन्धित साहित्य की समीक्षा | सम्बन्धित साहित्य का गहन अध्ययन किया जाता है। | गहन साहित्य-समीक्षा की आवश्यकता सामान्यतः नहीं होती। |
| 17. मूल्यांकन | परिणामों का मूल्यांकन बाह्य विशेषज्ञों द्वारा भी किया जा सकता है। | अभ्यासकर्ता स्वयं मूल्यांकन करता है कि समस्या का समाधान किस सीमा तक हुआ है। |
| 18. प्रकाशन | शोध-परिणाम और सिद्धान्त शोध-पत्रों तथा शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित किए जाते हैं। | परिणाम सामान्यतः औपचारिक रूप से प्रकाशित नहीं किए जाते, बल्कि सम्बन्धित एवं सहयोगी अभ्यासकर्ताओं तक पहुँचाए जाते हैं। |
मुख्य अन्तर का सार
परम्परागत अनुसन्धान का लक्ष्य व्यापक ज्ञान और सिद्धान्तों का निर्माण करना है, इसलिए इसमें वैज्ञानिक कठोरता, विशिष्ट प्रशिक्षण, प्रतिचयन और व्यापक सामान्यीकरण को महत्त्व दिया जाता है। इसके विपरीत क्रियात्मक अनुसन्धान किसी स्थानीय तथा तत्काल समस्या का व्यावहारिक समाधान खोजकर वर्तमान कार्यप्रणाली में सुधार लाने पर केन्द्रित होता है।
- अनुसन्धान के तीन प्रमुख प्रकार मौलिक, प्रयुक्त और क्रियात्मक अनुसन्धान हैं।
- मौलिक अनुसन्धान का उद्देश्य नवीन ज्ञान, सिद्धान्त और सामान्यीकरण विकसित करना है।
- प्रयुक्त अनुसन्धान मौलिक ज्ञान का प्रयोग वास्तविक एवं व्यावहारिक समस्याओं के समाधान में करता है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान कार्यकर्ता द्वारा अपनी तत्काल और स्थानीय समस्या के समाधान तथा कार्य-सुधार के लिए किया जाता है।
- परम्परागत अनुसन्धान का क्षेत्र व्यापक होता है, जबकि क्रियात्मक अनुसन्धान का क्षेत्र सीमित एवं स्थानीय होता है।
- परम्परागत अनुसन्धान में परिणामों का सामान्यीकरण किया जाता है, जबकि क्रियात्मक अनुसन्धान के निष्कर्ष मुख्यतः स्थानीय परिस्थिति तक उपयोगी होते हैं।
- क्रियात्मक अनुसन्धान में शोध-अभिकल्प लचीला, सरल और तत्काल सुधार पर केन्द्रित होता है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान में सामान्यतः कम समय, धन और श्रम की आवश्यकता होती है तथा परिणामों का उपयोग तुरंत किया जाता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान—भूमिका, अर्थ एवं परिभाषाएँ
क्रियात्मक अनुसन्धान की भूमिका
क्रियात्मक अनुसन्धान की अवधारणा अपेक्षाकृत नवीन है। इसका विकास 1930 के दशक के उत्तरार्द्ध में सामाजिक मनोविज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में हुआ। क्रियात्मक अनुसन्धान (Action Research) पद का सर्वप्रथम प्रयोग करने का श्रेय जर्मनी के कर्ट लेविन (Kurt Lewin) को दिया जाता है।
बाद में कोलम्बिया विश्वविद्यालय के शिक्षक प्रो. स्टीफन एम. कोरे ने इस अनुसन्धान-विधि को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। शिक्षा के क्षेत्र में इसका प्रयोग विशेष रूप से शिक्षकों, प्रधानाचार्यों तथा अन्य विद्यालयी कार्यकर्ताओं द्वारा अपनी दैनिक समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान खोजने और कार्यप्रणाली में सुधार लाने के लिए किया जाता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान का अर्थ
क्रियात्मक अनुसन्धान वह अनुसन्धान है जिसमें किसी कार्यक्षेत्र से जुड़ा व्यक्ति अपनी तत्काल और व्यावहारिक समस्या का वैज्ञानिक अध्ययन करके उसका समाधान खोजता है तथा अपने कार्य में सुधार लाने का प्रयास करता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान को व्यावसायिक अनुसन्धान (Vocational Research) भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें किसी व्यवसाय या कार्यक्षेत्र से जुड़ा व्यक्ति अपनी कार्यगत समस्याओं का वैज्ञानिक विधि से समाधान खोजता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान का कार्य-स्वरूप
क्रियात्मक अनुसन्धान केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। इसका प्रयोग प्रबन्ध विज्ञान, प्रशासन, सेना, उद्योग, समाज विज्ञान तथा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की कार्य-विधियों में सुधार लाने के लिए भी किया जाता है।
कठोर मौलिक अनुसन्धान की तुलना में क्रियात्मक अनुसन्धान कार्यकर्ता की वास्तविक दैनिक समस्याओं के अधिक निकट होता है। इसमें उपलब्ध समय और सीमित संसाधनों के भीतर समस्या का व्यावहारिक तथा उपयोगी समाधान प्राप्त करने पर बल दिया जाता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान की मूल बातें
1. अनुसन्धानकर्ता और परिणामों का उपयोगकर्ता प्रायः एक ही व्यक्ति
क्रियात्मक अनुसन्धान में सामान्यतः वही व्यक्ति अनुसन्धान करता है जिसे उसके निष्कर्षों का उपयोग अपने कार्य में करना होता है। उदाहरण के लिए शिक्षक अपनी कक्षा की समस्या पर अनुसन्धान करके प्राप्त परिणामों को स्वयं अपने शिक्षण में लागू करता है।
2. उपयोगिता विशिष्ट क्षेत्र तक सीमित
क्रियात्मक अनुसन्धान किसी विशेष परिस्थिति, संस्था या कार्यक्षेत्र की समस्या को ध्यान में रखकर किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सार्वभौमिक सिद्धान्त बनाना नहीं, बल्कि उस विशेष समस्या का उपयोगी समाधान प्राप्त करना होता है।
3. कार्यकर्ताओं द्वारा किया जाने वाला अनुसन्धान
क्रियात्मक अनुसन्धान प्रायः उसी क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर वे अनुसन्धान को अधिक वैज्ञानिक और वैध बनाने के लिए विशेषज्ञ की सहायता ले सकते हैं, किन्तु अन्तिम जिम्मेदारी अनुसन्धानकर्ता की ही रहती है।
क्रियात्मक अनुसन्धान की प्रमुख परिभाषाएँ
स्टीफन एम. कोरे के अनुसार
क्रियात्मक अनुसन्धान ऐसा अनुसन्धान है जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति अपने उद्देश्यों को अधिक प्रभावी ढंग से प्राप्त करने में सक्षम होता है। शिक्षक अपने शिक्षण और विद्यालय-प्रशासक अपने प्रशासनिक व्यवहार में सुधार के लिए इसका प्रयोग कर सकता है।
गुड के अनुसार
शिक्षकों, पर्यवेक्षकों और प्रशासकों द्वारा अपने निर्णयों तथा क्रियाओं की गुणवत्ता में सुधार लाने के उद्देश्य से किया गया अनुसन्धान क्रियात्मक अनुसन्धान कहलाता है।
जॉन डब्ल्यू. बेस्ट तथा जॉन वी. कान के अनुसार
क्रियात्मक अनुसन्धान तत्काल अनुप्रयोग पर केन्द्रित होता है, न कि सिद्धान्तों के विकास या व्यापक सामान्यीकरण पर। यह स्थानीय परिस्थिति में वर्तमान समस्या के समाधान और स्थानीय उपयोगिता पर विशेष बल देता है।
मौली के अनुसार
किसी तत्काल समस्या के समाधान के उद्देश्य से उसी स्थान पर किया गया अनुसन्धान सामान्यतः शिक्षा के क्षेत्र में क्रियात्मक अनुसन्धान कहलाता है।
प्रो. एस. के. मंगल के अनुसार
क्रियात्मक अनुसन्धान वह अनुसन्धान है जो अभ्यासकर्ता, जैसे शिक्षक या प्रशासक द्वारा अपने तथा अन्य अभ्यासकर्ताओं के लिए किया जाता है।
लुईस कोहेन तथा लॉरेन्स मैनियन के अनुसार
क्रियात्मक अनुसन्धान वास्तविक जगत की क्रियाओं में किए गए लघु-स्तरीय हस्तक्षेप और उस हस्तक्षेप के प्रभावों के निकट परीक्षण से सम्बन्धित है।
सरल शब्दों में क्रियात्मक अनुसन्धान
क्रियात्मक अनुसन्धान को सरल रूप में ऐसा स्थानीय और व्यावहारिक अनुसन्धान कहा जा सकता है जिसमें शिक्षक, प्रशासक या अन्य कार्यकर्ता अपनी वर्तमान समस्या की पहचान करता है, वैज्ञानिक ढंग से उसका अध्ययन करता है, समाधान लागू करता है और यह देखता है कि उसके कार्य में कितना सुधार हुआ।
- क्रियात्मक अनुसन्धान की अवधारणा का विकास 1930 के दशक के उत्तरार्द्ध में हुआ।
- Action Research पद के सर्वप्रथम प्रयोग का श्रेय कर्ट लेविन को दिया जाता है।
- स्टीफन एम. कोरे ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रियात्मक अनुसन्धान को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया।
- क्रियात्मक अनुसन्धान तत्काल और स्थानीय समस्या के वैज्ञानिक समाधान तथा कार्य-सुधार पर केन्द्रित होता है।
- इसमें अनुसन्धानकर्ता और अनुसन्धान के परिणामों का उपयोग करने वाला व्यक्ति प्रायः एक ही होता है।
- इसका उद्देश्य व्यापक सिद्धान्त निर्माण के बजाय किसी विशेष परिस्थिति में व्यावहारिक सुधार करना होता है।
- शिक्षक, प्रधानाचार्य और प्रशासक अपनी कार्यप्रणाली में सुधार के लिए क्रियात्मक अनुसन्धान कर सकते हैं।
- क्रियात्मक अनुसन्धान को व्यावसायिक अनुसन्धान भी कहा जाता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान की विशेषताएँ एवं उदाहरण
क्रियात्मक अनुसन्धान का सम्बन्ध किसी स्थानीय, वास्तविक और तत्काल समस्या के समाधान से होता है। यह केवल समस्या का अध्ययन नहीं करता, बल्कि प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर कार्य में सुधार लाने पर भी बल देता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान की विशेषताएँ
1. चक्रात्मक अध्ययन
क्रियात्मक अनुसन्धान एक ही चरण में समाप्त नहीं होता, बल्कि यह चक्रात्मक प्रक्रिया है। इसमें अनुसन्धान–क्रिया–अनुसन्धान–क्रिया का क्रम निरन्तर चलता रहता है।
प्राप्त निष्कर्षों और किए गए सुधारों का बार-बार मूल्यांकन किया जाता है। आवश्यकता होने पर पुनः समस्या का अध्ययन करके कार्य में नया सुधार किया जाता है।
2. तात्कालिक समस्याओं का अध्ययन
क्रियात्मक अनुसन्धान वर्तमान समय में सामने आई वास्तविक समस्या का घटनास्थल पर ही अध्ययन करता है। इसका सम्बन्ध सामान्यतः स्थानीय और तत्काल समस्याओं से होता है।
अलग-अलग समुदायों और संस्थाओं की समस्याएँ भिन्न हो सकती हैं, इसलिए उनका समाधान भी उनकी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है।
3. क्रियामुखी अनुसन्धान
क्रियात्मक अनुसन्धान में केवल ज्ञान प्राप्त करना पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि प्राप्त ज्ञान के आधार पर वास्तविक कार्य करना आवश्यक होता है। अनुसन्धानकर्ता समस्या का वैज्ञानिक अध्ययन करके अपने निर्णयों और क्रियाओं में सुधार करता है।
इस प्रकार इसमें अध्ययन की अपेक्षा कार्य एवं सुधार के पक्ष को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
4. दैनिक कार्यक्रम का अभिन्न अंग
क्रियात्मक अनुसन्धान सामान्यतः संस्था, समुदाय या विभाग के दैनिक कार्यों से जुड़ा रहता है। इसके लिए अलग से किसी विशेष अनुसन्धान इकाई की स्थापना करना आवश्यक नहीं होता।
समस्या की पहचान, सुधार और पुनः मूल्यांकन की प्रक्रिया दैनिक कार्यों के साथ लगातार चलती रहती है।
5. जनतान्त्रिक भावना पर आधारित
क्रियात्मक अनुसन्धान में समस्या से सम्बन्धित व्यक्तियों की सक्रिय सहभागिता और सहयोग को महत्त्व दिया जाता है। समस्या के समाधान में समुदाय या संस्था के सदस्यों को साथ लेकर कार्य किया जाता है।
इस सहयोगात्मक प्रक्रिया से सदस्यों में पारस्परिक सहयोग और जनतान्त्रिक मूल्यों का विकास होता है।
6. वस्तुपरक अध्ययन
क्रियात्मक अनुसन्धान में शोधकर्ता को समस्या का अध्ययन निष्पक्ष और वस्तुपरक दृष्टिकोण से करना चाहिए। व्यक्तिगत विचार, भावनाएँ, पूर्वाग्रह और मान्यताएँ अध्ययन के निष्कर्षों को प्रभावित नहीं करनी चाहिए।
वस्तुनिष्ठ अध्ययन के कारण समस्या के वास्तविक कारणों की पहचान और उचित समाधान प्राप्त करना अधिक सम्भव होता है।
7. तात्कालिक समस्याओं में सुधार एवं समाधान
कुछ समस्याओं का पूर्ण समाधान तत्काल सम्भव नहीं होता, परन्तु उनमें आवश्यक सुधार किया जा सकता है। क्रियात्मक अनुसन्धान समस्या के कारणों को जानकर उसके समाधान या सुधार दोनों की दिशा में कार्य करता है।
इसलिए इसका उद्देश्य केवल समस्या का वर्णन करना नहीं, बल्कि उसकी वर्तमान स्थिति को बेहतर बनाना भी है।
8. परिकल्पना स्थायी नहीं होती
क्रियात्मक अनुसन्धान की परिकल्पना कठोर और स्थायी नहीं होती। अनुसन्धान के दौरान प्राप्त नए अनुभवों और तथ्यों के आधार पर उसमें आवश्यक परिवर्तन या संशोधन किया जा सकता है।
आवश्यकता पड़ने पर अध्ययन के उद्देश्यों तथा कार्य-योजना में भी परिवर्तन किया जा सकता है।
9. सम्बन्धित सदस्यों द्वारा अनुसन्धान
क्रियात्मक अनुसन्धान में समस्या से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित व्यक्तियों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक होती है। स्थानीय समस्या को वही लोग अधिक अच्छी तरह समझ सकते हैं जो उस परिस्थिति में कार्य कर रहे हों।
बाहरी अनुसन्धानकर्ता की अपेक्षा संस्था या समुदाय के सम्बन्धित सदस्यों की सहभागिता को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
10. अन्य प्रमुख विशेषताएँ
- क्रियात्मक अनुसन्धान अपेक्षाकृत कम औपचारिक और अधिक लचीला होता है।
- इसका उद्देश्य वर्तमान कार्यों और निर्णयों की गुणवत्ता में सुधार करके उन्हें अधिक उपयोगी बनाना है।
- समस्या के अपेक्षित समाधान के रूप में क्रियात्मक परिकल्पना का निर्माण किया जाता है।
- इसका अनुसन्धान-अभिकल्प लचीला एवं गतिशील होता है और आवश्यकता के अनुसार उसमें परिवर्तन किया जा सकता है।
- इसकी मूल प्रवृत्ति स्व-मूल्यांकन है; शिक्षक, प्रधानाचार्य या पर्यवेक्षक अपने ही कार्यों, योजनाओं और निर्णयों का मूल्यांकन करते हैं।
- इसका उद्देश्य कक्षा और विद्यालय की क्रियाओं में निरन्तर सुधार लाना है।
- इसमें अनुसन्धानकर्ता और अभ्यासकर्ता प्रायः एक ही व्यक्ति होता है।
- इसमें अपेक्षाकृत कम समय, धन और श्रम की आवश्यकता होती है तथा सहयोगात्मक सहभागिता को महत्त्व दिया जाता है।
- यह शैक्षिक समस्याओं का वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ, प्रामाणिक और उपयोगी समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास करता है।
- इसका क्षेत्र स्थानीय परिस्थितियों तक सीमित रहता है, इसलिए व्यापक सिद्धान्त-निर्माण या सार्वभौमिक सामान्यीकरण इसका मुख्य उद्देश्य नहीं है।
- इसके परिणाम सामान्यतः औपचारिक रूप से प्रकाशित न होकर सम्बन्धित और सहयोगी अभ्यासकर्ताओं के बीच साझा किए जाते हैं।
- यह अभ्यासकर्ताओं की व्यावसायिक दक्षता बढ़ाने में सहायता करता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान के दो प्रमुख पक्ष
1. निदानात्मक पक्ष
इसमें समस्या उत्पन्न होने के वास्तविक कारणों की खोज की जाती है। सही कारणों की पहचान होने पर ही उपयुक्त सुधारात्मक कार्यवाही निर्धारित की जा सकती है।
2. उपचारात्मक पक्ष
इसमें पहचाने गए कारणों के आधार पर समस्या को दूर करने या उसकी स्थिति में सुधार लाने के उपाय किए जाते हैं। इस प्रकार निदान के बाद सुधारात्मक क्रिया क्रियात्मक अनुसन्धान का आवश्यक भाग बनती है।
क्रियात्मक अनुसन्धान के उदाहरण
विद्यालय और कक्षा की अनेक दैनिक समस्याओं पर क्रियात्मक अनुसन्धान किया जा सकता है। पुस्तक में इसके निम्न उदाहरण दिए गए हैं—
1. कक्षा में अनुशासन की समस्या
कक्षा में अनुशासनहीनता के कारणों का अध्ययन करके उनमें सुधार के लिए उपयुक्त उपायों का प्रयोग करना क्रियात्मक अनुसन्धान का उदाहरण है।
2. छात्रों की वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ
विद्यार्थियों द्वारा बार-बार की जाने वाली वर्तनी सम्बन्धी त्रुटियों के कारणों को पहचानकर उन्हें दूर करने के लिए सुधारात्मक शिक्षण किया जा सकता है।
3. विभिन्न शिक्षण-विधियों की प्रभावशीलता का तुलनात्मक अध्ययन
शिक्षक दो या अधिक शिक्षण-विधियों का प्रयोग करके यह अध्ययन कर सकता है कि विद्यार्थियों के अधिगम के लिए कौन-सी विधि अधिक प्रभावी है। प्राप्त परिणामों के आधार पर वह अपनी शिक्षण-विधि में सुधार कर सकता है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान एक चक्रात्मक, क्रियामुखी और स्थानीय समस्या पर केन्द्रित अध्ययन है।
- यह तत्काल समस्याओं का अध्ययन करके उनके समाधान और कार्य-सुधार पर बल देता है।
- इसका अभिकल्प लचीला होता है और आवश्यकता के अनुसार परिकल्पना तथा योजना में परिवर्तन किया जा सकता है।
- इसमें समस्या से सम्बन्धित सदस्यों की सक्रिय सहभागिता और स्व-मूल्यांकन को महत्त्व दिया जाता है।
- इसमें अनुसन्धानकर्ता और अभ्यासकर्ता प्रायः एक ही व्यक्ति होता है तथा कम समय, धन और श्रम की आवश्यकता होती है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान के निदानात्मक पक्ष में समस्या के कारण खोजे जाते हैं और उपचारात्मक पक्ष में सुधार के उपाय किए जाते हैं।
- कक्षा-अनुशासन, वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ और शिक्षण-विधियों की प्रभावशीलता का अध्ययन इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
क्रियात्मक अनुसन्धान के उद्देश्य एवं कार्यक्षेत्र
क्रियात्मक अनुसन्धान का मुख्य उद्देश्य किसी वास्तविक एवं स्थानीय समस्या का वैज्ञानिक अध्ययन करके कार्यप्रणाली में आवश्यक सुधार लाना है। शिक्षा के क्षेत्र में इसका प्रयोग विशेष रूप से कक्षा और विद्यालय की दैनिक समस्याओं को समझने तथा उनके व्यावहारिक समाधान के लिए किया जाता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान के उद्देश्य
1. व्यावसायिक कुशलता में सुधार
क्रियात्मक अनुसन्धान कार्य-विश्लेषण पर बल देता है और अभ्यासकर्ता को अपने कार्य की वास्तविक स्थिति समझने में सहायता करता है। इसके माध्यम से शिक्षक, प्रधानाचार्य या अन्य कार्यकर्ता अपनी व्यावसायिक कुशलता और कार्य-क्षमता में सुधार कर सकते हैं।
2. विशिष्ट समस्या का समाधान
इसका उद्देश्य किसी निश्चित परिस्थिति में उत्पन्न समस्या की पहचान करना तथा उसका उपयुक्त समाधान प्राप्त करना है। समस्या का अध्ययन उसी वास्तविक परिस्थिति में किया जाता है जिसमें वह उत्पन्न होती है।
3. विद्यालय की दैनिक समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन
विद्यालय में उत्पन्न होने वाली दैनिक समस्याओं का व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन किया जाता है। इससे विद्यालय की कार्यप्रणाली में अपेक्षित सुधार और प्रगति लाने में सहायता मिलती है।
4. प्रजातान्त्रिक मूल्यों का विकास
क्रियात्मक अनुसन्धान में छात्रों, शिक्षकों और अन्य सम्बन्धित व्यक्तियों की सहभागिता को महत्त्व दिया जाता है। इससे विद्यालय की कार्य-पद्धति में सहयोग, सहभागिता और प्रजातान्त्रिक मूल्यों के विकास को प्रोत्साहन मिलता है।
5. कार्यों और निर्णयों की गुणवत्ता में सुधार
क्रियात्मक अनुसन्धान का लक्ष्य किसी दी हुई परिस्थिति में किए जाने वाले कार्यों और निर्णयों की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है। इससे कार्यप्रणाली अधिक उपयोगी, प्रभावी और परिस्थितियों के अनुकूल बनती है।
6. छात्रों के निष्पादन स्तर को ऊँचा करना
शिक्षण-अधिगम की समस्याओं की पहचान करके उचित सुधारात्मक उपाय अपनाने से विद्यार्थियों के प्रदर्शन में सुधार किया जा सकता है। इस प्रकार क्रियात्मक अनुसन्धान छात्रों के निष्पादन स्तर को बढ़ाने में सहायक होता है।
7. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास
क्रियात्मक अनुसन्धान शिक्षकों, प्रधानाध्यापकों, प्रबन्धकों और अन्य विद्यालयी कार्यकर्ताओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करता है। इससे वे समस्याओं पर अनुमान या परम्परा के बजाय तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर विचार करना सीखते हैं।
क्रियात्मक अनुसन्धान का कार्यक्षेत्र
क्रियात्मक अनुसन्धान तत्काल अनुप्रयोग पर केन्द्रित रहता है। इसमें सिद्धान्त निर्माण या व्यापक सामान्यीकरण के स्थान पर स्थानीय परिस्थिति में उपस्थित वर्तमान समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।
शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक कक्षा-कक्ष की अनेक समस्याओं पर क्रियात्मक अनुसन्धान कर सकता है। इससे उसमें वस्तुनिष्ठ चिन्तन, अनुसन्धान-दक्षता, सहयोगपूर्ण कार्य करने की क्षमता तथा व्यावसायिक दक्षता का विकास भी होता है।
1. शिक्षण-अधिगम सम्बन्धी समस्याएँ
शिक्षण-अधिगम से सम्बन्धित ऐसी समस्याएँ जिनका सीधा प्रभाव विद्यार्थियों के सीखने और शिक्षक के शिक्षण पर पड़ता है, क्रियात्मक अनुसन्धान के प्रमुख क्षेत्र हैं। इनमें निम्न समस्याओं का अध्ययन किया जा सकता है—
- शिक्षण में नवीन विधियों को न अपनाने से सम्बन्धित समस्या।
- गृहकार्य से सम्बन्धित समस्या।
- शुद्ध उच्चारण से सम्बन्धित समस्या।
- दक्षता-आधारित शिक्षण-अधिगम की समस्या।
- कक्षा-कार्य संशोधन की समस्या।
- इकाई-शिक्षण की समस्या।
2. मूल्यांकन तथा परीक्षा सम्बन्धी समस्याएँ
मूल्यांकन और परीक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी, विश्वसनीय और वस्तुनिष्ठ बनाने से सम्बन्धित समस्याएँ भी क्रियात्मक अनुसन्धान के अन्तर्गत आती हैं।
- सतत और व्यापक मूल्यांकन से सम्बन्धित समस्या।
- इकाई मूल्यांकन एवं मासिक परीक्षाओं की व्यवस्था से सम्बन्धित समस्या।
- परीक्षा की विश्वसनीयता और वस्तुनिष्ठता से सम्बन्धित समस्या।
3. पाठ्य-सहगामी गतिविधियों सम्बन्धी समस्याएँ
विद्यालय में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए आयोजित पाठ्य-सहगामी गतिविधियों से सम्बन्धित कठिनाइयों का भी क्रियात्मक अनुसन्धान द्वारा अध्ययन किया जा सकता है।
- गतिविधियों के प्रति छात्रों और शिक्षकों की रुचि न होने की समस्या।
- सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन की समस्या।
- समाजोपयोगी उत्पादक कार्य की व्यवस्था सम्बन्धी समस्या।
- खेल के मैदान तथा खेल-उपकरणों की समस्या।
4. विद्यालय प्रबन्धन एवं प्रशासन सम्बन्धी समस्याएँ
विद्यालय की व्यवस्था, प्रशासन, शिक्षक-व्यवहार और सामुदायिक सहयोग से सम्बन्धित अनेक समस्याएँ भी क्रियात्मक अनुसन्धान के कार्यक्षेत्र में आती हैं।
- विद्यालय में शिक्षकों की संख्या कम होने की समस्या।
- बहुकक्षा शिक्षण की कठिनाई।
- नामांकन, ठहराव और उपलब्धि से सम्बन्धित समस्या।
- शिक्षक-अभिभावक सहयोग की समस्या।
- शिक्षकों के विद्यालय में विलम्ब से आने की समस्या।
- विद्यालय को सामुदायिक सहयोग प्राप्त न होने की समस्या।
- शिक्षकों द्वारा सन्दर्शिकाओं का प्रयोग न करने की समस्या।
कार्य क्षेत्र का सार
क्रियात्मक अनुसन्धान का क्षेत्र केवल शिक्षण तक सीमित नहीं है। इसके अन्तर्गत विद्यार्थी-व्यवहार में सुधार, शिक्षक की भूमिका को प्रभावी बनाना, विद्यालयी वातावरण में सुधार तथा पाठ्यक्रम और पाठ्य-सहगामी गतिविधियों को अधिक प्रभावशाली बनाना भी सम्मिलित है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान का उद्देश्य वास्तविक समस्या का समाधान करके कार्यप्रणाली में सुधार लाना है।
- यह व्यावसायिक कुशलता, कार्यों एवं निर्णयों की गुणवत्ता तथा विद्यार्थियों के निष्पादन स्तर में सुधार करता है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान शिक्षकों और विद्यालयी कार्यकर्ताओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करता है।
- इसके प्रमुख कार्यक्षेत्र शिक्षण-अधिगम, मूल्यांकन एवं परीक्षा, पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ तथा विद्यालय प्रबन्धन एवं प्रशासन हैं।
- यह स्थानीय और वर्तमान समस्याओं के अध्ययन पर केन्द्रित रहता है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान द्वारा कक्षा, विद्यालय और विद्यार्थी-व्यवहार से सम्बन्धित अनेक व्यावहारिक समस्याओं का अध्ययन किया जा सकता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान के प्रकार
क्रियात्मक अनुसन्धान का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया गया है। पुस्तक में इसे मुख्य रूप से लक्ष्य, समस्या के स्वरूप तथा विशेषज्ञ की भूमिका के आधार पर अलग-अलग प्रकारों में बाँटा गया है।
1. लक्ष्य के आधार पर क्रियात्मक अनुसन्धान
लेविन (1998) ने लक्ष्य के आधार पर क्रियात्मक अनुसन्धान को दो प्रकारों में विभाजित किया है—
1. सामान्य नियमों की खोज करने वाला क्रियात्मक अनुसन्धान
इस प्रकार के अनुसन्धान में ऐसी सामान्य बातों और नियमों की खोज की जाती है जो सिद्धान्तों तथा कार्य-प्रणालियों के विकास में सहायक हों। प्राप्त निष्कर्ष प्राकृतिक या व्यावहारिक घटनाओं के बारे में सामान्यीकरण करने में भी सहायता करते हैं।
2. किसी विशिष्ट स्थिति का निदान करने वाला क्रियात्मक अनुसन्धान
इसमें किसी विशेष परिस्थिति में उत्पन्न तत्काल समस्या की पहचान और उसका समाधान किया जाता है। इसका उद्देश्य व्यापक सिद्धान्त बनाने के स्थान पर उस विशिष्ट समस्या का व्यावहारिक हल प्राप्त करना होता है।
2. समस्या के स्वरूप के आधार पर क्रियात्मक अनुसन्धान
चिन, कॉक एवं हार्डिंग (Chein, Cock and Harding, 1948) ने समस्या के स्वरूप के आधार पर क्रियात्मक अनुसन्धान को चार प्रकारों में विभाजित किया है—
1. आनुभविक क्रियात्मक अनुसन्धान
आनुभविक अनुसन्धान में प्रेक्षण प्राकृतिक और वास्तविक परिस्थितियों में किए जाते हैं। इसमें अनुसन्धानकर्ता प्रत्यक्ष अनुभव और प्राप्त प्रदत्तों के आधार पर समस्या का अध्ययन करता है।
इसमें पहले इच्छित परिवर्तन लाने के लिए कुछ नीतियाँ अपनाकर उनके प्रभाव का अध्ययन किया जा सकता है। दूसरी स्थिति में व्यक्तियों की विशेषताओं का प्रेक्षण करके उनका मापन किया जाता है और प्रदत्त-संग्रह के लिए वर्णनात्मक प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है।
2. नैदानिक क्रियात्मक अनुसन्धान
नैदानिक अनुसन्धान में किसी परिस्थिति में उपस्थित कमियों और उनके कारणों की पहचान की जाती है। प्राप्त परिणामों के आधार पर ऐसा उपयुक्त कार्यक्रम बनाया जाता है जिससे उन कमियों को दूर किया जा सके।
3. प्रयोगात्मक क्रियात्मक अनुसन्धान
इसमें किसी प्रयोगात्मक चर के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। अनुसन्धानकर्ता यह जानने का प्रयास करता है कि प्रयोगात्मक चर में परिवर्तन करने से किसी निर्धारित प्रतिमान या आश्रित चर पर क्या प्रभाव पड़ता है।
4. सहभागी क्रियात्मक अनुसन्धान
सहभागी अनुसन्धान में अनुसन्धानकर्ता अध्ययन की परिस्थिति में स्वयं सक्रिय सहभागी के रूप में भाग लेता है। वह प्रत्यक्ष प्रेक्षण और सहभागिता के माध्यम से समस्या से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त करता है।
इस दृष्टि से अपने ही कार्यक्षेत्र में अनुसन्धान करने वाले शिक्षक, प्रशासक और अन्य अभ्यासकर्ता सहभागी अनुसन्धानकर्ता माने जा सकते हैं।
3. विशेषज्ञ की भूमिका के आधार पर क्रियात्मक अनुसन्धान
कैटजेल (Katzell, 1960) ने विशेषज्ञ की भूमिका के आधार पर क्रियात्मक अनुसन्धान की तीन स्थितियाँ बताई हैं—
1. संगठन की स्थिति का समय-समय पर अध्ययन
इसमें किसी संगठन या संस्था की स्थिति की निश्चित अन्तराल पर जाँच की जाती है। उदाहरण के लिए वार्षिक सर्वेक्षण द्वारा यह ज्ञात किया जा सकता है कि समय के साथ संस्था में क्या परिवर्तन हुए हैं।
2. विशेषज्ञ द्वारा उपयोगी साधन उपलब्ध कराना
इस स्थिति में विशेषज्ञ कार्यकर्ता को ऐसे साधन या तकनीक उपलब्ध कराता है जिनका प्रयोग व्यावहारिक समस्या के अध्ययन और समाधान में किया जा सके। पुस्तक में इसे कैटजेल की आगन्तुक स्थिति के रूप में भी बताया गया है।
3. छोटे प्रदर्शन समूह का गहन अध्ययन
इसमें छोटे प्रदर्शन समूह का गहराई से अध्ययन किया जाता है और सम्बन्धित विषय के तथ्य लगातार एकत्र किए जाते हैं। आवश्यकता के अनुसार इन तथ्यों को समूह के सामने प्रतिपुष्टि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे कार्य में सुधार किया जा सके।
- क्रियात्मक अनुसन्धान का वर्गीकरण लक्ष्य, समस्या के स्वरूप और विशेषज्ञ की भूमिका के आधार पर किया गया है।
- लेविन ने लक्ष्य के आधार पर सामान्य नियमों की खोज तथा विशिष्ट स्थिति के निदान से सम्बन्धित दो प्रकार बताए हैं।
- चिन, कॉक एवं हार्डिंग ने आनुभविक, नैदानिक, प्रयोगात्मक और सहभागी—चार प्रकार बताए हैं।
- आनुभविक अनुसन्धान प्रत्यक्ष अनुभव और प्रेक्षण, जबकि नैदानिक अनुसन्धान समस्या के कारणों और कमियों की पहचान पर बल देता है।
- प्रयोगात्मक अनुसन्धान में किसी चर के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है और सहभागी अनुसन्धान में अनुसन्धानकर्ता स्वयं परिस्थिति में भाग लेता है।
- कैटजेल ने विशेषज्ञ की भूमिका के आधार पर संगठन के समय-समय पर अध्ययन, उपयोगी साधन उपलब्ध कराने और छोटे समूह के गहन अध्ययन की स्थितियाँ बताई हैं।
क्रियात्मक अनुसन्धान की आवश्यकता, महत्त्व एवं उपयोगिता
क्रियात्मक अनुसन्धान शिक्षक, प्रधानाचार्य, प्रशासक, निदेशक तथा परामर्शदाता जैसे सभी अभ्यासकर्ताओं के लिए उपयोगी है। इसके माध्यम से वे अपने कार्यक्षेत्र की वास्तविक समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन करके उनमें आवश्यक सुधार ला सकते हैं।
विद्यालय में विशेष रूप से शिक्षक अपने शिक्षण-कार्य तथा विद्यार्थियों के व्यवहार से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन कर सकता है। इसी प्रकार प्रशासक और पर्यवेक्षक भी अपने कार्यों एवं दायित्वों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए क्रियात्मक अनुसन्धान का प्रयोग कर सकते हैं।
क्रियात्मक अनुसन्धान की आवश्यकता एवं महत्त्व
1. स्थानीय एवं तात्कालिक समस्याओं का तत्काल समाधान
क्रियात्मक अनुसन्धान स्थानीय और वर्तमान समस्याओं के शीघ्र समाधान पर केन्द्रित होता है। इसके द्वारा विद्यालय या कक्षा की समस्या का उसी परिस्थिति में अध्ययन करके शैक्षिक वातावरण को बेहतर बनाने का प्रयास किया जाता है।
अन्य विस्तृत अनुसन्धान विधियों की अपेक्षा इसमें समस्या के समाधान के लिए अधिक प्रत्यक्ष और तत्काल कार्य किया जा सकता है।
2. घटनास्थल पर ही अध्ययन
क्रियात्मक अनुसन्धान में समस्या का अध्ययन किसी अलग प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि उसी स्थान पर किया जाता है जहाँ समस्या वास्तव में उपस्थित होती है। अनुसन्धानकर्ता वास्तविक जीवन-परिस्थितियों से सम्बन्धित आँकड़े एकत्र करके उनका अध्ययन करता है।
वास्तविक परिस्थिति में अध्ययन होने के कारण प्राप्त परिणाम स्थानीय समस्या को समझने और उसका समाधान खोजने में अधिक उपयोगी होते हैं।
3. समस्या के मूल्यांकन में सहायक
क्रियात्मक अनुसन्धान समस्या का वस्तुनिष्ठ ढंग से मूल्यांकन करने में सहायता करता है। अनुसन्धानकर्ता वास्तविक परिस्थिति का निरीक्षण करके समस्या की प्रकृति और उसके कारणों को समझने का प्रयास करता है।
कई बार अनुसन्धानकर्ता स्वयं सम्बन्धित समूह का सहभागी निरीक्षणकर्ता भी होता है, जिससे उसे समस्या की वास्तविक स्थिति का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त होता है।
4. जनतान्त्रिक मूल्यों के आधार पर शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार
क्रियात्मक अनुसन्धान में समस्या से सम्बन्धित सभी व्यक्तियों के सहयोग और सहभागिता को महत्त्व दिया जाता है। इससे विद्यालय में सामूहिक उत्तरदायित्व और सहयोग की भावना विकसित होती है।
जब समस्या के समाधान में अधिक लोगों की सहभागिता होती है, तो उससे प्राप्त सुधार का लाभ भी व्यापक रूप से मिलता है और शैक्षिक गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
5. लचीली अनुसन्धान पद्धति
क्रियात्मक अनुसन्धान की पद्धति अपेक्षाकृत लचीली होती है। स्थानीय परिस्थितियों और समस्या की आवश्यकता के अनुसार अनुसन्धान की योजना, विधि अथवा क्रियात्मक परिकल्पना में आवश्यक परिवर्तन किए जा सकते हैं।
लचीलापन होने के बावजूद इसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वस्तुनिष्ठता को महत्त्व दिया जाता है।
6. विस्तृत एवं व्यापक कार्यक्षेत्र
यद्यपि क्रियात्मक अनुसन्धान का अध्ययन स्थानीय समस्याओं पर केन्द्रित रहता है, फिर भी इसके अन्तर्गत मानव-सम्बन्धी अनेक प्रकार की तात्कालिक समस्याओं का अध्ययन किया जा सकता है।
इसका क्षेत्र केवल समस्या के निराकरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सुधार, समाधान और आवश्यक नीति-निर्माण तक भी विस्तृत हो सकता है।
7. जनतान्त्रिक मूल्यों के आधार पर समस्या-सुधार
क्रियात्मक अनुसन्धान में अनुसन्धानकर्ता समस्या के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करता है। सम्बन्धित सदस्यों में पारस्परिक सहयोग और सहभागिता के माध्यम से समस्या में सुधार लाने का प्रयास किया जाता है।
इस प्रकार यह केवल समस्या-समाधान नहीं करता, बल्कि कार्यकर्ताओं में जनतान्त्रिक व्यवहार और सामूहिक जिम्मेदारी का विकास भी करता है।
8. प्राप्त निष्कर्षों की अनुप्रयुक्त वैधता
क्रियात्मक अनुसन्धान से प्राप्त निष्कर्ष उसी स्थानीय परिस्थिति और सामाजिक इकाई की समस्या के समाधान के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। इसलिए उस विशेष परिस्थिति में उनकी व्यावहारिक उपयोगिता अधिक होती है।
परिणामों का प्रयोग उसी क्षेत्र में किया जाता है जहाँ उनका परीक्षण हुआ है, इसलिए वहाँ उनकी अनुप्रयुक्त वैधता उच्च होती है।
9. सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहायक
क्रियात्मक अनुसन्धान केवल विद्यालयी समस्याओं तक सीमित नहीं है। यह विभिन्न सामाजिक समस्याओं को समझने, उनके कारणों का अध्ययन करने और उनका व्यावहारिक समाधान खोजने में भी सहायक होता है।
लेविन के अनुसार विभिन्न प्रकार की सामाजिक समस्याओं को समझने और उनके समाधान में क्रियात्मक अनुसन्धान महत्त्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान की उपयोगिता
1. कक्षा-कक्ष की समस्याओं का समाधान
क्रियात्मक अनुसन्धान द्वारा अधिगम और शिक्षण से सम्बन्धित कक्षा-कक्ष की समस्याओं का अध्ययन किया जा सकता है। उनके समाधान से विद्यालय की कार्यप्रणाली में आवश्यक सुधार आता है।
2. परिणामों का तत्काल प्रयोग
क्रियात्मक अनुसन्धान से प्राप्त निष्कर्षों और सुझावों को व्यवहार में तुरंत लागू किया जा सकता है। इससे समस्या के समाधान के लिए अनुसन्धान और क्रिया के बीच अनावश्यक दूरी नहीं रहती।
3. शैक्षिक तकनीकों एवं नवाचारों के प्रयोग में सहायक
यह नई शैक्षिक तकनीकों और नवाचारों से उत्पन्न परिस्थितियों का सामना करने में सहायता करता है। इनके प्रभाव का अध्ययन करके उपयोगी नवाचारों को विद्यालयी कार्यों में लागू किया जा सकता है।
4. विद्यालय की उपलब्धि में वृद्धि
विद्यालय की वास्तविक समस्याओं का अध्ययन और समाधान करके क्रियात्मक अनुसन्धान शैक्षिक उपलब्धि में वृद्धि करने में सहायता करता है। इससे शिक्षण तथा विद्यालयी कार्य अधिक प्रभावी बनते हैं।
5. समस्या को निकट से समझने में सहायक
क्रियात्मक अनुसन्धान में अनुसन्धानकर्ता को न्यादर्श सम्बन्धी जटिलताओं का सामना सामान्यतः नहीं करना पड़ता, क्योंकि वह अपने ही स्थानीय कार्यक्षेत्र की समस्या का अध्ययन करता है।
इस कारण वह समस्या को निकट से देख सकता है और उसकी वास्तविक प्रकृति को अधिक अच्छी तरह समझ सकता है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान स्थानीय और तात्कालिक समस्याओं के व्यावहारिक समाधान के लिए आवश्यक है।
- इसमें समस्या का अध्ययन उसी वास्तविक परिस्थिति या घटनास्थल पर किया जाता है जहाँ वह उत्पन्न होती है।
- यह समस्या के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन तथा शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार में सहायक है।
- इसकी पद्धति लचीली होती है और आवश्यकता के अनुसार अनुसन्धान-योजना में परिवर्तन किया जा सकता है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान सहयोग, सहभागिता और जनतान्त्रिक मूल्यों के विकास को प्रोत्साहित करता है।
- इसके निष्कर्ष स्थानीय परिस्थितियों में तत्काल और व्यावहारिक रूप से उपयोग किए जाते हैं।
- यह कक्षा-कक्ष की समस्याओं, शैक्षिक तकनीकों, नवाचारों तथा सामाजिक समस्याओं के समाधान में उपयोगी है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान विद्यालय की कार्यप्रणाली और शैक्षिक उपलब्धि में सुधार करने में सहायता करता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान के चरण
क्रियात्मक अनुसन्धान में वैज्ञानिक पद्धति का अनुसरण किया जाता है। इसमें समस्या की पहचान से लेकर उसके समाधान, परिणामों के विश्लेषण और प्रतिवेदन तैयार करने तक कार्य को क्रमबद्ध चरणों में पूरा किया जाता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान के प्रमुख चरण
1. समस्यागत क्षेत्रों की पहचान
सबसे पहले उस क्षेत्र की पहचान की जाती है जिसमें सुधार की आवश्यकता है। समस्या-क्षेत्र का निर्धारण करते समय उससे सम्बन्धित शिक्षकों, विद्यार्थियों या अन्य व्यक्तियों की राय भी ली जा सकती है, जिससे वास्तविक समस्या को सही रूप में समझा जा सके।
2. समस्या का निर्धारण
समस्या-क्षेत्र की पहचान के बाद उस विशेष समस्या को स्पष्ट और निश्चित रूप में निर्धारित किया जाता है जिस पर अनुसन्धान करना है। समस्या स्पष्ट हुए बिना उससे सम्बन्धित आँकड़े एकत्र करना या समाधान की योजना बनाना कठिन होता है।
3. कारणों के सन्दर्भ में समस्या का विश्लेषण
निर्धारित समस्या के सम्भावित कारणों का गहराई से विश्लेषण किया जाता है, ताकि उसके वास्तविक और प्रमुख कारणों की पहचान हो सके। यदि समस्या बड़ी हो तो उसे छोटे-छोटे भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग के कारणों का अलग-अलग अध्ययन किया जा सकता है।
4. उद्देश्यों की पहचान
समस्या और उसके कारणों को समझने के बाद अनुसन्धान के स्पष्ट उद्देश्य निर्धारित किए जाते हैं। उद्देश्य यह बताते हैं कि अनुसन्धानकर्ता समस्या में किस प्रकार का परिवर्तन या सुधार प्राप्त करना चाहता है।
5. क्रियात्मक परिकल्पना का निर्माण
समस्या के सम्भावित समाधान के रूप में एक या अधिक क्रियात्मक परिकल्पनाएँ बनाई जाती हैं। इन परिकल्पनाओं के आधार पर अनुसन्धानकर्ता आवश्यक क्रियाएँ करता है और यह जाँचता है कि कौन-सा उपाय समस्या के समाधान में प्रभावी है।
6. कार्य-योजना का निर्माण
समस्या के समाधान के लिए क्रमबद्ध कार्य-योजना तैयार की जाती है। इसमें यह निश्चित किया जाता है कि क्या कार्य करना है, किस प्रकार करना है और समस्या के समाधान के लिए किन साधनों तथा प्रक्रियाओं का प्रयोग किया जाएगा।
7. योजना का क्रियान्वयन
तैयार की गई कार्य-योजना को वास्तविक परिस्थिति में लागू किया जाता है। अनुसन्धानकर्ता को योजना के अनुसार कार्य करना चाहिए, क्योंकि उचित क्रियान्वयन न होने पर अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकते।
8. आँकड़ों का विश्लेषण
क्रियान्वयन के दौरान प्राप्त आँकड़ों को व्यवस्थित करके उनका उचित विश्लेषण किया जाता है। विश्लेषण के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि अपनाए गए उपायों से समस्या में कितना परिवर्तन या सुधार हुआ है।
आँकड़ों का विश्लेषण इस प्रकार किया जाना चाहिए कि उनसे विश्वसनीय और उपयोगी निष्कर्ष प्राप्त हो सकें।
9. परिणाम अथवा निष्कर्ष
आँकड़ों के विश्लेषण के आधार पर अनुसन्धान के परिणाम और निष्कर्ष निर्धारित किए जाते हैं। इनसे यह स्पष्ट होता है कि क्रियात्मक परिकल्पना और अपनाई गई कार्य-योजना समस्या के समाधान में कितनी प्रभावी रही।
10. प्रतिवेदन तैयार करना
अन्तिम चरण में सम्पूर्ण अनुसन्धान का व्यवस्थित और विस्तृत प्रतिवेदन तैयार किया जाता है। इसमें समस्या, प्रक्रिया, अपनाए गए उपाय, प्राप्त आँकड़े, परिणाम तथा निष्कर्ष स्पष्ट रूप से लिखे जाते हैं।
प्रतिवेदन में केवल सकारात्मक परिणाम ही नहीं, बल्कि ऐसे तथ्य और प्रयास भी लिखे जाने चाहिए जिनसे अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हुई। इससे भविष्य में उसी प्रकार का अनुसन्धान करने वाले व्यक्तियों को उपयोगी मार्गदर्शन मिलता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान के चरणों का क्रम
समस्यागत क्षेत्र की पहचान → समस्या का निर्धारण → कारणों का विश्लेषण → उद्देश्यों की पहचान → क्रियात्मक परिकल्पना → कार्य-योजना → योजना का क्रियान्वयन → आँकड़ों का विश्लेषण → निष्कर्ष → प्रतिवेदन।
- क्रियात्मक अनुसन्धान वैज्ञानिक एवं क्रमबद्ध प्रक्रिया है।
- इसका प्रथम चरण समस्यागत क्षेत्र की पहचान और उसके बाद वास्तविक समस्या का स्पष्ट निर्धारण करना है।
- समस्या के कारणों का विश्लेषण करके अनुसन्धान के उद्देश्य निर्धारित किए जाते हैं।
- समस्या के सम्भावित समाधान के रूप में क्रियात्मक परिकल्पना बनाई जाती है।
- परिकल्पना के आधार पर कार्य-योजना बनाकर उसे वास्तविक परिस्थिति में लागू किया जाता है।
- प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण करके परिणाम और निष्कर्ष निकाले जाते हैं।
- अन्त में सम्पूर्ण अनुसन्धान प्रक्रिया और परिणामों का प्रतिवेदन तैयार किया जाता है।
क्रियात्मक अनुसन्धान की सीमाएँ
क्रियात्मक अनुसन्धान स्थानीय और व्यावहारिक समस्याओं के समाधान में उपयोगी है, परन्तु इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। इसका क्षेत्र सीमित होने, अनुसन्धानकर्ता के विशेष प्रशिक्षण का अभाव तथा वैज्ञानिक नियन्त्रण कम होने के कारण इसके निष्कर्षों का उपयोग सावधानी से करना चाहिए।
क्रियात्मक अनुसन्धान की प्रमुख सीमाएँ
1. सामान्यीकरण का अभाव
क्रियात्मक अनुसन्धान में प्रत्येक समस्या का अध्ययन उसकी विशेष स्थानीय परिस्थिति में किया जाता है। एक विद्यालय या कक्षा में प्राप्त निष्कर्ष आवश्यक नहीं कि दूसरी परिस्थिति में भी समान रूप से लागू हों।
इसलिए वैज्ञानिक अनुसन्धान की तुलना में इसके परिणामों का व्यापक सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता।
2. वैज्ञानिक कठोरता का अभाव
क्रियात्मक अनुसन्धान में आधारभूत या परम्परागत अनुसन्धान की तरह कठोर वैज्ञानिक नियन्त्रण सामान्यतः नहीं रखा जाता। इसमें परिस्थितियों के अनुसार केवल आवश्यक और व्यावहारिक नियन्त्रण का प्रयोग किया जाता है।
इस कारण इसे पूर्ण रूप से कठोर वैज्ञानिक अनुसन्धान के समान नहीं माना जाता।
3. सीमित उपयोग
क्रियात्मक अनुसन्धान का उपयोग मुख्यतः स्थानीय लोगों की वर्तमान समस्याओं के अध्ययन और समाधान तक सीमित रहता है। इसके परिणाम किसी विशेष कक्षा, विद्यालय या संस्था की परिस्थिति के लिए अधिक उपयोगी होते हैं।
4. अनुसन्धानकर्ता को उच्चस्तरीय तकनीकी प्रशिक्षण का अभाव
क्रियात्मक अनुसन्धान प्रायः शिक्षक, प्रधानाचार्य या अन्य सामान्य रूप से शिक्षित अभ्यासकर्ताओं द्वारा किया जाता है। इनमें से सभी व्यक्तियों को अनुसन्धान की उन्नत तकनीकों और वैज्ञानिक विधियों का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त नहीं होता।
प्रशिक्षण और अनुसन्धान-अनुभव की कमी के कारण अध्ययन की गुणवत्ता अपेक्षित वैज्ञानिक स्तर तक न पहुँचने की सम्भावना रहती है।
5. परिणामों में विश्वसनीयता एवं वैधता का अभाव
विद्यालय की दैनिक परिस्थितियों का पूर्ण वैज्ञानिक नियन्त्रण कठिन होता है। यदि अनुसन्धानकर्ता क्रियात्मक अनुसन्धान की विधियों में पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित न हो, तो प्राप्त परिणामों की वस्तुनिष्ठता, विश्वसनीयता और वैधता प्रभावित हो सकती है।
6. प्राप्त निष्कर्षों की सीमित अनुप्रयुक्तता
क्रियात्मक अनुसन्धान से प्राप्त निष्कर्ष सामान्यतः उसी स्थानीय वातावरण के लिए उपयुक्त होते हैं जिसमें अनुसन्धान किया गया है। इसलिए इनके उपयोग का क्षेत्र अधिक व्यापक नहीं होता।
7. अनुसन्धान अभिकल्प में दोष
क्रियात्मक अनुसन्धान के अभिकल्प में प्रायः यादृच्छिक प्रतिचयन का अभाव रहता है और समस्या के अध्ययन पर अधिक बल दिया जाता है। साथ ही इसका अभिकल्प अपेक्षाकृत सरल तथा नियन्त्रण कम कठोर होता है।
इन कारणों से अनुसन्धान-अभिकल्प में कुछ वैज्ञानिक सीमाएँ बनी रह सकती हैं।
अन्य सीमाएँ
- कुछ आलोचकों के अनुसार सामान्य बुद्धि और अनुभव के प्रयोग से भी अनेक शिक्षण-अधिगम समस्याओं का समाधान किया जा सकता है, इसलिए प्रत्येक समस्या के लिए क्रियात्मक अनुसन्धान आवश्यक नहीं माना जाता।
- क्रियात्मक अनुसन्धान को सहयोगात्मक प्रयास के रूप में करने पर कभी-कभी इसकी प्रक्रिया अधिक कठिन और जटिल हो सकती है।
- शोधकर्ता अनुसन्धान के सिद्धान्तों और प्रक्रिया से परिचित हो सकता है, परन्तु सामान्य शिक्षक अनुसन्धान गतिविधियों में उतना प्रशिक्षित नहीं होता। इससे निष्कर्ष निकालने में त्रुटि की सम्भावना रहती है।
- अनुसन्धान के लिए सूझ-बूझ, विशेष संवेदनशीलता और पर्याप्त समय की आवश्यकता होती है। शिक्षक की दैनिक जिम्मेदारियों के कारण इतनी लम्बी प्रक्रिया को पूरा करना कठिन हो सकता है।
- बेस्ट एवं कान के अनुसार क्रियात्मक अनुसन्धान सामान्य समझ और अनुभव के अनुप्रयोग तथा अच्छे प्रबन्ध से बहुत अधिक दूर नहीं है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान के परिणामों का व्यापक सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता।
- इसमें परम्परागत अनुसन्धान जैसी वैज्ञानिक कठोरता और पूर्ण नियन्त्रण का अभाव रहता है।
- इसका उपयोग मुख्यतः स्थानीय और वर्तमान समस्याओं तक सीमित होता है।
- अनुसन्धानकर्ता को उच्चस्तरीय तकनीकी प्रशिक्षण न होने से अध्ययन की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
- पर्याप्त प्रशिक्षण और नियन्त्रण के अभाव में परिणामों की विश्वसनीयता तथा वैधता कम हो सकती है।
- इसके निष्कर्ष सामान्यतः उसी स्थानीय वातावरण में अधिक उपयोगी होते हैं जहाँ अनुसन्धान किया गया हो।
- सरल अभिकल्प, यादृच्छिक प्रतिचयन का अभाव और कम कठोर नियन्त्रण इसकी प्रमुख वैज्ञानिक सीमाएँ हैं।
क्रियात्मक अनुसन्धान प्रतिवेदन एवं शोध योजना का प्रारूप
क्रियात्मक अनुसन्धान पूरा होने के बाद उसकी समस्या, उद्देश्य, प्रक्रिया, प्राप्त आँकड़ों, निष्कर्षों और सुधारात्मक कार्यों को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस व्यवस्थित लिखित विवरण को क्रियात्मक अनुसन्धान प्रतिवेदन कहते हैं।
प्रतिवेदन का प्रारूप ऐसा होना चाहिए कि पाठक अनुसन्धान की पूरी प्रक्रिया को आसानी से समझ सके। पुस्तक के अनुसार अनुसन्धान प्रतिवेदन को सामान्यतः प्रारम्भिक भाग, मुख्य भाग और सन्दर्भ विभाग में विभाजित किया जा सकता है।
क्रियात्मक शोध योजना का प्रारूप
क्रियात्मक शोध प्रारम्भ करने से पहले उसकी योजना का एक निश्चित प्रारूप तैयार किया जाता है। इसमें अनुसन्धानकर्ता और अनुसन्धान से सम्बन्धित आवश्यक परिचयात्मक सूचनाएँ दी जाती हैं।
शोध योजना के प्रारूप में विश्वविद्यालय या संस्था का नाम एवं पता, अनुसन्धानकर्ता का नाम, विद्यालय, क्षेत्र अथवा अंचल, जिला, संकाय, सत्र, अनुक्रमांक, पंजीयन संख्या, शोध का विषय, पत्र संख्या तथा निर्देशनकर्ता का नाम जैसी सूचनाएँ सम्मिलित की जा सकती हैं।
क्रियात्मक अनुसन्धान प्रतिवेदन के प्रमुख भाग
1. प्रारम्भिक भाग
प्रतिवेदन का प्रारम्भिक भाग मुख्य अनुसन्धान-विवरण से पहले आवश्यक परिचयात्मक सामग्री प्रस्तुत करता है। इससे पाठक को शोध की पहचान, संगठन और विषय-वस्तु की प्रारम्भिक जानकारी प्राप्त होती है।
1. शीर्षक पृष्ठ
शीर्षक पृष्ठ पर अनुसन्धानकर्ता का नाम, शोध का शीर्षक, सम्बन्धित संस्था का नाम तथा प्रतिवेदन प्रस्तुत करने की तिथि जैसी आवश्यक सूचनाएँ दी जाती हैं। प्रकाशित शोध में प्रकाशक का नाम, स्थान और तिथि भी दी जा सकती है।
2. विषय-सूची
विषय-सूची में प्रतिवेदन के अध्यायों, उपशीर्षकों और आवश्यक प्रकरणों को क्रमबद्ध रूप में दिया जाता है। इससे पाठक किसी विशेष विषय को प्रतिवेदन में आसानी से खोज सकता है।
3. आभार स्वीकृति पृष्ठ
इस भाग में अनुसन्धानकर्ता अध्ययन के दौरान सहायता और मार्गदर्शन देने वाले व्यक्तियों तथा संस्थाओं के प्रति आभार व्यक्त करता है। आभार सरल, शिष्ट और संक्षिप्त रूप में लिखा जाना चाहिए।
4. प्राक्कथन
प्राक्कथन में अनुसन्धान के क्षेत्र, उद्देश्य और सामान्य स्वरूप का संक्षिप्त परिचय दिया जाता है। यह पाठक को अध्ययन की पृष्ठभूमि और उसके विषय को समझने में सहायता करता है।
5. सारणियों एवं आकृतियों की सूची
प्रतिवेदन में प्रयुक्त सारणियों, रेखाचित्रों तथा अन्य आकृतियों की अलग सूची दी जा सकती है। इससे प्रदत्तों और निष्कर्षों से सम्बन्धित आवश्यक सामग्री को शीघ्र खोजने में सुविधा होती है।
2. प्रतिवेदन का मुख्य भाग
प्रतिवेदन का मुख्य भाग सम्पूर्ण अनुसन्धान का वास्तविक विवरण प्रस्तुत करता है। इसमें समस्या से लेकर अनुसन्धान प्रक्रिया और निष्कर्ष तक सभी आवश्यक तथ्य क्रमबद्ध रूप से लिखे जाते हैं।
1. विषय-प्रवेश
विषय-प्रवेश प्रतिवेदन का प्रारम्भिक मुख्य भाग है। इसमें समस्या के चयन की पृष्ठभूमि, अध्ययन के उद्देश्य, महत्त्व और अनुसन्धान की आवश्यकता का संक्षिप्त विवरण दिया जाता है।
समस्या
अनुसन्धान की समस्या को स्पष्ट, निश्चित और तार्किक रूप में लिखा जाना चाहिए। समस्या के क्षेत्र की सीमा निर्धारित करने तथा आवश्यक तकनीकी शब्दों का अर्थ स्पष्ट करने से पाठक अध्ययन के वास्तविक स्वरूप को समझ सकता है।
सम्बन्धित साहित्य का सर्वेक्षण
अनुसन्धानकर्ता को अपनी समस्या से सम्बन्धित पूर्व अध्ययनों और उपलब्ध साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। इससे उसे पहले किए गए कार्य, उपलब्ध निष्कर्षों और अभी शेष प्रश्नों की जानकारी प्राप्त होती है।
सम्बन्धित साहित्य का अध्ययन अनावश्यक पुनरावृत्ति से बचाता है और वर्तमान अनुसन्धान को उचित दिशा प्रदान करता है।
2. प्रक्रिया
इस भाग में अनुसन्धान में अपनाई गई पूरी कार्य-विधि का विवरण दिया जाता है। इसमें प्रदत्तों के संग्रह, उन्हें व्यवस्थित करने, विश्लेषण करने तथा प्रयुक्त प्रविधियों और उपकरणों की जानकारी सम्मिलित होती है।
जिन स्रोतों से प्रदत्त प्राप्त किए गए हैं, उनकी प्रकृति, विश्वसनीयता और वैधता का भी उल्लेख किया जाना चाहिए। जिन विधियों का प्रयोग नहीं किया गया हो और जिनका उल्लेख आवश्यक हो, उन्हें भी स्पष्ट किया जा सकता है।
3. खोजें अथवा प्राप्त परिणाम
अनुसन्धान से प्राप्त प्रमुख परिणामों को स्पष्ट और क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जहाँ आवश्यक हो, प्रदत्तों को सारणियों, सांख्यिकीय रेखाचित्रों, चित्रों या अन्य उपयुक्त रूपों में दिखाया जा सकता है।
अत्यधिक विस्तृत मूल प्रदत्तों को मुख्य भाग में देने के स्थान पर परिशिष्ट में रखा जा सकता है, जिससे प्रतिवेदन का मुख्य भाग सरल और पठनीय बना रहे।
4. निष्कर्ष
प्राप्त परिणामों और उनके विश्लेषण के आधार पर अनुसन्धान के निष्कर्ष प्रस्तुत किए जाते हैं। निष्कर्ष केवल उन्हीं तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित होने चाहिए जो अध्ययन से प्राप्त हुए हों।
निष्कर्ष लिखते समय उनकी सीमा, प्रयुक्त न्यादर्श, प्रदत्त-संग्रह की विधियों तथा अध्ययन की परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए। सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के परिणामों को उचित स्थान दिया जाना चाहिए।
3. सन्दर्भ विभाग
सन्दर्भ विभाग में उन स्रोतों और सहायक सामग्रियों का विवरण दिया जाता है जिनका अनुसन्धान के दौरान उपयोग किया गया है। इससे अध्ययन की प्रामाणिकता बढ़ती है और पाठक आवश्यकता पड़ने पर मूल स्रोतों तक पहुँच सकता है।
1. पाद-टिप्पणियाँ
पाद-टिप्पणियों का प्रयोग किसी कथन की अतिरिक्त व्याख्या, उदाहरण या उसके स्रोत को स्पष्ट करने के लिए किया जाता है। इन्हें सामान्यतः उसी पृष्ठ के नीचे दिया जाता है।
2. ग्रन्थ-सूची
ग्रन्थ-सूची में अनुसन्धान के लिए प्रयुक्त पुस्तकों, शोध-प्रबन्धों, लेखों तथा अन्य सम्बन्धित साहित्य का व्यवस्थित विवरण दिया जाता है। इससे पाठक सम्बन्धित विषय पर आगे अध्ययन कर सकता है।
सन्दर्भों को वर्णमाला, विषय, प्रकरण या अन्य उपयुक्त क्रम में व्यवस्थित किया जा सकता है। सामान्यतः केवल उन्हीं स्रोतों का उल्लेख करना चाहिए जिनका अनुसन्धान में वास्तविक रूप से उपयोग किया गया हो।
3. सारणियाँ एवं आकृतियाँ
प्रदत्तों को स्पष्ट और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करने के लिए आवश्यकतानुसार सारणी, रेखाचित्र, फोटोग्राफ और मानचित्र आदि का प्रयोग किया जा सकता है। इनसे जटिल तथ्यों और सम्बन्धों को समझना सरल हो जाता है।
4. परिशिष्ट
परिशिष्ट में ऐसी सहायक सामग्री रखी जाती है जो अनुसन्धान को समझने के लिए उपयोगी हो, परन्तु उसे मुख्य प्रतिवेदन में देने से विषय के प्रवाह में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
प्रश्नावली, पत्र, परीक्षण, विस्तृत सारणियाँ तथा अन्य अनुसन्धान उपकरण परिशिष्ट में रखे जा सकते हैं। सामग्री को यथासम्भव उसी रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए जिस रूप में उसका अनुसन्धान में प्रयोग किया गया था।
5. अभिसूचक
अभिसूचक उपयोगी और विस्तृत प्रतिवेदन में विषयों, उपविषयों तथा महत्त्वपूर्ण नामों को शीघ्र खोजने में सहायता करता है। इसे सामान्यतः वर्णानुक्रम अथवा व्यवस्थित विषय-क्रम में तैयार किया जाता है।
प्रतिवेदन तैयार करते समय ध्यान रखने योग्य बात
क्रियात्मक अनुसन्धान प्रतिवेदन में केवल सफल परिणामों को दिखाना उचित नहीं है। जिन प्रयासों से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुए, उनका उल्लेख भी किया जाना चाहिए, क्योंकि उनसे भविष्य में अनुसन्धान करने वाले व्यक्तियों को उपयोगी मार्गदर्शन मिलता है।
- क्रियात्मक अनुसन्धान प्रतिवेदन में सम्पूर्ण अनुसन्धान प्रक्रिया को क्रमबद्ध और स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया जाता है।
- प्रतिवेदन के तीन प्रमुख भाग—प्रारम्भिक भाग, मुख्य भाग और सन्दर्भ विभाग हैं।
- प्रारम्भिक भाग में शीर्षक पृष्ठ, विषय-सूची, आभार, प्राक्कथन तथा सारणियों एवं आकृतियों की सूची आती है।
- मुख्य भाग में विषय-प्रवेश, समस्या, सम्बन्धित साहित्य, प्रक्रिया, प्राप्त परिणाम और निष्कर्ष सम्मिलित होते हैं।
- सन्दर्भ विभाग में पाद-टिप्पणियाँ, ग्रन्थ-सूची तथा आवश्यक सहायक सामग्री दी जाती है।
- प्रश्नावली, परीक्षण, पत्र और विस्तृत प्रदत्त जैसी सामग्री परिशिष्ट में रखी जा सकती है।
- प्रतिवेदन में सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों प्रकार के परिणामों का उल्लेख करना चाहिए।
क्रियात्मक शोध उपकरण निर्माण, सम्पादन एवं अभिलेखीकरण
क्रियात्मक अनुसन्धान में समस्या से सम्बन्धित आवश्यक तथ्यों और प्रदत्तों को एकत्र करने के लिए उपयुक्त शोध-उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद प्राप्त सामग्री को व्यवस्थित करके अनुसन्धान की पूरी प्रक्रिया, परिणाम और निष्कर्षों का अभिलेखीकरण किया जाता है।
क्रियात्मक शोध के प्रमुख उपकरण
अनुसन्धान की समस्या और आवश्यकता के अनुसार विभिन्न उपकरणों का प्रयोग किया जा सकता है। पुस्तक में क्रियात्मक शोध के लिए निम्न प्रमुख उपकरण बताए गए हैं—
- अवलोकन
- परीक्षण
- साक्षात्कार
- प्रश्नावली
- निर्धारण मापनी
- समाजमिति
- संचयी अभिलेख
अनुसन्धानकर्ता समस्या की प्रकृति के अनुसार इनमें से उपयुक्त उपकरण का चयन करता है। इनके माध्यम से प्राप्त प्रदत्तों को आगे विश्लेषण और निष्कर्ष निकालने के लिए व्यवस्थित किया जाता है।
क्रियात्मक शोध का सम्पादन एवं अभिलेखीकरण
क्रियात्मक शोध में किए गए प्रत्येक महत्त्वपूर्ण कार्य को क्रमबद्ध रूप से लिखना और सुरक्षित रखना आवश्यक होता है। इसमें समस्या की पहचान, उसके कारण, उद्देश्य, क्रियात्मक परिकल्पना, कार्य-योजना, प्राप्त प्रदत्त, उनका विश्लेषण तथा निष्कर्ष आदि का अभिलेख तैयार किया जाता है।
पुस्तक में इसकी प्रक्रिया को समझाने के लिए विद्यार्थियों की अंग्रेजी पठन-पाठन में कम रुचि से सम्बन्धित एक उदाहरण दिया गया है।
उदाहरण—विद्यार्थियों में अंग्रेजी पठन-पाठन के प्रति अभिरुचि का कम होना
1. समस्यागत क्षेत्र की पहचान
कक्षा 7 के विद्यार्थियों को लगभग पाँच माह तक अंग्रेजी पढ़ाने के बाद यह अनुभव किया गया कि अनेक विद्यार्थी अंग्रेजी पढ़ने और लिखने में कम रुचि लेते हैं। कुछ विद्यार्थी अंग्रेजी के समय बचने का प्रयास करते थे तथा अध्ययन में थकान और उदासीनता दिखाई देती थी।
इस स्थिति पर प्रधानाचार्य और अन्य शिक्षकों से भी चर्चा की गई तथा इसे अनुसन्धान योग्य समस्या माना गया।
2. समस्या का स्पष्ट निर्धारण
अध्ययन के लिए समस्या को इस रूप में निर्धारित किया गया कि विद्यार्थियों में अंग्रेजी विषय के पठन-पाठन के प्रति अभिरुचि कम है। इसके बाद इस समस्या के सम्भावित कारणों का अध्ययन किया गया।
3. समस्या के सम्भावित कारण
पुस्तक में विद्यार्थियों की कम रुचि के अनेक सम्भावित कारण बताए गए हैं—
- विद्यार्थियों में व्यक्तिगत भिन्नताएँ।
- संवेगात्मक भिन्नता।
- शारीरिक दोष।
- विद्यार्थियों का पिछड़ापन।
- लेखन पर पर्याप्त ध्यान न देना।
- बौद्धिक क्षमता का कम होना।
- अभिभावकों द्वारा पर्याप्त ध्यान न देना।
- अंग्रेजी का कालांश भोजनावकाश के बाद होना।
- शब्द-भण्डार का कम होना।
- अक्षरों की पहचान में कमजोरी।
- विद्यार्थियों की आदतें तथा पारिवारिक संस्कार।
- आयु-समूह में अन्तर।
- पूर्व शिक्षकों द्वारा समस्या पर पर्याप्त ध्यान न देना।
4. अनुसन्धान के उद्देश्य
समस्या के कारणों को समझने के बाद ऐसे उद्देश्य निर्धारित किए गए जिनसे शिक्षण में सुधार और विद्यार्थियों की रुचि में वृद्धि की जा सके।
- दैनिक शैक्षिक समस्याओं का क्रियात्मक अनुसन्धान द्वारा समाधान करना।
- विद्यार्थियों, शिक्षकों और प्रशासकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना।
- नई और प्रभावी शिक्षण-विधियों का प्रयोग करना।
- कक्षा तथा विद्यालय की वर्तमान स्थिति में सुधार करना।
- विद्यार्थियों की उपलब्धि का स्तर बढ़ाना।
- विद्यार्थियों की क्षमता और निष्पादन में सुधार करना।
- दोषपूर्ण शिक्षण-विधियों को छोड़कर उपयुक्त विधियों का प्रयोग करना।
- कक्षा और विद्यालय की दैनिक समस्याओं का अध्ययन करके उन्हें दूर करना।
5. क्रियात्मक परिकल्पनाएँ
समस्या के सम्भावित समाधान के लिए कुछ क्रियात्मक परिकल्पनाएँ बनाई गईं। इनमें विद्यालय के शिक्षण सम्बन्धी नियमों का उचित पालन, पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था तथा प्रशासन, प्रधानाचार्य, शिक्षक और विद्यार्थियों के सहयोग को महत्त्व दिया गया।
6. कार्य-योजना का निर्माण
समस्या की प्रकृति, उसके कारणों, उद्देश्यों और क्रियात्मक परिकल्पनाओं को ध्यान में रखकर कार्य-योजना तैयार की गई। योजना में यह निर्धारित किया गया कि विद्यार्थियों की रुचि बढ़ाने के लिए कौन-सी शिक्षण-विधि और सामग्री का प्रयोग किया जाएगा।
7. कार्य-योजना का क्रियान्वयन
अंग्रेजी शिक्षण में व्याख्या एवं प्रदर्शन विधि के साथ शिक्षण-सहायक सामग्री का प्रयोग किया गया। प्रधानाचार्य से अंग्रेजी का कालांश भोजनावकाश से पहले रखने का अनुरोध भी किया गया।
विद्यार्थियों को उपलब्धि के आधार पर दो समूहों में बाँटकर चयनित इकाइयों का शिक्षण किया गया और बाद में परीक्षण लिया गया। परिणामों से विद्यार्थियों की प्रगति, विषय में रुचि और सीखी हुई सामग्री के धारण में सुधार दिखाई दिया।
शिक्षण-सहायक सामग्री तथा बार-बार अभ्यास कराने से भी विद्यार्थियों की रुचि बढ़ी। पुस्तक के उदाहरण के अनुसार इन प्रयासों द्वारा समस्या में लगभग 10 प्रतिशत सुधार पाया गया।
8. प्रदत्तों का संग्रह एवं सारणीकरण
अनुसन्धान के दौरान दोनों समूहों के पूर्व-परीक्षण और पश्च-परीक्षण के प्राप्तांकों को एकत्र किया गया। इन प्राप्तांकों को सारणीबद्ध करके दोनों स्थितियों के अन्तर का अध्ययन किया गया।
इस प्रकार व्यवस्थित अभिलेखीकरण से यह जानना आसान होता है कि अपनाई गई क्रिया से विद्यार्थियों के निष्पादन में कितना परिवर्तन आया।
9. प्रदत्तों का विश्लेषण
छोटे स्तर की समस्याओं में प्रदत्तों का विश्लेषण सरल विधियों से किया जा सकता है, जबकि बड़ी समस्या में अधिक विस्तृत विश्लेषण की आवश्यकता हो सकती है। आवश्यकता पड़ने पर सांख्यिकी या अनुसन्धान से सम्बन्धित विशेषज्ञों और प्रशासन की सहायता भी ली जा सकती है।
उचित विश्लेषण से प्राप्त परिणामों की विश्वसनीयता और उपयोगिता को समझने में सहायता मिलती है।
10. अनुसन्धान कार्य का क्रमबद्ध अभिलेख
क्रियात्मक अनुसन्धान में किए गए कार्यों का तिथि के अनुसार क्रमबद्ध अभिलेख रखा जा सकता है। इसमें प्रत्येक तिथि पर की गई गतिविधि, अपनाई गई विधि तथा प्रयुक्त उपकरण का उल्लेख किया जाता है।
ऐसा अभिलेख अनुसन्धान की प्रगति को स्पष्ट करता है और बाद में प्रतिवेदन तैयार करने में सहायता देता है।
11. निष्कर्ष
पुस्तक में दिए गए उदाहरण के प्रारम्भ में लगभग 20 प्रतिशत विद्यार्थियों में अंग्रेजी पठन-पाठन के प्रति कम रुचि बताई गई है। अनुसन्धान के बाद प्राप्त प्रदत्तों से विद्यार्थियों की रुचि और उपस्थिति में सुधार पाया गया, यद्यपि सुधार की प्रक्रिया को आगे जारी रखना आवश्यक माना गया।
उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि विद्यालय और कक्षा की समस्याओं का सही निदान करके तथा विद्यार्थियों के मनोवैज्ञानिक स्तर को ध्यान में रखकर उनमें विषय के प्रति रुचि विकसित की जा सकती है।
12. सन्दर्भ सामग्री
अनुसन्धान के अभिलेखीकरण में प्रयुक्त सन्दर्भ सामग्री का भी उल्लेख किया जाता है। पुस्तक के उदाहरण में निम्न सामग्री का प्रयोग बताया गया है—
- अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तक।
- शिक्षण-अधिगम सामग्री।
- उपलब्धि परीक्षण।
- प्रदर्शन सम्बन्धी उपकरण।
- बुद्धि परीक्षण।
- विद्यार्थियों के अभिलेख।
- क्रियात्मक शोध के प्रमुख उपकरण अवलोकन, परीक्षण, साक्षात्कार, प्रश्नावली, निर्धारण मापनी, समाजमिति और संचयी अभिलेख हैं।
- शोध की समस्या के अनुसार उपयुक्त उपकरण का चयन करके आवश्यक प्रदत्त एकत्र किए जाते हैं।
- क्रियात्मक शोध के अभिलेखीकरण में समस्या, कारण, उद्देश्य, परिकल्पना, कार्य-योजना, क्रियान्वयन, प्रदत्त, विश्लेषण और निष्कर्ष क्रमबद्ध रूप से लिखे जाते हैं।
- प्रदत्तों को पूर्व-परीक्षण, पश्च-परीक्षण और अन्य आवश्यक अभिलेखों के रूप में व्यवस्थित किया जा सकता है।
- तिथि, गतिविधि, विधि और उपकरण का क्रमबद्ध अभिलेख अनुसन्धान की प्रगति को स्पष्ट करता है।
- अन्त में प्राप्त निष्कर्षों के साथ प्रयुक्त पुस्तकों, परीक्षणों, शिक्षण-सामग्री और विद्यार्थी अभिलेखों जैसी सन्दर्भ सामग्री का उल्लेख किया जाता है।