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Home Study Material Semester 3 समावेशी शिक्षा विशिष्ट आवश्यकता वाले बालक
Chapter 1 • समावेशी शिक्षा

विशिष्ट आवश्यकता वाले बालक

UP DELED Semester 3 के विषय समावेशी शिक्षा के इस अध्याय में समावेशी शिक्षा, विशिष्ट आवश्यकता वाले बालक, वंचित एवं समस्यात्मक बालक, दृष्टि, श्रवण, वाणी व अस्थि बाधिता, प्रतिभाशाली बालक, मंद गति से सीखने वाले बालक, अधिगम अक्षमता, शैक्षिक पिछड़ापन तथा मानसिक मन्दता का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

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Topic 1 समावेशी शिक्षा—अर्थ, आवश्यकता, क्षेत्र, उद्देश्य, आधार एवं महत्त्व

समावेशी शिक्षा—अर्थ, आवश्यकता, क्षेत्र, उद्देश्य, आधार एवं महत्त्व

समावेशी शिक्षा का अर्थ

समावेशी शिक्षा ऐसी शिक्षा-व्यवस्था है जिसमें सामान्य और विशिष्ट आवश्यकता वाले सभी बालकों को बिना किसी भेदभाव के एक ही विद्यालय में साथ-साथ शिक्षा दी जाती है। उनकी आवश्यकता के अनुसार आवश्यक तकनीक, शिक्षण-सामग्री और सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

इसका उद्देश्य केवल दिव्यांग या विशिष्ट बालकों को सामान्य विद्यालय में प्रवेश देना नहीं, बल्कि प्रत्येक बालक को समान शैक्षिक अवसर देना और उसे विद्यालय की मुख्यधारा का सक्रिय सदस्य बनाना है। यह शैक्षिक अलगाव को समाप्त करके स्वीकार्यता, सहयोग और सहभागिता को बढ़ावा देती है।

समावेशी शिक्षा की प्रमुख परिभाषाएँ

माइकल एफ. फिनग्रेस के अनुसार

समावेशी शिक्षा मूल्यों, सिद्धान्तों और व्यवहारों का ऐसा समूह है जो सभी विद्यार्थियों के लिए प्रभावशाली एवं अर्थपूर्ण शिक्षा की व्यवस्था करता है। इसमें बालक को किसी विशिष्टता का लेबल प्राप्त हो या न हो, सभी को समान रूप से शिक्षा दी जाती है।

स्टेनबैक तथा स्टेनबैक के अनुसार

समावेशी विद्यालय ऐसा स्थान है जहाँ प्रत्येक बालक को स्वीकार किया जाता है और उसके साथी तथा विद्यालय समुदाय के अन्य सदस्य उसकी शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सहयोग करते हैं।

समावेशी शिक्षा की आवश्यकता

समावेशी शिक्षा समानता, सामाजिक न्याय और सभी बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आवश्यक है। इसकी प्रमुख आवश्यकताएँ निम्नलिखित हैं—

1. समान कक्षा वातावरण में सहभागिता

समावेशी शिक्षा बालकों को अपनी आयु के अन्य विद्यार्थियों के साथ कक्षा की गतिविधियों में भाग लेने का अवसर देती है। इससे वे व्यक्तिगत लक्ष्यों पर कार्य करने के लिए भी प्रेरित होते हैं।

2. व्यक्तिगत शक्तियों का विकास

इसमें प्रत्येक बालक से उचित एवं उच्च अपेक्षाएँ रखी जाती हैं। उसकी व्यक्तिगत योग्यताओं और शक्तियों को पहचानकर उनका विकास करने का प्रयास किया जाता है।

3. माता-पिता की सहभागिता

समावेशी शिक्षा विद्यालय की गतिविधियों और बालक की शिक्षा में माता-पिता की भागीदारी को प्रोत्साहित करती है। इससे विद्यालय और परिवार के बीच सहयोग मजबूत होता है।

4. सम्मान और स्वीकार्यता का विकास

इसमें व्यक्तिगत भिन्नताओं को कमजोरी न मानकर स्वीकार किया जाता है। इससे विद्यालय में सम्मान, सहयोग और अपनापन की संस्कृति विकसित होती है।

5. विविधता के साथ मित्रता

विभिन्न आवश्यकताओं और क्षमताओं वाले बालक साथ पढ़ते हैं, जिससे उनमें एक-दूसरे को समझने और मित्रता करने की क्षमता विकसित होती है। इससे सभी बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने में सहायता मिलती है।

6. प्रत्येक बालक में उच्च अपेक्षाएँ

समावेशी शिक्षा प्रत्येक बालक की व्यक्तिगत शक्तियों के विकास पर बल देती है। बालक को उसकी क्षमता के अनुरूप प्रगति करने के अवसर दिए जाते हैं।

7. स्वाभाविक रूप से सीखने की प्रेरणा

सामान्य वातावरण में अन्य बच्चों के साथ रहने और सीखने से बालक को स्वाभाविक अधिगम के अवसर मिलते हैं। इससे सीखने के प्रति उसकी प्रेरणा बढ़ती है।

8. समान गतिविधियों में भागीदारी

विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों को भी अन्य बालकों के समान कक्षा की गतिविधियों में भाग लेने का अवसर दिया जाता है। इससे उनमें आत्मविश्वास और सामाजिक सहभागिता बढ़ती है।

9. शिक्षण में परिवार का सहयोग

समावेशी शिक्षा बालक की शिक्षण गतिविधियों में माता-पिता को सम्मिलित करने का समर्थन करती है। इससे बालक की आवश्यकताओं को समझना और उचित सहायता देना आसान होता है।

समावेशी शिक्षा का क्षेत्र

1. समावेशी बालकों की समस्याओं का अध्ययन

समावेशी शिक्षा के अन्तर्गत शारीरिक, मानसिक या बौद्धिक रूप से भिन्न बालकों की समस्याओं का गहन अध्ययन किया जाता है। विभिन्न बाधिताओं की प्रकृति को समझकर उनके लिए उपयोगी शिक्षण तकनीकों और उपायों की खोज की जाती है।

2. समस्याओं के सम्बन्ध में अनुसन्धान

बालकों की समस्याओं को समझने के बाद उनके समाधान के लिए अनुसन्धान किया जाता है। अनुसन्धान से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर प्रभावी शैक्षिक उपाय विकसित किए जा सकते हैं।

3. बालकों का सर्वांगीण विकास

समावेशी शिक्षा केवल शैक्षिक विकास तक सीमित नहीं है। यह बालक के सामाजिक, व्यावहारिक, व्यावसायिक और शारीरिक विकास को भी महत्त्व देती है।

4. सहायता हेतु रणनीतियों का निर्माण

विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की सहायता के लिए विशेष विद्यालय, सांस्कृतिक कार्यक्रम, शिक्षण-अधिगम विधियाँ तथा परिवार आधारित सहायता जैसी योजनाएँ तैयार की जाती हैं। इसका क्षेत्र बालक के घर से लेकर समाज और राष्ट्र के विकास तक विस्तृत है।

समावेशी शिक्षा के मूल उद्देश्य

1. सभी बालकों के लिए शिक्षा

समावेशी शिक्षा का मूल विचार “सभी बालकों के लिए शिक्षा” है। इसका उद्देश्य लगभग सभी नहीं, बल्कि प्रत्येक बालक तक शिक्षा पहुँचाना है।

2. समर्थ और असमर्थ बालकों को साथ पढ़ाना

सामान्य और विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों को समान विद्यालय एवं कक्षा में साथ-साथ शिक्षा प्रदान की जाती है। इससे अलगाव की भावना कम होती है।

3. सामाजिक एकता का विकास

बालकों को प्रारम्भ से ही साथ रहने, एक-दूसरे के कार्यों में सहयोग करने और मैत्रीपूर्ण व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे सामाजिक एकता और सहयोग की भावना विकसित होती है।

4. उपयुक्त पाठ्यचर्या और शिक्षण

विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थियों की जरूरतों को ध्यान में रखकर पाठ्यचर्या में आवश्यक परिवर्तन किया जाता है। उनके लिए उपयुक्त शिक्षण कार्य और विधियाँ निर्धारित की जाती हैं।

5. अनुकूल शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक वातावरण

विभिन्न आवश्यकता वाले बालकों के लिए ऐसा विद्यालयी वातावरण बनाया जाना चाहिए जिसमें वे शारीरिक और मानसिक रूप से सुरक्षित महसूस करें। यह उनके अधिगम और समायोजन में सहायक होता है।

6. कक्षा में इष्टतम अधिगम वातावरण

कक्षा के भीतर ऐसा वातावरण प्रदान करना उद्देश्य है जिसमें प्रत्येक बालक अपनी क्षमता के अनुसार अधिकतम सीख सके।

7. निर्देशनात्मक सामग्री का उचित प्रयोग

शिक्षक को विभिन्न शिक्षण-सामग्रियों से परिचित होना चाहिए और उन्हें विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की जरूरत के अनुसार प्रयोग करना चाहिए।

समावेशी शिक्षा को वास्तविक बनाने के आधार

1. आर्थिक आधार

आर्थिक आधार का उद्देश्य सभी बच्चों को कार्य एवं कौशल-विकास के समान अवसर देना तथा विशिष्ट बालकों को आत्मनिर्भर बनाना है। उन्हें व्यवसाय, समायोजन तथा विद्यालयी कार्यों में सहभागिता के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और सहायता दी जानी चाहिए।

  • व्यावसायिक कौशलों के विकास में सहायता करना।
  • सभी को कार्य के समान अवसर प्रदान करना।
  • विशिष्ट बालकों में व्यवसाय एवं समायोजन के प्रति आत्मविश्वास विकसित करना।
  • विद्यालयी कार्य एवं परिस्थितियों में सहभागिता का प्रशिक्षण देना।
  • बालकों को आत्मनिर्भर बनाने में सहयोग करना।
  • उनकी अन्तर्निहित क्षमताओं का विकास करना।
2. सामाजिक आधार

समावेशी शिक्षा का सामाजिक आधार समानता और सभी को समान शैक्षिक अवसर प्रदान करने पर आधारित है। समाज, परिवार और विद्यालय को विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों के विकास और स्वीकार्यता में सहयोग करना चाहिए।

  • समानता के मौलिक अधिकार का पूर्ण उपयोग करना।
  • सभी को शिक्षा के समान अवसर प्रदान करना।
  • विशिष्ट बालकों के विकास के लिए परिवार, समाज और विद्यालय को प्रोत्साहित करना।
  • बालकों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करना।
  • विभिन्न भिन्नताओं को समझना और उनका स्वागत करना।
  • विशिष्ट विद्यालयों में मिलने वाली उपयोगी सेवाएँ सामान्य विद्यालयों में उपलब्ध कराना।
  • सहानुभूति, सहयोग और नैतिकता जैसे गुणों का विकास करना।
3. कानूनी आधार

समावेशी शिक्षा को कानूनी समर्थन भी प्राप्त है। पुस्तक के अनुसार विकलांगता एवं पुनर्वास कार्य योजना 2006–13 के अन्तर्गत विभिन्न अवसरों और समानता का लाभ प्राप्त करना असमर्थ बालकों का अधिकार माना गया है।

समावेशी शिक्षा का महत्त्व

1. राष्ट्र का विकास

राष्ट्र की प्रगति उसके सभी नागरिकों की सहभागिता पर निर्भर करती है। समावेशी शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता के उपयोग का अवसर देकर राष्ट्र के विकास और नव-निर्माण में योगदान करती है।

2. शिक्षा का सार्वभौमिक विकास

शिक्षा तभी सार्वभौमिक हो सकती है जब प्रत्येक बालक के गुण, आवश्यकता और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर शिक्षा दी जाए। समावेशी शिक्षा सभी तक प्राथमिक एवं सामान्य शिक्षा पहुँचाने में सहायक है।

3. सामाजिक समानता का विकास

इसमें रंग, जाति, समुदाय, धर्म, आयु, लिंग तथा शारीरिक या मानसिक भिन्नता के कारण किसी बालक को शिक्षा से वंचित नहीं किया जाता। इस प्रकार यह समान अधिकार और अवसर की भावना को व्यवहार में लागू करती है।

4. समाज के विकास में सहायक

व्यक्ति समाज के निर्माण की मूल इकाई है और शिक्षा व्यक्ति के विकास का प्रमुख साधन है। समावेशी शिक्षा सभी व्यक्तियों की क्षमता विकसित करके समाज की प्रगति में सहायता करती है।

5. बालक के व्यक्तिगत जीवन एवं विकास में सहायक

समावेशी शिक्षा बालक के व्यक्तिगत जीवन को बेहतर बनाने तथा उसके विकास की संभावनाओं को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण है। उसे अपनी योग्यता के अनुरूप आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।

6. सामान्य मानसिक विकास

अलग शिक्षा-व्यवस्था के कारण विशिष्ट बालकों में हीनता या अलगाव की भावना विकसित हो सकती है। सामान्य बालकों के साथ शिक्षा प्राप्त करने से उन्हें मानसिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।

7. संवैधानिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन

समावेशी शिक्षा शिक्षा के अधिकार और समान अवसर से सम्बन्धित संवैधानिक उद्देश्यों को पूरा करने में सहायता करती है। पुस्तक में इस सम्बन्ध में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986, शिक्षा के सार्वभौमीकरण से सम्बन्धित कार्यक्रम, अशक्त बच्चों के लिए समन्वित शिक्षा योजना, सर्वशिक्षा अभियान 2002 तथा समावेशी शिक्षा की क्रियात्मक योजना का उल्लेख किया गया है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • समावेशी शिक्षा में सामान्य और विशिष्ट आवश्यकता वाले सभी बालक एक साथ समान विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करते हैं।
  • इसका आधार समान अवसर, स्वीकार्यता, सहयोग, सहभागिता तथा व्यक्तिगत भिन्नताओं का सम्मान है।
  • समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में बालकों की समस्याओं का अध्ययन, अनुसन्धान, सर्वांगीण विकास और सहायता रणनीतियों का निर्माण शामिल है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य सभी बालकों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना और समर्थ-असमर्थ बालकों को साथ-साथ सीखने का अवसर देना है।
  • समावेशी शिक्षा को वास्तविक बनाने के प्रमुख आधार आर्थिक, सामाजिक और कानूनी हैं।
  • यह सामाजिक समानता, बालक के व्यक्तिगत विकास, सामान्य मानसिक विकास और समाज के विकास में सहायक है।
  • समावेशी शिक्षा प्रत्येक बालक को उसकी क्षमता और आवश्यकता के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है।
  • राष्ट्र के विकास तथा संवैधानिक शैक्षिक उत्तरदायित्वों के निर्वहन में भी समावेशी शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

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Topic 2 विशिष्ट आवश्यकता वाले बालक—अर्थ, विशेषताएँ, पहचान एवं वर्गीकरण

विशिष्ट आवश्यकता वाले बालक—अर्थ, विशेषताएँ, पहचान एवं वर्गीकरण

विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों का अर्थ

वे बालक जो अपनी योग्यताओं, क्षमताओं, व्यक्तित्व, व्यवहार अथवा विकास की दृष्टि से अपनी आयु के सामान्य बालकों से पर्याप्त रूप से भिन्न होते हैं, विशिष्ट आवश्यकता वाले बालक कहलाते हैं। यह भिन्नता सामान्य स्तर से अधिक भी हो सकती है और कम भी।

ऐसे बालकों का मानसिक, शारीरिक, सामाजिक या संवेगात्मक विकास सामान्य बालकों से अलग हो सकता है। इसलिए उनकी क्षमताओं के उचित विकास के लिए विशेष शिक्षा, अनुदेशन, सेवाओं तथा देखभाल की आवश्यकता होती है।

विशिष्ट बालकों की प्रमुख परिभाषाएँ

क्रो एवं क्रो के अनुसार

विशिष्ट शब्द ऐसे गुण अथवा गुण रखने वाले व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है जिसके कारण वह अपने साथियों का विशेष ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है।

हीबर्ड के अनुसार

विशिष्ट बालकों में वे बच्चे सम्मिलित होते हैं जिन्हें सीखने में कठिनाई होती है, जिनका मानसिक या शैक्षिक निष्पादन अत्यन्त उच्च या निम्न होता है, जिनमें व्यावहारिक, संवेगात्मक अथवा सामाजिक समस्याएँ होती हैं या जो किसी शारीरिक निर्बलता से प्रभावित होते हैं। उनकी आवश्यकताओं के कारण उनके लिए अलग अथवा विशिष्ट शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ सकती है।

हेक के अनुसार

विशिष्ट बालक वह है जो किसी एक अथवा अनेक गुणों की दृष्टि से सामान्य बालक से पर्याप्त मात्रा में भिन्न होता है।

क्रिक के अनुसार

विशिष्ट बच्चे मानसिक, शारीरिक तथा सामाजिक गुणों में सामान्य बच्चों से इतने भिन्न होते हैं कि सामान्य विद्यालयी कार्यों में उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विशिष्ट शिक्षा सेवाओं में परिवर्तन अथवा अतिरिक्त अनुदेशन की आवश्यकता पड़ती है।

हेवेट तथा फोरनेस के अनुसार

विशिष्ट व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, बुद्धि, इन्द्रिय अथवा मांसपेशीय क्षमताएँ सामान्य स्तर से अलग हो सकती हैं। यह असामान्य श्रेष्ठता अथवा दुर्बलता उसकी प्रकृति और कार्य करने के स्तर को प्रभावित कर सकती है।

विशिष्ट बालकों की प्रकृति एवं विशेषताएँ

1. सामान्य या औसत स्तर से भिन्नता

विशिष्ट आवश्यकता वाले बालक सामान्य अथवा औसत स्तर के बालकों से किसी न किसी महत्त्वपूर्ण गुण में भिन्न होते हैं। यह भिन्नता शारीरिक, मानसिक, सामाजिक या संवेगात्मक हो सकती है।

2. असाधारण प्रतिभा अथवा भिन्नता

इनमें सामान्य स्तर से बहुत अधिक अथवा बहुत कम क्षमता देखने को मिल सकती है। इसलिए विशिष्टता केवल कमजोरी का संकेत नहीं है, बल्कि असाधारण प्रतिभा भी विशिष्टता का रूप हो सकती है।

3. सकारात्मक अथवा नकारात्मक भिन्नता

विशिष्टता दोनों दिशाओं में हो सकती है। कोई बालक अत्यधिक प्रतिभाशाली हो सकता है तो कोई किसी शारीरिक, मानसिक या अधिगम सम्बन्धी कठिनाई से प्रभावित हो सकता है।

4. समायोजन में कठिनाई

अपनी विशेष आवश्यकताओं के कारण कुछ बालकों को वातावरण के साथ समायोजन स्थापित करने में कठिनाई हो सकती है। इसके लिए उन्हें उचित सहायता और अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है।

5. विशेष देखभाल की आवश्यकता

इन बालकों की योग्यताओं और क्षमताओं के उचित विकास के लिए विशेष देखभाल आवश्यक होती है। उनकी आवश्यकता के अनुसार उचित वृद्धि, विकास और समायोजन के अवसर दिए जाने चाहिए।

6. विशिष्ट शिक्षा की आवश्यकता

सामान्य शिक्षा सभी विशिष्ट बालकों की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाती। इसलिए उनकी क्षमता और कठिनाई के अनुसार विशिष्ट शिक्षा अथवा अनुदेशन की आवश्यकता हो सकती है।

7. विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्टता

विशिष्ट आवश्यकता शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक और सामाजिक किसी भी क्षेत्र से सम्बन्धित हो सकती है। प्रत्येक प्रकार की विशिष्टता के अनुसार अलग शैक्षिक सहायता की आवश्यकता होती है।

8. विशेष सेवाएँ एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार

इन बालकों को शिक्षा के साथ-साथ विशेष सेवाओं, देखभाल और सहानुभूति की आवश्यकता होती है। उचित सहायता मिलने पर वे अपनी क्षमताओं का बेहतर विकास कर सकते हैं।

विशिष्ट एवं सामान्य बालकों में अन्तर

आधार विशिष्ट बालक सामान्य बालक
1. शारीरिक स्थिति इनमें किसी प्रकार की शारीरिक असामान्यता या बाधिता हो सकती है। सामान्यतः शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं।
2. स्वास्थ्य शारीरिक विकास में बाधा के कारण स्वास्थ्य सम्बन्धी कठिनाइयाँ हो सकती हैं। सामान्यतः अपेक्षाकृत स्वस्थ और रोगमुक्त होते हैं।
3. शारीरिक विकास कुछ बालक दिव्यांग, अत्यधिक लम्बे, मोटे, पतले अथवा अन्य शारीरिक भिन्नताओं वाले हो सकते हैं। सामान्य शारीरिक बनावट और विकास पाया जाता है।
4. बुद्धिलब्धि पुस्तक के अनुसार बुद्धिलब्धि 140 से अधिक अथवा 90 से कम भी हो सकती है। पुस्तक के अनुसार बुद्धिलब्धि सामान्यतः 90 से 110 के बीच होती है।
5. शैक्षिक उपलब्धि उपलब्धि अत्यधिक उच्च अथवा अपेक्षाकृत निम्न हो सकती है। शैक्षिक उपलब्धि सामान्य स्तर की होती है।
6. भावात्मक प्रवृत्ति कुछ बालक अति आशावादी अथवा अत्यधिक निराशावादी होकर अन्तर्मुखी हो सकते हैं। सामान्यतः आशावादी, सामाजिक और व्यावहारिक प्रवृत्ति पाई जाती है।
7. संवेगों पर नियन्त्रण प्रेम, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या और आनन्द आदि संवेगों पर नियन्त्रण कम हो सकता है। अपने संवेगों पर अपेक्षाकृत सामान्य नियन्त्रण रखते हैं।
8. महत्त्वाकांक्षा अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी अथवा अत्यधिक निराशावादी हो सकते हैं। सामान्य स्तर की महत्त्वाकांक्षा पाई जाती है।
9. समायोजन परिवार, समाज और विद्यालय के साथ समायोजन में कठिनाई हो सकती है। परिवार, समाज और विद्यालय में अपेक्षाकृत आसानी से समायोजन कर लेते हैं।
10. शैक्षिक आवश्यकता अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास के लिए विशेष शिक्षा एवं सेवाओं की आवश्यकता हो सकती है। सामान्य शिक्षा द्वारा अपनी क्षमताओं का विकास कर सकते हैं।

विशिष्ट बालकों की पहचान

विशिष्ट बालक सामान्य बालकों से विभिन्न गुणों और व्यवहारों के कारण अलग दिखाई दे सकते हैं। उनकी सही पहचान आवश्यक है ताकि उन्हें उनकी आवश्यकता के अनुसार उचित शिक्षा और सहायता प्रदान की जा सके।

1. व्यवहारात्मक अवलोकन

शिक्षक कक्षा में बालकों के व्यवहार का नियमित अवलोकन करके उनकी विशेषताओं को पहचान सकता है। बालक के व्यवहार का मनोवैज्ञानिक निरीक्षण और विश्लेषण भी इसमें सहायक होता है।

2. निरीक्षण

अध्यापक विभिन्न बालकों के विशिष्ट गुणों का व्यवस्थित निरीक्षण करके उनकी भिन्नताओं को समझ सकता है। इसके बाद उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा प्रदान की जा सकती है।

3. शैक्षिक परिणामों के आधार पर

बालक के शैक्षिक परिणामों की तुलना सामान्य बालकों से करके भी उसकी विशिष्टता की पहचान की जा सकती है। अत्यधिक उच्च या निम्न उपलब्धि किसी विशिष्ट आवश्यकता की ओर संकेत कर सकती है।

4. चिकित्सकीय परीक्षण

शारीरिक अथवा मानसिक बाधिता की सही पहचान के लिए चिकित्सकीय परीक्षण उपयोगी होता है। इससे ऐसी समस्याओं का पता लगाया जा सकता है जिन्हें सामान्य अवलोकन से पहचानना कठिन हो।

5. मानसिक परीक्षण

गंभीर मानसिक या व्यक्तित्व सम्बन्धी विशिष्टता की पहचान के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है। पुस्तक में टी.ए.टी., रोर्शा तथा स्याही-धब्बा परीक्षण आदि का उल्लेख किया गया है।

6. साक्षात्कार

विद्यार्थी से प्रत्यक्ष साक्षात्कार करके उसके व्यवहार, रुचियों, कठिनाइयों और अन्य विशेषताओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

विशिष्ट बालकों का वर्गीकरण

शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक, संवेगात्मक और सामाजिक विकास में पाई जाने वाली भिन्नताओं के आधार पर विशिष्ट बालकों को विभिन्न वर्गों में बाँटा जा सकता है।

1. शारीरिक अक्षमता
  • सांवेदिक रूप से विकलांगता
  • गतीय रूप से विकलांगता
  • बहुल विकलांगता

इसके अन्तर्गत दृष्टि बाधिता, श्रवण बाधिता, वाणी बाधिता तथा अस्थि बाधिता जैसे रूप सम्मिलित किए जाते हैं।

2. मानसिक अक्षमता
  • प्रतिभाशाली बालक
  • सृजनात्मक बालक
  • मन्दबुद्धि बालक

मानसिक क्षमता सामान्य स्तर से अत्यधिक अधिक अथवा कम होने पर बालक को विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की श्रेणी में रखा जा सकता है।

3. शैक्षिक अक्षमता
  • शैक्षिक रूप से समृद्ध बालक
  • शैक्षिक रूप से पिछड़ा बालक
  • किसी प्रमुख विषय को सीखने में कठिनाई वाला बालक
  • सम्प्रेषण बाधित बालक

इस वर्ग में उन बालकों को रखा जाता है जिनका शैक्षिक प्रदर्शन या सीखने की क्षमता सामान्य अपेक्षाओं से पर्याप्त रूप से भिन्न होती है।

4. सामाजिक अक्षमता
  • संवेगात्मक रूप से परेशान बालक
  • माता-पिता द्वारा तिरस्कृत बालक
  • बाल अपराधी
  • समस्यात्मक बालक
  • वंचित बालक
  • असमायोजित बालक

सामाजिक परिस्थितियों, पारिवारिक वातावरण अथवा व्यवहार सम्बन्धी समस्याओं के कारण कुछ बालकों को विशेष सहायता और शिक्षा की आवश्यकता होती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • विशिष्ट आवश्यकता वाले बालक अपनी क्षमता, योग्यता, व्यवहार या विकास की दृष्टि से सामान्य बालकों से पर्याप्त रूप से भिन्न होते हैं।
  • विशिष्टता सामान्य स्तर से अधिक अथवा कम दोनों प्रकार की हो सकती है।
  • इन बालकों को उनकी आवश्यकता के अनुसार विशिष्ट शिक्षा, सेवाएँ, देखभाल तथा अनुदेशन की आवश्यकता होती है।
  • विशिष्ट बालकों में शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक, संवेगात्मक और सामाजिक भिन्नताएँ पाई जा सकती हैं।
  • इनकी पहचान व्यवहारात्मक अवलोकन, निरीक्षण, शैक्षिक परिणाम, चिकित्सकीय एवं मानसिक परीक्षण तथा साक्षात्कार से की जा सकती है।
  • विशिष्ट बालकों और सामान्य बालकों में शारीरिक स्थिति, बुद्धिलब्धि, शैक्षिक उपलब्धि, संवेग, समायोजन और शैक्षिक आवश्यकताओं के आधार पर अन्तर पाया जाता है।
  • विशिष्ट बालकों का प्रमुख वर्गीकरण शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक और सामाजिक अक्षमता के आधार पर किया गया है।
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Topic 3 वंचित बालक—अर्थ, विशेषताएँ, प्रकार, पहचान एवं अनुदेशन रणनीतियाँ

वंचित बालक—अर्थ, विशेषताएँ, प्रकार, पहचान एवं अनुदेशन रणनीतियाँ

वंचित बालकों का अर्थ

वंचित बालक विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की वह श्रेणी है जो सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक विषमताओं के कारण आवश्यक सुविधाओं और अवसरों से वंचित रह जाती है। इन सुविधाओं की कमी के कारण उनका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और शैक्षिक विकास सामान्य रूप से नहीं हो पाता।

समाज में आर्थिक एवं सामाजिक असमानता के कारण कुछ बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, भाषा-विकास, सांस्कृतिक अवसर और अन्य आवश्यक सुविधाएँ पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पातीं। ऐसी परिस्थितियाँ उनके व्यक्तित्व और शैक्षिक उपलब्धि को प्रभावित करती हैं।

वंचित बालकों की विशेषताएँ

1. मनोसामाजिक विशेषताएँ
  • इन बालकों का समायोजन स्तर प्रायः निम्न होता है।
  • इनमें असुरक्षा की भावना पाई जा सकती है।
  • ये सामाजिक रूप से हीन भावना से प्रभावित हो सकते हैं।
  • इनमें संवेगात्मक अस्थिरता दिखाई दे सकती है।
  • भविष्य के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण का अभाव हो सकता है।
  • इनकी मित्रता कभी-कभी ऐसे बालकों से अधिक होती है जो असामाजिक गतिविधियों में संलग्न रहते हैं।
2. शैक्षिक विशेषताएँ
  • इनमें अपेक्षाकृत निम्न बौद्धिक एवं शैक्षिक स्तर दिखाई दे सकता है।
  • हीन भावना के कारण ये शिक्षा में अपनी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाते।
  • ये कभी-कभी अन्तर्मुखी, निराशावादी और रूढ़िवादी प्रवृत्ति के हो सकते हैं।
  • इनमें चिन्ता और भय की मात्रा अधिक हो सकती है।
  • दीर्घकालीन वंचन के कारण शैक्षिक क्षेत्र में कुण्ठा उत्पन्न हो सकती है।
  • ये विद्यालयी गतिविधियों में भाग लेने से कतराते हैं।
  • वंचन की स्थिति इनके शैक्षिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

वंचन के प्रकार

पुस्तक में वंचन को विभिन्न सामाजिक स्तरों के आधार पर निम्न प्रकार से स्पष्ट किया गया है—

1. क्षेत्र स्तर पर वंचन

देश के विभिन्न क्षेत्रों में भौगोलिक, सांस्कृतिक तथा उपलब्ध सुविधाओं में अन्तर पाया जाता है। अपेक्षाकृत कम विकसित क्षेत्रों में रहने वाले बालक अनेक शैक्षिक और सामाजिक सुविधाओं से वंचित रह सकते हैं।

2. भाषा स्तर पर वंचन

भारत एक बहुभाषी देश है तथा विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग भाषाएँ और बोलियाँ प्रचलित हैं। जब बालक की घरेलू या क्षेत्रीय भाषा और शिक्षा की भाषा में अधिक अन्तर होता है, तो उसकी शैक्षिक प्रगति प्रभावित हो सकती है।

3. लैंगिक स्तर पर वंचन

सामाजिक स्तर पर स्त्री, पुरुष और ट्रांसजेंडर सभी को समान अधिकार प्राप्त हैं। फिर भी कुछ सामाजिक परिस्थितियों में लिंग के आधार पर अवसरों और कार्यों में भेदभाव होने से वंचन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

4. वर्ग स्तर पर वंचन

समाज में आर्थिक और व्यावसायिक स्थिति के आधार पर मजदूर, कृषक, कर्मचारी, औद्योगिक तथा पूँजीपति आदि अनेक वर्ग पाए जाते हैं। संसाधनों और अवसरों की असमान उपलब्धता के कारण कुछ वर्गों के बच्चों को वंचन का सामना करना पड़ सकता है।

वंचित बालकों के प्रकार

वंचन की प्रकृति के आधार पर वंचित बालकों को निम्न प्रमुख वर्गों में रखा गया है—

1. संवेगात्मक दृष्टि से वंचित

जिन बालकों को पर्याप्त प्रेम, सुरक्षा, अपनापन और भावात्मक सहयोग नहीं मिलता, वे संवेगात्मक दृष्टि से वंचित कहलाते हैं।

2. सामाजिक दृष्टि से वंचित

जिन बच्चों को सामाजिक सहभागिता, सम्मान और समान अवसर पर्याप्त मात्रा में प्राप्त नहीं होते, वे सामाजिक वंचन से प्रभावित हो सकते हैं।

3. सांस्कृतिक दृष्टि से वंचित

पर्याप्त सांस्कृतिक अनुभव, भाषा, ज्ञान और सामाजिक-सांस्कृतिक अवसर न मिलने के कारण कुछ बालकों का विकास प्रभावित होता है। ऐसे बालक सांस्कृतिक दृष्टि से वंचित माने जाते हैं।

4. आर्थिक दृष्टि से वंचित

आर्थिक अभाव के कारण भोजन, वस्त्र, शिक्षण-सामग्री तथा अन्य आवश्यक सुविधाएँ पर्याप्त मात्रा में प्राप्त न करने वाले बालक आर्थिक दृष्टि से वंचित होते हैं।

5. शैक्षिक दृष्टि से वंचित

जिन बालकों को उचित विद्यालय, शिक्षक, शिक्षण-सामग्री और अध्ययन के पर्याप्त अवसर प्राप्त नहीं होते, उनका शैक्षिक विकास प्रभावित होता है।

पुस्तक में उल्लिखित अन्य वंचित समूह
  • अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बालक।
  • भ्रमणकारी जनजातियों के बालक।
  • अधिसूचना से मुक्त जनजातियों के बालक।
  • पिछड़ी जातियों के बालक।
  • श्रमिक परिवारों के बच्चे।

वंचित बालकों के प्रमुख लक्षण

वंचित परिस्थितियों में रहने वाले सभी बालकों में समान लक्षण होना आवश्यक नहीं है, फिर भी पुस्तक में निम्न प्रमुख लक्षण बताए गए हैं—

  • निम्न शैक्षिक उपलब्धि।
  • निम्न महत्त्वाकांक्षा।
  • विचारों में अस्थिरता, अतिउत्साहिता तथा निम्न आत्म-मूल्यांकन जैसी व्यक्तित्व सम्बन्धी समस्याएँ।
  • अनुपयुक्त आत्म-सम्प्रत्यय।
  • पढ़ाई के प्रति उदासीनता अथवा विद्यालय छोड़ने की प्रवृत्ति।
  • बौद्धिक विकास का अपेक्षाकृत धीमा होना।
  • सामाजिक कुशलताओं का अभाव।
  • भाषा सम्बन्धी भिन्नता या कठिनाई।

वंचित बालकों की पहचान

वंचित बालक की पहचान केवल जाति, धर्म या किसी एक सामाजिक वर्ग के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। बालक के परिवार की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति तथा स्वयं बालक को उपलब्ध अवसरों और सुविधाओं को ध्यान में रखकर उसकी वास्तविक स्थिति का अध्ययन करना चाहिए।

सही पहचान से विद्यालय प्रारम्भ से ही बालक की आवश्यकता के अनुरूप शिक्षा और सहायता की व्यवस्था कर सकता है।

वंचन की पहचान हेतु पुस्तक में उल्लिखित मापनियाँ
  • दीर्घकालिक वंचन मापनी — मिश्र एवं त्रिपाठी।
  • सांस्कृतिक वंचन मापनी — सामन्त एवं रथ।
  • सांस्कृतिक निर्धारक मापनी — ए. डी. शर्मा।

वंचित बालकों के लिए अनुदेशन रणनीतियाँ

1. शिक्षा में समान अवसर

विद्यालय में प्रवेश के समय वर्ग या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। सभी बालकों को शिक्षा प्राप्त करने का समान अधिकार और अवसर मिलना चाहिए।

2. न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति

वंचित बालकों के समुचित विकास के लिए भोजन, वस्त्र, शिक्षण-सामग्री तथा अन्य मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति आवश्यक है। आवश्यकता होने पर सरकार द्वारा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

3. समान एवं सम्मानजनक व्यवहार

विद्यालय में वंचित बालकों के साथ अन्य विद्यार्थियों के समान व्यवहार किया जाना चाहिए। किसी प्रकार का भेदभाव उनके आत्मविश्वास और शैक्षिक विकास को प्रभावित कर सकता है।

4. प्रेम, सहानुभूति एवं सहयोग

शिक्षक को इन बालकों के साथ प्रेमपूर्ण, सहानुभूतिपूर्ण और सहयोगी व्यवहार करना चाहिए। इससे उनमें सुरक्षा, आत्मविश्वास और विद्यालय के प्रति अपनापन विकसित होता है।

5. शैक्षिक एवं व्यावहारिक समस्याओं का समाधान

शिक्षक को बालक की शैक्षिक तथा व्यवहार सम्बन्धी कठिनाइयों की पहचान करके उनके समाधान का प्रयास करना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार व्यक्तिगत सहायता भी प्रदान की जानी चाहिए।

6. अभिभावकों को जागरूक करना

वंचित बालकों के माता-पिता को शिक्षा के महत्त्व के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए। विद्यालय और परिवार के सहयोग से बालक को नियमित शिक्षा से जोड़े रखना आसान होता है।

7. भाषा विकास पर विशेष ध्यान

जिन बालकों को भाषायी कठिनाई है, उनके भाषा-विकास के लिए विशेष अवसर और अभ्यास उपलब्ध कराए जाने चाहिए। शिक्षण में उनकी परिचित भाषा और अनुभवों का उचित उपयोग किया जा सकता है।

8. प्रोत्साहन एवं आर्थिक सुविधाएँ

वंचित बालकों को विद्यालय में आकर्षित करने और शिक्षा की परिधि में बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रोत्साहन और सुविधाएँ प्रदान की जानी चाहिए।

  • अभिभावकों को आवश्यक आर्थिक सहायता और अभिप्रेरणा प्रदान करना।
  • बालकों को निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराना।
  • पुस्तकें, पाठ्य-सामग्री तथा अन्य विद्यालयी आवश्यकताओं के लिए आर्थिक सहायता देना।
  • अच्छी शैक्षिक प्रगति पर छात्रवृत्ति और पुरस्कार प्रदान करना।
  • परिवार की परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक अवकाश की व्यवस्था करना, जैसे कृषि कार्य से जुड़े परिवारों के बच्चों के लिए बुवाई या कटाई के समय उचित सुविधा देना।
9. विशेष शैक्षिक व्यवस्था

आवश्यकता होने पर वंचित बालकों के लिए विशेष विद्यालय या विशेष शैक्षिक व्यवस्थाएँ की जा सकती हैं। इनमें उनकी कठिनाइयों को दूर करने के लिए उपयुक्त पाठ्यक्रम, विशेष शिक्षण-विधि और प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध होने चाहिए।

ऐसी विशेष व्यवस्था का उद्देश्य बालक को स्थायी रूप से अलग करना नहीं, बल्कि उसकी कठिनाइयों को कम करके उसे सामान्य विद्यालय की मुख्यधारा में अन्य बालकों के साथ शिक्षा प्राप्त करने योग्य बनाना होना चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सुविधाओं तथा अवसरों की कमी से प्रभावित बालक वंचित बालक कहलाते हैं।
  • वंचित बालकों में असुरक्षा, हीन भावना, संवेगात्मक अस्थिरता, निम्न शैक्षिक उपलब्धि और समायोजन सम्बन्धी कठिनाइयाँ देखी जा सकती हैं।
  • पुस्तक में क्षेत्र, भाषा, लिंग और वर्ग के स्तर पर वंचन का उल्लेख किया गया है।
  • वंचित बालक संवेगात्मक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और शैक्षिक दृष्टि से वंचित हो सकते हैं।
  • वंचित बालक की पहचान उसकी वास्तविक सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक परिस्थितियों के आधार पर करनी चाहिए।
  • इन बालकों को समान शैक्षिक अवसर, मूलभूत सुविधाएँ, आर्थिक सहायता और सम्मानजनक व्यवहार प्रदान करना आवश्यक है।
  • शिक्षक को प्रेम, सहानुभूति, भाषा-विकास और व्यक्तिगत सहायता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
  • विशेष शैक्षिक सहायता का लक्ष्य बालक को उसकी कठिनाइयों से उबारकर शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना होना चाहिए।
Topic 4 समस्यात्मक बालक—अर्थ, विशेषताएँ, पहचान, कारण एवं शिक्षा

समस्यात्मक बालक—अर्थ, विशेषताएँ, पहचान, कारण एवं शिक्षा

समस्यात्मक बालक का अर्थ

समस्यात्मक बालक वे बालक हैं जिनका व्यवहार या व्यक्तित्व सामान्य से पर्याप्त रूप से भिन्न होता है और जो परिवार, विद्यालय या कक्षा में बार-बार समस्यात्मक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। वे प्रायः अपने वातावरण से उचित समायोजन स्थापित नहीं कर पाते।

झूठ बोलना, चोरी करना, अत्यधिक क्रोध करना, गृहकार्य न करना, कक्षा में देर से आना तथा विद्यालय से भाग जाना आदि समस्यात्मक व्यवहार के उदाहरण हैं।

समस्यात्मक बालक की परिभाषा

वैलेन्टाइन के अनुसार

समस्यात्मक बालक वे होते हैं जिनका व्यवहार अथवा व्यक्तित्व किसी रूप में गंभीर रूप से असामान्य होता है।

पुस्तक में इसी स्थान पर बर्ट की एक परिभाषा भी दी गई है, किन्तु वह शैक्षिक रूप से पिछड़े बालक से सम्बन्धित है।

समस्यात्मक बालकों की विशेषताएँ

पुस्तक में डॉ. कमिंग्स आदि द्वारा बताई गई समस्यात्मक व्यवहार की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं—

  • ध्यान केन्द्रित न कर पाना।
  • डरपोक प्रवृत्ति।
  • आज्ञा का उल्लंघन करना।
  • झूठ बोलना।
  • बहुत कम बोलना।
  • चोरी करना।
  • आलसी तथा निर्दयी स्वभाव।
  • दूसरों का मजाक उड़ाना और हठ करना।
  • दुराचार या अन्य अनुचित व्यवहार की प्रवृत्ति।
  • दूसरों को अनुचित सलाह देना आदि।
शैक्षिक एवं मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ
  • इनकी शैक्षिक उपलब्धि और बुद्धि-लब्धि अपेक्षाकृत निम्न हो सकती है।
  • इनमें समायोजन की कमी तथा संवेगात्मक अपरिपक्वता पाई जा सकती है।
  • दूसरों के साथ पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित करने में कठिनाई हो सकती है।
  • इनकी आवश्यकताएँ और रुचियाँ सीमित हो सकती हैं।

समस्यात्मक बालकों की पहचान

1. निरीक्षण विधि

शिक्षक कक्षा में बालक के व्यवहार का नियमित निरीक्षण करके सामान्य बच्चों से उसके व्यवहार की भिन्नता और समस्यात्मक प्रवृत्तियों की पहचान कर सकता है।

2. साक्षात्कार

बालक, उसके माता-पिता और शिक्षकों से साक्षात्कार करके उसके व्यवहार, पारिवारिक परिस्थितियों और समस्याओं के बारे में आवश्यक जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

3. सम्बन्धित व्यक्तियों से सूचना

माता-पिता, शिक्षक, मित्र तथा अन्य सम्बन्धित व्यक्तियों से प्राप्त सूचनाएँ बालक के समस्यात्मक व्यवहार को समझने में सहायक होती हैं।

4. कथात्मक अभिलेख

शिक्षक बालक के महत्वपूर्ण व्यवहार और घटनाओं का कथात्मक अभिलेख रखकर उसके व्यवहार में होने वाले परिवर्तन और समस्याओं की पहचान कर सकता है।

5. संचयी अभिलेख

बालक से सम्बन्धित शैक्षिक, व्यवहारिक तथा अन्य सूचनाओं के संचयी अभिलेख का अध्ययन करके उसकी समस्याओं का पता लगाया जा सकता है।

6. मनोवैज्ञानिक परीक्षण

जब सामान्य विधियों से स्पष्ट पहचान न हो सके, तब विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षणों की सहायता से बालक की समस्यात्मक प्रवृत्तियों का अध्ययन किया जाता है।

समस्यात्मक व्यवहार के कारण

1. अनुपयुक्त वातावरण

परिवार में लगातार लड़ाई-झगड़ा, तनाव तथा विद्यालय में शिक्षक का तिरस्कारपूर्ण व्यवहार बालक में समस्यात्मक व्यवहार उत्पन्न कर सकता है। प्रेम और सुरक्षित वातावरण के अभाव में समस्या और बढ़ सकती है।

2. मूल प्रवृत्तियों का दमन

बालक की स्वाभाविक आवश्यकताओं और मूल प्रवृत्तियों का अत्यधिक दमन करने पर भावनात्मक ग्रन्थियाँ विकसित हो सकती हैं। इससे उसके व्यवहार में असामान्यता उत्पन्न हो सकती है।

3. संवेगात्मक दोष

आवश्यकताओं की उचित पूर्ति न होने तथा भावनात्मक असन्तुलन के कारण बालक में संवेगात्मक और मनोवैज्ञानिक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

4. शारीरिक क्षति

शारीरिक दोष, बीमारी अथवा अन्य शारीरिक कठिनाइयाँ भी बालक के व्यवहार और समायोजन को प्रभावित करके समस्यात्मक व्यवहार का कारण बन सकती हैं।

5. वंशानुक्रम

पुस्तक के अनुसार कुछ व्यवहारगत प्रवृत्तियों के विकास में वंशानुक्रम का प्रभाव भी हो सकता है।

समस्यात्मक बालकों की शिक्षा

1. बौद्धिक क्षमता के अनुकूल शिक्षा

बालक की बौद्धिक क्षमता को ध्यान में रखकर शिक्षा दी जानी चाहिए। अत्यधिक कठिन अथवा अत्यधिक सरल कार्य देने के स्थान पर उसकी क्षमता के अनुरूप शिक्षण व्यवस्था करनी चाहिए।

2. रुचि के अनुकूल शिक्षा

बालक की रुचियों को समझकर शिक्षण-सामग्री और गतिविधियों का चयन करना चाहिए। रुचिकर शिक्षा उसे विद्यालय और अध्ययन से जोड़े रखने में सहायक होती है।

3. उपयुक्त शिक्षण विधि

शिक्षण विधि रुचिकर, प्रेरणादायक, सहज और आनन्ददायक होनी चाहिए। इससे बालक की कक्षा में उपस्थिति और सक्रिय भागीदारी बढ़ती है।

4. उचित अनुशासन

शिक्षक को पक्षपात, जातीयता और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह से मुक्त रहकर अनुशासन स्थापित करना चाहिए। शिक्षक का आदर्श व्यवहार बालक के व्यवहार-सुधार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

5. मनोरंजन की व्यवस्था

बालकों को खेल, शैक्षिक फिल्म, ड्रामा, संगीत तथा अन्य मनोरंजक गतिविधियों के अवसर देने चाहिए। ऐसी गतिविधियाँ उनकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा प्रदान करती हैं।

6. शिक्षक एवं अभिभावकों का सहयोग

समस्यात्मक व्यवहार में सुधार के लिए विद्यालय और परिवार का सहयोग आवश्यक है। शिक्षक और अभिभावक मिलकर बालक की समस्या का कारण समझें और समान रूप से सुधारात्मक प्रयास करें।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सामान्य से गंभीर रूप से भिन्न व्यवहार या व्यक्तित्व प्रदर्शित करने वाले बालक समस्यात्मक बालक कहलाते हैं।
  • झूठ बोलना, चोरी करना, क्रोध, अवज्ञा, विद्यालय से भागना और अनुचित व्यवहार इसके प्रमुख संकेत हो सकते हैं।
  • इनकी पहचान निरीक्षण, साक्षात्कार, सम्बन्धित व्यक्तियों से सूचना, कथात्मक एवं संचयी अभिलेख तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से की जा सकती है।
  • अनुपयुक्त वातावरण, मूल प्रवृत्तियों का दमन, संवेगात्मक दोष, शारीरिक क्षति तथा वंशानुक्रम समस्यात्मक व्यवहार के प्रमुख कारण बताए गए हैं।
  • इनकी शिक्षा बालक की बुद्धि और रुचि के अनुसार होनी चाहिए तथा शिक्षण रुचिकर और प्रेरणादायक होना चाहिए।
  • उचित अनुशासन, मनोरंजक गतिविधियाँ तथा शिक्षक-अभिभावक सहयोग व्यवहार-सुधार में महत्त्वपूर्ण हैं।

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Topic 5 शारीरिक विकलांगता एवं दृष्टि बाधिता

शारीरिक विकलांगता एवं दृष्टि बाधिता

शारीरिक रूप से विकलांग बालक

शारीरिक रूप से विकलांग बालक वे होते हैं जो किसी न किसी शारीरिक कमी या बाधिता से प्रभावित होते हैं। श्रवण, दृष्टि, अस्थि अथवा स्वास्थ्य सम्बन्धी बाधिता के कारण उनकी सामान्य शारीरिक क्रियाएँ और विकास प्रभावित हो सकते हैं।

कुछ बालकों की शारीरिक बाधिता इतनी अधिक होती है कि उन्हें दैनिक कार्यों तथा विद्यालयी गतिविधियों के लिए कृत्रिम अंगों, सहायक उपकरणों या विशेष व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है।

वैधानिक अर्थ

पुस्तक के अनुसार शारीरिक रूप से बाधित अथवा अस्थि बाधित बालकों की शैक्षिक प्रक्रिया हाथ-पैर टेढ़े-मेढ़े होने, कुछ शारीरिक अंगों के न होने, जलने, अंग टूटने अथवा किसी गंभीर रोग के कारण प्रभावित हो सकती है।

शारीरिक विकलांगता का वर्गीकरण

पुस्तक में शारीरिक विकलांगता को निम्न प्रमुख प्रकारों में बाँटा गया है—

  • दृष्टि बाधिता (Visual Impairment)
  • श्रवण बाधिता (Hearing Impairment)
  • वाणी बाधिता (Speech Impairment)
  • अस्थि बाधित बालक (Orthopaedics Children)

दृष्टि बाधिता का अर्थ

दृष्टिबाधित बालक वे होते हैं जिन्हें ठीक प्रकार से देखने में कठिनाई होती है और जिसके कारण वे सामान्य शिक्षण-विधियों द्वारा शिक्षा ग्रहण करने में कठिनाई अनुभव करते हैं। दृष्टि बाधिता पूर्ण अथवा आंशिक दोनों प्रकार की हो सकती है।

पूर्ण रूप से दृष्टिहीन बालक सामान्य मुद्रित सामग्री का उपयोग नहीं कर पाते और उन्हें ब्रेल तथा अन्य वैकल्पिक शिक्षण-सामग्री की आवश्यकता होती है। आंशिक दृष्टिबाधित बालक बड़े अक्षरों, आवर्धक साधनों अथवा अन्य सहायक उपकरणों की सहायता से पढ़ सकते हैं।

दृष्टि क्षमता एवं स्नेलन चार्ट

दृष्टि क्षमता की जाँच प्रायः स्नेलन चार्ट द्वारा की जाती है। इसका विकास डॉ. हरबर्ट स्नेलन ने किया था। इस चार्ट में बड़े अक्षर से प्रारम्भ होकर क्रमशः छोटे अक्षरों की पंक्तियाँ होती हैं।

पुस्तक के अनुसार सामान्य दृष्टि वाला व्यक्ति लगभग 200 फीट की दूरी से जिस वस्तु को देख सकता है, पूर्ण दृष्टिबाधित व्यक्ति उसे लगभग 20 फीट की दूरी से देख पाता है। दृष्टि की तीक्ष्णता को 20/70, 20/200 आदि अनुपातों में व्यक्त किया जाता है।

कानूनी दृष्टि से पूर्ण दृष्टिबाधिता

पुस्तक में अमेरिकन मेडिकल संघ द्वारा सन् 1934 में दी गई परिभाषा के अनुसार 20/200 या उससे कम दृष्टि क्षमता तथा सीमित दृष्टि-क्षेत्र वाले व्यक्ति को कानूनी रूप से पूर्ण दृष्टिबाधित माना गया है, यदि सुधार के बाद भी उसकी दृष्टि पर्याप्त न हो।

भारत सरकार के समाज कल्याण मंत्रालय की परिभाषा

पुस्तक के अनुसार सन् 1987 में दृष्टिबाधिता की पहचान के लिए पूर्ण दृष्टि खो देना, चश्मे के प्रयोग के बाद भी अत्यन्त कम दृष्टि रहना तथा दृष्टि-क्षेत्र का लगभग 20° से कम होना प्रमुख आधार माने गए हैं।

शिक्षा की दृष्टि से

शिक्षा की दृष्टि से दृष्टिबाधित बालक वे हैं जिन्हें सामान्य मुद्रित सामग्री से शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई होती है और जिन्हें ब्रेल, श्रव्य सामग्री अथवा अन्य विशेष शिक्षण-साधनों की आवश्यकता पड़ती है।

दृष्टिबाधित बालकों का वर्गीकरण

1. आंशिक रूप से दृष्टिबाधित बालक

ये बालक बड़े अक्षरों या आवर्धक साधनों की सहायता से पढ़ सकते हैं और कुछ दूरी तक वस्तुओं को देख सकते हैं। पुस्तक के अनुसार इस वर्ग में 20/70 से 20/200 के बीच दृष्टि वाले तथा दृष्टि सम्बन्धी रोगों या कठिनाइयों से प्रभावित बालक सम्मिलित किए जा सकते हैं।

ऐसे बालक विशेष साधनों, उचित प्रकाश, बड़े अक्षरों और चिकित्सकीय सहायता से अपनी शेष दृष्टि का उपयोग कर सकते हैं।

2. गंभीर रूप से दृष्टिबाधित बालक

गंभीर रूप से दृष्टिबाधित बालकों की दृष्टि अत्यन्त सीमित होती है। पुस्तक में इनकी दृष्टि क्षमता लगभग 2/20 बताई गई है। ये ब्रेल लिपि तथा श्रव्य साधनों की सहायता लेते हैं और चलने-फिरने के लिए छड़ी का प्रयोग भी कर सकते हैं।

ऐसे बालकों के लिए नियमित नेत्र परीक्षण आवश्यक है क्योंकि उचित चश्मे अथवा उपचार से कुछ बालकों की दृष्टि में सुधार सम्भव हो सकता है।

दृष्टिबाधित बालकों की विशेषताएँ

1. भाषा का विकास

दृष्टिबाधित बालक सुन और बोल सकते हैं, इसलिए सामान्यतः भाषा सीखने की क्षमता बनी रहती है। किन्तु उनके अनुभव मुख्य रूप से श्रवण और स्पर्श पर आधारित होने के कारण रंग, आकार तथा दृश्य वस्तुओं से सम्बन्धित शब्दों को समझने में कठिनाई हो सकती है।

2. मानसिक योग्यता

दृष्टिबाधित बालकों की मानसिक योग्यता सामान्य बालकों से अनिवार्य रूप से कम नहीं होती। इनके मानसिक प्रत्ययों का विकास मुख्यतः स्पर्श अनुभव के माध्यम से होता है।

स्पर्श अनुभव दो प्रकार का बताया गया है—विश्लेषणात्मक स्पर्श अनुभव तथा संश्लेषणात्मक स्पर्श अनुभव। विश्लेषणात्मक स्पर्श में वस्तु के विभिन्न भागों को अलग-अलग समझा जाता है, जबकि संश्लेषणात्मक स्पर्श से सम्पूर्ण वस्तु का बोध होता है।

3. सामाजिक एवं कार्य समायोजन

दृष्टिबाधित बालकों में सामाजिक असमायोजन का कारण प्रायः उनकी आन्तरिक क्षमता नहीं, बल्कि समाज का व्यवहार होता है। सहानुभूतिपूर्ण तथा सहयोगी वातावरण मिलने पर वे सामाजिक एवं व्यावसायिक जीवन में बेहतर समायोजन स्थापित कर सकते हैं।

दृष्टिबाधित बालकों की पहचान

दृष्टिबाधिता की प्रारम्भिक पहचान बालक के व्यवहार तथा आँखों से सम्बन्धित कुछ संकेतों के आधार पर की जा सकती है—

  • बार-बार सिरदर्द होना तथा दर्द के बाद आँखें बन्द करना।
  • पलकों पर खुजली या सूजन होना।
  • पलकों का बार-बार झपकना।
  • पुस्तक या वस्तु को आँखों के बहुत पास ले जाना।
  • बार-बार आँखें मलना।
  • सिर की असामान्य स्थिति रखना।
  • प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होना।
  • आँखों से पानी बहना।
  • चलते समय गलत कदम रखना।
  • आँखों का टेढ़ापन, तिरछापन या भेंगापन होना।
  • पलकों का छोटा होना अथवा आँखों का लाल रहना।

दृष्टिबाधित बालकों की क्रियात्मक सीमाएँ

1. बुद्धि-लब्धि स्तर से सम्बन्धित कठिनाई

पुस्तक के अनुसार सीमित अनुभव और उपयुक्त अवसरों की कमी के कारण कुछ दृष्टिबाधित बालकों की व्यावहारिक कार्यक्षमता सामान्य बालकों की तुलना में कम दिखाई दे सकती है।

2. शैक्षिक मन्दता

ब्रेल या विशेष साधनों से पढ़ने की आवश्यकता के कारण शैक्षिक प्रगति अपेक्षाकृत धीमी हो सकती है। पुस्तक के अनुसार कुछ दृष्टिबाधित बालक सामान्य विद्यार्थियों से एक या दो वर्ष पीछे रह सकते हैं।

3. व्यक्तित्व विकास सम्बन्धी समस्या

वातावरण और जीवन के अनुभव व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते हैं। उचित अवसर और सहयोग न मिलने पर दृष्टिबाधित बालकों का व्यक्तित्व विकास सामान्य बालकों से भिन्न हो सकता है।

4. मन्द वाणी विकास

दृष्टि के माध्यम से दूसरों की मुख-मुद्रा और वाणी की नकल न कर पाने के कारण कुछ दृष्टिबाधित बालकों में वाणी के विकास की गति धीमी हो सकती है और शब्दों के उच्चारण में कठिनाई आ सकती है।

5. सामाजिक समायोजन की समस्या

समाज में अलग दृष्टिकोण से देखे जाने अथवा अत्यधिक सहायता पर निर्भरता की भावना के कारण कुछ बालकों में हीनता तथा सामाजिक समायोजन सम्बन्धी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

दृष्टिबाधित बालकों के लिए अनुदेशन रणनीतियाँ

1. उचित कक्षा व्यवस्था

दृष्टिबाधित बालकों को यथासम्भव सामान्य शिक्षा व्यवस्था में सम्मिलित किया जाना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार विशेष शिक्षक, विशेष कक्षा तथा उपयुक्त सहायक साधनों की व्यवस्था की जा सकती है।

2. सहयोगात्मक व्यवस्था

बालक की शिक्षा में प्रधानाध्यापक, शिक्षक, विशेष शिक्षक, स्वास्थ्य सेवा से जुड़े व्यक्ति और माता-पिता का सहयोग आवश्यक है। सभी को बालक की शैक्षिक आवश्यकताओं और उद्देश्यों की स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए।

3. उपयुक्त पाठ्यक्रम

कम दृष्टि वाले तथा सामान्य बालकों के लिए मूल पाठ्यक्रम समान रखा जा सकता है, लेकिन दृष्टिबाधित बालक पर अनावश्यक शैक्षिक दबाव नहीं डालना चाहिए। उसकी क्षमता के अनुसार कार्य और समय निर्धारित किया जाना चाहिए।

4. विशेष शिक्षण-साधनों का प्रयोग

पूर्ण दृष्टिहीन बालकों के लिए ब्रेल लिपि तथा श्रव्य सामग्री उपयोगी होती है, जबकि आंशिक दृष्टिबाधित बालकों के लिए बड़े अक्षर, आवर्धक साधन, पर्याप्त प्रकाश और अन्य सहायक उपकरणों का प्रयोग किया जा सकता है।

5. अनुभव आधारित शिक्षण

दृष्टिबाधित बालकों को वस्तुओं को छूने, सुनने और प्रत्यक्ष अनुभव करने के पर्याप्त अवसर देने चाहिए। इससे उनके प्रत्यय स्पष्ट होते हैं और अधिगम अधिक अर्थपूर्ण बनता है।

6. सुरक्षित एवं सहयोगी वातावरण

कक्षा और विद्यालय का वातावरण ऐसा होना चाहिए जिसमें बालक आसानी से चल-फिर सके और उसमें आत्मनिर्भरता विकसित हो। सहपाठियों को भी उसके प्रति सहयोगपूर्ण व्यवहार के लिए प्रेरित करना चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • शारीरिक विकलांगता के प्रमुख रूप दृष्टि, श्रवण, वाणी तथा अस्थि बाधिता हैं।
  • दृष्टिबाधित बालक पूर्ण अथवा आंशिक रूप से देखने में कठिनाई अनुभव करते हैं।
  • दृष्टि क्षमता के परीक्षण के लिए स्नेलन चार्ट का प्रयोग किया जाता है, जिसका विकास डॉ. हरबर्ट स्नेलन ने किया।
  • दृष्टिबाधित बालकों को मुख्यतः आंशिक तथा गंभीर रूप से दृष्टिबाधित वर्गों में बाँटा गया है।
  • इनकी बुद्धि सामान्य हो सकती है, लेकिन दृश्य अनुभव की कमी के कारण भाषा, प्रत्यय और सामाजिक समायोजन प्रभावित हो सकते हैं।
  • आँखें मलना, वस्तु को बहुत पास से देखना, सिरदर्द, पलकों का बार-बार झपकना तथा प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता दृष्टिबाधिता के प्रमुख संकेत हैं।
  • दृष्टिबाधित बालकों में शैक्षिक मन्दता, वाणी विकास की धीमी गति तथा सामाजिक समायोजन की कठिनाई दिखाई दे सकती है।
  • ब्रेल, श्रव्य सामग्री, बड़े अक्षर, आवर्धक साधन, सहयोगात्मक शिक्षण और अनुभव आधारित शिक्षा इनके लिए उपयोगी हैं।
Topic 6 श्रवण बाधिता—अर्थ, वर्गीकरण, विशेषताएँ, पहचान एवं अनुदेशन रणनीतियाँ

श्रवण बाधिता—अर्थ, वर्गीकरण, विशेषताएँ, पहचान एवं अनुदेशन रणनीतियाँ

श्रवण बाधिता का अर्थ

श्रवण बाधित बालक वे होते हैं जिनकी सुनने की क्षमता आंशिक या पूर्ण रूप से प्रभावित होती है। इसके कारण उन्हें भाषा सुनने, समझने और बोलने में कठिनाई हो सकती है।

ऐसे बालकों को श्रवण प्रशिक्षण, श्रवण यंत्र तथा दृश्य एवं अन्य सहायक शिक्षण-साधनों की आवश्यकता हो सकती है। आवश्यकता के अनुसार ऑडियोलॉजिस्ट तथा कान, नाक और गले के चिकित्सक की सहायता भी ली जाती है।

श्रवण बाधिता का वर्गीकरण

पुस्तक में डेसीबल स्तर और बाधिता प्रतिशत के आधार पर श्रवण बाधिता को चार वर्गों में बाँटा गया है—

प्रकार डेसीबल स्तर बाधिता प्रतिशत
कम बाधित 35–51 dB तक 40 प्रतिशत
मन्द बाधित 55–69 dB तक 40–50 प्रतिशत
गंभीर बाधित 70–89 dB तक 50–75 प्रतिशत
पूर्ण/गहन बाधित 90–100 dB तक 100 प्रतिशत

श्रवण बाधित बालकों की विशेषताएँ

1. बौद्धिक योग्यता

श्रवण बाधित बालकों का मानसिक विकास सामान्य बालकों के समान हो सकता है। उनकी चिन्तन शक्ति तथा अशाब्दिक बौद्धिक कार्य करने की क्षमता भी सामान्य स्तर की हो सकती है।

मुख्य कठिनाई भाषा से सम्बन्धित होती है, न कि आवश्यक रूप से बुद्धि से। पुस्तक के अनुसार अशाब्दिक बुद्धि-परीक्षणों में इनकी बुद्धिलब्धि उच्च स्तर की भी पाई जा सकती है।

2. मनोसामाजिक एवं व्यावसायिक समायोजन

पारस्परिक सम्प्रेषण और शाब्दिक अन्तःक्रिया की कठिनाई के कारण सामाजिक समायोजन प्रभावित हो सकता है। ऐसे बालक कभी-कभी अपने ही समूह में रहना और समान कठिनाई वाले साथियों से सम्बन्ध बनाना अधिक पसन्द करते हैं।

सामाजिक मान्यता और सहभागिता न मिलने पर उनमें हीनभावना उत्पन्न हो सकती है। उचित अवसर मिलने पर वे विभिन्न व्यवसायों में कार्य करने में सक्षम होते हैं।

3. शैक्षिक उपलब्धि

बुद्धि सामान्य या उच्च होने के बावजूद भाषा सम्बन्धी कठिनाइयों के कारण शैक्षिक उपलब्धि अपेक्षाकृत कम हो सकती है। पढ़ने, समझने और शाब्दिक विषयवस्तु के अधिगम में अधिक कठिनाई आती है।

4. भाषा एवं वाणी का विकास

श्रवण बाधिता का सबसे अधिक प्रभाव भाषा सीखने और बोलने की क्षमता पर पड़ता है। उच्चारण में दोष, सीमित शब्दावली तथा भाषा के सामान्य विकास में विलम्ब देखा जा सकता है।

जन्म से श्रवण बाधित बालकों के लिए विशेष प्रशिक्षण अधिक आवश्यक होता है। गहन प्रशिक्षण से भाषा और वाणी के विकास में सुधार किया जा सकता है।

5. अन्य विशेषताएँ
  • समाज और वातावरण के साथ समायोजन में कठिनाई हो सकती है।
  • भाषा की समस्या व्यक्तिगत एवं सामाजिक विकास को प्रभावित कर सकती है।
  • सुनने और बोलने दोनों में कठिनाई के कारण शाब्दिक अन्तःक्रिया सीमित हो सकती है।
  • दूसरों की बात न समझ पाने के कारण तनाव, हठ या चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो सकता है।

श्रवण बाधित बालकों की पहचान

कक्षा और दैनिक व्यवहार में कुछ संकेतों के आधार पर श्रवण बाधिता की प्रारम्भिक पहचान की जा सकती है—

  • ध्वनि की अपेक्षा गतिविधियों और दृश्य संकेतों पर अधिक ध्यान देना।
  • शिक्षक के होंठों और हाव-भाव को ध्यान से देखना।
  • सुनने के लिए सिर को एक ओर झुकाना।
  • व्यवहार में एकाग्रता और निरन्तरता की कमी होना।
  • प्रश्न या बात को बार-बार दोहराने के लिए कहना।
  • समान ध्वनि वाले शब्दों में भ्रम होना।
  • ध्वनि के स्रोत का पता न लगा पाना।
  • शब्दों के सही उच्चारण में कठिनाई होना।
  • बातचीत के बीच असंगत या निरर्थक बोल देना।
  • कभी-कभी बिना कारण बड़बड़ाते रहना।
  • शाब्दिक निर्देशों को समझने और उनका पालन करने में कठिनाई होना।
  • सामान्य से अधिक जोर से बोलना।

श्रवण बाधित बालकों की क्रियात्मक सीमाएँ

1. शैक्षिक सीमाएँ
  • बोलने का विकास अत्यन्त कम या अवरुद्ध हो सकता है।
  • वाणी-विकास प्रभावित होने से भाषा-विकास भी बाधित होता है।
  • कक्षा में पढ़ाई जाने वाली विषयवस्तु का अधिगम कठिन हो जाता है।
  • अधिगम की कठिनाइयों के कारण शैक्षिक उपलब्धि कम हो सकती है।
  • सामान्य परीक्षण एवं मूल्यांकन की विधियाँ इनके लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं हो सकतीं।
2. व्यक्तिगत एवं सामाजिक सीमाएँ
  • सामान्य बालकों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई हो सकती है।
  • नकारात्मक विचार और कुण्ठा उत्पन्न हो सकती है।
  • भावनात्मक ग्रन्थियाँ और चिड़चिड़ापन विकसित हो सकता है।
  • सामाजिक गतिविधियों में पीछे रह सकते हैं।
  • अपने प्रति विरोध या निषेधात्मक मनोवृत्ति विकसित हो सकती है।
  • पलायन की प्रवृत्ति तथा कुछ अनुचित व्यवहार दिखाई दे सकते हैं।

श्रवण बाधित बालकों के लिए अनुदेशन रणनीतियाँ

1. चिह्न भाषा

पूर्ण बधिर तथा कम सुनने वाले बालकों के लिए शब्दों और वर्णों को चिह्नों द्वारा व्यक्त किया जाता है। इससे भाषा और सम्प्रेषण को समझने में सहायता मिलती है।

2. संकेत भाषा

बालकों को पढ़ाते समय होंठों की गति के साथ हाथों के संकेतों का भी प्रयोग किया जाता है। इससे सामान्य भाषा के व्याकरण के साथ सीखना सरल होता है और दूसरे बालकों से सम्प्रेषण में सहायता मिलती है।

3. ओष्ठ पठन

इसमें होंठों की गति देखकर वर्ण और शब्द पहचानना सिखाया जाता है। पुस्तक के अनुसार इसकी सीमा यह है कि सामान्य गति से बोले गए वाक्य का केवल कुछ भाग ही समझ में आता है तथा कई वर्णों के उच्चारण में होंठों की गति लगभग समान दिखाई देती है।

4. स्पर्श प्रविधि

वस्तुओं को स्पर्श कराकर उनकी विशेषताओं और अर्थ को समझाया जाता है। यह प्रत्यक्ष अनुभव उपलब्ध कराने में सहायक होती है।

5. गतिविधि आधारित सम्प्रेषण

शारीरिक क्रियाओं और गतिविधियों के माध्यम से विचारों एवं निर्देशों को समझाने का प्रयास किया जाता है। इससे सम्प्रेषण अधिक स्पष्ट होता है।

6. ध्वनि प्रवर्धक यंत्र

जिन बालकों में कुछ श्रवण क्षमता शेष होती है, उनके लिए ध्वनि प्रवर्धक यंत्र उपयोगी हो सकते हैं। पुस्तक के अनुसार पूर्ण रूप से श्रवण बाधित बालकों के लिए इनका लाभ सीमित होता है।

प्रमुख शिक्षण रणनीतियाँ

  • चित्र, आकृति, संकेत शब्द, मॉडल और मानचित्र जैसी दृश्य सहायक सामग्री का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
  • पढ़ाते समय बीच-बीच में प्रश्न पूछकर यह जाँचना चाहिए कि बालक विषयवस्तु कितना समझ रहा है।
  • विशेष प्रशिक्षण प्राप्त शिक्षक की व्यवस्था की जानी चाहिए जो अन्य शिक्षकों और माता-पिता के साथ मिलकर कार्य करे।
  • पठन और लेखन सम्बन्धी कठिनाइयों पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देना चाहिए।
  • कम्प्यूटर तथा उपयुक्त तकनीकी साधनों का उपयोग शिक्षण और परीक्षण में किया जा सकता है।
  • श्रवण बाधित बालकों की आवश्यकताओं के अनुरूप विशेष तकनीकी एवं शैक्षिक कार्यक्रम विकसित किए जाने चाहिए।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • आंशिक या पूर्ण रूप से सुनने में कठिनाई वाले बालक श्रवण बाधित बालक कहलाते हैं।
  • पुस्तक में श्रवण बाधिता को कम, मन्द, गंभीर तथा पूर्ण/गहन चार वर्गों में बाँटा गया है।
  • श्रवण बाधिता मुख्यतः भाषा, वाणी, शैक्षिक उपलब्धि और सामाजिक सम्प्रेषण को प्रभावित करती है; बुद्धि आवश्यक रूप से कम नहीं होती।
  • होंठों को ध्यान से देखना, बात दोहराने को कहना, ऊँची आवाज में बोलना और ध्वनि के स्रोत को न पहचान पाना इसके प्रमुख संकेत हैं।
  • श्रवण बाधित बालकों में शैक्षिक, व्यक्तिगत और सामाजिक सीमाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • चिह्न भाषा, संकेत भाषा, ओष्ठ पठन, स्पर्श प्रविधि, गतिविधि और ध्वनि प्रवर्धक यंत्र प्रमुख सम्प्रेषण रणनीतियाँ हैं।
  • दृश्य सहायक सामग्री, प्रशिक्षित शिक्षक, व्यक्तिगत सहायता और तकनीकी साधनों का प्रयोग इनके शिक्षण में उपयोगी है।
Topic 7 वाणी बाधिता—अर्थ, पहचान, प्रकार, परीक्षण, कारण एवं उपचार

वाणी बाधिता—अर्थ, पहचान, प्रकार, परीक्षण, कारण एवं उपचार

वाणी बाधिता का अर्थ

वाणी बाधिता या वाक् विकार एक प्रकार का अधिगम दोष है जिसमें बालक को ध्वनि को समझने, उसका कूटानुवाद करने तथा शीघ्र प्रतिक्रिया देने में कठिनाई होती है। इससे भाषा को समझने, बोलने, पढ़ने, लिखने तथा वर्तनी सीखने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

ऐसे बालकों में बोलने और लिखने की क्षमता का विकास अपेक्षाकृत धीमी गति से हो सकता है। पुस्तक के अनुसार वाक् विकार से सम्बन्धित समस्याएँ मुख्यतः श्रवण, दृष्टि तथा ध्यान से जुड़ी हो सकती हैं।

वाणी बाधिता की परिभाषाएँ

लाहन एवं काफमेन (1988) के अनुसार

वाणी मुखर भाषा की ध्वनियों की क्रमबद्ध एवं व्यावहारिक अभिव्यक्ति है। जब यह अभिव्यक्ति सामान्य या उपयुक्त स्थिति से अलग हो जाती है, तब उसे वाक् दोष कहा जाता है।

राइपर (1979) के अनुसार

जिन बच्चों को सम्प्रेषण में कठिनाई होती है और जिनकी स्वर या वाणी अन्य बच्चों से भिन्न होती है, उन्हें वाणी सम्बन्धी समस्या वाला बालक माना जाता है। ऐसे बालक अपनी बात कहने में असमर्थता अनुभव कर सकते हैं और उनकी वाणी मधुर या स्पष्ट नहीं होती।

वाणी विकार सम्बन्धी बालकों की पहचान एवं लक्षण

योग्य शिक्षक बालक की गतिविधियों, पठन, उच्चारण और भाषा-व्यवहार का निरीक्षण करके वाणी बाधिता की प्रारम्भिक पहचान कर सकता है।

1. अक्षरों की पहचान में कठिनाई

बालक को अक्षरों को पहचानने और उनका सही उच्चारण करने में कठिनाई होती है। जब तक वह अक्षर की ठीक पहचान नहीं कर पाता, तब तक उसका उच्चारण भी त्रुटिपूर्ण रह सकता है।

2. पठन में उचित धाराप्रवाह का अभाव

बालक का पठन सहज और प्रवाहपूर्ण नहीं होता। गद्य या पद्य पढ़ते समय उचित गति, विराम तथा भाव बनाए रखने में कठिनाई होती है।

3. पुनरावृत्त शब्दों की पहचान में कठिनाई

एक ही अक्षर या शब्द को पुनः देखने पर भी बालक उसे तुरन्त पहचान नहीं पाता। कई बार पहले पढ़े हुए सरल शब्द को भी पहचानने में अधिक समय लगता है।

4. वर्णमाला के क्रम को सीखने में कठिनाई

वर्णमाला के क्रम, अक्षर-वर्ग तथा स्वर-व्यंजन के उचित संयोजन को समझने और याद रखने में कठिनाई हो सकती है।

5. वर्तनी के ज्ञान का अभाव

बालक को सही वर्तनी लिखने तथा स्वर और मात्राओं के उचित प्रयोग में कठिनाई होती है। बार-बार निर्देशन के बाद भी यह समस्या बनी रह सकती है।

6. धीमी गति से पढ़ना

ऐसे बालक सामान्य बच्चों की तुलना में धीमी गति से पढ़ते हैं। शब्दों के बीच अधिक समय लगाने के कारण सम्पूर्ण पठन की गति कम हो जाती है।

7. अक्षरों को विपरीत समझना

समान बनावट वाले अक्षरों को उल्टा या विपरीत समझने की प्रवृत्ति हो सकती है। पुस्तक में उदाहरण के रूप में d को b तथा b को d समझने का उल्लेख किया गया है।

8. अर्थ के अनुसार पठन का अभाव

बालक वाक्य या पद्य का अर्थ न समझ पाने के कारण भाव और अर्थ के अनुरूप उतार-चढ़ाव से पढ़ नहीं पाता। इससे रस, भाव और अभिव्यक्ति का उचित प्रदर्शन नहीं हो पाता।

वाक् विकार के प्रकार

पुस्तक में वाक् विकार को मुख्य रूप से छह प्रकारों में विभाजित किया गया है—

1. प्रक्रियात्मक या उच्चारणात्मक दोष

इसमें बालक को कुछ विशिष्ट शब्दों का शुद्ध उच्चारण करने में कठिनाई होती है। वह शब्दों को सही रूप में बोल नहीं पाता।

2. हकलाना

इस विकार में बालक बोलते समय रुक-रुककर बोलता है। किसी शब्द या ध्वनि को व्यक्त करने में बार-बार अवरोध उत्पन्न होता है।

3. आवाज की समस्या

इसमें बालक की आवाज अत्यधिक भारी, पतली अथवा अस्पष्ट हो सकती है। आवाज की गुणवत्ता सामान्य से भिन्न होती है।

4. अंगीय वाणी का दोष

वाक् अंगों, विशेषकर जीभ आदि से सम्बन्धित दोष के कारण बालक विभिन्न शब्दों का स्पष्ट उच्चारण नहीं कर पाता।

5. कम सुनने वाले बालकों की वाणी समस्या

कम सुनने वाले बालक शब्दों को ठीक प्रकार से नहीं सुन पाते, इसलिए उनके उच्चारण में भी त्रुटियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

6. देर से बोलने का विकार

कुछ बालकों में वाणी का विकास सामान्य आयु की तुलना में देर से होता है। इसे भी वाक् विकार का एक प्रकार माना गया है।

वाक् विकार की पहचान के प्रमुख परीक्षण

पुस्तक में वाणी एवं वाक् विकार की पहचान के लिए निम्न प्रमुख परीक्षणों का उल्लेख किया गया है—

  • डेनवर आर्टिक्यूलेशन स्क्रीनिंग एग्जामिनेशन।
  • अर्ली लैंग्वेज माइलस्टोन स्केल।
  • डेनवर-II।
  • पीबॉडी चित्र शब्दावली टेस्ट — संशोधित अंक।
  • हियरिंग टेस्ट — सुनने की क्षमता का परीक्षण।
वाक् परीक्षण

वाक् और भाषा चिकित्सक बालक के विकास सम्बन्धी इतिहास का अभिलेख रखते हैं तथा उसकी बोलने की क्षमता का परीक्षण करते हैं। इससे यह ज्ञात किया जाता है कि वाणी का विकास सामान्य स्तर पर हो रहा है या अपेक्षाकृत धीमा है।

संवर्धी एवं वैकल्पिक संचार (AAC)

इसमें सम्प्रेषण की सहायता के लिए तकनीक का प्रयोग किया जाता है। कम्प्यूटर, आईपैड तथा ऑडियो-वीडियो मॉड्यूल जैसे साधन बोलने की क्षमता और सम्प्रेषण को सुधारने में उपयोगी हो सकते हैं।

ऑडियोमेट्री परीक्षण

श्रवण क्षमता की कमी भी वाक् विकार का कारण हो सकती है। इसलिए आवश्यकता होने पर ऑडियोलॉजिस्ट द्वारा ऑडियोमेट्री परीक्षण कराया जाता है और उसके आधार पर श्रवण एवं स्पीच थेरेपी दी जा सकती है।

वाणी बाधिता के कारण

1. श्रवण सम्बन्धी दोष

बालक किसी शब्द को जैसा सुनता है, वैसा ही बोलने का प्रयास करता है। यदि श्रवण दोष के कारण शब्द गलत सुनाई देता है तो उसका उच्चारण भी उसी प्रकार गलत हो सकता है।

2. दृष्टि सम्बन्धी दोष

दृष्टि सम्बन्धी समस्या के कारण बालक लिखित सामग्री को ठीक से समझ या लिख नहीं पाता। इससे पठन और लेखन दोनों प्रभावित हो सकते हैं तथा धीरे-धीरे भाषा सम्बन्धी कठिनाइयाँ बढ़ सकती हैं।

3. ध्यान का अभाव

उचित वातावरण का अभाव या स्वाभाविक रूप से ध्यान की कमी पठन और भाषा विकास को प्रभावित कर सकती है। पढ़ते समय बार-बार पंक्ति बदलना या बीच में रोकना भी ध्यान भंग होने का कारण बन सकता है।

वाणी बाधिता का उपचार एवं सुधारात्मक उपाय

1. प्रारम्भिक अवस्था में विशेष ध्यान

प्रारम्भिक वर्षों में माता-पिता को बालक के भाषा और वाणी विकास पर ध्यान देना चाहिए। विद्यालय में प्रवेश के बाद शिक्षक को भी समस्या की शीघ्र पहचान करके उचित सुधारात्मक सहायता देनी चाहिए।

2. भाषायी शिक्षण को रुचिपूर्ण बनाना

शिक्षक को भाषा शिक्षण में उचित अभ्यास तथा रोचक विधियों का प्रयोग करना चाहिए। इससे बालक में पठन के प्रति रुचि विकसित होती है और पठन सम्बन्धी दोष कम किए जा सकते हैं।

3. भाषा सम्बन्धी नियमों का ज्ञान

बालकों को उच्चारण, वर्ण, मात्रा, शब्द और पठन से सम्बन्धित आवश्यक भाषायी नियम समझाए जाने चाहिए। इससे वे सही उच्चारण और उचित पठन का अभ्यास कर सकते हैं।

4. वर्तनी सम्बन्धी दोषों का व्यक्तिगत सुधार

शिक्षक को प्रत्येक बालक की वर्तनी सम्बन्धी कठिनाइयों की पहचान करके व्यक्तिगत रूप से उनका समाधान करना चाहिए।

5. श्रवण समस्या का उपचार

जिन बालकों में श्रवण समस्या हो, उनके अभिभावकों को उचित परामर्श दिया जाना चाहिए। आवश्यकता होने पर श्रवण यंत्र उपलब्ध कराकर सुनने और पठन की समस्या कम की जा सकती है।

6. उचित गति से पठन का अभ्यास

बालकों को न बहुत तेज और न अत्यधिक धीमी गति से पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। उचित गति से नियमित पठन अभ्यास करने से पठन कौशल बेहतर होता है।

7. कठिन शब्दों एवं वाक्यों का अभ्यास

ध्वनि और उच्चारण सम्बन्धी दोषों को कम करने के लिए कठिन शब्दों तथा वाक्यों का बार-बार अभ्यास कराया जाना चाहिए।

8. शब्दों के अर्थ का ज्ञान

बालक को केवल शब्द पढ़ना ही नहीं, बल्कि उसका अर्थ भी समझाया जाना चाहिए। अर्थ-बोध विकसित होने पर उचित आरोह-अवरोह, भाव और अर्थ के अनुसार पठन करना सरल हो जाता है।

पुस्तक के अनुसार माता-पिता, शिक्षक और चिकित्सक समन्वय से कार्य करें तो अधिकांश बालकों की वाणी और पठन सम्बन्धी कठिनाइयों में सुधार किया जा सकता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वाणी बाधिता में बालक को भाषा समझने, बोलने, पढ़ने, लिखने और वर्तनी सीखने में कठिनाई हो सकती है।
  • इसके प्रमुख लक्षण अक्षर पहचानने में कठिनाई, धीमा पठन, गलत वर्तनी, अक्षरों को उल्टा समझना तथा अर्थ के अनुसार न पढ़ पाना हैं।
  • वाक् विकार के प्रमुख प्रकार उच्चारण दोष, हकलाना, आवाज की समस्या, अंगीय वाणी दोष, श्रवण से सम्बन्धित वाणी समस्या तथा देर से बोलना हैं।
  • वाणी बाधिता की पहचान वाक् परीक्षण, श्रवण परीक्षण, ऑडियोमेट्री तथा विभिन्न भाषा-विकास परीक्षणों से की जा सकती है।
  • श्रवण दोष, दृष्टि दोष और ध्यान का अभाव इसके प्रमुख कारण बताए गए हैं।
  • भाषायी नियमों का अभ्यास, सही उच्चारण, उचित पठन गति, कठिन शब्दों का पुनराभ्यास तथा अर्थ-बोध विकसित करना सुधार में उपयोगी है।
  • समस्या के समाधान में माता-पिता, शिक्षक, चिकित्सक तथा आवश्यकता अनुसार स्पीच या श्रवण विशेषज्ञ का सहयोग महत्त्वपूर्ण है।

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Topic 8 अस्थि बाधित बालक—अर्थ, विशेषताएँ, वर्गीकरण, पहचान एवं अनुदेशन रणनीतियाँ

अस्थि बाधित बालक—अर्थ, विशेषताएँ, वर्गीकरण, पहचान एवं अनुदेशन रणनीतियाँ

अस्थि बाधित बालकों का अर्थ

अस्थि बाधित बालक वे होते हैं जिनकी अस्थियों, मांसपेशियों या जोड़ों में किसी प्रकार का दोष, विकृति अथवा क्षति होने के कारण उनकी सामान्य शारीरिक क्रियाएँ प्रभावित होती हैं। उन्हें चलने-फिरने, उठने-बैठने या अन्य शारीरिक कार्य करने में कठिनाई हो सकती है।

यह बाधिता जन्मजात, बीमारी अथवा दुर्घटना के कारण हो सकती है। गंभीर स्थिति में बालक को कृत्रिम अंग, बैसाखी, व्हीलचेयर या अन्य सहायक उपकरणों की आवश्यकता पड़ सकती है।

व्यापक अर्थ

पुस्तक के अनुसार वे बालक जिनकी हड्डियों, मांसपेशियों अथवा जोड़ों में जन्म, बीमारी, दुर्घटना या वंशानुगत कारणों से विकृति उत्पन्न हो जाए तथा जिसके कारण सामान्य कार्य और चलना-फिरना प्रभावित हो, अस्थि बाधित बालक कहलाते हैं।

इस प्रकार अस्थि बाधिता मुख्यतः शारीरिक अपंगता से सम्बन्धित है, न कि आवश्यक रूप से किसी इन्द्रिय दोष से।

अस्थि बाधित बालकों की विशेषताएँ

  • कृत्रिम अंगों अथवा सहायक उपकरणों के साथ समायोजन में कठिनाई हो सकती है।
  • इनमें शारीरिक क्रियाशीलता अपेक्षाकृत कम होती है।
  • कुछ कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ सकता है और कार्य पूरा करने में अधिक समय लगता है।
  • शारीरिक कमजोरी के बावजूद उनमें कार्य करने की इच्छा और उत्सुकता बनी रह सकती है।
  • सामाजिक सहभागिता और समायोजन में कठिनाई का अनुभव हो सकता है।

अस्थि बाधित बालकों का वर्गीकरण

अस्थि बाधिता का वर्गीकरण मुख्यतः शारीरिक अंगों और उनकी क्रियाशीलता में पाई जाने वाली विकृतियों के आधार पर किया जाता है। पुस्तक में इसके प्रमुख रूप निम्नलिखित बताए गए हैं—

1. पाँव-फिर (Clubfoot)

इसमें पैर की बनावट सामान्य स्थिति से विकृत होती है, जिससे चलने में कठिनाई उत्पन्न हो सकती है।

2. अंग का छोटा होना या अभाव

किसी हाथ या पैर का पूर्ण रूप से न होना अथवा सामान्य से छोटा होना इस श्रेणी में आता है।

3. एक या अधिक अंगों का पक्षाघात

इसमें एक या अधिक अंगों की गति और कार्य करने की क्षमता प्रभावित हो जाती है।

4. मस्तिष्क पक्षाघात (Cerebral Palsy)

मस्तिष्क से सम्बन्धित विकार के कारण शरीर की गति और मांसपेशियों के नियन्त्रण में कठिनाई उत्पन्न हो सकती है।

5. मेरुदण्ड का वक्र होना

मेरुदण्ड की असामान्य वक्रता के कारण शरीर की मुद्रा और गतिशीलता प्रभावित हो सकती है।

6. विकृत नितम्ब (Malformed Hips)

नितम्बों की असामान्य संरचना के कारण चलने और शरीर का संतुलन बनाए रखने में कठिनाई हो सकती है।

7. मेरुदण्ड द्विशाखीय (Spina Bifida)

यह मेरुदण्ड से सम्बन्धित जन्मजात विकृति है जिससे शरीर के निचले भाग की क्रियाशीलता प्रभावित हो सकती है।

8. मांसपेशीय असमर्थता (Muscular Dystrophy)

इसमें मांसपेशियों की शक्ति धीरे-धीरे कम होती जाती है, जिससे शारीरिक गतिविधियों को करना कठिन हो सकता है।

अस्थि बाधित बालकों की पहचान

  • बाधित अंगों पर उचित नियन्त्रण का अभाव होना।
  • शारीरिक कार्य और व्यायाम करने में कठिनाई होना।
  • बैसाखियों या अन्य सहायक उपकरणों से चलना।
  • चलते समय लड़खड़ाना।
  • अंगों की गति में नियन्त्रण और समन्वय की कमी होना।
  • हाथ, पैर, अंगुली या गर्दन आदि में स्पष्ट विकृति दिखाई देना।
  • कृत्रिम अंगों के साथ समायोजन करने में कठिनाई होना।
  • चलने-फिरने तथा उठने-बैठने में कठिनाई या असमर्थता होना।

अस्थि बाधिता के कारण

1. जन्मजात अनियमितता

कुछ शारीरिक विकृतियाँ जन्म से ही उपस्थित हो सकती हैं। पुस्तक में उचित पोषण की कमी तथा समय पर टीकाकरण न होने जैसी स्थितियों का भी उल्लेख किया गया है।

2. दुर्घटना

सड़क दुर्घटना, ऊँचाई से गिरना, जल जाना अथवा अन्य गंभीर चोटें अस्थियों और अंगों को क्षति पहुँचाकर अस्थि बाधिता उत्पन्न कर सकती हैं।

3. बीमारी

लकवा, गठिया, कूबड़ तथा अन्य रोग शरीर के गामक अंगों को प्रभावित कर सकते हैं और अस्थि बाधिता का कारण बन सकते हैं।

अस्थि बाधित बालकों की समस्याएँ

  • गतिशीलता सीमित होने के कारण स्वतंत्र रूप से शारीरिक गतिविधियाँ करने में कठिनाई होती है।
  • शारीरिक बाधिता के कारण शिक्षक से सम्पर्क करने में संकोच हो सकता है, जिससे उनकी आवश्यकताएँ अनदेखी रह जाती हैं।
  • सहपाठियों या शिक्षकों की अत्यधिक दया अथवा उपेक्षा दोनों ही उनके समायोजन को प्रभावित कर सकती हैं।
  • गंभीर रूप से बाधित बालक विद्यालय के सामान्य कार्यक्रमों में पूर्ण सहभागिता नहीं कर पाते।
  • उचित बैठने, लिखने-पढ़ने तथा चलने की व्यवस्था न होने से शिक्षण प्रभावित होता है।
  • माता-पिता की उपेक्षा या अत्यधिक उदासीनता मानसिक तनाव उत्पन्न कर सकती है।
  • निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारण उचित पोषण और चिकित्सा सुविधाओं की कमी हो सकती है।
  • सामाजिक और संवेगात्मक समायोजन में भी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

अस्थि बाधित बालकों हेतु अनुदेशन रणनीतियाँ

1. सामान्यीकृत पाठ्यचर्या

जहाँ तक सम्भव हो अस्थि बाधित बालकों को सामान्य पाठ्यचर्या के साथ ही शिक्षा देनी चाहिए, लेकिन उनकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार आवश्यक सुविधाएँ और परिवर्तन उपलब्ध कराने चाहिए।

  • बैठने और चलने-फिरने की उपयुक्त व्यवस्था करनी चाहिए।
  • शारीरिक कौशलों के विकास को ध्यान में रखकर शिक्षण देना चाहिए।
  • आवश्यक सहायक एवं सम्प्रेषण उपकरण उपलब्ध कराने चाहिए।
  • शिक्षक को बालक की चिकित्सीय स्थिति और उसके शैक्षिक प्रभाव की जानकारी होनी चाहिए।
2. सहायक उपकरणों का प्रयोग

बालक की बाधिता और गतिशीलता के अनुसार विभिन्न सहायक तकनीकों और उपकरणों का प्रयोग किया जा सकता है। इनसे बालक को शैक्षिक गतिविधियों में अधिक स्वतंत्र रूप से भाग लेने का अवसर मिलता है।

  • स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर।
  • भाषा पहचान सॉफ्टवेयर।
  • आगम एवं वैकल्पिक सम्प्रेषण उपकरण।
  • बेंत और बैसाखियाँ।
  • व्हीलचेयर।
  • विशेष व्यायाम उपकरण।
  • आवश्यकता के अनुसार विशेष कुर्सी, मेज अथवा टेबल।
3. सहयोगपूर्ण विद्यालयी वातावरण

शिक्षक और सहपाठियों को बालक के प्रति सहानुभूतिपूर्ण लेकिन सामान्य व्यवहार करना चाहिए। उसे अनावश्यक दया दिखाने के बजाय आत्मनिर्भर बनने और विद्यालयी गतिविधियों में भाग लेने के अवसर देने चाहिए।

4. स्वास्थ्य एवं शारीरिक स्थिति का ध्यान

बालक की चिकित्सीय स्थिति, थकान और गतिशीलता को ध्यान में रखते हुए कार्य और गतिविधियाँ निर्धारित करनी चाहिए। आवश्यकता होने पर चिकित्सक और अभिभावकों से भी सहयोग लेना चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अस्थियों, मांसपेशियों या जोड़ों की विकृति के कारण सामान्य शारीरिक कार्यों में कठिनाई अनुभव करने वाले बालक अस्थि बाधित कहलाते हैं।
  • अस्थि बाधिता जन्मजात विकृति, दुर्घटना तथा बीमारी के कारण उत्पन्न हो सकती है।
  • इसके प्रमुख प्रकार Clubfoot, अंगों का अभाव, पक्षाघात, Cerebral Palsy, मेरुदण्ड विकृति, Spina Bifida और Muscular Dystrophy आदि हैं।
  • चलने-फिरने में कठिनाई, अंगों पर नियन्त्रण की कमी तथा सहायक उपकरणों की आवश्यकता इसके प्रमुख पहचान संकेत हैं।
  • इन बालकों को गतिशीलता, सामाजिक समायोजन और विद्यालयी सहभागिता से सम्बन्धित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
  • सामान्यीकृत पाठ्यचर्या के साथ आवश्यक सुविधाएँ, उचित बैठने की व्यवस्था और सहायक उपकरण उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
  • बैसाखी, व्हीलचेयर, विशेष फर्नीचर तथा अन्य सहायक तकनीकें इनके शिक्षण और आत्मनिर्भरता में उपयोगी हैं।
Topic 9 मानसिक दक्षता एवं प्रतिभाशाली बालक

मानसिक दक्षता एवं प्रतिभाशाली बालक

मानसिक दक्षता

मानसिक क्षमता के आधार पर बालकों में पर्याप्त व्यक्तिगत भिन्नताएँ पाई जाती हैं। पुस्तक में मानसिक दक्षता के आधार पर प्रतिभाशाली बालक, मंद गति से सीखने वाले बालक, अधिगम अक्षमता वाले बालक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े बालकों का उल्लेख किया गया है।

प्रतिभाशाली बालक का अर्थ

प्रतिभाशाली बालक वे होते हैं जिनकी बौद्धिक क्षमता सामान्य बालकों की तुलना में अधिक होती है। वे नई बातों को शीघ्र सीखते हैं, समझते हैं और अपेक्षाकृत अधिक समय तक स्मरण रख सकते हैं।

पुस्तक के अनुसार सामान्य बालकों की बुद्धिलब्धि लगभग 90–110 के बीच मानी गई है, जबकि 120 से अधिक बुद्धिलब्धि वाले बालकों को प्रतिभाशाली बालकों की श्रेणी में रखा गया है। केवल अधिक बुद्धिलब्धि ही नहीं, किसी विशिष्ट क्षेत्र में उच्चकोटि की योग्यता भी प्रतिभा का आधार हो सकती है।

प्रतिभाशाली बालकों की प्रमुख परिभाषाएँ

टरमन एवं ओडन के अनुसार

प्रतिभाशाली बालक शारीरिक गठन, सामाजिक समायोजन, व्यक्तित्व, विद्यालयी उपलब्धि, खेल सम्बन्धी ज्ञान और रुचियों की विविधता में औसत बालकों से श्रेष्ठ पाए जाते हैं।

नेशनल सोसायटी फॉर द स्टडी ऑफ एजुकेशन के अनुसार

ऐसा बालक जो किसी उपयोगी कार्य-क्षेत्र में लगातार उच्च स्तर का प्रदर्शन करता है, प्रतिभाशाली या योग्य बालक माना जाता है।

प्रेम पसरीचा के अनुसार

प्रतिभाशाली बालक सामान्य बुद्धि की दृष्टि से श्रेष्ठ हो सकता है अथवा किसी ऐसे क्षेत्र में उच्च स्तर की विशिष्ट योग्यता रख सकता है जिसका उच्च बुद्धिलब्धि से सम्बन्ध होना आवश्यक नहीं है।

प्रतिभाशाली बालकों की विशेषताएँ

1. मनो-सामाजिक विशेषताएँ
  • ये प्रायः प्रसन्नचित्त, सक्रिय और सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत परिपक्व होते हैं।
  • अपनी आयु से बड़े बच्चों से मित्रता करना पसन्द कर सकते हैं।
  • घर, विद्यालय और समुदाय में उत्तरदायित्व लेना पसन्द करते हैं।
  • इनमें नेतृत्व की क्षमता अधिक पाई जा सकती है।
2. शैक्षिक विशेषताएँ
  • उच्च बौद्धिक क्षमता का प्रदर्शन करते हैं।
  • विद्यालयी विषयों में सामान्यतः उच्च उपलब्धि प्राप्त करते हैं।
  • साहित्य, विज्ञान, गणित, इतिहास या भूगोल जैसे किसी एक अथवा अनेक विषयों में विशेष योग्यता दिखा सकते हैं।
  • इनकी बुद्धि और शैक्षिक उपलब्धि में प्रायः सकारात्मक सम्बन्ध दिखाई देता है।
  • प्रतियोगिताओं और चुनौतीपूर्ण गतिविधियों में रुचि लेते हैं।
3. शारीरिक विशेषताएँ

पुस्तक में प्रतिभाशाली बालकों को सामान्यतः स्वस्थ एवं सक्रिय बताया गया है। कुछ अध्ययनों में इनके शारीरिक विकास को भी औसत बालकों की तुलना में बेहतर पाया गया है।

4. संवेगात्मक विशेषताएँ
  • संवेगात्मक रूप से अपेक्षाकृत स्थिर और समायोजित होते हैं।
  • समस्याओं और कठिन परिस्थितियों का स्वतंत्र रूप से सामना करने का प्रयास करते हैं।
  • नई परिस्थितियों तथा नए लोगों के साथ शीघ्र समायोजन कर सकते हैं।
  • इनका आत्मविश्वास और धैर्य अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है।
5. तीव्र मानसिक क्रियाएँ

प्रतिभाशाली बालकों में स्मृति, चिन्तन, तर्क, कल्पना, विश्लेषण, संश्लेषण और समस्या-समाधान जैसी मानसिक क्षमताएँ सामान्यतः अधिक विकसित होती हैं। वे जटिल बातों को शीघ्र समझने की क्षमता रखते हैं।

6. शैक्षिक उपलब्धि

तीव्र बुद्धि और शीघ्र सीखने की क्षमता के कारण इनका शैक्षिक प्रदर्शन सामान्यतः उच्च होता है। ये कम समय में अधिक विषयवस्तु ग्रहण कर सकते हैं।

7. सहगामी क्रियाओं में रुचि

प्रतिभाशाली बालक केवल अध्ययन में ही नहीं, बल्कि भाषण, वाद-विवाद, खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम और अन्य पाठ्य-सहगामी क्रियाओं में भी सक्रिय भाग ले सकते हैं।

8. व्यक्तिगत विशेषताएँ

इनमें जिज्ञासा, आत्मविश्वास, स्वतंत्र विचार, नई चीजें जानने की इच्छा और विविध रुचियाँ अधिक पाई जाती हैं। इनका शब्द-भण्डार भी सामान्यतः समृद्ध होता है।

9. पुस्तक में उल्लिखित अन्य सामान्य विशेषताएँ
  • शारीरिक रूप से सामान्यतः स्वस्थ होते हैं।
  • इनकी ज्ञानेन्द्रियाँ सक्रिय होती हैं।
  • बुद्धिलब्धि 120 से अधिक हो सकती है।
  • आत्मविश्वासी, आशावादी और धैर्यवान हो सकते हैं।
  • पढ़ने-लिखने में रुचि तथा विस्तृत शब्द-भण्डार पाया जाता है।
  • पुस्तक के अनुसार अधिकांश प्रतिभाशाली बालकों में अनुशासनप्रियता पाई जाती है।

प्रतिभाशाली बालकों की पहचान

1. बुद्धि परीक्षण

बुद्धि परीक्षणों द्वारा बालक की बौद्धिक क्षमता का आकलन किया जाता है। इसके लिए शाब्दिक और अशाब्दिक दोनों प्रकार के बुद्धि परीक्षणों का प्रयोग किया जा सकता है।

2. प्रवणता परीक्षण

प्रवणता परीक्षण से बालक की किसी विशेष कार्य या क्षेत्र में भविष्य की सम्भावित योग्यता का अनुमान लगाया जाता है।

3. सम्बन्धित व्यक्तियों से सूचनाएँ

माता-पिता, शिक्षक और बालक से सम्बन्धित अन्य व्यक्तियों से उसकी रुचियों, व्यवहार, उपलब्धियों और विशेष योग्यताओं की जानकारी एकत्र की जा सकती है।

4. उपलब्धि परीक्षण

विद्यालयी उपलब्धि का परीक्षण करके उन बालकों की पहचान की जा सकती है जो अपने आयु-स्तर की तुलना में लगातार उच्च प्रदर्शन करते हैं।

5. सृजनात्मक परीक्षण

सृजनात्मक परीक्षणों द्वारा बालक की मौलिकता, नवीन विचार प्रस्तुत करने और रचनात्मक समस्या-समाधान की क्षमता का पता लगाया जा सकता है।

6. साक्षात्कार

साक्षात्कार द्वारा बालक के तर्क, विचार, अभिव्यक्ति, रुचि और समस्या-समाधान की शैली का अध्ययन करके उसकी प्रतिभा के संकेत पहचाने जा सकते हैं।

प्रतिभाशाली बालकों की क्रियात्मक सीमाएँ

प्रतिभाशाली बालक सामान्यतः उच्च क्षमता वाले होते हैं, फिर भी उनकी विशेष आवश्यकताओं की उपेक्षा करने पर कुछ समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

1. कुसमायोजन

जब उनकी योग्यताओं और आवश्यकताओं के अनुरूप अवसर नहीं मिलते, तो मानसिक एवं संवेगात्मक असन्तोष उत्पन्न होकर समायोजन सम्बन्धी समस्या पैदा हो सकती है।

2. असुरक्षा एवं उपेक्षा की भावना

प्रतिभाशाली बालक प्रायः जिज्ञासु होते हैं और अधिक प्रश्न पूछते हैं। यदि शिक्षक या अभिभावक उनकी जिज्ञासा को बार-बार दबाएँ तो वे स्वयं को उपेक्षित या असुरक्षित अनुभव कर सकते हैं।

3. अन्तर्मुखता

प्रतिभा के विकास के लिए उचित अवसर न मिलने पर कुछ बालक स्वयं को समूह से अलग कर सकते हैं और एकान्तप्रिय हो सकते हैं।

4. अहं भावना

आवश्यकता से अधिक प्रशंसा मिलने पर बालक स्वयं को दूसरों से अत्यधिक श्रेष्ठ मानने लग सकता है। इससे अहंकार की भावना विकसित हो सकती है।

5. विद्रोह

यदि शिक्षक और अभिभावक बालक की प्रतिभा को समझने तथा उचित दिशा देने में असफल रहें तो उसमें विरोध या विद्रोही व्यवहार उत्पन्न हो सकता है।

6. अनुशासनहीनता

औसत बालकों के अनुसार बनाई गई कक्षा-गतिविधियाँ प्रतिभाशाली बालक को अत्यधिक सरल लग सकती हैं। चुनौती का अभाव होने पर वह ऊबकर कक्षा में अनुशासन सम्बन्धी समस्या उत्पन्न कर सकता है।

प्रतिभाशाली बालकों के लिए अनुदेशन रणनीतियाँ

1. व्यापक एवं विस्तृत पाठ्यचर्या

सामान्य पाठ्यक्रम की तुलना में प्रतिभाशाली बालकों को अधिक व्यापक, गहन और चुनौतीपूर्ण विषयवस्तु उपलब्ध करानी चाहिए। इसमें खोज, मौलिक विचार, स्वतंत्र कार्य तथा रचनात्मक गतिविधियों के पर्याप्त अवसर होने चाहिए।

2. शिक्षक द्वारा व्यक्तिगत ध्यान

शिक्षक को प्रतिभाशाली बालक की विशेष रुचियों और क्षमताओं को पहचानकर व्यक्तिगत निर्देशन और परामर्श देना चाहिए। इससे उसकी प्रतिभा सही दिशा में विकसित होती है।

3. पाठ्य-सहगामी क्रियाओं की व्यवस्था

सांस्कृतिक कार्यक्रम, भाषण, वाद-विवाद, नाटक, खेल, निबन्ध तथा सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताओं जैसे अवसर देकर बालक को अपनी विविध प्रतिभाओं के प्रदर्शन का अवसर देना चाहिए।

4. नवीन एवं विशिष्ट शिक्षण विधियाँ

प्रतिभाशाली बालकों को केवल सामान्य व्याख्यान पद्धति तक सीमित नहीं रखना चाहिए। प्रोजेक्ट, खोज, ब्रेन-स्टॉर्मिंग तथा समस्या-समाधान जैसी सक्रिय विधियाँ अधिक उपयोगी होती हैं।

5. योग्य शिक्षकों की व्यवस्था

ऐसे बालकों के शिक्षक अध्ययनशील, नवीन विचारों वाले और उनकी जिज्ञासाओं को समझने में सक्षम होने चाहिए। शिक्षक को चुनौतीपूर्ण प्रश्नों और स्वतंत्र विचारों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

6. उत्तरदायित्व प्रदान करना

बालक की रुचि और क्षमता के अनुसार उसे उचित उत्तरदायित्व देना चाहिए। इससे उसकी नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास और बौद्धिक विकास को प्रोत्साहन मिलता है।

7. पुरस्कार एवं छात्रवृत्ति

उल्लेखनीय उपलब्धियों पर उचित प्रशंसा, पुरस्कार और छात्रवृत्ति की व्यवस्था की जानी चाहिए। इससे प्रतिभाशाली बालक को आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा और आवश्यक सहायता मिलती है।

8. नेतृत्व का प्रशिक्षण

प्रतिभाशाली बालकों को विभिन्न परिस्थितियों में नेतृत्व करने के अवसर दिए जाने चाहिए। पुस्तक में क्रो एवं क्रो ने भी ऐसे बालकों को नेतृत्व के अवसर एवं प्रशिक्षण प्रदान करने पर बल दिया है।

9. संस्कृति की शिक्षा

पुस्तक में हॉलिंगवर्थ के अनुसार प्रतिभाशाली बालकों को अपनी संस्कृति के विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व की शिक्षा देना आवश्यक बताया गया है, जिससे वे समाज में उचित स्थान ग्रहण कर सकें।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मानसिक दक्षता के आधार पर प्रतिभाशाली, मंद गति से सीखने वाले, अधिगम अक्षमता वाले और पिछड़े बालकों में भिन्नता की जा सकती है।
  • पुस्तक के अनुसार 120 से अधिक बुद्धिलब्धि वाले बालकों को प्रतिभाशाली माना गया है, यद्यपि किसी विशेष क्षेत्र की उच्च योग्यता भी प्रतिभा का आधार हो सकती है।
  • प्रतिभाशाली बालक शीघ्र सीखते हैं तथा उनमें तर्क, स्मृति, कल्पना, समस्या-समाधान और नेतृत्व जैसी क्षमताएँ अधिक विकसित हो सकती हैं।
  • इनकी पहचान बुद्धि, प्रवणता, उपलब्धि एवं सृजनात्मक परीक्षण, सम्बन्धित व्यक्तियों से सूचना तथा साक्षात्कार द्वारा की जा सकती है।
  • उचित अवसर न मिलने पर कुसमायोजन, उपेक्षा, अन्तर्मुखता, अहं भावना, विद्रोह और अनुशासनहीनता जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • इनके लिए विस्तृत पाठ्यचर्या, व्यक्तिगत ध्यान, नवीन शिक्षण विधियाँ और चुनौतीपूर्ण गतिविधियाँ आवश्यक हैं।
  • पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ, उत्तरदायित्व, नेतृत्व प्रशिक्षण, पुरस्कार और छात्रवृत्ति प्रतिभा के उचित विकास में सहायक हैं।
Topic 10 मंद गति से सीखने वाले बालक

मंद गति से सीखने वाले बालक

मंद गति से सीखने वाले बालकों का अर्थ

मंद गति से सीखने वाले बालक वे होते हैं जिनकी बौद्धिक क्षमता औसत से कम होती है और जो विद्यालयी विषयवस्तु को सामान्य बालकों की तुलना में धीमी गति से सीखते हैं। समान आयु के बच्चों की तुलना में उनकी शैक्षिक प्रगति कम दिखाई देती है।

ऐसे बालक सामान्य विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन सीखने के लिए उन्हें अधिक समय, अभ्यास और शिक्षक के व्यक्तिगत सहयोग की आवश्यकता होती है। पुस्तक के अनुसार इनका बौद्धिक गुणांक लगभग 55/60 से 85/90 के आसपास हो सकता है।

प्रमुख परिभाषाएँ

मरसर के अनुसार

मंद गति से सीखने वाले बालक विद्यालय में अपेक्षित स्तर का कार्य नहीं कर पाते, किन्तु उनकी बुद्धि मानसिक मन्दता वाले बालकों की तुलना में अधिक होती है और वे विशेष शिक्षा की श्रेणी में आवश्यक रूप से नहीं आते।

टी. एन. ब्रिकेट के अनुसार

ऐसे बालक जिनकी बौद्धिक क्षमता में कुछ कमी होने के कारण सामान्य विद्यालय की विषयवस्तु सीखने की क्षमता सीमित होती है, मंद गति से सीखने वाले बालक कहलाते हैं।

मंद गति से सीखने वाले बालकों की विशेषताएँ

1. शैक्षणिक विशेषताएँ
  • इनकी ज्ञानात्मक क्षमता सीमित होती है।
  • अधिगम परिस्थितियों के साथ समायोजन करने में कठिनाई होती है।
  • सीखने की गति धीमी होती है और सीखी हुई बातों को जल्दी भूल सकते हैं।
  • जिन तथ्यों के बीच सम्बन्ध स्पष्ट हो, उन्हें अपेक्षाकृत आसानी से सीख लेते हैं।
  • स्मृति शक्ति कम होने के कारण एकाग्रता बनाए रखने में कठिनाई होती है।
  • मूर्त एवं प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत सामग्री को अपेक्षाकृत सरलता से याद कर लेते हैं।
  • कल्पना शक्ति सीमित होती है।
  • अपने विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में कठिनाई होती है और भाषायी ज्ञान भी सीमित हो सकता है।
  • भविष्य के बारे में दूरदर्शी चिन्तन अपेक्षाकृत कम होता है।
2. मनोसामाजिक विशेषताएँ
  • सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक समस्याओं का सामना कर सकते हैं।
  • मंद अधिगम का सम्बन्ध शारीरिक अथवा मानसिक दोनों प्रकार की स्थितियों से हो सकता है।
  • पुस्तक में इनके वस्त्र, लेखन, कला तथा उपकरणों की गुणवत्ता अपेक्षाकृत कमजोर होने का उल्लेख किया गया है।
  • आत्मविश्वास तथा सामाजिक गुणों की कमी हो सकती है।
  • धारण शक्ति अपेक्षाकृत कम होती है।
  • इनमें असुरक्षा की भावना पाई जा सकती है।

मंद गति से सीखने वाले बालकों की पहचान

1. निरीक्षण विधि

शिक्षक बालक की कक्षा-गतिविधियों, कार्य करने की गति, रुचि और अधिगम व्यवहार का नियमित निरीक्षण करके मंद अधिगम के संकेत पहचान सकता है।

2. एकल अध्ययन विधि

बालक के जन्म से वर्तमान समय तक की आवश्यक सूचनाओं, विद्यालयी अभिलेखों और व्यवहार का अध्ययन करके उसकी समस्याओं और विकास की स्थिति को समझा जाता है।

3. शैक्षिक परीक्षण

मंद गति से सीखने वाले बालक सामान्यतः शैक्षिक उपलब्धि में पीछे रहते हैं। उपलब्धि परीक्षणों द्वारा उनके शैक्षिक स्तर और कठिनाइयों की पहचान की जा सकती है।

4. चिकित्सकीय परीक्षण

यदि सामान्य सूचनाओं से कारण स्पष्ट न हो तो चिकित्सकीय परीक्षण द्वारा शारीरिक अथवा स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं की जाँच की जा सकती है।

5. व्यक्तित्व परीक्षण

व्यक्तित्व परीक्षण से बालक के मानसिक, सामाजिक और संवेगात्मक गुणों, व्यवहार तथा समायोजन क्षमता के विषय में जानकारी प्राप्त की जाती है।

6. बुद्धि परीक्षण

विभिन्न बुद्धि परीक्षणों की सहायता से बालक के मानसिक एवं बौद्धिक स्तर का आकलन किया जाता है। किसी एक परीक्षण के बजाय आवश्यकता के अनुसार विभिन्न परीक्षणों का उपयोग किया जा सकता है।

मंद गति से सीखने वाले बालकों की क्रियात्मक सीमाएँ

1. ज्ञानात्मक अधिगम सम्बन्धी समस्याएँ

इन बालकों को पाठ्यवस्तु सीखने में अपेक्षाकृत अधिक कठिनाई होती है। मूर्त और प्रत्यक्ष सामग्री को वे आसानी से समझ सकते हैं, जबकि अमूर्त धारणाओं का अधिगम कठिन होता है।

2. भाषा एवं वाणी सम्बन्धी समस्याएँ

शाब्दिक अभिव्यक्ति, शब्दों के उच्चारण तथा विचार व्यक्त करने में कठिनाई हो सकती है। इससे भाषा-विकास और कक्षा में सम्प्रेषण प्रभावित होता है।

3. श्रवण प्रत्यक्षीकरण की समस्याएँ

विभिन्न ध्वनियों में अन्तर करने और श्रुतिलेखन करने में कठिनाई हो सकती है। शाब्दिक प्रश्नों को ठीक प्रकार से समझने और उत्तर देने में भी समस्या आती है।

4. दृष्टि एवं क्रियात्मक समस्याएँ

विभिन्न रंगों, आकारों और स्वरूपों को पहचानने तथा हस्तलेखन जैसी क्रियाओं में कठिनाई हो सकती है। पुस्तक के अनुसार विषयवस्तु को छोटे-छोटे खण्डों में प्रस्तुत करने पर वे बेहतर सीखते हैं।

5. सामाजिक एवं संवेगात्मक समस्याएँ

ये बालक जल्दी थक सकते हैं और अधिक समय तक एक स्थान पर बैठने में कठिनाई अनुभव कर सकते हैं। इनमें आत्मविश्वास की कमी, दिवास्वप्न में खोए रहना और दूसरों से शीघ्र मित्रता न कर पाना जैसी स्थितियाँ भी दिखाई दे सकती हैं।

मंद गति से सीखने वाले बालकों के लिए अनुदेशन रणनीतियाँ

1. अभिप्रेरणा

शिक्षक को बालक के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए और उसे स्पष्ट लक्ष्यों की ओर प्रेरित करना चाहिए। छोटी-छोटी सफलताओं के माध्यम से सीखने के प्रति उसकी रुचि बनाए रखना उपयोगी होता है।

2. व्यक्तिगत ध्यान

शिक्षक को बालक की व्यक्तिगत भिन्नताओं और अधिगम की गति को समझकर विशेष ध्यान देना चाहिए। कठिन विषयवस्तु को उसकी क्षमता के अनुसार समझाना आवश्यक है।

3. आत्मविश्वास बढ़ाना

लगातार असफलता, दूसरों द्वारा अस्वीकृति और अनुचित व्यवहार इन बालकों में हीनता तथा भावनात्मक असन्तुलन उत्पन्न कर सकता है। शिक्षक को उपलब्ध अवसरों का प्रयोग करके उनमें आत्मविश्वास विकसित करना चाहिए।

4. सहज पाठ्यक्रम

पाठ्यक्रम बालक की तात्कालिक और दीर्घकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप सरल तथा उपयोगी होना चाहिए। अमूर्त और अत्यधिक सैद्धान्तिक विषयवस्तु के स्थान पर स्पष्ट एवं व्यावहारिक सामग्री पर अधिक बल देना चाहिए।

5. स्वस्थ वातावरण

विद्यालय का वातावरण स्वस्थ, सहयोगपूर्ण और अनावश्यक दबाव से मुक्त होना चाहिए। इससे बालक सुरक्षित महसूस करता है और सीखने में बेहतर सहभागिता कर सकता है।

6. आवधिक चिकित्सकीय जाँच

शारीरिक विकृतियाँ और खराब स्वास्थ्य भी अधिगम को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए आवश्यकता के अनुसार समय-समय पर चिकित्सकीय जाँच कराना उपयोगी है।

7. विशेष शिक्षण विधियों का प्रयोग

शिक्षण में ऐसी विधियाँ अपनानी चाहिए जो मंद गति से सीखने वाले बालकों के लिए सरल और प्रत्यक्ष हों। पुस्तक में दृश्य-श्रव्य साधनों तथा कम्प्यूटर आधारित उपकरणों के प्रयोग को उपयोगी बताया गया है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मंद गति से सीखने वाले बालक सामान्य बालकों की अपेक्षा विद्यालयी विषयवस्तु को धीमी गति से सीखते हैं।
  • पुस्तक के अनुसार इनका बौद्धिक गुणांक लगभग 55/60 से 85/90 के आसपास हो सकता है।
  • इनकी प्रमुख विशेषताएँ धीमा अधिगम, शीघ्र भूलना, कमजोर स्मृति, सीमित कल्पना तथा कम आत्मविश्वास हैं।
  • इनकी पहचान निरीक्षण, एकल अध्ययन, शैक्षिक, चिकित्सकीय, व्यक्तित्व तथा बुद्धि परीक्षणों द्वारा की जा सकती है।
  • इनमें ज्ञानात्मक, भाषा-वाणी, श्रवण प्रत्यक्षीकरण, दृष्टि-क्रियात्मक तथा सामाजिक-संवेगात्मक कठिनाइयाँ हो सकती हैं।
  • मूर्त और प्रत्यक्ष सामग्री को ये अमूर्त विषयवस्तु की तुलना में अधिक आसानी से सीखते हैं।
  • अभिप्रेरणा, व्यक्तिगत ध्यान, आत्मविश्वास, सहज पाठ्यक्रम और स्वस्थ वातावरण इनके शिक्षण में महत्त्वपूर्ण हैं।
  • दृश्य-श्रव्य एवं कम्प्यूटर आधारित साधनों का प्रयोग इनकी सीखने की प्रक्रिया को सरल बना सकता है।

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Topic 11 अधिगम अक्षमता—अर्थ, विशेषताएँ, कारण, पहचान, सीमाएँ एवं अनुदेशन रणनीतियाँ

अधिगम अक्षमता—अर्थ, विशेषताएँ, कारण, पहचान, सीमाएँ एवं अनुदेशन रणनीतियाँ

अधिगम अक्षमता का अर्थ

अधिगम अक्षम बालक वे होते हैं जिन्हें सामान्य बौद्धिक क्षमता होने के बावजूद सीखने के किसी विशेष क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक कठिनाई होती है। यह कठिनाई पढ़ने, लिखने, भाषा समझने, वर्तनी, गणना या अन्य शैक्षिक कार्यों में दिखाई दे सकती है।

ऐसे बालकों की योग्यता और वास्तविक शैक्षिक उपलब्धि के बीच स्पष्ट अन्तर पाया जा सकता है। इसलिए कम शैक्षिक प्रदर्शन को केवल कम बुद्धि का परिणाम नहीं माना जाता।

प्रमुख परिभाषाएँ

एस. ए. किर्क (1971) के अनुसार

अधिगम अक्षमता उन बालकों की सीखने सम्बन्धी कठिनाइयों को व्यक्त करती है जिनकी योग्यता और शैक्षिक उपलब्धि में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। इस कठिनाई को केवल मानसिक मन्दता, इन्द्रिय-दोष, संवेगात्मक समस्या या सीखने के अवसरों की कमी से नहीं समझाया जा सकता।

कावेल एवं फॉरनेस के अनुसार

अधिगम अक्षम बालक प्रायः सामान्य बुद्धि के होते हैं, फिर भी वे अन्य सामान्य बालकों की तरह समान कुशलता से अधिगम नहीं कर पाते और उनकी शैक्षिक उपलब्धि अपेक्षाकृत कम रहती है।

अधिगम अक्षम बालकों की विशेषताएँ

1. मनोसामाजिक विशेषताएँ
  • माता-पिता, शिक्षक तथा अन्य व्यक्तियों से विचार-विमर्श में कठिनाई हो सकती है।
  • अपनी समस्याओं के प्रति आत्मचेतना अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
  • दूसरों के साथ मिलकर कार्य करने में कठिनाई होती है।
  • व्यवहार में अस्थिरता दिखाई दे सकती है।
  • कुछ बालक अत्यधिक शांत या आज्ञाकारी दिखाई देते हैं।
  • कभी-कभी अपने अलग समूह बना लेते हैं।
2. शैक्षिक विशेषताएँ
  • हस्तलेखन करने में कठिनाई हो सकती है।
  • सुनी हुई बात या शब्दों को ग्रहण करने और समझने में समस्या होती है।
  • बोलकर पढ़ने तथा अर्थ समझकर पढ़ने में कठिनाई हो सकती है।
  • वर्तनी, अक्षर-क्रम तथा शब्दों को स्मरण रखने में समस्या आती है।
  • भाषा-कौशल अपेक्षाकृत कमजोर हो सकता है।
3. अन्य विशेषताएँ
  • सीखने की गति अपेक्षाकृत धीमी हो सकती है।
  • स्मृति, चिन्तन, तर्क, कल्पना, विश्लेषण और समस्या-समाधान में कठिनाई दिखाई दे सकती है।
  • संवेगात्मक अस्थिरता हो सकती है।
  • सामाजिक समायोजन में कठिनाई आती है।
  • व्यग्रता और अनावश्यक उत्तेजना दिखाई दे सकती है।
  • शैक्षिक उपलब्धि सामान्य क्षमता की तुलना में कम रहती है।
  • डिस्लेक्सिया (Dyslexia) तथा डिस्ग्राफिया (Dysgraphia) जैसी कठिनाइयाँ देखी जा सकती हैं।
  • ध्यान केन्द्रित करने तथा निर्देशों का पालन करने में समस्या हो सकती है।

अधिगम अक्षमता के कारण

1. वंशानुक्रमीय कारण

पुस्तक के अनुसार कुछ अधिगम सम्बन्धी कठिनाइयों में वंशानुक्रम की भूमिका हो सकती है। अत्यधिक सक्रियता और आवेगशीलता जैसी कुछ प्रवृत्तियाँ भी आनुवंशिक प्रभाव से सम्बन्धित मानी गई हैं।

2. पर्यावरणीय कारण

गर्भावस्था और बाल्यकाल का प्रतिकूल वातावरण बालक के शारीरिक तथा मानसिक विकास को प्रभावित कर सकता है। दुर्घटना, चोट या दीर्घकालीन बीमारी के कारण मस्तिष्क अथवा तंत्रिका-तंत्र प्रभावित होने पर भी अधिगम सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

पुस्तक में दोषपूर्ण शैक्षिक परिस्थितियाँ, योग्य शिक्षकों की कमी, प्रेरणा का अभाव, प्रतिकूल पारिवारिक-सामाजिक वातावरण तथा मादक पदार्थों के प्रभाव जैसी परिस्थितियों का भी उल्लेख किया गया है।

अधिगम अक्षम बालकों की पहचान

इन बालकों की पहचान के लिए परीक्षण रहित तथा परीक्षण युक्त दोनों प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता है।

1. परीक्षण रहित प्रविधियाँ

इसमें बालक का निरीक्षण, रेटिंग स्केल, चेकलिस्ट, साक्षात्कार तथा शिक्षक, माता-पिता और मित्रों से प्राप्त सूचनाओं का उपयोग किया जाता है। इनसे बालक की वास्तविक अधिगम कठिनाइयों और व्यवहार का प्रारम्भिक चित्र प्राप्त होता है।

2. परीक्षण युक्त प्रविधियाँ

अधिगम सम्बन्धी कठिनाई की प्रकृति और स्तर ज्ञात करने के लिए विभिन्न औपचारिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है—

  • भाषा परीक्षण (Language Test)
  • उपलब्धि परीक्षण (Achievement Test)
  • योग्यता परीक्षण (Ability Test)
  • मानक निदानात्मक परीक्षण (Standardised Diagnostic Test)

अधिगम अक्षम बालकों की क्रियात्मक सीमाएँ

1. अवधान सम्बन्धी सीमाएँ

बालक अधिक समय तक किसी एक कार्य पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाता। ध्यान बार-बार भटकने के कारण अधिगम की निरन्तरता प्रभावित होती है।

2. दृष्टि प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धी सीमाएँ

आकृति, आकार और वस्तुओं के बीच अन्तर पहचानने में कठिनाई हो सकती है। किसी शब्द या आकृति का एक भाग हटाने पर उसे पूर्ण रूप से पहचानने में भी समस्या आती है।

3. श्रवण प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धी सीमाएँ

विभिन्न ध्वनियों में भेद करने तथा बोले गए शब्दों का सही अर्थ समझने में कठिनाई हो सकती है। शब्द का कुछ भाग छूट जाने पर पूरा शब्द पहचानना कठिन हो जाता है।

4. भाषा सम्बन्धी सीमाएँ

भाषा-विकास अपेक्षाकृत धीमा हो सकता है। स्पष्ट बोलने तथा दो या अधिक वाक्यों को उचित क्रम में जोड़कर अभिव्यक्त करने में कठिनाई हो सकती है।

5. सामाजिक, संवेगात्मक एवं व्यवहारगत सीमाएँ

अपने व्यवहार के परिणामों को समझने में कठिनाई और विचारों में शीघ्र परिवर्तन सामाजिक एवं संवेगात्मक समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है।

6. शैक्षिक असमर्थता

पढ़ने, लिखने, गणना करने, वर्तनी, समय-बोध तथा मानचित्र में स्थान पहचानने जैसे कार्यों में कठिनाई हो सकती है।

अधिगम अक्षम बालकों के लिए अनुदेशन रणनीतियाँ

1. सामान्य विद्यालय में शिक्षा

जहाँ तक सम्भव हो इन बालकों को सामान्य विद्यालय में ही शिक्षा दी जानी चाहिए। आवश्यकता होने पर उनके लिए विशेष कक्षा अथवा अतिरिक्त शैक्षिक सहायता की व्यवस्था की जा सकती है।

2. सीमित कक्षा आकार

पुस्तक के अनुसार कक्षा में लगभग 25–30 विद्यार्थियों की संख्या होने पर शिक्षक अधिगम अक्षम बालकों को अधिक व्यक्तिगत सहायता दे सकता है।

3. प्रशिक्षित शिक्षक

इन बालकों के लिए योग्य, कुशल और विशेष प्रशिक्षण प्राप्त शिक्षक की व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षक को उनकी विशिष्ट अधिगम कठिनाइयों को समझना आवश्यक है।

4. भयमुक्त एवं मित्रवत वातावरण

विद्यालय का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहाँ बालक अपनी कठिनाइयों के कारण भय या हीनता महसूस न करे। प्रोत्साहन और सहयोग से सीखने की इच्छा बढ़ती है।

5. दृश्य-श्रव्य सामग्री

केवल मौखिक शिक्षण के स्थान पर चित्र, मॉडल, चार्ट तथा अन्य दृश्य-श्रव्य साधनों का प्रयोग करना चाहिए। इससे विषयवस्तु समझना सरल होता है।

6. शैक्षिक खेल

शैक्षिक खेलों के माध्यम से कठिन अवधारणाओं को सरल और रुचिकर बनाया जा सकता है। इससे अभ्यास और सहभागिता दोनों बढ़ते हैं।

7. छोटे-छोटे चरणों में शिक्षण

पाठ्य-सामग्री को छोटे भागों में बाँटकर धीरे-धीरे पढ़ाना चाहिए। एक चरण समझने के बाद ही अगले चरण की ओर बढ़ना अधिक उपयोगी होता है।

8. प्रेम एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार

बालक के साथ प्रेम, धैर्य, सहयोग और सहानुभूति से व्यवहार करना चाहिए। बार-बार आलोचना या तुलना करने से उसकी सीखने की समस्या बढ़ सकती है।

9. अतिरिक्त कार्य का दबाव न देना

पाठ्यचर्या सामान्य बालकों के समान रखी जा सकती है, लेकिन बालक पर अनावश्यक अतिरिक्त कार्य और दबाव नहीं डालना चाहिए।

10. उपचारात्मक शिक्षण

अधिगम सम्बन्धी विशिष्ट कमियों की पहचान करके उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching) दिया जाना चाहिए। इससे पढ़ने, लिखने, गणना और भाषा सम्बन्धी कठिनाइयों में सुधार किया जा सकता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सामान्य बुद्धि के बावजूद किसी विशेष शैक्षिक क्षेत्र में लगातार कठिनाई अनुभव करने वाले बालक अधिगम अक्षम कहलाते हैं।
  • इनकी योग्यता और वास्तविक शैक्षिक उपलब्धि के बीच स्पष्ट अन्तर पाया जा सकता है।
  • डिस्लेक्सिया और डिस्ग्राफिया अधिगम अक्षमता से सम्बन्धित प्रमुख कठिनाइयों के उदाहरण हैं।
  • वंशानुक्रमीय तथा पर्यावरणीय दोनों प्रकार के कारक अधिगम अक्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
  • इनकी पहचान निरीक्षण, साक्षात्कार, रेटिंग स्केल तथा भाषा, उपलब्धि, योग्यता एवं निदानात्मक परीक्षणों से की जा सकती है।
  • अवधान, दृष्टि एवं श्रवण प्रत्यक्षीकरण, भाषा, व्यवहार और शैक्षिक कार्यों में क्रियात्मक सीमाएँ दिखाई दे सकती हैं।
  • दृश्य-श्रव्य साधन, शैक्षिक खेल, छोटे चरणों में शिक्षण और प्रशिक्षित शिक्षक इनके अधिगम में सहायक हैं।
  • विशिष्ट कठिनाइयों को दूर करने के लिए उपचारात्मक शिक्षण विशेष रूप से उपयोगी है।
Topic 12 शैक्षिक रूप से पिछड़े बालक—अर्थ, विशेषताएँ, पहचान, कारण, शिक्षा एवं रोकथाम

शैक्षिक रूप से पिछड़े बालक—अर्थ, विशेषताएँ, पहचान, कारण, शिक्षा एवं रोकथाम

शैक्षिक रूप से पिछड़े बालक का अर्थ

ऐसे बालक जो अपनी आयु के औसत विद्यार्थियों के समान शैक्षिक प्रगति नहीं कर पाते, शैक्षिक रूप से पिछड़े बालक कहलाते हैं। उनका कक्षा-कार्य और शैक्षिक उपलब्धि अपेक्षित स्तर से कम रहती है।

पिछड़ापन केवल कम बुद्धि के कारण ही नहीं होता। स्वास्थ्य, परिवार, आर्थिक स्थिति, विद्यालयी वातावरण और शिक्षण सम्बन्धी कमियाँ भी बालक की शैक्षिक प्रगति को प्रभावित कर सकती हैं।

प्रमुख परिभाषाएँ

शोनेल एवं शोनेल के अनुसार

पिछड़ा बालक समान आयु के अन्य बालकों की तुलना में स्पष्ट रूप से निम्न शैक्षिक उपलब्धि प्रदर्शित करता है।

सिरिल बर्ट के अनुसार

ऐसा बालक जो विद्यालयी जीवन के मध्य में अपनी आयु के लिए सामान्य स्तर से एक कक्षा नीचे का कार्य भी नहीं कर पाता, पिछड़ा बालक माना जाता है।

टी. के. ए. मेनन के अनुसार

भारतीय परिस्थितियों में ऐसा बालक जिसकी आयु अपनी कक्षा की औसत आयु से एक वर्ष से अधिक हो, शैक्षिक पिछड़ेपन की श्रेणी में आ सकता है।

बर्टन हॉल के अनुसार

जब बालक की शैक्षिक उपलब्धि उसकी स्वाभाविक योग्यताओं के स्तर से नीचे रहती है, तब उसे शैक्षिक पिछड़ापन कहा जाता है।

पिछड़े बालकों की विशेषताएँ

  • सीखने की गति अपेक्षाकृत धीमी होती है।
  • नई बातों के प्रति जिज्ञासा कम हो सकती है।
  • बार-बार असफल होने से निराशा और हीनता की भावना उत्पन्न हो सकती है।
  • व्यवहार में समस्यात्मक अथवा असमायोजित प्रवृत्तियाँ दिखाई दे सकती हैं।
  • बौद्धिक एवं शैक्षिक उपलब्धि सामान्य स्तर से कम हो सकती है।
  • सामान्य कक्षा-कार्य पूरा करने में कठिनाई होती है।
  • कुछ बालक समाज-विरोधी गतिविधियों की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
  • मानसिक अस्वस्थता और समायोजन सम्बन्धी कठिनाइयाँ देखी जा सकती हैं।
  • समान आयु के बालकों के समान शैक्षिक प्रगति नहीं कर पाते।
  • पुस्तक के अनुसार कई पिछड़े बालकों की बुद्धिलब्धि 85 से कम पाई जाती है।
  • उत्तरदायित्व ग्रहण करने की भावना कम हो सकती है।
  • अमूर्त चिन्तन और ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाती।
  • सामान्य शिक्षण-विधियों से सीखने में कठिनाई होती है।
  • कई कार्यों में दूसरों पर निर्भरता दिखाई देती है।
  • चिन्ता और तनाव का प्रभाव उनकी शैक्षिक उपलब्धि पर पड़ सकता है।
  • मौलिकता की कमी के कारण नवीन समस्याओं पर स्वतन्त्र विचार करने में कठिनाई हो सकती है।

शैक्षिक रूप से पिछड़े बालकों की पहचान

1. परिस्थितियों एवं व्यवहार का अध्ययन

बालक के परिवार की शैक्षिक एवं आर्थिक स्थिति, विद्यालयी उपस्थिति, प्रवेश आयु, विद्यालय का वातावरण, शिक्षक की योग्यता और शिक्षण-साधनों आदि का अध्ययन करके पिछड़ेपन के सम्भावित कारणों को समझा जा सकता है।

2. व्यक्तिगत बुद्धि परीक्षण

बुद्धि परीक्षण से बालक के मानसिक स्तर का अनुमान लगाया जाता है। पुस्तक में बुद्धिलब्धि ज्ञात करने के लिए निम्न सूत्र दिया गया है—

बुद्धिलब्धि (IQ) = मानसिक आयु ÷ वास्तविक आयु × 100

3. उपलब्धि परीक्षण

उपलब्धि परीक्षणों द्वारा बालक के वास्तविक शैक्षिक प्रदर्शन का पता लगाया जाता है। इससे यह जाना जा सकता है कि वह अपेक्षित कक्षा-स्तर से कितना पीछे है।

4. सामूहिक परीक्षण

कक्षा के विद्यार्थियों पर शाब्दिक तथा अशाब्दिक सामूहिक बुद्धि परीक्षणों का प्रयोग करके शैक्षिक रूप से पिछड़े बालकों की पहचान की जा सकती है।

5. अन्य मनोवैज्ञानिक विधियाँ

पिछड़ापन कभी-कभी कुसमायोजन, रुचि की कमी, प्रेरणा के अभाव या मानसिक तनाव से भी जुड़ा होता है। इसलिए माता-पिता से बातचीत, साक्षात्कार तथा अन्य मनोवैज्ञानिक परीक्षण भी उपयोगी होते हैं।

पिछड़ेपन के कारण

1. शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य

लगातार अस्वस्थ रहना, शारीरिक कमजोरी, कम सुनना, हकलाना या अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ बालक की नियमित शिक्षा और सीखने की गति को प्रभावित कर सकती हैं।

2. पारिवारिक कारण

अत्यधिक लाड़-प्यार, कठोर अनुशासन, माता-पिता के बीच तनाव तथा घर में पढ़ाई के लिए अनुपयुक्त वातावरण शैक्षिक पिछड़ेपन को बढ़ा सकता है।

3. परिवार का बड़ा आकार

अधिक सदस्यों वाले परिवार में बालक को पर्याप्त ध्यान और शान्त वातावरण नहीं मिल पाता। घरेलू तनाव और संसाधनों की कमी भी अध्ययन को प्रभावित कर सकती है।

4. माता-पिता की अशिक्षा

अशिक्षित अभिभावक कई बार शिक्षा का महत्त्व नहीं समझ पाते और बालक को आवश्यक शैक्षिक मार्गदर्शन नहीं दे पाते। इससे उसकी प्रगति धीमी हो सकती है।

5. निम्न बौद्धिक स्तर

कम बौद्धिक क्षमता भी पिछड़ेपन का एक कारण हो सकती है। पुस्तक में शैक्षिक रूप से मंदित बालकों की बुद्धिलब्धि 85 से कम होने का उल्लेख किया गया है।

6. निर्धनता

आर्थिक अभाव के कारण पौष्टिक भोजन, शिक्षण-सामग्री और अन्य आवश्यक सुविधाएँ नहीं मिल पातीं। कई बालकों को कम आयु में कार्य करना पड़ता है, जिससे उनकी शिक्षा प्रभावित होती है।

7. विद्यालय का वातावरण

अनियमित उपस्थिति, योग्य शिक्षकों की कमी, पुस्तकालय और प्रयोगशाला का अभाव, अनुपयुक्त शिक्षण-विधियाँ तथा खेल एवं सहगामी गतिविधियों की कमी भी पिछड़ेपन के लिए उत्तरदायी हो सकती है।

पिछड़े बालकों की शिक्षा

1. अनुकूल वातावरण

बालक के परिवार और विद्यालय दोनों में सहयोगपूर्ण वातावरण बनाया जाना चाहिए। माता-पिता और शिक्षक के बीच नियमित सम्पर्क उसके सुधार में सहायक होता है।

2. विशेष विद्यालय की व्यवस्था

गंभीर आवश्यकता होने पर समान कठिनाइयों वाले बालकों के लिए विशेष शैक्षिक व्यवस्था की जा सकती है। इसका उद्देश्य उनकी कमियों को दूर करके सीखने की क्षमता विकसित करना होना चाहिए।

3. विद्यालय में विशेष कक्षाएँ

अलग विद्यालय सम्भव न होने पर सामान्य विद्यालय में विशेष कक्षाओं की व्यवस्था की जा सकती है। इनमें बालक की गति और रुचि के अनुसार अतिरिक्त सहायता दी जा सकती है।

4. विशेष पाठ्यचर्या

पाठ्यचर्या सरल, उपयोगी तथा बालक की क्षमता और रुचि के अनुरूप होनी चाहिए। अनावश्यक रूप से कठिन एवं अमूर्त सामग्री का बोझ कम रखा जाना चाहिए।

5. विशेष शिक्षण प्रविधियाँ
  • सरल और रुचिकर शिक्षण-विधियों का प्रयोग करना चाहिए।
  • सहायक शिक्षण-सामग्री का पर्याप्त उपयोग करना चाहिए।
  • एक समय में सीमित विषयवस्तु पढ़ानी चाहिए और शिक्षण की गति धीमी रखनी चाहिए।
  • सीखी हुई बातों का बार-बार अभ्यास कराना चाहिए।
  • नैतिक शिक्षा और अच्छे व्यवहार के विकास पर भी ध्यान देना चाहिए।
6. शारीरिक दोषों का उपचार

सुनने, देखने अथवा अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या होने पर उसका समय पर उपचार कराया जाना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार बालक को कक्षा में उपयुक्त स्थान भी दिया जाना चाहिए।

7. आर्थिक सहायता

निर्धन परिवारों के बालकों को निःशुल्क शिक्षा तथा आवश्यक आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए, जिससे आर्थिक अभाव उनकी पढ़ाई में बाधा न बने।

8. योग्य अध्यापकों की नियुक्ति

इन बालकों के लिए प्रशिक्षित, धैर्यवान और सहानुभूतिपूर्ण शिक्षक की आवश्यकता होती है। शिक्षक को बालक की व्यक्तिगत कठिनाइयों को समझकर उचित मार्गदर्शन देना चाहिए।

बालकों में पिछड़ेपन की रोकथाम के उपाय

  • शारीरिक एवं मानसिक दोषों की समय पर पहचान और उपचार किया जाना चाहिए।
  • निर्धन परिवारों के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध करानी चाहिए।
  • पाठ्यक्रम और शिक्षण-विधियों को व्यक्तिगत भिन्नताओं के अनुरूप बनाना चाहिए।
  • सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार की व्यवस्था द्वारा शारीरिक कमजोरी दूर करनी चाहिए।
  • पारिवारिक और सामाजिक वातावरण में आवश्यक सुधार किया जाना चाहिए।
  • पिछड़े बालकों के लिए अतिरिक्त कक्षाओं की व्यवस्था करनी चाहिए।
  • उचित शैक्षिक निर्देशन और परामर्श उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  • निरक्षर माता-पिता को शिक्षित करने तथा उनमें अच्छी शैक्षिक आदतें विकसित करने का प्रयास करना चाहिए।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अपनी आयु के सामान्य बालकों के समान शैक्षिक प्रगति न कर पाने वाले बालक शैक्षिक रूप से पिछड़े कहलाते हैं।
  • पिछड़ापन केवल कम बुद्धि से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, परिवार, निर्धनता और विद्यालयी परिस्थितियों से भी उत्पन्न हो सकता है।
  • धीमी सीखने की गति, कम उपलब्धि, निराशा, कमजोर ध्यान और समायोजन की कठिनाई इसके प्रमुख संकेत हैं।
  • पहचान के लिए परिस्थितियों का अध्ययन, बुद्धि परीक्षण, उपलब्धि परीक्षण, सामूहिक परीक्षण और मनोवैज्ञानिक विधियों का उपयोग किया जाता है।
  • शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक समस्याएँ, बड़ा परिवार, माता-पिता की अशिक्षा, निम्न बुद्धि, निर्धनता और अनुपयुक्त विद्यालयी वातावरण प्रमुख कारण हैं।
  • सरल पाठ्यचर्या, विशेष कक्षा, धीमी शिक्षण गति, पुनरावृत्ति और सहायक सामग्री इनके शिक्षण में उपयोगी हैं।
  • आर्थिक सहायता, स्वास्थ्य उपचार और योग्य शिक्षक पिछड़े बालकों की शैक्षिक प्रगति में महत्त्वपूर्ण हैं।
  • समय पर पहचान, व्यक्तिगत निर्देशन, पौष्टिक आहार और परिवार-विद्यालय सहयोग से पिछड़ेपन को कम किया जा सकता है।
Topic 13 मानसिक मन्दता—अर्थ, विशेषताएँ, प्रकार, पहचान, कारण, सीमाएँ एवं अनुदेशन रणनीतियाँ

मानसिक मन्दता—अर्थ, विशेषताएँ, प्रकार, पहचान, कारण, सीमाएँ एवं अनुदेशन रणनीतियाँ

मानसिक मन्दता का अर्थ

पुस्तक में मानसिक मन्दता से आशय ऐसे बालकों से है जिनका बौद्धिक स्तर सामान्य बालकों की अपेक्षा कम होता है और जिन्हें सीखने, व्यवहार करने तथा सामाजिक परिस्थितियों से समायोजन स्थापित करने में अधिक सहायता की आवश्यकता होती है।

मानसिक मन्दता केवल शैक्षिक उपलब्धि की कमी नहीं है। इसका सम्बन्ध बौद्धिक कार्यक्षमता तथा दैनिक जीवन और सामाजिक व्यवहार में अनुकूलन की कठिनाइयों से भी होता है।

प्रमुख परिभाषाएँ

हैबर के अनुसार

मानसिक मन्दता ऐसी असामान्य बौद्धिक क्रियाशीलता है जो विकासावस्था में दिखाई देती है और जिसके साथ व्यवहार के अनुकूलन में भी कमी पाई जाती है।

प्रोफेसर पेज के अनुसार

मानसिक अल्पता सामान्य से निम्न मानसिक विकास की ऐसी अवस्था है जो जन्म से उपस्थित हो सकती है अथवा प्रारम्भिक बाल्यावस्था में विकसित होती है। इसमें सीमित बुद्धि और सामाजिक उपयोगिता की कमी प्रमुख रूप से दिखाई देती है।

पुस्तक में अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ मेंटल डिफिशिएन्सी द्वारा प्रकाशित परिभाषाओं का भी उल्लेख किया गया है।

मानसिक मन्दित बालकों की विशेषताएँ

1. शैक्षणिक विशेषताएँ
  • पुस्तक के अनुसार इनकी बुद्धिलब्धि सामान्यतः लगभग 50 से 75 के बीच हो सकती है।
  • इनके लिए विशेष अधिगम सहायता और विद्यालयी समायोजन आवश्यक हो सकता है।
  • इनकी शिक्षा का स्तर सामान्य बालकों से भिन्न रखा जा सकता है।
  • सीखने की गति अपेक्षाकृत धीमी होती है।
  • सरल, प्रत्यक्ष और बार-बार अभ्यास वाली सामग्री अधिक उपयोगी होती है।
  • इनमें आत्मनिर्भरता विकसित करने के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
2. मनोसामाजिक विशेषताएँ
  • प्रशिक्षण द्वारा सामाजिक और व्यावसायिक जीवन के लिए आवश्यक आधारभूत कौशल सीखे जा सकते हैं।
  • आत्मविश्वास की कमी हो सकती है।
  • संवेगात्मक और सामाजिक समायोजन में कठिनाई पाई जा सकती है।
  • सामाजिक परिस्थितियों को समझने और उनसे तालमेल बैठाने में अधिक सहायता की आवश्यकता होती है।
  • सामाजिक सम्बन्धों को समझने की क्षमता सीमित हो सकती है।
  • प्यार, सुरक्षा और संवेदनात्मक सहयोग इनके विकास में महत्त्वपूर्ण होता है।
  • शारीरिक रूप से सक्षम होने के बावजूद मानसिक कार्यक्षमता अपेक्षाकृत कमजोर हो सकती है।

मानसिक मन्दता के प्रकार

पुस्तक में अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ मेंटल डिफिशिएन्सी, 1973 के आधार पर मानसिक मन्दता के चार स्तर बताए गए हैं—

1. हल्की मानसिक मन्दता

पुस्तक के अनुसार इस वर्ग में लगभग 52–68 बुद्धिलब्धि वाले बालक रखे गए हैं। उचित सहायता और प्रशिक्षण मिलने पर वे सामान्य दैनिक कार्य तथा कुछ शैक्षिक गतिविधियाँ सीख सकते हैं।

2. मध्यम मानसिक मन्दता

पुस्तक में इसकी बुद्धिलब्धि लगभग 36–51 बताई गई है। सीखने की गति सीमित होती है, लेकिन माता-पिता और शिक्षक के उचित निर्देशन से कुछ जीवनोपयोगी कार्यों का प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

3. तीव्र मानसिक मन्दता

पुस्तक के अनुसार इनकी बुद्धिलब्धि लगभग 20–35 होती है। संवेदनात्मक और गत्यात्मक क्रियाएँ अधिक प्रभावित हो सकती हैं तथा आत्मनिर्भरता सीमित रहती है।

4. गम्भीर मानसिक मन्दता

पुस्तक में 20 से कम बुद्धिलब्धि वाले बालकों को इस श्रेणी में रखा गया है। ऐसे बालकों को दैनिक जीवन के अधिकांश कार्यों में निरन्तर सहायता की आवश्यकता हो सकती है।

शैक्षिक एवं प्रशिक्षण क्षमता के आधार पर वर्गीकरण

पुस्तक में शिक्षा और प्रशिक्षण की सम्भावना के आधार पर एक अन्य वर्गीकरण भी दिया गया है—

1. शिक्षा पाने योग्य (Educable)

पुस्तक के अनुसार इनकी बुद्धिलब्धि लगभग 50–70 के बीच होती है। इन्हें पढ़ना-लिखना, सरल गणित तथा कुछ उत्पादक कार्य सिखाए जा सकते हैं।

2. प्रशिक्षण योग्य (Trainable)

इनकी बुद्धिलब्धि लगभग 25–50 बताई गई है। औपचारिक शिक्षा सीमित हो सकती है, लेकिन प्रशिक्षण द्वारा दैनिक जीवन के आवश्यक कार्यों में आत्मनिर्भरता बढ़ाई जा सकती है।

3. पूर्ण रूप से दूसरों पर निर्भर

पुस्तक में 25 से कम बुद्धिलब्धि वाले बालकों को इस वर्ग में रखा गया है। इन्हें दैनिक जीवन के कार्यों में भी निरन्तर सहयोग और देखभाल की आवश्यकता होती है।

मानसिक मन्दित बालकों की पहचान

  • सामान्य कार्य सीखने में अधिक समय लेना।
  • सीखने की क्षमता सीमित और गति धीमी होना।
  • पुस्तक के अनुसार बुद्धिलब्धि 70 से कम हो सकती है।
  • संवेगात्मक अस्थिरता दिखाई दे सकती है।
  • आत्मविश्वास अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
  • नई परिस्थितियों और समस्याओं के साथ समायोजन करने में कठिनाई होती है।
  • पारिवारिक, विद्यालयी तथा सामाजिक समायोजन संतोषजनक नहीं हो सकता।
  • सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति के विषय में अधिक चिन्ता दिखाई दे सकती है।
  • कक्षा में अपेक्षाकृत शान्त अथवा निष्क्रिय रह सकते हैं।
  • कुछ बालकों में शारीरिक या वाणी सम्बन्धी दोष भी पाए जा सकते हैं।
  • एकाग्रता और सृजनात्मकता सीमित हो सकती है।
  • मनोवैज्ञानिक परिपक्वता अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
पहचान की प्रमुख विधियाँ
  • निरीक्षण।
  • साक्षात्कार।
  • बुद्धि परीक्षण।
  • मानक उपलब्धि परीक्षण।

मानसिक मन्दता के कारण

1. वंशानुक्रमीय कारण

पुस्तक के अनुसार कुछ स्थितियों में दोषपूर्ण आनुवंशिक कारक बालक के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे प्रभाव बौद्धिक विकास में कमी का कारण बन सकते हैं।

2. पर्यावरणीय कारण

गर्भावस्था से लेकर बाल्यकाल तक का प्रतिकूल वातावरण मानसिक विकास को प्रभावित कर सकता है। गर्भावस्था में आवश्यक पोषण की कमी, जन्म के समय मस्तिष्क को चोट तथा कुछ रोग मानसिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।

पुस्तक में नशीले पदार्थों के सेवन, गर्भावस्था में शराब अथवा अन्य हानिकारक पदार्थों के प्रभाव तथा शरीर में कुछ विषैले पदार्थों की अधिक मात्रा पहुँचने को भी सम्भावित कारणों में बताया गया है।

मानसिक मन्दित बालकों की क्रियात्मक सीमाएँ

  • सीखी हुई बातों का नई परिस्थितियों में प्रयोग करने में कठिनाई होती है।
  • सामाजिक समायोजन में समस्या हो सकती है, जिससे वे समूह से अलग रह सकते हैं।
  • अधिगम सम्बन्धी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • माता-पिता या परिवार की उपेक्षा से मानसिक और संवेगात्मक समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
  • विद्यालय में बार-बार असफलता मिलने पर निराशा उत्पन्न हो सकती है।

मानसिक मन्दित बालकों के लिए अनुदेशन रणनीतियाँ

1. शैक्षिक उद्देश्यों का निर्धारण

इन बालकों की शिक्षा के उद्देश्य सामान्य शिक्षा से कुछ भिन्न होने चाहिए। सामाजिक कौशल, व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति, समायोजन, पढ़ना-लिखना और सरल गणित जैसे जीवनोपयोगी कौशलों पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

2. उपयुक्त पाठ्यचर्या

इनके लिए पाठ्यचर्या सामान्य बालकों की अपेक्षा सरल और व्यावहारिक होनी चाहिए। इसमें पढ़ना, लिखना, सामान्य गणित, सामाजिक ज्ञान, कला, हस्तकला तथा पाठ्य-सहगामी गतिविधियों को स्थान दिया जा सकता है।

व्यावसायिक शिक्षा भी उपयोगी होती है, क्योंकि इससे बालक भविष्य में अधिक आत्मनिर्भर बन सकता है।

3. उपयुक्त शिक्षण-विधि

प्रत्यक्ष शिक्षण, दृश्य-श्रव्य साधनों और बार-बार अभ्यास का उपयोग करना चाहिए। सीखी हुई बातों की नियमित पुनरावृत्ति इनके अधिगम को मजबूत करती है।

4. छोटी कक्षा

पुस्तक के अनुसार ऐसे बालकों की कक्षा में लगभग 15–20 विद्यार्थी होने चाहिए ताकि शिक्षक प्रत्येक बालक पर पर्याप्त व्यक्तिगत ध्यान दे सके।

5. अनुभवी एवं प्रशिक्षित शिक्षक

शिक्षक को योग्य, प्रशिक्षित और अनुभवी होना चाहिए। बालकों के साथ प्रेम, सहानुभूति और सहयोगपूर्ण व्यवहार करते हुए उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को समझना आवश्यक है।

6. अभिभावकों का सहयोग

बालक के विकास के लिए परिवार और विद्यालय के बीच नियमित सहयोग आवश्यक है। घर पर भी सीखे गए कौशलों का अभ्यास कराया जाना चाहिए।

7. भयमुक्त वातावरण

शिक्षा को परीक्षा और असफलता के अनावश्यक भय से मुक्त रखना चाहिए। सहयोगपूर्ण वातावरण बालक में सीखने की इच्छा और आत्मविश्वास विकसित करता है।

8. विशेष कक्षाओं की व्यवस्था

पुस्तक के अनुसार सामान्य कक्षा में कठिनाई होने पर प्रशिक्षित शिक्षक की सहायता से विशेष कक्षाओं में शिक्षा दी जा सकती है। इसका उद्देश्य बालक को उसकी क्षमता के अनुसार उचित अधिगम अवसर प्रदान करना है।

9. स्वयं देखभाल का प्रशिक्षण

बालकों को कपड़े पहनना, भोजन करना, स्वच्छता बनाए रखना तथा अन्य दैनिक कार्य करने का नियमित प्रशिक्षण देना चाहिए। इससे धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता विकसित होती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पुस्तक में मानसिक मन्दता को निम्न बौद्धिक कार्यक्षमता और व्यवहारिक समायोजन की कठिनाइयों से सम्बन्धित अवस्था माना गया है।
  • मानसिक मन्दता के चार प्रमुख स्तर हल्की, मध्यम, तीव्र और गम्भीर बताए गए हैं।
  • शिक्षण क्षमता के आधार पर बालकों को शिक्षा पाने योग्य, प्रशिक्षण योग्य तथा पूर्णतः दूसरों पर निर्भर वर्गों में बाँटा गया है।
  • धीमी सीखने की गति, सीमित बुद्धि, कम आत्मविश्वास तथा सामाजिक समायोजन की कठिनाई इसके प्रमुख संकेत हैं।
  • पहचान के लिए निरीक्षण, साक्षात्कार, बुद्धि परीक्षण और उपलब्धि परीक्षण उपयोगी हैं।
  • पुस्तक में वंशानुक्रमीय तथा पर्यावरणीय दोनों प्रकार के कारण बताए गए हैं।
  • इनके लिए सरल एवं व्यावहारिक पाठ्यचर्या, छोटी कक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक और बार-बार अभ्यास उपयोगी है।
  • स्वयं देखभाल, सामाजिक कौशल तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण के माध्यम से आत्मनिर्भरता विकसित करने पर विशेष बल देना चाहिए।

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अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

सामान्य बालकों की बुद्धिलब्धि होती है—

व्याख्या: सामान्य बालकों की बुद्धिलब्धि सामान्यतः 90 से 110 के बीच मानी जाती है।
Q 2

दृष्टिबाधिता का मापन किसके द्वारा किया जाता है?

व्याख्या: दृष्टि क्षमता के परीक्षण और दृष्टिबाधिता की पहचान के लिए स्नेलन चार्ट का प्रयोग किया जाता है।
Q 3

वाक् विकार के प्रमुख प्रकार कितने होते हैं?

व्याख्या: वाक् विकार को मुख्य रूप से छः प्रकारों में विभाजित किया गया है।
Q 4

प्रतिभाशाली बालकों की बुद्धिलब्धि होती है—

व्याख्या: 120 से अधिक बुद्धिलब्धि वाले बालकों को प्रतिभाशाली बालकों की श्रेणी में रखा जाता है।
Q 5

50 से 75 बुद्धिलब्धि वाले बालक कहलाते हैं—

व्याख्या: 50 से 75 के आसपास बुद्धिलब्धि वाले बालकों को मन्द बुद्धि की श्रेणी में रखा जाता है।
Q 6

विशिष्ट बालकों को कितने प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है?

व्याख्या: विशिष्ट बालकों को शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक तथा सामाजिक अक्षमता के आधार पर चार प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।
Q 7

कुछ विशिष्ट सुविधाओं से वंचित बालक कहलाते हैं—

व्याख्या: सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक सुविधाओं से वंचित बालकों को अपवंचित या वंचित बालक कहा जाता है।
Q 8

मन्द श्रवण बाधिता का डेसीबल स्तर होता है—

व्याख्या: मन्द श्रवण बाधिता का स्तर 55–69 dB के बीच होता है।
Q 9

“विशिष्ट ऐसा व्यक्ति है जिसकी शारीरिक, मानसिक, बुद्धि, इन्द्रियों तथा मांसपेशियों की क्षमताएँ अनोखी हों।” यह कथन किसका है?

व्याख्या: यह परिभाषा हेवेट एवं फोरनेस से सम्बन्धित है।
Q 10

आंशिक रूप से दृष्टिबाधित बालकों की दृष्टिक्षमता होती है—

व्याख्या: आंशिक रूप से दृष्टिबाधित बालकों में 20/70 जैसी दृष्टिक्षमता पाई जा सकती है।
Q 11

श्रवण बाधित बालक की पहचान का प्रमुख संकेत कौन-सा है?

व्याख्या: सुनने में कठिनाई के कारण श्रवण बाधित बालक अक्सर कही गई बात या प्रश्न को दोहराने के लिए कहते हैं।
Q 12

अस्थि बाधिता के प्रमुख कारण कौन-से हैं?

व्याख्या: जन्मजात अनियमितता, दुर्घटना और बीमारी तीनों अस्थि बाधिता के प्रमुख कारण हो सकते हैं।
Q 13

अधिगम अक्षमता की पहचान में कौन-से परीक्षण उपयोगी हैं?

व्याख्या: अधिगम अक्षमता की पहचान के लिए भाषा, उपलब्धि, योग्यता तथा मानक निदानात्मक परीक्षणों का प्रयोग किया जा सकता है।
Q 14

मन्द गति से सीखने वाले बालकों के लिए कौन-सी शिक्षण रणनीतियाँ उपयुक्त हैं?

व्याख्या: अभिप्रेरणा, व्यक्तिगत ध्यान और सहज पाठ्यक्रम मंद गति से सीखने वाले बालकों के लिए उपयोगी हैं।
Q 15

मानसिक मन्दित बालकों के शिक्षण में कौन-सा उपाय अधिक उपयोगी है?

व्याख्या: सरल एवं व्यावहारिक पाठ्यक्रम, प्रत्यक्ष शिक्षण और बार-बार अभ्यास मानसिक मन्दित बालकों के लिए अधिक उपयोगी होते हैं।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 3 के विषय समावेशी शिक्षा के अध्याय विशिष्ट आवश्यकता वाले बालक से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

विशिष्ट बालकों की एक परिभाषा दीजिए।

Q 2

स्नेलन चार्ट का विकास किसने किया?

Q 3

श्रवण बाधित बालकों की कोई एक पहचान बताइए।

Q 4

डिस्लेक्सिया शब्द की उत्पत्ति किन शब्दों से हुई है?

Q 5

मन्दबुद्धिता के कोई दो कारण लिखिए।

Q 6

समावेशी शिक्षा के मुख्य उद्देश्य लिखिए।

Q 7

विशिष्ट एवं सामान्य बालकों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

Q 8

वंचित बालकों के प्रमुख प्रकार लिखिए।

Q 9

वाक् विकार की पहचान हेतु प्रमुख परीक्षणों का उल्लेख कीजिए।

Q 10

मानसिक मन्दित बालकों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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