समावेशन हेतु उपकरण एवं अधिगम सामग्री—भूमिका एवं शिक्षा व्यवस्था
समावेशी कक्षा में सभी बालकों की क्षमताएँ, आवश्यकताएँ और सीखने की गति समान नहीं होती। इसलिए शिक्षक को बालकों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को समझते हुए उनके लिए उपयुक्त शिक्षण-अधिगम सामग्री एवं सहायक उपकरणों का चयन करना आवश्यक होता है।
अधिगम सामग्री की भूमिका
विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की शिक्षा में अधिगम सामग्री का विशेष महत्त्व है। उचित सामग्री उनकी शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साथ-साथ शैक्षिक उपलब्धि, विकास तथा सामाजिक समायोजन में भी सहायता करती है।
- शिक्षक बालक की शारीरिक, मानसिक तथा अभिरुचि सम्बन्धी विशेषताओं को ध्यान में रखकर शिक्षण सामग्री का चयन करता है। इससे शिक्षण बालक की वास्तविक आवश्यकता के अनुरूप बनता है।
- दृष्टि, श्रवण, शारीरिक या अन्य प्रकार की अक्षमता वाले बालकों को सामान्य शिक्षण सामग्री के साथ विशेष सहायक साधनों की भी आवश्यकता पड़ सकती है। ये उपकरण सीखने में आने वाली कठिनाइयों को कम करते हैं।
- विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों को शिक्षा के समान अवसर देना आवश्यक है। उनकी भिन्नताओं के कारण उन्हें शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की शिक्षा व्यवस्था
विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए केवल विद्यालय में प्रवेश देना पर्याप्त नहीं है। उनकी पहचान, आवश्यकता का आकलन, उपयुक्त सेवाएँ, प्रशिक्षित शिक्षक तथा आवश्यक सहायक सामग्री की व्यवस्थित व्यवस्था भी जरूरी है।
1. पहचान एवं आकलन
- शिक्षक को कक्षा में बालक की गतिविधियों और व्यवहार का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श एवं अन्य परीक्षणों की सहायता से उसकी विशिष्ट आवश्यकता की पहचान की जा सकती है।
2. आवश्यक सेवाओं की स्थापना
- बालक की आवश्यकता एवं पूर्व अनुभवों के आधार पर उपयुक्त शैक्षिक सेवा प्रदान की जानी चाहिए। शिक्षा की व्यवस्था सामान्य कक्षा से लेकर विशिष्ट या आवासीय संस्था तक आवश्यकता के अनुसार की जा सकती है।
- प्रमुख व्यवस्थाओं में सामान्य कक्षा में पूर्णकालिक सेवा, सामान्य एवं विशिष्ट कक्षाओं में क्रमशः अंशकालिक सेवा, विशिष्ट कक्षा में पूर्णकालिक सेवा, विशिष्ट शिक्षण में पूर्णकालिक सेवा तथा आवासीय शिक्षा संस्थाओं में पूर्णकालिक सेवा शामिल हैं।
3. व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान
- प्रत्येक बालक की क्षमता, व्यवहार और आवश्यकता अलग होती है। इसलिए केवल अक्षमता के आधार पर सभी बालकों के लिए एक जैसी शिक्षा व्यवस्था उपयुक्त नहीं होती।
4. अधिगम क्षमता के अनुसार शिक्षण
- बालकों की सीखने की क्षमता एवं गति में अन्तर होता है। शैक्षिक कार्यक्रम तैयार करते समय उनकी अधिगम क्षमता के अनुसार विषयवस्तु, गतिविधि और सहायता का चयन करना चाहिए।
5. विशिष्ट शिक्षा संस्थानों की भूमिका
- दृष्टिबाधित, श्रवणबाधित, शारीरिक रूप से बाधित तथा मानसिक अक्षमता वाले बालकों के लिए विशिष्ट शिक्षण संस्थानों की व्यवस्था की जाती है। इनमें प्रशिक्षित शिक्षकों, विशेष सहायक सामग्री तथा संसाधनों की सहायता से शिक्षण किया जाता है।
6. समावेशी शिक्षा को बढ़ावा
- समावेशी शिक्षा का उद्देश्य विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों को जहाँ तक सम्भव हो सामान्य शिक्षा से जोड़ना है। इससे वे सामान्य बालकों के साथ शिक्षा प्राप्त कर समाज से बेहतर समायोजन स्थापित कर सकते हैं।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में भी जहाँ तक सम्भव हो आंशिक रूप से बाधित तथा शारीरिक रूप से अक्षम बालकों को सामान्य बालकों की तरह शिक्षा देने पर बल दिया गया।
7. भत्ते एवं आर्थिक सहायता
- शारीरिक रूप से विकलांग बालकों की शिक्षा के लिए यात्रा भत्ता, वर्दी, पुस्तकें तथा छात्रवृत्ति जैसी सहायता का प्रावधान उपयोगी होता है। इससे आर्थिक कारणों से शिक्षा में आने वाली बाधाएँ कम होती हैं।
8. सामान्य शिक्षा के लिए पूर्व प्रशिक्षण
- सामान्य विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने से पहले कुछ बालकों को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जा सकता है। इसका उद्देश्य उनकी क्षमताओं एवं बौद्धिक स्तर को समझते हुए उन्हें संसाधनयुक्त कक्षा के लिए तैयार करना है।
9. संसाधनयुक्त शिक्षक की सहायता
- विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की सहायता के लिए प्रशिक्षित एवं संसाधनयुक्त शिक्षक की नियुक्ति उपयोगी होती है। ऐसा शिक्षक बालक की आवश्यकताओं को समझकर उपयुक्त शिक्षण सामग्री और सहायता उपलब्ध कराता है।
10. सहायक सामग्री एवं उपकरण
- विशिष्ट बालकों को उनकी आवश्यकता के अनुरूप संसाधन उपलब्ध होने चाहिए। दृष्टिबाधित बालकों के लिए ब्रेल तथा मोटे अक्षरों वाली सामग्री और श्रवणबाधित बालकों के लिए श्रवण यंत्र जैसे साधन उपयोगी होते हैं।
- मानसिक अक्षमता वाले बालकों के लिए खेल एवं खेल-आधारित सामग्री तथा अधिगम असमर्थी बालकों के लिए विशेष उपकरणों का प्रयोग किया जा सकता है।
- समावेशी शिक्षा में बालक की व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुसार शिक्षण-अधिगम सामग्री का चयन किया जाता है।
- विशिष्ट बालकों की शिक्षा में पहचान, आकलन, उपयुक्त सेवाएँ और अधिगम क्षमता का ध्यान रखना आवश्यक है।
- समावेशी शिक्षा का उद्देश्य विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों को यथासम्भव सामान्य शिक्षा से जोड़ना है।
- प्रशिक्षित शिक्षक, आर्थिक सहायता तथा उपयुक्त सहायक उपकरण उनकी शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाते हैं।
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दृष्टिबाधित एवं श्रवण बाधित बालकों के लिए अधिगम सामग्री
विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की बाधिता और अधिगम आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग प्रकार की सहायक सामग्री की आवश्यकता होती है। दृष्टिबाधित बालकों के लिए ऐसी सामग्री उपयोगी होती है जो देखने, पढ़ने और स्पर्श द्वारा सीखने में सहायता करे, जबकि श्रवण बाधित बालकों के लिए ऐसे उपकरण आवश्यक होते हैं जो सुनने और संप्रेषण को सरल बनाएँ।
दृष्टिबाधित बालकों के लिए अधिगम सामग्री
दृष्टिबाधिता आंशिक दृष्टिहीनता से लेकर पूर्ण दृष्टिहीनता तक हो सकती है। इसलिए बालक की दृष्टि-क्षमता के स्तर के अनुसार उपयुक्त सहायक उपकरण और अधिगम सामग्री का चयन किया जाता है।
1. आवर्धक लेंस तथा हस्तावर्धक
- कम दृष्टिबाधित बालकों के लिए आवर्धक लेंस तथा हस्तावर्धक उपयोगी होते हैं। ये अधिगम सामग्री को बड़े आकार में देखने में सहायता करते हैं।
2. संकीर्ण सर्किट टेलीविजन
- संकीर्ण सर्किट टेलीविजन कम दृष्टिबाधित बालकों के लिए उपयोगी उपकरण है। यह पाठ्य सामग्री को बड़े आकार में टेलीविजन के पर्दे पर प्रदर्शित करता है, जिससे पढ़ने में सुविधा होती है।
3. बड़े आकार की मुद्रित सामग्री
- आंशिक दृष्टिबाधित बालकों के लिए सामान्य से बड़े अक्षरों में मुद्रित पुस्तकें उपयोगी होती हैं। इनमें पाठ्य सामग्री लगभग 18–24 अंक के बड़े टंकण में दी जा सकती है।
4. ब्रेल स्लेट एवं स्टाइलस
- ब्रेल स्लेट तथा स्टाइलस का प्रयोग दृष्टिहीन बालक लिखने के लिए करते हैं। यह उनके लिए उसी प्रकार उपयोगी है जैसे सामान्य बालक पेन और कागज का प्रयोग करते हैं।
5. ब्रेल पुस्तकें
- ब्रेल पुस्तकें दृष्टिहीन बालकों की प्रमुख सहायक सामग्री हैं। इनमें अक्षर, शब्द, अंक तथा अन्य संकेत उभरे हुए बिन्दुओं के रूप में दिए जाते हैं जिन्हें स्पर्श द्वारा पढ़ा जाता है।
- ब्रेल प्रणाली द्वारा भाषा के साथ-साथ गणित, विज्ञान तथा अन्य विषयों का भी अध्ययन किया जा सकता है।
6. ब्रेल शीट
- ब्रेल शीट दृष्टिहीन बालकों के शैक्षिक कार्यों में विशेष उपयोगी होती है। ब्रेल स्लेट या ब्रेलर का अभ्यास होने पर बालक इसका प्रभावी प्रयोग कर सकता है।
7. बोलने वाला कैलकुलेटर
- Talking Calculator में संख्याएँ ध्वनि के माध्यम से सुनाई देती हैं। यह विशेष रूप से गणित शिक्षण-अधिगम में दृष्टिबाधित बालकों के लिए उपयोगी होता है।
8. अन्य विशिष्ट उपकरण
- टेप रिकॉर्डर, रेडियो तथा विशेष प्रकार के मानचित्र भूगोल, इतिहास, सामान्य विज्ञान एवं भाषा के अध्ययन में सहायक होते हैं।
- गणित शिक्षण में अबेकस का प्रयोग भी दृष्टिबाधित बालकों के लिए उपयोगी होता है।
श्रवण बाधित बालकों के लिए अधिगम सामग्री
श्रवण बाधिता कान या श्रवण तंत्र में दोष के कारण उत्पन्न होती है और इसका स्तर मंद से लेकर गंभीर तक हो सकता है। श्रवण सम्बन्धी सहायक उपकरणों की सहायता से बालक की उपलब्ध श्रवण क्षमता का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
1. श्रवण उपकरण
- Hearing Aid श्रवण बाधित बालकों के शिक्षण-अधिगम में महत्त्वपूर्ण उपकरण है। यह ध्वनि को अधिक तीव्रता से सुनने में सहायता करता है।
- ध्वनि-वर्धक तथा हेडफोन जैसे उपकरण व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों प्रकार के प्रयोगों में उपयोगी होते हैं।
2. फोनिक-कान एवं शून्य ट्यूब उपकरण
- फोनिक-कान उपकरण के माध्यम से ध्वनि सीधे अधिगमकर्ता के कान तक पहुँचाई जाती है। शून्य ट्यूब उपकरण ध्वनि को सरल एवं स्पष्ट बनाने में उपयोगी होता है।
3. चिन्ह-भाषा पैकेज
- Sign-Language Package में स्वर एवं शब्दों के लिए विशेष चिन्हों का प्रयोग किया जाता है। इससे श्रवण असमर्थी बालकों को भाषा समझने और सीखने में सहायता मिलती है।
4. अन्य श्रवण सहायक उपकरण
- टेलीफोन, टाइपराइटर तथा कम्प्यूटर का संयुक्त प्रयोग श्रवणबाधित बालकों के लिए उपयोगी हो सकता है।
- वीडियो टेप, श्रवण सहायक वेस्ट, ओवरहेड प्रोजेक्टर, छोटे-बड़े दर्पण, फ्लैश कार्ड, शैक्षिक खेल सामग्री तथा खिलौने भी शिक्षण को सरल बनाने में सहायक होते हैं।
- दृष्टिबाधित बालकों की अधिगम सामग्री का चयन उनकी दृष्टि-क्षमता के स्तर के अनुसार किया जाता है।
- आवर्धक लेंस, बड़े अक्षरों की सामग्री, ब्रेल स्लेट, ब्रेल पुस्तकें तथा बोलने वाला कैलकुलेटर प्रमुख सहायक साधन हैं।
- श्रवण बाधित बालकों के लिए श्रवण यंत्र, फोनिक-कान, शून्य ट्यूब तथा चिन्ह-भाषा पैकेज उपयोगी हैं।
- दृश्य एवं तकनीकी साधन श्रवण बाधित बालकों के अधिगम और संप्रेषण को सरल बनाते हैं।
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अस्थि बाधित एवं वाक्-दोष बालकों के लिए अधिगम सामग्री
अस्थि बाधित बालकों के लिए अधिगम सामग्री
अस्थि बाधिता से तात्पर्य शरीर के किसी अंग या भाग में ऐसे दोष अथवा विकृति से है, जिससे मांसपेशियों, जोड़ों या हड्डियों की सामान्य क्रियाओं में बाधा उत्पन्न होती है। इसमें अंग-विच्छेद, पक्षाघात, पाँव का विकार, रीढ़ की हड्डी का वक्र होना तथा मांसपेशीय असमर्थता जैसी स्थितियाँ शामिल हो सकती हैं।
अस्थि बाधिता रोग, दुर्घटना अथवा वंशानुगत कारणों से हो सकती है और इसका स्तर मंद से लेकर गंभीर तक हो सकता है। ऐसे बालकों के लिए सहायक सामग्री का चयन उनके बाधित अंग तथा बाधिता की प्रकृति के अनुसार किया जाना चाहिए।
1. पढ़ने-लिखने के सहायक उपकरण
- लैप-बोर्ड, पेज टर्नर, मोटे पेन तथा मोटे पेन-होल्डर जैसे उपकरण पढ़ने और लिखने में सहायता करते हैं। विशेष रूप से हाथों की गति या पकड़ में कठिनाई वाले बालकों के लिए ये उपयोगी होते हैं।
2. अनुकूलित फर्नीचर
- मेज-कुर्सी का आकार तथा ऊँचाई बालक की आवश्यकता के अनुसार रखी जानी चाहिए। उचित फर्नीचर से बालक को बैठने और अधिगम कार्य करने में कम कठिनाई होती है।
3. चलने-फिरने के सहायक साधन
- बैसाखी, पहिए वाली कुर्सी तथा अन्य आवश्यक साधन अस्थि बाधित बालकों की गतिशीलता में सहायता करते हैं।
4. कक्षा एवं लेखन व्यवस्था में अनुकूलन
- हाथों के समन्वय में कठिनाई होने पर मेज पर कागज को टेप से स्थिर किया जा सकता है। इससे लिखते समय कागज के खिसकने की समस्या कम होती है।
- पेन, पेंसिल तथा कार्बन प्रतिका को टिकाने के लिए उपयुक्त स्थान और पुस्तक रखने के लिए होल्डर की व्यवस्था भी उपयोगी होती है।
वाक्-दोष बालकों के लिए अधिगम सामग्री
वाक्-दोष या वाणी बाधिता शारीरिक कठिनाई के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक समस्या से भी सम्बन्धित हो सकती है। स्पष्ट वाणी के लिए वाणी-तंत्र के विभिन्न अंगों का उचित विकास और उनमें समन्वय आवश्यक होता है।
वाणी सम्बन्धी दोष भाषा के प्रयोग, उच्चारण, आवाज की तीव्रता, तारतम्यता, स्वरशैली तथा लय-ताल आदि से जुड़े हो सकते हैं। दोषपूर्ण भाषा तथा नाक से बोलना भी वाणी सम्बन्धी दोषों में शामिल है।
1. वाणी सम्बन्धी प्रशिक्षण
- वाक्-दोष वाले बालकों को सही वाणी के प्रयोग का प्रशिक्षण वाणी चिकित्सक अथवा विशेषज्ञ द्वारा दिया जा सकता है। इसमें ध्वनि, अक्षर और शब्दों से सम्बन्धित अभ्यास कराया जाता है।
- भाषा के नियम, व्याकरण, वाक्य-विन्यास तथा अर्थबोध का प्रशिक्षण भी बालक के भाषा विकास में सहायता करता है।
2. श्रवण सहायक उपकरण
- वाणी बाधित बालकों में श्रवण बाधिता भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में उनकी श्रवण सुविधा के लिए उपयुक्त श्रवण सहायक उपकरण आवश्यक होते हैं।
3. श्वसन में सहायता करने वाले साधन
- बोलते समय श्वसन क्रिया में सहायता के लिए कमरबन्द स्लिंग अथवा बन्धनी का प्रयोग उपयोगी हो सकता है।
4. चित्र, रेखाचित्र एवं मॉडल
- चित्र, रेखाचित्र तथा मॉडल वाणी-तंत्र की रचना और ध्वनि-उच्चारण सम्बन्धी प्रक्रिया को स्पष्ट करने में उपयोगी होते हैं।
5. दृश्य एवं तकनीकी अधिगम सामग्री
- चित्र बोर्ड, लेखन बोर्ड तथा टाइपिंग बोर्ड जैसी अधिगम सामग्री वाक्-दोष वाले बालकों के लिए उपयोगी होती है।
- कृत्रिम भाषा, कृत्रिम वाणी संश्लेषण तथा कम्प्यूटर जैसे साधनों का प्रयोग शिक्षा को सरल बनाने और ध्वनि-उच्चारण सम्बन्धी कठिनाइयों में सहायता के लिए किया जा सकता है।
6. श्रवण कैसेट एवं टेप
- श्रवण कैसेट तथा टेप का प्रयोग नासिका सम्बन्धी अशुद्धियों तथा अनुनाद सम्बन्धी दोषों के उपचार में सहायक साधन के रूप में किया जाता है।
- अस्थि बाधित बालकों के लिए लैप-बोर्ड, पेज टर्नर, मोटे पेन, अनुकूलित फर्नीचर, बैसाखी और पहिए वाली कुर्सी उपयोगी हैं।
- अस्थि बाधित बालकों की सहायक सामग्री का चयन बाधित अंग और बाधिता की प्रकृति के अनुसार किया जाता है।
- वाक्-दोष बालकों के लिए वाणी प्रशिक्षण, श्रवण सहायक उपकरण, चित्र, मॉडल तथा तकनीकी साधनों का प्रयोग किया जाता है।
- सही उच्चारण, भाषा, श्वसन और संप्रेषण के विकास में उपयुक्त सहायक सामग्री महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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बौद्धिक अक्षमता, प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात एवं अधिगम असमर्थी बालकों के लिए अधिगम सामग्री
बौद्धिक अक्षमता एवं प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात वाले बालक
बौद्धिक अक्षमता बालक के बौद्धिक क्रियान्वयन की निम्न स्तरीय अवस्था है, जिससे उसकी अधिगम, परिपक्वता तथा सामाजिक समायोजन सम्बन्धी क्षमता प्रभावित होती है। ऐसे बालकों की बौद्धिक लब्धि 89 या इससे कम हो सकती है।
प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात (Cerebral Palsy) विकसित हो रहे मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त होने की अवस्था है। इसका प्रभाव मुख्य रूप से शारीरिक क्रियाओं के समन्वय, शारीरिक मुद्रा तथा संतुलन पर पड़ता है और इससे मानसिक क्रियाएँ भी प्रभावित हो सकती हैं।
मस्तिष्क की क्षति प्रसव-पूर्व, प्रसवकाल अथवा जन्म के शीघ्र बाद हो सकती है। मस्तिष्क से सम्बन्धित भाग की क्षति जितनी अधिक होती है, प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात की तीव्रता भी उतनी अधिक हो सकती है।
बौद्धिक अक्षमता एवं प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात के लिए उपयोगी अधिगम सामग्री
- दिन, तिथियों तथा महीनों के अंकन वाले कैलेंडर समय और क्रम की अवधारणा समझाने में उपयोगी होते हैं।
- विभिन्न सम्प्रत्ययों के शिक्षण के लिए अलग-अलग आकृतियों के ठोस पदार्थों का प्रयोग किया जा सकता है।
- चित्रों के कार्ड तथा विभिन्न प्रकार के चित्र वस्तुओं एवं अवधारणाओं की पहचान कराने में सहायक होते हैं।
- टूल बॉक्स का प्रयोग क्रियात्मक एवं व्यावहारिक अधिगम में किया जा सकता है।
- इन्द्रिय समायोजन तथा अनुकूलन के लिए विशेष सहायक सामग्री उपयोगी होती है।
- शैक्षिक खेल तथा खेल-क्रिया से सम्बन्धित सामग्री अधिगम को सरल और रुचिकर बनाती है।
- ऑर्थोटिक्स, कास्ट तथा खपच्चियाँ शारीरिक अंगों को आवश्यक सहारा देने में उपयोगी होती हैं।
- बैठने एवं मुद्रा को उचित बनाए रखने के लिए विशेष आकार के फर्नीचर तथा चलने-फिरने के लिए बैसाखियाँ, केन-वॉकर, पहिया-कुर्सी या कैस्टर वाली कुर्सी का प्रयोग किया जा सकता है।
- शिक्षण के लिए की-बोर्ड, टाइप मशीन तथा शब्द संसाधक (Word Processor) जैसे साधनों का प्रयोग किया जा सकता है।
अधिगम असमर्थी बालक
अधिगम असमर्थी बालक अधिगम प्रक्रिया से सम्बन्धित उन सामान्य क्रियाओं को करने में कठिनाई अनुभव करते हैं जिन्हें कक्षा के अन्य बालक बिना कठिनाई के कर लेते हैं। इनमें पढ़ने, लिखने, बोलने, भाषा समझने तथा सूचनाओं के मानसिक प्रसंस्करण से सम्बन्धित कठिनाइयाँ हो सकती हैं।
अधिगम असमर्थताओं में मुख्य रूप से डिस्लेक्सिया, डिसग्राफिया, डिस्कैल्कुलिया तथा ध्यान-अभाव अति क्रियाशीलता विकृति (ADHD) को सम्मिलित किया जाता है।
अधिगम असमर्थी बालकों के लिए उपयोगी अधिगम सामग्री
- कैसेट, टेप एवं टेप-रिकॉर्डर द्वारा बालकों को भाषा की ध्वनियों तथा उनके रूप-विज्ञान सम्बन्धी सही ज्ञान देने में सहायता मिलती है।
- अक्षर-ध्वनि साहचर्य तथा दृश्य शब्द-पहचान के लिए सम्बन्धित ठोस अधिगम सामग्री का प्रयोग किया जा सकता है।
- भाषा सम्बन्धी ज्ञान के लिए शब्दों तथा वाक्यों के निर्माण में सहायक साधनों का प्रयोग किया जाता है।
- डिस्लेक्सिया वाले बालकों के लिए चित्र तथा शीर्षक सामग्री की सहायता से चित्र या स्थिति का कथानुसार वर्णन कराया जा सकता है।
- चित्रों वाली स्क्रैप-बुक में दी गई सामग्री की सहायता से विभिन्न शब्दों का ज्ञान कराया जा सकता है।
- विभिन्न रंगों तथा आकार-प्रकार के लकड़ी के गुटकों द्वारा प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धी ज्ञान दिया जा सकता है।
- मिलान करने तथा ढूँढने सम्बन्धी सामग्री डिस्कैल्कुलिया वाले बालकों को स्थानिक सम्बन्धों का ज्ञान देने में उपयोगी होती है।
- चिकनी एवं गीली मिट्टी का प्रयोग विभिन्न वस्तुओं और पदार्थों के आकार तथा गुणों को स्पष्ट करने के लिए किया जा सकता है।
- गणित सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए विभिन्न प्रकार की पहेलियों का प्रयोग अधिगम सामग्री के रूप में किया जा सकता है।
- पढ़ने तथा गणित सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए उपयुक्त सॉफ्टवेयर प्रोग्राम का प्रयोग किया जा सकता है। इनका उपयोग आवश्यकता के अनुसार दृष्टि एवं श्रवण सम्बन्धी सहायक सामग्री के रूप में भी किया जा सकता है।
- बौद्धिक अक्षमता बालक की अधिगम, परिपक्वता एवं सामाजिक समायोजन सम्बन्धी क्षमता को प्रभावित करती है।
- प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात में मुख्य रूप से शारीरिक समन्वय, मुद्रा और संतुलन प्रभावित होते हैं।
- इन बालकों के लिए कैलेंडर, चित्र, ठोस सामग्री, शैक्षिक खेल, विशेष फर्नीचर तथा गतिशीलता सम्बन्धी उपकरण उपयोगी हैं।
- अधिगम असमर्थताओं में डिस्लेक्सिया, डिसग्राफिया, डिस्कैल्कुलिया और ADHD प्रमुख हैं।
- अधिगम असमर्थी बालकों के लिए ध्वनि-सामग्री, चित्र, गुटके, मिलान सामग्री, पहेलियाँ तथा सॉफ्टवेयर उपयोगी होते हैं।
विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों हेतु उपकरण एवं अन्य तकनीकों का वर्गीकरण
विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की बाधिता और दैनिक आवश्यकताएँ अलग-अलग होती हैं। इसलिए उनकी शिक्षा, गतिशीलता, संप्रेषण, सुरक्षा तथा दैनिक जीवन को सरल बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के सहायक उपकरण एवं तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।
बाधिता के आधार पर उपकरणों का वर्गीकरण
सहायक उपकरणों को बालक की बाधिता और आवश्यकता के आधार पर मुख्य रूप से निम्न वर्गों में रखा जा सकता है—
- गतिशीलता सम्बन्धी अक्षमता के लिए व्हीलचेयर, वॉकर, स्थानांतरण उपकरण तथा कृत्रिम अंग उपयोगी होते हैं।
- दृष्टि बाधिता के लिए स्क्रीन पाठक, ब्रेल एवं ब्रेल रचनाकार, डेस्कटॉप वीडियो मैग्नीफायर, स्क्रीन पढ़ने वाला सॉफ्टवेयर तथा बड़े प्रिंट एवं स्पर्शनीय की-बोर्ड उपयोगी होते हैं।
- श्रवण बाधिता के लिए श्रवण उपकरण, सहायक श्रवण उपकरण तथा प्रवर्धित टेलीफोन का प्रयोग किया जाता है।
- संज्ञानात्मक बाधिता के लिए स्मृति सम्बन्धी तथा शैक्षिक उपकरण उपयोगी होते हैं।
- अन्य आवश्यकताओं के लिए निजी आपात प्रणाली, अधिगम सॉफ्टवेयर, आगम एवं वैकल्पिक संप्रेषण, खेल में सहायक तकनीक, शिक्षा में सहायक तकनीक, कम्प्यूटर अभिगम्यता तथा गृह स्वचालन जैसी तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।
विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों के प्रमुख सहायक उपकरण
- 1. गतिशीलता हेतु उपकरण— चलने-फिरने तथा एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में कठिनाई वाले बालकों के लिए व्हीलचेयर, स्कूटर, व्हीलचेयर जैसी गाड़ियाँ, स्ट्रेचर तथा ट्रांसपोर्टर उपयोगी होते हैं।
- 2. दृष्टि बाधितों हेतु उपकरण— दृष्टिबाधित बालकों के लिए कम्प्यूटर, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा सम्बन्धी साधन, सूचना भण्डारण, लेबलिंग, दिशा-निर्देशन, पढ़ने, टाइपिंग, यात्रा तथा ब्रेल सम्बन्धी उपकरण उपयोगी होते हैं।
- 3. श्रवण बाधितों हेतु उपकरण— श्रवण क्षमता बढ़ाने के लिए श्रवण यंत्र, मनोरंजक इलेक्ट्रॉनिक साधन, सांकेतिक भाषा, भाषण प्रशिक्षण, टेलीफोन तथा संकेत स्विच आदि का प्रयोग किया जाता है।
- 4. संप्रेषण सम्बन्धी उपकरण— संप्रेषण में कठिनाई वाले बालकों के लिए वैकल्पिक संचार उपकरण जैसे माउथस्टिक, हेडवैंड्स, सिग्नल प्रणाली, टाइपिंग, टेलीफोन तथा लेखन साधन उपयोगी होते हैं।
- 5. संज्ञानात्मकता सम्बन्धी उपकरण— विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विद्यालयों में विभिन्न शैक्षिक सामग्री, निर्देशन तथा सहायक उपकरण उपलब्ध कराए जाते हैं।
- 6. कम्प्यूटर— कम्प्यूटर एक महत्त्वपूर्ण अनुकूलित सहायक साधन है। इसमें विभिन्न प्रकार के सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर तथा कम्प्यूटर सहायक उपकरणों का प्रयोग कर बालकों को अधिक प्रभावी ढंग से सीखने में सहायता दी जाती है।
- 7. नियंत्रण हेतु उपकरण— विभिन्न उपकरणों को नियंत्रित करने में असमर्थ बालकों के लिए विशेष नियंत्रण साधनों का प्रयोग किया जाता है। स्विच आधारित नियंत्रण इसका प्रमुख उदाहरण है।
- 8. पर्यावरण अनुकूलन— बालक के वातावरण को उसकी आवश्यकता के अनुसार अनुकूल बनाने के लिए विशेष फर्नीचर, आन्तरिक एवं बाह्य वातावरण, प्रकाश तथा आसान पहुँच की व्यवस्था की जाती है।
- 9. अस्थि बाधितों हेतु उपकरण— चलने-फिरने में कठिनाई वाले अस्थि बाधित बालकों के लिए जोड़ों तथा शरीर के अन्य भागों को सहारा देने वाले विभिन्न उपकरण उपलब्ध कराए जाते हैं।
- 10. कृत्रिम शारीरिक उपकरण— शरीर के ऊपरी अथवा निचले भाग की सहायता के लिए कृत्रिम अंगों का प्रयोग किया जाता है, जैसे कृत्रिम पैर तथा कृत्रिम हाथ।
- 11. मनोरंजन सम्बन्धी उपकरण— शिल्प, संगीत, फोटोग्राफी, इलेक्ट्रॉनिक साधन, खेल तथा खिलौने विशेष आवश्यकता वाले बालकों को मनोरंजक गतिविधियों में भाग लेने में सहायता करते हैं।
- 12. सुरक्षात्मक उपकरण— सुरक्षा प्रणाली, अलार्म, बच्चों द्वारा आसानी से न खोले जा सकने वाले उपकरण, लाइट तथा बिजली के तारों एवं तालों से सम्बन्धित साधन बालकों की सुरक्षा के लिए उपयोगी होते हैं।
- 13. दैनिक जीवन के सहायक उपकरण— स्नान, एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने, कपड़े पहनने, भोजन करने, सौन्दर्य, स्वच्छता, स्वास्थ्य तथा शौच जैसी दैनिक क्रियाओं में सहायता देने वाले उपकरण इस श्रेणी में आते हैं।
- 14. बैठने एवं घूमने के उपकरण— चलने-फिरने में कठिनाई वाले बालकों के लिए चिकित्सीय सीटें, कुशन, बेंत, ब्रेसेज, बैसाखी और वॉकर जैसे उपकरण उपयोगी होते हैं।
अन्य सहायक तकनीकियाँ
सहायक उपकरणों के अतिरिक्त अनेक आधुनिक तकनीकियाँ भी विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों को संप्रेषण, सुरक्षा, शिक्षा, खेल तथा स्वतंत्र जीवन में सहायता प्रदान करती हैं।
1. आगम एवं वैकल्पिक संप्रेषण (AAC)
AAC ऐसी संप्रेषण प्रणाली है जो उन व्यक्तियों की सहायता करती है जिन्हें बोली या लिखित भाषा को बोलने अथवा समझने में कठिनाई होती है। इसमें चित्रों वाले बोर्ड से लेकर भाषण उत्पन्न करने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण तक शामिल हो सकते हैं।
2. निजी इमरजेंसी सिस्टम (PERS)
PERS एक सहायक तकनीक है जिसमें सामान्यतः अलार्म के साथ इलेक्ट्रॉनिक सेंसर जुड़ा होता है। आवश्यकता पड़ने पर इसके द्वारा सहायता का संकेत देखभाल करने वाले व्यक्ति तक पहुँचाया जा सकता है।
3. कम्प्यूटर अभिगम्यता
कम्प्यूटर अभिगम्यता का उद्देश्य विकलांग या बाधित व्यक्तियों के लिए कम्प्यूटर प्रणाली तक पहुँच को सरल बनाना है। इसके अन्तर्गत आवश्यकता के अनुसार विशेष हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और अन्य सहायक साधनों का प्रयोग किया जा सकता है।
4. खेल में सहायक प्रौद्योगिकी
खेलों में सहायक तकनीक ऐसे उपकरणों के विकास और अनुकूलन से सम्बन्धित है जिनकी सहायता से शारीरिक कठिनाई वाला व्यक्ति खेल गतिविधियों में भाग ले सके। इसके लिए खेल उपकरणों को खिलाड़ी की आवश्यकता के अनुसार अनुकूलित किया जाता है।
5. शिक्षा में सहायक तकनीकी
शिक्षा में सहायक तकनीक का उद्देश्य विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की शैक्षिक कठिनाइयों को कम करना है। इसमें कम तकनीक वाले साधनों से लेकर सॉफ्टवेयर, कम्प्यूटर तथा अन्य उच्च तकनीकी उपकरणों तक का प्रयोग किया जा सकता है।
- कम तकनीकी साधनों में सहायक पेपर, पेंसिल ग्रिप तथा पढ़ने-लिखने में सहायता देने वाले सरल उपकरण शामिल हो सकते हैं।
- उच्च तकनीकी साधनों में सॉफ्टवेयर, कम्प्यूटर एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।
6. गृह स्वचालन
गृह स्वचालन ऐसी सहायक तकनीक है जो विशेष रूप से बुजुर्ग एवं असमर्थ व्यक्तियों को घर में अधिक स्वतंत्र जीवन जीने में सहायता करती है। इसका प्रयोग सुरक्षा, मनोरंजन तथा ऊर्जा संरक्षण से सम्बन्धित कार्यों में किया जा सकता है।
स्वचालित संकेत, गति-संवेदक तथा पहले से रिकॉर्ड किए गए ऑडियो संदेश गृह स्वचालन के प्रमुख उदाहरण हैं।
- विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों के लिए उपकरणों का चयन उनकी बाधिता और व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुसार किया जाता है।
- प्रमुख उपकरण गतिशीलता, दृष्टि, श्रवण, संप्रेषण, संज्ञान, सुरक्षा तथा दैनिक जीवन से सम्बन्धित होते हैं।
- AAC, PERS, कम्प्यूटर अभिगम्यता और शिक्षा में सहायक तकनीक आधुनिक सहायक तकनीकों के प्रमुख उदाहरण हैं।
- सहायक उपकरण एवं तकनीकें विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की शिक्षा, स्वतंत्रता, सुरक्षा और सामाजिक सहभागिता को सरल बनाती हैं।
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सहकर्मी शिक्षण एवं सहकारी अधिगम
समावेशी कक्षा में सभी बालकों की क्षमता और सीखने की गति समान नहीं होती। ऐसे में सहकर्मी शिक्षण और सहकारी अधिगम जैसी विधियाँ विद्यार्थियों को एक-दूसरे की सहायता से सीखने का अवसर देती हैं तथा कक्षा में सहभागिता और सहयोग को बढ़ाती हैं।
सहकर्मी शिक्षण (Peer Tutoring)
सहकर्मी शिक्षण एक लचीली शिक्षण रणनीति है जिसमें एक ही कक्षा का अधिक क्षमता एवं उपलब्धि वाला छात्र सामान्य या कम क्षमता वाले छात्र को पढ़ने और सीखने में सहायता करता है। इस प्रकार विद्यार्थी आवश्यकता के अनुसार शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों की भूमिका निभा सकते हैं।
सहकर्मी शिक्षक का चयन उसकी विषय सम्बन्धी योग्यता के आधार पर किया जाता है। यह आवश्यक नहीं है कि एक ही विद्यार्थी सभी विषयों और सभी प्रकरणों में सहकर्मी शिक्षक की भूमिका निभाए।
सहकर्मी शिक्षण के प्रमुख प्रतिमान
- 1. कक्षानुसार सहकर्मी शिक्षण (Classwide Peer Tutoring)— इसमें पूरी कक्षा के विद्यार्थियों को उनकी योग्यता और क्षमता के अनुसार लगभग दो से पाँच समूहों में बाँटा जाता है। विद्यार्थी शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों की भूमिका निभाते हैं तथा प्रत्यक्ष अभ्यास और समूह गतिविधियों के माध्यम से सीखते हैं। यह गतिविधि लगभग 30 मिनट की हो सकती है और सप्ताह में दो या अधिक बार कराई जा सकती है।
- 2. पार/बड़े उम्र सहकर्मी शिक्षण (Cross-Age Peer Tutoring)— इसमें बड़े या पुराने विद्यार्थियों को छोटे अथवा नए विद्यार्थियों के साथ रखा जाता है। बड़ा विद्यार्थी शिक्षक तथा छोटा विद्यार्थी शिक्षार्थी की भूमिका निभाता है, जिससे अनुभव एवं कौशल का आदान-प्रदान होता है।
- 3. पारस्परिक सहकर्मी शिक्षण (Reciprocal Peer Tutoring)— इसमें विद्यार्थी बारी-बारी से शिक्षक और शिक्षार्थी की भूमिका निभाते हैं। सामान्यतः उच्च प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थी को निम्न प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थी के साथ रखा जाता है और दोनों मिलकर अपनी उपलब्धि सुधारने का प्रयास करते हैं।
- 4. एक ही आयु के सहकर्मी शिक्षण (Same Age Peer Tutoring)— इसमें लगभग समान आयु के विद्यार्थी एक साथ अध्ययन करते हैं। समान स्तर वाले अथवा अधिक उन्नत विद्यार्थी को कम उन्नत विद्यार्थी के साथ रखकर उनकी समस्याओं का संयुक्त रूप से समाधान कराया जा सकता है।
सहकारी अधिगम (Cooperative Learning)
सहकारी अधिगम ऐसी अधिगम प्रक्रिया है जिसमें विद्यार्थी समूह के सदस्य के रूप में परस्पर सहयोग करते हुए सीखते हैं। वे अपनी सूचनाओं और अनुभवों का आदान-प्रदान करते हैं तथा एक-दूसरे की सहायता से विषय सम्बन्धी ज्ञान और कौशल अर्जित करते हैं।
परम्परागत कक्षा में शिक्षण प्रायः शिक्षक एवं विषय-केंद्रित होता है, जबकि सहकारी अधिगम में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी और पारस्परिक सहयोग पर बल दिया जाता है। इससे शिक्षक और विद्यार्थी दोनों की भूमिका अधिक सहभागितापूर्ण बनती है।
सहकारी अधिगम के प्रमुख अंग
- 1. खेल द्वारा अधिगम— खेल और खिलौनों के माध्यम से बालकों में विभिन्न कौशलों का विकास होता है। साथ खेलने से उनमें प्रेम, सहयोग और सामाजिक गुण विकसित होते हैं तथा सीखना अधिक रुचिकर बनता है।
- 2. समूह द्वारा सीखना— विद्यार्थियों को समूहों में बाँटकर शैक्षिक कार्य दिए जाते हैं। प्रत्येक समूह में योग्य विद्यार्थियों को नेतृत्व की भूमिका दी जा सकती है, जिससे सभी सदस्य सहयोग करते हुए सीखते हैं।
- 3. सामूहिक प्रतियोगिता द्वारा अधिगम— विद्यार्थियों को समूहों में रखकर उपयुक्त प्रतियोगिताएँ कराई जा सकती हैं। इससे विद्यार्थी स्वयं सीखने के साथ अपने समूह के कमजोर सदस्यों की सहायता भी करते हैं।
- 4. सांस्कृतिक कार्यक्रम— विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में विद्यार्थियों को सहयोगपूर्वक भाग लेने के अवसर मिलने चाहिए। इससे वे स्वयं कार्य करके तथा अपने साथियों से सीखते हैं।
- 5. शैक्षिक प्रदर्शनी द्वारा सीखना— विद्यार्थियों की आयु और मानसिक स्तर के अनुरूप शैक्षिक प्रदर्शनियों का आयोजन किया जा सकता है। इससे वे प्रदर्शित वस्तुओं, सहपाठियों और शिक्षकों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करते हैं।
- 6. शैक्षिक मेलों द्वारा सीखना— शैक्षिक मेलों से विद्यार्थियों को विभिन्न विषयों एवं उपकरणों का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त होता है। जैसे कम्प्यूटर मेले से कम्प्यूटर और उससे सम्बन्धित उपकरणों के प्रयोग की जानकारी मिल सकती है।
- 7. शैक्षिक भ्रमण द्वारा सीखना— कम्प्यूटर प्रयोगशाला, उद्योग, समाचार-पत्र संस्थान तथा ऐतिहासिक स्थानों आदि के भ्रमण से विद्यार्थियों को वस्तुओं और प्रक्रियाओं का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त होता है तथा उनमें सहयोग की भावना विकसित होती है।
- सहकर्मी शिक्षण में विद्यार्थी एक-दूसरे की सहायता से सीखते हैं और आवश्यकता के अनुसार शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों की भूमिका निभाते हैं।
- सहकर्मी शिक्षण के प्रमुख प्रतिमान कक्षानुसार, पार-आयु, पारस्परिक तथा समान आयु सहकर्मी शिक्षण हैं।
- सहकारी अधिगम में विद्यार्थी समूह बनाकर सूचनाओं, अनुभवों और कौशलों का आदान-प्रदान करते हैं।
- खेल, समूह कार्य, सामूहिक प्रतियोगिता, सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनी, शैक्षिक मेले और भ्रमण सहकारी अधिगम के प्रमुख अंग हैं।
सामाजिक अधिगम एवं बडी सिस्टम
समावेशी शिक्षा में बालक केवल शिक्षक से ही नहीं, बल्कि परिवार, सहपाठियों और सामाजिक वातावरण से भी सीखता है। सामाजिक अधिगम बालक के व्यवहार और व्यक्तित्व के विकास में सहायता करता है, जबकि बडी सिस्टम में दो विद्यार्थी जोड़ी बनाकर एक-दूसरे की सहायता और निगरानी करते हुए सीखते हैं।
सामाजिक अधिगम (Social Learning)
अधिगम एक सामाजिक प्रक्रिया है। बालक सामाजिक अन्तःक्रिया, अनुभव तथा अपने आसपास के लोगों के व्यवहार से अनेक बातें सीखता है। किसी कार्य के लिए प्रोत्साहन मिलने पर बालक उस व्यवहार को अपनाने की ओर अग्रसर होता है, जबकि हतोत्साहित किए जाने पर वह उस कार्य से बचने का प्रयास करता है।
सामाजिक परिस्थितियाँ और घटनाएँ बालक की मनोदशा तथा सीखने की प्रक्रिया पर गहरा प्रभाव डालती हैं। इसलिए माता-पिता, शिक्षक और अन्य वयस्कों को बालक के साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए जिससे उसका आत्मविश्वास, सहयोग और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित हो।
सामाजिक अधिगम को प्रभावी बनाने के उपाय
- बालक की जिज्ञासा और उचित इच्छाओं को समझते हुए उसका विश्वास जीतने का प्रयास करना चाहिए।
- सीखने की प्रक्रिया में बालक के तर्क और विचारों को भी महत्त्व देना चाहिए। इससे वह स्वयं को अधिगम प्रक्रिया का सक्रिय भाग समझता है।
- बालक के कार्यों में सहयोग देना चाहिए तथा अपने व्यवहार से सहयोग की भावना का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
- यदि बालक खेल के माध्यम से सीखने में रुचि रखता है तो उसे उसी प्रकार की गतिविधियों द्वारा सीखने का अवसर देना चाहिए।
- बालक के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए। ऐसा वातावरण उसके आत्मसम्मान की रक्षा करता है और उसमें उचित सामाजिक व्यवहार विकसित करने में सहायता करता है।
बडी सिस्टम (Buddy System)
बडी सिस्टम ऐसी व्यवस्था है जिसमें दो व्यक्ति एक इकाई या जोड़ी के रूप में साथ कार्य करते हैं। वे एक-दूसरे की निगरानी करते हैं, आवश्यकता पड़ने पर सहायता देते हैं और निर्धारित कार्य को सुरक्षित तथा सही ढंग से पूरा करने में सहयोग करते हैं।
मेरियम वेबस्टर के अनुसार बडी सिस्टम में दो व्यक्ति एक जोड़े के रूप में कार्य करते हैं और विपरीत परिस्थितियों में एक-दूसरे की सुरक्षा तथा सहायता करते हैं। इसका सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1942 में किया गया।
बडी सिस्टम की कार्यप्रणाली
- विद्यार्थियों को दो-दो की जोड़ी में रखा जाता है। प्रत्येक साथी अपने निर्धारित कार्य को पूरा करता है और आवश्यकता पड़ने पर दूसरे विद्यार्थी की सहायता करता है।
- जब कोई विद्यार्थी किसी कार्य या कौशल में पर्याप्त दक्ष हो जाता है तो वह उस कौशल को अपने बडी अर्थात साथी को सीखने में सहायता कर सकता है।
- बडी सिस्टम का प्रयोग व्यक्तिगत जोड़ी के रूप में अथवा बड़े समूह के भीतर भी किया जा सकता है।
- प्रत्येक साथी का उत्तरदायित्व कक्षा की अवधि, स्थान और गतिविधि के अनुसार बदल सकता है। इसका प्रयोग कक्षा के साथ-साथ पाठ्येतर गतिविधियों में भी किया जा सकता है।
समावेशी कक्षा में शिक्षक की भूमिका
- शिक्षक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकलांग या विशिष्ट आवश्यकता वाला बालक किसी प्रकार के भेदभाव का शिकार न हो।
- कक्षा में बैठने की व्यवस्था और विद्यार्थियों के पारस्परिक व्यवहार की निरन्तर निगरानी करनी चाहिए, जिससे दोनों साथियों के बीच उचित सहयोग बना रहे।
- बडी सिस्टम शारीरिक रूप से अक्षम विद्यार्थियों तथा भाषा सीखने वाले विद्यार्थियों को भी सहयोग प्रदान करने में उपयोगी हो सकता है।
- सामाजिक अधिगम सामाजिक अन्तःक्रिया, अनुभव, प्रोत्साहन और वातावरण से प्रभावित होने वाली अधिगम प्रक्रिया है।
- बालक की जिज्ञासा, तर्क, रुचि और आत्मसम्मान को महत्त्व देने से सामाजिक अधिगम प्रभावी बनता है।
- बडी सिस्टम में दो विद्यार्थी जोड़ी बनाकर एक-दूसरे की निगरानी, सुरक्षा और सहायता करते हैं।
- बडी सिस्टम का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1942 में हुआ और समावेशी कक्षा में यह सहयोग तथा सहभागिता बढ़ाने में उपयोगी है।
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चिन्तनशील शिक्षण एवं बहुसंवेदी शिक्षण
समावेशी कक्षा में बालकों की अधिगम आवश्यकताएँ और सीखने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। चिन्तनशील शिक्षण बालक में स्वतंत्र एवं सृजनात्मक सोच विकसित करता है, जबकि बहुसंवेदी शिक्षण विभिन्न इन्द्रियों के प्रयोग द्वारा अधिगम को अधिक स्पष्ट और प्रभावी बनाता है।
चिन्तनशील शिक्षण (Reflective Teaching)
चिन्तन स्तर का शिक्षण तभी प्रभावी होता है जब विद्यार्थी पहले स्मृति स्तर एवं बोध स्तर का अधिगम कर चुका हो। इस स्तर पर विद्यार्थी केवल तथ्यों को याद नहीं करता, बल्कि समस्या पर विचार करके उसका समाधान खोजने का प्रयास करता है।
मॉरिस एल. बिग्गी के अनुसार चिन्तनशील शिक्षण में कक्षा का ऐसा वातावरण बनाया जाता है जो अधिक सजीव, उत्तेजक, आलोचनात्मक एवं संवेदनशील हो। यह वातावरण विद्यार्थियों को नवीन एवं मौलिक चिन्तन के लिए स्वतंत्रता प्रदान करता है।
चिन्तनशील शिक्षण की प्रमुख विशेषताएँ
- यह शिक्षण शिक्षक की योग्यता, अनुभव तथा कुशलता पर निर्भर करता है। योग्य शिक्षक विद्यार्थियों को स्वतंत्र रूप से ज्ञान प्राप्त करने के अवसर प्रदान करता है।
- इस शिक्षण में विद्यार्थियों के सामने समस्या प्रस्तुत की जाती है और उन्हें स्वयं उसके समाधान का प्रयास करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
- विद्यार्थी परम्परागत ढंग से सोचने के स्थान पर कल्पनात्मक एवं सृजनात्मक ढंग से चिन्तन करता है।
- गहन एवं गंभीर चिन्तन के माध्यम से विद्यार्थी अपना मौलिक दृष्टिकोण विकसित करना सीखता है।
- यह विद्यार्थियों को भविष्य में आने वाली समस्याओं का कल्पना, चिन्तन तथा तर्क के आधार पर समाधान करने योग्य बनाता है।
बहुसंवेदी शिक्षण (Multisensory Teaching)
बहुसंवेदी शिक्षण ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बालक को सीखने के लिए एक से अधिक इन्द्रियों और शिक्षण माध्यमों का प्रयोग करने का अवसर दिया जाता है। इसके द्वारा विभिन्न अवधारणाओं को समझना तथा उनके बीच सम्बन्ध स्थापित करना सरल हो जाता है।
यह शिक्षण केवल पढ़ने और सुनने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बालक को देखने, सुनने, स्पर्श करने तथा अन्य संवेदनाओं के माध्यम से अनुभव प्राप्त करने का अवसर देता है। इसलिए यह विभिन्न आवश्यकता वाले बालकों के शिक्षण में विशेष रूप से उपयोगी है।
बहुसंवेदी शिक्षण का अर्थ एवं आधार
मानव शरीर में विभिन्न ज्ञानवाहक तन्तुओं के माध्यम से सूचनाएँ मस्तिष्क तक पहुँचती हैं। बालक अपनी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त अनुभवों से ज्ञान अर्जित करता है और इसी प्राप्त ज्ञान को संवेदी ज्ञान कहा जाता है।
वार्ड के अनुसार, “शुद्ध संवेदना मनोवैज्ञानिक कल्पना है।” इसी प्रकार जेम्स के अनुसार, “संवेदी अंग ज्ञान मार्ग में पहली वस्तुएँ हैं।”
बहुसंवेदी शिक्षण में प्रयुक्त संवेदनाएँ
- दृष्टि द्वारा देखकर सीखना।
- ध्वनि द्वारा सुनकर सीखना।
- घ्राण द्वारा गन्ध का अनुभव करना।
- स्वाद द्वारा वस्तुओं का अनुभव करना।
- स्पर्श द्वारा आकार, बनावट एवं गुणों को समझना।
- मांसपेशीय एवं शारीरिक क्रियाओं द्वारा अनुभव प्राप्त करना।
बहुसंवेदी शिक्षण की उपयोगिता
- एक ही अवधारणा को अनेक माध्यमों से समझने का अवसर मिलता है, जिससे अधिगम अधिक स्पष्ट होता है।
- बालक अपनी उपलब्ध इन्द्रियों का प्रयोग करके सीख सकता है। इसलिए किसी एक संवेदना में कमी होने पर अन्य संवेदनाएँ अधिगम में सहायता कर सकती हैं।
- विभिन्न तथ्यों और अवधारणाओं के बीच सम्बन्ध स्थापित करने में सहायता मिलती है।
- विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों को उनकी संवेदनात्मक क्षमताओं के अनुसार शिक्षा प्रदान करने में यह विधि उपयोगी होती है।
- चिन्तनशील शिक्षण में विद्यार्थी समस्या पर स्वतंत्र, तार्किक तथा सृजनात्मक ढंग से विचार करता है।
- चिन्तन स्तर के शिक्षण से पहले स्मृति एवं बोध स्तर का अधिगम आवश्यक माना गया है।
- बहुसंवेदी शिक्षण में एक से अधिक इन्द्रियों एवं शिक्षण माध्यमों का प्रयोग किया जाता है।
- दृष्टि, ध्वनि, घ्राण, स्वाद, स्पर्श तथा शारीरिक संवेदनाएँ बहुसंवेदी अधिगम में सहायक होती हैं।
- बहुसंवेदी शिक्षण विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों के लिए अवधारणाओं को सरल और स्पष्ट बनाने में उपयोगी है।
ब्रेल लिपि—लुई ब्रेल का परिचय, संरचना एवं लेखन-पठन तकनीक
ब्रेल लिपि (Braille Script) दृष्टिबाधित व्यक्तियों के पढ़ने और लिखने की एक प्रमुख प्रणाली है। इसका विकास फ्रांस के लुई ब्रेल ने किया था, जो स्वयं दृष्टिहीन थे। ब्रेल में अक्षरों, संख्याओं और अन्य संकेतों को उभरे हुए बिन्दुओं के विभिन्न संयोजनों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
लुई ब्रेल का परिचय
लुई ब्रेल का जन्म 4 जनवरी 1809 को फ्रांस की राजधानी पेरिस से लगभग 40 किमी दूर कुप्रे नामक गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम मोनिक ब्रेल तथा पिता का नाम सायमन ब्रेल था। वे चार भाई-बहनों में सबसे छोटे थे।
तीन वर्ष की आयु में खेलते समय चमड़ा काटने वाले एक नुकीले औजार से उनकी एक आँख में चोट लग गई। बाद में संक्रमण दूसरी आँख तक पहुँच गया और वे पूर्ण रूप से दृष्टिहीन हो गए।
शिक्षा एवं ब्रेल लिपि के विकास की पृष्ठभूमि
- दस वर्ष की आयु में उनके पिता ने उन्हें पेरिस के रॉयल नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड चिल्ड्रेन में प्रवेश दिलाया।
- इसी संस्थान में फ्रांसीसी सेना के अधिकारी कैप्टन चार्ल्स बार्बियर ने सैनिकों द्वारा अँधेरे में पढ़ी जाने वाली “नाइट राइटिंग” अथवा सोनोग्राफी प्रणाली का परिचय दिया।
- बार्बियर की प्रणाली में 12 बिन्दुओं को 6–6 की दो पंक्तियों में रखा जाता था। इसमें विराम-चिह्न, संख्याएँ और गणितीय संकेत पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं थे।
- लुई ब्रेल ने इसी प्रणाली को आधार बनाकर 12 के स्थान पर केवल 6 बिन्दुओं का प्रयोग किया और अक्षरों तथा विभिन्न संकेतों की नई व्यवस्था विकसित की।
- लुई ब्रेल ने जब अपनी लिपि तैयार की तब उनकी आयु लगभग 15 वर्ष थी। इस प्रणाली में विराम-चिह्न, गणितीय संकेत तथा संगीत के संकेत भी लिखे जा सकते थे।
लुई ब्रेल के जीवन से सम्बन्धित प्रमुख तथ्य
- उनके जीवनकाल में ब्रेल लिपि को व्यापक मान्यता प्राप्त नहीं हुई।
- सन् 1851 में उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से खराब होने लगा और 6 जनवरी 1852 को 43 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
- उनकी मृत्यु के लगभग 16 वर्ष बाद, सन् 1868 में रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड यूथ ने ब्रेल लिपि को मान्यता दी।
ब्रेल लिपि की संरचना
ब्रेल दृष्टिबाधित बालकों के पढ़ने और लिखने की एक स्पर्श आधारित प्रणाली है। इसमें उभरे हुए बिन्दुओं के निश्चित संयोजन से अक्षर, संख्या तथा अन्य संकेत बनाए जाते हैं।
6-बिन्दु ब्रेल सेल
- ब्रेल की मूल संरचना 6 बिन्दुओं वाले सेल पर आधारित है। इन बिन्दुओं के विभिन्न संयोजनों से अलग-अलग अक्षर और संकेत बनाए जाते हैं।
- छह बिन्दुओं वाले सेल से 63 विभिन्न चरित्र बनाए जा सकते हैं। इनमें अक्षरों के साथ अन्य आवश्यक संकेत भी सम्मिलित होते हैं।
- यह एक प्रकार की शॉर्टहैंड प्रणाली की तरह कार्य करती है, जिससे कम स्थान में सामग्री लिखी जा सकती है।
ब्रेल पुस्तकों की छपाई में उभरे हुए बिन्दुओं के कारण पुस्तकें सामान्य पुस्तकों की तुलना में अधिक मोटी और भारी होती हैं तथा उन्हें रखने के लिए भी अधिक स्थान की आवश्यकता होती है।
8-बिन्दु ब्रेल सेल
बाद में ब्रेल सेल को 8 बिन्दुओं तक विकसित किया गया। इस व्यवस्था में चार बिन्दु ऊँचाई में और दो बिन्दु चौड़ाई में होते हैं। अतिरिक्त बिन्दु 7 और 8 को नीचे की ओर जोड़ा गया।
- 8-बिन्दु प्रणाली से 256 अक्षर, संख्या और विराम-चिह्न संयोजन सम्भव होते हैं।
- इसका लाभ यह है कि अधिक अक्षरों और संकेतों को एक ही सेल में व्यक्त किया जा सकता है।
ब्रेल पढ़ने की तकनीक
ब्रेल पढ़ने के लिए दृष्टिहीन बालक उँगलियों के स्पर्श से उभरे हुए बिन्दुओं को पहचानता है। इसके लिए उँगलियों को पंक्तियों पर व्यवस्थित रूप से चलाने और बिन्दुओं के विभिन्न संयोजनों को पहचानने का अभ्यास आवश्यक होता है।
- ब्रेल पढ़ते समय उँगलियों की गति और स्पर्श-संवेदनशीलता का विशेष महत्त्व होता है।
- ब्रेल सामग्री को स्लेट के साथ-साथ ब्रेल टाइपराइटर पर भी प्रस्तुत किया जा सकता है।
- 8-बिन्दु ब्रेल प्रणाली विकसित होने से अधिक शब्दों, संख्याओं तथा संकेतों को पढ़ने की सुविधा प्राप्त हुई।
ब्रेल लेखन की तकनीक
ब्रेल लेखन में कागज पर नुकीले स्टाइलस की सहायता से बिन्दुओं के उभरे हुए निशान बनाए जाते हैं। स्लेट और स्टाइलस के अतिरिक्त ब्रेल टाइपराइटर तथा अन्य विशेष उपकरणों का भी प्रयोग किया जाता है।
ब्रेल लेखन के प्रमुख साधन
- ब्रेल स्लेट एवं स्टाइलस— कागज पर बिन्दुओं को अंकित करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं।
- ब्रेल टाइपराइटर— इसकी सहायता से ब्रेल संकेतों को अधिक सुविधाजनक ढंग से लिखा जा सकता है।
- पर्किन्स ब्रेलर— ब्रेल लेखन के लिए प्रयुक्त विशेष प्रकार का लेखन उपकरण है।
- ब्रेल एम्बॉसर— कम्प्यूटर से जुड़कर ब्रेल सामग्री को उभरे हुए रूप में प्रिंट करने के लिए उपयोग किया जाता है।
भारतीय ब्रेल लिपि
भारतीय भाषाओं को ब्रेल पद्धति में लिखने के लिए विकसित समान व्यवस्था को भारती ब्रेल कहा जाता है। लगभग सन् 1951 में भारतीय भाषाओं के लिए एकीकृत ब्रेल व्यवस्था स्वीकार की गई, जिसे श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश ने भी अपनाया।
भारतीय ब्रेल मुख्यतः 6-बिन्दु प्रणाली पर आधारित है। भारत की विभिन्न लिपियों के वर्णों के लिए जहाँ तक सम्भव हो समान ब्रेल संकेतों का प्रयोग किया गया है।
- ब्रेल लिपि का विकास दृष्टिहीन फ्रांसीसी विद्वान लुई ब्रेल ने किया था।
- लुई ब्रेल का जन्म 4 जनवरी 1809 को कुप्रे, फ्रांस में हुआ तथा उनका निधन 6 जनवरी 1852 को हुआ।
- ब्रेल की मूल संरचना 6 उभरे हुए बिन्दुओं के सेल पर आधारित है, जबकि 8-बिन्दु प्रणाली में 256 संयोजन सम्भव हैं।
- ब्रेल को उँगलियों के स्पर्श से पढ़ा जाता है तथा स्लेट-स्टाइलस, ब्रेल टाइपराइटर और ब्रेल एम्बॉसर द्वारा लिखा या मुद्रित किया जा सकता है।
- भारतीय भाषाओं के लिए विकसित एकीकृत व्यवस्था को भारती ब्रेल कहा जाता है।
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ब्रेल लिपि का वर्गीकरण एवं लाभ
ब्रेल लिपि दृष्टिबाधित व्यक्तियों के पढ़ने और लिखने की प्रमुख प्रणाली है। आवश्यकता और लेखन की संक्षिप्तता के आधार पर ब्रेल को अलग-अलग ग्रेडों में विभाजित किया गया है। इसके साथ ही ब्रेल सीखने से विद्यार्थियों को अध्ययन, लेखन और स्मरण में अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।
ब्रेल लिपि का वर्गीकरण
ब्रेल लिपि को मुख्य रूप से तीन ग्रेड में विभाजित किया गया है। इन ग्रेडों में सामान्य अक्षर-लेखन से लेकर संक्षिप्त रूपों तक क्रमिक विकास दिखाई देता है।
1. ग्रेड 1 ब्रेल
ग्रेड 1 में प्रत्येक अक्षर को अलग-अलग ब्रेल संकेत द्वारा लिखा जाता है। जैसे किसी शब्द को लिखते समय उसके सभी अक्षरों को क्रम से ब्रेल में लिखा जाता है।
- इसे ओपन ब्रेल (Open Braille) भी कहा जाता है।
- यह ब्रेल सीखना प्रारम्भ करने वाले विद्यार्थियों के लिए अधिक उपयोगी है।
- इसमें प्रत्येक अक्षर अलग-अलग लिखे जाने के कारण सीखने में भ्रम की सम्भावना कम रहती है।
2. ग्रेड 2 ब्रेल
ग्रेड 2 को कॉन्ट्रैक्टेड ब्रेल (Contracted Braille) भी कहा जाता है। इसमें सामान्य शब्दों या शब्द-समूहों को संक्षिप्त संकेतों के रूप में लिखा जाता है।
- इससे लेखन छोटा और अधिक सुविधाजनक हो जाता है।
- सामान्यतः प्रयुक्त होने वाले शब्दों के लिए निश्चित संक्षिप्त संकेतों का प्रयोग किया जाता है।
- इसका उद्देश्य ब्रेल लेखन को अधिक तेज और कम स्थान लेने वाला बनाना है।
3. ग्रेड 3 ब्रेल
ग्रेड 3 को Total Braille Short Hand अथवा ब्रेल आशुलिपि कहा जाता है। इसमें शब्दों और वाक्यांशों को अत्यधिक संक्षिप्त रूप में लिखा जाता है।
- इसमें पूर्ण शब्दों के स्थान पर छोटे संकेतों अथवा संक्षिप्त रूपों का अधिक प्रयोग किया जाता है।
- यह ब्रेल लेखन की अधिक उन्नत और संक्षिप्त प्रणाली है।
- भारतीय ब्रेल कोड में अधिकतर ओपन ब्रेल का प्रयोग किया जाता है तथा ब्रेल संकोच और संक्षेप के विकास एवं प्रचार का प्रयास किया जा रहा है।
ब्रेल लिपि से लाभ
ब्रेल लिपि दृष्टिबाधित विद्यार्थियों को अध्ययन सामग्री को लिखित रूप में सुरक्षित रखने और स्वतंत्र रूप से पढ़ने-लिखने का अवसर देती है। विशेष रूप से नोट्स बनाने की आदत उनके अध्ययन को अधिक व्यवस्थित बनाती है।
- 1. स्व-अध्ययन में सहायक— ब्रेल में बनाए गए नोट्स विद्यार्थी अपनी पढ़ाई और पुनरावृत्ति के लिए स्वयं उपयोग कर सकते हैं।
- 2. लेखन गति में वृद्धि— नियमित रूप से नोट्स लिखने से ब्रेल लेखन का अभ्यास बढ़ता है और लिखने की गति तेज होती है।
- 3. ध्यान केन्द्रित रहता है— कक्षा में नोट्स बनाने से विद्यार्थी का ध्यान शिक्षण कार्य पर केन्द्रित रहता है।
- 4. स्मरण में सहायता— स्वयं लिखकर तैयार किए गए नोट्स के कारण पढ़ी हुई बातों को बाद में याद करना अधिक सरल हो जाता है।
- 5. परीक्षा की तैयारी में उपयोगी— संक्षिप्त और व्यवस्थित नोट्स परीक्षा से पहले पुनरावृत्ति करने में बहुत उपयोगी होते हैं।
- 6. आत्मनिर्भरता का विकास— ब्रेल के माध्यम से विद्यार्थी स्वयं पढ़ना, लिखना और अपने अध्ययन का कार्य करना सीखता है। इससे उसमें स्वतंत्र रूप से कार्य करने की आदत विकसित होती है।
- ब्रेल लिपि को ग्रेड 1, ग्रेड 2 और ग्रेड 3 में वर्गीकृत किया जाता है।
- ग्रेड 1 को ओपन ब्रेल, ग्रेड 2 को कॉन्ट्रैक्टेड ब्रेल तथा ग्रेड 3 को ब्रेल आशुलिपि कहा जाता है।
- ग्रेड बढ़ने के साथ ब्रेल लेखन अधिक संक्षिप्त होता जाता है।
- ब्रेल नोट्स स्व-अध्ययन, स्मरण, लेखन गति और परीक्षा की तैयारी में सहायक होते हैं।
- ब्रेल दृष्टिबाधित विद्यार्थी में आत्मनिर्भरता और स्वतंत्र अध्ययन की क्षमता विकसित करती है।