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Home Study Material Semester 2 वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा उभरते समाज के प्रमुख मुद्दे–2
Chapter 8 • वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा

उभरते समाज के प्रमुख मुद्दे–2

UP DELED Semester 2 के विषय वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा के इस अध्याय में पर्यावरणीय प्रदूषण एवं पर्यावरण संरक्षण, जल संचयन, ऊर्जा एवं भूमि संरक्षण, ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन, वैश्वीकरण, लैंगिक असमानता और जनसंचार माध्यमों की भूमिका, कारणों, प्रभावों, समस्याओं एवं समाधानात्मक उपायों का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

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Topic 1 पर्यावरण एवं पर्यावरणीय प्रदूषण—अर्थ, कारण, प्रकार एवं रोकथाम

पर्यावरण एवं पर्यावरणीय प्रदूषण—अर्थ, कारण, प्रकार एवं रोकथाम

पर्यावरण का अर्थ

पर्यावरण शब्द दो शब्दों—परि + आवरण से मिलकर बना है। यहाँ परि का अर्थ है—चारों ओर तथा आवरण का अर्थ है—ढका हुआ। अतः हमारे चारों ओर उपस्थित वे सभी प्राकृतिक, जैविक तथा सामाजिक परिस्थितियाँ, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं, पर्यावरण कहलाती हैं।

अंग्रेजी का Environment शब्द भी व्यक्ति या जीव को चारों ओर से घेरे हुए परिवेश की ओर संकेत करता है। मनुष्य जन्म से मृत्यु तक पर्यावरण के बीच ही रहता है और उसका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा वैयक्तिक विकास भी पर्यावरण से प्रभावित होता है।

पर्यावरण की प्रमुख परिभाषाएँ
  • गिसबर्ट के अनुसार— पर्यावरण वह सब कुछ है जो किसी जीव या वस्तु को चारों ओर से घेरे रहता है तथा उसे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।
  • टांसले के अनुसार— उन प्रभावी परिस्थितियों का समुच्चय जिनमें जीव रहते हैं, पर्यावरण कहलाता है।
  • ई. जे. रॉस के अनुसार— पर्यावरण एक बाह्य शक्ति है, जो मनुष्य को प्रभावित करती है।
  • अनास्तासी के अनुसार— मानव के वंशानुक्रम के अतिरिक्त उसे प्रभावित करने वाले सभी बाहरी कारक पर्यावरण के अन्तर्गत आते हैं।
  • एच. फिटिंग के अनुसार— किसी जीव के पारिस्थितिक तत्वों अथवा कारकों के योग को पर्यावरण कहा जाता है।

इस प्रकार पर्यावरण केवल प्राकृतिक वातावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक, जैविक और अन्य परिस्थितियाँ भी सम्मिलित हैं, जो मनुष्य की जीवन-प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।

पर्यावरणीय प्रदूषण का अर्थ

जब किसी बाहरी तत्व या मानवीय क्रिया के कारण पर्यावरण के प्राकृतिक संतुलन में ऐसा अवांछनीय परिवर्तन उत्पन्न हो जाए, जिससे मानव, अन्य जीवों अथवा प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक संसाधनों को हानि पहुँचने लगे, तो उसे पर्यावरणीय प्रदूषण कहते हैं।

सरल शब्दों में, जब वायु, जल, मिट्टी अथवा वातावरण के प्राकृतिक गुणों में हानिकारक परिवर्तन आ जाता है और उनका सामान्य उपयोग प्रभावित होने लगता है, तब वह स्थिति प्रदूषण कहलाती है।

प्रदूषण की प्रमुख परिभाषाएँ

राष्ट्रीय पर्यावरण अनुसंधान परिषद् (NERC, 1976) के अनुसार— मानव क्रियाओं से उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों अथवा ऊर्जा के कारण प्राकृतिक पर्यावरण में होने वाले हानिकारक परिवर्तन प्रदूषण कहलाते हैं।

ओडम के अनुसार— वायु, जल एवं मिट्टी के भौतिक, रासायनिक अथवा जैविक गुणों में ऐसा अवांछनीय परिवर्तन, जिससे मानव जीवन, औद्योगिक प्रक्रियाओं, जीव-जगत या सांस्कृतिक सम्पदा को हानि पहुँचे, प्रदूषण कहलाता है।

प्रदूषक

वे पदार्थ या तत्व जिनकी उपस्थिति से पर्यावरण के प्राकृतिक गुणों में हानिकारक परिवर्तन उत्पन्न हो, प्रदूषक (Pollutants) कहलाते हैं।

मनुष्य द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं के बाद बचने वाले पदार्थ—जैसे कूड़ा-कचरा, रसायन, तेल, गैस आदि—पर्यावरण में पहुँचकर प्रदूषक का कार्य कर सकते हैं।

पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रमुख कारण

1. विश्व की बढ़ती जनसंख्या

तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण आवास, भोजन, जल, ऊर्जा तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों की माँग बढ़ती जाती है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग होने लगता है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होता है।

2. औद्योगिक विकास

तीव्र औद्योगीकरण के कारण अनेक कारखाने स्थापित हुए हैं। इनसे निकलने वाला धुआँ, गैसें तथा अन्य अपशिष्ट पदार्थ वायु, जल और भूमि को प्रदूषित करते हैं। घरेलू कूड़ा-कचरा तथा सड़े-गले पदार्थों का अनुचित निस्तारण भी भूमि प्रदूषण को बढ़ाता है।

पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रकार

प्रदूषित होने वाले प्राकृतिक तथा सामाजिक संसाधनों के आधार पर पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं—

प्रदूषण का प्रकार संक्षिप्त अर्थ
वायु प्रदूषण वायु के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में हानिकारक परिवर्तन।
मृदा प्रदूषण मिट्टी के रासायनिक या भौतिक स्वरूप में ऐसा परिवर्तन जिससे उसकी उत्पादकता प्रभावित हो।
जल प्रदूषण जल में हानिकारक बाहरी पदार्थों के मिलने से उसके प्राकृतिक गुणों का बिगड़ना।
ध्वनि या शोर प्रदूषण अनावश्यक अथवा अत्यधिक तीव्र ध्वनि से मानव स्वास्थ्य एवं सुविधा पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव।
नाभिकीय/विकिरण प्रदूषण रेडियोधर्मी पदार्थों या विकिरण के कारण पर्यावरण में उत्पन्न हानिकारक प्रभाव।
सामाजिक प्रदूषण सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा नैतिक अव्यवस्थाओं से उत्पन्न प्रदूषण।
1. वायु प्रदूषण

जब वायुमण्डल में धूल, धुआँ, गैस, दुर्गन्ध, वाष्प आदि पदार्थ इतनी मात्रा में उपस्थित हो जाएँ कि वायु के प्राकृतिक गुण बदल जाएँ और मानव स्वास्थ्य, जीवन की गुणवत्ता तथा प्राकृतिक संसाधनों को हानि पहुँचने लगे, तो इसे वायु प्रदूषण कहते हैं।

2. मृदा प्रदूषण

मिट्टी में उपस्थित विभिन्न खनिज तत्व उसकी उर्वरता निर्धारित करते हैं। जब मिट्टी के रासायनिक संघटन अथवा भौतिक स्वरूप में प्रतिकूल परिवर्तन होता है और उसकी उत्पादकता कम होने लगती है, तो इसे मृदा प्रदूषण कहते हैं।

3. जल प्रदूषण

जब जल में खनिज, कार्बनिक, अकार्बनिक पदार्थ अथवा गैसें सामान्य सीमा से अधिक मात्रा में मिलकर उसके प्राकृतिक गुणों को बदल देती हैं और वह जीवों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाता है, तो इसे जल प्रदूषण कहते हैं।

4. ध्वनि या शोर प्रदूषण

जब किसी ध्वनि की तीव्रता मानव की सहन-सीमा से अधिक हो जाए और वह अप्रिय अथवा अवांछित लगने लगे, तो ऐसी ध्वनि को शोर कहा जाता है। अत्यधिक एवं अनावश्यक ध्वनि से मानव के स्वास्थ्य, सुविधा और कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, इसे ध्वनि प्रदूषण कहते हैं।

5. नाभिकीय या विकिरण प्रदूषण

नाभिकीय ऊर्जा के प्रयोग के साथ उत्पन्न रेडियोधर्मी पदार्थ तथा विकिरण पर्यावरण और जीव-जगत के लिए अत्यन्त हानिकारक हो सकते हैं। इनसे उत्पन्न प्रदूषण को नाभिकीय अथवा विकिरण प्रदूषण कहा जाता है।

6. सामाजिक प्रदूषण

निर्धनता, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, युद्ध, लूटपाट, डकैती, हत्या तथा अन्य सामाजिक अपराध और नैतिक पतन जैसी स्थितियाँ समाज के वातावरण को दूषित करती हैं। ऐसी स्थितियों को व्यापक अर्थ में सामाजिक प्रदूषण कहा जाता है।

प्रदूषण को रोकने के प्रमुख उपाय

  1. अनाज, दाल, फल, सब्जियों, मसालों तथा अन्य फसलों की उन्नत किस्मों का विकास किया जाए।
  2. पशुपालन को बढ़ावा दिया जाए, जिससे भोजन एवं अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति व्यवस्थित रूप से हो सके।
  3. भूमिगत जल की पुनःस्थापना के लिए जल के दुरुपयोग को रोका जाए।
  4. वनों का पुनःस्थापन तथा अधिकाधिक वृक्षारोपण किया जाए, जिससे मृदा अपरदन तथा पर्यावरणीय असंतुलन कम हो।
  5. मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने के लिए उचित भूमि प्रबन्धन अपनाया जाए।
  6. रासायनिक खादों के स्थान पर जैविक खादों का अधिक प्रयोग किया जाए।
  7. सीवेज तथा अपशिष्ट जल के शुद्धीकरण पर बल दिया जाए, जिससे जल प्रदूषण कम किया जा सके।
  8. घरेलू अपमार्जकों का उचित एवं सीमित उपयोग किया जाए, जिससे मिट्टी एवं जल की गुणवत्ता प्रभावित न हो।
  9. ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभावों के प्रति जन-जागरूकता उत्पन्न की जाए।
  10. जल तथा वायु प्रदूषण को रोकने के लिए स्वच्छ जल एवं स्वच्छ वायु की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास किए जाएँ।

पर्यावरण और मानव का सम्बन्ध

मनुष्य पर्यावरण का एक महत्त्वपूर्ण जैविक घटक है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करता है, परन्तु जब यह उपयोग अत्यधिक या असंतुलित हो जाता है तो पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने लगता है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग तथा प्रदूषण पर नियन्त्रण मानव जीवन और प्रकृति दोनों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पर्यावरण से आशय मनुष्य के चारों ओर उपस्थित प्राकृतिक, जैविक एवं सामाजिक परिस्थितियों से है।
  • पर्यावरण के प्राकृतिक संतुलन में हानिकारक परिवर्तन को पर्यावरणीय प्रदूषण कहा जाता है।
  • प्रदूषण उत्पन्न करने वाले हानिकारक पदार्थों को प्रदूषक कहते हैं।
  • जनसंख्या वृद्धि तथा औद्योगिक विकास पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं।
  • पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रमुख प्रकार हैं—वायु, मृदा, जल, ध्वनि, नाभिकीय/विकिरण तथा सामाजिक प्रदूषण।
  • वृक्षारोपण, जल संरक्षण, जैविक खादों का प्रयोग, अपशिष्ट जल का शुद्धीकरण तथा जन-जागरूकता प्रदूषण नियन्त्रण के प्रमुख उपाय हैं।
  • स्वस्थ मानव जीवन के लिए पर्यावरण का संतुलित एवं प्रदूषण-मुक्त रहना आवश्यक है।
Topic 2 पर्यावरण संरक्षण—अर्थ, उद्देश्य, आवश्यकता, महत्त्व एवं जागरूकता

पर्यावरण संरक्षण—अर्थ, उद्देश्य, आवश्यकता, महत्त्व एवं जागरूकता

पर्यावरण संरक्षण का अर्थ

वर्तमान समय में पर्यावरण प्रदूषण एक विश्वव्यापी समस्या बन चुका है। प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन, वनों की कटाई, बढ़ती जनसंख्या तथा मानवीय हस्तक्षेप के कारण पर्यावरण का प्राकृतिक संतुलन लगातार प्रभावित हो रहा है।

पर्यावरण संरक्षण से आशय पर्यावरणीय प्रदूषण तथा उससे उत्पन्न समस्याओं को समझकर उन्हें कम करने, प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग करने और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए किए जाने वाले प्रयासों से है।

वृक्षारोपण करना, प्रदूषण को रोकना, प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना तथा पर्यावरण में स्वच्छता बनाए रखना पर्यावरण संरक्षण के प्रमुख कार्य हैं।

पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य

पर्यावरण संरक्षण का मुख्य उद्देश्य मानव और प्रकृति के बीच ऐसा संतुलन स्थापित करना है जिससे वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ भावी पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित रह सकें। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

  1. हानिकारक मानवीय गतिविधियों को कम करना— ऐसी गतिविधियों पर नियंत्रण करना जिनसे पर्यावरण की गुणवत्ता को क्षति पहुँचती है।
  2. पर्यावरण प्रदूषण को कम करना— वायु, जल, मिट्टी तथा अन्य प्रकार के प्रदूषण को नियंत्रित करके स्वस्थ पर्यावरण बनाए रखना।
  3. भावी पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण— प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना और उनका उचित एवं संतुलित उपयोग करना।
  4. मानव और प्रकृति में समायोजन स्थापित करना— मानव तथा प्रकृति के बीच संवेदनशील और स्वस्थ सम्बन्ध विकसित करना।
  5. सामाजिक एवं आर्थिक विकास को उन्नत बनाना— ऐसा विकास करना जिससे मानव कल्याण के साथ पर्यावरणीय संतुलन भी सुरक्षित रहे।

पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता एवं महत्त्व

मानव जीवन और पर्यावरण एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। मनुष्य अपने भोजन, जल, वायु, भूमि तथा अन्य आवश्यक संसाधनों के लिए प्रकृति पर निर्भर है। इसलिए पर्यावरण का संरक्षण वास्तव में मानव जीवन और सभ्यता की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

1. पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण

पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न समस्याएँ मानव स्वास्थ्य तथा सभ्यता के विकास के लिए खतरा बनती जा रही हैं। इन समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है।

2. प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग

पर्यावरण संरक्षण लोगों को जल, वन, भूमि तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के उचित और विवेकपूर्ण उपयोग के प्रति जागरूक करता है। इससे संसाधनों का अनावश्यक दोहन कम किया जा सकता है।

3. प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना

प्रकृति में विभिन्न क्रियाएँ संतुलित रूप से चलती रहती हैं, परन्तु मानवीय हस्तक्षेप एवं अत्यधिक संसाधन-दोहन से यह संतुलन बिगड़ता है। इसके परिणामस्वरूप बाढ़, सूखा, भूमि-क्षरण आदि समस्याएँ बढ़ सकती हैं। पर्यावरण संरक्षण इन समस्याओं को नियंत्रित करने में सहायक है।

4. मृदा एवं जल की रक्षा

फसलों की उपज बढ़ाने के लिए रासायनिक पदार्थों का अत्यधिक प्रयोग मिट्टी की उर्वरता को कम कर सकता है। यही पदार्थ जल में मिलकर जल प्रदूषण भी उत्पन्न करते हैं। इनके नियंत्रित उपयोग तथा पर्यावरणीय जागरूकता से मृदा और जल दोनों की रक्षा की जा सकती है।

5. वायु की गुणवत्ता बनाए रखना

औद्योगीकरण के कारण वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य विषैली गैसों की मात्रा बढ़ती है। इससे स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। पर्यावरण संरक्षण तथा नियमित वृक्षारोपण वायु की गुणवत्ता सुधारने में सहायक होते हैं।

6. मानव एवं जैवमण्डल की रक्षा

पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखना मानव के साथ-साथ सम्पूर्ण जीव-जगत की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए भी महत्त्वपूर्ण है।

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता

केवल कानून या सरकारी प्रयासों से पर्यावरण की रक्षा सम्भव नहीं है। इसके लिए जनसामान्य में पर्यावरण के प्रति ज्ञान, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना आवश्यक है।

पर्यावरण जागरूकता बढ़ाने के लिए औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों प्रकार के कार्यक्रम उपयोगी हैं। स्रोत में इसके लिए तीन प्रमुख माध्यम बताए गए हैं—

  1. सतत शिक्षा तथा पर्यावरण जागरूकता
  2. स्कूली शिक्षा तथा पर्यावरण जागरूकता
  3. सामाजिक वानिकी तथा पर्यावरण जागरूकता

1. सतत शिक्षा तथा पर्यावरण जागरूकता

सतत शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को जीवन के विभिन्न चरणों में सीखते रहने के अवसर देना है। पर्यावरण जागरूकता के लिए इसका विशेष महत्त्व है, क्योंकि समाज के ऐसे लोगों तक भी पर्यावरण सम्बन्धी जानकारी पहुँचाई जा सकती है जो नियमित विद्यालयी शिक्षा से जुड़े नहीं हैं।

इस उद्देश्य से विभिन्न प्रकार की शिक्षा व्यवस्थाएँ उपयोगी होती हैं, जैसे—

  • प्रौढ़ शिक्षा (Adult Education)
  • अनौपचारिक शिक्षा (Informal Education)
  • निरौपचारिक शिक्षा (Non-formal Education)
  • दूरस्थ शिक्षा (Distance Education)

प्रौढ़ शिक्षा के माध्यम से निरक्षर स्त्री-पुरुषों को साक्षर बनाने के साथ उनकी कार्यकुशलता विकसित की जाती है। निरौपचारिक शिक्षा के माध्यम से युवाओं को सामान्य ज्ञान, सामाजिक समस्याओं तथा व्यवसाय सम्बन्धी आवश्यक जानकारी दी जा सकती है।

अनौपचारिक शिक्षा घर, परिवार, सामाजिक तथा धार्मिक संस्थाओं आदि के माध्यम से निरन्तर चलती रहती है। इन सभी माध्यमों का उपयोग पर्यावरण सम्बन्धी ज्ञान और जिम्मेदार व्यवहार विकसित करने के लिए किया जा सकता है।

2. स्कूली शिक्षा तथा पर्यावरण जागरूकता

बच्चों में प्रारम्भ से ही पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने में विद्यालय की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को पर्यावरण की समस्याओं, प्राकृतिक संसाधनों के महत्त्व तथा उनके संरक्षण के उपायों से परिचित कराया जा सकता है।

विद्यालयी शिक्षा विद्यार्थियों को केवल पर्यावरण सम्बन्धी जानकारी ही नहीं देती, बल्कि उनमें जिम्मेदार नागरिकता, कर्तव्य-बोध और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी विकसित करती है।

अतः विद्यालय स्तर पर पर्यावरण सम्बन्धी विषयों, गतिविधियों एवं कार्यक्रमों को स्थान देकर विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण की आदत विकसित की जानी चाहिए।

3. सामाजिक वानिकी तथा पर्यावरण जागरूकता

सामाजिक वानिकी का उद्देश्य वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण के कार्यों में जनसामान्य और समुदाय की भागीदारी बढ़ाना है। वर्तमान समय में पर्यावरण प्रदूषण की समस्या के कारण इसका महत्त्व और अधिक बढ़ गया है।

जब स्थानीय समुदाय वृक्षारोपण और वन-संरक्षण से सम्बन्धित गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेता है, तो लोगों में प्रकृति के प्रति भावनात्मक लगाव और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है।

इस प्रकार सामाजिक वानिकी को जनता की, जनता द्वारा और जनता के लिए वानिकी कहा जा सकता है। इसके माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुँचाया जा सकता है।

पर्यावरण जागरूकता में शिक्षा की भूमिका

  • लोगों को पर्यावरणीय समस्याओं एवं उनके कारणों से परिचित कराना।
  • प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की भावना विकसित करना।
  • वृक्षारोपण तथा पर्यावरण संरक्षण के कार्यक्रमों में जनभागीदारी बढ़ाना।
  • बच्चों में प्रारम्भिक अवस्था से ही प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता उत्पन्न करना।
  • समुदाय को प्रदूषण रोकने और पर्यावरण की स्वच्छता बनाए रखने के लिए प्रेरित करना।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पर्यावरण संरक्षण का अर्थ पर्यावरण प्रदूषण को कम करना, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना है।
  • इसके प्रमुख उद्देश्य प्रदूषण कम करना, प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग करना, भावी पीढ़ियों के लिए उन्हें सुरक्षित रखना तथा मानव और प्रकृति के बीच स्वस्थ समायोजन स्थापित करना हैं।
  • पर्यावरण संरक्षण मानव स्वास्थ्य, मृदा, जल, वायु तथा सम्पूर्ण जैवमण्डल की रक्षा के लिए आवश्यक है।
  • पर्यावरण संरक्षण तभी प्रभावी हो सकता है जब लोगों में इसके प्रति पर्याप्त जागरूकता हो।
  • पर्यावरण जागरूकता के प्रमुख माध्यम हैं—सतत शिक्षा, स्कूली शिक्षा और सामाजिक वानिकी।
  • सामाजिक वानिकी में जनभागीदारी द्वारा वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण को बढ़ावा दिया जाता है।
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Topic 3 जल संचयन—भूमिका, जल के स्रोत एवं वर्षा जल संचयन

जल संचयन—भूमिका, जल के स्रोत एवं वर्षा जल संचयन

जल संचयन का अर्थ एवं आवश्यकता

जल पृथ्वी पर जीवन का मूल आधार है। मनुष्य, पशु-पक्षी, वनस्पति तथा अन्य सभी जीवों के जीवन और पोषण के लिए जल आवश्यक है। पीने, कृषि, घरेलू कार्यों तथा अनेक आर्थिक गतिविधियों के लिए भी जल की आवश्यकता होती है।

पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत भाग जल से ढका हुआ है, परन्तु इसमें अधिकांश जल समुद्रों और महासागरों का खारा जल है। मनुष्य के उपयोग के लिए उपलब्ध अलवणीय जल की मात्रा बहुत सीमित है। इसलिए उपलब्ध जल का संरक्षण और उसका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है।

जनसंख्या वृद्धि, कृषि योग्य भूमि की बढ़ती आवश्यकता तथा जल के अत्यधिक उपयोग के कारण अनेक क्षेत्रों में जल संकट बढ़ रहा है। विशेष रूप से शुष्क और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में वर्षा अनियमित होने के कारण जल संरक्षण की आवश्यकता और अधिक हो जाती है।

ऐसी परिस्थितियों में वर्षा से प्राप्त जल को व्यर्थ बहने देने के स्थान पर एकत्र करके भविष्य में उपयोग करना जल संचयन कहलाता है। वर्तमान समय में वर्षा जल संचयन (Rain Water Harvesting) जल संकट के समाधान का एक सरल एवं उपयोगी उपाय है।

जल के प्रमुख स्रोत

पृथ्वी पर जल का प्रमुख प्राकृतिक स्रोत वर्षा है। सूर्य के ताप से पृथ्वी पर उपस्थित जल वाष्पित होकर वायुमण्डल में पहुँचता है। वहाँ संघनन के बाद यह पुनः वर्षा के रूप में पृथ्वी पर आता है। जल के इसी निरन्तर चक्र को जल-चक्र (Water Cycle) कहते हैं।

जल-चक्र के आधार पर पृथ्वी पर उपलब्ध जल को मुख्यतः दो भागों में समझा जा सकता है—

  1. धरातलीय जल (Surface Water)
  2. भूमिगत जल (Ground Water)

1. धरातलीय जल

जो जल पृथ्वी की सतह पर स्थित विभिन्न जल स्रोतों में पाया जाता है, उसे धरातलीय जल कहते हैं। यह जल मानव की दैनिक आवश्यकताओं, कृषि तथा अन्य कार्यों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।

धरातलीय जल के प्रमुख स्रोत हैं—

  • नदियाँ
  • झीलें
  • तालाब
  • कुण्ड एवं अन्य जलाशय

2. भूमिगत जल

वर्षा का कुछ जल भूमि के भीतर रिसकर नीचे की पारगम्य परतों में एकत्र हो जाता है। भूमि के नीचे संचित इसी जल को भूमिगत जल कहते हैं।

भूमि के भीतर रेत और बजरी जैसी छिद्रयुक्त परतें जल को अपने भीतर संचित कर सकती हैं, जबकि चिकनी मिट्टी तथा कम छिद्रयुक्त शैल-परतों से जल का रिसाव अपेक्षाकृत कम होता है।

भूमिगत जल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण जल स्रोत है। इसका उपयोग कुओं, नलकूपों तथा अन्य भूमिगत जल स्रोतों के माध्यम से किया जाता है।

भूमिगत जल स्रोतों के प्रमुख रूप

स्रोत में भूमिगत जल के जल-झरनों को दो प्रमुख रूपों में बताया गया है—

  1. असंकुचित जल झरने— ऐसे जल स्रोत पारगम्य एवं छिद्रयुक्त चट्टानी परतों के मध्य पाए जाते हैं। इनमें वर्षा तथा पिघली हुई बर्फ का जल रिसकर पहुँचता रहता है।
  2. संकुचित जल झरने— ये प्रायः अपारगम्य चट्टानों के बीच स्थित होते हैं। इनमें जल का प्रवाह सीमित स्थानों से होता है और भूमिगत जल धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहता है।

वर्षा जल संचयन

वर्षा के जल को बहकर नष्ट होने देने के बजाय उसे भूमि, जलाशयों, टैंकों, कुओं अथवा अन्य संरचनाओं में एकत्र करके भविष्य के उपयोग हेतु सुरक्षित रखना वर्षा जल संचयन कहलाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा का बहुत-सा जल तेजी से बहकर नदियों और नालों में चला जाता है। यदि इस जल को भूमि में रिसने का अवसर दिया जाए तो इससे भूमिगत जल का स्तर बनाए रखने में सहायता मिलती है।

शहरी क्षेत्रों में सड़कें और पक्के निर्माण भूमि द्वारा जल सोखने की क्षमता कम कर देते हैं। इसलिए छतों तथा अन्य सतहों पर गिरने वाले वर्षा जल को एकत्र करके उसका उपयोग करना विशेष रूप से आवश्यक है।

वर्षा जल संचयन का महत्त्व

  1. भूमिगत जल के क्षय को रोकना— वर्षा जल को भूमि में पहुँचाने से भूमिगत जल भण्डार के लगातार कम होने की समस्या नियंत्रित होती है।
  2. भूजल स्तर को बनाए रखना— वर्षा जल का पुनर्भरण भूमिगत जल स्तर को स्थिर रखने में सहायक होता है।
  3. सतही बहाव को कम करना— वर्षा का जल तेजी से बहकर नष्ट होने के बजाय उपयोग योग्य बनाया जा सकता है।
  4. भविष्य की जल आवश्यकता पूरी करना— संचित जल का उपयोग सूखे अथवा जल की कमी के समय किया जा सकता है।
  5. कृषि एवं घरेलू कार्यों में उपयोग— संचित वर्षा जल सिंचाई, घरेलू कार्यों तथा अन्य आवश्यकताओं में उपयोगी होता है।
  6. भूमिगत जल का पुनर्भरण— जल को भूमि में पहुँचाने से कुओं तथा अन्य भूमिगत जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने में सहायता मिलती है।

वर्षा जल संचयन की विधियाँ

वर्षा जल संचयन की विधियों को सामान्यतः दो भागों में समझा जा सकता है—

  1. प्राचीन विधियाँ
  2. आधुनिक विधियाँ
प्राचीन विधियाँ

प्राचीन समय से ही मानव वर्षा जल को तालाबों, सिंचाई कुओं, जलाशयों तथा अन्य स्थानीय संरचनाओं में एकत्र करता आया है। ग्रामीण क्षेत्रों में ये विधियाँ आज भी उपयोगी हैं।

आधुनिक विधियाँ

आधुनिक जल संचयन विधियों का मुख्य उद्देश्य वर्षा के अधिकतम जल को सुरक्षित करना तथा उसे भूमिगत जल के रूप में पुनर्भरित करना है। स्रोत में निम्न प्रमुख विधियाँ दी गई हैं—

1. नीगोरिम गड्ढा विधि

इस विधि में भूमि को हीरे या अंग्रेजी अक्षर V के आकार में इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि वर्षा का बहता हुआ जल गड्ढों में एकत्र हो सके। यह विधि विशेष रूप से उन स्थानों पर उपयोगी है जहाँ वनस्पति कम तथा भूमि अपेक्षाकृत कठोर हो।

2. सीढ़ीदार खेत विधि

ढालदार अथवा पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर जल के बहाव की गति कम की जाती है। सीढ़ियों के साथ बनाए गए गड्ढों अथवा बाँधों में वर्षा जल एकत्र होता है। इससे भूमि में नमी बनी रहती है और पेड़-पौधों के विकास में सहायता मिलती है।

3. अर्ध चन्द्राकार बाँध विधि

हल्की ढाल वाले क्षेत्रों में अर्ध चन्द्राकार गड्ढे अथवा बाँध बनाए जाते हैं। इनमें वर्षा जल एकत्र होकर धीरे-धीरे भूमि में रिसता है। इस विधि से चारागाह तथा वृक्षों के विकास में सहायता मिलती है।

राजस्थान के अलवर क्षेत्र में जल संकट के समय अर्ध चन्द्राकार संरचनाओं का उपयोग करके वर्षा जल को भूमि में पहुँचाया गया, जिससे भूमिगत जल स्तर बढ़ाने और सूखे कुओं को पुनर्जीवित करने में सहायता मिली।

4. समलम्बाकार बाँध विधि

लम्बी ढाल वाली भूमि में समलम्बाकार गड्ढे या बाँध बनाए जाते हैं। इनमें एकत्र वर्षा जल धीरे-धीरे खेतों की ओर पहुँचता है और सिंचाई में सहायक होता है। यह विधि अर्द्धशुष्क तथा शुष्क क्षेत्रों में उपयोगी मानी जाती है।

5. सीढ़ीदार पथरीले बाँध विधि

पत्थर उपलब्ध क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेतों के किनारों पर पत्थरों के बाँध बनाकर वर्षा जल के बहाव को कम किया जाता है। इससे जल भूमि में अधिक समय तक ठहरता है और खेतों को नमी प्राप्त होती है।

6. फिल्टर लगे खुले कुएँ की विधि

इस विधि में वर्षा जल को फिल्टर से गुजारकर गहरे कुओं में पहुँचाया जाता है। फिल्टर अशुद्धियों को रोकता है तथा अपेक्षाकृत स्वच्छ जल को भूमि के भीतर जाने देता है। यह भूमिगत जल के पुनर्भरण का उपयोगी तरीका है।

7. घरों की छतों पर जल एकत्रीकरण

इस विधि में घर की छत पर गिरने वाले वर्षा जल को पाइप के माध्यम से किसी कुएँ, टैंक या भूमिगत संरचना तक पहुँचाया जाता है। संचित जल को घरेलू कार्यों में उपयोग किया जा सकता है तथा आवश्यकता के अनुसार भूमिगत जल पुनर्भरण के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है।

जल संचयन की उपयोगिता

  • जल की कमी वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त जल उपलब्ध कराता है।
  • भूमिगत जल के स्तर को बनाए रखने में सहायक होता है।
  • वर्षा जल के अनावश्यक बहाव को रोकता है।
  • कृषि और सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराता है।
  • सूखे कुओं और जल स्रोतों के पुनर्भरण में सहायता करता है।
  • भविष्य की जल आवश्यकताओं की पूर्ति में उपयोगी है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पृथ्वी का लगभग 71% भाग जल से ढका है, लेकिन उपयोग योग्य अलवणीय जल की मात्रा सीमित है।
  • जल के दो प्रमुख रूप हैं—धरातलीय जल और भूमिगत जल।
  • वर्षा पृथ्वी पर जल का प्रमुख प्राकृतिक स्रोत है तथा जल का निरन्तर परिसंचरण जल-चक्र कहलाता है।
  • वर्षा जल संचयन का अर्थ वर्षा के जल को एकत्र करके भविष्य के उपयोग तथा भूमिगत जल पुनर्भरण के लिए सुरक्षित रखना है।
  • वर्षा जल संचयन भूजल स्तर बनाए रखने, सतही बहाव कम करने और जल संकट से निपटने में सहायक है।
  • प्रमुख आधुनिक विधियाँ हैं—नीगोरिम गड्ढा, सीढ़ीदार खेत, अर्ध चन्द्राकार बाँध, समलम्बाकार बाँध, सीढ़ीदार पथरीले बाँध, फिल्टरयुक्त खुले कुएँ तथा छतों पर वर्षा जल एकत्रीकरण।
Topic 4 जल प्रबन्धन हेतु सरकारी प्रयास एवं जल संरक्षण हेतु सुझाव

जल प्रबन्धन हेतु सरकारी प्रयास एवं जल संरक्षण हेतु सुझाव

जल प्रबन्धन की आवश्यकता

जल मानव जीवन, कृषि, उद्योग तथा समस्त जीव-जगत के लिए आवश्यक प्राकृतिक संसाधन है। जनसंख्या वृद्धि, जल की बढ़ती माँग, भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन तथा जल स्रोतों के प्रदूषण के कारण जल का उचित प्रबन्धन अत्यन्त आवश्यक हो गया है।

जल प्रबन्धन का उद्देश्य उपलब्ध जल संसाधनों का उचित उपयोग, संरक्षण, समान वितरण तथा भविष्य के लिए सुरक्षित संचयन करना है। भारत में जल संरक्षण और जल संसाधनों के सुव्यवस्थित प्रबन्धन के लिए सरकार द्वारा समय-समय पर विभिन्न नीतियाँ, योजनाएँ तथा संस्थागत व्यवस्थाएँ की गई हैं।

जल प्रबन्धन हेतु प्रमुख सरकारी प्रयास

1. राष्ट्रीय जल नीति, 1987

भारत में जल संसाधनों के उचित उपयोग और संरक्षण के लिए सन् 1987 में राष्ट्रीय जल नीति बनाई गई। इस नीति का उद्देश्य जल स्रोतों का उचित दोहन, जल का समान वितरण तथा जल संरक्षण से सम्बन्धित योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन करना था।

इस नीति के अन्तर्गत जल संरक्षण तथा नदी एवं जलाशय संरक्षण से सम्बन्धित अनेक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया गया।

  • गंगा कार्य योजना — 1985
  • यमुना कार्य योजना
  • राष्ट्रीय नदी संरक्षण कार्य योजना — 1995
  • राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम

इन कार्यक्रमों का मूल उद्देश्य जल स्रोतों की गुणवत्ता बनाए रखना तथा प्रदूषण को कम करके जल संसाधनों का संरक्षण करना था।

2. राष्ट्रीय जल नीति, 2002

जल प्रबन्धन की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए 1 अप्रैल 2002 को राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद द्वारा राष्ट्रीय जल नीति, 2002 को स्वीकृति प्रदान की गई।

इस नीति में जल संरक्षण की परम्परागत विधियों के साथ-साथ जल की माँग के प्रबन्धन को भी महत्त्व दिया गया। इसके अतिरिक्त जल की मात्रा और गुणवत्ता तथा उसके पर्यावरणीय पक्षों के बीच समन्वय स्थापित करने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य केवल अधिक जल उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि उपलब्ध जल का ऐसा प्रबन्धन करना था जिससे उसकी गुणवत्ता सुरक्षित रहे और वर्तमान तथा भावी आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके।

3. राष्ट्रीय जल बोर्ड

भारत सरकार द्वारा सितम्बर 1990 में राष्ट्रीय जल बोर्ड का गठन किया गया। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय जल नीति के क्रियान्वयन की प्रगति की समीक्षा करना तथा जल संसाधनों से सम्बन्धित आवश्यक सूचनाएँ राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद को उपलब्ध कराना था।

राष्ट्रीय जल बोर्ड का गठन जल संसाधन मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में किया गया। इस प्रकार यह संस्था जल नीति तथा जल प्रबन्धन के बीच समन्वय स्थापित करने में सहायक है।

जल संरक्षण हेतु सुझाव

जल संरक्षण केवल सरकारी नीतियों से सम्भव नहीं है। इसके लिए समाज, शिक्षण संस्थाओं तथा प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है। जल संकट और जल संरक्षण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए निम्न उपाय उपयोगी हैं—

1. अधिक से अधिक वृक्षारोपण

वृक्ष जल-चक्र और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अधिक से अधिक वृक्ष लगाने से मिट्टी में नमी बनी रहती है, जल का अनावश्यक बहाव कम होता है तथा भूमिगत जल पुनर्भरण में सहायता मिलती है।

2. जल संरक्षण सम्बन्धी कार्यशालाओं का आयोजन

विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में समय-समय पर जल संकट, जल संरक्षण तथा जल के विवेकपूर्ण उपयोग से सम्बन्धित राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय कार्यशालाएँ, संगोष्ठियाँ तथा जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।

इससे विद्यार्थियों में प्रारम्भ से ही जल के महत्त्व तथा उसके संरक्षण के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित की जा सकती है।

3. रेडियो एवं टेलीविजन द्वारा जागरूकता

शैक्षिक रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से जल संकट तथा जल संरक्षण के उपायों से सम्बन्धित कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाना चाहिए। जनसंचार माध्यमों द्वारा बड़ी संख्या में लोगों को कम समय में जल बचाने के प्रभावी उपायों से परिचित कराया जा सकता है।

4. वर्षा जल संचयन को प्रोत्साहन

जल संकट को कम करने तथा भूमिगत जल की स्थिति सुधारने के लिए वर्षा जल संचयन को अधिक से अधिक प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। घरों, विद्यालयों, सार्वजनिक भवनों तथा अन्य स्थानों पर वर्षा के जल को एकत्र करके उसका उपयोग किया जा सकता है।

वर्षा जल संचयन से वर्षा का जल व्यर्थ बहने से बचता है तथा भूमिगत जल के पुनर्भरण में सहायता मिलती है।

जल संरक्षण में शिक्षा की भूमिका

जल संरक्षण की आदत केवल नियमों से नहीं बल्कि शिक्षा और जागरूकता से विकसित होती है। विद्यार्थियों को जल के सीमित स्वरूप, जल संकट तथा जल बचाने की विधियों की जानकारी देकर उन्हें उत्तरदायी नागरिक बनाया जा सकता है।

  • जल का अनावश्यक उपयोग न करना।
  • वर्षा जल संचयन को अपनाना।
  • जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाना।
  • वृक्षारोपण तथा पर्यावरण संरक्षण में भाग लेना।
  • जल संरक्षण के प्रति समाज में जागरूकता फैलाना।

सरकारी प्रयास और जनभागीदारी का सम्बन्ध

सरकार जल संरक्षण के लिए नीतियाँ, योजनाएँ और संस्थाएँ स्थापित कर सकती है, किन्तु उनका वास्तविक लाभ तभी प्राप्त होता है जब नागरिक भी उनका पालन करें। अतः जल संकट का स्थायी समाधान सरकारी प्रयास, शिक्षा, जन-जागरूकता और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के संयुक्त प्रयास से ही सम्भव है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • राष्ट्रीय जल नीति, 1987 का उद्देश्य जल स्रोतों का उचित दोहन, समान वितरण तथा जल संरक्षण था।
  • इसके अन्तर्गत गंगा कार्य योजना, यमुना कार्य योजना, राष्ट्रीय नदी संरक्षण कार्य योजना तथा राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम जैसे प्रयास किए गए।
  • राष्ट्रीय जल नीति, 2002 को 1 अप्रैल 2002 को राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद द्वारा स्वीकृति दी गई।
  • राष्ट्रीय जल बोर्ड का गठन सितम्बर 1990 में राष्ट्रीय जल नीति के क्रियान्वयन की समीक्षा हेतु किया गया।
  • जल संरक्षण के प्रमुख सुझाव हैं—वृक्षारोपण, जागरूकता कार्यक्रम, रेडियो-टेलीविजन द्वारा प्रचार तथा वर्षा जल संचयन को प्रोत्साहन।
  • जल संरक्षण के लिए सरकारी प्रयासों के साथ-साथ जनभागीदारी और शिक्षा भी आवश्यक है।
Topic 5 ऊर्जा संरक्षण—आवश्यकता एवं प्रमुख उपाय

ऊर्जा संरक्षण—आवश्यकता एवं प्रमुख उपाय

ऊर्जा संरक्षण का अर्थ

ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र तथा मानव जीवन की लगभग सभी गतिविधियों का आधार है। भोजन-श्रृंखला, कृषि, उद्योग, परिवहन, घरेलू कार्य और तकनीकी विकास सभी ऊर्जा पर निर्भर करते हैं। मानव सभ्यता के विकास के साथ ऊर्जा की आवश्यकता भी लगातार बढ़ती गई है।

ऊर्जा संरक्षण से आशय उपलब्ध ऊर्जा संसाधनों का इस प्रकार विवेकपूर्ण, मितव्ययी और नियोजित उपयोग करना है कि ऊर्जा की अनावश्यक बर्बादी कम हो, सीमित संसाधन अधिक समय तक सुरक्षित रहें तथा पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव भी घटे।

ऊर्जा संरक्षण की आवश्यकता

मानव ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कोयला, पेट्रोलियम और अन्य पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया है। इन संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण ऊर्जा संकट तथा पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

ऊर्जा उत्पादन और उपयोग से वायु तथा जल प्रदूषण भी बढ़ता है। इसलिए पृथ्वी के विशाल पारिस्थितिक तंत्र की सक्रियता और निरन्तरता बनाए रखने तथा ऊर्जा संकट जैसी समस्याओं से बचने के लिए ऊर्जा का संरक्षण अत्यन्त आवश्यक है।

ऊर्जा संरक्षण की प्रमुख आवश्यकताएँ
  • सीमित पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों को शीघ्र समाप्त होने से बचाना।
  • भविष्य की पीढ़ियों के लिए ऊर्जा संसाधनों को सुरक्षित रखना।
  • ऊर्जा संकट की समस्या को कम करना।
  • वायु एवं जल प्रदूषण को नियंत्रित करना।
  • ऊर्जा के अनावश्यक अपव्यय को रोकना।
  • वैकल्पिक एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का अधिक उपयोग करना।
  • पारिस्थितिक संतुलन एवं पर्यावरण की निरन्तरता बनाए रखना।

ऊर्जा संरक्षण के प्रमुख उपाय

1. पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों पर कम निर्भरता

कोयला, पेट्रोलियम तथा अन्य खनिज तेल जैसे पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों के भण्डार सीमित हैं। इसलिए उनका प्रयोग आवश्यकता के अनुसार और अत्यन्त सावधानी से किया जाना चाहिए।

जहाँ सम्भव हो वहाँ पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों के स्थान पर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग किया जाना चाहिए। इससे ऊर्जा के सीमित भण्डारों पर दबाव कम होगा और प्रदूषण में भी कमी आएगी।

2. वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना

पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों की सीमितता के कारण मानव का झुकाव वैकल्पिक और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ा है। ये स्रोत अपेक्षाकृत स्वच्छ होते हैं तथा इनमें निरन्तर ऊर्जा प्रदान करने की क्षमता होती है।

प्रमुख वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत हैं—

  • सौर ऊर्जा (Solar Energy)
  • जल ऊर्जा (Hydro Energy)
  • पवन ऊर्जा (Wind Energy)
  • जैव ऊर्जा (Bio Energy)
  • भूतापीय ऊर्जा (Geo-Thermal Energy)
  • ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy)

इन स्रोतों के उपयोग से जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम की जा सकती है तथा प्रदूषण और ऊर्जा संकट दोनों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

3. पेट्रो फसलों का विकास

पेट्रोलियम जैसे खनिज तेलों की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए ऐसी फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा सकता है जिनसे वैकल्पिक ईंधन प्राप्त हो सके। स्रोत में ऐसी फसलों को पेट्रो फसलें (Petro Crops) कहा गया है।

इनके विकास से पारम्परिक पेट्रोलियम संसाधनों पर निर्भरता को कुछ सीमा तक कम किया जा सकता है।

4. अपशिष्टीकरण में कमी

ऊर्जा संसाधनों को प्राप्त करने की प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में अपशिष्ट पदार्थ उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए कोयले की खुदाई करते समय अनुपयोगी चट्टानों और अन्य पदार्थों के बड़े ढेर एकत्र हो जाते हैं, जिनसे भूमि और पर्यावरण दोनों प्रभावित होते हैं।

इसी प्रकार विभिन्न अपशिष्ट पदार्थ और गैसें वर्षा जल के साथ मिलकर जल प्रदूषण को भी बढ़ा सकती हैं। इसलिए ऊर्जा संसाधनों के निष्कर्षण, भण्डारण और परिवहन की ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे अपव्यय और अपशिष्ट न्यूनतम हों।

5. ऊर्जा संसाधनों का विवेकपूर्ण प्रयोग

ऊर्जा संसाधनों का उपयोग केवल उन कार्यों में किया जाना चाहिए जहाँ उनकी वास्तव में आवश्यकता हो और जहाँ कोई उपयुक्त विकल्प उपलब्ध न हो।

प्राकृतिक ऊर्जा संसाधनों को बचाने के लिए सिंचाई, कारखानों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में पेट्रोलियम ईंधनों के स्थान पर जल, विद्युत, बायोगैस तथा सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों का प्रयोग बढ़ाया जा सकता है।

सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरणों और मशीनों को बढ़ावा देकर पेट्रोल तथा डीजल की खपत कम की जा सकती है। विशेष रूप से दूरस्थ और अविकसित क्षेत्रों में ऐसे विकल्प उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

6. ऊर्जा संसाधनों का गुणात्मक सुधार

कई स्थानों पर निम्न गुणवत्ता वाले कोयले या अन्य ऊर्जा संसाधनों को आर्थिक दृष्टि से अनुपयोगी मानकर छोड़ दिया जाता है। यदि वैज्ञानिक तकनीकों द्वारा उनकी गुणवत्ता में सुधार किया जाए तो उनका भी उपयोग ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए निम्न श्रेणी के कोयले से भी उचित तकनीक द्वारा विद्युत उत्पादन सम्भव है। इस प्रकार उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करके ऊर्जा संरक्षण को प्रभावी बनाया जा सकता है।

ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण

ऊर्जा संरक्षण केवल ऊर्जा बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा सम्बन्ध पर्यावरण संरक्षण से भी है। कोयला और पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग से प्रदूषण बढ़ता है, जबकि सौर, पवन, जल और जैव ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोत अपेक्षाकृत पर्यावरण-अनुकूल होते हैं।

इसलिए ऊर्जा संरक्षण का सर्वोत्तम मार्ग है—ऊर्जा की अनावश्यक खपत को कम करना, उपलब्ध संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना तथा स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अधिक से अधिक अपनाना।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • ऊर्जा संरक्षण का अर्थ ऊर्जा संसाधनों का विवेकपूर्ण, मितव्ययी और नियोजित उपयोग करना है।
  • ऊर्जा संरक्षण सीमित संसाधनों की रक्षा, ऊर्जा संकट कम करने तथा पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए आवश्यक है।
  • पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों—कोयला, पेट्रोलियम आदि—पर निर्भरता कम करनी चाहिए।
  • सौर, जल, पवन, जैव, भूतापीय तथा ज्वारीय ऊर्जा प्रमुख वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत हैं।
  • ऊर्जा संरक्षण के प्रमुख उपाय हैं—वैकल्पिक ऊर्जा का प्रयोग, अपशिष्ट कम करना, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग तथा उनकी गुणवत्ता में सुधार करना।
  • ऊर्जा संरक्षण से पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास दोनों को बढ़ावा मिलता है।
Topic 6 भूमि संरक्षण—भारतीय भूमि की समस्याएँ एवं संरक्षण के उपाय

भूमि संरक्षण—भारतीय भूमि की समस्याएँ एवं संरक्षण के उपाय

भूमि संरक्षण का अर्थ

भूमि मानव जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक है। भोजन, आवास, कृषि, पशुपालन तथा अनेक आर्थिक गतिविधियाँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भूमि पर निर्भर हैं। मानव की मूल आवश्यकताओं का बहुत बड़ा भाग भूमि से ही पूरा होता है।

बढ़ती जनसंख्या तथा भूमि पर लगातार बढ़ते दबाव के कारण कृषि योग्य भूमि, वनभूमि और अन्य प्राकृतिक क्षेत्रों का अत्यधिक उपयोग किया जा रहा है। मानवीय गतिविधियों के कारण भूमि का निम्नीकरण बढ़ रहा है तथा मृदा अपरदन जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाएँ भी अधिक हानिकारक होती जा रही हैं।

अतः भूमि संरक्षण से आशय भूमि की उर्वरता, संरचना और उत्पादक क्षमता को बनाए रखते हुए उसे कटाव, क्षरण, जलभराव, मरुस्थलीकरण तथा अन्य हानिकारक प्रभावों से सुरक्षित रखने के प्रयासों से है।

भूमि संरक्षण की आवश्यकता

  • कृषि योग्य भूमि की उत्पादकता बनाए रखने के लिए।
  • मृदा अपरदन एवं भूमि-क्षरण को रोकने के लिए।
  • भूमि की उर्वरता बनाए रखने के लिए।
  • मरुस्थलीकरण एवं बंजर भूमि की वृद्धि को रोकने के लिए।
  • वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के लिए भूमि संसाधन सुरक्षित रखने के लिए।
  • कृषि उत्पादन तथा पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए।

भारतीय भूमि की प्रमुख समस्याएँ

भारतीय भूमि अनेक प्राकृतिक तथा मानवीय समस्याओं से प्रभावित है। स्रोत में इसकी प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित बताई गई हैं—

  1. मृदा अपरदन— जल तथा वायु के प्रभाव से मिट्टी की उपजाऊ ऊपरी परत का बह जाना या उड़ जाना मृदा अपरदन कहलाता है। इससे भूमि की उत्पादन क्षमता कम हो जाती है।
  2. उर्वरता में कमी— लगातार एक ही प्रकार की खेती, अनुचित कृषि पद्धतियाँ तथा पोषक तत्वों के असंतुलित उपयोग के कारण मिट्टी की उर्वरता घट सकती है।
  3. मरुस्थलीकरण— भूमि का धीरे-धीरे शुष्क, अनुपजाऊ तथा मरुस्थल जैसी स्थिति में परिवर्तित होना मरुस्थलीकरण कहलाता है।
  4. जल मग्नता— भूमि पर जल के लंबे समय तक जमा रहने से उसकी संरचना और कृषि उपयोगिता प्रभावित होती है।
  5. लवणीयता एवं क्षारीयता— मिट्टी में लवण अथवा क्षारीय तत्वों की मात्रा बढ़ने से भूमि की उर्वरता और फसल उत्पादन क्षमता कम हो जाती है।
  6. रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अधिक प्रयोग— इनका अत्यधिक उपयोग मिट्टी के प्राकृतिक गुणों एवं उर्वरता को प्रभावित कर सकता है।
  7. बंजर भूमि— ऐसी भूमि जिस पर कृषि या वनस्पति का विकास अत्यन्त कम या असम्भव हो जाए, उत्पादन की दृष्टि से अनुपयोगी बन जाती है।
  8. नगरीकरण एवं परिवहन विकास— नगरों, सड़कों, रेलमार्गों तथा अन्य निर्माण कार्यों के विस्तार से कृषि योग्य भूमि पर दबाव बढ़ता है।
  9. मानवीय हस्तक्षेप— वनों की कटाई, अनुचित कृषि, अत्यधिक पशुचारण तथा भूमि का अविवेकपूर्ण उपयोग भूमि-क्षरण की समस्या को बढ़ाते हैं।

भूमि संरक्षण के प्रमुख उपाय

1. वृक्षारोपण को बढ़ावा देना

भूमि के कटाव और उससे होने वाली क्षति के बारे में जनसामान्य को जागरूक करना आवश्यक है। भूमि को अपरदन से बचाने के लिए अधिक से अधिक वृक्ष लगाए जाने चाहिए।

वृक्षों की जड़ें मिट्टी को बाँधकर रखती हैं, जिससे मिट्टी का बहाव कम होता है तथा भूमि की उत्पादकता बनाए रखने में सहायता मिलती है।

2. भूमि का समुचित उपयोग

भूमि का उपयोग उसकी प्रकृति एवं क्षमता के अनुसार किया जाना चाहिए। जिस भूमि पर कृषि करना उपयुक्त हो वहाँ कृषि की जाए, जहाँ वन विकसित किए जा सकते हों वहाँ वन लगाए जाएँ तथा जो भूमि घास या चरागाह के लिए उपयुक्त हो उसे उसी रूप में विकसित किया जाए।

इस प्रकार भूमि की प्रकृति के विपरीत उपयोग को रोककर उसकी उर्वरता और उपयोगिता को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

3. फसल चक्र अपनाना

भूमि की उर्वरता बनाए रखने के लिए एक ही फसल को बार-बार बोने के स्थान पर फसलों को बदल-बदलकर बोना चाहिए। इसे फसल चक्र कहा जाता है।

फसल चक्र अपनाने से मिट्टी के विभिन्न पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग होता है तथा किसी एक पोषक तत्व की अत्यधिक कमी होने की सम्भावना घटती है।

4. उचित जल निकासी की व्यवस्था

जल का भूमि पर अधिक समय तक जमा रहना भूमि की उर्वरता को हानि पहुँचा सकता है। जल जमाव सड़क, रेलवे लाइन, नहरों तथा बाढ़ नियंत्रण सम्बन्धी संरचनाओं के कारण भी उत्पन्न हो सकता है।

ऐसी स्थिति में जल के निकास के लिए सुव्यवस्थित नालियों तथा आवश्यक पुलों आदि का निर्माण किया जाना चाहिए, ताकि अतिरिक्त जल आसानी से बाहर निकल सके।

5. ढालू भूमि पर समोच्च कृषि

ढलानदार भूमि पर तेजी से बहता जल मिट्टी को काटकर छोटी धाराएँ तथा अवनालिकाएँ बना सकता है। इसे रोकने के लिए ढाल के समानान्तर खेती करने के बजाय समोच्च रेखाओं के अनुसार जुताई की जानी चाहिए।

समोच्च जुताई तथा समोच्च पट्टियों में फसलें बोने से जल का वेग कम होता है और उपजाऊ मिट्टी का बहाव रोका जा सकता है।

6. उचित कृषि एवं नियंत्रित पशुचारण

मैदानी भागों में अनुचित कृषि तथा लगातार पशुओं के चरने से भूमि की उर्वरता घटती है और मिट्टी का कटाव बढ़ता है। इसलिए वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाना तथा अत्यधिक पशुचारण पर नियंत्रण करना आवश्यक है।

7. परती भूमि पर आवरण फसलें उगाना

यदि किसी भूमि को कुछ समय के लिए परती छोड़ा जाए तो उसे पूरी तरह खाली नहीं रखना चाहिए। ऐसी भूमि पर सनाई, ढैंचा जैसी आवरण या हरित खाद वाली फसलें उगाई जा सकती हैं।

इन फसलों से भूमि को आवरण मिलता है, मिट्टी का कटाव कम होता है तथा बाद में इनके जैविक पदार्थ मिट्टी में मिलकर खाद बनाने में सहायता करते हैं।

8. स्थानान्तरणशील कृषि को स्थायी कृषि में बदलना

स्थानान्तरणशील कृषि भूमि और वनों पर अधिक दबाव डाल सकती है। ऐसे कृषकों को आवश्यक साधन एवं सुविधाएँ उपलब्ध कराकर स्थायी कृषि अपनाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

स्थायी कृषि से भूमि का सुनियोजित उपयोग सम्भव होता है और बार-बार नई भूमि को साफ करने की आवश्यकता कम होती है।

9. सीढ़ीनुमा खेती एवं बाँध निर्माण

पहाड़ी तथा ढालू क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि करनी चाहिए। इससे वर्षा जल का प्रवाह धीमा होता है और मिट्टी के कटाव में कमी आती है।

ढालों पर छोटे बाँध बनाकर अवनालिकाओं के विकास को रोका जा सकता है। साथ ही घास तथा अन्य वनस्पतियाँ उगाने से मिट्टी को बाँधने और भूमि संरक्षण में सहायता मिलती है।

भूमि संरक्षण और कृषि उत्पादन

भूमि संरक्षण का उद्देश्य केवल मिट्टी को कटाव से बचाना नहीं है, बल्कि उसकी उर्वरता और उत्पादन क्षमता को लंबे समय तक बनाए रखना भी है। वृक्षारोपण, फसल चक्र, उचित जल निकासी, समोच्च कृषि तथा वैज्ञानिक भूमि उपयोग अपनाकर भूमि के संरक्षण के साथ कृषि उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है।

इस प्रकार भूमि का विवेकपूर्ण उपयोग वर्तमान समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साथ-साथ भावी पीढ़ियों के लिए भी इस महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन को सुरक्षित रखता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • भूमि संरक्षण का अर्थ भूमि की उर्वरता, संरचना और उत्पादन क्षमता को सुरक्षित रखना है।
  • भारतीय भूमि की प्रमुख समस्याएँ हैं—मृदा अपरदन, उर्वरता में कमी, मरुस्थलीकरण, जल मग्नता, लवणीयता एवं क्षारीयता, बंजर भूमि तथा मानवीय हस्तक्षेप।
  • रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग तथा नगरीकरण भी भूमि की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
  • भूमि संरक्षण के प्रमुख उपाय हैं—वृक्षारोपण, भूमि का समुचित उपयोग, फसल चक्र, उचित जल निकासी और समोच्च कृषि।
  • अत्यधिक पशुचारण पर नियंत्रण, आवरण फसलें, स्थायी कृषि तथा सीढ़ीनुमा खेती भी प्रभावी उपाय हैं।
  • भूमि संरक्षण से मृदा अपरदन कम होता है, उर्वरता सुरक्षित रहती है तथा कृषि उत्पादन बढ़ाने में सहायता मिलती है।
Topic 7 ग्लोबल वार्मिंग—अर्थ, कारण, दुष्प्रभाव एवं नियंत्रण के उपाय

ग्लोबल वार्मिंग—अर्थ, कारण, दुष्प्रभाव एवं नियंत्रण के उपाय

ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ

पृथ्वी के औसत तापमान में दीर्घकालीन वृद्धि को ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) या वैश्विक तापन कहा जाता है। इसका मुख्य सम्बन्ध वायुमण्डल में उन गैसों की बढ़ती मात्रा से है जो पृथ्वी से निकलने वाली ऊष्मा को रोककर वातावरण में बनाए रखती हैं।

पृथ्वी पर सूर्य से ऊर्जा प्राप्त होती है। पृथ्वी इस ऊर्जा का कुछ भाग अवशोषित करती है और शेष ऊष्मा को पुनः अंतरिक्ष की ओर विकिरित करती है। वायुमण्डल में उपस्थित कुछ गैसें इस ऊष्मा के एक भाग को रोक लेती हैं। इस प्राकृतिक प्रक्रिया को ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) कहा जाता है।

प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है, परन्तु जब मानवीय गतिविधियों के कारण ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है तो अधिक ऊष्मा वायुमण्डल में रुकने लगती है और पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ता है। यही स्थिति ग्लोबल वार्मिंग को जन्म देती है।

प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें

ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देने वाली प्रमुख गैसें निम्नलिखित हैं—

  • कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)
  • मीथेन (CH4)
  • नाइट्रस ऑक्साइड (N2O)
  • जलवाष्प
  • क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) तथा अन्य औद्योगिक गैसें

इनमें कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन विशेष रूप से जीवाश्म ईंधनों के दहन और औद्योगिक गतिविधियों से बढ़ता है। मीथेन का उत्सर्जन जैविक पदार्थों के अपघटन, कृषि तथा पशुपालन जैसी गतिविधियों से भी हो सकता है।

ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख कारण

1. औद्योगीकरण

कारखानों, ताप विद्युत गृहों तथा अन्य औद्योगिक प्रक्रियाओं में कोयला, पेट्रोलियम और अन्य जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड एवं अन्य गैसें वायुमण्डल में पहुँचती हैं। इससे ग्रीनहाउस प्रभाव बढ़ता है।

2. जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक दहन

कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे ईंधनों का परिवहन, विद्युत उत्पादन तथा उद्योगों में व्यापक उपयोग ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख मानवीय कारण है।

3. तापीय विद्युत उत्पादन

कोयला तथा अन्य जीवाश्म ईंधनों पर आधारित तापीय विद्युत गृहों से कार्बन डाइऑक्साइड सहित अनेक गैसों का उत्सर्जन होता है। इससे वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ती है।

4. वनों का विनाश

वन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बड़े पैमाने पर वनों की कटाई होने से एक ओर कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने वाली वनस्पति कम होती है और दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होता है।

5. नगरीकरण एवं आधुनिक उत्पादन व्यवस्था

तेजी से बढ़ता नगरीकरण, वाहनों की संख्या, ऊर्जा की माँग तथा आधुनिक उत्पादन प्रणालियाँ ऊर्जा उपभोग और ईंधन दहन को बढ़ाती हैं। इनके परिणामस्वरूप ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ता है।

6. मीथेन का उत्सर्जन

दलदली क्षेत्रों, धान की खेती, जैविक पदार्थों के अपघटन तथा पशुओं से मीथेन गैस निकलती है। मीथेन भी एक प्रभावी ग्रीनहाउस गैस है और तापमान वृद्धि में योगदान देती है।

7. औद्योगिक गैसें

कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं से CFC तथा अन्य कृत्रिम गैसों का उत्सर्जन होता है। ऐसी गैसें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वायुमण्डलीय संतुलन को प्रभावित कर वैश्विक तापन की समस्या को बढ़ाती हैं।

ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव

ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं रहता। यह जलवायु, जल संसाधन, कृषि, जैव-विविधता और मानव स्वास्थ्य पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

  1. जलवायु एवं मौसमी दशाओं में परिवर्तन— तापमान वृद्धि के कारण वर्षा, मौसम तथा अन्य जलवायवीय दशाओं के सामान्य स्वरूप में परिवर्तन हो सकता है।
  2. सूखे की समस्या में वृद्धि— तापमान बढ़ने और वर्षा की अनियमितता से कई क्षेत्रों में सूखे की स्थिति अधिक गंभीर हो सकती है।
  3. चक्रवाती दशाओं में परिवर्तन— महासागरीय तापमान और वायुमण्डलीय परिस्थितियों में बदलाव से चक्रवाती गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
  4. वायुमण्डलीय परिसंचरण में परिवर्तन— तापमान में असमान वृद्धि वायु प्रवाह और वायुमण्डलीय परिसंचरण के सामान्य स्वरूप को प्रभावित करती है।
  5. समुद्री जलस्तर में वृद्धि— तापमान बढ़ने से हिमनद और ध्रुवीय बर्फ पिघलती है तथा समुद्री जल के तापीय प्रसार के कारण समुद्र का स्तर बढ़ सकता है।
  6. हिमनदों एवं बर्फ का पिघलना— पर्वतीय एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ सकती है।
  7. तटीय क्षेत्रों में जलभराव— समुद्री जलस्तर बढ़ने से द्वीपों तथा समुद्रतटीय क्षेत्रों में बाढ़ एवं जलभराव का खतरा बढ़ सकता है।
  8. मानव विस्थापन— समुद्री जलस्तर वृद्धि, बाढ़, सूखा और अन्य पर्यावरणीय परिवर्तनों के कारण लोगों को अपने निवास स्थान छोड़ने पड़ सकते हैं।
  9. मृदा की उर्वरता में कमी एवं मरुस्थलीकरण— अधिक तापमान तथा अनियमित वर्षा भूमि की गुणवत्ता और उर्वरता को प्रभावित कर सकती है।
  10. कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव— तापमान और वर्षा में परिवर्तन से फसलों की उत्पादकता तथा कृषि चक्र प्रभावित हो सकते हैं।
  11. खाद्य संकट एवं जैव-विविधता में ह्रास— कृषि उत्पादन और प्राकृतिक आवास प्रभावित होने से खाद्य उपलब्धता तथा अनेक जीव-प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो सकता है।
  12. जैव संसाधनों पर प्रभाव— पारिस्थितिक तंत्र में परिवर्तन होने से वनस्पतियों, जीवों और अन्य जैव संसाधनों की उपलब्धता प्रभावित होती है।
  13. स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ— बढ़ते तापमान तथा पर्यावरणीय परिवर्तन के कारण गर्मी से सम्बन्धित रोगों और कुछ संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
  14. अतिवृष्टि, अनावृष्टि एवं बाढ़— वर्षा के स्वरूप में असंतुलन के कारण कहीं अत्यधिक वर्षा तो कहीं वर्षा की कमी जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के उपाय

ग्लोबल वार्मिंग एक वैश्विक समस्या है, इसलिए इसके नियंत्रण के लिए व्यक्तिगत, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय—तीनों स्तरों पर प्रयास आवश्यक हैं।

1. ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी

कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन तथा अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना ग्लोबल वार्मिंग को कम करने का सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय है। उद्योगों, ऊर्जा उत्पादन और परिवहन में कम प्रदूषण वाली तकनीकों को अपनाया जाना चाहिए।

2. जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना

कोयला, पेट्रोलियम तथा अन्य जीवाश्म ईंधनों की खपत कम करके सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा तथा अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।

3. वनों का संरक्षण एवं वृक्षारोपण

वन वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं। इसलिए वनों की कटाई रोकना, वन क्षेत्र बढ़ाना तथा व्यापक वृक्षारोपण करना ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने में उपयोगी है।

4. ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग

ऊर्जा की अनावश्यक खपत कम करनी चाहिए तथा ऊर्जा दक्ष उपकरणों और तकनीकों को बढ़ावा देना चाहिए। इससे ईंधन की खपत और उससे होने वाला गैसीय उत्सर्जन दोनों कम किए जा सकते हैं।

5. पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन तकनीक

उद्योगों और उत्पादन प्रणालियों को ऐसी तकनीकों की ओर बढ़ाना चाहिए जिनसे कम प्रदूषण हो और ऊर्जा का बेहतर उपयोग किया जा सके।

6. जन-जागरूकता

ग्लोबल वार्मिंग के कारणों और दुष्प्रभावों के बारे में लोगों को जागरूक करना आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा बचत और वृक्षारोपण को जन-आन्दोलन के रूप में अपनाने से इसके नियंत्रण में सहायता मिल सकती है।

ग्लोबल वार्मिंग नियंत्रण के अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास

ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए विश्व स्तर पर समय-समय पर विभिन्न सम्मेलन और समझौते किए गए। स्रोत में प्रमुख प्रयास निम्नलिखित बताए गए हैं—

  • स्टॉकहोम सम्मेलन, 1972— वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण को संगठित रूप से महत्त्व देने वाले प्रमुख प्रारम्भिक प्रयासों में से एक।
  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)— वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं पर अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाने के उद्देश्य से स्थापित कार्यक्रम।
  • वियना सम्मेलन, 1985— ओजोन परत की सुरक्षा के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास।
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, 1987— ओजोन क्षरण करने वाले पदार्थों के उत्पादन और उपयोग को नियंत्रित करने की दिशा में अन्तर्राष्ट्रीय समझौता।
  • पृथ्वी शिखर सम्मेलन/रियो सम्मेलन, 1992— पर्यावरण संरक्षण, जैव-विविधता, जलवायु परिवर्तन तथा सतत विकास से सम्बन्धित अनेक अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों को आगे बढ़ाया गया।
  • क्योटो प्रोटोकॉल, 1997— ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए देशों द्वारा सामूहिक प्रयास करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय समझौता।

ग्रीनहाउस प्रभाव और ग्लोबल वार्मिंग में सम्बन्ध

ग्रीनहाउस प्रभाव स्वयं एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसके कारण पृथ्वी का तापमान जीवन के अनुकूल बना रहता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब मानवीय गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा असामान्य रूप से बढ़ जाती है।

अधिक ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी द्वारा छोड़ी जाने वाली अधिक ऊष्मा को वायुमण्डल में रोकती हैं। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ने लगता है और यही बढ़ा हुआ प्रभाव ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख आधार बनता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • ग्लोबल वार्मिंग पृथ्वी के औसत तापमान में दीर्घकालीन वृद्धि है।
  • इसका प्रमुख कारण वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा है।
  • प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें CO2, CH4, N2O, जलवाष्प तथा कुछ औद्योगिक गैसें हैं।
  • औद्योगीकरण, जीवाश्म ईंधनों का दहन, तापीय विद्युत उत्पादन, वनों की कटाई तथा नगरीकरण ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख कारण हैं।
  • इसके प्रमुख दुष्प्रभाव हैं—जलवायु परिवर्तन, हिमनदों का पिघलना, समुद्री जलस्तर में वृद्धि, सूखा, बाढ़, कृषि पर प्रभाव तथा जैव-विविधता में कमी।
  • इसके नियंत्रण के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना, नवीकरणीय ऊर्जा अपनाना, वृक्षारोपण, ऊर्जा संरक्षण और जन-जागरूकता आवश्यक है।
  • स्टॉकहोम सम्मेलन, वियना सम्मेलन, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, रियो सम्मेलन तथा क्योटो प्रोटोकॉल पर्यावरण संरक्षण से जुड़े महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास हैं।
Topic 8 जलवायु परिवर्तन—अर्थ, कारण, प्रभाव, नियंत्रण के उपाय एवं IPCC रिपोर्ट

जलवायु परिवर्तन—अर्थ, कारण, प्रभाव, नियंत्रण के उपाय एवं IPCC रिपोर्ट

जलवायु परिवर्तन का अर्थ

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से आशय किसी क्षेत्र अथवा सम्पूर्ण पृथ्वी की औसत मौसमी दशाओं के स्वरूप में होने वाले दीर्घकालीन परिवर्तन से है। यह परिवर्तन केवल कुछ दिनों या महीनों के मौसम में होने वाला बदलाव नहीं होता, बल्कि वर्षों से लेकर बहुत लम्बी अवधि तक दिखाई देने वाला परिवर्तन होता है।

तापमान, वर्षा, वायु, आर्द्रता तथा अन्य मौसमी दशाओं में लम्बे समय तक होने वाले बदलाव जलवायु परिवर्तन के अन्तर्गत आते हैं।

जलवायु परिवर्तन का सम्बन्ध जैविक क्रियाओं, सौर विकिरण में भिन्नता, ज्वालामुखीय विस्फोट जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं से भी हो सकता है, किन्तु वर्तमान समय में मानवीय गतिविधियाँ इसके प्रमुख कारणों में सम्मिलित हैं।

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं, परन्तु दोनों का अर्थ बिल्कुल समान नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग मुख्य रूप से पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि को दर्शाता है, जबकि जलवायु परिवर्तन में तापमान के साथ-साथ वर्षा, सूखा, बाढ़, चक्रवात तथा अन्य मौसमी दशाओं में होने वाले दीर्घकालीन परिवर्तन भी सम्मिलित होते हैं।

वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ने से पृथ्वी का तापमान बढ़ता है और यही बढ़ता हुआ तापमान व्यापक रूप से जलवायु के स्वरूप को प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन का अध्ययन

वैज्ञानिक जलवायु के अतीत और वर्तमान स्वरूप का अध्ययन करके भविष्य में होने वाले सम्भावित परिवर्तनों का अनुमान लगाते हैं। इसके लिए विभिन्न प्रकार के जलवायु अभिलेखों और वैज्ञानिक मॉडलों का उपयोग किया जाता है।

इन अभिलेखों में पृथ्वी के पुराने तापमान, हिमनदों, बर्फ की परतों, जीव-जन्तुओं के अभिलेख तथा अन्य प्राकृतिक संकेतों का अध्ययन किया जाता है।

जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण

1. जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग

कोयला, पेट्रोलियम तथा अन्य जीवाश्म ईंधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग जलवायु परिवर्तन का प्रमुख मानवीय कारण है। इनके दहन से कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य ग्रीनहाउस गैसें वायुमण्डल में बढ़ती हैं।

2. औद्योगीकरण

उद्योगों, कारखानों और तापीय विद्युत उत्पादन के विस्तार से ऊर्जा की खपत और प्रदूषक गैसों का उत्सर्जन बढ़ता है। इससे पृथ्वी का तापमान तथा जलवायु दोनों प्रभावित होते हैं।

3. वनों की अत्यधिक कटाई

वन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं। वनों की अन्धाधुन्ध कटाई से वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है और प्राकृतिक संतुलन प्रभावित होता है।

4. जनसंख्या वृद्धि

जनसंख्या बढ़ने के साथ भोजन, आवास, परिवहन, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों की माँग भी बढ़ती है। इसके कारण भूमि, जल, वन तथा ऊर्जा संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।

5. जल का अत्यधिक उपयोग

जल संसाधनों के अविवेकपूर्ण एवं अत्यधिक उपयोग से प्राकृतिक जल-चक्र और पर्यावरणीय व्यवस्था प्रभावित होती है। इससे जल संकट और जलवायु सम्बन्धी समस्याएँ अधिक गंभीर हो सकती हैं।

6. वायुमण्डलीय संतुलन में परिवर्तन

वायुमण्डल की प्राकृतिक संरचना में परिवर्तन, प्रदूषक गैसों की वृद्धि तथा पर्यावरणीय सुरक्षा से सम्बन्धित प्राकृतिक प्रणालियों का कमजोर होना भी जलवायु परिवर्तन को बढ़ाता है।

7. जैव-विविधता में कमी

जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों की संख्या कम होने से पारिस्थितिक तंत्र का प्राकृतिक संतुलन प्रभावित होता है। यह परिवर्तन भी जलवायु और पर्यावरणीय स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

जलवायु परिवर्तन के प्रमुख प्रभाव

1. पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि

ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा के कारण पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि हो रही है। तापमान बढ़ने से अन्य अनेक पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं।

2. हिमनदों का पिघलना

तापमान बढ़ने से पर्वतीय और ध्रुवीय क्षेत्रों के हिमनदों तथा बर्फ के पिघलने की गति बढ़ती है।

3. समुद्री जलस्तर में वृद्धि

हिमनदों के पिघलने और तापमान वृद्धि के परिणामस्वरूप समुद्री जलस्तर बढ़ सकता है, जिससे तटीय क्षेत्रों तथा द्वीपों के लिए खतरा उत्पन्न होता है।

4. वर्षा के स्वरूप में परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का समय, मात्रा और वितरण प्रभावित हो सकता है। कहीं अत्यधिक वर्षा तथा कहीं वर्षा की कमी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

5. सूखा एवं बाढ़

वर्षा की अनियमितता के कारण सूखा, बाढ़ तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ सकती है।

6. जल संकट

हिमनदों के पिघलने, वर्षा में अनियमितता तथा जल संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से भविष्य में स्वच्छ जल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

7. प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास

जलवायु परिवर्तन से भूमि, जल, वन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। संसाधनों के अनियंत्रित दोहन से भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति कठिन हो सकती है।

8. जैव-विविधता पर प्रभाव

तापमान और प्राकृतिक आवासों में परिवर्तन के कारण अनेक वनस्पतियों एवं जीव-जन्तुओं के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो सकता है।

9. मानव जीवन पर प्रभाव

जल संकट, बाढ़, सूखा, समुद्री जलस्तर में वृद्धि तथा प्राकृतिक संसाधनों की कमी से मानव विस्थापन, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक-आर्थिक संकट उत्पन्न हो सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन को कम करने के उपाय

जलवायु परिवर्तन को पूर्णतः रोकना कठिन है, किन्तु उचित प्रयासों द्वारा इसकी गति और दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है।

1. ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी

कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य प्रदूषक गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना आवश्यक है। औद्योगिक एवं ऊर्जा उत्पादन सम्बन्धी प्रक्रियाओं में ऐसी तकनीकों को अपनाया जाना चाहिए जिनसे कम प्रदूषण हो।

2. विकसित देशों द्वारा उत्सर्जन में कटौती

जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए विकसित देशों से अपने कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी करने की अपेक्षा की गई है, क्योंकि औद्योगिक गतिविधियों और ऊर्जा उपयोग में उनका योगदान अधिक रहा है।

3. विकासशील देशों में स्वच्छ विकास

विकासशील देशों को भी औद्योगिक विकास के साथ उत्सर्जन कम करने के प्रयास करने चाहिए। इसके लिए विकसित देशों से तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग की आवश्यकता होती है।

4. नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा

जीवाश्म ईंधनों के स्थान पर सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा तथा अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का अधिक उपयोग किया जाना चाहिए।

इससे कोयला और पेट्रोलियम पर निर्भरता कम होती है तथा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी घटाया जा सकता है।

5. वैकल्पिक ऊर्जा साधनों का विकास

ऐसे ऊर्जा साधनों और तकनीकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जिनसे कम कार्बन उत्सर्जन हो तथा ऊर्जा की बढ़ती आवश्यकता भी पूरी की जा सके।

6. व्यापक जन-जागरूकता

जलवायु परिवर्तन की समस्या केवल सरकार या वैज्ञानिक संस्थाओं के प्रयासों से हल नहीं हो सकती। इसके लिए लोगों का सहयोग एवं समर्थन आवश्यक है।

ऊर्जा बचत, वृक्षारोपण, प्रदूषण में कमी और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के प्रति व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए।

जलवायु परिवर्तन पर IPCC रिपोर्ट

IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change) संयुक्त राष्ट्र से सम्बन्धित वैज्ञानिक निकाय है, जो जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक आधार, उसके प्रभावों तथा सम्भावित उपायों का आकलन करता है।

27 सितम्बर 2013 को IPCC की पाँचवीं आकलन रिपोर्ट का सारांश स्टॉकहोम में जारी किया गया और इसकी पूरी रिपोर्ट 30 सितम्बर 2013 को जारी हुई।

रिपोर्ट में वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर मानव गतिविधियों को वर्तमान तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के लिए प्रमुख रूप से उत्तरदायी माना गया।

IPCC रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
  • पृथ्वी के तापमान में वृद्धि पर मानवीय गतिविधियों का स्पष्ट प्रभाव है।
  • गर्म हवाओं तथा अत्यधिक तापमान की घटनाओं में वृद्धि हो सकती है।
  • बाढ़ और सूखे जैसी चरम मौसमी घटनाओं की पुनरावृत्ति बढ़ने की आशंका है।
  • हिमनदों और बर्फ के पिघलने की गति तेज हो रही है।
  • समुद्री जलस्तर बढ़ने की समस्या अधिक गंभीर हो सकती है।
  • वर्ष 1951 से 2010 के बीच तापमान में हुई वृद्धि में मानवीय गतिविधियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी गई।
  • इस आकलन को अनेक देशों के वैज्ञानिकों के विचार-विमर्श के बाद अन्तिम रूप दिया गया।

जलवायु परिवर्तन से निपटने की आवश्यकता

जलवायु परिवर्तन किसी एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण विश्व से सम्बन्धित समस्या है। इसलिए इसके समाधान के लिए देशों के बीच सहयोग, प्रदूषण नियंत्रण, ऊर्जा संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा आवश्यक है।

यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए तो जल, भूमि, वन, जैव-विविधता और मानव जीवन पर दबाव लगातार बढ़ता जाएगा। अतः पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन नियंत्रण को विकास की योजनाओं का आवश्यक भाग बनाया जाना चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जलवायु परिवर्तन औसत मौसमी दशाओं में होने वाला दीर्घकालीन परिवर्तन है।
  • जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, औद्योगीकरण, वनों की कटाई, जनसंख्या वृद्धि तथा संसाधनों का अत्यधिक दोहन इसके प्रमुख मानवीय कारण हैं।
  • इसके प्रमुख प्रभाव हैं—तापमान वृद्धि, हिमनदों का पिघलना, समुद्री जलस्तर में वृद्धि, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, जल संकट और जैव-विविधता का ह्रास।
  • ग्रीनहाउस गैसों में कमी, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ तकनीक और जन-जागरूकता जलवायु परिवर्तन को कम करने के प्रमुख उपाय हैं।
  • IPCC की पाँचवीं आकलन रिपोर्ट का सारांश 27 सितम्बर 2013 तथा पूरी रिपोर्ट 30 सितम्बर 2013 को जारी हुई।
  • IPCC रिपोर्ट में वर्तमान तापमान वृद्धि एवं जलवायु परिवर्तन में मानवीय गतिविधियों की प्रमुख भूमिका स्वीकार की गई है।
Topic 9 वैश्वीकरण—अर्थ, उद्देश्य एवं विशेषताएँ

वैश्वीकरण—अर्थ, उद्देश्य एवं विशेषताएँ

वैश्वीकरण का अर्थ

वैश्वीकरण (Globalisation) से आशय विश्व के विभिन्न देशों, समाजों और अर्थव्यवस्थाओं के बीच बढ़ते हुए सम्बन्ध, सहयोग, आदान-प्रदान और परस्पर निर्भरता की प्रक्रिया से है।

इस प्रक्रिया में भौगोलिक दूरियों तथा राष्ट्रीय सीमाओं का महत्त्व अपेक्षाकृत कम हो जाता है और वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी, श्रम, तकनीक, सूचनाओं तथा विचारों का आदान-प्रदान विश्व स्तर पर बढ़ने लगता है।

सामाजिक दृष्टि से वैश्वीकरण विश्व के विभिन्न समाजों को एक-दूसरे से जोड़ने की प्रक्रिया है। आर्थिक दृष्टि से यह व्यापार, उदारीकरण, निजीकरण और आर्थिक गतिविधियों के विस्तार से सम्बन्धित है, जबकि राजनीतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से यह राष्ट्रों के बीच सहयोग, सम्पर्क और विचारों के आदान-प्रदान को बढ़ाता है।

वैश्वीकरण शब्द को वर्तमान व्यापक अर्थ में प्रयोग करने वालों में एन्थनी गिडेन्स (Anthony Giddens) का नाम प्रमुख रूप से उल्लेखित किया गया है।

वैश्वीकरण की प्रमुख परिभाषाएँ

रॉबर्टसन के अनुसार

वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें विश्व की दूरियाँ कम होती प्रतीत होती हैं और सम्पूर्ण विश्व के लोगों में आपसी चेतना, निकटता तथा सम्बन्ध बढ़ते हैं।

प्रो. के. मनस्वी के अनुसार

उदारीकरण, आर्थिक विकास तथा निजीकरण के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाली विश्वस्तरीय प्रक्रिया को वैश्वीकरण कहा जाता है।

प्रो. टी. के. राघवन के अनुसार

जब विश्व की अर्थव्यवस्था का विकास होता है और सामाजिक विकास में राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण की सीमा कम होती जाती है, तब इस प्रक्रिया को वैश्वीकरण कहा जाता है।

श्रीमती आर. के. शर्मा के अनुसार

वैज्ञानिक प्रगति, आर्थिक समानता तथा मानव कल्याण के लिए किए जाने वाले विश्वस्तरीय प्रयासों को भूमण्डलीकरण कहा जाता है।

प्रो. एस. के. दुबे के अनुसार

वैश्वीकरण के अन्तर्गत वे शैक्षिक, सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियाँ आती हैं जिनका सम्बन्ध मानव कल्याण से होता है।

वैश्वीकरण का व्यापक स्वरूप

वैश्वीकरण केवल आर्थिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों को प्रभावित करता है। इसमें पूँजी, श्रम, उत्पादन, तकनीक और सूचना का प्रवाह बढ़ता है तथा विभिन्न देशों के बीच आपसी सम्बन्ध अधिक घनिष्ठ होते जाते हैं।

वैश्वीकरण के कारण राष्ट्रों के बीच सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, उत्पादन क्षमता और तकनीकी विकास को बढ़ावा मिलता है। इस प्रकार यह विश्व को अधिक परस्पर जुड़ी हुई व्यवस्था में बदलने की प्रक्रिया है।

वैश्वीकरण के उद्देश्य

वैश्वीकरण का उद्देश्य केवल व्यापार बढ़ाना नहीं है, बल्कि विश्व स्तर पर आर्थिक विकास, मानव कल्याण, समानता, सहयोग तथा संतुलित विकास को बढ़ावा देना भी है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

1. आर्थिक समानता स्थापित करना

वैश्वीकरण का प्रमुख उद्देश्य आर्थिक असमानता को कम करना तथा विकासशील देशों को आर्थिक विकास के अवसर उपलब्ध कराना है। आर्थिक सुधारों और अन्तरराष्ट्रीय सहायता के माध्यम से गरीब देशों की स्थिति सुधारने का प्रयास किया जाता है।

2. विकास के लिए नई साझेदारी

विभिन्न देशों, संस्थाओं तथा संगठनों के बीच सहयोग और साझेदारी स्थापित करके विकास की नई संभावनाएँ उत्पन्न करना वैश्वीकरण का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

अन्तरराष्ट्रीय सहयोग से विकासशील देशों को तकनीक, पूँजी, ज्ञान और अन्य संसाधनों का लाभ प्राप्त हो सकता है।

3. गरीबी उन्मूलन

गरीबी से जूझ रहे देशों को आर्थिक सहायता, विकास योजनाएँ और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराकर गरीबी कम करना वैश्वीकरण का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा विकासशील और गरीब देशों को सहायता प्रदान करना इसी दिशा का एक उदाहरण है।

4. उदारीकरण को बढ़ावा देना

वैश्वीकरण आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्रों में अनावश्यक प्रतिबन्धों को कम करके अधिक खुले वातावरण को प्रोत्साहित करता है। इससे देशों के बीच वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी और विचारों के आदान-प्रदान में वृद्धि होती है।

5. सरकारी नियंत्रण की सीमितता

वैश्वीकरण के अन्तर्गत अनेक आर्थिक गतिविधियों में प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण को सीमित किया जाता है और निजी तथा अन्तरराष्ट्रीय भागीदारी के लिए अवसर बढ़ाए जाते हैं।

सरकार की भूमिका मुख्यतः आवश्यक नियमन, सुरक्षा और सार्वजनिक हितों की रक्षा तक सीमित रखने पर बल दिया जाता है।

6. संतुलित विकास

विकास किसी एक देश, क्षेत्र या वर्ग तक सीमित न रहे, बल्कि उसका लाभ व्यापक समाज को मिले—यह वैश्वीकरण का एक प्रमुख उद्देश्य है।

संतुलित विकास के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों तथा देशों के बीच विकास की असमानताओं को कम करने का प्रयास किया जाता है।

7. जरूरतमंद देशों को आर्थिक सहायता

विश्व के किसी देश को विकास के लिए आर्थिक अथवा अन्य सहायता की आवश्यकता होने पर दूसरे देशों द्वारा सहयोग प्रदान करना वैश्वीकरण की भावना को दर्शाता है।

एक देश द्वारा दूसरे देश के विकास में आर्थिक सहायता देना अन्तरराष्ट्रीय सहयोग का व्यावहारिक स्वरूप है।

8. विश्वबन्धुत्व की भावना का विकास

वैश्वीकरण का उद्देश्य विभिन्न देशों के लोगों में यह भावना विकसित करना है कि विश्व की समस्याएँ केवल किसी एक राष्ट्र की समस्याएँ नहीं हैं।

प्राकृतिक आपदाओं, पर्यावरणीय संकटों तथा अन्य कठिन परिस्थितियों में विभिन्न देशों का एक-दूसरे की सहायता करना विश्वबन्धुत्व की भावना को मजबूत करता है।

9. अन्तरराष्ट्रीय सहयोग

राष्ट्रों के बीच आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा मानवीय सहयोग बढ़ाना वैश्वीकरण का प्रमुख उद्देश्य है। आपसी सहयोग द्वारा ऐसी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है जिन्हें कोई एक देश अकेले हल नहीं कर सकता।

वैश्वीकरण की प्रमुख विशेषताएँ

वैश्वीकरण में देशों के बीच वस्तुओं, मानव संसाधनों, सूचनाओं, तकनीक तथा पूँजी का अपेक्षाकृत खुला आदान-प्रदान होता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1. पारस्परिक निर्भरता

वैश्वीकरण के कारण कोई भी राष्ट्र पूर्णतः अलग रहकर विकास नहीं कर सकता। देश व्यापार, तकनीक, संसाधन, शिक्षा तथा अन्य आवश्यकताओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं।

भूकम्प, बाढ़ और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय विभिन्न देशों द्वारा एक-दूसरे की सहायता करना इसी पारस्परिक निर्भरता और सहयोग को दर्शाता है।

2. विकसित देशों का प्रभाव

वैश्वीकरण एक बहुआयामी प्रक्रिया है जिसका प्रभाव आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक तथा तकनीकी क्षेत्रों में दिखाई देता है।

विकसित देशों की उन्नत अर्थव्यवस्था, तकनीक तथा संसाधनों का प्रभाव विकासशील देशों पर पड़ता है और उन्हें अपनी आर्थिक व्यवस्था में सुधार तथा आधुनिक तकनीकों को अपनाने के अवसर प्राप्त होते हैं।

3. मानवता का विकास

वैश्वीकरण भौगोलिक और सामाजिक दूरियों को कम करता है तथा विभिन्न संस्कृतियों, जीवन-शैलियों और विचारों के बीच आदान-प्रदान को बढ़ावा देता है।

इससे मानव कल्याण, मानवीय सहयोग और विश्व समुदाय की भावना को बढ़ावा मिलता है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी मानव कल्याण के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

4. तकनीकी शिक्षा एवं विकास

वैश्वीकरण के कारण तकनीकी ज्ञान और शिक्षा का आदान-प्रदान तेजी से होता है। विभिन्न देशों के सहयोग से नई तकनीकों का विकास और उनका प्रसार सम्भव होता है।

वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं के समाधान में तकनीकी ज्ञान का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार तकनीकी विकास वैश्वीकरण को गति देता है और वैश्वीकरण तकनीकी विकास को बढ़ावा देता है।

वैश्वीकरण का सार

इस प्रकार वैश्वीकरण ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विश्व के विभिन्न राष्ट्र आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और तकनीकी रूप से एक-दूसरे के अधिक निकट आते हैं। इसका मूल आधार परस्पर निर्भरता, सहयोग, मानव कल्याण, तकनीकी विकास और विश्वबन्धुत्व है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वैश्वीकरण विश्व के देशों के बीच बढ़ते सम्बन्ध, सहयोग, आदान-प्रदान और परस्पर निर्भरता की प्रक्रिया है।
  • यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया भी है।
  • वैश्वीकरण के प्रमुख उद्देश्य हैं—आर्थिक समानता, गरीबी उन्मूलन, उदारीकरण, संतुलित विकास, विश्वबन्धुत्व और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग।
  • यह देशों के बीच पूँजी, श्रम, तकनीक, सूचना, वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान को बढ़ाता है।
  • वैश्वीकरण की प्रमुख विशेषताएँ हैं—पारस्परिक निर्भरता, विकसित देशों का प्रभाव, मानवता का विकास तथा तकनीकी शिक्षा का विकास।
  • वैश्वीकरण का अन्तिम उद्देश्य विश्व स्तर पर विकास, सहयोग और मानव कल्याण की भावना को मजबूत करना है।
Topic 10 वैश्वीकरण—आवश्यकता, महत्त्व, कारक, लाभ एवं सीमाएँ

वैश्वीकरण—आवश्यकता, महत्त्व, कारक, लाभ एवं सीमाएँ

वैश्वीकरण की आवश्यकता एवं महत्त्व

वर्तमान समय में कोई भी देश पूर्णतः आत्मनिर्भर नहीं है। प्रत्येक राष्ट्र को अपनी आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक अथवा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी न किसी रूप में दूसरे देशों के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। देशों के बीच इसी बढ़ती पारस्परिक निर्भरता ने वैश्वीकरण को महत्त्वपूर्ण बना दिया है।

वैश्वीकरण के माध्यम से व्यापार, तकनीक, सूचना, पूँजी, ज्ञान तथा संसाधनों का आदान-प्रदान बढ़ता है। इससे राष्ट्रों को अपनी समस्याओं के समाधान, आर्थिक विकास तथा विश्वस्तरीय सहयोग के नए अवसर प्राप्त होते हैं।

1. विश्व स्तर पर व्यापार का विकास

विश्व का कोई भी देश अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति अकेले नहीं कर सकता। इसलिए विभिन्न देश वस्तुओं और सेवाओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।

वैश्वीकरण व्यापार को राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर निकालकर अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाता है। इससे प्रतियोगिता बढ़ती है, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है तथा विश्व अर्थव्यवस्था अधिक खुली बनती है।

2. विश्व की समस्याओं के समाधान में सहयोग

आज बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, भ्रष्टाचार तथा अन्य अनेक समस्याएँ केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए विभिन्न देशों के अनुभवों, संसाधनों और नीतियों से सीखना आवश्यक है।

वैश्वीकरण राष्ट्रों को एक-दूसरे के सफल प्रयासों का अध्ययन करने तथा आवश्यकता के अनुसार उन्हें अपनाने का अवसर प्रदान करता है।

3. राष्ट्रीय विकास की आवश्यकता

किसी राष्ट्र की आर्थिक मजबूती उसके समग्र विकास का प्रमुख आधार है। वैश्वीकरण के माध्यम से व्यापार, निवेश, तकनीक तथा अन्तरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ता है, जिससे राष्ट्रीय विकास को गति मिल सकती है।

राष्ट्रों का परस्पर सहयोग राष्ट्रीय एकता और विकास को मजबूत करने में भी सहायक होता है।

4. विश्व नागरिकता की भावना

आधुनिक युग में विज्ञान और तकनीक ने विश्व को बहुत निकट ला दिया है। वैश्वीकरण व्यक्ति को केवल अपने देश की समस्याओं तक सीमित न रहकर सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के बारे में सोचने की दृष्टि प्रदान करता है।

इससे विश्वबन्धुत्व और विश्व नागरिकता की भावना विकसित होती है तथा मानव व्यापक दृष्टिकोण के साथ विश्व की समस्याओं को समझने लगता है।

5. जनसंचार के माध्यम से राष्ट्रीय गतिविधियों का ज्ञान

जनसंचार के साधनों के विकास से एक देश की आर्थिक, सामाजिक और विकास सम्बन्धी गतिविधियों की जानकारी दूसरे देशों तक शीघ्र पहुँचती है।

इन माध्यमों से राष्ट्र एक-दूसरे की उपलब्धियों, आवश्यकताओं और समस्याओं को समझते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर सहयोग प्राप्त कर सकते हैं। उत्पादों और सेवाओं का प्रचार भी विश्व स्तर पर सम्भव हो जाता है।

वैश्वीकरण के प्रमुख कारक

वैश्वीकरण के विकास के पीछे अनेक आर्थिक, राजनीतिक और तकनीकी कारण कार्य करते हैं। स्रोत में इसके प्रमुख कारक निम्नलिखित बताए गए हैं—

  1. आर्थिक परिवर्तनों का तीव्र विकास— आधुनिक आर्थिक परिवर्तनों के कारण व्यापार, व्यवसाय तथा आर्थिक संसाधनों का देशों के बीच आदान-प्रदान तेजी से बढ़ा है।
  2. संचार साधनों का विकास— संचार तकनीक के विकास ने विभिन्न देशों के बीच सूचना और संवाद को तीव्र तथा सरल बनाया है, जिससे भौगोलिक दूरी का प्रभाव कम हुआ है।
  3. राजनीतिक उदारीकरण और पर्यटन का विकास— देशों के बीच राजनीतिक खुलेपन तथा पर्यटन के विस्तार से विभिन्न संस्कृतियों के बीच सम्पर्क बढ़ा है।
  4. देशों के बीच बढ़ती गतिविधियाँ— आर्थिक, सामाजिक और अन्य अन्तरराष्ट्रीय गतिविधियों में वृद्धि से राष्ट्रों के बीच निकटता और एकरूपता बढ़ती है।
  5. परिवहन साधनों का विकास— आधुनिक परिवहन ने दूरी तय करने में लगने वाले समय को कम कर दिया है और लोगों तथा वस्तुओं की आवाजाही तेज हुई है।
  6. वैश्विक राजनीति का विकास— अन्तरराष्ट्रीय राजनीतिक सम्बन्धों और सहयोग की बढ़ती उपयोगिता भी वैश्वीकरण को गति प्रदान करती है।

वैश्वीकरण के लाभ

1. संतुलित पर्यावरण के विकास में सहयोग

पर्यावरण प्रदूषण किसी एक राष्ट्र की समस्या न होकर सम्पूर्ण विश्व की समस्या है। वैश्वीकरण के कारण विभिन्न देश पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त प्रयास कर सकते हैं।

विश्व स्तर पर पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति जागरूकता, सम्मेलन तथा सहयोग बढ़ने से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सामूहिक प्रयास सम्भव होते हैं।

2. मानवीय दृष्टिकोण का विकास

वैश्वीकरण विभिन्न देशों को मानव कल्याण से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान के लिए एक साथ लाता है। प्राकृतिक आपदाओं, भुखमरी और अन्य मानवीय संकटों के समय विभिन्न राष्ट्र एक-दूसरे की सहायता करते हैं।

इससे मानवता, सहयोग और विश्वबन्धुत्व की भावना मजबूत होती है।

3. निर्धनता उन्मूलन में सहायता

विकसित राष्ट्रों और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा विकासशील देशों में पूँजी निवेश, आर्थिक सहायता तथा विकास कार्यक्रमों के माध्यम से रोजगार के अवसर उत्पन्न किए जा सकते हैं।

इस प्रकार वैश्वीकरण आर्थिक विकास तथा गरीबी कम करने में सहायक हो सकता है।

4. मानव कल्याण की भावना का विकास

वैश्वीकरण मानव कल्याण को राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठाकर विश्वस्तरीय विषय बनाता है। इसके कारण विभिन्न राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ मानवाधिकार तथा मानव कल्याण से सम्बन्धित विषयों पर कार्य करती हैं।

5. समस्याओं का मिलकर सामना

आतंकवाद, पर्यावरण प्रदूषण तथा अन्य अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं का प्रभाव अनेक देशों पर पड़ता है। ऐसी समस्याओं का प्रभावी समाधान विभिन्न राष्ट्रों के संयुक्त प्रयासों से ही सम्भव है।

वैश्वीकरण राष्ट्रों को एक-दूसरे की समस्याओं को समझने और सहयोग के आधार पर समाधान खोजने का अवसर प्रदान करता है।

6. बाधारहित व्यापार

वैश्वीकरण के कारण विभिन्न राष्ट्रों के बीच व्यापारिक सम्बन्ध बढ़ते हैं और वस्तुओं तथा सेवाओं का आदान-प्रदान सरल होता है।

अनेक कम्पनियाँ विभिन्न देशों में अपनी शाखाएँ स्थापित करती हैं। इससे व्यापार के साथ रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि हो सकती है तथा देशों के बीच आर्थिक सम्बन्ध मजबूत होते हैं।

वैश्वीकरण की सीमाएँ

वैश्वीकरण के अनेक लाभ हैं, किन्तु इसके साथ कुछ सीमाएँ और चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं। स्रोत में वैश्वीकरण की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित बताई गई हैं—

1. प्रत्येक राष्ट्र द्वारा अपना स्थान सुरक्षित करने की प्रवृत्ति

यद्यपि वैश्वीकरण सहयोग की भावना पर आधारित है, फिर भी प्रत्येक राष्ट्र सबसे पहले अपने हित, विकास और स्थान को सुरक्षित रखने का प्रयास करता है। इससे कभी-कभी अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की भावना कमजोर पड़ सकती है।

2. नैतिक मूल्यों का ह्रास

वैश्वीकरण के कारण वस्तुओं और उपभोक्ता संस्कृति का अन्तरराष्ट्रीय प्रसार बहुत तेजी से होता है। इसका प्रभाव स्थानीय जीवन-शैली और मूल्यों पर भी पड़ सकता है।

अत्यधिक उपभोक्तावाद के कारण नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों में गिरावट आने की सम्भावना रहती है।

3. अच्छी शिक्षा प्रणाली अपनाना चुनौतीपूर्ण

वैश्वीकरण के कारण राष्ट्र एक-दूसरे की शिक्षा प्रणालियों और तकनीकों से प्रभावित होते हैं। विकासशील देश विकसित देशों की शिक्षा व्यवस्था को अपनाने का प्रयास करते हैं, किन्तु संसाधनों और आर्थिक क्षमता की कमी के कारण ऐसा करना महँगा तथा चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

4. शक्ति के विकेन्द्रीकरण के सामने चुनौती

विश्व के सभी देशों की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शक्ति समान नहीं है। शक्तिशाली राष्ट्रों का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक होता है, जिससे वैश्विक निर्णयों में शक्ति का असंतुलन उत्पन्न हो सकता है।

इस प्रकार वैश्वीकरण के साथ शक्ति के समान वितरण की चुनौती बनी रहती है।

5. प्रतिभा पलायन

विकासशील देशों के नागरिक बेहतर शिक्षा, रोजगार और सुविधाओं के लिए विकसित देशों की ओर आकर्षित होते हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वहीं नौकरी करना पसन्द करने से विकासशील देशों में योग्य मानव संसाधन की कमी हो सकती है।

इस स्थिति को सामान्यतः प्रतिभा पलायन के रूप में समझा जाता है।

6. तानाशाही प्रवृत्ति का खतरा

यदि कुछ शक्तिशाली राष्ट्र विश्व राजनीति, अर्थव्यवस्था और अन्य क्षेत्रों में अत्यधिक प्रभाव स्थापित कर लें, तो वे अपनी नीतियों और हितों को अन्य देशों पर थोपने का प्रयास कर सकते हैं।

ऐसी स्थिति समानता और सहयोग पर आधारित वैश्वीकरण की भावना के विपरीत होती है।

7. एक देश की दूसरे देश पर निर्भरता

वैश्वीकरण के कारण विकास, विदेशी पूँजी, व्यापार और तकनीक के लिए राष्ट्रों की एक-दूसरे पर निर्भरता बढ़ जाती है।

सहयोग उपयोगी है, किन्तु किसी अन्य देश पर अत्यधिक निर्भरता स्वयं की आर्थिक क्षमता और आत्मनिर्भरता के लिए हानिकारक हो सकती है।

वैश्वीकरण का संतुलित दृष्टिकोण

वैश्वीकरण देशों के लिए व्यापार, तकनीक, ज्ञान, रोजगार और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर प्रदान करता है, लेकिन इसका लाभ तभी अधिक प्रभावी होता है जब प्रत्येक राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हित, सांस्कृतिक मूल्यों और आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी सुरक्षित रखे।

अतः वैश्वीकरण को अपनाते समय अन्तरराष्ट्रीय सहयोग और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वैश्वीकरण की आवश्यकता देशों की बढ़ती पारस्परिक निर्भरता के कारण उत्पन्न हुई है।
  • इससे विश्व व्यापार, राष्ट्रीय विकास, विश्व नागरिकता, सूचना के आदान-प्रदान और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा मिलता है।
  • इसके प्रमुख कारक हैं—आर्थिक परिवर्तन, संचार एवं परिवहन का विकास, राजनीतिक उदारीकरण और बढ़ती अन्तरराष्ट्रीय गतिविधियाँ।
  • वैश्वीकरण के प्रमुख लाभ हैं—मानवीय सहयोग, निर्धनता उन्मूलन, मानव कल्याण, संयुक्त समस्या-समाधान और बाधारहित व्यापार।
  • इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं—राष्ट्रीय हितों की प्रतिस्पर्धा, नैतिक मूल्यों का ह्रास, शिक्षा सम्बन्धी चुनौती, शक्ति-असंतुलन, प्रतिभा पलायन तथा अत्यधिक विदेशी निर्भरता।
  • वैश्वीकरण का लाभ तभी स्थायी हो सकता है जब विश्व सहयोग के साथ राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता और हितों का संतुलन बनाए रखा जाए।
Topic 11 लैंगिक असमानता—अर्थ, रूप, क्षेत्र, कारण, दुष्प्रभाव एवं शिक्षा द्वारा लैंगिक समानता

लैंगिक असमानता—अर्थ, रूप, क्षेत्र, कारण, दुष्प्रभाव एवं शिक्षा द्वारा लैंगिक समानता

लैंगिक असमानता का अर्थ

लैंगिक असमानता (Gender Inequality) से आशय स्त्री और पुरुष के बीच केवल जैविक भिन्नता से नहीं, बल्कि लिंग के आधार पर किए जाने वाले सामाजिक भेदभाव एवं असमान व्यवहार से है।

जब किसी एक लिंग को दूसरे की तुलना में अधिक अवसर, अधिकार, सुविधाएँ या सामाजिक महत्त्व दिया जाता है और दूसरे लिंग के साथ प्रतिकूल व्यवहार किया जाता है, तो इसे लैंगिक असमानता कहा जाता है।

भारतीय समाज में स्त्री और पुरुष के कार्यों, अधिकारों, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य तथा पारिवारिक भूमिकाओं को लेकर अनेक प्रकार की असमानताएँ दिखाई देती हैं। इस प्रकार लैंगिक असमानता सामाजिक व्यवस्था में स्त्री-पुरुष के असमान सम्बन्धों का परिणाम है।

लैंगिक असमानता के प्रमुख रूप

लैंगिक असमानता अनेक रूपों में दिखाई देती है। इसके प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं—

  1. घर में असन्तुलित श्रम-विभाजन— घरेलू कार्यों को मुख्यतः महिलाओं का दायित्व माना जाता है, जबकि घर से बाहर के कार्यों को पुरुषों से जोड़ा जाता है।
  2. अवसरों की असमानता— स्त्री और पुरुष को शिक्षा, रोजगार, निर्णय-निर्माण तथा सामाजिक सहभागिता के समान अवसर हमेशा प्राप्त नहीं होते।
  3. घरेलू श्रम एवं सम्पत्ति में भेदभाव— घर के कार्यों में महिलाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद उनके श्रम को पर्याप्त महत्त्व नहीं मिलता तथा सम्पत्ति सम्बन्धी मामलों में भी भेदभाव दिखाई देता है।
  4. उच्च शिक्षा एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण में असमानता— महिलाओं को उच्च शिक्षा तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के अवसर अपेक्षाकृत कम मिल सकते हैं।
  5. शिक्षा एवं मूलभूत सुविधाओं में भेदभाव— कई परिस्थितियों में बालिकाओं और महिलाओं को शिक्षा तथा आवश्यक सुविधाओं में पुरुषों की तुलना में कम प्राथमिकता दी जाती है।
  6. व्यवसाय एवं आजीविका में भेदभाव— रोजगार और जीविकोपार्जन के क्षेत्र में भी महिलाओं को अनेक प्रकार की असमानताओं का सामना करना पड़ता है।

लैंगिक असमानता के प्रमुख क्षेत्र

1. घर में लैंगिक भेदभाव

भारतीय समाज में पारम्परिक रूप से पुरुषों को परिवार का प्रमुख सदस्य माना जाता रहा है। पुत्र को वंश चलाने वाला, माता-पिता का सहारा और परिवार का उत्तराधिकारी मानने जैसी धारणाओं के कारण कई परिवारों में जन्म से ही पुत्र और पुत्री के बीच भेदभाव प्रारम्भ हो जाता है।

बड़े होने पर भी दोनों के कार्य-क्षेत्र अलग निर्धारित कर दिए जाते हैं। बालिकाओं को घरेलू कार्यों के लिए तैयार किया जाता है, जबकि बालकों को बाहर के कार्यों और आजीविका से अधिक जोड़ा जाता है।

2. शिक्षा में असमानता

महिलाओं की साक्षरता और शिक्षा की स्थिति पुरुषों की तुलना में कमजोर रही है। प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर पर कई बालिकाएँ पारिवारिक दायित्वों और घरेलू कार्यों के कारण पढ़ाई बीच में छोड़ देती हैं।

शिक्षा में असमान अवसर मिलने से महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक तथा व्यावसायिक प्रगति भी प्रभावित होती है।

3. रोजगार में असमानता

रोजगार के क्षेत्र में भी महिलाओं को समान अवसर नहीं मिलते। अनेक संगठित क्षेत्रों में महिलाएँ अपेक्षाकृत निम्न स्तर के कार्यों में अधिक दिखाई देती हैं।

कुछ व्यवसायों में महिलाओं का प्रवेश सीमित रहता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में पुरुषों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। इससे महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

4. स्वास्थ्य एवं पोषण सम्बन्धी असमानता

महिलाओं में कुपोषण और खराब स्वास्थ्य की समस्या सामाजिक भेदभाव से जुड़ी हुई है। कई परिस्थितियों में बाल्यावस्था से ही बालिकाओं को अपेक्षाकृत कम पौष्टिक भोजन मिलता है।

महिलाएँ स्वयं भी अनेक बार परिवार के अन्य सदस्यों को प्राथमिकता देते हुए अपने स्वास्थ्य और पोषण की उपेक्षा करती हैं। इससे उनका स्वास्थ्य प्रभावित होता है और मातृत्व से सम्बन्धित समस्याएँ अधिक जटिल हो सकती हैं।

5. यौन शोषण

निर्धनता, अशिक्षा तथा सामाजिक परिस्थितियों के कारण अनेक महिलाएँ विभिन्न प्रकार के शोषण का शिकार होती हैं। ऐसा शोषण केवल महिलाओं के व्यक्तित्व और सम्मान को ही क्षति नहीं पहुँचाता, बल्कि समाज के नैतिक मूल्यों को भी प्रभावित करता है।

लैंगिक असमानता के कारण

1. सामाजिक स्तरीकरण

समाज में महिलाओं को परम्परागत रूप से पुरुषों की तुलना में निम्न सामाजिक स्थिति दिए जाने से लैंगिक असमानता को बढ़ावा मिला है।

जब सामाजिक स्तर, कार्यों और अधिकारों का निर्धारण लिंग के आधार पर किया जाता है, तो महिलाओं के अवसर एवं निर्णय लेने की क्षमता सीमित हो जाती है।

2. सामाजिक संरचना की जटिलता

पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना में पुरुष को अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व और अधिकार प्रदान किए जाते हैं। समय के साथ ये मान्यताएँ सामाजिक परम्पराओं का रूप ले लेती हैं।

ऐसी संरचना में महिलाओं के लिए स्थापित बन्धनों को तोड़ना कठिन हो जाता है और लैंगिक असमानता बनी रहती है।

3. लैंगिक रूढ़िवादिता

समाज स्त्री और पुरुष के लिए कुछ विशेष व्यवहार, कार्य और भूमिकाएँ पहले से निर्धारित कर देता है। जैसे कुछ कार्यों को केवल पुरुषों के योग्य तथा कुछ को केवल महिलाओं का कार्य मान लिया जाता है।

इस प्रकार की लैंगिक रूढ़िवादिता महिलाओं की क्षमताओं और अवसरों को सीमित करती है तथा असमानता को बढ़ावा देती है।

4. अशिक्षा एवं जागरूकता की कमी

अशिक्षा और अधिकारों के प्रति जागरूकता की कमी लैंगिक असमानता का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। शिक्षा की पर्याप्त पहुँच न होने से अनेक महिलाएँ अपने अधिकारों, अवसरों और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी प्राप्त नहीं कर पातीं।

इसलिए शिक्षा और सामाजिक जागरूकता लैंगिक भेदभाव समाप्त करने के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं।

लैंगिक असमानता के दुष्प्रभाव

1. राष्ट्रीय एकता में बाधा

लैंगिक असमानता समाज के एक बड़े वर्ग को समान अवसरों से वंचित करती है। जब स्त्री और पुरुष को समान अधिकार एवं सम्मान नहीं मिलते तो सामाजिक एकता और राष्ट्रीय प्रगति प्रभावित होती है।

2. लोकतान्त्रिक मूल्यों पर प्रतिकूल प्रभाव

लोकतन्त्र समानता, न्याय, स्वतंत्रता और भाईचारे जैसे मूल्यों पर आधारित है। लैंगिक असमानता इन मूल्यों के वास्तविक क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करती है।

3. राष्ट्रीय विकास में बाधा

राष्ट्रीय विकास का अर्थ समाज के सभी वर्गों का सर्वांगीण विकास है। यदि महिलाओं को समान अवसर नहीं मिलेंगे तो देश की आधी जनसंख्या की क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं हो सकेगा।

अतः लैंगिक असमानता सामाजिक तथा आर्थिक विकास की गति को धीमा करती है।

4. शिक्षा के सार्वभौमीकरण में बाधा

कई परिवारों में बालक और बालिका की शिक्षा में भेदभाव किया जाता है। बालिकाओं से अधिक घरेलू कार्य कराने या उनकी शिक्षा को कम प्राथमिकता देने के कारण वे पढ़ाई से वंचित हो सकती हैं।

इस प्रकार लैंगिक असमानता सभी बच्चों तक शिक्षा पहुँचाने के लक्ष्य में बड़ी बाधा बनती है।

शिक्षा द्वारा लैंगिक समानता के प्रति समझ एवं संवेदनशीलता का विकास

भारत में लैंगिक असमानता की जड़ें सामाजिक परम्पराओं और पुराने दृष्टिकोणों में गहराई तक जुड़ी हुई हैं। केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है; लोगों के दृष्टिकोण और व्यवहार में परिवर्तन भी आवश्यक है। इस परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा है।

शिक्षा महिलाओं को अपने अधिकारों, कर्तव्यों और उपलब्ध अवसरों की जानकारी देती है। इससे उनमें आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता तथा अन्याय का विरोध करने की शक्ति विकसित होती है।

1. महिलाओं की साक्षरता एवं शिक्षा में वृद्धि

किसी समाज के विकास का महत्त्वपूर्ण संकेत वहाँ की महिलाओं की शैक्षिक स्थिति है। शिक्षित महिलाएँ स्वास्थ्य, परिवार, आर्थिक निर्णय तथा सामाजिक जीवन में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं।

अतः महिलाओं की साक्षरता बढ़ाना लैंगिक समानता की दिशा में सबसे आवश्यक कदमों में से एक है।

2. स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता

महिला शिक्षा का सकारात्मक प्रभाव उनके स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान पर पड़ता है। शिक्षित महिलाएँ पोषण, स्वास्थ्य, मातृत्व तथा परिवार के स्वास्थ्य से सम्बन्धित विषयों के प्रति अधिक जागरूक होती हैं।

3. सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों की समझ

शिक्षा महिलाओं को अपने संवैधानिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को समझने में सहायता करती है। इससे वे सामाजिक निर्णयों में अधिक प्रभावी ढंग से भाग ले सकती हैं।

4. आत्मविश्वास और अधिकारिता का विकास

महिला शिक्षा से आत्मविश्वास विकसित होता है और महिलाएँ अपने अधिकारों के प्रति सजग होती हैं। शिक्षा उन्हें अन्याय और भेदभाव का सामना करने के लिए मानसिक एवं नैतिक शक्ति प्रदान करती है।

5. स्वास्थ्य, शिक्षा एवं कल्याण पर विशेष बल

महिलाओं के विकास और अधिकारिता को मजबूत करने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण तीन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

इन क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति मजबूत होने पर वे परिवार और समाज दोनों के विकास में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं।

6. महिला शिक्षा को प्राथमिकता

लैंगिक समानता स्थापित करने के लिए महिला शिक्षा को विकास नीतियों का केन्द्र बनाया जाना आवश्यक है। शिक्षा ही वह माध्यम है जो महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने, अधिकारों के प्रति जागरूक होने और सामाजिक भेदभाव का सामना करने में सक्षम बनाती है।

7. समाज और स्वैच्छिक संस्थाओं की भागीदारी

केवल सरकारी योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। महिला शिक्षा और लैंगिक समानता को बढ़ाने के लिए स्वैच्छिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों तथा समाज की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है।

सरकार और समाज के संयुक्त प्रयासों से बालिकाओं की शिक्षा, महिलाओं की जागरूकता और समान अवसरों को अधिक प्रभावी ढंग से बढ़ाया जा सकता है।

लैंगिक समानता के लिए शिक्षा का महत्त्व

लैंगिक समानता तभी सम्भव है जब बालक और बालिका दोनों को समान शिक्षा, अवसर, सम्मान और विकास की सुविधाएँ मिलें। शिक्षा व्यक्ति के दृष्टिकोण में परिवर्तन करके पुरानी रूढ़ियों और भेदभावपूर्ण मान्यताओं को समाप्त करने में सहायता करती है।

अतः लैंगिक समानता के लिए केवल महिलाओं को शिक्षित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण समाज में समानता, सम्मान और संवेदनशीलता की भावना विकसित करना भी आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • लैंगिक असमानता लिंग के आधार पर स्त्री और पुरुष के साथ किए जाने वाले असमान सामाजिक व्यवहार को कहते हैं।
  • इसके प्रमुख क्षेत्र हैं—घर, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य एवं पोषण तथा यौन शोषण।
  • इसके प्रमुख कारण हैं—सामाजिक स्तरीकरण, पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना, लैंगिक रूढ़िवादिता तथा अशिक्षा एवं जागरूकता की कमी।
  • लैंगिक असमानता राष्ट्रीय एकता, लोकतान्त्रिक मूल्यों, राष्ट्रीय विकास और शिक्षा के सार्वभौमीकरण में बाधा उत्पन्न करती है।
  • महिला शिक्षा आत्मविश्वास, अधिकारों की समझ, स्वास्थ्य जागरूकता और आर्थिक-सामाजिक भागीदारी को बढ़ाती है।
  • लैंगिक समानता के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण पर विशेष ध्यान तथा सरकार, समाज और स्वैच्छिक संस्थाओं के संयुक्त प्रयास आवश्यक हैं।
  • शिक्षा के माध्यम से स्त्री और पुरुष दोनों में समानता, सम्मान और लैंगिक संवेदनशीलता विकसित की जा सकती है।
Topic 12 जनसंचार माध्यम—अर्थ, आवश्यकता, उपयोगिता एवं प्रमुख साधन

जनसंचार माध्यम—अर्थ, आवश्यकता, उपयोगिता एवं प्रमुख साधन

जनसंचार का अर्थ

जनसंचार से आशय किसी सूचना, विचार, संदेश, ज्ञान अथवा भावना को संचार के विभिन्न साधनों द्वारा एक साथ बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचाने की प्रक्रिया से है।

मीडिया का अर्थ माध्यम होता है। आधुनिक युग में समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, टेलीविजन, रेडियो तथा अन्य संचार साधन समाज में सूचनाओं और विचारों के आदान-प्रदान के प्रमुख माध्यम हैं।

मीडिया समाज के विभिन्न वर्गों, व्यक्तियों, संस्थाओं तथा सत्ता केन्द्रों के बीच सेतु का कार्य करता है। इसलिए इसे लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ भी कहा जाता है।

समाज में जनसंचार माध्यमों की भूमिका

जनसंचार माध्यम केवल समाचार पहुँचाने का साधन नहीं है, बल्कि समाज के निर्माण और परिवर्तन में भी इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इतिहास में जनसंचार माध्यमों का उपयोग जन-जागरण, सामाजिक परिवर्तन तथा देशभक्ति की भावना उत्पन्न करने के लिए किया गया है।

वर्तमान समय में भी जनसंचार माध्यम स्वास्थ्य, शिक्षा, नागरिक अधिकार, बाल-मजदूरी, धूम्रपान के दुष्प्रभाव और अन्य सामाजिक विषयों के प्रति लोगों को जागरूक करने का कार्य करते हैं।

नाटक, नुक्कड़ नाटक तथा अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से जटिल सामाजिक विषयों को सरल और प्रभावी रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इस प्रकार जनसंचार समाज में जागरूकता और सामाजिक उत्तरदायित्व विकसित करने में सहायक है।

जनसंचार की प्रमुख परिभाषाएँ

समरी के अनुसार— “संचार सूचना, आदर्शों एवं अभिवृत्तियों को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने की कला है।”

गोकुल चन्द्र पाण्डेय के अनुसार— “संचार सूचना व्यक्त अथवा अव्यक्त रूप से सूचनाओं का प्रेषण एवं एकीकरण करना है।”

जनसंचार माध्यमों की आवश्यकता

आधुनिक समाज में संचार माध्यमों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। शिक्षा, सूचना, जन-जागरण और सामाजिक विकास में इनके महत्त्व को निम्न बिन्दुओं से समझा जा सकता है—

  1. जन-जागरूकता उत्पन्न करना— सामाजिक विषयों और समस्याओं के प्रति सामान्य जनता को जागरूक करने के लिए जनसंचार माध्यम आवश्यक हैं।
  2. दूरस्थ क्षेत्रों तक सूचना पहुँचाना— शोध, शिक्षा तथा अन्य महत्त्वपूर्ण सूचनाओं को दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुँचाया जा सकता है।
  3. कठिन विषयों को सरल बनाना— मनोवैज्ञानिक दृष्टि से कठिन पाठ्य-वस्तु एवं जटिल सूचनाओं को सरल और बोधगम्य रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
  4. विशाल जनसमूह को शिक्षित करना— एक ही समय में बड़ी संख्या में लोगों तक शैक्षिक सामग्री पहुँचाना सम्भव होता है।
  5. व्यावसायिक शिक्षा में सहायता— विभिन्न व्यवसायों एवं कौशलों से सम्बन्धित जानकारी देकर व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सकता है।
  6. मानवीय सम्बन्धों का विकास— जनसंचार मनुष्य को विश्व की गतिविधियों से परिचित कराता है और व्यापक मानवीय सम्बन्ध विकसित करने में सहायता करता है।
  7. औपचारिक शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाना— कठिन पाठों को सरल, रोचक और प्रभावी बनाकर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारी जा सकती है।
  8. देश-विदेश की घटनाओं का ज्ञान— प्रतिदिन होने वाली राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय घटनाओं से जनसामान्य को परिचित कराता है।
  9. वैज्ञानिक प्रगति की जानकारी— आधुनिक वैज्ञानिक उपलब्धियों और नए ज्ञान से लोगों को अवगत कराने तथा उनकी योग्यताओं के विकास में संचार साधन उपयोगी हैं।
  10. मनोरंजन प्रदान करना— ज्ञान और सूचना के साथ स्वस्थ मनोरंजन उपलब्ध कराना भी जनसंचार माध्यमों का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है।

जनसंचार माध्यमों की उपयोगिता

व्यक्ति को जागरूक बनाने तथा समाज तक आवश्यक संदेश पहुँचाने में जनसंचार माध्यमों की उपयोगिता अत्यन्त व्यापक है। इसकी प्रमुख उपयोगिताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. कठिन अवधारणाओं की सरल प्रस्तुति— जटिल विचारों और अवधारणाओं को सरल, स्पष्ट और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
  2. सामान्य व्यक्ति को ज्ञान प्रदान करना— विभिन्न विषयों की जानकारी सरल भाषा में देकर लोगों को अधिक सजग और ज्ञानवान बनाया जाता है।
  3. नवाचारों से परिचित कराना— इलेक्ट्रॉनिक निर्माण एवं तकनीकी विकास जैसे नए कार्यों और प्रयोगों के विषय में जानकारी प्रदान की जा सकती है।
  4. सैद्धान्तिक ज्ञान को जीवन से जोड़ना— शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रखकर उसके व्यावहारिक उपयोग को समझाने में सहायता मिलती है।
  5. अन्तरराष्ट्रीय मंच से जोड़ना— व्यक्ति को विश्व की घटनाओं, विचारों और गतिविधियों से परिचित कराकर उसका दृष्टिकोण व्यापक बनाया जाता है।
  6. दूरस्थ जानकारी उपलब्ध कराना— ऐसी जगहों, कार्यों और घटनाओं के बारे में भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है जहाँ व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से नहीं पहुँच सकता।
  7. शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण— विभिन्न प्रकार के शिक्षण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचाए जा सकते हैं।
  8. कल्पना एवं रचनात्मकता का विकास— जनसंचार माध्यम कल्पना शक्ति, जिज्ञासा, रचनात्मक और सृजनात्मक क्षमताओं के विकास में सहायक होते हैं।
  9. नवीन ज्ञान से परिचित कराना— विज्ञान, तकनीक तथा ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे नए विकासों की जानकारी प्रदान की जाती है।
  10. जनशिक्षा प्रदान करना— जनसंख्या शिक्षा, यौन शिक्षा, कानूनी शिक्षा तथा पर्यावरण शिक्षा जैसे विषयों की जानकारी जनसामान्य तक पहुँचाई जा सकती है।

जनसंचार के प्रमुख साधन

स्रोत में जनसंचार के साधनों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा गया है—

  1. प्रिंट मीडिया / मुद्रित सामग्री
  2. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

1. प्रिंट मीडिया / मुद्रित सामग्री

प्रिंट मीडिया से आशय ऐसी मुद्रित सामग्री से है जिसके माध्यम से ज्ञान, सूचना और अध्ययन सामग्री लोगों तक पहुँचाई जाती है।

शिक्षा के क्षेत्र में मुद्रित सामग्री का विशेष महत्त्व है। पाठ्यक्रम और विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुसार विशेषज्ञों द्वारा ऐसी सामग्री तैयार की जाती है जिसे विद्यार्थी अपनी सुविधा के अनुसार पढ़कर स्व-अध्ययन कर सकते हैं।

प्रिंट मीडिया के प्रमुख साधन हैं—

  • समाचार-पत्र (Newspaper)
  • पत्रिकाएँ (Magazines)
  • पुस्तक एवं अध्ययन सामग्री (Books and Reading Material)
प्रिंट मीडिया का शैक्षिक महत्त्व
  • विद्यार्थी अपनी गति और सुविधा के अनुसार अध्ययन कर सकते हैं।
  • पाठ्य-वस्तु को व्यवस्थित एवं स्थायी रूप में उपलब्ध कराया जा सकता है।
  • स्व-अध्ययन एवं पुनरावृत्ति में उपयोगी होता है।
  • समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएँ नवीन घटनाओं और विचारों से परिचित कराती हैं।

2. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

आधुनिक संचार युग में इलेक्ट्रॉनिक तकनीक पर आधारित माध्यमों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहा जाता है। इन माध्यमों ने जनसंचार की पहुँच और प्रभाव को अत्यन्त व्यापक बना दिया है।

रेडियो इलेक्ट्रॉनिक जनसंचार के प्रारम्भिक और महत्त्वपूर्ण माध्यमों में से एक है। इसके माध्यम से ध्वनि तरंगों द्वारा दूर-दराज क्षेत्रों तक समाचार, शिक्षा और अन्य सूचनाएँ पहुँचाई जा सकती हैं।

मुद्रित माध्यमों की पहुँच मुख्यतः पढ़े-लिखे लोगों तक सीमित हो सकती है, जबकि रेडियो और टेलीविजन जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम साक्षर और निरक्षर दोनों प्रकार के लोगों तक सूचना पहुँचाने में उपयोगी हैं।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रमुख साधन हैं—

  • टेलीविजन (Television)
  • रेडियो (Radio)
  • टेप रिकॉर्डर (Tape Recorder)
  • वीडियो टेप (Video Tape)
  • न्यूज चैनल (News Channel)
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की विशेष उपयोगिता
  • सूचना को बहुत कम समय में विशाल जनसमूह तक पहुँचाता है।
  • दूर-दराज क्षेत्रों तक शिक्षा और समाचार पहुँचाने में सहायक है।
  • श्रव्य अथवा दृश्य-श्रव्य रूप में जानकारी मिलने से उसे समझना सरल होता है।
  • शिक्षा, संस्कृति, सूचना और मनोरंजन—सभी क्षेत्रों में उपयोगी है।

प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का संयुक्त महत्त्व

प्रिंट मीडिया अध्ययन सामग्री को स्थायी और स्व-अध्ययन योग्य रूप में प्रदान करता है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सूचनाओं को तेजी से और व्यापक क्षेत्र तक पहुँचाता है। दोनों माध्यम एक-दूसरे के पूरक हैं।

इनका उचित उपयोग शिक्षा, जन-जागरूकता, सामाजिक परिवर्तन और आधुनिक ज्ञान के प्रसार को प्रभावी बना सकता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जनसंचार सूचना, विचार और संदेश को बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचाने की प्रक्रिया है।
  • मीडिया समाज के विभिन्न वर्गों, व्यक्तियों और संस्थाओं के बीच सेतु का कार्य करता है तथा इसे लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है।
  • जनसंचार की प्रमुख आवश्यकताएँ हैं—जन-जागरूकता, शिक्षा, वैज्ञानिक जानकारी, देश-विदेश की घटनाओं का ज्ञान और मनोरंजन।
  • जनसंचार कठिन विषयों को सरल बनाने, नवीन ज्ञान प्रदान करने, रचनात्मकता विकसित करने और जनशिक्षा के प्रसार में उपयोगी है।
  • जनसंचार के दो प्रमुख साधन हैं—प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया।
  • प्रिंट मीडिया के प्रमुख साधन समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ तथा पुस्तक एवं अध्ययन सामग्री हैं।
  • इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रमुख साधन टेलीविजन, रेडियो, टेप रिकॉर्डर, वीडियो टेप तथा न्यूज चैनल हैं।
Topic 13 जनसंचार का बहुआयामी प्रभाव—सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव

जनसंचार का बहुआयामी प्रभाव—सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव

जनसंचार का बहुआयामी प्रभाव

आधुनिक समाज में जनसंचार माध्यमों का प्रभाव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देता है। विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के विचारों, व्यवहार, सामाजिक सम्बन्धों, शिक्षा तथा जीवन-शैली पर मीडिया का गहरा प्रभाव पड़ता है।

तकनीक के विकास के कारण आज बच्चे और किशोर इंटरनेट तथा अन्य संचार माध्यमों से लगातार जुड़े रहते हैं। इससे उन्हें ज्ञान, सूचना, शिक्षा और सम्पर्क के अनेक अवसर प्राप्त होते हैं, लेकिन इनके अत्यधिक या अनुचित प्रयोग से विभिन्न समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं।

अतः जनसंचार माध्यमों का प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार का होता है। इनका परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति इन माध्यमों का किस उद्देश्य से और किस प्रकार उपयोग करता है।

मीडिया के सकारात्मक प्रभाव

बच्चों एवं किशोरों की अनेक सामाजिक आवश्यकताएँ और गतिविधियाँ मीडिया के माध्यम से पूरी होती हैं। इसके प्रमुख सकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं—

1. समाजीकरण एवं सम्प्रेषण

जनसंचार माध्यम व्यक्ति को अपने समुदाय तथा सम्पूर्ण विश्व को समझने में सहायता करते हैं। इनके माध्यम से विचारों, अनुभवों और सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है, जिससे व्यक्ति का सामाजिक विकास होता है।

समाजीकरण एवं सम्प्रेषण में मीडिया की भूमिका
  1. विचारों का विकास— ब्लॉग, वीडियो तथा अन्य माध्यम बच्चों और किशोरों के विचारों को विकसित करने और नए दृष्टिकोण समझने में सहायक होते हैं।
  2. ऑनलाइन सम्बन्धों का विस्तार— जनसंचार माध्यम व्यक्ति को व्यापक स्तर पर अन्य लोगों से सम्पर्क स्थापित करने का अवसर प्रदान करते हैं।
  3. सामुदायिक गतिविधियों में सहभागिता— मीडिया के माध्यम से किशोरों को सामुदायिक कार्यों एवं गतिविधियों में भाग लेने के अवसर प्राप्त होते हैं।
  4. राजनीतिक एवं सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी— जनसंचार माध्यम राजनीतिक तथा जनोपयोगी कार्यों से सम्बन्धित जानकारी देकर उनमें सहभागिता को प्रोत्साहित करते हैं।
  5. स्वयंसेवा की भावना— सामाजिक कार्यों के बारे में जानकारी मिलने से किशोरों को स्वयंसेवी गतिविधियों में योगदान देने के अवसर मिलते हैं।
  6. वैश्विक समस्याओं की समझ— मीडिया विश्व की विभिन्न समस्याओं और मुद्दों को समझने तथा उनके समाधान के बारे में जानकारी प्राप्त करने में सहायता करता है।
  7. रचनात्मकता का विकास— विचारों, कला तथा संगीत आदि के आदान-प्रदान से व्यक्तिगत और सामूहिक सृजनात्मकता का विकास होता है।
  8. व्यक्तिगत पहचान एवं सामाजिक कौशल— जनसंचार माध्यम किशोरों में व्यक्तिगत पहचान विकसित करने तथा विभिन्न सामाजिक कौशल सीखने में सहायता करते हैं।
  9. अन्य संस्कृतियों के प्रति सम्मान— विश्व की विभिन्न संस्कृतियों से परिचय मिलने के कारण किशोरों में सहिष्णुता तथा अन्य संस्कृतियों के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है।

2. स्वास्थ्य सूचनाओं की प्राप्ति

इंटरनेट तथा अन्य जनसंचार माध्यमों से बच्चों और किशोरों को स्वास्थ्य सम्बन्धी अनेक जानकारियाँ आसानी से प्राप्त हो जाती हैं।

तनाव नियंत्रण, हताशा से बचाव तथा यौन स्वास्थ्य जैसे विषयों से सम्बन्धित जानकारी ऑनलाइन माध्यमों द्वारा प्राप्त की जा सकती है।

हालाँकि इंटरनेट पर उपलब्ध प्रत्येक सूचना सही या विश्वसनीय हो, यह आवश्यक नहीं है। इसलिए बच्चों और किशोरों को प्राप्त सूचनाओं का सही उपयोग करने और गलत जानकारी से बचने के लिए अभिभावकीय मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।

3. अधिगम के अवसरों में वृद्धि

जनसंचार माध्यम शिक्षा और अधिगम के नए अवसर प्रदान करते हैं। इंटरनेट तथा अन्य मीडिया साधनों की सहायता से विद्यार्थी किसी विषय से सम्बन्धित अतिरिक्त जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

विद्यालयी कार्यों एवं गृहकार्य को पूरा करने के लिए इंटरनेट का उपयोग किया जा सकता है। विद्यार्थी मीडिया के माध्यम से विचारों और सूचनाओं का आदान-प्रदान भी कर सकते हैं।

वर्तमान समय में अनेक शिक्षण संस्थाएँ ब्लॉग तथा अन्य संचार माध्यमों का उपयोग शिक्षण उपकरण के रूप में करती हैं। इस प्रकार मीडिया बालकों और किशोरों के बहुमुखी विकास तथा अधिगम के अवसरों को बढ़ाने में सहायक है।

मीडिया के नकारात्मक प्रभाव

जनसंचार माध्यमों का अत्यधिक, असंतुलित अथवा अनुचित उपयोग बच्चों और किशोरों के सामाजिक, मानसिक, शैक्षिक तथा शारीरिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

1. अनुचित सामग्री का प्रसार

मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से कुछ बच्चे एवं किशोर अनुचित या यौन सम्बन्धी सामग्री का आदान-प्रदान कर सकते हैं अथवा ऐसी सामग्री को समाज में फैला सकते हैं।

इस प्रकार की गतिविधियाँ कभी-कभी अपराध की श्रेणी में भी आ सकती हैं और बच्चों तथा उनके माता-पिता के लिए शर्मिंदगी एवं विद्यालय में अपमान का कारण बन सकती हैं।

2. सामाजिक अलगाव

सोशल साइटों पर बहुत अधिक समय बिताने वाले किशोरों में सामाजिक अलगाव की समस्या उत्पन्न हो सकती है। वे वास्तविक सामाजिक सम्बन्धों की तुलना में ऑनलाइन सम्बन्धों में अधिक समय बिताने लगते हैं।

इससे उदासी, अकेलापन तथा वास्तविक सामाजिक जीवन से दूरी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

3. साइबर उत्पीड़न

ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग किसी किशोर को डराने, धमकाने अथवा परेशान करने के लिए भी किया जा सकता है। ऐसी गतिविधियाँ किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं।

इसके कारण हताशा, चिंता, अकेलापन तथा गंभीर परिस्थितियों में आत्मघाती प्रवृत्तियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं।

4. विज्ञापनों का प्रभाव

विभिन्न वेबसाइटों और मीडिया माध्यमों पर आयु, लिंग, शिक्षा, विवाह तथा अन्य विषयों से सम्बन्धित अनेक प्रकार के विज्ञापन प्रदर्शित किए जाते हैं।

ये विज्ञापन किशोरों को विभिन्न वस्तुएँ खरीदने के लिए प्रेरित कर सकते हैं तथा उनके विचार और उपभोग सम्बन्धी व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।

5. मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक समस्याएँ

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सामाजिक मीडिया पर अत्यधिक समय बिताने से किशोरों में आत्ममुग्धता, अहंकार तथा समाज-विरोधी व्यवहार विकसित हो सकते हैं।

इसके साथ ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

6. मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

सामाजिक मीडिया के अत्यधिक प्रयोग के कारण किशोरों में वास्तविक सामाजिक सम्पर्क और एकाग्रता में कमी आ सकती है।

स्रोत में इसके परिणामस्वरूप अनिद्रा, डिप्रेशन, बेचैनी और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया है।

7. शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव

सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने से किशोरों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है और वे शैक्षिक कार्यों में पिछड़ सकते हैं।

लगातार ऑनलाइन रहने से उनकी दिनचर्या प्रभावित होती है, जिसका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

मीडिया के संतुलित उपयोग की आवश्यकता

जनसंचार माध्यम आधुनिक जीवन का महत्त्वपूर्ण भाग हैं। इनसे शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सम्पर्क और रचनात्मकता के अनेक अवसर प्राप्त होते हैं, लेकिन इनके लाभ तभी प्राप्त किए जा सकते हैं जब इनका उपयोग संतुलित तथा उचित ढंग से किया जाए।

विशेष रूप से बच्चों और किशोरों को सही सामग्री का चयन करने, ऑनलाइन सूचनाओं की विश्वसनीयता समझने तथा मीडिया के अत्यधिक प्रयोग से बचने के लिए उचित मार्गदर्शन आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जनसंचार माध्यमों का प्रभाव बच्चों और किशोरों के सामाजिक, मानसिक, शैक्षिक एवं व्यवहारिक विकास पर पड़ता है।
  • मीडिया के प्रमुख सकारात्मक प्रभाव हैं—समाजीकरण एवं सम्प्रेषण, स्वास्थ्य सूचनाओं की प्राप्ति तथा अधिगम के अवसरों में वृद्धि।
  • मीडिया विचारों के आदान-प्रदान, सामाजिक सहभागिता, रचनात्मकता, वैश्विक समझ और सामाजिक कौशल के विकास में सहायक है।
  • इंटरनेट स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी प्रदान करता है, किन्तु प्रत्येक ऑनलाइन सूचना विश्वसनीय हो यह आवश्यक नहीं है।
  • मीडिया के नकारात्मक प्रभावों में अनुचित सामग्री, सामाजिक अलगाव, साइबर उत्पीड़न, विज्ञापनों का प्रभाव तथा सामाजिक मूल्यों में गिरावट शामिल हैं।
  • अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग से अनिद्रा, डिप्रेशन, बेचैनी, चिड़चिड़ापन तथा पढ़ाई में पिछड़ने जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
  • इसलिए जनसंचार माध्यमों का संतुलित, सुरक्षित और उद्देश्यपूर्ण उपयोग आवश्यक है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

पर्यावरण या वातावरण शब्द का निर्माण दो शब्दों से मिलकर हुआ है—

व्याख्या: पर्यावरण शब्द परि + आवरण से बना है। परि का अर्थ चारों ओर तथा आवरण का अर्थ ढकने वाला है।
Q 2

“पर्यावरण एक बाह्य शक्ति है, जो मानव को प्रभावित करती है।” यह कथन है—

व्याख्या: ई. जे. रॉस के अनुसार पर्यावरण एक बाह्य शक्ति है, जो मानव को प्रभावित करती है।
Q 3

राष्ट्रीय जल बोर्ड का गठन हुआ—

व्याख्या: राष्ट्रीय जल बोर्ड का गठन भारत सरकार द्वारा सितम्बर 1990 में किया गया था।
Q 4

आई. पी. सी. सी. की पूरी रिपोर्ट कब जारी हुई?

व्याख्या: IPCC की पाँचवीं आकलन रिपोर्ट की पूरी रिपोर्ट 30 सितम्बर 2013 को जारी हुई।
Q 5

पृथ्वी का लगभग कितना धरातल पानी से आच्छादित है?

व्याख्या: पृथ्वी की सतह का लगभग 71% भाग जल से आच्छादित है।
Q 6

अलवणीय जल कुल जल का लगभग है—

व्याख्या: पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का लगभग 3% भाग अलवणीय जल है।
Q 7

जल संचयन की आधुनिक विधि है—

व्याख्या: नीगोरिम गड्ढा, सीढ़ीदार खेत और ट्रेपिजॉइडल बाँध तीनों वर्षा जल संचयन की आधुनिक विधियाँ हैं।
Q 8

राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन कब किया गया?

व्याख्या: राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन वर्ष 1992 में किया गया।
Q 9

वैश्वीकरण के उद्देश्य हैं—

व्याख्या: उदारीकरण, निजीकरण तथा संतुलित विकास वैश्वीकरण से सम्बन्धित प्रमुख उद्देश्य हैं।
Q 10

भूमण्डलीय ताप वृद्धि में सर्वाधिक योगदान किस गैस का है?

व्याख्या: दिए गए विकल्पों में कार्बन डाइऑक्साइड वैश्विक ताप वृद्धि के लिए प्रमुख उत्तरदायी ग्रीनहाउस गैस है।
Q 11

पारिस्थितिकी असंतुलन का एक महत्त्वपूर्ण गतिक कारक है—

व्याख्या: तीव्र जनसंख्या वृद्धि प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाकर पारिस्थितिक असंतुलन उत्पन्न करती है।
Q 12

गंगा कार्ययोजना की शुरुआत की गई—

व्याख्या: गंगा कार्ययोजना की शुरुआत वर्ष 1985 में की गई थी।
Q 13

निम्न में से कौन सा भौतिक प्रदूषण नहीं है—

व्याख्या: सामाजिक प्रदूषण सामाजिक परिस्थितियों से सम्बन्धित है, जबकि जल, वायु और मृदा प्रदूषण भौतिक पर्यावरण से सम्बन्धित हैं।
Q 14

स्वच्छ ऊर्जा संसाधन है—

व्याख्या: सौर ऊर्जा स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है।
Q 15

भारतीय भूमि की समस्याएँ हैं—

व्याख्या: मृदा अपरदन, उर्वरता में कमी तथा बंजर भूमि तीनों भारतीय भूमि की प्रमुख समस्याएँ हैं।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP DELED Semester 2 के विषय वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा के अध्याय उभरते समाज के प्रमुख मुद्दे–2 से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

जनसंचार साधनों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?

Q 2

मीडिया के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव लिखिए।

Q 3

लिंग असमानता के दुष्प्रभाव पर प्रकाश डालिए।

Q 4

वैश्वीकरण की आवश्यकता तथा महत्त्व लिखिए।

Q 5

जलवायु परिवर्तन पर आई.पी.सी.सी. रिपोर्ट का उल्लेख कीजिए।

Q 6

जलवायु परिवर्तन के कारण एवं प्रभाव बताइए।

Q 7

ग्लोबल वार्मिंग किसे कहते हैं? ग्लोबल वार्मिंग के कारण बताइए।

Q 8

ऊर्जा संरक्षण एवं भूमि संरक्षण से आपका क्या अभिप्राय है?

Q 9

पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार लिखिए।

Q 10

पर्यावरण संरक्षण क्या है?

Q 11

राष्ट्रीय जल नीति 2002 क्या है?

Q 12

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव क्या हैं?

Q 13

भूमण्डलीकरण के सम्प्रत्यय को स्पष्ट कीजिए। इसके प्रमुख लाभ एवं हानियों को समझाइए।

Q 14

जनसंचार साधनों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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