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Home Study Material Semester 2 वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा उभरते समाज के प्रमुख मुद्दे–1
Chapter 7 • वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा

उभरते समाज के प्रमुख मुद्दे–1

UP DELED Semester 2 के विषय वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा के इस अध्याय में शिक्षा का सार्वभौमीकरण, शैक्षिक अवसरों की समानता, शिक्षा का व्यवसायीकरण, बालश्रम, जनसंख्या शिक्षा, जातिवाद, अलगाववाद और साम्प्रदायिकता की अवधारणाओं, कारणों, प्रभावों, समस्याओं एवं समाधानात्मक उपायों का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

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Topic 1 शिक्षा का सार्वभौमीकरण—अर्थ, प्रारम्भिक शिक्षा, संवैधानिक प्रावधान एवं 86वाँ संविधान संशोधन

शिक्षा का सार्वभौमीकरण—अर्थ, प्रारम्भिक शिक्षा, संवैधानिक प्रावधान एवं 86वाँ संविधान संशोधन

शिक्षा के सार्वभौमीकरण की भूमिका

आधुनिक युग में किसी भी राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए शिक्षा का सभी तक पहुँचना आवश्यक माना जाता है। वैश्वीकरण के कारण व्यापार, संस्कृति, राजनीति और ज्ञान के क्षेत्र में विश्व के देशों के बीच सम्बन्ध बढ़े हैं। ऐसी स्थिति में किसी राष्ट्र का विकास तभी सम्भव है, जब उसके अधिकतम नागरिक शिक्षित हों।

शिक्षा के सार्वभौमीकरण का मूल उद्देश्य ऐसी शिक्षा-व्यवस्था स्थापित करना है जिसमें प्रत्येक बालक को बिना किसी भेदभाव के आवश्यक स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले। इससे व्यक्ति का विकास होने के साथ-साथ राष्ट्र की सामाजिक और आर्थिक प्रगति भी सम्भव होती है।

सार्वभौमीकरण का अर्थ

सार्वभौमीकरण अंग्रेजी शब्द Universalisation का हिन्दी रूप है। इसका सामान्य अर्थ है—किसी सुविधा या व्यवस्था को सभी व्यक्तियों के लिए उपलब्ध कराना।

शिक्षा के क्षेत्र में सार्वभौमीकरण से आशय ऐसी व्यवस्था से है जिसमें एक निश्चित आयु-वर्ग के प्रत्येक बच्चे को विद्यालय में प्रवेश मिले, वह नियमित रूप से शिक्षा प्राप्त करे और निर्धारित स्तर तक अपनी शिक्षा पूरी करे।

शिक्षा के सार्वभौमीकरण के प्रमुख आधार
  • सभी योग्य आयु के बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिलाना।
  • शिक्षा को निःशुल्क एवं सुलभ बनाना।
  • किसी भी जाति, धर्म, वर्ग या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव न करना।
  • विद्यालय में प्रवेश लेने वाले बच्चों को बीच में पढ़ाई छोड़ने से रोकना।
  • बच्चों को निर्धारित प्रारम्भिक स्तर तक शिक्षा पूर्ण कराना।

अतः केवल विद्यालय खोल देना ही सार्वभौमीकरण नहीं है। वास्तविक सार्वभौमीकरण तभी माना जाएगा जब बच्चों का प्रवेश, निरन्तर उपस्थिति, शिक्षा में बने रहना और निर्धारित स्तर तक शिक्षा पूर्ण करना सुनिश्चित हो।

प्रारम्भिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण

भारत में प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण का उद्देश्य प्रत्येक बालक को प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर की शिक्षा उपलब्ध कराना है। इसके अन्तर्गत यह प्रयास किया जाता है कि विद्यालय जाने की आयु का कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।

भारत का संविधान लागू होने के बाद राज्य को यह दायित्व दिया गया कि बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की जाए। प्रारम्भिक व्यवस्था में 6 से 14 वर्ष आयु-वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर विशेष बल दिया गया।

सार्वभौमिक प्रारम्भिक शिक्षा तभी सफल मानी जाएगी जब—

  1. विद्यालय जाने योग्य प्रत्येक बच्चे का नामांकन हो।
  2. नामांकित बच्चे नियमित रूप से विद्यालय आते रहें।
  3. वे बीच में विद्यालय न छोड़ें।
  4. वे प्रारम्भिक शिक्षा के निर्धारित स्तर को सफलतापूर्वक पूरा करें।

शिक्षा के सार्वभौमीकरण का अर्थ एवं अवधारणा

शिक्षा व्यक्ति और समाज के समग्र विकास का आधार है। शिक्षा के सार्वभौमीकरण का शाब्दिक अर्थ है—एक निश्चित स्तर तक की शिक्षा को सभी बच्चों के लिए सुलभ, निःशुल्क और अनिवार्य बनाना।

इसका उद्देश्य केवल साक्षरता प्रदान करना नहीं है, बल्कि व्यक्ति को ऐसा ज्ञान और प्रशिक्षण देना भी है जिससे वह अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके, समाज का उपयोगी सदस्य बने और अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों को समझ सके।

विभिन्न शिक्षाविदों के विचार
शिक्षाविद् मुख्य विचार
डॉ. राधाकृष्णन शिक्षा केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि विचारों, नागरिकता और आध्यात्मिक जीवन के विकास का माध्यम है।
एस. एन. मुखर्जी प्राथमिक शिक्षा को प्रत्येक नागरिक तक पहुँचाने के लिए सरकारी प्रयासों को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।
पी. एम. सेन प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण ने भारत में प्राथमिक शिक्षा के विस्तार की आवश्यकता की ओर विशेष ध्यान आकर्षित किया।
जे. पी. नायक प्रारम्भिक शिक्षा की प्रगति किसी देश के सामाजिक, आर्थिक और सामान्य विकास का महत्वपूर्ण संकेतक है।
एस. चक्रवर्ती राष्ट्र के पुनर्निर्माण और विकास के लिए प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

संवैधानिक प्रावधान

भारत में प्रारम्भिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किए गए। प्रारम्भ में अनुच्छेद 45 के माध्यम से राज्य को बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया था।

बाद में बच्चों की शिक्षा को अधिक प्रभावी अधिकार देने के उद्देश्य से 86वाँ संविधान संशोधन किया गया। इस संशोधन के माध्यम से शिक्षा से सम्बन्धित तीन महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्थाएँ सामने आईं।

86वें संविधान संशोधन के प्रमुख प्रावधान
संवैधानिक प्रावधान मुख्य व्यवस्था
अनुच्छेद 21A 6 से 14 वर्ष आयु के सभी बच्चों को राज्य द्वारा निर्धारित विधि के अनुसार निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की गई।
अनुच्छेद 45 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की प्रारम्भिक बाल्यावस्था की देखभाल और शिक्षा की व्यवस्था पर बल दिया गया।
अनुच्छेद 51A माता-पिता अथवा अभिभावक का यह कर्तव्य माना गया कि वे 6 से 14 वर्ष आयु के अपने बच्चे या आश्रित बालक को शिक्षा का अवसर प्रदान करें।

86वें संविधान संशोधन का महत्त्व

  • बालकों की प्रारम्भिक शिक्षा को अधिक मजबूत संवैधानिक आधार प्राप्त हुआ।
  • 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने की दिशा स्पष्ट हुई।
  • राज्य के साथ-साथ माता-पिता एवं अभिभावकों की जिम्मेदारी भी निर्धारित हुई।
  • 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की प्रारम्भिक देखभाल एवं शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया गया।
  • शिक्षा को केवल कल्याणकारी सुविधा न मानकर प्रत्येक बच्चे तक पहुँचाने की संवैधानिक प्रतिबद्धता मजबूत हुई।

सार्वभौमीकरण का व्यापक आशय

शिक्षा के सार्वभौमीकरण का उद्देश्य केवल अधिक बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिलाना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य ऐसी शिक्षा-व्यवस्था विकसित करना है जिसमें प्रत्येक बालक को शिक्षा प्राप्त करने, विद्यालय में बने रहने और अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के समान अवसर प्राप्त हों।

इस प्रकार शिक्षा का सार्वभौमीकरण समान अवसर, सामाजिक न्याय, नागरिक विकास और राष्ट्रीय प्रगति से जुड़ी एक व्यापक अवधारणा है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सार्वभौमीकरण का अर्थ शिक्षा को सभी योग्य बच्चों के लिए सुलभ बनाना है।
  • प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण में नामांकन, निरन्तरता और शिक्षा पूर्ण करना तीनों महत्वपूर्ण हैं।
  • भारत में 6 से 14 वर्ष आयु के बच्चों की निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है।
  • अनुच्छेद 21A 6–14 वर्ष के बच्चों की निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा से सम्बन्धित है।
  • अनुच्छेद 45 प्रारम्भिक बाल्यावस्था की देखभाल एवं शिक्षा से सम्बन्धित है।
  • अनुच्छेद 51A के अन्तर्गत माता-पिता/अभिभावक का अपने 6–14 वर्ष आयु के बच्चे को शिक्षा का अवसर देना कर्तव्य माना गया है।
  • शिक्षा का सार्वभौमीकरण सामाजिक न्याय, समानता और राष्ट्रीय विकास का महत्वपूर्ण आधार है।
Topic 2 शिक्षा के सार्वभौमीकरण के उद्देश्य, आवश्यकता, महत्त्व, बाधाएँ एवं उपाय

शिक्षा के सार्वभौमीकरण के उद्देश्य, आवश्यकता, महत्त्व, बाधाएँ एवं उपाय

शिक्षा के सार्वभौमीकरण के उद्देश्य

शिक्षा के सार्वभौमीकरण का उद्देश्य केवल प्रत्येक बच्चे को विद्यालय में प्रवेश दिलाना नहीं है, बल्कि शिक्षा को सर्वव्यापी बनाकर ऐसे शिक्षित एवं संगठित समाज का निर्माण करना है जिसमें प्रत्येक बालक का समग्र विकास हो सके। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

  1. शारीरिक, बौद्धिक एवं मानसिक विकास— बालक के शरीर, बुद्धि और मानसिक क्षमताओं का संतुलित विकास करना।
  2. नैतिक एवं चारित्रिक विकास— बालक में सत्य, अनुशासन, उत्तरदायित्व, ईमानदारी और अच्छे चरित्र का विकास करना।
  3. सांस्कृतिक विकास— बालकों को अपनी संस्कृति, परम्पराओं, भाषा और सामाजिक मूल्यों से परिचित कराना।
  4. सामाजिक कुशलता का विकास— बालक में सहयोग, सहिष्णुता, सामूहिकता और सामाजिक व्यवहार की क्षमता विकसित करना।
  5. व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास— बालक की जन्मजात शक्तियों और क्षमताओं को विकसित कर उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करना।
  6. विवेकपूर्ण निर्णय क्षमता— बालकों में उचित-अनुचित का निर्णय करने और समस्याओं के समाधान की क्षमता विकसित करना।
  7. अन्तर्वैयक्तिक संचार-कौशल— दूसरों के साथ प्रभावी ढंग से संवाद और व्यवहार करने की क्षमता विकसित करना।
  8. सामाजिक समायोजन— बालक को समाज के बदलते परिवेश के साथ उचित समायोजन करने योग्य बनाना।

शिक्षा के सार्वभौमीकरण की आवश्यकता एवं महत्त्व

किसी देश की प्रगति तभी सम्भव है जब शिक्षा समाज के प्रत्येक वर्ग और प्रत्येक बालक तक पहुँचे। शिक्षा व्यक्ति को केवल पढ़ना-लिखना नहीं सिखाती, बल्कि उसे आत्मनिर्भर, जागरूक, विवेकशील और उत्तरदायी नागरिक बनाती है। इसी कारण शिक्षा के सार्वभौमीकरण का व्यापक सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्त्व है।

1. निरक्षरता को दूर करने में सहायक

शिक्षित व्यक्ति स्वयं साक्षर होने के साथ अपने परिवार और आसपास के लोगों को भी शिक्षा के प्रति प्रेरित कर सकता है। इस प्रकार शिक्षा का प्रसार निरक्षरता को कम करने का प्रभावी साधन है।

2. दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति

प्रारम्भिक शिक्षा व्यक्ति को दैनिक जीवन में आवश्यक पढ़ने-लिखने, गणना करने, पत्र-व्यवहार, हिसाब-किताब तथा आधुनिक संचार साधनों के उपयोग जैसी क्षमताएँ प्रदान करती है। इससे व्यक्ति अधिक आत्मनिर्भर बनता है।

3. स्व-शिक्षा की क्षमता का विकास

प्रारम्भिक शिक्षा व्यक्ति में सीखने की आधारभूत क्षमता विकसित करती है। इसके बाद वह पुस्तक, समाचार-पत्र, अनुभव और अन्य साधनों से स्वयं भी नवीन ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

4. व्यक्तित्व के विकास के लिए

शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों को उचित दिशा देती है तथा उसकी बौद्धिक, सामाजिक, भावनात्मक और नैतिक क्षमताओं का विकास करती है। इससे व्यक्ति का संतुलित और सर्वांगीण विकास सम्भव होता है।

5. राजनीतिक जागरूकता के लिए

शिक्षा नागरिक को उसके अधिकारों, कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों के प्रति जागरूक करती है। शिक्षित नागरिक शासन और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझकर उनमें जिम्मेदारी से भाग ले सकता है।

6. लोकतन्त्र को सफल बनाने के लिए

लोकतन्त्र की सफलता जागरूक एवं विवेकशील नागरिकों पर निर्भर करती है। सार्वभौमिक शिक्षा नागरिकों में निर्णय-क्षमता, उत्तरदायित्व और सामाजिक चेतना विकसित करके लोकतन्त्र को मजबूत बनाती है।

7. राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विकास

शिक्षा विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं, संस्कृतियों और परम्पराओं के प्रति सम्मान विकसित करती है। इससे संकीर्णता कम होती है और राष्ट्रीय एकता, अखण्डता तथा देशभक्ति की भावना मजबूत होती है।

8. सामाजिक समानता और न्याय की स्थापना

सभी बच्चों को समान रूप से शिक्षा उपलब्ध कराने से सामाजिक और शैक्षिक असमानताएँ कम होती हैं। शिक्षा वंचित एवं कमजोर वर्गों को भी आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करती है।

9. साम्प्रदायिकता को कम करने में सहायक

शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक बुराइयों, अन्धविश्वास और संकीर्ण विचारों को समझने तथा उनसे ऊपर उठने की क्षमता देती है। इससे भाईचारा, सहिष्णुता और सामाजिक एकता को बढ़ावा मिलता है।

10. व्यावसायिक प्रगति

शिक्षा व्यक्ति को आवश्यक ज्ञान, कौशल और आधुनिक तकनीकों के उपयोग की क्षमता प्रदान करती है। इससे रोजगार और व्यवसाय में उसकी दक्षता तथा उत्पादकता बढ़ती है।

शिक्षा के सार्वभौमीकरण में प्रमुख बाधाएँ

सार्वभौमिक शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने में अनेक सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और भौगोलिक समस्याएँ बाधा उत्पन्न करती हैं। प्रमुख बाधाएँ निम्नलिखित हैं—

  1. औपनिवेशिक शिक्षा-नीति का प्रभाव— पूर्ववर्ती शिक्षा-व्यवस्था का उद्देश्य व्यापक जनशिक्षा की अपेक्षा सीमित वर्ग को शिक्षित करना था। इसका प्रभाव लम्बे समय तक शिक्षा के विस्तार पर पड़ा।
  2. अनिवार्य शिक्षा सम्बन्धी प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन न होना— केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है; उनका उचित पालन और निगरानी भी आवश्यक है।
  3. सुविधाओं की कमी— अनेक क्षेत्रों में पर्याप्त विद्यालय, भवन, शिक्षण सामग्री और अन्य आवश्यक सुविधाओं का अभाव सार्वभौमिक शिक्षा में बाधक है।
  4. रूढ़िवादिता और सामाजिक कुरीतियाँ— बाल-विवाह, अन्धविश्वास, लैंगिक भेदभाव तथा शिक्षा के प्रति रूढ़ दृष्टिकोण बच्चों की पढ़ाई को प्रभावित करते हैं।
  5. अपव्यय एवं अवरोधन— अनेक विद्यार्थी बीच में ही विद्यालय छोड़ देते हैं या एक ही कक्षा में बार-बार रुक जाते हैं। इससे प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण नहीं हो पाती।
  6. जनसंख्या में वृद्धि— छात्र संख्या बढ़ने के साथ विद्यालय, शिक्षक और अन्य संसाधनों की माँग भी बढ़ती है। पर्याप्त संसाधनों के अभाव में सबको शिक्षा उपलब्ध कराना कठिन हो जाता है।
  7. संसाधनों की कमी— शिक्षा के लिए पर्याप्त धन, भवन, शिक्षण सामग्री और अन्य संसाधनों का अभाव सार्वभौमीकरण को प्रभावित करता है।
  8. दोषपूर्ण नियोजन— उपलब्ध धन एवं संसाधनों का उचित नियोजन न होने से शिक्षा सम्बन्धी योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता।
  9. निर्धनता— आर्थिक रूप से कमजोर परिवार बच्चों को विद्यालय भेजने की अपेक्षा काम में लगाने को विवश हो सकते हैं। इससे बच्चों की शिक्षा बाधित होती है।
  10. योग्य शिक्षकों की कमी— विशेषकर ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में प्रशिक्षित एवं योग्य शिक्षकों का अभाव शिक्षा की पहुँच और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करता है।
  11. अनुपयुक्त पाठ्यक्रम— अत्यधिक पुस्तकीय, एकांगी और जीवन से असम्बद्ध पाठ्यक्रम बालकों की रुचि को कम कर सकता है।
  12. शिक्षा के माध्यम की समस्या— बहुभाषी समाज में शिक्षा के उपयुक्त माध्यम का चयन भी कई बार कठिनाई उत्पन्न करता है।
  13. प्राकृतिक एवं भौगोलिक बाधाएँ— पर्वतीय, दुर्गम तथा यातायात-विहीन क्षेत्रों में विद्यालय तक पहुँचना कठिन होने के कारण बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है।

शिक्षा के सार्वभौमीकरण के उपाय

सार्वभौमिक शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। सामाजिक जागरूकता, उचित प्रशासन, आर्थिक सहायता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण-व्यवस्था का विकास भी आवश्यक है।

1. जनसंख्या पर नियंत्रण एवं जनजागरूकता

जनसंख्या वृद्धि से शिक्षा के संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। इसलिए प्रौढ़ शिक्षा और जनजागरूकता के माध्यम से परिवार नियोजन तथा शिक्षा के महत्त्व की जानकारी दी जानी चाहिए।

2. माता-पिता को जागरूक करना

अभिभावकों को बच्चों की शिक्षा के महत्त्व, नियमित विद्यालय उपस्थिति और शिक्षा पूर्ण कराने के लाभों से परिचित कराया जाना चाहिए।

3. प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावी बनाना

केवल स्थानीय संस्थाओं पर सम्पूर्ण उत्तरदायित्व न छोड़कर सरकार तथा स्थानीय प्रशासन के बीच उचित समन्वय होना चाहिए। शिक्षा-नीतियों और योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

4. आर्थिक सहायता

विद्यालयों को आवश्यक भवन, शिक्षण सामग्री और अन्य सुविधाओं के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। गरीब एवं वंचित विद्यार्थियों को भी आवश्यक सहायता प्रदान की जानी चाहिए।

5. पर्याप्त एवं योग्य शिक्षकों की व्यवस्था

योग्य शिक्षकों को शिक्षा-व्यवस्था की ओर आकर्षित करने के लिए उचित वेतन, सुविधाएँ तथा प्रोत्साहन प्रदान किए जाने चाहिए। विशेष रूप से ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षकों की पर्याप्त व्यवस्था आवश्यक है।

6. उपयुक्त एवं बाल-केन्द्रित पाठ्यक्रम

पाठ्यक्रम को बच्चों की आयु, रुचि, आवश्यकता और जीवन की वास्तविक परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जाना चाहिए। पुस्तकीय ज्ञान के साथ व्यावहारिक तथा उपयोगी शिक्षा को भी महत्व मिलना चाहिए।

7. वंचित वर्गों के लिए विशेष विद्यालय एवं सुविधाएँ

दूरस्थ, पिछड़े तथा सामाजिक रूप से वंचित क्षेत्रों के बच्चों के लिए आवश्यकतानुसार विशेष विद्यालय, छात्रावास और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि उन्हें शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हों।

8. शिक्षा-नीति और क्रियान्वयन में सुधार

शिक्षा को प्रभावी रूप से अनिवार्य एवं सर्वसुलभ बनाने के लिए नीतियों को समयानुकूल बनाया जाए और उनके क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा की जाए।

9. शिफ्ट प्रणाली का उपयोग

जहाँ विद्यालय भवन और शिक्षकों की कमी हो, वहाँ उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए आवश्यकतानुसार दो पालियों में विद्यालय चलाए जा सकते हैं।

बाधा और उपाय—एक दृष्टि में

प्रमुख बाधा उपयुक्त उपाय
निर्धनता आर्थिक सहायता एवं निःशुल्क शिक्षा
अभिभावकों की अशिक्षा जागरूकता एवं प्रौढ़ शिक्षा
शिक्षकों की कमी योग्य शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्ति
विद्यालयों एवं सुविधाओं की कमी आर्थिक सहायता, नए विद्यालय एवं शिफ्ट प्रणाली
अपव्यय एवं अवरोधन नियमित उपस्थिति और विद्यालय में बच्चों को बनाए रखने के प्रयास
अनुपयुक्त पाठ्यक्रम बाल-केन्द्रित एवं जीवनोपयोगी पाठ्यक्रम
दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र स्थानीय स्तर पर विद्यालय एवं आवश्यक सुविधाओं का विस्तार

निष्कर्ष

शिक्षा का सार्वभौमीकरण सामाजिक समानता, लोकतन्त्र और राष्ट्रीय विकास की आधारशिला है। इसका वास्तविक उद्देश्य प्रत्येक बालक को केवल विद्यालय तक पहुँचाना नहीं, बल्कि उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करते हुए निर्धारित स्तर तक शिक्षा पूर्ण कराना है। इसके लिए सरकार, विद्यालय, शिक्षक, अभिभावक और समाज सभी का संयुक्त प्रयास आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सार्वभौमिक शिक्षा का उद्देश्य बालक का शारीरिक, मानसिक, नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास करना है।
  • यह निरक्षरता दूर करने, लोकतन्त्र को मजबूत बनाने, राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित करने और सामाजिक समानता स्थापित करने में सहायक है।
  • इसके प्रमुख बाधक निर्धनता, जनसंख्या वृद्धि, संसाधनों व शिक्षकों की कमी, सामाजिक रूढ़ियाँ, अपव्यय-अवरोधन, अनुपयुक्त पाठ्यक्रम और भौगोलिक कठिनाइयाँ हैं।
  • अभिभावक जागरूकता, आर्थिक सहायता, योग्य शिक्षक, बाल-केन्द्रित पाठ्यक्रम, विशेष सुविधाएँ तथा प्रभावी प्रशासन इसके प्रमुख उपाय हैं।
  • सार्वभौमीकरण तभी सफल है जब प्रत्येक बालक विद्यालय में प्रवेश ले, नियमित रूप से पढ़े और निर्धारित स्तर की शिक्षा पूर्ण करे।
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Topic 3 शैक्षिक अवसरों की समानता—अर्थ, विशेषताएँ, आवश्यकता, असमानता के कारण एवं सुझाव

शैक्षिक अवसरों की समानता—अर्थ, विशेषताएँ, आवश्यकता, असमानता के कारण एवं सुझाव

शैक्षिक अवसरों की समानता का अर्थ

शैक्षिक अवसरों की समानता से तात्पर्य है कि समाज के प्रत्येक बालक को बिना किसी भेदभाव के शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर और आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध हों। किसी व्यक्ति को धर्म, जाति, भाषा, लिंग, सामाजिक स्थिति या आर्थिक दशा के कारण शिक्षा से वंचित न किया जाए।

समानता का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक विद्यार्थी को बिल्कुल एक जैसी शिक्षा दी जाए। विद्यार्थियों की रुचि, योग्यता, क्षमता और आवश्यकताओं में भिन्नता होती है, इसलिए शिक्षा की सुविधाएँ ऐसी होनी चाहिए कि प्रत्येक विद्यार्थी अपनी क्षमता के अनुसार विकास कर सके।

संवैधानिक आधार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29(2) के अनुसार राज्य द्वारा संचालित अथवा राज्य से सहायता प्राप्त किसी शिक्षण संस्था में किसी नागरिक को केवल धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता।

इस प्रकार शैक्षिक अवसरों की समानता का मूल उद्देश्य शिक्षा के मार्ग में आने वाली सामाजिक, आर्थिक तथा अन्य बाधाओं को कम करते हुए सभी को उन्नति का उचित अवसर प्रदान करना है।

शिक्षा आयोग (1964–66) का दृष्टिकोण

शिक्षा आयोग ने शैक्षिक अवसरों की समानता को सामाजिक न्याय से जोड़ा। इसके अनुसार प्रत्येक योग्य व्यक्ति को शिक्षा प्राप्त करने तथा अपनी क्षमताओं के विकास के लिए समान अवसर मिलने चाहिए, जिससे वह सुविधापूर्ण एवं सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सके।

शैक्षिक अवसरों की समानता की विशेषताएँ

  1. शिक्षा प्रत्येक नागरिक का मूल अवसर है— प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलना चाहिए। शिक्षा जीवनभर चलने वाली विकास की प्रक्रिया है।
  2. लोकतन्त्र का आधार— लोकतान्त्रिक व्यवस्था तभी सफल हो सकती है जब सभी नागरिकों को शिक्षित होकर अपनी योग्यता और क्षमता विकसित करने के समान अवसर प्राप्त हों।
  3. राष्ट्र के विकास का साधन— राष्ट्र की प्रगति उसके नागरिकों के विकास पर निर्भर करती है। इसलिए शिक्षा में किसी भी प्रकार का भेदभाव राष्ट्रीय विकास के लिए हानिकारक है।
  4. व्यक्तित्व के पूर्ण विकास का अवसर— शिक्षा व्यक्ति की क्षमताओं, रुचियों और प्रतिभाओं को विकसित करती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर मिलने चाहिए।

शैक्षिक अवसरों की समानता की आवश्यकता

लोकतान्त्रिक और कल्याणकारी समाज में केवल शिक्षा उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि समाज के प्रत्येक वर्ग तक शिक्षा की सुविधाएँ पहुँचें। इसकी आवश्यकता निम्न कारणों से है—

1. लोकतन्त्र की रक्षा के लिए

लोकतन्त्र की सफलता योग्य, जागरूक और शिक्षित नागरिकों पर निर्भर करती है। यदि समाज के कुछ वर्ग शिक्षा से वंचित रह जाते हैं तो लोकतान्त्रिक मूल्यों का वास्तविक विकास नहीं हो सकता।

2. व्यक्तित्व के विकास के लिए

प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रतिभा और क्षमताओं के विकास का अवसर मिलना चाहिए। शिक्षा के समान अवसर मिलने से पिछड़े, निर्धन और वंचित वर्गों के व्यक्ति भी अपनी योग्यताओं को विकसित कर सकते हैं।

3. वर्गभेद को कम करने के लिए

शिक्षा तक पहुँच में असमानता सामाजिक और आर्थिक वर्गभेद को बढ़ाती है। सभी वर्गों को समान शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने से समाज में अवसरों की दूरी कम होती है।

4. समाज के उन्नयन के लिए

एक विकसित समाज के निर्माण के लिए उसके प्रत्येक सदस्य का शिक्षित होना आवश्यक है। जब शिक्षा सभी तक पहुँचती है तो समाज अधिक जागरूक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील बनता है।

5. राष्ट्र के आर्थिक विकास के लिए

मानव संसाधन का विकास शिक्षा द्वारा होता है। शिक्षित एवं प्रशिक्षित नागरिक अपनी योग्यता का उपयोग उत्पादन, तकनीक और आर्थिक गतिविधियों में करके राष्ट्र की प्रगति में योगदान देते हैं।

शैक्षिक अवसरों में असमानता के प्रमुख कारण

1. लैंगिक भेदभाव

कई स्थानों पर लड़कों की तुलना में लड़कियों की शिक्षा को कम महत्व दिया जाता है। सामाजिक परम्पराएँ, घरेलू उत्तरदायित्व और सुरक्षा सम्बन्धी चिंताएँ बालिकाओं की शिक्षा में बाधा बनती हैं। इससे समान शैक्षिक अवसरों का लक्ष्य प्रभावित होता है।

2. विद्यालयों की दूरी एवं अनुपलब्धता

यदि विद्यालय घर से बहुत दूर हो अथवा किसी क्षेत्र में पर्याप्त शिक्षण संस्थाएँ न हों तो विशेषकर छोटे बच्चों और बालिकाओं की शिक्षा बाधित होती है। ग्रामीण, पर्वतीय एवं दूरस्थ क्षेत्रों में यह समस्या अधिक दिखाई देती है।

3. आर्थिक समस्याएँ

निर्धन परिवारों के लिए भोजन, वस्त्र और आवास जैसी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति ही कठिन होती है। ऐसे परिवार बच्चों की शिक्षा पर पर्याप्त धन खर्च नहीं कर पाते और कई बार बच्चों को कम आयु में काम पर लगा देते हैं।

4. प्रादेशिक असन्तुलन

देश के सभी क्षेत्रों में शैक्षिक विकास समान नहीं है। किसी क्षेत्र में पर्याप्त विद्यालय, परिवहन और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में उनका अभाव है। इससे विभिन्न प्रदेशों और क्षेत्रों के बच्चों के शैक्षिक अवसरों में अंतर उत्पन्न होता है।

5. शारीरिक विकलांगता

विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए उपयुक्त भवन, शिक्षण सामग्री, सहायक उपकरण और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी होने पर वे समान शैक्षिक अवसरों से वंचित रह जाते हैं। इसलिए समावेशी शिक्षा की उचित व्यवस्था आवश्यक है।

6. घर का प्रतिकूल वातावरण

निर्धनता, अशिक्षा, पारिवारिक कलह, बच्चों की अधिक संख्या तथा असुरक्षित वातावरण बच्चे की शिक्षा को प्रभावित कर सकता है। ऐसे वातावरण में रहने वाले बच्चों के लिए नियमित अध्ययन करना कठिन हो जाता है।

7. मानसिक असन्तुलन एवं विशेष शैक्षिक आवश्यकताएँ

कुछ बच्चों को मानसिक अथवा बौद्धिक कठिनाइयों के कारण विशेष प्रकार की शिक्षा और सहायता की आवश्यकता होती है। उचित संस्थागत एवं शैक्षिक सहायता उपलब्ध न होने पर उन्हें समान अवसर नहीं मिल पाते।

शैक्षिक अवसरों में समानता स्थापित करने के सुझाव

1. शिक्षा का सार्वभौमीकरण

प्रत्येक बच्चे तक शिक्षा पहुँचाने के लिए शिक्षा को सर्वसुलभ बनाया जाना चाहिए। विद्यालय में प्रवेश के साथ-साथ बच्चों की नियमित उपस्थिति और शिक्षा पूर्ण करने की व्यवस्था भी आवश्यक है।

2. योग्यता के आधार पर विद्यार्थियों को अवसर

उच्च स्तर की शिक्षा में विद्यार्थियों को उनकी रुचि, योग्यता और क्षमता के आधार पर अवसर मिलना चाहिए। जाति, धर्म, भाषा, रंग या लिंग जैसे आधारों पर अनुचित भेदभाव नहीं होना चाहिए।

3. सामान्य विद्यालय प्रणाली

ऐसी विद्यालय प्रणाली विकसित की जानी चाहिए जिसमें विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक वर्गों के बच्चे समान शैक्षिक वातावरण में शिक्षा प्राप्त कर सकें। इससे सामाजिक दूरी कम होती है और समानता की भावना विकसित होती है।

4. प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था

जो व्यक्ति बाल्यावस्था में शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाए, उनके लिए प्रौढ़ शिक्षा की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षित माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति भी अधिक जागरूक होते हैं।

5. माध्यमिक शिक्षा का व्यवसायीकरण

माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक एवं कार्यपरक शिक्षा को स्थान दिया जाना चाहिए ताकि विद्यार्थियों को अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार रोजगारोन्मुख कौशल प्राप्त हो सकें। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में व्यावहारिक शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध होने चाहिए।

6. संवैधानिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास

शैक्षिक समानता से सम्बन्धित संवैधानिक प्रावधानों और नीतियों को प्रभावी रूप से लागू किया जाना चाहिए। नागरिकों को भी शिक्षा के अधिकार और उसके महत्व के प्रति जागरूक करना आवश्यक है।

असमानता और समाधान—एक दृष्टि में

असमानता का कारण प्रमुख समाधान
लैंगिक भेदभाव बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन और समान सुविधाएँ
विद्यालय की दूरी सुलभ विद्यालय एवं परिवहन सुविधा
आर्थिक कठिनाई आर्थिक सहायता एवं निःशुल्क शैक्षिक सुविधाएँ
प्रादेशिक असन्तुलन पिछड़े क्षेत्रों में शैक्षिक सुविधाओं का विस्तार
विशेष आवश्यकता समावेशी शिक्षा एवं आवश्यक सहायक सुविधाएँ
प्रतिकूल पारिवारिक वातावरण अभिभावक जागरूकता एवं सामाजिक सहायता

निष्कर्ष

शैक्षिक अवसरों की समानता का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यता, रुचि और आवश्यकता के अनुरूप शिक्षा प्राप्त करने का न्यायपूर्ण अवसर प्रदान करना है। वास्तविक समानता तभी सम्भव है जब सामाजिक, आर्थिक, लैंगिक, क्षेत्रीय और शारीरिक बाधाओं को दूर करके शिक्षा को सभी वर्गों के लिए सुलभ और उपयोगी बनाया जाए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • शैक्षिक अवसरों की समानता का अर्थ बिना अनुचित भेदभाव के सभी को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर देना है।
  • समानता का अर्थ सभी को बिल्कुल एक जैसी शिक्षा देना नहीं, बल्कि उनकी योग्यता एवं आवश्यकता के अनुसार उचित अवसर देना है।
  • यह लोकतन्त्र, सामाजिक न्याय, व्यक्तित्व विकास और राष्ट्रीय प्रगति के लिए आवश्यक है।
  • लैंगिक भेदभाव, निर्धनता, विद्यालयों की दूरी, प्रादेशिक असन्तुलन, विशेष आवश्यकताएँ और प्रतिकूल पारिवारिक वातावरण इसके प्रमुख बाधक हैं।
  • शिक्षा का सार्वभौमीकरण, सामान्य विद्यालय प्रणाली, प्रौढ़ शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा तथा संवैधानिक प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन शैक्षिक समानता स्थापित करने के प्रमुख उपाय हैं।
Topic 4 शिक्षा का व्यवसायीकरण—अवधारणा, अर्थ, विशेषताएँ, सम्बन्ध, आवश्यकता एवं महत्त्व

शिक्षा का व्यवसायीकरण—अवधारणा, अर्थ, विशेषताएँ, सम्बन्ध, आवश्यकता एवं महत्त्व

शिक्षा के व्यवसायीकरण की अवधारणा

शिक्षा के व्यवसायीकरण का अर्थ शिक्षा को इस प्रकार उपयोगी और कार्यपरक बनाना है कि विद्यार्थी अध्ययन के साथ किसी व्यवसाय, कार्य या रोजगार से सम्बन्धित आवश्यक ज्ञान, कौशल और तकनीकों को भी सीख सके। इसका उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान देना नहीं, बल्कि विद्यार्थी को जीवन और जीविकोपार्जन के लिए तैयार करना है।

आधुनिक समाज में विभिन्न क्षेत्रों के लिए कुशल एवं प्रशिक्षित कर्मचारियों की आवश्यकता लगातार बढ़ती रहती है। यदि शिक्षा व्यक्ति को किसी उपयोगी कार्य के योग्य नहीं बनाती तो उसका व्यावहारिक महत्त्व कम हो जाता है। इसलिए विशेष रूप से माध्यमिक स्तर पर शिक्षा को व्यवसायोन्मुख बनाने पर बल दिया गया।

व्यवसायीकरण के अन्तर्गत सामान्य शिक्षा के पाठ्यक्रम में व्यावसायिक ज्ञान, कौशल तथा तकनीकी प्रशिक्षण को इस प्रकार सम्मिलित किया जाता है कि विद्यार्थी अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद किसी उपयुक्त व्यवसाय को अपनाकर जीविकोपार्जन कर सके।

व्यवसायीकरण के विकास सम्बन्धी प्रमुख प्रयास
  • माध्यमिक शिक्षा आयोग ने माध्यमिक स्तर पर बहुउद्देशीय विद्यालयों की स्थापना का सुझाव दिया, जिससे विद्यार्थियों को विभिन्न व्यवसायों की शिक्षा दी जा सके।
  • कोठारी आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में व्यवसायीकरण को सम्मिलित करने तथा कार्यानुभव और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को महत्त्व देने की बात कही।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 तथा 1986 में भी व्यावसायिक शिक्षा को महत्त्व दिया गया।
  • माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों को रोजगारोन्मुख शिक्षा देने के लिए व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के विस्तार पर बल दिया गया।

व्यवसायीकरण का अर्थ

व्यवसाय वह कार्य है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपना जीविकोपार्जन करता है। शिक्षा के सन्दर्भ में व्यवसायीकरण का अर्थ ऐसी शिक्षा से है जो विद्यार्थी को किसी निश्चित व्यवसाय से सम्बन्धित ज्ञान और कौशल प्रदान करे तथा उसे भविष्य में आत्मनिर्भर बनने योग्य बनाए।

यह केवल नौकरी प्राप्त करने का प्रशिक्षण नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य व्यक्ति की व्यावसायिक रुचियों, योग्यताओं और कार्य-कुशलताओं को विकसित करना तथा उसे समाज के उत्पादक सदस्य के रूप में तैयार करना है।

आर. के. शर्मा के अनुसार

व्यवसायीकरण का सम्बन्ध समाज के उन दायित्वों और वर्गों से है जिन्हें किसी विशेष व्यवसाय के आधार पर पहचान प्राप्त होती है तथा जो समाज और उसके सदस्यों के लिए उपयोगी कार्य करते हैं।

एस. के. दुबे के अनुसार

व्यवसायीकरण का सम्बन्ध ऐसे जीविकोपार्जन सम्बन्धी व्यवसाय से है जिसे समाज के किसी वर्ग द्वारा स्वीकार किया जाता है तथा जिसे सामाजिक मान्यता प्राप्त होती है।

इन विचारों से स्पष्ट है कि व्यवसायीकरण व्यक्ति और समाज दोनों की आवश्यकता है। व्यक्ति इसके माध्यम से जीविका अर्जित करता है, जबकि समाज को विभिन्न क्षेत्रों के लिए प्रशिक्षित एवं कुशल मानव-शक्ति प्राप्त होती है।

व्यवसायीकरण की प्रमुख विशेषताएँ

  1. मानव एवं समाज की प्रगति का आधार— व्यवसायीकरण के बिना आधुनिक समाज की आर्थिक और सामाजिक उन्नति की कल्पना कठिन है।
  2. व्यक्ति की पहचान का माध्यम— व्यक्ति अपने व्यवसाय, कार्य और विशेषज्ञता के माध्यम से समाज में विशिष्ट पहचान प्राप्त करता है।
  3. जीविकोपार्जन से सम्बन्ध— व्यवसायीकरण का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध व्यक्ति, समूह और समुदाय के जीविकोपार्जन से होता है।
  4. कौशल एवं दक्षताओं का विकास— इसके माध्यम से व्यक्ति में किसी विशेष व्यवसाय से सम्बन्धित ज्ञान, दक्षता और कौशल विकसित किए जा सकते हैं।
  5. शिक्षा और समाज से घनिष्ठ सम्बन्ध— समाज की व्यावसायिक आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा में परिवर्तन किया जाता है और शिक्षा समाज को प्रशिक्षित मानव-संसाधन प्रदान करती है।
  6. आर्थिक एवं औद्योगिक विकास में सहायक— कुशल मानव-शक्ति उत्पादन, उद्योग और आर्थिक विकास को गति प्रदान करती है।
  7. प्रतिस्पर्धा की भावना का विकास— व्यवसायीकरण व्यक्ति को अपने कार्य में अधिक कुशल बनने तथा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
  8. मानव कल्याण की भावना— व्यवसाय का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत आय अर्जित करना नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करना भी है।

व्यवसायीकरण और शिक्षा का सम्बन्ध

शिक्षा और व्यवसायीकरण एक-दूसरे के पूरक हैं। शिक्षा व्यक्ति को व्यवसाय के चुनाव और उसके लिए आवश्यक तैयारी में सहायता करती है, जबकि समाज की व्यावसायिक आवश्यकताएँ शिक्षा के स्वरूप और पाठ्यक्रम को प्रभावित करती हैं।

  1. व्यवसाय के विभिन्न क्षेत्रों के विकास के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल शिक्षा द्वारा प्रदान किए जाते हैं।
  2. शिक्षा व्यक्ति को अपनी रुचि, योग्यता और क्षमता के अनुसार उचित व्यवसाय चुनने में सहायता करती है।
  3. जिस देश की शिक्षा-व्यवस्था जितनी विकसित और विविध होगी, वहाँ विभिन्न व्यवसायों के विकास की सम्भावनाएँ भी उतनी अधिक होंगी।
  4. आधुनिक समय में रोजगारोन्मुख एवं क्रियाप्रधान शिक्षा जनकल्याण की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक है।
  5. शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति की व्यावसायिक रुचि, कौशल, योग्यता और कार्य-दक्षता विकसित की जाती है।
  6. शिक्षा व्यक्ति को उस व्यवसाय की ओर ले जाने में सहायता करती है जिसके लिए वह अधिक योग्य है।
  7. विभिन्न व्यवसायों की जानकारी शिक्षा द्वारा देकर व्यक्ति को अपनी रुचि के अनुरूप उचित क्षेत्र चुनने में सहायता दी जाती है।
  8. शिक्षा के माध्यम से नई व्यावसायिक तकनीकों, उपकरणों एवं प्रशिक्षण-पद्धतियों का ज्ञान प्राप्त होता है।

व्यवसायीकरण और समाज का सम्बन्ध

समाज और व्यवसायीकरण के बीच भी घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाज में रहने वाला लगभग प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी कार्य या व्यवसाय से सम्बन्धित होता है। इसलिए समाज की आर्थिक, औद्योगिक और सामाजिक संरचना पर व्यवसायों का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।

  1. भौतिक उन्नति का आधार— व्यवसायों की प्रगति से उत्पादन और आर्थिक समृद्धि में वृद्धि होती है, जिससे समाज की भौतिक उन्नति होती है।
  2. सामाजिक संरचना का निर्माण— विभिन्न व्यक्तियों एवं समूहों के व्यवसाय समाज की आर्थिक और सामाजिक संरचना को प्रभावित करते हैं।
  3. विकास एवं आर्थिक उत्थान— समाज की प्रगति के लिए प्रशिक्षित एवं कुशल मानव-शक्ति आवश्यक है, जिसकी पूर्ति व्यवसायीकरण द्वारा होती है।
  4. समग्र सामाजिक विकास— विभिन्न व्यवसाय समाज के अलग-अलग क्षेत्रों की आवश्यकताओं को पूरा करके उसके सर्वांगीण विकास में सहयोग करते हैं।
  5. आत्मनिर्भरता— व्यवसायीकरण व्यक्ति और समाज दोनों को आत्मनिर्भर बनाने में सहायता करता है।
  6. आधुनिक समाज की आवश्यकता— आधुनिक युग में प्रत्येक कार्य को अधिक दक्ष और व्यावसायिक रूप से करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, इसलिए व्यवसायीकरण का महत्त्व लगातार बढ़ रहा है।
  7. मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति— विभिन्न व्यवसायों के माध्यम से समाज के सदस्यों की अनेक आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति होती है।

शिक्षा के व्यवसायीकरण की आवश्यकता एवं महत्त्व

1. आर्थिक विकास

देश के आर्थिक और औद्योगिक विकास के लिए प्रशिक्षित एवं कुशल मानव-शक्ति आवश्यक होती है। शिक्षा का व्यवसायीकरण विद्यार्थियों को उपयोगी कौशल प्रदान करता है, जिससे वे उत्पादन तथा रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान दे सकते हैं।

व्यवसायोन्मुख शिक्षा बेरोजगारी की समस्या को कम करने और विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाने में भी सहायक होती है। इससे उपलब्ध मानवीय एवं प्राकृतिक संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग सम्भव होता है।

2. विद्यार्थियों की रुचियों, योग्यताओं एवं प्रतिभाओं का विकास

सभी विद्यार्थियों की रुचियाँ और योग्यताएँ समान नहीं होतीं। व्यवसायीकरण के द्वारा विद्यार्थियों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुरूप प्रशिक्षण दिया जा सकता है। इससे उनकी छिपी हुई प्रतिभाएँ और व्यावहारिक क्षमताएँ विकसित होती हैं।

3. शिक्षा-प्रक्रिया को उद्देश्यपूर्ण बनाना

जब शिक्षा को जीवन और कार्य से जोड़ दिया जाता है तो वह विद्यार्थी के लिए अधिक उपयोगी और अर्थपूर्ण बनती है। व्यवसायीकरण शिक्षा को स्पष्ट दिशा प्रदान करता है और केवल प्रमाण-पत्र प्राप्त करने की प्रवृत्ति के स्थान पर कार्य-कौशल के विकास को महत्त्व देता है।

4. नैतिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विकास

व्यवसायीकरण का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं है। उपयुक्त व्यवसाय प्राप्त होने से व्यक्ति में उत्तरदायित्व, आत्मनिर्भरता, श्रम के प्रति सम्मान और सामाजिक उपयोगिता की भावना विकसित होती है। इससे उसके नैतिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विकास को भी आधार मिलता है।

सामान्य शिक्षा और व्यवसायोन्मुख शिक्षा में अन्तर

आधार सामान्य शिक्षा व्यवसायोन्मुख शिक्षा
मुख्य उद्देश्य सामान्य ज्ञान एवं व्यक्तित्व विकास ज्ञान के साथ रोजगारोपयोगी कौशल का विकास
प्रकृति अधिकतर सैद्धान्तिक व्यावहारिक एवं कार्यपरक
जीविकोपार्जन प्रत्यक्ष सम्बन्ध आवश्यक नहीं जीविकोपार्जन से प्रत्यक्ष सम्बन्ध
प्रशिक्षण सामान्य विषयों पर बल विशेष कौशल एवं तकनीकी प्रशिक्षण पर बल

निष्कर्ष

शिक्षा का व्यवसायीकरण शिक्षा को जीवन, कार्य और रोजगार से जोड़ने की प्रक्रिया है। इसके द्वारा विद्यार्थी केवल ज्ञान प्राप्त नहीं करता, बल्कि अपनी रुचि और योग्यता के अनुरूप व्यावहारिक कौशल विकसित करके आत्मनिर्भर बनने की क्षमता प्राप्त करता है। इसलिए आधुनिक समाज के आर्थिक, औद्योगिक और सामाजिक विकास के लिए व्यवसायोन्मुख शिक्षा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • शिक्षा का व्यवसायीकरण शिक्षा में व्यवसाय सम्बन्धी ज्ञान, कौशल और तकनीकों को सम्मिलित कर विद्यार्थी को जीविकोपार्जन योग्य बनाने की प्रक्रिया है।
  • यह व्यक्ति की रुचि, योग्यता और क्षमता के अनुरूप व्यावसायिक दक्षताओं का विकास करता है।
  • शिक्षा और व्यवसायीकरण परस्पर पूरक हैं—शिक्षा व्यवसाय के लिए आवश्यक ज्ञान व प्रशिक्षण प्रदान करती है।
  • व्यवसायीकरण व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है तथा समाज को कुशल मानव-शक्ति उपलब्ध कराता है।
  • आर्थिक विकास, रोजगार, विद्यार्थियों की प्रतिभा का विकास तथा शिक्षा को उद्देश्यपूर्ण बनाना इसके प्रमुख महत्त्व हैं।
Topic 5 बचपन छीनता बालश्रम—अर्थ, कारण, समस्याएँ, शिक्षा में बाधा एवं उन्मूलन के उपाय

बचपन छीनता बालश्रम—अर्थ, कारण, समस्याएँ, शिक्षा में बाधा एवं उन्मूलन के उपाय

बालश्रम : भूमिका

बाल्यावस्था व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास की आधारभूत अवस्था है। इस समय बच्चे को उचित देखभाल, प्रेम, सुरक्षा, पौष्टिक आहार, खेल और शिक्षा की आवश्यकता होती है। यदि इसी अवस्था में उसे आजीविका के लिए श्रम करने पर विवश कर दिया जाए तो उसके स्वाभाविक विकास में गंभीर बाधा उत्पन्न होती है।

बालक के प्रारम्भिक वर्ष उसके सम्पूर्ण भावी जीवन की नींव रखते हैं। इसी अवधि में उसका व्यवहार, सोच, सीखने की क्षमता और सामाजिक दृष्टिकोण विकसित होता है। इसलिए बालक को शिक्षा और विकास के अवसरों से वंचित कर काम में लगाना उसके बचपन को छीनने के समान है।

बालश्रम केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और बाल-अधिकारों से जुड़ी एक गंभीर समस्या है।

बालश्रम का अर्थ

सामान्य रूप से बालश्रम से आशय ऐसी स्थिति से है जिसमें कम आयु के बच्चों को उनके बचपन, खेल, शिक्षा और स्वाभाविक विकास के अवसरों से वंचित करके आर्थिक लाभ के लिए श्रम में लगा दिया जाता है।

ऐसे बच्चों से प्रायः कम पारिश्रमिक पर अधिक समय तक कार्य कराया जाता है। इससे उनका शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक और सामाजिक विकास प्रभावित होता है।

बालश्रम की प्रमुख परिभाषाओं का सार
  • बालश्रम ऐसी स्थिति है जिसमें कम आयु के बच्चे को खतरनाक अथवा श्रमसाध्य कार्यों में लगाया जाता है और उसका सामान्य विकास प्रभावित होता है।
  • जनगणना सम्बन्धी दृष्टिकोण में ऐसा बालक बाल-श्रमिक माना जाता है जो दिन का बड़ा भाग शारीरिक श्रम में व्यतीत करता है और उसकी आयु 14 वर्ष से कम होती है।
  • मीनाक्षी अग्रवाल के विचार से बाल-श्रमिक वे असहाय एवं शोषित बच्चे हैं जिन्हें अपनी या दूसरों की आजीविका के लिए श्रम करना पड़ता है।

इन विचारों से स्पष्ट है कि बालश्रम का मुख्य आधार कम आयु, आर्थिक विवशता, शोषण तथा शिक्षा और बचपन से वंचित होना है।

बालश्रम के प्रमुख कारण

1. जनसंख्या में वृद्धि

जनसंख्या बढ़ने पर सीमित संसाधनों, रोजगार तथा आय के साधनों पर दबाव बढ़ता है। निर्धन परिवारों में परिवार के सभी सदस्यों से आर्थिक योगदान की अपेक्षा की जाने लगती है, जिसके कारण बच्चों को भी कम आयु में श्रम करना पड़ता है।

2. गरीबी

बालश्रम का सबसे प्रमुख कारण गरीबी है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के माता-पिता बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर पाते। फलतः बच्चे परिवार की आय बढ़ाने के लिए काम करने लगते हैं।

3. अनिवार्य शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी

कई माता-पिता निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार तथा शिक्षा के दीर्घकालीन महत्त्व से परिचित नहीं होते। इसके कारण वे बच्चे को विद्यालय भेजने के बजाय काम पर भेजना अधिक उपयोगी समझते हैं।

4. अशिक्षा

अशिक्षित माता-पिता प्रायः शिक्षा के महत्त्व और उससे मिलने वाले भविष्य के लाभों को ठीक प्रकार नहीं समझ पाते। परिणामस्वरूप वे बच्चों को पढ़ाने की अपेक्षा श्रम में लगाने लगते हैं।

5. शिक्षा की अधिक लागत

यद्यपि प्रारम्भिक शिक्षा के लिए अनेक सुविधाएँ उपलब्ध हैं, फिर भी परिवहन, सामग्री तथा अन्य खर्च निर्धन परिवारों के लिए कठिन हो सकते हैं। आर्थिक दबाव के कारण कुछ परिवार बच्चों की शिक्षा जारी नहीं रख पाते।

6. अकुशल श्रमिकों की अधिक माँग

बालक कम मजदूरी पर कार्य करने के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। इसलिए ऐसे कार्यों में जहाँ अकुशल और सस्ते श्रमिकों की माँग अधिक होती है, वहाँ बालश्रम को बढ़ावा मिलता है।

बाल-श्रमिकों की प्रमुख समस्याएँ

1. स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ

अधिक समय तक कार्य करने, अस्वास्थ्यकर वातावरण, कम भोजन और अधिक श्रम के कारण बाल-श्रमिक अनेक शारीरिक समस्याओं से ग्रस्त हो जाते हैं। उनकी वृद्धि, पोषण और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

कारखानों, उद्योगों और अन्य असुरक्षित स्थानों पर कार्य करने वाले बच्चों में आँख, श्वसन तथा शारीरिक कमजोरी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

2. शैक्षिक समस्या

जिस आयु में बच्चे को विद्यालय जाकर शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए और खेल के माध्यम से उसका मानसिक विकास होना चाहिए, उसी समय यदि वह श्रम में लग जाता है तो उसकी शिक्षा बीच में छूट जाती है। इससे उसके भविष्य की प्रगति के अवसर सीमित हो जाते हैं।

3. आर्थिक शोषण

बाल-श्रमिकों को सामान्यतः बहुत कम पारिश्रमिक दिया जाता है। कई बार मालिक या मध्यस्थ उनके पारिश्रमिक का कुछ हिस्सा स्वयं रख लेते हैं। इस प्रकार बच्चे आर्थिक शोषण के शिकार होते हैं।

4. भावनात्मक एवं मानसिक शोषण

बाल-श्रमिकों को डाँट, अपमान, भय और कभी-कभी शारीरिक उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है। इससे उनमें तनाव, भय, निराशा और मानसिक असुरक्षा उत्पन्न हो सकती है।

5. स्वाभिमान की कमी

लगातार उपेक्षा और शोषण के कारण बच्चे में आत्मसम्मान का विकास नहीं हो पाता। वह स्वयं को दूसरों से कमतर समझने लगता है।

6. अपराधी व्यवहार की सम्भावना

असुरक्षित वातावरण और अनुचित संगति के कारण कुछ बाल-श्रमिक चोरी, नशा, जुआ तथा अन्य असामाजिक व्यवहारों की ओर आकर्षित हो सकते हैं।

7. वैयक्तिक एवं सामाजिक विघटन

लम्बे कार्य-घंटों के कारण बालक परिवार, मित्रों और समाज से दूर होता जाता है। इससे उसका सामाजिक विकास बाधित होता है और वह तनाव तथा अकेलेपन का अनुभव करता है।

बालश्रम : निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा में बाधक

बालश्रम और सार्वभौमिक शिक्षा एक-दूसरे के विपरीत हैं। जब बच्चा रोजी-रोटी के लिए काम करता है तो उसके लिए नियमित रूप से विद्यालय जाना कठिन हो जाता है। इस प्रकार बालश्रम निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के लक्ष्य की प्राप्ति में बड़ी बाधा है।

6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था तभी प्रभावी हो सकती है जब बच्चों को श्रम से मुक्त कर विद्यालय तक पहुँचाया जाए।

बालश्रम द्वारा शिक्षा में उत्पन्न प्रमुख बाधाएँ
  1. निर्धनता— गरीब परिवार अपनी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बच्चों की कमाई पर निर्भर हो जाते हैं।
  2. पारिवारिक परिस्थितियाँ— पारिवारिक कलह, टूटा परिवार, आर्थिक संकट और उचित दिशा-निर्देशन का अभाव बच्चों को विद्यालय से दूर कर सकता है।
  3. अशिक्षा— अशिक्षित परिवार शिक्षा के महत्त्व को न समझ पाने के कारण बालक को श्रम में लगा देते हैं।
  4. असंवेदनशील शिक्षा-व्यवस्था— विद्यालयों में संसाधनों, शिक्षकों और उपयुक्त सुविधाओं की कमी के कारण कुछ बच्चे शिक्षा से आकर्षित नहीं हो पाते।
  5. वित्तीय असमानता— निर्धन परिवार छोटे-मोटे व्यवसाय या वैकल्पिक आय के साधन न होने के कारण बच्चों की आय पर निर्भर हो जाते हैं।
  6. कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की कमी— बालश्रम रोकने के लिए कानूनी प्रावधान होने पर भी उनका प्रभावी पालन न होने से समस्या बनी रहती है।
  7. बचपन से वंचित होना— बालश्रम बच्चे से खेल, मित्रता, शिक्षा और आनंद के वे अवसर छीन लेता है जो उसके स्वस्थ व्यक्तित्व के निर्माण के लिए आवश्यक हैं।

बालश्रम उन्मूलन के उपाय

1. निःशुल्क शिक्षा की प्रभावी व्यवस्था

बालश्रम समाप्त करने के लिए प्रत्येक बच्चे तक निःशुल्क शिक्षा की वास्तविक पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए। केवल विद्यालय खोलना पर्याप्त नहीं है; यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चा नियमित रूप से विद्यालय जाए और अपनी शिक्षा पूर्ण करे।

2. नैतिक प्रेरणा

बालश्रम को केवल कानूनी समस्या न मानकर सामाजिक और नैतिक समस्या के रूप में भी समझना चाहिए। बच्चों से श्रम कराने वाले व्यक्तियों, उद्योगों और समाज को इसके हानिकारक प्रभावों से परिचित कराना आवश्यक है।

3. कुशल एवं प्रशिक्षित श्रमिकों की माँग बढ़ाना

अकुशल और सस्ते श्रमिकों की माँग बालश्रम को बढ़ाती है। यदि समाज में कुशल एवं प्रशिक्षित श्रमिकों को अधिक महत्त्व और रोजगार मिले तो बालश्रम की माँग कम की जा सकती है।

इसके लिए गरीब परिवारों के वयस्क सदस्यों को प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर प्रदान करना आवश्यक है।

4. जागरूकता का प्रसार

माता-पिता और समाज को निःशुल्क शिक्षा, बालश्रम के दुष्परिणाम तथा बच्चों के विकास की आवश्यकताओं से परिचित कराया जाना चाहिए। विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और जनसंचार माध्यमों द्वारा जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं।

5. निर्धन परिवारों का सशक्तीकरण

बालश्रम से सर्वाधिक प्रभावित निर्धन परिवार होते हैं। इसलिए उन्हें रोजगार के अवसर, आर्थिक सहायता तथा छोटे व्यवसाय के साधन उपलब्ध कराना आवश्यक है। परिवार की आय बढ़ने पर बच्चों को काम पर भेजने की आर्थिक विवशता कम होती है।

बालश्रम और शिक्षा का सम्बन्ध

बालश्रम शिक्षा
बच्चे को कम आयु में कार्य में लगाता है। बच्चे के ज्ञान और क्षमता का विकास करती है।
विद्यालय से दूरी बढ़ाता है। विद्यालय से जुड़ाव बढ़ाती है।
शारीरिक एवं मानसिक विकास में बाधक है। सर्वांगीण विकास में सहायक है।
गरीबी और शोषण का चक्र बनाए रख सकता है। आत्मनिर्भरता और बेहतर भविष्य का आधार बनती है।

निष्कर्ष

बालश्रम बच्चे से उसका बचपन, शिक्षा और विकास के अवसर छीन लेता है। गरीबी, अशिक्षा, जनसंख्या वृद्धि, जागरूकता की कमी तथा सस्ते श्रम की माँग इसके प्रमुख कारण हैं। इसका स्थायी समाधान तभी सम्भव है जब निःशुल्क शिक्षा को प्रभावी बनाया जाए, गरीब परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त किया जाए, समाज में जागरूकता बढ़ाई जाए और बच्चों को विद्यालय तथा स्वस्थ विकास से जोड़ा जाए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • बालश्रम वह स्थिति है जिसमें बच्चे को शिक्षा, खेल और स्वाभाविक विकास से वंचित कर श्रम में लगाया जाता है।
  • गरीबी, जनसंख्या वृद्धि, अशिक्षा, अनिवार्य शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी और अकुशल श्रमिकों की माँग इसके प्रमुख कारण हैं।
  • बालश्रम से स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक स्थिति, मानसिक विकास, स्वाभिमान और सामाजिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • बालश्रम निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के लक्ष्य की प्राप्ति में प्रमुख बाधा है।
  • निःशुल्क शिक्षा, जागरूकता, कुशल रोजगार, प्रभावी क्रियान्वयन तथा गरीब परिवारों का सशक्तीकरण बालश्रम उन्मूलन के प्रमुख उपाय हैं।
Topic 6 जनसंख्या शिक्षा—अर्थ, उद्देश्य, महत्त्व, समस्याएँ एवं समाधान

जनसंख्या शिक्षा—अर्थ, उद्देश्य, महत्त्व, समस्याएँ एवं समाधान

जनसंख्या शिक्षा का अर्थ

तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरणीय तथा संसाधनों से सम्बन्धित अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इन समस्याओं को समझने, जनसंख्या वृद्धि के प्रभावों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने तथा उत्तरदायी व्यवहार विकसित करने के लिए दी जाने वाली शिक्षा को जनसंख्या शिक्षा कहा जाता है।

जनसंख्या शिक्षा केवल जनसंख्या की संख्या का अध्ययन नहीं है। इसके अन्तर्गत जनसंख्या वृद्धि का व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व पर पड़ने वाला प्रभाव, छोटे परिवार का महत्त्व, संसाधनों का उचित उपयोग तथा जनसंख्या नियंत्रण से सम्बन्धित समझ विकसित की जाती है।

जनसंख्या शिक्षा की अवधारणा

भारत में जनसंख्या शिक्षा के विकास में अमेरिकी शिक्षाविद् डॉ. मलेया के विचारों का प्रभाव रहा। प्रोफेसर बैलेंडेजेन के कार्यों से प्रभावित होकर भारत में भी जनसंख्या शिक्षा के प्रसार पर विचार किया गया। 7–8 मार्च, 1968 को मुम्बई में आयोजित एक सेमिनार में इसे सामान्य शिक्षा का अंग बनाने पर बल दिया गया।

सन् 1980 में भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय जनसंख्या परियोजना की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य विद्यालयों, महाविद्यालयों, प्रौढ़ों तथा अनौपचारिक शिक्षा से जुड़े लोगों तक छोटे परिवार और जनसंख्या सम्बन्धी आवश्यक संदेश पहुँचाना था।

प्रमुख परिभाषाएँ

जनसंख्या शिक्षा ऐसा शैक्षिक कार्यक्रम है जिसमें परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व की जनसंख्या की स्थिति का अध्ययन किया जाता है तथा विद्यार्थियों में उसके प्रति विवेकपूर्ण और उत्तरदायित्वपूर्ण दृष्टिकोण विकसित किया जाता है।

मनियालिस के अनुसार— जनसंख्या शिक्षा मानव जनसंख्या की प्रकृति, उसमें होने वाले परिवर्तनों तथा उनके प्राकृतिक और मानवीय प्रभावों को समझने की अध्ययन-विधि है।

जनसंख्या शिक्षा की मुख्य बातें
  • यह एक शैक्षिक कार्यक्रम है।
  • यह जनसंख्या वृद्धि और उसके प्रभावों का अध्ययन कराती है।
  • यह विद्यार्थियों में जनसंख्या सम्बन्धी सही एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करती है।
  • यह व्यक्ति को उत्तरदायी पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के लिए तैयार करती है।

जनसंख्या शिक्षा के उद्देश्य

जनसंख्या शिक्षा का उद्देश्य केवल जनसंख्या वृद्धि की जानकारी देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में ऐसी समझ और व्यवहार विकसित करना है जिससे वे जनसंख्या सम्बन्धी समस्याओं के प्रति उत्तरदायी बन सकें।

  1. विद्यार्थियों को जनसंख्या वृद्धि के कारणों का ज्ञान कराना।
  2. बढ़ती जनसंख्या का व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव समझाना।
  3. विद्यार्थियों को छोटे एवं सुखी परिवार की उपयोगिता से परिचित कराना।
  4. बड़े परिवारों के कारण उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों से परिचित कराना।
  5. जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न होने वाली विभिन्न समस्याओं का ज्ञान देना।
  6. जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के विभिन्न उपायों से परिचित कराना।
  7. विद्यार्थियों में जनसंख्या नियंत्रण के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित करना।
  8. उपलब्ध संसाधनों के उचित एवं सीमित उपयोग की भावना विकसित करना।
  9. विद्यार्थियों को जीवन-स्तर सुधारने से सम्बन्धित आवश्यक ज्ञान प्रदान करना।

जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्त्व

बढ़ती हुई जनसंख्या आज विश्व की प्रमुख समस्याओं में से एक है। जनसंख्या के अत्यधिक बढ़ने पर भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। इसलिए जनसंख्या शिक्षा व्यक्ति को जनसंख्या वृद्धि के परिणाम समझाकर उत्तरदायी व्यवहार के लिए तैयार करती है।

1. छोटे परिवार की भावना का विकास

जनसंख्या शिक्षा द्वारा यह समझ विकसित की जा सकती है कि छोटा परिवार अपने सदस्यों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और जीवन-स्तर की बेहतर व्यवस्था कर सकता है। इससे व्यक्ति परिवार नियोजन के प्रति जागरूक होता है।

2. विवाह से पूर्व उचित जानकारी

युवक एवं युवतियों को विवाह से पूर्व बढ़ती जनसंख्या और उससे सम्बन्धित पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं की जानकारी देना आवश्यक है, जिससे वे भविष्य में उत्तरदायी निर्णय ले सकें।

3. नागरिक कल्याण में सहायक

राष्ट्र अपने नागरिकों के स्वास्थ्य, कल्याण और समुचित विकास की जिम्मेदारी तभी प्रभावी रूप से निभा सकता है जब जनसंख्या और उपलब्ध संसाधनों के बीच उचित संतुलन बना रहे।

4. आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति

अत्यधिक जनसंख्या आर्थिक विकास की गति को प्रभावित करती है। जनसंख्या शिक्षा लोगों को जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक-सामाजिक समस्याओं के सम्बन्ध को समझने में सहायता देती है।

5. जनसंख्या अध्ययन को शिक्षा से जोड़ना

जिस प्रकार जीव-जगत के अध्ययन के लिए जीव विज्ञान आवश्यक है, उसी प्रकार मानव जनसंख्या की प्रकृति और उसके प्रभावों को समझने के लिए जनसंख्या शिक्षा को भी शिक्षा-व्यवस्था से जोड़ना उपयोगी है।

6. आवश्यक संसाधनों पर दबाव कम करना

जनसंख्या बढ़ने से भोजन, वस्त्र, आवास तथा अन्य आवश्यक संसाधनों की माँग बढ़ती है। जनसंख्या शिक्षा संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग तथा जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता समझाती है।

7. प्राकृतिक संसाधनों एवं पर्यावरण की रक्षा

अत्यधिक जनसंख्या के कारण वन कटाव, प्राकृतिक संसाधनों का तीव्र दोहन और प्रदूषण बढ़ सकता है। जनसंख्या शिक्षा विद्यार्थियों को जनसंख्या, संसाधन और पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्ध से परिचित कराती है।

8. सामाजिक जीवन को उन्नत बनाना

नियंत्रित जनसंख्या से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधाओं का बेहतर वितरण सम्भव होता है। इसलिए जनसंख्या शिक्षा सामाजिक जीवन के विकास में सहायक है।

9. आर्थिक स्थिति में सुधार

जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण होने से उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है और प्रति व्यक्ति सुविधाओं को बढ़ाने में सहायता मिलती है।

10. ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष आवश्यकता

ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि, शिक्षा और संसाधनों से सम्बन्धित समस्याएँ अधिक गंभीर हो सकती हैं। इसलिए वहाँ जनसंख्या शिक्षा के प्रसार की विशेष आवश्यकता है।

जनसंख्या शिक्षा की प्रमुख समस्याएँ

जनसंख्या शिक्षा का क्षेत्र विस्तृत है। इसे विद्यालयी और प्रौढ़ शिक्षा में प्रभावी रूप से लागू करने में पाठ्यक्रम, संसाधन, व्यवस्था तथा सामाजिक विरोध से सम्बन्धित अनेक कठिनाइयाँ सामने आती हैं।

1. पाठ्यक्रम सम्बन्धी समस्याएँ
  • जनसंख्या शिक्षा का पाठ्यक्रम कई स्तरों पर अत्यधिक विस्तृत हो जाता है।
  • प्राथमिक स्तर के बालकों के लिए सभी विषय-वस्तु उपयुक्त नहीं होती।
  • माध्यमिक स्तर पर भी पाठ्यक्रम के उचित विस्तार का निर्धारण आवश्यक है।
  • उच्च शिक्षा में इसे अनिवार्य विषय बनाने के स्थान पर आवश्यकतानुसार ऐच्छिक अथवा सम्बन्धित विषयों के साथ जोड़ा जा सकता है।
पाठ्यक्रम सम्बन्धी समाधान
  1. प्राथमिक स्तर पर अत्यधिक जटिल जनसंख्या-विषयक सामग्री न रखी जाए।
  2. माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रम को सीमित, उपयोगी और आयु-अनुकूल बनाया जाए।
  3. उच्च शिक्षा में इसे आवश्यकता के अनुसार ऐच्छिक विषय या सम्बन्धित विषयों के साथ पढ़ाया जाए।
  4. प्रौढ़ शिक्षा में जनसंख्या शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया जाए।
2. संसाधनों सम्बन्धी समस्याएँ

विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा से सम्बन्धित चार्ट, मॉडल, ग्राफ, चित्र और अन्य शिक्षण-सामग्री की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होती। अनेक उपयोगी संसाधन महँगे भी होते हैं और विद्यालय उनका उचित प्रबन्ध नहीं कर पाते।

संसाधन सम्बन्धी समाधान
  • विद्यालय प्रबन्धकों को जनसंख्या शिक्षा के संसाधनों के महत्त्व के प्रति जागरूक किया जाए।
  • प्रतिवर्ष नियोजित ढंग से आवश्यक शिक्षण-सामग्री की व्यवस्था की जाए।
  • सरकारी अनुदान का उचित उपयोग किया जाए।
  • ग्राफ, मॉडल, चार्ट और चित्र जैसी सरल एवं उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराई जाए।
3. व्यवस्था सम्बन्धी समस्याएँ

एक प्रमुख प्रश्न यह है कि जनसंख्या शिक्षा किस आयु से, किस स्तर पर और किस विषय के माध्यम से दी जाए। इस सम्बन्ध में सभी शिक्षाविदों में पूर्ण समानता नहीं है। कई बार इसे अलग विषय, सामाजिक विज्ञान के भाग अथवा जनचेतना कार्यक्रम के रूप में पढ़ाने के अलग-अलग सुझाव दिए जाते हैं।

व्यवस्था सम्बन्धी समाधान
  • जनसंख्या शिक्षा की व्यवस्थित शुरुआत माध्यमिक स्तर से की जा सकती है।
  • इसे सामाजिक विज्ञान अथवा जीवनोपयोगी शिक्षा के एक प्रकरण के रूप में पढ़ाया जा सकता है।
  • प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों में इसे आवश्यक रूप से सम्मिलित किया जाना चाहिए।
  • समाचार-पत्र, दूरदर्शन तथा अन्य जनसंचार माध्यमों का उपयोग किया जाए।
  • इसे जीवन से जुड़ी व्यावहारिक शिक्षा के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
4. जनसंख्या शिक्षा के विरोध की समस्या

कुछ लोग जनसंख्या शिक्षा को परिवार नियोजन अथवा यौन शिक्षा तक सीमित मान लेते हैं। इस प्रकार की गलत धारणाओं के कारण इसके प्रति विरोध उत्पन्न होता है। जबकि जनसंख्या शिक्षा का क्षेत्र इससे कहीं अधिक व्यापक है और इसमें जनसंख्या, संसाधन, परिवार, समाज तथा जीवन-स्तर से जुड़े विषय शामिल होते हैं।

विरोध दूर करने के उपाय
  1. विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा के वास्तविक अर्थ और उद्देश्य के प्रति जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
  2. अभिभावकों को भी इन कार्यक्रमों में सम्मिलित किया जाए।
  3. समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, फिल्म, प्रदर्शनी और अन्य माध्यमों द्वारा सही जानकारी दी जाए।
  4. जनसंख्या शिक्षा को केवल परिवार नियोजन की शिक्षा न मानकर व्यापक सामाजिक एवं शैक्षिक कार्यक्रम के रूप में प्रस्तुत किया जाए।

जनसंख्या शिक्षा का समग्र महत्त्व

जनसंख्या शिक्षा व्यक्ति को जनसंख्या वृद्धि के कारणों और परिणामों को समझने के साथ-साथ छोटा परिवार, संसाधनों का संतुलित उपयोग, उत्तरदायी नागरिकता तथा बेहतर जीवन-स्तर की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करती है। इसलिए यह केवल जनसंख्या नियंत्रण का साधन नहीं, बल्कि व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के संतुलित विकास की शिक्षा है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जनसंख्या शिक्षा जनसंख्या की स्थिति, वृद्धि और उसके व्यक्ति, परिवार, समाज तथा राष्ट्र पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कराने वाला शैक्षिक कार्यक्रम है।
  • इसका प्रमुख उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि के प्रति विवेकपूर्ण, वैज्ञानिक और उत्तरदायी दृष्टिकोण विकसित करना है।
  • छोटा परिवार, संसाधनों का उचित उपयोग, जनसंख्या नियंत्रण, बेहतर जीवन-स्तर और आर्थिक-सामाजिक विकास इसकी प्रमुख विषय-वस्तु हैं।
  • जनसंख्या शिक्षा की प्रमुख समस्याएँ पाठ्यक्रम, संसाधन, व्यवस्था तथा सामाजिक विरोध से सम्बन्धित हैं।
  • आयु-अनुकूल पाठ्यक्रम, पर्याप्त शिक्षण-सामग्री, प्रौढ़ शिक्षा, जनसंचार माध्यमों और जन-जागरूकता द्वारा इसे अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
Topic 7 जातिवाद—अर्थ, विकास के कारण, दुष्परिणाम एवं उन्मूलन के उपाय

जातिवाद—अर्थ, विकास के कारण, दुष्परिणाम एवं उन्मूलन के उपाय

जातिवाद का अर्थ

जातिवाद ऐसी संकुचित भावना है जिसमें व्यक्ति अपनी जाति के हितों को समाज और राष्ट्र के व्यापक हितों से अधिक महत्त्व देने लगता है। वह अपनी जाति के सदस्यों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने तथा उनकी उन्नति के लिए विशेष रूप से कार्य करता है।

सरल शब्दों में, जब व्यक्ति का व्यवहार केवल अपनी जाति के कल्याण तक सीमित हो जाए और वह दूसरी जातियों के हितों की उपेक्षा करने लगे, तो इस भावना को जातिवाद कहा जाता है।

जातिवाद के दो प्रमुख पक्ष
  1. मनोवैज्ञानिक पक्ष— व्यक्ति के मन में अपनी जाति के प्रति विशेष लगाव तथा अन्य जातियों के प्रति दूरी या उपेक्षा की भावना उत्पन्न होती है।
  2. व्यावहारिक पक्ष— व्यक्ति अपनी जाति के हितों को बढ़ाने के लिए उसी के अनुसार कार्य करता है और सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक क्षेत्रों में अपनी जाति को प्राथमिकता देता है।

जातिवाद की प्रमुख परिभाषाएँ

डॉ. कैलाश नाथ शर्मा के अनुसार— जातिवाद वह भावना है जिसमें व्यक्ति समाज और देश के सामान्य हितों की अपेक्षा अपनी जाति की उन्नति, एकता और सामाजिक स्थिति को अधिक महत्त्व देता है।

काका कालेलकर के अनुसार— जातिवाद एक संकीर्ण और सीमित समूह-भक्ति है, जिसमें सामान्य सामाजिक न्याय, नैतिकता और व्यापक भ्रातृत्व की उपेक्षा होने लगती है।

के. एम. पन्निकर के अनुसार— राजनीतिक भाषा में अपनी उपजाति अथवा जातीय समूह के प्रति अत्यधिक निष्ठा की भावना जातिवाद है।

इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि जातिवाद का मूल आधार अपनी जाति के प्रति अत्यधिक पक्षपात और अन्य जातियों के प्रति उपेक्षा है।

जातिवाद के विकास के प्रमुख कारण

जातिवाद किसी एक कारण से विकसित नहीं हुआ। सामाजिक संरचना, विवाह-प्रथा, संचार के साधनों और जातीय संगठनों सहित अनेक कारणों ने इसे बढ़ावा दिया है।

1. वैवाहिक प्रतिबन्ध

अपनी ही जाति के भीतर विवाह करने की परम्परा ने जाति के सदस्यों को एक-दूसरे से अधिक निकट रखा। इससे व्यक्ति का सामाजिक सम्बन्ध अपनी जाति तक सीमित होता गया और जातीय एकता तथा जातिवादी भावना को बढ़ावा मिला।

2. जातीय स्थिति को ऊँचा उठाने की लालसा

प्रत्येक जाति अपने सामाजिक स्तर, प्रतिष्ठा और प्रभाव को बढ़ाना चाहती है। जब यह प्रयास सामान्य सामाजिक हित के स्थान पर केवल अपनी जाति की उन्नति पर केन्द्रित हो जाता है, तब जातिवाद को प्रोत्साहन मिलता है।

3. प्रचार एवं यातायात के साधनों में वृद्धि

आधुनिक संचार और यातायात के साधनों के विकास से एक ही जाति के लोग दूर-दूर रहकर भी आसानी से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं। जातीय सम्मेलन, संगठन, बैठकें तथा प्रचार के माध्यम से जाति के सदस्यों को संगठित करना आसान हुआ है। इससे जातिवादी भावना को भी बल मिला।

4. जजमानी प्रथा का विघटन

परम्परागत जजमानी व्यवस्था में विभिन्न जातियाँ एक-दूसरे की सेवाओं पर निर्भर रहती थीं। इस व्यवस्था में सामाजिक और आर्थिक पारस्परिकता बनी रहती थी। इसके कमजोर होने पर विभिन्न जातियों के बीच पहले जैसी परस्पर निर्भरता कम हुई और अलग जातीय हितों पर अधिक बल दिया जाने लगा।

5. जाति-व्यवस्था

जातिवाद का मूल आधार स्वयं जाति-व्यवस्था भी है। जन्म के आधार पर अलग-अलग जातीय समूहों का निर्माण होने से विवाह, खान-पान, सामाजिक सम्पर्क और अनेक व्यवहारों पर प्रतिबन्ध बने। इससे जातीय पृथकता और अपनी जाति के प्रति विशेष निष्ठा विकसित हुई।

6. विभिन्न जातीय संगठन

अनेक जातियों ने स्थानीय, क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर अपने संगठन बनाए। इनका उद्देश्य प्रायः अपनी जाति के सदस्यों को संगठित करना और उनके हितों की रक्षा करना होता है। जब ऐसे संगठन व्यापक सामाजिक हितों के बजाय केवल जातीय हितों पर बल देते हैं, तब जातिवाद को बढ़ावा मिलता है।

जातिवाद के दुष्परिणाम

जातिवाद केवल जातियों के बीच दूरी ही उत्पन्न नहीं करता, बल्कि लोकतंत्र, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और नैतिक जीवन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

1. प्रजातंत्र विरोधी

लोकतंत्र समानता, स्वतंत्रता, न्याय, बन्धुत्व और समान अवसरों पर आधारित है, जबकि जातिवाद भेदभाव, पक्षपात और संकीर्ण हितों को बढ़ावा देता है। इसलिए जातिवाद लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।

2. राष्ट्रीयता के विकास में बाधक

जातिवाद व्यक्ति की निष्ठा को राष्ट्र से सीमित करके जाति तक ले आता है। जब लोग राष्ट्रीय हित की अपेक्षा अपनी जाति के हित को प्राथमिकता देते हैं तो राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय भावना कमजोर होती है।

3. सामाजिक एकता में बाधक

जातीय श्रेष्ठता और पृथकता की भावना समाज को छोटे-छोटे समूहों में बाँटती है। इससे आपसी सहयोग, भाईचारा और सामाजिक समरसता कमजोर होती है तथा सामाजिक एकता में बाधा उत्पन्न होती है।

4. नैतिक पतन

जातीय हितों को सर्वोपरि मानने पर व्यक्ति कई बार पक्षपातपूर्ण और अनुचित व्यवहार को भी उचित मानने लगता है। इससे निष्पक्षता, न्याय तथा नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है।

5. भाई-भतीजावाद को प्रोत्साहन

जातिवाद के कारण नियुक्ति, अवसर और लाभ प्रदान करते समय योग्यता के स्थान पर जातीय सम्बन्धों को प्राथमिकता दी जा सकती है। इससे भाई-भतीजावाद तथा पक्षपात बढ़ता है और योग्य व्यक्तियों के अवसर प्रभावित होते हैं।

6. सामाजिक तनाव में वृद्धि

जब विभिन्न जातियाँ स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ मानती हैं तो पारस्परिक अविश्वास, द्वेष और संघर्ष पैदा होते हैं। इससे समाज में तनाव बढ़ता है और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व प्रभावित होता है।

जातिवाद को समाप्त करने के उपाय

जातिवाद जैसी गहरी सामाजिक समस्या को केवल कानून द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए शिक्षा, सामाजिक सुधार, समानता और सांस्कृतिक एकीकरण के संयुक्त प्रयास आवश्यक हैं।

1. जाति-विरोधी शिक्षा

विद्यालयों में विद्यार्थियों को जातिवाद के दुष्परिणामों से परिचित कराया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम, कहानियों, उदाहरणों, चर्चाओं और गतिविधियों के माध्यम से समानता, बन्धुत्व और सामाजिक समरसता के मूल्य विकसित किए जाने चाहिए।

2. अन्तर्विवाह एवं अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन

अन्तर्जातीय विवाह विभिन्न जातियों के बीच सामाजिक दूरी को कम करने का प्रभावी साधन हो सकता है। इससे जातीय संकीर्णता कम होती है और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच निकटता तथा एकता बढ़ती है।

3. जाति-बोधक नामों का बहिष्कार

ऐसे नामों और व्यवहारों को अनावश्यक रूप से बढ़ावा नहीं देना चाहिए जिनसे व्यक्ति की जातीय पहचान को सामाजिक श्रेष्ठता या हीनता से जोड़ा जाए। इससे जातिगत विभाजन और जातीय चेतना को कम करने में सहायता मिल सकती है।

4. जातीय श्रेणीबद्धता को समाप्त करना

जन्म के आधार पर ऊँच-नीच की भावना जातिवाद को मजबूत करती है। समाज में सभी व्यक्तियों की समान गरिमा को स्वीकार कर जातीय श्रेष्ठता और हीनता की भावना समाप्त की जानी चाहिए।

5. जातीय संगठनों को हतोत्साहित करना

ऐसे संगठनों और गतिविधियों को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए जो जातिगत भेदभाव, संघर्ष या संकीर्णता को बढ़ाएँ। सामाजिक संगठनों का उद्देश्य व्यापक समाज के कल्याण और सहयोग को बढ़ाना होना चाहिए।

6. सांस्कृतिक एकीकरण को प्रोत्साहन

विभिन्न जातियों और समुदायों के लोगों को साझा सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने के अवसर दिए जाने चाहिए। इससे पारस्परिक समझ, सहयोग और राष्ट्रीय एकता विकसित होती है तथा जातीय संकीर्णता कम होती है।

शिक्षा द्वारा जातिवाद के उन्मूलन में सहायता

शिक्षा व्यक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाती है। विद्यालय यदि समानता, न्याय, सहिष्णुता, मानव गरिमा और राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित करें तो जातिवादी सोच को कमजोर किया जा सकता है। बच्चों को आरम्भ से यह समझाना आवश्यक है कि व्यक्ति का मूल्य उसकी योग्यता, चरित्र और कर्म से निर्धारित होना चाहिए, न कि उसकी जाति से।

इस प्रकार शिक्षा सामाजिक दूरी को कम कर विभिन्न समूहों में सहयोग, सम्मान और समान नागरिकता की भावना विकसित करके जातिवाद के उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जातिवाद अपनी जाति के हितों को समाज और राष्ट्र के व्यापक हितों से ऊपर रखने की संकीर्ण भावना है।
  • इसके प्रमुख कारण हैं—वैवाहिक प्रतिबन्ध, जातीय प्रतिष्ठा बढ़ाने की इच्छा, संचार एवं यातायात का विकास, जजमानी प्रथा का विघटन, जाति-व्यवस्था तथा जातीय संगठन।
  • जातिवाद लोकतंत्र, राष्ट्रीयता और सामाजिक एकता के लिए बाधक है तथा नैतिक पतन, भाई-भतीजावाद और सामाजिक तनाव को बढ़ाता है।
  • जाति-विरोधी शिक्षा, अन्तर्जातीय विवाह, जातीय श्रेणीबद्धता का अन्त तथा सांस्कृतिक एकीकरण इसके प्रमुख सुधारात्मक उपाय हैं।
  • शिक्षा समानता, बन्धुत्व, न्याय एवं राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित करके जातिवाद को कम करने का प्रभावी माध्यम है।
Topic 8 साम्प्रदायिकता—अर्थ, विशेषताएँ, कारण, दुष्परिणाम एवं उन्मूलन के उपाय

साम्प्रदायिकता—अर्थ, विशेषताएँ, कारण, दुष्परिणाम एवं उन्मूलन के उपाय

साम्प्रदायिकता का अर्थ

साम्प्रदायिकता ऐसी संकीर्ण भावना है जिसमें व्यक्ति अपने धर्म, सम्प्रदाय, जातीय अथवा भाषा-समूह को अन्य समूहों से श्रेष्ठ मानने लगता है और उसके हितों को व्यापक समाज एवं राष्ट्र के हितों से ऊपर रखता है। यह भावना विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच विरोध, अविश्वास और संघर्ष को जन्म दे सकती है।

साम्प्रदायिकता मूलतः धार्मिक अस्मिता का राजनीतिक और सामाजिक रूप से संकीर्ण प्रयोग है। इसमें धर्म, भाषा, क्षेत्र, संस्कृति अथवा प्रजातीय भिन्नताओं के आधार पर एक समूह स्वयं को दूसरे समूह से अलग और कई बार श्रेष्ठ समझने लगता है।

साम्प्रदायिकता की प्रमुख परिभाषाएँ

स्मिथ के अनुसार— साम्प्रदायिकता वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति या समूह अपने धार्मिक अथवा भाषा-समूह को एक पृथक राजनीतिक तथा सामाजिक इकाई के रूप में देखता है और उसके हितों को अन्य समूहों से अलग मानता है।

रैण्डल हाउस डिक्शनरी के अनुसार— साम्प्रदायिकता अपने जातीय या सामुदायिक समूह के प्रति निष्ठा की वह भावना है जो सम्पूर्ण समाज के प्रति निष्ठा से अधिक प्रभावी हो जाती है।

इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि साम्प्रदायिकता में व्यक्ति की निष्ठा व्यापक समाज और राष्ट्र की अपेक्षा अपने धर्म या समुदाय तक सीमित हो जाती है।

साम्प्रदायिकता की विशेषताएँ

1. धर्म से सम्बन्धित

साम्प्रदायिकता का सम्बन्ध सामान्यतः धार्मिक समूहों से होता है। जब अलग-अलग धार्मिक समुदाय स्वयं को पृथक राजनीतिक या सामाजिक समूह के रूप में देखने लगते हैं, तब साम्प्रदायिक संघर्ष की सम्भावना बढ़ती है।

2. श्रेष्ठता की भावना

साम्प्रदायिक व्यक्ति अपने धर्म या समुदाय को श्रेष्ठ और दूसरे समुदायों को निम्न समझ सकता है। यह सोच सामाजिक समानता और पारस्परिक सम्मान को कमजोर करती है।

3. दूसरे समुदाय की उपेक्षा

इस भावना में व्यक्ति दूसरे धर्म, संस्कृति और मान्यताओं की उपेक्षा करने लगता है। इससे विभिन्न समुदायों के बीच दूरी तथा अविश्वास बढ़ता है।

4. अलगाव की भावना

साम्प्रदायिकता से प्रभावित समूह दूसरे समुदायों से अलग रहने और केवल अपने समुदाय के हितों को सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं। इससे सामाजिक एकता प्रभावित होती है।

5. क्षति का भय

साम्प्रदायिक भावना से ग्रसित व्यक्ति को यह भय रहता है कि दूसरे समुदाय से उसके धर्म, धार्मिक स्थान, मान्यताओं या हितों को हानि पहुँच सकती है। यही भय कई बार संघर्ष को जन्म देता है।

6. तिरस्कार एवं घृणा की भावना

साम्प्रदायिकता विभिन्न समूहों में परस्पर तिरस्कार और घृणा को बढ़ाती है। इससे सामाजिक सम्बन्ध कमजोर होते हैं।

7. अनुकूलन का अभाव

साम्प्रदायिक सोच रखने वाले व्यक्ति दूसरे समुदायों की भावनाओं और परम्पराओं को स्वीकार करने में कठिनाई अनुभव करते हैं। इससे सहयोग और सद्भाव कम होता है।

8. धार्मिक कट्टरता

साम्प्रदायिकता धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देती है। व्यक्ति अपने धर्म या सम्प्रदाय के प्रति इतना संकीर्ण हो सकता है कि दूसरे विचारों को समझने और स्वीकार करने की उसकी क्षमता सीमित हो जाए।

साम्प्रदायिकता के प्रमुख कारण

1. फूट डालो और शासन करो की नीति

ब्रिटिश शासन ने भारत में अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए फूट डालो और शासन करो की नीति अपनाई। धर्म और समुदाय के आधार पर लोगों को बाँटने की इस नीति ने साम्प्रदायिक भावना को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2. मनोवैज्ञानिक कारण

साम्प्रदायिक भेदभाव से ग्रसित व्यक्ति दूसरे समुदाय के प्रति असुरक्षा, संदेह और गलत धारणाएँ विकसित कर सकता है। ऐसी मनोवैज्ञानिक दूरी धीरे-धीरे साम्प्रदायिक तनाव का रूप ले सकती है।

3. जाति-व्यवस्था

भारतीय समाज में जाति-आधारित विभाजन ने विभिन्न समूहों के बीच पृथकता की भावना को मजबूत किया। जब यह समूहगत संकीर्णता धर्म और सम्प्रदाय से जुड़ती है तो साम्प्रदायिकता को बढ़ावा मिलता है।

4. साम्प्रदायिक संगठन

कुछ संगठन धर्म, जाति अथवा पंथ के आधार पर अपने समूह को संगठित करते हुए दूसरे समुदायों के प्रति विरोध की भावना उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसे संगठन साम्प्रदायिकता को बढ़ाने में सहायक बनते हैं।

5. धार्मिक कारण

भारत में अनेक धर्मों के लोग निवास करते हैं। उनकी भाषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज और धार्मिक आचरण भिन्न हो सकते हैं। यदि इन भिन्नताओं को श्रेष्ठता और विरोध के रूप में देखा जाए तो साम्प्रदायिकता बढ़ सकती है।

6. असामाजिक तत्त्व

कुछ असामाजिक तत्त्व अपने निजी स्वार्थ के लिए धार्मिक और सामुदायिक भावनाओं को भड़काते हैं। अफवाह, हिंसा और उकसावे के माध्यम से वे साम्प्रदायिक तनाव को और गंभीर बना सकते हैं।

साम्प्रदायिकता के दुष्परिणाम

1. राष्ट्रीय एकता में बाधा

साम्प्रदायिकता राष्ट्र को धर्म और समुदाय के आधार पर विभाजित करती है। इससे व्यक्ति की निष्ठा राष्ट्र के बजाय अपने समुदाय तक सीमित होने लगती है और राष्ट्रीय एकता कमजोर होती है।

2. तनाव एवं संघर्ष

साम्प्रदायिकता से अविश्वास, घृणा, पूर्वाग्रह और स्वार्थ बढ़ते हैं। इनके परिणामस्वरूप विभिन्न समुदायों में तनाव, विवाद और संघर्ष उत्पन्न होते हैं।

3. असुरक्षा की भावना

साम्प्रदायिक तनाव के समय विभिन्न समुदायों में एक-दूसरे के प्रति भय और असुरक्षा उत्पन्न होती है। व्यक्ति अपने जीवन, सम्पत्ति और धार्मिक पहचान को लेकर चिंतित रहने लगता है।

4. हिंसा एवं नरसंहार

जब साम्प्रदायिक संघर्ष अत्यधिक बढ़ जाता है तो वह हिंसा और भीषण जन-संघर्ष का रूप ले सकता है। इससे मानव जीवन तथा सम्पत्ति की व्यापक क्षति होती है।

5. आर्थिक विकास में बाधा

साम्प्रदायिक तनाव और हिंसा के दौरान उद्योग, व्यापार, परिवहन, कार्यालय और अन्य आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं। सार्वजनिक सम्पत्ति की क्षति तथा व्यवस्था बनाए रखने पर अतिरिक्त व्यय के कारण आर्थिक विकास बाधित होता है।

6. राजनीतिक अस्थिरता

साम्प्रदायिकता से सरकार और प्रशासन के प्रति अविश्वास बढ़ सकता है। राजनीतिक दलों में आपसी संघर्ष, संकीर्णता और मतभेद बढ़ने से राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होती है।

7. असामाजिक तत्त्वों में वृद्धि

साम्प्रदायिक संघर्ष के समय असामाजिक तत्त्व सक्रिय हो जाते हैं। लूट-पाट, हिंसा, आगजनी और व्यक्तिगत दुश्मनी जैसी गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं।

8. पारिवारिक एवं सामाजिक विघटन

साम्प्रदायिक दंगों और संघर्षों के कारण अनेक परिवार विस्थापन, मृत्यु, चोट और आर्थिक संकट का सामना करते हैं। इसका प्रभाव परिवार और समाज दोनों की स्थिरता पर पड़ता है।

साम्प्रदायिकता के उन्मूलन के उपाय

1. साम्प्रदायिक संगठनों पर नियंत्रण

ऐसे संगठनों पर प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए जो जाति, धर्म या सम्प्रदाय के नाम पर लोगों में वैमनस्य और संघर्ष उत्पन्न करते हों। कानून का निष्पक्ष रूप से पालन कराया जाना आवश्यक है।

2. उच्च एवं व्यापक शिक्षा की व्यवस्था

शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों में तार्किक सोच, सहिष्णुता, भाईचारा और राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित की जा सकती है। पाठ्यक्रम में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के प्रति सम्मान तथा नैतिक मूल्यों को स्थान दिया जाना चाहिए।

3. साम्प्रदायिक राजनीतिक दलों को हतोत्साहित करना

धर्म या सम्प्रदाय के आधार पर राजनीतिक लाभ प्राप्त करने की प्रवृत्ति साम्प्रदायिकता को बढ़ाती है। इसलिए राजनीति को साम्प्रदायिक आधार से मुक्त रखना आवश्यक है।

4. मानवतावादी धर्म-दर्शन का प्रचार

धर्म का उद्देश्य मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना होना चाहिए। ऐसे मानवतावादी विचारों का प्रचार किया जाना चाहिए जिनमें सभी व्यक्तियों को समान माना जाए और प्रेम, करुणा तथा सह-अस्तित्व को महत्त्व दिया जाए।

5. राष्ट्रवादी एवं एकतावादी साहित्य का प्रचार

ऐसे साहित्य को बढ़ावा देना चाहिए जो राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सहयोग और भाईचारे की भावना उत्पन्न करे। इससे जाति और धर्म से ऊपर उठकर राष्ट्र के प्रति निष्ठा विकसित होती है।

6. नैतिक शिक्षा का प्रसार

विद्यालयी शिक्षा में नैतिक शिक्षा को उचित स्थान देकर प्रेम, भाईचारा, पारस्परिक सम्मान, सहिष्णुता और सहयोग जैसे गुणों का विकास किया जाना चाहिए।

भारत में साम्प्रदायिकता

भारत प्राचीन काल से अनेक धर्मों, जातियों, भाषाओं और समुदायों का देश रहा है। विभिन्न समुदायों ने यहाँ साथ रहते हुए सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन में योगदान दिया है। भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप विविधता में एकता पर आधारित है।

औपनिवेशिक शासन के समय फूट डालो और शासन करो की नीति ने धार्मिक आधार पर विभाजन को बढ़ावा दिया। इसका गंभीर परिणाम देश के विभाजन के रूप में भी सामने आया। स्वतंत्रता के बाद भी समय-समय पर राजनीतिक स्वार्थ, असामाजिक तत्त्व और धार्मिक कट्टरता साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ाते रहे हैं।

साम्प्रदायिकता मानवता, भाईचारे, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के लिए बाधक है। इसलिए भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में सभी धर्मों एवं समुदायों के प्रति समान सम्मान, सहिष्णुता तथा राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित करना अत्यन्त आवश्यक है।

साम्प्रदायिकता के उन्मूलन में शिक्षा की भूमिका

शिक्षा साम्प्रदायिकता को कम करने का प्रभावी माध्यम है। विद्यालय विद्यार्थियों को यह समझा सकते हैं कि धर्म और संस्कृति की विविधता संघर्ष का नहीं, बल्कि समाज की समृद्धि का आधार है। शिक्षा द्वारा समानता, धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता, मानवता, भाईचारा और राष्ट्रीय एकता के मूल्य विकसित किए जा सकते हैं।

यदि बाल्यावस्था से ही विद्यार्थियों में सभी धर्मों के प्रति सम्मान और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण विकसित किया जाए तो साम्प्रदायिक संकीर्णता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • साम्प्रदायिकता अपने धर्म या समुदाय को अन्य समुदायों से श्रेष्ठ मानकर उसके हितों को व्यापक समाज एवं राष्ट्र से ऊपर रखने की संकीर्ण भावना है।
  • इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं—श्रेष्ठता, उपेक्षा, अलगाव, असुरक्षा, घृणा, अनुकूलन का अभाव और धार्मिक कट्टरता।
  • इसके प्रमुख कारण हैं—फूट डालो और शासन करो की नीति, मनोवैज्ञानिक कारण, जाति-व्यवस्था, साम्प्रदायिक संगठन, धार्मिक भिन्नताएँ और असामाजिक तत्त्व।
  • साम्प्रदायिकता राष्ट्रीय एकता को कमजोर करती है तथा तनाव, हिंसा, असुरक्षा, आर्थिक हानि, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक विघटन उत्पन्न करती है।
  • शिक्षा, नैतिक मूल्यों, मानवतावादी दृष्टिकोण, राष्ट्रीय एकता और साम्प्रदायिक संगठनों पर नियंत्रण द्वारा इसे कम किया जा सकता है।
  • भारत जैसे बहुधार्मिक देश में साम्प्रदायिक सद्भाव और विविधता में एकता राष्ट्रीय विकास के लिए आवश्यक है।
Topic 9 अलगाववाद—अर्थ, कारण, दुष्परिणाम एवं रोकथाम के उपाय

अलगाववाद—अर्थ, कारण, दुष्परिणाम एवं रोकथाम के उपाय

अलगाववाद का अर्थ

अलगाववाद ऐसी भावना या प्रवृत्ति है जिसमें किसी क्षेत्र, समूह, समुदाय, जाति, भाषा अथवा संस्कृति से जुड़े लोग स्वयं को व्यापक समाज या राष्ट्र से अलग मानने लगते हैं और अपने लिए पृथक राजनीतिक या भौगोलिक पहचान की माँग करने लगते हैं।

जब किसी क्षेत्र के लोग अपने क्षेत्रीय, भाषायी, धार्मिक अथवा सांस्कृतिक हितों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखकर पृथक राज्य, स्वायत्त क्षेत्र अथवा स्वतंत्र इकाई की माँग करने लगते हैं, तब यह स्थिति अलगाववाद का रूप धारण कर सकती है।

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में विभिन्न जातियों, धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोग निवास करते हैं। राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक है कि यह विविधता परस्पर सहयोग और समान राष्ट्रीय भावना से जुड़ी रहे। जब समूहगत हित राष्ट्रीय एकता से ऊपर रखे जाने लगते हैं, तब अलगाववादी प्रवृत्तियाँ विकसित होती हैं।

अलगाववाद की प्रमुख विशेषताएँ

  • यह किसी विशेष क्षेत्र, समुदाय या समूह के प्रति अत्यधिक पक्षपातपूर्ण निष्ठा पैदा करता है।
  • इसमें व्यापक राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा क्षेत्रीय या समूहगत हितों को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
  • यह पृथक राज्य, स्वायत्त क्षेत्र अथवा अलग राजनीतिक पहचान की माँग को जन्म दे सकता है।
  • यह क्षेत्रवाद, स्थानीयतावाद और पृथक्करण की भावना को बढ़ा सकता है।
  • अत्यधिक रूप लेने पर यह राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता के लिए चुनौती बन जाता है।

अलगाववाद के उत्तरदायी कारक

1. राजनीतिक कारक

कुछ राजनीतिक दल या समूह जाति, धर्म, क्षेत्र अथवा भाषा की भावनाओं का उपयोग अपने राजनीतिक हितों के लिए करते हैं। वे अलग पहचान और पृथक इकाई की माँग को प्रोत्साहित कर सकते हैं। केन्द्र और राज्यों के बीच तनाव, सीमा-विवाद, संसाधनों के बँटवारे तथा प्रशासनिक असंतोष जैसी स्थितियाँ भी अलगाववादी भावना को बढ़ा सकती हैं।

2. आर्थिक कारक

जब किसी क्षेत्र के लोगों को यह अनुभव होता है कि उनका आर्थिक विकास अन्य क्षेत्रों की तुलना में कम हुआ है अथवा योजनाओं और संसाधनों का उचित लाभ उन्हें नहीं मिल रहा है, तो असंतोष पैदा होता है। लगातार आर्थिक पिछड़ापन और विकास में असमानता अलगाववादी प्रवृत्तियों को जन्म दे सकती है।

3. भौगोलिक कारक

भारत जैसे विशाल देश में विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु, भू-आकृति, वर्षा, जीवन-पद्धति और आर्थिक परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं। अत्यधिक भौगोलिक दूरी तथा कठिन आवागमन कभी-कभी लोगों में पृथक क्षेत्रीय पहचान को मजबूत कर सकते हैं।

4. भाषा की समस्या

भाषा व्यक्ति की पहचान और संस्कृति से गहराई से जुड़ी होती है। जब भाषा के आधार पर श्रेष्ठता, उपेक्षा या क्षेत्रीय संघर्ष की भावना विकसित होती है, तो अलगाववाद बढ़ सकता है। भाषायी विवाद कभी-कभी क्षेत्रीय राजनीतिक माँगों को भी जन्म देते हैं।

5. अन्य सहायक कारक

युवा असंतोष, आर्थिक विषमता, निर्धनता, क्षेत्रवाद, आतंकवादी गतिविधियाँ, जातिवाद और साम्प्रदायिक शक्तियाँ भी अलगाववादी प्रवृत्तियों को बढ़ाने में सहायक हो सकती हैं।

अलगाववाद के दुष्परिणाम

1. संकीर्ण नेतृत्व का विकास

अलगाववाद ऐसे नेतृत्व को बढ़ावा देता है जो व्यापक राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा किसी विशेष क्षेत्र या समूह के हितों को प्राथमिकता देता है। इससे राजनीतिक दृष्टिकोण संकीर्ण हो सकता है।

2. राष्ट्र के विकास में बाधा

जब समाज की ऊर्जा विकास के बजाय क्षेत्रीय संघर्ष और पृथकता की माँगों में लगती है तो राष्ट्रीय विकास की गति प्रभावित होती है। सरकार का समय और संसाधन भी ऐसी समस्याओं के समाधान में खर्च होते हैं।

3. क्षेत्रीय तनाव

अलगाववाद विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के बीच अविश्वास तथा तनाव पैदा करता है। इससे सामाजिक सहयोग और राष्ट्रीय समरसता कमजोर होती है।

4. सामाजिक न्याय के लिए चुनौती

जब कोई समूह केवल अपने क्षेत्रीय हितों पर ध्यान देता है तो समाज के अन्य वर्गों के अधिकारों और समान अवसरों की उपेक्षा होने की सम्भावना रहती है। इससे सामाजिक न्याय की स्थापना कठिन हो सकती है।

5. नए राज्यों अथवा क्षेत्रों की माँग

अलगाववादी प्रवृत्ति कई बार नए राज्य, पृथक प्रशासनिक क्षेत्र अथवा स्वतंत्र राजनीतिक इकाई की माँग को जन्म देती है। यदि ऐसी माँगें संतुलित एवं संवैधानिक ढंग से न सुलझें तो संघर्ष उत्पन्न हो सकता है।

6. जन-धन की हानि और असुरक्षा

जब अलगाववादी आन्दोलन हिंसक रूप धारण कर लेते हैं तो लोगों के जीवन और सम्पत्ति को खतरा उत्पन्न होता है। इससे समाज में भय और असुरक्षा की भावना फैलती है।

7. मानवता एवं राष्ट्रीय एकता को क्षति

अलगाववाद मनुष्य को व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय पहचान से काटकर संकीर्ण समूहगत पहचान तक सीमित कर देता है। इससे भाईचारा, सह-अस्तित्व और राष्ट्रीय एकता प्रभावित होती है।

अलगाववाद को रोकने के उपाय

1. नैतिक एवं राष्ट्रीय शिक्षा

विद्यालयों में ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए जो विद्यार्थियों में राष्ट्रीय एकता, नैतिकता, सहयोग और देश के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करे। शिक्षा के माध्यम से क्षेत्रीय हितों और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है।

2. सांस्कृतिक विकास एवं सामाजिक समरसता

देश की विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और परम्पराओं के प्रति सम्मान विकसित किया जाना चाहिए। सांस्कृतिक आदान-प्रदान से अलग-अलग क्षेत्रों के लोग एक-दूसरे को समझते हैं और पृथकता की भावना कम होती है।

3. शिक्षित एवं जागरूक समाज का निर्माण

लोगों को अलगाववाद के दुष्परिणामों, राष्ट्रीय एकता के महत्त्व तथा संवैधानिक उपायों से परिचित कराया जाना चाहिए। जागरूक नागरिक भड़काऊ प्रचार और संकीर्ण विचारों से कम प्रभावित होते हैं।

4. युवाओं की कुण्ठा और असंतोष को दूर करना

युवाओं के लिए शिक्षा, रोजगार, प्रशिक्षण और विकास के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। बेरोजगारी और उपेक्षा से उत्पन्न असंतोष को कम करके अलगाववादी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण किया जा सकता है।

5. प्रारम्भिक स्तर से एकता की शिक्षा

बाल्यावस्था से ही बच्चों को राष्ट्रीयता, एकता, सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान की शिक्षा दी जानी चाहिए। इससे आगे चलकर उनमें संकीर्ण क्षेत्रीय या समूहगत सोच के विकसित होने की सम्भावना कम होती है।

6. नीतियों एवं योजनाओं का समान क्रियान्वयन

सरकारी योजनाओं और विकास नीतियों का लाभ सभी क्षेत्रों तक समान रूप से पहुँचना चाहिए। क्षेत्रीय असमानता और उपेक्षा की भावना कम होने से अलगाववाद के आधार कमजोर होते हैं।

7. केन्द्र और राज्यों के बीच बेहतर सम्बन्ध

केन्द्र तथा राज्य सरकारों के बीच सहयोग, संवाद और समन्वय बनाए रखना आवश्यक है। विवादों का संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण समाधान अलगाववादी भावनाओं को कम करता है।

अलगाववाद और शिक्षा

अलगाववाद को रोकने में शिक्षा की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। शिक्षा व्यक्ति को केवल ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि उसे व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण भी प्रदान करती है। विद्यालयों में लोकतांत्रिक मूल्यों, राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विविधता और पारस्परिक सम्मान का विकास करके विद्यार्थियों को संकीर्ण अलगाववादी सोच से बचाया जा सकता है।

इसलिए शिक्षा का उद्देश्य ऐसा नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो अपनी स्थानीय भाषा, संस्कृति और क्षेत्र से प्रेम करते हुए भी स्वयं को राष्ट्र का अभिन्न अंग समझे।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अलगाववाद वह प्रवृत्ति है जिसमें कोई क्षेत्र या समूह व्यापक राष्ट्र से पृथक राजनीतिक अथवा क्षेत्रीय पहचान की माँग करने लगता है।
  • इसके प्रमुख कारण हैं—राजनीतिक स्वार्थ, आर्थिक असमानता, भौगोलिक परिस्थितियाँ और भाषा सम्बन्धी विवाद।
  • युवा असंतोष, निर्धनता, क्षेत्रवाद, जातिवाद और साम्प्रदायिकता भी इसे बढ़ा सकते हैं।
  • अलगाववाद राष्ट्रीय विकास, सामाजिक एकता और सुरक्षा के लिए बाधक है तथा क्षेत्रीय तनाव एवं जन-धन की हानि उत्पन्न कर सकता है।
  • राष्ट्रीय शिक्षा, सांस्कृतिक समरसता, समान क्षेत्रीय विकास, युवाओं को अवसर तथा केन्द्र-राज्य सहयोग इसके प्रमुख समाधान हैं।
  • राष्ट्रीय एकता का अर्थ क्षेत्रीय पहचान को समाप्त करना नहीं, बल्कि विविधताओं को स्वीकार करते हुए व्यापक राष्ट्रीय हित से जुड़ना है।
Topic 10 साम्प्रदायिकता—अर्थ, विशेषताएँ, कारण, दुष्परिणाम एवं उन्मूलन के उपाय

साम्प्रदायिकता—अर्थ, विशेषताएँ, कारण, दुष्परिणाम एवं उन्मूलन के उपाय

साम्प्रदायिकता का अर्थ

साम्प्रदायिकता ऐसी संकीर्ण भावना है जिसमें व्यक्ति अपने धर्म, सम्प्रदाय या धार्मिक समूह को अन्य समूहों से श्रेष्ठ मानने लगता है और अपने समुदाय के हितों को व्यापक समाज तथा राष्ट्र के हितों से ऊपर रखने लगता है। जब धार्मिक पहचान का प्रयोग राजनीतिक या सामाजिक संघर्ष उत्पन्न करने के लिए किया जाने लगे, तब यह साम्प्रदायिकता का रूप ले लेती है।

साम्प्रदायिकता केवल धार्मिक आस्था नहीं है। धार्मिक आस्था व्यक्ति का निजी विश्वास हो सकती है, जबकि साम्प्रदायिकता में धर्म के आधार पर लोगों को अलग-अलग समूहों में बाँटकर उनके बीच विरोध, अविश्वास और संघर्ष की भावना पैदा की जाती है।

विद्वानों के अनुसार

रिचर्ड के अनुसार साम्प्रदायिकता में व्यक्ति अपने धार्मिक अथवा भाषायी समूह को एक पृथक राजनीतिक एवं सामाजिक इकाई मानता है और उसके हितों को अन्य समूहों के हितों से अलग समझता है।

रेण्डम हाउस डिक्शनरी के अनुसार साम्प्रदायिकता अपने जातीय अथवा धार्मिक समूह के प्रति ऐसी निष्ठा है जिसमें सम्पूर्ण समाज के हितों की अपेक्षा अपने समूह के हितों को अधिक महत्त्व दिया जाता है।

अतः साम्प्रदायिकता वह मानसिकता है जिसमें व्यक्ति अपने धर्म अथवा सम्प्रदाय को श्रेष्ठ मानकर दूसरे धर्मों या समूहों के प्रति दूरी, उपेक्षा या विरोध की भावना रखता है।

साम्प्रदायिकता की विशेषताएँ

1. धर्म से सम्बन्धित होना

साम्प्रदायिकता का मुख्य आधार धार्मिक समूह होते हैं। जब विभिन्न धर्मों के अनुयायी स्वयं को अलग राजनीतिक या सामाजिक हितों वाला समूह मानने लगते हैं तो साम्प्रदायिक संघर्ष की सम्भावना बढ़ जाती है।

2. श्रेष्ठता की भावना

साम्प्रदायिक व्यक्ति अपने धर्म या सम्प्रदाय को श्रेष्ठ तथा दूसरे धर्मों को निम्न समझने लगता है। यह भावना पारस्परिक सम्मान को कमजोर करती है।

3. उपेक्षा की भावना

एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय के धर्म, संस्कृति, आदर्श और परम्पराओं की उपेक्षा करने लगते हैं। इससे सामाजिक दूरी तथा तनाव बढ़ता है।

4. अलगाव की प्रवृत्ति

साम्प्रदायिकता से प्रेरित समूह दूसरे धार्मिक समूहों से अलग रहना चाहते हैं। इससे सहयोग, सह-अस्तित्व और सामाजिक समरसता कमजोर होती है।

5. क्षति का भय

साम्प्रदायिक भावना से ग्रस्त व्यक्ति को यह भय रहने लगता है कि दूसरा समुदाय उसके धर्म, धार्मिक स्थलों, सम्पत्ति या हितों को हानि पहुँचा सकता है। यह भय आपसी अविश्वास को बढ़ाता है।

6. तिरस्कार और घृणा

साम्प्रदायिकता विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच तिरस्कार एवं घृणा उत्पन्न करती है। इसके कारण लोग एक-दूसरे को सहयोगी नागरिक के स्थान पर प्रतिद्वन्द्वी के रूप में देखने लगते हैं।

7. अनुकूलन का अभाव

साम्प्रदायिक मानसिकता वाले व्यक्ति दूसरे समूहों की भावनाओं, परम्पराओं और जीवन-पद्धति का सम्मान नहीं कर पाते। इससे पारस्परिक सद्भाव और सहयोग का अभाव उत्पन्न होता है।

8. धार्मिक कट्टरता

साम्प्रदायिकता धार्मिक कट्टरता को जन्म देती है। इससे व्यक्ति की सोच सीमित हो जाती है और वह व्यापक सामाजिक तथा राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा संकीर्ण धार्मिक हितों को प्राथमिकता देने लगता है।

साम्प्रदायिकता के प्रमुख कारण

1. फूट डालो और राज करो की नीति

औपनिवेशिक शासन ने अपने राजनीतिक हितों के लिए विभिन्न समुदायों के बीच विभाजन को प्रोत्साहित किया। इस नीति ने सामाजिक दूरी और साम्प्रदायिक मानसिकता को मजबूत किया। बाद के समय में भी सत्ता और वोट की राजनीति में ऐसी प्रवृत्तियों का उपयोग साम्प्रदायिकता को बढ़ाता है।

2. मनोवैज्ञानिक कारण

संकीर्ण साम्प्रदायिक मानसिकता में व्यक्ति दूसरे समुदाय के लोगों से स्वयं को असुरक्षित अनुभव करता है। भय और अविश्वास से गलत धारणाएँ बनती हैं तथा समुदायों के बीच दूरी बढ़ती है।

3. जाति-व्यवस्था

समाज का जातियों और उपसमूहों में विभाजन भी संकीर्ण समूहगत भावना को बढ़ा सकता है। जब व्यक्ति व्यापक सामाजिक पहचान के स्थान पर केवल अपने समूह को प्राथमिकता देता है तो संघर्ष की सम्भावना बढ़ती है।

4. साम्प्रदायिक संगठन

धर्म, जाति अथवा सम्प्रदाय के आधार पर बने कुछ संगठन अपने समूह को श्रेष्ठ बताकर दूसरे समूहों के विरुद्ध भावना भड़का सकते हैं। ऐसे संगठन साम्प्रदायिक मानसिकता को संगठित रूप प्रदान करते हैं।

5. धार्मिक कारण

भारत में अनेक धर्मों के लोग रहते हैं जिनकी भाषा, रीति-रिवाज, रहन-सहन और धार्मिक परम्पराएँ अलग-अलग हो सकती हैं। इन भिन्नताओं को श्रेष्ठता और हीनता के आधार पर देखने से साम्प्रदायिक भावना उत्पन्न होती है।

6. असामाजिक तत्व

कुछ असामाजिक तत्व अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ाते हैं। अफवाह, हिंसा तथा भड़काऊ गतिविधियों द्वारा वे समुदायों के बीच संघर्ष उत्पन्न कर सकते हैं।

साम्प्रदायिकता के दुष्परिणाम

1. राष्ट्रीय एकता में बाधा

साम्प्रदायिकता राष्ट्र को विभिन्न धार्मिक और सामुदायिक समूहों में बाँट देती है। लोग राष्ट्रीय हित के स्थान पर अपने समूह के हितों को प्राथमिकता देने लगते हैं, जिससे राष्ट्रीय एकता कमजोर होती है।

2. तनाव एवं संघर्ष

साम्प्रदायिकता से समुदायों के बीच अविश्वास, पूर्वाग्रह, घृणा और स्वार्थ की भावना बढ़ती है। परिणामस्वरूप सामाजिक तनाव और संघर्ष उत्पन्न होते हैं।

3. असुरक्षा की भावना

साम्प्रदायिक संघर्षों के कारण विभिन्न समुदायों के लोगों में अपने जीवन, सम्पत्ति और भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना विकसित होती है।

4. भीषण नरसंहार

साम्प्रदायिक संघर्ष जब हिंसक रूप ले लेता है तो जन-धन की भारी हानि हो सकती है। सामान्य सामाजिक तनाव कभी-कभी व्यापक हिंसा और नरसंहार में बदल जाता है।

5. आर्थिक विकास में बाधा

दंगे और साम्प्रदायिक संघर्ष होने पर व्यापार, उद्योग, परिवहन तथा कार्यालयों का कार्य प्रभावित होता है। सार्वजनिक एवं निजी सम्पत्ति की हानि होती है और सरकार को शान्ति स्थापित करने तथा पुनर्निर्माण में धन खर्च करना पड़ता है।

6. राजनीतिक अस्थिरता

साम्प्रदायिकता सरकार और प्रशासन के प्रति अविश्वास बढ़ाती है। राजनीतिक दलों में आपसी संघर्ष, संकीर्णता और विभाजन बढ़ने से राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है।

7. असामाजिक तत्वों में वृद्धि

साम्प्रदायिक तनाव के समय असामाजिक तत्व सक्रिय होकर लूटपाट, हिंसा, आगजनी तथा अन्य आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं।

8. पारिवारिक और सामाजिक विघटन

साम्प्रदायिक संघर्ष अनेक परिवारों को विस्थापन, मृत्यु, आर्थिक हानि और असुरक्षा जैसी परिस्थितियों में पहुँचा देता है। इससे पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन प्रभावित होता है।

साम्प्रदायिकता के उन्मूलन के उपाय

1. साम्प्रदायिक संगठनों पर नियंत्रण

ऐसे संगठनों पर प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए जो धर्म, जाति अथवा सम्प्रदाय के आधार पर लोगों में घृणा और संघर्ष उत्पन्न करते हैं। कानून का उल्लंघन करने वाले संगठनों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही आवश्यक है।

2. उच्च एवं मूल्यपरक शिक्षा

शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों में राष्ट्रीय एकता, पारस्परिक सम्मान, सहिष्णुता और नैतिकता का विकास किया जाना चाहिए। उन्हें साम्प्रदायिकता के दुष्परिणामों से परिचित कराना भी आवश्यक है।

3. साम्प्रदायिक राजनीतिक दलों को हतोत्साहित करना

धर्म अथवा सम्प्रदाय के आधार पर राजनीतिक लाभ प्राप्त करने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। राजनीति का आधार राष्ट्रीय हित और लोककल्याण होना चाहिए।

4. मानवतावादी धर्म-दर्शन का प्रचार

ऐसी विचारधारा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जो मनुष्य को धर्म या सम्प्रदाय से पहले मानव के रूप में देखे। सभी धर्मों में निहित प्रेम, दया, सहिष्णुता और मानव-कल्याण के मूल्यों पर बल दिया जाना चाहिए।

5. राष्ट्रवादी एवं एकतावादी साहित्य का प्रचार

ऐसे साहित्य का प्रचार किया जाना चाहिए जिसमें राष्ट्रीयता, एकता, भाईचारा और सामाजिक समरसता के मूल्य हों। इससे लोगों में व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विकास होता है।

6. नैतिक शिक्षा का प्रसार

विद्यालयी पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को उचित स्थान दिया जाना चाहिए। विद्यार्थियों को भाईचारा, प्रेम, पारस्परिक सहयोग और सहिष्णुता जैसे गुणों का व्यवहारिक अभ्यास कराया जाना चाहिए।

भारत में साम्प्रदायिकता

भारत प्राचीन काल से विभिन्न धर्मों, जातियों, भाषाओं और सम्प्रदायों का देश रहा है। यहाँ विभिन्न धार्मिक समुदाय लंबे समय से साथ रहते आए हैं और सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक जीवन में भाग लेते रहे हैं। भारतीय संस्कृति की विशेषता विविधता के भीतर एकता रही है।

औपनिवेशिक शासन में अपनाई गई फूट डालो और राज करो की नीति ने धार्मिक विभाजन को बढ़ावा दिया। इसका गहरा प्रभाव भारतीय समाज पर पड़ा और देश के विभाजन जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं।

स्वतंत्रता के बाद भी समय-समय पर राजनीतिक स्वार्थ, असामाजिक तत्वों और धार्मिक कट्टरता के कारण साम्प्रदायिक तनाव दिखाई देता है। जब धर्म का प्रयोग राजनीतिक या व्यक्तिगत हितों की प्राप्ति के साधन के रूप में किया जाता है, तब सामाजिक सद्भाव तथा राष्ट्रीय एकता को क्षति पहुँचती है।

अतः भारत जैसे बहुधार्मिक एवं बहुसांस्कृतिक राष्ट्र में साम्प्रदायिकता का उन्मूलन राष्ट्रीय एकता, मानवता, भाईचारे और सामाजिक शान्ति के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

साम्प्रदायिकता को समाप्त करने में शिक्षा की भूमिका

  • विद्यार्थियों में सभी धर्मों और संस्कृतियों के प्रति सम्मान विकसित करना।
  • राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति निष्ठा उत्पन्न करना।
  • धार्मिक कट्टरता, पूर्वाग्रह और अन्धविश्वास के स्थान पर विवेकपूर्ण दृष्टिकोण विकसित करना।
  • सहिष्णुता, प्रेम, सहयोग तथा भाईचारे की भावना को व्यवहार में विकसित करना।
  • साम्प्रदायिक अफवाहों और भड़काऊ विचारों का तार्किक ढंग से मूल्यांकन करने की क्षमता विकसित करना।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • साम्प्रदायिकता अपने धर्म या सम्प्रदाय को व्यापक समाज एवं राष्ट्र से ऊपर रखने वाली संकीर्ण भावना है।
  • इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं—श्रेष्ठता, उपेक्षा, अलगाव, असुरक्षा, घृणा, अनुकूलन का अभाव तथा धार्मिक कट्टरता।
  • इसके प्रमुख कारण हैं—फूट डालो और राज करो की नीति, मनोवैज्ञानिक असुरक्षा, जाति-व्यवस्था, साम्प्रदायिक संगठन, धार्मिक संकीर्णता और असामाजिक तत्व।
  • इसके कारण राष्ट्रीय एकता कमजोर होती है, तनाव और हिंसा बढ़ती है, आर्थिक विकास प्रभावित होता है तथा राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होती है।
  • शिक्षा, नैतिक मूल्यों, मानवतावादी दृष्टिकोण, राष्ट्रीय साहित्य और साम्प्रदायिक संगठनों पर नियंत्रण द्वारा इसे कम किया जा सकता है।
  • भारत में विविधता के भीतर एकता को बनाए रखने के लिए साम्प्रदायिक सद्भाव अत्यन्त आवश्यक है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

यूनिवर्सलाइजेशन का अर्थ है—

व्याख्या: Universalisation का हिन्दी रूप सार्वभौमीकरण है। शिक्षा के संदर्भ में इसका अर्थ सभी बच्चों तक शिक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
Q 2

बाल-श्रम के कारण हैं—

व्याख्या: गरीबी, अशिक्षा और जनसंख्या वृद्धि—तीनों ही बाल-श्रम को बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं।
Q 3

“राजनीतिक भाषा में उपजाति के प्रति निष्ठा का भाव ही जातिवाद है।” यह कथन है—

व्याख्या: के. एम. पन्निकर ने राजनीतिक संदर्भ में उपजाति के प्रति निष्ठा की भावना को जातिवाद माना है।
Q 4

जातिवाद का दुष्परिणाम है—

व्याख्या: जातिवाद संकीर्ण जातीय हितों को बढ़ावा देता है, जिससे पक्षपात और अनुचित व्यवहार बढ़ते हैं तथा नैतिक पतन होता है।
Q 5

“सम्प्रदायवाद अपने ही जातीय समूह के प्रति न कि समग्र समाज के प्रति निष्ठा की भावना है।” यह कथन है—

व्याख्या: रेण्डम हाउस डिक्शनरी में साम्प्रदायिकता को अपने समूह के प्रति संकीर्ण निष्ठा की भावना के रूप में स्पष्ट किया गया है।
Q 6

साम्प्रदायिकता के कारण हैं—

व्याख्या: जाति व्यवस्था, मनोवैज्ञानिक असुरक्षा तथा साम्प्रदायिक संगठन—सभी साम्प्रदायिकता को बढ़ाने वाले कारण हैं।
Q 7

कोठारी आयोग का गठन कब किया गया?

व्याख्या: शिक्षा आयोग, जिसे कोठारी आयोग कहा जाता है, का गठन वर्ष 1964 में किया गया था।
Q 8

राष्ट्रीय बाल श्रम नीति कब घोषित की गई?

व्याख्या: भारत में राष्ट्रीय बाल श्रम नीति वर्ष 1987 में घोषित की गई।
Q 9

बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा पाने का अधिकार अधिनियम कब पारित हुआ?

व्याख्या: बच्चों का निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) वर्ष 2009 में पारित हुआ और 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ।
Q 10

जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण का प्रमुख उपाय है—

व्याख्या: शिक्षा लोगों में जनसंख्या वृद्धि, परिवार नियोजन तथा छोटे परिवार के प्रति जागरूकता उत्पन्न करती है।
Q 11

जातिवाद का उद्गम स्रोत है—

व्याख्या: जातिवाद का मूल आधार जाति-व्यवस्था है, जिसमें व्यक्ति अपनी जाति के हितों को अन्य जातियों और व्यापक समाज से ऊपर रखता है।
Q 12

मध्याह्न भोजन योजना का आरम्भ हुआ—

व्याख्या: राष्ट्रीय स्तर पर मध्याह्न भोजन योजना की शुरुआत वर्ष 1995 में की गई।
Q 13

साम्प्रदायिकता के उन्मूलन में प्रमुख भूमिका अदा कर सकता है—

व्याख्या: शिक्षा सहिष्णुता, राष्ट्रीय एकता, भाईचारा तथा सभी धर्मों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करके साम्प्रदायिकता को कम कर सकती है।
Q 14

शिक्षा के सार्वभौमीकरण का प्रमुख उद्देश्य है—

व्याख्या: शिक्षा के सार्वभौमीकरण का मूल उद्देश्य सभी बच्चों को बिना भेदभाव के शिक्षा की उपलब्धता, नामांकन और निरन्तरता सुनिश्चित करना है।
Q 15

साम्प्रदायिकता का प्रमुख दुष्परिणाम कौन-सा है?

व्याख्या: साम्प्रदायिकता लोगों को धार्मिक समूहों में विभाजित करके आपसी अविश्वास और संघर्ष बढ़ाती है, जिससे राष्ट्रीय एकता बाधित होती है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP DELED Semester 2 के विषय वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा के अध्याय उभरते समाज के प्रमुख मुद्दे–1 से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के प्रमुख चरणों का उल्लेख कीजिए।

Q 2

समानता के क्षेत्र लिखिए।

Q 3

शिक्षा के व्यवसायीकरण की अवधारणा पर प्रकाश डालिए।

Q 4

शैक्षिक अवसरों में समानता के लिए कुछ सुझाव दीजिए।

Q 5

बाल-श्रम के कारण बताइए।

Q 6

बाल-श्रम निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा में किस प्रकार बाधक है? स्पष्ट कीजिए।

Q 7

बालश्रम से आपका क्या अभिप्राय है?

Q 8

जनसंख्या शिक्षा की समस्याएँ व उनका समाधान बताइए।

Q 9

शिक्षा के सार्वभौमीकरण को परिभाषित कीजिए।

Q 10

शिक्षा के सार्वभौमीकरण के पाँच उद्देश्य लिखिए।

Q 11

शैक्षिक अवसरों की समानता से आप क्या समझते हैं?

Q 12

शैक्षिक असमानता से क्या अभिप्राय है?

Q 13

शैक्षिक असमानता की उत्पत्ति के तीन कारणों का वर्णन कीजिए।

Q 14

शिक्षा के व्यवसायीकरण की विशेषताएँ लिखिए।

Q 15

व्यवसायीकरण तथा शिक्षा एक-दूसरे से पूरक हैं। स्पष्ट कीजिए।

Q 16

बाल श्रमिकों की समस्याएँ बताइए।

Q 17

निर्धनता व बालश्रम में क्या सम्बन्ध है?

Q 18

जनसंख्या शिक्षा की समस्याएँ लिखिए।

Q 19

वर्तमान में जनसंख्या शिक्षा की क्या आवश्यकता है?

Q 20

साम्प्रदायिकता उन्मूलन के उपाय लिखिए।

Q 21

अलगाववाद को परिभाषित कीजिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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