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Home Study Material Semester 2 वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा शिक्षा एवं मूल्य
Chapter 9 • वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा

शिक्षा एवं मूल्य

UP DELED Semester 2 के विषय वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा के इस अध्याय में मूल्य की अवधारणा, प्रकृति एवं वर्गीकरण, मूल्य शिक्षा, मूल्यों के विकास में परिवार, समाज एवं विद्यालय की भूमिका, राष्ट्रीय एकता, अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना, लोकतान्त्रिक विकास तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति के विकास का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

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Topic 1 मूल्य—अर्थ, परिभाषाएँ, प्रकृति एवं विशेषताएँ

मूल्य—अर्थ, परिभाषाएँ, प्रकृति एवं विशेषताएँ

भूमिका

आधुनिक शिक्षा में बौद्धिक विकास पर अधिक बल दिया जा रहा है, जबकि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का संतुलित एवं सर्वांगीण विकास करना भी है।

भारतीय परम्परा में नैतिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों को विशेष महत्त्व दिया गया है। जब समाज में इन मूल्यों का ह्रास होता है, तो व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, नैतिक और धार्मिक जीवन में असंतुलन उत्पन्न होने लगता है।

अतः शिक्षा का कार्य विद्यार्थियों में ज्ञान के साथ-साथ अच्छे गुण, आदतें, मूल्य, रुचियाँ और स्वस्थ प्रवृत्तियाँ विकसित करना भी है, जिससे उनका मानसिक, सामाजिक, भावात्मक एवं आध्यात्मिक विकास हो सके।

मूल्य का अर्थ

मानव जीवन को अर्थपूर्ण बनाने में मूल्यों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। व्यक्ति जिन वस्तुओं, विचारों, आदर्शों, गुणों अथवा व्यवहारों को महत्त्वपूर्ण और वांछनीय मानता है, वे उसके मूल्य कहलाते हैं।

सरल शब्दों में, जिस वस्तु, विचार, गुण या आदर्श को व्यक्ति महत्त्व देता है और जिसे अपने जीवन में अपनाना चाहता है, वही मूल्य है।

सत्य, ईमानदारी और अच्छाई जैसे गुण मूल्य माने जाते हैं, जबकि झूठ, बेईमानी आदि को अमूल्य अथवा अवांछनीय माना जाता है।

अंग्रेजी शब्द Value की उत्पत्ति लैटिन भाषा के Valure शब्द से मानी गई है, जिसका अर्थ महत्त्व, उपयोगिता अथवा वांछनीयता से सम्बन्धित है।

समाज में मूल्य विभिन्न आदर्शों और प्रतिमानों के रूप में व्यक्ति को उचित दिशा प्रदान करते हैं। ये सामाजिक व्यक्तित्व के विकास तथा चरित्र निर्माण में सहायक होते हैं।

मूल्य केवल बाहरी नियम नहीं होते, बल्कि ऐसी आचरण-संहिता और सद्गुणों का समूह होते हैं जिन्हें अपनाकर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास करता है।

मूल्य की प्रमुख परिभाषाएँ

1. जॉन जे. केन (John J. Kane)

जॉन जे. केन के अनुसार, मूल्य वे आदर्श, विश्वास या मानक हैं जिन्हें समाज अथवा समाज के अधिकांश सदस्य स्वीकार करते हैं।

2. ऑगबर्न

ऑगबर्न के अनुसार, मूल्य वह है जो मानव की इच्छाओं की तुष्टि करता है।

3. डी. एच. पार्कर (D. H. Parker)

डी. एच. पार्कर के अनुसार, मूल्य मनुष्य के आन्तरिक मानसिक संसार से सम्बन्धित हैं। इच्छाओं की पूर्ति ही मूल्य है। मूल्य मूलतः एक अनुभव है, कोई वस्तु या उद्देश्य मात्र नहीं।

4. आर. बी. पैरी

आर. बी. पैरी के अनुसार, किसी व्यक्ति के लिए वही विषय मूल्यवान होता है जिसमें उसकी रुचि हो। अर्थात मूल्य का निर्माण व्यक्ति की रुचि और विषय के बीच विशेष सम्बन्ध से होता है।

5. ए. के. सी. ओटवे (A. K. C. Ottaway)

ए. के. सी. ओटवे के अनुसार, मूल्य वे विचार हैं जिनके लिए मनुष्य जीवन जीता है।

मूल्य की प्रकृति एवं विशेषताएँ

प्रत्येक समाज के अपने मूल्य होते हैं और वह अपने सदस्यों से उन मूल्यों के अनुरूप व्यवहार की अपेक्षा करता है। मूल्य समाज के आदर्शों, विश्वासों और व्यवहार-मानकों को व्यक्त करते हैं। इनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1. अमूर्त सम्प्रत्यय

मूल्य किसी भौतिक वस्तु के समान प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते। उनका सम्बन्ध मनुष्य के मन, आन्तरिक भावनाओं, विचारों और विश्वासों से होता है। इसलिए मूल्य की प्रकृति अमूर्त होती है।

2. दीर्घ अनुभवों का परिणाम

किसी समाज के मूल्य थोड़े समय में विकसित नहीं होते। वे समाज के दीर्घकालीन अनुभवों, विश्वासों, आदर्शों, नैतिक प्रतिमानों तथा व्यवहारिक मानदण्डों के परिणामस्वरूप बनते हैं।

समाज जिन अनुभवों को बार-बार उपयोगी और उचित पाता है, वे धीरे-धीरे सामाजिक मूल्य का रूप धारण कर लेते हैं।

3. सामाजिक स्वीकृति

मूल्यों को समाज की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होती है। समाज अपने आदर्शों, नैतिक नियमों, व्यवहारिक प्रतिमानों और सिद्धान्तों को स्वीकार करता है तथा व्यक्ति भी उन्हें महत्त्व प्रदान करता है।

4. व्यवहार के निर्धारक

मूल्य व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित और निर्देशित करते हैं। व्यक्ति सामाजिक जीवन में अनेक निर्णय अपने स्वीकृत मूल्यों के आधार पर लेता है।

इस प्रकार मूल्य यह निर्धारित करने में सहायता करते हैं कि कौन-सा व्यवहार उचित है और कौन-सा अनुचित।

5. सहभागिता से मूल्यों का विकास

व्यक्ति धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करता है। इन सामाजिक अनुभवों एवं सहभागिताओं के माध्यम से उसके मूल्यों का विकास होता है।

6. मूल्यों का चयन

व्यक्ति सभी मूल्यों को समान महत्त्व नहीं देता। वह अपनी रुचि, आवश्यकता तथा सामाजिक वातावरण के आधार पर कुछ मूल्यों को अधिक महत्त्व देता है।

आदर्श, सिद्धान्त, नैतिक नियम तथा व्यवहारिक मानदण्ड इसी चयन प्रक्रिया से व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बनते हैं।

7. उचित कार्य के प्रेरक

समाज में स्वीकृत मूल्य व्यक्ति को अच्छे और उचित कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं। वे व्यक्ति को सही और गलत के बीच अन्तर समझने तथा उचित निर्णय लेने में सहायता करते हैं।

8. आत्म-सन्तुष्टि

जब व्यक्ति अपने स्वीकृत मूल्यों के अनुसार आचरण करता है तो उसे आत्म-सन्तुष्टि की अनुभूति होती है। इसलिए मूल्य व्यक्ति को केवल दिशा ही नहीं देते, बल्कि उसके आन्तरिक संतोष से भी जुड़े होते हैं।

9. परिवर्तनशीलता

मूल्यों की प्रकृति परिवर्तनशील होती है। अलग-अलग समाजों में अलग-अलग मूल्य पाए जाते हैं और समय तथा परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ नए मूल्य भी विकसित होते रहते हैं।

अतः मूल्य पूरी तरह स्थिर नहीं होते, बल्कि सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार उनमें परिवर्तन सम्भव है।

10. समाज की पहचान

किसी समाज, राष्ट्र अथवा व्यक्ति की पहचान उसके मूल्यों से भी होती है। किसी समाज में स्वीकृत मूल्य उसके आदर्शों, संस्कृति, मान्यताओं और जीवन-दृष्टि को प्रकट करते हैं।

मूल्यों का जीवन में महत्त्व

मूल्य व्यक्ति को उचित आचरण की दिशा प्रदान करते हैं। वे उसके निर्णय, व्यवहार और व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं तथा समाज में स्वीकृत और उत्तरदायी जीवन जीने में सहायता करते हैं।

इसलिए शिक्षा में मूल्यों का विकास आवश्यक है, ताकि विद्यार्थी केवल ज्ञानवान ही न बनें बल्कि अच्छे चरित्र, उचित व्यवहार और स्वस्थ सामाजिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति भी बनें।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मूल्य वे आदर्श, गुण, विश्वास अथवा मानक हैं जिन्हें व्यक्ति और समाज महत्त्वपूर्ण एवं वांछनीय मानते हैं।
  • Value शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द Valure से मानी गई है, जिसका सम्बन्ध महत्त्व, उपयोगिता और वांछनीयता से है।
  • जॉन जे. केन ने मूल्यों को समाज द्वारा स्वीकृत आदर्श, विश्वास और मानक माना है।
  • ऑगबर्न के अनुसार मूल्य वह है जो मानव की इच्छाओं की तुष्टि करता है।
  • ए. के. सी. ओटवे के अनुसार मूल्य वे विचार हैं जिनके लिए मनुष्य जीवन जीता है।
  • मूल्यों की प्रमुख विशेषताएँ हैं—अमूर्तता, दीर्घ अनुभवों का परिणाम, सामाजिक स्वीकृति, व्यवहार निर्धारण, चयन, आत्म-सन्तुष्टि और परिवर्तनशीलता।
  • मूल्य व्यक्ति के व्यवहार को दिशा देते हैं तथा किसी समाज और राष्ट्र की पहचान बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
Topic 2 मूल्य शिक्षा के उद्देश्य एवं मूल्यों का वर्गीकरण

मूल्य शिक्षा के उद्देश्य एवं मूल्यों का वर्गीकरण

मूल्य शिक्षा के उद्देश्य

मूल्य शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि उनमें ऐसे नैतिक, सामाजिक और मानवीय गुणों का विकास करना है जो उन्हें अच्छा व्यक्ति तथा उत्तरदायी नागरिक बनने में सहायता करें।

स्रोत के अनुसार मूल्य शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

  1. अनैतिकता का प्रतिरोध करने की क्षमता— विद्यार्थियों में ऐसी नैतिक शक्ति विकसित करना जिससे वे अनैतिक आचरण और गलत प्रवृत्तियों का विरोध कर सकें।
  2. सुखद एवं समृद्ध भारतवर्ष का निर्माण— ऐसे नागरिक तैयार करना जो अपने अच्छे आचरण, सहयोग और उत्तरदायित्व के माध्यम से राष्ट्र के विकास में योगदान दें।
  3. भौतिकवादी एवं आध्यात्मिक संस्कृति में समन्वय— जीवन में भौतिक आवश्यकताओं और आध्यात्मिक मूल्यों के बीच उचित संतुलन स्थापित करना।
  4. व्यक्ति के आचरण में सुधार— विद्यार्थियों के व्यवहार को नैतिक, अनुशासित और समाजोपयोगी बनाना।
  5. मानव के सुखद भविष्य का निर्माण— ऐसे मूल्यों का विकास करना जिनसे व्यक्ति तथा समाज दोनों का भविष्य अधिक शान्तिपूर्ण और कल्याणकारी बन सके।
  6. मौलिक गुणों का विकास— विद्यार्थियों में सहयोग, प्रेम, करुणा, शान्ति, अहिंसा, साहस, समानता, बन्धुत्व, श्रम-गरिमा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा विभेदीकरण की शक्ति जैसे गुणों का विकास करना।
  7. राष्ट्रीय लक्ष्यों का बोध— विद्यार्थियों को समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता और लोकतन्त्र जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों की सही समझ प्रदान करना।

मूल्यों का वर्गीकरण

मूल्यों का स्वरूप बहुत व्यापक है। सामान्य रूप से मूल्यों को तीन प्रमुख वर्गों में रखा जा सकता है—

  1. परम्परागत मूल्य
  2. आधुनिक मूल्य
  3. जीवन-शैली में परिवर्तन के परिणामस्वरूप विकसित मूल्य

1. परम्परागत मूल्य

परम्परागत मूल्य वे आदर्श, सिद्धान्त एवं विश्वास हैं जो प्राचीन काल से समाज का मार्गदर्शन करते आए हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होते रहते हैं।

समाज में परिवर्तन होने के बाद भी इन मूल्यों पर अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है। इसलिए इन्हें शाश्वत मूल्य भी कहा जाता है।

प्रमुख परम्परागत मूल्य हैं—

  • सत्य
  • अहिंसा
  • करुणा
  • शान्ति
  • क्षमाशीलता
  • सादगी
  • धैर्य
  • ज्ञान
  • प्रचार
  • सहयोग

2. आधुनिक मूल्य

आधुनिक मूल्य वे मूल्य हैं जिन्हें आधुनिक लोकतान्त्रिक समाज और भारतीय संविधान में महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। ये व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रीय और मानवीय एकता को मजबूत करते हैं।

i. स्वतंत्रता

स्वतंत्रता मानव जीवन का आधारभूत एवं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मूल्य है। भारतीय संविधान नागरिकों को अनेक प्रकार की स्वतंत्रताएँ प्रदान करता है।

  • भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
  • क्षेत्र भ्रमण की स्वतंत्रता।
  • व्यवसाय अपनाने की स्वतंत्रता।
  • सभा करने की स्वतंत्रता।
  • संघ बनाने की स्वतंत्रता।
ii. समानता

समानता का अर्थ है कि नागरिकों के साथ धर्म, लिंग, जाति, जन्म-स्थान आदि के आधार पर अनुचित भेदभाव न किया जाए।

विधिक दृष्टि से सभी नागरिक समान हैं। समाज के कुछ वंचित वर्गों के हितों की रक्षा और उन्हें समान अवसर प्रदान करने के लिए विशेष व्यवस्थाएँ भी की जा सकती हैं।

iii. भ्रातृत्व भाव

भ्रातृत्व का अर्थ भाईचारे, प्रेम और सहयोग की भावना से है। इसका उद्देश्य जाति, धर्म, लिंग, आर्थिक स्थिति आदि के भेद से ऊपर उठकर सभी व्यक्तियों के प्रति समान और सहयोगपूर्ण दृष्टिकोण विकसित करना है।

भ्रातृत्व राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है और “जियो और जीने दो” की भावना पर आधारित समाज के निर्माण में सहायक होता है।

iv. विश्व बन्धुत्व की भावना

वर्तमान युग में केवल राष्ट्रीय स्तर पर भाईचारे की भावना पर्याप्त नहीं है। विभिन्न राष्ट्रों के बीच शान्ति और सहयोग बनाए रखने के लिए विश्व बन्धुत्व आवश्यक है।

विश्व बन्धुत्व का अर्थ सम्पूर्ण मानवता को एक परिवार के रूप में देखना तथा देशों के बीच संघर्ष के स्थान पर सहयोग, सद्भाव और मानव कल्याण को महत्त्व देना है।

v. समाजवादी मूल्य

लोकतान्त्रिक समाजवादी व्यवस्था में आर्थिक एवं सामाजिक समानता को विशेष महत्त्व दिया जाता है। समाजवादी मूल्यों के प्रमुख आधार हैं—

  • पदवी एवं अवसर के प्रति समानता का आदर।
  • धन का समान एवं न्यायपूर्ण बँटवारा।

समाजवादी दृष्टिकोण का लक्ष्य आर्थिक असमानता को कम करके वर्गविहीन और अधिक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना करना है।

vi. धर्मनिरपेक्षता सम्बन्धी मूल्य

धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान का महत्त्वपूर्ण सामाजिक मूल्य है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म के अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता प्राप्त हो और किसी के धार्मिक विश्वास से दूसरों के सामाजिक, आर्थिक अथवा राजनीतिक जीवन में बाधा उत्पन्न न हो।

धर्मनिरपेक्षता से सम्बन्धित प्रमुख मूल्य हैं—

  • सभी धर्मों के प्रति आदर।
  • पूजा करने की स्वतंत्रता।
  • नागरिक कार्यों की व्यवस्था करते समय धर्म को अनुचित रूप से बीच में न लाना।
vii. न्याय

न्याय का अर्थ सभी व्यक्तियों के साथ न्यायोचित व्यवहार करना है। न्याय के माध्यम से पक्षपातपूर्ण प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण किया जा सकता है और समाज के व्यापक हितों की रक्षा की जा सकती है।

न्याय के तीन प्रमुख रूप हैं—

  • सामाजिक न्याय
  • आर्थिक न्याय
  • राजनीतिक न्याय

3. जीवन-शैली में परिवर्तन के परिणामस्वरूप विकसित मूल्य

आधुनिक जीवन-शैली में होने वाले परिवर्तनों के साथ कुछ नए मूल्य भी विकसित हुए हैं। इनमें प्रमुख रूप से—

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास सम्बन्धी मूल्य
  • पर्यावरणीय मूल्य

ये मूल्य आधुनिक समाज की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार वैज्ञानिक सोच तथा पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व को महत्त्व देते हैं।

विभिन्न विद्वानों द्वारा मूल्यों का वर्गीकरण

विभिन्न विद्वानों ने अपनी-अपनी दृष्टि से मूल्यों का वर्गीकरण किया है।

वाल्टर जी. एवरेट के अनुसार

वाल्टर जी. एवरेट ने मूल्यों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया है—

  1. आर्थिक मूल्य— ऐसे मूल्य जिनका उपयोग अन्य मूल्यों की प्राप्ति के साधन के रूप में किया जाता है।
  2. शारीरिक मूल्य— शारीरिक स्वास्थ्य तथा जीवन की सुन्दरता से सम्बन्धित मूल्य।
  3. मनोरंजन मूल्य— खेल एवं मनोरंजन से सम्बन्धित मूल्य।
  4. सामाजिक मूल्य— मानवीय सम्बन्धों से जुड़े मूल्य; जैसे सामाजिक दायित्व, आदर्श नागरिकता, लोकतन्त्र, मानवतावाद, सामाजिक संवेदनशीलता और राष्ट्रीय एकता।
  5. चारित्रिक मूल्य— व्यक्तित्व तथा सामाजिक चरित्र से सम्बन्धित मूल्य; जैसे न्याय, परोपकार और दयालुता।
  6. सौन्दर्यात्मक मूल्य— प्राकृतिक सौन्दर्य एवं कलात्मक कार्यों से सम्बन्धित मूल्य।
  7. बौद्धिक मूल्य— ज्ञान तथा सत्य की खोज से सम्बन्धित मूल्य।
  8. धार्मिक मूल्य— भक्ति, पूजा, उपासना आदि से सम्बन्धित मूल्य।
पार्कर के अनुसार

पार्कर ने रुचि के आधार पर मूल्यों के आठ प्रकार बताए हैं—

  1. जैविक मूल्य
  2. आर्थिक मूल्य
  3. भावात्मक मूल्य
  4. सामाजिक मूल्य
  5. बौद्धिक मूल्य
  6. सौन्दर्यात्मक मूल्य
  7. नैतिक मूल्य
  8. धार्मिक मूल्य
हैरी एस. ब्राउडी के अनुसार

हैरी एस. ब्राउडी ने अपनी पुस्तक Building a Philosophy of Education में निम्न मूल्यों का उल्लेख किया है—

  1. आर्थिक मूल्य
  2. शारीरिक मूल्य
  3. मनोरंजन मूल्य
  4. सम्बन्धात्मक मूल्य
  5. सौन्दर्यात्मक मूल्य
  6. नैतिक मूल्य
  7. धार्मिक मूल्य
प्लेटो के अनुसार

प्लेटो ने परम सत्य के सन्दर्भ में तीन मूल्यों को विशेष महत्त्व दिया—

  1. सत्य (Truth)
  2. अच्छाई (Goodness)
  3. सुन्दरता (Beauty)

भारतीय विचारधारा में इन्हीं को सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् के रूप में व्यक्त किया गया है।

इसके अतिरिक्त मूल्यों का वर्गीकरण आत्मनिष्ठ एवं वस्तुनिष्ठ (Subjective and Objective) रूप में भी किया गया है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मूल्य शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों में नैतिकता, सहयोग, प्रेम, करुणा, शान्ति, अहिंसा, समानता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसे गुणों का विकास करना है।
  • सामान्यतः मूल्यों को परम्परागत, आधुनिक तथा जीवन-शैली में परिवर्तन से विकसित मूल्य—इन तीन भागों में बाँटा गया है।
  • परम्परागत मूल्यों में सत्य, अहिंसा, करुणा, शान्ति, क्षमाशीलता, सादगी और सहयोग आदि आते हैं।
  • आधुनिक संवैधानिक मूल्यों में स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व, विश्व बन्धुत्व, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और न्याय प्रमुख हैं।
  • आधुनिक जीवन-शैली से वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा पर्यावरणीय मूल्य विकसित हुए हैं।
  • वाल्टर जी. एवरेट ने आर्थिक, शारीरिक, मनोरंजन, सामाजिक, चारित्रिक, सौन्दर्यात्मक, बौद्धिक और धार्मिक मूल्यों का उल्लेख किया है।
  • प्लेटो ने सत्य, अच्छाई और सुन्दरता को प्रमुख मूल्य माना, जिन्हें भारतीय परम्परा में सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् कहा गया है।
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Topic 3 मूल्य शिक्षा—अर्थ, विशेषताएँ, सिद्धान्त एवं आवश्यकता

मूल्य शिक्षा—अर्थ, विशेषताएँ, सिद्धान्त एवं आवश्यकता

मूल्य शिक्षा का अर्थ

मूल्य शिक्षा (Value Education) से आशय ऐसी शिक्षा से है जिसमें मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों के विकास पर विशेष बल दिया जाता है। इसके अन्तर्गत शिक्षा की पूरी व्यवस्था—जैसे पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधियाँ, उद्देश्य तथा शिक्षक—इस प्रकार कार्य करते हैं कि विद्यार्थियों में अच्छे मूल्यों का संवर्द्धन हो सके।

वर्तमान समय में समाज में अनेक सार्वभौमिक मूल्यों का ह्रास दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में शिक्षा ही वह प्रभावी माध्यम है जिसके द्वारा विद्यार्थियों में सत्य, सहयोग, प्रेम, करुणा, समानता, बन्धुत्व तथा अन्य श्रेष्ठ मूल्यों को पुनः स्थापित किया जा सकता है।

मूल्य शिक्षा व्यक्ति को केवल ज्ञानवान बनाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसे अच्छा मनुष्य, उत्तरदायी नागरिक और समाजोपयोगी व्यक्ति बनाने का प्रयास करती है।

“वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना के अनुरूप मूल्य शिक्षा विश्वबन्धुत्व एवं अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास में भी सहायक होती है।

मूल्य शिक्षा की विशेषताएँ

1. मानवीय एवं सामाजिक गुणों का विकास

मूल्य शिक्षा विद्यार्थियों में सहयोग, समानता, साहस, प्रेम, करुणा, बन्धुत्व, श्रम की गरिमा तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसे गुणों का विकास करती है।

इसके साथ ही विद्यार्थियों में उचित-अनुचित के बीच भेद करने की क्षमता भी विकसित होती है।

2. उत्तरदायी नागरिक का निर्माण

मूल्य शिक्षा विद्यार्थियों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाकर उन्हें उत्तरदायी नागरिक बनने के लिए तैयार करती है।

3. सामाजिक स्वीकृति

मूल्य केवल व्यक्तिगत धारणाएँ नहीं होते, बल्कि वे समाज द्वारा भी स्वीकार किए जाते हैं। समाज जिन आदर्शों और व्यवहारों को उचित मानता है, वे व्यक्ति के मूल्य निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

4. आदर्शों एवं मानदण्डों से सम्बन्ध

मूल्य समाज में प्रचलित विश्वासों, आदर्शों, सिद्धान्तों, नैतिक नियमों और व्यवहार के मानदण्डों से जुड़े होते हैं।

व्यक्ति इन सभी मूल्यों को समान महत्त्व नहीं देता। वह अपनी आवश्यकता एवं रुचि के अनुसार कुछ मूल्यों को अधिक और कुछ को कम महत्त्व देता है।

5. व्यवहार को नियंत्रित एवं निर्देशित करना

मूल्य व्यक्ति के व्यवहार को दिशा देते हैं। व्यक्ति अपने मूल्यों के आधार पर यह निर्णय करता है कि किसी परिस्थिति में उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए।

6. अलग-अलग समाजों में मूल्यों की भिन्नता

प्रत्येक समाज के अपने विशिष्ट मूल्य होते हैं। इसी कारण अलग-अलग समाजों में मूल्यों के स्वरूप में भिन्नता दिखाई देती है और किसी समाज की पहचान भी उसके मूल्यों से होती है।

7. मूल्य अमूर्त सम्प्रत्यय हैं

मूल्य भौतिक वस्तुओं की तरह दिखाई नहीं देते। उनका सम्बन्ध मनुष्य के अन्तर्मन, विचारों, भावनाओं और विश्वासों से होता है। इसलिए मूल्य एक अमूर्त सम्प्रत्यय हैं।

8. सामाजिक क्रियाओं द्वारा मूल्यों का अधिगम

मनुष्य सामाजिक जीवन में भाग लेते हुए विभिन्न मूल्यों को सीखता और अपनाता है। परिवार, विद्यालय, समुदाय तथा अन्य सामाजिक गतिविधियाँ मूल्य निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

मूल्यपरक शिक्षा के सिद्धान्त

मूल्य शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए स्रोत में निम्न प्रमुख सिद्धान्त बताए गए हैं—

1. मूल्य शिक्षा धार्मिक शिक्षा से भिन्न है

मूल्यपरक शिक्षा को किसी एक विशेष धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इसका उद्देश्य सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों का विकास करना है, इसलिए इसमें किसी एक धर्म पर अनावश्यक विशेष बल नहीं दिया जाना चाहिए।

2. मूल्य शिक्षा को अलग विषय न बनाया जाए

मूल्य शिक्षा को केवल एक स्वतंत्र विषय के रूप में पढ़ाने के बजाय विभिन्न विषयों और शिक्षण-अनुभवों में मूल्यों को समाहित किया जाना चाहिए।

इससे विद्यार्थी मूल्यों को केवल सिद्धान्त के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जोड़कर समझते हैं।

3. संवैधानिक मूल्य एवं सामाजिक उत्तरदायित्व केन्द्र में हों

भारतीय संविधान में निहित मूल्यों तथा सामाजिक उत्तरदायित्वों को मूल्यपरक शिक्षा का प्रमुख आधार बनाया जाना चाहिए।

इससे विद्यार्थियों में समानता, न्याय, स्वतंत्रता, बन्धुत्व तथा सामाजिक कर्तव्य की भावना विकसित होती है।

4. सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से सम्बन्ध

मूल्यपरक शिक्षा को समाज की वास्तविक आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में लागू किया जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थी मूल्यों को अपने वास्तविक जीवन से जोड़ सकें।

5. घर, विद्यालय एवं आदर्श वातावरण का सहयोग

मूल्य शिक्षा केवल विद्यालय की जिम्मेदारी नहीं है। इसका आधार घर, विद्यालय, आदर्श वातावरण और शिक्षा—सभी होने चाहिए।

जब परिवार और विद्यालय दोनों समान मूल्यों को व्यवहार में प्रस्तुत करते हैं, तब विद्यार्थियों पर उनका अधिक प्रभाव पड़ता है।

मूल्य आधारित शिक्षा की आवश्यकता

वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में मूल्य आधारित शिक्षा की आवश्यकता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार तथा सामाजिक दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।

1. नैतिक गुणों का विकास

युवा पीढ़ी में नैतिक गुणों के विकास के लिए मूल्य आधारित शिक्षा आवश्यक है।

नम्रता, सच्चाई, ईमानदारी, बड़ों का सम्मान, शिष्टाचार, सेवा की भावना, सहिष्णुता तथा बलिदान जैसे गुण व्यक्ति के चरित्र को श्रेष्ठ बनाते हैं।

मूल्य आधारित शिक्षा इन गुणों को विकसित करके व्यक्ति को श्रेष्ठ जीवन जीने में सहायता करती है।

2. सकारात्मक सामाजिक प्रवृत्तियों का विकास

मूल्य आधारित शिक्षा युवाओं में सकारात्मक सामाजिक प्रवृत्तियों का विकास करती है और उन्हें समाज में फैली बुराइयों के प्रति जागरूक बनाती है।

दहेज प्रथा, भ्रष्टाचार, आतंक, गुंडागर्दी तथा लालफीताशाही जैसी बुराइयों के विरुद्ध जागरूक होकर युवा समाज के सुधार में योगदान दे सकते हैं।

3. समग्र विकास

केवल तथ्य, आँकड़े, नियम और कानून का ज्ञान व्यक्ति के पूर्ण विकास के लिए पर्याप्त नहीं है। जीवन की सूक्ष्म एवं व्यावहारिक बातों को समझना भी आवश्यक है।

विद्यार्थियों में सीखने की क्षमता होती है, परन्तु यदि शिक्षा केवल शैक्षिक विषयों तक सीमित रहे तो उनका विकास एकांगी हो सकता है।

इसलिए विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए मूल्य आधारित शिक्षा आवश्यक है।

4. मानवीकरण प्रभाव

मूल्य आधारित शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति का मानवीकरण करना है। सच्ची शिक्षा वह है जो व्यक्ति में मानव कल्याण, आत्म-विकास और सामुदायिक विकास की भावना उत्पन्न करे।

मानवीय मूल्यों से युक्त व्यक्ति समाज में उचित स्थान एवं सम्मान प्राप्त करता है और दूसरों के कल्याण के प्रति भी संवेदनशील बनता है।

5. लोकतान्त्रिक गुणों का विकास

मूल्य आधारित शिक्षा व्यक्ति में लोकतान्त्रिक गुणों का विकास करती है।

इनमें दूसरों के विचारों का सम्मान, व्यापक दृष्टिकोण, सामाजिक न्याय में विश्वास, समानता, भाईचारा तथा देशप्रेम जैसी भावनाएँ प्रमुख हैं।

इससे व्यक्ति में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति आस्था भी मजबूत होती है।

6. भौतिकवादी प्रवृत्तियों का विरोध

केवल भौतिक सुख-सुविधाओं को जीवन का लक्ष्य मानने वाली प्रवृत्तियाँ व्यक्ति को नैतिक मूल्यों से दूर कर सकती हैं।

मूल्य आधारित शिक्षा ऐसी अत्यधिक भौतिकवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध प्रभावी साधन के रूप में कार्य करती है और व्यक्ति में नीति तथा नैतिक मूल्यों के प्रति सम्मान विकसित करती है।

7. सहयोग एवं सहानुभूति का विकास

वर्तमान समाज में स्वार्थ, ईर्ष्या और असहयोग की भावना अनेक समस्याओं को जन्म देती है। शिक्षा बचपन से ही व्यक्ति के व्यवहार और दृष्टिकोण को प्रभावित करती है।

मूल्य आधारित शिक्षा विद्यार्थियों में सहयोग और सहानुभूति की भावना विकसित करती है, जिससे वे समाज के साथ बेहतर सम्बन्ध स्थापित कर पाते हैं।

मूल्य शिक्षा का समग्र महत्त्व

मूल्य शिक्षा व्यक्ति के नैतिक, सामाजिक, लोकतान्त्रिक और मानवीय विकास का आधार है। यह उसे सही और गलत में अन्तर करना, दूसरों का सम्मान करना और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझना सिखाती है।

इस प्रकार मूल्य शिक्षा केवल विद्यालयी पाठ्यक्रम का एक भाग नहीं, बल्कि व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन को दिशा देने वाली शिक्षा है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मूल्य शिक्षा वह शिक्षा है जिसमें पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधियों, उद्देश्यों और शिक्षक के माध्यम से मूल्यों के विकास पर बल दिया जाता है।
  • मूल्य शिक्षा विद्यार्थियों में सहयोग, समानता, प्रेम, करुणा, बन्धुत्व, श्रम-गरिमा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करती है।
  • मूल्यपरक शिक्षा किसी विशेष धर्म पर आधारित न होकर सार्वभौमिक एवं संवैधानिक मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए।
  • मूल्य शिक्षा को अलग विषय के बजाय विभिन्न विषयों और जीवन-अनुभवों में समाहित किया जाना चाहिए।
  • मूल्य आधारित शिक्षा नैतिक गुणों, सकारात्मक सामाजिक प्रवृत्तियों, लोकतान्त्रिक मूल्यों तथा सर्वांगीण विकास को बढ़ावा देती है।
  • यह अत्यधिक भौतिकवादी प्रवृत्तियों का विरोध करती है तथा सहयोग और सहानुभूति की भावना विकसित करती है।
  • घर, विद्यालय और आदर्श सामाजिक वातावरण के संयुक्त प्रयास से मूल्य शिक्षा अधिक प्रभावी होती है।
Topic 4 मूल्यों के विकास में परिवार, समाज एवं विद्यालय की भूमिका

मूल्यों के विकास में परिवार, समाज एवं विद्यालय की भूमिका

मूल्यों के विकास में परिवार, समाज एवं विद्यालय का महत्त्व

व्यक्ति के मूल्य जन्म से पूर्ण रूप से विकसित नहीं होते, बल्कि वे परिवार, समाज और विद्यालय के प्रभाव से धीरे-धीरे विकसित होते हैं।

बालक का पहला सम्पर्क परिवार से होता है, फिर वह समाज के व्यापक वातावरण से प्रभावित होता है और विद्यालय उसके व्यक्तित्व तथा मूल्यों को व्यवस्थित दिशा प्रदान करता है।

इस प्रकार परिवार, समाज और विद्यालय तीनों मिलकर बालक में अच्छे आचरण, उत्तरदायित्व, अनुशासन, सहयोग, देशप्रेम और अन्य मानवीय मूल्यों का विकास करते हैं।

मूल्यों के विकास में परिवार की भूमिका

परिवार बालक की प्रथम शिक्षा संस्था है। बालक प्रारम्भिक जीवन में माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों के व्यवहार को देखकर सीखता है। इसलिए परिवार का वातावरण मूल्य निर्माण की आधारशिला माना जाता है।

1. परिवार का वातावरण मूल्योन्मुख बनाना

माता-पिता को घर का वातावरण ऐसा बनाना चाहिए जिसमें सत्य, ईमानदारी, सहयोग, प्रेम, अनुशासन और सम्मान जैसे मूल्यों का व्यवहारिक रूप दिखाई दे।

जब बालक इन मूल्यों को परिवार के दैनिक जीवन में अनुभव करता है, तब वह उन्हें स्वाभाविक रूप से अपनाने लगता है।

2. मूल्य आधारित कथाओं का उपयोग

माता-पिता को बच्चों को ऐसी कहानियाँ और कथाएँ पढ़ने तथा सुनने के अवसर देने चाहिए जिनमें सत्य, साहस, परोपकार, सेवा, करुणा और ईमानदारी जैसे मूल्यों का संदेश हो।

कहानियों के माध्यम से बालक कठिन नैतिक विचारों को सरल और रोचक रूप में समझ सकता है।

3. माता-पिता का आदर्श व्यवहार

माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों को बालकों के सामने अनुशासित एवं मूल्यपरक व्यवहार प्रस्तुत करना चाहिए।

परिवार के सदस्यों की कथनी और करनी में अन्तर नहीं होना चाहिए, क्योंकि बालक उपदेश की अपेक्षा व्यवहार से अधिक सीखता है।

4. मूल्यपरक व्यवहार पर प्रोत्साहन

बालक जब सत्य बोलने, सहयोग करने, अनुशासन का पालन करने अथवा अन्य अच्छे मूल्यों का व्यवहार प्रदर्शित करे, तो माता-पिता को उसकी प्रशंसा तथा उचित प्रोत्साहन करना चाहिए।

इससे अच्छे व्यवहार की पुनरावृत्ति होती है और मूल्य धीरे-धीरे स्थायी आदत का रूप ले लेते हैं।

5. स्वस्थ आदतों और मूल्यों का विकास

माता-पिता को अपने कर्तव्यों और कमजोरियों को समझते हुए बच्चों का उचित मार्गदर्शन करना चाहिए। अत्यधिक कठोरता अथवा उपेक्षा के स्थान पर संतुलित अनुशासन अपनाना चाहिए।

उपयुक्त पारिवारिक वातावरण उपलब्ध कराकर बालक में अच्छी आदतों एवं स्वस्थ मूल्यों का विकास किया जा सकता है।

मूल्यों के विकास में समाज की भूमिका

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहकर ही वह व्यवहार, आदर्श, परम्पराएँ और सामाजिक मानदण्ड सीखता है।

समाज एक ऐसी संगठित व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति को कुछ कार्यों की स्वतंत्रता प्राप्त होती है, वहीं कुछ कार्यों पर सामाजिक नियंत्रण भी रहता है। इसमें अधिकारों तथा कर्तव्यों दोनों का निर्धारण होता है और व्यक्ति से निश्चित प्रकार के सामाजिक व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।

समाज अपने मूल्यों, आदर्शों, परम्पराओं, मानकों तथा व्यवहार-पद्धतियों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाता है। इसी प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति सामाजिक जीवन के लिए आवश्यक मूल्यों को सीखता है।

समाज द्वारा मूल्य विकास के प्रमुख आधार
  • समाज व्यक्ति के लिए उचित एवं अनुचित व्यवहार के मानदण्ड निर्धारित करता है।
  • सामाजिक परम्पराएँ और आदर्श व्यक्ति के आचरण को प्रभावित करते हैं।
  • व्यक्ति समाज के अधिकारों तथा कर्तव्यों की व्यवस्था से उत्तरदायित्व सीखता है।
  • समाज की विभिन्न क्रियाओं में भाग लेकर व्यक्ति सहयोग और सामाजिक व्यवहार सीखता है।
  • एक पीढ़ी के मूल्य, आदर्श और परम्पराएँ अगली पीढ़ी तक पहुँचती रहती हैं।

मूल्यों के विकास में विद्यालय की भूमिका

विद्यालय बालक के मूल्य विकास का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माध्यम है। विद्यालय केवल विषयगत ज्ञान नहीं देता, बल्कि विभिन्न शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों द्वारा विद्यार्थियों के चरित्र और व्यवहार का निर्माण भी करता है।

1. पाठ्यपुस्तकों में नैतिक कहानियों का समावेश

पाठ्यपुस्तकों में नैतिक शिक्षा से सम्बन्धित प्रेरक कहानियाँ सम्मिलित की जानी चाहिए, जिससे विद्यार्थी सत्य, ईमानदारी, त्याग, साहस और सहयोग जैसे मूल्यों को सरलता से समझ सकें।

2. भाषण प्रतियोगिताओं का आयोजन

जीवन-मूल्यों से सम्बन्धित विषयों पर विद्यालयों में भाषण प्रतियोगिताएँ आयोजित की जानी चाहिए।

इनसे विद्यार्थियों को मूल्यों के विषय में विचार करने, उन्हें समझने और व्यक्त करने का अवसर मिलता है।

3. राष्ट्रीय सेवा योजना जैसी गतिविधियाँ

राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) जैसी संस्थाओं और गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों को समाज सेवा के कार्यों में भाग लेने का अवसर दिया जाना चाहिए।

इससे सेवा, सहयोग, सामाजिक उत्तरदायित्व और परोपकार जैसे मूल्यों का विकास होता है।

4. मूल्य शिक्षा सम्बन्धी योजनाएँ

शैक्षिक संस्थानों में मूल्य शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न योजनाएँ आरम्भ की जानी चाहिए और उनका निर्देशन शिक्षक द्वारा किया जाना चाहिए।

स्रोत में उदाहरण के रूप में सहकारी दुकान चलाने जैसी गतिविधि का उल्लेख किया गया है, जिससे विद्यार्थियों में सहयोग, जिम्मेदारी और ईमानदारी का विकास हो सकता है।

5. विशेषज्ञों के व्याख्यान

नैतिकता और मूल्य शिक्षा से सम्बन्धित विषयों पर विशिष्ट व्यक्तियों एवं विशेषज्ञों को विद्यालय में आमन्त्रित कर भाषण और व्याख्यान आयोजित किए जाने चाहिए।

इससे विद्यार्थियों को जीवन-मूल्यों की व्यावहारिक समझ प्राप्त होती है।

6. पुस्तकों एवं साहित्य की प्रदर्शनी

विद्यालय में नैतिक शिक्षा तथा मूल्य शिक्षा से सम्बन्धित पुस्तकों और साहित्य की प्रदर्शनी आयोजित की जानी चाहिए।

इससे विद्यार्थियों में मूल्यपरक साहित्य पढ़ने की रुचि विकसित होती है।

7. मूल्य शिक्षा सम्बन्धी पत्रिकाओं का प्रकाशन

शैक्षिक संस्थाएँ मूल्य शिक्षा से सम्बन्धित पत्रिकाएँ प्रकाशित कर सकती हैं, जिनमें नैतिक विचार, प्रेरक प्रसंग, लेख और विद्यार्थियों की रचनाएँ सम्मिलित की जा सकती हैं।

8. नाटक, एकांकी एवं सामूहिक प्रतियोगिताएँ

विद्यालय में नाटक, एकांकी तथा सामूहिक प्रतियोगिताओं का आयोजन विभिन्न मूल्यों के सन्दर्भ में किया जा सकता है।

इन गतिविधियों से सहयोग, अनुशासन, संवेदनशीलता, अभिव्यक्ति तथा सामाजिक चेतना का विकास होता है।

9. मूल्य आधारित शिक्षा को आवश्यक बनाना

विद्यालयी शिक्षा में मूल्य आधारित शिक्षा को पर्याप्त महत्त्व दिया जाना चाहिए ताकि यह केवल अवसर विशेष तक सीमित न रहे, बल्कि विद्यार्थियों के दैनिक शैक्षिक जीवन का हिस्सा बने।

10. प्रातःकालीन सभा

विद्यालयों में प्रातःकालीन सभा का आयोजन किया जाना चाहिए। इसके माध्यम से प्रार्थना, प्रेरक विचार और मूल्यपरक संदेश विद्यार्थियों तक नियमित रूप से पहुँचाए जा सकते हैं।

11. लोकगीतों द्वारा सांस्कृतिक मूल्यों का विकास

लोकगीतों और अन्य सांस्कृतिक माध्यमों द्वारा विद्यार्थियों को भारत की सांस्कृतिक धरोहर से परिचित कराया जाना चाहिए।

इससे विद्यार्थियों में अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान और गौरव की भावना विकसित होती है।

12. समाज एवं देश के प्रति प्रेम

विद्यालय को विद्यार्थियों में समाज और देश के प्रति प्रेम की भावना विकसित करने का प्रयास करना चाहिए।

इससे उनमें सामाजिक उत्तरदायित्व, राष्ट्रप्रेम तथा जनकल्याण की भावना विकसित होती है।

परिवार, समाज एवं विद्यालय का संयुक्त योगदान

मूल्यों का स्थायी विकास तभी सम्भव है जब परिवार, समाज और विद्यालय तीनों एक-दूसरे के पूरक बनकर कार्य करें।

परिवार मूल्य सीखने की प्रारम्भिक भूमि प्रदान करता है, समाज उन मूल्यों को सामाजिक मान्यता और व्यवहार का क्षेत्र देता है तथा विद्यालय उन्हें व्यवस्थित शिक्षा और गतिविधियों द्वारा सुदृढ़ करता है।

अतः बालक के स्वस्थ चरित्र एवं संतुलित व्यक्तित्व के निर्माण के लिए इन तीनों संस्थाओं का सहयोग आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • परिवार बालक की प्रथम मूल्य-शिक्षा संस्था है और माता-पिता का व्यवहार उसके मूल्य निर्माण का प्रमुख आधार बनता है।
  • परिवार में मूल्यपरक वातावरण, प्रेरक कथाएँ, आदर्श व्यवहार, प्रोत्साहन तथा स्वस्थ अनुशासन द्वारा मूल्यों का विकास किया जाता है।
  • समाज अपने मूल्य, आदर्श, परम्पराएँ, मानक और व्यवहार-पद्धतियाँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाता है।
  • विद्यालय पाठ्यपुस्तकों, भाषण प्रतियोगिताओं, NSS, व्याख्यानों, साहित्य प्रदर्शनी, नाटक तथा अन्य गतिविधियों द्वारा मूल्य शिक्षा प्रदान करता है।
  • प्रातःकालीन सभा, लोकगीत एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विद्यार्थियों में सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों का विकास करते हैं।
  • विद्यालय का उद्देश्य विद्यार्थियों में समाज एवं देश के प्रति प्रेम, सहयोग और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना भी है।
  • मूल्यों के प्रभावी विकास के लिए परिवार, समाज और विद्यालय का संयुक्त प्रयास आवश्यक है।
Topic 5 राष्ट्रीय एकता—अर्थ, शिक्षा के उद्देश्य एवं आवश्यकता

राष्ट्रीय एकता—अर्थ, शिक्षा के उद्देश्य एवं आवश्यकता

राष्ट्रीय एकता का अर्थ

राष्ट्रीय एकता (National Integration) से आशय राष्ट्र के सभी नागरिकों में विचारों, भावनाओं और राष्ट्रीय हितों के प्रति एकता की भावना से है।

जब व्यक्ति धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, राजनीति और संस्कृति जैसी विभिन्नताओं से ऊपर उठकर स्वयं को राष्ट्र का अभिन्न अंग मानता है तथा व्यक्तिगत और सामूहिक हितों से ऊपर राष्ट्रहित को महत्त्व देता है, तब राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित होती है।

राष्ट्रीय एकता नागरिकों को संकीर्ण मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्र के विकास के लिए एकजुट होकर कार्य करने की प्रेरणा देती है। ऐसी भावना मजबूत होने पर व्यक्ति आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्र के लिए अपने जीवन, धन तथा व्यक्तिगत हितों का भी त्याग करने के लिए तैयार रहता है।

अतः राष्ट्रीय एकता केवल भौगोलिक एकता नहीं है, बल्कि यह भावनात्मक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता की भावना है।

राष्ट्रीय एकता की प्रमुख परिभाषाएँ

1. प्रो. जिमर्न के अनुसार

प्रो. जिमर्न ने राष्ट्रीयता को सामूहिक जीवन, सामूहिक विकास तथा सामूहिक आत्मसम्मान से सम्बन्धित माना है। अर्थात राष्ट्र के नागरिक जब अपने व्यक्तिगत अस्तित्व से आगे बढ़कर सामूहिक हित और विकास को महत्त्व देते हैं, तब राष्ट्रीय भावना मजबूत होती है।

2. डॉ. सम्पूर्णानन्द के अनुसार

डॉ. सम्पूर्णानन्द के अनुसार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने अनेक क्षेत्रों में प्रगति की, किन्तु राष्ट्रीय जीवन में अलगाव तथा पृथकता की प्रवृत्तियों में वृद्धि भी दिखाई दी। इसलिए राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना आवश्यक है।

3. डॉ. जे. एस. बैटी के अनुसार

राष्ट्रीय एकता का अर्थ देश के विभिन्न राज्यों तथा नागरिकों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषा-सम्बन्धी विभिन्नताओं को उचित सीमा में रखते हुए उनमें भारत की एकता की भावना का समावेश करना है।

4. डोरोथी थॉमसन के अनुसार

राष्ट्रीय एकीकरण वह भावना है जो किसी देश के नागरिकों को आपस में बाँधती है।

राष्ट्रीय एकता हेतु शिक्षा के उद्देश्य

राष्ट्रीय एकता की शिक्षा का मूल उद्देश्य देश के बच्चों, युवाओं और प्रौढ़ों को क्षेत्र, जाति, धर्म, भाषा और संस्कृति की विभिन्नताओं के बावजूद “हम सब एक राष्ट्र के नागरिक हैं” की भावना से जोड़ना है।

इसके लिए क्षेत्रीय, जातीय, धार्मिक, भाषायी तथा सांस्कृतिक संकीर्णताओं को कम करना और विभिन्न सम्प्रदायों एवं धर्मों के प्रति आदरभाव विकसित करना आवश्यक है।

1. संकीर्ण जातीयता को समाप्त करना

व्यक्तियों में संकीर्ण जातीय भावना को समाप्त करके उदार एवं मानवतावादी दृष्टिकोण विकसित किया जाना चाहिए।

विद्यार्थियों को यह समझाया जाना चाहिए कि जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर सभी नागरिकों को राष्ट्र के समान सदस्य के रूप में देखना राष्ट्रीय एकता की पहली आवश्यकता है।

2. राष्ट्रीय एकता के बाधक तत्वों को दूर करना

जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, धार्मिक संकीर्णता और अन्य विभाजनकारी प्रवृत्तियाँ राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती हैं।

शिक्षा द्वारा इन प्रवृत्तियों को कम करके नागरिकों में राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित की जानी चाहिए।

3. साम्प्रदायिक दुर्भावनाओं को समाप्त करना

लोगों में धर्म और सम्प्रदाय के आधार पर उत्पन्न होने वाली दुर्भावनाओं को दूर करके सर्वधर्म समभाव की भावना विकसित करना राष्ट्रीय एकता की शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

4. स्वदेश प्रेम एवं देश के प्रति अहम् भाव का विकास

प्रत्येक व्यक्ति में अपने देश के प्रति प्रेम, गौरव और उत्तरदायित्व की भावना विकसित की जानी चाहिए।

देशप्रेम का अर्थ केवल भावनात्मक लगाव नहीं, बल्कि राष्ट्र के हित, विकास और सुरक्षा के प्रति उत्तरदायी होना भी है।

5. सभी धर्मों एवं संस्कृतियों के प्रति आदर

भारत अनेक धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों वाला देश है। इसलिए विद्यार्थियों में सभी धर्मों और संस्कृतियों के प्रति आदर एवं सहिष्णुता की भावना विकसित की जानी चाहिए।

6. लोकतान्त्रिक भावना का विकास

सभी नागरिकों में लोकतान्त्रिक मूल्यों और भावनाओं का विकास करना आवश्यक है। समानता, स्वतंत्रता, न्याय, सहिष्णुता और दूसरों के विचारों का सम्मान राष्ट्रीय एकता को मजबूत करते हैं।

राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता

व्यक्तिगत स्वार्थ, जातीयता, क्षेत्रीयता, साम्प्रदायिकता और अन्य संकीर्ण प्रवृत्तियाँ राष्ट्रीय एकता को कमजोर करती हैं। राष्ट्र की सुरक्षा, प्रगति, शान्ति और समग्र विकास के लिए राष्ट्रीय एकता अत्यन्त आवश्यक है।

1. राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से

किसी राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमा पर तैनात सैनिकों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि नागरिकों की आन्तरिक एकता पर भी निर्भर करती है।

यदि राष्ट्र के भीतर ऐसे तत्व सक्रिय हों जो व्यक्तिगत या बाहरी हितों के लिए देश की एकता को नुकसान पहुँचाएँ, तो राष्ट्रीय सुरक्षा संकट में पड़ सकती है। इसलिए नागरिकों में राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने की भावना आवश्यक है।

2. वर्ग-संघर्ष की समाप्ति के लिए

समाज में जाति, धर्म, क्षेत्र, संस्कृति, राजनीतिक दल, उद्योगपति, मजदूर तथा सरकारी कर्मचारियों के बीच विभिन्न प्रकार के संघर्ष दिखाई दे सकते हैं।

इन संघर्षों के कारण दंगे, तोड़-फोड़, आगजनी, कामबन्दी और हड़ताल जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। राष्ट्रीय एकता की भावना इन संघर्षों को कम करके सामाजिक समरसता स्थापित करने में सहायक होती है।

3. “हम” की भावना के विकास के लिए

राष्ट्र की मजबूती के लिए नागरिकों में व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर “हम” की भावना विकसित होना आवश्यक है।

नाम, धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र अलग होते हुए भी नागरिक जब स्वयं को एक राष्ट्र का सदस्य मानते हैं, तब राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है।

4. लोकतान्त्रिक शासन में आस्था के लिए

भारत एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र है। लोकतन्त्र की सफलता केवल नागरिकों को अधिकार देने से नहीं होती, बल्कि उन्हें लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति विश्वास और उत्तरदायित्व भी विकसित करना होता है।

राष्ट्रीय एकता नागरिकों में लोकतान्त्रिक शासन के प्रति आस्था उत्पन्न करने तथा उन्हें अपने अधिकारों का उचित उपयोग करने के लिए प्रेरित करती है।

5. क्षेत्रीय संकीर्णता को समाप्त करने के लिए

क्षेत्रीयता की भावना बढ़ने पर विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों के बीच सीमाविवाद, विभाजन तथा अलगाव की माँग जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

राष्ट्रीय एकता व्यक्ति को अपने क्षेत्रीय हित से ऊपर उठकर सम्पूर्ण राष्ट्र के हित को महत्त्व देना सिखाती है।

6. विघटनकारी तत्वों के उन्मूलन के लिए

भारत में भाषा, जाति, धर्म और संस्कृति की विविधता है, जो राष्ट्र की विशेषता है। किन्तु कुछ विघटनकारी तत्व इसी विविधता का उपयोग समाज में विभाजन उत्पन्न करने के लिए कर सकते हैं।

जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र या भाषा के आधार पर लोगों को बाँटने वाली प्रवृत्तियाँ राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक हैं। इसलिए वैयक्तिक स्वार्थ, क्षेत्रीयता, जातीयता और भाषायी संकीर्णता को समाप्त करना आवश्यक है।

7. राष्ट्रीय उन्नति एवं जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के लिए

किसी राष्ट्र का समग्र विकास तभी सम्भव है जब उसके सभी भागों और नागरिकों में राष्ट्रीय एकता हो तथा सरकार की नीतियों और योजनाओं को जनसहयोग प्राप्त हो।

राष्ट्रीय एकता आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विकास को गति देती है तथा नागरिकों के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने में सहायक होती है।

राष्ट्रीय एकता का समग्र महत्त्व

राष्ट्रीय एकता राष्ट्र की सुरक्षा, शान्ति, सद्भावना, भाईचारा, लोकतान्त्रिक स्थिरता और समग्र विकास का आधार है।

विविधताओं से भरे भारत जैसे देश में राष्ट्रीय एकता का अर्थ विभिन्नताओं को समाप्त करना नहीं, बल्कि उनका सम्मान करते हुए सभी नागरिकों को एक व्यापक राष्ट्रीय भावना से जोड़ना है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • राष्ट्रीय एकता राष्ट्र के नागरिकों में विचारों, भावनाओं और राष्ट्रीय हितों की एकता की भावना है।
  • राष्ट्रीय एकता नागरिकों को जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र एवं संस्कृति की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में कार्य करने की प्रेरणा देती है।
  • राष्ट्रीय एकता हेतु शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य हैं—जातीय संकीर्णता दूर करना, साम्प्रदायिक सद्भाव, देशप्रेम, सभी धर्मों एवं संस्कृतियों के प्रति आदर और लोकतान्त्रिक भावना विकसित करना।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा तथा सामाजिक शान्ति के लिए राष्ट्रीय एकता आवश्यक है।
  • यह वर्ग-संघर्ष, क्षेत्रीय संकीर्णता तथा विघटनकारी प्रवृत्तियों को कम करने में सहायक है।
  • राष्ट्रीय एकता नागरिकों में “हम” की भावना तथा लोकतान्त्रिक शासन के प्रति विश्वास विकसित करती है।
  • राष्ट्र की आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक उन्नति तथा नागरिकों के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के लिए राष्ट्रीय एकता आवश्यक है।
Topic 6 राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में शिक्षा एवं शिक्षक की भूमिका

राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में शिक्षा एवं शिक्षक की भूमिका

राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में शिक्षा की भूमिका

राष्ट्रीय एकता केवल उपदेश से विकसित नहीं होती, बल्कि इसके लिए बच्चों में प्रारम्भ से ही देशप्रेम, सहयोग, भाईचारा, सांस्कृतिक सम्मान तथा राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना विकसित करनी आवश्यक है।

विद्यालय इस कार्य का सबसे प्रभावी माध्यम है। विभिन्न शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों द्वारा विद्यार्थियों को भारत की विविधता से परिचित कराया जा सकता है तथा उनमें “मैं” के स्थान पर “हम” की भावना विकसित की जा सकती है।

स्रोत के अनुसार राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में शिक्षा का योगदान निम्न प्रकार से है—

1. दैनिक प्रातः सभा का आयोजन

सभी विद्यालयों में दिन का प्रारम्भ लगभग 15 मिनट की सामूहिक प्रातः सभा से किया जाना चाहिए। इस सभा में राष्ट्रगान, प्रार्थना, नैतिक शिक्षा तथा राष्ट्रीय एकता से सम्बन्धित विचारों को स्थान दिया जा सकता है।

समय-समय पर विद्यार्थियों को राष्ट्रीय एकता से सम्बन्धित प्रेरक भाषण सुनाए जाने चाहिए तथा उनमें राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना विकसित की जानी चाहिए।

प्रार्थना एवं प्रेरक विचार ऐसे हों जिनमें देशप्रेम, मानवता, सद्भाव और उच्च नैतिक भावनाओं की स्पष्ट झलक दिखाई दे।

2. राष्ट्रीय पर्वों का आयोजन

विद्यालयों में स्वतंत्रता दिवस, गणतन्त्र दिवस, शहीद दिवस तथा गाँधी जयन्ती जैसे राष्ट्रीय पर्वों को अर्थपूर्ण ढंग से मनाया जाना चाहिए।

इन अवसरों पर विद्यार्थियों को स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास, स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग तथा अनेक बलिदानों के बाद प्राप्त हुई स्वतंत्रता के महत्त्व से परिचित कराया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय पर्वों को केवल अवकाश के रूप में न देखकर विद्यालय में प्रेरक एवं शैक्षिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। इन अवसरों पर किसी महान व्यक्तित्व को आमन्त्रित करके विद्यार्थियों को प्रेरणा भी दी जा सकती है।

3. विद्वानों के व्याख्यानों का आयोजन

समय-समय पर राष्ट्र की स्वतंत्रता, अखण्डता, विकास तथा अन्य राष्ट्रीय समस्याओं से सम्बन्धित विषयों पर विद्वानों के व्याख्यान आयोजित किए जाने चाहिए।

विषय-विशेषज्ञ, विचारक, दार्शनिक तथा इतिहासकार अपने ज्ञान और अनुभव द्वारा विद्यार्थियों में राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व एवं राष्ट्रीयता की भावना विकसित कर सकते हैं।

4. प्रतियोगिताओं का आयोजन

राष्ट्रीय एकता से सम्बन्धित विषयों पर भाषण, वाद-विवाद, निबन्ध, नाटक तथा अन्य साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाना चाहिए।

इन गतिविधियों से विद्यार्थियों को राष्ट्रीय विषयों पर सोचने, अपने विचार व्यक्त करने और भारत की विविधता में एकता को समझने का अवसर मिलता है।

प्रतियोगिताओं के आयोजन में किसी प्रकार के पक्षपात अथवा पूर्वाग्रह को स्थान नहीं दिया जाना चाहिए।

5. प्रदर्शनियों का आयोजन

विद्यालयों में समय-समय पर ऐसी प्रदर्शनियाँ आयोजित की जानी चाहिए जिनमें भारत की सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीय जीवन की झाँकी प्रस्तुत की जाए।

जनसंख्या दिवस, पर्यावरण दिवस, शिक्षक दिवस आदि महत्त्वपूर्ण अवसरों पर भी प्रदर्शनियाँ आयोजित की जा सकती हैं। इनके माध्यम से विद्यार्थियों को देश की सांस्कृतिक विरासत एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों से परिचित कराया जा सकता है।

6. राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षकों का आदान-प्रदान

प्राथमिक, माध्यमिक तथा विश्वविद्यालय स्तर के शिक्षकों का राष्ट्रीय स्तर पर आदान-प्रदान किया जाना चाहिए।

जब विभिन्न भाषाओं, जातियों, धर्मों, सम्प्रदायों और प्रदेशों से सम्बन्धित शिक्षक एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर कार्य करते हैं, तो उन्हें वहाँ की संस्कृति और जीवन-पद्धति को समझने का अवसर मिलता है।

इससे विभिन्न संस्कृतियों में सामंजस्य बढ़ता है तथा राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है।

7. अन्तर्राज्यीय खेल-कूद एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम

विभिन्न राज्यों के विद्यार्थियों के बीच खेल-कूद एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए।

इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों का सम्पर्क क्षेत्र बढ़ता है, वे एक-दूसरे की भाषा, संस्कृति और जीवन-शैली को समझते हैं तथा उनमें परस्पर लगाव उत्पन्न होता है।

इस प्रकार उनमें “मैं” की भावना के स्थान पर “हम” की भावना विकसित होती है और राष्ट्र के प्रति प्रेम बढ़ता है।

8. राष्ट्रीय एवं सामाजिक सेवा संस्थाओं का गठन

विद्यालयों में NCC, NSS, स्काउटिंग और गर्ल गाइडिंग जैसी संस्थाओं एवं गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

इनके माध्यम से विद्यार्थियों को समाज सेवा, अनुशासन, सहयोग, उत्तरदायित्व और देशसेवा के कार्यों में भाग लेने का अवसर मिलता है।

समाज सेवा में निःस्वार्थ रूप से कार्य करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय एकता के विकास में शिक्षक की भूमिका

विद्यालय में राष्ट्रीय एकता का वास्तविक संदेश विद्यार्थियों तक पहुँचाने में शिक्षक की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। विद्यार्थी शिक्षक के विचारों, व्यवहार और आचरण से प्रभावित होते हैं।

इसलिए शिक्षक को स्वयं जाति, धर्म, भाषा, लिंग और क्षेत्रीय संकीर्णताओं से ऊपर उठकर निष्पक्ष तथा आदर्श व्यवहार प्रस्तुत करना चाहिए।

1. विद्यार्थियों में सहयोग की भावना विकसित करना

राष्ट्रीय एकता के लिए नागरिकों में राष्ट्रीय एवं भावनात्मक एकता आवश्यक है। शिक्षक विद्यार्थियों को भाषा, जाति, धर्म और संस्कृति के आधार पर परस्पर भेद न करने की शिक्षा देता है।

विद्यालय में सहयोग की भावना विकसित होने पर विद्यार्थी आगे चलकर समाज एवं राष्ट्र के एकीकरण में भी सकारात्मक योगदान देते हैं।

2. विद्यार्थियों को उत्तम नागरिक बनाना

शिक्षक विद्यार्थियों में उत्तम नागरिकता के गुण विकसित करता है। वह उन्हें राष्ट्रीय पर्वों, उनके महत्त्व तथा राष्ट्रीय जीवन से सम्बन्धित आवश्यक जानकारी प्रदान करता है।

राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना विकसित करके शिक्षक विद्यार्थियों को जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए तैयार करता है।

ऐसे विद्यार्थी भविष्य में अपने ज्ञान एवं अच्छे गुणों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाकर राष्ट्रीय एकता को स्थायी बनाने में सहायता करते हैं।

3. भाषाओं, संस्कृतियों एवं धर्मों के प्रति उदारता विकसित करना

भारत की पहचान उसकी विविध भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों से है। शिक्षक को इन विविधताओं के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और विद्यार्थियों में भी यही भावना विकसित करनी चाहिए।

विद्यार्थियों को राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीकों तथा देश की सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान करना सिखाया जाना चाहिए।

जब विद्यार्थी अन्य भाषाओं, संस्कृतियों और धर्मों को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, तब उनमें राष्ट्र के प्रति एकता और सद्भाव की भावना मजबूत होती है।

4. जाति, धर्म, लिंग एवं क्षेत्रीयता के भेदभाव को समाप्त करना

जाति, धर्म, लिंग तथा क्षेत्रीयता की संकीर्ण भावनाएँ राष्ट्रीय एकता की प्रमुख बाधाएँ हैं। शिक्षक को विद्यार्थियों में ऊँच-नीच तथा भेदभाव की भावना समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

बालक और बालिका के बीच लिंग आधारित भेदभाव को दूर करके समान व्यवहार किया जाना चाहिए। इसी प्रकार जाति और धर्म के आधार पर किसी प्रकार की श्रेष्ठता या हीनता की भावना को भी प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।

क्षेत्रीय संकीर्णता को दूर करके विद्यार्थियों में सामाजिक एकता, भाईचारा और राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित करना शिक्षक का महत्त्वपूर्ण दायित्व है।

शिक्षा एवं शिक्षक का संयुक्त योगदान

राष्ट्रीय एकता स्थापित करने के लिए विद्यालयी कार्यक्रम और शिक्षक का आदर्श व्यवहार दोनों आवश्यक हैं। विद्यालय विद्यार्थियों को विविध गतिविधियों में भाग लेने का अवसर देता है, जबकि शिक्षक इन अनुभवों को उचित दिशा प्रदान करता है।

इस प्रकार शिक्षा के माध्यम से देशप्रेम, सहयोग, सहिष्णुता, सांस्कृतिक सम्मान, सामाजिक सेवा और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व जैसे गुण विकसित करके राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया जा सकता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में विद्यालयी शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान है।
  • दैनिक प्रातः सभा, राष्ट्रीय पर्व, विद्वानों के व्याख्यान, प्रतियोगिताएँ और प्रदर्शनियाँ राष्ट्रीय भावना विकसित करने के प्रमुख साधन हैं।
  • शिक्षकों का राष्ट्रीय स्तर पर आदान-प्रदान तथा अन्तर्राज्यीय खेल एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभिन्न संस्कृतियों के बीच समझ बढ़ाते हैं।
  • NCC, NSS, स्काउटिंग और गर्ल गाइडिंग विद्यार्थियों में सेवा, अनुशासन एवं राष्ट्रप्रेम विकसित करती हैं।
  • शिक्षक विद्यार्थियों में सहयोग, उत्तम नागरिकता और विभिन्न भाषाओं, धर्मों एवं संस्कृतियों के प्रति सम्मान विकसित करता है।
  • जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्रीयता के आधार पर भेदभाव समाप्त करना शिक्षक की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
  • शिक्षा एवं शिक्षक के संयुक्त प्रयास से विद्यार्थियों में “मैं” से “हम” की भावना तथा राष्ट्रीय एकता विकसित होती है।
Topic 7 अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना—अर्थ, परिभाषाएँ एवं शिक्षा के उद्देश्य

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना—अर्थ, परिभाषाएँ एवं शिक्षा के उद्देश्य

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का अर्थ

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना (International Harmony) का अर्थ विभिन्न राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध, पारस्परिक सम्मान और अच्छी भावना बनाए रखना है।

सरल शब्दों में, जब विभिन्न देशों के लोग राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और अन्य भिन्नताओं के बावजूद एक-दूसरे के प्रति सहयोग, सम्मान और भाईचारे की भावना रखते हैं, तो इसे अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना कहा जाता है।

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना विश्वबन्धुत्व और विश्व-मैत्री की भावना पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल अपने राष्ट्र का हित देखना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण को महत्त्व देना है।

इस भावना के अनुसार सभी मनुष्यों और प्राणियों के प्रति समान दृष्टि रखनी चाहिए, विभिन्न राष्ट्रों के बीच पारस्परिक निकटता एवं भाईचारा होना चाहिए तथा सम्पूर्ण पृथ्वी को एक परिवार के समान समझना चाहिए।

महात्मा गाँधी के अहिंसा एवं विश्व-मैत्री के विचार तथा भारतीय परम्परा का संदेश “वसुधैव कुटुम्बकम्” अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना की इसी भावना को व्यक्त करते हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना की प्रमुख परिभाषाएँ

1. गोल्ड स्मिथ के अनुसार

गोल्ड स्मिथ के अनुसार, अन्तर्राष्ट्रीयता वह भावना है जो व्यक्ति को यह बोध कराती है कि वह केवल अपने राज्य का नागरिक ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व का नागरिक भी है।

2. डॉ. वाल्टर एच. सी. लेज के अनुसार

डॉ. वाल्टर एच. सी. लेज के अनुसार, अन्तर्राष्ट्रीय भावना का अर्थ यह है कि व्यक्ति किसी की राष्ट्रीयता अथवा संस्कृति से प्रभावित हुए बिना उसके व्यवहार का आलोचनात्मक एवं निष्पक्ष मूल्यांकन करने की योग्यता रखे।

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के लिए शिक्षा का महत्त्व

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का विकास स्वतः नहीं होता। इसके लिए बच्चों को प्रारम्भ से ही विश्व-नागरिकता, सहिष्णुता, निष्पक्षता, स्वतंत्र चिन्तन तथा विभिन्न संस्कृतियों और राष्ट्रों के प्रति सम्मान की शिक्षा देना आवश्यक है।

इसी उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के लिए शिक्षा के उद्देश्यों को स्रोत में दो भागों में बाँटा गया है—

  1. सामान्य उद्देश्य
  2. यूनेस्को द्वारा प्रतिपादित उद्देश्य

1. अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के सामान्य शैक्षिक उद्देश्य

1. विश्व-नागरिकता के लिए तैयार करना

बालकों को ऐसा नागरिक बनाया जाए जो स्वयं को केवल किसी एक देश का सदस्य न माने, बल्कि व्यापक रूप से विश्व-नागरिक के रूप में अपने दायित्वों को भी समझे।

2. स्वतंत्र विचार एवं अभिव्यक्ति का विकास

बालकों में स्वतंत्र रूप से विचार करने, निर्णय लेने तथा अपने विचारों को भाषण और लेखन के माध्यम से स्पष्ट रूप में व्यक्त करने की योग्यता विकसित की जाए।

इससे वे अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के विषय में पूर्वाग्रह से मुक्त होकर विचार कर सकेंगे।

3. विश्व-समाज के निर्माण में सहायक मूल्यों का विकास

विद्यार्थियों में उन मूल्यों, आदर्शों और उद्देश्यों के प्रति विश्वास उत्पन्न किया जाए जो शान्तिपूर्ण एवं सहयोगपूर्ण विश्व-समाज के निर्माण में सहायक हों।

4. संकीर्ण राष्ट्रीयता का विरोध

बालकों को ऐसी संकीर्ण और सीमित राष्ट्रीयता से ऊपर उठने के लिए प्रेरित किया जाए जो दूसरे राष्ट्रों के प्रति द्वेष या विरोध उत्पन्न करती हो।

स्वस्थ राष्ट्रप्रेम के साथ-साथ विश्व मानवता के प्रति सम्मान का विकास करना आवश्यक है।

5. विश्व की समस्याओं का ज्ञान

विद्यार्थियों को विश्व की प्रमुख समस्याओं से परिचित कराया जाए और उन्हें यह समझाया जाए कि इन समस्याओं का समाधान लोकतान्त्रिक एवं सहयोगपूर्ण तरीकों से कैसे किया जा सकता है।

6. राष्ट्रों की पारस्परिक निर्भरता की समझ

विद्यार्थियों को उन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक कारणों की जानकारी दी जाए जिनके कारण आधुनिक विश्व में विभिन्न राष्ट्र एक-दूसरे पर निर्भर हैं।

इससे वे समझ सकेंगे कि वर्तमान समय में कोई भी राष्ट्र पूर्ण रूप से अलग रहकर विकास नहीं कर सकता।

7. सांस्कृतिक विविधताओं में समान मानवीय तत्त्वों की खोज

विद्यार्थियों को विभिन्न संस्कृतियों का अध्ययन करते समय उनमें उपस्थित ऐसे समान और कल्याणकारी तत्त्व खोजने का प्रशिक्षण दिया जाए जो सम्पूर्ण मानव जाति के हित में हों।

8. सभी राष्ट्रों की उपलब्धियों के प्रति सम्मान

मानव संस्कृति और विश्व-नागरिकता के विकास के लिए विद्यार्थियों को विभिन्न राष्ट्रों की उपलब्धियों का उचित मूल्यांकन करना तथा उनके प्रति सम्मान रखना सिखाया जाए।

2. यूनेस्को द्वारा प्रतिपादित उद्देश्य

यूनेस्को (UNESCO) ने अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना एवं विश्व-नागरिकता के विकास के लिए शिक्षा से सम्बन्धित निम्न उद्देश्य बताए हैं—

1. विश्व-संस्कृति एवं विश्व-नागरिकता का विकास

विद्यार्थियों को सभी देशों की उपलब्धियों का मूल्यांकन करना और उनके प्रति आदर करना सिखाया जाए, जिससे उनमें विश्व-संस्कृति और विश्व-नागरिकता की भावना विकसित हो।

2. साथ मिलकर रहने की शिक्षा

विद्यार्थियों को वे आवश्यक ज्ञान, व्यवहार और गुण सिखाए जाएँ जिनकी सहायता से विभिन्न देशों, संस्कृतियों और समुदायों के लोग शान्तिपूर्वक एक साथ रह सकें।

3. विभिन्न लोगों के जीवन एवं आकांक्षाओं से परिचय

विद्यार्थियों को विभिन्न लोगों की जीवन-शैली, मूल्यों तथा आकांक्षाओं से परिचित कराया जाए, जिससे वे दूसरों के जीवन और दृष्टिकोण को बेहतर ढंग से समझ सकें।

4. सांस्कृतिक विभिन्नताओं में समान तत्त्वों की खोज

बालकों को विभिन्न संस्कृतियों में ऐसे समान एवं कल्याणकारी तत्त्व खोजने का प्रशिक्षण दिया जाए जो मानवता के हित में हों।

5. निष्पक्ष एवं आलोचनात्मक दृष्टि का विकास

विद्यार्थियों को विभिन्न स्थानों और संस्कृतियों के लोगों के व्यवहार का पूर्वाग्रह रहित, आलोचनात्मक और निष्पक्ष निरीक्षण करना सिखाया जाए।

6. सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय पक्षपात से ऊपर उठना

बालकों को केवल अपनी संस्कृति और राष्ट्रीय पक्षपात को अत्यधिक महत्त्व न देने की शिक्षा दी जाए।

उन्हें दूसरे राष्ट्रों और संस्कृतियों के प्रति भी खुले तथा सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण के साथ व्यवहार करना सिखाया जाए।

7. समाज निर्माण में सक्रिय भागीदारी

बालक और बालिकाओं को समाज के निर्माण और विकास में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए तैयार किया जाए।

इससे उनमें सामाजिक उत्तरदायित्व तथा सहयोग की भावना विकसित होती है।

8. सभी राष्ट्रीयताओं, संस्कृतियों एवं प्रजातियों के प्रति समानता

विद्यार्थियों में यह भावना विकसित की जाए कि सभी राष्ट्रीयताओं, संस्कृतियों और प्रजातियों से सम्बन्धित मनुष्य समान सम्मान के अधिकारी हैं।

यह दृष्टिकोण भेदभाव, पूर्वाग्रह और संकीर्णता को कम करके अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना को मजबूत करता है।

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना की शिक्षा का सार

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना की शिक्षा का लक्ष्य ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना है जो अपने राष्ट्र से प्रेम करने के साथ-साथ सम्पूर्ण मानवता के प्रति भी उत्तरदायी हों।

ऐसी शिक्षा व्यक्ति में विश्व-नागरिकता, स्वतंत्र चिन्तन, सांस्कृतिक सहिष्णुता, निष्पक्षता, सहयोग और विश्वबन्धुत्व की भावना विकसित करती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना विभिन्न राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध, सहयोग एवं अच्छी भावना बनाए रखने का विचार है।
  • यह विश्वबन्धुत्व, विश्व-मैत्री तथा “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना पर आधारित है।
  • गोल्ड स्मिथ के अनुसार व्यक्ति केवल अपने राज्य का नागरिक नहीं, बल्कि विश्व का नागरिक भी है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना की शिक्षा विद्यार्थियों में विश्व-नागरिकता, स्वतंत्र विचार, निष्पक्ष दृष्टिकोण और सांस्कृतिक सम्मान विकसित करती है।
  • इसके सामान्य उद्देश्यों में संकीर्ण राष्ट्रीयता से ऊपर उठना, विश्व की समस्याओं को समझना तथा राष्ट्रों की पारस्परिक निर्भरता का ज्ञान प्राप्त करना शामिल है।
  • यूनेस्को ने विभिन्न देशों की उपलब्धियों का सम्मान, साथ मिलकर रहने की शिक्षा, सांस्कृतिक पक्षपात से ऊपर उठने तथा समाज-निर्माण में सक्रिय भागीदारी पर बल दिया है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का अन्तिम लक्ष्य विश्व शान्ति, मानव कल्याण और विश्वबन्धुत्व की भावना को मजबूत करना है।
Topic 8 अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के कार्य एवं सद्भावना की आवश्यकता व महत्त्व

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के कार्य एवं सद्भावना की आवश्यकता व महत्त्व

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के कार्य

वर्तमान विश्व में विभिन्न राष्ट्र आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षा का कार्य केवल राष्ट्रीय नागरिकता विकसित करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में विश्व-शान्ति, विश्व-नागरिकता, स्वतंत्र चिन्तन और विभिन्न संस्कृतियों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना भी है।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—

1. विश्व-शान्ति के प्रति प्रेम उत्पन्न करना

शिक्षा का एक प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय उद्देश्य विद्यार्थियों में विश्व-शान्ति, आपसी समझ और सद्भावना की भावना विकसित करना है।

विश्व को युद्ध, अशान्ति और अराजकता की परिस्थितियों से बचाकर शान्तिपूर्ण बनाना केवल राजनीतिक प्रयासों से सम्भव नहीं है। इसके लिए नागरिकों के विचारों और व्यवहार में भी शान्ति तथा सहयोग के मूल्य विकसित होने चाहिए।

शिक्षा विद्यार्थियों को यह समझाती है कि विश्व-शान्ति मानव कल्याण के लिए आवश्यक है और राष्ट्रों के बीच संघर्ष की अपेक्षा संवाद एवं सहयोग अधिक उपयोगी हैं।

2. संकीर्ण राष्ट्रीयता से ऊपर उठाना

अपने राष्ट्र से प्रेम करना आवश्यक है, किन्तु ऐसा राष्ट्रप्रेम जो दूसरे राष्ट्रों के प्रति द्वेष उत्पन्न करे, अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना में बाधक बन जाता है।

शिक्षा का कार्य विद्यार्थियों को संकीर्ण राष्ट्रीयता से ऊपर उठाकर विश्वबन्धुत्व की भावना विकसित करना है।

जिस प्रकार राष्ट्रहित के लिए कभी-कभी व्यक्ति को अपने निजी स्वार्थों का त्याग करना पड़ता है, उसी प्रकार विश्व की समस्याओं के समाधान के लिए राष्ट्रों को भी केवल अपने संकीर्ण हितों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

3. विश्व-नागरिकता की भावना उत्पन्न करना

शिक्षा विद्यार्थियों में यह भावना विकसित करती है कि वे केवल अपने देश के नागरिक ही नहीं, बल्कि व्यापक अर्थ में विश्व के नागरिक भी हैं।

भारतीय संस्कृति में सभी धर्मों, देशों और सम्पूर्ण मानवता के प्रति समभाव तथा निकटता की भावना को महत्त्व दिया गया है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का विचार भी सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने का संदेश देता है।

विश्व-नागरिकता की भावना विकसित होने से विद्यार्थियों में दूसरे देशों और संस्कृतियों के प्रति सम्मान, सहयोग और उत्तरदायित्व की भावना बढ़ती है।

4. स्वतंत्र चिन्तन का विकास

अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को समझने और उनके उचित समाधान खोजने के लिए विद्यार्थियों में स्वतंत्र एवं तार्किक चिन्तन का विकास आवश्यक है।

शिक्षा बालक को अपने विचार स्वतंत्र रूप से बनाने, सही और गलत का विवेकपूर्ण निर्णय करने तथा विभिन्न समस्याओं पर निष्पक्ष दृष्टि से विचार करने की क्षमता प्रदान करती है।

स्वतंत्र चिन्तन वाला व्यक्ति अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को पूर्वाग्रह से मुक्त होकर समझ सकता है और उनके समाधान में रचनात्मक योगदान दे सकता है।

5. विश्व की विभिन्न संस्कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन

विश्व में अनेक संस्कृतियाँ विद्यमान हैं और प्रत्येक संस्कृति की अपनी विशेषताएँ हैं। शिक्षा का कार्य विद्यार्थियों को विभिन्न संस्कृतियों से परिचित कराना तथा उनका तुलनात्मक अध्ययन कराना है।

इससे विद्यार्थी केवल अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ मानने की संकीर्णता से बचते हैं और अन्य संस्कृतियों के प्रति भी प्रेम, सम्मान और आदर की भावना विकसित करते हैं।

विभिन्न संस्कृतियों का ज्ञान पारस्परिक समझ बढ़ाता है और विश्व-समुदाय में सद्भाव स्थापित करने में सहायक होता है।

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना की आवश्यकता एवं महत्त्व

वर्तमान समय में अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का विकास अत्यन्त आवश्यक है। विज्ञान, संचार, परिवहन और आर्थिक सम्बन्धों ने विश्व के देशों को एक-दूसरे के बहुत निकट ला दिया है। अब किसी राष्ट्र का विकास अन्य राष्ट्रों से पूर्णतः अलग रहकर सम्भव नहीं है।

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना की आवश्यकता एवं महत्त्व को निम्न आधारों से समझा जा सकता है—

1. मानव जाति मूलतः एक है

सम्पूर्ण मानव जाति मूलतः एक है। विश्व के लोग रूप, रंग, जाति, धर्म और जीवन-शैली में भिन्न हो सकते हैं, किन्तु उनकी मूल मानवीय आवश्यकताएँ, भावनाएँ और आकांक्षाएँ समान हैं।

उदारता, सहानुभूति, प्रेम और सहयोग जैसे गुण किसी एक देश या समाज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के मूल्य हैं।

शिक्षा द्वारा विद्यार्थियों में इन मानवीय गुणों का विकास करने से वे सम्पूर्ण मानव जाति के प्रति प्रेम एवं सहानुभूति रखना सीखते हैं और अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना मजबूत होती है।

2. केवल राष्ट्रीयता से मानव-कल्याण सम्भव नहीं

इतिहास में संकीर्ण और आक्रामक राष्ट्रीयता ने अनेक संघर्षों और युद्धों को जन्म दिया है। बीसवीं शताब्दी के दो महायुद्धों ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल अपने राष्ट्र के हित को सर्वोपरि मानकर सम्पूर्ण मानवता का कल्याण नहीं किया जा सकता।

युद्धों से सामाजिक क्रूरता, अत्याचार तथा मौलिक मानवीय और राजनीतिक अधिकारों का हनन होता है।

अतः विद्यार्थियों और सम्पूर्ण मानव समाज में राष्ट्रीय भावना के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का भी विकास किया जाना आवश्यक है।

3. वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास

विज्ञान और तकनीक के विकास ने विश्व की भौगोलिक दूरियों को बहुत कम कर दिया है। परिवहन तथा संचार के आधुनिक साधनों ने विभिन्न देशों के लोगों को एक-दूसरे के अधिक निकट ला दिया है।

तार, रेडियो, टेलीविजन, फोन तथा यातायात के आधुनिक साधनों के कारण सूचना और सम्पर्क अत्यन्त तीव्र हो गए हैं।

जब विश्व इतनी निकटता से जुड़ चुका है, तब देशों के बीच परस्पर समझ, सहयोग और सद्भाव बनाए रखना और भी अधिक आवश्यक हो जाता है।

4. राष्ट्रों की पारस्परिक निर्भरता

वर्तमान युग में कोई भी राष्ट्र पूर्णतः आत्मनिर्भर नहीं है। प्रत्येक देश किसी न किसी रूप में दूसरे देशों के संसाधनों, तकनीक, व्यापार, ज्ञान या सहयोग पर निर्भर रहता है।

जो राष्ट्र स्वयं को अन्य देशों से पूरी तरह अलग रखता है, उसके विकास की गति प्रभावित हो सकती है। इसलिए आधुनिक विश्व में एक राष्ट्र की उन्नति अनेक बार दूसरे राष्ट्रों के सहयोग से जुड़ी होती है।

राष्ट्रों की इस पारस्परिक निर्भरता के कारण अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण और सद्भावना का विकास अत्यन्त आवश्यक हो गया है।

शिक्षा और अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का सम्बन्ध

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का स्थायी विकास शिक्षा द्वारा ही सम्भव है। शिक्षा विद्यार्थियों के विचारों को व्यापक बनाती है, उनमें अन्य देशों और संस्कृतियों के प्रति सम्मान विकसित करती है तथा संकीर्ण राष्ट्रीयता के स्थान पर विश्वबन्धुत्व की भावना उत्पन्न करती है।

अतः शिक्षा का उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो अपने राष्ट्र से प्रेम करें, किन्तु साथ ही सम्पूर्ण मानवता के कल्याण, विश्व-शान्ति और अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को भी महत्त्व दें।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा का प्रमुख कार्य विद्यार्थियों में विश्व-शान्ति और सद्भावना की भावना विकसित करना है।
  • शिक्षा व्यक्ति को संकीर्ण राष्ट्रीयता से ऊपर उठाकर विश्वबन्धुत्व एवं विश्व-नागरिकता की भावना प्रदान करती है।
  • स्वतंत्र चिन्तन विद्यार्थियों को अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का निष्पक्ष एवं तार्किक समाधान खोजने में सक्षम बनाता है।
  • विभिन्न संस्कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन से अन्य संस्कृतियों के प्रति सम्मान और सहिष्णुता विकसित होती है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना आवश्यक है क्योंकि सम्पूर्ण मानव जाति मूलतः एक है और केवल संकीर्ण राष्ट्रीयता से मानव-कल्याण सम्भव नहीं है।
  • वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास ने विश्व के राष्ट्रों को एक-दूसरे के बहुत निकट ला दिया है।
  • आधुनिक विश्व में राष्ट्र एक-दूसरे पर निर्भर हैं, इसलिए पारस्परिक सहयोग और अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना अत्यन्त आवश्यक है।
Topic 9 अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास के नियम एवं शिक्षा की भूमिका

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास के नियम एवं शिक्षा की भूमिका

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास की आवश्यकता

विश्व के राष्ट्रों के बीच शान्ति, सहयोग, पारस्परिक सम्मान और विश्वबन्धुत्व की भावना विकसित करने के लिए केवल राजनीतिक समझौते पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए व्यक्तियों के विचारों, दृष्टिकोण और व्यवहार में भी परिवर्तन आवश्यक है।

इस परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा है। शिक्षा के द्वारा विद्यार्थियों को विभिन्न राष्ट्रों, संस्कृतियों और मानव समुदायों को समझने, पूर्वाग्रहों से ऊपर उठने तथा विश्व-नागरिकता की भावना विकसित करने के अवसर दिए जा सकते हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास के नियम

सन् 1974 में यूनेस्को ने अन्तर्राष्ट्रीयता के लिए शिक्षा से सम्बन्धित एक प्रपत्र प्रकाशित किया। इसमें विशेष रूप से सामाजिक विज्ञान की शिक्षा के माध्यम से अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित करने पर बल दिया गया तथा निम्न नियम प्रस्तुत किए गए—

1. विश्व के प्रमुख अंगों का अध्ययन

सामाजिक विज्ञान के शिक्षण में विश्व के विभिन्न देशों, क्षेत्रों और मानव समुदायों का अध्ययन कराया जाना चाहिए।

विद्यार्थियों को केवल अपने देश तक सीमित रखने के बजाय विश्व की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों की जानकारी प्रदान करनी चाहिए।

2. उपयुक्त तथ्यों, मनोवृत्तियों एवं कौशलों का विकास

सामाजिक विज्ञान के शिक्षण में उपयोगी और आवश्यक तथ्यों को प्रस्तुत किया जाना चाहिए। केवल सूचना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों में उचित मनोवृत्तियों और सामाजिक कौशलों का भी विकास होना चाहिए।

3. मानव समुदायों के सौहार्दपूर्ण सम्बन्धों पर बल

सामाजिक विज्ञान के सिद्धान्तों को पढ़ाते समय विभिन्न मानव समुदायों के बीच पारस्परिक सौहार्द, सहयोग और सह-अस्तित्व के सम्बन्धों को विशेष महत्त्व दिया जाना चाहिए।

4. भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास

प्रजाति, धर्म और संस्कृति के आधार पर आर्थिक अथवा शैक्षिक स्तर पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में शिक्षा का प्रयोग किया जाना चाहिए।

विद्यार्थियों को यह समझाया जाना चाहिए कि सामाजिक अथवा सांस्कृतिक विभिन्नता किसी व्यक्ति के साथ असमान व्यवहार का आधार नहीं हो सकती।

5. नागरिकता शिक्षा को व्यावहारिक बनाना

नागरिकता की शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके लिए कक्षा, विद्यालय और समाज को प्रयोगशाला के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए।

इससे विद्यार्थी सहयोग, उत्तरदायित्व, समानता और लोकतान्त्रिक व्यवहार को वास्तविक जीवन में सीखते हैं।

6. मानव-सम्बन्धों एवं व्यक्तित्व का विकास

सामाजिक विज्ञान के अध्ययन में केवल घटनाओं और तथ्यों पर बल न देकर अच्छे मानव-सम्बन्धों तथा व्यक्ति के संतुलित व्यक्तित्व के विकास को भी स्थान दिया जाना चाहिए।

7. आलोचनात्मक तर्कशक्ति का विकास

विद्यार्थियों में ऐसी आलोचनात्मक तर्कशक्ति विकसित की जानी चाहिए जिससे वे किसी विचार, घटना अथवा अन्तर्राष्ट्रीय समस्या को बिना पूर्वाग्रह के समझ और परख सकें।

तार्किक सोच उन्हें संकीर्णता और अन्ध-अनुकरण से बचाती है।

8. विश्व भूगोल का अध्ययन

विश्व के भूगोल का अध्ययन विशेष रूप से कराया जाना चाहिए। इससे विद्यार्थी विभिन्न देशों की भौगोलिक परिस्थितियों तथा प्राकृतिक सम्पदा से परिचित होते हैं।

इस ज्ञान से उन्हें यह समझने में सहायता मिलती है कि विभिन्न देशों की आवश्यकताएँ और संसाधन अलग-अलग हैं तथा वे अनेक रूपों में एक-दूसरे पर निर्भर हैं।

9. सामाजिक घटनाओं, संघर्षों एवं सहयोग का अध्ययन

सामाजिक विज्ञान में ऐसी घटनाओं और समस्याओं पर चर्चा की जानी चाहिए जो सामाजिक संघर्ष, सहयोग तथा मानवीय सम्बन्धों से जुड़ी हों।

इससे विद्यार्थी संघर्षों के कारणों को समझते हैं और सहयोगपूर्ण समाधान की दिशा में विचार करना सीखते हैं।

10. समकालीन विश्व-समस्याओं में रुचि

विद्यार्थियों को वर्तमान विश्व की विभिन्न समस्याओं के किसी न किसी पक्ष में रुचि लेने और उनके बारे में विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

इससे उनमें विश्व की घटनाओं के प्रति जागरूकता और अन्तर्राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है।

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास में शिक्षा की भूमिका

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास के लिए विश्वबन्धुत्व की भावना का प्रसार अत्यन्त आवश्यक है। विद्यालय इस कार्य का सबसे प्रभावी माध्यम है, क्योंकि बालक के विचारों, दृष्टिकोण और व्यवहार को शिक्षा द्वारा व्यवस्थित दिशा दी जा सकती है।

इस सम्बन्ध में स्रोत में निम्न प्रमुख सुझाव दिए गए हैं—

1. मानवता में पारस्परिक विश्वास विकसित करना

विद्यार्थियों में एक-दूसरे के प्रति विश्वास की भावना विकसित की जानी चाहिए। उन्हें यह समझाया जाए कि सम्पूर्ण विश्व के लोग एक व्यापक मानव परिवार का भाग हैं और सभी के प्रति सद्भावना रखना आवश्यक है।

2. राष्ट्रों के तनाव एवं संघर्ष को कम करना

शिक्षा का उद्देश्य राष्ट्रों के बीच तनाव, संघर्ष और भय की भावना को कम करना होना चाहिए।

विद्यार्थियों को संघर्ष के स्थान पर शान्ति, संवाद और सहयोग को महत्त्व देना सिखाया जाना चाहिए।

3. पाठ्यक्रम में अन्तर्राष्ट्रीय भावना को स्थान देना

विभिन्न विषयों को पढ़ाते समय उन प्रसंगों और विषय-वस्तु पर विशेष बल दिया जाना चाहिए जो अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना, विश्वबन्धुत्व और सहयोग की भावना को बढ़ाते हों।

4. वर्ग-भेद को समाप्त करना

वर्ग-भेद अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना के विकास में बाधक होता है। शिक्षा के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक वर्गों के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण को कम करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

विद्यार्थियों में समानता और मानव-मर्यादा के प्रति सम्मान विकसित किया जाना चाहिए।

5. मानव की पारस्परिक निर्भरता समझाना

शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि आधुनिक विश्व में मनुष्य और राष्ट्र एक-दूसरे पर निर्भर हैं।

जब बालक इस पारस्परिक निर्भरता को समझते हैं तो उनमें दूसरे देशों के लोगों के प्रति आदर, अनुराग और सहयोग की भावना विकसित होती है।

6. धैर्य एवं आत्मविश्वास का विकास

शिक्षा द्वारा विद्यार्थियों में धैर्य और आत्मविश्वास जैसे गुण विकसित किए जाने चाहिए।

ये गुण उन्हें संकीर्ण दृष्टिकोण, भय और पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर व्यापक मानवीय दृष्टि अपनाने में सहायता करते हैं।

7. व्यापक विश्व-नागरिकता का विकास

शिक्षा द्वारा केवल संकीर्ण राष्ट्रीय नागरिकता की भावना विकसित करने के स्थान पर व्यापक विश्व-नागरिकता की भावना को प्रोत्साहित करना चाहिए।

इसका अर्थ राष्ट्रप्रेम को समाप्त करना नहीं, बल्कि राष्ट्रप्रेम के साथ सम्पूर्ण मानवता के प्रति उत्तरदायित्व विकसित करना है।

8. विज्ञान को शिक्षा में उचित स्थान देना

बालकों के पाठ्यक्रम में विज्ञान को उचित स्थान दिया जाना चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टिकोण विचारों की संकीर्णता, अन्धविश्वास तथा जातीय भेदभाव जैसी प्रवृत्तियों को कम करने में सहायक होता है।

विज्ञान विद्यार्थियों को प्रमाण, तर्क और निष्पक्ष चिन्तन के आधार पर विचार करना सिखाता है।

9. स्वतंत्र सोच-विचार का अवसर देना

विद्यार्थियों की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें उन्हें सोचने और विचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो।

विद्यालय के वातावरण में ऐसे श्रेष्ठ सांस्कृतिक एवं मानवीय तत्त्व होने चाहिए जिन्हें विद्यार्थी स्वतंत्र रूप से समझ सकें, अपनाएँ और अपने व्यवहार में व्यक्त कर सकें।

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के लिए शिक्षा का समग्र उद्देश्य

शिक्षा का उद्देश्य ऐसा व्यक्ति तैयार करना है जो अपने देश के प्रति निष्ठावान होने के साथ-साथ सम्पूर्ण मानवता के प्रति भी संवेदनशील हो।

ऐसा व्यक्ति जाति, धर्म, संस्कृति, भाषा और राष्ट्रीय सीमाओं के संकीर्ण भेदों से ऊपर उठकर शान्ति, समानता, सहयोग, सहिष्णुता और विश्वबन्धुत्व के मूल्यों को स्वीकार करता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सन् 1974 में यूनेस्को ने अन्तर्राष्ट्रीयता के लिए शिक्षा से सम्बन्धित नियम प्रस्तुत किए।
  • सामाजिक विज्ञान के शिक्षण में विश्व के विभिन्न देशों, मानव समुदायों और उनके पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन कराया जाना चाहिए।
  • विद्यार्थियों में आलोचनात्मक तर्कशक्ति, मानवीय सम्बन्ध, नागरिकता और सहयोग की भावना विकसित करना आवश्यक है।
  • जाति, धर्म, संस्कृति तथा वर्ग के आधार पर होने वाले भेदभाव को शिक्षा द्वारा कम किया जाना चाहिए।
  • समकालीन विश्व-समस्याओं, सामाजिक संघर्षों और सहयोग से सम्बन्धित विषयों का अध्ययन अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित करता है।
  • शिक्षा मानव की पारस्परिक निर्भरता, विश्व-नागरिकता और विश्वबन्धुत्व की भावना विकसित करने का प्रमुख साधन है।
  • विज्ञान, स्वतंत्र चिन्तन, धैर्य और आत्मविश्वास विद्यार्थियों को संकीर्ण दृष्टिकोण एवं अन्धविश्वास से ऊपर उठाने में सहायक हैं।
Topic 10 लोकतान्त्रिक विकास—अर्थ, परिभाषाएँ एवं लोकतान्त्रिक शिक्षा के उद्देश्य

लोकतान्त्रिक विकास—अर्थ, परिभाषाएँ एवं लोकतान्त्रिक शिक्षा के उद्देश्य

लोकतन्त्र का अर्थ

लोकतन्त्र (Democracy) ऐसी शासन-व्यवस्था है जिसमें शासन की वास्तविक शक्ति जनता में निहित होती है और नागरिकों को शासन तथा सार्वजनिक जीवन में भाग लेने का अवसर मिलता है।

हिन्दी का जनतन्त्र शब्द जन + तन्त्र से बना है, जिसका सामान्य अर्थ है—जनता का शासन। इसी प्रकार Democracy शब्द यूनानी भाषा के Demos और Kratos शब्दों से बना है, जिनका आशय क्रमशः जनता तथा शासन/शक्ति से है।

लोकतन्त्र का अर्थ केवल चुनाव और सरकार तक सीमित नहीं है। व्यापक अर्थ में यह ऐसी जीवन-पद्धति है जिसमें स्वतंत्रता, समानता, न्याय, सहिष्णुता, सहयोग, उत्तरदायित्व और सभी व्यक्तियों की भागीदारी को महत्त्व दिया जाता है।

लोकतान्त्रिक विकास का अर्थ

लोकतान्त्रिक विकास से आशय व्यक्ति में उन ज्ञान, गुणों, दृष्टिकोणों और व्यवहारों का विकास करना है जो उसे लोकतान्त्रिक समाज का सक्रिय, उत्तरदायी और विवेकशील नागरिक बना सकें।

इसके अन्तर्गत व्यक्ति को अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों की समझ, दूसरों के विचारों के प्रति सम्मान, समानता में विश्वास, स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व विकसित करना आवश्यक है।

लोकतन्त्र की प्रमुख परिभाषाएँ

1. अब्राहम लिंकन के अनुसार

अब्राहम लिंकन के अनुसार, लोकतन्त्र वह शासन-प्रणाली है जिसमें शासन जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए होता है।

इस परिभाषा में लोकतन्त्र के तीन मूल तत्त्व स्पष्ट होते हैं—शासन का आधार जनता है, शासन में जनता की भागीदारी होती है और शासन का उद्देश्य जनता का कल्याण है।

2. सीले के अनुसार

सीले के अनुसार, लोकतन्त्र वह सरकार है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति भाग लेता है।

अर्थात लोकतन्त्र में प्रत्येक नागरिक को सार्वजनिक जीवन तथा शासन से सम्बन्धित प्रक्रियाओं में भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए।

3. डायसी के अनुसार

डायसी के अनुसार, लोकतन्त्र ऐसी शासन-व्यवस्था है जिसमें जनता को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है और शासन में उसकी भागीदारी होती है।

लोकतन्त्र और शिक्षा का सम्बन्ध

लोकतन्त्र की सफलता केवल संविधान और राजनीतिक संस्थाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि ऐसे नागरिकों पर निर्भर करती है जो शिक्षित, विवेकशील, उत्तरदायी तथा लोकतान्त्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले हों।

इसलिए लोकतान्त्रिक शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों में केवल बौद्धिक ज्ञान विकसित करना नहीं, बल्कि उनके शारीरिक, मानसिक, नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यक्तित्व का भी संतुलित विकास करना है।

लोकतान्त्रिक शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य

1. व्यक्तित्व का विकास

लोकतन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति का अपना महत्त्व होता है। इसलिए लोकतान्त्रिक शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थी के व्यक्तित्व का पूर्ण और संतुलित विकास करना है।

केवल बौद्धिक विकास पर्याप्त नहीं है। बालक के शारीरिक, मानसिक, नैतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक पक्षों का भी विकास आवश्यक है। इन सभी पक्षों के समन्वित विकास से ही उसका व्यक्तित्व गतिशील एवं प्रभावशाली बनता है।

2. जनतान्त्रिक नागरिकता का विकास

लोकतन्त्र की सफलता के लिए ऐसे नागरिक आवश्यक हैं जो अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझें तथा जिम्मेदारीपूर्वक उनका निर्वाह करें।

लोकतान्त्रिक शिक्षा व्यक्ति में स्वतंत्र एवं स्पष्ट चिन्तन विकसित करती है, जिससे वह महत्वपूर्ण विषयों पर स्वयं निर्णय ले सके और सही-असत्य में अन्तर कर सके।

एक आदर्श लोकतान्त्रिक नागरिक को—

  • देश की समस्याओं के विषय में स्वतंत्र चिन्तन करना चाहिए।
  • मताधिकार का उचित प्रयोग करना चाहिए।
  • सत्य और असत्य में भेद करने की क्षमता रखनी चाहिए।
  • सामाजिक समानता तथा धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखना चाहिए।
  • भारतीय संविधान के प्रति पूर्ण आस्था रखनी चाहिए।
  • जीवन के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
  • विभिन्न विचारों में समन्वय स्थापित करने की क्षमता रखनी चाहिए।
3. व्यावसायिक कुशलता का विकास

एक अच्छे नागरिक का स्वावलम्बी होना भी आवश्यक है। इसलिए लोकतान्त्रिक शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों में ऐसी व्यावसायिक एवं तकनीकी कुशलता विकसित करना है जिससे वे अपनी आजीविका अर्जित कर सकें।

औद्योगीकरण तथा उत्पादन के विकास के लिए कुशल इंजीनियरों, तकनीशियनों और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। शिक्षा को विद्यार्थियों को उनकी रुचि एवं योग्यता के अनुसार उचित तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण देना चाहिए।

व्यावसायिक कुशलता से व्यक्ति आत्मनिर्भर बनता है और राष्ट्र के आर्थिक विकास में भी योगदान देता है।

4. नेतृत्व के लिए शिक्षा

लोकतन्त्र की सफलता के लिए प्रत्येक क्षेत्र में योग्य, ईमानदार और सक्षम नेतृत्व की आवश्यकता होती है।

नेतृत्व केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और अन्य सभी क्षेत्रों में अच्छे नेतृत्व की आवश्यकता होती है।

एक अच्छे नेता में निम्न गुण होने चाहिए—

  • योग्यता एवं बुद्धिमत्ता
  • सहनशीलता
  • दूरदर्शिता
  • अनुशासन
  • सहयोग की भावना
  • न्यायप्रियता
  • परिश्रमशीलता

लोकतान्त्रिक शिक्षा विद्यार्थियों में इन गुणों का विकास करके उन्हें भविष्य के योग्य एवं उत्तरदायी नेतृत्व के लिए तैयार करती है।

5. धार्मिक सहिष्णुता का विकास

भारत में अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं और प्रत्येक धर्म की अपनी पूजा-पद्धति, परम्पराएँ और मान्यताएँ हैं।

लोकतान्त्रिक शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों में सभी धर्मों के प्रति सम्मान, सहिष्णुता और सौहार्द की भावना विकसित करना है।

व्यक्ति को ऐसी संकीर्ण मानसिकता से बचना चाहिए जिसमें वह अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरे धर्मों को हीन समझे। धार्मिक सहिष्णुता सामाजिक शान्ति एवं राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक है।

6. देशभक्ति की भावना का विकास

शिक्षा द्वारा विद्यार्थियों में प्रारम्भ से ही देशप्रेम और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित की जानी चाहिए।

परन्तु देशभक्ति का अर्थ संकीर्ण राष्ट्रीयता नहीं होना चाहिए। विद्यार्थियों को यह समझाया जाना चाहिए कि वे अपने देश के नागरिक होने के साथ-साथ विश्व-समुदाय के भी सदस्य हैं।

इसलिए देशप्रेम के साथ “वसुधैव कुटुम्बकम्” और विश्वबन्धुत्व की भावना का विकास भी आवश्यक है।

7. अवकाश के समय का सदुपयोग

लोकतान्त्रिक शिक्षा का एक उद्देश्य नागरिकों को अपने अवकाश के समय का उचित एवं रचनात्मक उपयोग करना सिखाना भी है।

अवकाश को निरर्थक कार्यों में व्यतीत करने के स्थान पर अध्ययन, कला, खेल, सामाजिक सेवा तथा अन्य रचनात्मक कार्यों में लगाना चाहिए।

अवकाश का उचित उपयोग व्यक्ति के कौशल में वृद्धि करता है और उसके व्यक्तित्व तथा समाज दोनों के कल्याण में सहायक होता है।

लोकतान्त्रिक शिक्षा का समग्र उद्देश्य

लोकतान्त्रिक शिक्षा ऐसे नागरिक का निर्माण करना चाहती है जो स्वतंत्र चिन्तन करने वाला, स्वावलम्बी, सहिष्णु, देशभक्त, न्यायप्रिय, उत्तरदायी और सहयोगी हो।

इस प्रकार लोकतान्त्रिक शिक्षा व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ लोकतान्त्रिक समाज और राष्ट्र की सफलता का आधार भी बनती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • लोकतन्त्र का सामान्य अर्थ जनता का शासन है।
  • अब्राहम लिंकन के अनुसार लोकतन्त्र जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन है।
  • लोकतान्त्रिक विकास का उद्देश्य व्यक्ति में स्वतंत्रता, समानता, न्याय, उत्तरदायित्व एवं सहभागिता की भावना विकसित करना है।
  • लोकतान्त्रिक शिक्षा का प्रथम उद्देश्य विद्यार्थी के सर्वांगीण व्यक्तित्व का विकास करना है।
  • लोकतान्त्रिक नागरिक को अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों की जानकारी, स्वतंत्र चिन्तन और संविधान में आस्था होनी चाहिए।
  • लोकतान्त्रिक शिक्षा व्यावसायिक कुशलता, नेतृत्व और धार्मिक सहिष्णुता का विकास करती है।
  • देशभक्ति को संकीर्ण राष्ट्रीयता न बनाकर विश्वबन्धुत्व की भावना से जोड़ना आवश्यक है।
  • अवकाश के समय का रचनात्मक सदुपयोग भी लोकतान्त्रिक शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।
Topic 11 लोकतन्त्र में शिक्षा की आवश्यकता एवं भूमिका

लोकतन्त्र में शिक्षा की आवश्यकता एवं भूमिका

लोकतन्त्र में शिक्षा की आवश्यकता

शिक्षा लोकतन्त्र का आधार है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था तभी सफल हो सकती है जब उसके नागरिक शिक्षित, जागरूक, विवेकशील और अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति उत्तरदायी हों।

शिक्षा के माध्यम से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक लोकतन्त्र को स्थायी आधार प्राप्त होता है। इसके अभाव में नागरिक अपने अधिकारों का उचित उपयोग नहीं कर पाते और न ही अपने कर्तव्यों एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों को सही ढंग से समझ पाते हैं।

लोकतन्त्र में शिक्षा का अर्थ केवल विद्यालयी या पुस्तकीय शिक्षा नहीं है, बल्कि ऐसी व्यापक शिक्षा से है जो व्यक्ति में स्वतंत्र चिन्तन, सामाजिक उत्तरदायित्व, सहिष्णुता, सहयोग, सद्भाव और लोकतान्त्रिक जीवन-मूल्यों का विकास करे।

लोकतन्त्र में शिक्षा की आवश्यकता के प्रमुख आधार

1. लोकतान्त्रिक व्यवस्था की सफलता

लोकतन्त्र में शासन की शक्ति नागरिकों के हाथ में होती है। इसलिए नागरिकों को इतना शिक्षित और जागरूक होना चाहिए कि वे शासन, चुनाव तथा सामाजिक जीवन से सम्बन्धित विषयों पर उचित निर्णय ले सकें।

अशिक्षित या राजनीतिक रूप से अनभिज्ञ नागरिक लोकतन्त्र की संस्थाओं का उचित उपयोग नहीं कर पाते, जिससे लोकतान्त्रिक व्यवस्था कमजोर हो सकती है।

2. लोकतन्त्र की बुराइयों को दूर करना

स्रोत में वोटों की राजनीति, अस्पष्ट प्रतिबद्धता, भ्रष्टाचार, अधिकारों का दुरुपयोग तथा अयोग्य व्यक्तियों के जनप्रतिनिधि के रूप में चुने जाने जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया है।

इन समस्याओं को कम करने के लिए ऐसी शिक्षा आवश्यक है जो नागरिकों में विवेक, उत्तरदायित्व और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करे।

3. अधिकारों के साथ कर्तव्यों का ज्ञान

लोकतन्त्र में नागरिकों को अनेक अधिकार प्राप्त होते हैं, परन्तु केवल अधिकारों का उपयोग करना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का भी निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

शिक्षा नागरिकों को अधिकार और कर्तव्य दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना सिखाती है।

4. सामाजिक गुणों का विकास

लोकतान्त्रिक समाज के लिए त्याग, प्रेम, सहिष्णुता, सहयोग और सद्भाव जैसे गुण आवश्यक हैं। ये गुण स्वतः विकसित नहीं होते, बल्कि शिक्षा द्वारा उनका व्यवस्थित विकास किया जा सकता है।

5. लोकतन्त्र की रक्षा

लोकतन्त्र की रक्षा के लिए ऐसे नागरिक आवश्यक हैं जो न्याय, समानता, स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व जैसे आदर्शों में विश्वास करते हों।

शिक्षा समाज के व्यक्तियों में इन आदर्शों का विकास करके लोकतान्त्रिक व्यवस्था को स्थिर और प्रभावी बनाती है।

हैदरिंगटन का मत

हैदरिंगटन (Hetherington) के अनुसार, लोकतान्त्रिक सरकार शिक्षित जनता की माँग करती है। अर्थात लोकतन्त्र की सफलता के लिए नागरिकों का शिक्षित होना आवश्यक है।

जॉन ड्यूवी का मत

लोकतन्त्र में शिक्षा के महत्त्व को स्पष्ट करने का विशेष श्रेय जॉन ड्यूवी (John Dewey) को दिया जाता है।

उनके अनुसार लोकतन्त्र में ऐसी शिक्षा आवश्यक है जो व्यक्ति में सामाजिक कार्यों और सम्बन्धों के प्रति रुचि विकसित करे तथा ऐसी मानसिक आदतों का निर्माण करे जिनसे सामाजिक परिवर्तन शान्तिपूर्ण और व्यवस्थित रूप से सम्भव हो सके।

लोकतन्त्र में शिक्षा की भूमिका

लोकतान्त्रिक समाज में शिक्षा व्यक्ति को केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि उसे ऐसा नागरिक बनाती है जो समाज और राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को समझ सके।

लोकतन्त्र में शिक्षा की प्रमुख भूमिकाएँ निम्नलिखित हैं—

1. नागरिकता के विकास में भूमिका

लोकतन्त्र के सफल संचालन के लिए प्रत्येक नागरिक का लोकतन्त्र के प्रति जागरूक होना आवश्यक है।

शिक्षा व्यक्ति को नागरिकता का प्रशिक्षण देकर उसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक एवं राष्ट्रीय विषयों पर स्वयं निर्णय लेने योग्य बनाती है।

इसके लिए बालकों में स्वतंत्र एवं स्पष्ट चिन्तन तथा बौद्धिक जागरूकता विकसित करना आवश्यक है। इस प्रकार आदर्श नागरिकता का विकास लोकतान्त्रिक शिक्षा की प्रमुख भूमिका है।

2. जीवनयापन कला के विकास में भूमिका

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसलिए उसे समाज में दूसरों के साथ सहयोगपूर्वक रहने और अपने जीवन को व्यवस्थित ढंग से चलाने की कला आनी चाहिए।

उचित शिक्षण एवं अभ्यास द्वारा व्यक्ति में जीवनयापन की कला विकसित की जा सकती है। लोकतन्त्र में परस्पर सहयोग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि व्यक्तियों के सहयोग से ही समाज और राष्ट्र की प्रगति सम्भव होती है।

3. देशभक्ति की भावना का विकास

शिक्षा विद्यार्थियों में राष्ट्र और देश के प्रति प्रेम तथा उत्तरदायित्व की भावना विकसित करती है।

किन्तु देशभक्ति का स्वरूप संकीर्ण नहीं होना चाहिए। एक देश की गतिविधियों का प्रभाव दूसरे देशों पर भी पड़ता है, इसलिए स्वस्थ देशभक्ति के साथ अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना और विश्व के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी आवश्यक है।

4. अच्छी आदतों का निर्माण

विद्यालयों में विभिन्न शैक्षिक एवं सहशैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों में अच्छी आदतों का निर्माण किया जाता है।

शिक्षा एक सकारात्मक प्रक्रिया है और अच्छी आदतें ही अच्छे आचरण का आधार बनती हैं। इसलिए लोकतान्त्रिक शिक्षा में प्रारम्भ से ही अनुशासन, समयपालन, सहयोग तथा उत्तरदायित्व जैसी स्वस्थ आदतों का विकास किया जाना चाहिए।

5. सामाजिक दृष्टिकोण का विकास

लोकतान्त्रिक शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों में ऐसा सामाजिक दृष्टिकोण विकसित करना है जिससे वे स्वयं को समाज का एक अभिन्न अंग और एक व्यापक सामाजिक इकाई का सदस्य समझें।

समाज के प्रति विद्यार्थियों के अनेक उत्तरदायित्व होते हैं। उनका उचित निर्वाह करना तथा राष्ट्र के कल्याण और विकास के विषय में सोचना लोकतान्त्रिक नागरिक का कर्तव्य है।

6. व्यक्तित्व का विकास

लोकतान्त्रिक शिक्षा विद्यार्थियों के संतुलित एवं सुसंगठित व्यक्तित्व के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

उन्हें भविष्य का अच्छा नागरिक बनाने के लिए उनकी रुचियों, मानवीय गुणों, अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूकता, उत्तरदायित्व निभाने की क्षमता तथा अवकाश के सदुपयोग जैसे गुणों का विकास किया जाना चाहिए।

7. नेतृत्व के गुणों का विकास

आज का बालक भविष्य में केवल नागरिक ही नहीं, बल्कि समाज या राष्ट्र का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति भी हो सकता है।

इसलिए लोकतान्त्रिक शिक्षा द्वारा विद्यार्थियों में सच्चरित्रता, मानव-मूल्य, आत्मविश्वास, उत्साह, स्पष्ट चिन्तन, अभिव्यक्ति तथा निर्णय लेने की क्षमता का विकास किया जाना चाहिए।

ये गुण विद्यार्थियों को भविष्य में योग्य एवं उत्तरदायी नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम बनाते हैं।

8. व्यावसायिक कुशलता का विकास

लोकतान्त्रिक शिक्षा व्यक्ति को आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बनाने पर भी बल देती है।

नागरिकों में व्यावसायिक कुशलता का विकास करके उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। साथ ही उनमें राष्ट्र की सेवा, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और परिश्रम जैसे गुण भी विकसित किए जाने चाहिए।

लोकतन्त्र एवं शिक्षा का परस्पर सम्बन्ध

लोकतन्त्र और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं। लोकतन्त्र व्यक्ति को स्वतंत्रता, समानता और सहभागिता का अवसर देता है, जबकि शिक्षा उसे इन अवसरों का उत्तरदायित्वपूर्वक उपयोग करना सिखाती है।

इसलिए स्वस्थ लोकतन्त्र के निर्माण के लिए ऐसी शिक्षा आवश्यक है जो व्यक्ति में ज्ञान के साथ विवेक, चरित्र, सामाजिक दृष्टिकोण, नेतृत्व, स्वावलम्बन और नागरिक उत्तरदायित्व का विकास करे।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • शिक्षा लोकतन्त्र का आधार है और उसकी सफलता के लिए शिक्षित एवं जागरूक नागरिक आवश्यक हैं।
  • शिक्षा नागरिकों को अधिकारों के उचित उपयोग तथा कर्तव्यों के निष्ठापूर्वक पालन की समझ प्रदान करती है।
  • हैदरिंगटन के अनुसार लोकतान्त्रिक सरकार शिक्षित जनता की माँग करती है।
  • जॉन ड्यूवी ने लोकतन्त्र में ऐसी शिक्षा पर बल दिया जो सामाजिक रुचि एवं स्वस्थ मानसिक आदतों का विकास करे।
  • लोकतन्त्र में शिक्षा की प्रमुख भूमिकाएँ हैं—नागरिकता, जीवनयापन कला, देशभक्ति, अच्छी आदतें और सामाजिक दृष्टिकोण का विकास।
  • लोकतान्त्रिक शिक्षा विद्यार्थियों में संतुलित व्यक्तित्व, नेतृत्व के गुण और व्यावसायिक कुशलता विकसित करती है।
  • लोकतन्त्र की रक्षा के लिए शिक्षा द्वारा स्वतंत्र चिन्तन, सहयोग, सहिष्णुता, उत्तरदायित्व और सामाजिक चेतना का विकास आवश्यक है।
Topic 12 वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति—अर्थ एवं विकास के उपाय

वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति—अर्थ एवं विकास के उपाय

अभिवृत्ति का अर्थ

अभिवृत्ति (Attitude) व्यक्ति के भावात्मक क्षेत्र से सम्बन्धित ऐसा व्यवहारगत परिवर्तन है, जिसके द्वारा वह किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति के प्रति एक निश्चित दृष्टिकोण प्रदर्शित करता है।

अर्थात किसी विषय को देखने, समझने और उसके प्रति व्यवहार करने की व्यक्ति की स्थायी प्रवृत्ति को अभिवृत्ति कहा जा सकता है।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति का अर्थ

वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति से आशय ऐसी सोच और व्यवहार से है जिसमें व्यक्ति किसी तथ्य को बिना पर्याप्त प्रमाण के स्वीकार न करे, जिज्ञासु बना रहे, सत्य की खोज करे और अपने निष्कर्षों को प्रयोग तथा प्रमाण के आधार पर परखे।

स्रोत में वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति से सम्बन्धित प्रमुख गुणों के रूप में उदार मनोवृत्ति, सहज जिज्ञासा, सत्य के प्रति निष्ठा, अपनी कार्य-पद्धति में विश्वास तथा परिणाम की सत्यता को प्रयोग द्वारा प्रमाणित करने की प्रवृत्ति का उल्लेख किया गया है।

इस प्रकार वैज्ञानिक अभिवृत्ति व्यक्ति को परम्परागत धारणाओं और अन्धविश्वासों को बिना जाँच स्वीकार करने के स्थान पर स्वतंत्र, तर्कपूर्ण तथा प्रमाण-आधारित चिन्तन करने के लिए प्रेरित करती है।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति का महत्त्व

आधुनिक समाज विज्ञान और तकनीक पर आधारित है। इसलिए विद्यार्थियों में केवल वैज्ञानिक तथ्यों का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनमें वैज्ञानिक ढंग से सोचने की आदत भी विकसित होनी चाहिए।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण विद्यार्थी को प्रश्न पूछने, प्रमाण खोजने, प्रयोग करने, निष्कर्ष निकालने तथा गलत धारणाओं को सुधारने में सहायता करता है।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति के विकास के उपाय

विद्यालय विद्यार्थियों में वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति विकसित करने का महत्त्वपूर्ण माध्यम है। स्रोत में इसके लिए निम्न उपाय बताए गए हैं—

1. शिक्षक का व्यक्तित्व

विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए शिक्षक का अपना व्यक्तित्व भी वैज्ञानिक होना चाहिए।

शिक्षक को अपने व्यवहार में सत्यप्रियता, तार्किकता और प्रमाणिकता प्रदर्शित करनी चाहिए। उसे किसी तथ्य को केवल परम्परा, विश्वास या अनुमान के आधार पर स्वीकार नहीं करना चाहिए।

जब शिक्षक स्वयं प्रमाण, तर्क और सत्य की कसौटी पर विचार करता है, तो विद्यार्थियों पर भी उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

2. उचित शिक्षण प्रविधियों का प्रयोग

विद्यार्थियों को दिया जाने वाला शिक्षण प्रभावशाली, क्रमबद्ध और यथासम्भव प्रयोगात्मक होना चाहिए।

तथ्यों को केवल मौखिक रूप से बताने के बजाय उन्हें प्रयोग, निरीक्षण, मॉडल प्रदर्शन तथा प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा समझाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

शिक्षक को विद्यार्थियों को स्वयं निरीक्षण करने, प्रयोग करने और निष्कर्ष निकालने के अवसर देने चाहिए। इस प्रक्रिया में विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता आवश्यक है।

3. जिज्ञासाओं की सन्तुष्टि

बालकों में प्रकृति, वस्तुओं, घटनाओं तथा अनदेखे और अनसुने तथ्यों के प्रति स्वाभाविक जिज्ञासा होती है।

शिक्षक को विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं को दबाने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और यथासम्भव उनकी जिज्ञासाओं का उचित समाधान करना चाहिए।

ज्ञान के संचार को केवल किसी निश्चित स्तर तक सीमित नहीं रखना चाहिए। जिज्ञासा की सन्तुष्टि से विद्यार्थियों में खोज, अध्ययन और वैज्ञानिक चिन्तन की प्रवृत्ति बढ़ती है।

4. अन्धविश्वासों का समापन

समाज में अनेक अन्धविश्वास पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते हैं। वैज्ञानिक एवं तकनीकी दृष्टिकोण का विकास करके ऐसे अन्धविश्वासों को कम किया जा सकता है।

विद्यार्थियों को वैज्ञानिक तथ्यों, सिद्धान्तों और प्रविधियों के आधार पर घटनाओं को समझने के अवसर दिए जाने चाहिए।

इससे वे किसी धारणा को केवल परम्परा के कारण स्वीकार करने के बजाय उसे तर्क एवं प्रमाण की कसौटी पर परखना सीखते हैं।

5. नवीन वैज्ञानिक साहित्य का उपयोग

विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए उन्हें नवीन वैज्ञानिक साहित्य के निरन्तर अध्ययन के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

विद्यालय के पुस्तकालय में वैज्ञानिक खोजों, समसामयिक घटनाओं तथा नई उपलब्धियों से सम्बन्धित साहित्य उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

महान वैज्ञानिकों के जीवन-वृत्त तथा प्रमुख आविष्कारों की प्रेरक कथाएँ भी विद्यार्थियों में विज्ञान के प्रति रुचि, जिज्ञासा और खोज की भावना विकसित करने में सहायक होती हैं।

विद्यालय की भूमिका

वैज्ञानिक अभिवृत्ति का विकास केवल विज्ञान विषय पढ़ाने से नहीं होता। इसके लिए विद्यालय का सम्पूर्ण वातावरण प्रश्न पूछने, तर्क करने, प्रयोग करने और प्रमाण खोजने के लिए अनुकूल होना चाहिए।

शिक्षक का वैज्ञानिक व्यवहार, प्रयोगात्मक शिक्षण, विद्यार्थियों की जिज्ञासा की सन्तुष्टि, अन्धविश्वासों से मुक्ति और नवीन वैज्ञानिक साहित्य की उपलब्धता मिलकर विद्यार्थियों में वैज्ञानिक एवं तकनीकी दृष्टिकोण विकसित करती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अभिवृत्ति किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति व्यक्ति के निश्चित दृष्टिकोण को व्यक्त करती है।
  • वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति में जिज्ञासा, सत्य के प्रति निष्ठा, तार्किकता और प्रयोग द्वारा प्रमाणित करने की प्रवृत्ति प्रमुख होती है।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण व्यक्ति को परम्परागत एवं अन्धविश्वासी सोच से ऊपर उठाकर स्वतंत्र एवं प्रमाण-आधारित चिन्तन की ओर ले जाता है।
  • वैज्ञानिक अभिवृत्ति के विकास के लिए शिक्षक का स्वयं वैज्ञानिक एवं तार्किक दृष्टिकोण वाला होना आवश्यक है।
  • प्रयोग, निरीक्षण, मॉडल प्रदर्शन तथा सक्रिय सहभागिता जैसी शिक्षण प्रविधियाँ वैज्ञानिक सोच विकसित करती हैं।
  • विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं की सन्तुष्टि तथा अन्धविश्वासों का वैज्ञानिक आधार पर निराकरण आवश्यक है।
  • नवीन वैज्ञानिक साहित्य, वैज्ञानिक खोजों तथा महान वैज्ञानिकों के जीवन से परिचय विद्यार्थियों में वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति विकसित करता है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

‘Value’ शब्द किस भाषा का शब्द है?

व्याख्या: Value शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द से मानी गई है, जिसका सम्बन्ध महत्त्व, उपयोगिता और वांछनीयता से है।
Q 2

‘क्रेटोस’ (Kratos) का अर्थ है—

व्याख्या: Democracy शब्द Demos और Kratos से बना है। Demos का अर्थ जनता तथा Kratos का अर्थ शक्ति या शासन है।
Q 3

“मूल्य वह है जो मानव इच्छाओं की तुष्टि करे।” यह कथन है—

व्याख्या: ऑगबर्न के अनुसार मूल्य वह है जो मानव की इच्छाओं की तुष्टि करता है।
Q 4

“जनतन्त्र वह सरकार है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति भाग लेता है।” यह कथन है—

व्याख्या: सीले ने लोकतन्त्र को ऐसी सरकार माना है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति भाग लेता है।
Q 5

“समाज शिक्षकों से भरा हुआ है। ये सब जानबूझ कर और चेतन व अचेतन रूप में व्यक्तित्व के पूर्ण विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।” यह कथन है—

व्याख्या: यह कथन ए. के. सी. ओटवे से सम्बन्धित है, जिन्होंने समाज और शिक्षा के सम्बन्ध पर बल दिया।
Q 6

विद्यालय को कहा जाता है—

व्याख्या: विद्यालय को लघु समाज कहा जाता है क्योंकि यहाँ विद्यार्थी सामाजिक जीवन के व्यवहार, मूल्य और उत्तरदायित्व सीखते हैं।
Q 7

“डेमोक्रेसी एण्ड एजुकेशन” के लेखक हैं—

व्याख्या: Democracy and Education जॉन ड्यूवी की प्रसिद्ध पुस्तक है।
Q 8

यूनेस्को ने ‘अन्तर्राष्ट्रीयता’ के लिए शिक्षा नामक प्रपत्र कब प्रकाशित किया?

व्याख्या: सन् 1974 में यूनेस्को ने अन्तर्राष्ट्रीयता के लिए शिक्षा से सम्बन्धित प्रपत्र प्रकाशित किया था।
Q 9

लोकतन्त्र युग में शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य हैं—

व्याख्या: व्यक्तित्व विकास, जनतान्त्रिक नागरिकता तथा नेतृत्व का विकास लोकतान्त्रिक शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य हैं।
Q 10

अनौपचारिक शिक्षा के अभिकरण हैं—

व्याख्या: दिए गए विकल्पों में परिवार, राज्य और समुदाय—तीनों को शिक्षा के सामाजिक अभिकरणों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
Q 11

जनतान्त्रिक शिक्षा के पहलू हैं—

व्याख्या: जनतान्त्रिक शिक्षा में विद्यालय, बालक और पाठ्यचर्या तीनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
Q 12

मूल्य शिक्षा का तात्पर्य ऐसी शिक्षा से है—

व्याख्या: मूल्य शिक्षा ऐसी शिक्षा है जिसमें विद्यार्थियों में मानवीय, सामाजिक और नैतिक मूल्यों के विकास पर बल दिया जाता है।
Q 13

“Nationalism and Government” पुस्तक के लेखक हैं—

व्याख्या: स्रोत में Nationalism and Government पुस्तक के लेखक के रूप में प्रो. जिमर्न का उल्लेख किया गया है।
Q 14

सामान्यतः मूल्यों को कितने प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया गया है?

व्याख्या: मूल्यों को सामान्यतः परम्परागत मूल्य, आधुनिक मूल्य तथा जीवन-शैली में परिवर्तन से विकसित मूल्य—इन तीन भागों में बाँटा गया है।
Q 15

विद्यार्थियों में वैज्ञानिक एवं तकनीकी अभिवृत्ति के विकास का प्रमुख उपाय है—

व्याख्या: वैज्ञानिक अभिवृत्ति के विकास के लिए प्रयोग, निरीक्षण, प्रमाण, जिज्ञासा और तार्किक चिन्तन को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP DELED Semester 2 के विषय वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा के अध्याय शिक्षा एवं मूल्य से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

मूल्य की प्रकृति एवं विशेषताएँ बताइए।

Q 2

मूल्यों के विकास में परिवार की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

Q 3

मूल्यों के विकास में विद्यालय की भूमिका बताइए।

Q 4

राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।

Q 5

राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में शिक्षा का क्या योगदान रहा? स्पष्ट कीजिए।

Q 6

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के लिए शिक्षा के उद्देश्य लिखिए।

Q 7

लोकतन्त्र में शिक्षा की भूमिका बताइए।

Q 8

मूल्यपरक शिक्षा के उद्देश्य बताइए।

Q 9

मूल्यपरक शिक्षा के मार्गदर्शक सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।

Q 10

मूल्यों के विकास में विद्यालय की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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