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Home Study Material Semester 2 प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास स्वतंत्रता के पश्चात गठित आयोग एवं समितियाँ
Chapter 3 • प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास

स्वतंत्रता के पश्चात गठित आयोग एवं समितियाँ

UP DELED Semester 2 के विषय प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास के इस अध्याय में स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय शिक्षा के विकास, कोठारी आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986, संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 तथा यशपाल समिति के गठन, प्रमुख सिफारिशों, कार्ययोजनाओं, मूल्यांकन एवं भारतीय शिक्षा पर उनके प्रभाव का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

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Topic 1 स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय शिक्षा का विकास एवं प्रमुख आयोग और नीतियाँ

स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय शिक्षा का विकास एवं प्रमुख आयोग और नीतियाँ

स्वतंत्रता के बाद भारतीय शिक्षा की नई दिशा

भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के बाद देश के सामने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना ही उद्देश्य नहीं था, बल्कि गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करके लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना भी आवश्यक था। इसलिए शिक्षा को राष्ट्र-निर्माण का प्रमुख साधन माना गया।

स्वतंत्र भारत में शिक्षा का उद्देश्य ऐसी व्यवस्था विकसित करना था जो नागरिकों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाए, लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करे तथा देश की नई सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक आवश्यकताओं के अनुरूप मानव संसाधन तैयार करे।

स्वतंत्र भारत में शिक्षा सुधार का प्रारम्भ

स्वतंत्रता प्राप्ति के शीघ्र बाद शिक्षा को नई दिशा देने का प्रयास आरम्भ हुआ। जनवरी 1948 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने एक अखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन आयोजित कराया।

इस सम्मेलन का उद्देश्य केवल पुरानी शिक्षा व्यवस्था को थोड़े परिवर्तन के साथ जारी रखना नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा में मूलभूत परिवर्तन करना था।

सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी इस बात पर बल दिया कि स्वतंत्र भारत को औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था को ज्यों-का-त्यों स्वीकार करने के बजाय अपनी नई परिस्थितियों और राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा-व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।

स्वतंत्रता के बाद शिक्षा के क्षेत्र में प्रमुख परिवर्तन

स्वतंत्रता के बाद भारत में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च, तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा तक अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। शिक्षा का क्षेत्र पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक और बहुआयामी हुआ।

1. विश्वविद्यालय शिक्षा में सुधार

सन् 1948–49 में विश्वविद्यालय शिक्षा की समस्याओं और सुधारों का अध्ययन करने के लिए विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग गठित किया गया। इस आयोग ने उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, उद्देश्य और संगठन के सम्बन्ध में अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए।

आगे चलकर उच्च शिक्षा के विकास के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की स्थापना की गई। इसके माध्यम से विश्वविद्यालयों के विकास, वित्तीय सहायता और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया।

2. नए विश्वविद्यालयों का विस्तार

स्वतंत्रता के बाद देश में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ। अनेक नए विश्वविद्यालय स्थापित किए गए, जिससे विभिन्न क्षेत्रों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अधिक अवसर मिलने लगे।

पंजाब, गौहाटी, पूना, रुड़की, कश्मीर, बड़ौदा, गुजरात, महिला विश्वविद्यालय, विश्वभारती, श्री वेंकटेश्वर, यादवपुर, वल्लभभाई, कुरुक्षेत्र, गोरखपुर, विक्रमशिला तथा संस्कृत विश्वविद्यालय जैसे अनेक विश्वविद्यालयों ने उच्च शिक्षा के विस्तार में योगदान दिया।

3. भारतीय परम्परा और आधुनिक शिक्षा का विकास

स्वतंत्र भारत में केवल पाश्चात्य स्वरूप की शिक्षा पर ही ध्यान नहीं दिया गया, बल्कि भारतीय संस्कृति और वैकल्पिक शिक्षा परम्पराओं से जुड़ी संस्थाओं ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विश्वभारती, गुरुकुल, अरविन्द आश्रम, जामिया मिलिया इस्लामिया और विद्याभवन जैसी संस्थाएँ आधुनिक भारतीय शिक्षा के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बनीं।

4. माध्यमिक शिक्षा का पुनर्गठन

सन् 1952–53 में माध्यमिक शिक्षा की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए माध्यमिक शिक्षा आयोग का गठन किया गया, जिसे मुदालियर आयोग भी कहा जाता है।

इस आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के उद्देश्यों, संगठन और सुधार के सम्बन्ध में अनेक सुझाव दिए। इससे माध्यमिक शिक्षा के पुनर्गठन को नई दिशा मिली।

सर्वजन शिक्षा की दिशा में प्रयास

स्वतंत्रता के बाद सरकार ने अधिक से अधिक बच्चों तक शिक्षा पहुँचाने के लिए अनेक योजनाएँ प्रारम्भ कीं। इक्कीसवीं शताब्दी के आरम्भ में प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण की दिशा में प्रयास और तेज किए गए।

नवम्बर 2000 में केन्द्र सरकार द्वारा सर्व शिक्षा अभियान प्रारम्भ किया गया। इसका प्रमुख लक्ष्य 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों तक प्राथमिक शिक्षा पहुँचाना था।

इस कार्यक्रम के माध्यम से विद्यालयों तक पहुँच, नामांकन और प्राथमिक शिक्षा के विस्तार को बढ़ावा मिला।

बाल शिक्षा एवं पोषण सम्बन्धी प्रयास

छोटे बच्चों की देखभाल और शिक्षा के लिए गाँवों तथा बस्तियों में आँगनवाड़ी केन्द्रों की व्यवस्था की गई। इन केन्द्रों पर प्रारम्भिक शिक्षा के साथ बच्चों के पोषण की आवश्यकताओं पर भी ध्यान दिया गया।

विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने और पोषण की स्थिति सुधारने के उद्देश्य से सरकारी विद्यालयों में मध्याह्न भोजन की व्यवस्था भी की गई।

प्रबन्ध एवं तकनीकी शिक्षा का विस्तार

स्वतंत्रता के बाद उच्च तकनीकी और प्रबन्ध शिक्षा के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया गया। देश में भारतीय प्रबन्ध संस्थान (IIM) तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की स्थापना की गई।

इन संस्थानों ने भारत में उच्च स्तरीय तकनीकी, प्रबन्धकीय और व्यावसायिक शिक्षा को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा भारतीय विद्यार्थियों की प्रतिभा को राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

शिक्षा में नए संगठनात्मक प्रयोग

उच्च शिक्षा को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाने के लिए कई महाविद्यालयों में सेमेस्टर प्रणाली अपनाई गई। शिक्षा में शोध, विज्ञान, तकनीक, प्रबन्ध और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर भी लगातार अधिक बल दिया जाने लगा।

इस प्रकार स्वतंत्र भारत की शिक्षा केवल विद्यालयी ज्ञान तक सीमित न रहकर तकनीकी, व्यावसायिक, उच्च तथा शोध-आधारित शिक्षा की ओर विस्तृत होती गई।

स्वतंत्र भारत के प्रमुख शिक्षा आयोग एवं नीतियाँ

स्वतंत्रता के बाद शिक्षा व्यवस्था को समय की आवश्यकताओं के अनुसार सुधारने के लिए विभिन्न आयोग, समितियाँ और नीतियाँ गठित की गईं। इस अध्याय में विशेष रूप से निम्न आयोगों और नीतियों का अध्ययन किया गया है—

वर्ष आयोग / नीति
1964–66 शिक्षा आयोग / कोठारी आयोग
1986 राष्ट्रीय शिक्षा नीति
1992 संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति
1992–93 यशपाल समिति
2005 राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा
2009 राष्ट्रीय पाठ्यचर्या संरचना—शिक्षक शिक्षा

इन आयोगों और नीतियों की आवश्यकता

समय के साथ समाज, अर्थव्यवस्था, विज्ञान और तकनीक में परिवर्तन होते रहे। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में भी निरन्तर सुधार आवश्यक था। विभिन्न आयोगों और नीतियों के माध्यम से सरकार ने शिक्षा के उद्देश्यों, संरचना, पाठ्यक्रम, शिक्षक-प्रशिक्षण, समान अवसर, तकनीकी शिक्षा तथा शिक्षा के सार्वभौमीकरण जैसे विषयों पर सुधार करने का प्रयास किया।

इस प्रकार स्वतंत्रता के बाद भारतीय शिक्षा का विकास केवल संस्थाओं की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसे राष्ट्रीय विकास, सामाजिक समानता, लोकतांत्रिक मूल्यों और आधुनिक ज्ञान से जोड़ने की दिशा में भी निरन्तर प्रयास किए गए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ और इसके बाद शिक्षा को राष्ट्र-निर्माण का प्रमुख साधन माना गया।
  • जनवरी 1948 में मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन आयोजित कराया।
  • 1948–49 में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग तथा 1952–53 में माध्यमिक शिक्षा आयोग (मुदालियर आयोग) गठित किया गया।
  • उच्च शिक्षा के विकास के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा अनेक नए विश्वविद्यालय स्थापित किए गए।
  • नवम्बर 2000 में सर्व शिक्षा अभियान प्रारम्भ किया गया, जिसका लक्ष्य 6–14 वर्ष के बच्चों तक प्राथमिक शिक्षा पहुँचाना था।
  • बाल शिक्षा एवं पोषण के लिए आँगनवाड़ी और मध्याह्न भोजन जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया गया।
  • तकनीकी और प्रबन्ध शिक्षा के विकास के लिए IIT और IIM जैसे उच्च स्तरीय संस्थान विकसित किए गए।
  • प्रमुख शिक्षा सुधारों में कोठारी आयोग 1964–66, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986, संशोधित नीति 1992, यशपाल समिति 1992–93, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 तथा शिक्षक शिक्षा सम्बन्धी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या संरचना 2009 महत्त्वपूर्ण हैं।
  • स्वतंत्रता के बाद भारतीय शिक्षा का लक्ष्य शिक्षा का विस्तार करने के साथ उसे लोकतंत्र, समानता, आधुनिक ज्ञान और राष्ट्रीय विकास से जोड़ना रहा।
Topic 2 शिक्षा आयोग अथवा कोठारी आयोग (1964–1966)—गठन, उद्देश्य, कार्यक्षेत्र एवं प्रतिवेदन

शिक्षा आयोग अथवा कोठारी आयोग (1964–1966)—गठन, उद्देश्य, कार्यक्षेत्र एवं प्रतिवेदन

कोठारी आयोग की पृष्ठभूमि

स्वतंत्रता के बाद भारत में विश्वविद्यालय तथा माध्यमिक शिक्षा के सुधार के लिए अलग-अलग आयोग गठित किए गए थे। इन आयोगों ने अपने-अपने क्षेत्र की समस्याओं का अध्ययन करके महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए, लेकिन देश की पूरी शिक्षा-व्यवस्था के लिए एक समान एवं व्यापक नीति की आवश्यकता बनी रही।

भारत सरकार ने अनुभव किया कि प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च एवं तकनीकी शिक्षा तक सभी स्तरों का एक साथ अध्ययन करके ऐसी शिक्षा-व्यवस्था विकसित की जाए जो पूरे देश की वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ भविष्य के राष्ट्रीय विकास में भी सहायक हो।

इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने 14 जुलाई 1964 को एक व्यापक शिक्षा आयोग का गठन किया।

कोठारी आयोग का गठन

शिक्षा आयोग के अध्यक्ष प्रो. डी. एस. कोठारी थे, जो उस समय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष थे। इसलिए इस आयोग को उनके नाम पर कोठारी आयोग कहा जाता है।

आयोग में भारत के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र के अनुभवी विशेषज्ञों को सम्मिलित किया गया। इससे आयोग को भारतीय शिक्षा की समस्याओं का व्यापक अध्ययन करने और विभिन्न स्तरों के लिए व्यावहारिक सुझाव देने में सहायता मिली।

बिन्दु विवरण
गठन 14 जुलाई 1964
अध्यक्ष प्रो. डी. एस. कोठारी
प्रचलित नाम कोठारी आयोग
कार्यकाल 1964–1966
प्रतिवेदन प्रस्तुत 29 जून 1966
प्रतिवेदन का नाम शिक्षा एवं राष्ट्रीय विकास

आयोग के गठन की आवश्यकता

स्वतंत्र भारत में शिक्षा के विभिन्न स्तरों का विकास हो रहा था, लेकिन उनमें एकरूपता और समन्वय की कमी थी। प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च तथा तकनीकी शिक्षा अलग-अलग समस्याओं से प्रभावित थी।

इसलिए ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा-व्यवस्था की आवश्यकता थी जो पूरे देश में शिक्षा के उद्देश्य, संगठन, प्रशासन, गुणवत्ता और विस्तार के सम्बन्ध में एक स्पष्ट दिशा प्रदान कर सके।

शिक्षा आयोग के उद्देश्य एवं कार्यक्षेत्र

सरकार ने आयोग को प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च तथा तकनीकी शिक्षा सहित सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा-व्यवस्था का अध्ययन करने का दायित्व दिया। आयोग के प्रमुख उद्देश्य और कार्यक्षेत्र निम्नलिखित थे—

1. तत्कालीन शिक्षा-प्रणाली का अध्ययन

आयोग को भारत में प्रचलित शिक्षा व्यवस्था का गहन अध्ययन करना था तथा उसकी प्रमुख कमियों और असन्तोष के कारणों की पहचान करके सुधार के उपाय सुझाने थे।

2. पूरे देश के लिए समान शिक्षा-व्यवस्था का सुझाव

आयोग का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य ऐसी शिक्षा-प्रणाली के सम्बन्ध में सुझाव देना था जो पूरे देश के लिए उपयोगी हो और भारत की वर्तमान आवश्यकताओं के साथ भविष्य के विकास में भी सहायक बन सके।

3. शिक्षा प्रशासन एवं नीति में सुधार

आयोग को शिक्षा के प्रशासन और व्यवस्था से सम्बन्धित नीतियों का अध्ययन करके सरकार को सुधार के सुझाव देने थे, जिससे शिक्षा-प्रणाली अधिक संगठित और प्रभावी बन सके।

4. शिक्षा के प्रसार एवं गुणवत्ता में सुधार

आयोग को शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर विस्तार के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता में सुधार के उपाय सुझाने थे। अर्थात केवल अधिक विद्यालय और संस्थाएँ खोलना ही लक्ष्य नहीं था, बल्कि शिक्षा के स्तर को भी बेहतर बनाना था।

आयोग की अध्ययन पद्धति

कोठारी आयोग ने केवल उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर अपना प्रतिवेदन तैयार नहीं किया। शिक्षा की वास्तविक स्थिति समझने के लिए उसने विभिन्न प्रकार से जानकारी एकत्र की।

  • विशेषज्ञों के कार्यकारी दल बनाए गए।
  • देश के विभिन्न राज्यों के विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों का अध्ययन किया गया।
  • शिक्षा से जुड़े व्यक्तियों और विशेषज्ञों से साक्षात्कार किए गए।
  • शिक्षा सम्बन्धी प्रश्नों के लिए प्रश्नावलियाँ तैयार कर उनके उत्तर प्राप्त किए गए।
  • प्राप्त आँकड़ों, विचारों और अनुभवों का विश्लेषण करके निष्कर्ष निकाले गए।

इस व्यापक अध्ययन के कारण आयोग भारतीय शिक्षा की वास्तविक समस्याओं को समझकर विभिन्न स्तरों के लिए विस्तृत सुझाव प्रस्तुत कर सका।

कोठारी आयोग का प्रतिवेदन

अपने अध्ययन और विचार-विमर्श के बाद आयोग ने 29 जून 1966 को अपना प्रतिवेदन तत्कालीन शिक्षा मंत्री एम. सी. छागला को प्रस्तुत किया।

यह प्रतिवेदन लगभग 692 पृष्ठों का विस्तृत दस्तावेज था। इसका शीर्षक “शिक्षा एवं राष्ट्रीय विकास” (Education and National Development) था।

प्रतिवेदन की संरचना

आयोग का प्रतिवेदन तीन मुख्य भागों में विभाजित था और इसमें शिक्षा के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण पक्षों का अध्ययन किया गया।

प्रथम भाग

प्रथम भाग में 6 अध्याय थे। इनमें सम्पूर्ण शिक्षा-व्यवस्था के पुनर्निर्माण से सम्बन्धित मूल प्रश्नों का अध्ययन किया गया, जैसे—

  • राष्ट्रीय लक्ष्य और शिक्षा का स्वरूप,
  • शिक्षकों की स्थिति और समृद्धि,
  • प्रवेश सम्बन्धी व्यवस्था,
  • शैक्षिक अवसरों की समानता।
द्वितीय भाग

द्वितीय भाग में 11 अध्याय थे। इसमें शिक्षा के अलग-अलग क्षेत्रों का विस्तार से अध्ययन किया गया, जिनमें प्रमुख रूप से—

  • विद्यालयी शिक्षा,
  • उच्च शिक्षा,
  • कृषि शिक्षा,
  • व्यावसायिक शिक्षा,
  • तकनीकी शिक्षा,
  • प्रौढ़ शिक्षा आदि शामिल थे।
तृतीय भाग

तृतीय भाग में 2 अध्याय थे। इनमें मुख्यतः—

  • शिक्षा का प्रशासन एवं नियोजन,
  • शिक्षा की आर्थिक व्यवस्था

पर विचार किया गया।

कोठारी आयोग का विशेष महत्त्व

कोठारी आयोग की विशेषता यह थी कि इसने केवल किसी एक स्तर की शिक्षा का अध्ययन नहीं किया, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को एक इकाई के रूप में देखा।

इसने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास से जोड़ते हुए प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, शिक्षक शिक्षा, प्रशासन, वित्त और समान शैक्षिक अवसर जैसे विषयों पर एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

इसी कारण कोठारी आयोग स्वतंत्र भारत की शिक्षा के विकास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आयोग माना जाता है। इसकी अनेक सिफारिशों ने आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति और शिक्षा-व्यवस्था को प्रभावित किया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • भारत सरकार ने 14 जुलाई 1964 को शिक्षा आयोग का गठन किया।
  • आयोग के अध्यक्ष प्रो. डी. एस. कोठारी थे, इसलिए इसे कोठारी आयोग कहा जाता है।
  • आयोग का कार्यकाल 1964 से 1966 तक रहा।
  • इसका उद्देश्य सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा-व्यवस्था का अध्ययन करके उसके पुनर्गठन और सुधार के सुझाव देना था।
  • आयोग ने शिक्षा की कमियों की पहचान, समान राष्ट्रीय शिक्षा-व्यवस्था, प्रशासनिक सुधार तथा शिक्षा के प्रसार और गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया।
  • आयोग ने विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों का अध्ययन, साक्षात्कार तथा प्रश्नावलियों आदि के माध्यम से जानकारी एकत्र की।
  • आयोग ने 29 जून 1966 को तत्कालीन शिक्षा मंत्री एम. सी. छागला को अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
  • प्रतिवेदन का नाम “शिक्षा एवं राष्ट्रीय विकास” था और यह लगभग 692 पृष्ठों का था।
  • प्रतिवेदन तीन भागों में विभाजित था—प्रथम भाग में 6, द्वितीय में 11 और तृतीय में 2 अध्याय थे।
  • कोठारी आयोग ने प्राथमिक से लेकर उच्च, तकनीकी और प्रौढ़ शिक्षा तक सम्पूर्ण शिक्षा-व्यवस्था को एक साथ सुधारने की दिशा प्रस्तुत की।
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Topic 3 कोठारी आयोग की सिफारिशें—शिक्षा की संरचना, उद्देश्य एवं लक्ष्य

कोठारी आयोग की सिफारिशें—शिक्षा की संरचना, उद्देश्य एवं लक्ष्य

कोठारी आयोग की शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

कोठारी आयोग ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था का व्यापक अध्ययन करके उसके पुनर्गठन के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। आयोग का विचार था कि शिक्षा की संरचना ऐसी हो जो देशभर में एकरूपता लाए, विद्यार्थियों को आगे की शिक्षा तथा जीवन के लिए तैयार करे और राष्ट्रीय विकास में सक्रिय योगदान दे।

आयोग ने शिक्षा के विभिन्न स्तरों की संरचना निर्धारित करने के साथ शिक्षा के उद्देश्यों को भी राष्ट्रीय आवश्यकताओं से जोड़ा।

शिक्षा की प्रस्तावित संरचना

आयोग ने पूर्व-प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक शिक्षा को क्रमबद्ध रूप में संगठित करने का सुझाव दिया। इसका उद्देश्य शिक्षा के प्रत्येक स्तर को अगले स्तर से तार्किक रूप से जोड़ना था।

1. पूर्व-प्राथमिक शिक्षा

औपचारिक विद्यालयी शिक्षा प्रारम्भ होने से पहले बच्चों को लगभग 1 से 3 वर्ष की पूर्व-प्राथमिक अथवा पूर्व-विद्यालयी शिक्षा देने का सुझाव दिया गया।

इस स्तर का उद्देश्य बच्चों को विद्यालयी वातावरण के लिए तैयार करना और उनके प्रारम्भिक विकास को उचित दिशा देना था।

2. प्राथमिक शिक्षा

आयोग ने प्राथमिक शिक्षा की कुल अवधि लगभग 7 से 8 वर्ष रखने का सुझाव दिया। इसे दो भागों में विभाजित किया गया—

  • निम्न प्राथमिक स्तर— लगभग 4 से 5 वर्ष।
  • उच्च प्राथमिक स्तर— लगभग 3 से 4 वर्ष।

आयोग ने कक्षा 1 में प्रवेश के समय बच्चे की आयु लगभग 6 वर्ष रखने पर बल दिया।

3. निम्न माध्यमिक शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा के बाद निम्न माध्यमिक स्तर की अवधि लगभग 2 से 3 वर्ष रखने का सुझाव दिया गया।

इस स्तर पर विद्यार्थियों के लिए सामान्य शिक्षा के साथ आवश्यकता के अनुसार व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था भी की जा सकती थी।

4. उच्चतर माध्यमिक शिक्षा

उच्चतर माध्यमिक स्तर की अवधि लगभग 2 से 3 वर्ष रखने का प्रस्ताव किया गया। इस स्तर को विद्यार्थी की आगे की उच्च शिक्षा अथवा व्यावसायिक तैयारी से जोड़ा गया।

5. विद्यालयी शिक्षा के दो प्रमुख चरण

आयोग के अनुसार विद्यालयी शिक्षा को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि एक सामान्य विद्यार्थी लगभग 10 वर्ष में हाईस्कूल स्तर तथा लगभग 12 वर्ष में उच्चतर माध्यमिक स्तर पूर्ण कर सके।

उच्च शिक्षा की संरचना

विद्यालयी शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा को भी निश्चित क्रम में संगठित करने का सुझाव दिया गया।

  • प्रथम डिग्री पाठ्यक्रम— लगभग 3 वर्ष।
  • द्वितीय डिग्री पाठ्यक्रम— लगभग 2 से 3 वर्ष।
  • अनुसंधान— आवश्यकता के अनुसार लगभग 2 से 3 वर्ष अथवा उससे सम्बद्ध उच्च अध्ययन।

आयोग ने कुछ विश्वविद्यालयों में ऐसे विशिष्ट स्नातक विद्यालय स्थापित करने का भी सुझाव दिया जहाँ चुने हुए विषयों में उच्च स्तर की पढ़ाई और शोध की व्यवस्था हो।

शिक्षा के स्तर में सुधार सम्बन्धी सुझाव

केवल शिक्षा की अवधि निर्धारित करना पर्याप्त नहीं था। आयोग ने प्रत्येक स्तर की गुणवत्ता सुधारने पर भी बल दिया।

  • विद्यालयी शिक्षा में अपव्यय तथा अवरोधन को कम किया जाए।
  • कक्षा 10 के स्तर को तत्कालीन उच्चतम माध्यमिक स्तर के अनुरूप मजबूत बनाया जाए।
  • विश्वविद्यालयों की उपाधियों और पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए।
  • शिक्षा के विभिन्न अंगों के बीच उचित समन्वय स्थापित किया जाए।

विद्यालय संकुल की अवधारणा

आयोग ने निकट स्थित विद्यालयों को परस्पर सहयोग से कार्य करने के लिए विद्यालय संकुल (School Complex) बनाने का सुझाव दिया।

एक माध्यमिक विद्यालय के साथ उसके आसपास स्थित प्राथमिक विद्यालयों को जोड़कर संसाधनों, शिक्षकों और शैक्षिक सुविधाओं का बेहतर उपयोग किया जा सकता था। इससे विभिन्न विद्यालयों के बीच समन्वय और गुणवत्ता सुधारने में सहायता मिलती।

शिक्षा के उद्देश्य एवं लक्ष्य

कोठारी आयोग ने शिक्षा को केवल व्यक्तिगत विकास का साधन नहीं माना, बल्कि उसे राष्ट्रीय विकास और सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा। आयोग ने शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों को पाँच व्यापक क्षेत्रों में व्यवस्थित किया।

1. शिक्षा और उत्पादन

आयोग का विचार था कि शिक्षा को देश की उत्पादन क्षमता और आर्थिक विकास से जोड़ा जाना चाहिए। इसके लिए शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, वैज्ञानिक तथा कार्यपरक बनाने पर बल दिया गया।

प्रमुख सुझाव
  • माध्यमिक और उच्च शिक्षा में विज्ञान की शिक्षा को महत्त्व दिया जाए।
  • कार्यानुभव को शिक्षा का आवश्यक अंग बनाया जाए।
  • माध्यमिक स्तर पर अधिक व्यावसायिक विषयों की व्यवस्था की जाए।
  • उच्च शिक्षा में तकनीकी शिक्षा के विकास पर बल दिया जाए।
  • विज्ञान और तकनीकी क्षेत्रों में अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जाए।

इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को ऐसा ज्ञान और कौशल देना था जो देश की आर्थिक तथा उत्पादन सम्बन्धी आवश्यकताओं में उपयोगी हो।

2. सामाजिकता और राष्ट्रीय एकता

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों में सामाजिकता, राष्ट्रीय एकता और नागरिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना माना गया।

प्रमुख सुझाव
  • शिक्षा के सभी स्तरों पर सामाजिक एवं राष्ट्रीय सेवा को महत्त्व दिया जाए।
  • सामान्य विद्यालय पद्धति (Common School System) को राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में अपनाया जाए।
  • विद्यालयों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय सेवा से सम्बन्धित कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
  • राष्ट्रीय एकता के विकास हेतु सरकार आवश्यक सहयोग प्रदान करे।
  • बच्चों में सामाजिकता तथा राष्ट्रीय चेतना विकसित करने वाली गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाए।
  • शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा को उचित स्थान दिया जाए।
  • पाठ्यक्रम में संविधान, लोकतंत्र और नागरिकता से सम्बन्धित मूल्यों को स्थान दिया जाए।

3. शिक्षा और लोकतंत्र

लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए शिक्षा को सभी नागरिकों तक पहुँचाना आवश्यक माना गया। आयोग ने समान अवसर, नेतृत्व क्षमता और लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास पर जोर दिया।

प्रमुख सुझाव
  • प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य एवं निःशुल्क बनाया जाए।
  • जाति, वर्ग, लिंग या अन्य भेदभाव के बिना सभी बच्चों को शिक्षा के समान अवसर दिए जाएँ।
  • माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा का उचित विकास किया जाए।
  • विद्यार्थियों में लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास के लिए विद्यालयों में कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
  • सहिष्णुता, समाज-सेवा, जनहित, नैतिकता और आत्मानुशासन जैसे गुणों का विकास किया जाए।

4. शिक्षा द्वारा आधुनिकीकरण

आयोग ने आधुनिकीकरण का सम्बन्ध विज्ञान और तकनीकी के उचित प्रयोग से जोड़ा। उसका मानना था कि आधुनिक भारत के निर्माण के लिए विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, स्वतंत्र विचार और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करना आवश्यक है।

प्रमुख सुझाव
  • शिक्षा में विज्ञान-आधारित तकनीकी का उपयोग किया जाए।
  • आधुनिकीकरण को शिक्षा का महत्त्वपूर्ण साधन माना जाए।
  • आधुनिकीकरण की गति और प्रसार में समन्वय स्थापित किया जाए।
  • विद्यार्थियों में स्वतंत्र विचार, स्वतंत्र निर्णय तथा स्वतंत्र अध्ययन की क्षमता विकसित की जाए।
  • शिक्षा के स्तर को लगातार ऊँचा उठाया जाए।

5. सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का विकास

कोठारी आयोग ने शिक्षा को केवल बौद्धिक या आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं माना। विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण के लिए सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों के विकास को भी आवश्यक बताया।

प्रमुख सुझाव
  • सभी शिक्षण संस्थाओं में सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा दी जाए।
  • प्राथमिक स्तर पर रोचक कहानियों तथा उपयुक्त गतिविधियों के माध्यम से इन मूल्यों का विकास किया जाए।
  • माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों के साथ विचार-विमर्श द्वारा उचित मूल्यों को समझाया जाए।
  • विद्यार्थियों में मूल्यों के विकास के लिए शिक्षकों को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
  • उच्च शिक्षा के स्तर पर मूल्यों की तार्किक और गम्भीर समझ विकसित की जाए।

समग्र दृष्टि

कोठारी आयोग की शिक्षा-सम्बन्धी दृष्टि व्यापक थी। उसने शिक्षा की संरचना को व्यवस्थित करने के साथ उसे उत्पादन, राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र, आधुनिकीकरण तथा मूल्य-शिक्षा से जोड़ा।

इस प्रकार आयोग का उद्देश्य ऐसी शिक्षा-व्यवस्था विकसित करना था जो विद्यार्थी के व्यक्तिगत विकास के साथ-साथ देश के आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय विकास में भी उपयोगी सिद्ध हो।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कोठारी आयोग ने पूर्व-प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक शिक्षा की एक क्रमबद्ध संरचना प्रस्तावित की।
  • प्राथमिक शिक्षा लगभग 7–8 वर्ष, निम्न माध्यमिक लगभग 2–3 वर्ष तथा उच्चतर माध्यमिक लगभग 2–3 वर्ष रखने का सुझाव दिया गया।
  • कक्षा 1 में प्रवेश की आयु लगभग 6 वर्ष रखने पर बल दिया गया।
  • उच्च शिक्षा में प्रथम डिग्री लगभग 3 वर्ष तथा द्वितीय डिग्री लगभग 2–3 वर्ष की रखने का सुझाव दिया गया।
  • निकटवर्ती विद्यालयों को जोड़कर विद्यालय संकुल (School Complex) बनाने का विचार प्रस्तुत किया गया।
  • आयोग ने शिक्षा के पाँच प्रमुख लक्ष्य माने—उत्पादन में वृद्धि, सामाजिकता एवं राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र, आधुनिकीकरण तथा सामाजिक-नैतिक-आध्यात्मिक मूल्यों का विकास।
  • शिक्षा को विज्ञान, तकनीकी, कार्यानुभव और व्यावसायिकता से जोड़ने पर बल दिया गया।
  • समान विद्यालय पद्धति, मातृभाषा, राष्ट्रीय सेवा और समान शैक्षिक अवसर को महत्त्व दिया गया।
  • लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास के लिए अनिवार्य एवं निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा तथा भेदभाव-रहित अवसरों का समर्थन किया गया।
  • आयोग ने विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों के विकास को भी शिक्षा का आवश्यक उद्देश्य माना।
Topic 4 कोठारी आयोग—शिक्षा प्रशासन, वित्त, नियोजन एवं शिक्षक सेवा सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग—शिक्षा प्रशासन, वित्त, नियोजन एवं शिक्षक सेवा सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग के प्रशासन, वित्त एवं नियोजन सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग (1964–1966) ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में सुधार के लिए शिक्षा के प्रशासन, वित्तीय व्यवस्था और शैक्षिक नियोजन को विशेष महत्त्व दिया।

आयोग का मानना था कि शिक्षा की गुणवत्ता और प्रसार केवल नए विद्यालय खोलने से नहीं बढ़ सकते। इसके लिए योग्य प्रशासन, पर्याप्त धनराशि, स्पष्ट उत्तरदायित्व तथा सुव्यवस्थित शैक्षिक नियोजन भी आवश्यक हैं।

इसी उद्देश्य से आयोग ने केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय संस्थाओं तथा शिक्षा से सम्बन्धित संगठनों के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए।

1. शिक्षा का राष्ट्रीय महत्त्व एवं प्रशासनिक सुधार

आयोग ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का प्रमुख साधन मानते हुए उसके प्रशासन को अधिक प्रभावशाली और व्यवस्थित बनाने पर बल दिया।

प्रमुख सुझाव
  • शिक्षा को राष्ट्रीय महत्त्व देना— शिक्षा को राष्ट्रीय महत्त्व का विषय माना जाए। आवश्यकता पड़ने पर केन्द्र सरकार शिक्षा के सम्बन्ध में राष्ट्रीय नीति घोषित करे।
  • योग्य शिक्षा अधिकारियों की नियुक्ति— शिक्षा मंत्रालयों में शिक्षा सलाहकार तथा शिक्षा सचिव जैसे पदों पर सरकारी, गैर-सरकारी और विश्वविद्यालयों से सम्बन्धित योग्य एवं अनुभवी व्यक्तियों का चयन किया जाए।
  • भारतीय शिक्षा सेवा में अनुभवी व्यक्तियों का चयन— भारतीय शिक्षा सेवा में ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति की जाए जिन्हें शिक्षण कार्य का वास्तविक अनुभव हो। इससे शिक्षा प्रशासन में शिक्षण की समस्याओं को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा।
  • केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड को सशक्त बनाना— केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड के अधिकारों में वृद्धि की जाए, जिससे वह शिक्षा सम्बन्धी नीतियों और सुधारों में प्रभावशाली भूमिका निभा सके।
  • NCERT की भूमिका— राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) को विद्यालयी शिक्षा का दायित्व सौंपने का सुझाव दिया गया।

इन सुझावों का मुख्य उद्देश्य शिक्षा प्रशासन में योग्य व्यक्तियों की भागीदारी बढ़ाना तथा शिक्षा सम्बन्धी निर्णयों को अधिक प्रभावी बनाना था।

2. शिक्षा की वित्तीय व्यवस्था सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने माना कि पर्याप्त आर्थिक संसाधनों के बिना शिक्षा का व्यापक विकास सम्भव नहीं है। इसलिए उसने शिक्षा के लिए सरकारी बजट बढ़ाने तथा उपलब्ध धनराशि का उचित उपयोग करने पर बल दिया।

प्रमुख सुझाव
  • शिक्षा पर 6% व्यय— केन्द्र सरकार अपने बजट में शिक्षा के लिए कम से कम 6% धनराशि की व्यवस्था करे।
  • राज्य सरकारों द्वारा बजट में वृद्धि— प्रान्तीय अर्थात राज्य सरकारें भी अपने शिक्षा बजट में वृद्धि करें, जिससे विद्यालयों और अन्य शैक्षिक संस्थाओं के विकास के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हो सकें।
  • शिक्षा में सहयोग को प्रोत्साहन— शिक्षा के विकास में आर्थिक अथवा अन्य प्रकार से सहयोग देने वाले व्यक्तियों को प्रोत्साहित किया जाए।
  • शिक्षा बजट का वितरण— आयोग ने सुझाव दिया कि कुल शिक्षा बजट का लगभग दो-तिहाई (2/3) भाग सामान्य शिक्षा तथा एक-तिहाई (1/3) भाग उच्च शिक्षा पर व्यय किया जाए।

इस प्रकार आयोग ने शिक्षा के सभी स्तरों के विकास के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराने तथा उसका योजनाबद्ध उपयोग करने की आवश्यकता बताई।

3. शैक्षिक नियोजन में केन्द्र, राज्य एवं स्थानीय संस्थाओं की भूमिका

शैक्षिक नियोजन का अर्थ है—शिक्षा के उद्देश्यों, आवश्यकताओं, संसाधनों और भविष्य की योजनाओं को ध्यान में रखकर शिक्षा के विकास की व्यवस्थित योजना बनाना।

कोठारी आयोग ने सुझाव दिया कि शिक्षा का नियोजन केवल केन्द्र सरकार के हाथों में सीमित न रहे, बल्कि केन्द्र, राज्य तथा स्थानीय संस्थाएँ अपने-अपने स्तर पर उचित उत्तरदायित्व निभाएँ।

प्रमुख सुझाव
  • स्थानीय संस्थाओं की जिम्मेदारी— स्थानीय संस्थाओं को उनके क्षेत्र में स्थित प्राथमिक शिक्षण संस्थाओं का दायित्व सौंपा जाए।
  • केन्द्रीय एवं राज्य स्तरीय नियोजन— शिक्षा का नियोजन केन्द्रीय तथा राज्य स्तर पर अलग-अलग किया जाए, जिससे दोनों अपने-अपने क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुसार योजनाएँ बना सकें।
  • विद्यालयी शिक्षा का नियोजन— विद्यालयी शिक्षा की योजनाएँ स्थानीय निकायों तथा राज्य सरकारों द्वारा मिलकर तैयार की जाएँ।
  • उच्च शिक्षा का नियोजन— उच्च शिक्षा की योजनाएँ राज्य तथा केन्द्र सरकारों द्वारा परस्पर सहयोग से बनाई जाएँ।

इन सुझावों का उद्देश्य शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर उत्तरदायित्व स्पष्ट करना और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाओं का निर्माण करना था।

4. प्रभावी शैक्षिक नियोजन सम्बन्धी सुझाव

आयोग ने शिक्षा के नियोजन को केवल विद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता तथा विद्यार्थियों की भविष्य की आवश्यकताओं को भी महत्त्व दिया।

प्रमुख सुझाव
  • वर्तमान एवं भविष्य की आवश्यकताओं का ध्यान— शैक्षिक नियोजन वर्तमान परिस्थितियों तथा भविष्य की सम्भावनाओं के आधार पर किया जाए।
  • अपव्यय एवं अवरोधन की रोकथाम— शिक्षा में अपव्यय और अवरोधन को रोकने के उपाय किए जाएँ। अर्थात विद्यार्थियों द्वारा पढ़ाई बीच में छोड़ने या एक ही कक्षा में बार-बार रुकने जैसी समस्याओं को कम करने का प्रयास किया जाए।
  • शिक्षा के प्रसार के साथ गुणात्मक सुधार— शिक्षा का विस्तार करते समय उसकी गुणवत्ता सुधारने की भी व्यवस्था की जाए। केवल संस्थाओं की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।
  • माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा का नियोजन— आयोग ने सुझाव दिया कि माध्यमिक शिक्षा लगभग 70% विद्यार्थियों के लिए पूर्ण शिक्षा का स्तर हो तथा शेष 30% योग्य विद्यार्थी उच्च शिक्षा में प्रवेश लें।

इस प्रकार आयोग ने शैक्षिक नियोजन में आवश्यकताओं का आकलन, संसाधनों का उचित उपयोग, अपव्यय की रोकथाम तथा शिक्षा की गुणवत्ता को विशेष महत्त्व दिया।

कोठारी आयोग के शिक्षकों के वेतन, सेवा एवं नियुक्ति सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग के अनुसार शिक्षा के क्षेत्र में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका शिक्षक की होती है। किसी भी शिक्षा-व्यवस्था की सफलता बहुत हद तक शिक्षकों की योग्यता, कार्यकुशलता और सेवा-परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

इसलिए आयोग ने योग्य व्यक्तियों को शिक्षण व्यवसाय की ओर आकर्षित करने, शिक्षकों की आर्थिक स्थिति सुधारने तथा उनकी सेवा-शर्तों को बेहतर बनाने के लिए अनेक सुझाव दिए।

5. शिक्षकों के वेतन एवं भत्तों सम्बन्धी सुझाव

आयोग ने शिक्षकों के आर्थिक स्तर में सुधार को आवश्यक माना, ताकि योग्य व्यक्ति शिक्षण व्यवसाय अपनाएँ और शिक्षक आर्थिक चिन्ताओं से मुक्त होकर अपने कार्य पर ध्यान दे सकें।

प्रमुख सुझाव
  • वेतन का निर्धारण— भारत सरकार शिक्षा के सभी स्तरों पर कार्य करने वाले शिक्षकों का वेतन निर्धारित करे।
  • समान वेतन— सरकारी तथा गैर-सरकारी शिक्षण संस्थाओं में कार्य करने वाले शिक्षकों का वेतन समान होना चाहिए।
  • महँगाई भत्ता— शिक्षकों के लिए महँगाई भत्ते की व्यवस्था की जाए, जिससे बढ़ती महँगाई के कारण उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित न हो।
  • वेतनमान की समय-समय पर समीक्षा— शिक्षकों के वेतनमान का प्रत्येक 5 वर्ष के बाद पुनर्निरीक्षण किया जाए।

इन सुझावों का उद्देश्य शिक्षकों को उचित वेतन तथा आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना और शिक्षण व्यवसाय को अधिक आकर्षक बनाना था।

6. शिक्षकों की नियुक्ति, योग्यता एवं पदोन्नति सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने स्पष्ट किया कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए विद्यालयों में योग्य और कुशल शिक्षकों की नियुक्ति आवश्यक है।

प्रमुख सुझाव
  • नियुक्ति एवं चयन प्रक्रिया में सुधार— शिक्षकों की आवश्यक योग्यताओं तथा चयन की विधियों में सुधार किया जाए, जिससे शिक्षण कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्तियों का चयन हो सके।
  • महिला शिक्षकों को प्रोत्साहन— शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर महिला शिक्षकों की नियुक्ति और भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए।
  • आवश्यक कार्य-सुविधाएँ— शिक्षकों को अपने शिक्षण कार्य को उचित ढंग से करने के लिए कम से कम आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
  • योग्यता के आधार पर पदोन्नति— योग्य एवं कुशल शिक्षकों को पदोन्नति के अवसर दिए जाएँ।
  • व्यावसायिक योग्यता में वृद्धि— शिक्षकों को अपनी व्यावसायिक योग्यता और शिक्षण-कौशल बढ़ाने के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाएँ।

इन सुझावों का उद्देश्य शिक्षण व्यवसाय में योग्य व्यक्तियों को आकर्षित करना तथा शिक्षकों को अपनी कार्यकुशलता बढ़ाने के अवसर प्रदान करना था।

7. शिक्षकों की सेवा-शर्तों एवं सामाजिक सुरक्षा सम्बन्धी सुझाव

आयोग ने माना कि शिक्षकों की सेवा-शर्तें स्पष्ट और न्यायसंगत होनी चाहिए। साथ ही उन्हें ऐसी सुविधाएँ मिलनी चाहिए जिनसे वे अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन उचित ढंग से कर सकें।

प्रमुख सुझाव
  • समान सेवा-शर्तें— सरकारी तथा गैर-सरकारी शिक्षकों की सेवा-शर्तें समान होनी चाहिए।
  • बीमा एवं पेंशन— शिक्षकों को बीमा तथा पेंशन जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ, जिससे उन्हें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा मिल सके।
  • कार्य के घंटों का निर्धारण— शिक्षकों के अध्यापन कार्य के घंटे निर्धारित करते समय उनके द्वारा किए जाने वाले अन्य विद्यालयी कार्यों को भी ध्यान में रखा जाए।
  • व्यक्तिगत ट्यूशन पर नियंत्रण— शिक्षा के क्षेत्र में प्रचलित व्यक्तिगत ट्यूशन की व्यवस्था पर उचित नियंत्रण किया जाए।

इन सुझावों के माध्यम से आयोग ने शिक्षकों के लिए उचित कार्य-परिस्थितियाँ, समान सेवा-सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने पर बल दिया।

8. शिक्षकों के आवास एवं प्रोत्साहन सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने शिक्षकों की आवास सम्बन्धी समस्याओं को भी महत्त्वपूर्ण माना। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने वाले शिक्षकों के लिए आवास की सुविधा आवश्यक बताई गई।

प्रमुख सुझाव
  • ग्रामीण शिक्षकों के लिए आवास— ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने वाले अध्यापकों के निवास स्थान की उचित व्यवस्था की जाए।
  • नगरीय शिक्षकों के लिए मकान किराया भत्ता— नगरों में कार्य करने वाले अध्यापकों को आवास किराए के लिए भत्ता प्रदान किया जाए।
  • सरकारी आवास योजनाएँ— अध्यापकों के लिए सरकारी आवास निर्माण योजनाओं को प्रोत्साहित किया जाए।
  • शिक्षक पुरस्कारों में वृद्धि— शिक्षा मंत्रालय द्वारा शिक्षकों को प्रदान किए जाने वाले पुरस्कारों की संख्या बढ़ाई जाए।

इन सुझावों का उद्देश्य शिक्षकों को बेहतर जीवन-परिस्थितियाँ प्रदान करना तथा उत्कृष्ट शिक्षण कार्य करने वाले अध्यापकों को प्रोत्साहित करना था।

कोठारी आयोग की सिफारिशों का समग्र महत्त्व

कोठारी आयोग ने शिक्षा के विकास के लिए प्रशासन, वित्त, नियोजन तथा शिक्षक सेवा को परस्पर सम्बन्धित माना।

आयोग के अनुसार शिक्षा के प्रभावी विकास के लिए जहाँ एक ओर योग्य प्रशासन, पर्याप्त बजट और व्यवस्थित नियोजन आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर योग्य, प्रशिक्षित, आर्थिक रूप से सुरक्षित तथा प्रोत्साहित शिक्षक भी आवश्यक हैं।

इस प्रकार आयोग ने शिक्षा के प्रसार के साथ उसकी गुणवत्ता सुधारने तथा शिक्षकों की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कोठारी आयोग ने शिक्षा को राष्ट्रीय महत्त्व का विषय मानते हुए उसके प्रशासन में सुधार की सिफारिश की।
  • शिक्षा मंत्रालयों में योग्य एवं अनुभवी अधिकारियों की नियुक्ति तथा भारतीय शिक्षा सेवा में शिक्षण अनुभव वाले व्यक्तियों के चयन पर बल दिया गया।
  • केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड के अधिकार बढ़ाने और NCERT को विद्यालयी शिक्षा का दायित्व सौंपने का सुझाव दिया गया।
  • केन्द्र सरकार के बजट में शिक्षा के लिए कम से कम 6% धनराशि की व्यवस्था करने तथा राज्य सरकारों का शिक्षा बजट बढ़ाने पर बल दिया गया।
  • कुल शिक्षा बजट का 2/3 भाग सामान्य शिक्षा तथा 1/3 भाग उच्च शिक्षा पर व्यय करने का सुझाव दिया गया।
  • विद्यालयी शिक्षा का नियोजन स्थानीय निकायों एवं राज्य सरकारों तथा उच्च शिक्षा का नियोजन राज्य एवं केन्द्र सरकारों द्वारा मिलकर करने की सिफारिश की गई।
  • शैक्षिक नियोजन में वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं, अपव्यय एवं अवरोधन की रोकथाम तथा शिक्षा की गुणवत्ता को महत्त्व दिया गया।
  • आयोग ने माध्यमिक शिक्षा को लगभग 70% विद्यार्थियों के लिए पूर्ण शिक्षा तथा शेष 30% योग्य विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा में प्रवेश की व्यवस्था का सुझाव दिया।
  • सभी स्तरों के शिक्षकों के वेतन निर्धारण, सरकारी एवं गैर-सरकारी शिक्षकों के समान वेतन तथा महँगाई भत्ते की व्यवस्था पर बल दिया गया।
  • शिक्षकों के वेतनमान का प्रत्येक 5 वर्ष बाद पुनर्निरीक्षण करने की सिफारिश की गई।
  • शिक्षकों की नियुक्ति एवं चयन प्रक्रिया में सुधार, महिला शिक्षकों को प्रोत्साहन तथा योग्य शिक्षकों को पदोन्नति देने पर बल दिया गया।
  • शिक्षकों के लिए समान सेवा-शर्तें, बीमा, पेंशन, आवास एवं मकान किराया भत्ता जैसी सुविधाओं का सुझाव दिया गया।
  • शिक्षकों के कार्य के घंटों का निर्धारण करते समय अन्य विद्यालयी कार्यों को ध्यान में रखने तथा व्यक्तिगत ट्यूशन पर नियंत्रण करने की सिफारिश की गई।
  • शिक्षकों को व्यावसायिक विकास के अवसर देने तथा उत्कृष्ट शिक्षकों के लिए पुरस्कारों की संख्या बढ़ाने पर बल दिया गया।
Topic 5 कोठारी आयोग—अध्यापक शिक्षा, प्रशिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थाओं में सुधार

कोठारी आयोग—अध्यापक शिक्षा, प्रशिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थाओं में सुधार

कोठारी आयोग के अध्यापक शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग (1964–1966) ने भारतीय शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए अध्यापक शिक्षा एवं शिक्षक प्रशिक्षण को विशेष महत्त्व दिया। आयोग का मानना था कि शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षकों को उचित व्यावसायिक प्रशिक्षण देना भी आवश्यक है।

आयोग ने तत्कालीन अध्यापक शिक्षा की स्थिति का अध्ययन किया और पाया कि प्रशिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधियों तथा विद्यालयों के साथ उनके सम्बन्धों में अनेक कमियाँ थीं।

इसलिए आयोग ने अध्यापक शिक्षा के दोषों को दूर करने, शिक्षक प्रशिक्षण को व्यावहारिक बनाने तथा प्रशिक्षण संस्थाओं की गुणवत्ता सुधारने के लिए अनेक सुझाव प्रस्तुत किए।

1. अध्यापक शिक्षा के प्रमुख दोष

कोठारी आयोग ने तत्कालीन अध्यापक शिक्षा व्यवस्था में निम्नलिखित सात प्रमुख दोष बताए—

1. प्रशिक्षण संस्थाओं का निम्न स्तर

अनेक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं की कार्यप्रणाली संतोषजनक नहीं थी। इन संस्थाओं में प्रशिक्षण का स्तर निम्न होने के कारण भावी शिक्षकों को पर्याप्त व्यावसायिक दक्षता प्राप्त नहीं हो पाती थी।

2. योग्य अध्यापकों की कमी

प्रशिक्षण संस्थाओं में योग्य एवं अनुभवी अध्यापकों की कमी थी। इसके कारण प्रशिक्षणार्थियों को उचित मार्गदर्शन और प्रभावी प्रशिक्षण प्राप्त करने में कठिनाई होती थी।

3. पाठ्यक्रम में नवीनता का अभाव

अध्यापक शिक्षा के पाठ्यक्रम में सजीवता, नवीनता तथा वास्तविकता की कमी थी। पाठ्यक्रम विद्यालयों की वास्तविक परिस्थितियों और शिक्षण की व्यावहारिक आवश्यकताओं से पर्याप्त रूप से जुड़ा हुआ नहीं था।

4. शिक्षण-विधियों में नवीनता का अभाव

प्रशिक्षण संस्थाओं में आधुनिक और प्रभावी शिक्षण-विधियों का पर्याप्त प्रयोग नहीं किया जाता था। इससे प्रशिक्षणार्थियों को नई शिक्षण तकनीकों का उचित अनुभव नहीं मिल पाता था।

5. परम्परागत प्रशिक्षण व्यवस्था

शिक्षकों को दिया जाने वाला प्रशिक्षण मुख्यतः परम्परागत पद्धतियों पर आधारित था। इसमें नवीन शिक्षण प्रयोगों तथा व्यावहारिक प्रशिक्षण को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया जाता था।

6. प्राथमिक विद्यालयों की समस्याओं से सम्बन्ध का अभाव

प्राथमिक शिक्षकों को प्रशिक्षण देने वाली संस्थाओं का प्राथमिक विद्यालयों की दैनिक समस्याओं से पर्याप्त सम्बन्ध नहीं था। इसलिए प्रशिक्षणार्थियों को वास्तविक विद्यालयी समस्याओं को समझने और उनका समाधान करने का उचित अवसर नहीं मिलता था।

7. माध्यमिक विद्यालयों की समस्याओं से सम्बन्ध का अभाव

माध्यमिक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाएँ भी माध्यमिक विद्यालयों की दैनिक समस्याओं से पर्याप्त रूप से जुड़ी नहीं थीं। परिणामस्वरूप प्रशिक्षण और वास्तविक शिक्षण परिस्थितियों के बीच दूरी बनी रहती थी।

2. अध्यापक शिक्षा के दोषों को दूर करने के सुझाव

कोठारी आयोग ने अध्यापक शिक्षा की उपर्युक्त कमियों को दूर करने तथा शिक्षक प्रशिक्षण को अधिक प्रभावी और व्यावहारिक बनाने के लिए सात महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए।

1. अध्यापक शिक्षा को उच्च शिक्षा से जोड़ना

अध्यापक शिक्षा को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाए। इससे शिक्षक प्रशिक्षण को उच्च शिक्षा के अनुरूप विकसित करने तथा उसकी शैक्षिक गुणवत्ता बढ़ाने में सहायता मिलेगी।

2. शिक्षा विभागों की स्थापना

अध्यापक शिक्षा के पाठ्यक्रम, अध्ययन और अनुसंधान के विकास के लिए कुछ विशिष्ट संस्थानों में शिक्षा विभाग (School of Education) स्थापित किए जाएँ।

इन विभागों का उद्देश्य अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र में उच्च स्तरीय अध्ययन, पाठ्यक्रम विकास तथा अनुसंधान को प्रोत्साहित करना हो।

3. राज्य शिक्षक शिक्षा बोर्ड की स्थापना

शिक्षकों के प्रशिक्षण तथा उससे सम्बन्धित कार्यक्रमों के संचालन के लिए राज्य शिक्षक शिक्षा बोर्ड (State Board of Teacher Education) की स्थापना की जाए।

इससे राज्य स्तर पर शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को अधिक व्यवस्थित बनाने में सहायता मिलेगी।

4. शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों का नामकरण

शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं को शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय कहा जाए। आयोग ने प्रशिक्षण संस्थाओं को एक व्यवस्थित शैक्षिक स्वरूप प्रदान करने के लिए यह सुझाव दिया।

5. प्रसार सेवा विभाग की स्थापना

प्रशिक्षण संस्थाओं में प्रसार सेवा विभाग (Extension Service Department) स्थापित किए जाएँ।

इन विभागों का कार्य विद्यालयों और उनके अध्यापकों की वास्तविक समस्याओं पर कार्य करना तथा प्रशिक्षण संस्थाओं और विद्यालयों के बीच सम्बन्ध स्थापित करना हो।

6. शिक्षण अभ्यास के लिए मान्यता प्राप्त विद्यालयों का चयन

प्रशिक्षणार्थियों के शिक्षण अभ्यास के लिए केवल मान्यता प्राप्त विद्यालयों का चयन किया जाए।

इससे भावी शिक्षकों को उपयुक्त विद्यालयी वातावरण में शिक्षण कार्य का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो सकेगा।

7. प्रशिक्षण संस्थाओं और विद्यालयों के अध्यापकों का आदान-प्रदान

प्रशिक्षण संस्थाओं तथा उनसे सम्बद्ध शिक्षण अभ्यास विद्यालयों के अध्यापकों को समय-समय पर एक-दूसरे के स्थान पर कार्य करना चाहिए।

इस व्यवस्था से प्रशिक्षण संस्थाओं के अध्यापक वास्तविक विद्यालयी परिस्थितियों को समझ सकेंगे और विद्यालयों के अध्यापकों को प्रशिक्षण सम्बन्धी अनुभव प्राप्त होगा।

3. अध्यापक व्यावसायिक शिक्षा की उन्नति सम्बन्धी सुझाव

व्यावसायिक अध्यापक शिक्षा का उद्देश्य भावी शिक्षकों को शिक्षण कार्य के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल और व्यावहारिक अनुभव प्रदान करना है।

कोठारी आयोग ने अध्यापक शिक्षा को अधिक उपयोगी और प्रभावशाली बनाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए—

1. शिक्षण अभ्यास की गुणवत्ता में सुधार

शिक्षण अभ्यास में गुणात्मक सुधार किया जाए। प्रशिक्षणार्थियों को केवल सैद्धान्तिक ज्ञान देने के बजाय वास्तविक कक्षा में शिक्षण कार्य का प्रभावी अभ्यास कराया जाए।

2. विशिष्ट कार्यक्रमों एवं पाठ्यक्रमों का निर्माण

प्रशिक्षणार्थियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा उपयुक्त पाठ्यचर्या तैयार की जाए, जिससे वे शिक्षण कार्य की आवश्यकताओं के अनुरूप दक्षता प्राप्त कर सकें।

3. विद्यालयी विषयों की गहन समझ

अध्यापक शिक्षा का पाठ्यक्रम इस प्रकार तैयार किया जाए कि छात्राध्यापकों को विद्यालय में पढ़ाए जाने वाले विषयों के उद्देश्यों, जटिलताओं तथा उपयोगिता का उचित ज्ञान प्राप्त हो।

अर्थात भावी शिक्षक केवल विषय की जानकारी ही प्राप्त न करें, बल्कि यह भी समझें कि उस विषय को क्यों और किस प्रकार पढ़ाया जाना चाहिए।

4. एकीकृत पाठ्यक्रमों की व्यवस्था

विश्वविद्यालयों में सामान्य शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा के एकीकृत पाठ्यक्रम प्रारम्भ किए जाएँ।

इससे विद्यार्थियों को विषय सम्बन्धी ज्ञान और व्यावसायिक प्रशिक्षण एक साथ प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।

4. शिक्षक प्रशिक्षण की अवधि सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने शिक्षकों की शैक्षिक योग्यता तथा प्रशिक्षण के स्तर को ध्यान में रखते हुए शिक्षक प्रशिक्षण की अवधि निर्धारित करने के सम्बन्ध में भी सुझाव दिए।

1. प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण की अवधि

जिन प्राथमिक शिक्षकों ने माध्यमिक स्तर की शिक्षा उत्तीर्ण की हो, उनके प्रशिक्षण की अवधि 2 वर्ष रखी जाए।

2. माध्यमिक शिक्षक प्रशिक्षण की अवधि

जिन माध्यमिक शिक्षकों ने स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की हो, उनके प्रशिक्षण की अवधि प्रारम्भ में 1 वर्ष रखी जाए, लेकिन कुछ समय बाद इसे बढ़ाकर 2 वर्ष कर दिया जाए।

3. एम.एड. प्रशिक्षण की अवधि

एम.एड. (M.Ed.) का पाठ्यक्रम केवल उन्हीं संस्थाओं में प्रारम्भ किया जाए जहाँ योग्य प्राध्यापक उपलब्ध हों।

आयोग ने एम.एड. पाठ्यक्रम की अवधि 1 वर्ष 6 महीने रखने का सुझाव दिया।

प्रशिक्षण अवधि का सारांश
प्रशिक्षण प्रस्तावित अवधि
माध्यमिक शिक्षा उत्तीर्ण प्राथमिक शिक्षक 2 वर्ष
स्नातक उत्तीर्ण माध्यमिक शिक्षक प्रारम्भ में 1 वर्ष, बाद में 2 वर्ष
एम.एड. पाठ्यक्रम 1 वर्ष 6 महीने

इन सुझावों का उद्देश्य शिक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण अवधि प्रदान करना तथा उनकी शैक्षिक योग्यता के अनुरूप व्यावसायिक दक्षता विकसित करना था।

5. शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं की उन्नति सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं की गुणवत्ता सुधारने के लिए उनके अध्यापकों की योग्यता, पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधियों, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं तथा अन्य सुविधाओं में सुधार करने पर बल दिया।

इसके लिए आयोग ने निम्नलिखित प्रमुख सुझाव दिए—

1. प्रशिक्षण महाविद्यालयों के अध्यापकों की उच्च योग्यता

प्रशिक्षण महाविद्यालयों के अध्यापकों के पास शिक्षा सम्बन्धी उपाधि के अतिरिक्त दो परास्नातक उपाधियाँ होनी चाहिए।

इसका उद्देश्य प्रशिक्षण संस्थाओं में उच्च शैक्षिक योग्यता वाले अध्यापकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना था।

2. डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त अध्यापकों की नियुक्ति

प्रशिक्षण महाविद्यालयों में डॉक्टरेट (Ph.D.) उपाधि प्राप्त अध्यापकों का उचित अनुपात होना चाहिए।

इससे अध्यापक शिक्षा के अध्ययन और अनुसंधान को प्रोत्साहन मिल सकेगा।

3. प्रयोगात्मक विद्यालय की व्यवस्था

प्रत्येक प्रशिक्षण संस्था में एक प्रयोगात्मक विद्यालय (Experimental School) होना चाहिए।

इस विद्यालय में प्रशिक्षणार्थी शिक्षण-विधियों का अभ्यास कर सकें तथा वास्तविक शिक्षण परिस्थितियों का अनुभव प्राप्त कर सकें।

4. प्रशिक्षणार्थियों से शुल्क न लेना

आयोग ने सुझाव दिया कि प्रशिक्षण संस्थाओं में छात्राध्यापकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाए।

इससे शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त करने के इच्छुक विद्यार्थियों पर आर्थिक भार कम होगा।

5. प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं के अध्यापकों की योग्यता

प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं में अध्यापन करने वाले अध्यापकों की न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निम्नलिखित में से कोई एक होनी चाहिए—

  • परास्नातक उपाधि के साथ बी.एड.
  • स्नातक उपाधि के साथ एम.एड.

इससे प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं में योग्य एवं प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति सुनिश्चित की जा सकेगी।

6. माध्यमिक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं के प्राध्यापकों की योग्यता

माध्यमिक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं के प्राध्यापकों की न्यूनतम शैक्षिक योग्यता परास्नातक उपाधि के साथ एम.एड. होनी चाहिए।

इसके अतिरिक्त पीएच.डी. उपाधि प्राप्त अभ्यर्थियों को नियुक्ति में वरीयता दी जाए।

7. पुस्तकालयों एवं प्रयोगशालाओं में सुधार

शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं के पुस्तकालयों तथा प्रयोगशालाओं की स्थिति में सुधार किया जाए।

इससे प्रशिक्षणार्थियों को अध्ययन, शिक्षण अभ्यास तथा प्रयोगात्मक कार्यों के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध हो सकेंगे।

8. प्रशिक्षण की शिक्षण-विधियों में सुधार

प्रशिक्षण संस्थाओं में मुख्यतः व्याख्यान विधि का प्रयोग किया जाता था। आयोग ने इसके स्थान पर विचार-विमर्श तथा सेमिनार जैसी विधियों को अपनाने का सुझाव दिया।

इससे प्रशिक्षणार्थियों की सक्रिय भागीदारी बढ़ेगी और उन्हें अपने विचार प्रस्तुत करने तथा शिक्षण समस्याओं पर चर्चा करने के अवसर मिलेंगे।

9. योग्य प्रशिक्षणार्थियों को प्रवेश

शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं में केवल स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण योग्य छात्र-छात्राओं को प्रवेश दिया जाए।

इस सुझाव का उद्देश्य शिक्षक प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त शैक्षिक योग्यता वाले विद्यार्थियों का चयन करना था।

10. आवश्यकता के अनुसार प्रशिक्षण महाविद्यालयों की स्थापना

प्रत्येक राज्य में शिक्षकों की वास्तविक माँग के आधार पर प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण तथा माध्यमिक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों की स्थापना की जाए।

इससे प्रशिक्षण संस्थाओं की संख्या को राज्य की शिक्षक सम्बन्धी आवश्यकताओं के अनुरूप व्यवस्थित किया जा सकेगा।

11. अंशकालिक एवं पत्राचार पाठ्यक्रमों का विस्तार

शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए अंशकालिक पाठ्यक्रम (Part-time Courses) तथा पत्राचार पाठ्यक्रम (Correspondence Courses) की सुविधाओं का विस्तार किया जाए।

इससे उन शिक्षकों को भी प्रशिक्षण प्राप्त करने के अवसर मिलेंगे जो नियमित प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में भाग नहीं ले सकते।

कोठारी आयोग के अध्यापक शिक्षा सम्बन्धी सुझावों का महत्त्व

कोठारी आयोग ने अध्यापक शिक्षा में सुधार के लिए प्रशिक्षण की गुणवत्ता, शिक्षकों की योग्यता तथा प्रशिक्षण संस्थाओं की कार्यप्रणाली को महत्त्वपूर्ण माना।

आयोग ने इस बात पर विशेष बल दिया कि शिक्षक प्रशिक्षण केवल सैद्धान्तिक ज्ञान तक सीमित न रहे, बल्कि उसे विद्यालयों की वास्तविक परिस्थितियों, शिक्षण अभ्यास तथा आधुनिक शिक्षण-विधियों से जोड़ा जाए।

इसके साथ ही प्रशिक्षण संस्थाओं में योग्य अध्यापकों की नियुक्ति, प्रयोगात्मक विद्यालयों की व्यवस्था, पुस्तकालयों और प्रयोगशालाओं का विकास तथा उच्च शिक्षा के साथ अध्यापक शिक्षा का समन्वय स्थापित करने पर भी बल दिया गया।

इस प्रकार कोठारी आयोग ने अध्यापक शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, व्यवस्थित, गुणवत्तापूर्ण तथा व्यावसायिक बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कोठारी आयोग ने शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए अध्यापक शिक्षा एवं शिक्षक प्रशिक्षण को विशेष महत्त्व दिया।
  • आयोग ने अध्यापक शिक्षा के प्रमुख दोषों में प्रशिक्षण का निम्न स्तर, योग्य अध्यापकों की कमी, पाठ्यक्रम और शिक्षण-विधियों में नवीनता का अभाव तथा परम्परागत प्रशिक्षण व्यवस्था को शामिल किया।
  • प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं का विद्यालयों की वास्तविक समस्याओं से पर्याप्त सम्बन्ध न होना भी एक महत्त्वपूर्ण दोष था।
  • आयोग ने अध्यापक शिक्षा को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में शामिल करने तथा विशिष्ट संस्थानों में School of Education स्थापित करने का सुझाव दिया।
  • शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए राज्य शिक्षक शिक्षा बोर्ड तथा विद्यालयों की समस्याओं के समाधान हेतु प्रसार सेवा विभाग की स्थापना की सिफारिश की गई।
  • शिक्षण अभ्यास के लिए मान्यता प्राप्त विद्यालयों का चयन तथा प्रशिक्षण संस्थाओं और विद्यालयों के अध्यापकों का समय-समय पर आदान-प्रदान करने का सुझाव दिया गया।
  • अध्यापक व्यावसायिक शिक्षा में सुधार के लिए शिक्षण अभ्यास की गुणवत्ता, विशिष्ट प्रशिक्षण कार्यक्रम, विषयों की गहन समझ तथा सामान्य एवं व्यावसायिक शिक्षा के एकीकृत पाठ्यक्रमों पर बल दिया गया।
  • माध्यमिक शिक्षा उत्तीर्ण प्राथमिक शिक्षकों के प्रशिक्षण की अवधि 2 वर्ष रखने का सुझाव दिया गया।
  • स्नातक उत्तीर्ण माध्यमिक शिक्षकों का प्रशिक्षण प्रारम्भ में 1 वर्ष तथा बाद में 2 वर्ष करने की सिफारिश की गई।
  • योग्य प्राध्यापकों वाली संस्थाओं में एम.एड. की अवधि 1 वर्ष 6 महीने रखने का सुझाव दिया गया।
  • प्रशिक्षण महाविद्यालयों में उच्च शैक्षिक योग्यता वाले अध्यापक तथा उचित अनुपात में डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त अध्यापक होने चाहिए।
  • प्राथमिक प्रशिक्षण संस्थाओं के अध्यापकों के लिए परास्नातक + बी.एड. अथवा स्नातक + एम.एड. की योग्यता का सुझाव दिया गया।
  • माध्यमिक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं के प्राध्यापकों के लिए परास्नातक + एम.एड. तथा पीएच.डी. उपाधि वालों को वरीयता देने की सिफारिश की गई।
  • प्रशिक्षण संस्थाओं में प्रयोगात्मक विद्यालय की व्यवस्था, छात्राध्यापकों से शुल्क न लेने तथा पुस्तकालयों एवं प्रयोगशालाओं में सुधार पर बल दिया गया।
  • व्याख्यान विधि के स्थान पर विचार-विमर्श और सेमिनार जैसी शिक्षण-विधियों को अपनाने का सुझाव दिया गया।
  • प्रशिक्षण संस्थाओं में स्नातक उत्तीर्ण योग्य विद्यार्थियों को प्रवेश देने तथा प्रत्येक राज्य में शिक्षकों की माँग के अनुसार प्रशिक्षण महाविद्यालय स्थापित करने की सिफारिश की गई।
  • शिक्षकों के प्रशिक्षण हेतु अंशकालिक एवं पत्राचार पाठ्यक्रमों की सुविधाओं का विस्तार करने पर बल दिया गया।
Topic 6 कोठारी आयोग—विद्यालयी शिक्षा, पाठ्यचर्या, शिक्षण-विधि, पाठ्यपुस्तक, निर्देशन एवं मूल्यांकन

कोठारी आयोग—विद्यालयी शिक्षा, पाठ्यचर्या, शिक्षण-विधि, पाठ्यपुस्तक, निर्देशन एवं मूल्यांकन

कोठारी आयोग के विद्यालयी शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग (1964–1966) ने भारतीय विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। आयोग का मानना था कि विद्यालयी शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रशासन, पाठ्यचर्या, शिक्षण-विधियों, पाठ्यपुस्तकों तथा मूल्यांकन व्यवस्था में भी सुधार आवश्यक है।

आयोग ने विद्यालयों के उचित प्रबन्ध, विभिन्न स्तरों पर उपयोगी पाठ्यक्रम, आधुनिक शिक्षण-विधियों तथा विद्यार्थियों की रुचि और योग्यता के अनुसार निर्देशन एवं परामर्श की व्यवस्था पर विशेष बल दिया।

1. विद्यालयी शिक्षा के प्रशासन सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने विद्यालयों के प्रशासन और निरीक्षण को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए केन्द्र, राज्य तथा जिला स्तर पर शिक्षा सम्बन्धी संस्थाओं की स्थापना का सुझाव दिया।

प्रमुख सुझाव
  • राष्ट्रीय विद्यालय शिक्षा बोर्ड— केन्द्र स्तर पर राष्ट्रीय विद्यालय शिक्षा बोर्ड की स्थापना की जाए, जो विद्यालयी शिक्षा से सम्बन्धित व्यवस्थाओं को उचित दिशा प्रदान करे।
  • भारतीय शिक्षा सेवा— केन्द्र स्तर पर भारतीय शिक्षा सेवा की स्थापना की जाए, जिससे शिक्षा प्रशासन के लिए योग्य व्यक्तियों की सेवाएँ प्राप्त की जा सकें।
  • राज्य विद्यालय शिक्षा बोर्ड— प्रत्येक राज्य में राज्य विद्यालय शिक्षा बोर्ड तथा राज्य शिक्षा सेवा की स्थापना की जाए।
  • विद्यालयों का नियमित निरीक्षण— जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा विद्यालयों का नियमित निरीक्षण किया जाए, जिससे उनकी कार्यप्रणाली और शैक्षिक स्थिति की जानकारी प्राप्त हो सके।
  • जिला स्तर पर प्रशासन— विद्यालयों के प्रशासन तथा निरीक्षण का कार्य जिला विद्यालय बोर्ड और जिला शिक्षा अधिकारी के हाथों में होना चाहिए।

इन सुझावों का उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा में प्रशासनिक उत्तरदायित्व, नियमित निरीक्षण तथा प्रभावी प्रबन्ध स्थापित करना था।

2. पाठ्यचर्या सम्बन्धी सामान्य सुझाव

पाठ्यचर्या से आशय विद्यालय में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए निर्धारित विषयों, शिक्षण-अनुभवों तथा शैक्षिक गतिविधियों से है।

कोठारी आयोग ने पाठ्यचर्या को विद्यार्थियों की आवश्यकताओं, राष्ट्रीय उद्देश्यों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाने पर बल दिया।

प्रमुख सुझाव
  • सिद्धान्तों पर आधारित पाठ्यचर्या— पाठ्यचर्या का निर्माण उचित शैक्षिक सिद्धान्तों के आधार पर किया जाए।
  • प्राथमिक स्तर पर समान पाठ्यचर्या— पूरे देश में प्राथमिक शिक्षा के लिए समान पाठ्यचर्या की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • माध्यमिक स्तर पर आधारभूत पाठ्यचर्या— माध्यमिक शिक्षा में पूरे देश के लिए एक आधारभूत पाठ्यचर्या (Core Curriculum) निर्धारित की जाए।
  • स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार व्यावसायिक पाठ्यचर्या— माध्यमिक स्तर पर आधारभूत पाठ्यचर्या के साथ स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार व्यावसायिक पाठ्यचर्या की व्यवस्था की जाए।

इस प्रकार आयोग ने पाठ्यचर्या में राष्ट्रीय एकरूपता और स्थानीय आवश्यकताओं के बीच उचित समन्वय स्थापित करने का सुझाव दिया।

3. विभिन्न स्तरों पर पाठ्यचर्या सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने विद्यार्थियों की आयु, शैक्षिक स्तर तथा विकास की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक अलग-अलग विषयों की व्यवस्था का सुझाव दिया।

1. प्राथमिक शिक्षा की पाठ्यचर्या

आयोग ने प्राथमिक स्तर पर बच्चों को भाषा, गणित तथा पर्यावरण सम्बन्धी प्रारम्भिक ज्ञान देने के साथ उनके शारीरिक, सामाजिक और रचनात्मक विकास पर बल दिया।

प्राथमिक शिक्षा की पाठ्यचर्या में निम्नलिखित विषय शामिल करने का सुझाव दिया गया—

  • मातृभाषा अथवा क्षेत्रीय भाषा— भाषा सम्बन्धी ज्ञान एवं अभिव्यक्ति का विकास।
  • गणित— संख्याओं तथा प्रारम्भिक गणितीय अवधारणाओं का ज्ञान।
  • पर्यावरण का अध्ययन— आसपास के प्राकृतिक एवं सामाजिक वातावरण का ज्ञान।
  • सृजनात्मक क्रियाएँ— बच्चों की रचनात्मक क्षमताओं का विकास।
  • कार्यानुभव— कार्य करके सीखने के अवसर प्रदान करना।
  • समाज सेवा— सहयोग एवं सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना।
  • स्वास्थ्य शिक्षा— स्वास्थ्य, स्वच्छता और अच्छी आदतों का विकास।

इस पाठ्यचर्या का मुख्य उद्देश्य बच्चों को प्रारम्भिक ज्ञान देने के साथ उनके सर्वांगीण विकास की आधारशिला तैयार करना था।

2. निम्न माध्यमिक शिक्षा की पाठ्यचर्या

निम्न माध्यमिक स्तर पर आयोग ने भाषाओं के साथ गणित, विज्ञान, सामाजिक विषयों तथा व्यावहारिक गतिविधियों को महत्त्व दिया।

इस स्तर की पाठ्यचर्या में निम्नलिखित विषयों को शामिल करने का सुझाव दिया गया—

  • मातृभाषा अथवा क्षेत्रीय भाषा तथा हिन्दी या अंग्रेजी।
  • गणित।
  • विज्ञान।
  • सामाजिक विषय।
  • कला।
  • कार्यानुभव।
  • शारीरिक शिक्षा।
  • नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा।

इस स्तर पर विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण, कार्यकुशलता तथा नैतिक मूल्यों के विकास पर बल दिया गया।

3. माध्यमिक शिक्षा की पाठ्यचर्या

कोठारी आयोग ने माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों को भाषाओं, विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान तथा अन्य उपयोगी विषयों का ज्ञान देने की सिफारिश की।

माध्यमिक शिक्षा की पाठ्यचर्या में निम्नलिखित विषयों की व्यवस्था का सुझाव दिया गया—

  • मातृभाषा अथवा क्षेत्रीय भाषा।
  • हिन्दी अथवा संघीय भाषा।
  • कोई एक यूरोपीय भाषा अथवा शास्त्रीय भाषा।
  • गणित।
  • सामान्य विज्ञान।
  • सामाजिक विज्ञान।
  • कला।
  • कार्यानुभव।
  • शारीरिक शिक्षा।
  • नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा।

इस प्रकार माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों को विभिन्न विषयों का व्यापक ज्ञान देने के साथ उनकी शारीरिक, सामाजिक तथा नैतिक क्षमताओं के विकास पर बल दिया गया।

4. उच्चतर माध्यमिक शिक्षा की पाठ्यचर्या

उच्चतर माध्यमिक स्तर पर आयोग ने विद्यार्थियों को उनकी रुचि और भविष्य की शिक्षा के अनुसार विषयों का चयन करने के अवसर देने का सुझाव दिया।

इस स्तर पर दो भाषाओं के अध्ययन की व्यवस्था का सुझाव दिया गया, जिनमें आधुनिक भारतीय अथवा विदेशी भाषा और शास्त्रीय भाषा का विकल्प शामिल था।

इसके अतिरिक्त निम्नलिखित विषयों में से किन्हीं तीन विषयों का चयन करने की व्यवस्था सुझाई गई—

  • कोई तीसरी भाषा।
  • इतिहास।
  • भूगोल।
  • अर्थशास्त्र।
  • तर्कशास्त्र।
  • मनोविज्ञान।
  • समाजशास्त्र।
  • कला।
  • भौतिक शास्त्र।
  • रसायन शास्त्र।
  • गणित।
  • जीव-विज्ञान।
  • भूगर्भ शास्त्र।
  • गृहविज्ञान।

इस व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों को उनकी रुचि, योग्यता तथा उच्च शिक्षा की आवश्यकताओं के अनुसार विषय चुनने का अवसर प्रदान करना था।

4. त्रिभाषा सूत्र में संशोधन सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने भाषा शिक्षा को महत्त्व देते हुए त्रिभाषा सूत्र में संशोधन का सुझाव दिया।

त्रिभाषा सूत्र का उद्देश्य विद्यार्थियों को मातृभाषा के साथ अन्य भारतीय अथवा विदेशी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करने के अवसर देना था।

संशोधित त्रिभाषा सूत्र

आयोग ने निम्नलिखित तीन भाषाओं के अध्ययन की व्यवस्था का सुझाव दिया—

  • प्रथम भाषा—मातृभाषा: मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा अथवा प्रादेशिक भाषा।
  • द्वितीय भाषा—हिन्दी अथवा अंग्रेजी: हिन्दी या अंग्रेजी का अध्ययन।
  • तृतीय भाषा—अन्य भाषा: कोई आधुनिक भारतीय भाषा, यूरोपीय भाषा अथवा शास्त्रीय भाषा, जिसका चयन पहली दो भाषाओं में न किया गया हो।

इस प्रकार आयोग ने भाषा शिक्षा में मातृभाषा को महत्त्व देते हुए विद्यार्थियों को अन्य भाषाओं का अध्ययन करने के अवसर प्रदान करने की सिफारिश की।

5. शिक्षण-विधियों सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने परम्परागत शिक्षण-विधियों में सुधार करके शिक्षण को अधिक क्रियाप्रधान, रोचक तथा विद्यार्थी-केंद्रित बनाने पर बल दिया।

आयोग के अनुसार प्रभावी शिक्षण के लिए केवल व्याख्यान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेने के अवसर भी मिलने चाहिए।

प्रमुख सुझाव
  • लचीली एवं गतिशील शिक्षण-विधियाँ— शिक्षण-विधियाँ ऐसी हों जिन्हें विद्यार्थियों की आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सके।
  • क्रियाप्रधान एवं रोचक शिक्षण— शिक्षण-विधियाँ गतिविधियों पर आधारित तथा विद्यार्थियों की रुचि बढ़ाने वाली होनी चाहिए।
  • नवीन विधियों का प्रसार— नई शिक्षण-विधियों को प्रोत्साहित करने के लिए सेमिनार, कार्यशालाएँ, प्रदर्शनियाँ तथा परीक्षण आयोजित किए जाएँ।
  • शिक्षकों को प्रोत्साहन— शिक्षकों को नई-नई शिक्षण-विधियों का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
  • सहायक शिक्षण सामग्री— विद्यालयों में शिक्षण के लिए आवश्यक सहायक सामग्री उपलब्ध कराई जाए।

इन सुझावों का उद्देश्य शिक्षण को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रखकर अनुभव, गतिविधि तथा सक्रिय सहभागिता से जोड़ना था।

6. पाठ्यपुस्तकों सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए अच्छी पाठ्यपुस्तकों को अत्यन्त आवश्यक माना।

आयोग के अनुसार पाठ्यपुस्तकें उचित शैक्षिक सिद्धान्तों पर आधारित होनी चाहिए तथा उनके निर्माण, परीक्षण एवं मूल्यांकन की व्यवस्थित व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रमुख सुझाव
  • राष्ट्रीय स्तर पर योजना— पाठ्यपुस्तकों के निर्माण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक योजना तैयार की जाए।
  • NCERT के सिद्धान्तों का पालन— राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा निर्धारित सिद्धान्तों के अनुसार पाठ्यपुस्तकें तैयार की जाएँ।
  • लेखकों को उचित पारिश्रमिक— पाठ्यपुस्तकों के लेखकों को पर्याप्त पारिश्रमिक देने की व्यवस्था की जाए, जिससे अच्छी पुस्तकों के निर्माण को प्रोत्साहन मिले।
  • राज्य शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी— पाठ्यपुस्तकों के निर्माण, परीक्षण तथा मूल्यांकन का दायित्व राज्य के शिक्षा विभाग को दिया जाए।
  • विशेष समिति का गठन— पाठ्यपुस्तकों के निर्माण के लिए एक विशेष समिति गठित की जाए।
  • पाठ्यपुस्तकों की बिक्री— शिक्षा विभाग पाठ्यपुस्तकों की बिक्री स्वयं न करे, बल्कि यह कार्य विद्यालयों के सहकारी भण्डारों को सौंप दिया जाए।

इन सुझावों का उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकों का निर्माण, उचित परीक्षण तथा विद्यार्थियों तक पुस्तकों की व्यवस्थित उपलब्धता सुनिश्चित करना था।

7. निर्देशन एवं परामर्श सम्बन्धी सुझाव

शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance) का अर्थ है विद्यार्थियों को उनकी शिक्षा, विषय-चयन तथा अध्ययन सम्बन्धी निर्णयों में उचित मार्गदर्शन प्रदान करना।

शैक्षिक परामर्श (Educational Counselling) के माध्यम से विद्यार्थियों की रुचि, योग्यता तथा समस्याओं को समझकर उन्हें उचित सलाह दी जाती है।

कोठारी आयोग ने विद्यार्थियों के उचित शैक्षिक विकास के लिए विद्यालयों में निर्देशन एवं परामर्श की व्यवस्था करने पर बल दिया।

प्रमुख सुझाव
  • प्राथमिक स्तर से निर्देशन— विद्यार्थियों को प्राथमिक कक्षाओं से ही आवश्यक शैक्षिक निर्देशन प्रदान किया जाए।
  • शिक्षकों को प्रशिक्षण— शिक्षक प्रशिक्षण के दौरान अध्यापकों को निर्देशन सम्बन्धी आवश्यक ज्ञान दिया जाए।
  • विषय चयन में सहायता— विद्यार्थियों को विषयों का उचित चुनाव करने के लिए परामर्श प्रदान किया जाए।
  • रुचि एवं योग्यता के अनुसार मार्गदर्शन— विद्यार्थियों की व्यक्तिगत रुचि और योग्यता के आधार पर निर्देशन तथा परामर्श दिया जाए।
  • जिला स्तर पर व्यवस्था— प्रत्येक जिले के कम से कम एक विद्यालय में शैक्षिक निर्देशन एवं परामर्श की व्यवस्था की जाए।
  • पिछड़े एवं प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की पहचान— शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से पिछड़े और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की पहचान की जाए, जिससे उन्हें उचित शैक्षिक सहायता मिल सके।
  • माध्यमिक विद्यालयों में निर्देशन कार्यक्रम— माध्यमिक विद्यालयों के लिए न्यूनतम शैक्षिक निर्देशन कार्यक्रम तैयार किया जाए।
  • परामर्शदाता की नियुक्ति— प्रत्येक 10 माध्यमिक विद्यालयों पर एक परामर्शदाता की नियुक्ति की जाए।

इन सुझावों का उद्देश्य विद्यार्थियों को उनकी क्षमताओं के अनुरूप शिक्षा प्राप्त करने में सहायता देना तथा विषय चयन एवं अध्ययन सम्बन्धी समस्याओं का समाधान करना था।

8. मूल्यांकन सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने विद्यार्थियों की उपलब्धियों का सही आकलन करने के लिए परीक्षा एवं मूल्यांकन प्रणाली में सुधार करने पर विशेष बल दिया।

आयोग का विचार था कि मूल्यांकन केवल लिखित परीक्षा में प्राप्त अंकों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों की विभिन्न शैक्षिक क्षमताओं का भी आकलन किया जाना चाहिए।

प्रमुख सुझाव
1. प्राथमिक स्तर पर आन्तरिक मूल्यांकन

कक्षा 1 से 4 तक विद्यार्थियों का आन्तरिक मूल्यांकन (Internal Evaluation) किया जाए।

आन्तरिक मूल्यांकन का अर्थ है विद्यालय और शिक्षक द्वारा विद्यार्थियों की शैक्षिक प्रगति का मूल्यांकन करना।

2. प्राथमिक शिक्षा के बाद बाह्य परीक्षा

प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होने के बाद जिला स्तर पर बाह्य परीक्षा की व्यवस्था की जाए।

बाह्य परीक्षा से आशय विद्यालय से बाहर निर्धारित परीक्षा व्यवस्था के माध्यम से विद्यार्थियों का मूल्यांकन करना है।

3. लिखित परीक्षाओं में सुधार

लिखित परीक्षाओं की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए आवश्यक सुधार किए जाएँ, ताकि विद्यार्थियों की वास्तविक शैक्षिक उपलब्धियों का उचित आकलन हो सके।

4. वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय एवं व्यावहारिक परीक्षा

लिखित परीक्षाओं को वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय तथा व्यावहारिक बनाया जाए।

  • वस्तुनिष्ठ— मूल्यांकन व्यक्तिगत पक्षपात से मुक्त हो।
  • विश्वसनीय— मूल्यांकन के परिणाम भरोसेमंद हों।
  • व्यावहारिक— परीक्षा विद्यार्थियों की वास्तविक क्षमताओं का उचित आकलन कर सके।
5. मौखिक एवं निदानात्मक परीक्षाओं की व्यवस्था

माध्यमिक स्तर पर लिखित परीक्षाओं के साथ मौखिक तथा निदानात्मक परीक्षाओं का भी आयोजन किया जाए।

निदानात्मक परीक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों की सीखने सम्बन्धी कठिनाइयों और कमियों की पहचान करना है।

6. बाह्य परीक्षाओं में वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बाह्य परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों में वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को भी शामिल किया जाए, जिससे मूल्यांकन को अधिक निष्पक्ष बनाया जा सके।

7. व्यापक आन्तरिक मूल्यांकन

आन्तरिक मूल्यांकन को इतना व्यापक बनाया जाए कि उसकी सहायता से विद्यार्थियों के सभी महत्त्वपूर्ण पक्षों का मूल्यांकन किया जा सके।

8. श्रेणी के स्थान पर ग्रेड प्रणाली

बाह्य परीक्षाओं में श्रेणी (Division) के स्थान पर ग्रेड प्रणाली (Grading System) का प्रयोग किया जाए।

9. आन्तरिक एवं बाह्य अंकों का पृथक प्रदर्शन

विद्यार्थियों के आन्तरिक तथा बाह्य परीक्षाओं में प्राप्त अंकों को अलग-अलग प्रदर्शित किया जाए।

इससे विद्यार्थी की विद्यालयी प्रगति और बाह्य परीक्षा की उपलब्धि का पृथक रूप से आकलन किया जा सकेगा।

कोठारी आयोग के विद्यालयी शिक्षा सम्बन्धी सुझावों का महत्त्व

कोठारी आयोग ने विद्यालयी शिक्षा के विभिन्न पक्षों में सुधार करके उसे अधिक प्रभावी, व्यवस्थित तथा उपयोगी बनाने का प्रयास किया।

आयोग ने विद्यालयों के प्रशासन और निरीक्षण में सुधार के साथ पाठ्यचर्या में राष्ट्रीय एकरूपता तथा स्थानीय आवश्यकताओं को महत्त्व दिया।

इसके अतिरिक्त शिक्षण-विधियों को क्रियाप्रधान बनाने, गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकों के निर्माण, विद्यार्थियों की रुचि एवं योग्यता के अनुसार निर्देशन तथा परीक्षा प्रणाली में सुधार पर विशेष बल दिया गया।

इस प्रकार कोठारी आयोग की विद्यालयी शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशों का प्रमुख उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता, विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया की प्रभावशीलता बढ़ाना था।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कोठारी आयोग ने विद्यालयी शिक्षा के प्रशासन, पाठ्यचर्या, शिक्षण-विधियों, पाठ्यपुस्तकों, निर्देशन तथा मूल्यांकन में सुधार के सुझाव दिए।
  • केन्द्र में राष्ट्रीय विद्यालय शिक्षा बोर्ड और भारतीय शिक्षा सेवा तथा राज्यों में राज्य विद्यालय शिक्षा बोर्ड और राज्य शिक्षा सेवा की स्थापना की सिफारिश की गई।
  • विद्यालयों के नियमित निरीक्षण तथा जिला विद्यालय बोर्ड और जिला शिक्षा अधिकारी के माध्यम से प्रशासन की व्यवस्था करने पर बल दिया गया।
  • प्राथमिक स्तर पर पूरे देश के लिए समान पाठ्यचर्या तथा माध्यमिक स्तर पर आधारभूत पाठ्यचर्या (Core Curriculum) का सुझाव दिया गया।
  • माध्यमिक स्तर पर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार व्यावसायिक पाठ्यचर्या की व्यवस्था करने की सिफारिश की गई।
  • प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा, गणित, पर्यावरण अध्ययन, सृजनात्मक क्रियाएँ, कार्यानुभव, समाज सेवा और स्वास्थ्य शिक्षा को स्थान दिया गया।
  • निम्न माध्यमिक और माध्यमिक स्तर पर भाषाओं, गणित, विज्ञान, सामाजिक विषयों, कला, कार्यानुभव, शारीरिक तथा नैतिक शिक्षा पर बल दिया गया।
  • उच्चतर माध्यमिक स्तर पर दो भाषाओं तथा निर्धारित विषयों में से तीन विषयों के चयन की व्यवस्था का सुझाव दिया गया।
  • संशोधित त्रिभाषा सूत्र में मातृभाषा, हिन्दी अथवा अंग्रेजी तथा एक अन्य आधुनिक भारतीय, यूरोपीय या शास्त्रीय भाषा का अध्ययन प्रस्तावित किया गया।
  • शिक्षण-विधियों को लचीला, गतिशील, क्रियाप्रधान तथा रोचक बनाने और शिक्षकों को नवीन विधियों के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करने की सिफारिश की गई।
  • पाठ्यपुस्तकों के निर्माण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजना, NCERT के सिद्धान्तों का पालन तथा राज्य शिक्षा विभाग द्वारा परीक्षण और मूल्यांकन की व्यवस्था का सुझाव दिया गया।
  • विद्यार्थियों को प्राथमिक स्तर से निर्देशन प्रदान करने तथा उनकी रुचि, योग्यता और विषय चयन के अनुसार परामर्श देने पर बल दिया गया।
  • आयोग ने प्रत्येक 10 माध्यमिक विद्यालयों पर एक परामर्शदाता नियुक्त करने का सुझाव दिया।
  • कक्षा 1 से 4 तक आन्तरिक मूल्यांकन तथा प्राथमिक शिक्षा की समाप्ति के बाद जिला स्तर पर बाह्य परीक्षा की सिफारिश की गई।
  • लिखित परीक्षाओं को वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय तथा व्यावहारिक बनाने के साथ माध्यमिक स्तर पर मौखिक और निदानात्मक परीक्षाओं की व्यवस्था करने पर बल दिया गया।
  • बाह्य परीक्षाओं में श्रेणी के स्थान पर ग्रेड प्रणाली तथा आन्तरिक और बाह्य परीक्षाओं के अंक अलग-अलग दिखाने का सुझाव दिया गया।
Topic 7 कोठारी आयोग—शिक्षा का प्रसार एवं शैक्षिक अवसरों की समानता

कोठारी आयोग—शिक्षा का प्रसार एवं शैक्षिक अवसरों की समानता

कोठारी आयोग के शिक्षा के प्रसार सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग (1964–1966) ने भारतीय शिक्षा के विकास के लिए शिक्षा के प्रसार तथा शैक्षिक अवसरों की समानता को विशेष महत्त्व दिया।

आयोग का मानना था कि शिक्षा का लाभ केवल कुछ वर्गों या क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। देश के अधिक से अधिक बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध कराने के लिए विद्यालयों का विस्तार, निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था तथा आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों की सहायता आवश्यक है।

इसी उद्देश्य से आयोग ने पूर्व-प्राथमिक, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के प्रसार के साथ सभी विद्यार्थियों को समान शैक्षिक अवसर प्रदान करने के लिए अनेक सुझाव दिए।

1. पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के प्रसार सम्बन्धी सुझाव

पूर्व-प्राथमिक शिक्षा बच्चों की औपचारिक विद्यालयी शिक्षा से पहले की शिक्षा है। इस स्तर पर बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के साथ उन्हें विद्यालयी वातावरण के लिए तैयार किया जाता है।

कोठारी आयोग ने पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए—

1. राज्य स्तर पर शिक्षा केन्द्रों की स्थापना

प्रत्येक राज्य के राज्य शिक्षा संस्थान में पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के लिए राज्य स्तर पर शिक्षा केन्द्र स्थापित किए जाएँ।

इसका उद्देश्य पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए आवश्यक व्यवस्था तैयार करना था।

2. अधिक पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों की व्यवस्था

अधिक से अधिक प्राथमिक विद्यालयों में पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था की जाए, जिससे छोटे बच्चों को औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ करने से पहले आवश्यक प्रारम्भिक शिक्षा मिल सके।

3. निजी संस्थाओं को आर्थिक सहायता

पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना के लिए व्यक्तिगत एवं गैर-सरकारी संस्थाओं को अनुदान प्रदान किया जाए।

इससे पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के विस्तार में सरकारी प्रयासों के साथ अन्य संस्थाओं का सहयोग भी प्राप्त हो सकेगा।

4. शारीरिक गतिविधियों को स्थान

पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों में विभिन्न प्रकार की शारीरिक क्रियाओं को स्थान दिया जाए, जिससे बच्चों का शारीरिक विकास हो और वे सक्रिय रूप से सीखने में भाग ले सकें।

2. प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण सम्बन्धी सुझाव

प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण का अर्थ है सभी बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित करना, उन्हें विद्यालय में प्रवेश दिलाना तथा शिक्षा पूरी करने के अवसर प्रदान करना।

कोठारी आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के विस्तार को राष्ट्रीय आवश्यकता मानते हुए निम्नलिखित सुझाव दिए।

1. सभी बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा

देश के सभी बच्चों के लिए 5 वर्ष की प्राथमिक शिक्षा की उत्तम व्यवस्था की जाए।

इसका उद्देश्य प्रत्येक बच्चे को प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध कराना था।

2. निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का लक्ष्य

आयोग ने सुझाव दिया कि सन् 1985–86 तक 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाए।

निःशुल्क शिक्षा का अर्थ है शिक्षा प्राप्त करने के लिए शुल्क न देना, जबकि अनिवार्य शिक्षा का उद्देश्य निर्धारित आयु वर्ग के सभी बच्चों को विद्यालयी शिक्षा उपलब्ध कराना है।

ध्यान दें: वर्ष 1985–86 आयोग द्वारा प्रस्तावित लक्ष्य की समय-सीमा थी।

3. शैक्षिक अपव्यय एवं अवरोधन की रोकथाम

प्राथमिक शिक्षा में अपव्यय तथा अवरोधन को कम करने के प्रयास किए जाएँ।

  • अपव्यय— विद्यार्थी द्वारा शिक्षा पूरी किए बिना विद्यालय छोड़ देना।
  • अवरोधन— विद्यार्थी का एक ही कक्षा में बार-बार रुकना या अनुत्तीर्ण होना।

इन समस्याओं को कम करके अधिक से अधिक बच्चों को अपनी शिक्षा पूरी करने के अवसर दिए जा सकते हैं।

4. हस्तकौशल का विकास

जो विद्यार्थी प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे अध्ययन नहीं करना चाहते, उन्हें प्राथमिक स्तर पर ही हस्तकौशल में निपुण बनाने की व्यवस्था की जाए।

इसका उद्देश्य ऐसे विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ उपयोगी व्यावहारिक कौशल प्रदान करना था।

3. प्राथमिक विद्यालयों की उपलब्धता सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने शिक्षा के प्रसार के लिए विद्यालयों को बच्चों के निवास स्थान के निकट उपलब्ध कराने पर बल दिया।

प्रमुख सुझाव
  • प्राथमिक विद्यालय की दूरी— सभी बच्चों के लिए लगभग 1 किलोमीटर की दूरी के भीतर प्राथमिक विद्यालय उपलब्ध हो।
  • उच्च प्राथमिक विद्यालय की दूरी— सभी बच्चों के लिए लगभग 3 किलोमीटर की दूरी के भीतर उच्च प्राथमिक विद्यालय उपलब्ध हो।

इन सुझावों का उद्देश्य विद्यालयों की दूरी के कारण बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने में होने वाली कठिनाइयों को कम करना था।

4. विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा

कोठारी आयोग ने शिक्षा का प्रसार करते समय उन बच्चों की आवश्यकताओं पर भी ध्यान दिया जो शारीरिक अथवा अन्य कठिनाइयों के कारण सामान्य विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने में समस्याओं का सामना करते थे।

आयोग ने सुझाव दिया कि शैक्षिक रूप से पिछड़े तथा विकलांग बच्चों के लिए विशेष विद्यालय खोले जाएँ।

इसका उद्देश्य ऐसे बच्चों को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करना था।

5. माध्यमिक शिक्षा के प्रसार सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के साथ माध्यमिक शिक्षा के विकास को भी आवश्यक माना। आयोग के अनुसार माध्यमिक शिक्षा का विस्तार विद्यार्थियों की संख्या, अध्यापकों की उपलब्धता तथा स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

1. माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना

आवश्यकता के अनुसार शीघ्र ही नए माध्यमिक विद्यालय खोले जाएँ, जिससे अधिक विद्यार्थियों को प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे पढ़ने के अवसर मिल सकें।

2. माध्यमिक शिक्षा के प्रसार की योजना

माध्यमिक शिक्षा के विकास और विस्तार के लिए उचित शैक्षिक योजना तैयार की जाए।

इससे विद्यालयों की स्थापना और शैक्षिक सुविधाओं का विकास आवश्यकताओं के अनुसार किया जा सकेगा।

3. अपव्यय एवं अवरोधन को रोकना

माध्यमिक स्तर पर भी विद्यार्थियों द्वारा पढ़ाई बीच में छोड़ने तथा एक ही कक्षा में बार-बार रुकने जैसी समस्याओं को रोकने के प्रयास किए जाएँ।

4. विद्यार्थियों की संख्या का निर्धारण

माध्यमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या अध्यापकों की उपलब्धता के आधार पर निर्धारित की जाए।

इसका उद्देश्य उपलब्ध शिक्षकों और विद्यार्थियों की संख्या के बीच उचित संतुलन बनाए रखना था।

5. माध्यमिक शिक्षा की समान उपलब्धता

माध्यमिक शिक्षा सभी बच्चों के लिए समान रूप से उपलब्ध कराई जाए, जिससे किसी बच्चे को केवल अवसरों की कमी के कारण आगे की पढ़ाई से वंचित न होना पड़े।

6. बालिकाओं की शिक्षा के प्रसार सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने बालिकाओं की शिक्षा का विस्तार करने पर भी विशेष बल दिया।

1. बालिकाओं के लिए अलग विद्यालय

बालिकाओं के लिए अलग से माध्यमिक विद्यालय खोले जाएँ, जिससे उन्हें शिक्षा प्राप्त करने की सुविधाएँ उपलब्ध हो सकें।

2. निःशुल्क माध्यमिक शिक्षा

बालिकाओं के लिए माध्यमिक शिक्षा निःशुल्क करने का सुझाव दिया गया।

3. छात्रवृत्तियों की व्यवस्था

बालिकाओं को माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रवृत्तियाँ प्रदान की जाएँ, ताकि आर्थिक कठिनाइयों के कारण उनकी पढ़ाई बाधित न हो।

4. बालिका शिक्षा के विस्तार का दीर्घकालीन लक्ष्य

आयोग ने आगामी 20 वर्षों में बालिकाओं की शिक्षा का व्यापक विस्तार करने के लिए ठोस कदम उठाने का सुझाव दिया।

इन सिफारिशों का उद्देश्य बालिकाओं को अधिक शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराना तथा उनकी शिक्षा के प्रसार को गति देना था।

7. शैक्षिक अवसरों की समानता

शैक्षिक अवसरों की समानता (Equality of Educational Opportunities) का अर्थ है कि प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी आर्थिक स्थिति अथवा अन्य कठिनाइयों के कारण शिक्षा प्राप्त करने के अवसरों से वंचित न होना पड़े।

कोठारी आयोग ने शैक्षिक अवसरों की समानता को शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य माना।

आयोग का विचार था कि शिक्षा का वास्तविक प्रसार तभी सम्भव है जब विद्यालयों की उपलब्धता के साथ विद्यार्थियों को आवश्यक पुस्तकें, अध्ययन सामग्री तथा आर्थिक सहायता भी प्रदान की जाए।

इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिए।

8. निःशुल्क शिक्षा एवं अध्ययन सामग्री सम्बन्धी सुझाव

1. निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा

देश के सभी बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा निःशुल्क करने की व्यवस्था की जाए।

इससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को भी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के अवसर मिल सकेंगे।

2. निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें

विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकें निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएँ, ताकि पुस्तकों पर होने वाला व्यय उनकी पढ़ाई में बाधा न बने।

3. पुस्तकालयों में पर्याप्त पुस्तकें

विद्यालयों के पुस्तकालयों में पर्याप्त संख्या में पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएँ, जिससे विद्यार्थी उनका अध्ययन में उपयोग कर सकें।

4. अध्ययन सामग्री के लिए आर्थिक सहायता

योग्य विद्यार्थियों को शिक्षण सम्बन्धी सामग्री खरीदने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।

इससे आवश्यक अध्ययन सामग्री की कमी के कारण उनकी शिक्षा प्रभावित नहीं होगी।

9. आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियाँ

कोठारी आयोग ने माना कि आर्थिक कठिनाइयों के कारण किसी योग्य विद्यार्थी को शिक्षा से वंचित नहीं होना चाहिए।

इसलिए आयोग ने विभिन्न शैक्षिक स्तरों पर छात्रवृत्तियों की व्यवस्था करने के सुझाव दिए।

1. गरीब विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति

ऐसी व्यवस्था की जाए कि कोई भी गरीब विद्यार्थी आर्थिक कठिनाई के कारण शिक्षा से वंचित न रहे।

इसके लिए आवश्यकतानुसार छात्रवृत्तियाँ प्रदान की जाएँ।

2. माध्यमिक स्तर पर छात्रवृत्ति

माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर 15% योग्य विद्यार्थियों को छात्रवृत्तियाँ प्रदान करने का सुझाव दिया गया।

इसका उद्देश्य योग्य विद्यार्थियों को आगे अध्ययन करने के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना था।

3. स्नातक एवं परास्नातक स्तर पर छात्रवृत्ति

आयोग ने सुझाव दिया कि स्नातक तथा परास्नातक स्तर पर भी योग्य विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की जाए।

इससे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सहायता मिल सकेगी।

4. राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना का विस्तार

राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना का विस्तार किया जाए तथा उसका विकेन्द्रीकरण किया जाए।

विकेन्द्रीकरण का अर्थ है छात्रवृत्ति सम्बन्धी व्यवस्था और उत्तरदायित्व को केवल एक केन्द्रीय स्तर तक सीमित न रखकर विभिन्न स्तरों पर व्यवस्थित करना।

5. व्यावसायिक शिक्षा के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति

व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए भी छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की जाए।

इससे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में अध्ययन करने वाले योग्य विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता प्राप्त हो सकेगी।

कोठारी आयोग के शिक्षा प्रसार एवं समान अवसर सम्बन्धी सुझावों का महत्त्व

कोठारी आयोग ने शिक्षा के प्रसार तथा शैक्षिक अवसरों की समानता को एक-दूसरे से सम्बन्धित माना।

आयोग ने पूर्व-प्राथमिक और प्राथमिक शिक्षा के विस्तार, सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा, विद्यालयों की निकट उपलब्धता तथा माध्यमिक शिक्षा के विकास पर बल दिया।

इसके अतिरिक्त बालिकाओं और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए शैक्षिक सुविधाओं के विस्तार तथा गरीब एवं योग्य विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति और अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने की सिफारिश की।

इस प्रकार कोठारी आयोग की इन सिफारिशों का मुख्य उद्देश्य शिक्षा को अधिक व्यापक, सुलभ तथा सभी वर्गों के लिए समान अवसर प्रदान करने वाली व्यवस्था के रूप में विकसित करना था।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कोठारी आयोग ने शिक्षा के प्रसार तथा शैक्षिक अवसरों की समानता को भारतीय शिक्षा के महत्त्वपूर्ण उद्देश्य माना।
  • पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के लिए राज्य स्तर पर शिक्षा केन्द्र स्थापित करने तथा अधिक प्राथमिक विद्यालयों में पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करने का सुझाव दिया।
  • पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना के लिए निजी संस्थाओं को अनुदान तथा विद्यालयों में शारीरिक क्रियाओं को स्थान देने की सिफारिश की गई।
  • देश के सभी बच्चों के लिए 5 वर्ष की प्राथमिक शिक्षा की उत्तम व्यवस्था करने पर बल दिया गया।
  • आयोग ने सन् 1985–86 तक 6–14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का लक्ष्य प्रस्तावित किया।
  • प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा में अपव्यय और अवरोधन को रोकने तथा आगे न पढ़ने वाले बच्चों को हस्तकौशल में निपुण बनाने का सुझाव दिया।
  • प्राथमिक विद्यालय लगभग 1 किलोमीटर तथा उच्च प्राथमिक विद्यालय लगभग 3 किलोमीटर की दूरी के भीतर उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई।
  • शैक्षिक रूप से पिछड़े तथा विकलांग बच्चों के लिए विशेष विद्यालय खोलने का सुझाव दिया गया।
  • माध्यमिक शिक्षा के विस्तार के लिए नए विद्यालय खोलने, उचित योजनाएँ बनाने तथा विद्यार्थियों की संख्या अध्यापकों की उपलब्धता के अनुसार निर्धारित करने पर बल दिया गया।
  • बालिकाओं के लिए अलग माध्यमिक विद्यालय, निःशुल्क शिक्षा तथा छात्रवृत्तियों की व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया।
  • आयोग ने आगामी 20 वर्षों में बालिकाओं की शिक्षा का विस्तार करने के लिए ठोस कदम उठाने की सिफारिश की।
  • शैक्षिक अवसरों की समानता के लिए निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा, निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें तथा पुस्तकालयों में पर्याप्त पुस्तकें उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।
  • योग्य विद्यार्थियों को शिक्षण सामग्री खरीदने के लिए आर्थिक सहायता तथा गरीब विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान करने का सुझाव दिया गया।
  • माध्यमिक स्तर पर 15% योग्य विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने की सिफारिश की गई।
  • स्नातक, परास्नातक तथा व्यावसायिक शिक्षा के योग्य विद्यार्थियों के लिए भी छात्रवृत्तियों की व्यवस्था का सुझाव दिया गया।
  • राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना के विस्तार एवं विकेन्द्रीकरण पर बल दिया गया, जिससे अधिक विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता मिल सके।
Topic 8 कोठारी आयोग—उच्च, स्त्री, प्रौढ़, विज्ञान, कृषि, व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग—उच्च, स्त्री, प्रौढ़, विज्ञान, कृषि, व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग की विभिन्न प्रकार की शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

कोठारी आयोग (1964–1966) ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के व्यापक विकास के लिए विद्यालयी शिक्षा के साथ-साथ उच्च शिक्षा, स्त्री शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, विज्ञान, कृषि तथा व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा को भी विशेष महत्त्व दिया।

आयोग का उद्देश्य शिक्षा को केवल सामान्य ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम न बनाकर उसे राष्ट्रीय विकास, सामाजिक समानता, वैज्ञानिक प्रगति तथा रोजगार की आवश्यकताओं से जोड़ना था।

इसी उद्देश्य से आयोग ने शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में सुधार के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण सिफारिशें प्रस्तुत कीं।

1. उच्च शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने विश्वविद्यालयों तथा उच्च शिक्षण संस्थाओं की स्थिति का अध्ययन करके उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधियों, प्रशासन तथा अनुसंधान में सुधार की आवश्यकता बताई।

आयोग के अनुसार उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल उपाधियाँ प्रदान करना नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों में उच्च ज्ञान, अनुसंधान की क्षमता, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा नेतृत्व के गुण विकसित करना भी होना चाहिए।

विश्वविद्यालय शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य

आयोग ने विश्वविद्यालय शिक्षा के निम्नलिखित आठ उद्देश्य बताए—

  • नवीन ज्ञान की खोज— अध्ययन और अनुसंधान द्वारा नए ज्ञान का विकास करना।
  • सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का विकास— विद्यार्थियों में समाज और संस्कृति के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना।
  • ज्ञान का विस्तार— प्राचीन ज्ञान को आधुनिक ज्ञान से जोड़ना।
  • सामाजिक न्याय— समाज में न्याय और समानता की भावना को प्रोत्साहित करना।
  • नेतृत्व का विकास— समाज को उचित दिशा देने वाले योग्य व्यक्तियों का निर्माण करना।
  • राष्ट्रीय चेतना— विद्यार्थियों में राष्ट्रीय एकता और देश के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना।
  • कुशल मानव शक्ति का निर्माण— कला, विज्ञान, कृषि, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा तथा अन्य व्यवसायों के लिए प्रशिक्षित व्यक्तियों को तैयार करना।
  • प्रतिभाओं का विकास— प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की पहचान करके उनकी क्षमताओं के विकास में सहायता करना।

2. विश्वविद्यालयों की स्थापना एवं विकास सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने विश्वविद्यालयों की स्थापना तथा उनके शैक्षिक स्तर को सुधारने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए।

प्रमुख सुझाव
  • UGC की स्वीकृति— नए विश्वविद्यालयों की स्थापना विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की स्वीकृति प्राप्त करने के बाद ही की जाए।
  • आवश्यक क्षेत्रों में विश्वविद्यालय— जिन स्थानों पर विश्वविद्यालय उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ प्राथमिकता के आधार पर नए विश्वविद्यालय स्थापित किए जाएँ।
  • शिक्षा की गुणवत्ता— नए विश्वविद्यालयों का प्रमुख उद्देश्य उच्च शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए।
  • महाविद्यालयों का संगठन— आवश्यकता के अनुसार कई परास्नातक महाविद्यालयों को संगठित करके विश्वविद्यालय का स्वरूप प्रदान किया जा सकता है।

3. वरिष्ठ विश्वविद्यालय सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने उच्च स्तरीय अध्ययन और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए वरिष्ठ विश्वविद्यालय (Senior University) की अवधारणा प्रस्तुत की।

इन विश्वविद्यालयों में प्रतिभाशाली विद्यार्थियों, योग्य शिक्षकों तथा उच्च स्तरीय अनुसंधान के लिए विशेष सुविधाओं की व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया।

प्रमुख सुझाव
  • वरिष्ठ विश्वविद्यालयों का वित्तीय भार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) वहन करे।
  • इन विश्वविद्यालयों में केवल अत्यधिक प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाए।
  • योग्य विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की जाए।
  • कुछ विश्वविद्यालयों में परास्नातक शिक्षा तथा अनुसंधान कार्य पर विशेष बल दिया जाए।
  • शिक्षकों की नियुक्ति राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर की जाए।
  • शिक्षकों के लिए अनुसंधान कार्य की उचित व्यवस्था की जाए।
  • इन विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए योग्य शिक्षकों का निर्माण किया जाए।

इन सुझावों का उद्देश्य उच्च शिक्षा में उत्कृष्टता, प्रतिभा विकास तथा अनुसंधान की गुणवत्ता को बढ़ावा देना था।

4. उच्च शिक्षा की पाठ्यचर्या सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों को अधिक उपयोगी, विविधतापूर्ण तथा विद्यार्थियों की रुचियों के अनुकूल बनाने पर बल दिया।

प्रमुख सुझाव
  • स्नातक पाठ्यक्रम की अवधि— स्नातक स्तर की शिक्षा की अवधि 3 वर्ष रखी जाए।
  • सामान्य एवं ऑनर्स पाठ्यक्रम— स्नातक स्तर पर सामान्य तथा ऑनर्स दोनों प्रकार के पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की जाए।
  • नए विषयों का समावेश— पाठ्यक्रम में नए-नए विषय सम्मिलित किए जाएँ, जिससे विद्यार्थी अपनी रुचि के अनुसार विषयों का चुनाव कर सकें।
  • परास्नातक स्तर पर विशेषज्ञता— परास्नातक स्तर पर किसी एक विषय का गहन अध्ययन कराया जाए।
  • भाषाओं का अध्ययन— भारतीय, विदेशी तथा शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन की उचित व्यवस्था की जाए।

5. उच्च शिक्षा के माध्यम सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने उच्च शिक्षा के शिक्षण-माध्यम के विषय में निम्नलिखित सुझाव दिए—

  • स्नातक स्तर पर शिक्षा का माध्यम क्षेत्रीय भाषाएँ हों।
  • परास्नातक स्तर पर शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रखने का सुझाव दिया गया।
  • उच्च शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत अध्यापकों को कम से कम दो भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए।
  • भारतीय भाषाओं के विकास के लिए उच्च अध्ययन केन्द्र स्थापित किए जाएँ।
  • विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों में अंग्रेजी के अध्ययन हेतु विद्यार्थियों को विशेष सुविधाएँ प्रदान की जाएँ।

इन सुझावों का उद्देश्य उच्च शिक्षा में भारतीय भाषाओं के विकास के साथ विद्यार्थियों को अन्य भाषाओं के अध्ययन के अवसर प्रदान करना था।

6. उच्च शिक्षा की शिक्षण-विधियों एवं मूल्यांकन में सुधार

कोठारी आयोग ने विश्वविद्यालयों में शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाने तथा परीक्षा प्रणाली की कमियों को दूर करने पर बल दिया।

शिक्षण-विधियों सम्बन्धी सुझाव
  • समझकर सीखना— विद्यार्थियों में रटने की प्रवृत्ति कम करके विषय को समझने की क्षमता विकसित की जाए।
  • पुस्तकालयों में सुधार— विश्वविद्यालयों में उत्तम पुस्तकालयों की व्यवस्था की जाए।
  • स्वाध्याय एवं विचार-विमर्श— व्याख्यान के बाद विद्यार्थियों को आत्मसात करने का समय दिया जाए तथा स्वाध्याय, विचार-विमर्श और समस्या-समाधान विधियों को महत्त्व दिया जाए।
  • शिक्षण सत्र की निरन्तरता— शिक्षकों को शैक्षिक सत्र के बीच संस्था छोड़ने की अनुमति न दी जाए तथा एक साथ सात दिन से अधिक अवकाश न दिया जाए।
  • शिक्षण-विधियों के विकास हेतु समिति— विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा शिक्षण-विधियों में सुधार के लिए समिति गठित की जाए।
परीक्षा एवं मूल्यांकन सम्बन्धी सुझाव
  • विश्वविद्यालय परीक्षाओं में सुधार के लिए केन्द्रीय परीक्षा सुधार समिति का गठन किया जाए।
  • बाह्य परीक्षा प्रणाली के स्थान पर आन्तरिक परीक्षा तथा क्रमिक मूल्यांकन की व्यवस्था की जाए।
  • शिक्षकों के मूल्यांकन की नई विधियों के लिए सेमिनार, कार्यशालाएँ एवं सम्मेलन आयोजित किए जाएँ।
  • एक परीक्षक को पूरे वर्ष में 500 से अधिक उत्तर-पुस्तिकाओं का मूल्यांकन न करने दिया जाए।
  • उत्तर-पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए शिक्षकों को पारिश्रमिक न देने का सुझाव भी आयोग ने दिया।

7. उच्च शिक्षा के प्रशासन सम्बन्धी अन्य सुझाव

आयोग ने विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के प्रशासन को अधिक प्रभावशाली और उत्तरदायी बनाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए—

  • विद्यार्थियों के प्रवेश के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएँ तथा केवल योग्य विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाए।
  • विद्यार्थियों की संख्या शिक्षकों और उपलब्ध शिक्षण-सुविधाओं के अनुसार निर्धारित की जाए।
  • विश्वविद्यालयों को कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की जाए।
  • विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार किया जाए।
  • महाविद्यालयों में प्राचार्य की अध्यक्षता में समस्याओं के समाधान हेतु समिति गठित की जाए।
  • विद्यार्थियों एवं शिक्षकों की संयुक्त समितियाँ स्थापित की जाएँ।
  • उच्च श्रेणी के महाविद्यालयों को स्वायत्त महाविद्यालयों में परिवर्तित करके उच्च शिक्षा का स्तर बढ़ाने का प्रयास किया जाए।
  • शिक्षकों की नियुक्ति राष्ट्रीय स्तर पर की जाए।
  • विश्वविद्यालयों की परीक्षा एवं मूल्यांकन व्यवस्था में सुधार किया जाए।

8. स्त्री शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने स्त्री शिक्षा (Women’s Education) को समाज और राष्ट्र के विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक माना।

आयोग के अनुसार महिलाओं की शिक्षा से न केवल उनका व्यक्तिगत विकास होता है, बल्कि परिवार की उन्नति तथा बच्चों के चरित्र निर्माण में भी सहायता मिलती है।

इसलिए आयोग ने बालिकाओं और महिलाओं को अधिक से अधिक शिक्षा प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध कराने के लिए अनेक सुझाव दिए।

स्त्री शिक्षा के प्रमुख सुझाव
  • प्राथमिक शिक्षा का विस्तार— बालिकाओं के लिए प्राथमिक शिक्षा का अधिक से अधिक विस्तार किया जाए।
  • माध्यमिक शिक्षा का विकास— माध्यमिक स्तर पर बालिकाओं की शिक्षा के विस्तार की गति तेज की जाए।
  • अलग विद्यालय एवं छात्रावास— आवश्यकता के अनुसार बालिकाओं के लिए अलग विद्यालयों और छात्रावासों की व्यवस्था की जाए।
  • छात्रवृत्तियों की व्यवस्था— बालिकाओं को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक सहायता एवं छात्रवृत्तियाँ प्रदान की जाएँ।
  • उपयोगी विषयों का विस्तार— गृहविज्ञान तथा सामाजिक कार्य जैसे विषयों के अध्ययन की सुविधाएँ बढ़ाई जाएँ।
  • स्त्री शिक्षा में अनुसंधान— एक या दो विश्वविद्यालयों में स्त्री शिक्षा से सम्बन्धित अनुसंधान इकाइयाँ स्थापित की जाएँ।
  • विषय चयन की स्वतंत्रता— महिलाओं को कला, विज्ञान, मानवशास्त्र, तकनीकी आदि विषयों के अध्ययन के अवसर दिए जाएँ।
  • उच्च शिक्षा की व्यवस्था— महिलाओं के लिए अलग स्नातकोत्तर महाविद्यालय स्थापित किए जाएँ।

9. स्त्री शिक्षा की पाठ्यचर्या सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने बालिकाओं की शिक्षा को सीमित विषयों तक न रखकर उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ने के अवसर देने की सिफारिश की।

प्रमुख सुझाव
  • कक्षा 10 तक समान पाठ्यक्रम— कक्षा 10 तक बालक और बालिकाओं के लिए समान पाठ्यक्रम हो। केवल कार्यानुभव तथा भाषा के चयन में विकल्प उपलब्ध हों।
  • गृहविज्ञान— माध्यमिक स्तर पर बालिकाओं को उनकी रुचि के अनुसार गृहविज्ञान के अध्ययन का अवसर दिया जाए।
  • संगीत एवं कला— बालिकाओं के लिए संगीत तथा कला शिक्षा की व्यवस्था की जाए।
  • विज्ञान एवं गणित— छात्राओं को विज्ञान और गणित के अध्ययन के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

10. स्त्री शिक्षा के विस्तार सम्बन्धी सुझाव

स्त्री शिक्षा के व्यापक विकास के लिए आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिए—

  • स्त्री शिक्षा के विस्तार के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
  • महिलाओं की शिक्षा में आने वाली समस्याओं को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ।
  • केन्द्र तथा राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर पर स्त्री शिक्षा का निरीक्षण करें।
  • पुरुषों और महिलाओं की शिक्षा के बीच विद्यमान अन्तर को कम करके समाप्त करने का प्रयास किया जाए।

इन सुझावों का उद्देश्य महिलाओं को शिक्षा के सभी स्तरों पर आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराना तथा स्त्री और पुरुष शिक्षा के बीच असमानता कम करना था।

11. प्रौढ़ शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

प्रौढ़ शिक्षा (Adult Education) से आशय ऐसे वयस्क व्यक्तियों की शिक्षा से है, जिन्हें उचित आयु में औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिल सका।

कोठारी आयोग ने देश की निरक्षरता दूर करने तथा वयस्क व्यक्तियों को आवश्यक ज्ञान और कौशल प्रदान करने के लिए प्रौढ़ शिक्षा के विस्तार पर बल दिया।

प्रमुख सुझाव
  • राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा बोर्ड— केन्द्र में राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा बोर्ड की स्थापना की जाए।
  • राज्य प्रौढ़ शिक्षा बोर्ड— प्रत्येक राज्य में राज्य प्रौढ़ शिक्षा बोर्ड स्थापित किया जाए।
  • प्रौढ़ शिक्षा समितियाँ— गाँव तथा जिला स्तर पर प्रौढ़ शिक्षा समितियों का गठन किया जाए।
  • पर्याप्त बजट— प्रौढ़ शिक्षा के विकास के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराई जाए।
  • सामाजिक सहयोग— प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों में विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा समाजसेवी संस्थाओं का सहयोग लिया जाए।
  • जनसंचार माध्यमों का प्रयोग— प्रौढ़ शिक्षा के महत्त्व और उसके प्रसार के लिए जनसंचार के साधनों का उपयोग किया जाए।
  • ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता— ग्रामीण महिलाओं को साक्षर बनाने के लिए ग्राम सेविकाओं का सहयोग लिया जाए।
  • पुस्तकालयों का उपयोग— विद्यालयों के पुस्तकालय नवसाक्षर प्रौढ़ों के लिए भी उपलब्ध कराए जाएँ।
  • कामकाजी व्यक्तियों के लिए शिक्षा— कामकाजी प्रौढ़ों के लिए अल्पकालीन पाठ्यक्रम चलाए जाएँ।
  • पत्राचार शिक्षा— प्रौढ़ों की शिक्षा के लिए पत्राचार पाठ्यक्रमों की भी व्यवस्था की जाए।

इन सिफारिशों का उद्देश्य वयस्क व्यक्तियों को शिक्षा के अवसर प्रदान करना, निरक्षरता कम करना तथा प्रौढ़ शिक्षा को सामाजिक सहयोग से व्यापक बनाना था।

12. विज्ञान शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने देश की आर्थिक प्रगति, औद्योगिक विकास तथा वैज्ञानिक उन्नति के लिए विज्ञान शिक्षा को आवश्यक माना।

आयोग का विचार था कि विज्ञान और तकनीकी के विकास से देश की उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सकती है तथा राष्ट्रीय आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता मिल सकती है।

प्रमुख सुझाव
  • राष्ट्रीय विकास से सम्बन्ध— विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा को देश के आर्थिक तथा औद्योगिक विकास से जोड़ा जाए।
  • पाठ्यक्रमों में सुधार— विज्ञान तथा गणित के पाठ्यक्रमों में आवश्यक संशोधन किए जाएँ।
  • योग्य अध्यापकों की नियुक्ति— विज्ञान शिक्षा के लिए योग्य तथा प्रशिक्षित अध्यापकों की व्यवस्था की जाए।
  • सैद्धान्तिक एवं प्रयोगात्मक शिक्षा— विज्ञान के सिद्धान्तों तथा प्रयोगात्मक कार्यों के बीच उचित समन्वय स्थापित किया जाए।
  • विज्ञान के विद्यार्थियों की संख्या— देश की आवश्यकताओं के अनुसार विज्ञान का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाई जाए।
  • प्रयोगशालाओं का विकास— प्रत्येक महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय में विज्ञान की सुसज्जित प्रयोगशालाएँ स्थापित की जाएँ।
  • अन्तरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का सहयोग— अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भारतीय वैज्ञानिकों को भारत में शिक्षण कार्य के लिए आमन्त्रित किया जाए।
  • विज्ञान की प्रमुख शाखाओं का विकास— भौतिक विज्ञान तथा रसायन विज्ञान के विकास पर विशेष ध्यान दिया जाए।
  • विशेष प्रशिक्षण पाठ्यक्रम— एम.एससी. के दो वर्षीय पाठ्यक्रम के अतिरिक्त वैज्ञानिक तथा औद्योगिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक वर्षीय विशेष पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया जाए।
  • विज्ञान शिक्षा का निरीक्षण— विश्वविद्यालय अनुदान आयोग समय-समय पर विज्ञान शिक्षा के निरीक्षण के लिए समिति गठित करे।

13. कृषि शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसलिए कोठारी आयोग ने कृषि शिक्षा को देश के आर्थिक विकास और ग्रामीण जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ने पर बल दिया।

आयोग के अनुसार कृषि शिक्षा केवल पुस्तकीय अध्ययन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों को कृषि कार्य, प्रयोगात्मक प्रशिक्षण तथा ग्रामीण समस्याओं का व्यावहारिक ज्ञान भी प्राप्त होना चाहिए।

प्रमुख सुझाव
  • कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना— प्रत्येक राज्य में कम से कम एक कृषि विश्वविद्यालय स्थापित किया जाए।
  • शिक्षा एवं अनुसंधान— कृषि विश्वविद्यालयों में कृषि शिक्षा तथा अनुसंधान की उत्तम व्यवस्था की जाए।
  • योग्य शिक्षक— कृषि विश्वविद्यालयों में योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति की जाए।
  • छात्रवृत्तियाँ— कृषि शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की जाए।
  • अध्यापक प्रशिक्षण— कृषि शिक्षा के अध्यापकों के लिए प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किए जाएँ।
  • प्रयोगात्मक कार्य— कृषि विश्वविद्यालयों में व्यावहारिक तथा प्रयोगात्मक कार्यों पर विशेष बल दिया जाए।
  • मौजूदा संस्थाओं में सुधार— नए कृषि महाविद्यालय स्थापित करने के स्थान पर पुराने महाविद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने को प्राथमिकता दी जाए।
  • कृषि महाविद्यालयों में भूमि— प्रत्येक कृषि महाविद्यालय के पास लगभग 200 एकड़ भूमि का कृषि फार्म होना चाहिए।
  • कृषि विश्वविद्यालयों में भूमि— प्रत्येक कृषि विश्वविद्यालय के पास लगभग 1,000 एकड़ भूमि का कृषि फार्म होना चाहिए।
  • डिग्री पाठ्यक्रम की अवधि— आयोग ने कृषि डिग्री पाठ्यक्रम की अवधि विद्यालयी शिक्षा के 10 वर्षों के बाद 5 वर्ष रखने का सुझाव दिया।
  • प्राथमिक स्तर पर कृषि ज्ञान— ग्रामीण तथा शहरी प्राथमिक विद्यालयों में कृषि सम्बन्धी सामान्य जानकारी को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाया जाए।
  • कार्यानुभव में कृषि— विद्यालयी स्तर पर कृषि को कार्यानुभव का अंग बनाया जाए।
  • ग्रामीण समस्याओं का अध्ययन— अध्यापक शिक्षा में कृषि तथा ग्रामीण समस्याओं को भी उचित स्थान दिया जाए।

इन सुझावों का उद्देश्य कृषि शिक्षा को अधिक वैज्ञानिक, व्यावहारिक तथा ग्रामीण जीवन के लिए उपयोगी बनाना था।

14. व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने शिक्षा को रोजगार तथा औद्योगिक विकास से जोड़ने के लिए व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा का विस्तार आवश्यक माना।

व्यावसायिक शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित ज्ञान और कौशल प्रदान करना है, जबकि तकनीकी शिक्षा में तकनीकी कार्यों, उपकरणों तथा औद्योगिक प्रक्रियाओं से सम्बन्धित प्रशिक्षण दिया जाता है।

आयोग ने इन क्षेत्रों में निम्नलिखित सुझाव दिए—

1. विद्यालय स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा

विद्यालयों के पाठ्यक्रम में व्यावसायिक शिक्षा को उचित स्थान दिया जाए, जिससे विद्यार्थी सामान्य शिक्षा के साथ उपयोगी कार्य-कौशल भी सीख सकें।

2. उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुसार विस्तार

तकनीकी शिक्षण संस्थाओं का विकास और विस्तार उद्योगों की वास्तविक आवश्यकताओं के आधार पर किया जाए।

3. तकनीकी हाईस्कूलों का विकास

जूनियर तकनीकी स्कूलों को तकनीकी हाईस्कूलों का स्वरूप प्रदान किया जाए।

4. औद्योगिक क्षेत्रों में तकनीकी महाविद्यालय

नए तकनीकी महाविद्यालयों की स्थापना औद्योगिक क्षेत्रों में की जाए, जिससे विद्यार्थियों को उद्योगों से सम्बन्धित प्रशिक्षण प्राप्त करने के अवसर मिलें।

5. ग्रामीण तकनीकी महाविद्यालयों में कृषि सम्बन्धी शिक्षा

ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित तकनीकी महाविद्यालयों में कृषि से सम्बन्धित उद्योगों की शिक्षा की व्यवस्था की जाए।

6. बालिकाओं की रुचि के अनुसार पाठ्यक्रम

तकनीकी महाविद्यालयों की पाठ्यचर्या तैयार करते समय बालिकाओं की रुचियों और आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाए।

7. अपव्यय एवं अवरोधन की रोकथाम

तकनीकी महाविद्यालयों में विद्यार्थियों के अपव्यय तथा अवरोधन को रोकने के लिए आवश्यक उपाय किए जाएँ।

8. तकनीकी संस्थाओं की गुणवत्ता में सुधार

जो तकनीकी महाविद्यालय उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान नहीं कर रहे हैं, उनमें सुधार किया जाए। आवश्यकता होने पर ऐसी संस्थाओं को बन्द करने का सुझाव भी दिया गया।

9. इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में सुधार

इंजीनियरिंग शिक्षा के पाठ्यक्रमों का निर्माण वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार किया जाए।

10. विशेषज्ञों से पाठ्यक्रम की समीक्षा

तकनीकी पाठ्यक्रमों में विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार आवश्यक संशोधन किए जाएँ।

11. अन्तिम वर्ष में व्यावहारिक प्रशिक्षण

तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को अन्तिम वर्ष में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।

12. तकनीकी शिक्षकों के वेतन में वृद्धि

प्रतिभाशाली एवं योग्य व्यक्तियों को तकनीकी शिक्षण व्यवसाय की ओर आकर्षित करने के लिए शिक्षकों के वेतन में वृद्धि की जाए।

13. उच्च अध्ययन केन्द्रों की स्थापना

तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में उच्च अध्ययन केन्द्र स्थापित किए जाएँ, जिससे उच्च स्तरीय तकनीकी अध्ययन की सुविधाएँ उपलब्ध हो सकें।

इस प्रकार आयोग ने तकनीकी शिक्षा को उद्योगों की आवश्यकताओं, रोजगार, व्यावहारिक प्रशिक्षण तथा आधुनिक तकनीकी ज्ञान से जोड़ने पर विशेष बल दिया।

15. विज्ञान शिक्षा एवं वैज्ञानिक अनुसंधान सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग ने विज्ञान शिक्षा के साथ वैज्ञानिक अनुसंधान (Scientific Research) को भी देश के आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक माना।

आयोग के अनुसार विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति के लिए विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक वैज्ञानिक अध्ययन और अनुसंधान की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रमुख सुझाव
  • प्रारम्भिक स्तर से विज्ञान शिक्षा— विज्ञान की शिक्षा प्राथमिक कक्षाओं से ही प्रारम्भ की जाए।
  • वैज्ञानिक संस्थाओं का पुनर्गठन— राष्ट्रीय विज्ञान संस्थानों का पुनर्गठन किया जाए, जिससे विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान को प्रोत्साहन मिल सके।
  • अनुसंधान पर व्यय में वृद्धि— पुस्तक में उल्लिखित तत्कालीन स्थिति के अनुसार वैज्ञानिक शोध पर लगभग 0.03% व्यय किया जाता था। आयोग ने इस व्यय को बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
  • उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में सुधार— विज्ञान शिक्षा के स्नातक, परास्नातक तथा विशिष्ट पाठ्यक्रमों में सुधार करके उन्हें अधिक प्रगतिशील बनाया जाए।
  • उच्च स्तरीय अनुसंधान— वैज्ञानिक अनुसंधान की उचित व्यवस्था की जाए तथा शोध कार्यों को अन्तरराष्ट्रीय स्तर का बनाने का प्रयास किया जाए।
  • उच्च अध्ययन केन्द्र— विज्ञान के उच्च अध्ययन केन्द्र स्थापित किए जाएँ और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इनके विकास के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करे।
  • आधुनिक प्रयोगशालाएँ— विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों में अनुसंधान और विज्ञान शिक्षा के लिए उत्तम प्रयोगशालाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
  • योग्य वैज्ञानिक शिक्षक— विज्ञान शिक्षा के लिए योग्य तथा अनुभवी अध्यापकों की नियुक्ति की जाए।
  • प्रयोगात्मक मूल्यांकन— विज्ञान के विद्यार्थियों के मूल्यांकन में प्रयोगात्मक कार्यों को सैद्धान्तिक परीक्षाओं से अधिक महत्त्व दिया जाए।
  • शोधार्थियों को आर्थिक सहायता— अनुसंधान कार्य करने वाले विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।
  • अन्तरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों का सहयोग— अन्तरराष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों को व्याख्यान देने के लिए भारत बुलाया जाए तथा कुछ को 1 से 3 वर्ष के लिए विजिटिंग प्रोफेसर नियुक्त किया जाए।

इन सुझावों का उद्देश्य वैज्ञानिक अनुसंधान की गुणवत्ता बढ़ाना, विद्यार्थियों को आधुनिक प्रयोगात्मक सुविधाएँ प्रदान करना तथा भारतीय विज्ञान शिक्षा को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित करना था।

कोठारी आयोग की इन सिफारिशों का समग्र महत्त्व

कोठारी आयोग ने उच्च शिक्षा, स्त्री शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, विज्ञान, कृषि तथा व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा को राष्ट्रीय विकास के महत्त्वपूर्ण अंग माना।

आयोग ने उच्च शिक्षा में अनुसंधान और गुणवत्ता सुधारने, महिलाओं को समान शैक्षिक अवसर प्रदान करने तथा प्रौढ़ों की निरक्षरता दूर करने पर बल दिया।

इसके अतिरिक्त विज्ञान और कृषि शिक्षा को व्यावहारिक बनाने तथा तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा को उद्योगों और रोजगार की आवश्यकताओं से जोड़ने की सिफारिश की।

इस प्रकार आयोग की इन सिफारिशों का मुख्य उद्देश्य ऐसी शिक्षा-व्यवस्था विकसित करना था जो ज्ञान, कौशल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक समानता तथा राष्ट्रीय आर्थिक विकास में योगदान दे सके।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कोठारी आयोग ने उच्च शिक्षा का उद्देश्य नवीन ज्ञान की खोज, सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का विकास, राष्ट्रीय चेतना, नेतृत्व और कुशल मानव शक्ति का निर्माण माना।
  • नए विश्वविद्यालयों की स्थापना UGC की स्वीकृति के बाद करने तथा विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने पर बल दिया गया।
  • उच्च स्तरीय अध्ययन और अनुसंधान के लिए वरिष्ठ विश्वविद्यालय (Senior University) विकसित करने का सुझाव दिया गया।
  • स्नातक शिक्षा की अवधि 3 वर्ष रखने तथा सामान्य और ऑनर्स पाठ्यक्रमों की व्यवस्था करने की सिफारिश की गई।
  • विश्वविद्यालयों में स्वाध्याय, विचार-विमर्श, समस्या-समाधान तथा अनुसंधान को प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया।
  • उच्च शिक्षा की परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए केन्द्रीय परीक्षा सुधार समिति तथा आन्तरिक एवं क्रमिक मूल्यांकन का सुझाव दिया गया।
  • स्त्री शिक्षा के विस्तार हेतु बालिकाओं के लिए विद्यालय, छात्रावास, छात्रवृत्तियाँ तथा उच्च शिक्षा की सुविधाएँ विकसित करने की सिफारिश की गई।
  • कक्षा 10 तक बालक-बालिकाओं के लिए समान पाठ्यक्रम रखने तथा महिलाओं को विज्ञान, गणित, कला और तकनीकी विषयों के अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया।
  • प्रौढ़ शिक्षा के विकास के लिए केन्द्र में राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा बोर्ड, राज्यों में राज्य प्रौढ़ शिक्षा बोर्ड तथा गाँव और जिला स्तर पर प्रौढ़ शिक्षा समितियाँ स्थापित करने का सुझाव दिया गया।
  • ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता के लिए ग्राम सेविकाओं के सहयोग तथा कामकाजी प्रौढ़ों के लिए अल्पकालीन एवं पत्राचार पाठ्यक्रमों की व्यवस्था पर बल दिया गया।
  • विज्ञान शिक्षा को देश के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास से जोड़ने, विज्ञान और गणित के पाठ्यक्रमों में सुधार तथा आधुनिक प्रयोगशालाएँ स्थापित करने की सिफारिश की गई।
  • प्रत्येक राज्य में कम से कम एक कृषि विश्वविद्यालय स्थापित करने तथा कृषि शिक्षा में व्यावहारिक प्रशिक्षण और अनुसंधान को महत्त्व देने का सुझाव दिया गया।
  • प्रत्येक कृषि महाविद्यालय के पास लगभग 200 एकड़ तथा कृषि विश्वविद्यालय के पास लगभग 1,000 एकड़ भूमि का कृषि फार्म रखने की सिफारिश की गई।
  • कृषि डिग्री पाठ्यक्रम की अवधि 10 वर्ष की विद्यालयी शिक्षा के बाद 5 वर्ष रखने का सुझाव दिया गया।
  • व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा का विस्तार उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुसार करने तथा विद्यालय स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा को स्थान देने पर बल दिया गया।
  • तकनीकी शिक्षा के विद्यार्थियों को अन्तिम वर्ष में व्यावहारिक प्रशिक्षण देने तथा इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार संशोधन करने की सिफारिश की गई।
  • विज्ञान शिक्षा प्राथमिक स्तर से प्रारम्भ करने तथा वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए आधुनिक प्रयोगशालाओं और उच्च अध्ययन केन्द्रों की स्थापना पर बल दिया गया।
  • विज्ञान के विद्यार्थियों के मूल्यांकन में प्रयोगात्मक कार्यों को अधिक महत्त्व देने तथा शोधार्थियों को आर्थिक सहायता प्रदान करने का सुझाव दिया गया।
  • अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वैज्ञानिकों को भारत में शिक्षण और अनुसंधान के लिए आमन्त्रित करने तथा कुछ वैज्ञानिकों को 1 से 3 वर्ष के लिए विजिटिंग प्रोफेसर नियुक्त करने की सिफारिश की गई।
Topic 9 कोठारी आयोग—छात्र नामांकन, मानव शक्ति, मूल्यांकन, गुण-दोष एवं भारतीय शिक्षा पर प्रभाव

कोठारी आयोग—छात्र नामांकन, मानव शक्ति, मूल्यांकन, गुण-दोष एवं भारतीय शिक्षा पर प्रभाव

कोठारी आयोग के छात्र नामांकन एवं मानव शक्ति सम्बन्धी सुझाव

कोठारी आयोग (1964–1966) ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास तथा मानव शक्ति के निर्माण का महत्त्वपूर्ण साधन माना। आयोग के अनुसार किसी देश की प्रगति के लिए शिक्षित, योग्य और कुशल मानव शक्ति का होना आवश्यक है।

आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि भारत में शिक्षा के व्यापक प्रसार की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक आर्थिक संसाधनों की कमी थी। इसलिए उसने उपलब्ध संसाधनों का उचित उपयोग करते हुए शिक्षा का विकास करने तथा विद्यार्थियों के प्रवेश को राष्ट्रीय और स्थानीय आवश्यकताओं से जोड़ने पर बल दिया।

इस उद्देश्य से आयोग ने छात्र नामांकन और मानव शक्ति के विकास के लिए निम्नलिखित दस सुझाव दिए।

1. छात्र नामांकन एवं मानव शक्ति के प्रमुख सुझाव

1. शिक्षा पर पर्याप्त व्यय

आयोग ने शिक्षा को राष्ट्रीय महत्त्व का विषय मानते हुए केन्द्र सरकार के बजट में शिक्षा के लिए 6% व्यय करने का सुझाव दिया।

इसके साथ ही राज्य सरकारों को भी शिक्षा पर अधिक धनराशि खर्च करने के प्रयास करने चाहिए, जिससे शिक्षा के प्रसार और गुणवत्ता में सुधार हो सके।

2. छात्र प्रवेश सम्बन्धी राष्ट्रीय नीति

शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर विद्यार्थियों के प्रवेश के लिए एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति निर्धारित की जाए।

इसका उद्देश्य विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश की व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाना तथा योग्य विद्यार्थियों को उचित शैक्षिक अवसर प्रदान करना था।

3. निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा

आयोग ने 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करने का सुझाव दिया।

इसका उद्देश्य सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध कराना तथा निरक्षरता को कम करना था।

4. प्रौढ़ शिक्षा का विकास

शिक्षा को जनशिक्षा के रूप में विकसित करने तथा देश के नागरिकों की निरक्षरता दूर करने के लिए प्रौढ़ शिक्षा की उचित व्यवस्था की जाए।

इससे उन वयस्क व्यक्तियों को भी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा जो बचपन में विद्यालयी शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके थे।

5. माध्यमिक शिक्षा में प्रवेश परीक्षा

माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों के प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाए, जिससे योग्य विद्यार्थी ही माध्यमिक शिक्षा में प्रवेश प्राप्त कर सकें।

इस सुझाव का उद्देश्य विद्यार्थियों की योग्यता के आधार पर प्रवेश व्यवस्था को व्यवस्थित करना था।

6. उच्च शिक्षा में योग्य विद्यार्थियों का प्रवेश

उच्च शिक्षा में प्रवेश के लिए कठोर और स्पष्ट नियम बनाए जाएँ तथा केवल योग्य एवं प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाए।

आयोग का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखना तथा उपलब्ध संसाधनों का उचित उपयोग करना था।

7. स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार प्रवेश

व्यावसायिक, तकनीकी तथा कृषि शिक्षा में विद्यार्थियों का प्रवेश स्थानीय क्षेत्रों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किया जाए।

उदाहरण के लिए, कृषि प्रधान क्षेत्रों में कृषि शिक्षा तथा औद्योगिक क्षेत्रों में तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा की आवश्यकताओं को महत्त्व दिया जाए।

8. प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को विशेष अवसर

प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की क्षमताओं को अधिक विकसित करने के लिए उन्हें अधिक से अधिक शैक्षिक अवसर प्रदान किए जाएँ।

इससे उनकी प्रतिभा का उचित विकास होगा और वे देश की प्रगति में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकेंगे।

9. सतत शिक्षा की व्यवस्था

मानव शक्ति को नवीन ज्ञान एवं कौशल से युक्त और उपयोगी बनाए रखने के लिए सतत शिक्षा (Continuing Education) की व्यवस्था की जाए।

सतत शिक्षा का अर्थ है औपचारिक शिक्षा पूरी होने के बाद भी व्यक्ति को समय-समय पर नए ज्ञान और कौशल प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध कराना।

10. रोजगार की सम्भावनाओं के अनुसार शिक्षा का विस्तार

शिक्षा के प्रत्येक स्तर का विस्तार करते समय रोजगार के अवसरों को ध्यान में रखा जाए।

इसका उद्देश्य शिक्षा और रोजगार के बीच उचित सम्बन्ध स्थापित करना था, जिससे शिक्षित व्यक्तियों की योग्यता का उपयोग देश के आर्थिक विकास में किया जा सके।

छात्र नामांकन एवं मानव शक्ति सम्बन्धी सुझावों का महत्त्व

कोठारी आयोग ने छात्र नामांकन को केवल विद्यालयों और महाविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने का विषय नहीं माना, बल्कि इसे देश की मानव शक्ति के विकास से जोड़ा।

आयोग ने एक ओर सभी बच्चों के लिए प्रारम्भिक शिक्षा तथा प्रौढ़ों की साक्षरता का समर्थन किया, वहीं दूसरी ओर माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा में योग्यता, स्थानीय आवश्यकताओं और रोजगार की सम्भावनाओं के अनुसार प्रवेश देने पर बल दिया।

इस प्रकार आयोग का उद्देश्य उपलब्ध आर्थिक संसाधनों का उचित उपयोग करके शिक्षित, कुशल, प्रतिभाशाली तथा रोजगार के लिए उपयोगी मानव शक्ति का विकास करना था।

कोठारी आयोग का मूल्यांकन

कोठारी आयोग ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था का व्यापक अध्ययन करके उसके सुधार के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। आयोग में देश तथा विदेश के अनुभवी शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की भागीदारी थी।

आयोग की सिफारिशों ने प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च, तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा तक विभिन्न क्षेत्रों के विकास को दिशा प्रदान की।

किन्तु आयोग की सभी सिफारिशें समान रूप से स्पष्ट और व्यावहारिक नहीं थीं। कुछ सुझावों में अस्पष्टता तथा आपसी विरोधाभास भी पाए गए।

इसलिए कोठारी आयोग का मूल्यांकन उसके गुणों और दोषों के आधार पर किया जाता है।

2. कोठारी आयोग के गुण

कोठारी आयोग के प्रमुख नौ गुण निम्नलिखित हैं—

1. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण का आधार

कोठारी आयोग ने शिक्षा को राष्ट्रीय महत्त्व का विषय मानते हुए शिक्षा पर पर्याप्त धनराशि खर्च करने तथा पूरे देश के लिए एक समान शिक्षा नीति विकसित करने का सुझाव दिया।

आयोग ने शिक्षा पर 6% व्यय करने का भी सुझाव दिया। इसकी सिफारिशों ने आगे चलकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 के निर्माण को महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान किया तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 को भी प्रभावित किया।

इस प्रकार आयोग ने राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के उद्देश्य, संरचना और विकास की दिशा निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

2. शिक्षा की उचित व्यवस्था सम्बन्धी सुझाव

आयोग ने 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए लगभग 20 वर्षों के भीतर निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करने का सुझाव दिया।

इसके अतिरिक्त आयोग ने माध्यमिक शिक्षा को लगभग 70% विद्यार्थियों के लिए पूर्ण शिक्षा का स्तर बनाने तथा शेष 30% विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए तैयार करने की सिफारिश की।

इस प्रकार आयोग ने प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के साथ माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा की व्यवस्था को भी महत्त्व दिया।

3. शिक्षा के उपयुक्त उद्देश्य

कोठारी आयोग ने शिक्षा के ऐसे उद्देश्य निर्धारित किए जो राष्ट्रीय विकास तथा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए उपयोगी थे।

आयोग ने शिक्षा को उत्पादन, सामाजिकता, राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र, आधुनिकीकरण तथा नैतिक मूल्यों के विकास से जोड़ा।

ये उद्देश्य शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्त करने तक सीमित न रखकर सामाजिक एवं राष्ट्रीय विकास का साधन बनाने वाले थे।

4. प्राथमिक शिक्षा सम्बन्धी उपयोगी सुझाव

आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए, जिनमें प्रमुख थे—

  • प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क एवं अनिवार्य बनाना।
  • प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्यों एवं पाठ्यक्रम में सुधार करना।
  • उपयुक्त एवं प्रभावी शिक्षण-विधियों का प्रयोग करना।
  • प्राथमिक शिक्षा का अधिक से अधिक विस्तार करना।
  • शैक्षिक अपव्यय एवं अवरोधन को रोकना।

इन सुझावों का उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा को अधिक सुलभ, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण बनाना था।

5. माध्यमिक शिक्षा सम्बन्धी समयानुकूल सुझाव

कोठारी आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर लगभग 70% विद्यार्थियों के लिए इसे पूर्ण शिक्षा का स्तर बनाने का सुझाव दिया।

आयोग ने यह भी माना कि माध्यमिक स्तर पर सभी विद्यार्थियों की आवश्यकताएँ एक जैसी नहीं होतीं। इसलिए उनके लिए शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन तथा परामर्श की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

इन सुझावों का उद्देश्य विद्यार्थियों को उनकी रुचि, योग्यता तथा भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने में सहायता देना था।

6. उच्च शिक्षा सम्बन्धी उपयोगी सुझाव

आयोग ने उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण सिफारिशें कीं।

इनमें प्रमुख रूप से निम्न सुझाव शामिल थे—

  • उच्च शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाना।
  • योग्य एवं प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना।
  • विश्वविद्यालयों को कार्य करने की स्वतंत्रता प्रदान करना।
  • नए एवं उपयोगी पाठ्यक्रम प्रारम्भ करना।
  • योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करना।

इन सुझावों से उच्च शिक्षा को अधिक गुणवत्तापूर्ण तथा विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने की दिशा मिली।

7. कृषि शिक्षा के लिए उपयुक्त व्यवस्था

कोठारी आयोग ने कृषि प्रधान भारत में कृषि शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया।

आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर कृषि को कार्यानुभव का अंग बनाने, पॉलीटेक्निक महाविद्यालयों में कृषि शिक्षा की व्यवस्था करने तथा कृषि शिक्षा के उच्च अध्ययन एवं अनुसंधान को विकसित करने का सुझाव दिया।

इस प्रकार आयोग ने कृषि शिक्षा को केवल सैद्धान्तिक अध्ययन तक सीमित न रखकर उसे व्यावहारिक प्रशिक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ने पर बल दिया।

8. शिक्षकों के लिए उपयोगी सुझाव

कोठारी आयोग ने शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए शिक्षकों की स्थिति में सुधार को अत्यन्त आवश्यक माना।

आयोग ने शिक्षकों के वेतन में वृद्धि, सेवा-शर्तों में सुधार, महँगाई भत्ता, फण्ड, बोनस तथा अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करने के सुझाव दिए।

इसके साथ ही शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं की गुणवत्ता सुधारने तथा अध्यापक शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाने पर भी बल दिया गया।

इन सुझावों का उद्देश्य योग्य व्यक्तियों को शिक्षण व्यवसाय की ओर आकर्षित करना तथा शिक्षकों की कार्यकुशलता बढ़ाना था।

9. शिक्षा के अन्य क्षेत्रों के लिए उपयोगी सुझाव

आयोग ने केवल सामान्य विद्यालयी शिक्षा तक अपने सुझाव सीमित नहीं रखे, बल्कि शिक्षा के अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के विकास पर भी ध्यान दिया।

इनमें प्रमुख रूप से निम्न क्षेत्र शामिल थे—

  • स्त्री शिक्षा का विस्तार।
  • व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा का विकास।
  • प्रौढ़ शिक्षा का प्रसार।
  • शैक्षिक अवसरों की समानता।
  • विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान का विकास।

इन सुझावों के माध्यम से आयोग ने शिक्षा को अधिक व्यापक और समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने का प्रयास किया।

3. कोठारी आयोग के दोष

कोठारी आयोग ने भारतीय शिक्षा के विकास के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण सिफारिशें कीं, किन्तु इसके कुछ सुझाव स्पष्ट, व्यावहारिक तथा परस्पर संगत नहीं थे।

आयोग के प्रमुख सात दोष निम्नलिखित हैं—

1. शिक्षा की संरचना में अस्पष्टता

आयोग ने शिक्षा की संरचना के सम्बन्ध में जो सुझाव दिए, वे कई स्थानों पर अस्पष्ट और उलझे हुए थे।

विद्यालयी शिक्षा के विभिन्न स्तरों की अवधि और संगठन सम्बन्धी सुझावों से यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका कि आयोग भारत में किस प्रकार की शिक्षा-संरचना स्थापित करना चाहता था।

इसलिए शिक्षा की प्रस्तावित संरचना को समझने और लागू करने में कठिनाई हो सकती थी।

2. प्राथमिक स्तर पर निर्देशन सम्बन्धी अनुपयुक्त सुझाव

आयोग ने प्राथमिक स्तर पर ही बच्चों के लिए शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन की व्यवस्था करने का सुझाव दिया।

पुस्तक में इस सुझाव को अनुपयुक्त माना गया है, क्योंकि प्राथमिक स्तर के बच्चों की आयु और समझ के अनुसार व्यावसायिक निर्देशन की आवश्यकता तथा उपयोगिता सीमित हो सकती है।

इस प्रकार प्राथमिक स्तर पर व्यावसायिक निर्देशन देने का सुझाव पूरी तरह व्यावहारिक नहीं माना गया।

3. माध्यमिक शिक्षा सम्बन्धी विरोधाभासी सुझाव

आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के सम्बन्ध में दो ऐसे सुझाव दिए जिनमें परस्पर विरोध दिखाई देता है।

  • एक ओर आयोग ने माध्यमिक शिक्षा को लगभग 70% विद्यार्थियों के लिए पूर्ण शिक्षा का स्तर बनाने का सुझाव दिया।
  • दूसरी ओर आयोग ने लगभग 50% विद्यार्थियों को व्यावसायिक वर्ग में प्रवेश देने का सुझाव भी दिया।

इन दोनों सुझावों के बीच स्पष्ट समन्वय नहीं था। इसलिए माध्यमिक शिक्षा के स्वरूप और विद्यार्थियों के विभाजन के सम्बन्ध में भ्रम उत्पन्न होता था।

4. शिक्षा के माध्यम में अस्पष्टता

कोठारी आयोग ने शिक्षा के माध्यम के सम्बन्ध में भी अलग-अलग स्तरों पर विभिन्न सुझाव दिए।

एक ओर आयोग ने भविष्य में उच्च शिक्षा का माध्यम क्षेत्रीय भाषाओं को बनाने की बात कही, जबकि दूसरी ओर विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रखने का सुझाव दिया।

इसी प्रकार माध्यमिक शिक्षा के लिए तीन भाषाओं के अध्ययन की सिफारिश की गई, जिनमें मातृभाषा, संघीय भाषा तथा विदेशी भाषा का उल्लेख था।

इन सुझावों के कारण यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका कि आयोग विभिन्न स्तरों पर किस भाषा को शिक्षा का प्रमुख माध्यम बनाना चाहता था।

5. शिक्षा प्रशासन एवं वित्तीय व्यवस्था में अस्पष्टता

आयोग ने केन्द्र सरकार को शिक्षा पर बजट का 6% व्यय करने का सुझाव दिया, किन्तु पुस्तक के मूल्यांकन के अनुसार यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इस धनराशि की व्यवस्था और उसका उपयोग किस प्रकार किया जाएगा।

इसी प्रकार राज्य सरकारों द्वारा शिक्षा पर व्यय करने के सम्बन्ध में भी कोई स्पष्ट और निश्चित व्यवस्था प्रस्तुत नहीं की गई।

इसलिए आयोग की वित्तीय एवं प्रशासनिक सिफारिशों को पूर्ण रूप से व्यावहारिक बनाने में कठिनाई थी।

6. शिक्षा के विस्तार सम्बन्धी विरोधाभासी सुझाव

कोठारी आयोग ने विद्यालयी, उच्च तथा अन्य प्रकार की शिक्षा के विस्तार और सभी विद्यार्थियों के लिए शैक्षिक अवसरों की समानता की सिफारिश की।

किन्तु छात्र नामांकन एवं मानव शक्ति के विषय में आयोग ने आर्थिक संसाधनों की कमी को भी महत्त्वपूर्ण समस्या माना।

इसके अतिरिक्त आयोग ने एक ओर प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क एवं अनिवार्य बनाने की बात कही, जबकि पुस्तक के मूल्यांकन के अनुसार उच्च प्राथमिक स्तर पर केवल इच्छुक विद्यार्थियों को प्रवेश देने का सुझाव भी दिया गया।

इस प्रकार शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने और प्रवेश को सीमित करने सम्बन्धी सुझावों में विरोधाभास दिखाई देता था।

7. राष्ट्रीय शिक्षा के सम्बन्ध में ठोस सुझावों का अभाव

आयोग ने राष्ट्रीय शिक्षा-व्यवस्था के निर्माण के लिए अनेक सुझाव दिए, किन्तु कुछ विषयों में स्पष्ट और एकरूप दृष्टिकोण प्रस्तुत नहीं कर सका।

उदाहरण के लिए—

  • निम्न माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा को महत्त्व देने की बात कही गई।
  • उच्चतर माध्यमिक शिक्षा में विशिष्टीकरण का सुझाव दिया गया।
  • माध्यमिक शिक्षा में त्रिभाषा सूत्र अपनाने की सिफारिश की गई।
  • भाषा शिक्षा में अंग्रेजी, फ्रेंच तथा अन्य भाषाओं के अध्ययन की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया।

पुस्तक के मूल्यांकन के अनुसार इन सभी सुझावों के पीछे एक स्पष्ट और ठोस राष्ट्रीय शिक्षा-दृष्टिकोण का अभाव दिखाई देता था।

इस कारण आयोग की कुछ सिफारिशों को व्यवहार में लागू करने में कठिनाई हो सकती थी।

कोठारी आयोग के गुण-दोषों का समग्र मूल्यांकन

कोठारी आयोग ने भारतीय शिक्षा की लगभग सभी प्रमुख समस्याओं का अध्ययन करके उनके समाधान के लिए व्यापक सुझाव प्रस्तुत किए।

शिक्षा के राष्ट्रीय महत्त्व, समान अवसर, निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा, शिक्षक शिक्षा, उच्च शिक्षा तथा विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के विकास सम्बन्धी इसकी सिफारिशें अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थीं।

किन्तु शिक्षा की संरचना, माध्यम, प्रशासन, वित्त तथा कुछ प्रवेश सम्बन्धी सुझावों में अस्पष्टता और विरोधाभास भी थे।

इस प्रकार आयोग की सभी सिफारिशें पूर्णतः व्यावहारिक नहीं थीं, फिर भी भारतीय शिक्षा के पुनर्गठन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण में इसकी भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही।

4. कोठारी आयोग की सिफारिशों का भारतीय शिक्षा पर प्रभाव

कोठारी आयोग ने भारतीय शिक्षा के विभिन्न स्तरों का गहन अध्ययन करके शिक्षा के पुनर्गठन और राष्ट्रीय विकास के लिए अनेक सुझाव दिए।

इसकी सिफारिशों ने भारत की शिक्षा नीतियों, विद्यालयी शिक्षा की संरचना, पाठ्यचर्या, उच्च शिक्षा, शिक्षक शिक्षा तथा प्रौढ़ शिक्षा के विकास को महत्त्वपूर्ण दिशा प्रदान की।

भारतीय शिक्षा पर कोठारी आयोग की सिफारिशों के प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं—

1. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 का निर्माण

कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर भारत की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार की गई।

भारत सरकार ने इस नीति की घोषणा 24 जुलाई 1968 को की।

इस नीति के माध्यम से पूरे देश की शिक्षा-व्यवस्था को राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने तथा शिक्षा के विभिन्न स्तरों में सुधार लाने का प्रयास किया गया।

इस प्रकार कोठारी आयोग ने स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण को एक महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान किया।

2. 10+2+3 शिक्षा-संरचना को बढ़ावा

कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर देश में 10+2+3 शिक्षा-संरचना लागू करने के प्रयास प्रारम्भ किए गए।

इस संरचना के अनुसार—

  • 10 वर्ष— विद्यालयी शिक्षा।
  • 2 वर्ष— उच्चतर माध्यमिक शिक्षा।
  • 3 वर्ष— स्नातक शिक्षा।

इस व्यवस्था का उद्देश्य शिक्षा के विभिन्न स्तरों को एक निश्चित क्रम में संगठित करना तथा पूरे देश में शिक्षा-संरचना में एकरूपता लाना था।

3. विद्यालयी पाठ्यचर्या का विकास

कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने प्रथम दस वर्षों की विद्यालयी शिक्षा के लिए आधारभूत पाठ्यचर्या तैयार की।

कुछ राज्यों में इस आधारभूत पाठ्यचर्या के अनुसार दस वर्षीय विद्यालयी शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार करके लागू भी किया गया।

इससे विद्यालयी शिक्षा को अधिक व्यवस्थित और राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने की दिशा में प्रगति हुई।

4. व्यावसायिक शिक्षा के विकास के प्रयास

आयोग ने सामान्य शिक्षा के साथ व्यावसायिक शिक्षा को जोड़ने पर बल दिया था।

इसकी सिफारिशों के आधार पर कुछ राज्यों में उच्चतर माध्यमिक स्तर (+2) पर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की व्यवस्था भी की गई।

हालाँकि पुस्तक के अनुसार इन प्रारम्भिक प्रयासों को अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हो सकी।

फिर भी इनसे विद्यालयी शिक्षा को रोजगार और व्यावहारिक कौशल से जोड़ने की दिशा में प्रयास प्रारम्भ हुए।

5. स्नातक शिक्षा की अवधि में परिवर्तन

कोठारी आयोग की सिफारिशों के प्रभाव से स्नातक पाठ्यक्रम की अवधि 3 वर्ष निर्धारित की गई।

इससे विद्यालयी शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा को एक व्यवस्थित क्रम में संगठित करने में सहायता मिली।

6. उच्च शिक्षा का प्रसार एवं स्तर सुधार

आयोग की सिफारिशों के आधार पर उच्च शिक्षा का स्तर ऊँचा उठाने तथा उसके विस्तार के लिए अनेक प्रयास किए गए।

विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, उच्च अध्ययन की सुविधाएँ बढ़ाने तथा पाठ्यक्रमों को अधिक उपयोगी बनाने पर बल दिया गया।

इससे उच्च शिक्षा के विकास को नई दिशा प्राप्त हुई।

7. शिक्षक शिक्षा में सुधार

कोठारी आयोग ने शिक्षकों की भूमिका और प्रशिक्षण को शिक्षा की गुणवत्ता का महत्त्वपूर्ण आधार माना था।

इसकी सिफारिशों के प्रभाव से शिक्षक शिक्षा एवं प्रशिक्षण व्यवस्था में सुधार के प्रयास किए गए।

अध्यापक शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाने तथा शिक्षकों की व्यावसायिक दक्षता विकसित करने पर ध्यान दिया गया।

8. प्रौढ़ शिक्षा का विस्तार

कोठारी आयोग ने देश की निरक्षरता दूर करने और वयस्क नागरिकों को शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रौढ़ शिक्षा का प्रसार आवश्यक माना।

इसकी सिफारिशों के प्रभाव से प्रौढ़ शिक्षा का विस्तार करने के प्रयास किए गए, जिससे औपचारिक विद्यालयी शिक्षा से वंचित व्यक्तियों को भी शिक्षा प्राप्त करने के अवसर मिल सकें।

9. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 पर प्रभाव

कोठारी आयोग की सिफारिशों ने केवल राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि आगे चलकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के निर्माण को भी महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान किया।

शिक्षा के राष्ट्रीय महत्त्व, समान शैक्षिक अवसर, शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक शिक्षा तथा राष्ट्रीय विकास में शिक्षा की भूमिका जैसे विषयों को आगे की शिक्षा नीतियों में भी महत्त्व दिया गया।

भारतीय शिक्षा के विकास में कोठारी आयोग का स्थान

कोठारी आयोग स्वतंत्र भारत के शिक्षा इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण आयोग था, जिसने प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च, तकनीकी, व्यावसायिक तथा प्रौढ़ शिक्षा तक सम्पूर्ण शिक्षा-व्यवस्था का अध्ययन किया।

आयोग ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का आधार मानते हुए उसके उद्देश्यों, संरचना, प्रशासन, वित्त, पाठ्यक्रम, शिक्षक प्रशिक्षण और शैक्षिक अवसरों की समानता में सुधार की सिफारिश की।

इसके अनेक सुझावों ने भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों तथा शिक्षा-व्यवस्था के पुनर्गठन को प्रभावित किया।

यद्यपि आयोग की सभी सिफारिशें समान रूप से सफल या व्यावहारिक नहीं रहीं, फिर भी भारतीय शिक्षा को अधिक संगठित, व्यापक, गुणवत्तापूर्ण तथा राष्ट्रीय विकास से सम्बन्धित बनाने की दिशा में इसका योगदान महत्त्वपूर्ण रहा।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कोठारी आयोग ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास एवं मानव शक्ति के निर्माण का महत्त्वपूर्ण साधन माना।
  • आयोग ने शिक्षा के लिए 6% व्यय करने तथा राज्य सरकारों को शिक्षा पर अधिक धनराशि खर्च करने का सुझाव दिया।
  • शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर विद्यार्थियों के प्रवेश के लिए राष्ट्रीय नीति निर्धारित करने की सिफारिश की गई।
  • 6–14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा तथा निरक्षरता दूर करने के लिए प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था पर बल दिया गया।
  • माध्यमिक स्तर पर प्रवेश परीक्षा तथा उच्च शिक्षा में केवल योग्य एवं प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को प्रवेश देने का सुझाव दिया गया।
  • व्यावसायिक, तकनीकी एवं कृषि शिक्षा में प्रवेश स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार देने तथा शिक्षा का विस्तार रोजगार के अवसरों से जोड़ने की सिफारिश की गई।
  • प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को विशेष अवसर तथा मानव शक्ति के विकास के लिए सतत शिक्षा की व्यवस्था करने पर बल दिया गया।
  • आयोग के प्रमुख गुणों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का आधार तैयार करना, निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा, उपयुक्त शैक्षिक उद्देश्य तथा माध्यमिक शिक्षा में निर्देशन एवं परामर्श की व्यवस्था शामिल थी।
  • उच्च शिक्षा, कृषि शिक्षा, शिक्षक शिक्षा, स्त्री शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, विज्ञान तथा तकनीकी शिक्षा के लिए आयोग की सिफारिशें महत्त्वपूर्ण थीं।
  • आयोग के प्रमुख दोषों में शिक्षा-संरचना की अस्पष्टता, प्राथमिक स्तर पर निर्देशन सम्बन्धी अनुपयुक्त सुझाव तथा माध्यमिक शिक्षा सम्बन्धी विरोधाभास शामिल थे।
  • शिक्षा के माध्यम, प्रशासन एवं वित्तीय व्यवस्था तथा शिक्षा के विस्तार सम्बन्धी सुझावों में भी अस्पष्टता और विरोधाभास थे।
  • कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर भारत की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति 24 जुलाई 1968 को घोषित की गई।
  • आयोग के प्रभाव से देश में 10+2+3 शिक्षा-संरचना लागू करने के प्रयास प्रारम्भ हुए।
  • NCERT ने प्रथम दस वर्षों की विद्यालयी शिक्षा के लिए आधारभूत पाठ्यचर्या तैयार की, जिसे कुछ राज्यों में लागू किया गया।
  • उच्चतर माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक पाठ्यक्रम प्रारम्भ करने के प्रयास हुए, किन्तु पुस्तक के अनुसार इन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
  • आयोग की सिफारिशों के प्रभाव से स्नातक पाठ्यक्रम की अवधि 3 वर्ष निर्धारित की गई।
  • उच्च शिक्षा के विकास, शिक्षक शिक्षा में सुधार तथा प्रौढ़ शिक्षा के विस्तार के प्रयासों को भी आयोग की सिफारिशों से दिशा मिली।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के निर्माण पर भी कोठारी आयोग की सिफारिशों का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा।
  • कोठारी आयोग ने भारतीय शिक्षा को राष्ट्रीय विकास, सामाजिक समानता, वैज्ञानिक प्रगति तथा मानव शक्ति के विकास से जोड़ने की व्यापक दिशा प्रदान की।
Topic 10 राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986—पृष्ठभूमि, राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली एवं प्रमुख प्रावधान

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986—पृष्ठभूमि, राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली एवं प्रमुख प्रावधान

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का परिचय

भारत में स्वतंत्रता के बाद शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया। देश की बदलती सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और तकनीकी आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा-व्यवस्था में सुधार करने के लिए समय-समय पर विभिन्न आयोग गठित किए गए तथा शिक्षा नीतियाँ बनाई गईं।

इसी क्रम में भारत सरकार ने मई 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 (National Policy on Education, 1986) घोषित की।

इस नीति का प्रमुख उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना, देशभर में समान शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराना, शिक्षा को राष्ट्रीय विकास से जोड़ना तथा भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना था।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें शिक्षा सुधारों के साथ उनके क्रियान्वयन के लिए कार्ययोजना तैयार करने पर भी विशेष ध्यान दिया गया।

1. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का निर्माण अचानक नहीं हुआ था। इसके पीछे स्वतंत्रता के बाद शिक्षा सुधार के लिए किए गए अनेक प्रयास तथा पूर्ववर्ती शिक्षा आयोगों की सिफारिशें थीं।

1. कोठारी आयोग का गठन एवं प्रतिवेदन

भारत सरकार ने सन् 1964 में प्रो. डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग का गठन किया।

इस आयोग ने सन् 1966 में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तथा सम्पूर्ण देश के लिए एक समान शिक्षा-संरचना और राष्ट्रीय शिक्षा नीति विकसित करने की आवश्यकता बताई।

कोठारी आयोग ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का साधन मानते हुए प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक व्यापक सुधारों की सिफारिश की।

2. प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968

कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर भारत सरकार ने 24 जुलाई 1968 को स्वतंत्र भारत की प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की।

इस नीति का उद्देश्य शिक्षा का विस्तार करना, राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना तथा देश की सामाजिक एवं आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा-व्यवस्था विकसित करना था।

3. नई शिक्षा नीति बनाने के प्रयास

मार्च 1977 में केन्द्र में जनता दल के नेतृत्व वाली सरकार बनी। इस सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार करने का प्रयास किया।

सन् 1979 में एक नई शिक्षा नीति की घोषणा की गई, किन्तु केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के कारण इसे प्रभावी रूप से लागू नहीं किया जा सका।

इसके बाद कांग्रेस सरकार ने पुनः राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 के प्रावधानों को लागू करने पर बल दिया।

4. राजीव गाँधी के कार्यकाल में नई शिक्षा नीति

प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गाँधी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में सुधार के प्रयास प्रारम्भ किए।

शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए तत्कालीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया गया तथा प्राप्त सुझावों के आधार पर नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार की गई।

नई शिक्षा नीति संसद में प्रस्तुत की गई और स्वीकृति प्राप्त होने के बाद मई 1986 में इसे प्रकाशित किया गया।

इसके क्रियान्वयन के लिए एक अलग कार्ययोजना भी तैयार की गई, ताकि नीति के उद्देश्यों को व्यवहार में लागू करने की व्यवस्था की जा सके।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण तथ्य

बिन्दु विवरण
पूर्ववर्ती शिक्षा आयोग कोठारी आयोग, 1964–1966
प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986
घोषणा / प्रकाशन मई 1986
तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी
मूल नीति दस्तावेज 12 खण्ड
शिक्षा-संरचना 10+2+3
प्रमुख विशेषता नीति के साथ क्रियान्वयन की कार्ययोजना

2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रमुख उद्देश्य

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का उद्देश्य भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को अधिक प्रभावी, समावेशी और राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुकूल बनाना था।

इस नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे—

  • समान शैक्षिक अवसर— जाति, धर्म, लिंग तथा सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी नागरिकों को शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर उपलब्ध कराना।
  • राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली— सम्पूर्ण देश में एक समान शिक्षा-संरचना विकसित करना, जिससे शिक्षा के विभिन्न स्तरों में एकरूपता स्थापित हो।
  • प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण— सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराना तथा विद्यालय में उनका नामांकन और ठहराव सुनिश्चित करना।
  • शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार— पाठ्यचर्या, शिक्षण-विधियों, शिक्षक प्रशिक्षण तथा परीक्षा प्रणाली में सुधार करना।
  • सामाजिक असमानता को दूर करना— महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों की शिक्षा का विकास करना।
  • विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा— वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना तथा तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा को प्रोत्साहित करना।
  • रोजगारपरक शिक्षा— शिक्षा को व्यावहारिक ज्ञान, कार्यानुभव और रोजगार की आवश्यकताओं से जोड़ना।
  • राष्ट्रीय एकता एवं मूल्यों का विकास— विद्यार्थियों में समानता, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक न्याय की भावना विकसित करना।

3. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का मूल दस्तावेज

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का मूल दस्तावेज कुल 12 खण्डों में विभाजित था।

इन खण्डों में शिक्षा के महत्त्व, राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली, समान शैक्षिक अवसर, विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक पुनर्गठन, शिक्षक शिक्षा, शिक्षा प्रशासन तथा शिक्षा के लिए आवश्यक संसाधनों आदि का वर्णन किया गया।

इन बारह खण्डों का विवरण निम्नलिखित है।

खण्ड 1. प्रस्तावना (Introduction)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की प्रस्तावना में देश की बदलती परिस्थितियों और शिक्षा सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया।

भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी तथा सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी परिस्थितियों में निरन्तर परिवर्तन हो रहा था।

इन परिस्थितियों में देश के सामने नई चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही थीं। इन चुनौतियों का सामना करने तथा लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षा-व्यवस्था में सुधार आवश्यक था।

प्रमुख विचार
  • देश के आर्थिक एवं तकनीकी विकास का लाभ अधिक से अधिक नागरिकों तक पहुँचाया जाए।
  • बढ़ती जनसंख्या और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार शिक्षा को विकसित किया जाए।
  • नई सामाजिक आवश्यकताओं और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए शिक्षा में सुधार किया जाए।
  • राष्ट्रीय विकास के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए नई शिक्षा नीति तैयार करके उसे प्रभावी रूप से लागू किया जाए।

खण्ड 2. शिक्षा का सार एवं भूमिका (Essence and Role of Education)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में शिक्षा को मानव जीवन के विकास का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साधन माना गया।

नीति के अनुसार शिक्षा से व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक, चारित्रिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय और लोकतांत्रिक गुणों का विकास होता है।

शिक्षा व्यक्ति में स्वतंत्र विचार करने की क्षमता विकसित करती है तथा उसे सामाजिक जीवन में अपने अधिकारों और उत्तरदायित्वों को समझने योग्य बनाती है।

शिक्षा की प्रमुख भूमिकाएँ
  • व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास करना।
  • स्वतंत्र चिन्तन और निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना।
  • राष्ट्रीय एकता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत बनाना।
  • समानता, स्वतंत्रता, भ्रातृत्व, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और न्याय जैसे मूल्यों का विकास करना।
  • व्यक्ति को वर्तमान एवं भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करना।

इस प्रकार नीति में शिक्षा को व्यक्ति के सर्वांगीण विकास तथा समाज और राष्ट्र के निर्माण का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया।

खण्ड 3. राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली (National System of Education)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का एक प्रमुख प्रावधान पूरे देश में राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली को विकसित करना था।

राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली से आशय ऐसी शिक्षा-व्यवस्था से है जिसमें देश के सभी नागरिकों को समान शैक्षिक अवसर प्राप्त हों और शिक्षा के विभिन्न स्तरों की संरचना में एकरूपता हो।

इस नीति में जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी नागरिकों के लिए शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।

10+2+3 शिक्षा-संरचना

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में पूरे देश में 10+2+3 शिक्षा-संरचना को अपनाने पर बल दिया गया।

इस संरचना के अनुसार शिक्षा को निम्नलिखित चरणों में व्यवस्थित किया गया—

शिक्षा का स्तर अवधि
प्राथमिक शिक्षा 5 वर्ष
उच्च प्राथमिक शिक्षा 3 वर्ष
हाईस्कूल शिक्षा 2 वर्ष
उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (+2) 2 वर्ष
स्नातक शिक्षा (+3) 3 वर्ष

इस प्रकार प्रारम्भिक 10 वर्षों में 5 वर्ष की प्राथमिक, 3 वर्ष की उच्च प्राथमिक तथा 2 वर्ष की हाईस्कूल शिक्षा शामिल थी।

इसके बाद 2 वर्ष की उच्चतर माध्यमिक शिक्षा और 3 वर्ष की स्नातक शिक्षा की व्यवस्था प्रस्तावित थी।

राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के अन्य प्रावधान
  • शिक्षा के प्रत्येक स्तर के लिए न्यूनतम शैक्षिक मानक निर्धारित किए जाएँ।
  • देश में सम्पर्क भाषा के विकास को प्रोत्साहित किया जाए।
  • उच्च एवं तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को समान अवसर उपलब्ध कराए जाएँ।
  • विज्ञान, तकनीकी और अनुसंधान से सम्बन्धित संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित किया जाए।
  • युवाओं, गृहिणियों, श्रमिकों, किसानों तथा व्यापारियों आदि को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा जारी रखने के अवसर दिए जाएँ।

इस प्रणाली के विकास में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE), राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) तथा अन्य राष्ट्रीय संस्थाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी गई।

खण्ड 4. समानता के लिए शिक्षा (Education for Equality)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में शिक्षा को सामाजिक असमानताओं को दूर करने का महत्त्वपूर्ण माध्यम माना गया।

इस खण्ड का उद्देश्य समाज के उन वर्गों तक शिक्षा पहुँचाना था जो आर्थिक, सामाजिक अथवा अन्य कारणों से पर्याप्त शिक्षा प्राप्त नहीं कर पा रहे थे।

प्रमुख प्रावधान
1. महिला शिक्षा का विकास

महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए शिक्षा का विशेष उपयोग किया जाए तथा शिक्षण संस्थाओं में महिला विकास से सम्बन्धित कार्यक्रम प्रारम्भ किए जाएँ।

बालिकाओं की शिक्षा में आने वाली बाधाओं को दूर करने और उनके लिए समान शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।

2. निर्धन एवं पिछड़े वर्गों की शिक्षा

निर्धन परिवारों के बच्चों को 14 वर्ष तक की अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

अनुसूचित जाति तथा अन्य वंचित वर्गों के विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, छात्रावास और आवश्यक शैक्षिक सुविधाओं का विस्तार किया जाए।

3. अनुसूचित जनजातियों की शिक्षा

अनुसूचित जनजातियों के बच्चों के लिए शैक्षिक सुविधाएँ विकसित की जाएँ तथा आवश्यकता के अनुसार ग्रामीण रोजगार और रोजगार गारंटी जैसे कार्यक्रमों से भी सहायता उपलब्ध कराई जाए।

4. दिव्यांग बच्चों की शिक्षा

शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों की शिक्षा के लिए विशेष विद्यालय खोले जाएँ तथा उनकी आवश्यकताओं के अनुसार व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए।

5. प्रौढ़ शिक्षा

निरक्षर वयस्कों को साक्षर बनाने के लिए प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रम विकसित किए जाएँ।

इस प्रकार इस खण्ड में शिक्षा के माध्यम से सामाजिक समानता, महिला सशक्तीकरण तथा वंचित वर्गों के शैक्षिक विकास पर विशेष बल दिया गया।

खण्ड 5. विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक पुनर्गठन (Educational Reorganisation at Various Levels)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर पुनर्गठन करके उनकी गुणवत्ता तथा उपयोगिता बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई।

इस खण्ड में शिशुओं की देखभाल से लेकर उच्च शिक्षा तक विभिन्न स्तरों पर सुधार के प्रावधान किए गए।

1. शिशुओं की देखभाल एवं प्रारम्भिक शिक्षा

छोटे बच्चों की देखभाल और प्रारम्भिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाए।

बच्चों की देखभाल करने वाली संस्थाओं तथा शिक्षा केन्द्रों के बीच उचित समन्वय स्थापित किया जाए और इन कार्यक्रमों में स्थानीय समुदाय का सहयोग लिया जाए।

2. प्राथमिक शिक्षा में सुधार

प्राथमिक शिक्षा में 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के प्रवेश और विद्यालय में बने रहने पर बल दिया गया।

शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए शिक्षण सामग्री और आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जाए तथा ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना लागू की जाए।

3. माध्यमिक शिक्षा का विकास

माध्यमिक स्तर पर योग्य एवं प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के विकास के लिए गति निर्धारक विद्यालय (Pace Setting Schools) स्थापित करने का सुझाव दिया गया।

माध्यमिक पाठ्यक्रमों में विविधता लाने तथा व्यावसायिक शिक्षा के कार्यक्रमों की नियमित समीक्षा करने पर भी बल दिया गया।

4. उच्च शिक्षा का पुनर्गठन

उच्च शिक्षा का नियोजन और उच्च शिक्षण संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए आवश्यक संस्थागत व्यवस्था विकसित की जाए।

विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, अनुसंधान को सहायता देने तथा विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के अधिक अवसर उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त शिक्षा को अधिक जनतांत्रिक बनाने के उद्देश्य से मुक्त विश्वविद्यालयों की स्थापना तथा उच्च शिक्षा के विस्तार को प्रोत्साहित किया गया।

खण्ड 6. तकनीकी तथा प्रबन्ध शिक्षा (Technical and Management Education)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में तकनीकी और प्रबन्ध शिक्षा को देश के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक माना गया।

नीति के अनुसार तकनीकी शिक्षा का विकास करते समय वर्तमान तथा भविष्य की आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

प्रमुख प्रावधान
  • तकनीकी तथा प्रबन्ध शिक्षा का पुनर्गठन किया जाए।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में भी तकनीकी शिक्षा की सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
  • महिलाओं, आर्थिक एवं सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों तथा दिव्यांग व्यक्तियों के लिए तकनीकी शिक्षा की उचित व्यवस्था की जाए।
  • तकनीकी और प्रबन्ध शिक्षा के पाठ्यक्रमों को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया जाए।
  • पॉलीटेक्निक विद्यालयों एवं तकनीकी संस्थानों के विकास को प्रोत्साहित किया जाए।
  • विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त मार्गदर्शन एवं परामर्श की व्यवस्था की जाए।

इस प्रकार नीति ने तकनीकी शिक्षा को अधिक उपयोगी तथा समाज के विभिन्न वर्गों के लिए सुलभ बनाने पर बल दिया।

खण्ड 7. शिक्षा व्यवस्था का क्रियान्वयन (Implementation of Education System)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में शिक्षा सम्बन्धी सुधारों को केवल कागजों तक सीमित न रखकर उन्हें व्यवहार में लागू करने पर बल दिया गया।

इस उद्देश्य से शिक्षकों, शिक्षण संस्थाओं तथा शिक्षा प्रशासन की जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने की आवश्यकता बताई गई।

प्रमुख प्रावधान
  • शिक्षकों की जवाबदेही— सभी अध्यापकों के शैक्षिक उत्तरदायित्व निर्धारित किए जाएँ।
  • उचित आचरण— शिक्षक विद्यार्थियों के लिए आदर्श आचरण प्रस्तुत करें।
  • शैक्षिक सुविधाओं का विस्तार— शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों को अधिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
  • संस्थागत मूल्यांकन— शिक्षण संस्थाओं का मूल्यांकन राज्य स्तर पर निर्धारित शैक्षिक मानकों के आधार पर किया जाए।

इस खण्ड का उद्देश्य शिक्षा-व्यवस्था में उत्तरदायित्व, अनुशासन तथा गुणवत्ता सुनिश्चित करना था।

खण्ड 8. शिक्षा की विषय-वस्तु तथा प्रक्रिया को नया मोड़ देना (New Direction to the Content and Process of Education)

इस खण्ड में शिक्षा की पाठ्यचर्या, शिक्षण प्रक्रिया तथा मूल्यांकन को अधिक आधुनिक, उपयोगी और विद्यार्थी-केंद्रित बनाने पर बल दिया गया।

नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल पुस्तकीय ज्ञान देना नहीं था, बल्कि उनमें समझने, तर्क करने, स्वतंत्र अध्ययन करने और व्यावहारिक समस्याओं का समाधान करने की क्षमता विकसित करना भी था।

प्रमुख प्रावधान
1. पाठ्यचर्या एवं पाठ्यपुस्तकों में सुधार

विद्यालयों के पाठ्यक्रम और शिक्षण प्रक्रियाओं को अधिक सुदृढ़ बनाया जाए।

पाठ्यपुस्तकों की गुणवत्ता सुधारी जाए तथा विद्यार्थियों तक उनकी आसान उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

2. पुस्तकालयों का विकास

विद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थाओं में पुस्तकालयों की स्थिति सुधारने तथा नए पुस्तकालय स्थापित करने पर बल दिया गया।

3. स्वाध्याय एवं रचनात्मक लेखन

विद्यार्थियों में स्वाध्याय, स्वतंत्र चिन्तन तथा रचनात्मक लेखन को प्रोत्साहित किया जाए।

4. शैक्षिक तकनीकी का उपयोग

शिक्षा में सूचनाओं के प्रसार, कला एवं संस्कृति के प्रति जागरूकता और मूल्य-विकास के लिए शैक्षिक तकनीकी का उपयोग किया जाए।

5. कार्यानुभव एवं पर्यावरण शिक्षा

कार्यानुभव को शिक्षा के सभी स्तरों पर आवश्यक अंग बनाया जाए तथा विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता विकसित की जाए।

6. गणित एवं विज्ञान शिक्षा में सुधार

गणित की शिक्षा में विद्यार्थियों को समझने, विश्लेषण करने और तार्किक चिन्तन का प्रशिक्षण दिया जाए।

विज्ञान शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों में जिज्ञासा, सृजनशीलता तथा वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण विकसित किया जाए।

7. खेलकूद एवं शारीरिक शिक्षा

शारीरिक शिक्षा और खेलकूद को शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के आवश्यक अंग के रूप में स्वीकार किया जाए।

विद्यार्थियों के मूल्यांकन में भी इन गतिविधियों को उचित स्थान दिया जाए।

8. परीक्षा एवं मूल्यांकन प्रणाली में सुधार

परीक्षा प्रणाली को अधिक वैध, विश्वसनीय तथा उपयोगी बनाया जाए।

इसके लिए सतत एवं व्यापक मूल्यांकन को अपनाने, परीक्षा संचालन में सुधार करने तथा अंकों के स्थान पर ग्रेड प्रणाली के उपयोग पर बल दिया गया।

इस प्रकार इस खण्ड का मुख्य उद्देश्य शिक्षण प्रक्रिया को ज्ञान-केंद्रित होने के साथ अनुभव, तर्क, सृजनशीलता तथा व्यावहारिक जीवन से सम्बन्धित बनाना था।

खण्ड 9. अध्यापक (Teachers)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 ने अध्यापकों को शिक्षा-व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण आधार माना।

नीति के अनुसार शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए शिक्षकों को उचित प्रशिक्षण, सम्मान तथा आवश्यक सुविधाएँ प्रदान करना जरूरी है।

प्रमुख प्रावधान
  • वेतन में सुधार— अध्यापकों के वेतन एवं सेवा-शर्तों में सुधार किया जाए।
  • समानता का प्रयास— सम्पूर्ण देश में शिक्षकों के वेतन एवं सेवा सम्बन्धी व्यवस्थाओं में उचित समानता स्थापित की जाए।
  • अध्यापक शिक्षा— शिक्षक प्रशिक्षण तथा अध्यापक शिक्षा की व्यवस्था में सुधार किया जाए।
  • शिक्षकों की गरिमा— समाज में अध्यापकों की प्रतिष्ठा तथा मर्यादा को बनाए रखा जाए।
  • सृजनात्मकता का विकास— शिक्षकों को रचनात्मक एवं सृजनात्मक शिक्षण कार्य के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

इस खण्ड का उद्देश्य योग्य और समर्पित शिक्षकों के माध्यम से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना था।

खण्ड 10. शिक्षा का प्रबन्ध (Management of Education)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में शिक्षा की योजना तथा प्रबन्ध व्यवस्था में सुधार को प्राथमिकता दी गई।

नीति के अनुसार शैक्षिक प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए विकेन्द्रीकरण तथा शिक्षण संस्थाओं की स्वायत्तता को महत्त्व दिया जाना चाहिए।

प्रमुख प्रावधान
  • शिक्षा के लिए दीर्घकालीन योजनाएँ तैयार की जाएँ।
  • शिक्षा प्रशासन का विकेन्द्रीकरण किया जाए।
  • शिक्षण संस्थाओं में स्वतंत्रता एवं उत्तरदायित्व की भावना विकसित की जाए।
  • शैक्षिक योजना और प्रबन्ध में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए।
  • शिक्षा प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाए।
  • राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय शिक्षा सेवा स्थापित की जाए।
  • राज्य स्तर पर प्रान्तीय शिक्षा सेवा की व्यवस्था की जाए।
  • जिला स्तर पर जिला शिक्षा परिषद का गठन किया जाए।

इस प्रकार नीति ने शिक्षा के प्रभावी प्रशासन के लिए केन्द्र, राज्य और जिला स्तर पर उत्तरदायित्वपूर्ण संस्थागत व्यवस्था विकसित करने पर बल दिया।

खण्ड 11. संसाधन और समीक्षा (Resources and Review)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में यह स्वीकार किया गया कि शिक्षा के व्यापक विकास तथा उसकी योजनाओं को लागू करने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होगी।

प्रमुख प्रावधान
  • आर्थिक संसाधनों की व्यवस्था— शिक्षा सम्बन्धी प्रस्तावित कार्यक्रमों के लिए दान, उपहार, शुल्क तथा अन्य स्रोतों से आवश्यक धनराशि जुटाने की व्यवस्था की जाए।
  • शिक्षा पर निवेश— आठवीं पंचवर्षीय योजना से शिक्षा में राष्ट्रीय आय के 6% से अधिक निवेश का लक्ष्य रखा जाए।
  • नीति की नियमित समीक्षा— प्रत्येक 5 वर्ष बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समीक्षा की जाए।
  • प्रगति का मूल्यांकन— समय-समय पर शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति का मूल्यांकन करके आवश्यक सुधार किए जाएँ।

इस खण्ड का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि शिक्षा सुधारों के लिए आवश्यक धनराशि उपलब्ध हो तथा योजनाओं के क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा की जा सके।

खण्ड 12. भविष्य (Future)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के अन्तिम खण्ड में भारत की भावी शिक्षा-व्यवस्था के प्रति आशा और विश्वास व्यक्त किया गया।

इसमें यह विश्वास प्रकट किया गया कि भविष्य में देश पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को प्राप्त करेगा तथा भारत के उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति विश्व के श्रेष्ठ शिक्षित व्यक्तियों में स्थान प्राप्त करेंगे।

इस प्रकार शिक्षा नीति का दीर्घकालीन उद्देश्य भारत को एक शिक्षित, सक्षम, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला तथा विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ाना था।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की प्रमुख विशेषताएँ

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के विभिन्न प्रावधानों से इसकी निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं—

  • राष्ट्रीय एकरूपता— सम्पूर्ण देश में 10+2+3 शिक्षा-संरचना तथा राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली को विकसित करने पर बल।
  • समान अवसर— महिलाओं, वंचित वर्गों तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के शैक्षिक विकास पर ध्यान।
  • प्राथमिक शिक्षा को प्राथमिकता— सभी बच्चों तक प्राथमिक शिक्षा पहुँचाने और विद्यालयों में आवश्यक सुविधाएँ विकसित करने का प्रयास।
  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा— पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकों, शिक्षण-विधियों तथा परीक्षा प्रणाली में सुधार पर बल।
  • व्यावहारिक एवं तकनीकी शिक्षा— विज्ञान, तकनीकी, कार्यानुभव और रोजगारपरक शिक्षा को प्रोत्साहन।
  • शिक्षक शिक्षा का विकास— शिक्षक प्रशिक्षण, सेवा-शर्तों तथा शिक्षकों की व्यावसायिक दक्षता में सुधार।
  • विकेन्द्रीकृत प्रशासन— शिक्षा की योजना तथा प्रबन्ध में केन्द्र, राज्य और स्थानीय स्तर की भागीदारी।
  • आर्थिक संसाधन एवं समीक्षा— शिक्षा पर अधिक निवेश तथा निर्धारित अन्तराल पर नीति की समीक्षा की व्यवस्था।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का शैक्षिक महत्त्व

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को अधिक व्यापक, व्यवस्थित और आधुनिक बनाने की दिशा प्रस्तुत की।

इस नीति ने शिक्षा को केवल व्यक्तिगत ज्ञान प्राप्त करने का साधन न मानकर उसे राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समानता, वैज्ञानिक प्रगति तथा आर्थिक विकास से जोड़ा।

इसमें सभी बच्चों की प्राथमिक शिक्षा, महिलाओं तथा वंचित वर्गों के शैक्षिक विकास, शिक्षकों के प्रशिक्षण, तकनीकी शिक्षा, पाठ्यचर्या सुधार और शिक्षा प्रशासन में सुधार पर बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त नीति के क्रियान्वयन के लिए कार्ययोजना तैयार करने तथा उसकी नियमित समीक्षा की व्यवस्था पर ध्यान दिया गया।

इस प्रकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 ने भारतीय शिक्षा को समान अवसर, गुणवत्ता, व्यावहारिकता तथा राष्ट्रीय विकास की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान किया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की पृष्ठभूमि में कोठारी आयोग (1964–1966) तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
  • भारत की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति 24 जुलाई 1968 को घोषित की गई थी।
  • प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के कार्यकाल में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार की गई तथा मई 1986 में प्रकाशित की गई।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का मूल दस्तावेज कुल 12 खण्डों में विभाजित था।
  • नीति का प्रमुख उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना, समान शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराना तथा शिक्षा को राष्ट्रीय विकास से जोड़ना था।
  • राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत पूरे देश में 10+2+3 शिक्षा-संरचना अपनाने पर बल दिया गया।
  • 10+2+3 संरचना में 5 वर्ष प्राथमिक, 3 वर्ष उच्च प्राथमिक, 2 वर्ष हाईस्कूल, 2 वर्ष उच्चतर माध्यमिक तथा 3 वर्ष स्नातक शिक्षा की व्यवस्था थी।
  • शिक्षा को व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक, सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक विकास का साधन माना गया।
  • शिक्षा में जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव समाप्त करके सभी नागरिकों को समान अवसर उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।
  • महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, निर्धन वर्गों तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा के विकास को महत्त्व दिया गया।
  • प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण तथा विद्यालयी सुविधाओं में सुधार के लिए ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना को महत्त्व दिया गया।
  • माध्यमिक स्तर पर प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के विकास के लिए गति निर्धारक विद्यालय स्थापित करने पर बल दिया गया।
  • उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने तथा उसके प्रसार के लिए मुक्त विश्वविद्यालयों के विकास को प्रोत्साहित किया गया।
  • तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा का विस्तार करने तथा महिलाओं, ग्रामीण क्षेत्रों और कमजोर वर्गों को अधिक अवसर देने की सिफारिश की गई।
  • शिक्षा की विषय-वस्तु और प्रक्रिया में सुधार के लिए स्वाध्याय, कार्यानुभव, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, रचनात्मकता और शैक्षिक तकनीकी पर बल दिया गया।
  • परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए सतत एवं व्यापक मूल्यांकन तथा ग्रेड प्रणाली को प्रोत्साहित किया गया।
  • अध्यापकों के वेतन, सेवा-शर्तों, प्रशिक्षण तथा सामाजिक प्रतिष्ठा में सुधार को शिक्षा की गुणवत्ता के लिए आवश्यक माना गया।
  • शिक्षा प्रशासन में विकेन्द्रीकरण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय शिक्षा सेवा, राज्य स्तर पर प्रान्तीय शिक्षा सेवा तथा जिला स्तर पर जिला शिक्षा परिषद के गठन पर बल दिया गया।
  • नीति में आठवीं पंचवर्षीय योजना से शिक्षा पर राष्ट्रीय आय के 6% से अधिक निवेश का लक्ष्य तथा प्रत्येक 5 वर्ष बाद नीति की समीक्षा का प्रावधान किया गया।
  • नीति के अन्तिम खण्ड में भविष्य में पूर्ण साक्षरता प्राप्त करने तथा भारत की उच्च शिक्षा को विश्वस्तरीय बनाने की आशा व्यक्त की गई।
Topic 11 राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986—कार्ययोजना, मूल तत्त्व, मूल्यांकन एवं प्रभाव

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986—कार्ययोजना, मूल तत्त्व, मूल्यांकन एवं प्रभाव

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की कार्ययोजना

भारत सरकार ने मई 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की। इस नीति के उद्देश्यों और प्रावधानों को व्यवहार में लागू करने के लिए नवम्बर 1986 में इसकी कार्ययोजना (Programme of Action) प्रकाशित की गई।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का मूल दस्तावेज 12 खण्डों में विभाजित था, जबकि इसकी कार्ययोजना को 24 खण्डों में व्यवस्थित किया गया।

इस कार्ययोजना का उद्देश्य शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर सुधार करना, शिक्षण संस्थाओं की गुणवत्ता बढ़ाना तथा महिलाओं, वंचित वर्गों और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों तक शिक्षा की सुविधाएँ पहुँचाना था।

कार्ययोजना के सभी 24 खण्ड निम्नलिखित हैं।

1. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की कार्ययोजना के 24 खण्ड

खण्ड 1. पूर्व बाल्यावस्था एवं शिक्षा

इस खण्ड में जन्म से 6 वर्ष की आयु तक बच्चों की उचित देखभाल, स्वास्थ्य, पोषण तथा पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के विकास पर बल दिया गया।

बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण को पूर्व-प्राथमिक शिक्षा से जोड़ने तथा इन कार्यक्रमों के लिए आवश्यक संस्थाओं और अलग धनराशि की व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया।

खण्ड 2. प्राथमिक शिक्षा एवं ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड

इस खण्ड का उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण करना तथा प्राथमिक विद्यालयों की आधारभूत सुविधाओं में सुधार करना था।

इसके अन्तर्गत सभी बच्चों के लिए लगभग 1 किलोमीटर की दूरी के भीतर प्राथमिक विद्यालय तथा 3 किलोमीटर की दूरी के भीतर उच्च प्राथमिक विद्यालय उपलब्ध कराने की बात कही गई।

प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति सुधारने के लिए ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना प्रस्तावित की गई।

ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना

ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना का उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों में आवश्यक भौतिक सुविधाएँ, शिक्षण सामग्री तथा पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराकर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना था।

पुस्तक के अनुसार योजना में निम्नलिखित सुविधाओं की व्यवस्था प्रस्तावित थी—

  • प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम दो बड़े कमरे हों।
  • विद्यालय में एक बरामदा तथा पर्याप्त शौचालयों की व्यवस्था हो।
  • प्रत्येक विद्यालय में कम से कम दो शिक्षक हों, जिनमें जहाँ तक सम्भव हो एक महिला अध्यापिका हो।
  • विद्यालयों में ब्लैकबोर्ड, नक्शे, खिलौने, चार्ट तथा अन्य शिक्षण सहायक सामग्री उपलब्ध हो।
  • विद्यालयों में उचित फर्नीचर तथा पठन-पाठन की आवश्यक सुविधाएँ हों।

इस प्रकार ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना का मुख्य उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों में न्यूनतम आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना था।

खण्ड 3. माध्यमिक शिक्षा का प्रसार

माध्यमिक शिक्षा का विस्तार करने के लिए आवश्यकता के अनुसार नए माध्यमिक विद्यालय खोलने तथा वर्तमान विद्यालयों की स्थिति सुधारने का सुझाव दिया गया।

इसके अतिरिक्त प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के विकास के लिए गति निर्धारक विद्यालय (Pace Setting Schools) तथा माध्यमिक स्तर पर मुक्त शिक्षा की व्यवस्था करने की योजना प्रस्तुत की गई।

खण्ड 4. शिक्षा का व्यवसायीकरण

इस खण्ड में शिक्षा को व्यावसायिक एवं रोजगारपरक बनाने पर बल दिया गया।

इसके अन्तर्गत शिक्षा में कार्यानुभव को महत्त्व देने, उच्चतर माध्यमिक स्तर (+2) पर विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रम प्रारम्भ करने तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े बच्चों के लिए विशेष व्यावसायिक संस्थान स्थापित करने की योजना प्रस्तुत की गई।

इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को सामान्य शिक्षा के साथ रोजगार से सम्बन्धित व्यावहारिक ज्ञान और कौशल प्रदान करना था।

खण्ड 5. उच्च शिक्षा

उच्च शिक्षा का स्तर ऊँचा उठाने तथा उसकी गुणवत्ता सुधारने के लिए प्रवेश परीक्षाओं, पाठ्यक्रम सुधार, अनुसंधान सुविधाओं और योग्य शिक्षकों की व्यवस्था पर बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को पर्याप्त शैक्षिक संसाधन उपलब्ध कराने की योजना प्रस्तुत की गई।

खण्ड 6. दूरस्थ शिक्षा तथा खुला विश्वविद्यालय

दूरस्थ शिक्षा के विस्तार के लिए इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) के कार्यक्रमों का विस्तार करने तथा नए मुक्त विश्वविद्यालय स्थापित करने की योजना बनाई गई।

इसका उद्देश्य ऐसे विद्यार्थियों और व्यक्तियों को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करना था जो नियमित शिक्षण संस्थाओं में उपस्थित नहीं हो सकते।

खण्ड 7. ग्रामीण संस्थान एवं विश्वविद्यालय

ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के विकास के लिए केन्द्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद के गठन, ग्रामीण संस्थाओं एवं विश्वविद्यालयों के पुनर्गठन तथा कुछ संस्थाओं को स्वायत्तता प्रदान करने की योजना प्रस्तुत की गई।

इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का विस्तार करना तथा शिक्षण संस्थाओं को अधिक प्रभावशाली बनाना था।

खण्ड 8. प्रबन्ध एवं तकनीकी शिक्षा

तकनीकी शिक्षा के विकास के लिए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) तथा राज्यों के तकनीकी शिक्षा बोर्डों को मजबूत बनाने पर बल दिया गया।

कुछ तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षण संस्थाओं को स्वायत्तता देने तथा इस क्षेत्र में सतत शिक्षा की व्यवस्था करने की योजना प्रस्तुत की गई।

खण्ड 9. शिक्षा प्रणाली का कार्यान्वयन

इस खण्ड में शिक्षण संस्थाओं के प्रशासन, शिक्षकों की शैक्षिक योग्यता तथा शिक्षक एवं विद्यार्थियों की कार्यप्रणाली में सुधार करने पर बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त शिक्षण संस्थाओं के नियमित मूल्यांकन की व्यवस्था करने की योजना प्रस्तुत की गई।

खण्ड 10. रोजगार की उपलब्धता

रोजगार सम्बन्धी अवसरों के लिए राष्ट्रीय परीक्षण सेवा (National Testing Service) प्रारम्भ करने का प्रस्ताव किया गया।

इस व्यवस्था के अन्तर्गत क्षेत्र-विशेष के रोजगार प्राप्त करने के लिए सम्बन्धित राष्ट्रीय परीक्षण में सफल होने की आवश्यकता बताई गई।

इसका उद्देश्य योग्यता के आधार पर रोजगार सम्बन्धी चयन की व्यवस्था विकसित करना था।

खण्ड 11. शोध तथा विकास

उच्च शिक्षा में अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के लिए पाठ्यक्रमों का विस्तार, शोध केन्द्रों में सुधार तथा प्रतिभाशाली शोधार्थियों की पहचान करने पर बल दिया गया।

कार्यरत शिक्षकों को भी अधिक से अधिक अनुसंधान के अवसर उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई।

खण्ड 12. स्त्री शिक्षा

महिलाओं की शिक्षा का विस्तार करने के लिए बालिकाओं हेतु अलग विद्यालय और महाविद्यालय स्थापित करने, छात्रवृत्तियाँ प्रदान करने तथा महिला शिक्षकों की नियुक्ति में प्राथमिकता देने की योजना प्रस्तुत की गई।

इसका उद्देश्य बालिकाओं को अधिक शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराना तथा शिक्षा में स्त्री-पुरुष असमानता को कम करना था।

खण्ड 13. अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़े वर्गों की शिक्षा

इस खण्ड में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्गों के क्षेत्रों में विद्यालय खोलने और विद्यार्थियों को छात्रवृत्तियाँ उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त छात्रावासों की व्यवस्था करने तथा इन वर्गों के योग्य शिक्षकों की नियुक्ति की योजना प्रस्तुत की गई।

खण्ड 14. अल्पसंख्यकों की शिक्षा

अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक विकास के लिए उनके क्षेत्रों में विद्यालय और पॉलीटेक्निक महाविद्यालय स्थापित करने का सुझाव दिया गया।

इसके साथ शिक्षकों को प्रशिक्षण देने तथा अल्पसंख्यक वर्ग की बालिकाओं के लिए शिक्षा सम्बन्धी योजनाएँ विकसित करने पर बल दिया गया।

खण्ड 15. विकलांग बच्चों की शिक्षा

विकलांग बच्चों की शिक्षा के लिए जिला स्तर पर आवश्यक सेवाएँ प्रारम्भ करने तथा उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उचित शैक्षिक सुविधाएँ विकसित करने की योजना प्रस्तुत की गई।

इसका उद्देश्य विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के अधिक अवसर उपलब्ध कराना था।

खण्ड 16. प्रौढ़ शिक्षा

निरक्षर वयस्कों को शिक्षा प्रदान करने के लिए गाँवों में प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र तथा पुस्तकालय स्थापित करने की योजना प्रस्तुत की गई।

इससे औपचारिक विद्यालयी शिक्षा से वंचित व्यक्तियों को साक्षर बनाने तथा उनके ज्ञान में वृद्धि करने का प्रयास किया जाना था।

खण्ड 17. स्कूली शिक्षा की विषयवस्तु

विद्यालयी शिक्षा की विषयवस्तु और शिक्षण प्रक्रिया में सुधार के लिए राष्ट्रीय कोर पाठ्यक्रम तथा पाठ्यपुस्तकों को बेहतर बनाने की योजना प्रस्तुत की गई।

इसका उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा को राष्ट्रीय आवश्यकताओं और विद्यार्थियों के विकास के अनुरूप बनाना था।

खण्ड 18. परीक्षा प्रणाली तथा मूल्यांकन

परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए कक्षा 10 और 12 के अन्त में बाह्य परीक्षाएँ आयोजित करने, सतत मूल्यांकन को अपनाने तथा अंक प्रणाली के स्थान पर ग्रेड प्रणाली विकसित करने पर बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए आवश्यक कानूनी व्यवस्था करने की योजना भी प्रस्तुत की गई।

खण्ड 19. स्वास्थ्य शिक्षा तथा युवा

विद्यार्थियों के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए शिक्षा में स्वास्थ्य शिक्षा तथा खेलकूद को शामिल करने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में स्वस्थ जीवन की आदतें विकसित करना तथा उनके सर्वांगीण विकास को प्रोत्साहित करना था।

खण्ड 20. भाषा

भारत की आधुनिक भाषाओं के विकास तथा हिन्दी को सम्पर्क भाषा के रूप में प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया।

इसके लिए भाषाओं के विकास से सम्बन्धित कार्यक्रमों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की योजना प्रस्तुत की गई।

खण्ड 21. सांस्कृतिक कार्यक्रम

विद्यालयी पाठ्यचर्या में सांस्कृतिक कार्यक्रमों को महत्त्वपूर्ण स्थान देने की योजना बनाई गई।

इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय कला, संस्कृति तथा सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ना था।

खण्ड 22. दृश्य-श्रव्य सामग्री

शिक्षा को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए रेडियो, टेलीविजन, कम्प्यूटर तथा ओवरहेड प्रोजेक्टर जैसी दृश्य-श्रव्य सामग्री के उपयोग पर बल दिया गया।

इन साधनों का उद्देश्य शिक्षण को अधिक रोचक बनाना तथा विद्यार्थियों को विभिन्न विषयों की जानकारी प्रभावी ढंग से प्रदान करना था।

खण्ड 23. अध्यापक तथा अध्यापक प्रशिक्षण

अध्यापक शिक्षा में सुधार के लिए प्रत्येक जिले में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण परिषद स्थापित करने की योजना प्रस्तुत की गई।

इसके अतिरिक्त कुछ अच्छे शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों को उच्च अध्ययन शिक्षा संस्थानों के रूप में विकसित करने तथा राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) को स्वायत्तता देने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य अध्यापक प्रशिक्षण की गुणवत्ता सुधारना तथा शिक्षक शिक्षा को अधिक व्यवस्थित बनाना था।

खण्ड 24. शिक्षा की व्यवस्था

इस खण्ड में शिक्षा प्रशासन को प्रभावशाली बनाने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय को मजबूत करने तथा प्रशासन के विकेन्द्रीकरण पर बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त शिक्षा के प्रबन्ध के लिए भारतीय शिक्षा सेवा प्रारम्भ करने और जिला स्तर पर जिला शिक्षा परिषदों का गठन करने की योजना प्रस्तुत की गई।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की कार्ययोजना का महत्त्व

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की कार्ययोजना ने शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर प्रस्तावित सुधारों को लागू करने के लिए एक व्यवस्थित रूपरेखा प्रस्तुत की।

इस कार्ययोजना में पूर्व-प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च, तकनीकी तथा प्रौढ़ शिक्षा तक सभी प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया।

इसके अतिरिक्त महिलाओं, वंचित वर्गों और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा, शिक्षकों के प्रशिक्षण, परीक्षा सुधार तथा शिक्षा प्रशासन के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया गया।

इस प्रकार कार्ययोजना का उद्देश्य शिक्षा नीति को केवल सैद्धान्तिक दस्तावेज न रखकर उसे व्यावहारिक रूप से क्रियान्वित करने योग्य बनाना था।

2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के मूल तत्त्व

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में भारतीय शिक्षा के विकास के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त और प्रावधान निर्धारित किए गए।

इनका मुख्य उद्देश्य शिक्षा का सार्वभौमीकरण, समान शैक्षिक अवसर, शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार तथा राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा-व्यवस्था विकसित करना था।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के 22 प्रमुख मूल तत्त्व निम्नलिखित हैं—

  1. 10+2+3 शिक्षा-संरचना— पूरे देश में 10+2+3 शिक्षा-संरचना लागू करने पर बल दिया गया।
  2. निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा— 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया।
  3. अपव्यय की रोकथाम— प्राथमिक शिक्षा में अपव्यय अर्थात विद्यार्थियों द्वारा पढ़ाई बीच में छोड़ने की समस्या को कम करने पर बल दिया गया।
  4. स्त्री शिक्षा का विकास— महिलाओं की निरक्षरता दूर करने तथा उन्हें व्यावसायिक एवं तकनीकी प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करने का प्रावधान किया गया।
  5. अल्पसंख्यकों की शिक्षा— अल्पसंख्यक समुदायों की शिक्षा की गुणवत्ता तथा सामाजिक विकास पर विशेष ध्यान देने की व्यवस्था की गई।
  6. विकलांग बच्चों की शिक्षा— विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा के विकास के लिए आवश्यक सुविधाएँ और विशेष प्रयास करने पर बल दिया गया।
  7. गति निर्धारक विद्यालय— प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के विकास के लिए गति निर्धारक विद्यालय (Pace Setting Schools) खोलने का प्रावधान किया गया।
  8. व्यावसायिक पाठ्यक्रम— उच्चतर माध्यमिक स्तर (+2) पर व्यावसायिक शिक्षा के पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई।
  9. कार्यानुभव— शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर कार्यानुभव को अनिवार्य एवं महत्त्वपूर्ण अंग बनाने पर बल दिया गया।
  10. प्रौढ़ शिक्षा— निरक्षर वयस्कों के लिए प्रौढ़ शिक्षा की उचित व्यवस्था करने का प्रावधान किया गया।
  11. ग्रामीण उच्च शिक्षा— ग्रामीण विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों का विकास करने पर बल दिया गया।
  12. तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा— तकनीकी तथा प्रबन्ध शिक्षण संस्थाओं में अधिक शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया।
  13. मूल्य शिक्षा— विद्यार्थियों में सामाजिक, नैतिक तथा मानवीय मूल्यों का विकास करने पर बल दिया गया।
  14. गणित एवं विज्ञान शिक्षा— गणित और विज्ञान की शिक्षा के लिए आधुनिक तकनीकी उपकरण तथा शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई।
  15. पाठ्यपुस्तकों एवं पुस्तकालयों में सुधार— पुस्तकों की गुणवत्ता सुधारने, लेखन को प्रोत्साहित करने तथा पुस्तकालयों की उचित व्यवस्था करने पर बल दिया गया।
  16. खेलकूद एवं शारीरिक शिक्षा— शारीरिक शिक्षा और खेलकूद के विकास के लिए विद्यार्थियों को NSS अथवा NCC जैसी गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने तथा परीक्षा प्रणाली में सुधार करने का प्रावधान किया गया।
  17. योग्य शिक्षकों का चयन— शिक्षकों का चयन उनकी योग्यता, वस्तुनिष्ठता तथा व्यावहारिक दक्षता के आधार पर करने पर बल दिया गया।
  18. शिक्षा पर 6% व्यय— शिक्षा के विकास के लिए राष्ट्रीय आय का लगभग 6% शिक्षा पर व्यय करने का लक्ष्य रखा गया।
  19. शिक्षक प्रशिक्षण में सुधार— अध्यापक शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाने का प्रावधान किया गया।
  20. शैक्षिक अवसरों की समानता— सभी वर्गों के विद्यार्थियों को समान शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने के लिए ठोस कदम उठाने पर बल दिया गया।
  21. प्रभावशाली शिक्षा व्यवस्था— शिक्षा के प्रशासन, प्रबन्ध और कार्यान्वयन को अधिक प्रभावी बनाने का प्रावधान किया गया।
  22. उच्च शिक्षा का विकास— उच्च शिक्षा का प्रसार करने तथा उसकी गुणवत्ता और स्तर में सुधार लाने पर बल दिया गया।

इस प्रकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के मूल तत्त्वों में शिक्षा के विस्तार के साथ समानता, गुणवत्ता, व्यावसायिकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा शिक्षक प्रशिक्षण को विशेष महत्त्व दिया गया।

3. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का मूल्यांकन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के विभिन्न स्तरों पर सुधार के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण प्रावधान किए।

इस नीति में शिक्षा के विकास के साथ उसके क्रियान्वयन के लिए कार्ययोजना भी तैयार की गई। इससे शिक्षा सुधारों को व्यवहार में लागू करने की दिशा प्राप्त हुई।

किन्तु नीति के सभी प्रावधान समान रूप से सफल नहीं हो सके। कुछ योजनाओं में संसाधनों की कमी, प्रशासनिक कठिनाइयाँ और क्रियान्वयन सम्बन्धी समस्याएँ सामने आईं।

इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का मूल्यांकन इसके गुणों और दोषों के आधार पर किया जाता है।

4. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के गुण

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रमुख दस गुण निम्नलिखित हैं—

1. शिक्षा को राष्ट्रीय महत्त्व देना

इस नीति में शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया तथा इसके लिए राष्ट्रीय आय का लगभग 6% व्यय करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।

इससे शिक्षा के विकास हेतु पर्याप्त आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता को विशेष महत्त्व मिला।

2. कार्ययोजना की व्यवस्था

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का एक प्रमुख गुण यह था कि इसके उद्देश्यों और प्रावधानों को लागू करने के लिए अलग से कार्ययोजना तैयार की गई।

इस कार्ययोजना में शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर सुधार के लिए कार्यक्रम और व्यवस्थाएँ प्रस्तुत की गईं।

3. समान शिक्षा-संरचना

इस नीति में पूरे देश में 10+2+3 शिक्षा-संरचना लागू करने पर बल दिया गया।

इससे प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा की संरचना में एकरूपता स्थापित करने की दिशा मिली।

4. प्राथमिक शिक्षा में सुधार

प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना प्रारम्भ की गई।

पुस्तक में दिए गए ऐतिहासिक मूल्यांकन के अनुसार इस योजना का लाभ लगभग 90% प्राथमिक विद्यालयों तक पहुँच चुका था।

इससे प्राथमिक विद्यालयों में आवश्यक भवन, शिक्षक तथा शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने के प्रयासों को बढ़ावा मिला।

5. नवोदय विद्यालयों का विकास

ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए गति निर्धारक नवोदय विद्यालयों की स्थापना को प्रोत्साहित किया गया।

पुस्तक के अनुसार 2012 तक लगभग 586 नवोदय विद्यालय स्थापित किए जा चुके थे।

इन विद्यालयों का उद्देश्य विशेष रूप से ग्रामीण प्रतिभाओं को आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करना था।

6. मुक्त विश्वविद्यालयों का विस्तार

दूरस्थ शिक्षा के विकास के लिए इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय तथा अन्य मुक्त विश्वविद्यालयों के विस्तार को प्रोत्साहित किया गया।

पुस्तक के अनुसार 2012 तक 16 मुक्त विश्वविद्यालय खोले जा चुके थे।

इससे नियमित महाविद्यालयों में उपस्थित न हो सकने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा के अवसर बढ़े।

7. शिक्षकों की स्थिति में सुधार

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 ने शिक्षकों की आर्थिक एवं व्यावसायिक स्थिति में सुधार पर विशेष ध्यान दिया।

इसके अन्तर्गत शिक्षकों के वेतन तथा सेवा-शर्तों में सुधार करने के प्रयास किए गए।

8. शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं का विकास

इस नीति के बाद शिक्षक शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थाओं के विकास को प्रोत्साहन मिला।

पुस्तक के अनुसार 2011 तक 555 जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) स्थापित किए जा चुके थे। इसके अतिरिक्त शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों के उन्नयन के प्रयास भी किए गए।

इन संस्थाओं का उद्देश्य शिक्षकों को अधिक प्रभावी एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना था।

9. परीक्षा एवं मूल्यांकन में सुधार

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में परीक्षाओं को अधिक वस्तुनिष्ठ तथा विश्वसनीय बनाने पर बल दिया गया।

इसके माध्यम से परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली में सुधार करने तथा विद्यार्थियों की वास्तविक शैक्षिक उपलब्धियों का उचित आकलन करने का प्रयास किया गया।

10. शैक्षिक अवसरों की समानता

इस नीति में सभी वर्गों के विद्यार्थियों के लिए बिना भेदभाव शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराने पर विशेष बल दिया गया।

महिलाओं, वंचित वर्गों तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए शिक्षा का विस्तार करने के प्रावधान किए गए।

5. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के दोष

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में अनेक उपयोगी प्रावधान किए गए, लेकिन पुस्तक के मूल्यांकन के अनुसार इसके क्रियान्वयन में कुछ महत्त्वपूर्ण कमियाँ भी सामने आईं।

इसके प्रमुख छह दोष निम्नलिखित हैं—

1. शिक्षण संस्थाओं द्वारा आर्थिक शोषण की समस्या

नीति में शिक्षा-व्यवस्था के विकास के लिए व्यक्तिगत एवं गैर-सरकारी प्रयासों को प्रोत्साहित किया गया।

किन्तु पुस्तक के मूल्यांकन के अनुसार कुछ शिक्षण संस्थाओं ने प्रवेश के समय विद्यार्थियों से बड़ी धनराशि लेना प्रारम्भ कर दिया।

इससे शिक्षा के विकास में सहयोग के स्थान पर विद्यार्थियों के आर्थिक शोषण की समस्या उत्पन्न हुई।

2. स्ववित्तपोषी संस्थाओं की समस्याएँ

इस नीति के बाद स्ववित्तपोषी शिक्षण संस्थाओं के विस्तार को प्रोत्साहन मिला।

किन्तु पुस्तक के अनुसार इन संस्थाओं के कारण उच्च शिक्षा महँगी होती गई तथा कुछ स्थानों पर शिक्षा की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई।

इससे आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना कठिन हो सकता था।

3. ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना की कमियाँ

ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना का उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों में आवश्यक भौतिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना था।

किन्तु पुस्तक के मूल्यांकन में बताया गया है कि इस योजना के अन्तर्गत बनाए गए कुछ विद्यालय भवनों तथा उपलब्ध कराए गए फर्नीचर और शिक्षण सामग्री की गुणवत्ता निम्न स्तर की थी।

इससे योजना का अपेक्षित लाभ सभी विद्यालयों को समान रूप से प्राप्त नहीं हो सका।

4. नवोदय विद्यालयों के लाभ में असमानता

नवोदय विद्यालयों की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी।

किन्तु पुस्तक के मूल्यांकन के अनुसार जिन योग्य विद्यार्थियों के लिए ये विद्यालय स्थापित किए गए थे, उनमें से सभी विद्यार्थियों को इनका लाभ नहीं मिल सका।

इस प्रकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसरों को सभी पात्र विद्यार्थियों तक पहुँचाना एक चुनौती बनी रही।

5. व्यावसायिक शिक्षा में संसाधनों की कमी

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के अन्तर्गत उच्चतर माध्यमिक स्तर (+2) पर व्यावसायिक पाठ्यक्रम प्रारम्भ किए गए।

किन्तु अनेक स्थानों पर इन पाठ्यक्रमों के लिए आवश्यक संसाधनों तथा योग्य अध्यापकों की कमी बनी रही।

इसके कारण व्यावसायिक शिक्षा की गुणवत्ता तथा उपयोगिता अपेक्षा के अनुरूप विकसित नहीं हो सकी।

6. आन्तरिक मूल्यांकन में पक्षपात एवं शोषण की आशंका

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में आन्तरिक मूल्यांकन पर विशेष बल दिया गया।

किन्तु पुस्तक के मूल्यांकन में यह दोष बताया गया है कि आन्तरिक मूल्यांकन की व्यवस्था में निष्पक्षता का अभाव होने पर विद्यार्थियों के साथ पक्षपात या शोषण की सम्भावना बढ़ सकती है।

इसलिए आन्तरिक मूल्यांकन को प्रभावी बनाने के लिए पारदर्शिता तथा उचित निगरानी आवश्यक मानी जा सकती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के गुण-दोषों का समग्र मूल्यांकन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 ने भारतीय शिक्षा के विकास के लिए व्यापक प्रावधान प्रस्तुत किए तथा उनके क्रियान्वयन के लिए कार्ययोजना भी तैयार की।

इस नीति ने प्राथमिक शिक्षा के विस्तार, नवोदय विद्यालयों, मुक्त विश्वविद्यालयों, शिक्षक प्रशिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा तथा समान शैक्षिक अवसरों के विकास को महत्त्वपूर्ण दिशा प्रदान की।

किन्तु कुछ कार्यक्रमों में पर्याप्त संसाधनों का अभाव, शिक्षण संस्थाओं की व्यावसायिक प्रवृत्तियाँ, शिक्षा की बढ़ती लागत तथा मूल्यांकन सम्बन्धी समस्याएँ सामने आईं।

इस प्रकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के अनेक सकारात्मक प्रभाव पड़े, लेकिन इसके सभी उद्देश्यों को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं किया जा सका।

6. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का भारतीय शिक्षा पर प्रभाव

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के क्रियान्वयन से भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

इस नीति के माध्यम से विद्यालयी शिक्षा, उच्च शिक्षा, शिक्षक शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा तथा वंचित वर्गों की शिक्षा के विस्तार और गुणवत्ता सुधारने के प्रयास किए गए।

पुस्तक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के निम्नलिखित 13 प्रमुख प्रभाव बताए गए हैं।

1. शिक्षा बजट में वृद्धि

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रभाव से केन्द्र तथा राज्य सरकारों ने शिक्षा पर व्यय की जाने वाली धनराशि बढ़ाने के प्रयास किए।

इससे शिक्षा के विकास, विद्यालयों की सुविधाओं तथा विभिन्न शैक्षिक योजनाओं के लिए अधिक आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में प्रगति हुई।

2. बाल शिक्षा एवं आँगनवाड़ी केन्द्रों का विस्तार

छोटे बच्चों की देखभाल, पोषण तथा प्रारम्भिक शिक्षा के लिए आँगनवाड़ी केन्द्रों और बालवाड़ियों का विस्तार हुआ।

पुस्तक में दिए गए ऐतिहासिक विवरण के अनुसार देश में लगभग 13.5 लाख आँगनवाड़ी एवं बालवाड़ी केन्द्र स्थापित हो चुके थे, जिनसे लगभग 3.5 करोड़ बच्चे लाभान्वित हो रहे थे।

इससे बाल विकास और प्रारम्भिक शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई।

3. 10+2+3 शिक्षा-संरचना का विस्तार

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रभाव से देशभर में 10+2+3 शिक्षा-संरचना को लागू करने के प्रयासों को बढ़ावा मिला।

इस व्यवस्था ने विद्यालयी और उच्च शिक्षा के विभिन्न स्तरों को एक व्यवस्थित क्रम में संगठित करने में सहायता की।

4. प्राथमिक शिक्षा एवं ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड का विकास

प्राथमिक शिक्षा के प्रसार तथा विद्यालयों की आधारभूत सुविधाओं में सुधार के लिए ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना का विस्तार हुआ।

पुस्तक के ऐतिहासिक मूल्यांकन के अनुसार लगभग 90% प्राथमिक विद्यालयों में इस योजना के अन्तर्गत सुधार किए जा चुके थे।

इससे विद्यालयों में कक्षाओं, शिक्षकों तथा शिक्षण सामग्री की उपलब्धता बढ़ाने के प्रयासों को प्रोत्साहन मिला।

5. माध्यमिक शिक्षा एवं नवोदय विद्यालयों का विकास

माध्यमिक शिक्षा के विस्तार के साथ ग्रामीण प्रतिभाओं के विकास के लिए जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना को बढ़ावा मिला।

पुस्तक के अनुसार लगभग 586 नवोदय विद्यालय स्थापित किए जा चुके थे।

इसके अतिरिक्त मुक्त शिक्षा के कार्यक्रमों का विस्तार हुआ और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी व्यवस्था से बड़ी संख्या में विद्यार्थी जुड़े।

6. व्यावसायिक शिक्षा का विकास

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रभाव से उच्चतर माध्यमिक स्तर (+2) पर विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को प्रारम्भ करने के प्रयास हुए।

इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को विद्यालयी शिक्षा के साथ रोजगार सम्बन्धी ज्ञान और व्यावहारिक कौशल प्रदान करना था।

7. शिक्षक शिक्षा में सुधार

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के बाद शिक्षक प्रशिक्षण की व्यवस्था में सुधार के लिए विभिन्न प्रयास किए गए।

पुस्तक के अनुसार राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) की वैधानिक स्थिति मजबूत करने तथा शिक्षक शिक्षा को व्यवस्थित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

इसके अतिरिक्त जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (DIET) की स्थापना को भी प्रोत्साहन मिला।

पुस्तक के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 2011 तक 555 DIET स्थापित किए जा चुके थे।

8. शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों का उन्नयन

शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए अच्छे शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों को उच्च स्तर की शिक्षक शिक्षा संस्थाओं के रूप में विकसित करने के प्रयास किए गए।

इससे शिक्षक प्रशिक्षण को अधिक व्यवस्थित, व्यावसायिक तथा उच्च स्तरीय बनाने की दिशा में विकास हुआ।

9. उच्च, तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा का विकास

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रभाव से उच्च शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, तकनीकी शिक्षा तथा प्रबन्ध शिक्षा के विस्तार और गुणवत्ता सुधारने के प्रयास किए गए।

इन क्षेत्रों में पाठ्यक्रमों को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने तथा योग्य मानव संसाधन विकसित करने पर बल दिया गया।

10. प्रौढ़ एवं सतत शिक्षा का विकास

प्रौढ़ शिक्षा तथा सतत शिक्षा के कार्यक्रमों के विकास के लिए आवश्यक आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने के प्रयास किए गए।

इससे निरक्षर वयस्कों को शिक्षा प्रदान करने तथा पहले से शिक्षित व्यक्तियों को आगे भी ज्ञान और कौशल विकसित करने के अवसर देने की दिशा में प्रगति हुई।

11. शिक्षकों की जवाबदेही पर बल

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रभाव से शिक्षा-व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने तथा शिक्षकों की जवाबदेही सुनिश्चित करने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य शिक्षकों को अपने शैक्षिक उत्तरदायित्वों के प्रति अधिक सजग बनाना तथा शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करना था।

12. स्त्री शिक्षा एवं वंचित वर्गों की शिक्षा का विस्तार

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रभाव से महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछड़े वर्गों तथा अल्पसंख्यक समुदायों की शिक्षा के विकास को प्रोत्साहन मिला।

इन वर्गों के विद्यार्थियों के लिए विद्यालयों, छात्रवृत्तियों तथा अन्य शैक्षिक सुविधाओं के विस्तार के प्रयास किए गए।

इससे शिक्षा के अवसरों में सामाजिक समानता स्थापित करने की दिशा में प्रगति हुई।

13. विकलांग बच्चों के लिए विशेष शिक्षा व्यवस्था

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रभाव से विकलांग बच्चों की शैक्षिक आवश्यकताओं पर अधिक ध्यान दिया गया।

ऐसे बच्चों के लिए विशेष विद्यालय स्थापित करने तथा उनकी आवश्यकताओं के अनुसार शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने के प्रयास किए गए।

इसका उद्देश्य विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के उचित अवसर प्रदान करना था।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का समग्र शैक्षिक महत्त्व

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को अधिक व्यापक, व्यवस्थित तथा आधुनिक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस नीति ने शिक्षा को केवल व्यक्तिगत ज्ञान प्राप्त करने तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक समानता, राष्ट्रीय विकास, वैज्ञानिक प्रगति तथा रोजगार से जोड़ने पर बल दिया।

इसके अन्तर्गत प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण, शिक्षक शिक्षा में सुधार, व्यावसायिक शिक्षा का विकास तथा महिलाओं और वंचित वर्गों की शिक्षा का विस्तार करने के लिए अनेक कार्यक्रम प्रारम्भ किए गए।

यद्यपि संसाधनों की कमी और क्रियान्वयन सम्बन्धी समस्याओं के कारण सभी लक्ष्य पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं किए जा सके, फिर भी इस नीति ने भारतीय शिक्षा के विकास को महत्त्वपूर्ण दिशा प्रदान की।

इस प्रकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण नीति थी, जिसने शिक्षा के प्रसार, गुणवत्ता और समान शैक्षिक अवसरों के विकास में योगदान दिया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति मई 1986 में घोषित हुई तथा इसकी कार्ययोजना नवम्बर 1986 में प्रकाशित की गई।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का मूल दस्तावेज 12 खण्डों में तथा इसकी कार्ययोजना 24 खण्डों में विभाजित थी।
  • कार्ययोजना में पूर्व-प्राथमिक, प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च, तकनीकी, व्यावसायिक, प्रौढ़ तथा दूरस्थ शिक्षा के विकास की योजनाएँ प्रस्तुत की गईं।
  • ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना का उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों में आवश्यक कमरे, शिक्षक, शौचालय, ब्लैकबोर्ड और शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराना था।
  • कार्ययोजना में प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम दो बड़े कमरे और दो शिक्षक रखने तथा जहाँ सम्भव हो एक महिला अध्यापिका नियुक्त करने की व्यवस्था प्रस्तावित थी।
  • ग्रामीण प्रतिभाओं के विकास के लिए गति निर्धारक नवोदय विद्यालय तथा दूरस्थ शिक्षा के लिए मुक्त विश्वविद्यालयों के विस्तार पर बल दिया गया।
  • उच्चतर माध्यमिक स्तर (+2) पर व्यावसायिक पाठ्यक्रम प्रारम्भ करने तथा शिक्षा को रोजगार और कार्यानुभव से जोड़ने की योजना बनाई गई।
  • महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रावधान किए गए।
  • अध्यापक शिक्षा में सुधार के लिए जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों तथा राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद के विकास पर बल दिया गया।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के 22 मूल तत्त्वों में 10+2+3 शिक्षा-संरचना, निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा, अपव्यय की रोकथाम तथा समान शैक्षिक अवसर महत्त्वपूर्ण थे।
  • नीति में स्त्री शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, मूल्य शिक्षा, विज्ञान, गणित, तकनीकी शिक्षा तथा ग्रामीण उच्च शिक्षा के विकास पर बल दिया गया।
  • शिक्षा पर राष्ट्रीय आय का लगभग 6% व्यय करने तथा शिक्षक प्रशिक्षण और परीक्षा प्रणाली में सुधार का लक्ष्य रखा गया।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रमुख गुणों में कार्ययोजना का निर्माण, प्राथमिक शिक्षा का विकास, 10+2+3 संरचना, नवोदय विद्यालय तथा मुक्त विश्वविद्यालयों का विस्तार शामिल था।
  • शिक्षक शिक्षा में सुधार, परीक्षा एवं मूल्यांकन को वस्तुनिष्ठ बनाने तथा शैक्षिक अवसरों की समानता को बढ़ावा देना भी इसके महत्त्वपूर्ण गुण थे।
  • नीति के प्रमुख दोषों में शिक्षण संस्थाओं द्वारा आर्थिक शोषण, स्ववित्तपोषी शिक्षा की बढ़ती लागत तथा ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना में सुविधाओं की निम्न गुणवत्ता शामिल थीं।
  • नवोदय विद्यालयों के लाभ में असमानता, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में संसाधनों एवं योग्य शिक्षकों की कमी तथा आन्तरिक मूल्यांकन में पक्षपात की सम्भावना भी प्रमुख दोष थे।
  • नीति के प्रभाव से प्राथमिक शिक्षा, बाल शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा के विस्तार को बढ़ावा मिला।
  • शिक्षक प्रशिक्षण के विकास में DIET तथा NCTE की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही।
  • प्रौढ़ शिक्षा, सतत शिक्षा, स्त्री शिक्षा तथा वंचित वर्गों की शिक्षा के विस्तार को प्रोत्साहन मिला।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 ने भारतीय शिक्षा को समान अवसर, गुणवत्ता, व्यावहारिकता तथा राष्ट्रीय विकास से जोड़ने की दिशा प्रदान की।
Topic 12 संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992—पृष्ठभूमि, प्रमुख संशोधन, कार्ययोजना एवं मूल्यांकन

संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992—पृष्ठभूमि, प्रमुख संशोधन, कार्ययोजना एवं मूल्यांकन

संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 का परिचय

भारत सरकार ने मई 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की थी। इस नीति में शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर सुधार करने तथा उसके क्रियान्वयन की समय-समय पर समीक्षा करने की व्यवस्था की गई थी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में यह प्रावधान था कि प्रत्येक 5 वर्ष बाद नीति के क्रियान्वयन और उसके परिणामों की समीक्षा की जाएगी, जिससे आवश्यकतानुसार उसमें सुधार किए जा सकें।

इसी उद्देश्य से सन् 1990 में राममूर्ति शिक्षा समिति तथा सन् 1992 में जनार्दन रेड्डी समिति का गठन किया गया।

इन समितियों की रिपोर्टों के आधार पर भारत सरकार ने सन् 1992 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में कुछ महत्त्वपूर्ण संशोधन किए। इसके साथ ही उसकी कार्ययोजना में भी परिवर्तन किया गया।

इस संशोधित नीति को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का संशोधित रूप, 1992 (Modified National Policy on Education, 1992) कहा जाता है।

1. संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 की पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण, समान शैक्षिक अवसर, शिक्षक प्रशिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा तथा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए अनेक कार्यक्रम प्रस्तावित किए गए थे।

किन्तु इन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन और उनकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन करना आवश्यक था। इसलिए सरकार ने नीति की समीक्षा के लिए शिक्षा समितियों का गठन किया।

1. राममूर्ति शिक्षा समिति, 1990

भारत सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की समीक्षा के लिए 7 मई 1990 को आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया।

इस समिति को राममूर्ति शिक्षा समिति, 1990 के नाम से जाना जाता है।

समिति का प्रमुख कार्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के क्रियान्वयन तथा उसके परिणामों का अध्ययन करना और आवश्यक सुधारों के लिए सुझाव प्रस्तुत करना था।

समिति ने 26 दिसम्बर 1990 को अपनी रिपोर्ट भारत सरकार के समक्ष प्रस्तुत की।

राममूर्ति समिति की प्रमुख टिप्पणियाँ एवं सुझाव

समिति ने अपने प्रतिवेदन में शिक्षा की स्थिति पर असन्तोष व्यक्त किया और अनेक क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता बताई।

इसके प्रमुख सुझाव निम्नलिखित थे—

  • सामान्य विद्यालय प्रणाली— सभी वर्गों के बच्चों को समान शिक्षा प्रदान करने के लिए सामान्य विद्यालय प्रणाली (Common School System) विकसित की जाए।
  • शिक्षा में वर्गभेद समाप्त करना— शिक्षा के अवसरों में सामाजिक एवं आर्थिक आधार पर होने वाले भेदभाव को कम किया जाए।
  • शिक्षा पर पर्याप्त व्यय— शिक्षा के विकास के लिए आवश्यक आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ।
  • भाषा सम्बन्धी सुधार— शिक्षा में भाषा सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए उचित व्यवस्था की जाए।
  • अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र— औपचारिक शिक्षा से वंचित बच्चों और व्यक्तियों के लिए अनौपचारिक शिक्षा की व्यवस्था विकसित की जाए।
  • व्यावसायिक शिक्षा— विद्यार्थियों को रोजगार के योग्य बनाने के लिए व्यावसायिक शिक्षा का विकास किया जाए।
  • रोजगारपरक शिक्षा— शिक्षा को रोजगार और व्यावहारिक जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ा जाए।

इस प्रकार राममूर्ति समिति ने शिक्षा को अधिक समानतापूर्ण, सुलभ तथा रोजगारपरक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

2. जनार्दन रेड्डी समिति, 1992

राममूर्ति शिक्षा समिति की रिपोर्ट पर विचार-विमर्श प्रारम्भ होने से पहले ही केन्द्र में सरकार बदल गई।

इसके बाद नई सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की समीक्षा के लिए सन् 1992 में जनार्दन रेड्डी समिति का गठन किया।

इस समिति का उद्देश्य पूर्ववर्ती शिक्षा नीति तथा उसके क्रियान्वयन की समीक्षा करके आवश्यक सुधारों के सम्बन्ध में सुझाव देना था।

राममूर्ति समिति तथा जनार्दन रेड्डी समिति की रिपोर्टों के आधार पर भारत सरकार ने 1992 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में संशोधन किए।

इसके अतिरिक्त नीति की कार्ययोजना में भी परिवर्तन किए गए। इस परिवर्तित कार्ययोजना को कार्ययोजना 1992 (Programme of Action, 1992) कहा गया।

संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 के प्रमुख तथ्य

बिन्दु विवरण
मूल राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986
प्रथम समीक्षा समिति राममूर्ति शिक्षा समिति, 1990
राममूर्ति समिति का गठन 7 मई 1990
राममूर्ति समिति के अध्यक्ष आचार्य राममूर्ति
राममूर्ति समिति की रिपोर्ट 26 दिसम्बर 1990
द्वितीय समीक्षा समिति जनार्दन रेड्डी समिति, 1992
नीति में संशोधन 1992
मूल कार्ययोजना 1986 24 भाग
संशोधित कार्ययोजना 1992 23 भाग

2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में किए गए प्रमुख संशोधन

भारत सरकार ने सन् 1992 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के विभिन्न प्रावधानों में संशोधन किए।

इन संशोधनों का प्रमुख उद्देश्य शिक्षा के प्रसार में तेजी लाना, प्राथमिक विद्यालयों की सुविधाओं में सुधार करना, शैक्षिक समानता को बढ़ावा देना तथा शिक्षा के प्रबन्ध और मूल्यांकन को अधिक प्रभावी बनाना था।

पुस्तक के अनुसार नीति के निम्नलिखित खण्डों में प्रमुख संशोधन किए गए।

3. राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली सम्बन्धी संशोधन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के खण्ड 3—राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली में संशोधन किया गया।

इसके अन्तर्गत यह स्पष्ट किया गया कि पूरे देश में +2 स्तर को विद्यालयी शिक्षा का अंग बनाया जाएगा।

अर्थात उच्चतर माध्यमिक शिक्षा को विद्यालयी शिक्षा की संरचना में व्यवस्थित रूप से शामिल करने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य शिक्षा के विभिन्न स्तरों के बीच एकरूपता तथा समन्वय स्थापित करना था।

4. समानता के लिए शिक्षा सम्बन्धी संशोधन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के खण्ड 4—समानता के लिए शिक्षा में चार प्रमुख संशोधन किए गए।

इनका उद्देश्य निरक्षरता कम करना, वंचित वर्गों के शैक्षिक विकास को बढ़ावा देना तथा नए साक्षर व्यक्तियों को शिक्षा जारी रखने के अवसर उपलब्ध कराना था।

1. समग्र साक्षरता अभियान को प्रोत्साहन

देश में निरक्षरता दूर करने के लिए समग्र साक्षरता अभियान (Total Literacy Campaign) पर अधिक बल दिया जाए।

इसका उद्देश्य अधिक से अधिक निरक्षर व्यक्तियों को साक्षर बनाना तथा शिक्षा के प्रसार को गति देना था।

2. राष्ट्रीय साक्षरता मिशन को सामाजिक विकास से जोड़ना

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन को केवल पढ़ना-लिखना सिखाने तक सीमित न रखकर विभिन्न सामाजिक एवं राष्ट्रीय कार्यक्रमों से जोड़ा जाए।

पुस्तक के अनुसार इसे निम्नलिखित क्षेत्रों से जोड़ने का सुझाव दिया गया—

  • निर्धनता निवारण।
  • राष्ट्रीय एकता का विकास।
  • पर्यावरण संरक्षण।
  • छोटे परिवार को प्रोत्साहन।
  • नारी समानता का विकास।
  • प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण।
  • प्राथमिक स्वास्थ्य परिचर्या।

इसका उद्देश्य साक्षरता को व्यक्ति के दैनिक जीवन, सामाजिक जागरूकता तथा राष्ट्रीय विकास से जोड़ना था।

3. व्यावसायिक एवं कौशल प्रशिक्षण

व्यक्तियों की आवश्यकताओं और रुचियों के आधार पर व्यावसायिक तथा कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाए।

इन कार्यक्रमों को रोजगार और स्वरोजगार से जोड़ा जाए, जिससे व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से आजीविका के लिए उपयोगी कौशल प्राप्त कर सकें।

4. नवसाक्षरों के लिए सतत शिक्षा

नए साक्षर व्यक्तियों के लिए साक्षरता प्राप्त करने के बाद भी सतत शिक्षा (Continuing Education) के कार्यक्रम उपलब्ध कराए जाएँ।

इसका उद्देश्य नवसाक्षरों को अपना ज्ञान बनाए रखने तथा आगे की शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करना था।

5. विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक पुनर्गठन सम्बन्धी संशोधन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के खण्ड 5—विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक पुनर्गठन में सात प्रमुख संशोधन किए गए।

इन संशोधनों में प्राथमिक शिक्षा की सुविधाओं, महिला शिक्षकों की नियुक्ति, उच्च प्राथमिक शिक्षा तथा शैक्षिक मूल्यांकन पर विशेष ध्यान दिया गया।

1. ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना का विस्तार

ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना के अन्तर्गत प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में तीन कमरे तथा तीन अध्यापकों की व्यवस्था करने का प्रस्ताव किया गया।

मूल योजना में कम से कम दो कमरे तथा दो अध्यापकों की व्यवस्था पर बल दिया गया था। संशोधन में इन सुविधाओं को बढ़ाने का सुझाव दिया गया।

इसका उद्देश्य विद्यालयों में बेहतर शिक्षण वातावरण तथा पर्याप्त अध्यापक उपलब्ध कराना था।

2. महिला अध्यापिकाओं की नियुक्ति

भविष्य में प्राथमिक विद्यालयों में नियुक्त किए जाने वाले अध्यापकों में 50% महिला अध्यापिकाएँ रखने का सुझाव दिया गया।

इस व्यवस्था का उद्देश्य महिला शिक्षकों की भागीदारी बढ़ाना तथा प्राथमिक शिक्षा के विकास में उनकी भूमिका को प्रोत्साहित करना था।

3. उच्च प्राथमिक स्तर पर ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड

ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना को केवल प्राथमिक विद्यालयों तक सीमित न रखकर उच्च प्राथमिक विद्यालयों में भी लागू करने का प्रस्ताव किया गया।

इससे उच्च प्राथमिक स्तर पर भी आवश्यक भवन, शिक्षण सामग्री तथा अन्य शैक्षिक सुविधाओं के विकास को प्रोत्साहन मिल सकेगा।

4. निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का राष्ट्रीय मिशन

सन् 2000 तक अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक राष्ट्रीय मिशन चलाने का सुझाव दिया गया।

इसका उद्देश्य सभी बच्चों तक प्रारम्भिक शिक्षा पहुँचाने तथा शिक्षा के सार्वभौमीकरण की दिशा में प्रयास तेज करना था।

ध्यान दें: सन् 2000 यहाँ नीति में प्रस्तावित लक्ष्य की समय-सीमा है।

5. माध्यमिक शिक्षा में बालिकाओं एवं वंचित वर्गों का प्रवेश

माध्यमिक शिक्षा में बालिकाओं, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के बच्चों के प्रवेश को बढ़ावा दिया जाए।

इसका उद्देश्य सामाजिक रूप से वंचित वर्गों तथा बालिकाओं को आगे की शिक्षा प्राप्त करने के अधिक अवसर उपलब्ध कराना था।

6. मुक्त शिक्षण प्रणाली का विकास

मुक्त शिक्षण प्रणाली (Open Learning System) को अधिक सुदृढ़ बनाया जाए।

इसका उद्देश्य उन विद्यार्थियों को शिक्षा जारी रखने के अवसर प्रदान करना था जो विभिन्न कारणों से नियमित विद्यालयों या शिक्षण संस्थाओं में अध्ययन नहीं कर सकते।

7. राष्ट्रीय मूल्यांकन संगठन की स्थापना

शैक्षिक मूल्यांकन में सुधार के लिए राष्ट्रीय मूल्यांकन संगठन का निर्माण करने का सुझाव दिया गया।

इसका उद्देश्य शिक्षा के मूल्यांकन की व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित तथा प्रभावी बनाना था।

6. तकनीकी तथा प्रबन्ध शिक्षा सम्बन्धी संशोधन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के खण्ड 6—तकनीकी तथा प्रबन्ध शिक्षा में संशोधन किया गया।

इसके अन्तर्गत अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) को अधिक सुदृढ़ बनाने पर बल दिया गया।

इस संशोधन का उद्देश्य तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा के विकास तथा उसकी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना था।

7. शिक्षा की विषयवस्तु एवं प्रक्रिया सम्बन्धी संशोधन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के खण्ड 8—शिक्षा की विषयवस्तु तथा प्रक्रिया को नया मोड़ देना में दो प्रमुख संशोधन किए गए।

1. जनसंख्या शिक्षा को प्रोत्साहन

विद्यालयी शिक्षा में जनसंख्या शिक्षा (Population Education) पर विशेष बल दिया जाए।

इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को जनसंख्या से सम्बन्धित विषयों के प्रति जागरूक बनाना था।

2. राष्ट्रीय परीक्षा सुधार प्रारूप

परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए परीक्षा संस्थाओं के दिशा-निर्देशन हेतु एक राष्ट्रीय परीक्षा सुधार प्रारूप तैयार किया जाए।

इसका उद्देश्य विभिन्न परीक्षा संस्थाओं को परीक्षा एवं मूल्यांकन में सुधार के लिए उचित दिशा प्रदान करना था।

8. शिक्षा के प्रबन्ध एवं वित्त सम्बन्धी संशोधन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के खण्ड 10—शिक्षा का प्रबन्ध में शिक्षा पर अधिक आर्थिक निवेश करने का सुझाव दिया गया।

इसके अन्तर्गत शिक्षा के विकास के लिए राष्ट्रीय आय का 6% से अधिक व्यय करने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य विद्यालयों, शिक्षकों, प्रशिक्षण संस्थाओं तथा अन्य शिक्षा सम्बन्धी कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराना था।

9. संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 की कार्ययोजना

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के क्रियान्वयन के लिए तैयार की गई मूल कार्ययोजना 24 भागों में विभाजित थी।

सन् 1992 में नीति के संशोधन के साथ उसकी कार्ययोजना में भी परिवर्तन किए गए। इस संशोधित कार्ययोजना को 23 भागों में व्यवस्थित किया गया।

इसे कार्ययोजना 1992 (Programme of Action, 1992) कहा जाता है।

इस कार्ययोजना में महिलाओं, वंचित वर्गों, प्रारम्भिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण तथा शिक्षा प्रबन्ध जैसे विभिन्न क्षेत्रों को सम्मिलित किया गया।

कार्ययोजना 1992 के 23 भाग

संशोधित कार्ययोजना 1992 के सभी 23 भाग निम्नलिखित हैं—

  1. नारी समता के लिए शिक्षा।
  2. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों की शिक्षा।
  3. अल्पसंख्यकों की शिक्षा।
  4. विकलांगों की शिक्षा।
  5. प्रौढ़ एवं सतत शिक्षा।
  6. पूर्व बाल्यकाल परिचर्या एवं शिक्षा।
  7. प्राथमिक शिक्षा।
  8. माध्यमिक शिक्षा।
  9. नवोदय विद्यालय।
  10. व्यावसायिक शिक्षा।
  11. उच्च शिक्षा।
  12. मुक्त शिक्षा।
  13. मानव शक्ति नियोजन।
  14. ग्रामीण विश्वविद्यालय एवं संस्थान।
  15. तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा।
  16. अनुसंधान एवं विकास।
  17. सांस्कृतिक परिवेश।
  18. भाषाओं का विकास।
  19. जनसंचार एवं शैक्षिक तकनीकी।
  20. खेल, शारीरिक शिक्षा एवं युवा।
  21. मूल्यांकन प्रक्रिया एवं परीक्षा सुधार।
  22. अध्यापक एवं उनका प्रशिक्षण।
  23. शिक्षा का प्रबन्ध।

कार्ययोजना 1992 की प्रमुख विशेषताएँ

संशोधित कार्ययोजना 1992 की विषयवस्तु से स्पष्ट होता है कि इसमें शिक्षा के विभिन्न स्तरों के साथ विशेष शैक्षिक आवश्यकताओं पर भी ध्यान दिया गया।

1. समानता एवं सामाजिक न्याय

कार्ययोजना में महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों तथा विकलांग व्यक्तियों की शिक्षा को स्थान दिया गया।

2. प्रारम्भिक एवं माध्यमिक शिक्षा

पूर्व बाल्यकाल शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा तथा नवोदय विद्यालयों के विकास को कार्ययोजना में शामिल किया गया।

3. उच्च एवं रोजगारपरक शिक्षा

उच्च शिक्षा, मुक्त शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा तथा मानव शक्ति नियोजन को महत्त्व दिया गया।

4. अनुसंधान एवं शैक्षिक तकनीकी

अनुसंधान, विकास, जनसंचार और शैक्षिक तकनीकी को शिक्षा के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के रूप में सम्मिलित किया गया।

5. शिक्षक प्रशिक्षण एवं मूल्यांकन

अध्यापक प्रशिक्षण, मूल्यांकन प्रक्रिया, परीक्षा सुधार तथा शिक्षा के प्रबन्ध को कार्ययोजना का अंग बनाया गया।

इस प्रकार कार्ययोजना 1992 ने शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में सुधार के लिए एक व्यापक क्रियान्वयन रूपरेखा प्रस्तुत की।

10. संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 का मूल्यांकन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में सन् 1992 में किए गए संशोधनों का उद्देश्य प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक शिक्षा का विस्तार करना, विद्यालयों की सुविधाओं में सुधार लाना तथा शैक्षिक अवसरों को अधिक व्यापक बनाना था।

पुस्तक में संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 के निम्नलिखित चार प्रमुख प्रावधानों एवं प्रभावों का उल्लेख किया गया है।

1. प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों की उपलब्धता

संशोधित नीति में विद्यालयों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए जनसंख्या तथा दूरी सम्बन्धी मानकों में परिवर्तन का प्रस्ताव किया गया।

  • प्राथमिक विद्यालय— 300 जनसंख्या वाले क्षेत्र के स्थान पर 200 जनसंख्या वाले क्षेत्र में एक प्राथमिक विद्यालय खोलने का प्रस्ताव किया गया।
  • उच्च प्राथमिक विद्यालय— 3 किलोमीटर की दूरी के स्थान पर लगभग 2 किलोमीटर की दूरी के भीतर उच्च प्राथमिक विद्यालय खोलने का प्रस्ताव किया गया।

इन प्रावधानों का उद्देश्य बच्चों को उनके निवास स्थान के निकट विद्यालय उपलब्ध कराना तथा विद्यालयों की दूरी के कारण शिक्षा प्राप्त करने में होने वाली कठिनाइयों को कम करना था।

2. ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना में सुविधाओं की वृद्धि

संशोधित नीति में ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना के अन्तर्गत प्राथमिक विद्यालयों की सुविधाओं को बढ़ाने का प्रावधान किया गया।

इसके अनुसार विद्यालयों में—

  • दो कमरों के स्थान पर तीन कमरे उपलब्ध कराने का प्रस्ताव था।
  • दो अध्यापकों के स्थान पर तीन अध्यापक नियुक्त करने का प्रस्ताव था।

इसका उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों में पर्याप्त कक्षाएँ और शिक्षक उपलब्ध कराकर शिक्षण व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना था।

3. उच्च प्राथमिक विद्यालयों तक ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड का विस्तार

संशोधित नीति के अन्तर्गत ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना को उच्च प्राथमिक विद्यालयों में भी लागू करने का प्रावधान किया गया।

इससे उच्च प्राथमिक शिक्षा की आधारभूत सुविधाओं में सुधार करने तथा विद्यालयों को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास किए गए।

4. स्ववित्तपोषित उच्च शिक्षा संस्थाओं को मान्यता

संशोधित नीति के मूल्यांकन में स्ववित्तपोषित उच्च शिक्षा संस्थाओं को मान्यता प्रदान करने का उल्लेख किया गया है।

इस व्यवस्था से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गैर-सरकारी संस्थाओं की भागीदारी और विस्तार को बढ़ावा मिला।

किन्तु इसके साथ उच्च शिक्षा की लागत तथा गुणवत्ता से सम्बन्धित समस्याएँ भी सामने आईं।

11. संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 के सकारात्मक प्रभाव

पुस्तक के मूल्यांकन के अनुसार संशोधित नीति के प्रभाव से प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक शिक्षा के प्रसार में तेजी आई।

इसके प्रमुख सकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित थे—

  • विद्यालयों की उपलब्धता में सुधार— प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के विस्तार को प्रोत्साहन मिला।
  • ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड का विस्तार— विद्यालयों में आवश्यक भवन, शिक्षक तथा अन्य आधारभूत सुविधाओं को बढ़ाने के प्रयास हुए।
  • उच्च प्राथमिक शिक्षा का विकास— ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना का लाभ उच्च प्राथमिक विद्यालयों तक पहुँचाने की दिशा में कार्य किया गया।
  • महिला शिक्षा को प्रोत्साहन— महिला अध्यापिकाओं की नियुक्ति तथा बालिकाओं के शैक्षिक अवसर बढ़ाने पर बल दिया गया।
  • शैक्षिक समानता— वंचित वर्गों की शिक्षा, साक्षरता और सतत शिक्षा के विकास को महत्त्व दिया गया।

पुस्तक में दिए गए ऐतिहासिक आँकड़ों के अनुसार 1992 से 2011 तक लगभग 70% उच्च प्राथमिक विद्यालयों को ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना का लाभ पहुँचाया जा चुका था।

यह पुस्तक में उल्लिखित तत्कालीन स्थिति का आँकड़ा है।

12. संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 की सीमाएँ

संशोधित नीति से प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक शिक्षा के विस्तार को प्रोत्साहन मिला, किन्तु पुस्तक के मूल्यांकन में उच्च शिक्षा के क्षेत्र से सम्बन्धित कुछ समस्याओं का भी उल्लेख किया गया है।

1. उच्च शिक्षा का महँगा होना

पुस्तक के अनुसार उच्च शिक्षा में निजी एवं स्ववित्तपोषित संस्थाओं के विस्तार के साथ शिक्षा की लागत बढ़ने की समस्या सामने आई।

इसके कारण आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना कठिन हो सकता था।

2. उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सम्बन्धी समस्याएँ

पुस्तक के मूल्यांकन में यह आलोचना की गई है कि उच्च शिक्षा के निजीकरण के कारण कुछ संस्थाओं में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ने के स्थान पर उसका स्तर प्रभावित हुआ।

इसलिए उच्च शिक्षा के विस्तार के साथ उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी आवश्यक था।

3. विद्यार्थियों के आर्थिक शोषण की समस्या

पुस्तक में उच्च शिक्षा के व्यावसायीकरण के कारण विद्यार्थियों से अधिक धनराशि लेने तथा उनके आर्थिक शोषण की समस्या का उल्लेख किया गया है।

इससे स्पष्ट होता है कि उच्च शिक्षा में केवल संस्थाओं की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी शैक्षिक गुणवत्ता और आर्थिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।

संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 का समग्र मूल्यांकन

संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रावधानों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए विभिन्न सुधार प्रस्तुत किए।

इसमें विशेष रूप से साक्षरता, निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा, ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना, महिला शिक्षकों की नियुक्ति, उच्च प्राथमिक शिक्षा तथा मूल्यांकन व्यवस्था पर ध्यान दिया गया।

इसके अतिरिक्त शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों के विकास के लिए 23 भागों वाली संशोधित कार्ययोजना प्रस्तुत की गई।

पुस्तक के मूल्यांकन के अनुसार इन संशोधनों से प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक शिक्षा के प्रसार को गति मिली। किन्तु उच्च शिक्षा के निजीकरण, बढ़ती लागत तथा गुणवत्ता सम्बन्धी समस्याएँ भी सामने आईं।

इस प्रकार संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 का महत्त्व भारतीय शिक्षा को अधिक व्यापक एवं सुलभ बनाने के प्रयासों में रहा, जबकि शिक्षा की गुणवत्ता तथा समान अवसर सुनिश्चित करना एक महत्त्वपूर्ण चुनौती बनी रही।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में घोषित की गई थी। इसमें प्रत्येक 5 वर्ष बाद नीति के क्रियान्वयन और परिणामों की समीक्षा का प्रावधान था।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की समीक्षा के लिए 7 मई 1990 को आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में राममूर्ति शिक्षा समिति गठित की गई।
  • राममूर्ति समिति ने 26 दिसम्बर 1990 को अपनी रिपोर्ट सरकार के समक्ष प्रस्तुत की।
  • राममूर्ति समिति ने सामान्य विद्यालय प्रणाली, शिक्षा में वर्गभेद समाप्त करने, साक्षरता, व्यावसायिक शिक्षा तथा रोजगारपरक शिक्षा के विकास पर बल दिया।
  • सन् 1992 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समीक्षा के लिए जनार्दन रेड्डी समिति का गठन किया गया।
  • राममूर्ति और जनार्दन रेड्डी समितियों की रिपोर्टों के आधार पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में 1992 में संशोधन किए गए।
  • संशोधित नीति में पूरे देश में +2 स्तर को विद्यालयी शिक्षा का अंग बनाने पर बल दिया गया।
  • समानता के लिए शिक्षा सम्बन्धी संशोधनों में समग्र साक्षरता अभियान, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा नवसाक्षरों के लिए सतत शिक्षा को महत्त्व दिया गया।
  • ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना के अन्तर्गत प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में तीन कमरे और तीन अध्यापकों की व्यवस्था करने का प्रस्ताव किया गया।
  • भविष्य में शिक्षकों की नियुक्ति में 50% महिला अध्यापिकाओं को स्थान देने का सुझाव दिया गया।
  • ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना को उच्च प्राथमिक विद्यालयों में भी लागू करने का प्रावधान किया गया।
  • सन् 2000 तक निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय मिशन चलाने का प्रस्ताव किया गया।
  • माध्यमिक शिक्षा में बालिकाओं, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के बच्चों के प्रवेश को बढ़ावा देने पर बल दिया गया।
  • तकनीकी शिक्षा के विकास के लिए AICTE को सुदृढ़ बनाने तथा परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए राष्ट्रीय परीक्षा सुधार प्रारूप तैयार करने का सुझाव दिया गया।
  • शिक्षा के विकास के लिए राष्ट्रीय आय का 6% से अधिक व्यय करने पर बल दिया गया।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की मूल कार्ययोजना 24 भागों में थी, जबकि संशोधित कार्ययोजना 1992 को 23 भागों में विभाजित किया गया।
  • संशोधित नीति के मूल्यांकन में 300 के स्थान पर 200 जनसंख्या वाले क्षेत्र में प्राथमिक विद्यालय खोलने का प्रस्ताव किया गया।
  • उच्च प्राथमिक विद्यालय की दूरी 3 किलोमीटर के स्थान पर 2 किलोमीटर रखने का प्रस्ताव किया गया।
  • पुस्तक के अनुसार 1992 से 2011 तक लगभग 70% उच्च प्राथमिक विद्यालयों को ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना का लाभ पहुँचाया जा चुका था।
  • संशोधित नीति की प्रमुख सीमाओं में उच्च शिक्षा का महँगा होना, गुणवत्ता सम्बन्धी समस्याएँ तथा विद्यार्थियों के आर्थिक शोषण की समस्या शामिल थी।
Topic 13 यशपाल समिति (1992–93)—गठन, शैक्षिक बोझ की समस्या, कारण, सुझाव एवं मूल्यांकन

यशपाल समिति (1992–93)—गठन, शैक्षिक बोझ की समस्या, कारण, सुझाव एवं मूल्यांकन

यशपाल समिति का परिचय

स्वतंत्रता के बाद भारत में शिक्षा के प्रसार के साथ उसकी गुणवत्ता सुधारने के अनेक प्रयास किए गए। किन्तु विद्यालयी शिक्षा में विद्यार्थियों पर बढ़ता शैक्षिक बोझ तथा शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट महत्त्वपूर्ण समस्याएँ बनी रहीं।

विद्यालयों में भारी पाठ्यक्रम, कठिन पाठ्यपुस्तकें, परीक्षाओं का भय तथा रटने पर अत्यधिक बल दिए जाने के कारण बच्चों के लिए शिक्षा एक बोझ बनती जा रही थी। अनेक विद्यार्थी परीक्षा के समय तनाव और भय का अनुभव करते थे।

इन समस्याओं को दूर करने तथा विद्यालयी शिक्षा को अधिक रोचक, उपयोगी और गुणवत्तापूर्ण बनाने के उद्देश्य से भारत सरकार ने सन् 1992 में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय सलाहकार समिति गठित की।

यह समिति यशपाल समिति (Yashpal Committee) के नाम से प्रसिद्ध हुई।

1. यशपाल समिति का गठन

भारत में विद्यार्थियों पर बढ़ते शैक्षिक बोझ की समस्या पर लंबे समय से विचार किया जा रहा था।

पुस्तक के अनुसार तत्कालीन राज्यसभा सदस्य एवं प्रसिद्ध साहित्यकार आर. के. नारायण ने भी इस समस्या की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया।

इसके बाद भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 1992 में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय सलाहकार समिति (National Advisory Committee) का गठन किया।

यह समिति आठ सदस्यीय थी और इसके अध्यक्ष प्रो. यशपाल थे।

समिति का मुख्य कार्य विद्यालयी विद्यार्थियों पर पड़ने वाले अनावश्यक शैक्षिक बोझ का अध्ययन करके उसे कम करने तथा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के उपाय सुझाना था।

यशपाल समिति के प्रमुख तथ्य

बिन्दु विवरण
गठन वर्ष 1992
समिति का नाम राष्ट्रीय सलाहकार समिति
प्रचलित नाम यशपाल समिति
अध्यक्ष प्रो. यशपाल
कुल सदस्य 8
गठन करने वाला मंत्रालय मानव संसाधन विकास मंत्रालय
प्रतिवेदन प्रस्तुत 15 जुलाई 1993
प्रतिवेदन का नाम शिक्षा बिना बोझ (Learning Without Burden)
मुख्य उद्देश्य शैक्षिक बोझ कम करना तथा अधिगम की गुणवत्ता सुधारना

2. यशपाल समिति के प्रमुख उद्देश्य

यशपाल समिति का गठन विद्यालयी शिक्षा में बढ़ते अनावश्यक बोझ को कम करने तथा बच्चों के लिए शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक रुचिकर बनाने के उद्देश्य से किया गया था।

समिति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे—

  • शैक्षिक बोझ कम करना— विद्यार्थियों पर पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकों और परीक्षा के कारण पड़ने वाले अनावश्यक बोझ को कम करना।
  • शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना— विद्यालयी शिक्षा को अधिक प्रभावी, उपयोगी तथा गुणवत्तापूर्ण बनाना।
  • शिक्षा को रोचक बनाना— शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को बच्चों की रुचियों और आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना।
  • समझकर सीखने को प्रोत्साहन— रटने की प्रवृत्ति कम करके विद्यार्थियों में विषयों को समझने की क्षमता विकसित करना।
  • पाठ्यचर्या में सुधार— विद्यालयी पाठ्यचर्या और पाठ्यपुस्तकों को बच्चों के वास्तविक जीवन से जोड़ना।
  • परीक्षा प्रणाली में सुधार— परीक्षा के भय और अंकों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करके मूल्यांकन को अधिक उपयोगी बनाना।

3. यशपाल समिति की अध्ययन पद्धति

यशपाल समिति ने विद्यालयी शिक्षा में शैक्षिक बोझ की समस्या को समझने के लिए विभिन्न पाठ्यक्रमों, पाठ्यपुस्तकों तथा शिक्षण व्यवस्थाओं का अध्ययन किया।

समिति ने मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य किए—

  • CBSE की पाठ्यचर्या तथा पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन किया।
  • NCERT द्वारा तैयार पाठ्यचर्या तथा पुस्तकों का अध्ययन किया।
  • तत्कालीन विद्यालयी पाठ्यक्रमों की स्थिति का निरीक्षण और विश्लेषण किया।
  • विद्यालयों के प्रधानाचार्यों तथा शिक्षकों से विचार-विमर्श किया।
  • शिक्षा बोर्डों के अध्यक्षों तथा शिक्षाविदों के विचार प्राप्त किए।

इस अध्ययन के आधार पर समिति ने विद्यालयी शिक्षा में बढ़ते बोझ के स्वरूप, उसके कारणों तथा सम्भावित समाधानों का विश्लेषण किया।

4. यशपाल समिति का प्रतिवेदन

यशपाल समिति ने 15 जुलाई 1993 को अपना प्रतिवेदन भारत सरकार को प्रस्तुत किया।

इस प्रतिवेदन का शीर्षक शिक्षा बिना बोझ (Learning Without Burden) था।

प्रतिवेदन में विद्यार्थियों पर बढ़ते शैक्षिक बोझ, परीक्षा के भय, कठिन पाठ्यपुस्तकों, अत्यधिक पाठ्यक्रम तथा शिक्षा की गुणवत्ता से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन किया गया।

समिति ने इन समस्याओं को दूर करने के लिए पाठ्यचर्या, पाठ्यपुस्तकों, शिक्षण-विधियों, शिक्षक प्रशिक्षण तथा विद्यालयी प्रशासन में सुधार सम्बन्धी सुझाव प्रस्तुत किए।

प्रतिवेदन के पाँच प्रमुख भाग

पुस्तक में यशपाल समिति के प्रतिवेदन की विषयवस्तु को पाँच प्रमुख भागों में प्रस्तुत किया गया है।

1. प्रथम भाग—समिति का गठन एवं कार्यविधि

इस भाग में समिति के गठन के उद्देश्य, कार्यविधि तथा अध्ययन की पृष्ठभूमि का वर्णन किया गया।

2. द्वितीय भाग—पाठ्यचर्या के बोझ की समस्या

इस भाग में विद्यार्थियों पर बढ़ते पाठ्यचर्या सम्बन्धी बोझ का स्वरूप तथा शिक्षा की गुणवत्ता पर उसके प्रभाव को स्पष्ट किया गया।

3. तृतीय भाग—समस्या के कारण

इस भाग में विद्यालयी शिक्षा के बोझिल होने तथा शिक्षा के स्तर में गिरावट के प्रमुख कारणों का उल्लेख किया गया।

4. चतुर्थ भाग—सुझाव एवं सिफारिशें

इस भाग में शैक्षिक बोझ कम करने, पाठ्यक्रम सुधारने तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए सुझाव प्रस्तुत किए गए।

5. पंचम भाग—समिति के गठन का आदेशपत्र

पुस्तक के अनुसार प्रतिवेदन के अन्तिम भाग में समिति के गठन से सम्बन्धित सरकारी आदेशपत्र को सम्मिलित किया गया।

5. शैक्षिक बोझ की समस्या का स्वरूप

यशपाल समिति ने विद्यालयी शिक्षा में बढ़ते शैक्षिक बोझ को एक गम्भीर समस्या माना।

शैक्षिक बोझ से आशय केवल बच्चों के भारी बस्तों से नहीं है, बल्कि अत्यधिक पाठ्यक्रम, कठिन विषयवस्तु, रटने का दबाव, परीक्षा का भय तथा बच्चों की समझ से बाहर की शिक्षण प्रक्रिया से भी है।

समिति ने पाया कि अनेक विद्यालयों में शिक्षा बच्चों के लिए आनंददायक अनुभव बनने के बजाय तनावपूर्ण और बोझिल बनती जा रही थी।

पुस्तक में शैक्षिक बोझ की समस्या के निम्नलिखित प्रमुख स्वरूप बताए गए हैं।

1. कम आयु में औपचारिक शिक्षा का प्रारम्भ

बच्चों की बहुत कम आयु में ही औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ कर दी जाती थी।

इससे बच्चों पर उनकी आयु और विकास के स्तर के अनुसार अपेक्षा से अधिक शैक्षिक दबाव पड़ता था।

2. परीक्षा का भय

विद्यार्थियों में परीक्षाओं का भय बना रहता था। शिक्षक तथा अभिभावक भी अधिक अंक प्राप्त करने का दबाव डालकर इस भय को बढ़ाते थे।

परिणामस्वरूप विद्यार्थी सीखने की प्रक्रिया का आनंद लेने के बजाय परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने पर अधिक ध्यान देते थे।

3. पाठ्यक्रम पूरा करने पर अत्यधिक बल

अनेक शिक्षकों का प्रमुख उद्देश्य निर्धारित समय में पाठ्यचर्या पूरी करना बन गया था।

इस कारण बच्चों की रुचि, समझ तथा अन्य शैक्षिक आवश्यकताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता था।

4. मनोरंजन एवं अवकाश की कमी

बच्चों को अध्ययन के साथ खेलकूद, मनोरंजन और पर्याप्त अवकाश की भी आवश्यकता होती है।

किन्तु अत्यधिक पढ़ाई के दबाव के कारण उन्हें इन गतिविधियों के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते थे।

समिति ने बच्चों की रुचि बढ़ाने के लिए मनोरंजन तथा अवकाश को महत्त्वपूर्ण माना।

5. बड़ी कक्षाएँ और भारी पाठ्यचर्या

विद्यालयों में विद्यार्थियों की अधिक संख्या, भारी पाठ्यचर्या तथा कठिन पाठ्यपुस्तकें शिक्षण को बोझिल बनाती थीं।

इन परिस्थितियों में शिक्षक बच्चों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं पर ध्यान देने के बजाय केवल पाठ्यक्रम पूरा करने में लगे रहते थे।

6. वास्तविक जीवन से असम्बन्धित पाठ्यवस्तु

पाठ्यचर्या तथा पाठ्यपुस्तकों की विषयवस्तु बच्चों के वास्तविक जीवन और अनुभवों से पर्याप्त रूप से सम्बन्धित नहीं थी।

इस कारण विद्यार्थी पढ़ाई गई बातों को अपने दैनिक जीवन से जोड़कर समझ नहीं पाते थे।

7. विद्यालयी शिक्षा का नीरस होना

अत्यधिक पाठ्यक्रम तथा परीक्षा-केंद्रित शिक्षण के कारण विद्यालयी शिक्षा बच्चों को नीरस, बोझिल और अरुचिकर लगती थी।

इससे शिक्षा के प्रति उनकी स्वाभाविक जिज्ञासा और रुचि प्रभावित होती थी।

8. सामाजिक विज्ञान में सूचनाओं की अधिकता

सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में बड़ी मात्रा में सूचनाएँ दी जाती थीं, जबकि बच्चों के जीवन से सम्बन्धित सामाजिक समस्याओं को अपेक्षाकृत कम स्थान मिलता था।

इससे सामाजिक विज्ञान का अध्ययन वास्तविक जीवन को समझने के बजाय तथ्यों को याद करने तक सीमित हो जाता था।

9. पाठ्यपुस्तकों की भाषा कठिन होना

अनेक पाठ्यपुस्तकों की भाषा बच्चों की जनभाषा तथा दैनिक बोलचाल की भाषा से अलग थी।

इससे विद्यार्थियों को विषयवस्तु समझने में कठिनाई होती थी और वे रटने पर निर्भर हो जाते थे।

समिति ने पाठ्यपुस्तकों को बच्चों की भाषा तथा वास्तविक जीवन के अनुभवों से जोड़ने पर बल दिया।

10. प्राथमिक स्तर पर अत्यधिक पाठ्यवस्तु

प्राथमिक कक्षाओं में ही बच्चों को बहुत अधिक विषयवस्तु पढ़ाना प्रारम्भ कर दिया जाता था।

इससे प्रारम्भिक शिक्षा का स्तर बच्चों की आयु और समझ के अनुरूप नहीं रह पाता था।

11. अंकों को ही योग्यता का आधार मानना

विद्यालयों में परीक्षा के अंकों को विद्यार्थियों की योग्यता का प्रमुख आधार माना जाता था।

अगली कक्षा में प्रवेश और शैक्षिक सफलता को अंकों से जोड़ने के कारण बच्चे विषयों को समझने के बजाय रटने लगते थे।

12. विद्यालयी बस्तों का अधिक भार

पुस्तक के अनुसार तत्कालीन निजी विद्यालयों में प्राथमिक स्तर के बच्चों के बस्तों का औसत भार लगभग 4 किलोग्राम बताया गया था।

छोटे बच्चों को प्रतिदिन भारी पुस्तकें और अन्य सामग्री विद्यालय लाने तथा वापस ले जाने के कारण अनावश्यक शारीरिक बोझ उठाना पड़ता था।

13. भाषा शिक्षा में भाषा-कौशल की उपेक्षा

भाषा की पाठ्यपुस्तकों में भाषा के मूल तत्त्वों तथा भाषा-कौशल के विकास के स्थान पर विषयगत जानकारी पर अधिक बल दिया जाता था।

इससे बच्चों की भाषा को समझने, प्रयोग करने तथा अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करने का उद्देश्य प्रभावित होता था।

शैक्षिक बोझ की समस्या का निष्कर्ष

यशपाल समिति के अनुसार विद्यालयी शिक्षा का बोझ केवल पुस्तकों की संख्या या बस्ते के भार तक सीमित नहीं था।

इसमें पाठ्यक्रम की अधिकता, कठिन भाषा, रटने की प्रवृत्ति, परीक्षा का दबाव, बच्चों की रुचियों की उपेक्षा तथा वास्तविक जीवन से असम्बन्धित शिक्षा जैसी समस्याएँ भी शामिल थीं।

इसलिए समिति ने शिक्षा की विषयवस्तु और शिक्षण प्रक्रिया में मूलभूत सुधार करने की आवश्यकता बताई।

6. शैक्षिक बोझ बढ़ने के प्रमुख कारण

यशपाल समिति ने विद्यालयी स्तर पर बढ़ते शैक्षिक बोझ तथा शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट के विभिन्न कारणों का अध्ययन किया।

पुस्तक में इसके निम्नलिखित 12 प्रमुख कारण बताए गए हैं।

1. सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण की औपचारिकता

शिक्षकों का सेवाकालीन प्रशिक्षण केवल एक परम्परा बनकर रह गया था।

इससे शिक्षकों को नवीन शिक्षण-विधियों तथा वास्तविक विद्यालयी समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त सहायता नहीं मिल पाती थी।

2. अंक-केंद्रित परीक्षा प्रणाली

परीक्षा प्रणाली का मुख्य आधार विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त अंक बन गए थे।

इससे विद्यार्थियों में विषयों को समझने के बजाय अधिक अंक प्राप्त करने की प्रवृत्ति विकसित होती थी।

3. शिक्षकों के उत्तरदायित्व में कमी

कुछ शिक्षकों के व्यवहार तथा शैक्षिक उत्तरदायित्वों के निर्वहन में कमी पाई गई।

इससे बच्चों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं और सीखने की कठिनाइयों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता था।

4. विद्यालयों की दोषपूर्ण कार्यप्रणाली

विद्यालयों की कार्यप्रणाली में अनेक कमियाँ थीं तथा कई संस्थाओं में पुस्तकालयों जैसी आवश्यक शैक्षिक सुविधाओं का अभाव था।

5. निम्न कक्षाओं में उच्च स्तर की पाठ्यवस्तु

निम्न कक्षाओं के पाठ्यक्रम में अपेक्षाकृत उच्च स्तर की विषयवस्तु सम्मिलित कर दी जाती थी।

इससे बच्चों को अपनी आयु और समझ से अधिक कठिन सामग्री पढ़नी पड़ती थी।

6. शिक्षक शिक्षा और विद्यालयी शिक्षा में दूरी

पूर्णकालीन शिक्षक शिक्षा की व्यवस्था विद्यालयी शिक्षा की वास्तविक परिस्थितियों से पर्याप्त रूप से जुड़ी नहीं थी।

इससे शिक्षक प्रशिक्षण और वास्तविक कक्षा शिक्षण के बीच अन्तर बना रहता था।

7. पाठ्यपुस्तकों पर अत्यधिक निर्भरता

शिक्षक पाठ्यपुस्तकों में दी गई विषयवस्तु को ही अपने शिक्षण कार्य की सीमा और प्रमुख मार्गदर्शन मान लेते थे।

इससे स्वतंत्र शिक्षण, गतिविधियों तथा बच्चों के अनुभवों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता था।

8. अत्यधिक विस्तृत पाठ्यक्रम का निर्माण

पुस्तक के अनुसार प्रायः विश्वविद्यालयी शिक्षकों द्वारा विद्यालयी पाठ्यचर्याओं का निर्माण किया जाता था।

परिणामस्वरूप कई बार पाठ्यक्रम इतने विस्तृत हो जाते थे कि उन्हें उपलब्ध शिक्षण समय में पूरा करना कठिन होता था।

9. ज्ञान और सूचना को एक समान मानना

विद्यालयी शिक्षा में ज्ञान प्राप्त करने का अर्थ अधिक से अधिक सूचनाएँ याद करना माना जाने लगा था।

बच्चों में समझ विकसित करने के बजाय अधिक जानकारी भरने पर बल दिया जाता था।

10. पाठ्यचर्या का केन्द्रीकृत स्वरूप

पाठ्यचर्या और पाठ्यपुस्तकों के निर्माण की व्यवस्था अत्यधिक केन्द्रीकृत थी।

इस कारण पाठ्यक्रमों में स्थानीय पर्यावरण, क्षेत्रीय परिस्थितियों तथा बच्चों की वास्तविक आवश्यकताओं को पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता था।

11. उचित शैक्षिक वातावरण का अभाव

अनेक विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षण समय, योग्य कर्मचारी, भवन, पुस्तकालय तथा प्रयोगशालाओं जैसी सुविधाओं की कमी थी।

इन कमियों के कारण शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया प्रभावी नहीं बन पाती थी।

12. प्रतिस्पर्धा एवं अंग्रेजी माध्यम का दबाव

समिति ने प्रतियोगिता पर आधारित सामाजिक वातावरण को भी शैक्षिक बोझ का एक प्रमुख कारण माना।

समाज में अंग्रेजी भाषा के ज्ञान और प्रयोग को उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ने की प्रवृत्ति के कारण अनेक बच्चों पर अंग्रेजी माध्यम से अध्ययन करने का दबाव बढ़ता था।

जब विद्यार्थी शिक्षण की भाषा को ठीक प्रकार से नहीं समझ पाते थे, तब वे विषयवस्तु को समझने के बजाय रटने लगते थे।

7. शैक्षिक बोझ कम करने के लिए यशपाल समिति के सुझाव

यशपाल समिति ने विद्यालयी शिक्षा की समस्याओं और उनके कारणों का अध्ययन करके शैक्षिक बोझ कम करने तथा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए अनेक सुझाव प्रस्तुत किए।

इन सुझावों में पाठ्यचर्या, पाठ्यपुस्तकों, शिक्षण-विधियों, शिक्षक प्रशिक्षण, गृहकार्य, परीक्षा प्रणाली तथा विद्यालयी प्रशासन में सुधार पर विशेष बल दिया गया।

8. पाठ्यचर्या एवं विषयवस्तु सम्बन्धी सुझाव

1. सामाजिक विज्ञान की पाठ्यचर्या में सुधार

सामाजिक विज्ञान की पाठ्यचर्या में सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक व्यवस्था का सामान्य एवं उपयोगी ज्ञान सम्मिलित किया जाए।

इससे विद्यार्थी अपने आसपास के समाज तथा उसकी समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।

2. प्राथमिक स्तर पर प्रयोगात्मक विज्ञान शिक्षा

प्राथमिक स्तर की विज्ञान पाठ्यचर्या में अधिकतर विषयवस्तु ऐसी हो जिसे बच्चे गतिविधियों और प्रयोगों के माध्यम से सीख सकें।

इसका उद्देश्य छोटे बच्चों में अनुभव के आधार पर सीखने की क्षमता विकसित करना था।

3. माध्यमिक स्तर पर प्रयोगशाला आधारित विज्ञान

माध्यमिक स्तर पर विज्ञान की पाठ्यचर्या में ऐसी विषयवस्तु सम्मिलित की जाए जिसे प्रयोगशालाओं तथा कार्यशालाओं में व्यावहारिक रूप से सीखा जा सके।

इससे विद्यार्थियों को विज्ञान के सिद्धान्तों को प्रयोगों के माध्यम से समझने के अवसर प्राप्त होंगे।

4. सभी विषयों की पाठ्यपुस्तकों में सुधार

सभी विषयों की पाठ्यपुस्तकों को बच्चों की आयु, समझ तथा वास्तविक जीवन की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जाए।

भाषा सम्बन्धी पुस्तकों में स्थानीय भाषाओं को उचित स्थान दिया जाए।

9. शिक्षक शिक्षा एवं प्रशिक्षण सम्बन्धी सुझाव

1. पत्राचार आधारित बी.एड. पाठ्यक्रम समाप्त करना

समिति ने पत्राचार के माध्यम से संचालित बी.एड. पाठ्यक्रम को समाप्त करने का सुझाव दिया।

इसका उद्देश्य शिक्षक प्रशिक्षण को अधिक प्रभावी तथा व्यावहारिक बनाने पर बल देना था।

2. सेवाकालीन प्रशिक्षण में सुधार

शिक्षकों की सतत एवं सेवाकालीन शिक्षा की उचित व्यवस्था की जाए।

प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए आयोजित न किए जाएँ, बल्कि उनसे शिक्षकों की वास्तविक शिक्षण क्षमता का विकास होना चाहिए।

3. बी.एड. पाठ्यक्रम में विशेष योग्यता की व्यवस्था

बी.एड. पाठ्यक्रम में नर्सरी, प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर पर शिक्षण के लिए विशेष योग्यता प्राप्त करने की व्यवस्था की जाए।

इससे भावी शिक्षक जिस शैक्षिक स्तर पर पढ़ाना चाहते हैं, उसकी आवश्यकताओं के अनुसार प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंगे।

4. पाठ्यचर्या निर्माण में शिक्षकों की भागीदारी

विद्यालयों के शिक्षकों को पाठ्यचर्या तथा पाठ्यपुस्तकों के निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए।

इससे पाठ्यक्रम तैयार करते समय वास्तविक कक्षा शिक्षण और विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जा सकेगा।

5. स्वैच्छिक संगठनों को प्रोत्साहन

शिक्षा में नवाचारों के प्रति समर्पित स्वैच्छिक संगठनों को पाठ्यचर्या निर्माण, पाठ्यपुस्तक निर्माण तथा शिक्षक प्रशिक्षण के विकास में कार्य करने की स्वतंत्रता प्रदान की जाए।

इसका उद्देश्य शिक्षा में नए विचारों और प्रभावी शिक्षण प्रयोगों को प्रोत्साहित करना था।

10. बस्ते का बोझ एवं गृहकार्य सम्बन्धी सुझाव

1. विद्यालय में पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता

छोटे बच्चों को प्रतिदिन भारी बस्ता न उठाना पड़े, इसके लिए पाठ्यपुस्तकें विद्यालय में ही उपलब्ध कराई जाएँ।

इससे बच्चों को प्रत्येक दिन सभी पुस्तकें घर से विद्यालय और विद्यालय से घर ले जाने की आवश्यकता कम होगी।

2. प्राथमिक कक्षाओं में गृहकार्य समाप्त करना

समिति ने प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों को अनावश्यक गृहकार्य (Homework) न देने का सुझाव दिया।

इसका उद्देश्य छोटे बच्चों को विद्यालय के बाद खेलकूद, मनोरंजन और अन्य विकासात्मक गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय प्रदान करना था।

3. उच्च कक्षाओं में गृहकार्य की उचित व्यवस्था

उच्च प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर पर आवश्यक गृहकार्य के लिए विद्यार्थियों को उचित पुस्तकों तथा अध्ययन सामग्री की सुविधा प्रदान की जाए।

गृहकार्य ऐसा होना चाहिए जिससे विद्यार्थियों की समझ विकसित हो, न कि केवल रटने और लिखने का अतिरिक्त बोझ बढ़े।

11. विद्यालयी प्रशासन एवं मान्यता सम्बन्धी सुझाव

1. निजी विद्यालयों की मान्यता के नियम

निजी विद्यालयों को मान्यता देते समय निर्धारित शैक्षिक मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

इसका उद्देश्य विद्यालयों में आवश्यक सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखना था।

2. नर्सरी विद्यालयों की मान्यता में सुधार

नर्सरी विद्यालयों को मान्यता प्रदान करने के लिए भवन, सुविधाओं तथा शिक्षा के स्तर से सम्बन्धित स्पष्ट नियम निर्धारित किए जाएँ।

इन नियमों का उचित पालन कराया जाए।

3. नर्सरी प्रवेश परीक्षा एवं साक्षात्कार समाप्त करना

नर्सरी विद्यालयों में प्रवेश के लिए बच्चों की प्रवेश परीक्षा तथा साक्षात्कार की व्यवस्था समाप्त की जाए।

इसका उद्देश्य बहुत कम आयु में बच्चों को अनावश्यक परीक्षा और प्रतिस्पर्धा के दबाव से बचाना था।

4. शिक्षा बोर्डों की व्यवस्था में सुधार

समिति ने सुझाव दिया कि केवल केन्द्रीय विद्यालय तथा नवोदय विद्यालय ही केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से सम्बद्ध हों।

अन्य विद्यालय सम्बन्धित राज्य शिक्षा बोर्डों से सम्बद्ध किए जाएँ।

यह समिति की तत्कालीन सिफारिश थी, वर्तमान सम्बद्धता व्यवस्था का विवरण नहीं है।

5. स्थानीय शिक्षा समितियों की भूमिका

विद्यालयों के नियोजन और निरीक्षण का कार्य ग्रामीण, ब्लॉक तथा जिला स्तर की शिक्षा समितियों के माध्यम से व्यवस्थित किया जाए।

इससे शिक्षा के प्रबन्ध में स्थानीय आवश्यकताओं तथा समुदाय की भूमिका को महत्त्व मिल सकेगा।

12. मातृभाषा एवं पाठ्यचर्या के विकेन्द्रीकरण सम्बन्धी सुझाव

1. प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा

समिति ने प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम मातृभाषा रखने का सुझाव दिया।

इसका उद्देश्य बच्चों को उनकी परिचित भाषा में सीखने का अवसर प्रदान करना था, जिससे वे विषयवस्तु को आसानी से समझ सकें।

2. क्षेत्रीय शिक्षकों की सहभागिता

पाठ्यचर्या और पाठ्यपुस्तकों के निर्माण में स्थानीय तथा क्षेत्रीय शिक्षकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

इससे पाठ्यक्रमों में स्थानीय पर्यावरण, सामाजिक परिस्थितियों तथा बच्चों के जीवन से सम्बन्धित विषयों को उचित स्थान मिल सकेगा।

3. पाठ्यचर्या निर्माण का विकेन्द्रीकरण

पाठ्यचर्या तथा पाठ्यपुस्तकों के निर्माण की प्रक्रिया को अधिक विकेन्द्रीकृत बनाया जाए।

इसका उद्देश्य सभी विद्यालयों पर एक जैसी विषयवस्तु थोपने के बजाय क्षेत्रीय आवश्यकताओं और स्थानीय अनुभवों को महत्त्व देना था।

13. परीक्षा, प्रतिस्पर्धा एवं मूल्यांकन सम्बन्धी सुझाव

1. व्यक्तिगत उपलब्धि आधारित प्रतियोगिताएँ कम करना

समिति ने बच्चों की व्यक्तिगत उपलब्धियों के आधार पर पुरस्कार देने वाली प्रतियोगिताओं को समाप्त करने का सुझाव दिया।

समिति का मानना था कि अत्यधिक प्रतिस्पर्धा बच्चों को आनंददायक शिक्षा से वंचित कर सकती है।

इसलिए शिक्षण में प्रतियोगिता के दबाव के स्थान पर बच्चों की स्वाभाविक रुचि और सीखने की प्रक्रिया को महत्त्व दिया जाना चाहिए।

2. परीक्षा-केंद्रित शिक्षा में सुधार

समिति ने शिक्षा में केवल अंकों को योग्यता का आधार मानने की प्रवृत्ति को समस्या के रूप में पहचाना।

इस दृष्टि से शिक्षण और मूल्यांकन में बच्चों की वास्तविक समझ तथा सीखने की क्षमता को महत्त्व देना आवश्यक माना गया।

14. शैक्षिक वातावरण एवं संसाधनों सम्बन्धी सुझाव

1. छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार

समिति ने विद्यालयों में शिक्षकों और विद्यार्थियों की संख्या के बीच उचित अनुपात बनाए रखने पर बल दिया।

पुस्तक में 1:40 छात्र-शिक्षक अनुपात लागू करने का उल्लेख है।

मूल समिति प्रतिवेदन के अनुसार तत्कालीन 1:40 मानक का पालन सुनिश्चित करने के साथ प्राथमिक स्तर पर इसे घटाकर 1:30 करने का प्रयास भी किया जाना चाहिए।

इसका उद्देश्य प्रत्येक शिक्षक को विद्यार्थियों की सीखने सम्बन्धी आवश्यकताओं पर पर्याप्त ध्यान देने का अवसर प्रदान करना था।

2. शैक्षिक उपकरणों के लिए पर्याप्त धनराशि

विद्यालयों में शैक्षिक उपकरणों की खरीद, मरम्मत तथा अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराई जाए।

पुस्तक में सुझाव दिया गया है कि यह धनराशि विद्यालय के कुल वेतन बिल के 10% से कम नहीं होनी चाहिए।

इसका उद्देश्य विद्यालयों में आवश्यक शिक्षण-संसाधनों की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करना था।

3. दूरदर्शन के माध्यम से शैक्षिक कार्यक्रम

विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा अभिभावकों के लिए दूरदर्शन पर नियमित शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित किए जाएँ।

समिति ने ऐसे कार्यक्रम के लिए शिक्षा दर्शन (Shiksha Darshan) नाम का सुझाव दिया।

इसका उद्देश्य शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों को उपयोगी शैक्षिक जानकारी प्रदान करना था।

15. यशपाल समिति की प्रमुख सिफारिशों का महत्त्व

यशपाल समिति की सिफारिशों का मुख्य उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा को बच्चों की आयु, रुचि, समझ तथा वास्तविक जीवन के अनुरूप बनाना था।

समिति ने केवल बस्ते का भार कम करने की बात नहीं की, बल्कि पाठ्यचर्या, पाठ्यपुस्तकों, गृहकार्य, शिक्षण-विधियों और परीक्षा प्रणाली में सुधार को भी आवश्यक माना।

इसके अतिरिक्त शिक्षक प्रशिक्षण की गुणवत्ता, मातृभाषा में शिक्षा, पाठ्यचर्या निर्माण में शिक्षकों की भागीदारी तथा विद्यालयों में पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।

इन सुझावों की मूल भावना यह थी कि बच्चों के लिए शिक्षा अनावश्यक दबाव और रटने की प्रक्रिया के स्थान पर समझ, अनुभव तथा रुचि पर आधारित होनी चाहिए।

16. यशपाल समिति का मूल्यांकन

यशपाल समिति ने विद्यालयी शिक्षा में बढ़ते शैक्षिक बोझ तथा शिक्षा की गुणवत्ता से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन किया।

समिति ने पाठ्यचर्या, पाठ्यपुस्तकों, शिक्षक प्रशिक्षण, परीक्षा प्रणाली तथा विद्यालयी प्रशासन में सुधार के लिए अनेक सुझाव प्रस्तुत किए।

किन्तु पाठ्यपुस्तक के मूल्यांकन में समिति की रिपोर्ट की कुछ कमियों की आलोचना की गई है।

पुस्तक के अनुसार यशपाल समिति के मूल्यांकन के प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं।

1. विद्यालयी शिक्षण अनुभव का अभाव

पुस्तक के लेखक ने आलोचना की है कि समिति के सदस्यों को विद्यालयी स्तर पर अध्यापन का पर्याप्त प्रत्यक्ष अनुभव नहीं था।

लेखक के अनुसार इस कारण समिति विद्यालयी शिक्षा की समस्याओं के स्वरूप को पूरी तरह समझने तथा उनके व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने में सफल नहीं हो सकी।

यह पुस्तक में प्रस्तुत आलोचनात्मक मत है।

2. समस्याओं के स्वरूप की पर्याप्त स्पष्टता का अभाव

पुस्तक के मूल्यांकन के अनुसार समिति की रिपोर्ट में शैक्षिक बोझ की समस्याओं का स्वरूप पर्याप्त स्पष्टता के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया।

कुछ स्थानों पर समस्याओं का वर्णन करते समय ही उनके समाधान सम्बन्धी सुझाव भी सम्मिलित कर दिए गए।

इससे समस्याओं और उनके समाधानों के बीच स्पष्ट अन्तर बनाए रखना कठिन हो गया।

3. प्रतिवेदन में तार्किक क्रम का अभाव

पुस्तक के अनुसार समिति की रिपोर्ट में समस्याओं और उनके समाधानों को प्रस्तुत करने का क्रम पूरी तरह व्यवस्थित नहीं था।

कहीं समस्या का वर्णन किया गया और कहीं उसके समाधान के उपाय प्रस्तुत किए गए।

इस प्रकार विषयवस्तु के तार्किक क्रम में कमी दिखाई देती थी।

4. सिफारिशों की व्यावहारिकता पर प्रश्न

पुस्तक के लेखक का मत है कि समिति द्वारा दिए गए कुछ सुझावों में पर्याप्त स्पष्टता और व्यावहारिक दिशा का अभाव था।

इसलिए लेखक ने समस्याओं के समाधान में समिति की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठाया।

5. प्रतिवेदन की समग्र आलोचना

पुस्तक में समिति के प्रतिवेदन की आलोचना करते हुए कहा गया है कि उसमें समस्याओं और समाधानों का क्रम अव्यवस्थित था तथा कोई स्पष्ट समग्र निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं हो पाया।

इसी आधार पर पुस्तक के लेखक ने समिति के प्रतिवेदन को अपेक्षित रूप से प्रभावशाली नहीं माना।

यशपाल समिति का समग्र मूल्यांकन

यशपाल समिति ने भारतीय विद्यालयी शिक्षा की एक महत्त्वपूर्ण समस्या—विद्यार्थियों पर बढ़ते शैक्षिक बोझ—को अपने अध्ययन का प्रमुख विषय बनाया।

समिति ने कठिन पाठ्यक्रम, रटने की प्रवृत्ति, परीक्षा का भय, भारी बस्ते तथा वास्तविक जीवन से असम्बन्धित पाठ्यपुस्तकों जैसी समस्याओं की पहचान की।

इन समस्याओं के समाधान के लिए समिति ने पाठ्यचर्या सुधार, मातृभाषा में शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण, गृहकार्य में कमी तथा विद्यालयों में उचित शैक्षिक सुविधाओं की व्यवस्था जैसे सुझाव दिए।

हालाँकि पुस्तक के लेखक ने समिति के प्रतिवेदन में अस्पष्टता, तार्किक क्रम की कमी तथा कुछ सुझावों की व्यावहारिकता पर प्रश्न उठाए हैं।

इस प्रकार यशपाल समिति का महत्त्व विद्यालयी शिक्षा में शैक्षिक बोझ की समस्या को सामने लाने तथा शिक्षा को अधिक सरल, रुचिकर, व्यावहारिक और समझ पर आधारित बनाने की आवश्यकता पर बल देने में रहा।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • भारत सरकार ने सन् 1992 में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सलाहकार समिति का गठन किया।
  • यशपाल समिति आठ सदस्यीय थी तथा इसके अध्यक्ष प्रो. यशपाल थे।
  • समिति का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों पर बढ़ते शैक्षिक बोझ को कम करना तथा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना था।
  • यशपाल समिति ने 15 जुलाई 1993 को अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
  • समिति के प्रतिवेदन का नाम शिक्षा बिना बोझ (Learning Without Burden) था।
  • समिति ने CBSE और NCERT की पाठ्यचर्या तथा पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन किया और शिक्षकों, प्रधानाचार्यों तथा शिक्षाविदों से विचार-विमर्श किया।
  • पुस्तक के अनुसार समिति के प्रतिवेदन में गठन एवं कार्यविधि, शैक्षिक बोझ की समस्या, कारण, सुझाव तथा आदेशपत्र से सम्बन्धित पाँच भाग थे।
  • शैक्षिक बोझ की प्रमुख समस्याएँ थीं—कम आयु में शिक्षा का प्रारम्भ, परीक्षा का भय, भारी पाठ्यक्रम, कठिन पाठ्यपुस्तकें तथा रटने की प्रवृत्ति।
  • पुस्तक के अनुसार तत्कालीन निजी विद्यालयों में प्राथमिक बच्चों के बस्तों का औसत भार लगभग 4 किलोग्राम बताया गया था।
  • शैक्षिक बोझ के प्रमुख कारणों में अंक-केंद्रित परीक्षा प्रणाली, सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण की औपचारिकता तथा पाठ्यचर्या का केन्द्रीकृत स्वरूप शामिल थे।
  • समिति ने सामाजिक विज्ञान के पाठ्यक्रम को वास्तविक सामाजिक जीवन से जोड़ने तथा विज्ञान शिक्षा में प्रयोगात्मक कार्यों को महत्त्व देने की सिफारिश की।
  • पाठ्यपुस्तकों को बच्चों की आयु, रुचि, समझ तथा वास्तविक जीवन के अनुरूप बनाने पर बल दिया गया।
  • समिति ने पत्राचार आधारित बी.एड. पाठ्यक्रम समाप्त करने तथा सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण में सुधार की सिफारिश की।
  • शिक्षकों को पाठ्यचर्या और पाठ्यपुस्तकों के निर्माण में सहभागी बनाने तथा इस प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण करने पर बल दिया गया।
  • छोटे बच्चों के बस्तों का बोझ कम करने के लिए विद्यालय में ही पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया।
  • प्राथमिक कक्षाओं में अनावश्यक गृहकार्य समाप्त करने तथा उच्च कक्षाओं में गृहकार्य की उचित व्यवस्था करने की सिफारिश की गई।
  • नर्सरी विद्यालयों में प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा एवं साक्षात्कार समाप्त करने का सुझाव दिया गया।
  • समिति ने प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम मातृभाषा रखने पर बल दिया।
  • समिति ने व्यक्तिगत उपलब्धियों के आधार पर पुरस्कार देने वाली प्रतियोगिताएँ समाप्त करके आनंददायक शिक्षा को प्रोत्साहित करने का सुझाव दिया।
  • समिति ने तत्कालीन 1:40 छात्र-शिक्षक अनुपात का पालन सुनिश्चित करने और प्राथमिक स्तर पर उसे 1:30 तक कम करने का प्रयास करने की सिफारिश की।
  • विद्यालयों में शैक्षिक उपकरणों की खरीद एवं मरम्मत के लिए कुल वेतन बिल के कम से कम 10% के बराबर धनराशि की व्यवस्था का सुझाव दिया गया।
  • विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए दूरदर्शन पर शिक्षा दर्शन कार्यक्रम प्रारम्भ करने का सुझाव दिया गया।
  • पुस्तक के मूल्यांकन में समिति के प्रतिवेदन में स्पष्टता, तार्किक क्रम तथा व्यावहारिकता की कमी को प्रमुख दोष बताया गया।
  • यशपाल समिति का प्रमुख महत्त्व विद्यालयी शिक्षा को बोझमुक्त, रुचिकर, अनुभव-आधारित तथा बच्चों की समझ के अनुरूप बनाने की आवश्यकता पर बल देना था।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

कोठारी आयोग का गठन कब हुआ?

व्याख्या: भारत सरकार ने 14 जुलाई 1964 को शिक्षा आयोग का गठन किया। यह आयोग कोठारी आयोग के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
Q 2

कोठारी आयोग के अध्यक्ष कौन थे?

व्याख्या: कोठारी आयोग के अध्यक्ष प्रो. डी. एस. कोठारी थे। उनके नाम पर ही शिक्षा आयोग (1964–1966) को कोठारी आयोग कहा जाता है।
Q 3

कोठारी आयोग के प्रतिवेदन का नाम क्या था?

व्याख्या: कोठारी आयोग ने 29 जून 1966 को अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इसका नाम "शिक्षा एवं राष्ट्रीय विकास" (Education and National Development) था।
Q 4

कोठारी आयोग ने शिक्षा पर राष्ट्रीय आय का कितना प्रतिशत व्यय करने की सिफारिश की थी?

व्याख्या: कोठारी आयोग ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का आधार मानते हुए शिक्षा पर राष्ट्रीय आय का 6% व्यय करने की सिफारिश की थी।
Q 5

कोठारी आयोग ने किस शिक्षा-संरचना को अपनाने की सिफारिश की?

व्याख्या: कोठारी आयोग ने 10+2+3 शिक्षा-संरचना की सिफारिश की। इसमें 10 वर्ष की विद्यालयी शिक्षा, 2 वर्ष की उच्चतर माध्यमिक शिक्षा तथा 3 वर्ष का स्नातक पाठ्यक्रम शामिल था।
Q 6

स्वतंत्र भारत की प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति किस वर्ष घोषित की गई?

व्याख्या: स्वतंत्र भारत की प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 24 जुलाई 1968 को घोषित की गई थी। यह कोठारी आयोग की सिफारिशों पर आधारित थी।
Q 7

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 किस प्रधानमंत्री के कार्यकाल में घोषित की गई?

व्याख्या: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की घोषणा मई 1986 में प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के कार्यकाल में की गई थी।
Q 8

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का मूल दस्तावेज कितने खण्डों में विभाजित था?

व्याख्या: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का मूल दस्तावेज कुल 12 खण्डों में विभाजित था। इसमें राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली, समानता, शिक्षक शिक्षा, शैक्षिक प्रबन्ध आदि विषय शामिल थे।
Q 9

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की कार्ययोजना कितने भागों में विभाजित थी?

व्याख्या: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की कार्ययोजना नवम्बर 1986 में प्रकाशित हुई थी। यह कुल 24 भागों में विभाजित थी।
Q 10

ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना के अन्तर्गत प्रारम्भ में प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम कितने कमरे और शिक्षक रखने का प्रावधान था?

व्याख्या: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड योजना में प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम 2 कमरे और 2 शिक्षक रखने का प्रावधान था।
Q 11

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की समीक्षा के लिए 1990 में किस समिति का गठन किया गया?

व्याख्या: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की समीक्षा के लिए 7 मई 1990 को आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में राममूर्ति शिक्षा समिति का गठन किया गया था।
Q 12

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की समीक्षा के लिए 1992 में किस समिति का गठन किया गया?

व्याख्या: सन् 1992 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की समीक्षा के लिए जनार्दन रेड्डी समिति का गठन किया गया। इसकी तथा राममूर्ति समिति की रिपोर्टों के आधार पर नीति में संशोधन किए गए।
Q 13

संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 की कार्ययोजना कितने भागों में विभाजित थी?

व्याख्या: संशोधित कार्ययोजना 1992 को 23 भागों में विभाजित किया गया था, जबकि मूल कार्ययोजना 1986 में 24 भाग थे।
Q 14

यशपाल समिति (1992–93) में कुल कितने सदस्य थे?

व्याख्या: यशपाल समिति का गठन 1992 में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में किया गया था। यह आठ सदस्यीय राष्ट्रीय सलाहकार समिति थी।
Q 15

यशपाल समिति द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन का नाम क्या था?

व्याख्या: यशपाल समिति ने 15 जुलाई 1993 को "शिक्षा बिना बोझ" (Learning Without Burden) नामक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों पर अनावश्यक शैक्षिक बोझ कम करना था।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP DELED Semester 2 के विषय प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास के अध्याय स्वतंत्रता के पश्चात गठित आयोग एवं समितियाँ से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

यशपाल समिति का मूल्यांकन कीजिए।

Q 2

संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1992 का मूल्यांकन कीजिए।

Q 3

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 के गुण एवं दोष बताइए।

Q 4

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मूल तत्त्व बताइए।

Q 5

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 एवं उसका संशोधित रूप, 1992 पर प्रकाश डालिए।

Q 6

“1986 का दस्तावेज” कार्य योजना का प्रारूप दीजिए।

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