शिक्षा से सम्बन्धित संवैधानिक प्रावधान—समानता, पिछड़े वर्ग एवं अवसर की समानता
भूमिका
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने ऐसी शासन-व्यवस्था और संविधान बनाने की आवश्यकता थी, जो नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करे तथा सामाजिक और शैक्षिक असमानताओं को कम करने में सहायक हो।
संविधान सभा ने विस्तृत विचार-विमर्श के बाद संविधान को 26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत किया और 26 जनवरी 1950 से इसे लागू किया गया।
भारतीय संविधान में शिक्षा से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित अनेक प्रावधान किए गए हैं। इनमें विधि के समक्ष समानता, सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान तथा लोक नियोजन में अवसर की समानता विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
1. अनुच्छेद 14—विधि के समक्ष समानता
अनुच्छेद 14 भारतीय नागरिकों को विधि के समक्ष समानता तथा विधियों के समान संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है।
इसका आशय है कि राज्य सभी व्यक्तियों के लिए समान कानून लागू करेगा तथा किसी व्यक्ति को बिना उचित आधार के कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जाएगा।
शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्व
- शिक्षा से सम्बन्धित कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं।
- विद्यार्थियों के साथ केवल जाति, धर्म, लिंग अथवा अन्य अनुचित आधारों पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
- शिक्षा के अवसरों तक पहुँच में समानता की संवैधानिक भावना को यह अनुच्छेद आधार प्रदान करता है।
इस प्रकार अनुच्छेद 14 शिक्षा के क्षेत्र में समानता और न्यायपूर्ण व्यवहार की आधारभूत संवैधानिक व्यवस्था है।
2. सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों हेतु प्रावधान—अनुच्छेद 15(4)
संविधान का अनुच्छेद 15 सामान्य रूप से धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है।
इसके साथ ही अनुच्छेद 15(4) राज्य को यह अधिकार देता है कि वह सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान कर सके।
अनुच्छेद 15 के अन्तर्गत प्रमुख बातें
- किसी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
- सार्वजनिक स्थानों एवं सामान्य उपयोग की सुविधाओं के उपयोग में अनुचित भेदभाव नहीं किया जा सकता।
- राज्य स्त्रियों और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है।
- राज्य सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष व्यवस्था कर सकता है।
अनुच्छेद 15(4) की पृष्ठभूमि
स्रोत के अनुसार संविधान के प्रथम संशोधन, 1951 द्वारा अनुच्छेद 15 में खण्ड (4) जोड़ा गया।
इसकी पृष्ठभूमि मद्रास राज्य बनाम चम्पकम दोराईराजन प्रकरण से जुड़ी थी। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने धर्म, जाति आदि के आधार पर शैक्षिक संस्थानों में सीटों के वर्गीकरण को असंवैधानिक माना।
इसके बाद राज्य को सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के हित में विशेष प्रावधान करने में सक्षम बनाने के लिए अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया।
अनुच्छेद 15(4) की प्रकृति
यह प्रावधान राज्य को पिछड़े वर्गों के लिए विशेष व्यवस्था करने की सक्षमकारी शक्ति देता है। अर्थात आवश्यकता और परिस्थितियों के अनुसार राज्य उनके शैक्षिक उत्थान के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है।
ऐसे वर्गों की पहचान सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर की जाती है और आवश्यक होने पर न्यायालय राज्य द्वारा निर्धारित मानदण्डों की समीक्षा कर सकता है।
3. अनुच्छेद 46—दुर्बल वर्गों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों की उन्नति
अनुच्छेद 46 राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों के अन्तर्गत आता है।
इसके अनुसार राज्य जनता के दुर्बल वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की विशेष सावधानी से उन्नति करेगा तथा उन्हें सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से संरक्षण प्रदान करेगा।
शिक्षा के क्षेत्र में अनुच्छेद 46 का महत्त्व
- पिछड़े एवं कमजोर वर्गों की शिक्षा को बढ़ावा देना।
- उनके लिए शैक्षिक अवसरों की उपलब्धता बढ़ाना।
- सामाजिक एवं आर्थिक बाधाओं के कारण शिक्षा से वंचित होने की स्थिति को कम करना।
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों के शैक्षिक हितों की विशेष सुरक्षा करना।
अनुच्छेद 15(4) और अनुच्छेद 46 दोनों का उद्देश्य सामाजिक न्याय को मजबूत करना तथा शिक्षा में पिछड़े वर्गों की भागीदारी बढ़ाना है।
4. अनुच्छेद 16—लोक नियोजन में अवसर की समानता
अनुच्छेद 16 राज्य के अधीन सार्वजनिक रोजगार और नियुक्तियों के मामलों में सभी नागरिकों को अवसर की समानता प्रदान करता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी पदों और नियुक्तियों में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान या निवास जैसे आधारों पर किसी नागरिक को अनुचित रूप से अपात्र न ठहराया जाए।
अनुच्छेद 16 के प्रमुख प्रावधान
- राज्य के अधीन किसी पद या नियुक्ति के सम्बन्ध में सभी नागरिकों को अवसर की समानता प्राप्त होगी।
- धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान अथवा निवास आदि के आधार पर किसी नागरिक के साथ अनुचित भेदभाव नहीं किया जाएगा।
- कानून द्वारा कुछ पदों के लिए राज्य अथवा संघ राज्य क्षेत्र में निवास सम्बन्धी शर्त निर्धारित की जा सकती है।
- शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं में समान अवसर की व्यापक संवैधानिक भावना को यह अनुच्छेद मजबूत करता है।
शिक्षा में समानता और सामाजिक न्याय का सम्बन्ध
भारतीय संविधान केवल औपचारिक समानता प्रदान करने तक सीमित नहीं है। जहाँ आवश्यक हो वहाँ सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान करने की व्यवस्था भी करता है।
इसी कारण एक ओर अनुच्छेद 14 सभी को समानता देता है, वहीं अनुच्छेद 15(4) और 46 पिछड़े एवं दुर्बल वर्गों को आगे बढ़ाने के लिए विशेष सहायता की अनुमति और दिशा प्रदान करते हैं।
इस प्रकार संविधान का उद्देश्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करना है जिसमें समान अवसर के साथ-साथ सामाजिक न्याय भी सुनिश्चित हो।
- अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समानता और विधियों के समान संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 15(4) राज्य को सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति देता है।
- अनुच्छेद 15(4) को प्रथम संविधान संशोधन, 1951 द्वारा जोड़ा गया।
- अनुच्छेद 46 राज्य को दुर्बल वर्गों, विशेषतः अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के शैक्षिक और आर्थिक हितों की उन्नति का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता प्रदान करता है।
- इन संवैधानिक प्रावधानों का मूल उद्देश्य समानता, सामाजिक न्याय और शिक्षा के अवसरों का विस्तार करना है।
शिक्षा से सम्बन्धित संवैधानिक प्रावधान—निःशुल्क शिक्षा, धार्मिक शिक्षा, भाषा-संस्कृति एवं अल्पसंख्यक अधिकार
भूमिका
भारतीय संविधान में शिक्षा के प्रसार, बच्चों के शैक्षिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण तथा अल्पसंख्यकों की शिक्षा से सम्बन्धित अनेक महत्त्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं।
इन संवैधानिक प्रावधानों का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराना, बच्चों को शिक्षा से जोड़ना तथा भारत की भाषायी, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता की रक्षा करना है।
1. अनुच्छेद 21(A)—6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा
अनुच्छेद 21(A) के अनुसार 6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।
इसे 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संविधान में जोड़ा गया और बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा को मौलिक अधिकार का स्वरूप प्रदान किया गया।
निःशुल्क शिक्षा का अर्थ
निःशुल्क शिक्षा का अर्थ है कि बच्चे से ऐसी कोई फीस या शुल्क न लिया जाए जिसके कारण वह अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने अथवा उसे पूर्ण करने से वंचित हो।
अनिवार्य शिक्षा का अर्थ
अनिवार्य शिक्षा का आशय यह है कि 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिलाने, उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने तथा उनकी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण कराने की जिम्मेदारी राज्य की होगी।
अनुच्छेद 21(A) का महत्त्व
- 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का संवैधानिक अधिकार प्राप्त हुआ।
- प्रारम्भिक शिक्षा को प्रत्येक बच्चे तक पहुँचाने का आधार मजबूत हुआ।
- आर्थिक कठिनाई के कारण बच्चे शिक्षा से वंचित न हों, इस दिशा में राज्य का दायित्व स्पष्ट हुआ।
- इसी संवैधानिक आधार को प्रभावी बनाने के लिए आगे चलकर शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 लागू किया गया।
2. अनुच्छेद 28—शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा एवं उपासना
अनुच्छेद 28 शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा और धार्मिक उपासना से सम्बन्धित प्रावधान करता है।
राज्य निधि से पूर्णतः पोषित संस्थाएँ
जो शिक्षण संस्था पूरी तरह राज्य की निधि से संचालित होती है, उसमें धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं की जा सकती।
राज्य द्वारा प्रशासित विशेष धार्मिक संस्थाएँ
यदि कोई संस्था किसी ऐसे धर्मस्व या न्यास के अधीन स्थापित की गई हो जिसमें धार्मिक शिक्षा देना आवश्यक हो, तो राज्य द्वारा उसका प्रशासन किए जाने पर भी वहाँ धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है।
मान्यता प्राप्त अथवा सहायता प्राप्त संस्थाएँ
राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्य निधि से सहायता प्राप्त संस्था में किसी विद्यार्थी को उसकी सहमति के बिना धार्मिक शिक्षा अथवा उपासना में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
यदि विद्यार्थी अवयस्क है तो इस सम्बन्ध में उसके अभिभावक की सहमति आवश्यक होगी।
3. अनुच्छेद 29(1)—भाषा, लिपि एवं संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार
अनुच्छेद 29(1) भारत में रहने वाले नागरिकों के ऐसे किसी वर्ग को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार प्रदान करता है।
इसका उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक और भाषायी विविधता की रक्षा करना है, ताकि विभिन्न समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रख सकें।
इस अधिकार की विशेषता
यह अधिकार केवल तकनीकी अर्थ में अल्पसंख्यक समुदायों तक सीमित नहीं है। नागरिकों का कोई भी ऐसा वर्ग जिसकी अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसके संरक्षण का अधिकार रखता है।
इस प्रकार संविधान सांस्कृतिक विविधता को राष्ट्रीय एकता के विरोध में नहीं, बल्कि भारतीय समाज की विशेषता के रूप में स्वीकार करता है।
4. अनुच्छेद 29(2)—शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश का अधिकार
अनुच्छेद 29(2) के अनुसार राज्य द्वारा संचालित या राज्य निधि से सहायता प्राप्त किसी शिक्षण संस्था में किसी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति अथवा भाषा के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता।
इस प्रावधान का उद्देश्य शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के अवसरों को भेदभाव से मुक्त रखना है।
प्रमुख बातें
- यह अधिकार सभी नागरिकों को प्राप्त है।
- यह केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं है।
- राज्य सहायता प्राप्त संस्था धर्म, जाति या भाषा के आधार पर किसी योग्य नागरिक को प्रवेश देने से मना नहीं कर सकती।
- इसका उद्देश्य शिक्षा में समानता और निष्पक्षता बनाए रखना है।
5. अनुच्छेद 30—अल्पसंख्यकों की शिक्षा सम्बन्धी अधिकार
अनुच्छेद 30 धर्म अथवा भाषा पर आधारित अल्पसंख्यकों को अपनी पसन्द की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना एवं प्रशासन करने का अधिकार प्रदान करता है।
इस प्रावधान का उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी भाषा, धर्म और संस्कृति के संरक्षण के साथ शिक्षा के क्षेत्र में स्वायत्तता प्रदान करना है।
स्थापना का अर्थ
स्थापना से आशय शिक्षण संस्था की स्थापना करना तथा उसके लिए आवश्यक व्यवस्था करना है।
प्रशासन का अर्थ
प्रशासन से आशय संस्था के कार्यों का प्रभावी प्रबन्ध एवं संचालन करना है।
अल्पसंख्यक समुदाय को अपनी शिक्षण संस्था का प्रशासन करने का अधिकार प्राप्त है, ताकि वह अपने शैक्षिक तथा सांस्कृतिक उद्देश्यों को सुरक्षित रख सके।
अनुच्छेद 30 का शैक्षिक महत्त्व
- अल्पसंख्यकों की भाषा एवं संस्कृति का संरक्षण होता है।
- उन्हें अपनी पसन्द की शिक्षण संस्था स्थापित करने का अधिकार मिलता है।
- संस्था के प्रशासन एवं प्रबन्ध में उचित स्वतंत्रता प्राप्त होती है।
- अल्पसंख्यक बच्चों के शैक्षिक विकास को प्रोत्साहन मिलता है।
6. अनुच्छेद 45—बच्चों की शिक्षा से सम्बन्धित नीति-निर्देशक प्रावधान
संविधान के मूल स्वरूप में अनुच्छेद 45 के अन्तर्गत राज्य को यह निर्देश दिया गया था कि संविधान लागू होने के दस वर्षों के भीतर 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करने का प्रयास किया जाए।
बाद में 86वें संविधान संशोधन, 2002 द्वारा 6 से 14 वर्ष के बच्चों की निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा को अनुच्छेद 21(A) के अन्तर्गत मौलिक अधिकार बना दिया गया।
इस प्रकार बच्चों की शिक्षा से सम्बन्धित संवैधानिक व्यवस्था धीरे-धीरे नीति-निर्देशक लक्ष्य से आगे बढ़कर मौलिक अधिकार के रूप में विकसित हुई।
7. अनुच्छेद 351—हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार का दायित्व
अनुच्छेद 351 के अनुसार संघ का यह कर्तव्य है कि वह हिन्दी भाषा के प्रसार एवं विकास को बढ़ावा दे, ताकि वह भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का प्रभावी माध्यम बन सके।
हिन्दी के विकास में भारत की अन्य भाषाओं की शब्द-सम्पदा और अभिव्यक्तियों को भी आत्मसात करने पर बल दिया गया है।
स्रोत में यह भी स्पष्ट किया गया है कि हिन्दी का विकास राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करने की दिशा में किया जाना चाहिए तथा अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान बना रहना चाहिए।
शिक्षा में इन संवैधानिक प्रावधानों का महत्त्व
इन संवैधानिक व्यवस्थाओं से स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं मानता, बल्कि इसे समानता, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक संरक्षण, धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता से भी जोड़ता है।
एक ओर बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान किया गया है, वहीं दूसरी ओर भाषा, लिपि, संस्कृति एवं अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं की स्वतंत्रता की भी सुरक्षा की गई है।
- अनुच्छेद 21(A) 6 से 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 21(A) को 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया।
- अनुच्छेद 28 शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा एवं उपासना से सम्बन्धित प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 29(1) नागरिकों को अपनी भाषा, लिपि एवं संस्कृति सुरक्षित रखने का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 29(2) राज्य संचालित या सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से वंचित करने का निषेध करता है।
- अनुच्छेद 30 धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यकों को अपनी पसन्द की शिक्षण संस्थाएँ स्थापित एवं प्रशासित करने का अधिकार देता है।
- मूल अनुच्छेद 45 में 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया था।
- अनुच्छेद 351 हिन्दी भाषा के प्रचार एवं विकास से सम्बन्धित है।
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बाल अधिकार—भूमिका, उद्देश्य एवं मुख्य बिन्दु
बाल अधिकार का अर्थ एवं भूमिका
बच्चे आगे चलकर देश के नागरिक बनते हैं और राष्ट्र के भविष्य के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए उनका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक एवं भावात्मक विकास सुनिश्चित करना प्रत्येक समाज और राष्ट्र का दायित्व है।
बालकों के समुचित विकास के लिए केवल शिक्षा पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें जीवन, स्वास्थ्य, सुरक्षा, परिवार, विकास और सहभागिता से सम्बन्धित आवश्यक अधिकार भी प्राप्त होने चाहिए। इन्हीं अधिकारों को व्यापक रूप से बाल अधिकार (Children’s Rights) कहा जाता है।
बालकों की शिक्षा उनके विकास की आधारशिला है। इसलिए प्रत्येक बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर देना उसके मूल अधिकारों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
बाल अधिकारों की घोषणा
संयुक्त राष्ट्र संघ ने 20 नवम्बर 1989 को बच्चों के अधिकारों से सम्बन्धित घोषणा को स्वीकार किया। इसका प्रमुख उद्देश्य विश्व के सभी बच्चों के लिए मूल मानवीय अधिकारों को सुनिश्चित करना था।
इस व्यवस्था का आधार मानव की अन्तर्निहित गरिमा, समानता तथा अहस्तान्तरणीय अधिकारों की मान्यता है।
भारत ने भी बच्चों के अधिकारों को स्वीकार करते हुए उन्हें संरक्षण और विकास के अवसर प्रदान करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। स्रोत के अनुसार भारत द्वारा इसे 11 दिसम्बर 1992 को अंगीकृत किया गया।
बालकों के शैक्षिक हितों को ध्यान में रखते हुए संविधान में भी बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में प्रावधान किए गए, जिससे उनके सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त हो सके।
बाल अधिकारों के उद्देश्य
बाल अधिकारों का मूल उद्देश्य प्रत्येक बच्चे को ऐसा सुरक्षित और अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना है जिसमें वह गरिमापूर्ण जीवन जी सके और अपनी क्षमताओं का पूर्ण विकास कर सके।
1. बाल अधिकारों की जानकारी देना
बच्चों को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रस्तावित उनके अधिकारों के विषय में जानकारी देना आवश्यक है, ताकि वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकें।
2. बाल कल्याण के प्रयासों से परिचित कराना
बच्चों को भारत सरकार तथा अन्य संस्थाओं द्वारा उनके कल्याण के लिए किए जा रहे प्रयासों और योजनाओं से अवगत कराया जाना चाहिए।
3. जीवन, पोषण एवं स्वास्थ्य का अधिकार
प्रत्येक बच्चे को जीवन जीने, उचित एवं पौष्टिक भोजन प्राप्त करने तथा अच्छे स्वास्थ्य की सुविधाएँ पाने का अधिकार है।
4. शोषण से संरक्षण
बालकों को शोषण, बालश्रम, व्यापार और बाल विवाह जैसी हानिकारक परिस्थितियों से सुरक्षित रखना बाल अधिकारों का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।
5. सहभागिता को बढ़ावा देना
बालकों को उनकी आयु और समझ के अनुरूप अपनी बात कहने, निर्णयों में भाग लेने और सामाजिक गतिविधियों में सहभागिता के अवसर दिए जाने चाहिए।
6. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं विकास के अवसर
प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मनोरंजन तथा व्यक्तित्व-विकास के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए और उसे भयमुक्त वातावरण प्रदान किया जाना चाहिए।
बाल अधिकार सम्बन्धी मुख्य बिन्दु
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा बाल अधिकारों को स्वीकार करने का प्रमुख उद्देश्य विश्व के सभी बच्चों को मूलभूत मानवीय अधिकार प्रदान करना और उन्हें शोषण, उपेक्षा तथा हिंसा से सुरक्षित रखना है। इसके प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं—
1. जन्म के बाद पंजीकरण एवं राष्ट्रीयता का अधिकार
प्रत्येक बच्चे का जन्म के तुरन्त बाद पंजीकरण किया जाना चाहिए तथा उसे राष्ट्रीयता प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए।
2. नाम एवं पारिवारिक पहचान का अधिकार
प्रत्येक बच्चे को अपना नाम, पारिवारिक नाम तथा राष्ट्रीयता बनाए रखने का अधिकार है।
3. माता-पिता से अनावश्यक अलगाव से संरक्षण
बच्चे को उसकी इच्छा तथा माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध उनसे अनावश्यक रूप से अलग नहीं किया जाना चाहिए।
4. परिवार से पुनः एकीकरण का अधिकार
यदि किसी कारण से बालक अपने माता-पिता या परिवार से अलग हो गया हो, तो उसे पुनः परिवार से जुड़ने तथा सम्बन्ध बनाए रखने का अवसर मिलना चाहिए।
5. अपहरण एवं बाल-व्यापार से संरक्षण
बालकों के अपहरण, क्रय-विक्रय तथा व्यापार को रोकने के लिए राज्य को प्रभावी कानून एवं सुरक्षा व्यवस्था बनानी चाहिए।
6. दुर्व्यवहार से संरक्षण
यदि माता-पिता, अभिभावक अथवा देखभाल करने वाला व्यक्ति बच्चे के साथ दुर्व्यवहार करता है, तो राज्य का दायित्व है कि वह बच्चे को आवश्यक संरक्षण प्रदान करे।
7. मादक पदार्थों से सुरक्षा
बच्चों को मादक पदार्थों के सेवन, उत्पादन और उनसे जुड़ी हानिकारक गतिविधियों से बचाया जाना चाहिए।
8. गोद लेने में बालक के हित की प्राथमिकता
गोद लेने से सम्बन्धित निर्णयों में बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
9. शरणार्थी बच्चों का संरक्षण
शरणार्थी बच्चों को विशेष सुरक्षा, सहायता और आवश्यक सुविधाएँ प्रदान की जानी चाहिए।
10. आर्थिक एवं खतरनाक शोषण से संरक्षण
बच्चों को आर्थिक शोषण तथा ऐसे खतरनाक कार्यों से बचाया जाना चाहिए जो उनके स्वास्थ्य, शिक्षा या शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास को हानि पहुँचा सकते हों।
11. लैंगिक शोषण से संरक्षण
प्रत्येक बच्चे को लैंगिक शोषण और उससे सम्बन्धित सभी प्रकार की हानिकारक गतिविधियों से सुरक्षित रखने का अधिकार है।
12. सशस्त्र संघर्ष से संरक्षण
सशस्त्र संघर्ष अथवा युद्ध की स्थिति में 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों को युद्ध में भाग लेने तथा सेना में भर्ती किए जाने से बचाया जाना चाहिए।
बाल अधिकारों का महत्त्व
बाल अधिकार बच्चों को केवल सुरक्षा ही नहीं देते, बल्कि उन्हें स्वस्थ जीवन, शिक्षा, परिवार, सम्मान और विकास के अवसर भी प्रदान करते हैं।
इन अधिकारों का पालन होने पर बच्चे भय, हिंसा, शोषण एवं उपेक्षा से मुक्त वातावरण में विकसित हो सकते हैं और भविष्य में जिम्मेदार नागरिक के रूप में समाज एवं राष्ट्र के विकास में योगदान दे सकते हैं।
- बाल अधिकार वे मूल अधिकार हैं जो बच्चों के जीवन, सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र संघ ने बच्चों के अधिकारों से सम्बन्धित घोषणा 20 नवम्बर 1989 को स्वीकार की।
- स्रोत के अनुसार भारत ने इसे 11 दिसम्बर 1992 को अंगीकृत किया।
- बाल अधिकारों के प्रमुख उद्देश्य हैं—जीवन एवं स्वास्थ्य की सुरक्षा, शोषण से संरक्षण, सहभागिता तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं विकास के अवसर प्रदान करना।
- प्रत्येक बच्चे को जन्म-पंजीकरण, नाम, राष्ट्रीयता तथा परिवार से सम्बन्ध बनाए रखने का अधिकार है।
- बच्चों को अपहरण, बाल-व्यापार, बालश्रम, मादक पदार्थों, लैंगिक शोषण और अन्य हानिकारक कार्यों से संरक्षण मिलना चाहिए।
- गोद लेने और अन्य निर्णयों में बालक के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सशस्त्र संघर्ष में भाग लेने और सेना में भर्ती होने से सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश में बाल अधिकारों की घोषणा एवं राष्ट्रीय बाल नीति
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु बाल अधिकारों की घोषणा
प्रत्येक बच्चे तक प्रारम्भिक शिक्षा पहुँचाने तथा शिक्षा का सार्वजनीकरण करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश में बालकों के लिए अनेक शैक्षिक सुविधाओं और अधिकारों की व्यवस्था की गई।
राज्य परियोजना कार्यालय तथा बेसिक शिक्षा निदेशालय, उत्तर प्रदेश द्वारा शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु घोषित प्रमुख बाल अधिकार एवं व्यवस्थाएँ निम्नलिखित हैं—
1. 6 से 14 वर्ष तक निःशुल्क शिक्षा
6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराना प्रमुख उद्देश्य है, ताकि आर्थिक कठिनाइयों के कारण कोई बच्चा प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित न रहे।
2. निःशुल्क पाठ्य-पुस्तकों की व्यवस्था
कक्षा 1 से 8 तक अध्ययन करने वाले बच्चों को निःशुल्क पाठ्य-पुस्तकें उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई, जिससे शिक्षा पर होने वाला आर्थिक भार कम किया जा सके।
3. मध्याह्न भोजन की व्यवस्था
प्राथमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए प्रतिदिन मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई।
इसका उद्देश्य बच्चों के पोषण में सुधार करने के साथ-साथ विद्यालय में उनकी उपस्थिति और निरन्तरता को बढ़ाना है।
4. विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए विद्यालयों में शिक्षक एवं शिक्षामित्रों की पर्याप्त व्यवस्था करने पर बल दिया गया।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों को नियमित शिक्षण प्राप्त हो और शिक्षक की कमी के कारण उनकी शिक्षा प्रभावित न हो।
5. बालिकाओं के लिए निःशुल्क यूनिफॉर्म
शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े विकास खण्डों में कक्षा 1 से 5 तक की बालिकाओं को निःशुल्क यूनिफॉर्म प्रदान करने की व्यवस्था की गई।
इससे बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देने और विद्यालय में उनकी सहभागिता बढ़ाने का प्रयास किया गया।
6. पिछड़े वर्गों के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों के बालक-बालिकाओं के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था की गई।
- कक्षा 1 से 5 तक—₹300 वार्षिक।
- कक्षा 6 से 8 तक—₹480 वार्षिक।
इसका उद्देश्य आर्थिक कठिनाइयों को कम करके बच्चों को विद्यालय में बनाए रखना था।
7. विद्यालय रख-रखाव हेतु अनुदान
विद्यालय के रख-रखाव के लिए ₹5000 वार्षिक अनुदान की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
इससे विद्यालय भवन और आवश्यक सुविधाओं को सुचारु बनाए रखने में सहायता मिलती है।
8. विद्यालय विकास अनुदान
विद्यालय के विकास हेतु ₹2000 वार्षिक विकास अनुदान प्रदान करने की व्यवस्था की गई।
इसका उपयोग विद्यालय की आवश्यक शैक्षिक एवं विकास सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने में किया जा सकता है।
9. विद्यालय प्रबन्ध में समुदाय की सहभागिता
विद्यालय के प्रबन्ध में ग्राम शिक्षा समिति, जनप्रतिनिधियों एवं अभिभावकों की सहभागिता पर बल दिया गया।
इस व्यवस्था का उद्देश्य विद्यालय को स्थानीय समुदाय से जोड़ना तथा शिक्षा के विकास में अभिभावकों और समाज की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना है।
राष्ट्रीय बाल नीति
भारत सरकार ने बच्चों के कल्याण और विकास को राष्ट्रीय दायित्व के रूप में स्वीकार करते हुए 22 अगस्त 1974 को राष्ट्रीय बाल नीति को अपनाया।
इस नीति में बालक के शारीरिक, मानसिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक विकास को महत्त्व देते हुए राज्य के लिए अनेक कल्याणकारी दायित्व निर्धारित किए गए।
राष्ट्रीय बाल नीति की प्रमुख व्यवस्थाएँ
1. जन्म से पूर्व एवं जन्म के बाद आवश्यक सेवाएँ
बालक के स्वस्थ विकास के लिए जन्म से पूर्व तथा जन्म के बाद पर्याप्त स्वास्थ्य, पोषण और विकास सम्बन्धी सेवाएँ उपलब्ध कराना राज्य का प्रमुख दायित्व माना गया।
2. माता-पिता एवं परिवार का संरक्षण
बालक के विकास के लिए पारिवारिक वातावरण को महत्त्व दिया गया। बालक को अनावश्यक रूप से माता-पिता से अलग नहीं किया जाना चाहिए और उसके पालन-पोषण एवं विकास के लिए परिवार का सहयोग बनाए रखा जाना चाहिए।
3. 6 से 14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा
6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए राज्य द्वारा समयबद्ध कार्यक्रम तैयार किए जाने पर बल दिया गया।
4. बच्चों के पोषण की व्यवस्था
बच्चों में पोषक तत्त्वों की कमी दूर करने के लिए राज्य द्वारा आवश्यक पोषाहार कार्यक्रम संचालित किए जाने चाहिए।
उचित पोषण बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक माना गया है।
5. वैकल्पिक शिक्षा की व्यवस्था
जो बच्चे किसी कारणवश औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम न हों, उनके लिए राज्य द्वारा वैकल्पिक शैक्षिक व्यवस्थाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
6. बच्चों को जोखिमपूर्ण कार्यों से संरक्षण
14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को ऐसे जोखिमपूर्ण एवं हानिकारक उत्पादक कार्यों में नहीं लगाया जाना चाहिए जो उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास को प्रभावित करें।
7. प्रतिभाशाली बच्चों के लिए विशेष कार्यक्रम
प्रतिभाशाली बच्चों की पहचान करने, उन्हें प्रोत्साहन देने और उनकी प्रतिभा के विकास हेतु सहायता प्रदान करने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए।
8. मादक पदार्थों से संरक्षण
राज्य का दायित्व है कि बच्चों को मादक पदार्थों के सेवन, उत्पादन और व्यापार जैसी हानिकारक गतिविधियों से सुरक्षित रखे।
9. शारीरिक, वैज्ञानिक एवं सामाजिक गतिविधियों को प्रोत्साहन
विद्यालयों में बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए शारीरिक शिक्षा, खेल-कूद, वैज्ञानिक गतिविधियों तथा सामाजिक क्रियाकलापों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
10. समझ, शान्ति एवं सहिष्णुता का विकास
बालकों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे उनमें समझ, शान्ति, सहिष्णुता और परस्पर सम्मान की भावना विकसित हो सके।
शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों में स्वस्थ सामाजिक व्यवहार भी विकसित करना है।
11. दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष व्यवस्था
दिव्यांग अथवा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को उचित उपचार, शिक्षा एवं संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार दिया जाना चाहिए।
ऐसी सुविधाएँ उनके अधिकतम सम्भव विकास और सम्मानपूर्ण जीवन के लिए आवश्यक हैं।
12. आत्मसम्मान के अनुरूप विद्यालयी अनुशासन
विद्यालय का अनुशासन ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे बच्चे के आत्मसम्मान और गरिमा को ठेस पहुँचे।
अनुशासन का उद्देश्य बालक को सुधारना और जिम्मेदार बनाना होना चाहिए, न कि उसे अपमानित करना।
13. व्यापक स्वास्थ्य कार्यक्रम
राज्य द्वारा बच्चों के लिए व्यापक स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए, जिनमें आवश्यक स्वास्थ्य परीक्षण एवं स्वास्थ्य-सुरक्षा की व्यवस्था हो।
14. अनाथ बच्चों के कल्याण की व्यवस्था
अनाथ बच्चों की देखभाल, संरक्षण और विकास के लिए राज्य को उचित कल्याणकारी प्रावधान करने चाहिए।
15. आर्थिक शोषण से संरक्षण एवं समन्वित विकास
बच्चों को आर्थिक शोषण से सुरक्षित रखना राज्य का दायित्व है। साथ ही उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और समग्र विकास को एक-दूसरे से जोड़ते हुए योजनाबद्ध व्यवस्था की जानी चाहिए।
राष्ट्रीय बाल नीति का महत्त्व
राष्ट्रीय बाल नीति बच्चों को केवल सहायता का पात्र नहीं मानती, बल्कि उनके स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, सुरक्षा और विकास को राज्य की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करती है।
इस नीति का मूल उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना है जिसमें प्रत्येक बालक को स्वस्थ जीवन, शिक्षा, सुरक्षा, सम्मान और सर्वांगीण विकास के पर्याप्त अवसर प्राप्त हो सकें।
उत्तर प्रदेश की घोषणा एवं राष्ट्रीय बाल नीति का सम्बन्ध
राष्ट्रीय बाल नीति व्यापक स्तर पर बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और संरक्षण की दिशा निर्धारित करती है, जबकि उत्तर प्रदेश में शिक्षा के सार्वजनीकरण से सम्बन्धित व्यवस्थाएँ इन उद्देश्यों को विद्यालय स्तर पर व्यावहारिक रूप देने का प्रयास करती हैं।
दोनों का मूल लक्ष्य बच्चों को शिक्षा से जोड़ना, उनकी आर्थिक एवं सामाजिक बाधाएँ कम करना तथा उनके स्वस्थ एवं सम्मानपूर्ण विकास के लिए आवश्यक अवसर उपलब्ध कराना है।
- उत्तर प्रदेश में शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।
- कक्षा 1 से 8 तक निःशुल्क पाठ्य-पुस्तकें तथा प्राथमिक विद्यालयों में मध्याह्न भोजन की व्यवस्था प्रमुख उपाय हैं।
- बालिका शिक्षा, पिछड़े वर्गों की छात्रवृत्ति, विद्यालय रख-रखाव एवं विकास अनुदान तथा समुदाय की सहभागिता को भी महत्त्व दिया गया।
- राष्ट्रीय बाल नीति 22 अगस्त 1974 को अपनाई गई।
- राष्ट्रीय बाल नीति बच्चों के शारीरिक, मानसिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विकास पर बल देती है।
- इसमें निःशुल्क शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, वैकल्पिक शिक्षा और प्रतिभाशाली बच्चों के विकास से सम्बन्धित व्यवस्थाएँ शामिल हैं।
- बच्चों को जोखिमपूर्ण कार्यों, मादक पदार्थों और आर्थिक शोषण से सुरक्षित रखने पर विशेष बल दिया गया है।
- दिव्यांग एवं अनाथ बच्चों के उपचार, शिक्षा, संरक्षण और कल्याण हेतु विशेष व्यवस्था करना राज्य का दायित्व माना गया है।
बाल अधिकारों के संरक्षण से सम्बन्धित संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान
बाल अधिकारों के संरक्षण का अर्थ
बाल अधिकारों का संरक्षण केवल बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। बच्चों को शोषण, मानव-तस्करी, जबरन श्रम, खतरनाक कार्यों तथा ऐसी परिस्थितियों से बचाना भी आवश्यक है जो उनके शारीरिक, मानसिक और शैक्षिक विकास को प्रभावित करती हैं।
इसी उद्देश्य से भारतीय संविधान तथा विभिन्न कानूनों में बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और कल्याण से सम्बन्धित अनेक प्रावधान किए गए हैं।
1. अनुच्छेद 23—मानव तस्करी एवं बलात् श्रम का निषेध
अनुच्छेद 23 मानव तस्करी, बेगार तथा अन्य प्रकार के बलात् श्रम का निषेध करता है।
बालकों के सन्दर्भ में इसका विशेष महत्त्व है क्योंकि बच्चों का क्रय-विक्रय, उन्हें जबरन काम में लगाना अथवा उनका अनैतिक व्यापार करना उनके मूल अधिकारों का उल्लंघन है।
ऐसे कार्य दण्डनीय हैं और राज्य का दायित्व है कि बच्चों को इन प्रकार के शोषण से सुरक्षित रखे।
बाल संरक्षण की दृष्टि से महत्त्व
- बच्चों की खरीद-फरोख्त एवं तस्करी पर रोक लगाता है।
- बच्चों से जबरन श्रम कराने की प्रवृत्ति को रोकता है।
- बालकों की गरिमा, स्वतंत्रता और सुरक्षित जीवन की रक्षा करता है।
2. अनुच्छेद 24—बालकों को खतरनाक कार्यों में लगाने का निषेध
अनुच्छेद 24 बच्चों को कारखानों, खानों तथा अन्य जोखिमपूर्ण कार्यों में नियोजित किए जाने से संरक्षण प्रदान करता है।
बालकों को ऐसे कार्यों में लगाना उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास के लिए हानिकारक होता है। इसलिए संविधान ने बालश्रम के विशेष रूप से खतरनाक स्वरूपों को रोकने की व्यवस्था की है।
अनुच्छेद 24 का शैक्षिक महत्त्व
यदि बालक कम आयु में श्रम और जोखिमपूर्ण कार्यों में लगा दिया जाता है तो वह शिक्षा प्राप्त करने से वंचित हो सकता है। इसीलिए बालश्रम पर रोक और प्रारम्भिक शिक्षा का अधिकार एक-दूसरे से निकट रूप से सम्बन्धित हैं।
3. बालश्रम एवं बाल नियोजन से सम्बन्धित कानूनी प्रावधान
बालकों को अनुचित श्रम और जोखिमपूर्ण कार्यों से बचाने के लिए समय-समय पर विभिन्न कानून बनाए गए। प्रमुख कानूनों में निम्नलिखित का उल्लेख किया गया है—
- बाल नियोजन अधिनियम, 1938
- बाल श्रम (गिरवीकरण) अधिनियम, 1933
- बाल श्रम अधिनियम, 1986
- भारतीय कारखाना अधिनियम, 1948
- वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 1958
- मोटर परिवहन कर्मकार अधिनियम, 1961
- शिक्षु अधिनियम, 1961
इन कानूनी व्यवस्थाओं का उद्देश्य बच्चों को ऐसे कार्यों से दूर रखना है जिनसे उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा या सामान्य विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
बालश्रम रोकने की आवश्यकता
बालश्रम केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह बालक के शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन के अधिकार से भी जुड़ा हुआ है।
कम आयु में काम करने से बच्चा विद्यालय से दूर हो सकता है, उसकी शिक्षा बाधित हो सकती है तथा शारीरिक और मानसिक विकास भी प्रभावित हो सकता है।
इसलिए बाल अधिकारों के संरक्षण का एक प्रमुख उद्देश्य बच्चों को श्रम के स्थान पर शिक्षा एवं विकास के अवसर उपलब्ध कराना है।
4. दिव्यांग बच्चों के प्रशिक्षण से सम्बन्धित प्रावधान
स्रोत में सन् 1992 के अधिनियम 34 के अन्तर्गत दिव्यांग बच्चों के प्रशिक्षण हेतु विकसित पाठ्यक्रमों एवं तकनीकों को मान्यता प्रदान करने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
इसका उद्देश्य विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए उपयुक्त प्रशिक्षण और शिक्षण-पद्धतियों को व्यवस्थित एवं प्रभावी बनाना है।
इस प्रावधान का महत्त्व
- दिव्यांग बच्चों को उनकी आवश्यकता के अनुरूप प्रशिक्षण उपलब्ध कराना।
- विशेष शिक्षा के लिए उपयुक्त पाठ्यक्रम एवं तकनीकों को प्रोत्साहित करना।
- विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को शिक्षा और विकास के अवसरों से जोड़ना।
5. 86वाँ संविधान संशोधन, 2002 एवं अनुच्छेद 21(A)
बालकों के शैक्षिक अधिकारों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संविधान में अनुच्छेद 21(A) जोड़ा गया।
इसके अन्तर्गत 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने को मौलिक अधिकार बनाया गया।
इस प्रावधान ने शिक्षा को केवल राज्य की नीति या लक्ष्य तक सीमित न रखकर बच्चे के संवैधानिक अधिकार के रूप में स्थापित किया।
अनुच्छेद 21(A) का बाल अधिकारों से सम्बन्ध
- प्रत्येक 6 से 14 वर्ष के बच्चे को प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिला।
- आर्थिक कमजोरी के कारण शिक्षा से वंचित होने की स्थिति को कम करने का संवैधानिक आधार प्राप्त हुआ।
- राज्य पर बच्चों की निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व बढ़ा।
- बालश्रम और अशिक्षा के विरुद्ध कानूनी व्यवस्था को अधिक मजबूती मिली।
संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों का समग्र महत्त्व
बाल अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा तभी सम्भव है जब बच्चे शोषण, तस्करी, बलात् श्रम और जोखिमपूर्ण कार्यों से मुक्त हों तथा उन्हें शिक्षा, प्रशिक्षण और विकास के पर्याप्त अवसर प्राप्त हों।
अनुच्छेद 23 और 24 बच्चों को शोषण और खतरनाक श्रम से संरक्षण प्रदान करते हैं, जबकि अनुच्छेद 21(A) उन्हें प्रारम्भिक शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है।
इस प्रकार भारतीय संवैधानिक एवं कानूनी व्यवस्था का उद्देश्य बच्चे को सुरक्षित, शिक्षित, स्वस्थ और सम्मानपूर्ण जीवन प्रदान करना है।
- अनुच्छेद 23 मानव तस्करी, बेगार तथा बलात् श्रम का निषेध करता है।
- अनुच्छेद 24 बच्चों को कारखानों, खानों और जोखिमपूर्ण कार्यों में नियोजित किए जाने से संरक्षण प्रदान करता है।
- बाल नियोजन, बाल श्रम, कारखाना, पोत परिवहन, मोटर परिवहन तथा शिक्षु सम्बन्धी विभिन्न कानून बच्चों को हानिकारक श्रम से बचाने में सहायक हैं।
- सन् 1992 के प्रावधान में दिव्यांग बच्चों के प्रशिक्षण हेतु पाठ्यक्रम एवं तकनीकों को मान्यता देने की व्यवस्था का उल्लेख है।
- 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद 21(A) जोड़ा गया।
- अनुच्छेद 21(A) 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।
- बाल अधिकार संरक्षण का उद्देश्य बच्चों को शोषण से बचाकर शिक्षा, सुरक्षा एवं सर्वांगीण विकास के अवसर प्रदान करना है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009—पृष्ठभूमि एवं प्रमुख प्रावधान
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009
किसी भी समाज और राष्ट्र का विकास उसके नागरिकों के व्यक्तित्व-विकास पर निर्भर करता है। शिक्षित, योग्य और उत्तरदायी नागरिकों के निर्माण के लिए प्रारम्भिक शिक्षा का सार्वभौमिक एवं सुलभ होना आवश्यक है।
इसी उद्देश्य से बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा को केवल सरकारी नीति तक सीमित न रखकर एक मौलिक अधिकार का स्वरूप प्रदान किया गया और बाद में इसे प्रभावी बनाने के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 बनाया गया।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम की संवैधानिक पृष्ठभूमि
भारत के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संविधान में अनुच्छेद 21(A) जोड़ा गया। इसके अन्तर्गत 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया।
इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियों के कारण कोई बच्चा प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित न रहे।
अनुच्छेद 21(A) का मूल भाव
- 6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।
- ऐसी शिक्षा निःशुल्क एवं अनिवार्य होगी।
- बच्चे की प्रारम्भिक शिक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य व्यवस्था से जुड़ी है।
- शिक्षा को बच्चों के मौलिक अधिकार के रूप में संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुई।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 का निर्माण
अनुच्छेद 21(A) को व्यावहारिक रूप देने के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 बनाया गया।
स्रोत के अनुसार इस अधिनियम को 4 अगस्त 2009 को संसद में पारित किया गया तथा राष्ट्रपति के अनुमोदन के उपरान्त 27 अगस्त 2009 को भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया गया।
इस अधिनियम के माध्यम से प्रत्येक बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने के मौलिक अधिकार को कानूनी स्वरूप प्रदान किया गया।
अधिनियम की संरचना
स्रोत के अनुसार शिक्षा का अधिकार अधिनियम में कुल 7 अध्याय तथा 38 खण्ड हैं।
इन अध्यायों में विद्यालयों की प्रकृति, बच्चों के निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार, सरकार एवं अभिभावकों के दायित्व, विद्यालय एवं शिक्षक के दायित्व, पाठ्यक्रम, बाल अधिकार संरक्षण तथा अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है।
अध्याय 1—प्रस्तावना एवं विद्यालयों के प्रकार
अधिनियम में विद्यालयों को उनके प्रबन्ध एवं वित्तीय व्यवस्था के आधार पर चार प्रमुख प्रकारों में रखा गया है—
- सरकार द्वारा स्थापित एवं नियंत्रित विद्यालय— ऐसे विद्यालय जिन्हें सरकार स्थापित करती है और जिनका संचालन सरकारी व्यवस्था के अन्तर्गत होता है।
- सरकार से अनुदान प्राप्त निजी विद्यालय— ऐसे निजी विद्यालय जिन्हें सरकार से आर्थिक सहायता या अनुदान प्राप्त होता है।
- विशेष श्रेणी के विद्यालय— जैसे केन्द्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय आदि।
- अनुदान न पाने वाले निजी विद्यालय— ऐसे निजी विद्यालय जिन्हें सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं होती।
अध्याय 2—निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार
अधिनियम का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा प्रदान करने से सम्बन्धित है।
1. प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क एवं अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा
6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क एवं अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि किसी बच्चे की शिक्षा उसकी आर्थिक स्थिति या पारिवारिक परिस्थितियों के कारण बाधित न हो।
2. प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के लिए कोई शुल्क नहीं
बच्चे से अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने तथा उसे पूरा करने के लिए ऐसा कोई शुल्क या व्यय नहीं लिया जाना चाहिए जो उसकी शिक्षा प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न करे।
इस प्रकार निःशुल्क शिक्षा का वास्तविक अर्थ केवल प्रवेश-शुल्क न लेना नहीं, बल्कि बच्चे को प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण करने का अवसर उपलब्ध कराना है।
3. आयु के अनुसार प्रवेश का अधिकार
यदि कोई बच्चा किसी कारण से 6 वर्ष की आयु में विद्यालय में प्रवेश नहीं ले पाया हो, तो बाद में उसे उसकी आयु के अनुसार उपयुक्त कक्षा में प्रवेश दिया जा सकता है।
विद्यालय ऐसे बच्चे को केवल इस आधार पर प्रवेश देने से मना नहीं कर सकता कि उसने निर्धारित प्रारम्भिक आयु में विद्यालय में प्रवेश नहीं लिया था।
यदि बच्चा 14 वर्ष की आयु तक अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाया है, तो उसे प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने तक निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार रहेगा।
4. विद्यालय बदलने का अधिकार
बच्चे को एक विद्यालय से दूसरे विद्यालय में स्थानान्तरण कराने का अधिकार प्राप्त है।
यदि किसी विद्यालय में प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध नहीं है, तो बच्चा दूसरे विद्यालय में प्रवेश ले सकता है।
स्थानान्तरण के लिए प्रधानाध्यापक द्वारा स्थानान्तरण प्रमाण-पत्र (T.C.) जारी किया जाना चाहिए।
यदि किसी कारण से T.C. उपलब्ध नहीं है, तो केवल इसी आधार पर बच्चे को दूसरे विद्यालय में प्रवेश देने से मना नहीं किया जा सकता।
शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश और समानता
अधिनियम की पृष्ठभूमि में संविधान का अनुच्छेद 29(2) भी शिक्षा में समान प्रवेश की भावना को मजबूत करता है।
इसके अनुसार राज्य द्वारा संचालित अथवा राज्य से सहायता प्राप्त शिक्षण संस्था में किसी नागरिक को केवल धर्म, जाति, प्रजाति या भाषा आदि के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता।
इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षा का अधिकार केवल विद्यालय उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा के अवसरों में समानता सुनिश्चित करना भी उसका महत्त्वपूर्ण आधार है।
निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का वास्तविक अर्थ
निःशुल्क शिक्षा
निःशुल्क शिक्षा से आशय ऐसी शिक्षा से है जिसमें आर्थिक कारण बच्चे की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने या उसे पूरा करने में बाधा न बने।
अनिवार्य शिक्षा
अनिवार्य शिक्षा का अर्थ केवल बच्चे को विद्यालय भेजने के लिए बाध्य करना नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें प्रत्येक पात्र बच्चे का प्रवेश हो, वह विद्यालय में बना रहे और अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण कर सके।
अधिनियम का शैक्षिक महत्त्व
- प्रारम्भिक शिक्षा को बच्चे के कानूनी एवं मौलिक अधिकार से जोड़ा गया।
- 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित करने का आधार मजबूत हुआ।
- आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के शिक्षा से वंचित होने की सम्भावना कम करने का प्रयास किया गया।
- विद्यालय से बाहर रह गए बच्चों को आयु के अनुसार शिक्षा व्यवस्था में पुनः शामिल करने की व्यवस्था की गई।
- स्थानान्तरण जैसी परिस्थितियों के कारण बच्चे की शिक्षा बाधित न हो, इसका प्रावधान किया गया।
- बच्चे की प्रारम्भिक शिक्षा को पूर्ण कराना अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य है।
- 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद 21(A) जोड़ा गया।
- अनुच्छेद 21(A) 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।
- इसे प्रभावी बनाने के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 बनाया गया।
- स्रोत के अनुसार अधिनियम में कुल 7 अध्याय और 38 खण्ड हैं।
- अधिनियम में सरकारी, अनुदानित निजी, विशेष श्रेणी तथा गैर-अनुदानित निजी विद्यालयों का उल्लेख किया गया है।
- 6 से 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने और उसे पूर्ण करने का अधिकार है।
- विद्यालय से बाहर रह गए बच्चे को उसकी आयु के अनुसार उपयुक्त कक्षा में प्रवेश दिया जा सकता है।
- बच्चे को विद्यालय बदलने का अधिकार है और केवल T.C. न होने के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम—केन्द्र, राज्य, स्थानीय सरकार एवं अभिभावकों के दायित्व
भूमिका
निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार तभी प्रभावी हो सकता है जब बच्चों को विद्यालय, शिक्षक, शिक्षण-सामग्री तथा आवश्यक शैक्षिक सुविधाएँ वास्तविक रूप से उपलब्ध हों।
इसीलिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम में केवल बच्चे के अधिकारों का ही उल्लेख नहीं किया गया, बल्कि केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय सरकार तथा अभिभावकों के दायित्व भी निर्धारित किए गए हैं।
1. पड़ोस में विद्यालय स्थापित करने का दायित्व
अधिनियम लागू होने के तीन वर्ष के भीतर सरकार को ऐसे क्षेत्रों में पड़ोस का विद्यालय स्थापित करने की व्यवस्था करनी है जहाँ आवश्यक विद्यालय उपलब्ध नहीं हैं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए अत्यधिक दूरी तय न करनी पड़े और विद्यालय तक उनकी पहुँच सरल हो।
2. केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा वित्तीय व्यवस्था
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक धनराशि की व्यवस्था करना केन्द्र एवं राज्य सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।
विद्यालयों की स्थापना, शिक्षकों की उपलब्धता, आधारभूत सुविधाओं और अन्य शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।
3. केन्द्र सरकार द्वारा राज्यों को आर्थिक सहायता
केन्द्र सरकार राज्य सरकारों के साथ परामर्श करके अधिनियम के क्रियान्वयन में होने वाले व्यय का एक निश्चित भाग सहायता के रूप में उपलब्ध कराती है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण किसी राज्य में बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा प्रभावित न हो।
4. केन्द्र सरकार के शैक्षिक दायित्व
केन्द्र सरकार पर केवल वित्तीय सहायता प्रदान करने का दायित्व नहीं है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और समान मानकों के विकास में भी उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
स्रोत के अनुसार केन्द्र सरकार के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—
- राष्ट्रीय पाठ्यचर्या का प्रारूप तैयार करना।
- शिक्षकों के प्रशिक्षण की दिशा निर्धारित करना।
- शिक्षा में नवाचार एवं अनुसन्धान को प्रोत्साहित करना।
- शिक्षकों की नियुक्ति से सम्बन्धित मानदण्ड निर्धारित करना।
- राज्य सरकारों को तकनीकी सहायता एवं आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना।
- शिक्षा की गुणवत्ता एवं क्षमता-विकास के लिए आवश्यक सहयोग प्रदान करना।
5. राज्य एवं स्थानीय सरकारों के दायित्व
राज्य एवं स्थानीय सरकारों का प्रमुख दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि 6 से 14 वर्ष की आयु का प्रत्येक बच्चा विद्यालय में प्रवेश ले, नियमित रूप से उपस्थित रहे और अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण करे।
इसके लिए निम्न बातों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए—
- प्रत्येक पात्र बच्चे का विद्यालय में प्रवेश सुनिश्चित करना।
- बच्चों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना।
- बच्चे को प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने का अवसर देना।
- आवश्यकतानुसार पड़ोस में विद्यालय की सुविधा उपलब्ध कराना।
- कमजोर तथा वंचित वर्ग के बच्चों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव न होने देना।
6. विद्यालयी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का दायित्व
सरकार को ऐसी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए जिनके बिना गुणवत्तापूर्ण प्रारम्भिक शिक्षा सम्भव नहीं है।
इनमें प्रमुख रूप से निम्न व्यवस्थाएँ शामिल हैं—
- उपयुक्त विद्यालय भवन।
- पर्याप्त संख्या में शिक्षक।
- आवश्यक शिक्षण-सामग्री।
- विद्यालय की आधारभूत संरचना एवं सुविधाएँ।
- शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था।
- विद्यालय के कामकाज की नियमित निगरानी।
इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल विद्यालय खोलना नहीं, बल्कि विद्यालय को इस योग्य बनाना है कि वह बच्चों को प्रभावी एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर सके।
7. अभिभावकों का दायित्व
शिक्षा का अधिकार अधिनियम में केवल सरकारों को ही उत्तरदायी नहीं बनाया गया है। बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण मानी गई है।
6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चे को विद्यालय में प्रवेश दिलाना प्रत्येक माता-पिता या अभिभावक का दायित्व है।
अभिभावकों को बच्चे की शिक्षा के प्रति रुचि रखते हुए उसे विद्यालय भेजने और उसकी प्रारम्भिक शिक्षा पूरी कराने में सहयोग करना चाहिए।
8. तीन वर्ष से अधिक आयु के बच्चों के लिए पूर्व-प्राथमिक तैयारी
स्रोत के अनुसार सरकार तीन वर्ष से अधिक आयु के बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा के लिए तैयार करने हेतु आवश्यक व्यवस्था कर सकती है।
इसका उद्देश्य विद्यालय में प्रवेश से पहले बच्चों में ऐसी प्रारम्भिक योग्यताओं और आदतों का विकास करना है जिससे वे आगे की शिक्षा के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकें।
सरकार और अभिभावकों के संयुक्त दायित्व का महत्त्व
बच्चे का विद्यालय में नामांकन कर देना मात्र पर्याप्त नहीं है। उसे विद्यालय में बनाए रखना, नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना, उचित शिक्षण उपलब्ध कराना तथा प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण कराना भी उतना ही आवश्यक है।
इसलिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम में केन्द्र, राज्य, स्थानीय सरकार और अभिभावकों के बीच उत्तरदायित्व का विभाजन किया गया है।
इन सभी पक्षों के संयुक्त प्रयास से ही सार्वभौमिक, निःशुल्क, अनिवार्य एवं गुणवत्तापूर्ण प्रारम्भिक शिक्षा का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
- अधिनियम लागू होने के तीन वर्ष के भीतर आवश्यक स्थानों पर पड़ोस के विद्यालय स्थापित करने का प्रावधान है।
- अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार दोनों वित्तीय व्यवस्था के लिए उत्तरदायी हैं।
- केन्द्र सरकार राष्ट्रीय पाठ्यचर्या, शिक्षक प्रशिक्षण, अनुसन्धान, शिक्षक नियुक्ति के मानदण्ड तथा तकनीकी सहायता से सम्बन्धित कार्य करती है।
- राज्य एवं स्थानीय सरकारों को 6 से 14 वर्ष के बच्चों का प्रवेश, उपस्थिति और प्रारम्भिक शिक्षा की पूर्णता सुनिश्चित करनी है।
- सरकार को विद्यालय भवन, शिक्षक, शिक्षण-सामग्री, आधारभूत सुविधाएँ और शिक्षक प्रशिक्षण उपलब्ध कराना चाहिए।
- कमजोर एवं वंचित वर्ग के बच्चों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
- 6 से 14 वर्ष के बच्चे को विद्यालय में प्रवेश दिलाना अभिभावक का दायित्व है।
- तीन वर्ष से अधिक आयु के बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा के लिए तैयार करने की व्यवस्था भी की जा सकती है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम—विद्यालय एवं शिक्षक के दायित्व, पाठ्यक्रम, बाल अधिकार संरक्षण एवं उद्देश्य
भूमिका
निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 केवल बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिलाने तक सीमित नहीं है। इसमें विद्यालयों और शिक्षकों के दायित्व, पाठ्यक्रम एवं मूल्यांकन की प्रकृति, बाल अधिकारों की सुरक्षा तथा अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन से सम्बन्धित व्यवस्थाएँ भी की गई हैं।
इन प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक बच्चे को केवल विद्यालय तक पहुँच ही न मिले, बल्कि उसे सुरक्षित, भेदभाव-मुक्त, बाल-केंद्रित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी प्राप्त हो।
अध्याय 4—विद्यालय और शिक्षकों के दायित्व
1. निःशुल्क शिक्षा एवं 25% प्रवेश व्यवस्था
सरकारी विद्यालयों का दायित्व है कि वे बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करें।
स्रोत के अनुसार निजी एवं विशेष श्रेणी के विद्यालयों में आर्थिक रूप से कमजोर तथा वंचित समुदाय के बच्चों के लिए कक्षा 1 में 25 प्रतिशत तक स्थान उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है।
इस प्रावधान का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण बच्चों के बीच शिक्षा के अवसरों में उत्पन्न असमानता को कम करना है।
2. प्रवेश के लिए दान या अनुचित चयन का निषेध
किसी विद्यालय द्वारा बच्चे के प्रवेश के लिए अनिवार्य रूप से दान, चन्दा अथवा अतिरिक्त राशि नहीं ली जा सकती और प्रवेश के लिए अनुचित चयन या स्क्रीनिंग प्रक्रिया भी नहीं अपनाई जानी चाहिए।
यदि प्रवेश के नाम पर चन्दा या दान लिया जाता है तो स्रोत के अनुसार उसका दस गुना आर्थिक दण्ड लगाया जा सकता है।
इसी प्रकार प्रवेश के लिए अनुचित चयन प्रक्रिया अपनाने पर पहली बार ₹25,000 तथा पुनः ऐसा किए जाने पर ₹50,000 तक अर्थदण्ड का प्रावधान बताया गया है।
3. आयु निर्धारण एवं जन्म प्रमाण-पत्र
बालक की आयु का निर्धारण जन्म प्रमाण-पत्र के आधार पर किया जाएगा, जो जन्म, मृत्यु एवं विवाह पंजीकरण से सम्बन्धित प्रावधानों के अनुसार मान्य हो।
लेकिन केवल जन्म प्रमाण-पत्र उपलब्ध न होने के कारण किसी बच्चे को विद्यालय में प्रवेश देने से मना नहीं किया जा सकता।
इस व्यवस्था का उद्देश्य दस्तावेजों की कमी के कारण बच्चों को शिक्षा से वंचित होने से बचाना है।
4. बच्चे को कक्षा में रोकने या विद्यालय से निकालने का निषेध
स्रोत में यह प्रावधान दिया गया है कि प्रारम्भिक शिक्षा पूरी होने तक बच्चे को किसी कक्षा में रोकना या विद्यालय से निष्कासित नहीं किया जाना चाहिए।
इसका उद्देश्य बच्चे की शिक्षा को निरन्तर बनाए रखना तथा उसे विद्यालय से बाहर होने की स्थिति से बचाना है।
5. शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न का निषेध
बच्चों को किसी प्रकार की शारीरिक या मानसिक यातना नहीं दी जा सकती।
बालक के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करना आवश्यक है। किसी शिक्षक या कर्मचारी द्वारा शारीरिक अथवा मानसिक उत्पीड़न किए जाने पर उसके विरुद्ध सेवा-नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
विद्यालय प्रबन्ध समिति
अनुदान न पाने वाले निजी विद्यालयों को छोड़कर अन्य विद्यालयों में विद्यालय प्रबन्ध समिति गठित करने का प्रावधान है।
इस समिति में स्थानीय सरकार के प्रतिनिधि तथा विद्यालय में नामांकित बच्चों के अभिभावक सम्मिलित होते हैं।
विद्यालय प्रबन्ध समिति की संरचना
स्रोत के अनुसार समिति के कुल सदस्यों में से लगभग तीन-चौथाई अर्थात 75% सदस्य अभिभावकों में से लिए जाते हैं।
समिति में वंचित एवं कमजोर वर्गों तथा महिलाओं को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।
विद्यालय प्रबन्ध समिति के प्रमुख कार्य
- विद्यालय के कार्यों का अनुश्रवण करना।
- विद्यालय के विकास की योजना तैयार करना तथा उसके क्रियान्वयन में सहयोग देना।
- सरकार, स्थानीय सरकार अथवा अन्य स्रोतों से प्राप्त अनुदान के उपयोग की निगरानी करना।
- विद्यालय एवं समिति को सौंपे गए अन्य आवश्यक कार्य करना।
शिक्षकों के प्रमुख दायित्व
विद्यालय की गुणवत्ता मुख्य रूप से शिक्षक के कार्य एवं उत्तरदायित्व पर निर्भर करती है। स्रोत में शिक्षक के निम्न प्रमुख दायित्व दिए गए हैं—
- नियमित एवं समय पर विद्यालय आना— शिक्षक को नियमित रूप से निर्धारित समय पर विद्यालय उपस्थित होना चाहिए।
- पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षण— निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार विद्यार्थियों को पढ़ाना तथा पाठ्यक्रम पूरा करना शिक्षक का दायित्व है।
- अधिगम का आकलन— विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता और उपलब्धियों का नियमित आकलन करना चाहिए।
- निर्धारित समय में पाठ्यक्रम पूर्ण करना— विद्यार्थियों की शिक्षा बाधित न हो, इसलिए निर्धारित अवधि में पाठ्यक्रम को पूरा किया जाना चाहिए।
- अभिभावक बैठकों का आयोजन— समय-समय पर अभिभावकों के साथ बैठक करके बच्चे की प्रगति, कठिनाइयों और आवश्यकताओं पर चर्चा की जानी चाहिए।
- अन्य निर्धारित दायित्वों का निर्वहन— शिक्षक को शिक्षा एवं विद्यालय से सम्बन्धित अन्य सौंपे गए दायित्वों को भी पूरा करना चाहिए।
शिक्षक-छात्र अनुपात एवं शिक्षक व्यवस्था
स्रोत के अनुसार अधिनियम लागू होने के 6 माह के भीतर राज्य एवं स्थानीय सरकार को शिक्षक-छात्र अनुपात को निर्धारित मानकों के अनुरूप करने का प्रयास करना चाहिए।
शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कार्यों में अनावश्यक रूप से नहीं लगाया जाना चाहिए और विद्यालयों में रिक्त शिक्षकीय पदों की संख्या कुल स्वीकृत पदों के 10 प्रतिशत से अधिक न रहने देने पर बल दिया गया है।
अध्याय 5—प्रारम्भिक शिक्षा का पाठ्यक्रम एवं उसका पूरा किया जाना
अधिनियम में प्रारम्भिक शिक्षा के पाठ्यक्रम तथा मूल्यांकन के लिए बाल-केंद्रित एवं विकासोन्मुख दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया गया है।
1. पाठ्यक्रम एवं मूल्यांकन का निर्धारण
प्रारम्भिक शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम तथा मूल्यांकन की विधि उपयुक्त सरकार द्वारा नियुक्त शैक्षिक प्राधिकारी द्वारा निर्धारित की जाएगी।
2. पाठ्यक्रम निर्माण के प्रमुख आधार
पाठ्यक्रम एवं मूल्यांकन निर्धारित करते समय निम्न बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए—
- संविधान में निहित मूल्यों के अनुरूपता।
- बच्चे का सर्वांगीण विकास।
- बच्चे के ज्ञान, सम्भावित क्षमता एवं प्रतिभा का विकास।
- बालक की शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं का अधिकतम विकास।
- बाल-केंद्रित एवं बाल-सुलभ गतिविधियों द्वारा सीखने के अवसर।
- क्रियाकलाप, अन्वेषण एवं खोज द्वारा अधिगम को बढ़ावा देना।
3. मातृभाषा को प्राथमिकता
जहाँ तक सम्भव हो, प्रारम्भिक स्तर पर पढ़ाई के लिए मातृभाषा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
बालक अपनी परिचित भाषा में विषय को अधिक स्वाभाविक और प्रभावी रूप से समझ सकता है।
4. भय एवं चिंता से मुक्त शिक्षा
विद्यालय का वातावरण ऐसा होना चाहिए जिसमें बच्चा भय, चिंता और सदमे से मुक्त होकर सीख सके तथा अपने विचारों को खुलकर व्यक्त कर सके।
बालक में प्रश्न पूछने, सोचने और अपनी बात कहने की स्वतंत्रता प्रभावी अधिगम के लिए आवश्यक है।
5. सतत मूल्यांकन
बालक के ज्ञान, समझ तथा उस ज्ञान को व्यवहार में प्रयोग करने की क्षमता का निरन्तर मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
मूल्यांकन का उद्देश्य केवल अंक देना नहीं, बल्कि बच्चे की प्रगति, कठिनाइयों और अधिगम की आवश्यकता को पहचानना होना चाहिए।
6. प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण होने से पहले बोर्ड परीक्षा नहीं
स्रोत के अनुसार प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण किए बिना बच्चे के लिए बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण करना आवश्यक नहीं है।
7. प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण करने पर प्रमाण-पत्र
प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को निर्धारित प्रारूप में प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाना चाहिए।
अध्याय 6—बाल अधिकारों का संरक्षण
शिक्षा के अधिकार का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है जब बच्चे से सम्बन्धित अधिकारों की निगरानी की जाए और शिकायतों के निस्तारण की प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध हो।
1. बाल अधिकार संरक्षण आयोग की भूमिका
बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2005 के अन्तर्गत गठित राष्ट्रीय अथवा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग शिक्षा के अधिकार से सम्बन्धित व्यवस्थाओं की समीक्षा कर सकते हैं।
ये आयोग अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक सुझाव एवं सिफारिशें भी देते हैं।
2. शिक्षा के अधिकार से सम्बन्धित शिकायतों का निस्तारण
शिक्षा के अधिकार से सम्बन्धित शिकायतें निर्धारित क्षेत्रीय अथवा सम्बन्धित अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती हैं, जहाँ मामले की जाँच और उचित निस्तारण किया जाता है।
3. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद
केन्द्र सरकार एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन कर सकती है, जिसमें प्रारम्भिक शिक्षा एवं बाल विकास के क्षेत्र में अनुभव रखने वाले व्यक्तियों को शामिल किया जाता है।
इस परिषद का कार्य अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के विषय में केन्द्र सरकार को परामर्श देना है।
अध्याय 7—अन्य प्रासंगिक बातें
1. नियम बनाने की शक्ति
अधिनियम को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए केन्द्र सरकार, राज्य सरकार तथा स्थानीय प्राधिकारी आवश्यक नियम बना सकते हैं।
2. सद्भावपूर्वक किए गए कार्यों का संरक्षण
अधिनियम अथवा उसके नियमों का पालन करते हुए सद्भावपूर्वक किए गए कार्यों के लिए केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, बाल अधिकार संरक्षण आयोग, स्थानीय प्राधिकारी, विद्यालय प्रबन्ध समिति अथवा सम्बन्धित व्यक्तियों के विरुद्ध अनावश्यक वैधानिक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य अधिनियम को ईमानदारी से लागू करने वाले अधिकारियों एवं संस्थाओं को आवश्यक कानूनी संरक्षण प्रदान करना है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के उद्देश्य
शिक्षा का अधिकार अधिनियम का व्यापक उद्देश्य प्रारम्भिक शिक्षा को प्रत्येक बच्चे तक पहुँचाना और ऐसी शिक्षा उपलब्ध कराना है जिससे बच्चे का समग्र विकास हो सके।
1. आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को शिक्षा प्रदान करना
आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करके उन्हें शिक्षित बनाना अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य है।
2. प्राथमिक शिक्षा को सर्वसुलभ बनाना
प्रारम्भिक शिक्षा को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाकर उसका सार्वभौमीकरण करना अधिनियम का महत्त्वपूर्ण लक्ष्य है।
3. 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को बुनियादी शिक्षा
देश में 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को बुनियादी प्रारम्भिक शिक्षा प्रदान करना इसका प्रमुख उद्देश्य है।
4. शिक्षा के प्रति रुचि उत्पन्न करना
बालकों में शिक्षा के प्रति रुचि और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया जाना चाहिए, ताकि वे विद्यालय से जुड़े रहें और अपनी शिक्षा पूरी करें।
5. बालिका शिक्षा पर विशेष ध्यान
बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करना और उन्हें शिक्षा के समान अवसर प्रदान करना अधिनियम के उद्देश्यों में शामिल है।
6. शिक्षा के स्तर में सुधार
देश में प्रारम्भिक शिक्षा की गुणवत्ता एवं स्तर को बेहतर बनाना अधिनियम का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।
7. ग्रामीण क्षेत्रों तक शिक्षा का प्रसार
ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों तक प्रारम्भिक शिक्षा पहुँचाकर क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने पर बल दिया गया है।
8. शिक्षा से वंचित क्षेत्रों में विद्यालय स्थापित करना
ऐसे क्षेत्रों में विद्यालयों की स्थापना करना आवश्यक है जहाँ अब तक प्रारम्भिक शिक्षा की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध नहीं है।
9. आवश्यक शैक्षिक सहायता उपलब्ध कराना
बच्चों को निःशुल्क पाठ्य-पुस्तकें, यूनिफॉर्म तथा छात्रवृत्ति जैसी आवश्यक सहायता देकर उनकी शिक्षा को प्रोत्साहित करना भी अधिनियम का उद्देश्य है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम का समग्र महत्त्व
शिक्षा का अधिकार अधिनियम बच्चे को केवल विद्यालय में प्रवेश का अधिकार नहीं देता, बल्कि विद्यालय की गुणवत्ता, शिक्षक के उत्तरदायित्व, बाल-केंद्रित पाठ्यक्रम, सुरक्षित वातावरण तथा अधिकारों के संरक्षण की व्यवस्था भी करता है।
इस प्रकार अधिनियम का उद्देश्य ऐसी प्रारम्भिक शिक्षा व्यवस्था स्थापित करना है जिसमें समान अवसर, गुणवत्ता, सुरक्षा, बाल सम्मान और सर्वांगीण विकास सभी को महत्त्व दिया जाए।
- सरकारी विद्यालय निःशुल्क शिक्षा प्रदान करते हैं तथा स्रोत के अनुसार कमजोर एवं वंचित वर्गों के बच्चों के लिए कक्षा 1 में 25% तक स्थान की व्यवस्था की गई है।
- प्रवेश के लिए अनिवार्य दान, चन्दा अथवा अनुचित चयन प्रक्रिया अपनाना निषिद्ध है।
- जन्म प्रमाण-पत्र के अभाव में बच्चे को विद्यालय में प्रवेश से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
- बच्चों को शारीरिक एवं मानसिक यातना से सुरक्षित रखना आवश्यक है।
- विद्यालय प्रबन्ध समिति में स्रोत के अनुसार लगभग 75% सदस्य अभिभावकों में से लिए जाते हैं।
- शिक्षक के प्रमुख दायित्व हैं—नियमित उपस्थिति, पाठ्यक्रम पूरा करना, अधिगम का आकलन और अभिभावकों से संवाद।
- पाठ्यक्रम बाल-केंद्रित, बाल-सुलभ और सर्वांगीण विकास पर आधारित होना चाहिए तथा मातृभाषा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- विद्यालयी वातावरण भय, चिंता एवं मानसिक दबाव से मुक्त होना चाहिए और बच्चे का निरन्तर मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
- राष्ट्रीय एवं राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग शिक्षा के अधिकार से सम्बन्धित व्यवस्थाओं की समीक्षा एवं शिकायतों के निस्तारण में भूमिका निभाते हैं।
- RTE Act का प्रमुख लक्ष्य 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को सर्वसुलभ, निःशुल्क, अनिवार्य एवं गुणवत्तापूर्ण प्रारम्भिक शिक्षा उपलब्ध कराना है।