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Home Study Material Semester 2 प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास प्रारम्भिक शिक्षा के सन्दर्भ में गठित आयोग एवं समितियाँ
Chapter 2 • प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास

प्रारम्भिक शिक्षा के सन्दर्भ में गठित आयोग एवं समितियाँ

UP DELED Semester 2 के विषय प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास के इस अध्याय में स्वतंत्रता-पूर्व भारतीय शिक्षा की पृष्ठभूमि, 1813 के आज्ञा-पत्र, प्राच्य-पाश्चात्य विवाद, मैकाले के विवरण-पत्र, निस्पंदन सिद्धान्त, बैंटिक एवं ऑकलैंड की शिक्षा नीति, वुड के घोषणा-पत्र, हंटर आयोग तथा लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति, उनकी प्रमुख सिफारिशों, गुण-दोष एवं भारतीय शिक्षा पर प्रभाव का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

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Topic 1 स्वतंत्रता-पूर्व भारतीय शिक्षा—पृष्ठभूमि एवं मिशनरियों द्वारा आधुनिक शिक्षा का आरम्भ

स्वतंत्रता-पूर्व भारतीय शिक्षा—पृष्ठभूमि एवं मिशनरियों द्वारा आधुनिक शिक्षा का आरम्भ

स्वतंत्रता-पूर्व भारतीय शिक्षा की पृष्ठभूमि

भारत में शिक्षा की परम्परा अत्यन्त प्राचीन रही है। समय और शासन-व्यवस्था के परिवर्तन के साथ शिक्षा के स्वरूप, संस्थाओं और माध्यम में भी परिवर्तन होता रहा। ब्रिटिश शासन से पहले भारत में वैदिक, बौद्ध और मुस्लिम काल की अपनी-अपनी शिक्षा व्यवस्थाएँ विकसित थीं।

1. वैदिक काल की शिक्षा

वैदिक काल में शिक्षा का प्रमुख केन्द्र गुरुकुल था। विद्यार्थी गुरु के संरक्षण में रहकर अध्ययन करते थे। शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि चरित्र, अनुशासन और जीवन-व्यवहार के विकास पर भी बल दिया जाता था।

2. बौद्ध काल की शिक्षा

बौद्ध काल में शिक्षा के प्रमुख केन्द्र बौद्ध मठ और विहार थे। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान की जाती थी तथा शिक्षा का प्रमुख माध्यम पाली भाषा था।

3. मुस्लिम काल की शिक्षा

मुस्लिम शासन के समय शिक्षा मुख्यतः मकतब और मदरसों में दी जाती थी। मकतब प्रारम्भिक शिक्षा के केन्द्र थे, जबकि मदरसों में अपेक्षाकृत उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान की जाती थी।

4. ब्रिटिश शासन के प्रारम्भिक समय की स्थिति

ब्रिटिश शासन के आरम्भिक चरण में अंग्रेज शासकों ने भारतीय शिक्षा के विकास में विशेष रुचि नहीं दिखाई। उनका मुख्य ध्यान व्यापार, प्रशासन और अपने राजनीतिक प्रभाव को मजबूत करने पर था।

बाद में जैसे-जैसे ईस्ट इंडिया कम्पनी का राजनीतिक प्रभाव बढ़ा, शासन को भारतीय समाज और प्रशासन की आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा के विषय में भी विचार करना पड़ा। इसी काल में मिशनरियों और कम्पनी से जुड़े कुछ व्यक्तियों द्वारा आधुनिक शिक्षा के प्रसार की दिशा में प्रयास प्रारम्भ हुए।

मिशनरियों द्वारा आधुनिक शिक्षा का आरम्भ

भारत में आधुनिक शिक्षा के प्रारम्भिक प्रसार में ईसाई मिशनरियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। मिशनरियों का प्रमुख उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार करना था, परन्तु इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अनेक शिक्षण संस्थाएँ भी स्थापित कीं।

मिशनरियों का मानना था कि विद्यालयों के माध्यम से भारतीयों से सीधा सम्पर्क स्थापित किया जा सकता है और उन्हें अपने धार्मिक विचारों से परिचित कराया जा सकता है। इस प्रकार शिक्षा उनके लिए धार्मिक प्रचार का एक प्रभावी माध्यम भी बनी।

मिशनरियों की शैक्षिक गतिविधियाँ
  • विभिन्न क्षेत्रों में विद्यालयों की स्थापना की गई।
  • विद्यालयों में सामान्य विषयों के साथ धार्मिक शिक्षा भी दी जाती थी।
  • कुछ मिशनरी विद्यालयों में कम्पनी के कर्मचारियों तथा भारतीय बच्चों को शिक्षा प्रदान की जाती थी।
  • बाद में डेनिश, फ्रांसीसी, पुर्तगाली तथा अंग्रेज मिशनरियों ने भी अनेक शिक्षण संस्थाएँ स्थापित कीं।
  • अंग्रेज मिशनरियों ने विशेष रूप से बंगाल क्षेत्र में शिक्षा के प्रसार के लिए कार्य किया।

ईस्ट इंडिया कम्पनी और शिक्षा

ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत में मुख्यतः व्यापार के उद्देश्य से आई थी। धीरे-धीरे उसने भारत के बड़े भू-भाग पर राजनीतिक अधिकार स्थापित कर लिया। शासन को स्थायी और प्रभावी बनाने के लिए भारतीय समाज, प्रशासन और शिक्षा की ओर ध्यान देना भी आवश्यक हो गया।

इस प्रकार कम्पनी के शासन के साथ भारत में शिक्षा के क्षेत्र में भी परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। आरम्भ में शिक्षा के प्रति कम्पनी का दृष्टिकोण सीमित था, लेकिन बाद में प्रशासनिक आवश्यकताओं तथा मिशनरियों के प्रभाव के कारण शिक्षा सम्बन्धी संस्थाओं और नीतियों का विकास होने लगा।

ग्रांट का शिक्षा सम्बन्धी दृष्टिकोण

कम्पनी से सम्बद्ध ग्रांट ने भारत में शिक्षा की स्थिति पर विचार करते हुए विद्यालयों की स्थापना और अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार की योजना प्रस्तुत की। उसका विचार था कि शिक्षा के माध्यम से भारतीय समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है।

ग्रांट ने भारतीयों की शिक्षा के लिए एक ऐसी रूपरेखा प्रस्तुत की जिसने आगे चलकर आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के विकास को प्रभावित किया। इसी कारण कुछ विद्वानों ने उसे भारत में आधुनिक शिक्षा के प्रारम्भिक प्रवर्तकों में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है।

कम्पनी काल की प्रमुख प्रारम्भिक शिक्षण संस्थाएँ

ब्रिटिश शासन के प्रारम्भिक समय में भारतीयों तथा कम्पनी के प्रशासनिक उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए कुछ महत्त्वपूर्ण शिक्षण संस्थाएँ स्थापित की गईं।

वर्ष शिक्षण संस्था मुख्य उद्देश्य
1781 कलकत्ता मदरसा मुस्लिम कानून एवं सम्बन्धित अध्ययन को बढ़ावा देना।
1791 बनारस संस्कृत कॉलेज हिन्दू धर्म, कानून और संस्कृत अध्ययन को प्रोत्साहित करना।
1800 फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता कम्पनी के प्रशासनिक कर्मचारियों को भारतीय भाषाओं, कानून एवं इतिहास का ज्ञान देना।
1818 पूना संस्कृत कॉलेज संस्कृत शिक्षा को प्रोत्साहित करना।

कलकत्ता मदरसा एवं बनारस संस्कृत कॉलेज का उद्देश्य

इन संस्थाओं की स्थापना केवल सामान्य शिक्षा के लिए नहीं की गई थी। शासन को ऐसे भारतीयों की आवश्यकता थी जो स्थानीय कानून, परम्पराओं और भाषाओं का ज्ञान रखते हों और प्रशासनिक कार्यों में सहायता कर सकें।

इसी कारण कलकत्ता मदरसा में मुस्लिम कानून तथा बनारस संस्कृत कॉलेज में हिन्दू कानून और संस्कृत सम्बन्धी अध्ययन को विशेष महत्त्व दिया गया।

फोर्ट विलियम कॉलेज का महत्त्व

सन् 1800 में कलकत्ता में स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज मुख्यतः ईस्ट इंडिया कम्पनी के कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए बनाया गया था। यहाँ भारतीय भाषाओं, भारतीय इतिहास तथा हिन्दू और मुस्लिम कानून का अध्ययन कराया जाता था।

इस संस्था ने भारतीय भाषाओं के अध्ययन तथा प्रशासनिक प्रशिक्षण को संगठित स्वरूप देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आधुनिक शिक्षा के आरम्भ का महत्त्व

मिशनरियों और कम्पनी के प्रारम्भिक प्रयासों से भारत की पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था में धीरे-धीरे परिवर्तन शुरू हुआ। विद्यालयों और कॉलेजों की स्थापना के साथ शिक्षा का संस्थागत स्वरूप अधिक व्यवस्थित होने लगा।

यद्यपि इन प्रयासों के पीछे धार्मिक, प्रशासनिक और राजनीतिक उद्देश्य भी थे, फिर भी इनसे भारत में आधुनिक शिक्षा के विकास की प्रारम्भिक भूमि तैयार हुई। आगे चलकर यही प्रक्रिया 1813 के आज्ञा-पत्र तथा ब्रिटिश शिक्षा नीतियों के विकास का आधार बनी।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वैदिक काल में शिक्षा का प्रमुख केन्द्र गुरुकुल था।
  • बौद्ध काल में शिक्षा मठों और विहारों में दी जाती थी तथा पाली भाषा का प्रयोग होता था।
  • मुस्लिम काल में मकतब और मदरसे प्रमुख शिक्षण संस्थाएँ थीं।
  • भारत में आधुनिक शिक्षा के प्रारम्भिक विकास में ईसाई मिशनरियों ने विद्यालय स्थापित करके महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • ईस्ट इंडिया कम्पनी प्रारम्भ में शिक्षा के प्रति उदासीन रही, परन्तु राजनीतिक और प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण बाद में शिक्षा की ओर ध्यान देना पड़ा।
  • ग्रांट ने भारत में विद्यालयों और आधुनिक शिक्षा के प्रसार से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए।
  • 1781 में कलकत्ता मदरसा, 1791 में बनारस संस्कृत कॉलेज और 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना आधुनिक शिक्षा के प्रारम्भिक विकास की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ थीं।
  • इन प्रारम्भिक प्रयासों ने आगे चलकर भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति के विकास के लिए आधार तैयार किया।
Topic 2 1813 का आज्ञा-पत्र एवं प्राच्य-पाश्चात्य विवाद

1813 का आज्ञा-पत्र एवं प्राच्य-पाश्चात्य विवाद

1813 के आज्ञा-पत्र की पृष्ठभूमि

ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत में व्यापार और शासन करने के लिए ब्रिटिश संसद से प्राप्त अधिकारों का समय-समय पर नवीनीकरण किया जाता था। कम्पनी के आज्ञा-पत्र का लगभग प्रत्येक 20 वर्ष के बाद पुनर्नवीनीकरण होता था।

इसी क्रम में सन् 1813 में कम्पनी के अधिकार-पत्र के नवीनीकरण का प्रस्ताव ब्रिटिश संसद के समक्ष रखा गया। इस अवसर पर भारत में शिक्षा के प्रसार और उसके प्रति कम्पनी के उत्तरदायित्व का प्रश्न भी प्रमुख रूप से सामने आया।

विरोध के बावजूद शिक्षा सम्बन्धी प्रावधानों को आज्ञा-पत्र में स्थान मिला। इससे पहली बार भारतीयों की शिक्षा के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी की जिम्मेदारी को स्पष्ट रूप से स्वीकार करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया।

1813 के आज्ञा-पत्र का शैक्षिक प्रावधान

1813 के आज्ञा-पत्र में शिक्षा के लिए यह व्यवस्था की गई कि भारतीय साहित्य के पुनरुद्धार एवं उन्नति, भारतीय विद्वानों को प्रोत्साहित करने तथा ब्रिटिश भारत के निवासियों में विज्ञान के ज्ञान के प्रसार के लिए प्रतिवर्ष निश्चित धनराशि खर्च की जाए।

इसके लिए प्रतिवर्ष कम-से-कम ₹1 लाख की धनराशि निर्धारित की गई। इस धनराशि का उद्देश्य शिक्षा और ज्ञान के प्रसार को प्रोत्साहित करना था।

इस प्रावधान के मुख्य पक्ष
  • भारतीय साहित्य के पुनरुद्धार और विकास को प्रोत्साहित करना।
  • भारतीय विद्वानों को संरक्षण एवं प्रोत्साहन देना।
  • भारतीयों में विज्ञान सम्बन्धी ज्ञान का प्रसार करना।
  • शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष कम-से-कम ₹1 लाख की राशि उपलब्ध कराना।
  • भारतीय शिक्षा को कम्पनी के उत्तरदायित्व से जोड़ना।

धारा 43 का महत्त्व

1813 के आज्ञा-पत्र की धारा 43 भारतीय शिक्षा के इतिहास में विशेष महत्त्व रखती है। इसी धारा में शिक्षा के लिए धनराशि निर्धारित की गई, लेकिन धन के उपयोग और शिक्षा के स्वरूप से सम्बन्धित बातें पूरी तरह स्पष्ट नहीं की गईं।

धारा 43 के कारण मुख्यतः तीन प्रश्न सामने आए—

  1. निर्धारित ₹1 लाख की धनराशि किस प्रकार की शिक्षा पर खर्च की जाए?
  2. भारतीय विद्वान से किन विद्वानों को समझा जाए?
  3. धारा में प्रयुक्त साहित्य शब्द से किस साहित्य का आशय लिया जाए?

इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर न होने के कारण आगे चलकर भारतीय शिक्षा की दिशा को लेकर दो विचारधाराओं के बीच विवाद उत्पन्न हुआ।

प्राच्य-पाश्चात्य विवाद का अर्थ

1813 के आज्ञा-पत्र में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि शिक्षा के लिए निर्धारित धनराशि भारतीय प्राच्य शिक्षा पर खर्च की जाए या पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार पर। इसी मतभेद को भारतीय शिक्षा के इतिहास में प्राच्य-पाश्चात्य विवाद कहा जाता है।

एक पक्ष भारतीय परम्परागत ज्ञान, साहित्य और शिक्षा को महत्त्व देने के पक्ष में था, जबकि दूसरा पक्ष पाश्चात्य ज्ञान और अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार का समर्थन करता था।

प्राच्यवादी विचारधारा

प्राच्यवादी भारतीय परम्परागत शिक्षा और साहित्य के संरक्षण तथा विकास को महत्त्व देते थे। उनका विचार था कि शिक्षा के लिए उपलब्ध धनराशि का उपयोग भारतीय ज्ञान-परम्परा और उससे सम्बन्धित शिक्षण संस्थाओं को प्रोत्साहित करने में किया जाना चाहिए।

इस दृष्टिकोण में भारतीयों को उनकी अपनी सांस्कृतिक एवं शैक्षिक परम्पराओं से जोड़कर शिक्षा देने पर बल था।

पाश्चात्यवादी विचारधारा

पाश्चात्यवादी भारत में पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान और अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देने के पक्ष में थे। उनका मानना था कि आधुनिक ज्ञान और विज्ञान के प्रसार के लिए पाश्चात्य शिक्षा को महत्त्व दिया जाना चाहिए।

इस प्रकार दोनों पक्षों के बीच मुख्य प्रश्न यह था कि भारतीय शिक्षा का विकास परम्परागत प्राच्य ज्ञान के आधार पर किया जाए या पाश्चात्य ज्ञान और शिक्षा को प्रमुख स्थान दिया जाए।

प्राच्य-पाश्चात्य विवाद के प्रमुख कारण

1. ₹1 लाख की राशि के उपयोग का प्रश्न

1813 के आज्ञा-पत्र में शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष ₹1 लाख निर्धारित किया गया था, परन्तु यह स्पष्ट नहीं था कि इसका उपयोग प्राच्य शिक्षा पर किया जाए या पाश्चात्य शिक्षा पर।

2. भारतीय विद्वान की अस्पष्टता

आज्ञा-पत्र में भारतीय विद्वानों को प्रोत्साहित करने की बात कही गई थी, लेकिन यह निर्धारित नहीं किया गया था कि किन प्रकार के विद्वानों को इस श्रेणी में रखा जाएगा।

3. साहित्य शब्द की अस्पष्टता

आज्ञा-पत्र में साहित्य के पुनरुद्धार और उन्नति की बात कही गई थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि साहित्य से आशय परम्परागत भारतीय साहित्य है अथवा पाश्चात्य साहित्य भी इसके अन्तर्गत आएगा।

विवाद की अवधि एवं परिणाम

प्राच्यवादियों और पाश्चात्यवादियों के बीच यह विवाद लम्बे समय तक चलता रहा। शिक्षा के उद्देश्य, भाषा, साहित्य और निर्धारित धनराशि के उपयोग को लेकर दोनों पक्षों में सहमति नहीं बन सकी।

सन् 1834 तक यह मतभेद जारी रहा। अन्ततः सन् 1835 में यह विवाद निर्णायक अवस्था में पहुँचा और इसके समाधान की दिशा में आगे की शिक्षा नीति निर्धारित करने की प्रक्रिया शुरू हुई।

इसके बाद मैकाले के विवरण-पत्र ने इस विवाद को एक निश्चित दिशा दी, जिसका विस्तृत अध्ययन अगले विषय में किया जाएगा।

1813 के आज्ञा-पत्र का शैक्षिक महत्त्व

  1. शिक्षा के प्रति कम्पनी का उत्तरदायित्व— भारतीयों की शिक्षा को ईस्ट इंडिया कम्पनी की जिम्मेदारी से जोड़ने की दिशा में यह महत्त्वपूर्ण कदम था।
  2. शिक्षा के लिए निश्चित धनराशि— पहली बार प्रतिवर्ष कम-से-कम ₹1 लाख शिक्षा एवं ज्ञान के विकास के लिए निर्धारित किया गया।
  3. भारतीय विद्वानों को प्रोत्साहन— आज्ञा-पत्र में भारतीय विद्वानों और साहित्य के विकास की बात स्वीकार की गई।
  4. विज्ञान के प्रसार पर बल— भारतीयों में वैज्ञानिक ज्ञान के प्रसार को शिक्षा के महत्त्वपूर्ण उद्देश्य के रूप में स्थान मिला।
  5. नई शिक्षा नीति की पृष्ठभूमि— धारा 43 की अस्पष्टताओं से उत्पन्न प्राच्य-पाश्चात्य विवाद ने आगे की ब्रिटिश शिक्षा नीति को प्रभावित किया।

1813 के आज्ञा-पत्र और प्राच्य-पाश्चात्य विवाद का सम्बन्ध

1813 का आज्ञा-पत्र एक ओर भारतीय शिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण उपलब्धि था, क्योंकि इसने शिक्षा के लिए आर्थिक व्यवस्था और कम्पनी के उत्तरदायित्व को स्वीकार किया। दूसरी ओर इसकी धारा 43 में शिक्षा के स्वरूप, साहित्य, विद्वानों और धनराशि के उपयोग की स्पष्टता न होने से एक लम्बा वैचारिक विवाद भी उत्पन्न हुआ।

इस प्रकार 1813 का आज्ञा-पत्र भारतीय शिक्षा के इतिहास में इसलिए विशेष महत्त्व रखता है क्योंकि इसी से आगे चलकर यह प्रश्न प्रमुख बना कि भारत की शिक्षा व्यवस्था का आधार प्राच्य परम्परा हो या पाश्चात्य ज्ञान और अंग्रेजी शिक्षा।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • ईस्ट इंडिया कम्पनी के आज्ञा-पत्र का लगभग प्रत्येक 20 वर्ष बाद पुनर्नवीनीकरण किया जाता था।
  • 1813 के आज्ञा-पत्र में भारतीय शिक्षा के प्रति कम्पनी के उत्तरदायित्व को महत्त्व दिया गया।
  • शिक्षा, साहित्य और विज्ञान के प्रसार के लिए प्रतिवर्ष कम-से-कम ₹1 लाख निर्धारित किया गया।
  • धारा 43 में धन के उपयोग, भारतीय विद्वानों और साहित्य शब्द के अर्थ की स्पष्टता नहीं थी।
  • इन्हीं अस्पष्टताओं के कारण प्राच्य-पाश्चात्य विवाद उत्पन्न हुआ।
  • प्राच्यवादी भारतीय परम्परागत ज्ञान एवं साहित्य को महत्त्व देते थे, जबकि पाश्चात्यवादी पश्चिमी ज्ञान और अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के पक्ष में थे।
  • यह विवाद सन् 1834 तक चलता रहा और सन् 1835 में निर्णायक चरण में पहुँचा।
  • 1813 का आज्ञा-पत्र आगे की ब्रिटिश शिक्षा नीतियों और भारतीय आधुनिक शिक्षा के विकास की महत्त्वपूर्ण पृष्ठभूमि बना।
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Topic 3 मैकाले का विवरण-पत्र, 1835—धारा 43 की व्याख्या एवं पाश्चात्य शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

मैकाले का विवरण-पत्र, 1835—धारा 43 की व्याख्या एवं पाश्चात्य शिक्षा सम्बन्धी सुझाव

मैकाले के विवरण-पत्र की पृष्ठभूमि

1813 के आज्ञा-पत्र की धारा 43 में शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये की व्यवस्था की गई थी, परन्तु यह स्पष्ट नहीं था कि इस धनराशि का उपयोग प्राच्य शिक्षा के लिए किया जाए या पाश्चात्य शिक्षा के लिए। इसी कारण प्राच्यवादियों और पाश्चात्यवादियों के बीच लम्बे समय तक विवाद चलता रहा।

इस विवाद को सुलझाने के लिए तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ने लॉर्ड मैकाले को लोक शिक्षा समिति का अध्यक्ष बनाया और उससे धारा 43 से सम्बन्धित विवादित प्रश्नों पर अपना मत देने की अपेक्षा की।

मैकाले भारत में 10 जून 1834 को गवर्नर जनरल की काउन्सिल के कानूनी सदस्य के रूप में नियुक्त हुआ था। वह अंग्रेजी साहित्य तथा पाश्चात्य ज्ञान का समर्थक था और प्राच्य शिक्षा को कम उपयोगी मानता था।

मैकाले ने 1813 के आज्ञा-पत्र की धारा 43 का अध्ययन करने के बाद 2 फरवरी 1835 को अपने विचार एक विस्तृत विवरण-पत्र के रूप में प्रस्तुत किए। यही दस्तावेज मैकाले का विवरण-पत्र, 1835 (Macaulay’s Minutes) कहलाता है।

मैकाले के विवरण-पत्र का मुख्य उद्देश्य

मैकाले का प्रमुख उद्देश्य 1813 के आज्ञा-पत्र से उत्पन्न प्राच्य-पाश्चात्य विवाद को समाप्त करना और यह निर्धारित करना था कि सरकार की शिक्षा सम्बन्धी धनराशि किस प्रकार तथा किस प्रकार की शिक्षा पर व्यय की जाए।

इसके लिए उसने धारा 43 में प्रयुक्त तीन प्रमुख बातों की व्याख्या की—

  1. साहित्य शब्द का अर्थ क्या है?
  2. भारतीय विद्वान किसे माना जाए?
  3. शिक्षा के लिए निर्धारित एक लाख रुपये की राशि किस प्रकार खर्च की जाए?

मैकाले द्वारा धारा 43 की व्याख्या

1. ‘साहित्य’ शब्द से आशय

मैकाले ने धारा 43 में प्रयुक्त ‘साहित्य’ शब्द का अर्थ केवल अरबी और फारसी साहित्य तक सीमित नहीं माना। उसके अनुसार इसमें अंग्रेजी साहित्य को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए।

इस व्याख्या के माध्यम से उसने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि 1813 के आज्ञा-पत्र में अंग्रेजी साहित्य और पाश्चात्य ज्ञान को प्रोत्साहित करने की भी गुंजाइश है।

2. ‘भारतीय विद्वान’ से आशय

मैकाले के अनुसार भारतीय विद्वान का अर्थ केवल प्राच्य ज्ञान—जैसे संस्कृत, अरबी या फारसी के विद्वानों—तक सीमित नहीं होना चाहिए।

उसने कहा कि ऐसे भारतीय भी विद्वान माने जा सकते हैं जो पाश्चात्य दर्शन, साहित्य और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से परिचित हों। इस प्रकार उसने ‘भारतीय विद्वान’ की परिभाषा में पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों को भी शामिल करने का समर्थन किया।

3. एक लाख रुपये की धनराशि के व्यय के सम्बन्ध में

मैकाले ने यह मत प्रस्तुत किया कि शिक्षा के लिए निर्धारित एक लाख रुपये को किस प्रकार खर्च करना है, यह निर्णय कम्पनी के अधिकार क्षेत्र में है। इसलिए कम्पनी उस धनराशि को ऐसी शिक्षा पर व्यय कर सकती है जिसे वह अधिक उपयोगी समझे।

इस व्याख्या का उद्देश्य सरकारी धन को अंग्रेजी एवं पाश्चात्य शिक्षा की ओर मोड़ने का आधार तैयार करना था।

पाश्चात्य शिक्षा के सम्बन्ध में मैकाले का दृष्टिकोण

मैकाले पाश्चात्य साहित्य और आधुनिक यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान का प्रबल समर्थक था। उसका मत था कि भारतीयों को आधुनिक ज्ञान से परिचित कराने के लिए अंग्रेजी भाषा और पाश्चात्य साहित्य को शिक्षा में प्रमुख स्थान दिया जाना चाहिए।

उसके विचार स्पष्ट रूप से औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रभावित थे। इसलिए भारतीय साहित्य, भाषाओं और परम्परागत ज्ञान के सम्बन्ध में उसके अनेक कथन अत्यधिक पक्षपातपूर्ण थे। इन्हें ऐतिहासिक विचार के रूप में समझना चाहिए, न कि वस्तुनिष्ठ सत्य के रूप में।

पाश्चात्य साहित्य एवं अंग्रेजी शिक्षा सम्बन्धी मैकाले के प्रमुख सुझाव

1. अंग्रेजी साहित्य को महत्त्व

मैकाले ने अंग्रेजी साहित्य को अत्यन्त उपयोगी और ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न माना। उसने भारतीयों को अंग्रेजी साहित्य से परिचित कराने पर बल दिया।

2. आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का प्रसार

उसका विचार था कि आधुनिक यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान का विशाल भण्डार अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है। इसलिए भारतीयों को आधुनिक ज्ञान से जोड़ने के लिए अंग्रेजी शिक्षा उपयोगी होगी।

3. अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम बनाना

मैकाले ने उच्च स्तर की शिक्षा के लिए अंग्रेजी भाषा को माध्यम बनाने का समर्थन किया। उसका मत था कि तत्कालीन भारतीय भाषाओं में आधुनिक पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं थी।

4. भारतीय परम्परागत साहित्य के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण

मैकाले ने भारतीय साहित्य तथा ज्ञान-परम्परा का उचित मूल्यांकन नहीं किया। उसने संस्कृत, अरबी तथा अन्य भारतीय ज्ञान-स्रोतों को पाश्चात्य साहित्य की तुलना में कम उपयोगी माना।

उसका यह दृष्टिकोण बाद में उसके विवरण-पत्र की प्रमुख आलोचनाओं में सम्मिलित हुआ।

5. भारतीय इतिहास एवं भूगोल के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टि

मैकाले ने तत्कालीन भारतीय इतिहास और भूगोल सम्बन्धी साहित्य की आलोचना की और इसे आधुनिक शिक्षा के लिए पर्याप्त नहीं माना। इस आधार पर उसने यूरोपीय ज्ञान-सामग्री को अधिक महत्त्व देने की वकालत की।

6. भारतीय चिकित्सा-ज्ञान की आलोचना

उसने भारतीय चिकित्सा साहित्य को भी आधुनिक यूरोपीय चिकित्सा विज्ञान की तुलना में कम उपयोगी माना और आधुनिक पाश्चात्य चिकित्सा-ज्ञान के प्रसार को अधिक महत्त्व दिया।

7. अंग्रेजी भाषा को श्रेष्ठ माध्यम मानना

मैकाले अंग्रेजी भाषा को आधुनिक ज्ञान के प्रसार के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानता था। इसलिए उसने भारतीय विद्यार्थियों को अंग्रेजी भाषा की शिक्षा देने की सिफारिश की।

8. अंग्रेजी शिक्षा के प्रति भारतीयों की रुचि

मैकाले का मत था कि भारतीय समाज के अनेक शिक्षित और उच्च वर्ग के लोग अंग्रेजी भाषा सीखने में रुचि रखते हैं। उसने इस रुचि को अंग्रेजी शिक्षा के विस्तार के पक्ष में एक आधार के रूप में प्रस्तुत किया।

9. प्राच्य शिक्षण संस्थानों पर सरकारी व्यय घटाना

मैकाले ने संस्कृत और अरबी विद्यालयों तथा महाविद्यालयों पर सरकारी धन खर्च करने का विरोध किया। उसका विचार था कि सरकारी धन का अधिक उपयोग अंग्रेजी और आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा के विस्तार में किया जाए।

10. अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय एवं कॉलेज खोलना

उसने ऐसे विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना का समर्थन किया जहाँ विद्यार्थियों को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दी जा सके।

11. उच्च शिक्षा को सीमित वर्ग से आरम्भ करना

मैकाले का मत था कि उपलब्ध सरकारी धन सीमित है, इसलिए प्रारम्भ में उच्च शिक्षा पर धन खर्च करके समाज के एक शिक्षित वर्ग को तैयार किया जाए।

उसकी धारणा थी कि यह शिक्षित वर्ग आगे चलकर अपने सम्पर्क के माध्यम से अन्य लोगों तक ज्ञान पहुँचाएगा। यही विचार आगे चलकर निस्पंदन या छनन सिद्धान्त से जुड़ा, जिसका विस्तृत अध्ययन अगले Topic में किया जाएगा।

मैकाले की शिक्षा योजना का मूल स्वरूप

मैकाले की शिक्षा सम्बन्धी सोच को संक्षेप में तीन मुख्य बिन्दुओं में समझा जा सकता है—

  • माध्यम— उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी भाषा।
  • विषयवस्तु— पाश्चात्य साहित्य, विज्ञान और आधुनिक ज्ञान।
  • प्रारम्भिक लक्ष्य— सीमित सरकारी संसाधनों से पहले उच्च वर्ग के एक शिक्षित समूह को तैयार करना।

भारतीय शिक्षा के इतिहास में विवरण-पत्र का महत्त्व

मैकाले के विवरण-पत्र ने केवल धारा 43 की व्याख्या ही नहीं की, बल्कि ब्रिटिश भारत की आगे की शिक्षा नीति की दिशा भी स्पष्ट कर दी। इसके बाद सरकारी संरक्षण का झुकाव तेजी से अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा की ओर बढ़ा।

इस विवरण-पत्र ने प्राच्य-पाश्चात्य विवाद के समाधान की भूमि तैयार की और शीघ्र ही लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा नई शिक्षा नीति घोषित की गई।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मैकाले भारत में 10 जून 1834 को गवर्नर जनरल की काउन्सिल के कानूनी सदस्य के रूप में आया।
  • लॉर्ड विलियम बैंटिक ने उसे लोक शिक्षा समिति का अध्यक्ष बनाकर प्राच्य-पाश्चात्य विवाद पर मत देने का कार्य सौंपा।
  • मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को अपना प्रसिद्ध विवरण-पत्र प्रस्तुत किया।
  • उसने धारा 43 में प्रयुक्त ‘साहित्य’, ‘भारतीय विद्वान’ और ₹1 लाख की धनराशि की व्याख्या की।
  • मैकाले ने साहित्य के अन्तर्गत अंग्रेजी साहित्य तथा भारतीय विद्वानों की श्रेणी में पाश्चात्य ज्ञान प्राप्त भारतीयों को भी शामिल माना।
  • उसने उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी को माध्यम तथा पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान को प्रमुख विषयवस्तु बनाने का समर्थन किया।
  • उसने प्राच्य शिक्षण संस्थानों पर सरकारी व्यय कम करके अंग्रेजी विद्यालयों एवं कॉलेजों को बढ़ावा देने का सुझाव दिया।
  • मैकाले के विवरण-पत्र ने प्राच्य-पाश्चात्य विवाद को निर्णायक दिशा दी और आगे की ब्रिटिश शिक्षा नीति का आधार तैयार किया।
Topic 4 मैकाले के विवरण-पत्र का मूल्यांकन, प्रभाव एवं निस्पंदन सिद्धान्त

मैकाले के विवरण-पत्र का मूल्यांकन, प्रभाव एवं निस्पंदन सिद्धान्त

मैकाले के विवरण-पत्र का मूल्यांकन

मैकाले के विवरण-पत्र, 1835 ने भारतीय शिक्षा की दिशा को गहराई से प्रभावित किया। इसने प्राच्य-पाश्चात्य विवाद को निर्णायक मोड़ दिया और पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान तथा अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया।

इसके कुछ पक्ष तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन और आधुनिक ज्ञान के प्रसार की दृष्टि से उपयोगी थे, जबकि भारतीय भाषाओं, साहित्य और परम्परागत ज्ञान के प्रति इसके दृष्टिकोण की गंभीर आलोचना भी की गई। इसलिए इसका मूल्यांकन गुण और दोष दोनों आधारों पर किया जाता है।

मैकाले के विवरण-पत्र के गुण

1. प्राच्य-पाश्चात्य विवाद को निर्णायक दिशा

1813 के आज्ञा-पत्र की धारा 43 की अस्पष्टता के कारण शिक्षा की दिशा को लेकर लम्बे समय से विवाद चल रहा था। मैकाले ने अपनी स्पष्ट व्याख्या और तर्कों द्वारा इस विवाद को निर्णय की स्थिति तक पहुँचाया।

2. पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान पर बल

मैकाले ने भारतीयों को आधुनिक पाश्चात्य साहित्य, विज्ञान और विचारों से परिचित कराने पर जोर दिया। इससे भारत में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन को प्रोत्साहन मिला।

3. प्रगतिशील शिक्षा की आवश्यकता पर ध्यान

तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था में परम्परागत साहित्य का प्रभाव अधिक था। मैकाले ने शिक्षा को आधुनिक विषयों और नए ज्ञान से जोड़ने का प्रयास किया, जिससे शिक्षा के स्वरूप में परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हुई।

4. अनुदान प्राप्त संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा पर रोक का सुझाव

उसने सुझाव दिया कि सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त करने वाले विद्यालयों में किसी विशेष धर्म की शिक्षा न दी जाए। यह सुझाव शिक्षा को धार्मिक प्रभाव से अलग रखने की दिशा में महत्त्वपूर्ण माना गया।

मैकाले के विवरण-पत्र के दोष

1. धारा 43 की पक्षपातपूर्ण व्याख्या

मैकाले ने 1813 के आज्ञा-पत्र की धारा 43 की व्याख्या पाश्चात्य शिक्षा के पक्ष में की। यद्यपि उसने अपने तर्कों द्वारा अपनी व्याख्या को उचित सिद्ध करने का प्रयास किया, फिर भी उसका दृष्टिकोण प्राच्य शिक्षा के प्रति निष्पक्ष नहीं माना गया।

2. अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने पर अत्यधिक बल

किसी देश में व्यापक शिक्षा के लिए उसकी मातृभाषाओं और प्रचलित भाषाओं का महत्त्व होता है। मैकाले ने अंग्रेजी को प्रमुख शिक्षा-माध्यम बनाने पर जोर दिया, जिससे बड़ी संख्या में भारतीयों तक शिक्षा पहुँचाना कठिन हो गया।

3. भारतीय साहित्य का अवमूल्यन

मैकाले ने भारतीय साहित्य, दर्शन और ज्ञान-परम्परा का अत्यन्त निम्न मूल्यांकन किया। भारतीय ग्रन्थों और परम्परागत ज्ञान की गहराई को समझे बिना की गई उसकी आलोचना एकपक्षीय मानी गई।

4. एक सीमित शिक्षित वर्ग के निर्माण की नीति

मैकाले व्यापक जनशिक्षा के बजाय पहले सीमित उच्च वर्ग को शिक्षित करने के पक्ष में था। इससे शिक्षा का लाभ प्रारम्भ में समाज के छोटे और अपेक्षाकृत सम्पन्न वर्ग तक सीमित रहने की सम्भावना बढ़ी।

5. भारतीय भाषाओं की उपेक्षा

मैकाले ने भारतीय भाषाओं को आधुनिक ज्ञान के प्रसार के लिए अपर्याप्त माना। इसके परिणामस्वरूप भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा और उनके विकास को अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल सका।

6. उच्च शिक्षा में वर्गीय असमानता की सम्भावना

उच्च शिक्षा को मुख्यतः उच्च वर्ग तक सीमित रखने की नीति से शिक्षा में समान अवसर की भावना कमजोर हुई। इससे शिक्षित उच्च वर्ग और शिक्षा से वंचित निम्न वर्ग के बीच दूरी बढ़ने की स्थिति उत्पन्न हुई।

मैकाले के विवरण-पत्र का प्रभाव

मैकाले के विवरण-पत्र ने भारतीय शिक्षा पर तत्कालीन और दीर्घकालीन दोनों प्रकार के प्रभाव डाले। इसके आधार पर ब्रिटिश सरकार ने अपनी शिक्षा नीति को अंग्रेजी और पाश्चात्य ज्ञान की ओर स्पष्ट रूप से मोड़ दिया।

1. तत्कालीन प्रभाव

अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों और महाविद्यालयों का विकास

मैकाले के सुझावों के बाद अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय और महाविद्यालय अधिक संख्या में खुलने लगे। आगे चलकर यही व्यवस्था औपनिवेशिक भारत की प्रमुख औपचारिक शिक्षा प्रणाली बन गई।

अंग्रेजी का महत्त्व बढ़ना

अंग्रेजी को शासन और शिक्षा में विशेष महत्त्व दिया गया। परिणामस्वरूप अंग्रेजी जानने वाले व्यक्तियों के लिए सरकारी सेवाओं तथा उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ने लगे।

सरकारी नौकरियों में अंग्रेजी-ज्ञान को महत्त्व

सरकारी सेवाओं में अंग्रेजी जानने वाले अभ्यर्थियों को प्राथमिकता मिलने लगी। इससे अंग्रेजी सीखने के प्रति भारतीयों की रुचि और अधिक बढ़ी।

नई शिक्षा नीति का आधार

मैकाले के सुझावों से प्रभावित होकर सरकार ने अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा को बढ़ावा देने वाली नई नीति अपनाई। इस प्रकार उसका विवरण-पत्र सरकारी शिक्षा नीति का आधार बन गया।

2. दीर्घकालीन प्रभाव

पाश्चात्य साहित्य और अंग्रेजी का ज्ञान

भारतीयों को पाश्चात्य साहित्य और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान प्राप्त हुआ। इससे वे आधुनिक विचारों, विज्ञान और विश्व में हो रहे बौद्धिक विकास से परिचित होने लगे।

रूढ़िवादी शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन

तत्कालीन भारतीय शिक्षा मुख्यतः परम्परागत स्वरूप की थी। पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार से आधुनिक विषयों और नवीन विचारों को शिक्षा में स्थान मिलने लगा, जिससे शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन आया।

धार्मिक शिक्षा का प्रभाव सीमित होना

मैकाले धर्म और सामान्य शिक्षा को अलग रखने के पक्ष में था। इसके प्रभाव से सरकारी शिक्षा में धार्मिक शिक्षा का स्थान अपेक्षाकृत सीमित करने की दिशा में प्रयास हुए।

पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति से परिचय

अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से भारतीय विद्यार्थी पाश्चात्य विचारों, साहित्य और संस्कृति से परिचित हुए। इससे भारतीय समाज में नए बौद्धिक विचारों के प्रसार को भी बल मिला।

निस्पंदन या छनन सिद्धान्त

निस्पंदन सिद्धान्त (Filtration Theory) से आशय ऐसी शिक्षा नीति से है जिसमें पहले समाज के उच्च वर्ग के सीमित व्यक्तियों को शिक्षा दी जाए और यह माना जाए कि उनके माध्यम से ज्ञान धीरे-धीरे निम्न वर्गों तक पहुँच जाएगा।

यह विचार ईस्ट इंडिया कम्पनी की उस नीति के अनुकूल था जिसमें कम धन खर्च करके सीमित संख्या में लोगों को उच्च शिक्षा देने का प्रयास किया गया।

सिद्धान्त का मूल विचार

इस सिद्धान्त के अनुसार सरकार को प्रारम्भ में समाज के उन उच्च वर्गों को शिक्षित करना चाहिए जिनके पास अध्ययन के लिए समय और साधन उपलब्ध हों। आगे चलकर इन्हीं शिक्षित व्यक्तियों के सम्पर्क से ज्ञान सामान्य जनता तक पहुँचने की कल्पना की गई।

इस प्रकार शिक्षा को ऊपर के वर्ग से नीचे के वर्ग की ओर छनकर पहुँचने वाली प्रक्रिया माना गया, इसलिए इसे छनन अथवा निस्पंदन सिद्धान्त कहा गया।

निस्पंदन सिद्धान्त की पृष्ठभूमि

इस विचार का प्रयोग मैकाले से पहले भी किया जा चुका था। ईसाई मिशनरियों का विचार था कि यदि समाज के प्रभावशाली उच्च वर्ग के लोग उनके विचारों को स्वीकार करेंगे तो उनके प्रभाव से निम्न वर्ग भी प्रभावित होगा।

सन् 1823 में बम्बई के गवर्नर की काउन्सिल के सदस्य वार्डन ने भी कम व्यक्तियों को अधिक ज्ञान देने को व्यापक स्तर पर थोड़ी शिक्षा देने से अधिक उपयोगी बताया।

सन् 1830 में कम्पनी के संचालकों ने मद्रास के गवर्नर को सलाह दी कि शिक्षा की प्रगति के लिए पहले ऐसे उच्च वर्गीय व्यक्तियों को शिक्षित किया जाए जिनका अपने देशवासियों पर प्रभाव हो।

मैकाले और निस्पंदन सिद्धान्त

सन् 1835 में मैकाले ने अपने विवरण-पत्र में इस सिद्धान्त का समर्थन किया। उसका विचार था कि सरकार के सीमित संसाधनों को पहले ऐसे उच्च वर्ग के व्यक्तियों की शिक्षा पर खर्च किया जाए जो शासकों और सामान्य जनता के बीच मध्यस्थ का कार्य कर सकें।

इस नीति का आधार यह विश्वास था कि उच्च वर्ग के शिक्षित होने के बाद शिक्षा और ज्ञान स्वयं धीरे-धीरे निम्न वर्गों तक पहुँच जाएगा।

निस्पंदन सिद्धान्त की प्रमुख विशेषताएँ

  • पहले उच्च वर्ग को उच्च शिक्षा प्रदान करना।
  • सीमित सरकारी धन का उपयोग कम संख्या के विद्यार्थियों पर करना।
  • शिक्षित उच्च वर्ग को सामान्य जनता तक ज्ञान पहुँचाने का माध्यम मानना।
  • प्रत्यक्ष जनशिक्षा के स्थान पर ऊपर से नीचे की ओर शिक्षा प्रसार की कल्पना करना।

निस्पंदन सिद्धान्त की सीमा

इस सिद्धान्त की सबसे बड़ी सीमा यह थी कि इसमें सामान्य जनता को प्रत्यक्ष रूप से शिक्षा उपलब्ध कराने के स्थान पर यह मान लिया गया कि उच्च वर्ग से शिक्षा स्वतः निम्न वर्ग तक पहुँच जाएगी। व्यवहार में शिक्षा का लाभ लंबे समय तक सीमित वर्ग तक ही केन्द्रित रहा और जनशिक्षा को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी।

समग्र मूल्यांकन

मैकाले के विवरण-पत्र ने भारतीय शिक्षा को आधुनिक पाश्चात्य ज्ञान और अंग्रेजी भाषा से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, परन्तु इसकी नीति व्यापक जनशिक्षा के बजाय सीमित वर्ग की शिक्षा पर केन्द्रित रही। भारतीय भाषाओं और साहित्य की उपेक्षा तथा उच्च वर्ग को प्राथमिकता देना इसकी प्रमुख कमजोरियाँ थीं।

इस प्रकार मैकाले की शिक्षा नीति ने भारत की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला, किन्तु इसके साथ शिक्षा में भाषा, वर्ग और सांस्कृतिक असमानता से जुड़ी अनेक समस्याएँ भी उत्पन्न हुईं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मैकाले के विवरण-पत्र ने प्राच्य-पाश्चात्य विवाद को निर्णायक दिशा दी और पाश्चात्य शिक्षा के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।
  • इसके प्रमुख गुणों में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, प्रगतिशील शिक्षा और धार्मिक शिक्षा को सीमित करने पर बल शामिल था।
  • इसके प्रमुख दोष थे—अंग्रेजी को अत्यधिक महत्त्व, भारतीय साहित्य एवं भाषाओं की उपेक्षा और उच्च वर्ग केन्द्रित शिक्षा।
  • इसके तत्कालीन प्रभाव से अंग्रेजी विद्यालयों और महाविद्यालयों का विकास हुआ तथा सरकारी सेवाओं में अंग्रेजी-ज्ञान का महत्त्व बढ़ा।
  • दीर्घकाल में भारतीयों को पाश्चात्य साहित्य, विज्ञान और आधुनिक विचारों से परिचय मिला।
  • निस्पंदन सिद्धान्त में पहले उच्च वर्ग को शिक्षित करके उसके माध्यम से शिक्षा को निम्न वर्ग तक पहुँचाने की कल्पना की गई।
  • मैकाले ने सन् 1835 में इस सिद्धान्त का समर्थन किया।
  • इस सिद्धान्त की प्रमुख सीमा यह थी कि व्यापक जनशिक्षा के बजाय शिक्षा का लाभ प्रारम्भ में सीमित वर्ग तक केन्द्रित रहा।
Topic 5 बैंटिक की शिक्षा नीति (1835) एवं ऑकलैंड का विवरण-पत्र (1839)

बैंटिक की शिक्षा नीति (1835) एवं ऑकलैंड का विवरण-पत्र (1839)

बैंटिक की शिक्षा नीति, 1835

1813 के आज्ञा-पत्र की धारा 43 के कारण प्राच्य और पाश्चात्य शिक्षा के समर्थकों के बीच लम्बे समय से विवाद चल रहा था। इस विवाद पर निर्णय देने के लिए मैकाले ने अपना विवरण-पत्र प्रस्तुत किया, जो गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक को 2 फरवरी 1835 को प्राप्त हुआ।

बैंटिक ने मैकाले के विचारों का अध्ययन किया और उन्हें स्वीकार करते हुए 7 मार्च 1835 को ब्रिटिश सरकार की नई शिक्षा नीति घोषित कर दी। इस नीति ने भारत में अंग्रेजी एवं पाश्चात्य शिक्षा को सरकारी संरक्षण प्रदान किया।

बैंटिक की शिक्षा नीति की प्रमुख बातें

1. अंग्रेजी शिक्षा पर सरकारी धन का व्यय

बैंटिक की नीति के अनुसार शिक्षा के लिए उपलब्ध सरकारी धन का सर्वोत्तम उपयोग अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार में किया जाना था। इससे सरकारी शिक्षा नीति का झुकाव स्पष्ट रूप से पाश्चात्य शिक्षा की ओर हो गया।

2. जनशिक्षा के स्थान पर सीमित वर्ग की शिक्षा

सरकारी धन सीमित होने के कारण तत्काल व्यापक जनशिक्षा की व्यवस्था करने के बजाय पहले समाज के सीमित और प्रभावशाली वर्ग को शिक्षित करने की नीति अपनाई गई।

इसके पीछे यह धारणा थी कि शिक्षित उच्च वर्ग आगे चलकर अन्य लोगों तक शिक्षा और ज्ञान पहुँचाने में सहायता करेगा।

3. प्राच्य शिक्षा पर सरकारी व्यय में कमी

नीति के अनुसार संस्कृत, अरबी तथा अन्य प्राच्य साहित्य के संरक्षण और विकास पर नए सरकारी व्यय को प्राथमिकता नहीं दी गई। उपलब्ध धन का मुख्य उपयोग अंग्रेजी तथा पाश्चात्य ज्ञान के प्रसार के लिए किया जाने लगा।

4. अंग्रेजी शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन

बैंटिक की घोषणा से अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा को सरकारी समर्थन मिला। इसके परिणामस्वरूप अंग्रेजी विद्यालयों और पाश्चात्य शिक्षा के विस्तार की गति तेज हुई।

बैंटिक की शिक्षा नीति का महत्त्व

  • सरकार ने पहली बार स्पष्ट रूप से अंग्रेजी एवं पाश्चात्य शिक्षा को प्राथमिकता दी।
  • मैकाले के विवरण-पत्र को सरकारी नीति का व्यावहारिक रूप मिला।
  • 1813 के आज्ञा-पत्र की धारा 43 से उत्पन्न विवाद को तत्कालीन स्तर पर समाप्त करने का प्रयास हुआ।
  • भारत में अंग्रेजी शिक्षा के तेजी से विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ।

बैंटिक की नीति घोषित होने के केवल कुछ दिनों बाद वह 20 मार्च 1835 को इंग्लैंड लौट गया। उसके जाने के बाद प्राच्य शिक्षा के समर्थकों ने पुनः अपना विरोध आरम्भ कर दिया। अतः प्राच्य-पाश्चात्य विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया।

लॉर्ड ऑकलैंड और प्राच्य-पाश्चात्य विवाद

लॉर्ड बैंटिक के बाद लॉर्ड ऑकलैंड भारत का गवर्नर जनरल बना। उसने प्राच्य और पाश्चात्य शिक्षा के विवाद का कई वर्षों तक अध्ययन किया और यह पाया कि प्राच्य शिक्षा को पर्याप्त आर्थिक सहायता न मिलना इस विवाद का एक प्रमुख कारण था।

दोनों पक्षों के बीच संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से ऑकलैंड ने 24 नवम्बर 1839 को अपना विवरण-पत्र जारी किया। इसमें प्राच्य शिक्षा को सहायता देने के साथ अंग्रेजी शिक्षा को भी जारी रखने की व्यवस्था की गई।

ऑकलैंड के विवरण-पत्र, 1839 की प्रमुख व्यवस्थाएँ

1. प्राच्य विद्यालयों को आर्थिक सहायता

ऑकलैंड ने देशी एवं प्राच्य विद्यालयों को पूर्ववत् चलने देने और उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान करने का समर्थन किया। उसने यह भी कहा कि इन विद्यालयों को अंग्रेजी विद्यालयों से पहले आवश्यक सहायता दी जाए।

2. विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति

प्राच्य विद्यालयों में अध्ययन करने वाले लगभग एक-चौथाई अर्थात 25 प्रतिशत विद्यार्थियों को उनकी आर्थिक स्थिति और आवश्यकता के आधार पर छात्रवृत्ति देने की व्यवस्था का सुझाव दिया गया।

3. योग्य शिक्षकों को प्रोत्साहन

शिक्षण कार्य में योग्य और निष्ठावान व्यक्तियों को आकर्षित करने के लिए उन्हें पर्याप्त वेतन देने पर बल दिया गया। इसका उद्देश्य प्राच्य विद्यालयों में शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करना था।

4. अंग्रेजी पढ़ने की सुविधा

प्राच्य विद्यालयों के विद्यार्थियों को अपने मुख्य अध्ययन के साथ अंग्रेजी सीखने का अवसर भी प्रदान किया गया। आवश्यक प्राच्य विषयों का अध्ययन पूरा करने के बाद अंग्रेजी की कक्षाएँ खोली जा सकती थीं।

5. प्राच्य साहित्य के प्रकाशन हेतु धन

प्राच्य साहित्य और उपयोगी पाठ्यपुस्तकों के प्रकाशन के लिए अतिरिक्त धन देने की व्यवस्था की गई। इसके लिए लगभग ₹31,000 की अतिरिक्त राशि उपलब्ध कराने की घोषणा की गई।

इस धन का उपयोग उपयोगी प्राच्य पुस्तकों के मुद्रण और प्रकाशन के लिए किया जाना था, जिससे भारतीय साहित्य एवं परम्परागत शिक्षा को भी संरक्षण मिल सके।

6. देशी विद्यालयों में अंग्रेजी कक्षाओं की अनुमति

जो देशी विद्यालय अंग्रेजी पढ़ाने में सक्षम थे, उन्हें अंग्रेजी की कक्षाएँ प्रारम्भ करने की अनुमति दी गई। इस प्रकार ऑकलैंड ने प्राच्य और अंग्रेजी शिक्षा को पूर्णतः एक-दूसरे के विरोध में रखने के बजाय दोनों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया।

दोनों पक्षों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास

ऑकलैंड ने केवल प्राच्यवादियों को ही संतुष्ट नहीं किया। उसने पाश्चात्य साहित्य और आधुनिक विज्ञान के विकास के लिए भी पर्याप्त सरकारी सहायता जारी रखी। इस प्रकार उसकी नीति में प्राच्य शिक्षा को संरक्षण तथा अंग्रेजी-पाश्चात्य शिक्षा को विकास—दोनों के लिए स्थान था।

इसी समझौता-आधारित नीति के कारण 1813 से चला आ रहा प्राच्य-पाश्चात्य विवाद काफी हद तक समाप्त हो गया।

ऑकलैंड की नीति का प्रभाव

1. प्राच्यवादियों को संतोष

प्राच्य विद्यालयों के लिए आर्थिक सहायता, छात्रवृत्तियाँ और पुस्तकों के प्रकाशन हेतु धन मिलने से प्राच्य शिक्षा के समर्थकों की प्रमुख माँगों को स्वीकार किया गया।

2. अंग्रेजी शिक्षा का विकास जारी रहा

यद्यपि प्राच्य शिक्षा को सहायता मिली, फिर भी ऑकलैंड ने अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी साहित्य और अंग्रेजी विद्यालयों के विकास में अधिक रुचि दिखाई। परिणामस्वरूप अंग्रेजी शिक्षा का विस्तार तेजी से जारी रहा।

3. प्राच्य-पाश्चात्य विवाद का अन्त

दोनों शिक्षा-पद्धतियों को सहायता देने की नीति ने लम्बे समय से चल रहे विवाद को शांत किया। इस कारण ऑकलैंड का विवरण-पत्र भारतीय शिक्षा के इतिहास में महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

4. प्राच्य शिक्षा का अपेक्षित विकास न होना

प्राच्य शिक्षा को आर्थिक सहायता अवश्य मिली, परन्तु अंग्रेजी शिक्षा की तुलना में उसका विस्तार अपेक्षित स्तर तक नहीं हो सका। परिणामस्वरूप भारतीय भाषाओं और परम्परागत साहित्य के विकास को सीमित अवसर मिले।

बैंटिक और ऑकलैंड की नीतियों में अन्तर

बैंटिक की नीति, 1835 ऑकलैंड की नीति, 1839
अंग्रेजी एवं पाश्चात्य शिक्षा को स्पष्ट प्राथमिकता दी गई। प्राच्य और पाश्चात्य दोनों शिक्षा-पद्धतियों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया।
सरकारी धन को मुख्यतः अंग्रेजी शिक्षा पर खर्च करने की नीति अपनाई गई। प्राच्य विद्यालयों, विद्यार्थियों और साहित्य को भी आर्थिक सहायता दी गई।
प्राच्य शिक्षा का सरकारी संरक्षण कमजोर हुआ। प्राच्य शिक्षा को पुनः सहायता दी गई, पर अंग्रेजी शिक्षा भी जारी रही।
विवाद को तत्काल दबाया गया, पर वह फिर उभर गया। समझौते की नीति द्वारा विवाद को काफी हद तक समाप्त किया गया।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • लॉर्ड बैंटिक को मैकाले का विवरण-पत्र 2 फरवरी 1835 को प्राप्त हुआ।
  • बैंटिक ने 7 मार्च 1835 को नई शिक्षा नीति घोषित कर अंग्रेजी एवं पाश्चात्य शिक्षा को सरकारी संरक्षण दिया।
  • इस नीति में शिक्षा की सरकारी धनराशि को मुख्यतः अंग्रेजी शिक्षा पर व्यय करने पर बल दिया गया।
  • बैंटिक के इंग्लैंड लौटने के बाद प्राच्य-पाश्चात्य विवाद पुनः प्रारम्भ हो गया।
  • लॉर्ड ऑकलैंड ने 24 नवम्बर 1839 को अपना विवरण-पत्र जारी कर दोनों पक्षों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया।
  • ऑकलैंड ने प्राच्य विद्यालयों को आर्थिक सहायता, लगभग 25% विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति, योग्य शिक्षकों को प्रोत्साहन तथा प्राच्य साहित्य के प्रकाशन हेतु लगभग ₹31,000 अतिरिक्त धन देने की व्यवस्था की।
  • प्राच्य विद्यालयों में आवश्यकता के अनुसार अंग्रेजी कक्षाएँ चलाने की भी अनुमति दी गई।
  • ऑकलैंड की समन्वयकारी नीति से 1813 से चला आ रहा प्राच्य-पाश्चात्य विवाद काफी हद तक समाप्त हुआ।
Topic 6 वुड का घोषणा-पत्र, 1854—पृष्ठभूमि, कारण एवं प्रमुख सिफारिशें

वुड का घोषणा-पत्र, 1854—पृष्ठभूमि, कारण एवं प्रमुख सिफारिशें

वुड का घोषणा-पत्र, 1854

सन् 1853 तक भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव काफी बढ़ चुका था। मैकाले के विवरण-पत्र और बैंटिक की शिक्षा नीति के बाद पाश्चात्य शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन मिला, लेकिन भारतीय शिक्षा के संगठन, जनशिक्षा, शिक्षक-प्रशिक्षण, स्त्री-शिक्षा और विभिन्न स्तरों की शिक्षा को व्यवस्थित करने के लिए अभी भी एक व्यापक नीति की आवश्यकता थी।

ईस्ट इंडिया कम्पनी के आज्ञा-पत्र के नवीनीकरण के समय ब्रिटिश संसद ने भारतीय शिक्षा की स्थिति का अध्ययन करने की आवश्यकता अनुभव की। इसके लिए भारतीय शिक्षा की तत्कालीन दशा का विस्तृत अध्ययन किया गया और प्राप्त सुझावों के आधार पर 19 जुलाई 1854 को एक नई शिक्षा नीति घोषित की गई।

उस समय सर चार्ल्स वुड बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष थे। इसलिए यह शिक्षा सम्बन्धी दस्तावेज वुड का घोषणा-पत्र (Wood’s Despatch), 1854 कहलाया। इसमें लगभग 100 अनुच्छेद थे और भारतीय शिक्षा के लगभग सभी प्रमुख पक्षों पर सुझाव दिए गए थे।

इसके व्यापक स्वरूप और भारतीय शिक्षा के संगठन में इसके महत्त्व के कारण इसे प्रायः “भारतीय शिक्षा का महाधिकार-पत्र” (Magna Carta of Indian Education) कहा जाता है।

वुड के घोषणा-पत्र की आवश्यकता के कारण

इस घोषणा-पत्र के प्रकाशन के पीछे तत्कालीन भारतीय शिक्षा की अनेक आवश्यकताएँ और समस्याएँ थीं। प्रमुख कारण निम्नलिखित थे—

  1. अंग्रेजी शिक्षा की बढ़ती माँग— भारतीय समाज में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा लगातार बढ़ रही थी, इसलिए इसकी उचित व्यवस्था आवश्यक हो गई थी।
  2. शिक्षा संस्थाओं की गुणवत्ता में सुधार— उपलब्ध विद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थाओं की व्यवस्था तथा गुणवत्ता को बेहतर बनाने की आवश्यकता थी।
  3. पाठ्यक्रम और शिक्षा-स्तर का उन्नयन— शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम तथा शैक्षिक स्तर को अधिक उपयोगी और व्यवस्थित बनाना आवश्यक था।
  4. स्थायी शिक्षा नीति की आवश्यकता— ब्रिटिश शासन के विस्तार के साथ शिक्षा के लिए एक दीर्घकालीन और संगठित नीति की आवश्यकता महसूस हुई।
  5. अधिक भारतीयों तक शिक्षा पहुँचाना— शिक्षा को केवल सीमित वर्ग तक रखने के बजाय अधिक लोगों तक पहुँचाने की आवश्यकता थी।
  6. जनशिक्षा को प्रोत्साहन— निस्पंदन सिद्धान्त के कारण व्यापक जनता तक शिक्षा अपेक्षित रूप से नहीं पहुँच पाई थी। इसलिए जनशिक्षा को बढ़ावा देना आवश्यक था।
  7. स्त्री एवं मुस्लिम शिक्षा की स्थिति सुधारना— इन वर्गों में शिक्षा का प्रसार अपेक्षाकृत कम था, इसलिए इनके लिए विशेष शैक्षिक प्रयासों की आवश्यकता थी।
  8. शिक्षा की विभिन्न समस्याओं का समाधान— प्राथमिक से उच्च स्तर तक शिक्षा के संगठन, प्रशासन और विकास से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक नीति अपेक्षित थी।

वुड के घोषणा-पत्र की प्रमुख सिफारिशें

1. शिक्षा का उत्तरदायित्व सरकार का

घोषणा-पत्र में स्पष्ट किया गया कि भारत में शिक्षा की व्यवस्था करना सरकार का महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व है। शिक्षा को केवल निजी या धार्मिक संस्थाओं पर निर्भर रखने के स्थान पर सरकार की सक्रिय भूमिका को स्वीकार किया गया।

2. शिक्षा के निश्चित उद्देश्य

शिक्षा का उद्देश्य भारतीयों के नैतिक और बौद्धिक स्तर को ऊँचा उठाना तथा ऐसे योग्य व्यक्तियों का निर्माण करना था जो प्रशासनिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर सकें।

3. जनशिक्षा विभाग की स्थापना

प्रत्येक प्रान्त में एक पृथक जनशिक्षा विभाग स्थापित करने की सिफारिश की गई। इसकी सहायता के लिए शिक्षा संचालक, निरीक्षक तथा अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की व्यवस्था प्रस्तावित की गई।

इसका उद्देश्य शिक्षा प्रशासन को नियमित, संगठित और उत्तरदायी बनाना था।

4. शिक्षा का क्रमबद्ध संगठन

वुड के घोषणा-पत्र ने शिक्षा व्यवस्था को विभिन्न स्तरों में संगठित करने पर बल दिया। शिक्षा का क्रम इस प्रकार रखा गया—

  1. प्राथमिक विद्यालय
  2. मिडिल स्कूल
  3. हाईस्कूल
  4. कॉलेज
  5. विश्वविद्यालय

इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रत्येक स्तर को अगले स्तर से जोड़ते हुए सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली को क्रमबद्ध बनाना था।

5. क्रमबद्ध विद्यालयों की स्थापना

देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग स्तरों के विद्यालयों की स्थापना का सुझाव दिया गया, ताकि विद्यार्थी प्राथमिक स्तर से आगे बढ़ते हुए उच्च शिक्षा तक पहुँच सकें।

6. सहायता-अनुदान प्रणाली

योग्य शिक्षण संस्थाओं को सरकारी सहायता-अनुदान (Grant-in-Aid) देने की सिफारिश की गई। इस सहायता का उपयोग शिक्षकों के वेतन, छात्रवृत्ति, भवन, पुस्तकालय तथा प्रयोगशालाओं आदि के विकास में किया जा सकता था।

अनुदान देते समय अनुचित भेदभाव न करने तथा संस्थाओं की आवश्यकताओं के आधार पर सहायता देने पर बल दिया गया।

7. पाठ्यक्रम में भारतीय और पाश्चात्य ज्ञान

घोषणा-पत्र में भारतीय भाषाओं को शिक्षा में स्थान देने और उनके विकास को प्रोत्साहित करने की बात कही गई। साथ ही विद्यार्थियों को आधुनिक पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराने की भी आवश्यकता बताई गई।

8. शिक्षा का माध्यम

प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के लिए देशी या प्रान्तीय भाषाओं को उपयुक्त माना गया, जबकि उच्च शिक्षा में अंग्रेजी को महत्त्व दिया गया।

इस प्रकार प्राथमिक शिक्षा को स्थानीय भाषाओं से जोड़ने और उच्च शिक्षा को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की उपलब्ध सामग्री से सम्बद्ध करने का प्रयास किया गया।

9. शिक्षकों की आर्थिक स्थिति में सुधार

घोषणा-पत्र में शिक्षकों की स्थिति को शिक्षा की गुणवत्ता से जोड़ा गया। इसलिए योग्य शिक्षकों को आकर्षित करने के लिए उनके वेतन और भत्तों में सुधार की आवश्यकता बताई गई।

10. गरीब विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता

आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को शिक्षा से वंचित न होना पड़े, इसलिए उन्हें छात्रवृत्ति तथा अन्य आर्थिक सहायता देने का सुझाव दिया गया।

11. शिक्षक-प्रशिक्षण की व्यवस्था

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रशिक्षित अध्यापकों की आवश्यकता को स्वीकार किया गया। इसलिए शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थाओं की स्थापना और शिक्षकों के प्रशिक्षण की उचित व्यवस्था करने पर बल दिया गया।

12. विश्वविद्यालयों की स्थापना

भारत में उच्च शिक्षा को व्यवस्थित करने के लिए विश्वविद्यालय स्थापित करने की सिफारिश की गई। विश्वविद्यालयों के प्रमुख कार्यों में महाविद्यालयों को मान्यता देना, विद्यार्थियों की परीक्षा लेना तथा सफल विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र प्रदान करना शामिल था।

13. सभी वर्गों के लिए शिक्षा

केवल उच्च वर्ग को शिक्षित करके शिक्षा को नीचे के वर्गों तक पहुँचाने वाली निस्पंदन नीति को पर्याप्त नहीं माना गया। घोषणा-पत्र में शिक्षा को समाज के अधिकाधिक वर्गों तक पहुँचाने तथा प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया गया।

14. स्त्री-शिक्षा को प्रोत्साहन

वुड के घोषणा-पत्र में स्त्री-शिक्षा के महत्त्व को स्वीकार किया गया। बालिका विद्यालयों तथा स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा देने वाली संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करने की सिफारिश की गई।

15. मुस्लिम शिक्षा पर ध्यान

मुस्लिम समुदाय में शिक्षा की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति को देखते हुए उनके लिए शैक्षिक सुविधाएँ बढ़ाने और अभिभावकों को बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक करने पर बल दिया गया।

16. व्यावसायिक शिक्षा

घोषणा-पत्र में शिक्षा को आजीविका से जोड़ने के लिए व्यावसायिक शिक्षा के विकास पर भी बल दिया गया। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को शिक्षा के बाद अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार व्यवसाय चुनने में सक्षम बनाना था।

वुड के घोषणा-पत्र की विशेष दिशा

मैकाले की नीति में मुख्य बल उच्च वर्ग की शिक्षा पर था, जबकि वुड के घोषणा-पत्र में शिक्षा को अधिक व्यापक रूप से संगठित करने का प्रयास किया गया। प्राथमिक शिक्षा, स्त्री-शिक्षा, शिक्षक-प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता तथा विभिन्न स्तरों के विद्यालयों की व्यवस्था पर बल देकर शिक्षा को अधिक लोगों तक पहुँचाने की दिशा अपनाई गई।

इस प्रकार वुड का घोषणा-पत्र भारतीय शिक्षा के लिए एक व्यापक नीति प्रस्तुत करता है, जिसमें शिक्षा के प्रशासन से लेकर विद्यालयी संगठन, भाषा, शिक्षकों, विद्यार्थियों और उच्च शिक्षा तक अनेक पक्षों को एक साथ व्यवस्थित करने का प्रयास दिखाई देता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वुड का घोषणा-पत्र 19 जुलाई 1854 को जारी किया गया।
  • उस समय सर चार्ल्स वुड बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष थे।
  • यह लगभग 100 अनुच्छेदों वाला विस्तृत शिक्षा दस्तावेज था और इसे “भारतीय शिक्षा का महाधिकार-पत्र” कहा गया।
  • इसमें प्रत्येक प्रान्त में जनशिक्षा विभाग स्थापित करने की सिफारिश की गई।
  • शिक्षा को प्राथमिक विद्यालय → मिडिल स्कूल → हाईस्कूल → कॉलेज → विश्वविद्यालय के क्रम में संगठित करने की व्यवस्था प्रस्तुत की गई।
  • शिक्षण संस्थाओं के लिए सहायता-अनुदान प्रणाली का सुझाव दिया गया।
  • प्राथमिक स्तर पर देशी भाषाओं और उच्च स्तर पर अंग्रेजी को महत्त्व दिया गया।
  • शिक्षक-प्रशिक्षण, शिक्षकों की आर्थिक स्थिति, गरीब विद्यार्थियों की सहायता और विश्वविद्यालयों की स्थापना पर बल दिया गया।
  • स्त्री-शिक्षा, मुस्लिम शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा के विकास को भी महत्त्व दिया गया।
  • वुड के घोषणा-पत्र ने सीमित वर्ग की शिक्षा के स्थान पर शिक्षा को अधिक व्यापक एवं संगठित रूप देने की दिशा प्रस्तुत की।
Topic 7 वुड के घोषणा-पत्र का मूल्यांकन, आलोचनात्मक विचार एवं भारतीय शिक्षा पर प्रभाव

वुड के घोषणा-पत्र का मूल्यांकन, आलोचनात्मक विचार एवं भारतीय शिक्षा पर प्रभाव

वुड के घोषणा-पत्र का मूल्यांकन

वुड का घोषणा-पत्र, 1854 भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। इसने शिक्षा को केवल उच्च वर्ग तक सीमित रखने के बजाय प्राथमिक शिक्षा से विश्वविद्यालय स्तर तक एक व्यवस्थित ढाँचा देने का प्रयास किया।

इसके माध्यम से शिक्षा प्रशासन, जनशिक्षा, सहायता-अनुदान, शिक्षक-प्रशिक्षण, स्त्री-शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा और विश्वविद्यालयों की स्थापना जैसे अनेक पक्षों को एक साथ महत्त्व दिया गया। फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ भी थीं। इसलिए इसका मूल्यांकन गुण और दोष दोनों के आधार पर किया जाता है।

वुड के घोषणा-पत्र के प्रमुख गुण

1. शिक्षा का उत्तरदायित्व राज्य पर

इस घोषणा-पत्र का एक प्रमुख गुण यह था कि इसमें शिक्षा की व्यवस्था को सरकार का उत्तरदायित्व माना गया। इससे शिक्षा को अधिक संगठित और प्रशासनिक आधार प्राप्त हुआ।

2. शिक्षा के उद्देश्य स्पष्ट किए गए

भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों को निश्चित करने का प्रयास किया गया। इससे शिक्षा को केवल परम्परागत अध्ययन तक सीमित न रखकर उसके बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक पक्षों पर भी ध्यान दिया गया।

3. जनशिक्षा विभाग की स्थापना

प्रान्तों में अलग शिक्षा विभाग स्थापित करने की व्यवस्था ने शिक्षा प्रशासन को अधिक व्यवस्थित बनाया। इससे शिक्षा की देखरेख, निरीक्षण और विकास के लिए एक निश्चित प्रशासनिक ढाँचा तैयार हुआ।

4. गरीब विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता

आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति और अन्य सहायता देने की व्यवस्था की गई। इससे शिक्षा के अवसरों को अपेक्षाकृत अधिक व्यापक बनाने का प्रयास हुआ।

5. शिक्षा का क्रमबद्ध संगठन

प्राथमिक, मिडिल, हाईस्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर को क्रमबद्ध रूप से व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया। इससे भारतीय शिक्षा को एक स्पष्ट संस्थागत ढाँचा प्राप्त हुआ।

6. व्यावसायिक शिक्षा को प्रोत्साहन

शिक्षा को आजीविका से जोड़ने के लिए व्यावसायिक शिक्षा के विकास पर बल दिया गया। इससे विद्यार्थियों को केवल पुस्तकीय ज्ञान के बजाय कार्य और रोजगार से सम्बन्धित शिक्षा देने की दिशा विकसित हुई।

7. स्त्री-शिक्षा को महत्त्व

बालिका शिक्षा और स्त्री-शिक्षा के विकास को आवश्यक माना गया। इस उद्देश्य से बालिका विद्यालयों तथा स्त्री-शिक्षा के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं को प्रोत्साहन देने की व्यवस्था की गई।

8. विश्वविद्यालयों की स्थापना का आधार

घोषणा-पत्र में विश्वविद्यालय स्थापित करने की सिफारिश की गई। इससे उच्च शिक्षा को व्यवस्थित रूप मिला और आगे चलकर कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास में विश्वविद्यालय स्थापित हुए।

9. शिक्षक-प्रशिक्षण को महत्त्व

शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए प्रशिक्षित अध्यापकों की आवश्यकता स्वीकार की गई। इससे शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थाओं के विकास को प्रोत्साहन मिला।

10. मुस्लिम शिक्षा पर ध्यान

मुस्लिम समुदाय में शिक्षा की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति को ध्यान में रखकर उनके लिए शैक्षिक सुविधाएँ बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई।

11. निस्पंदन सिद्धान्त से व्यापक शिक्षा की ओर

मैकाले की नीति में पहले उच्च वर्ग को शिक्षित करने पर अधिक बल था। वुड के घोषणा-पत्र में इस सीमित दृष्टिकोण के स्थान पर अधिक व्यापक जनशिक्षा की दिशा अपनाई गई।

वुड के घोषणा-पत्र के प्रमुख दोष

1. प्राच्य साहित्य की उपेक्षा

यद्यपि घोषणा-पत्र में भारतीय भाषाओं को स्थान देने की बात कही गई, फिर भी व्यवहार में प्राच्य साहित्य और भारतीय ज्ञान-परम्परा को अपेक्षित महत्त्व नहीं मिल सका।

2. स्वतंत्र भारतीय शिक्षा-व्यवस्था का पर्याप्त विकास नहीं

शिक्षा का उत्तरदायित्व कम्पनी के अधीन ही रखा गया। इसके कारण भारतीय परम्परागत शिक्षण संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से विकसित होने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।

3. उच्च शिक्षा में अंग्रेजी का प्रभुत्व

प्राथमिक स्तर पर भारतीय भाषाओं का समर्थन किया गया, लेकिन उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी को प्रमुख माध्यम बनाया गया। इससे उच्च शिक्षा में अंग्रेजी का प्रभाव लगातार बढ़ता गया।

4. पाठ्यक्रम में पाश्चात्य ज्ञान को अधिक महत्त्व

पाठ्यक्रम में पाश्चात्य साहित्य और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को विशेष स्थान मिला। इसके कारण भारतीय साहित्य और ज्ञान-परम्परा को अपेक्षित समान महत्त्व प्राप्त नहीं हुआ।

5. धार्मिक शिक्षा के सम्बन्ध में स्पष्ट नीति का अभाव

धार्मिक शिक्षा के विषय में घोषणा-पत्र की नीति पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी। एक ओर सरकारी संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा को सीमित करने की प्रवृत्ति थी, जबकि दूसरी ओर कुछ मिशनरी संस्थाओं को धार्मिक शिक्षा जारी रखने का अवसर मिलता रहा।

वुड के घोषणा-पत्र पर आलोचनात्मक विचार

वुड के घोषणा-पत्र के सम्बन्ध में विद्वानों ने समर्थन और विरोध दोनों प्रकार के विचार व्यक्त किए। समर्थकों ने इसे भारतीय शिक्षा की आधुनिक व्यवस्था का आधार माना, जबकि आलोचकों ने इसकी औपनिवेशिक सीमाओं और भारतीय परम्परा की उपेक्षा की ओर ध्यान दिलाया।

पक्ष में प्रमुख विचार
  • इस घोषणा-पत्र ने भारतीय शिक्षा को पहली बार एक व्यापक और व्यवस्थित योजना प्रदान की।
  • शिक्षा के विभिन्न स्तरों, प्रशासन, अनुदान, शिक्षक-प्रशिक्षण और विश्वविद्यालयों के लिए एक स्पष्ट संरचना प्रस्तुत की गई।
  • इसके माध्यम से आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली की आधारभूमि तैयार हुई।
  • कुछ विद्वानों ने इसे भारतीय शिक्षा के विकास के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दस्तावेज माना।
विपक्ष में प्रमुख विचार
  • आलोचकों के अनुसार इस नीति में भारतीय शिक्षा की प्राचीन परम्पराओं और सामाजिक परिस्थितियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
  • शिक्षा का उद्देश्य कहीं-कहीं औपनिवेशिक शासन की प्रशासनिक आवश्यकताओं से अधिक प्रभावित दिखाई देता है।
  • अंग्रेजी और पाश्चात्य ज्ञान को अधिक महत्त्व मिलने से भारतीय भाषाओं और साहित्य के विकास को अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिला।
  • व्यापक जनशिक्षा की घोषणा के बावजूद तत्कालीन परिस्थितियों में शिक्षा सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँच सकी।

वुड के घोषणा-पत्र का भारतीय शिक्षा पर प्रभाव

वुड के घोषणा-पत्र का भारतीय शिक्षा पर तत्कालीन और दीर्घकालीन दोनों प्रकार का प्रभाव पड़ा। इसके बाद शिक्षा का प्रशासन अधिक संगठित हुआ और विद्यालयों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों की संख्या में वृद्धि होने लगी।

1. तत्कालीन प्रभाव

शिक्षा विभागों की स्थापना

घोषणा-पत्र के सुझाव के अनुसार विभिन्न प्रान्तों में शिक्षा विभाग स्थापित किए गए। सन् 1856 तक कम्पनी-शासित अनेक प्रान्तों में शिक्षा प्रशासन का यह ढाँचा कार्य करने लगा।

सहायता-अनुदान प्रणाली का प्रारम्भ

शिक्षण संस्थाओं को निश्चित नियमों के अनुसार सरकारी आर्थिक सहायता मिलने लगी। इससे अनेक निजी और स्थानीय संस्थाओं को विद्यालय चलाने में सहायता मिली।

क्रमबद्ध विद्यालयों का विकास

प्राथमिक, मिडिल, हाईस्कूल और उच्च शिक्षा संस्थाओं के बीच क्रमबद्ध सम्बन्ध स्थापित करने की दिशा में कार्य प्रारम्भ हुआ।

विश्वविद्यालयों की स्थापना

वुड की शिक्षा नीति के बाद सन् 1857 में कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में विश्वविद्यालय स्थापित किए गए। प्रारम्भ में इनका प्रमुख कार्य महाविद्यालयों को सम्बद्धता देना, परीक्षाएँ लेना और सफल विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र प्रदान करना था।

2. दीर्घकालीन प्रभाव

शिक्षा को राज्य का उत्तरदायित्व मानने की परम्परा

वुड के घोषणा-पत्र ने स्पष्ट किया कि शिक्षा की व्यवस्था सरकार का दायित्व है। आगे की भारतीय शिक्षा नीतियों में भी यह विचार महत्त्वपूर्ण बना रहा।

शिक्षा के विभिन्न स्तरों का संगठन

प्राथमिक से विश्वविद्यालय तक अलग-अलग स्तरों की शिक्षा को व्यवस्थित करने की परम्परा विकसित हुई। आधुनिक भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में भी विभिन्न स्तरों की यह संरचना दिखाई देती है।

शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित करने की परम्परा

शिक्षा के उद्देश्य समय और समाज की आवश्यकताओं के अनुसार निर्धारित करने की प्रक्रिया को बल मिला। बाद की शिक्षा नीतियों और आयोगों ने भी इस पद्धति को अपनाया।

पृथक शिक्षण संस्थाओं का विकास

विभिन्न स्तरों और उद्देश्यों के लिए अलग-अलग विद्यालय तथा उच्च शिक्षण संस्थाएँ विकसित होने लगीं। इससे शिक्षा अधिक संगठित और संस्थागत बनी।

स्त्री-शिक्षा, शिक्षक-शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा में प्रगति

वुड के घोषणा-पत्र में इन क्षेत्रों को महत्त्व दिए जाने के बाद इनके विकास के लिए योजनाएँ और संस्थाएँ विकसित होने लगीं। विशेष रूप से शिक्षक-प्रशिक्षण और स्त्री-शिक्षा की आवश्यकता को शैक्षिक नीति का भाग बनाया गया।

समग्र प्रभाव

वुड के घोषणा-पत्र के बाद भारत में शिक्षा प्रशासन के संगठन, सहायता-अनुदान, क्रमबद्ध विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के विकास की प्रक्रिया तेज हुई। आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली की अनेक संस्थागत विशेषताओं की नींव इसी नीति में दिखाई देती है।

फिर भी इसमें कुछ सीमाएँ थीं—विशेष रूप से भारतीय भाषाओं और प्राच्य साहित्य को अपेक्षित स्थान न मिलना, उच्च शिक्षा में अंग्रेजी का प्रभुत्व तथा धार्मिक शिक्षा के विषय में अस्पष्टता। इन कमियों के बावजूद भारतीय शिक्षा के विकास में इसका योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वुड का घोषणा-पत्र भारतीय शिक्षा के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण और व्यापक शिक्षा दस्तावेज था।
  • इसके प्रमुख गुण थे—राज्य का शैक्षिक उत्तरदायित्व, जनशिक्षा विभाग, क्रमबद्ध शिक्षा व्यवस्था, सहायता-अनुदान, शिक्षक-प्रशिक्षण, स्त्री-शिक्षा और विश्वविद्यालयों की स्थापना।
  • इसके प्रमुख दोष थे—प्राच्य साहित्य की उपेक्षा, उच्च शिक्षा में अंग्रेजी का प्रभुत्व तथा भारतीय परम्परागत शिक्षा को पर्याप्त संरक्षण न मिलना।
  • इसके समर्थकों ने इसे आधुनिक भारतीय शिक्षा की आधारभूमि माना, जबकि आलोचकों ने इसके औपनिवेशिक दृष्टिकोण की आलोचना की।
  • सन् 1856 तक अनेक प्रान्तों में शिक्षा विभाग स्थापित हो गए।
  • सन् 1857 में कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में विश्वविद्यालय स्थापित किए गए।
  • सहायता-अनुदान प्रणाली और क्रमबद्ध विद्यालयों के विकास से शिक्षा संस्थाओं की संख्या बढ़ी।
  • दीर्घकाल में राज्य का शैक्षिक उत्तरदायित्व, विभिन्न शिक्षा-स्तरों का संगठन और शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित करने की परम्परा मजबूत हुई।
  • स्त्री-शिक्षा, शिक्षक-शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा के विकास को भी इस घोषणा-पत्र से महत्त्वपूर्ण प्रोत्साहन मिला।
  • इसी व्यापक प्रभाव के कारण वुड के घोषणा-पत्र को आधुनिक भारतीय शिक्षा के विकास का एक प्रमुख आधार माना जाता है।
Topic 8 भारतीय शिक्षा आयोग, 1882 (हंटर आयोग)—गठन, अध्ययन के मुख्य बिन्दु एवं प्राथमिक शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

भारतीय शिक्षा आयोग, 1882 (हंटर आयोग)—गठन, अध्ययन के मुख्य बिन्दु एवं प्राथमिक शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

भारतीय शिक्षा आयोग, 1882 (हंटर आयोग)

वुड के घोषणा-पत्र, 1854 ने भारतीय शिक्षा के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत की थी, परन्तु उसके बाद भी शिक्षा का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो पाया। विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा की स्थिति, सरकारी शिक्षा नीति, मिशनरी संस्थाओं की भूमिका तथा शिक्षा के प्रशासन को लेकर अनेक प्रश्न सामने आने लगे।

भारतीय शिक्षाविदों और अन्य जागरूक व्यक्तियों की ओर से शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा की माँग भी बढ़ रही थी। इसी समय ईसाई मिशनरी भी सरकार से अपनी शैक्षिक गतिविधियों के लिए अधिक सुविधाओं की अपेक्षा कर रहे थे।

हंटर आयोग की स्थापना

ब्रिटिश सरकार ने सन् 1880 में लॉर्ड रिपन को भारत का गवर्नर जनरल नियुक्त किया। लॉर्ड रिपन भारतीय शिक्षा की वास्तविक स्थिति का अध्ययन कर उसमें आवश्यक सुधार करना चाहता था।

इसी उद्देश्य से सन् 1882 में गवर्नर जनरल की काउन्सिल के सदस्य सर विलियम हंटर की अध्यक्षता में भारतीय शिक्षा आयोग (Indian Education Commission) का गठन किया गया।

आयोग के अध्यक्ष सर विलियम हंटर के नाम पर इसे सामान्यतः हंटर आयोग (Hunter Commission) कहा जाता है।

हंटर आयोग के गठन का उद्देश्य

आयोग का प्रमुख कार्य वुड के घोषणा-पत्र के बाद भारतीय शिक्षा में हुई प्रगति की समीक्षा करना और शिक्षा की तत्कालीन समस्याओं को समझकर सुधार के सुझाव देना था।

विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा की वास्तविक स्थिति और उसके विकास की सम्भावनाओं का अध्ययन आयोग के कार्य का महत्त्वपूर्ण भाग था।

हंटर आयोग के अध्ययन के मुख्य बिन्दु

आयोग ने देश के विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन किया, शिक्षाविदों से विचार-विमर्श किया और शिक्षा से सम्बन्धित नीतियों तथा संस्थाओं की स्थिति का परीक्षण किया। इसके अध्ययन के प्रमुख प्रश्न निम्नलिखित थे—

  1. प्राथमिक शिक्षा की स्थिति— भारत में प्राथमिक शिक्षा की तत्कालीन दशा क्या है और उसके विस्तार एवं सुधार के लिए कौन-से उपाय किए जाने चाहिए?
  2. सरकारी प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा— क्या सरकार ने माध्यमिक और उच्च शिक्षा को अधिक महत्त्व देकर प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा की है?
  3. राजकीय विद्यालयों की भूमिका— सरकारी विद्यालयों की स्थिति कैसी है तथा उनके प्रशासन और विकास के लिए सरकार को कैसी नीति अपनानी चाहिए?
  4. मिशनरी विद्यालयों का स्थान— भारतीय शिक्षा व्यवस्था में मिशनरियों द्वारा संचालित विद्यालयों की क्या भूमिका होनी चाहिए?
  5. व्यक्तिगत एवं निजी प्रयास— शिक्षा के विकास में निजी संस्थाओं और व्यक्तिगत प्रयासों के प्रति सरकार की नीति कैसी होनी चाहिए?

इन प्रश्नों की जाँच के लिए आयोग ने विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण किया और तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था का विस्तृत अध्ययन किया। इसके बाद आयोग ने सरकार को एक विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें भारतीय शिक्षा के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित सुझाव सम्मिलित थे।

शिक्षा नीति, 1854 के सम्बन्ध में आयोग का दृष्टिकोण

हंटर आयोग ने वुड के घोषणा-पत्र, 1854 की शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की समीक्षा करते हुए सहायता-अनुदान और शिक्षा प्रशासन को अधिक व्यावहारिक बनाने पर बल दिया।

मुख्य सुझाव
  • सरकार को शिक्षा के अनेक कार्य धीरे-धीरे स्थानीय निकायों और निजी संस्थाओं को सौंपने चाहिए।
  • सहायता-अनुदान देने के नियम उदार, स्पष्ट और आवश्यकता के अनुरूप होने चाहिए।
  • अनुदान का उपयोग केवल शिक्षक-वेतन के लिए ही नहीं, बल्कि छात्रवृत्ति, भवन, पुस्तकालय तथा प्रयोगशाला जैसी आवश्यक सुविधाओं के लिए भी किया जाना चाहिए।
  • सहायता-अनुदान प्रदान करते समय संस्थाओं के साथ अनुचित भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
  • स्वीकृत अनुदान समय पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  • सहायता प्राप्त संस्थाओं के आन्तरिक कार्यों में अनावश्यक सरकारी हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में हंटर आयोग की सिफारिशें

हंटर आयोग ने प्राथमिक शिक्षा को भारतीय जनसाधारण तक पहुँचाने पर विशेष बल दिया। आयोग का मत था कि प्राथमिक शिक्षा का स्वरूप स्थानीय जीवन और सामान्य जनता की आवश्यकताओं के अनुकूल होना चाहिए।

1. प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्य

आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के दो प्रमुख उद्देश्य बताए—

  • जनसाधारण के लिए उपयोगी शिक्षा— प्राथमिक शिक्षा ऐसी हो जो सामान्य व्यक्ति के दैनिक जीवन में उपयोगी सिद्ध हो।
  • पिछड़े वर्गों तक शिक्षा का प्रसार— पिछड़ी जातियों तथा शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के लिए विशेष प्रयास किए जाएँ।
2. प्रशासन एवं वित्त की व्यवस्था

आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के प्रशासन और वित्त की जिम्मेदारी मुख्य रूप से नगरपालिकाओं तथा स्थानीय निकायों को सौंपने का सुझाव दिया।

स्थानीय निकाय अपनी आवश्यकताओं के अनुसार प्राथमिक शिक्षा पर धन व्यय करें तथा प्रान्तीय सरकार भी उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान करे। इस प्रकार प्राथमिक शिक्षा को स्थानीय परिस्थितियों के अधिक निकट लाने का प्रयास किया गया।

3. मातृभाषा एवं प्रान्तीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम

प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम प्रान्तीय अथवा स्थानीय भाषा होनी चाहिए। आयोग ने इन भाषाओं के विकास को भी प्रोत्साहित करने पर बल दिया ताकि सामान्य बच्चों के लिए शिक्षा सहज और बोधगम्य बन सके।

4. उपयोगी एवं जीवनोपयोगी पाठ्यक्रम

आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम को स्थानीय परिस्थितियों और बच्चों की व्यावहारिक आवश्यकताओं से जोड़ने की सिफारिश की।

पाठ्यक्रम में सामान्य विषयों के साथ ऐसे विषयों को भी स्थान देने का सुझाव दिया गया जो दैनिक जीवन और स्थानीय व्यवसायों में उपयोगी हों, जैसे—

  • गणित,
  • सामान्य विज्ञान,
  • कृषि,
  • बहिखाता,
  • पशुपालन,
  • बुनाई एवं कताई आदि।

इसका उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा को केवल पुस्तक-आधारित न रखकर बच्चों के वास्तविक जीवन से जोड़ना था।

5. प्रशिक्षित एवं योग्य शिक्षकों की नियुक्ति

प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए विद्यालयों में प्रशिक्षित और योग्य शिक्षकों की नियुक्ति पर बल दिया गया।

आयोग का विचार था कि केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; प्रभावी शिक्षा के लिए सक्षम एवं प्रशिक्षित शिक्षक भी आवश्यक हैं।

6. शिक्षक-प्रशिक्षण विद्यालयों की स्थापना

योग्य प्राथमिक शिक्षकों की पर्याप्त संख्या तैयार करने के लिए नॉर्मल विद्यालयों अर्थात शिक्षक-प्रशिक्षण केन्द्रों की संख्या बढ़ाने का सुझाव दिया गया।

आयोग ने यह व्यवस्था करने पर बल दिया कि प्रत्येक विद्यालय निरीक्षक के क्षेत्र में कम-से-कम एक शिक्षक-प्रशिक्षण विद्यालय उपलब्ध हो, जिससे प्रशिक्षित शिक्षकों की नियमित आपूर्ति की जा सके।

प्राथमिक शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशों का महत्त्व

हंटर आयोग ने प्राथमिक शिक्षा को उच्च शिक्षा की तैयारी मात्र न मानकर सामान्य जनता की आवश्यकताओं से जुड़ी शिक्षा के रूप में देखने का प्रयास किया। मातृभाषा, स्थानीय प्रशासन, उपयोगी पाठ्यक्रम और प्रशिक्षित शिक्षक जैसी सिफारिशें इसी दृष्टिकोण को व्यक्त करती हैं।

विशेष रूप से शिक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय निकायों को देने का सुझाव आगे चलकर प्राथमिक शिक्षा के प्रशासन पर गहरा प्रभाव डालने वाला सिद्ध हुआ।

हंटर आयोग की प्राथमिक शिक्षा सम्बन्धी दृष्टि

आयोग की मूल धारणा यह थी कि प्राथमिक शिक्षा अधिकाधिक बच्चों तक पहुँचे, स्थानीय आवश्यकताओं के अनुकूल हो तथा बच्चों को जीवनोपयोगी ज्ञान और कौशल प्रदान करे।

इस प्रकार हंटर आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के प्रसार, स्थानीयकरण, मातृभाषा, व्यावहारिक पाठ्यक्रम और शिक्षक-प्रशिक्षण को सुधार के प्रमुख आधार के रूप में प्रस्तुत किया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • भारतीय शिक्षा आयोग का गठन सन् 1882 में लॉर्ड रिपन के समय किया गया।
  • इसके अध्यक्ष सर विलियम हंटर थे, इसलिए इसे हंटर आयोग कहा जाता है।
  • आयोग का प्रमुख उद्देश्य वुड के घोषणा-पत्र के बाद शिक्षा की प्रगति की समीक्षा तथा विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा की स्थिति का अध्ययन करना था।
  • आयोग ने प्राथमिक शिक्षा, सरकारी विद्यालयों, मिशनरी संस्थाओं और निजी प्रयासों की भूमिका का अध्ययन किया।
  • प्राथमिक शिक्षा को जनसाधारण के लिए उपयोगी बनाने तथा पिछड़े वर्गों और क्षेत्रों तक पहुँचाने पर बल दिया गया।
  • प्राथमिक शिक्षा का प्रशासन मुख्यतः नगरपालिकाओं एवं स्थानीय निकायों को सौंपने का सुझाव दिया गया।
  • प्राथमिक शिक्षा का माध्यम प्रान्तीय अथवा स्थानीय भाषा रखने की सिफारिश की गई।
  • पाठ्यक्रम को जीवनोपयोगी बनाने के लिए गणित, कृषि, सामान्य विज्ञान, बहिखाता, पशुपालन, बुनाई एवं कताई जैसे विषयों को महत्त्व दिया गया।
  • प्राथमिक विद्यालयों में प्रशिक्षित एवं योग्य शिक्षकों की नियुक्ति पर बल दिया गया।
  • शिक्षक तैयार करने के लिए नॉर्मल विद्यालयों/शिक्षक-प्रशिक्षण केन्द्रों की संख्या बढ़ाने की सिफारिश की गई।
Topic 9 हंटर आयोग—माध्यमिक, उच्च, धार्मिक, स्त्री, मुस्लिम एवं मिशनरी शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

हंटर आयोग—माध्यमिक, उच्च, धार्मिक, स्त्री, मुस्लिम एवं मिशनरी शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

हंटर आयोग की अन्य प्रमुख शैक्षिक सिफारिशें

हंटर आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के अतिरिक्त माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा, धार्मिक शिक्षा, स्त्री-शिक्षा, मुस्लिम शिक्षा और मिशनरी शिक्षण संस्थाओं के सम्बन्ध में भी अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। इन सिफारिशों का उद्देश्य शिक्षा के विभिन्न स्तरों और वर्गों को अधिक व्यवस्थित, उपयोगी तथा व्यापक बनाना था।

1. माध्यमिक शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

माध्यमिक शिक्षा के उद्देश्य

आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के दो प्रमुख उद्देश्य स्वीकार किए—

  • विद्यार्थियों को सामान्य जीवन के लिए तैयार करना।
  • आगे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए तैयार करना।
प्रशासन एवं वित्त

आयोग ने सुझाव दिया कि माध्यमिक शिक्षा का भार केवल सरकार पर न रहे। जहाँ सम्भव हो वहाँ समाज के सम्पन्न एवं सक्षम व्यक्तियों तथा निजी संस्थाओं को भी माध्यमिक विद्यालयों के संचालन में भाग लेना चाहिए।

जिन क्षेत्रों में पर्याप्त माध्यमिक विद्यालय उपलब्ध न हों, वहाँ सरकार को आवश्यकतानुसार विद्यालय खोलने चाहिए।

शिक्षा का माध्यम

माध्यमिक शिक्षा के माध्यम के सम्बन्ध में आयोग ने कोई बहुत स्पष्ट परिवर्तनकारी नीति प्रस्तुत नहीं की। तत्कालीन व्यवस्था में इस स्तर पर अंग्रेजी का प्रभाव बना रहा।

दो प्रकार के पाठ्यक्रम

आयोग ने माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों की अलग-अलग आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए दो प्रकार के पाठ्यक्रम सुझाए—

(क) अ-पाठ्यक्रम (A-Course)

यह पाठ्यक्रम उन विद्यार्थियों के लिए था जो माध्यमिक शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। इसमें साहित्यिक विषयों तथा अंग्रेजी शिक्षा को प्रमुख स्थान दिया गया।

(ख) ब-पाठ्यक्रम (B-Course)

यह पाठ्यक्रम उन विद्यार्थियों के लिए था जो माध्यमिक शिक्षा के बाद सीधे व्यवसाय या रोजगार की ओर जाना चाहते थे। इसलिए इसमें व्यावसायिक एवं उपयोगी विषयों को स्थान देने की बात कही गई।

प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति

माध्यमिक शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए आयोग ने योग्य एवं प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति पर बल दिया।

2. उच्च शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

उच्च शिक्षा के उद्देश्य

हंटर आयोग ने उच्च शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्त करने का साधन न मानकर विद्यार्थियों के बौद्धिक और नैतिक विकास से जोड़ा। इसके प्रमुख उद्देश्य थे—

  • विद्यार्थियों को अच्छे नागरिक बनने योग्य ज्ञान प्रदान करना।
  • नैतिक एवं चारित्रिक विकास करना।
  • राष्ट्र-सेवा की भावना विकसित करना।
  • उच्च ज्ञान प्राप्त करने के अवसर प्रदान करना।
प्रशासन एवं वित्त

आयोग ने उच्च शिक्षा के विकास में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने का सुझाव दिया। जहाँ जनता स्वयं महाविद्यालय स्थापित करने में सक्षम न हो, वहाँ सरकार को महाविद्यालय खोलने चाहिए तथा योग्य संस्थाओं को उदारतापूर्वक सहायता-अनुदान देना चाहिए।

शिक्षा का माध्यम

आयोग ने उच्च शिक्षा में अंग्रेजी माध्यम को जारी रखने का समर्थन किया।

पाठ्यक्रम में लचीलापन

महाविद्यालयों को अपने पाठ्यक्रम में पर्याप्त विस्तार और विविधता रखने की अनुमति देने का सुझाव दिया गया, ताकि विद्यार्थी अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार विषयों का चयन कर सकें।

योग्य भारतीयों को अध्यापन में अवसर

आयोग ने महाविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति करते समय योग्य भारतीयों को भी उचित अवसर देने पर बल दिया। विशेष रूप से उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त भारतीयों को उनकी योग्यता के अनुसार प्राथमिकता देने की बात कही गई।

3. धार्मिक शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

हंटर आयोग ने धार्मिक शिक्षा के सम्बन्ध में अपेक्षाकृत संतुलित नीति अपनाने का सुझाव दिया।

  • सरकारी विद्यालयों में किसी विशेष धर्म की धार्मिक शिक्षा न दी जाए।
  • गैर-सरकारी विद्यालयों में यदि उनके प्रबन्धक चाहें तो धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं।
  • सरकारी सहायता देते समय संस्था की धार्मिक प्रकृति के बजाय उसके शैक्षिक स्तर और कार्य को महत्त्व दिया जाए।

इस नीति का उद्देश्य सरकारी शिक्षा को किसी विशेष धर्म के प्रचार से अलग रखना था।

4. स्त्री-शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

आयोग ने स्त्री-शिक्षा की पिछड़ी स्थिति को देखते हुए उसके विकास के लिए विशेष उपाय सुझाए।

प्रमुख सुझाव
  • जिन स्थानों पर बालिका विद्यालय उपलब्ध न हों, वहाँ अलग बालिका विद्यालय स्थापित किए जाएँ।
  • बालिकाओं के लिए निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाए।
  • बालिकाओं को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने हेतु छात्रवृत्तियाँ दी जाएँ।
  • बालिका विद्यालयों को सरकार द्वारा आर्थिक अनुदान प्रदान किया जाए।
  • बालिकाओं की आवश्यकताओं के अनुरूप उपयुक्त पाठ्यक्रम तैयार किया जाए।
  • बालिका विद्यालयों में यथासम्भव महिला शिक्षिकाओं की नियुक्ति की जाए।
  • महिला शिक्षिकाओं को तैयार करने के लिए अलग शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थाएँ खोली जाएँ।
  • शिक्षा प्राप्त करने वाली बालिकाओं के लिए आवश्यकतानुसार छात्रावास की व्यवस्था की जाए।

5. मुस्लिम शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

आयोग ने स्वीकार किया कि तत्कालीन समय में मुस्लिम समुदाय शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षाकृत पिछड़ा हुआ था। इसलिए उनके लिए विशेष शैक्षिक सुविधाएँ विकसित करने की सिफारिश की गई।

प्रमुख सुझाव
  • मुस्लिम विद्यार्थियों के लिए आवश्यकतानुसार मुस्लिम विद्यालयों की स्थापना की जाए।
  • इन विद्यालयों को स्थानीय तथा प्रान्तीय सरकार द्वारा आर्थिक सहायता दी जाए।
  • मुस्लिम विद्यालयों में हिन्दी के साथ फारसी भाषा की शिक्षा की व्यवस्था की जाए।
  • मुस्लिम विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की जाए।
  • मुस्लिम शिक्षण संस्थाएँ स्थापित करने वाले व्यक्तियों और संगठनों को प्रोत्साहन दिया जाए।

6. मिशनरी शिक्षा सम्बन्धी सिफारिशें

हंटर आयोग ने मिशनरियों द्वारा किए जा रहे शैक्षिक कार्यों का भी अध्ययन किया। आयोग ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय शिक्षा की सम्पूर्ण जिम्मेदारी ईसाई मिशनरियों को नहीं सौंपी जानी चाहिए।

प्रमुख सुझाव
  • भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को पूर्णतः ईसाई मिशनरियों के नियंत्रण में न दिया जाए।
  • भारतीयों द्वारा संचालित विद्यालयों और मिशनरी विद्यालयों के बीच अनुचित भेदभाव न किया जाए।
  • सहायता-अनुदान देने के नियम सभी योग्य विद्यालयों के लिए समान और निष्पक्ष हों।
  • यदि शिक्षा के क्षेत्र में किसी पक्ष को विशेष रूप से आगे बढ़ाने की आवश्यकता हो तो भारतीयों के अपने शैक्षिक प्रयासों को प्रोत्साहित किया जाए।

हंटर आयोग की इन सिफारिशों का शैक्षिक महत्त्व

हंटर आयोग की सिफारिशों में शिक्षा को केवल एक ही स्तर या वर्ग तक सीमित न रखकर माध्यमिक, उच्च, स्त्री तथा मुस्लिम शिक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा गया।

माध्यमिक शिक्षा में दो प्रकार के पाठ्यक्रमों का सुझाव विद्यार्थियों की अलग-अलग आवश्यकताओं को स्वीकार करता था। स्त्री और मुस्लिम शिक्षा के लिए विशेष सुविधाओं की सिफारिश सामाजिक रूप से शिक्षा का दायरा बढ़ाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण थी।

इसी प्रकार धार्मिक शिक्षा और मिशनरी संस्थाओं के सम्बन्ध में आयोग ने सरकारी निष्पक्षता तथा भारतीय शैक्षिक प्रयासों को उचित अवसर देने की दिशा में सुझाव प्रस्तुत किए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • माध्यमिक शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को सामान्य जीवन तथा उच्च शिक्षा दोनों के लिए तैयार करना था।
  • माध्यमिक स्तर पर A-Course उच्च शिक्षा के इच्छुक विद्यार्थियों और B-Course व्यावसायिक शिक्षा के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए सुझाया गया।
  • माध्यमिक विद्यालयों में प्रशिक्षित एवं योग्य अध्यापकों की नियुक्ति पर बल दिया गया।
  • उच्च शिक्षा में अच्छे नागरिक, नैतिक चरित्र, राष्ट्र-सेवा तथा उच्च ज्ञान के विकास को उद्देश्य माना गया।
  • उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बनाए रखने का समर्थन किया गया।
  • सरकारी विद्यालयों में किसी विशेष धर्म की धार्मिक शिक्षा न देने की सिफारिश की गई।
  • स्त्री-शिक्षा के लिए बालिका विद्यालय, निःशुल्क शिक्षा, छात्रवृत्ति, महिला शिक्षिकाएँ, प्रशिक्षण संस्थाएँ और छात्रावास की व्यवस्था पर बल दिया गया।
  • मुस्लिम शिक्षा के लिए अलग विद्यालय, आर्थिक सहायता, छात्रवृत्ति तथा हिन्दी के साथ फारसी की शिक्षा की सिफारिश की गई।
  • भारतीय एवं मिशनरी विद्यालयों के बीच सहायता-अनुदान में भेदभाव न करने पर बल दिया गया।
  • हंटर आयोग ने भारतीयों के अपने शैक्षिक प्रयासों को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए।
Topic 10 हंटर आयोग का मूल्यांकन एवं भारतीय शिक्षा पर प्रभाव

हंटर आयोग का मूल्यांकन एवं भारतीय शिक्षा पर प्रभाव

हंटर आयोग का मूल्यांकन

भारतीय शिक्षा आयोग, 1882 अर्थात हंटर आयोग का गठन तत्कालीन भारतीय शिक्षा की आवश्यकताओं और समस्याओं का अध्ययन करने के लिए किया गया था। आयोग ने प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक अनेक क्षेत्रों का अध्ययन करके सुधार सम्बन्धी सुझाव दिए।

आयोग की अनेक सिफारिशों ने भारतीय शिक्षा के प्रसार और संगठन को नई दिशा दी, परन्तु कुछ सुझावों में ऐसी सीमाएँ भी थीं जिनके कारण इसकी आलोचना की गई। इसलिए हंटर आयोग का मूल्यांकन उसके गुण और दोष दोनों के आधार पर किया जाता है।

हंटर आयोग के गुण

1. शिक्षा को केवल मिशनरियों के नियंत्रण में न देना

आयोग ने भारतीय शिक्षा की सम्पूर्ण व्यवस्था ईसाई मिशनरियों के हाथों में सौंपने का समर्थन नहीं किया। इससे भारतीय शिक्षा को केवल धर्म-प्रचार का माध्यम बनने से बचाने और भारतीयों के अपने शैक्षिक प्रयासों को अवसर देने में सहायता मिली।

2. वुड के घोषणा-पत्र की उपयोगी सिफारिशों को स्वीकार करना

आयोग ने वुड के घोषणा-पत्र की उन व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाने का समर्थन किया जो भारतीय शिक्षा के विकास के लिए उपयोगी थीं। इससे पहले से स्थापित शिक्षा-व्यवस्था को पूरी तरह बदलने के बजाय आवश्यक सुधारों के साथ आगे बढ़ाया गया।

3. प्राथमिक शिक्षा का प्रशासन स्थानीय निकायों को देना

प्राथमिक शिक्षा को नगरपालिकाओं और अन्य स्थानीय संस्थाओं से जोड़कर आयोग ने इसे स्थानीय आवश्यकताओं के अधिक निकट लाने का प्रयास किया। इससे स्थानीय स्तर पर विद्यालयों के संचालन और विकास की सम्भावना बढ़ी।

4. शिक्षा के विभिन्न स्तरों के पाठ्यक्रम में सुधार

आयोग ने प्राथमिक से लेकर उच्च स्तर तक शिक्षा के पाठ्यक्रम को अधिक उपयोगी और व्यवस्थित बनाने पर बल दिया। इससे शिक्षा को विद्यार्थियों के जीवन और भविष्य की आवश्यकताओं से जोड़ने का प्रयास हुआ।

5. माध्यमिक स्तर पर दो प्रकार के पाठ्यक्रम

माध्यमिक शिक्षा में A-Course और B-Course की व्यवस्था का सुझाव आयोग की महत्त्वपूर्ण विशेषता थी।

  • A-Course उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए था।
  • B-Course व्यावसायिक जीवन की ओर जाने वाले विद्यार्थियों के लिए बनाया गया था।

इससे विद्यार्थियों की रुचि और भविष्य की आवश्यकता के अनुसार शिक्षा देने की दिशा मिली।

6. स्त्री एवं मुस्लिम शिक्षा के विकास पर ध्यान

आयोग ने स्त्रियों और मुस्लिम समुदाय की पिछड़ी शैक्षिक स्थिति को स्वीकार करते हुए उनके लिए विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराने की सिफारिश की। इससे इन वर्गों में शिक्षा के विस्तार की दिशा में प्रयास तेज हुए।

7. शिक्षक-प्रशिक्षण को महत्त्व

प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर योग्य शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए आयोग ने शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थाएँ स्थापित करने और उनका विस्तार करने पर बल दिया।

यह सुझाव शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण था।

8. निजी प्रयासों को प्रोत्साहन

आयोग ने माध्यमिक और उच्च शिक्षा के विस्तार में सक्षम एवं सम्पन्न भारतीयों तथा निजी संस्थाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित किया।

इससे शिक्षा के क्षेत्र में केवल सरकारी संस्थाओं पर निर्भरता कम हुई और समाज की भागीदारी बढ़ी।

9. भारतीयों की शैक्षिक भागीदारी को बढ़ावा

भारतीय व्यक्तियों और संस्थाओं को विद्यालय तथा महाविद्यालय स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इससे भारतीय समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के प्रति रुचि और उत्तरदायित्व की भावना बढ़ी।

10. सहायता-अनुदान प्रणाली को सरल बनाना

आयोग ने सहायता-अनुदान प्राप्त करने की शर्तों को अधिक उदार और सरल बनाने पर बल दिया। इससे गैर-सरकारी विद्यालयों के संचालन और नई शिक्षण संस्थाओं की स्थापना में सहायता मिली।

11. मातृभाषा एवं प्रान्तीय भाषाओं को महत्त्व

प्राथमिक शिक्षा का माध्यम स्थानीय अथवा प्रान्तीय भाषाओं को बनाने का सुझाव दिया गया। इससे सामान्य जनता के लिए शिक्षा को अधिक सरल और सुलभ बनाने तथा जनशिक्षा के प्रसार में सहायता मिली।

12. पिछड़े वर्गों की शिक्षा पर ध्यान

आयोग ने सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के बच्चों तक शिक्षा पहुँचाने की आवश्यकता को स्वीकार किया और उनके लिए विशेष प्रयास करने की सिफारिश की।

13. धार्मिक शिक्षा के सम्बन्ध में संतुलित दृष्टिकोण

सरकारी विद्यालयों को किसी विशेष धर्म की शिक्षा से अलग रखने तथा गैर-सरकारी संस्थाओं को सीमित स्वतंत्रता देने का सुझाव धार्मिक शिक्षा के सम्बन्ध में एक संतुलित दृष्टिकोण माना गया।

हंटर आयोग के दोष

1. सरकार के शैक्षिक उत्तरदायित्व को कम करना

आयोग ने शिक्षा के अनेक कार्य स्थानीय निकायों और निजी संस्थाओं को सौंपने पर अत्यधिक बल दिया। इससे सरकार के प्रत्यक्ष उत्तरदायित्व में कमी आई और अनेक स्थानों पर शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हुई।

2. निःशुल्क शिक्षा के लिए स्पष्ट सुझाव का अभाव

आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के विस्तार की बात तो की, किन्तु सभी बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने के सम्बन्ध में कोई ठोस एवं व्यापक प्रस्ताव नहीं दिया।

गरीब परिवारों के बच्चों तक शिक्षा पहुँचाने की दृष्टि से यह एक बड़ी कमी थी।

3. मुस्लिम बच्चों के लिए पृथक विद्यालयों का सुझाव

मुस्लिम बच्चों के लिए अलग विद्यालय खोलने का सुझाव दिया गया। आलोचकों के अनुसार इस प्रकार की पृथक व्यवस्था सामाजिक एकता और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा की भावना के अनुकूल नहीं थी।

4. उच्च शिक्षा में यूरोपीय शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों को वरीयता

उच्च शिक्षण संस्थाओं में यूरोपीय विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों को प्राथमिकता देने की बात भारतीय शिक्षा संस्थानों से योग्य बने व्यक्तियों के साथ भेदभावपूर्ण मानी गई।

5. प्राथमिक शिक्षा के अनुदान की न्यूनतम सीमा निश्चित न करना

प्राथमिक शिक्षा के लिए सरकारी आर्थिक सहायता की कोई निश्चित न्यूनतम सीमा निर्धारित नहीं की गई। इससे कई क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं हो सका।

6. परीक्षा-प्रधान शिक्षा को बढ़ावा

सहायता-अनुदान की शर्तों को सरल बनाया गया, लेकिन संस्थाओं की शैक्षिक उपलब्धि का आकलन अधिकतर परीक्षाओं के परिणामों से किया जाने लगा।

इससे शिक्षा के व्यापक विकास के बजाय परीक्षा और परिणाम पर अधिक जोर पड़ने की प्रवृत्ति बढ़ी।

7. व्यावसायिक शिक्षा के लिए पर्याप्त ठोस व्यवस्था का अभाव

माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा की आवश्यकता स्वीकार करने के बावजूद उसके पाठ्यक्रम और प्रभावी क्रियान्वयन के सम्बन्ध में पर्याप्त ठोस सुझाव नहीं दिए गए।

8. शिक्षा प्रशासन में अस्थिरता

सरकार, स्थानीय संस्थाओं और निजी प्रयासों के बीच उत्तरदायित्व बाँटने की नीति से कई क्षेत्रों में शिक्षा प्रशासन का स्पष्ट नियंत्रण कमजोर हुआ और व्यवस्था में असमानता दिखाई दी।

9. पिछड़े वर्गों के लिए पृथक व्यवस्था की आलोचना

पिछड़ी तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बच्चों के लिए अलग विद्यालय तथा उनके लिए अलग शिक्षकों की व्यवस्था जैसे सुझावों को विभाजनकारी माना गया। इससे समान एवं समावेशी शिक्षा के सिद्धान्त को कमजोर होने का खतरा था।

हंटर आयोग का भारतीय शिक्षा पर प्रभाव

हंटर आयोग की अनेक सिफारिशों को ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार किया और धीरे-धीरे भारतीय शिक्षा व्यवस्था में लागू किया। इसके परिणामस्वरूप विद्यालयों की संख्या, विद्यार्थियों की संख्या तथा निजी भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

1. आयोग की सिफारिशों का क्रियान्वयन

आयोग द्वारा प्रस्तुत अनेक उपयोगी सुझावों को सरकारी शिक्षा नीति में स्थान दिया गया। इससे शिक्षा के प्रशासन, पाठ्यक्रम, अनुदान तथा विभिन्न स्तरों के विस्तार की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

2. प्राथमिक शिक्षा का स्थानीय निकायों को हस्तांतरण

प्राथमिक शिक्षा का उत्तरदायित्व स्थानीय निकायों को सौंपे जाने से इसका प्रशासन स्थानीय स्तर पर पहुँचा। इससे शिक्षा के प्रसार को कुछ सहायता मिली, परन्तु स्थानीय निकायों की आर्थिक कमजोरी के कारण कई क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित भी हुई।

3. निजी शिक्षण संस्थाओं का विस्तार

माध्यमिक और उच्च शिक्षा में निजी संस्थाओं को प्रोत्साहित किए जाने से भारतीय समाज के लोग शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हुए। इससे अनेक नए विद्यालय और महाविद्यालय स्थापित हुए।

4. सहायता-अनुदान से शिक्षण संस्थाओं की संख्या में वृद्धि

सहायता-अनुदान की सरल शर्तों ने निजी विद्यालयों और संस्थाओं को आर्थिक सहयोग प्राप्त करने में सहायता दी। परिणामस्वरूप शिक्षण संस्थाओं की संख्या तेजी से बढ़ी।

5. प्राथमिक शिक्षा का प्रसार

आयोग के बाद प्राथमिक विद्यालयों की संख्या तथा उनमें अध्ययन करने वाले बच्चों की संख्या में वृद्धि हुई। स्थानीय भाषाओं को प्राथमिक शिक्षा में स्थान मिलने से भी सामान्य जनता तक शिक्षा पहुँचाने में सहायता मिली।

6. माध्यमिक शिक्षा का विस्तार

माध्यमिक विद्यालयों और उनमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी। दो प्रकार के पाठ्यक्रम की अवधारणा ने माध्यमिक शिक्षा को उच्च शिक्षा और रोजगार—दोनों आवश्यकताओं से जोड़ने की दिशा दिखाई।

7. उच्च शिक्षा में वृद्धि

आयोग की नीति के बाद उच्च शिक्षा का भी विस्तार हुआ। महाविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थाओं की संख्या में वृद्धि हुई तथा अधिक विद्यार्थी उच्च शिक्षा तक पहुँचने लगे।

8. विश्वविद्यालयी शिक्षा का विकास

कलकत्ता, बम्बई और मद्रास विश्वविद्यालयों में उच्च स्तर पर विशेष रूप से विज्ञान शिक्षा के विकास की दिशा में व्यवस्था की गई। इससे विश्वविद्यालयी शिक्षा का दायरा बढ़ा।

9. उच्च शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ना

विद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या में वृद्धि के साथ उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या में भी वृद्धि हुई।

हंटर आयोग का समग्र महत्त्व

हंटर आयोग ने भारतीय शिक्षा की तत्कालीन समस्याओं का विस्तृत अध्ययन करके शिक्षा के प्रसार के लिए कई व्यावहारिक सुझाव दिए। इसके कारण ईसाई मिशनरियों के एकाधिकार की सम्भावना कम हुई और भारतीयों तथा निजी संस्थाओं की भागीदारी बढ़ी।

स्त्री-शिक्षा, मुस्लिम शिक्षा, शिक्षक-प्रशिक्षण, स्थानीय भाषाओं और सहायता-अनुदान जैसी व्यवस्थाओं ने शिक्षा के क्षेत्र को अधिक व्यापक बनाया।

यद्यपि आयोग की नीतियों में सरकारी उत्तरदायित्व कम करने, पृथक विद्यालयों की व्यवस्था तथा निःशुल्क शिक्षा की उपेक्षा जैसी कमियाँ थीं, फिर भी भारतीय शिक्षा के विस्तार और सुधार में इसका योगदान महत्त्वपूर्ण रहा।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • हंटर आयोग की प्रमुख उपलब्धियों में प्राथमिक शिक्षा का स्थानीयकरण, मातृभाषा को महत्त्व और शिक्षक-प्रशिक्षण का विस्तार शामिल था।
  • आयोग ने स्त्री, मुस्लिम और पिछड़े वर्गों की शिक्षा के लिए विशेष सुझाव दिए।
  • माध्यमिक स्तर पर A-Course और B-Course की व्यवस्था आयोग की महत्त्वपूर्ण सिफारिश थी।
  • सहायता-अनुदान की शर्तों को सरल करने से निजी शिक्षण संस्थाओं की संख्या बढ़ी।
  • आयोग का प्रमुख दोष यह था कि उसने सरकार के शिक्षा सम्बन्धी प्रत्यक्ष उत्तरदायित्व को सीमित किया।
  • सभी बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा के सम्बन्ध में कोई ठोस व्यवस्था नहीं दी गई।
  • पृथक मुस्लिम एवं पिछड़े वर्गों के विद्यालयों के सुझाव की आलोचना की गई।
  • आयोग के प्रभाव से प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षण संस्थाओं तथा विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि हुई।
  • भारतीयों और निजी संस्थाओं की शिक्षा के क्षेत्र में भागीदारी बढ़ी।
  • कमियों के बावजूद हंटर आयोग ने भारतीय शिक्षा के विस्तार और सुधार की प्रक्रिया को गति प्रदान की।
Topic 11 लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति—पृष्ठभूमि, शिमला शिक्षा सम्मेलन 1901 एवं तत्कालीन शिक्षा के दोष

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति—पृष्ठभूमि, शिमला शिक्षा सम्मेलन 1901 एवं तत्कालीन शिक्षा के दोष

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति की पृष्ठभूमि

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक भारत में अंग्रेजी एवं पाश्चात्य शिक्षा का काफी विस्तार हो चुका था, परन्तु शिक्षा-व्यवस्था में अनेक कमियाँ भी दिखाई देने लगी थीं। प्राथमिक शिक्षा का प्रसार सीमित था, भारतीय भाषाओं की उपेक्षा हो रही थी, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं थी तथा शिक्षा का उद्देश्य अधिकतर सरकारी नौकरियों से जुड़ता जा रहा था।

इसी समय सन् 1898 में लॉर्ड कर्जन भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया। वह एक कुशल प्रशासक था और भारतीय शिक्षा की तत्कालीन स्थिति में व्यापक सुधार की आवश्यकता महसूस करता था।

कर्जन का विचार था कि शिक्षा की केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता, प्रशासन, अनुशासन और उपयोगिता में भी सुधार होना चाहिए।

कर्जन के शैक्षिक सुधारों की दिशा

भारत आने के बाद कर्जन ने शिक्षा की स्थिति का अध्ययन प्रारम्भ किया। उसने प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के साथ शिक्षक-प्रशिक्षण, कृषि शिक्षा, नैतिक शिक्षा और विश्वविद्यालय प्रशासन जैसे क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता अनुभव की।

इसी उद्देश्य से उसने सन् 1901 में शिमला शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया। आगे चलकर विश्वविद्यालय शिक्षा के अध्ययन के लिए भारतीय विश्वविद्यालय आयोग, 1902 नियुक्त किया गया और उसके सुझावों के आधार पर विश्वविद्यालय सम्बन्धी सुधार किए गए।

शिमला शिक्षा सम्मेलन, 1901

भारतीय शिक्षा की समस्याओं का व्यवस्थित अध्ययन करने और उसमें सुधार के उपाय खोजने के उद्देश्य से लॉर्ड कर्जन ने सन् 1901 में शिमला शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया।

इस सम्मेलन की अध्यक्षता स्वयं लॉर्ड कर्जन ने की। इसमें शिक्षा-प्रबन्धकों और मिशनरी संस्थाओं से जुड़े कुछ प्रतिनिधियों को आमन्त्रित किया गया, लेकिन किसी भारतीय प्रतिनिधि को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया।

इस कारण भारतीयों में सम्मेलन के प्रति संदेह और असन्तोष उत्पन्न हुआ। उन्हें आशंका हुई कि ब्रिटिश सरकार शिक्षा पर अपना नियंत्रण और अधिक मजबूत करने की योजना बना रही है।

शिमला सम्मेलन की प्रमुख विशेषताएँ

  • सम्मेलन लगभग 15 दिनों तक चला।
  • इसमें भारतीय शिक्षा से सम्बन्धित अनेक समस्याओं पर विचार किया गया।
  • शिक्षा सुधार से सम्बन्धित लगभग 150 प्रस्ताव पारित किए गए।
  • इन प्रस्तावों को तत्काल सार्वजनिक न किए जाने के कारण भारतीयों में शंका और बढ़ गई।
  • सम्मेलन ने कर्जन को भारतीय शिक्षा की कमियों का व्यवस्थित अध्ययन करने और नई नीति तैयार करने का आधार प्रदान किया।

शिमला सम्मेलन के बाद की दिशा

शिमला शिक्षा सम्मेलन में हुए विचार-विमर्श और पारित प्रस्तावों के आधार पर कर्जन ने भारतीय शिक्षा को अधिक नियंत्रित, संगठित और गुणात्मक बनाने के प्रयास प्रारम्भ किए।

बाद में उसने इन विचारों को अपनी शिक्षा नीति में रूपांतरित किया। सन् 1904 में उसकी शिक्षा नीति को औपचारिक रूप दिया गया, जिसमें तत्कालीन शिक्षा की समस्याओं को दूर करने और विभिन्न स्तरों पर सुधार करने का प्रयास किया गया।

तत्कालीन भारतीय शिक्षा के प्रमुख दोष

कर्जन ने भारतीय शिक्षा की स्थिति का अध्ययन करके अनेक गंभीर कमियाँ देखीं। उसके अनुसार शिक्षा का प्रसार बहुत सीमित था और इसकी गुणवत्ता भी अपेक्षित स्तर की नहीं थी।

1. शिक्षा का अत्यन्त सीमित प्रसार

भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या शिक्षा से वंचित थी। स्रोत में दिए गए आँकड़ों के अनुसार लगभग चार में से तीन बालक विद्यालयी शिक्षा से वंचित थे और बालिकाओं की स्थिति इससे भी अधिक कमजोर थी।

लगभग चालीस बालिकाओं में से केवल एक को किसी प्रकार की विद्यालयी शिक्षा प्राप्त हो रही थी। इससे स्पष्ट था कि शिक्षा सामान्य जनता तक नहीं पहुँच पाई थी।

2. पाठ्यक्रम का अत्यधिक साहित्यिक होना

तत्कालीन पाठ्यक्रम मुख्यतः साहित्यिक विषयों पर केन्द्रित था। उसमें उपयोगी, व्यावसायिक और जीवनोपयोगी विषयों को पर्याप्त स्थान नहीं मिला था।

इससे शिक्षा विद्यार्थियों को व्यावहारिक जीवन तथा रोजगार की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं कर पा रही थी।

3. भारतीय भाषाओं की उपेक्षा

शिक्षा में अंग्रेजी को अत्यधिक महत्त्व मिलने के कारण भारतीय भाषाओं का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया। इससे शिक्षा का सामान्य जनता से सम्बन्ध भी कमजोर हुआ।

कर्जन के अनुसार शिक्षा का प्रसार तभी प्रभावी हो सकता था जब भारतीय भाषाओं को भी उचित स्थान दिया जाए।

4. परीक्षाओं को आवश्यकता से अधिक महत्त्व

शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान, व्यक्तित्व और कौशल का विकास होना चाहिए, लेकिन तत्कालीन व्यवस्था में परीक्षा पास करना ही मुख्य लक्ष्य बनता जा रहा था।

इस परीक्षा-प्रधान व्यवस्था के कारण वास्तविक समझ, स्वतंत्र विचार और व्यावहारिक ज्ञान की उपेक्षा होने लगी थी।

5. सरकारी नौकरी प्राप्त करना शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य

बहुत से विद्यार्थी शिक्षा को ज्ञान और व्यक्तित्व विकास के साधन के बजाय सरकारी पद प्राप्त करने का माध्यम समझने लगे थे।

इस प्रवृत्ति से शिक्षा का व्यापक सामाजिक एवं व्यावहारिक उद्देश्य सीमित हो गया था।

6. विद्यार्थियों को अत्यधिक स्वतंत्रता

स्रोत में यह भी उल्लेख है कि विद्यार्थियों को आवश्यकता से अधिक स्वतंत्रता मिलने के कारण अनुशासन और आत्म-नियन्त्रण से सम्बन्धित समस्याएँ उत्पन्न हो रही थीं।

कर्जन शिक्षा में अनुशासन, जिम्मेदारी और सुव्यवस्थित प्रशासन को अधिक महत्त्व देना चाहता था।

7. उच्च शिक्षा का अत्यधिक संकुचित होना

उच्च शिक्षा का क्षेत्र भी सीमित तथा संकीर्ण था। उच्च शिक्षण संस्थाएँ विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं, व्यावहारिक ज्ञान और व्यापक सामाजिक विकास के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान नहीं कर पा रही थीं।

कर्जन की सुधारवादी दृष्टि

कर्जन का मानना था कि शिक्षा में केवल विद्यालयों और विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा को उपयोगी बनाने के लिए गुणवत्ता, प्रशिक्षित शिक्षक, प्रभावी प्रशासन, उचित पाठ्यक्रम, अनुशासन और व्यावहारिक ज्ञान पर भी बल देना आवश्यक है।

इसी सोच के आधार पर आगे उसने प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के साथ स्त्री-शिक्षा, कृषि शिक्षा, नैतिक शिक्षा तथा शिक्षा प्रशासन के क्षेत्रों में विभिन्न सुधार प्रस्तावित किए।

शिमला सम्मेलन का शैक्षिक महत्त्व

शिमला शिक्षा सम्मेलन भारतीय शिक्षा की तत्कालीन कमियों को व्यवस्थित रूप से सामने लाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास था। यद्यपि इसमें भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल न किए जाने के कारण इसकी आलोचना हुई, फिर भी इस सम्मेलन ने कर्जन की आगे की शिक्षा नीति के लिए आधार तैयार किया।

इसके बाद भारतीय शिक्षा में गुणवत्ता, प्रशासन और नियंत्रण को केन्द्र में रखकर कई सुधार किए गए, जिनका विस्तृत अध्ययन अगले Topic में किया जाएगा।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • लॉर्ड कर्जन 1898 में भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया।
  • उसने भारतीय शिक्षा में संख्या के साथ-साथ गुणवत्ता, प्रशासन और अनुशासन सुधारने पर बल दिया।
  • सन् 1901 में उसने शिमला शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया।
  • सम्मेलन लगभग 15 दिन चला और शिक्षा सम्बन्धी लगभग 150 प्रस्ताव पारित किए गए।
  • सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल न करने के कारण भारतीयों में संदेह और असन्तोष उत्पन्न हुआ।
  • तत्कालीन शिक्षा का प्रसार बहुत सीमित था—लगभग चार में से तीन बालक विद्यालयी शिक्षा से वंचित थे।
  • बालिका शिक्षा की स्थिति और भी खराब थी; लगभग चालीस में से केवल एक बालिका को शिक्षा प्राप्त हो रही थी।
  • प्रमुख दोष थे—साहित्यिक पाठ्यक्रम, भारतीय भाषाओं की उपेक्षा, परीक्षा-प्रधानता, सरकारी नौकरी केन्द्रित शिक्षा, अत्यधिक स्वतंत्रता और संकुचित उच्च शिक्षा।
  • शिमला सम्मेलन ने आगे आने वाली कर्जन की शिक्षा नीति एवं शैक्षिक सुधारों की आधारभूमि तैयार की।
Topic 12 लॉर्ड कर्जन के शिक्षा सुधार—प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च एवं अन्य शैक्षिक प्रयास

लॉर्ड कर्जन के शिक्षा सुधार—प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च एवं अन्य शैक्षिक प्रयास

लॉर्ड कर्जन के शिक्षा सुधार

लॉर्ड कर्जन ने भारतीय शिक्षा की तत्कालीन कमियों का अध्ययन करने के बाद शिक्षा के विभिन्न स्तरों में सुधार के लिए अनेक सुझाव दिए। उसका उद्देश्य केवल शिक्षण संस्थाओं की संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक-प्रशिक्षण, प्रशासन, पाठ्यक्रम और व्यावहारिक उपयोगिता में भी सुधार करना था।

उसके प्रमुख सुधारों को प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा तथा अन्य शैक्षिक प्रयासों के रूप में समझा जा सकता है।

1. प्राथमिक शिक्षा सम्बन्धी सुधार

1. प्राथमिक शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था

कर्जन ने प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित करना आवश्यक माना। उसने प्राथमिक शिक्षकों के लिए लगभग दो वर्ष के शिक्षक-प्रशिक्षण की व्यवस्था करने पर बल दिया।

इसके साथ ही शिक्षकों के वेतन और सेवा-शर्तों में सुधार करने की आवश्यकता भी स्वीकार की गई, ताकि योग्य व्यक्तियों को प्राथमिक शिक्षण की ओर आकर्षित किया जा सके।

2. प्राथमिक शिक्षा का प्रसार सरकार का उत्तरदायित्व

कर्जन ने प्राथमिक शिक्षा के विस्तार को सरकार का प्रमुख दायित्व माना। उसके अनुसार सामान्य जनता तक शिक्षा पहुँचाने के लिए सरकार को इस क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

इसलिए प्राथमिक विद्यालयों की संख्या बढ़ाने और शिक्षा के प्रसार के लिए अधिक संगठित प्रयास करने पर बल दिया गया।

3. स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम

प्राथमिक शिक्षा का पाठ्यक्रम एक जैसा और केवल पुस्तकीय न होकर स्थानीय परिस्थितियों तथा क्षेत्रीय आवश्यकताओं से जुड़ा होना चाहिए।

इस उद्देश्य से ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करने पर बल दिया गया जिनमें विद्यार्थियों के परिवेश और दैनिक जीवन से सम्बन्धित उपयोगी विषयों को स्थान मिले। पाठ्यक्रम निर्माण के लिए उपयुक्त समितियाँ गठित करने का भी सुझाव दिया गया।

4. भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम

प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएँ रखने का समर्थन किया गया। कर्जन का विचार था कि प्रारम्भिक शिक्षा ऐसी भाषा में दी जानी चाहिए जिसे बालक आसानी से समझ सके।

इस स्तर पर अंग्रेजी को अनावश्यक रूप से प्रमुख स्थान न देने पर बल दिया गया।

5. बालोपयोगी शिक्षण-विधियों का विकास

प्राथमिक शिक्षा में केवल रटने की पद्धति के स्थान पर बच्चों की आयु और मानसिक स्तर के अनुरूप शिक्षण-विधियों के विकास की आवश्यकता बताई गई।

इस सन्दर्भ में किण्डरगार्टन प्रणाली जैसी बालकेन्द्रित शिक्षण-पद्धतियों को अपनाने की बात कही गई, जिससे शिक्षा अधिक रोचक और क्रियात्मक बन सके।

2. माध्यमिक शिक्षा सम्बन्धी सुधार

1. गैर-सरकारी विद्यालयों को मान्यता

कर्जन ने गैर-सरकारी माध्यमिक विद्यालयों को व्यवस्थित रूप से सरकारी मान्यता देने की व्यवस्था का समर्थन किया।

इससे विद्यालयों की गुणवत्ता और प्रशासन पर आवश्यक निगरानी रखी जा सके तथा मान्यता प्राप्त संस्थाओं के लिए निश्चित मानक निर्धारित किए जा सकें।

2. मान्यता एवं सहायता-अनुदान के लिए निश्चित नियम

माध्यमिक विद्यालयों को मान्यता और आर्थिक सहायता देते समय स्पष्ट नियमों का पालन करने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य यह था कि सरकारी सहायता केवल उन संस्थाओं को मिले जो निर्धारित शैक्षिक मानकों का पालन करें।

3. प्रशिक्षित एवं योग्य शिक्षकों की नियुक्ति

माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षित और योग्य अध्यापकों की नियुक्ति आवश्यक मानी गई।

कर्जन के अनुसार केवल विद्यालय खोलना पर्याप्त नहीं है; उनमें प्रभावी शिक्षण के लिए सक्षम अध्यापक उपलब्ध होना भी अनिवार्य है।

4. सरकारी विद्यालयों को आदर्श विद्यालय बनाना

सरकारी माध्यमिक विद्यालयों को इस प्रकार विकसित करने की बात कही गई कि वे गैर-सरकारी विद्यालयों के लिए आदर्श संस्था का कार्य कर सकें।

उनके प्रशासन, शिक्षण और अनुशासन के माध्यम से अन्य विद्यालयों के सामने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का उदाहरण प्रस्तुत किया जाना था।

5. माध्यमिक शिक्षा के स्तर में सुधार

कर्जन ने माध्यमिक विद्यालयों के शैक्षिक स्तर को ऊँचा उठाने पर विशेष बल दिया। पाठ्यक्रम, अध्यापन, विद्यालय प्रशासन और विद्यार्थियों की प्रगति—सभी क्षेत्रों में गुणवत्ता सुधार आवश्यक माना गया।

6. योग्य अध्यापकों की पर्याप्त व्यवस्था

विद्यालयों में ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति करने पर बल दिया गया जिनके पास विषय-ज्ञान के साथ उचित शिक्षण-योग्यता भी हो।

7. व्यावसायिक विषयों को पाठ्यक्रम में स्थान

माध्यमिक शिक्षा को केवल साहित्यिक या परीक्षा-केंद्रित न रखकर उसे जीवनोपयोगी बनाने के लिए व्यावसायिक विषयों को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का सुझाव दिया गया।

इससे विद्यार्थियों को शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार और आजीविका से सम्बन्धित उपयोगी ज्ञान प्राप्त हो सके।

3. उच्च शिक्षा सम्बन्धी सुधार

1. उच्च शिक्षा का विस्तार

कर्जन ने उच्च शिक्षा की सुविधाओं का विस्तार करने की आवश्यकता स्वीकार की। इसके लिए आवश्यक धनराशि बढ़ाने और उच्च शिक्षण संस्थाओं के विकास पर बल दिया गया।

2. विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के स्तर में सुधार

विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए—यह कर्जन की उच्च शिक्षा सम्बन्धी नीति का महत्त्वपूर्ण पक्ष था।

उसने केवल संस्थाओं की संख्या बढ़ाने के बजाय उनके शिक्षण स्तर, प्रशासन और शैक्षिक गुणवत्ता सुधारने को अधिक महत्त्व दिया।

3. परीक्षा-व्यवस्था में सुधार

उच्च शिक्षा में परीक्षा-व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर भी ध्यान दिया गया। स्रोत के अनुसार आन्तरिक परीक्षाओं की अपेक्षा बाह्य परीक्षाओं को कम महत्त्व देने की बात कही गई।

अर्थात विद्यार्थियों के अध्ययन और प्रगति का मूल्यांकन केवल बाहरी परीक्षा पर निर्भर न रखकर शिक्षण-प्रक्रिया के भीतर होने वाले मूल्यांकन को भी महत्त्व दिया जाना चाहिए।

4. स्त्री-शिक्षा के लिए प्रयास

कर्जन ने स्त्री-शिक्षा के विस्तार को भी आवश्यक माना। बालिकाओं के लिए विद्यालयों की व्यवस्था करने तथा उनमें योग्य अध्यापिकाओं की नियुक्ति पर बल दिया गया।

स्त्री-शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की बात भी कही गई, ताकि अधिक बालिकाएँ विद्यालयी शिक्षा से जुड़ सकें।

5. नैतिक शिक्षा पर बल

कर्जन का विचार था कि शिक्षा केवल बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं होनी चाहिए। विद्यार्थियों में अनुशासन, परिश्रम, सदाचार और उत्तम चरित्र का भी विकास होना चाहिए।

इसलिए शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा की व्यवस्था करने तथा महान व्यक्तियों के जीवन-चरित्र के अध्ययन द्वारा विद्यार्थियों के नैतिक विकास को प्रोत्साहित करने का सुझाव दिया गया।

6. कृषि शिक्षा का विकास

भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व देखते हुए कर्जन ने कृषि शिक्षा को विशेष स्थान दिया।

उसने प्रत्येक प्रान्त में कृषि शिक्षा की व्यवस्था विकसित करने, कृषि महाविद्यालय स्थापित करने तथा पाठ्यक्रम में कृषि को सम्मिलित करने पर बल दिया।

कृषि सम्बन्धी उपयोगी पुस्तकों को भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने तथा कृषि अनुसंधान के लिए संस्थाएँ विकसित करने का भी सुझाव दिया गया।

7. पुरातत्त्व एवं ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण

कर्जन ने भारत की प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की आवश्यकता को भी महत्त्व दिया। भवनों, स्मारकों और ऐतिहासिक अवशेषों की देखभाल के लिए पुरातत्त्व विभाग को व्यवस्थित रूप देने के प्रयास किए गए।

ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण के लिए कानूनी व्यवस्था विकसित करने पर भी बल दिया गया, जिससे भारतीय सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखा जा सके।

8. केन्द्रीय शिक्षा विभाग की स्थापना

वुड के घोषणा-पत्र के बाद प्रान्तों में शिक्षा विभाग स्थापित हो चुके थे, परन्तु केन्द्रीय स्तर पर शिक्षा प्रशासन के लिए पर्याप्त संगठित व्यवस्था नहीं थी।

कर्जन ने केन्द्र में केन्द्रीय शिक्षा विभाग स्थापित करने और उसके संचालन के लिए डायरेक्टर जनरल ऑफ एजुकेशन जैसे उच्च अधिकारी की नियुक्ति की व्यवस्था की।

इससे विभिन्न प्रान्तों की शिक्षा-व्यवस्था के बीच समन्वय, निरीक्षण और नीति-निर्माण को अधिक व्यवस्थित रूप देने का प्रयास हुआ।

कर्जन के शिक्षा सुधारों की प्रमुख दिशा

कर्जन के सुधारों का केन्द्र केवल शिक्षा का विस्तार नहीं था। उसकी नीति में शिक्षा को अधिक संगठित, नियंत्रित, गुणवत्तापूर्ण और उपयोगी बनाने पर बल दिया गया।

प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा और बालोपयोगी शिक्षण, माध्यमिक स्तर पर प्रशिक्षित शिक्षक और व्यावसायिक विषय, उच्च स्तर पर गुणवत्ता सुधार तथा अन्य क्षेत्रों में स्त्री-शिक्षा, कृषि, नैतिक शिक्षा और प्रशासनिक संगठन—इन सभी को उसकी शिक्षा नीति में स्थान मिला।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्राथमिक शिक्षकों के लिए लगभग दो वर्ष के प्रशिक्षण तथा बेहतर वेतन और सेवा-शर्तों पर बल दिया गया।
  • प्राथमिक शिक्षा का प्रसार सरकार का महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व माना गया।
  • प्राथमिक स्तर पर भारतीय भाषाओं को माध्यम तथा बालकेन्द्रित शिक्षण-विधियों को प्रोत्साहन दिया गया।
  • माध्यमिक विद्यालयों की मान्यता, सहायता-अनुदान और प्रशिक्षित शिक्षकों के लिए निश्चित मानकों पर बल दिया गया।
  • माध्यमिक पाठ्यक्रम में व्यावसायिक विषयों को शामिल करने का सुझाव दिया गया।
  • विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के स्तर में सुधार तथा उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए अधिक धन उपलब्ध कराने की बात कही गई।
  • स्त्री-शिक्षा के लिए विद्यालय, योग्य अध्यापिकाएँ और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया।
  • विद्यार्थियों के चरित्र-निर्माण के लिए नैतिक शिक्षा को महत्त्व दिया गया।
  • कृषि महाविद्यालय, कृषि पाठ्यक्रम और कृषि अनुसंधान के विकास की दिशा में प्रयास किए गए।
  • ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण हेतु पुरातत्त्व सम्बन्धी व्यवस्था तथा केन्द्र में केन्द्रीय शिक्षा विभाग स्थापित करने पर बल दिया गया।
Topic 13 लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति का मूल्यांकन—गुण एवं दोष

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति का मूल्यांकन—गुण एवं दोष

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति का मूल्यांकन

लॉर्ड कर्जन ने भारतीय शिक्षा की तत्कालीन समस्याओं का गम्भीरता से अध्ययन किया और प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक शिक्षा में सुधार के अनेक प्रयास किए। उसकी नीति का मुख्य उद्देश्य शिक्षा की केवल संख्यात्मक वृद्धि करना नहीं था, बल्कि उसकी गुणवत्ता, प्रशासन, अनुशासन और व्यावहारिक उपयोगिता को भी बेहतर बनाना था।

कर्जन की शिक्षा नीति से प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के साथ कृषि, नैतिक शिक्षा तथा शिक्षा-प्रशासन के क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण सुधार हुए। दूसरी ओर उसकी अत्यधिक नियंत्रणवादी नीति के कारण शिक्षण संस्थाओं और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित हुई। इसलिए उसकी शिक्षा नीति में गुण और दोष दोनों दिखाई देते हैं।

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति के गुण

1. प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए अधिक धन

कर्जन ने प्राथमिक शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए सरकारी व्यय बढ़ाने पर बल दिया। इसका उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों की संख्या बढ़ाने के साथ उनकी गुणवत्ता में भी सुधार करना था।

इस प्रकार प्राथमिक शिक्षा के संख्यात्मक और गुणात्मक दोनों विकास को महत्त्व दिया गया।

2. केन्द्रीय शिक्षा प्रशासन को संगठित करना

कर्जन के समय केन्द्र में शिक्षा सम्बन्धी प्रशासन को अधिक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया गया। इससे विभिन्न प्रान्तों में चल रही शैक्षिक गतिविधियों के बीच समन्वय तथा शिक्षा-नीतियों के क्रियान्वयन में सहायता मिली।

केन्द्रीय स्तर पर शिक्षा प्रशासन की व्यवस्था बनने से शिक्षा के क्षेत्र में निरीक्षण, निर्देशन और योजना निर्माण अधिक संगठित हुआ।

3. माध्यमिक शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता में वृद्धि

कर्जन ने माध्यमिक शिक्षा के विस्तार एवं स्तर-सुधार के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता बढ़ाने का प्रयास किया।

इससे माध्यमिक विद्यालयों के विकास को गति मिली और उनकी शिक्षण व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की सम्भावना बढ़ी।

4. विश्वविद्यालय शिक्षा में सुधार

कर्जन के समय विश्वविद्यालय व्यवस्था में सुधार के लिए महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए। विश्वविद्यालयों के प्रशासन, महाविद्यालयों के शैक्षिक स्तर तथा उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर विशेष ध्यान दिया गया।

विश्वविद्यालयों को केवल परीक्षा लेने वाली संस्थाएँ न मानकर उनके शैक्षिक स्तर और प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में कार्य किया गया।

5. कृषि शिक्षा का विकास

भारत की कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए कर्जन ने कृषि शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया।

कृषि विभागों और कृषि महाविद्यालयों की स्थापना तथा कृषि सम्बन्धी अनुसंधान को प्रोत्साहित करने की दिशा में प्रयास किए गए। इससे शिक्षा को देश की व्यावहारिक आवश्यकताओं से जोड़ने में सहायता मिली।

6. नैतिक शिक्षा पर बल

कर्जन ने शिक्षा को केवल बौद्धिक ज्ञान प्राप्त करने का साधन नहीं माना। उसने विद्यार्थियों में अच्छे चरित्र, अनुशासन, परिश्रम और नैतिक गुणों के विकास को भी आवश्यक समझा।

इसलिए शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा को महत्त्वपूर्ण स्थान देने पर बल दिया गया।

7. शिक्षा को संकीर्ण धार्मिक दृष्टिकोण से अलग करने का प्रयास

कर्जन की नीति में सामान्य शिक्षा को संकीर्ण धार्मिक विवादों से अलग रखने और शिक्षा से सम्बन्धित समस्याओं को अधिक व्यावहारिक दृष्टि से हल करने का प्रयास दिखाई देता है।

इससे शिक्षा को किसी एक धार्मिक दृष्टिकोण तक सीमित रखने के बजाय व्यापक शैक्षिक उद्देश्यों से जोड़ने की दिशा मजबूत हुई।

8. व्यावहारिक ज्ञान को महत्त्व

कर्जन ने केवल सैद्धान्तिक और पुस्तकीय ज्ञान पर आधारित शिक्षा को पर्याप्त नहीं माना। उसने विद्यार्थियों को ऐसा ज्ञान देने पर बल दिया जिसका वास्तविक जीवन में उपयोग किया जा सके।

इसी कारण उसकी नीति में व्यावहारिक, व्यावसायिक और कृषि सम्बन्धी शिक्षा को महत्त्व मिला।

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति के दोष

1. सहायता-अनुदान के कठोर नियम

कर्जन की नीति में शिक्षण संस्थाओं को मान्यता और सहायता-अनुदान देने के लिए अनेक कठोर शर्तें निर्धारित की गईं।

इन नियमों का पालन करना कई विद्यालयों के लिए कठिन था। परिणामस्वरूप विशेष रूप से माध्यमिक शिक्षा के विस्तार की गति प्रभावित हुई।

2. महाविद्यालयों की सम्बद्धता के नियम अधिक कठोर

विश्वविद्यालयों से महाविद्यालयों को सम्बद्ध करने के लिए कड़े नियम बनाए गए। इनका उद्देश्य गुणवत्ता बनाए रखना था, लेकिन अत्यधिक कठोरता के कारण नए महाविद्यालयों के विकास और विस्तार में कठिनाई उत्पन्न हुई।

3. विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता में कमी

कर्जन ने विश्वविद्यालयों के प्रशासन पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाया। इससे विश्वविद्यालयों को अपने शैक्षिक और प्रशासनिक निर्णय स्वतंत्र रूप से लेने की गुंजाइश कम हो गई।

इस कारण उसकी विश्वविद्यालय नीति को अत्यधिक नियंत्रणवादी माना गया।

4. नए विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के विस्तार पर पर्याप्त ध्यान नहीं

कर्जन ने पहले से स्थापित विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने पर तो विशेष ध्यान दिया, लेकिन नए उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना और व्यापक विस्तार के लिए उतने प्रभावी उपाय नहीं किए।

इससे विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या बढ़ने की गति अपेक्षाकृत धीमी रही।

कर्जन की नीति में गुणवत्ता और नियंत्रण

कर्जन की शिक्षा नीति की सबसे प्रमुख विशेषता गुणवत्ता सुधार और प्रशासनिक नियंत्रण थी। उसका विश्वास था कि केवल विद्यालयों और महाविद्यालयों की संख्या बढ़ाने से अच्छी शिक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।

इसलिए उसने मान्यता, निरीक्षण, प्रशिक्षित शिक्षक, परीक्षा, पाठ्यक्रम तथा प्रशासन के लिए अधिक स्पष्ट और कठोर मानदण्ड अपनाए।

इन प्रयासों से शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार हुआ, लेकिन अधिक सरकारी नियंत्रण के कारण शिक्षण संस्थाओं की स्वतंत्रता भी सीमित हुई। यही उसकी नीति की सबसे बड़ी विशेषता और साथ ही प्रमुख आलोचना भी बनी।

भारतीय शिक्षा में कर्जन का योगदान

कर्जन ने अपने शासनकाल में भारतीय शिक्षा की कमियों की पहचान करके उन्हें दूर करने के लिए विभिन्न स्तरों पर सुधार किए। प्राथमिक शिक्षा में अधिक धन, माध्यमिक शिक्षा में गुणवत्ता, विश्वविद्यालयों के प्रशासन में सुधार, कृषि शिक्षा, नैतिक शिक्षा और व्यावहारिक ज्ञान पर बल उसके प्रमुख योगदान थे।

उसकी नीतियों के प्रति भारतीयों में अविश्वास भी था, क्योंकि उसके कई कदम सरकारी नियंत्रण बढ़ाने वाले थे। फिर भी भारतीय शिक्षा के प्रशासन और गुणवत्ता सुधार में उसके प्रयासों को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

समग्र मूल्यांकन

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति को पूर्णतः अच्छी या पूर्णतः दोषपूर्ण नहीं माना जा सकता। उसने शिक्षा की वास्तविक समस्याओं को पहचाना और अनेक क्षेत्रों में उपयोगी सुधार किए, परन्तु सुधार लागू करने का उसका तरीका अत्यधिक केन्द्रीयकृत और नियंत्रणवादी था।

इसलिए एक ओर उसकी नीति ने शिक्षा के स्तर, प्रशासन, कृषि शिक्षा, नैतिक शिक्षा और व्यावहारिक ज्ञान के विकास में योगदान दिया, वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं की स्वायत्तता को सीमित कर दिया।

इन सीमाओं के बावजूद भारतीय शिक्षा के संगठन और स्तर को सुधारने के लिए किए गए उसके प्रयास भारतीय शिक्षा के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कर्जन की शिक्षा नीति का मुख्य जोर शिक्षा की गुणवत्ता, प्रशासन और व्यावहारिक उपयोगिता सुधारने पर था।
  • प्राथमिक शिक्षा के संख्यात्मक और गुणात्मक विकास के लिए सरकारी धन में वृद्धि की गई।
  • केन्द्रीय स्तर पर शिक्षा प्रशासन को अधिक संगठित किया गया।
  • माध्यमिक शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता बढ़ाई गई और विश्वविद्यालय शिक्षा में सुधार के प्रयास किए गए।
  • कृषि शिक्षा, नैतिक शिक्षा और व्यावहारिक ज्ञान को विशेष महत्त्व दिया गया।
  • नीति का प्रमुख दोष यह था कि मान्यता एवं सहायता-अनुदान के नियम अत्यधिक कठोर थे।
  • महाविद्यालयों की सम्बद्धता के कठोर नियमों से उनके विस्तार में बाधा उत्पन्न हुई।
  • विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता कम हुई और सरकारी नियंत्रण बढ़ा।
  • नए विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के व्यापक विस्तार के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई।
  • समग्र रूप से कर्जन ने भारतीय शिक्षा के स्तर और प्रशासन को सुधारने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन उसकी नीति अत्यधिक नियंत्रणवादी भी थी।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

संसद द्वारा ईस्ट इंडिया कम्पनी के आज्ञा-पत्र का कितने वर्षों के बाद पुनरावर्तन किया जाता था?

व्याख्या: ईस्ट इंडिया कम्पनी के आज्ञा-पत्र का लगभग प्रत्येक 20 वर्ष बाद ब्रिटिश संसद द्वारा पुनरावर्तन किया जाता था।
Q 2

1813 के आज्ञा-पत्र में किसे सर्वोच्च माना गया है?

व्याख्या: 1813 के आज्ञा-पत्र ने भारतीयों की शिक्षा के प्रसार की जिम्मेदारी को ईस्ट इंडिया कम्पनी के उत्तरदायित्व से जोड़ा।
Q 3

लॉर्ड मैकाले भारत के गवर्नर जनरल की काउन्सिल के कानूनी सलाहकार के पद पर कब नियुक्त हुए?

व्याख्या: लॉर्ड मैकाले 10 जून 1834 को गवर्नर जनरल की काउन्सिल के कानूनी सदस्य के रूप में नियुक्त हुए।
Q 4

निस्पंदन सिद्धान्त का जनक किसे माना जाता है?

व्याख्या: शिक्षा के क्षेत्र में निस्पंदन या छनन सिद्धान्त को व्यवस्थित रूप से समर्थन देने के कारण लॉर्ड मैकाले को इसका प्रमुख प्रतिपादक माना जाता है।
Q 5

भारतीय शिक्षा आयोग, 1882 को अन्य किस नाम से जाना जाता है?

व्याख्या: भारतीय शिक्षा आयोग, 1882 के अध्यक्ष सर विलियम हंटर थे, इसलिए इसे हंटर आयोग कहा जाता है।
Q 6

भारतीय शिक्षा आयोग, 1882 का गठन किसकी अध्यक्षता में हुआ?

व्याख्या: सन् 1882 में लॉर्ड रिपन ने सर विलियम हंटर की अध्यक्षता में भारतीय शिक्षा आयोग का गठन किया।
Q 7

हर्टोग समिति का गठन किसकी अध्यक्षता में हुआ?

व्याख्या: हर्टोग समिति की अध्यक्षता सर फिलिप हर्टोग ने की थी।
Q 8

मैकाले ने अपना प्रसिद्ध विवरण-पत्र कब प्रस्तुत किया?

व्याख्या: मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को अपना प्रसिद्ध विवरण-पत्र प्रस्तुत किया, जिसने प्राच्य-पाश्चात्य विवाद को निर्णायक दिशा दी।
Q 9

लॉर्ड विलियम बैंटिक ने नई शिक्षा नीति की घोषणा कब की?

व्याख्या: मैकाले के सुझावों को स्वीकार करते हुए लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 7 मार्च 1835 को नई शिक्षा नीति घोषित की।
Q 10

लॉर्ड ऑकलैंड ने प्राच्य-पाश्चात्य विवाद के समाधान के लिए अपना विवरण-पत्र कब जारी किया?

व्याख्या: लॉर्ड ऑकलैंड ने 24 नवम्बर 1839 को अपना विवरण-पत्र जारी कर प्राच्य और पाश्चात्य शिक्षा में संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया।
Q 11

वुड का घोषणा-पत्र कब जारी किया गया?

व्याख्या: ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 19 जुलाई 1854 को वुड का घोषणा-पत्र जारी किया।
Q 12

वुड के घोषणा-पत्र के समय बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष कौन थे?

व्याख्या: 1854 में सर चार्ल्स वुड बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष थे, इसलिए यह शिक्षा दस्तावेज वुड के घोषणा-पत्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
Q 13

किस शिक्षा दस्तावेज को भारतीय शिक्षा का महाधिकार-पत्र कहा जाता है?

व्याख्या: वुड का घोषणा-पत्र, 1854 अपनी व्यापक शैक्षिक सिफारिशों के कारण भारतीय शिक्षा का महाधिकार-पत्र (Magna Carta of Indian Education) कहलाता है।
Q 14

भारतीय शिक्षा आयोग (हंटर आयोग) का गठन किस वर्ष किया गया?

व्याख्या: लॉर्ड रिपन ने सन् 1882 में सर विलियम हंटर की अध्यक्षता में भारतीय शिक्षा आयोग का गठन किया।
Q 15

लॉर्ड कर्जन ने शिमला शिक्षा सम्मेलन का आयोजन किस वर्ष किया?

व्याख्या: भारतीय शिक्षा के पुनर्गठन और सुधार पर विचार करने के लिए लॉर्ड कर्जन ने 1901 में शिमला शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP DELED Semester 2 के विषय प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास के अध्याय प्रारम्भिक शिक्षा के सन्दर्भ में गठित आयोग एवं समितियाँ से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

पाश्चात्य साहित्य के विषय में मैकाले के सुझाव को व्यक्त कीजिए।

Q 2

निस्पंदन या छनन सिद्धान्त से आप क्या समझते हैं?

Q 3

बैंटिक की शिक्षा नीति से आप क्या समझते हैं?

Q 4

वुड के घोषणा-पत्र की सिफारिशों का वर्णन कीजिए।

Q 5

हंटर आयोग से आप क्या समझते हैं?

Q 6

कर्जन ने माध्यमिक शिक्षा सम्बन्धी क्या सुझाव दिए?

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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