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Home Study Material Semester 2 प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास प्रारम्भिक शिक्षा के लिए कार्यक्रम–प्रथम
Chapter 5 • प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास

प्रारम्भिक शिक्षा के लिए कार्यक्रम–प्रथम

UP DELED Semester 2 के विषय प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास के इस अध्याय में ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड, सेवारत अध्यापकों के विस्तृत अभिविन्यास कार्यक्रम (P-MOST), प्राथमिक शिक्षकों के विशेष अनुस्थापन कार्यक्रम (SOPT), बेसिक शिक्षा परियोजना (BEP), जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP), विद्यालय शिक्षा की तैयारी कार्यक्रम तथा सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के उद्देश्यों, विशेषताओं, कार्यों, प्रशिक्षण व्यवस्थाओं, क्रियान्वयन, परिणामों एवं महत्त्व का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

6
Topics
15
MCQs
10+
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Notes
Topic 1 ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड—परिचय, उद्देश्य, शिक्षण सामग्री, सुविधाएँ, विशेषताएँ एवं महत्त्व

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड—परिचय, उद्देश्य, शिक्षण सामग्री, सुविधाएँ, विशेषताएँ एवं महत्त्व

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का परिचय

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड (Operation Blackboard) भारत सरकार द्वारा प्रारम्भिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने तथा प्राथमिक विद्यालयों में न्यूनतम आवश्यक शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए शुरू किया गया एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम था।

स्वतन्त्रता के बाद देश में प्राथमिक शिक्षा का विस्तार हुआ, लेकिन अनेक विद्यालयों में पर्याप्त भवन, कक्षा-कक्ष, शिक्षक तथा शिक्षण सामग्री उपलब्ध नहीं थी। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित विद्यालय इन समस्याओं से प्रभावित थे।

अनेक प्राथमिक विद्यालयों में केवल एक या दो कमरे थे। कुछ विद्यालयों में एक ही शिक्षक द्वारा सभी कक्षाओं का संचालन किया जाता था। ऐसी स्थिति में बच्चों को उचित शिक्षण वातावरण उपलब्ध कराना कठिन था।

इन समस्याओं को दूर करने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड कार्यक्रम प्रारम्भ करने का प्रस्ताव किया गया।

इस योजना की शुरुआत 1987–88 में की गई। इसका मुख्य उद्देश्य प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम आवश्यक भवन, शिक्षक तथा शिक्षण-अधिगम सामग्री उपलब्ध कराकर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना था।

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का अर्थ

इस योजना के नाम में ऑपरेशन का अर्थ किसी निर्धारित कार्य को प्राथमिकता के साथ शीघ्र पूरा करने के अभियान से है, जबकि ब्लैक बोर्ड विद्यालय की आधारभूत शिक्षण सुविधाओं का प्रतीक है।

इस प्रकार ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का अर्थ केवल विद्यालयों में श्यामपट्ट उपलब्ध कराना नहीं था। इसका उद्देश्य विद्यालयों में शिक्षकों, कक्षा-कक्षों, शौचालयों तथा आवश्यक शिक्षण-अधिगम सामग्री की व्यवस्था करना भी था।

1. ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की पृष्ठभूमि एवं विकास

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड कार्यक्रम का विकास प्राथमिक शिक्षा की आवश्यकताओं तथा विद्यालयों में उपलब्ध सुविधाओं की कमी को ध्यान में रखकर किया गया।

1. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में प्रस्ताव

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में प्राथमिक विद्यालयों की खराब स्थिति सुधारने, आवश्यक शिक्षण सुविधाएँ उपलब्ध कराने तथा शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने पर विशेष बल दिया गया।

इसके अन्तर्गत ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड कार्यक्रम प्रारम्भ करने का प्रस्ताव किया गया।

2. वर्ष 1987–88 में शुरुआत

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की शुरुआत 1987–88 में हुई।

प्रारम्भिक व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध कराने पर बल दिया गया—

  • दो उपयुक्त कक्षा-कक्ष।
  • कम से कम दो शिक्षक।
  • प्रत्येक कक्षा के लिए श्यामपट्ट।
  • आवश्यक शिक्षण-अधिगम सामग्री।
  • खेल सामग्री एवं खिलौने।
  • पुस्तकालय के लिए पुस्तकें।
  • विद्यालय की आवश्यक भौतिक सुविधाएँ।

विद्यालयों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय, विद्यालय की चारदीवारी तथा शिक्षण वातावरण को बेहतर बनाने सम्बन्धी सुविधाओं का भी उल्लेख किया गया।

3. वर्ष 1992 में संशोधन

पुस्तक में वर्ष 1992 में ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना में संशोधन किए जाने का उल्लेख है।

इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन सुझाव प्रस्तुत किए गए—

  1. योजना का विस्तार— शेष विद्यालयों, विशेषकर अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों के विद्यालयों तक योजना पहुँचाई जाए।
  2. अधिक शिक्षकों एवं कक्षों की व्यवस्था— नामांकित बच्चों की संख्या तथा आवश्यकता के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों में तीन शिक्षकों और तीन कमरों की व्यवस्था की जाए।
  3. उच्च प्राथमिक स्तर तक विस्तार— ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना का विस्तार उच्च प्राथमिक विद्यालयों तक किया जाए।
4. वर्ष 1993–94 में योजना का विस्तार

वर्ष 1993–94 में ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना का विस्तार किया गया।

इस विस्तार के अन्तर्गत अधिक नामांकन वाले प्राथमिक विद्यालयों में तीसरे शिक्षक एवं तीसरे कक्षा-कक्ष की व्यवस्था तथा उच्च प्राथमिक विद्यालयों में अतिरिक्त शिक्षक और शिक्षण-अधिगम सामग्री उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।

सरकारी अभिलेखों के अनुसार तीन शिक्षक एवं तीन कक्षा-कक्ष का विस्तारित प्रावधान 100 से अधिक विद्यार्थियों वाले प्राथमिक विद्यालयों से सम्बन्धित था।

इस योजना को राज्य सरकारों के माध्यम से लागू किया गया। केन्द्र सरकार द्वारा राज्यों को शिक्षण-अधिगम उपकरण (Teaching Learning Equipment—TLE) तथा अतिरिक्त शिक्षकों के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की गई।

2. ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के उद्देश्य

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का प्रमुख उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों में न्यूनतम आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराकर शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाना था।

पुस्तक के अनुसार इस कार्यक्रम के चार प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं।

1. श्यामपट्ट एवं चॉक की व्यवस्था करना

सभी प्राथमिक विद्यालयों में श्यामपट्ट (Blackboard) तथा चॉक उपलब्ध कराना इस योजना का प्रमुख उद्देश्य था।

श्यामपट्ट शिक्षण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। इसके माध्यम से शिक्षक विषयवस्तु को लिखकर तथा आवश्यक चित्र या उदाहरण बनाकर बच्चों को समझा सकता है।

इसलिए प्रत्येक कक्षा के लिए श्यामपट्ट की व्यवस्था को आवश्यक माना गया।

2. आवश्यक शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना

प्राथमिक विद्यालयों में पर्याप्त कक्षा-कक्ष, पाठ्यसामग्री तथा शिक्षण उपकरण जैसी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना।

इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था विकसित करना था जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी बिना अनावश्यक कठिनाई के शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में भाग ले सकें।

3. प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना

प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था।

इसके लिए शिक्षकों को आवश्यक शिक्षण सामग्री तथा विद्यार्थियों को उपयुक्त अधिगम वातावरण उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।

इससे शिक्षण को अधिक प्रभावशाली, रुचिकर तथा उपयोगी बनाने का प्रयास किया गया।

4. प्राथमिक शिक्षा में परिमाणात्मक सुधार करना

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का एक उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा में परिमाणात्मक सुधार करना भी था।

परिमाणात्मक सुधार का अर्थ है शिक्षा के अवसरों, विद्यालयी सुविधाओं तथा बच्चों की विद्यालयी सहभागिता में वृद्धि करना।

विद्यालयों में आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराने से अधिक बच्चों को शिक्षा से जोड़ने तथा विद्यालय में बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।

3. ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के अन्तर्गत विद्यालयों को दी गई शिक्षण सामग्री

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के अन्तर्गत विद्यालयों को शिक्षण कार्य के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया।

इन सामग्रियों का उद्देश्य शिक्षकों को प्रभावशाली शिक्षण में सहायता देना तथा बच्चों के लिए सीखने की प्रक्रिया को अधिक रुचिकर बनाना था।

पुस्तक में निम्नलिखित 15 प्रकार की सामग्री एवं सुविधाओं का उल्लेख किया गया है।

  1. शिक्षण उपकरण— पाठ्यक्रम, शिक्षक सन्दर्शिका तथा पाठ्यपुस्तकें।
  2. कक्षा शिक्षण सामग्री— मानचित्र, ग्लोब तथा चार्ट आदि।
  3. चटाई— बच्चों के बैठने के लिए चटाइयों की व्यवस्था।
  4. शिक्षकों के लिए कुर्सियाँ— शिक्षकों के बैठने हेतु आवश्यक फर्नीचर।
  5. ब्लैक बोर्ड— कक्षाओं में शिक्षण कार्य के लिए श्यामपट्ट।
  6. खेल सामग्री एवं खिलौने— बच्चों की रुचि तथा गतिविधि आधारित अधिगम के लिए।
  7. विज्ञान किट— विज्ञान सम्बन्धी गतिविधियों तथा प्रयोगों के लिए आवश्यक सामग्री।
  8. लघु यन्त्र किट— पेंचकस, प्लास आदि छोटे औजार।
  9. श्रव्य उपकरण— रेडियो जैसे उपकरण।
  10. आकस्मिक व्यय हेतु धन— आवश्यक आकस्मिक खर्चों के लिए शिक्षकों को धन उपलब्ध कराना।
  11. कक्षा-कक्ष— विद्यालय में आवश्यक शिक्षण कक्षों की व्यवस्था।
  12. शौचालय— विद्यालय में शौचालय की सुविधा।
  13. पुस्तकालय हेतु पुस्तकें— विद्यार्थियों के पठन-पाठन के लिए पुस्तकें।
  14. विद्यालय की घंटी— विद्यालय की समय-सारिणी एवं गतिविधियों के संचालन के लिए।
  15. संगीत उपकरण— ढोलक, तबला तथा हारमोनियम आदि।

इन शिक्षण सामग्रियों में पुस्तकों के साथ मानचित्र, ग्लोब, विज्ञान किट, खिलौनों तथा संगीत उपकरणों को भी सम्मिलित किया गया।

इससे स्पष्ट होता है कि योजना में केवल पुस्तकीय शिक्षा पर ही नहीं, बल्कि गतिविधियों, प्रयोगों, खेल तथा अन्य अनुभवों के माध्यम से सीखने पर भी ध्यान दिया गया।

4. ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के अन्तर्गत दी गई सुविधाएँ

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के अन्तर्गत विद्यालयों की भौतिक तथा शैक्षिक स्थिति सुधारने के लिए विभिन्न सुविधाओं का प्रावधान किया गया।

पुस्तक के अनुसार इसकी सात प्रमुख सुविधाएँ निम्नलिखित हैं।

1. दो बड़े कक्षा-कक्ष एवं बरामदे की व्यवस्था

प्राथमिक विद्यालयों में कम से कम दो बड़े कमरे तथा उनके सामने बरामदे की व्यवस्था की जाए।

पुस्तक में प्रत्येक कमरे का न्यूनतम क्षेत्रफल 30 वर्गमीटर तथा बरामदे की चौड़ाई लगभग 9–10 फीट बताई गई है।

इसका उद्देश्य बच्चों को बैठने और अध्ययन करने के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध कराना था।

2. दो शिक्षकों की व्यवस्था

प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम दो शिक्षक होने चाहिए।

पुस्तक में इनमें से एक महिला शिक्षिका की व्यवस्था करने पर भी बल दिया गया है।

इस प्रावधान का उद्देश्य एकल-शिक्षक विद्यालयों की समस्या कम करना तथा बच्चों के शिक्षण की व्यवस्था बेहतर बनाना था।

3. आवश्यक शिक्षण-अधिगम सामग्री उपलब्ध कराना

विद्यालयों में शिक्षण तथा अधिगम के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जाए।

इसमें श्यामपट्ट, पाठ्यपुस्तकें, चार्ट, मानचित्र, ग्लोब, खिलौने तथा अन्य उपयोगी उपकरण सम्मिलित हैं।

इन साधनों से शिक्षक विषयवस्तु को अधिक स्पष्ट तथा रोचक ढंग से समझा सकता है।

4. विद्यालय एवं कक्षा को आकर्षक बनाना

विद्यालय भवन तथा कक्षा-कक्षों को बच्चों के लिए आकर्षक और उपयोगी बनाया जाए।

इस उद्देश्य के लिए स्वच्छता, शिक्षण सामग्री तथा उपयुक्त कक्षागत व्यवस्था पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई।

आकर्षक विद्यालयी वातावरण से बच्चों में विद्यालय आने और सीखने की रुचि विकसित हो सकती है।

5. बालक-केंद्रित शिक्षा की व्यवस्था

शिक्षण प्रक्रिया का केन्द्र बालक को माना जाए।

बालक-केंद्रित शिक्षा का अर्थ है ऐसी शिक्षा जिसमें बच्चों की रुचियों, योग्यताओं तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर शिक्षण किया जाए।

इसके लिए बच्चों को विभिन्न गतिविधियों और शिक्षण सामग्री के माध्यम से सीखने के अवसर प्रदान किए जाएँ।

6. लड़कों एवं लड़कियों के लिए अलग शौचालय

प्रत्येक विद्यालय में बालकों तथा बालिकाओं के लिए अलग-अलग शौचालयों की व्यवस्था होनी चाहिए।

इसके साथ शौचालयों की नियमित साफ-सफाई पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

इसका उद्देश्य विद्यालय में स्वच्छ तथा सुविधाजनक वातावरण प्रदान करना है।

7. पुस्तकालय की व्यवस्था

प्रत्येक विद्यालय में पुस्तकालय की सुविधा उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया।

पुस्तकालय में बच्चों के अध्ययन के लिए आवश्यक पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएँ।

इससे विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें पढ़ने तथा अपने ज्ञान को विकसित करने के अवसर प्राप्त होते हैं।

5. ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की प्रमुख विशेषताएँ

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की प्रमुख विशेषता विद्यालयों में आवश्यक भौतिक सुविधाओं तथा शिक्षण-अधिगम सामग्री की व्यवस्था करना थी।

पुस्तक में इसकी पाँच प्रमुख विशेषताएँ बताई गई हैं।

1. कक्षा-कक्षों के सौन्दर्यीकरण पर बल

कक्षा-कक्षों को आकर्षक बनाने के लिए चार्ट, खिलौने तथा ग्लोब जैसी आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया।

इससे बच्चों के लिए कक्षा का वातावरण अधिक रुचिकर तथा शिक्षण के अनुकूल बनाया जा सकता है।

2. विद्यालय भवनों के लिए सरकारी धन की व्यवस्था

विद्यालय भवनों को आकर्षक तथा उपयोगी बनाने के लिए सरकारी धनराशि उपलब्ध कराने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया।

इसका उद्देश्य विद्यालयों की भौतिक स्थिति सुधारना तथा बच्चों के लिए बेहतर शिक्षण वातावरण तैयार करना था।

3. बालक-केंद्रित शिक्षण को महत्त्व

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के अन्तर्गत शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में बालक को केन्द्र माना गया।

बच्चों की रुचियों एवं क्षमताओं के अनुसार शिक्षण सामग्री और गतिविधियों की व्यवस्था करने पर बल दिया गया।

इससे शिक्षा को बच्चों की आवश्यकताओं के अधिक अनुरूप बनाया जा सकता है।

4. शिक्षण-अधिगम सामग्री के लिए वित्तीय व्यवस्था

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में आवश्यक विभिन्न सामग्रियों के लिए आर्थिक व्यवस्था की गई।

इनमें शिक्षकों के लिए आवश्यक सामग्री, कक्षागत शिक्षण सामग्री तथा खेल सामग्री आदि सम्मिलित हैं।

इसका उद्देश्य विद्यालयों में शिक्षण सामग्री की कमी को दूर करना था।

5. सामग्री की गुणवत्ता एवं मानक निर्धारित करना

योजना में उपलब्ध कराई जाने वाली सामग्री की गुणवत्ता बनाए रखने पर भी ध्यान दिया गया।

इसके लिए विभिन्न मदों के मानक तथा उनकी विशेषताओं का निर्धारण किया गया।

इससे विद्यालयों को दी जाने वाली सामग्री को निर्धारित आवश्यकताओं के अनुरूप रखने का प्रयास किया गया।

6. ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की आवश्यकता एवं महत्त्व

भारत में प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति सुधारने तथा बच्चों को आवश्यक शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड कार्यक्रम महत्त्वपूर्ण था।

पुस्तक के अनुसार इस योजना की आवश्यकता एवं महत्त्व को निम्नलिखित चार प्रमुख बिन्दुओं से समझा जा सकता है।

1. उत्तम शिक्षा की प्राप्ति के लिए

उत्तम शिक्षा के लिए योग्य शिक्षक के साथ-साथ उचित शैक्षिक वातावरण एवं आवश्यक शिक्षण सामग्री का होना भी जरूरी है।

यदि शिक्षक के पास श्यामपट्ट, चॉक, डस्टर, पाठ्यपुस्तकें तथा अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध न हो, तो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाना कठिन हो सकता है।

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के माध्यम से विद्यालयों में ऐसी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।

इससे शिक्षकों को अपने शिक्षण कार्य में सहायता मिलने तथा विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा प्राप्त करने के अवसर बढ़ने की अपेक्षा थी।

2. उचित शैक्षिक वातावरण के निर्माण के लिए

बच्चों की प्रभावशाली शिक्षा के लिए विद्यालय में सुरक्षित, स्वच्छ तथा अनुकूल शैक्षिक वातावरण होना आवश्यक है।

यदि विद्यालय में पर्याप्त भवन तथा कक्षा-कक्ष उपलब्ध न हों, तो बच्चों को खुले स्थान पर बैठकर शिक्षा प्राप्त करनी पड़ सकती है।

ऐसी स्थिति में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियाँ शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं।

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के अन्तर्गत कक्षा-कक्ष, बरामदे तथा आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराने का उद्देश्य ऐसी समस्याओं को कम करना था।

इस प्रकार यह योजना विद्यालयों में बेहतर शैक्षिक वातावरण के निर्माण के लिए महत्त्वपूर्ण थी।

3. अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या कम करने के लिए

प्राथमिक शिक्षा में अपव्यय तथा अवरोधन महत्त्वपूर्ण समस्याएँ रही हैं।

अपव्यय (Wastage) का अर्थ है किसी विद्यार्थी का प्राथमिक शिक्षा पूरी किए बिना विद्यालय छोड़ देना।

अवरोधन (Stagnation) का अर्थ है विद्यार्थी का अपेक्षित समय में अगली कक्षा में प्रगति न कर पाना और उसी कक्षा में रुक जाना।

विद्यालयों में भवन, शिक्षक तथा अन्य सुविधाओं की कमी के कारण बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। ऐसी परिस्थितियाँ उनके विद्यालय छोड़ने या पढ़ाई में पिछड़ने का कारण बन सकती हैं।

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के माध्यम से विद्यालयों में आवश्यक शैक्षिक एवं भौतिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने को प्राथमिकता दी गई।

इसका उद्देश्य बच्चों की विद्यालयी शिक्षा में निरन्तरता बनाए रखना तथा अपव्यय एवं अवरोधन की समस्याओं को कम करने में सहायता करना था।

4. शिक्षा के सार्वभौमीकरण के लिए

शिक्षा का सार्वभौमीकरण का अर्थ है सभी बच्चों तक शिक्षा के अवसर पहुँचाना तथा उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ उपलब्ध कराना।

भारत में बड़ी संख्या में लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। अनेक परिवारों की आर्थिक परिस्थितियाँ भी कमजोर होती हैं।

ऐसे क्षेत्रों में यदि विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, भवन तथा शिक्षण सुविधाएँ उपलब्ध न हों, तो अभिभावकों की बच्चों को विद्यालय भेजने में रुचि कम हो सकती है।

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के अन्तर्गत विद्यालयों को आवश्यक सुविधाओं से सम्पन्न बनाकर बच्चों तथा अभिभावकों को विद्यालयी शिक्षा के प्रति आकर्षित करने का प्रयास किया गया।

इस प्रकार इस कार्यक्रम का उद्देश्य अधिक बच्चों को विद्यालय से जोड़कर प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण में सहयोग प्रदान करना था।

7. ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का समग्र महत्त्व

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड प्राथमिक विद्यालयों में न्यूनतम आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक कार्यक्रम था।

इस योजना में विद्यालय भवन, कक्षा-कक्ष, शिक्षकों की उपलब्धता, श्यामपट्ट, पाठ्यपुस्तकों, शिक्षण-अधिगम सामग्री तथा स्वच्छता सम्बन्धी सुविधाओं को महत्त्व दिया गया।

इसके माध्यम से विद्यालयों में बेहतर वातावरण विकसित करने, शिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाने तथा बच्चों की विद्यालयी शिक्षा में आने वाली कठिनाइयों को कम करने का प्रयास किया गया।

इस प्रकार ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का प्रमुख महत्त्व प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, अपव्यय एवं अवरोधन को कम करने तथा शिक्षा के सार्वभौमीकरण में सहायता प्रदान करने से सम्बन्धित है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड प्राथमिक विद्यालयों में न्यूनतम आवश्यक शैक्षिक एवं भौतिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने का कार्यक्रम था।
  • इस योजना का प्रस्ताव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में किया गया था।
  • ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की शुरुआत 1987–88 में हुई।
  • पुस्तक में वर्ष 1992 में संशोधन का उल्लेख है, जबकि सरकारी अभिलेखों के अनुसार योजना का विस्तार 1993–94 में किया गया।
  • प्रारम्भिक व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम दो कमरे तथा दो शिक्षक उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।
  • विस्तारित व्यवस्था में अधिक नामांकन वाले प्राथमिक विद्यालयों के लिए तीसरे शिक्षक तथा तीसरे कक्षा-कक्ष और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में अतिरिक्त सुविधाओं का प्रावधान किया गया।
  • पुस्तक में ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के 4 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
  • इसके उद्देश्य थे—श्यामपट्ट एवं चॉक की व्यवस्था, आवश्यक शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना, प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना तथा परिमाणात्मक सुधार करना।
  • पुस्तक में योजना के अन्तर्गत 15 प्रकार की सामग्री एवं सुविधाओं का उल्लेख किया गया है।
  • प्रमुख शिक्षण सामग्री में श्यामपट्ट, मानचित्र, ग्लोब, चार्ट, विज्ञान किट, खिलौने, रेडियो, पुस्तकें तथा संगीत उपकरण सम्मिलित थे।
  • पुस्तक में इस योजना की 7 प्रमुख सुविधाएँ बताई गई हैं।
  • विद्यालय में कम से कम 30 वर्गमीटर क्षेत्रफल वाले दो बड़े कमरे तथा लगभग 9–10 फीट चौड़े बरामदे का उल्लेख किया गया है।
  • प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम दो शिक्षक रखने तथा उनमें एक महिला शिक्षिका की व्यवस्था पर बल दिया गया।
  • विद्यालयों में बालक-केंद्रित शिक्षा, अलग-अलग शौचालयों, पुस्तकालय तथा आवश्यक शिक्षण सामग्री की व्यवस्था को महत्त्व दिया गया।
  • ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की 5 प्रमुख विशेषताएँ हैं—कक्षाओं का सौन्दर्यीकरण, भवनों के लिए धन, बालक-केंद्रित शिक्षण, सामग्री के लिए वित्तीय व्यवस्था तथा गुणवत्ता के मानक।
  • इस योजना की आवश्यकता एवं महत्त्व के 4 प्रमुख आधार हैं—उत्तम शिक्षा, अच्छा शैक्षिक वातावरण, अपव्यय एवं अवरोधन में कमी तथा शिक्षा का सार्वभौमीकरण।
  • अपव्यय का अर्थ प्राथमिक शिक्षा पूरी किए बिना विद्यालय छोड़ना तथा अवरोधन का अर्थ विद्यार्थी का एक ही कक्षा में रुक जाना है।
  • ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का मुख्य उद्देश्य आवश्यक सुविधाओं के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा को अधिक प्रभावशाली एवं गुणवत्तापूर्ण बनाना था।
Topic 2 सेवारत अध्यापकों का विस्तृत अभिविन्यास कार्यक्रम (P-MOST) एवं प्राथमिक शिक्षकों का विशेष अनुस्थापन कार्यक्रम (SOPT)

सेवारत अध्यापकों का विस्तृत अभिविन्यास कार्यक्रम (P-MOST) एवं प्राथमिक शिक्षकों का विशेष अनुस्थापन कार्यक्रम (SOPT)

1. सेवारत अध्यापकों का विस्तृत अभिविन्यास कार्यक्रम (P-MOST)

पी-मोस्ट (P-MOST) का पूरा नाम Programme for Mass Orientation of School Teachers है। इसे हिन्दी में सेवारत अध्यापकों का विस्तृत अभिविन्यास कार्यक्रम कहा जाता है।

इस कार्यक्रम की शुरुआत 1986 में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा की गई थी।

इसका मुख्य उद्देश्य प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर पर कार्यरत शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की प्रमुख सिफारिशों से परिचित कराना तथा उनकी व्यावसायिक दक्षता का विकास करना था।

शिक्षा की गुणवत्ता केवल पाठ्यक्रम या विद्यालयी सुविधाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि शिक्षक की योग्यता, शिक्षण-कौशल और शिक्षण-विधियों पर भी निर्भर करती है।

इसलिए P-MOST के माध्यम से सेवारत शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण-विधियों, शिक्षण सामग्री के प्रयोग तथा बाल-केंद्रित शिक्षा का प्रशिक्षण देने पर बल दिया गया।

अभिविन्यास का अर्थ

अभिविन्यास (Orientation) का अर्थ है किसी व्यक्ति को नए उद्देश्यों, विचारों, कार्य-विधियों तथा उत्तरदायित्वों से परिचित कराना।

शिक्षक अभिविन्यास का उद्देश्य पहले से कार्यरत शिक्षकों को नवीन शैक्षिक विचारों और शिक्षण-विधियों के अनुरूप तैयार करना है।

2. P-MOST कार्यक्रम की पृष्ठभूमि एवं विकास

1. वर्ष 1986 में प्रारम्भ

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने तथा शिक्षकों की व्यावसायिक योग्यता बढ़ाने पर बल दिया गया।

इसी उद्देश्य से NCERT द्वारा वर्ष 1986 में P-MOST कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया।

इसके अन्तर्गत शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के नवीन विचारों तथा प्रभावशाली शिक्षण-अधिगम की विधियों से परिचित कराया गया।

2. प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण

पुस्तक के अनुसार P-MOST की प्रशिक्षण सामग्री को दो भागों में विभाजित किया गया था—

  1. प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के लिए।
  2. माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों के लिए।

इस व्यवस्था का उद्देश्य दोनों शैक्षिक स्तरों के शिक्षकों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार प्रशिक्षण प्रदान करना था।

3. वर्ष 1990 में ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड से सम्बन्ध

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना के अन्तर्गत प्राथमिक विद्यालयों में आवश्यक शिक्षण-अधिगम सामग्री उपलब्ध कराई गई थी।

लेकिन सामग्री उपलब्ध करा देना ही पर्याप्त नहीं था। शिक्षकों को उसका उचित तथा प्रभावशाली प्रयोग करना भी आना चाहिए।

इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1990 में P-MOST के प्रशिक्षण कार्यक्रम को ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की शिक्षण सामग्री के उपयोग से जोड़ा गया।

इसे P-MOST-OB के रूप में विकसित किया गया, जिसके अन्तर्गत शिक्षकों को ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री का सही उपयोग सिखाया गया।

इस प्रकार P-MOST का उद्देश्य शिक्षकों के सामान्य अभिविन्यास के साथ उन्हें व्यावहारिक शिक्षण-कौशल में दक्ष बनाना भी था।

3. P-MOST कार्यक्रम के उद्देश्य

सेवारत अध्यापकों के विस्तृत अभिविन्यास कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य शिक्षकों के शिक्षण-कौशल, व्यावसायिक दक्षता तथा शिक्षण सामग्री के उपयोग की क्षमता में वृद्धि करना था।

पुस्तक में P-MOST के निम्नलिखित 7 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।

1. सहायक शिक्षण सामग्री के उपयोग में दक्षता बढ़ाना

शिक्षकों में सहायक शिक्षण सामग्री के प्रयोग की दक्षता तथा अभिरुचि विकसित करना।

शिक्षक को यह समझना चाहिए कि विभिन्न शिक्षण उपकरणों का प्रयोग किस विषय और किस परिस्थिति में उपयोगी होगा।

इससे शिक्षक शिक्षण सामग्री का सही उपयोग करके विषयवस्तु को अधिक स्पष्ट बना सकता है।

2. उपलब्ध शिक्षण सामग्री का कक्षा में प्रयोग करना

विद्यालय में उपलब्ध शिक्षण-अधिगम सामग्री का कक्षा शिक्षण में प्रभावशाली उपयोग करना।

पाठ्यपुस्तक के अतिरिक्त चार्ट, मानचित्र, ग्लोब, विज्ञान किट तथा अन्य उपकरणों की सहायता से बच्चों को विषयवस्तु समझाने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य उपलब्ध संसाधनों का वास्तविक शिक्षण कार्य में उपयोग सुनिश्चित करना था।

3. शिक्षण-कौशल में दक्षता प्राप्त करना

शिक्षकों की शिक्षण सम्बन्धी व्यावसायिक दक्षता विकसित करना।

शिक्षक को विषयवस्तु प्रस्तुत करने, उपयुक्त शिक्षण-विधियों का चयन करने तथा शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने में सक्षम बनाना इस उद्देश्य का प्रमुख आधार था।

4. ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की शिक्षण सामग्री से परिचित कराना

शिक्षकों को ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना के अन्तर्गत उपलब्ध कराई जाने वाली विभिन्न शिक्षण सामग्रियों से परिचित कराना।

इसके माध्यम से शिक्षक जान सकते थे कि उपलब्ध उपकरणों और सामग्रियों का उपयोग किस प्रकार किया जाए।

इससे विद्यालयों में उपलब्ध शिक्षण संसाधनों का बेहतर उपयोग सम्भव हो सकता था।

5. बाल-केंद्रित शिक्षण-विधियों के चयन में सहायता करना

शिक्षकों को बाल-केंद्रित शिक्षण-विधियों का चयन करने में सहयोग प्रदान करना।

बाल-केंद्रित शिक्षा में विद्यार्थियों की रुचियों, क्षमताओं, आवश्यकताओं तथा अनुभवों को विशेष महत्त्व दिया जाता है।

इसलिए शिक्षक को ऐसी शिक्षण-विधियाँ अपनाने के लिए तैयार किया गया जिनमें बालक शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार हो।

6. क्रियाप्रधान शिक्षण-विधियों का प्रयोग करना

शिक्षकों को क्रियाप्रधान अथवा गतिविधि-आधारित शिक्षण-विधियों का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना।

क्रियाप्रधान शिक्षण में विद्यार्थी केवल शिक्षक की बातें नहीं सुनता, बल्कि विभिन्न गतिविधियों और व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से सीखता है।

इससे बच्चों की शिक्षण प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी बढ़ाने में सहायता मिलती है।

7. विद्यालय एवं कक्षाओं को रुचिकर बनाना

विद्यालयों तथा कक्षा-कक्षों को बच्चों के लिए अधिक आकर्षक एवं रुचिकर बनाने पर बल देना।

इसके लिए उपलब्ध शिक्षण सामग्री, खिलौनों, चार्ट तथा विभिन्न गतिविधियों का उपयोग किया जा सकता है।

इसका उद्देश्य बच्चों में विद्यालय तथा अध्ययन के प्रति रुचि विकसित करना था।

4. P-MOST के अन्तर्गत उपलब्ध शिक्षण सामग्री

P-MOST कार्यक्रम में शिक्षकों को विभिन्न शिक्षण सामग्रियों के उपयोग का प्रशिक्षण दिया गया।

पुस्तक में निम्नलिखित 8 प्रकार की प्रमुख सामग्री का उल्लेख किया गया है।

  1. गणित किट— गणित सम्बन्धी अवधारणाओं तथा गतिविधियों के शिक्षण के लिए।
  2. विज्ञान किट— विज्ञान की विषयवस्तु को प्रयोग और प्रदर्शन के माध्यम से समझाने के लिए।
  3. खेल सामग्री— बच्चों को खेल तथा गतिविधियों में सम्मिलित करने के लिए।
  4. क्रीड़ा उपकरण— शारीरिक एवं खेल सम्बन्धी गतिविधियों के संचालन के लिए।
  5. मिनी टूल किट— छोटे औजारों तथा व्यावहारिक गतिविधियों के लिए।
  6. पुस्तकालय हेतु पुस्तकें— विद्यार्थियों के पठन-पाठन तथा ज्ञान-विस्तार के लिए।
  7. कक्षा शिक्षण सामग्री— विषयवस्तु को समझाने के लिए आवश्यक सहायक उपकरण एवं सामग्री।
  8. संगीत उपकरण— संगीत एवं अन्य रचनात्मक गतिविधियों के लिए।

इन सामग्रियों का उद्देश्य केवल विद्यालयों में उपकरण उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि शिक्षकों को इनके उपयोग में दक्ष बनाना भी था।

5. P-MOST के अन्तर्गत शिक्षक अभिविन्यास कार्यक्रमों की रूपरेखा

पुस्तक के अनुसार शिक्षक अभिविन्यास कार्यक्रमों की रूपरेखा में निम्नलिखित 5 प्रमुख व्यवस्थाओं पर बल दिया गया।

1. विद्यालय एवं कक्षाओं को आकर्षक बनाना

विद्यालय तथा कक्षा-कक्षों में शिक्षण सामग्री की उचित व्यवस्था करके उन्हें बच्चों के लिए आकर्षक और उपयोगी बनाया जाए।

2. बाल-केंद्रित एवं गतिविधि-आधारित शिक्षण

शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए बाल-केंद्रित तथा कार्यकलाप-आधारित शिक्षण-अधिगम को प्रोत्साहित किया जाए।

इससे बच्चे विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से सीख सकें।

3. आवश्यक सुविधाओं का स्पष्ट निर्धारण

विद्यालय को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए भवन, शिक्षक तथा शिक्षण सामग्री जैसी सुविधाओं की आवश्यकताओं का स्पष्ट उल्लेख किया जाए।

4. न्यूनतम शिक्षण आवश्यकताओं का निर्धारण

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के लिए आवश्यक न्यूनतम सामग्रियों और सुविधाओं का निर्धारण किया जाए।

इससे विद्यालयों को यह समझने में सहायता मिलती है कि प्रभावशाली शिक्षण के लिए किन संसाधनों की आवश्यकता होगी।

5. सामग्री की गुणवत्ता एवं मानकों का निर्धारण

विद्यालयों को उपलब्ध कराई जाने वाली प्रत्येक सामग्री की गुणवत्ता, मानक तथा विशेषताओं का निर्धारण किया जाए।

इसका उद्देश्य शिक्षण सामग्री को उपयोगी तथा निर्धारित आवश्यकताओं के अनुरूप बनाए रखना था।

6. P-MOST के अन्तर्गत शिक्षकों को विज्ञान किट का प्रशिक्षण

P-MOST कार्यक्रम में शिक्षकों को विज्ञान किट में उपलब्ध सामग्री के उपयोग का प्रशिक्षण भी दिया गया।

इसका उद्देश्य शिक्षकों को विभिन्न प्रयोगों तथा प्रदर्शनों के माध्यम से विज्ञान शिक्षण करने में सक्षम बनाना था।

पुस्तक में विज्ञान किट की निम्नलिखित 6 प्रमुख सामग्रियाँ बताई गई हैं।

  1. रासायनिक पदार्थ— हवाबन्द डिब्बों में रखे गए विभिन्न रासायनिक पदार्थ।
  2. चट्टान एवं खनिज पदार्थ— प्लास्टिक के डिब्बों में रखे गए चट्टानों तथा खनिज पदार्थों के टुकड़े।
  3. मापन एवं प्रयोग के उपकरण— मापन, प्रदर्शन तथा प्रयोगात्मक कार्यों के लिए आवश्यक उपकरण।
  4. सरल औजार— हथौड़ा, सरौता तथा प्लास आदि।
  5. विभिन्न प्रकरणों से सम्बन्धित चार्ट— विज्ञान के अलग-अलग विषयों को समझाने के लिए उपयोगी चार्ट।
  6. किट मैनुअल— विज्ञान किट के उपयोग से सम्बन्धित तीन खण्डों में तैयार निर्देश सामग्री।

इस प्रकार विज्ञान किट के उपयोग का प्रशिक्षण शिक्षकों को प्रयोगात्मक एवं गतिविधि-आधारित विज्ञान शिक्षण के लिए तैयार करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास था।

7. प्राथमिक शिक्षकों का विशेष अनुस्थापन कार्यक्रम (SOPT)

SOPT का पूरा नाम Special Orientation Programme for Primary Teachers है। इसे हिन्दी में प्राथमिक शिक्षकों का विशेष अनुस्थापन कार्यक्रम कहा जाता है।

इस कार्यक्रम की शुरुआत 1993–94 में प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी।

इस कार्यक्रम का सम्बन्ध मानव संसाधन विकास मंत्रालय की शिक्षक शिक्षा सम्बन्धी पहल से था। NCERT ने इसके लिए प्रशिक्षण सामग्री तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

SOPT का प्रमुख उद्देश्य प्राथमिक शिक्षकों की व्यावसायिक दक्षता में सुधार करना तथा उन्हें बाल-केंद्रित, क्रियाप्रधान और प्रभावशाली शिक्षण के लिए तैयार करना था।

इस कार्यक्रम में शिक्षकों को केवल सैद्धान्तिक जानकारी देने के स्थान पर शिक्षण सामग्री के प्रदर्शन, समूह चर्चा, प्रशिक्षण गतिविधियों तथा ऑडियो-वीडियो सामग्री के माध्यम से सीखने के अवसर प्रदान किए गए।

8. SOPT कार्यक्रम की पृष्ठभूमि एवं प्रमुख व्यवस्थाएँ

1. वर्ष 1993–94 में शुरुआत

SOPT कार्यक्रम वर्ष 1993–94 में प्रारम्भ किया गया।

यह कार्यक्रम विशेष रूप से प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए विकसित किया गया था।

इसमें ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की शिक्षण सामग्री के प्रभावशाली प्रयोग, नवीन शिक्षण-विधियों तथा शिक्षक की व्यावसायिक क्षमताओं के विकास पर विशेष बल दिया गया।

2. प्रमुख प्रशिक्षण संस्थाओं का सहयोग

पुस्तक के अनुसार इस कार्यक्रम के आयोजन में NCERT के विभिन्न विभागों तथा शिक्षा से सम्बन्धित संस्थाओं का सहयोग लिया गया।

इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित संस्थाओं का उल्लेख किया गया है—

  • NCERT के शिक्षक शिक्षा एवं विशेष शिक्षा से सम्बन्धित विभाग।
  • विद्यालय-पूर्व एवं माध्यमिक शिक्षा से सम्बन्धित विभाग।
  • केन्द्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी संस्थान (CIET)।
  • क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालय—अजमेर, भोपाल, भुवनेश्वर एवं मैसूर।
  • शिक्षा से सम्बन्धित अन्य क्षेत्रीय सलाहकार एवं विशेषज्ञ।
3. प्रशिक्षण का लक्ष्य

पुस्तक के अनुसार SOPT कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रतिवर्ष लगभग 4.5 लाख प्राथमिक शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था।

इस व्यापक प्रशिक्षण व्यवस्था का उद्देश्य अधिक से अधिक प्राथमिक शिक्षकों तक नवीन शैक्षिक विचार तथा प्रभावशाली शिक्षण-विधियाँ पहुँचाना था।

4. प्रमुख शिक्षण क्षेत्र

SOPT कार्यक्रम में विशेष रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों पर ध्यान दिया गया—

  • शिक्षणशास्त्र।
  • गणित।
  • भाषा।
  • पर्यावरण विज्ञान।

इसके अतिरिक्त शिक्षकों में अनुभव प्राप्त करने, विचार-विमर्श करने, रचनात्मक शिक्षण अपनाने तथा शिक्षण-विधियों के मूल्यांकन की क्षमता विकसित करने पर भी बल दिया गया।

9. SOPT कार्यक्रम के उद्देश्य

SOPT कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य प्राथमिक शिक्षकों को नवीन शिक्षण-विधियों से परिचित कराना तथा उनकी व्यावसायिक योग्यता में सुधार करना था।

पुस्तक में इस कार्यक्रम के निम्नलिखित 8 उद्देश्य बताए गए हैं।

1. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विचारों से परिचित कराना

शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रमुख विचारों तथा शैक्षिक सुधारों से परिचित कराना।

इससे शिक्षक विद्यालयी शिक्षा की नई आवश्यकताओं और उद्देश्यों को समझकर उनके अनुरूप शिक्षण कर सकते हैं।

2. शिक्षणशास्त्र में परिवर्तन के प्रति दृष्टिकोण विकसित करना

शिक्षकों को शिक्षणशास्त्र में हो रहे परिवर्तनों से परिचित कराना तथा इन परिवर्तनों को शिक्षण प्रक्रिया में अपनाने का दृष्टिकोण विकसित करना।

इसका उद्देश्य शिक्षकों को केवल परम्परागत शिक्षण-विधियों तक सीमित न रखकर नवीन और प्रभावशाली विधियों के प्रयोग के लिए तैयार करना था।

3. उभरती शिक्षण-पद्धतियों से सामंजस्य विकसित करना

प्राथमिक शिक्षकों को नवीन एवं उभरती शिक्षण-पद्धतियों से परिचित कराना तथा उनके उपयोग के प्रति अनुकूल दृष्टिकोण विकसित करना।

इससे शिक्षक बदलती शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुसार अपने शिक्षण में सुधार कर सकते हैं।

4. शिक्षण प्रक्रियाओं के प्रदर्शन के अवसर प्रदान करना

शिक्षकों को विभिन्न शिक्षण प्रक्रियाओं तथा विधियों का प्रदर्शन करने और समझने के अवसर प्रदान करना।

इसका उद्देश्य शिक्षकों को केवल सैद्धान्तिक ज्ञान देने के बजाय व्यावहारिक प्रदर्शन के माध्यम से शिक्षण-कौशल विकसित करने में सहायता करना था।

5. शिक्षण सामग्री के उपयोग पर विचार करने की क्षमता विकसित करना

शिक्षकों को उपलब्ध शिक्षण सामग्री का अध्ययन करने, उसके उपयोग पर विचार करने तथा उपयुक्त परिस्थितियों में उसका प्रयोग करने में सक्षम बनाना।

इससे शिक्षक शिक्षण सामग्री का उपयोग अधिक समझदारी और प्रभावशीलता के साथ कर सकते हैं।

6. दैनिक कक्षा शिक्षण के लिए सामग्री विकसित करना

शिक्षकों को प्रतिदिन की कक्षा शिक्षण गतिविधियों के लिए आवश्यक शिक्षण-अधिगम सामग्री तैयार करने में सक्षम बनाना।

इसका उद्देश्य शिक्षक को केवल तैयार सामग्री पर निर्भर न रखकर आवश्यकतानुसार उपयोगी सामग्री विकसित करने के योग्य बनाना था।

7. शिक्षा सम्बन्धी अधिकारों एवं प्रावधानों के प्रति जागरूकता

पुस्तक के सातवें बिन्दु में शिक्षकों से शिक्षा का अधिकार अधिनियम के विषय में चर्चा करने तथा उसका अनुपालन करने के लिए प्रोत्साहित करने का उल्लेख किया गया है।

तथ्यात्मक सावधानी— SOPT कार्यक्रम 1993–94 में शुरू हुआ था, जबकि निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 में बना और 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। इसलिए पुस्तक का यह बिन्दु मूल SOPT कार्यक्रम के 1993–94 के उद्देश्य के रूप में ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।

परीक्षा की तैयारी में दोनों तिथियों को अलग-अलग याद रखना चाहिए।

8. सतत एवं व्यावसायिक विकास के लिए सुझाव देना

शिक्षकों को उनके निरन्तर व्यावसायिक विकास के लिए आवश्यक सुझाव तथा मार्गदर्शन प्रदान करना।

इसका उद्देश्य शिक्षकों को प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद भी अपने ज्ञान, शिक्षण-कौशल तथा कार्यकुशलता में सुधार करने के लिए प्रेरित करना था।

10. SOPT कार्यक्रम की प्रशिक्षण प्रक्रिया

SOPT कार्यक्रम में शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए सहभागिता, चर्चा, प्रदर्शन तथा मूल्यांकन जैसी प्रक्रियाओं को महत्त्व दिया गया।

इसका उद्देश्य शिक्षकों को प्रशिक्षण का सक्रिय भागीदार बनाना तथा उन्हें अपने शिक्षण सम्बन्धी अनुभवों पर विचार करने के अवसर प्रदान करना था।

1. सहभागितापूर्ण प्रशिक्षण

SOPT में प्रशिक्षण को एकतरफा व्याख्यान तक सीमित नहीं रखा गया।

इसमें शिक्षकों को समूह चर्चा तथा अन्य गतिविधियों के माध्यम से अपने विचार प्रस्तुत करने के अवसर दिए गए।

प्रशिक्षण के दौरान शिक्षकों की शिक्षण-विधियों तथा रणनीतियों का मूल्यांकन भी किया जाता था।

2. ऑडियो-वीडियो सामग्री का उपयोग

इस कार्यक्रम के अन्तर्गत केन्द्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी संस्थान (CIET) ने शिक्षकों के प्रशिक्षण में महत्त्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।

पुस्तक के अनुसार CIET द्वारा शिक्षक प्रशिक्षण की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए 40 वीडियो कार्यक्रमों का एक मॉड्यूल आधारित शैक्षिक टेलीविजन पैकेज विकसित किया गया।

इन कार्यक्रमों को NCERT के विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार किया गया तथा प्रशिक्षण मैनुअल और SOPT की अन्य शिक्षण सामग्रियों से जोड़ा गया।

3. दूरदर्शन के माध्यम से प्रशिक्षण

पुस्तक के अनुसार तैयार किए गए वीडियो कार्यक्रमों का प्रसारण विभिन्न राज्यों में अलग-अलग समय पर टेलीविजन के माध्यम से किया जाता था।

इन राज्यों में प्रमुख रूप से निम्नलिखित का उल्लेख है—

  • आन्ध्र प्रदेश।
  • बिहार।
  • गुजरात।
  • महाराष्ट्र।
  • उड़ीसा।
  • उत्तर प्रदेश।

इस व्यवस्था के माध्यम से बड़ी संख्या में शिक्षकों तक प्रशिक्षण सम्बन्धी सामग्री पहुँचाने का प्रयास किया गया।

11. SOPT में प्रशिक्षण की पाँच प्रमुख गतिविधियाँ

पुस्तक के अनुसार SOPT कार्यक्रम में शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए निम्नलिखित 5 गतिविधियों का प्रयोग किया गया।

1. समूह चर्चा एवं गतिविधियाँ

सम्पूर्ण कक्षा शिक्षण से सम्बन्धित विषयों पर समूह चर्चा तथा विभिन्न गतिविधियों का आयोजन करना।

इससे शिक्षक अपने अनुभव साझा कर सकते हैं तथा दूसरों के विचारों से सीख सकते हैं।

2. प्रदर्शन-सह-चर्चा

किसी शिक्षण-विधि या गतिविधि का प्रदर्शन करने के बाद उस पर चर्चा करना।

इससे शिक्षक प्रदर्शन के विभिन्न पक्षों को समझकर उसका उपयोग अपने शिक्षण में कर सकते हैं।

3. प्रस्तुति-सह-चर्चा

NCERT के सदस्यों अथवा विशेषज्ञों द्वारा विभिन्न शैक्षिक विषयों की प्रस्तुति देना तथा उसके बाद शिक्षकों के साथ चर्चा करना।

इसका उद्देश्य शिक्षकों की शंकाओं का समाधान करना तथा उनके विचारों को समझना था।

4. शिक्षण-अधिगम के वीडियो प्रदर्शन

शिक्षकों को शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया से सम्बन्धित वीडियो कार्यक्रम दिखाना।

इन कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षक विभिन्न शिक्षण-विधियों तथा कक्षागत गतिविधियों को देख और समझ सकते थे।

5. शैक्षिक भ्रमण

प्रशिक्षण के अन्तर्गत शिक्षकों को शैक्षिक भ्रमण के अवसर प्रदान करना।

इससे शिक्षक विभिन्न शैक्षिक व्यवस्थाओं तथा शिक्षण सम्बन्धी अनुभवों से परिचित हो सकते हैं।

12. SOPT कार्यक्रम की प्रशिक्षण सामग्री

SOPT कार्यक्रम में प्राथमिक शिक्षकों को विभिन्न शैक्षिक विषयों तथा शिक्षण सम्बन्धी आवश्यक अवधारणाओं का प्रशिक्षण दिया गया।

पुस्तक के अनुसार इस कार्यक्रम की प्रशिक्षण सामग्री में निम्नलिखित 9 प्रमुख विषय सम्मिलित थे।

1. ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड परियोजना

प्राथमिक विद्यालयों में ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के अन्तर्गत उपलब्ध कराई गई शिक्षण सामग्री तथा सुविधाओं के उपयोग से शिक्षकों को परिचित कराना।

2. न्यूनतम अधिगम स्तर

न्यूनतम अधिगम स्तर (Minimum Levels of Learning—MLL) की अवधारणा तथा उसे प्राप्त करने में प्राथमिक शिक्षकों की भूमिका को समझाना।

इसका उद्देश्य शिक्षकों को यह समझाना था कि प्राथमिक शिक्षा के किसी निर्धारित स्तर पर बच्चों से न्यूनतम रूप से क्या सीखने की अपेक्षा की जाती है।

3. सतत एवं व्यापक मूल्यांकन

प्राथमिक स्तर पर सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की अवधारणा तथा उसके उपयोग का प्रशिक्षण देना।

इसके माध्यम से विद्यार्थियों की सीखने की प्रगति तथा विभिन्न क्षमताओं का नियमित आकलन करने पर बल दिया गया।

4. विद्यालय तत्परता का विकास

बच्चों में विद्यालय तत्परता (School Readiness) विकसित करने से सम्बन्धित अवधारणाओं, मार्गदर्शक सिद्धान्तों तथा गतिविधियों का अध्ययन।

इसका उद्देश्य बच्चों को विद्यालयी वातावरण तथा प्रारम्भिक अधिगम के लिए तैयार करने में शिक्षकों की सहायता करना था।

5. प्रभावी शिक्षण-अधिगम के लिए विद्यालयी वातावरण

विद्यालय में ऐसा वातावरण विकसित करने का प्रशिक्षण देना जिसमें बच्चे सहजता और सक्रियता से सीख सकें।

इसमें कक्षा की उपयुक्त व्यवस्था तथा शिक्षण-अधिगम के अनुकूल परिस्थितियों को महत्त्व दिया गया।

6. विशेष समूहों की शिक्षा

विभिन्न आवश्यकताओं और परिस्थितियों वाले बच्चों की शिक्षा के सम्बन्ध में शिक्षकों को आवश्यक जानकारी देना।

इसका उद्देश्य शिक्षकों को विविध शैक्षिक आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील बनाना था।

7. छात्राओं की शिक्षा में शिक्षकों की भूमिका

बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करने तथा उन्हें विद्यालयी शिक्षा के उचित अवसर प्रदान करने में शिक्षक की भूमिका को समझाना।

इससे शिक्षक बालिका शिक्षा के महत्त्व के प्रति अधिक जागरूक हो सकते हैं।

8. मूल्यों की शिक्षा

विद्यार्थियों में उचित मानवीय तथा सामाजिक मूल्यों के विकास के लिए मूल्य शिक्षा सम्बन्धी विचारों से शिक्षकों को परिचित कराना।

9. बहुश्रेणी शिक्षण

बहुश्रेणी शिक्षण (Multigrade Teaching) का अर्थ है ऐसी शिक्षण व्यवस्था जिसमें एक शिक्षक एक ही समय में एक से अधिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाता है।

प्राथमिक विद्यालयों में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए शिक्षकों को बहुश्रेणी शिक्षण की आवश्यक समझ और विधियों का प्रशिक्षण देना महत्त्वपूर्ण माना गया।

13. P-MOST तथा SOPT कार्यक्रम में अन्तर

P-MOST तथा SOPT दोनों का सम्बन्ध सेवारत शिक्षकों के प्रशिक्षण और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने से था। लेकिन इनके प्रारम्भ का समय तथा प्रशिक्षण का प्रमुख केन्द्र अलग-अलग था।

आधार P-MOST SOPT
पूरा नाम Programme for Mass Orientation of School Teachers Special Orientation Programme for Primary Teachers
प्रारम्भ 1986 1993–94
लक्षित शिक्षक प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षक। विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षक।
मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के विचारों से परिचित कराना तथा व्यावसायिक दक्षता बढ़ाना। प्राथमिक शिक्षकों को नवीन शिक्षण-विधियों तथा प्रभावी शिक्षण के लिए तैयार करना।
प्रमुख विशेषता शिक्षण सामग्री का उपयोग, बाल-केंद्रित एवं क्रियाप्रधान शिक्षण। सहभागितापूर्ण प्रशिक्षण, प्रदर्शन, समूह चर्चा तथा ऑडियो-वीडियो कार्यक्रम।
महत्त्वपूर्ण तथ्य 1990 में ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड सामग्री के प्रशिक्षण से जोड़ा गया। लगभग 4.5 लाख शिक्षकों को प्रतिवर्ष प्रशिक्षित करने का लक्ष्य।

14. P-MOST एवं SOPT कार्यक्रमों का शैक्षिक महत्त्व

P-MOST तथा SOPT दोनों कार्यक्रमों ने शिक्षकों की व्यावसायिक योग्यता सुधारने के लिए महत्त्वपूर्ण प्रयास किए।

P-MOST के माध्यम से शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के विचारों, शिक्षण सामग्री के प्रयोग तथा बाल-केंद्रित और क्रियाप्रधान शिक्षण-विधियों से परिचित कराया गया।

इसके बाद SOPT ने प्राथमिक शिक्षकों के प्रशिक्षण को अधिक व्यवस्थित तथा गतिविधि-आधारित बनाने पर बल दिया।

SOPT में शिक्षण-अधिगम के प्रदर्शन, समूह चर्चा, प्रशिक्षण वीडियो, न्यूनतम अधिगम स्तर तथा सतत एवं व्यापक मूल्यांकन जैसी अवधारणाओं को विशेष महत्त्व दिया गया।

इस प्रकार दोनों कार्यक्रमों का व्यापक उद्देश्य शिक्षकों की कार्यकुशलता बढ़ाना, उपलब्ध शिक्षण संसाधनों का प्रभावशाली उपयोग सुनिश्चित करना तथा प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना था।

समग्र निष्कर्ष

सेवारत अध्यापकों का विस्तृत अभिविन्यास कार्यक्रम (P-MOST) वर्ष 1986 में प्रारम्भ किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की प्रमुख सिफारिशों से परिचित कराना तथा उनकी व्यावसायिक दक्षता का विकास करना था।

वर्ष 1990 में इस कार्यक्रम का प्रशिक्षण ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड के अन्तर्गत उपलब्ध शिक्षण सामग्री के प्रभावशाली उपयोग पर केंद्रित किया गया।

इसी क्रम में वर्ष 1993–94 में प्राथमिक शिक्षकों का विशेष अनुस्थापन कार्यक्रम (SOPT) प्रारम्भ किया गया।

SOPT के अन्तर्गत प्राथमिक शिक्षकों को बाल-केंद्रित शिक्षा, आधुनिक शिक्षण-विधियों, प्रशिक्षण सामग्री, न्यूनतम अधिगम स्तर, सतत मूल्यांकन तथा अन्य महत्त्वपूर्ण शैक्षिक विषयों का प्रशिक्षण दिया गया।

इस प्रकार P-MOST तथा SOPT दोनों कार्यक्रमों ने सेवारत शिक्षकों के प्रशिक्षण, व्यावसायिक विकास एवं गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान किया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • P-MOST का पूरा नाम Programme for Mass Orientation of School Teachers है।
  • P-MOST को हिन्दी में सेवारत अध्यापकों का विस्तृत अभिविन्यास कार्यक्रम कहा जाता है।
  • इसकी शुरुआत 1986 में NCERT द्वारा की गई।
  • P-MOST का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की सिफारिशों से परिचित कराना तथा व्यावसायिक दक्षता बढ़ाना था।
  • P-MOST की प्रशिक्षण सामग्री प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों के लिए दो भागों में तैयार की गई।
  • वर्ष 1990 में P-MOST को ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की शिक्षण सामग्री के उपयोग से जोड़ा गया।
  • पुस्तक में P-MOST के 7 उद्देश्य बताए गए हैं।
  • P-MOST के प्रमुख उद्देश्य शिक्षण सामग्री का प्रभावशाली उपयोग, शिक्षण-कौशल का विकास, बाल-केंद्रित एवं क्रियाप्रधान शिक्षण तथा आकर्षक विद्यालयी वातावरण का निर्माण थे।
  • P-MOST में गणित किट, विज्ञान किट, खेल सामग्री, क्रीड़ा उपकरण, मिनी टूल किट, पुस्तकालय पुस्तकें, कक्षा शिक्षण सामग्री तथा संगीत उपकरण उपलब्ध कराए गए।
  • शिक्षक अभिविन्यास की रूपरेखा में 5 प्रमुख व्यवस्थाएँ तथा विज्ञान किट के प्रशिक्षण में 6 प्रकार की सामग्री का उल्लेख है।
  • SOPT का पूरा नाम Special Orientation Programme for Primary Teachers है।
  • SOPT को हिन्दी में प्राथमिक शिक्षकों का विशेष अनुस्थापन कार्यक्रम कहा जाता है।
  • SOPT कार्यक्रम की शुरुआत 1993–94 में हुई।
  • इसका मुख्य उद्देश्य प्राथमिक शिक्षकों की व्यावसायिक दक्षता तथा शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करना था।
  • SOPT में प्रतिवर्ष लगभग 4.5 लाख प्राथमिक शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था।
  • SOPT में विशेष रूप से शिक्षणशास्त्र, गणित, भाषा एवं पर्यावरण विज्ञान को महत्त्व दिया गया।
  • पुस्तक में SOPT के 8 उद्देश्य बताए गए हैं।
  • SOPT के प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति से परिचय, नवीन शिक्षण-विधियों का प्रयोग, शिक्षण सामग्री का विकास तथा शिक्षकों का सतत व्यावसायिक विकास थे।
  • पुस्तक के अनुसार CIET द्वारा 40 वीडियो कार्यक्रमों का शैक्षिक टेलीविजन पैकेज विकसित किया गया।
  • SOPT में समूह चर्चा, प्रदर्शन-सह-चर्चा, प्रस्तुति-सह-चर्चा, वीडियो प्रदर्शन तथा शैक्षिक भ्रमण जैसी पाँच गतिविधियों का प्रयोग किया गया।
  • SOPT की प्रशिक्षण सामग्री में 9 प्रमुख विषय सम्मिलित थे।
  • इनमें ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड, न्यूनतम अधिगम स्तर, सतत एवं व्यापक मूल्यांकन, विद्यालय तत्परता, विशेष समूहों की शिक्षा, बालिका शिक्षा, मूल्य शिक्षा तथा बहुश्रेणी शिक्षण प्रमुख थे।
  • महत्त्वपूर्ण तिथियाँ— P-MOST: 1986; P-MOST-OB: 1990; SOPT: 1993–94; शिक्षा का अधिकार अधिनियम: 2009।
  • दोनों कार्यक्रमों का प्रमुख लक्ष्य शिक्षकों का व्यावसायिक विकास तथा विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना था।
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Topic 3 बेसिक शिक्षा परियोजना (BEP)—परिचय, उद्देश्य, कार्य, क्रियान्वयन, घटक एवं परिणाम

बेसिक शिक्षा परियोजना (BEP)—परिचय, उद्देश्य, कार्य, क्रियान्वयन, घटक एवं परिणाम

बेसिक शिक्षा परियोजना का परिचय

बेसिक शिक्षा परियोजना (Basic Education Project—BEP) प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण, शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार तथा सभी बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से संचालित एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक परियोजना थी।

भारत में अनेक बच्चे सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षिक सुविधाओं की कमी के कारण प्राथमिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते थे। विशेष रूप से बालिकाओं, पिछड़े वर्गों तथा कमजोर आर्थिक परिस्थितियों वाले परिवारों के बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाइयाँ होती थीं।

इन समस्याओं को दूर करने के लिए बेसिक शिक्षा परियोजना के माध्यम से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने तथा प्रारम्भिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर बल दिया गया।

इस परियोजना में बालिकाओं तथा समाज के वंचित वर्गों की शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया गया, जिससे उनकी शैक्षिक स्थिति में सुधार हो तथा उनका सशक्तीकरण किया जा सके।

बेसिक शिक्षा परियोजना का मुख्य उद्देश्य प्रारम्भिक शिक्षा तक सभी बच्चों की पहुँच बढ़ाना, विद्यालयों की सुविधाओं में सुधार करना तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना था।

1. उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परियोजना की पृष्ठभूमि

बेसिक शिक्षा परियोजना का संचालन विभिन्न राज्यों में उनकी शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुसार किया गया।

उत्तर प्रदेश में इस परियोजना को प्रारम्भिक शिक्षा की स्थिति सुधारने तथा शैक्षिक अवसरों में असमानता कम करने के उद्देश्य से लागू किया गया।

उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने प्रारम्भ में चयनित 10 जिलों में परियोजना संचालित करने के लिए विश्व बैंक से वित्तीय सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया।

इस परियोजना के माध्यम से जिलों की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था में सुधार, विद्यालयी सुविधाओं का विस्तार तथा बालिकाओं एवं कमजोर वर्गों की शिक्षा को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया गया।

परियोजना के प्रमुख ऐतिहासिक तथ्य
  • पूरा नाम— बेसिक शिक्षा परियोजना (Basic Education Project—BEP)।
  • प्रारम्भ वर्ष— 1993।
  • उत्तर प्रदेश में प्रभावी तिथि— 5 अक्टूबर 1993।
  • वित्तीय सहयोग— विश्व बैंक की सहायता से परियोजना संचालित की गई।
  • अनुमानित लागत— पुस्तक के अनुसार लगभग 550 करोड़ रुपये।
  • प्रारम्भिक क्षेत्र— उत्तर प्रदेश के चयनित 10 जिले।
  • प्रमुख लक्षित वर्ग— प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित बच्चे, बालिकाएँ तथा समाज के कमजोर वर्ग।
  • प्रमुख लक्ष्य— शिक्षा का सार्वभौमीकरण, शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार तथा प्रारम्भिक शिक्षा तक पहुँच बढ़ाना।

पुस्तक में परियोजना के निरीक्षण एवं संचालन के लिए राष्ट्रीय नियंत्रण इकाई (National Monitoring Unit) की परिकल्पना का भी उल्लेख किया गया है।

2. उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परियोजना के प्रारम्भिक दस जिले

पुस्तक के अनुसार उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परियोजना को प्रारम्भिक चरण में निम्नलिखित 10 जिलों में लागू किया गया—

  1. वाराणसी।
  2. इलाहाबाद।
  3. बाँदा।
  4. इटावा।
  5. सीतापुर।
  6. अलीगढ़।
  7. सहारनपुर।
  8. गोरखपुर।
  9. पौड़ी।
  10. नैनीताल।

इन जिलों का चयन करके प्रारम्भिक शिक्षा की सुविधाओं का विस्तार, बालिकाओं की शिक्षा तथा शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार करने का प्रयास किया गया।

ध्यान दें: यह सूची परियोजना के प्रारम्भिक समय की है। पौड़ी और नैनीताल उस समय अविभाजित उत्तर प्रदेश के जिले थे।

3. बेसिक शिक्षा परियोजना के तीन प्रमुख अंग

पुस्तक के अनुसार बेसिक शिक्षा परियोजना को तीन प्रमुख अंगों में विभाजित किया गया।

इन तीनों अंगों का उद्देश्य शिक्षा-व्यवस्था को सशक्त बनाना, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना तथा सभी बच्चों तक प्रारम्भिक शिक्षा पहुँचाना था।

1. संस्थागत क्षमता में वृद्धि

संस्थागत क्षमता में वृद्धि (Institutional Capacity Building) का अर्थ है शिक्षा के नियोजन, प्रबन्धन तथा संचालन में कार्यरत संस्थाओं को अधिक सक्षम बनाना।

इस परियोजना के अन्तर्गत राज्य, जनपद तथा स्थानीय स्तरों पर शिक्षा के नियोजन और प्रबन्धन के लिए आवश्यक इकाइयों को विकसित करने पर बल दिया गया।

इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित थे—

  • राज्य, जिला तथा स्थानीय स्तर पर शिक्षा सम्बन्धी नियोजन एवं प्रबन्धन को मजबूत करना।
  • 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों के नामांकन के लिए आवश्यक व्यवस्था करना।
  • विद्यालयों की सुविधाओं का उचित नियोजन तथा प्रबन्धन करना।
  • शिक्षा के विकास में समुदाय की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करना।

इस प्रकार संस्थागत क्षमता में वृद्धि का मुख्य उद्देश्य शिक्षा-व्यवस्था को अधिक संगठित, उत्तरदायी तथा प्रभावशाली बनाना था।

2. गुणवत्ता में सुधार एवं पूर्णता

इस अंग का उद्देश्य बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिलाने के साथ उनकी शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना तथा उन्हें प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के अवसर प्रदान करना था।

इसके अन्तर्गत निम्नलिखित कार्यों को महत्त्व दिया गया—

  • पाठ्यक्रम तथा पाठ्यपुस्तकों का संशोधन करना।
  • सेवारत शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।
  • शिक्षकों को नवीन शैक्षिक विचारों तथा नवाचारों से परिचित कराना।
  • बालिकाओं तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देना।
  • नियमित अनुश्रवण एवं सतत मूल्यांकन की व्यवस्था करना।

अनुश्रवण (Monitoring) का अर्थ है किसी कार्यक्रम के क्रियान्वयन तथा प्रगति की नियमित निगरानी करना।

इस प्रकार इस अंग में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, शिक्षक प्रशिक्षण तथा विद्यार्थियों की शैक्षिक प्रगति को विशेष महत्त्व दिया गया।

3. बेसिक शिक्षा तक पहुँच में सुधार

इस अंग का मुख्य उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों और बच्चों तक प्रारम्भिक शिक्षा पहुँचाना था जहाँ शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं।

इसके अन्तर्गत निम्नलिखित प्रयासों पर बल दिया गया—

  • शैक्षिक सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों में प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना करना।
  • आवश्यकतानुसार शिक्षा केन्द्रों का संचालन करना।
  • समाज के कमजोर तथा वंचित वर्गों के बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था करना।
  • ऐसे बच्चों के लिए वैकल्पिक शैक्षिक कार्यक्रमों का समर्थन करना जो औपचारिक विद्यालयों में भाग नहीं ले पा रहे थे।

इस प्रकार इस अंग का प्रमुख उद्देश्य प्रारम्भिक शिक्षा के अवसरों का विस्तार तथा शिक्षा से वंचित बच्चों को विद्यालयी व्यवस्था से जोड़ना था।

4. बेसिक शिक्षा परियोजना के उद्देश्य

बेसिक शिक्षा परियोजना के अन्तर्गत प्राथमिक विद्यालयों की उपलब्धता बढ़ाने, बच्चों का नामांकन सुनिश्चित करने, शैक्षिक उपलब्धियों में सुधार तथा सतत शिक्षा की व्यवस्था पर बल दिया गया।

पुस्तक में परियोजना के निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।

1. विद्यालय सुलभ कराना

सभी बच्चों को उनके निवास स्थान के निकट प्राथमिक शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराना।

पुस्तक के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों अथवा वैकल्पिक शिक्षा केन्द्रों की स्थापना के लिए लगभग 300 की आबादी तथा डेढ़ किलोमीटर की दूरी का मानदण्ड प्रस्तुत किया गया।

इसका उद्देश्य बच्चों को विद्यालय तक पहुँचने में होने वाली कठिनाइयों को कम करना तथा अधिक से अधिक बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना था।

2. सभी बच्चों का नामांकन सुनिश्चित करना

बेसिक शिक्षा परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य 6 से 11 वर्ष के सभी बालक-बालिकाओं का विद्यालयों में नामांकन कराना था।

पुस्तक में इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वर्ष 2006 तक का लक्ष्य दिया गया है।

इसका उद्देश्य किसी भी बच्चे को प्राथमिक शिक्षा से वंचित न रहने देना था।

3. अधिगम उपलब्धियों में सुधार करना

परियोजना के अन्तर्गत विद्यालयों में नामांकित बच्चों की शैक्षिक उपलब्धियों तथा अधिगम क्षमताओं को विकसित करने पर बल दिया गया।

पुस्तक के अनुसार बच्चों में न्यूनतम तथा उच्च स्तर की शैक्षिक दक्षताओं का विकास करने के लिए वर्ष 2000 तक का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि बच्चे केवल विद्यालय में नामांकित न हों, बल्कि अपेक्षित ज्ञान और कौशल भी प्राप्त करें।

4. सतत शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराना

बेसिक शिक्षा परियोजना में सतत शिक्षा को भी महत्त्वपूर्ण माना गया।

सतत शिक्षा (Continuing Education) से आशय शिक्षा प्राप्त करने तथा अपने ज्ञान और कौशल को विकसित करते रहने के अवसरों से है।

पुस्तक के अनुसार लगभग 5000 की ग्रामीण आबादी वाले क्षेत्रों में सतत शिक्षा की सुविधाएँ उपलब्ध कराने का उद्देश्य रखा गया।

इससे विद्यालयी शिक्षा के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों को भी शिक्षा से जुड़े रहने के अवसर प्रदान किए जा सकते थे।

5. परियोजना के अन्य प्रमुख उद्देश्य

उपर्युक्त उद्देश्यों के अतिरिक्त बेसिक शिक्षा परियोजना में निम्नलिखित छह उद्देश्यों को भी महत्त्व दिया गया—

  1. शिक्षा का सार्वभौमीकरण करना।
  2. 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना।
  3. प्राथमिक शिक्षा में अपव्यय एवं अवरोधन की समस्याओं को समाप्त करने का प्रयास करना।
  4. समाज के वंचित वर्गों तथा बालिकाओं को शिक्षा से लाभान्वित करना।
  5. प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन बढ़ाना।
  6. प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना।

अपव्यय का अर्थ है विद्यार्थी का शिक्षा पूरी किए बिना विद्यालय छोड़ देना, जबकि अवरोधन का अर्थ है अपेक्षित समय में अगली कक्षा में प्रगति न कर पाना।

इस प्रकार बेसिक शिक्षा परियोजना का उद्देश्य शिक्षा में प्रवेश, निरन्तरता तथा गुणवत्ता तीनों में सुधार करना था।

5. बेसिक शिक्षा परियोजना के प्रमुख कार्य

बेसिक शिक्षा परियोजना के सफल संचालन के लिए शिक्षा-व्यवस्था में विभिन्न स्तरों पर संस्थागत तथा प्रशिक्षण सम्बन्धी व्यवस्थाएँ विकसित की गईं।

पुस्तक के अनुसार इसके कार्यों को मुख्य रूप से प्रबन्धकीय व्यवस्था तथा अकादमिक व्यवस्था में समझाया गया है।

1. प्रबन्धकीय व्यवस्था

प्रबन्धकीय व्यवस्था का सम्बन्ध परियोजना के नियोजन, संचालन, प्रशासन तथा आवश्यक निर्णय लेने से है।

इसके अन्तर्गत निम्नलिखित स्तरों पर समितियों की व्यवस्था की गई—

  1. राज्य स्तर— राज्य परियोजना परिषद।
  2. जनपद स्तर— जिला शिक्षा परियोजना समिति।
  3. विकास खण्ड स्तर— ब्लॉक शिक्षा समिति।
  4. ग्राम स्तर— ग्राम शिक्षा समिति।

इन समितियों का उद्देश्य परियोजना के कार्यों का स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार नियोजन करना तथा उनके संचालन में सहयोग प्रदान करना था।

2. अकादमिक व्यवस्था

अकादमिक व्यवस्था का सम्बन्ध शिक्षक प्रशिक्षण, शैक्षिक मार्गदर्शन, शिक्षण-विधियों तथा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने से है।

पुस्तक में इसके अन्तर्गत निम्नलिखित संस्थाओं का उल्लेख किया गया है—

स्तर संस्था
राज्य स्तर राज्य शैक्षिक प्रबन्धन एवं प्रशिक्षण संस्थान (SIEMAT)।
जनपद स्तर जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET)।
विकास खण्ड स्तर ब्लॉक संसाधन केन्द्र (BRC)।
न्याय पंचायत स्तर न्याय पंचायत संसाधन केन्द्र (NPRC)।

इन संस्थाओं के माध्यम से शिक्षकों के प्रशिक्षण, शैक्षिक सहायता तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सुधार करने का प्रयास किया गया।

इस प्रकार प्रबन्धकीय व्यवस्था परियोजना के संचालन से सम्बन्धित थी, जबकि अकादमिक व्यवस्था शिक्षा की गुणवत्ता एवं शिक्षक प्रशिक्षण से सम्बन्धित थी।

6. बेसिक शिक्षा परियोजना के कार्यों का क्रियान्वयन

बेसिक शिक्षा परियोजना को सफल बनाने के लिए राज्य, जिला, विकास खण्ड तथा स्थानीय स्तरों पर विभिन्न कार्यों का क्रियान्वयन किया गया।

पुस्तक में परियोजना के क्रियान्वयन से सम्बन्धित निम्नलिखित 7 प्रमुख कार्य बताए गए हैं।

1. संस्थागत क्षमता में वृद्धि करना

राज्य, जनपद तथा स्थानीय स्तर की विभिन्न इकाइयों के माध्यम से शिक्षा-व्यवस्था की क्षमता बढ़ाने पर बल दिया गया।

इसके अन्तर्गत 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों के नामांकन तथा विद्यालयी सुविधाओं के नियोजन एवं प्रबन्धन को महत्त्व दिया गया।

इसका उद्देश्य शिक्षा-व्यवस्था को अधिक संगठित तथा प्रभावशाली बनाना था।

2. विभिन्न संस्थाओं की स्थापना

शैक्षिक प्रबन्धन तथा प्रशिक्षण की व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक संस्थाओं की स्थापना की गई।

पुस्तक में विशेष रूप से राज्य शैक्षिक प्रबन्धन एवं प्रशिक्षण संस्थान (SIEMAT) के अन्तर्गत शैक्षिक प्रबन्धन सम्बन्धी संस्थागत व्यवस्था विकसित करने का उल्लेख किया गया है।

इसका उद्देश्य शिक्षा के प्रशासन, प्रबन्धन तथा प्रशिक्षण कार्यों में सुधार करना था।

3. शैक्षिक गुणवत्ता का उन्नयन

शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए पाठ्यक्रम तथा पाठ्यपुस्तकों के संशोधन पर बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (DIET) के माध्यम से शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था को महत्त्व दिया गया।

इसका उद्देश्य शिक्षकों की कार्यकुशलता बढ़ाना तथा विद्यार्थियों को अधिक प्रभावी शिक्षा प्रदान करना था।

4. सूक्ष्म स्तर तक कार्यान्वयन

परियोजना को केवल राज्य अथवा जिला स्तर तक सीमित न रखकर विकास खण्ड तथा न्याय पंचायत स्तर तक लागू करने पर बल दिया गया।

इसके लिए स्थानीय स्तर पर शैक्षिक सन्दर्भ एवं संसाधन केन्द्रों की व्यवस्था की गई।

इसका उद्देश्य स्थानीय शैक्षिक आवश्यकताओं को समझना तथा शिक्षकों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना था।

5. अधिगम सम्प्राप्ति में गुणवत्ता

परियोजना में विद्यार्थियों की अधिगम सम्प्राप्ति (Learning Achievement) सुधारने पर विशेष ध्यान दिया गया।

अधिगम सम्प्राप्ति का अर्थ है शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के बाद विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त ज्ञान, कौशल तथा शैक्षिक उपलब्धियाँ।

इस उद्देश्य के लिए पाठ्यक्रम, अध्ययन सामग्री तथा शिक्षण-अधिगम सामग्री के निर्माण एवं सुधार पर बल दिया गया।

इससे विद्यार्थियों के वास्तविक अधिगम स्तर में सुधार करने का प्रयास किया गया।

6. मूल्यांकन तकनीकों का विकास

विद्यार्थियों की शैक्षिक स्थिति तथा परियोजना की प्रगति समझने के लिए उचित मूल्यांकन व्यवस्था विकसित करने पर बल दिया गया।

पुस्तक में निम्नलिखित मूल्यांकन सम्बन्धी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है—

  • आधाररेखा सर्वेक्षण (Baseline Survey)— कार्यक्रम के आरम्भ में शैक्षिक स्थिति की जानकारी प्राप्त करना।
  • सतत मूल्यांकन— विद्यार्थियों की शैक्षिक प्रगति का नियमित आकलन करना।
  • क्रमिक विकास का आकलन— समय के साथ शिक्षा की उपलब्धियों तथा प्रगति का अध्ययन करना।

इस प्रकार मूल्यांकन के माध्यम से शिक्षण-अधिगम में सुधार की आवश्यकताओं को पहचानने का प्रयास किया गया।

7. शिक्षा केन्द्रों की स्थापना

बेसिक शिक्षा परियोजना में बच्चों, विशेष रूप से बालिकाओं तथा शिक्षा से वंचित वर्गों तक शिक्षा पहुँचाने के लिए विभिन्न शिक्षा केन्द्रों की स्थापना पर बल दिया गया।

इसके अन्तर्गत निम्नलिखित कार्य सम्मिलित थे—

  • बालिकाओं के अधिकतम नामांकन के लिए प्रयास करना।
  • क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा केन्द्र स्थापित करना।
  • शिशु शिक्षा केन्द्रों की व्यवस्था करना।
  • बालिका शिक्षा के उन्नयन के लिए विशेष प्रयास करना।

इस प्रकार शिक्षा केन्द्रों की स्थापना का उद्देश्य शिक्षा की पहुँच बढ़ाना तथा बालिकाओं एवं वंचित बच्चों को शैक्षिक अवसर प्रदान करना था।

7. बेसिक शिक्षा परियोजना के तीन प्रमुख घटक

पुस्तक के अनुसार बेसिक शिक्षा परियोजना में तीन प्रमुख घटकों को सम्मिलित किया गया।

इन घटकों का सम्बन्ध संस्थागत विकास, शिक्षा की गुणवत्ता तथा प्रारम्भिक शिक्षा की पहुँच बढ़ाने से था।

1. राज्य एवं जिला स्तर पर संस्थागत क्षमता का निर्माण

इस घटक के अन्तर्गत राज्य तथा जिला स्तर पर शिक्षा के नियोजन, प्रबन्धन एवं व्यावसायिक संगठन को मजबूत बनाने पर बल दिया गया।

पुस्तक में 10 से 15 वर्षीय राज्यव्यापी बेसिक शिक्षा विकास कार्यक्रम के नियोजन, प्रबन्धन तथा मूल्यांकन के लिए संस्थागत क्षमता विकसित करने का उल्लेख किया गया है।

इसका उद्देश्य शिक्षा के दीर्घकालीन विकास के लिए सक्षम प्रशासनिक एवं शैक्षिक व्यवस्था तैयार करना था।

2. सामुदायिक सहभागिता एवं शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार

इस घटक में समुदाय की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करने तथा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर बल दिया गया।

इसके अन्तर्गत निम्नलिखित कार्य शामिल थे—

  • प्राथमिक शिक्षा में सामुदायिक सहभागिता को मजबूत बनाना।
  • पाठ्यचर्या एवं पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा करना।
  • सेवारत शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।
  • महिलाओं तथा बालिकाओं के लिए लक्षित शैक्षिक कार्यक्रम विकसित करना।
  • विद्यालय प्रबन्धन को अधिक सक्षम बनाना।
  • प्रारम्भिक चयनित जिलों में शिक्षा की गुणवत्ता तथा प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने की स्थिति सुधारना।

इस प्रकार इस घटक में शिक्षक प्रशिक्षण, सामाजिक सहभागिता और शैक्षिक गुणवत्ता को विशेष महत्त्व दिया गया।

3. प्रारम्भिक शिक्षा तक पहुँच का विस्तार

इस घटक का मुख्य उद्देश्य प्रारम्भिक शिक्षा की सुविधाओं का विस्तार करना था।

इसके अन्तर्गत चयनित जिलों में नए प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना एवं निर्माण का प्रावधान किया गया।

इसके अतिरिक्त ऐसे बच्चों के लिए अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रमों को सहायता प्रदान करने पर बल दिया गया जो नियमित विद्यालयों में भाग नहीं ले पा रहे थे।

इस प्रकार इस घटक का उद्देश्य अधिक से अधिक बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा से जोड़ना था।

8. बेसिक शिक्षा परियोजना के परिणाम

बेसिक शिक्षा परियोजना के माध्यम से शिक्षा-व्यवस्था के संस्थागत विकास, विद्यालयों की स्थापना तथा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए अनेक प्रयास किए गए।

पुस्तक में इस परियोजना के निम्नलिखित 6 परिणाम बताए गए हैं।

1. संस्थागत विकास में सहायता

परियोजना का आकलन करने पर यह पाया गया कि इसके अन्तर्गत संस्थागत विकास प्रभावशाली रहा।

राज्य, जिला तथा स्थानीय स्तरों पर शिक्षा के प्रबन्धन एवं संचालन के लिए आवश्यक संस्थाओं को विकसित करने में सहायता मिली।

2. वित्तीय सहायता एवं परियोजना का मूल्यांकन

परियोजना के अन्तर्गत विश्व बैंक से प्राप्त ऋण तथा परियोजना की लचीली कार्यप्रणाली का मूल्यांकन किया गया।

इससे परियोजना के वित्तीय सहयोग एवं संचालन सम्बन्धी पक्षों की समीक्षा करने में सहायता मिली।

3. शिक्षक सहायता संस्थाओं की स्थापना

शैक्षिक सुधार के लिए शिक्षक सहायता से सम्बन्धित संस्थाओं की स्थापना तथा पहले से उपलब्ध संस्थाओं को सशक्त बनाया गया।

इन संस्थाओं का उद्देश्य शिक्षकों के प्रशिक्षण एवं शैक्षिक कार्यों में आवश्यक सहायता प्रदान करना था।

4. शैक्षिक गुणवत्ता एवं नामांकन में वृद्धि

पुस्तक के अनुसार परियोजना के माध्यम से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के साथ विद्यालयों में बच्चों के नामांकन में भी वृद्धि हुई।

इस परिणाम का सम्बन्ध अधिक बच्चों को शिक्षा से जोड़ने तथा विद्यालयी शिक्षा की स्थिति बेहतर बनाने से था।

5. प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना

चयनित जनपदों में नए प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना की गई।

इससे प्रारम्भिक शिक्षा की सुविधाओं का विस्तार हुआ तथा बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के अधिक अवसर उपलब्ध हुए।

6. अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों की स्थापना

परियोजना के अन्तर्गत अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों की स्थापना भी की गई।

इन केन्द्रों का उद्देश्य उन बच्चों तक शिक्षा पहुँचाना था जो विभिन्न कारणों से नियमित विद्यालयों में नहीं जा पा रहे थे।

9. बेसिक शिक्षा परियोजना का शैक्षिक महत्त्व

बेसिक शिक्षा परियोजना प्रारम्भिक शिक्षा के विकास के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रयास थी।

इस परियोजना में केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाने पर ही ध्यान नहीं दिया गया, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक प्रशिक्षण, सामाजिक सहभागिता तथा बच्चों की अधिगम उपलब्धियों में सुधार को भी महत्त्व दिया गया।

विशेष रूप से बालिकाओं, कमजोर वर्गों तथा शिक्षा से वंचित बच्चों को विद्यालयी शिक्षा से जोड़ने के लिए प्रयास किए गए।

इसके अतिरिक्त राज्य, जिला, विकास खण्ड तथा स्थानीय स्तरों पर प्रबन्धकीय एवं अकादमिक व्यवस्थाओं को विकसित करने का प्रयास किया गया।

इस प्रकार बेसिक शिक्षा परियोजना का प्रमुख महत्त्व प्रारम्भिक शिक्षा की पहुँच बढ़ाना, शैक्षिक असमानताओं को कम करना, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना तथा शिक्षा के सार्वभौमीकरण को प्रोत्साहित करना था।

समग्र निष्कर्ष

बेसिक शिक्षा परियोजना (BEP) उत्तर प्रदेश में वर्ष 1993 में प्रारम्भ की गई थी और यह 5 अक्टूबर 1993 से प्रभावी हुई।

विश्व बैंक के वित्तीय सहयोग से संचालित इस परियोजना का उद्देश्य सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा के अवसर प्रदान करना, बालिकाओं तथा वंचित वर्गों की शिक्षा को प्रोत्साहित करना और शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार करना था।

पुस्तक के अनुसार परियोजना के तीन प्रमुख अंग थे—संस्थागत क्षमता में वृद्धि, गुणवत्ता में सुधार एवं पूर्णता तथा बेसिक शिक्षा तक पहुँच में सुधार।

परियोजना के अन्तर्गत विद्यालयों की उपलब्धता, नामांकन, अधिगम उपलब्धियों, सतत शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण तथा विद्यालयी सुविधाओं के विकास को महत्त्व दिया गया।

इसके सफल क्रियान्वयन के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रबन्धकीय समितियों तथा अकादमिक संस्थाओं की व्यवस्था विकसित की गई।

इस प्रकार बेसिक शिक्षा परियोजना ने गुणवत्तापूर्ण एवं सर्वसुलभ प्रारम्भिक शिक्षा के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण संस्थागत तथा शैक्षिक आधार प्रदान किया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • BEP का पूरा नाम Basic Education Project तथा हिन्दी नाम बेसिक शिक्षा परियोजना है।
  • उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परियोजना वर्ष 1993 में प्रारम्भ हुई।
  • यह परियोजना 5 अक्टूबर 1993 से प्रभावी हुई।
  • परियोजना को विश्व बैंक से वित्तीय सहायता प्राप्त हुई।
  • पुस्तक के अनुसार इसकी कुल अनुमानित लागत लगभग 550 करोड़ रुपये थी।
  • प्रारम्भिक चरण में परियोजना उत्तर प्रदेश के 10 जिलों में लागू की गई।
  • ये जिले थे—वाराणसी, इलाहाबाद, बाँदा, इटावा, सीतापुर, अलीगढ़, सहारनपुर, गोरखपुर, पौड़ी तथा नैनीताल।
  • परियोजना का मुख्य उद्देश्य 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना था।
  • बालिकाओं, पिछड़े वर्गों तथा समाज के कमजोर वर्गों की शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया गया।
  • बेसिक शिक्षा परियोजना के 3 प्रमुख अंग थे—संस्थागत क्षमता में वृद्धि, गुणवत्ता में सुधार एवं पूर्णता तथा बेसिक शिक्षा तक पहुँच में सुधार।
  • विद्यालयों की सुलभता के लिए पुस्तक में 300 की आबादी तथा 1.5 किलोमीटर दूरी का मानदण्ड प्रस्तुत किया गया।
  • 6 से 11 वर्ष के सभी बच्चों के नामांकन के लिए पुस्तक में वर्ष 2006 का लक्ष्य दिया गया है।
  • बच्चों की अधिगम दक्षताओं के विकास के लिए वर्ष 2000 का लक्ष्य दिया गया।
  • लगभग 5000 की ग्रामीण आबादी वाले क्षेत्रों में सतत शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराने का उद्देश्य रखा गया।
  • परियोजना के अन्य उद्देश्य थे—शिक्षा का सार्वभौमीकरण, अपव्यय एवं अवरोधन में कमी, वंचित वर्गों की शिक्षा, नामांकन वृद्धि तथा गुणवत्ता सुधार।
  • परियोजना के कार्यों को प्रबन्धकीय तथा अकादमिक व्यवस्था में विभाजित किया गया।
  • प्रबन्धकीय व्यवस्था में राज्य परियोजना परिषद, जिला शिक्षा परियोजना समिति, ब्लॉक शिक्षा समिति तथा ग्राम शिक्षा समिति शामिल थीं।
  • अकादमिक व्यवस्था में SIEMAT, DIET, BRC तथा NPRC जैसी संस्थाओं का उल्लेख किया गया।
  • परियोजना के क्रियान्वयन के 7 प्रमुख कार्य थे—संस्थागत क्षमता वृद्धि, संस्थाओं की स्थापना, शैक्षिक गुणवत्ता उन्नयन, स्थानीय स्तर तक कार्यान्वयन, अधिगम सम्प्राप्ति सुधार, मूल्यांकन तकनीक तथा शिक्षा केन्द्रों की स्थापना।
  • परियोजना में 3 प्रमुख घटक थे—संस्थागत क्षमता निर्माण, सामुदायिक सहभागिता एवं गुणवत्ता सुधार तथा शिक्षा की पहुँच का विस्तार।
  • पुस्तक में परियोजना के 6 प्रमुख परिणाम बताए गए हैं।
  • प्रमुख परिणाम थे—संस्थागत विकास, वित्तीय मूल्यांकन, शिक्षक सहायता संस्थाओं का विकास, शैक्षिक गुणवत्ता एवं नामांकन में वृद्धि, नए विद्यालयों तथा अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों की स्थापना।
  • बेसिक शिक्षा परियोजना का मुख्य महत्त्व शिक्षा के सार्वभौमीकरण, शैक्षिक असमानताओं में कमी तथा गुणवत्तापूर्ण प्रारम्भिक शिक्षा से सम्बन्धित था।
Topic 4 जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP)—परिचय, उद्देश्य, प्रमुख विशेषताएँ एवं रणनीतियाँ

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP)—परिचय, उद्देश्य, प्रमुख विशेषताएँ एवं रणनीतियाँ

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम का परिचय

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (District Primary Education Programme—DPEP) भारत सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण, शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार तथा शिक्षा से वंचित बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने के लिए प्रारम्भ किया गया एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम था।

इस कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1994 में की गई थी।

इसका प्रमुख उद्देश्य सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना, विद्यालयों में उनका नामांकन एवं ठहराव बढ़ाना तथा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना था।

भारत में विभिन्न जिलों की सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षिक परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं। इसलिए DPEP में प्रत्येक जिले की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा के विकास की योजना तैयार करने पर बल दिया गया।

इस कार्यक्रम में विशेष रूप से बालिका शिक्षा, शैक्षिक असमानताओं को कम करने, विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या घटाने तथा शिक्षकों की दक्षता बढ़ाने को महत्त्व दिया गया।

इसके अतिरिक्त विद्यालय भवनों, कक्षा-कक्षों, शिक्षण सामग्री, संसाधन केन्द्रों तथा शिक्षक प्रशिक्षण की व्यवस्था में सुधार करने का प्रयास किया गया।

DPEP का प्रमुख उद्देश्य

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम का मूल उद्देश्य जिला स्तर पर नियोजन एवं सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना था।

1. जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम की पृष्ठभूमि एवं विकास

प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए देश में अनेक योजनाएँ संचालित की गई थीं। इनके बावजूद अनेक क्षेत्रों में बच्चों का नामांकन कम था तथा विद्यालयों में पर्याप्त सुविधाओं का अभाव था।

विशेष रूप से बालिकाएँ तथा सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चे शिक्षा के उचित अवसर प्राप्त नहीं कर पा रहे थे।

इन समस्याओं को दूर करने के लिए जिला स्तर पर अलग-अलग शैक्षिक योजनाएँ बनाकर कार्य करने की आवश्यकता अनुभव की गई।

इसी उद्देश्य से वर्ष 1994 में जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया।

इस कार्यक्रम में विद्यालयों की उपलब्धता बढ़ाने के साथ शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने तथा शैक्षिक असमानताओं को कम करने पर भी ध्यान दिया गया।

2. DPEP कार्यक्रम का तीन चरणों में विस्तार

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम को देश के विभिन्न राज्यों और जिलों में चरणबद्ध ढंग से लागू किया गया।

पुस्तक में इसके विकास का वर्णन तीन चरणों के अन्तर्गत किया गया है।

1. प्रथम चरण—वर्ष 1994

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम का प्रथम चरण वर्ष 1994 में प्रारम्भ किया गया।

इस चरण में देश के 7 राज्यों के 42 जिलों को कार्यक्रम के अन्तर्गत शामिल किया गया।

ये सात राज्य थे—

  1. मध्य प्रदेश।
  2. असम।
  3. हरियाणा।
  4. महाराष्ट्र।
  5. कर्नाटक।
  6. तमिलनाडु।
  7. केरल।

इन राज्यों के चयनित जिलों में प्राथमिक शिक्षा की पहुँच बढ़ाने, विद्यालयी सुविधाओं का विकास करने तथा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के प्रयास किए गए।

महत्त्वपूर्ण तथ्य: DPEP का प्रथम चरण वर्ष 1994 में 7 राज्यों के 42 जिलों से प्रारम्भ हुआ था।

2. द्वितीय चरण—उत्तर प्रदेश में 1997

कार्यक्रम के द्वितीय चरण में पहले से सम्मिलित राज्यों के अतिरिक्त अन्य राज्यों और जिलों तक इसका विस्तार किया गया।

पुस्तक में गुजरात, हिमाचल प्रदेश तथा उड़ीसा में भी कार्यक्रम के विस्तार का उल्लेख किया गया है।

उत्तर प्रदेश में DPEP-II वर्ष 1997 में प्रारम्भ हुआ।

इस चरण में उत्तर प्रदेश के 22 जिलों का चयन किया गया।

पुस्तक के अनुसार इन जिलों के चयन में महिला साक्षरता की अपेक्षाकृत निम्न स्थिति को महत्त्वपूर्ण आधार बनाया गया।

उत्तर प्रदेश के द्वितीय चरण के जिले

पुस्तक में निम्नलिखित 22 जिलों का उल्लेख किया गया है—

  1. बरेली।
  2. सोनभद्र।
  3. ललितपुर।
  4. बलरामपुर।
  5. ज्योतिबा फुले नगर।
  6. संत कबीर नगर।
  7. रामपुर।
  8. बहराइच।
  9. बाराबंकी।
  10. श्रावस्ती।
  11. फिरोजाबाद।
  12. हरदोई।
  13. देवरिया।
  14. बस्ती।
  15. शाहजहाँपुर।
  16. मुरादाबाद।
  17. पीलीभीत।
  18. लखीमपुर।
  19. गोण्डा।
  20. सिद्धार्थनगर।
  21. महाराजगंज।
  22. बदायूँ।

इस चरण में विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा, शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने तथा विद्यालयी सुविधाओं के विस्तार पर ध्यान दिया गया।

3. तृतीय चरण—उत्तर प्रदेश में 2000

उत्तर प्रदेश में DPEP-II के सकारात्मक अनुभवों को देखते हुए कार्यक्रम के विस्तार का निर्णय लिया गया।

इसके अन्तर्गत वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश में DPEP-III प्रारम्भ किया गया।

इस चरण में राज्य के 32 जिलों को कार्यक्रम से सम्बन्धित किया गया।

पुस्तक में प्रमुख रूप से कुशीनगर, प्रतापगढ़, हमीरपुर, महोबा, आजमगढ़, रायबरेली, फैजाबाद, आगरा, बिजनौर, मथुरा, झाँसी, उन्नाव, गाजीपुर, बलिया, गाजियाबाद, मेरठ तथा अन्य चयनित जिलों का उल्लेख किया गया है।

इस चरण का उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा के अवसरों का विस्तार करना तथा अधिक जिलों में विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना था।

DPEP के प्रमुख चरणों का सारांश
चरण वर्ष प्रमुख तथ्य
प्रथम चरण 1994 7 राज्यों के 42 जिलों में शुरुआत।
उत्तर प्रदेश DPEP-II 1997 उत्तर प्रदेश के 22 जिलों में कार्यक्रम।
उत्तर प्रदेश DPEP-III 2000 उत्तर प्रदेश के 32 जिलों में कार्यक्रम।

ध्यान दें: उपर्युक्त 1997 और 2000 की तिथियाँ उत्तर प्रदेश में DPEP के विस्तार से सम्बन्धित हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम के विभिन्न चरणों की शुरुआत की तिथियों से इन्हें अलग समझना चाहिए।

3. DPEP के तीन प्रमुख कार्यक्षेत्र

पुस्तक के अनुसार जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम में निम्नलिखित तीन प्रमुख पक्षों पर विशेष ध्यान दिया गया।

1. भवन एवं संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ बनाना

विद्यालय भवनों, संसाधन केन्द्रों तथा शिक्षा से सम्बन्धित संस्थाओं की सुविधाओं और कार्यक्षमता में सुधार करना।

इसके अन्तर्गत विद्यालयों की भौतिक व्यवस्था के साथ शैक्षिक प्रबन्धन को भी सशक्त बनाने पर बल दिया गया।

2. शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना तथा सम्प्राप्ति में कमी दूर करना

विद्यार्थियों के अधिगम स्तर में सुधार करना तथा उनकी शैक्षिक उपलब्धियों में पाई जाने वाली कमियों को दूर करना।

इसके लिए शिक्षक प्रशिक्षण, शिक्षण सामग्री तथा मूल्यांकन में सुधार को महत्त्व दिया गया।

3. प्राथमिक शिक्षा तक पहुँच का विस्तार करना

अधिक से अधिक बच्चों तक प्राथमिक शिक्षा की सुविधा पहुँचाना।

इसके लिए नए विद्यालयों तथा वैकल्पिक शिक्षा केन्द्रों की स्थापना और शिक्षा से वंचित बच्चों को विद्यालयी व्यवस्था से जोड़ने पर बल दिया गया।

4. जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम के उद्देश्य

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य प्रारम्भिक शिक्षा की पहुँच बढ़ाना, शैक्षिक गुणवत्ता सुधारना तथा सभी बच्चों को समान शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराना था।

पुस्तक में इसके 9 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।

1. सभी छात्रों को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ना

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम का प्रथम उद्देश्य सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना था।

इसके अन्तर्गत चयनित जिलों में विद्यालय न जाने वाले बच्चों की पहचान करके उन्हें विद्यालयी शिक्षा से जोड़ने पर बल दिया गया।

इससे प्राथमिक शिक्षा का प्रसार बढ़ाने तथा अधिक बच्चों को विद्यालय आने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया।

2. औपचारिक शिक्षा प्रदान करना

कार्यक्रम का दूसरा उद्देश्य बच्चों को औपचारिक विद्यालयी शिक्षा (Formal Education) प्रदान करना था।

औपचारिक शिक्षा से आशय विद्यालयों में निर्धारित पाठ्यक्रम तथा शैक्षिक व्यवस्था के अन्तर्गत दी जाने वाली शिक्षा से है।

इस उद्देश्य के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा का विस्तार करने तथा साक्षरता एवं विद्यालयी नामांकन बढ़ाने पर बल दिया गया।

3. लैंगिक असमानता एवं भेदभाव समाप्त करना

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम में बालक और बालिकाओं के बीच शैक्षिक असमानता कम करने को विशेष महत्त्व दिया गया।

इसके साथ विद्यार्थियों के बीच सामाजिक एवं जातीय भेदभाव दूर करने पर भी बल दिया गया।

इस उद्देश्य का मुख्य आधार सभी बच्चों के लिए समान शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराना था।

इससे बालिकाओं तथा वंचित वर्गों के बच्चों की शिक्षा को प्रोत्साहन मिलने की अपेक्षा थी।

4. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के बच्चों को सहायता देना

इस कार्यक्रम का एक उद्देश्य अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के लिए आवश्यक सहायता प्रदान करना था।

पुस्तक में इनके लिए निःशुल्क शिक्षा तथा सहायक सामग्री उपलब्ध कराने का उल्लेख किया गया है।

इन सामग्रियों में प्रमुख रूप से निम्नलिखित शामिल थीं—

  • पुस्तकें।
  • विद्यालयी बैग।
  • अन्य आवश्यक शैक्षिक सामग्री।

इस प्रकार आर्थिक तथा सामाजिक कठिनाइयों के कारण शिक्षा से वंचित बच्चों को विद्यालय से जोड़ने का प्रयास किया गया।

5. जिला स्तर पर एकता एवं समानता की भावना विकसित करना

DPEP का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों के बच्चों के बीच एकता, सहयोग तथा समानता की भावना विकसित करना था।

पुस्तक के अनुसार इसके माध्यम से सामाजिक रूप से पिछड़े तथा वंचित वर्गों को विकास के उचित अवसर प्रदान करने पर बल दिया गया।

इस प्रकार यह कार्यक्रम केवल शिक्षा के प्रसार तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक समानता को भी प्रोत्साहित करता था।

6. विद्यार्थियों की अधिगम क्षमताओं में 25 प्रतिशत वृद्धि करना

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम में विद्यार्थियों की अधिगम उपलब्धियों में कम से कम 25 प्रतिशत सुधार का लक्ष्य रखा गया था।

अधिगम उपलब्धि का अर्थ है शिक्षण प्राप्त करने के बाद विद्यार्थियों द्वारा अर्जित ज्ञान, कौशल तथा दक्षताएँ।

इसके लिए प्राथमिक स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सुधार करने पर बल दिया गया।

इस उद्देश्य का लक्ष्य विद्यार्थियों को आगे की शिक्षा के लिए अधिक सक्षम बनाना था।

7. प्राथमिक स्तर पर विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या कम करना

प्राथमिक शिक्षा में विद्यालय छोड़ने की समस्या (Dropout) को कम करना इस कार्यक्रम का एक प्रमुख उद्देश्य था।

कुछ विद्यार्थी आर्थिक, सामाजिक या पारिवारिक परिस्थितियों के कारण प्राथमिक शिक्षा पूरी किए बिना विद्यालय छोड़ देते हैं।

DPEP के अन्तर्गत ऐसे बच्चों को पुनः शिक्षा से जोड़ने तथा विद्यालय में बनाए रखने के प्रयासों को महत्त्व दिया गया।

इसका उद्देश्य बच्चों की शिक्षा में निरन्तरता बनाए रखना और प्राथमिक शिक्षा पूरी करने की स्थिति में सुधार करना था।

8. कार्यक्रम की पूर्ण सफलता सुनिश्चित करना

इस उद्देश्य का सम्बन्ध जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम के निर्धारित शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति से था।

पुस्तक के अनुसार कार्यक्रम की सफलता तभी मानी जाएगी जब विद्यार्थियों का उचित विकास हो तथा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आए।

इसलिए कार्यक्रम में नामांकन बढ़ाने के साथ विद्यार्थियों के वास्तविक अधिगम तथा साक्षरता में सुधार को भी आवश्यक माना गया।

9. सामुदायिक सहभागिता को प्रोत्साहित करना

DPEP का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य शिक्षा के विकास में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना था।

इसके अन्तर्गत ग्रामीण जनता, सरपंच, पंच, विद्यालय के अधिकारियों तथा अन्य स्थानीय व्यक्तियों की सहभागिता को महत्त्व दिया गया।

समुदाय की सहायता से विद्यालयों की समस्याओं की पहचान करना, बच्चों का नामांकन बढ़ाना तथा शैक्षिक सुविधाओं के विकास में सहयोग प्राप्त करना सम्भव हो सकता है।

इस प्रकार DPEP में प्राथमिक शिक्षा को केवल सरकार का उत्तरदायित्व न मानकर सरकार, विद्यालय तथा समुदाय का संयुक्त प्रयास माना गया।

5. जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएँ

DPEP के अन्तर्गत विद्यालयों की संख्या, शिक्षक नियुक्ति, शैक्षिक संसाधनों तथा विद्यार्थियों की सहभागिता बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किए गए।

पुस्तक में कार्यक्रम की 8 प्रमुख विशेषताएँ ऐतिहासिक आँकड़ों के साथ प्रस्तुत की गई हैं।

निम्नलिखित आँकड़े मूल पुस्तक में दिए गए विवरण पर आधारित हैं। इन्हें उसी स्रोत के ऐतिहासिक दावों के रूप में समझना चाहिए।

1. शिक्षकों की नियुक्ति

पुस्तक के अनुसार इस कार्यक्रम के अन्तर्गत लगभग 1,77,000 अध्यापकों की नियुक्ति का उल्लेख किया गया है।

इसका उद्देश्य विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ाना तथा शिक्षण व्यवस्था में सुधार करना था।

2. नए विद्यालयों एवं वैकल्पिक शिक्षा का विस्तार

पुस्तक में लगभग 1 लाख 60 हजार नए विद्यालयों तथा वैकल्पिक शिक्षा सम्बन्धी व्यवस्थाओं के विस्तार का उल्लेख किया गया है।

इसी बिन्दु में 83 वैकल्पिक विद्यालय एवं संस्थानों तथा ब्रिज कोर्स के माध्यम से लगभग 2 लाख बच्चों को शिक्षित किए जाने का विवरण भी दिया गया है।

ब्रिज कोर्स (Bridge Course) का अर्थ ऐसे विशेष शिक्षण कार्यक्रम से है जो शिक्षा से वंचित या पढ़ाई में पीछे रह गए बच्चों को नियमित विद्यालयी शिक्षा से जुड़ने में सहायता करता है।

इन प्रयासों का उद्देश्य विद्यालय न जाने वाले बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना था।

3. विद्यालय भवनों एवं संसाधन केन्द्रों का विकास

पुस्तक के अनुसार कार्यक्रम के अन्तर्गत—

  • 52,758 विद्यालय भवनों के निर्माण का उल्लेख है।
  • 16,619 संसाधन केन्द्रों की स्थापना का उल्लेख है।
  • 29,307 कमरों की मरम्मत कराए जाने का उल्लेख है।
  • विद्यालयों में शौचालयों के निर्माण एवं सुविधाओं के विकास पर भी ध्यान दिया गया।

इन कार्यों का उद्देश्य विद्यालयों की भौतिक स्थिति तथा शिक्षण-अधिगम के वातावरण में सुधार करना था।

4. वैकल्पिक शिक्षा एवं साक्षरता में सुधार

कार्यक्रम के अन्तर्गत वैकल्पिक विद्यालयों तथा शिक्षा की गारंटी सम्बन्धी व्यवस्थाओं के माध्यम से बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया गया।

पुस्तक में वर्ष 2001–02 के सन्दर्भ में साक्षरता अनुपात को 100 प्रतिशत तक पहुँचाने का उल्लेख है।

यह पुस्तक में प्रस्तुत ऐतिहासिक दावा है। इसे पूरे देश की वास्तविक साक्षरता दर के रूप में नहीं समझना चाहिए।

5. बालिकाओं की शिक्षा में वृद्धि

DPEP में बालिका शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया।

पुस्तक के अनुसार कार्यक्रम के माध्यम से बालिकाओं की संख्या में वृद्धि हुई तथा लगभग 48–49 प्रतिशत उपस्थिति का उल्लेख किया गया है।

इसका सम्बन्ध विद्यालयों में बालिकाओं की भागीदारी बढ़ाने के प्रयासों से था।

6. संसाधन केन्द्रों की स्थापना

शिक्षा की गुणवत्ता तथा शिक्षक प्रशिक्षण में सुधार के लिए विभिन्न स्तरों पर संसाधन केन्द्र विकसित किए गए।

पुस्तक के अनुसार—

  • जिला स्तर पर 3,380 संसाधन केन्द्रों का उल्लेख किया गया है।
  • क्लस्टर स्तर पर 29,725 केन्द्रों का उल्लेख किया गया है।

इन केन्द्रों के माध्यम से शिक्षकों को शैक्षिक सहायता तथा प्रशिक्षण सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।

7. दिव्यांग एवं अन्य बच्चों को शिक्षा से जोड़ना

DPEP में विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों की शिक्षा को भी महत्त्व दिया गया।

पुस्तक के अनुसार इस कार्यक्रम के अन्तर्गत लगभग 4,20,203 दिव्यांग बच्चों को सम्मिलित किए जाने का उल्लेख है।

इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों के लगभग 5,53,844 अन्य बच्चों की सहभागिता का विवरण भी दिया गया है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य विभिन्न आवश्यकताओं वाले बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना था।

8. ग्राम शिक्षा समिति एवं विद्यालय प्रबन्ध समिति का गठन

कार्यक्रम में ग्रामीण समुदाय तथा अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न समितियों के गठन पर बल दिया गया।

इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित समितियाँ शामिल थीं—

  • ग्राम शिक्षा समिति।
  • विद्यालय प्रबन्ध समिति।

इन समितियों का उद्देश्य विद्यालयों की समस्याओं की पहचान करना, आवश्यक सुविधाओं के विकास में सहयोग करना तथा समुदाय को शिक्षा के प्रति उत्तरदायी बनाना था।

6. DPEP के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु प्रमुख रणनीतियाँ

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम के शैक्षिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपनाई गईं।

पुस्तक में इसकी 6 प्रमुख रणनीतियाँ बताई गई हैं।

1. निचले स्तर तक योजना निर्माण एवं क्रियान्वयन में सहभागिता

DPEP की एक प्रमुख रणनीति स्थानीय स्तर पर शैक्षिक नियोजन को महत्त्व देना था।

इसके अन्तर्गत जिला, विकास खण्ड तथा स्थानीय स्तर पर शिक्षा की आवश्यकताओं के अनुसार योजनाएँ तैयार करने पर बल दिया गया।

इससे स्थानीय लोगों तथा शिक्षा से सम्बन्धित संस्थाओं की भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया गया।

2. बालिका शिक्षा को विशेष महत्त्व

DPEP में बालिकाओं की शिक्षा को विशेष प्राथमिकता दी गई।

इस रणनीति का उद्देश्य बालिकाओं के नामांकन एवं विद्यालयी सहभागिता को बढ़ाना तथा बालक-बालिकाओं के बीच शैक्षिक असमानता कम करना था।

इसके लिए समाज में बालिका शिक्षा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने पर भी बल दिया गया।

3. विद्यालय की प्रभावकारिता बढ़ाना

विद्यालय की प्रभावकारिता का अर्थ है विद्यालय द्वारा अपने शैक्षिक उद्देश्यों को प्रभावशाली ढंग से पूरा करने की क्षमता।

DPEP के अन्तर्गत विद्यालयों की कार्यप्रणाली, शिक्षण सामग्री, शिक्षक प्रशिक्षण तथा शिक्षण-अधिगम वातावरण में सुधार पर बल दिया गया।

इससे विद्यालयों को अधिक उपयोगी तथा विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने का प्रयास किया गया।

4. वैकल्पिक शिक्षा का सुदृढ़ीकरण

सभी बच्चे विभिन्न कारणों से नियमित विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते।

ऐसे बच्चों के लिए वैकल्पिक शिक्षा केन्द्रों तथा विशेष शैक्षिक कार्यक्रमों को मजबूत बनाने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य शिक्षा से वंचित बच्चों तक प्राथमिक शिक्षा पहुँचाना तथा उन्हें विद्यालयी शिक्षा से जोड़ना था।

5. सामुदायिक सहयोग एवं समानता पर बल

DPEP में शिक्षा के विकास के लिए समुदाय के सहयोग को आवश्यक माना गया।

इसके अन्तर्गत अभिभावकों, ग्राम शिक्षा समितियों तथा स्थानीय व्यक्तियों की सक्रिय सहभागिता पर बल दिया गया।

इसके साथ ही समाज के विभिन्न वर्गों के बच्चों को समान शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराने को भी महत्त्व दिया गया।

इस प्रकार इस रणनीति का उद्देश्य सामुदायिक सहयोग के माध्यम से शिक्षा का प्रसार तथा शैक्षिक समानता का विकास करना था।

6. शिक्षकों की दक्षता में वृद्धि

शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए शिक्षकों की योग्यता तथा शिक्षण-कौशल का विकास आवश्यक है।

इसलिए DPEP में शिक्षकों के प्रशिक्षण तथा व्यावसायिक विकास पर विशेष ध्यान दिया गया।

इसका उद्देश्य शिक्षकों को प्रभावशाली शिक्षण-विधियों, शिक्षण सामग्री तथा बच्चों की अधिगम आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य करने में सक्षम बनाना था।

7. जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम का शैक्षिक महत्त्व

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम भारतीय प्राथमिक शिक्षा के विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास था।

इसकी विशेषता यह थी कि शिक्षा के विकास के लिए केवल राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर योजनाएँ तैयार करने के बजाय जिलों की वास्तविक आवश्यकताओं तथा स्थानीय सहभागिता को महत्त्व दिया गया।

इसके माध्यम से विद्यालयी सुविधाओं का विस्तार, शिक्षकों का प्रशिक्षण, बालिका शिक्षा का विकास तथा शिक्षा से वंचित बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने के प्रयास किए गए।

कार्यक्रम में विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या कम करने तथा विद्यार्थियों की अधिगम उपलब्धियों में सुधार को भी प्रमुख लक्ष्य माना गया।

इसके अतिरिक्त ग्राम शिक्षा समितियों तथा विद्यालय प्रबन्ध समितियों के माध्यम से समुदाय की सहभागिता को प्रोत्साहित किया गया।

इस प्रकार DPEP का प्रमुख महत्त्व शिक्षा की पहुँच, गुणवत्ता, समानता तथा सामुदायिक सहभागिता में सुधार से सम्बन्धित था।

समग्र निष्कर्ष

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP) वर्ष 1994 में प्रारम्भ किया गया था। प्रथम चरण में यह कार्यक्रम 7 राज्यों के 42 जिलों में लागू हुआ।

उत्तर प्रदेश में इसके द्वितीय चरण की शुरुआत 1997 में 22 जिलों तथा तृतीय चरण की शुरुआत 2000 में 32 जिलों में हुई।

इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ना, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना, बालिका शिक्षा को बढ़ावा देना तथा सामाजिक एवं लैंगिक असमानताओं को कम करना था।

कार्यक्रम में विद्यार्थियों की अधिगम उपलब्धियों में 25 प्रतिशत सुधार तथा प्राथमिक स्तर पर विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या कम करने को भी महत्त्व दिया गया।

DPEP के अन्तर्गत विद्यालयों एवं संसाधन केन्द्रों का विकास, शिक्षक प्रशिक्षण, वैकल्पिक शिक्षा तथा सामुदायिक सहभागिता जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया गया।

इस प्रकार जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम ने विकेन्द्रीकृत नियोजन, गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा तथा शैक्षिक समानता के विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • DPEP का पूरा नाम District Primary Education Programme है। इसका हिन्दी नाम जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम है।
  • DPEP की शुरुआत 1994 में की गई।
  • प्रथम चरण में यह कार्यक्रम 7 राज्यों के 42 जिलों में लागू किया गया।
  • ये सात राज्य थे—मध्य प्रदेश, असम, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल।
  • उत्तर प्रदेश में DPEP-II वर्ष 1997 में प्रारम्भ हुआ तथा इसके अन्तर्गत 22 जिलों का चयन किया गया।
  • उत्तर प्रदेश में DPEP-III वर्ष 2000 में प्रारम्भ हुआ तथा इसमें 32 जिलों को सम्मिलित किया गया।
  • DPEP-II के जिलों के चयन में महिला साक्षरता की निम्न स्थिति को महत्त्वपूर्ण आधार बनाया गया।
  • DPEP के तीन प्रमुख कार्यक्षेत्र थे—संस्थागत क्षमता का विकास, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना तथा प्राथमिक शिक्षा की पहुँच बढ़ाना।
  • पुस्तक में DPEP के 9 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
  • प्रमुख उद्देश्य थे—सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ना, औपचारिक शिक्षा प्रदान करना तथा लैंगिक एवं सामाजिक भेदभाव कम करना।
  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा तथा पुस्तकों, बैग आदि शैक्षिक सामग्री की सहायता पर बल दिया गया।
  • DPEP का एक प्रमुख लक्ष्य विद्यार्थियों की अधिगम उपलब्धियों में कम से कम 25 प्रतिशत सुधार करना था।
  • प्राथमिक स्तर पर विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या कम करना भी इस कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य था।
  • DPEP में शिक्षा के विकास के लिए सामुदायिक सहभागिता को विशेष महत्त्व दिया गया।
  • पुस्तक में DPEP की 8 प्रमुख विशेषताएँ बताई गई हैं।
  • इनमें शिक्षक नियुक्ति, नए विद्यालयों की स्थापना, भवन निर्माण, संसाधन केन्द्रों का विकास तथा बालिका शिक्षा का विस्तार प्रमुख हैं।
  • पुस्तक में लगभग 1,77,000 शिक्षकों की नियुक्ति तथा 52,758 विद्यालय भवनों के निर्माण का उल्लेख है।
  • पुस्तक के अनुसार लगभग 3,380 संसाधन केन्द्र तथा क्लस्टर स्तर पर 29,725 केन्द्रों का उल्लेख किया गया है।
  • कार्यक्रम में दिव्यांग बच्चों को शिक्षा से जोड़ने तथा ग्राम शिक्षा समिति और विद्यालय प्रबन्ध समिति के गठन पर बल दिया गया।
  • पुस्तक में DPEP की 6 प्रमुख रणनीतियाँ बताई गई हैं।
  • ये रणनीतियाँ थीं—स्थानीय स्तर पर नियोजन, बालिका शिक्षा, विद्यालय की प्रभावकारिता, वैकल्पिक शिक्षा, सामुदायिक सहयोग एवं समानता तथा शिक्षक दक्षता में वृद्धि।
  • DPEP का मूल आधार जिला-आधारित नियोजन तथा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप प्राथमिक शिक्षा का विकास था।
  • इस कार्यक्रम का समग्र उद्देश्य सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराना तथा शैक्षिक असमानताओं को कम करना था।
Topic 5 विद्यालय शिक्षा की तैयारी कार्यक्रम (School Readiness)—अवधारणा, उद्देश्य, क्षेत्र एवं महत्त्व

विद्यालय शिक्षा की तैयारी कार्यक्रम (School Readiness)—अवधारणा, उद्देश्य, क्षेत्र एवं महत्त्व

विद्यालय शिक्षा की तैयारी कार्यक्रम का परिचय

विद्यालय शिक्षा की तैयारी कार्यक्रम (School Readiness Programme) एक ऐसा शैक्षिक कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य छोटे बच्चों को औपचारिक विद्यालयी वातावरण में प्रवेश करने तथा वहाँ की शिक्षण-अधिगम गतिविधियों में भाग लेने के लिए तैयार करना है।

पुस्तक में इसे विद्यालयोन्मुख कार्यक्रम भी कहा गया है। यह मुख्य रूप से 3 से 6 वर्ष की आयु के बच्चों की विद्यालयी तैयारी से सम्बन्धित है।

सामान्यतः छोटे बच्चे अपने परिवार, डे-केयर, क्रेच, आँगनबाड़ी अथवा बालवाड़ी जैसे अनौपचारिक परिवेश में रहते हैं। वहाँ का वातावरण विद्यालय की अपेक्षा अधिक परिचित तथा सहज होता है।

जब ये बच्चे पहली बार औपचारिक विद्यालय में प्रवेश लेते हैं, तो उन्हें नए वातावरण, शिक्षकों, अन्य बच्चों तथा विभिन्न गतिविधियों के साथ समायोजन करने में कठिनाई हो सकती है।

इन्हीं कठिनाइयों को कम करने के लिए स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम के माध्यम से बच्चों की भाषा, पठन सम्बन्धी प्रारम्भिक क्षमताओं, सामाजिक व्यवहार तथा सीखने की तैयारी को विकसित करने पर बल दिया जाता है।

पुस्तक के अनुसार यह कार्यक्रम राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा तैयार किया गया है।

1. स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम की अवधारणा

स्कूल रेडीनेस (School Readiness) का अर्थ है बालक में ऐसी आवश्यक क्षमताओं, आदतों तथा व्यवहारों का विकास करना, जिनसे वह विद्यालय में प्रवेश करने के बाद नई परिस्थितियों के साथ सहजता से समायोजन कर सके।

पुस्तक में स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम को पूर्व-विद्यालयी बच्चों की तैयारी बढ़ाने वाला एक पेरेंटिंग कार्यक्रम बताया गया है, जो बेसिक पेरेंट प्रोग्राम का पूरक है।

इसके अन्तर्गत बच्चों की भाषा, पठन सम्बन्धी तैयारी तथा सामाजिक कौशलों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

इस कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य बच्चे को केवल पढ़ना-लिखना सिखाना नहीं, बल्कि उसे विद्यालय के वातावरण, शिक्षण गतिविधियों तथा सामाजिक व्यवहार के लिए तैयार करना है।

स्कूल रेडीनेस की आवश्यकता क्यों होती है?

जब बच्चा आँगनबाड़ी, बालवाड़ी अथवा पारिवारिक परिवेश से निकलकर कक्षा एक में प्रवेश करता है, तो उसके सामने कई नई परिस्थितियाँ आती हैं।

  • नए विद्यालयी वातावरण से परिचित होना।
  • शिक्षकों एवं अन्य बच्चों के साथ व्यवहार करना।
  • कक्षा की गतिविधियों में भाग लेना।
  • शिक्षक के निर्देशों को ध्यान से सुनना।
  • विद्यालय में आवश्यक आदतों एवं व्यवहारों को अपनाना।

इन परिस्थितियों के लिए पूर्व तैयारी होने से बच्चे को विद्यालय में समायोजन करने में सहायता मिलती है।

इसीलिए स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम को विद्यालय में प्रवेश से पहले बच्चों की आवश्यक वैयक्तिक, सामाजिक, अकादमिक तथा मानसिक तैयारी का महत्त्वपूर्ण माध्यम माना गया है।

2. स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम की प्रमुख विशेषताएँ

पुस्तक में वर्णित अवधारणा के आधार पर स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  • लक्षित आयु वर्ग— यह कार्यक्रम मुख्य रूप से 3 से 6 वर्ष के बच्चों के लिए है।
  • पूर्व-विद्यालयी तैयारी— बच्चों को औपचारिक विद्यालय में प्रवेश के लिए तैयार करना इसका मुख्य उद्देश्य है।
  • अनौपचारिक से औपचारिक वातावरण में समायोजन— परिवार, आँगनबाड़ी अथवा बालवाड़ी से विद्यालय में आने वाले बच्चों की सहायता करना।
  • भाषायी एवं सामाजिक विकास— बच्चों की भाषा, पठन सम्बन्धी प्रारम्भिक तैयारी तथा सामाजिक कौशलों को बढ़ावा देना।
  • गतिविधियों पर विशेष ध्यान— बच्चों को विभिन्न रोचक गतिविधियों के माध्यम से सीखने तथा नए वातावरण से परिचित होने के अवसर प्रदान करना।

इस प्रकार स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम बच्चों को विद्यालय के लिए मानसिक, सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से तैयार करने में सहायता करता है।

3. स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम के उद्देश्य

विद्यालय शिक्षा की तैयारी कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य छोटे बच्चों में विद्यालय के प्रति रुचि तथा सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना और उन्हें शिक्षण-अधिगम गतिविधियों में भाग लेने के योग्य बनाना है।

पुस्तक के अनुसार इस कार्यक्रम के 9 प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं।

1. कक्षागत गतिविधियों में बच्चों की सहभागिता बढ़ाना

स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम का पहला उद्देश्य बच्चों को कक्षा में होने वाली विभिन्न गतिविधियों में भाग लेने के लिए तैयार करना है।

इसके माध्यम से बच्चे शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सक्रिय रूप से सम्मिलित होना सीखते हैं।

इससे उनमें विद्यालय की गतिविधियों के प्रति रुचि तथा सहभागिता की भावना विकसित होती है।

2. औपचारिक विद्यालयी वातावरण के लिए तैयार करना

छोटे बच्चे सामान्यतः अनौपचारिक वातावरण में रहते हैं। विद्यालय में प्रवेश लेने पर उन्हें नए नियमों, गतिविधियों तथा व्यवहारों से परिचित होना पड़ता है।

इसलिए इस कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों को औपचारिक विद्यालयी वातावरण के लिए तैयार करना है।

इससे बच्चे नए वातावरण में अधिक सहजता से समायोजन कर सकते हैं।

3. विद्यालय के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना

बच्चों में विद्यालय के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना इस कार्यक्रम का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

बच्चे विद्यालय को भय अथवा कठिनाई का स्थान न समझकर सीखने तथा विभिन्न गतिविधियों में भाग लेने के स्थान के रूप में स्वीकार करें।

इससे विद्यालय के प्रति उनकी रुचि विकसित करने में सहायता मिलती है।

4. विद्यालय के प्रति रुचि एवं जागरूकता उत्पन्न करना

इस कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों को विद्यालय तथा वहाँ होने वाली गतिविधियों के प्रति जागरूक बनाना है।

बच्चों में विद्यालय आने, नई बातें सीखने तथा अन्य बच्चों के साथ गतिविधियों में भाग लेने की रुचि विकसित की जाती है।

इससे वे विद्यालयी शिक्षा को अधिक सहजता से स्वीकार कर सकते हैं।

5. विद्यालयी गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना

छोटे बच्चों को विभिन्न विद्यालयी गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना भी स्कूल रेडीनेस का उद्देश्य है।

बच्चों को कविता सुनाने, खेल तथा अन्य रोचक गतिविधियों में सम्मिलित होने के अवसर दिए जाते हैं।

इससे उनमें सक्रियता, आत्मविश्वास तथा सहभागिता विकसित करने में सहायता मिलती है।

6. विद्यालय एवं बालक के बीच समायोजन स्थापित करना

विद्यालय में प्रवेश लेने के बाद बच्चे को नए वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है।

स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम बच्चों को विद्यालय के वातावरण, शिक्षक तथा अन्य बच्चों से परिचित होने में सहायता करता है।

इस प्रकार इसका उद्देश्य बालक एवं विद्यालयी वातावरण के बीच उचित समायोजन विकसित करना है।

7. श्रवण कौशल में सुधार करना

श्रवण कौशल (Listening Skill) का अर्थ है किसी ध्वनि, निर्देश अथवा कही गई बात को ध्यानपूर्वक सुनने और समझने की क्षमता।

स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम में बच्चों के श्रवण कौशल को विकसित करने पर बल दिया जाता है।

इससे बच्चे शिक्षक द्वारा कही गई बातों तथा निर्देशों को अधिक ध्यान से सुनना सीखते हैं।

8. ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता विकसित करना

छोटे बच्चों का ध्यान विभिन्न गतिविधियों की ओर जल्दी आकर्षित हो सकता है।

इसलिए इस कार्यक्रम का एक उद्देश्य बच्चों में ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता विकसित करना है।

इसके माध्यम से बच्चे किसी गतिविधि, ध्वनि अथवा विषय पर अधिक ध्यान देने का अभ्यास करते हैं।

9. ध्वनि एवं दृश्य में समन्वय करने का कौशल विकसित करना

इस कार्यक्रम का एक उद्देश्य बच्चों में ध्वनि तथा दृश्य के बीच समन्वय स्थापित करने की क्षमता विकसित करना है।

अर्थात बच्चे जो सुनते हैं और जो देखते हैं, उनके बीच उचित सम्बन्ध समझना सीखते हैं।

इससे बच्चों की श्रवण, दृश्य पहचान तथा प्रारम्भिक अधिगम सम्बन्धी क्षमताओं के विकास में सहायता मिलती है।

4. स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम के प्रमुख क्षेत्र

स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम में बच्चों की विद्यालयी तैयारी को विकसित करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाता है।

पुस्तक में इसके 4 प्रमुख क्षेत्र बताए गए हैं।

  1. वैयक्तिक एवं सामाजिक तैयारी।
  2. अकादमिक तैयारी।
  3. संज्ञानात्मक कौशलों का विकास।
  4. सृजनात्मकता का विकास।

इन क्षेत्रों का उद्देश्य बच्चों की आवश्यक व्यक्तिगत आदतों, सामाजिक व्यवहार, प्रारम्भिक अधिगम क्षमताओं तथा रचनात्मक योग्यताओं का विकास करना है।

5. वैयक्तिक एवं सामाजिक तैयारी

वैयक्तिक एवं सामाजिक तैयारी (Personal and Social Readiness) का अर्थ है बच्चे को अपने व्यक्तिगत कार्य करने तथा अन्य लोगों के साथ उचित व्यवहार करने के लिए तैयार करना।

विद्यालय में बच्चे को केवल पढ़ाई ही नहीं करनी होती, बल्कि अन्य बच्चों तथा शिक्षकों के साथ मिलकर विभिन्न गतिविधियों में भाग भी लेना होता है।

इसलिए स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम में बच्चों के वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास को महत्त्व दिया गया है।

इसके अन्तर्गत विकसित किए जाने वाले प्रमुख गुण
  1. अपने कार्यों के लिए तत्परता— बच्चे में अपने छोटे-छोटे कार्य स्वयं करने की इच्छा तथा तैयारी विकसित करना।
  2. संयम एवं धैर्य— बच्चों को विभिन्न परिस्थितियों में संयम रखना तथा धैर्यपूर्वक कार्य करना सिखाना।
  3. शिष्टता एवं आदर— शिक्षक, साथियों तथा अन्य व्यक्तियों के प्रति उचित व्यवहार एवं सम्मान की भावना विकसित करना।
  4. सामाजिक सहयोग— दूसरे बच्चों के साथ मिलकर कार्य करने तथा एक-दूसरे की सहायता करने की भावना विकसित करना।
  5. व्यक्तिगत प्रस्तुति एवं आचरण— बच्चों के व्यक्तिगत व्यवहार, प्रस्तुति तथा अच्छी आदतों में सुधार करना।

इस प्रकार वैयक्तिक एवं सामाजिक तैयारी से बच्चे में आत्मनिर्भरता, शिष्ट व्यवहार, धैर्य तथा सहयोग की भावना विकसित होती है।

6. अकादमिक तैयारी

अकादमिक तैयारी (Academic Readiness) का अर्थ है बच्चे में विद्यालयी अधिगम के लिए आवश्यक प्रारम्भिक ज्ञान तथा क्षमताएँ विकसित करना।

इसके अन्तर्गत भाषा, शब्दों, अक्षरों, श्रवण तथा ध्वनि एवं दृश्य सम्बन्धी क्षमताओं के विकास पर ध्यान दिया जाता है।

पुस्तक के अनुसार अकादमिक तैयारी में निम्नलिखित 6 प्रमुख क्षमताएँ विकसित की जाती हैं।

1. शब्द भण्डार में वृद्धि

बच्चों को नए शब्दों से परिचित कराकर उनके शब्द भण्डार (Vocabulary) में वृद्धि करना।

इससे बच्चों की भाषा को समझने तथा अपने विचार व्यक्त करने की क्षमता विकसित होती है।

2. पढ़ने तथा पुस्तक पकड़ने की सही विधि सीखना

बच्चों को पुस्तकों से परिचित कराना तथा पुस्तक को सही ढंग से पकड़ने और देखने का अभ्यास कराना।

यह प्रारम्भिक पठन सम्बन्धी तैयारी का महत्त्वपूर्ण भाग है।

3. अक्षरों के आकार की पहचान करना

बच्चों को विभिन्न अक्षरों के आकार से परिचित कराना तथा उनकी पहचान करने की क्षमता विकसित करना।

इससे बच्चों को प्रारम्भिक भाषा-अधिगम में सहायता मिलती है।

4. श्रवण कौशल में सुधार

बच्चों को ध्वनियाँ, शब्द तथा निर्देश ध्यान से सुनने का अभ्यास कराना।

इसका उद्देश्य उनकी सुनने तथा समझने की क्षमता में सुधार करना है।

5. ध्वनि पर ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता विकसित करना

बच्चों में किसी विशेष ध्वनि को ध्यान से सुनने तथा उस पर ध्यान केन्द्रित करने की योग्यता विकसित करना।

इससे वे विभिन्न ध्वनियों की पहचान करने में अधिक सक्षम हो सकते हैं।

6. ध्वनि एवं दृश्य में समन्वय स्थापित करना

बच्चों को सुनी गई ध्वनि तथा देखी गई वस्तु या चित्र के बीच उचित सम्बन्ध समझने का अभ्यास कराना।

इससे बच्चों की श्रवण तथा दृश्य सम्बन्धी प्रारम्भिक क्षमताएँ विकसित होती हैं।

इस प्रकार अकादमिक तैयारी का उद्देश्य बच्चों को भाषा, अक्षर पहचान, पठन सम्बन्धी प्रारम्भिक कौशल तथा श्रवण-दृश्य समन्वय के लिए तैयार करना है।

7. संज्ञानात्मक कौशलों का विकास

संज्ञानात्मक कौशल (Cognitive Skills) वे मानसिक क्षमताएँ हैं जिनकी सहायता से बालक किसी बात को समझता है, पहचानता है, उस पर ध्यान देता है तथा सीखता है।

स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम में बच्चों के संज्ञानात्मक कौशलों के विकास को महत्त्व दिया गया है।

पुस्तक के अनुसार इस क्षेत्र का उद्देश्य बच्चों के मानसिक स्तर तथा समझने की क्षमता का विकास करना है।

इससे बच्चे नई परिस्थितियों, वस्तुओं तथा विभिन्न गतिविधियों को समझने के लिए अधिक तैयार हो सकते हैं।

इस प्रकार संज्ञानात्मक विकास बच्चों की मानसिक तैयारी एवं प्रारम्भिक अधिगम क्षमता से सम्बन्धित है।

8. सृजनात्मकता का विकास

सृजनात्मकता (Creativity) का अर्थ है अपनी कल्पना और क्षमताओं का प्रयोग करके नए विचार, वस्तुएँ अथवा कलात्मक अभिव्यक्तियाँ प्रस्तुत करना।

स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम में बच्चों की सृजनात्मक क्षमताओं को विकसित करने के लिए विभिन्न मनोरंजक गतिविधियों को महत्त्व दिया गया है।

पुस्तक में निम्नलिखित गतिविधियों के उदाहरण दिए गए हैं—

  1. नाचना।
  2. कविता सुनाना।
  3. मिट्टी से फल, फूल तथा सब्जियों की आकृतियाँ बनाना।
  4. कागज मोड़कर विभिन्न आकृतियाँ तैयार करना।

इन गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को अपनी कल्पना, रुचि तथा रचनात्मक क्षमताओं के उपयोग के अवसर प्राप्त होते हैं।

इससे बच्चों में सृजनात्मकता, सक्रिय सहभागिता तथा नए वातावरण में आनंदपूर्वक सीखने की भावना विकसित होती है।

9. स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम के चार क्षेत्रों का सारांश

क्षेत्र प्रमुख उद्देश्य
वैयक्तिक एवं सामाजिक तैयारी अपने कार्य करना, संयम, धैर्य, शिष्टता, आदर तथा सहयोग की भावना विकसित करना।
अकादमिक तैयारी शब्द भण्डार, प्रारम्भिक पठन, अक्षर पहचान, श्रवण तथा ध्वनि-दृश्य समन्वय विकसित करना।
संज्ञानात्मक कौशल बच्चों की मानसिक क्षमताओं तथा समझने की योग्यता का विकास करना।
सृजनात्मकता कविता, नृत्य, मिट्टी तथा कागज से सम्बन्धित गतिविधियों द्वारा रचनात्मक क्षमताओं का विकास करना।

10. स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम का महत्त्व

स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम छोटे बच्चों को औपचारिक विद्यालयी शिक्षा के लिए तैयार करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है।

इसके माध्यम से बच्चों में आवश्यक व्यक्तिगत आदतें, सामाजिक व्यवहार, प्रारम्भिक अधिगम क्षमताएँ तथा विद्यालय के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास किया जाता है।

पुस्तक में इस कार्यक्रम के 5 प्रमुख महत्त्व बताए गए हैं।

1. बच्चों को अपने कार्य स्वयं करने योग्य बनाना

स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम बच्चों को अपने छोटे-छोटे व्यक्तिगत कार्य करने के लिए तैयार करता है।

इससे बच्चों में आत्मनिर्भरता तथा अपने कार्यों के प्रति तत्परता विकसित करने में सहायता मिलती है।

विद्यालय में प्रवेश लेने के बाद यह क्षमता बच्चों को दैनिक गतिविधियों में अधिक सहज बनाती है।

2. स्वयं के प्रति जागरूकता विकसित करना

इस कार्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य बच्चों में स्वयं के प्रति जागरूकता विकसित करना है।

बच्चे अपने व्यवहार, कार्यों तथा आवश्यकताओं के प्रति अधिक सजग होना सीखते हैं।

इससे उनके व्यक्तिगत विकास तथा विद्यालयी समायोजन में सहायता मिलती है।

3. स्वच्छता एवं अच्छी आदतों का विकास

स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम बच्चों में स्वच्छता तथा अच्छी आदतों के विकास में सहायक है।

विद्यालय में उचित व्यवहार, साफ-सफाई तथा अच्छी दैनिक आदतों का महत्त्व समझने से बच्चे विद्यालयी वातावरण के अनुरूप तैयार होते हैं।

इस प्रकार यह कार्यक्रम बच्चों के व्यक्तिगत व्यवहार तथा स्वच्छता सम्बन्धी विकास में सहायक होता है।

4. विद्यालयी वातावरण का सहज अनुभव प्रदान करना

छोटे बच्चों के लिए पहली बार विद्यालय में प्रवेश करना एक नया अनुभव होता है।

स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम बच्चों को विद्यालय की गतिविधियों तथा वातावरण से परिचित कराता है।

इससे वे विद्यालय को अधिक सहजता से स्वीकार करते हैं तथा नए परिवेश में समायोजन कर सकते हैं।

इस प्रकार यह कार्यक्रम अनौपचारिक परिवेश से औपचारिक विद्यालयी वातावरण में प्रवेश को आसान बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

5. सामाजिक भावना का विकास

विद्यालय में बच्चों को अन्य विद्यार्थियों तथा शिक्षकों के साथ मिलकर विभिन्न गतिविधियों में भाग लेना होता है।

स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम बच्चों में सहयोग, शिष्ट व्यवहार तथा सामाजिक भावना के विकास में सहायता करता है।

इससे वे दूसरे बच्चों के साथ अच्छे सम्बन्ध स्थापित करना तथा सामूहिक गतिविधियों में भाग लेना सीखते हैं।

समग्र निष्कर्ष

विद्यालय शिक्षा की तैयारी कार्यक्रम (School Readiness Programme) मुख्य रूप से 3 से 6 वर्ष के बच्चों को औपचारिक विद्यालयी शिक्षा के लिए तैयार करने वाला कार्यक्रम है।

इसका उद्देश्य बच्चों को नए विद्यालयी वातावरण के साथ समायोजन करने में सहायता प्रदान करना तथा उनमें विद्यालय के प्रति रुचि एवं सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना है।

पुस्तक के अनुसार इस कार्यक्रम के 9 प्रमुख उद्देश्य हैं, जिनमें विद्यालयी गतिविधियों में सहभागिता, औपचारिक वातावरण के लिए तैयारी, श्रवण कौशल, ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता तथा ध्वनि-दृश्य समन्वय का विकास सम्मिलित है।

इसके अन्तर्गत वैयक्तिक एवं सामाजिक तैयारी, अकादमिक तैयारी, संज्ञानात्मक कौशलों का विकास तथा सृजनात्मकता के चार प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाता है।

इस प्रकार स्कूल रेडीनेस कार्यक्रम बच्चों में आत्मनिर्भरता, अच्छी आदतें, सामाजिक व्यवहार, प्रारम्भिक अधिगम क्षमताएँ तथा विद्यालयी समायोजन विकसित करने का महत्त्वपूर्ण माध्यम है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • School Readiness Programme को हिन्दी में विद्यालय शिक्षा की तैयारी कार्यक्रम अथवा विद्यालयोन्मुख कार्यक्रम कहा जाता है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को औपचारिक विद्यालयी वातावरण के लिए तैयार करना है।
  • यह कार्यक्रम मुख्य रूप से 3 से 6 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए है।
  • पुस्तक के अनुसार यह कार्यक्रम NCERT द्वारा तैयार किया गया है।
  • यह बच्चों को परिवार, आँगनबाड़ी अथवा बालवाड़ी जैसे अनौपचारिक परिवेश से औपचारिक विद्यालयी परिवेश में समायोजन करने में सहायता करता है।
  • पुस्तक में स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम के 9 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
  • इसके प्रमुख उद्देश्य हैं—कक्षागत सहभागिता, औपचारिक वातावरण के लिए तैयारी, विद्यालय के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, रुचि तथा जागरूकता का विकास।
  • बच्चों को विद्यालयी गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना तथा विद्यालयी वातावरण से समायोजन स्थापित करना भी इसके उद्देश्य हैं।
  • श्रवण कौशल, ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता तथा ध्वनि-दृश्य समन्वय का विकास भी इस कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य हैं।
  • स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम के 4 प्रमुख क्षेत्र हैं—वैयक्तिक एवं सामाजिक तैयारी, अकादमिक तैयारी, संज्ञानात्मक कौशल तथा सृजनात्मकता।
  • वैयक्तिक एवं सामाजिक तैयारी— अपने कार्यों के लिए तत्परता, संयम, धैर्य, शिष्टता, आदर, सामाजिक सहयोग तथा उचित व्यवहार का विकास।
  • अकादमिक तैयारी— शब्द भण्डार, पुस्तक पकड़ने की सही विधि, अक्षरों के आकार की पहचान, श्रवण कौशल तथा ध्वनि-दृश्य समन्वय का विकास।
  • संज्ञानात्मक तैयारी— बच्चों की मानसिक क्षमताओं तथा समझने की योग्यता का विकास।
  • सृजनात्मकता— नृत्य, कविता, मिट्टी से आकृतियाँ बनाना तथा कागज मोड़ने जैसी गतिविधियों द्वारा रचनात्मक क्षमताओं का विकास।
  • पुस्तक में इस कार्यक्रम के 5 प्रमुख महत्त्व बताए गए हैं।
  • ये हैं—अपने कार्य स्वयं करने की क्षमता, स्वयं के प्रति जागरूकता, स्वच्छता एवं अच्छी आदतों का विकास, विद्यालयी वातावरण में सहज अनुभव तथा सामाजिक भावना का विकास।
  • स्कूल रेडीनेस का मुख्य महत्त्व बच्चों को विद्यालय के प्रति सहज, उत्साहित तथा सीखने के लिए तैयार बनाना है।
Topic 6 सम्पूर्ण साक्षरता अभियान—परिचय, विशेषताएँ, लक्ष्य, लाभ एवं संचालन में उत्तरदायी अभिकरण

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान—परिचय, विशेषताएँ, लक्ष्य, लाभ एवं संचालन में उत्तरदायी अभिकरण

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का परिचय

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान (Total Literacy Campaign—TLC) भारत में निरक्षरता को दूर करने तथा अधिक से अधिक व्यक्तियों को साक्षर बनाने के उद्देश्य से चलाया गया एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक अभियान था।

स्वतन्त्रता के बाद भारत में शिक्षा का विस्तार हुआ, लेकिन बड़ी संख्या में वयस्क व्यक्ति पढ़ने, लिखने तथा सामान्य गणना करने की क्षमता से वंचित थे।

निरक्षरता के कारण व्यक्तियों को दैनिक जीवन के कार्यों, सामाजिक अधिकारों तथा विभिन्न शैक्षिक अवसरों का लाभ प्राप्त करने में कठिनाई होती थी।

इसी समस्या को दूर करने के लिए भारत सरकार ने 5 मई 1988 को राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना की।

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के अन्तर्गत जन-सहभागिता के माध्यम से निरक्षर व्यक्तियों को साक्षर बनाने के लिए सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की पद्धति अपनाई गई।

इस अभियान में केवल सरकार के प्रयासों पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय समुदाय, स्वैच्छिक संगठनों, शिक्षकों तथा अन्य व्यक्तियों की सक्रिय भागीदारी को महत्त्व दिया गया।

इस प्रकार सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का मुख्य उद्देश्य जन-सहयोग तथा समयबद्ध प्रयासों से निरक्षरता को दूर करना और समाज में साक्षरता का प्रसार करना था।

1. सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का अर्थ

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का अर्थ है किसी निर्धारित क्षेत्र में जन-सहभागिता एवं संगठित प्रयासों के माध्यम से निरक्षर व्यक्तियों को पढ़ने, लिखने तथा सामान्य गणना करने योग्य बनाने का अभियान।

यह एक लक्ष्योन्मुखी एवं समयबद्ध कार्यक्रम था, जिसमें स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर साक्षरता का लक्ष्य निर्धारित करके उसे पूरा करने का प्रयास किया जाता था।

कार्यात्मक साक्षरता का अर्थ

कार्यात्मक साक्षरता (Functional Literacy) का अर्थ है ऐसी साक्षरता जिसका उपयोग व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में कर सके।

इसमें केवल अक्षरों की पहचान करना ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि पढ़ने, लिखने तथा सामान्य गणना करने की क्षमता विकसित करना भी आवश्यक होता है।

उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति साधारण सूचना पढ़ सके, अपना नाम लिख सके तथा दैनिक जीवन में आवश्यक सामान्य गणना कर सके।

इस प्रकार कार्यात्मक साक्षरता व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त करने तथा दैनिक जीवन में उसका उपयोग करने के योग्य बनाने से सम्बन्धित है।

2. राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना एवं प्रमुख लक्ष्य

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन (National Literacy Mission—NLM) की स्थापना भारत सरकार द्वारा 5 मई 1988 को की गई थी।

पुस्तक के अनुसार इसे एक सामाजिक तथा प्रौद्योगिकी अभियान के रूप में प्रारम्भ किया गया था।

इसका प्रमुख उद्देश्य निरक्षर वयस्कों को कार्यात्मक साक्षरता प्रदान करना तथा देश में साक्षरता का स्तर बढ़ाना था।

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के प्रमुख ऐतिहासिक लक्ष्य
  1. 15–35 वर्ष का आयु वर्ग— मुख्य रूप से इस आयु वर्ग के निरक्षर वयस्कों को कार्यात्मक साक्षरता प्रदान करना।
  2. 8 करोड़ व्यक्तियों की साक्षरता— वर्ष 1995 तक कुल 8 करोड़ निरक्षर व्यक्तियों को कार्यात्मक साक्षरता प्रदान करने का लक्ष्य।
  3. वर्ष 1990 का लक्ष्य— प्रारम्भिक 3 करोड़ निरक्षर व्यक्तियों को साक्षर बनाना।
  4. वर्ष 1995 का लक्ष्य— अतिरिक्त 5 करोड़ निरक्षर व्यक्तियों को साक्षर बनाना।
  5. वर्ष 2007 का लक्ष्य— देश में साक्षरता का न्यूनतम स्तर 75 प्रतिशत तक पहुँचाना।

पुस्तक में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के संचालन के लिए राज्य स्तर पर राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण के गठन का भी उल्लेख किया गया है।

महत्त्वपूर्ण: उपर्युक्त सभी आँकड़े राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के ऐतिहासिक लक्ष्य हैं। इन्हें उन वर्षों में प्राप्त वास्तविक उपलब्धियों के रूप में नहीं समझना चाहिए।

3. केरल के एर्नाकुलम में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना के बाद सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के क्षेत्रीय प्रयोग को विशेष महत्त्व मिला।

पुस्तक के अनुसार 26 जनवरी 1989 को केरल राज्य के एर्नाकुलम जनपद में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान प्रारम्भ किया गया।

इस अभियान का उद्देश्य जनपद में निरक्षर व्यक्तियों को साक्षर बनाना तथा स्थानीय समुदाय के सहयोग से साक्षरता का विस्तार करना था।

इसके लिए प्रशासन, स्थानीय लोगों तथा स्वैच्छिक संगठनों के सहयोग से व्यापक साक्षरता कार्यक्रम संचालित किया गया।

एर्नाकुलम अभियान में लोगों को साक्षरता के महत्त्व से परिचित कराया गया तथा निरक्षर व्यक्तियों को शिक्षण गतिविधियों से जोड़ने के प्रयास किए गए।

पुस्तक के अनुसार फरवरी 1990 तक एर्नाकुलम जनपद ने सम्पूर्ण साक्षरता की उपलब्धि प्राप्त की।

एर्नाकुलम की सफलता से प्रेरित होकर केरल में राज्यव्यापी साक्षरता अभियान प्रारम्भ किया गया।

पुस्तक में इस व्यापक अभियान के बाद केरल की साक्षरता लगभग 91 प्रतिशत तक पहुँचने का उल्लेख किया गया है।

एर्नाकुलम के अनुभव ने यह स्पष्ट किया कि निरक्षरता को दूर करने में जन-सहभागिता, स्थानीय नेतृत्व तथा संगठित प्रयास महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इसके बाद भारत सरकार ने सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की पद्धति को अपनाकर अन्य राज्यों तथा जिलों में भी साक्षरता कार्यक्रमों का विस्तार किया।

4. सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का कार्यक्षेत्र

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का प्रमुख ध्यान 15 से 35 वर्ष के निरक्षर वयस्कों की साक्षरता पर था।

लेकिन पुस्तक के अनुसार अभियान के प्रयास केवल इसी आयु वर्ग तक सीमित नहीं थे।

इसके अन्तर्गत विद्यालय न जाने वाले बच्चों तथा अन्य निरक्षर वयस्कों को भी शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया गया।

प्रमुख प्रयास
  • निरक्षर वयस्कों को साक्षरता कार्यक्रमों से जोड़ना।
  • विद्यालय न जाने वाले बच्चों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना।
  • आवश्यकतानुसार अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों का उपयोग करना।
  • बालक एवं बालिकाओं का निकटतम प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन बढ़ाना।
  • बच्चों को अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के लिए प्रेरित करना।
  • बच्चों द्वारा बीच में विद्यालय छोड़ने की समस्या को कम करने का प्रयास करना।

इस प्रकार अभियान में वयस्क साक्षरता के साथ बच्चों की विद्यालयी शिक्षा तथा शैक्षिक निरन्तरता को भी महत्त्व दिया गया।

5. सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की प्रमुख विशेषताएँ

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें साक्षरता को केवल सरकारी कार्यक्रम न मानकर समाज का सामूहिक उत्तरदायित्व समझा गया।

पुस्तक में इसकी 6 प्रमुख विशेषताएँ बताई गई हैं।

1. जन-अभिप्रेरणा एवं सामुदायिक सहयोग पर आधारित अभियान

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की सफलता मुख्य रूप से जनता की अभिप्रेरणा तथा सामुदायिक सहयोग पर निर्भर करती थी।

इसमें स्थानीय व्यक्तियों को निरक्षरता दूर करने के लिए प्रेरित किया जाता था।

जब समाज के लोग स्वयं साक्षरता अभियान में भाग लेते हैं, तो निरक्षर व्यक्तियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए अधिक सहयोग और प्रोत्साहन मिलता है।

इस प्रकार जन-सहभागिता सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का प्रमुख आधार थी।

2. क्षेत्र-विशेष एवं समयबद्ध अभियान

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान को निर्धारित क्षेत्रों में निश्चित समयावधि के अन्तर्गत संचालित किया जाता था।

इसके लिए विभिन्न संस्थाओं तथा व्यक्तियों के बीच आपसी सहयोग स्थापित किया जाता था।

इसका उद्देश्य निर्धारित क्षेत्र में साक्षरता सम्बन्धी लक्ष्य को व्यवस्थित ढंग से पूरा करना था।

इस प्रकार अभियान की विशेषता क्षेत्रीय आवश्यकता, समयबद्ध योजना तथा सामूहिक प्रयास थी।

3. लक्ष्योन्मुखी अभियान

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान एक लक्ष्योन्मुखी कार्यक्रम था।

इसका उद्देश्य केवल शिक्षार्थियों का नामांकन बढ़ाना नहीं था, बल्कि उन्हें वास्तविक रूप से साक्षर बनाना था।

अर्थात अभियान में यह देखना आवश्यक था कि शिक्षार्थियों ने पढ़ने, लिखने तथा सामान्य गणना करने की क्षमता प्राप्त की है या नहीं।

इस प्रकार अभियान में केवल संख्या बढ़ाने के बजाय साक्षरता की वास्तविक उपलब्धि को महत्त्व दिया गया।

4. जिला स्तर पर पंजीकृत समितियों द्वारा संचालन

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान को संचालित करने के लिए जिला स्तर पर पंजीकृत समितियों को महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व प्रदान किया गया।

इन समितियों के माध्यम से अभियान का नियोजन, संचालन तथा विभिन्न गतिविधियों में सहयोग की व्यवस्था की जाती थी।

इससे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार साक्षरता कार्यक्रम संचालित करना सम्भव हो सकता था।

5. स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार लक्ष्य निर्धारण

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान में प्रत्येक क्षेत्र की वास्तविक शैक्षिक स्थिति को ध्यान में रखने पर बल दिया गया।

पुस्तक के अनुसार बाहरी स्तर से निर्धारित लक्ष्यों के स्थान पर स्थानीय सर्वेक्षण के आधार पर साक्षरता सम्बन्धी आवश्यकताओं तथा लक्ष्यों को समझा जाता था।

इसका उद्देश्य स्थानीय क्षेत्र में निरक्षर व्यक्तियों की स्थिति का अध्ययन करके उपयुक्त कार्यक्रम तैयार करना था।

इस प्रकार अभियान में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजना को महत्त्व दिया गया।

6. त्रुटि निवारण एवं जन-सहभागिता

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान में कार्यक्रम के संचालन के दौरान उत्पन्न होने वाली कमियों तथा समस्याओं को दूर करने पर भी ध्यान दिया जाता था।

इसके साथ जन-सहभागिता को बढ़ावा दिया जाता था, जिससे स्थानीय व्यक्तियों तथा संस्थाओं का सहयोग प्राप्त हो सके।

इस प्रकार कार्यक्रम में सुधार तथा समुदाय की सक्रिय भागीदारी इस अभियान की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ थीं।

6. सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के लक्ष्य

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का प्रमुख उद्देश्य देश में निरक्षरता को कम करना तथा लोगों को शिक्षा के माध्यम से अधिक सक्षम बनाना था।

पुस्तक में इसके 3 प्रमुख लक्ष्य बताए गए हैं।

1. देश से निरक्षरता को शीघ्र दूर करना

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का सबसे प्रमुख लक्ष्य देश से निरक्षरता को शीघ्रता से दूर करना था।

इसके लिए निरक्षर व्यक्तियों को पढ़ने, लिखने तथा सामान्य गणना करने की शिक्षा प्रदान करने पर बल दिया गया।

जन-सहयोग के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को साक्षरता कार्यक्रमों से जोड़ना इस लक्ष्य की प्राप्ति का प्रमुख साधन था।

2. राज्य स्तरीय शिक्षा को सुदृढ़ बनाना

इस अभियान का दूसरा लक्ष्य राज्य स्तर पर शिक्षा की व्यवस्था को मजबूत बनाना था।

इसके लिए स्थानीय संस्थाओं, जिला स्तरीय समितियों तथा विभिन्न संगठनों के सहयोग से साक्षरता कार्यक्रम संचालित किए गए।

इस प्रकार अभियान के माध्यम से शिक्षा के प्रसार में राज्य तथा स्थानीय स्तर की भागीदारी बढ़ाने पर बल दिया गया।

3. शिक्षा के नए आयामों को प्राप्त करना

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का तीसरा लक्ष्य शिक्षा के नए अवसरों तथा आयामों का विकास करना था।

इसके अन्तर्गत निरक्षर व्यक्तियों को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर देना तथा उनके ज्ञान और क्षमताओं के विकास को महत्त्व दिया गया।

इस प्रकार अभियान का उद्देश्य साक्षरता के माध्यम से व्यक्तियों के जीवन में उपयोगी शैक्षिक परिवर्तन लाना था।

7. सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के लाभ एवं प्रभाव

साक्षरता व्यक्ति को केवल पढ़ने और लिखने की क्षमता ही नहीं देती, बल्कि उसके व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन को भी प्रभावित कर सकती है।

पुस्तक में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के 5 प्रमुख लाभ एवं प्रभाव बताए गए हैं।

1. मानव संसाधन विकास में सहायता

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान मानव संसाधन विकास के विभिन्न पक्षों को प्रभावित करता है।

मानव संसाधन विकास का अर्थ है व्यक्तियों के ज्ञान, योग्यताओं तथा क्षमताओं का विकास करना।

पुस्तक में इसके निम्नलिखित तीन प्रमुख प्रभाव बताए गए हैं।

  1. बच्चों के नामांकन में सहयोग— साक्षर अभिभावक शिक्षा का महत्त्व समझकर अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए अधिक प्रेरित होते हैं।
  2. शिक्षा में निरन्तरता— शिक्षित माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने तथा उन्हें विद्यालय छोड़ने से रोकने के लिए प्रयास करते हैं।
  3. महिला जागरूकता में वृद्धि— साक्षर महिलाएँ अपने सामाजिक एवं कानूनी अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हो सकती हैं।

इस प्रकार साक्षरता का लाभ केवल शिक्षार्थी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके परिवार तथा बच्चों की शिक्षा पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

2. गरीबी उन्मूलन में सहायता

पुस्तक के अनुसार साक्षरता का विस्तार गरीबी उन्मूलन में सहायक हो सकता है।

शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों का ज्ञान तथा कार्य सम्बन्धी क्षमताएँ विकसित होती हैं।

इससे वे अपने जीवन की आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझने तथा उपलब्ध अवसरों का उपयोग करने में सक्षम हो सकते हैं।

इस प्रकार साक्षरता आर्थिक एवं सामाजिक विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण आधार बन सकती है।

3. प्रजातान्त्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव देश की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने से सम्बन्धित है।

साक्षर व्यक्ति सामाजिक परिस्थितियों, अधिकारों तथा विभिन्न सार्वजनिक विषयों को अधिक अच्छी तरह समझ सकता है।

इससे समाज तथा लोकतान्त्रिक गतिविधियों में उसकी जागरूक भागीदारी की सम्भावना बढ़ती है।

इस प्रकार साक्षरता लोकतान्त्रिक व्यवस्था के विकास में सहायक हो सकती है।

4. साक्षर समाज का निर्माण

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के माध्यम से ऐसे समाज का निर्माण करने का प्रयास किया गया जिसमें प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा का महत्त्व समझे।

जब समाज में साक्षरता के प्रति जागरूकता बढ़ती है, तो निरक्षर व्यक्ति भी साक्षर बनने के लिए प्रेरित हो सकते हैं।

इस प्रकार यह अभियान साक्षरता के प्रति सकारात्मक सामाजिक वातावरण विकसित करने में सहायक है।

5. व्यक्तिगत क्षमताओं एवं दक्षताओं का विकास

साक्षरता व्यक्तियों की विभिन्न योग्यताओं तथा दक्षताओं के विकास का महत्त्वपूर्ण साधन है।

इसके माध्यम से व्यक्ति नई जानकारी प्राप्त करने तथा अपनी क्षमताओं को विकसित करने के अवसर प्राप्त कर सकता है।

पुस्तक के अनुसार साक्षरता व्यक्ति की क्षमताओं एवं दक्षताओं के विकास का मूल आधार बन सकती है।

इस प्रकार सम्पूर्ण साक्षरता अभियान व्यक्तिगत विकास तथा सामाजिक प्रगति में सहायक है।

8. सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के संचालन में उत्तरदायी अभिकरण

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की सफलता के लिए विभिन्न संस्थाओं तथा संगठनों का सहयोग आवश्यक था।

इसलिए इसके संचालन में सरकारी समितियों, स्वैच्छिक संगठनों तथा अन्य शैक्षिक संस्थाओं को महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रदान की गई।

पुस्तक में निम्नलिखित 3 प्रमुख उत्तरदायी अभिकरणों का उल्लेख किया गया है।

1. जिला साक्षरता समितियाँ

जिला साक्षरता समितियाँ सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के संचालन में प्रमुख भूमिका निभाती थीं।

इन समितियों के माध्यम से जिला स्तर पर साक्षरता कार्यक्रमों के नियोजन तथा संचालन की व्यवस्था की जाती थी।

पुस्तक के अनुसार जिला साक्षरता समिति की—

  • साधारण सभा के अध्यक्ष— प्रभारी मण्डलीय मन्त्री होते थे।
  • कार्यकारिणी के सभापति— जिलाधिकारी होते थे।

इस प्रकार जिला साक्षरता समितियाँ स्थानीय स्तर पर साक्षरता अभियान के प्रशासनिक संचालन तथा विभिन्न गतिविधियों में समन्वय का कार्य करती थीं।

2. स्वैच्छिक संगठन

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान में स्वैच्छिक संगठनों (Voluntary Organisations) का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था।

ये संगठन स्थानीय स्तर पर लोगों को साक्षरता के प्रति जागरूक करने तथा अभियान की गतिविधियों में सहयोग प्रदान करने का कार्य करते थे।

पुस्तक के अनुसार ये संगठन जिला साक्षरता समिति के प्रति उत्तरदायी होते थे।

इन संगठनों को साक्षरता सम्बन्धी कार्यों के लिए भारत सरकार द्वारा वित्तीय अनुदान दिए जाने का भी उल्लेख है।

इस प्रकार स्वैच्छिक संगठनों की प्रमुख भूमिका जन-जागरूकता, सामुदायिक सहयोग तथा साक्षरता कार्यक्रमों के संचालन में सहायता प्रदान करना थी।

3. अन्य अभिकरण

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के संचालन में विभिन्न शैक्षिक तथा सामाजिक संस्थाओं ने भी योगदान दिया।

पुस्तक में निम्नलिखित संस्थाओं का विशेष उल्लेख किया गया है—

  1. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC)।
  2. श्रमिक विद्यापीठ।
  3. नेहरू युवा केन्द्र संगठन (NYKS)।

इन संस्थाओं के सहयोग से साक्षरता अभियान में विभिन्न वर्गों की सहभागिता तथा शैक्षिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया।

इस प्रकार सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का संचालन जिला साक्षरता समितियों, स्वैच्छिक संगठनों तथा अन्य शैक्षिक-सामाजिक संस्थाओं के संयुक्त सहयोग पर आधारित था।

9. सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का शैक्षिक महत्त्व

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान भारत में वयस्क शिक्षा तथा निरक्षरता उन्मूलन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास था।

इस अभियान की विशेषता यह थी कि इसमें साक्षरता को केवल सरकारी उत्तरदायित्व न मानकर सामाजिक सहभागिता पर आधारित अभियान के रूप में संचालित किया गया।

इसमें निरक्षर वयस्कों को कार्यात्मक साक्षरता प्रदान करने के साथ विद्यालय न जाने वाले बच्चों को शिक्षा से जोड़ने पर भी बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त महिला जागरूकता, बच्चों की शिक्षा में निरन्तरता, व्यक्तिगत क्षमताओं के विकास तथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने जैसे लाभों को भी महत्त्वपूर्ण माना गया।

एर्नाकुलम में प्रारम्भ किए गए अभियान ने जन-सहयोग तथा स्थानीय स्तर पर संगठित प्रयासों की उपयोगिता को स्पष्ट किया।

इस प्रकार सम्पूर्ण साक्षरता अभियान ने जन-सहभागिता, कार्यात्मक साक्षरता तथा स्थानीय स्तर पर शैक्षिक विकास को बढ़ावा देने की दिशा प्रदान की।

10. महत्त्वपूर्ण तिथियाँ एवं तथ्य

तिथि / वर्ष सम्बन्धित घटना या लक्ष्य
5 मई 1988 राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना।
26 जनवरी 1989 केरल के एर्नाकुलम जनपद में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की शुरुआत।
1990 3 करोड़ निरक्षर व्यक्तियों को साक्षर बनाने का प्रारम्भिक लक्ष्य।
फरवरी 1990 एर्नाकुलम में सम्पूर्ण साक्षरता की उपलब्धि की घोषणा।
1995 अतिरिक्त 5 करोड़ व्यक्तियों सहित कुल 8 करोड़ को साक्षर बनाने का लक्ष्य।
2007 राष्ट्रीय साक्षरता दर 75 प्रतिशत तक पहुँचाने का लक्ष्य।

परीक्षा के लिए विशेष ध्यान दें— राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना तथा एर्नाकुलम में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का प्रारम्भ दो अलग-अलग घटनाएँ हैं।

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना 5 मई 1988 को हुई, जबकि एर्नाकुलम में अभियान की शुरुआत 26 जनवरी 1989 को हुई।

समग्र निष्कर्ष

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान भारत में निरक्षरता उन्मूलन तथा वयस्क शिक्षा के प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम था।

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना 5 मई 1988 को हुई तथा 26 जनवरी 1989 को केरल के एर्नाकुलम जनपद में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान प्रारम्भ किया गया।

इस अभियान का मुख्य उद्देश्य कार्यात्मक साक्षरता का प्रसार करना तथा जन-सहभागिता से निरक्षरता को शीघ्र दूर करना था।

पुस्तक के अनुसार इसकी 6 विशेषताएँ, 3 प्रमुख लक्ष्य, 5 लाभ तथा 3 उत्तरदायी अभिकरण बताए गए हैं।

इस अभियान में समयबद्ध योजना, स्थानीय सर्वेक्षण, सामुदायिक सहयोग तथा वास्तविक साक्षरता उपलब्धि को विशेष महत्त्व दिया गया।

इसके संचालन में जिला साक्षरता समितियों, स्वैच्छिक संगठनों तथा अन्य शैक्षिक एवं सामाजिक संस्थाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस प्रकार सम्पूर्ण साक्षरता अभियान का मूल आधार जन-सहभागिता तथा संगठित प्रयासों द्वारा साक्षरता का विस्तार करना और व्यक्तियों को सामाजिक एवं व्यक्तिगत विकास के अवसर प्रदान करना था।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सम्पूर्ण साक्षरता अभियान (TLC) का पूरा नाम Total Literacy Campaign है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य निरक्षरता दूर करना तथा कार्यात्मक साक्षरता का प्रसार करना था।
  • राष्ट्रीय साक्षरता मिशन (NLM) की स्थापना 5 मई 1988 को हुई।
  • राष्ट्रीय साक्षरता मिशन का प्रमुख लक्षित आयु वर्ग 15–35 वर्ष था।
  • मिशन के अन्तर्गत वर्ष 1995 तक कुल 8 करोड़ निरक्षर व्यक्तियों को साक्षर बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
  • इसमें वर्ष 1990 तक 3 करोड़ तथा वर्ष 1995 तक अतिरिक्त 5 करोड़ व्यक्तियों को साक्षर बनाने का लक्ष्य शामिल था।
  • राष्ट्रीय साक्षरता मिशन का एक लक्ष्य वर्ष 2007 तक 75 प्रतिशत साक्षरता दर प्राप्त करना था।
  • केरल के एर्नाकुलम जनपद में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की शुरुआत 26 जनवरी 1989 को हुई।
  • पुस्तक के अनुसार फरवरी 1990 में एर्नाकुलम ने सम्पूर्ण साक्षरता की उपलब्धि प्राप्त की।
  • एर्नाकुलम अभियान की सफलता से प्रेरित होकर केरल में राज्यव्यापी साक्षरता अभियान प्रारम्भ किया गया।
  • पुस्तक में इस व्यापक अभियान के बाद केरल की साक्षरता लगभग 91 प्रतिशत तक पहुँचने का उल्लेख है।
  • पुस्तक में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की 6 प्रमुख विशेषताएँ बताई गई हैं।
  • इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं—जन-अभिप्रेरणा एवं सामुदायिक सहयोग, समयबद्ध कार्यक्रम तथा लक्ष्योन्मुखी अभियान।
  • इसके अतिरिक्त जिला स्तरीय पंजीकृत समितियों द्वारा संचालन, स्थानीय सर्वेक्षण के आधार पर लक्ष्य निर्धारण तथा त्रुटि निवारण को महत्त्व दिया गया।
  • सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के 3 प्रमुख लक्ष्य हैं—निरक्षरता को शीघ्र दूर करना, राज्य स्तरीय शिक्षा को सुदृढ़ बनाना तथा शिक्षा के नए आयाम विकसित करना।
  • पुस्तक में इस अभियान के 5 प्रमुख लाभ बताए गए हैं।
  • मानव संसाधन विकास— साक्षर अभिभावक बच्चों की शिक्षा में सहयोग करते हैं तथा साक्षर महिलाएँ अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक होती हैं।
  • अन्य लाभ हैं—गरीबी उन्मूलन में सहायता, लोकतान्त्रिक व्यवस्था की मजबूती, साक्षर समाज का निर्माण तथा व्यक्तिगत क्षमताओं का विकास।
  • सम्पूर्ण साक्षरता अभियान के संचालन में 3 प्रमुख अभिकरण थे—जिला साक्षरता समितियाँ, स्वैच्छिक संगठन तथा अन्य अभिकरण।
  • पुस्तक के अनुसार जिला साक्षरता समिति की साधारण सभा के अध्यक्ष प्रभारी मण्डलीय मन्त्री तथा कार्यकारिणी के सभापति जिलाधिकारी होते थे।
  • अन्य महत्त्वपूर्ण अभिकरणों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, श्रमिक विद्यापीठ तथा नेहरू युवा केन्द्र संगठन शामिल थे।
  • इस अभियान में वयस्क साक्षरता के साथ विद्यालय न जाने वाले बच्चों को शिक्षा से जोड़ने तथा उनकी पढ़ाई में निरन्तरता बनाए रखने पर भी ध्यान दिया गया।
  • सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य— राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना 5 मई 1988 को तथा एर्नाकुलम में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की शुरुआत 26 जनवरी 1989 को हुई।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना की शुरुआत किस वर्ष हुई?

व्याख्या: ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना की शुरुआत 1987–88 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के अन्तर्गत हुई। इसका उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों में न्यूनतम आवश्यक शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना था।
Q 2

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना का प्रमुख उद्देश्य है—

व्याख्या: ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का मुख्य उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों में कम से कम दो कमरे, दो शिक्षक तथा श्यामपट्ट, पाठ्यपुस्तकें और अन्य आवश्यक शिक्षण-अधिगम सामग्री उपलब्ध कराना था।
Q 3

पुस्तक के अनुसार सेवारत अध्यापकों का विस्तृत अभिविन्यास कार्यक्रम (P-MOST) किस वर्ष प्रारम्भ हुआ?

व्याख्या: पुस्तक के अनुसार P-MOST कार्यक्रम 1986 में प्रारम्भ हुआ। इसका उद्देश्य प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की प्रमुख सिफारिशों से परिचित कराना तथा उनकी व्यावसायिक दक्षता बढ़ाना था।
Q 4

पी-मोस्ट (P-MOST) कार्यक्रम किस संस्था द्वारा प्रारम्भ किया गया?

व्याख्या: P-MOST का पूरा नाम Programme for Mass Orientation of School Teachers है। यह NCERT द्वारा सेवारत शिक्षकों के अभिविन्यास तथा शिक्षण-कौशल में सुधार के लिए संचालित किया गया।
Q 5

प्राथमिक शिक्षकों के विशेष अनुस्थापन कार्यक्रम (SOPT) की शुरुआत कब हुई?

व्याख्या: SOPT का पूरा नाम Special Orientation Programme for Primary Teachers है। इसकी शुरुआत 1993–94 में प्राथमिक शिक्षकों को नवीन शिक्षण-विधियों तथा प्रभावशाली शिक्षण का प्रशिक्षण देने के लिए की गई।
Q 6

SOPT कार्यक्रम किस स्तर के अध्यापकों हेतु संचालित किया गया था?

व्याख्या: SOPT विशेष रूप से प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के लिए संचालित किया गया था। इसमें बाल-केंद्रित शिक्षण, न्यूनतम अधिगम स्तर, मूल्यांकन तथा शिक्षण सामग्री के प्रभावशाली उपयोग पर बल दिया गया।
Q 7

उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा परियोजना (BEP) कब प्रारम्भ की गई?

व्याख्या: उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परियोजना 1993 में प्रारम्भ हुई तथा 5 अक्टूबर 1993 से प्रभावी हुई। इसका उद्देश्य प्रारम्भिक शिक्षा की पहुँच बढ़ाना, गुणवत्ता सुधारना तथा वंचित वर्गों और बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करना था।
Q 8

बेसिक शिक्षा परियोजना के कितने प्रमुख अंग हैं?

व्याख्या: बेसिक शिक्षा परियोजना के तीन प्रमुख अंग हैं—संस्थागत क्षमता में वृद्धि, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार एवं पूर्णता तथा बेसिक शिक्षा तक पहुँच में सुधार।
Q 9

बेसिक शिक्षा परियोजना मुख्य रूप से किस आयु वर्ग के बच्चों की शिक्षा से सम्बन्धित थी?

व्याख्या: बेसिक शिक्षा परियोजना का प्रमुख उद्देश्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना तथा शिक्षा के सार्वभौमीकरण को बढ़ावा देना था।
Q 10

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP) की शुरुआत राष्ट्रीय स्तर पर किस वर्ष हुई?

व्याख्या: जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP) की शुरुआत 1994 में हुई। प्रथम चरण में इसे 7 राज्यों के 42 जिलों में लागू किया गया। इसका उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण तथा शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार करना था।
Q 11

वर्ष 1997 में DPEP के द्वितीय चरण के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश के कितने जनपदों का चयन किया गया?

व्याख्या: उत्तर प्रदेश में DPEP-II वर्ष 1997 में प्रारम्भ हुआ। इसके अन्तर्गत महिला साक्षरता की अपेक्षाकृत निम्न स्थिति वाले 22 जनपदों का चयन किया गया।
Q 12

उत्तर प्रदेश में DPEP के तृतीय चरण की शुरुआत किस वर्ष हुई?

व्याख्या: उत्तर प्रदेश में DPEP-III की शुरुआत वर्ष 2000 में हुई। इसके अन्तर्गत राज्य के 32 जनपदों को सम्मिलित किया गया तथा प्राथमिक शिक्षा की पहुँच और गुणवत्ता सुधारने पर बल दिया गया।
Q 13

स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम मुख्य रूप से किस आयु वर्ग के बच्चों के लिए है?

व्याख्या: स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम मुख्य रूप से 3 से 6 वर्ष के बच्चों के लिए है। इसका उद्देश्य बच्चों को औपचारिक विद्यालयी वातावरण के लिए तैयार करना तथा उनकी वैयक्तिक, सामाजिक, अकादमिक एवं संज्ञानात्मक क्षमताओं का विकास करना है।
Q 14

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना कब हुई?

व्याख्या: राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना 5 मई 1988 को हुई। इसका मुख्य उद्देश्य 15 से 35 वर्ष के निरक्षर वयस्कों को कार्यात्मक साक्षरता प्रदान करना था।
Q 15

केरल के एर्नाकुलम जनपद में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की शुरुआत कब हुई?

व्याख्या: केरल के एर्नाकुलम जनपद में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान 26 जनवरी 1989 को प्रारम्भ हुआ। 4 फरवरी 1990 को एर्नाकुलम को पूर्ण साक्षर घोषित किया गया। पुस्तक की उत्तरमाला में 16 जनवरी 1989 दिया है, जो सही नहीं है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 2 के विषय प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास के अध्याय प्रारम्भिक शिक्षा के लिए कार्यक्रम–प्रथम से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की आवश्यकता एवं महत्त्व लिखिए।

Q 2

पी-मोस्ट कार्यक्रम के उद्देश्य बताइए।

Q 3

SOPT कार्यक्रम की प्रक्रिया पर प्रकाश डालिए।

Q 4

बेसिक शिक्षा परियोजना के कार्यों का क्रियान्वयन किस प्रकार किया जाता है? स्पष्ट कीजिए।

Q 5

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम के उद्देश्य लिखिए।

Q 6

सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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