सर्व शिक्षा अभियान (SSA)—परिचय, लक्ष्य एवं उद्देश्य, शैक्षिक सुविधाएँ, योजनाएँ, प्रमुख कार्य, मूल्यांकन एवं सुधार के सुझाव
सर्व शिक्षा अभियान का परिचय
सर्व शिक्षा अभियान (Sarva Shiksha Abhiyan—SSA) भारत सरकार का एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यक्रम था, जिसका मुख्य उद्देश्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क, अनिवार्य एवं गुणवत्तापूर्ण प्रारम्भिक शिक्षा उपलब्ध कराना था।
इस अभियान की शुरुआत वर्ष 2001–02 में राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में हुई। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार इसका क्रियान्वयन वर्ष 2000–01 से प्रारम्भ किया गया था।
स्वतन्त्रता के बाद भारत में प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के लिए अनेक प्रयास किए गए, लेकिन गरीबी, सामाजिक असमानता, विद्यालयों की कमी तथा अन्य कारणों से सभी बच्चों तक शिक्षा नहीं पहुँच सकी थी।
इन समस्याओं को दूर करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से विद्यालयों की स्थापना, शिक्षकों की नियुक्ति, निःशुल्क पाठ्यपुस्तकों, शिक्षक प्रशिक्षण तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा पर बल दिया गया।
सर्व शिक्षा अभियान का मूल उद्देश्य सभी बच्चों का विद्यालयों में नामांकन सुनिश्चित करना, उनकी शिक्षा में निरन्तरता बनाए रखना तथा प्रारम्भिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना था।
यह कार्यक्रम केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय संस्थाओं तथा समुदाय के सहयोग से संचालित किया गया।
1. सर्व शिक्षा अभियान की पृष्ठभूमि एवं विकास
1. शिक्षा सबके लिए विश्व सम्मेलन—1990
वर्ष 1990 में सभी के लिए शिक्षा के विषय पर विश्व सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें शिक्षा को सभी व्यक्तियों की मूलभूत आवश्यकता मानते हुए सार्वभौमिक शिक्षा पर बल दिया गया।
भारत में भी सभी बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए पहले से विभिन्न योजनाएँ संचालित थीं। इनके बावजूद सार्वभौमिक प्रारम्भिक शिक्षा का लक्ष्य पूरी तरह प्राप्त नहीं हो सका था।
2. संविधान का अनुच्छेद 45
भारतीय संविधान के मूल अनुच्छेद 45 में राज्य को संविधान लागू होने के दस वर्षों के भीतर 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया था।
लेकिन निर्धारित समय में यह लक्ष्य पूरी तरह प्राप्त नहीं किया जा सका।
संवैधानिक तथ्य— वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन द्वारा शिक्षा के अधिकार से सम्बन्धित अनुच्छेद 21A जोड़ा गया। इसी संशोधन से अनुच्छेद 45 को बदलकर छह वर्ष से कम आयु के बच्चों की प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा से सम्बन्धित कर दिया गया।
3. सर्व शिक्षा अभियान का प्रारम्भ
भारत सरकार ने प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के लिए वर्ष 2000 में सर्व शिक्षा अभियान की रूपरेखा को स्वीकृति दी।
इसके बाद वर्ष 2001–02 में सर्व शिक्षा अभियान को राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में प्रारम्भ किया गया।
इस कार्यक्रम को देश के विभिन्न जिलों में लागू किया गया तथा वर्ष 2010 तक सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।
4. शिक्षा का अधिकार अधिनियम से सम्बन्ध
निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 को 1 अप्रैल 2010 से लागू किया गया।
इसके माध्यम से 6 से 14 वर्ष के बच्चों की निःशुल्क एवं अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा को कानूनी आधार प्राप्त हुआ।
सर्व शिक्षा अभियान ने विद्यालयों की उपलब्धता, शैक्षिक संसाधनों तथा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के माध्यम से इस अधिकार के क्रियान्वयन में सहयोग दिया।
2. सर्व शिक्षा अभियान की सात प्रमुख विशेषताएँ
पुस्तक के अनुसार सर्व शिक्षा अभियान एक समयबद्ध कार्यक्रम था, जिसकी निम्नलिखित सात प्रमुख विशेषताएँ थीं।
- समयबद्ध कार्यक्रम— सर्व शिक्षा अभियान को निर्धारित समयावधि में प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए संचालित किया गया। इसका प्रमुख लक्ष्य वर्ष 2010 तक सभी बच्चों को आठ वर्ष की प्रारम्भिक शिक्षा उपलब्ध कराना था।
- प्रारम्भिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण— इसका उद्देश्य सभी बच्चों के लिए विद्यालयों की उपलब्धता, नामांकन तथा प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के अवसर सुनिश्चित करना था।
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा— केवल नामांकन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। इसलिए बच्चों के वास्तविक अधिगम, बौद्धिक विकास तथा शिक्षण की गुणवत्ता सुधारने पर विशेष ध्यान दिया गया।
- स्थानीय संस्थाओं की प्रभावशाली सहभागिता— पंचायती राज संस्थाओं, ग्राम शिक्षा समितियों, विद्यालय प्रबन्ध समितियों तथा अभिभावक-शिक्षक संस्थाओं की भागीदारी को महत्त्व दिया गया।
- केन्द्र एवं राज्य स्तर पर सहयोग— कार्यक्रम के संचालन के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच प्रशासनिक तथा वित्तीय सहयोग की व्यवस्था की गई।
- सामाजिक न्याय— जाति, धर्म, लिंग अथवा सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी बच्चों को समान शैक्षिक अवसर प्रदान करने पर बल दिया गया।
- राज्यों के दृष्टिकोण का विकास एवं राष्ट्रीय एकता— राज्यों को अपनी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार शैक्षिक योजनाएँ तैयार करने के अवसर दिए गए। इसके साथ राष्ट्रीय एकता तथा समान शैक्षिक अवसरों को महत्त्व दिया गया।
इस प्रकार सर्व शिक्षा अभियान की प्रमुख विशेषताएँ समयबद्ध लक्ष्य, समान अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा सामुदायिक सहभागिता थीं।
3. सर्व शिक्षा अभियान के व्यापक लक्ष्य
सर्व शिक्षा अभियान का उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के साथ सभी बच्चों के मानसिक, सामाजिक तथा नैतिक विकास के लिए आवश्यक अवसर उपलब्ध कराना था।
पुस्तक में इसके निम्नलिखित छह व्यापक लक्ष्य बताए गए हैं।
1. सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा प्रदान करना
6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा उपलब्ध कराना।
इसमें कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा को सम्मिलित किया गया। इसका उद्देश्य किसी भी बच्चे को प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित नहीं रहने देना था।
2. प्राकृतिक वातावरण में शिक्षा प्रदान करना
बच्चों को ऐसा शैक्षिक वातावरण उपलब्ध कराना जिसमें वे सहज रूप से सीख सकें तथा उनका सर्वांगीण विकास हो।
इस उद्देश्य में बच्चों की रुचियों, अनुभवों और आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण को महत्त्व दिया गया।
3. विद्यालयों में सामुदायिक सहभागिता बढ़ाना
विद्यालयों के विकास और संचालन में स्थानीय समुदाय तथा अभिभावकों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
पुस्तक में 73वें एवं 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम से स्थानीय स्वशासन को मजबूत बनाने का उल्लेख भी किया गया है।
4. मूल्य-आधारित शिक्षा प्रदान करना
बच्चों में सच्चाई, मित्रता, भाईचारा, अनुशासन तथा नैतिक मूल्यों का विकास करना।
इसका उद्देश्य विद्यार्थियों के ज्ञान के साथ उनके चरित्र एवं सामाजिक व्यवहार में भी सकारात्मक विकास करना था।
5. सामाजिक, क्षेत्रीय एवं लैंगिक असमानता कम करना
समाज के विभिन्न वर्गों, क्षेत्रों तथा बालक-बालिकाओं के बीच शिक्षा से सम्बन्धित असमानताओं को दूर करना।
इसके लिए बालिकाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य वंचित वर्गों के बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया।
6. शिशु देखभाल को महत्त्व देना
पुस्तक में विद्यालयी शिक्षा से पहले बच्चों की देखभाल और प्रारम्भिक विकास को भी महत्त्वपूर्ण बताया गया है।
इसके अन्तर्गत छोटे बच्चों की देखभाल तथा प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा सम्बन्धी सेवाओं के सहयोग पर बल दिया गया।
ध्यान दें— सर्व शिक्षा अभियान का मुख्य लक्षित आयु वर्ग 6–14 वर्ष था। शिशु देखभाल उससे पहले की तैयारी से सम्बन्धित सहायक क्षेत्र था।
4. सर्व शिक्षा अभियान के समयबद्ध उद्देश्य
सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत प्रारम्भिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण प्राप्त करने के लिए विभिन्न समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित किए गए थे।
पुस्तक में इसके निम्नलिखित 10 उद्देश्य दिए गए हैं।
- वर्ष 2003 तक— प्राथमिक शिक्षा को सर्वसुलभ बनाना।
- वर्ष 2005 तक— सभी बच्चों के लिए प्राथमिक विद्यालय, शिक्षा गारंटी केन्द्र, वैकल्पिक विद्यालय तथा बैक-टू-स्कूल शिविर जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
- वर्ष 2007 तक— सभी बच्चों द्वारा पाँच वर्ष की प्राथमिक शिक्षा पूरी करने का लक्ष्य प्राप्त करना।
- वर्ष 2010 तक— सभी बच्चों द्वारा आठ वर्ष की प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने का लक्ष्य प्राप्त करना।
- वर्ष 2010 तक— प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण तथा प्रतिधारण का लक्ष्य प्राप्त करना।
- शैक्षिक असमानता समाप्त करना— प्राथमिक स्तर पर वर्ष 2007 तक तथा प्रारम्भिक शिक्षा के सम्पूर्ण स्तर पर वर्ष 2010 तक लैंगिक एवं सामाजिक असमानताओं को समाप्त करना।
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा— ऐसी शिक्षा पर बल देना जो जीवन के लिए उपयोगी हो।
- शिक्षा को जीवन से जोड़ना— शिक्षण-अधिगम को बच्चों के दैनिक जीवन एवं अनुभवों से सम्बन्धित बनाना।
- विद्यालय में प्रतिधारण— वर्ष 2010 तक सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा पूरी होने तक विद्यालय में बनाए रखने का लक्ष्य प्राप्त करना।
- शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार— प्राथमिक शिक्षा के शिक्षण स्तर तथा विद्यार्थियों की अधिगम उपलब्धियों में सुधार करना।
प्रतिधारण (Retention) का अर्थ है विद्यालय में प्रवेश लेने वाले बच्चों का शिक्षा पूरी होने तक विद्यालय में बने रहना।
महत्त्वपूर्ण: वर्ष 2003, 2005, 2007 और 2010 से सम्बन्धित उपर्युक्त बिन्दु अभियान के ऐतिहासिक लक्ष्य हैं। इन्हें उन वर्षों में वास्तव में प्राप्त उपलब्धियों के रूप में नहीं समझना चाहिए।
5. सर्व शिक्षा अभियान में केन्द्र एवं राज्य की वित्तीय सहभागिता
सर्व शिक्षा अभियान केन्द्र तथा राज्य सरकारों की संयुक्त वित्तीय सहायता से संचालित किया गया।
पुस्तक के अनुसार प्रारम्भिक वित्तीय रूपरेखा निम्न प्रकार थी—
| पंचवर्षीय योजना | केन्द्र : राज्य |
|---|---|
| नौवीं पंचवर्षीय योजना | 85 : 15 |
| दसवीं पंचवर्षीय योजना | 75 : 25 |
| दसवीं योजना के बाद की प्रारम्भिक रूपरेखा | 50 : 50 |
ये योजना की प्रारम्भिक ऐतिहासिक वित्तीय व्यवस्थाएँ थीं। बाद के वर्षों में केन्द्र और राज्यों के वास्तविक वित्तीय अनुपात में परिवर्तन किए गए।
6. सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत शैक्षिक सुविधाएँ
सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में आवश्यक भौतिक, शैक्षिक तथा शिक्षक सम्बन्धी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया।
पुस्तक में निम्नलिखित 11 प्रमुख सुविधाओं का उल्लेख है।
1. शिक्षकों की व्यवस्था
विद्यालयों में पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करना।
पुस्तक में लगभग 40 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक तथा प्राथमिक विद्यालय में कम से कम दो शिक्षकों की व्यवस्था का उल्लेख है।
उच्च प्राथमिक स्तर पर विभिन्न कक्षाओं एवं विषयों के अनुसार शिक्षकों की व्यवस्था करने पर भी बल दिया गया।
2. विद्यालयों की स्थापना
जिन बस्तियों में विद्यालय उपलब्ध नहीं थे, वहाँ नए विद्यालय खोलने की व्यवस्था करना।
पुस्तक के अनुसार प्राथमिक विद्यालय की उपलब्धता के लिए लगभग एक किलोमीटर की दूरी का मानक रखा गया।
दूरस्थ तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा गारंटी केन्द्र जैसी वैकल्पिक व्यवस्थाओं को भी महत्त्व दिया गया।
3. कक्षा-कक्षों की स्थापना
विद्यालयों में पर्याप्त कक्षा-कक्ष उपलब्ध कराना तथा आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त कमरों का निर्माण करना।
पुस्तक में प्राथमिक विद्यालयों के लिए कम से कम दो हवादार कमरों तथा बरामदे की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
इसके साथ विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के अनुकूल सुविधाएँ विकसित करने पर भी बल दिया गया।
4. निःशुल्क पाठ्यपुस्तकों का वितरण
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, बालिकाओं तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने की व्यवस्था।
इसका उद्देश्य आर्थिक कठिनाइयों के कारण बच्चों की शिक्षा में आने वाली बाधाओं को कम करना था।
5. शिक्षण-अधिगम सामग्री उपलब्ध कराना
विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण के लिए आवश्यक शिक्षण-अधिगम सामग्री उपलब्ध कराना।
पुस्तक में नए प्राथमिक विद्यालयों के लिए ₹10,000 तथा उच्च प्राथमिक विद्यालयों के लिए ₹50,000 तक के शिक्षण-अधिगम उपकरण सम्बन्धी अनुदान का उल्लेख है।
इस सामग्री में बच्चों के लिए उपयोगी शिक्षण साधन, चार्ट, उपकरण तथा गतिविधि-आधारित अधिगम सामग्री सम्मिलित हो सकती थी।
6. विद्यालय अनुदान
विद्यालयों को आवश्यक फर्नीचर तथा अन्य शैक्षिक सुविधाओं के लिए अनुदान प्रदान करना।
इस अनुदान के उपयोग में ग्राम शिक्षा समिति तथा विद्यालय प्रबन्ध समिति की भूमिका को महत्त्व दिया गया।
इसके साथ अनुदान के उपयोग में पारदर्शिता बनाए रखने पर भी बल दिया गया।
7. शिक्षक अनुदान
शिक्षकों को उनकी आवश्यकता के अनुसार शिक्षण-अधिगम सामग्री तैयार करने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करना।
इसका उद्देश्य शिक्षकों को उपयोगी सामग्री विकसित करने तथा शिक्षण प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली बनाने में सहायता देना था।
8. शिक्षक प्रशिक्षण
सर्व शिक्षा अभियान में शिक्षकों की व्यावसायिक दक्षता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई।
पुस्तक में निम्नलिखित ऐतिहासिक प्रशिक्षण प्रावधानों का उल्लेख है—
- सेवारत शिक्षक— प्रतिवर्ष 20 दिन का प्रशिक्षण।
- नव नियुक्त प्रशिक्षित शिक्षक— 30 दिन का प्रशिक्षण।
- अप्रशिक्षित शिक्षक— 60 दिन का प्रशिक्षण।
इसके लिए SCERT तथा DIET जैसी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं को मजबूत बनाने पर बल दिया गया।
9. विद्यालय भवनों का रखरखाव
विद्यालय भवनों की मरम्मत तथा आवश्यक रखरखाव के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करना।
पुस्तक के अनुसार विद्यालय भवन के रखरखाव के लिए ₹5,000 वार्षिक अनुदान का प्रावधान बताया गया है।
इस अनुदान का उपयोग स्थानीय शिक्षा समितियों के माध्यम से किए जाने पर बल दिया गया।
10. विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा
दिव्यांग तथा विशेष शैक्षिक आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
पुस्तक में ऐसे बच्चों के लिए ₹1,200 प्रति बच्चा प्रतिवर्ष की ऐतिहासिक सहायता का उल्लेख किया गया है।
इसका उद्देश्य बच्चों की आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण एवं सहायक सुविधाओं की व्यवस्था करना था।
11. ग्रामीण एवं शहरी नेतृत्व का प्रशिक्षण
स्थानीय स्तर पर शिक्षा के विकास में भाग लेने वाले व्यक्तियों की नेतृत्व क्षमता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।
पुस्तक में ग्रामीण तथा शहरी प्रतिनिधियों के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण और प्रशिक्षण व्यय के लिए ₹30 प्रतिदिन का उल्लेख है।
इस प्रशिक्षण में महिलाओं की सहभागिता को विशेष प्राथमिकता देने पर भी बल दिया गया।
ध्यान दें— इस अनुभाग में दी गई धनराशियाँ और प्रशिक्षण अवधि पुस्तक के ऐतिहासिक प्रावधान हैं। इन्हें वर्तमान सरकारी मानक नहीं समझना चाहिए।
7. सर्व शिक्षा अभियान से सम्बन्धित प्रमुख योजनाएँ
सर्व शिक्षा अभियान के संचालन में प्राथमिक शिक्षा के लिए पहले से चल रहे विभिन्न कार्यक्रमों के अनुभवों तथा व्यवस्थाओं का उपयोग किया गया।
पुस्तक में इसके साथ सम्बन्धित निम्नलिखित 9 प्रमुख योजनाओं एवं कार्यक्रमों का उल्लेख किया गया है।
1. शिक्षा गारंटी योजना (EGS)
शिक्षा गारंटी योजना (Education Guarantee Scheme—EGS) का उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों में शिक्षा की व्यवस्था करना था जहाँ विद्यालय उपलब्ध नहीं थे।
पुस्तक के अनुसार अप्रैल 2001 में इसे सर्व शिक्षा अभियान से जोड़ा गया।
इसके अन्तर्गत कम जनसंख्या वाले तथा दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा गारंटी केन्द्र खोलने का प्रावधान था।
पुस्तक में लगभग 25 बच्चों की उपलब्धता वाले ऐसे क्षेत्रों का उल्लेख है जहाँ नियमित प्राथमिक विद्यालय नहीं था।
इस योजना का उद्देश्य विद्यालयी सुविधाओं से वंचित बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराना था।
2. ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना
ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड का प्रस्ताव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में किया गया था और इसकी शुरुआत 1987–88 में हुई।
इसका उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों में कम से कम दो कमरे, दो शिक्षक तथा आवश्यक शिक्षण-अधिगम सामग्री उपलब्ध कराना था।
पुस्तक में वर्ष 2003 के दौरान इस योजना को सर्व शिक्षा अभियान से जोड़ने का उल्लेख किया गया है।
सर्व शिक्षा अभियान में विद्यालयों की न्यूनतम सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए इस कार्यक्रम के अनुभवों का उपयोग किया गया।
3. जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP)
जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (District Primary Education Programme—DPEP) की शुरुआत वर्ष 1994 में हुई थी।
इसमें जिले की शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुसार योजनाएँ बनाकर प्राथमिक शिक्षा की पहुँच और गुणवत्ता सुधारने पर बल दिया गया।
सर्व शिक्षा अभियान ने DPEP के विकेन्द्रीकृत नियोजन, शिक्षक प्रशिक्षण तथा सामुदायिक सहभागिता सम्बन्धी अनुभवों को आगे बढ़ाया।
4. कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय (KGBV) योजना वर्ष 2004 में प्रारम्भ की गई।
इसका उद्देश्य शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में वंचित वर्गों की बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालयों की सुविधा उपलब्ध कराना था।
पुस्तक में वर्ष 2007 में इसे सर्व शिक्षा अभियान से जोड़ने का उल्लेख है।
इस योजना में विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग तथा अल्पसंख्यक समुदायों की बालिकाओं की शिक्षा को महत्त्व दिया गया।
5. मिड-डे मील योजना
मिड-डे मील योजना (Mid-Day Meal Scheme) की शुरुआत राष्ट्रीय स्तर पर 15 अगस्त 1995 को हुई।
इसका उद्देश्य बच्चों को पोषण सम्बन्धी सहायता प्रदान करना तथा विद्यालयों में नामांकन, उपस्थिति एवं प्रतिधारण बढ़ाना था।
पुस्तक में वर्ष 2007 में इस योजना को सर्व शिक्षा अभियान से जोड़ने का उल्लेख है।
तथ्यात्मक स्पष्टता— मिड-डे मील राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पोषण सहायता कार्यक्रम था। प्रारम्भिक शिक्षा के समान लक्ष्यों के कारण इसका सर्व शिक्षा अभियान के साथ समन्वय रहा।
6. लोक जुम्बिश परियोजना
लोक जुम्बिश परियोजना (Lok Jumbish Project) राजस्थान में प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए संचालित एक कार्यक्रम था।
पुस्तक के अनुसार इसका संचालन राजस्थान के 13 जिलों में किया गया।
इसमें विशेष रूप से बालिका शिक्षा, सामुदायिक सहभागिता तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर बल दिया गया।
इस कार्यक्रम के स्थानीय सहभागिता सम्बन्धी अनुभव सर्व शिक्षा अभियान के लिए उपयोगी रहे।
7. महिला समाख्या कार्यक्रम
महिला समाख्या कार्यक्रम (Mahila Samakhya Programme) का सम्बन्ध महिलाओं की शिक्षा, जागरूकता एवं सशक्तीकरण से था।
इस कार्यक्रम के माध्यम से महिलाओं को शिक्षा के महत्त्व से परिचित कराने तथा बालिकाओं की शिक्षा में उनकी सहभागिता बढ़ाने पर बल दिया गया।
सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करने में महिला समाख्या जैसे कार्यक्रमों की भूमिका को महत्त्व दिया गया।
8. शिक्षक शिक्षा का सुदृढ़ीकरण
प्रारम्भिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए शिक्षक शिक्षा एवं प्रशिक्षण को मजबूत बनाना आवश्यक माना गया।
इसके अन्तर्गत शिक्षकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण तथा व्यावसायिक विकास पर बल दिया गया।
विशेष रूप से DIET तथा SCERT जैसी संस्थाओं के माध्यम से शिक्षकों को आवश्यक शैक्षिक मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण प्रदान करने का प्रयास किया गया।
9. जनशाला कार्यक्रम
जनशाला कार्यक्रम (Janshala Programme) समुदाय-आधारित प्राथमिक शिक्षा से सम्बन्धित कार्यक्रम था।
पुस्तक के अनुसार यह भारत सरकार तथा संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से संचालित किया गया।
इन संस्थाओं में प्रमुख रूप से UNDP, UNICEF, UNESCO, ILO तथा UNFPA शामिल थीं।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा को मजबूत बनाना तथा बालिकाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य वंचित वर्गों के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करना था।
इसमें समुदाय की सहभागिता तथा स्थानीय स्तर पर शिक्षा के विकास को विशेष महत्त्व दिया गया।
8. सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत किए गए प्रमुख कार्य
सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से शिक्षा के सार्वभौमीकरण तथा विद्यालयी सुविधाओं के विकास के लिए अनेक कार्य किए गए।
पुस्तक में इसके निम्नलिखित 11 प्रमुख कार्य बताए गए हैं।
- पिछड़े बच्चों की शिक्षा— शिक्षा से वंचित तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने के प्रयास किए गए।
- वंचित वर्गों पर विशेष ध्यान— अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान किए गए।
- बालिका शिक्षा का विकास— बालिकाओं का नामांकन बढ़ाने तथा उनकी प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था को मजबूत बनाने पर विशेष बल दिया गया।
- दिव्यांग बच्चों की शिक्षा— विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए उपयुक्त शिक्षा एवं सहायक सुविधाओं का विकास किया गया।
- योग्य शिक्षकों की नियुक्ति— विद्यालयों में शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए नियुक्तियों की व्यवस्था की गई।
- विद्यालयों की आधारभूत संरचना में सुधार— विद्यालय भवनों, कक्षा-कक्षों तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं का विकास किया गया।
- नए विद्यालयों की स्थापना— आवश्यकता के अनुसार प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना की गई।
- निःशुल्क सुविधाएँ— बच्चों के नामांकन को प्रोत्साहित करने के लिए निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें, यूनिफॉर्म तथा भोजन जैसी सुविधाओं के विस्तार पर बल दिया गया।
- विद्यालय में प्रतिधारण— बच्चों को विद्यालय में बनाए रखने तथा बीच में पढ़ाई छोड़ने की समस्या कम करने के प्रयास किए गए।
- विद्यालयों का निरीक्षण— विद्यालयों के संचालन, सुविधाओं तथा शिक्षण व्यवस्था की निगरानी को महत्त्व दिया गया।
- कम्प्यूटर शिक्षा— विद्यालयों में कम्प्यूटर सम्बन्धी शिक्षा एवं सुविधाओं को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया।
9. सर्व शिक्षा अभियान का मूल्यांकन
किसी भी शैक्षिक कार्यक्रम का मूल्यांकन उसकी उपलब्धियों तथा कमियों के आधार पर किया जाता है।
सर्व शिक्षा अभियान का मूल्यांकन करने के लिए यह देखना आवश्यक है कि इससे विद्यालयों की उपलब्धता, बच्चों का नामांकन, शिक्षा की गुणवत्ता तथा शैक्षिक समानता में किस प्रकार परिवर्तन हुआ।
पुस्तक में सर्व शिक्षा अभियान की उपलब्धियों तथा कमियों का अलग-अलग वर्णन किया गया है।
10. सर्व शिक्षा अभियान की प्रमुख उपलब्धियाँ
पुस्तक में वर्ष 2014 तक के सन्दर्भ में निम्नलिखित 10 उपलब्धियों का उल्लेख किया गया है।
ध्यान दें— नीचे दी गई संख्यात्मक उपलब्धियाँ मूल पुस्तक के ऐतिहासिक विवरण पर आधारित हैं। इन सभी आँकड़ों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित राष्ट्रीय उपलब्धियाँ नहीं माना जाना चाहिए।
- विद्यालयों की स्थापना— पुस्तक के अनुसार दिसम्बर 2014 तक लगभग चार लाख विद्यालय खोले जाने का उल्लेख है।
- शिक्षकों की नियुक्ति— पुस्तक में वर्ष 2014 तक दो लाख से अधिक अध्यापकों की नियुक्ति का उल्लेख किया गया है।
- विद्यालय छोड़ने की समस्या में कमी— बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखने के प्रयासों से विद्यालय छोड़ने की समस्या कम करने में सहायता मिली।
- बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन— बालिकाओं को विद्यालयों से जोड़ने तथा शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने में सहायता मिली।
- विद्यालयी सुविधाओं का विकास— आवश्यकता के अनुसार नए भवन, फर्नीचर तथा शिक्षण-अधिगम सामग्री उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।
- निःशुल्क सुविधाओं का विस्तार— पाठ्यपुस्तकों, विद्यालयी यूनिफॉर्म तथा भोजन सम्बन्धी सुविधाओं का लाभ बच्चों तक पहुँचाने पर बल दिया गया।
- शिक्षण-विधियों में सुधार— शिक्षण को अधिक रुचिकर तथा प्रभावशाली बनाने के लिए नवीन विधियों के प्रयोग को प्रोत्साहित किया गया।
- पाठ्यक्रम में सुधार— समय-समय पर पाठ्यक्रम में आवश्यक परिवर्तन करके उसे बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने का प्रयास किया गया।
- शिक्षा के सार्वभौमीकरण में प्रगति— पुस्तक में वर्ष 2014 तक प्राथमिक स्तर पर 99 प्रतिशत तथा उच्च प्राथमिक स्तर पर 90 प्रतिशत बच्चों तक शिक्षा पहुँचने का दावा किया गया है।
- अवरोधन की समस्या में कमी— पुस्तक में अवरोधन की समस्या में लगभग 95 प्रतिशत कमी का उल्लेख किया गया है।
इन उपलब्धियों से स्पष्ट होता है कि सर्व शिक्षा अभियान ने विद्यालयी सुविधाओं, नामांकन, बालिका शिक्षा तथा शैक्षिक गुणवत्ता सुधारने की दिशा में प्रयास किए।
हालाँकि, इन प्रयासों के बावजूद सार्वभौमिक प्रारम्भिक शिक्षा का लक्ष्य पूरी तरह प्राप्त करना एक चुनौती बना रहा।
11. सर्व शिक्षा अभियान की प्रमुख कमियाँ
पुस्तक में सर्व शिक्षा अभियान की निम्नलिखित चार प्रमुख कमियाँ बताई गई हैं।
1. विद्यालयी सुविधाओं की गुणवत्ता में कमी
कई स्थानों पर विद्यालय भवन, फर्नीचर तथा शिक्षण सामग्री उपलब्ध होने के बावजूद उनकी गुणवत्ता एवं उपयोगिता से सम्बन्धित समस्याएँ बनी रहीं।
केवल संसाधन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। उनका उचित रखरखाव तथा प्रभावशाली उपयोग भी आवश्यक है।
2. लक्ष्यों की वास्तविक प्राप्ति में अन्तर
कार्यक्रम की विभिन्न उपलब्धियों के बावजूद निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का लक्ष्य पूरी तरह प्राप्त नहीं हो सका।
इससे स्पष्ट होता है कि विद्यालयों की संख्या तथा नामांकन बढ़ने के साथ शिक्षा की वास्तविक उपलब्धियों पर भी ध्यान देना आवश्यक था।
3. विद्यालय से बाहर बच्चों की समस्या
पुस्तक में उस समय लगभग 4 करोड़ बच्चों के प्राथमिक शिक्षा से बाहर होने का उल्लेख किया गया है।
यह पुस्तक में प्रस्तुत ऐतिहासिक अनुमान है, वर्तमान स्थिति का आँकड़ा नहीं।
4. नामांकन एवं ड्रॉपआउट की समस्या
पुस्तक में लगभग दो करोड़ बच्चों द्वारा विद्यालय में प्रवेश नहीं लेने तथा दो करोड़ बच्चों द्वारा बीच में शिक्षा छोड़ देने का विवरण दिया गया है।
इससे विद्यालयी नामांकन के साथ बच्चों को शिक्षा पूरी होने तक विद्यालय में बनाए रखने की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
12. सर्व शिक्षा अभियान को सुदृढ़ बनाने हेतु सुझाव
सर्व शिक्षा अभियान के उद्देश्यों को प्रभावशाली ढंग से प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि विद्यालयों में पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध हों तथा शिक्षकों एवं स्थानीय संस्थाओं की समस्याओं का समाधान किया जाए।
पुस्तक में अभियान को मजबूत बनाने के लिए निम्नलिखित 12 प्रमुख सुझाव दिए गए हैं।
1. आवश्यकता के अनुसार विद्यालयों को सुविधाएँ देना
सभी विद्यालयों को एक जैसी सुविधाएँ देने के स्थान पर उनकी वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
इससे उपलब्ध धन एवं सामग्री का अधिक उपयोगी ढंग से प्रयोग किया जा सकता है।
2. बालक एवं बालिकाओं को समान सुविधाएँ देना
निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें तथा अन्य आवश्यक सुविधाएँ केवल बालिकाओं तक सीमित न रखकर आवश्यकतानुसार बालकों को भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
इसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर सभी बच्चों को शिक्षा के समान अवसर प्रदान करना है।
3. भेदभाव रहित आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना
विद्यार्थियों को बिना किसी भेदभाव के आवश्यक शैक्षिक सामग्री उपलब्ध करानी चाहिए।
पुस्तक में वर्दी, जूते, कॉपी तथा पेंसिल जैसी सामग्री की व्यवस्था पर भी बल दिया गया है।
4. शिक्षक प्रशिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाना
शिक्षकों के लिए केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना पर्याप्त नहीं है।
प्रशिक्षण के माध्यम से उनके ज्ञान, शिक्षण-कौशल तथा कक्षा शिक्षण की वास्तविक समस्याओं का समाधान होना चाहिए।
इसलिए सेवाकालीन प्रशिक्षण को अधिक व्यावहारिक एवं प्रभावशाली बनाया जाना चाहिए।
5. आधुनिक शिक्षण-विधियों का प्रशिक्षण देना
सेवारत शिक्षकों को बदलती शैक्षिक परिस्थितियों तथा आधुनिक शिक्षण-विधियों के अनुसार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
इससे शिक्षक बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण करने में अधिक सक्षम बन सकते हैं।
6. मिड-डे मील के संचालन में सुधार करना
पुस्तक में शिक्षकों को भोजन पकाने तथा वितरण सम्बन्धी कार्यों में अधिक व्यस्त रहने के कारण शिक्षण प्रभावित होने की समस्या बताई गई है।
इसलिए मिड-डे मील के संचालन का उत्तरदायित्व उपयुक्त स्थानीय संस्थाओं अथवा निर्धारित कर्मचारियों को दिया जाना चाहिए।
इससे शिक्षक अपने मुख्य शिक्षण कार्य पर अधिक ध्यान दे सकेंगे।
7. विद्यालय अनुदान के अभिलेखों की व्यवस्था सुधारना
विद्यालयों को प्राप्त होने वाले विभिन्न अनुदानों का सही एवं पारदर्शी अभिलेख तैयार किया जाना चाहिए।
इसके लिए प्रशिक्षित तथा उत्तरदायी कर्मचारियों की व्यवस्था आवश्यक है।
8. ग्राम स्तरीय समितियों में समन्वय स्थापित करना
ग्राम पंचायतों तथा ग्राम शिक्षा समितियों के बीच उचित समन्वय होना चाहिए।
इससे विद्यालयों के संचालन तथा आवश्यक सुविधाओं के विकास में सहयोग बढ़ाया जा सकता है।
9. ग्राम शिक्षा समितियों में शिक्षित व्यक्तियों की सहभागिता
ग्राम शिक्षा समितियों में ऐसे व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाना चाहिए जो विद्यालयी समस्याओं को समझने तथा उनके समाधान में सहयोग करने में सक्षम हों।
इससे शिक्षा सम्बन्धी निर्णय अधिक प्रभावशाली बन सकते हैं।
10. BRC एवं CRC की उत्तरदायित्वपूर्ण भूमिका
BRC (Block Resource Centre) तथा CRC (Cluster Resource Centre) विद्यालयों एवं शिक्षकों को शैक्षिक सहायता प्रदान करने वाली महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ हैं।
इनके उत्तरदायित्व स्पष्ट किए जाने चाहिए तथा इनके कार्यों का नियमित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
11. शिक्षा को राजनीति से दूर रखना
सर्व शिक्षा अभियान का संचालन शैक्षिक आवश्यकताओं तथा बच्चों के हितों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
पुस्तक में ग्राम शिक्षा समितियों तथा अन्य संस्थाओं में अनावश्यक राजनीतिक हस्तक्षेप कम करने का सुझाव दिया गया है।
12. प्रचार-प्रसार पर अनावश्यक खर्च कम करना
कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार पर होने वाले अनावश्यक खर्च को कम करके धन का उपयोग वास्तविक शैक्षिक आवश्यकताओं पर किया जाना चाहिए।
पुस्तक में शिक्षकों के माध्यम से सीधे समुदाय तक जानकारी पहुँचाने तथा उपलब्ध संसाधनों का उचित उपयोग करने का सुझाव दिया गया है।
13. सर्व शिक्षा अभियान का शैक्षिक महत्त्व
सर्व शिक्षा अभियान भारत में प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम था।
इसके माध्यम से विद्यालयों की उपलब्धता बढ़ाने, आवश्यक शैक्षिक सुविधाओं का विकास करने तथा वंचित बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के प्रयास किए गए।
इस अभियान में बालिका शिक्षा, दिव्यांग बच्चों की शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण तथा स्थानीय समुदाय की सहभागिता को विशेष महत्त्व दिया गया।
इसके अतिरिक्त विद्यालयों में निःशुल्क पाठ्यपुस्तकों, शिक्षण-अधिगम सामग्री तथा आवश्यक भौतिक सुविधाओं का विस्तार किया गया।
इस प्रकार सर्व शिक्षा अभियान का प्रमुख महत्त्व शिक्षा की पहुँच बढ़ाना, बच्चों का प्रतिधारण सुनिश्चित करना, शैक्षिक असमानता कम करना तथा गुणवत्तापूर्ण प्रारम्भिक शिक्षा को प्रोत्साहित करना था।
14. सर्व शिक्षा अभियान की वर्तमान ऐतिहासिक स्थिति
सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2001–02 में हुई थी।
इसके बाद शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 लागू होने पर निःशुल्क एवं अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा के कानूनी प्रावधानों के क्रियान्वयन में भी इस कार्यक्रम ने भूमिका निभाई।
वर्ष 2018–19 में सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान तथा शिक्षक शिक्षा की योजनाओं को समग्र शिक्षा कार्यक्रम में समाहित किया गया।
इसलिए पुस्तक में दिए गए सर्व शिक्षा अभियान के अनुदान, लक्ष्य एवं अन्य व्यवस्थाओं को ऐतिहासिक सन्दर्भ में समझना चाहिए, न कि वर्तमान नियमों के रूप में।
समग्र निष्कर्ष
सर्व शिक्षा अभियान (SSA) भारत में 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को निःशुल्क, अनिवार्य एवं गुणवत्तापूर्ण प्रारम्भिक शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित राष्ट्रीय कार्यक्रम था।
इसे वर्ष 2001–02 में राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में प्रारम्भ किया गया तथा वर्ष 2010 तक सार्वभौमिक प्रारम्भिक शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया गया।
सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से नए विद्यालयों की स्थापना, शिक्षकों की नियुक्ति, निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें, शिक्षण-अधिगम सामग्री, शिक्षक प्रशिक्षण तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा पर बल दिया गया।
इसके अन्तर्गत बालिका शिक्षा, सामाजिक समानता, सामुदायिक सहभागिता तथा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के प्रयास किए गए।
हालाँकि विद्यालय छोड़ने की समस्या, संसाधनों की गुणवत्ता तथा विद्यालयी प्रबन्धन से सम्बन्धित अनेक चुनौतियाँ बनी रहीं।
इस प्रकार सर्व शिक्षा अभियान प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण, शैक्षिक समानता एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास था।
- SSA का पूरा नाम Sarva Shiksha Abhiyan है।
- सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में 2001–02 में हुई।
- शिक्षा मंत्रालय के अनुसार इसका क्रियान्वयन 2000–01 से शुरू हुआ था।
- इसका मुख्य लक्षित आयु वर्ग 6–14 वर्ष तथा कक्षाएँ 1 से 8 थीं।
- अभियान का मुख्य लक्ष्य सभी बच्चों को निःशुल्क, अनिवार्य एवं गुणवत्तापूर्ण प्रारम्भिक शिक्षा प्रदान करना था।
- भारतीय संविधान में शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 21A के अन्तर्गत है, जिसे 86वें संविधान संशोधन, 2002 द्वारा जोड़ा गया।
- शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 को 1 अप्रैल 2010 से लागू किया गया।
- पुस्तक में सर्व शिक्षा अभियान की 7 प्रमुख विशेषताएँ बताई गई हैं।
- प्रमुख विशेषताएँ हैं—समयबद्ध कार्यक्रम, शिक्षा का सार्वभौमीकरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्थानीय सहभागिता, केन्द्र-राज्य सहयोग, सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रीय एकता।
- पुस्तक में अभियान के 6 व्यापक लक्ष्य तथा 10 समयबद्ध उद्देश्य दिए गए हैं।
- प्रमुख ऐतिहासिक लक्ष्य थे—2005 तक सभी बच्चों को विद्यालयी सुविधा, 2007 तक पाँच वर्ष की प्राथमिक शिक्षा तथा 2010 तक आठ वर्ष की प्रारम्भिक शिक्षा पूरी कराना।
- वर्ष 2010 तक सभी बच्चों के प्रतिधारण तथा प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण का लक्ष्य रखा गया था।
- नौवीं पंचवर्षीय योजना में केन्द्र-राज्य वित्तीय अनुपात 85:15 तथा दसवीं योजना में 75:25 था।
- पुस्तक में सर्व शिक्षा अभियान की 11 प्रमुख शैक्षिक सुविधाएँ बताई गई हैं।
- इनमें शिक्षक नियुक्ति, विद्यालय स्थापना, कक्षा-कक्ष, निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें, शिक्षण सामग्री, विद्यालय अनुदान, शिक्षक अनुदान तथा शिक्षक प्रशिक्षण प्रमुख थे।
- पुस्तक में 40 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक की ऐतिहासिक व्यवस्था का उल्लेख है।
- नए प्राथमिक विद्यालयों के लिए ₹10,000 तथा उच्च प्राथमिक विद्यालयों के लिए ₹50,000 तक की शिक्षण सामग्री का प्रावधान बताया गया है।
- विद्यालय भवन रखरखाव हेतु ₹5,000 वार्षिक तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए ₹1,200 प्रति बच्चा प्रतिवर्ष की ऐतिहासिक सहायता का उल्लेख है।
- शिक्षक प्रशिक्षण के लिए क्रमशः 20 दिन, 30 दिन तथा 60 दिन की व्यवस्थाओं का उल्लेख है।
- पुस्तक में सर्व शिक्षा अभियान से सम्बन्धित 9 प्रमुख योजनाएँ एवं कार्यक्रम बताए गए हैं।
- ये हैं—शिक्षा गारंटी योजना, ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड, DPEP, कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय, मिड-डे मील, लोक जुम्बिश, महिला समाख्या, शिक्षक शिक्षा तथा जनशाला कार्यक्रम।
- पुस्तक में अभियान के अन्तर्गत किए गए 11 प्रमुख कार्य बताए गए हैं।
- इनमें बालिका शिक्षा, वंचित वर्गों एवं दिव्यांग बच्चों की शिक्षा, शिक्षक नियुक्ति, भवन विकास, निःशुल्क सुविधाएँ तथा कम्प्यूटर शिक्षा प्रमुख हैं।
- पुस्तक में सर्व शिक्षा अभियान की 10 ऐतिहासिक उपलब्धियों तथा 4 प्रमुख कमियों का उल्लेख है।
- प्रमुख कमियाँ थीं—विद्यालयी सुविधाओं की गुणवत्ता, लक्ष्यों की अपूर्ण प्राप्ति, विद्यालय से बाहर बच्चों की समस्या तथा ड्रॉपआउट।
- अभियान को सुदृढ़ बनाने के लिए पुस्तक में 12 प्रमुख सुझाव दिए गए हैं।
- इनमें आवश्यकता आधारित सुविधाएँ, समान शैक्षिक अवसर, प्रभावशाली शिक्षक प्रशिक्षण, मिड-डे मील प्रबन्धन, अनुदान की पारदर्शिता तथा BRC/CRC की जवाबदेही प्रमुख हैं।
- वर्ष 2018–19 में सर्व शिक्षा अभियान को समग्र शिक्षा कार्यक्रम में समाहित किया गया।
- सर्व शिक्षा अभियान का मूल उद्देश्य सभी बच्चों के लिए शिक्षा की पहुँच, समानता, प्रतिधारण तथा गुणवत्तापूर्ण अधिगम सुनिश्चित करना था।
प्राथमिक स्तर पर बालिका शिक्षा हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPEGEL)—परिचय, उद्देश्य, क्षेत्र, घटक एवं मॉडल क्लस्टर विद्यालयों की सुविधाएँ
प्राथमिक स्तर पर बालिका शिक्षा हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम का परिचय
प्राथमिक स्तर पर बालिका शिक्षा हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (National Programme for Education of Girls at Elementary Level—NPEGEL) भारत सरकार द्वारा बालिकाओं की प्रारम्भिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्रारम्भ किया गया एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक कार्यक्रम था।
इस कार्यक्रम की शुरुआत जुलाई 2003 में सर्व शिक्षा अभियान (SSA) के अन्तर्गत की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े क्षेत्रों तथा वंचित वर्गों की बालिकाओं को प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक शिक्षा के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना था।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा किए गए सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट हुआ कि विभिन्न शैक्षिक प्रयासों के बावजूद अनेक बालिकाएँ विद्यालयों में नियमित रूप से उपस्थित नहीं हो पा रही थीं।
कुछ बालिकाएँ विद्यालय में नामांकन होने के बाद भी पढ़ाई बीच में छोड़ देती थीं। विशेष रूप से सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में यह समस्या अधिक थी।
इन समस्याओं को दूर करने के लिए NPEGEL कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। इसके माध्यम से बालिकाओं की शिक्षा के लिए अतिरिक्त शैक्षिक सुविधाएँ, विशेष प्रशिक्षण, प्रोत्साहन सामग्री तथा सामुदायिक सहयोग उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।
इस कार्यक्रम का प्रमुख लक्ष्य कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा से वंचित बालिकाओं को विद्यालयों से जोड़ना, उनके नामांकन एवं ठहराव में वृद्धि करना तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना था।
1. NPEGEL कार्यक्रम की पृष्ठभूमि एवं प्रमुख विशेषताएँ
सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत सभी बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। लेकिन कुछ क्षेत्रों में बालिकाओं की शिक्षा के लिए सामान्य सुविधाओं के अतिरिक्त विशेष प्रयासों की आवश्यकता थी।
इसी उद्देश्य से सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत NPEGEL को बालिका शिक्षा के विशेष कार्यक्रम के रूप में संचालित किया गया।
कार्यक्रम के प्रमुख तथ्य
- पूरा नाम— National Programme for Education of Girls at Elementary Level।
- संक्षिप्त नाम— NPEGEL।
- प्रारम्भ— जुलाई 2003।
- सम्बन्धित अभियान— सर्व शिक्षा अभियान (SSA)।
- लक्षित कक्षाएँ— कक्षा 1 से 8 तक।
- प्रमुख लक्षित वर्ग— शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों तथा वंचित समुदायों की बालिकाएँ।
- प्रमुख उद्देश्य— बालिकाओं के नामांकन, ठहराव, शैक्षिक उपलब्धियों तथा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना।
इस कार्यक्रम की एक प्रमुख विशेषता मॉडल क्लस्टर विद्यालयों (Model Cluster Schools) का विकास करना था।
मॉडल क्लस्टर विद्यालय ऐसे चयनित विद्यालय थे, जिन्हें बालिका शिक्षा के लिए अतिरिक्त शैक्षिक संसाधन उपलब्ध कराकर विकसित किया जाता था।
इन विद्यालयों में उपलब्ध सुविधाओं का लाभ सम्बन्धित क्लस्टर के अन्य विद्यालयों की बालिकाओं तक भी पहुँचाने का प्रयास किया जाता था।
क्लस्टर (Cluster) से आशय एक निश्चित क्षेत्र में स्थित विद्यालयों के समूह से है। इस समूह में एक चयनित विद्यालय को मॉडल विद्यालय के रूप में विकसित करके अन्य विद्यालयों के लिए भी उपयोगी शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती थीं।
2. NPEGEL कार्यक्रम के उद्देश्य
NPEGEL कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बालिकाओं को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना, विद्यालयों में उनकी नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना तथा लैंगिक असमानता को कम करना था।
पुस्तक में इसके निम्नलिखित 13 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
1. बालिकाओं के लिए प्रारम्भिक शिक्षा की सुविधाओं का विकास
बालिकाओं को प्रारम्भिक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक शैक्षिक सुविधाओं का विकास एवं विस्तार करना।
इसका उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों की बालिकाओं को शिक्षा के अवसर प्रदान करना था, जहाँ पर्याप्त विद्यालयी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं।
2. शिक्षा में लैंगिक अंतर कम करना
लैंगिक अंतर (Gender Gap) को कम करना इस कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य था।
इसका अर्थ है बालक और बालिकाओं के बीच नामांकन, उपस्थिति, शैक्षिक उपलब्धियों तथा शिक्षा के अवसरों में पाई जाने वाली असमानता को कम करना।
इसके लिए बालिकाओं की शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन दिया गया।
3. मॉडल क्लस्टर विद्यालयों का विकास करना
कम महिला साक्षरता दर वाले जनपदों के विकास खण्डों अथवा न्याय पंचायत स्तर पर चयनित विद्यालयों को मॉडल क्लस्टर स्कूल के रूप में विकसित करना।
इन विद्यालयों में बालिकाओं की शिक्षा के लिए अतिरिक्त सुविधाएँ उपलब्ध कराकर आसपास के विद्यालयों को भी लाभ पहुँचाने का प्रयास किया गया।
4. विद्यालयों में बालिकाओं का ठहराव बढ़ाना
विद्यालयों में बालिकाओं का ठहराव अथवा प्रतिधारण (Retention) बढ़ाना।
प्रतिधारण का अर्थ है विद्यालय में नामांकित बालिकाओं का अपनी शिक्षा पूरी होने तक विद्यालय में बने रहना।
इसका उद्देश्य बालिकाओं द्वारा बीच में पढ़ाई छोड़ने की समस्या को कम करना था।
5. शत-प्रतिशत नामांकन, ठहराव एवं गुणवत्ता का प्रयास
चयनित मॉडल क्लस्टर विद्यालयों में बालिकाओं का शत-प्रतिशत नामांकन एवं ठहराव सुनिश्चित करने तथा शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास करना।
इस उद्देश्य के अन्तर्गत केवल विद्यालय में प्रवेश दिलाना ही नहीं, बल्कि बालिकाओं की पढ़ाई जारी रखना तथा उनके अधिगम स्तर में सुधार करना भी महत्त्वपूर्ण था।
6. कमजोर विद्यार्थियों के लिए उपचारात्मक शिविर
विद्यार्थियों के मूल्यांकन के बाद उन बच्चों की पहचान करना जिन्हें कुछ विषयों को समझने में कठिनाई होती है।
ऐसे विद्यार्थियों के लिए गणित, अंग्रेजी तथा विज्ञान जैसे विषयों में उपचारात्मक शिक्षण शिविर आयोजित करना।
उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching) का अर्थ है विद्यार्थियों की सीखने सम्बन्धी कठिनाइयों की पहचान करके उन्हें विशेष सहायता एवं अतिरिक्त शिक्षण प्रदान करना।
7. महिलाओं एवं बालिकाओं की अधिकतम सहभागिता
शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं तथा बालिकाओं की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करना।
इसका उद्देश्य अभिभावकों एवं समुदाय में बालिका शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा महिलाओं को शैक्षिक गतिविधियों से जोड़ना था।
8. उच्च प्राथमिक स्तर पर कार्यानुभव शिक्षा प्रदान करना
बालिकाओं के लिए उच्च प्राथमिक स्तर पर कार्यानुभव शिक्षा (Work Experience Education) उपलब्ध कराना।
कार्यानुभव शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को व्यावहारिक गतिविधियों में भाग लेकर उपयोगी कौशल विकसित करने के अवसर मिलते हैं।
9. ओपन स्कूल के माध्यम से शिक्षा उपलब्ध कराना
उच्च प्राथमिक स्तर की शिक्षा से वंचित बालिकाओं को ओपन स्कूल जैसी वैकल्पिक शैक्षिक व्यवस्थाओं से जोड़ने का प्रयास करना।
इसका उद्देश्य उन बालिकाओं को शिक्षा के अवसर देना था जो विभिन्न कारणों से नियमित विद्यालयों में नहीं पढ़ पा रही थीं।
10. शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना
बालिकाओं को उपलब्ध कराई जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना।
इसके लिए आवश्यक शिक्षण सामग्री, अतिरिक्त सहायता तथा प्रभावशाली शिक्षण व्यवस्था को महत्त्व दिया गया।
इसका उद्देश्य बालिकाओं की वास्तविक अधिगम उपलब्धियों में वृद्धि करना था।
11. विद्यालय छोड़ चुकी बालिकाओं को पुनः शिक्षा से जोड़ना
विद्यालय छोड़ चुके बच्चों, विशेष रूप से बालिकाओं को ग्रीष्मकालीन शैक्षिक शिविरों के माध्यम से पुनः शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना।
इससे पढ़ाई बीच में छोड़ चुकी बालिकाओं को दोबारा सीखने और विद्यालय में प्रवेश लेने के अवसर प्रदान किए जा सकते थे।
12. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा द्वारा बालिका सशक्तीकरण
बालिकाओं के सशक्तीकरण के लिए उनकी शिक्षा की गुणवत्ता तथा उपयोगिता पर विशेष ध्यान देना।
इस उद्देश्य में ऐसी शिक्षा को महत्त्व दिया गया जो बालिकाओं के ज्ञान, आत्मविश्वास तथा व्यक्तिगत क्षमताओं के विकास में सहायक हो।
13. ब्रिज कैम्प द्वारा वंचित बालिकाओं को शिक्षित करना
असेवित क्षेत्रों एवं बस्तियों की ऐसी बालिकाओं के लिए ब्रिज कैम्प (Bridge Camp) संचालित करना जो विद्यालयी शिक्षा से वंचित थीं।
ब्रिज कैम्प एक विशेष शैक्षिक व्यवस्था है, जिसके माध्यम से विद्यालय से बाहर रह गए बच्चों को आवश्यक प्रारम्भिक शिक्षण देकर नियमित शिक्षा से जुड़ने के लिए तैयार किया जाता है।
इसका उद्देश्य शिक्षा से वंचित बालिकाओं को पुनः विद्यालयी व्यवस्था में सम्मिलित करना था।
3. NPEGEL कार्यक्रम के प्रमुख क्षेत्र
NPEGEL कार्यक्रम मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में संचालित किया गया जहाँ महिला साक्षरता की स्थिति कमजोर थी तथा बालिकाओं को शिक्षा प्राप्त करने में सामाजिक एवं शैक्षिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
पुस्तक में इसके निम्नलिखित 3 प्रमुख क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है।
1. शैक्षिक रूप से पिछड़े विकास खण्ड
ऐसे विकास खण्ड जहाँ महिलाओं की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से कम हो तथा पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता दर के बीच अंतर राष्ट्रीय औसत से अधिक हो।
इन्हें शैक्षिक रूप से पिछड़े विकास खण्ड (Educationally Backward Blocks—EBBs) कहा जाता है।
ऐसे क्षेत्रों में बालिकाओं की शिक्षा के लिए विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराने तथा नामांकन बढ़ाने पर बल दिया गया।
तथ्यात्मक सावधानी— मूल पुस्तक में इस बिन्दु पर लिंगानुपात का उल्लेख है, जबकि आधिकारिक मानदण्ड पुरुष-महिला साक्षरता दर के अंतर से सम्बन्धित है।
2. चयनित शहरी मलिन बस्तियाँ
ऐसी चयनित शहरी मलिन बस्तियाँ जहाँ गरीबी तथा अन्य सामाजिक-आर्थिक कारणों से बालिकाओं को शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाइयाँ होती थीं।
इन क्षेत्रों में बालिकाओं के नामांकन, नियमित उपस्थिति तथा शैक्षिक सुविधाओं के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया।
3. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्र
ऐसे विकास खण्ड जहाँ अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या कम से कम 5 प्रतिशत हो तथा सम्बन्धित वर्ग की महिलाओं की साक्षरता दर 10 प्रतिशत से कम हो।
पुस्तक में इन क्षेत्रों को भी कार्यक्रम के विशेष कार्यक्षेत्र में सम्मिलित किया गया है।
इसका उद्देश्य सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से वंचित समुदायों की बालिकाओं तक प्रारम्भिक शिक्षा पहुँचाना था।
इस प्रकार NPEGEL कार्यक्रम के प्रमुख क्षेत्र शैक्षिक रूप से पिछड़े विकास खण्ड, चयनित शहरी मलिन बस्तियाँ तथा कम महिला साक्षरता वाले वंचित समुदायों के क्षेत्र थे।
4. NPEGEL कार्यक्रम के प्रमुख घटक
बालिका शिक्षा को प्रभावशाली बनाने के लिए NPEGEL के अन्तर्गत मॉडल क्लस्टर विद्यालयों का विकास तथा शैक्षिक सुविधाओं के विस्तार को विशेष महत्त्व दिया गया।
पुस्तक में इसके 4 प्रमुख घटक बताए गए हैं।
1. प्रत्येक न्याय पंचायत में मॉडल क्लस्टर विद्यालय की स्थापना
प्रत्येक चयनित न्याय पंचायत में एक विद्यालय को आदर्श क्लस्टर विद्यालय के रूप में विकसित करने का प्रावधान किया गया।
इस विद्यालय में उपलब्ध अतिरिक्त संसाधनों का उद्देश्य सम्बन्धित क्लस्टर की बालिकाओं की शिक्षा में सुधार करना था।
2. वंचित वर्गों की बालिकाओं के लिए विद्यालयों का चयन
मॉडल क्लस्टर विद्यालयों के चयन में ऐसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई जहाँ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग तथा अल्पसंख्यक समुदायों की बालिकाओं की संख्या अधिक थी।
इसका उद्देश्य उन बालिकाओं तक शैक्षिक सुविधाएँ पहुँचाना था जिन्हें शिक्षा प्राप्त करने में अधिक कठिनाइयाँ होती थीं।
3. क्लस्टर के सभी विद्यालयों तक सुविधाएँ पहुँचाना
मॉडल क्लस्टर विद्यालय में उपलब्ध संसाधनों का लाभ केवल उसी विद्यालय तक सीमित न रखकर सम्बन्धित क्लस्टर के सभी विद्यालयों तक पहुँचाने पर बल दिया गया।
इससे आसपास के विद्यालयों की बालिकाओं को भी अतिरिक्त शिक्षण सामग्री तथा अन्य शैक्षिक सुविधाओं का लाभ मिल सके।
4. मॉडल क्लस्टर विद्यालयों का सुदृढ़ीकरण
पुस्तक के अनुसार वर्ष 2007–08 तक 7,245 विद्यालयों को आदर्श क्लस्टर विद्यालयों के रूप में सुदृढ़ बनाने का उल्लेख किया गया है।
इस घटक का उद्देश्य चयनित विद्यालयों में आवश्यक शैक्षिक सुविधाओं का विकास करके उन्हें बालिका शिक्षा के उपयोगी केन्द्रों के रूप में तैयार करना था।
ध्यान दें— 7,245 का आँकड़ा पुस्तक में दिए गए ऐतिहासिक विवरण पर आधारित है। इसे वर्तमान संख्या अथवा पूरे देश में संचालित मॉडल क्लस्टर विद्यालयों की कुल संख्या नहीं समझना चाहिए।
5. मॉडल क्लस्टर विद्यालयों को दी गई सुविधाएँ
NPEGEL कार्यक्रम के अन्तर्गत चयनित मॉडल क्लस्टर विद्यालयों में बालिकाओं की शिक्षा, आत्मविश्वास, शैक्षिक उपलब्धियों तथा नियमित उपस्थिति बढ़ाने के लिए विभिन्न सुविधाएँ उपलब्ध कराई गईं।
पुस्तक में ऐसी 8 प्रमुख सुविधाओं का उल्लेख किया गया है।
1. लकड़ी की चौकियों की व्यवस्था
पुस्तक के अनुसार वर्ष 2005–06 में कक्षा 1 से 5 तक की बालिकाओं के लिए चयनित 8,392 मॉडल क्लस्टर प्राथमिक विद्यालयों में लकड़ी की चौकियाँ उपलब्ध कराई गईं।
इन चौकियों का उद्देश्य बालिकाओं को बैठने एवं लिखने के लिए उचित स्थान उपलब्ध कराना था।
इससे उन्हें लिखने की गतिविधियों में सुविधा मिल सके तथा कक्षा में अध्ययन का वातावरण बेहतर बनाया जा सके।
2. साइकिलों एवं झूलों की उपलब्धता
बालिकाओं में आत्मविश्वास तथा गतिविधि सम्बन्धी कौशल विकसित करने के लिए साइकिलों एवं झूलों की व्यवस्था की गई।
पुस्तक के अनुसार—
- प्रथम चरण में प्रत्येक ब्लॉक स्तरीय क्लस्टर विद्यालय में 10 साइकिलें उपलब्ध कराई गईं।
- द्वितीय चरण में क्लस्टर स्तर के विद्यालयों में भी साइकिलों की व्यवस्था की गई।
- प्रत्येक क्लस्टर विद्यालय में झूलों के चार सेट स्थापित किए गए।
इन सुविधाओं का उद्देश्य बालिकाओं में साइकिल चलाने का कौशल, आत्मविश्वास तथा विद्यालयी गतिविधियों के प्रति रुचि विकसित करना था।
3. निःशुल्क यूनिफॉर्म का वितरण
चयनित 680 विकास खण्डों तथा शहरी मलिन बस्तियों में स्थित प्राथमिक विद्यालयों की बालिकाओं को प्रतिवर्ष निःशुल्क यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने का उल्लेख किया गया है।
इस सुविधा का उद्देश्य आर्थिक कठिनाइयों के कारण बालिकाओं की विद्यालयी शिक्षा में आने वाली बाधाओं को कम करना था।
निःशुल्क यूनिफॉर्म से बालिकाओं की नियमित उपस्थिति तथा विद्यालय में बने रहने को प्रोत्साहन मिल सकता था।
4. पुस्तकालयों की स्थापना
बालिकाओं में पढ़ने की रुचि तथा पठन कौशल विकसित करने के लिए मॉडल क्लस्टर विद्यालयों में पुस्तकालय स्थापित किए गए।
पुस्तक के अनुसार पुस्तकालयों के विकास में नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया (National Book Trust of India) का सहयोग लिया गया।
पुस्तकों की खरीद ग्राम शिक्षा समितियों के माध्यम से करने का प्रावधान बताया गया है।
इसका उद्देश्य बालिकाओं को पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त उपयोगी पुस्तकें पढ़ने के अवसर प्रदान करना था।
5. निःशुल्क स्कूल बैग का वितरण
पूर्व माध्यमिक स्तर की बालिकाओं को अतिरिक्त प्रोत्साहन के रूप में निःशुल्क स्कूल बैग उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई।
पुस्तक के अनुसार बालिकाओं को दो वर्षों तक निःशुल्क स्कूल बैग उपलब्ध कराने का उल्लेख है।
इसका उद्देश्य आवश्यक विद्यालयी सामग्री की कमी को बालिकाओं की पढ़ाई में बाधा बनने से रोकना था।
6. बहुउद्देशीय कक्षा-कक्षों का निर्माण
मॉडल क्लस्टर विद्यालयों में शैक्षिक गतिविधियों तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए बहुउद्देशीय कक्षा-कक्षों का निर्माण कराया गया।
पुस्तक के अनुसार इन निर्माण कार्यों में ग्राम शिक्षा समितियों की भूमिका थी।
इसके अन्तर्गत विद्यालयों की संरचनात्मक सुविधाओं, बालिका शौचालयों तथा अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं के विकास पर भी बल दिया गया।
इसका उद्देश्य बालिकाओं के लिए अधिक सुविधाजनक विद्यालयी वातावरण तैयार करना था।
7. उपचारात्मक शिक्षण की व्यवस्था
कुछ बालिकाओं को गणित, विज्ञान तथा अंग्रेजी जैसे विषयों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
इसका एक कारण विषय-शिक्षकों की कमी तथा उचित शैक्षिक सहायता का अभाव भी था।
इसलिए चयनित विद्यालयों में ऐसी बालिकाओं के लिए उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching) की व्यवस्था की गई।
इसका उद्देश्य कमजोर अधिगम स्तर वाली बालिकाओं को अतिरिक्त सहायता प्रदान करके उनकी शैक्षिक उपलब्धियों में सुधार करना था।
8. उत्कृष्ट विद्यालयों को पुरस्कार
मॉडल क्लस्टर विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता एवं आवश्यक सुविधाओं के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कारों की व्यवस्था की गई।
पुस्तक के अनुसार वर्ष 2008–09 तथा 2009–10 के सन्दर्भ में प्रत्येक क्लस्टर के उत्कृष्ट विद्यालयों की पहचान करके निर्धारित मानकों के आधार पर पुरस्कृत करने का उल्लेख मिलता है।
इसका उद्देश्य विद्यालयों को बेहतर शैक्षिक परिणाम तथा बालिका शिक्षा के विकास के लिए प्रेरित करना था।
6. मॉडल क्लस्टर विद्यालयों की सुविधाओं का सारांश
| सुविधा | प्रमुख उद्देश्य |
|---|---|
| लकड़ी की चौकियाँ | बालिकाओं को बैठने एवं लिखने की सुविधा देना। |
| साइकिल एवं झूले | आत्मविश्वास, कौशल तथा विद्यालयी गतिविधियों के प्रति रुचि विकसित करना। |
| निःशुल्क यूनिफॉर्म | आर्थिक बाधाएँ कम करना तथा विद्यालयी उपस्थिति बढ़ाना। |
| पुस्तकालय | पठन कौशल एवं पढ़ने की रुचि विकसित करना। |
| निःशुल्क स्कूल बैग | बालिकाओं को आवश्यक विद्यालयी सुविधा प्रदान करना। |
| बहुउद्देशीय कक्षा-कक्ष | शैक्षिक गतिविधियों तथा आधारभूत सुविधाओं का विकास करना। |
| उपचारात्मक शिक्षण | कमजोर विषयों में बालिकाओं की अधिगम उपलब्धियाँ सुधारना। |
| विद्यालय पुरस्कार | विद्यालयों को बेहतर गुणवत्ता एवं सुविधाओं के विकास के लिए प्रोत्साहित करना। |
7. NPEGEL कार्यक्रम का शैक्षिक महत्त्व
NPEGEL कार्यक्रम बालिका शिक्षा में व्याप्त असमानताओं को दूर करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास था।
इसके माध्यम से शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग तथा अल्पसंख्यक समुदायों की बालिकाओं को अतिरिक्त शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने पर बल दिया गया।
कार्यक्रम में बालिकाओं के विद्यालयी नामांकन के साथ उनके ठहराव, अधिगम उपलब्धियों एवं शिक्षा की गुणवत्ता को भी महत्त्व दिया गया।
मॉडल क्लस्टर विद्यालयों के माध्यम से पुस्तकालय, यूनिफॉर्म, स्कूल बैग, साइकिल, अतिरिक्त कक्षा-कक्ष तथा उपचारात्मक शिक्षण जैसी सुविधाओं का विकास किया गया।
इसके अतिरिक्त विद्यालय छोड़ चुकी बालिकाओं को ग्रीष्मकालीन शिविरों तथा ब्रिज कैम्प के माध्यम से दोबारा शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया गया।
इस प्रकार NPEGEL का प्रमुख महत्त्व बालिकाओं के लिए समान शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराना, लैंगिक असमानता कम करना तथा गुणवत्तापूर्ण प्रारम्भिक शिक्षा के माध्यम से उनका सशक्तीकरण करना था।
समग्र निष्कर्ष
प्राथमिक स्तर पर बालिका शिक्षा हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPEGEL) जुलाई 2003 में सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत प्रारम्भ किया गया एक विशेष शैक्षिक कार्यक्रम था।
इसका मुख्य उद्देश्य कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा से वंचित तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों की बालिकाओं को शिक्षा के अतिरिक्त अवसर उपलब्ध कराना था।
इस कार्यक्रम में बालिकाओं के नामांकन एवं ठहराव को बढ़ाने, लैंगिक अंतर कम करने, उपचारात्मक शिक्षण प्रदान करने तथा विद्यालय छोड़ चुकी बालिकाओं को पुनः शिक्षा से जोड़ने पर बल दिया गया।
पुस्तक के अनुसार NPEGEL के 13 उद्देश्य, 3 प्रमुख क्षेत्र तथा 4 घटक बताए गए हैं।
इसके अन्तर्गत मॉडल क्लस्टर विद्यालयों का विकास करके बालिकाओं को लकड़ी की चौकियाँ, साइकिल, झूले, निःशुल्क यूनिफॉर्म, पुस्तकालय, स्कूल बैग, बहुउद्देशीय कक्षा-कक्ष, उपचारात्मक शिक्षण तथा पुरस्कार जैसी सुविधाएँ प्रदान की गईं।
इस प्रकार NPEGEL बालिकाओं की शिक्षा में समानता, नियमित उपस्थिति, शैक्षिक गुणवत्ता तथा सशक्तीकरण को बढ़ावा देने वाला एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम था।
- NPEGEL का पूरा नाम National Programme for Education of Girls at Elementary Level है।
- इसका हिन्दी नाम प्राथमिक स्तर पर बालिका शिक्षा हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम है।
- इस कार्यक्रम की शुरुआत जुलाई 2003 में हुई।
- NPEGEL को सर्व शिक्षा अभियान (SSA) के अन्तर्गत संचालित किया गया।
- इसका प्रमुख लक्षित वर्ग कक्षा 1 से 8 तक की वंचित एवं शैक्षिक रूप से पिछड़ी बालिकाएँ थीं।
- इसका मुख्य उद्देश्य लैंगिक असमानता कम करना, बालिकाओं का नामांकन एवं ठहराव बढ़ाना तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना था।
- पुस्तक में NPEGEL के 13 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
- प्रमुख उद्देश्यों में मॉडल क्लस्टर विद्यालयों का विकास, शत-प्रतिशत नामांकन, उपचारात्मक शिविर, कार्यानुभव शिक्षा, ओपन स्कूल तथा ब्रिज कैम्प शामिल थे।
- मॉडल क्लस्टर विद्यालय चयनित विद्यालय थे, जिन्हें बालिका शिक्षा के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराकर विकसित किया गया।
- पुस्तक में कार्यक्रम के 3 प्रमुख क्षेत्र बताए गए हैं।
- ये क्षेत्र थे—शैक्षिक रूप से पिछड़े विकास खण्ड, चयनित शहरी मलिन बस्तियाँ तथा कम महिला साक्षरता वाले अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्र।
- शैक्षिक रूप से पिछड़े विकास खण्डों की पहचान में कम महिला साक्षरता दर तथा अधिक लैंगिक साक्षरता अंतर महत्त्वपूर्ण मानदण्ड थे।
- पुस्तक में ऐसे विशेष क्षेत्रों का भी उल्लेख है जहाँ अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या कम से कम 5 प्रतिशत तथा सम्बन्धित महिलाओं की साक्षरता दर 10 प्रतिशत से कम थी।
- पुस्तक में NPEGEL के 4 प्रमुख घटक बताए गए हैं।
- इनमें मॉडल क्लस्टर विद्यालयों की स्थापना, वंचित बालिकाओं के क्षेत्रों को प्राथमिकता, क्लस्टर के सभी विद्यालयों तक सुविधाएँ पहुँचाना तथा मॉडल विद्यालयों का सुदृढ़ीकरण प्रमुख थे।
- पुस्तक के अनुसार वर्ष 2007–08 तक 7,245 विद्यालयों के सुदृढ़ीकरण का उल्लेख है।
- मॉडल क्लस्टर विद्यालयों में बालिकाओं के लिए 8 प्रमुख प्रकार की सुविधाएँ बताई गई हैं।
- वर्ष 2005–06 में पुस्तक के अनुसार 8,392 मॉडल क्लस्टर प्राथमिक विद्यालयों में लकड़ी की चौकियों की व्यवस्था का उल्लेख है।
- प्रथम चरण में प्रत्येक ब्लॉक स्तरीय क्लस्टर विद्यालय में 10 साइकिलें उपलब्ध कराने का उल्लेख है।
- प्रत्येक क्लस्टर विद्यालय में झूलों के चार सेट स्थापित किए गए।
- चयनित 680 विकास खण्डों एवं शहरी मलिन बस्तियों की बालिकाओं को निःशुल्क यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने का उल्लेख है।
- मॉडल क्लस्टर विद्यालयों में पुस्तकालयों के विकास के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया का सहयोग लिया गया।
- पूर्व माध्यमिक स्तर की बालिकाओं को दो वर्षों तक निःशुल्क स्कूल बैग उपलब्ध कराने का उल्लेख है।
- उपचारात्मक शिक्षण के माध्यम से गणित, अंग्रेजी तथा विज्ञान जैसे विषयों में कमजोर बालिकाओं की सहायता की गई।
- उत्कृष्ट मॉडल क्लस्टर विद्यालयों को निर्धारित मानकों के आधार पर पुरस्कृत करने की व्यवस्था भी थी।
- NPEGEL का मूल उद्देश्य बालिकाओं की प्रारम्भिक शिक्षा में समान अवसर, शैक्षिक गुणवत्ता एवं सशक्तीकरण सुनिश्चित करना था।
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स्कूल चलो अभियान—परिचय, उद्देश्य, प्रमुख गतिविधियाँ एवं उपलब्धियाँ
स्कूल चलो अभियान का परिचय
स्कूल चलो अभियान (School Chalo Abhiyan) बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने तथा प्रारम्भिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण करने के उद्देश्य से संचालित एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक जन-जागरूकता अभियान है।
इस अभियान का मुख्य उद्देश्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को विद्यालयों में प्रवेश दिलाना, उनका नियमित नामांकन सुनिश्चित करना तथा विद्यालय छोड़ने की समस्या को कम करना है।
पुस्तक के अनुसार जुलाई 1996 में कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को विद्यालयों के प्रति आकर्षित करने के लिए स्कूल चलो अभियान चलाया गया था।
उस समय अनेक बच्चे सामाजिक, आर्थिक तथा पारिवारिक परिस्थितियों के कारण विद्यालय नहीं जा पाते थे। विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों की शिक्षा को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता थी।
इसलिए अभियान के अन्तर्गत बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए अभिभावकों को प्रेरित करने तथा वंचित वर्गों के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति जैसी प्रोत्साहन सुविधाओं पर भी बल दिया गया।
स्कूल चलो अभियान को केवल सरकारी कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि जन-आन्दोलन के रूप में संचालित करने का प्रयास किया गया, जिससे समाज के सभी वर्ग शिक्षा के विकास में सहयोग कर सकें।
1. स्कूल चलो अभियान की पृष्ठभूमि एवं आवश्यकता
भारत में प्रारम्भिक शिक्षा के विकास के लिए अनेक योजनाएँ चलाई गईं। इनमें सर्व शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रम भी शामिल थे।
इन प्रयासों के बावजूद अनेक बच्चे विद्यालयों में नामांकित नहीं हो पा रहे थे। कुछ बच्चे विद्यालय में प्रवेश लेने के बाद भी बीच में पढ़ाई छोड़ देते थे।
इस समस्या को दूर करने के लिए समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा अभिभावकों को बच्चों के नामांकन के लिए प्रेरित करना आवश्यक था।
इसी उद्देश्य से स्कूल चलो अभियान के अन्तर्गत विद्यालय से बाहर बच्चों की पहचान, घर-घर सम्पर्क, अभिभावकों से बातचीत तथा जन-जागरूकता गतिविधियों को महत्त्व दिया गया।
विद्यालय से बाहर बच्चों की पहचान
इस अभियान में विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों को चिह्नित करने पर बल दिया गया जहाँ विद्यालय नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या अधिक थी।
इन क्षेत्रों में बच्चों के अभिभावकों से सम्पर्क करके उनका विद्यालयों में नामांकन कराने का प्रयास किया गया।
इसका उद्देश्य केवल बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिलाना नहीं था, बल्कि उन्हें नियमित रूप से विद्यालय आने तथा प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के लिए प्रेरित करना भी था।
2. वर्ष 2006 में स्कूल चलो अभियान का आयोजन
पुस्तक के अनुसार सर्व शिक्षा अभियान के विभिन्न प्रयासों के बाद भी अनेक बच्चे विद्यालयों से बाहर थे।
इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 जुलाई से 31 जुलाई 2006 तक विशेष स्कूल चलो अभियान संचालित करने का निर्णय लिया।
इस अभियान का मुख्य लक्ष्य विद्यालय न जाने वाले प्रत्येक बालक एवं बालिका को शिक्षा से जोड़ना था।
इसके अन्तर्गत विशेष रूप से निम्नलिखित कार्यों पर बल दिया गया—
- विद्यालय न जाने वाले बच्चों की पहचान करना।
- विद्यालयों में बच्चों का अधिकतम नामांकन कराना।
- अभिभावकों को शिक्षा के महत्त्व से परिचित कराना।
- बच्चों को नियमित विद्यालय आने के लिए प्रेरित करना।
- विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या न्यूनतम करना।
- समुदाय तथा जनप्रतिनिधियों को अभियान से जोड़ना।
इस प्रकार वर्ष 2006 का स्कूल चलो अभियान विद्यालयी नामांकन बढ़ाने तथा प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में लाने का एक विशेष प्रयास था।
3. स्कूल चलो अभियान की प्रमुख गतिविधियाँ
स्कूल चलो अभियान को प्रभावशाली ढंग से संचालित करने के लिए विभिन्न प्रशासनिक एवं स्थानीय स्तरों पर गतिविधियों की योजना बनाई गई।
पुस्तक के अनुसार इन गतिविधियों को मुख्य रूप से तीन स्तरों पर आयोजित किया गया—
- जनपद स्तर।
- ब्लॉक स्तर।
- ग्राम स्तर।
इन तीनों स्तरों पर निर्धारित समय के अनुसार बैठकें, जनसम्पर्क तथा जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने की व्यवस्था की गई।
4. जनपद स्तर पर प्रमुख गतिविधियाँ
जनपद स्तर पर स्कूल चलो अभियान के संचालन के लिए जिला शिक्षा से सम्बन्धित समितियों तथा जनप्रतिनिधियों की भागीदारी को महत्त्व दिया गया।
पुस्तक में जनपद स्तर की निम्नलिखित दो प्रमुख गतिविधियाँ बताई गई हैं।
1. जिला शिक्षा परियोजना समिति की बैठक
बच्चों के अधिकतम नामांकन के लिए आवश्यक रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से 20 जून को जिला शिक्षा परियोजना समिति की बैठक आयोजित करने की व्यवस्था की गई।
इस बैठक का मुख्य उद्देश्य यह तय करना था कि जिले के विद्यालयों में अधिक से अधिक बच्चों का नामांकन किस प्रकार कराया जाए।
इसके अन्तर्गत अभियान की कार्ययोजना तथा विभिन्न स्तरों पर किए जाने वाले कार्यों पर विचार किया गया।
2. जनप्रतिनिधियों से सम्पर्क
पुस्तक के अनुसार 22 से 25 जून के बीच जनपद के प्रमुख जनप्रतिनिधियों से सम्पर्क करने का कार्यक्रम निर्धारित किया गया।
इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित जनप्रतिनिधि सम्मिलित थे—
- जिला पंचायत अध्यक्ष।
- संसद सदस्य।
- विधायकगण।
- जिला पंचायत सदस्य।
इनसे बच्चों के नामांकन तथा शिक्षा के प्रचार-प्रसार में सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया गया।
इस प्रकार जनपद स्तर की गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य अभियान की योजना बनाना तथा जनप्रतिनिधियों के सहयोग से नामांकन कार्य को प्रभावशाली बनाना था।
5. ब्लॉक स्तर पर प्रमुख गतिविधियाँ
स्कूल चलो अभियान के अन्तर्गत ब्लॉक स्तर पर भी विशेष बैठकों तथा कार्ययोजना निर्माण की व्यवस्था की गई।
पुस्तक के अनुसार 22 से 25 जून के बीच ब्लॉक स्तर पर विशेष बैठकें आयोजित करने का कार्यक्रम निर्धारित था।
इन बैठकों में निम्नलिखित व्यक्तियों की सहभागिता पर बल दिया गया—
- ब्लॉक प्रमुख।
- क्षेत्र पंचायत सदस्य (BDC सदस्य)।
- ग्राम प्रधान।
इन बैठकों का उद्देश्य विद्यालय से बाहर बच्चों की पहचान तथा अधिकतम नामांकन के लिए स्थानीय स्तर पर कार्ययोजना तैयार करना था।
ब्लॉक स्तर पर तैयार कार्ययोजना के माध्यम से ग्राम स्तर पर होने वाली गतिविधियों को व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया।
इस प्रकार ब्लॉक स्तर की प्रमुख भूमिका स्थानीय जनप्रतिनिधियों के सहयोग से अभियान की योजना तैयार करना तथा नामांकन सम्बन्धी गतिविधियों में समन्वय स्थापित करना थी।
6. ग्राम स्तर पर प्रमुख गतिविधियाँ
स्कूल चलो अभियान में ग्राम स्तर की गतिविधियों को विशेष महत्त्व दिया गया, क्योंकि विद्यालय से बाहर बच्चों तथा उनके अभिभावकों से सीधा सम्पर्क इसी स्तर पर सम्भव होता है।
पुस्तक में ग्राम स्तर पर निम्नलिखित तीन प्रमुख गतिविधियाँ बताई गई हैं।
1. ग्राम शिक्षा समिति की बैठक एवं कार्ययोजना
पुस्तक के अनुसार 25 से 30 जून तक ग्राम शिक्षा समिति अथवा वार्ड शिक्षा समिति की बैठक आयोजित करने का कार्यक्रम निर्धारित किया गया।
इन बैठकों में विद्यालय से बाहर बच्चों के नामांकन के लिए आवश्यक कार्ययोजना तैयार की जाती थी।
इसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय समुदाय को अभियान से जोड़ना तथा गाँव के अधिक से अधिक बच्चों को विद्यालय भेजने के प्रयास करना था।
2. प्रभात फेरी का आयोजन
पुस्तक के अनुसार 1 से 2 जुलाई तक ग्राम स्तर पर प्रभात फेरी आयोजित करने का कार्यक्रम निर्धारित किया गया।
प्रभात फेरी का अर्थ है प्रातःकाल लोगों के समूह द्वारा किसी सामाजिक उद्देश्य के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए निकाली जाने वाली रैली।
स्कूल चलो अभियान में प्रभात फेरी के माध्यम से लोगों को शिक्षा के महत्त्व से परिचित कराने तथा अभिभावकों को बच्चों का विद्यालय में नामांकन कराने के लिए प्रेरित किया जाता था।
इसका उद्देश्य शिक्षा के प्रति समाज में सकारात्मक वातावरण विकसित करना था।
3. घर-घर जाकर सम्पर्क करना
पुस्तक के अनुसार 3 से 6 जुलाई तक घर-घर जाकर सम्पर्क करने की गतिविधि निर्धारित की गई।
इसके अन्तर्गत विद्यालय न जाने वाले बच्चों के अभिभावकों से बातचीत करके उन्हें शिक्षा के महत्त्व के प्रति जागरूक किया जाता था।
अभिभावकों को अपने बच्चों का विद्यालय में नामांकन कराने तथा उन्हें नियमित रूप से विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित किया जाता था।
इस प्रकार घर-घर सम्पर्क अभियान का महत्त्वपूर्ण भाग था, क्योंकि इससे शिक्षा से वंचित बच्चों की पहचान तथा उनके नामांकन के लिए प्रत्यक्ष प्रयास किए जा सकते थे।
7. स्कूल चलो अभियान की गतिविधियों की समय-सारणी
पुस्तक में वर्ष 2006 के स्कूल चलो अभियान के लिए निम्नलिखित समय-सारणी दी गई है।
| स्तर | प्रमुख गतिविधि | निर्धारित समय |
|---|---|---|
| जनपद स्तर | नामांकन रणनीति के लिए जिला शिक्षा परियोजना समिति की बैठक। | 20 जून |
| जनपद स्तर | जनप्रतिनिधियों से नामांकन हेतु सहयोग प्राप्त करने के लिए सम्पर्क। | 22–25 जून |
| ब्लॉक स्तर | ब्लॉक प्रमुख, BDC सदस्यों तथा ग्राम प्रधानों की बैठक एवं कार्ययोजना। | 22–25 जून |
| ग्राम स्तर | ग्राम शिक्षा समिति या वार्ड शिक्षा समिति की बैठक एवं कार्ययोजना। | 25–30 जून |
| ग्राम स्तर | प्रभात फेरी का आयोजन। | 1–2 जुलाई |
| ग्राम स्तर | घर-घर जाकर अभिभावकों से सम्पर्क। | 3–6 जुलाई |
महत्त्वपूर्ण तथ्य— पुस्तक के अनुसार वर्ष 2006 में स्कूल चलो अभियान की मुख्य अवधि 1 जुलाई से 31 जुलाई थी, जबकि इसकी तैयारी सम्बन्धी गतिविधियाँ जून में प्रारम्भ की गई थीं।
8. स्कूल चलो अभियान के उद्देश्य
स्कूल चलो अभियान का प्रमुख उद्देश्य सभी बच्चों को विद्यालयी शिक्षा से जोड़ना तथा प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण में सहयोग प्रदान करना था।
पुस्तक में इसके 7 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
1. विद्यालय न जाने वाले बच्चों को शिक्षा से जोड़ना
स्कूल चलो अभियान का प्रथम उद्देश्य पढ़ाई में अरुचि रखने वाले तथा विद्यालय न जाने वाले बच्चों को विद्यालय तक पहुँचाना था।
इसके लिए बच्चों तथा उनके अभिभावकों को शिक्षा का महत्त्व समझाकर विद्यालय में नामांकन कराने के लिए प्रेरित किया गया।
इसका उद्देश्य ऐसे बच्चों को भी शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना था जो विभिन्न कारणों से विद्यालयी शिक्षा से दूर थे।
2. शिक्षा की असमानता एवं ह्रास को रोकना
स्कूल चलो अभियान का दूसरा उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों के बच्चों के बीच शैक्षिक असमानता को कम करना था।
इसके अतिरिक्त शिक्षा के प्रति रुचि तथा विद्यालयी सहभागिता में होने वाली कमी को रोकने पर भी बल दिया गया।
इस प्रकार अभियान में सभी बच्चों के लिए समान शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराने को महत्त्व दिया गया।
3. बालिकाओं के नामांकन में वृद्धि करना
स्कूल चलो अभियान में बालिका शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया गया।
इसका उद्देश्य अधिक से अधिक बालिकाओं का विद्यालयों में नामांकन कराना तथा उनके अभिभावकों को बालिका शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना था।
विशेष रूप से सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ने के प्रयास किए गए।
4. विद्यालय छोड़ने की समस्या कम करना
इस अभियान का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य विद्यालयों में बच्चों की ड्रॉपआउट दर (Dropout Rate) को न्यूनतम करना था।
ड्रॉपआउट का अर्थ है किसी विद्यार्थी द्वारा अपनी शिक्षा पूरी किए बिना बीच में विद्यालय छोड़ देना।
अभियान में बच्चों के नामांकन के साथ उन्हें विद्यालय में बनाए रखने तथा उनकी शिक्षा में निरन्तरता सुनिश्चित करने पर बल दिया गया।
5. सभी 6–14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा से जोड़ना
स्कूल चलो अभियान का प्रमुख उद्देश्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा से जोड़ना था।
इसमें कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा को महत्त्व दिया गया।
इसका उद्देश्य किसी भी बच्चे को सामाजिक, आर्थिक अथवा अन्य परिस्थितियों के कारण प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित नहीं रहने देना था।
6. केन्द्र एवं राज्य सरकार के सहयोग से शैक्षिक प्रयास करना
स्कूल चलो अभियान में प्रारम्भिक शिक्षा के विकास के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं तथा प्रयासों को महत्त्व दिया गया।
पुस्तक में सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत केन्द्र सरकार द्वारा 75 प्रतिशत तथा राज्य सरकार द्वारा 25 प्रतिशत वित्तीय योगदान की ऐतिहासिक व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
इसका उद्देश्य प्रारम्भिक शिक्षा की सुविधाओं के विकास में केन्द्र और राज्य सरकारों के सहयोग को स्पष्ट करना था।
ध्यान दें— 75:25 का यह अनुपात सर्व शिक्षा अभियान की तत्कालीन वित्तीय व्यवस्था से सम्बन्धित है। इसे स्कूल चलो अभियान का अलग बजट अथवा वर्तमान वित्तीय अनुपात नहीं समझना चाहिए।
7. सर्व शिक्षा अभियान का व्यापक प्रचार-प्रसार करना
स्कूल चलो अभियान का एक उद्देश्य सर्व शिक्षा अभियान के शैक्षिक लक्ष्यों तथा सुविधाओं की जानकारी जन-जन तक पहुँचाना था।
इसके लिए जनसम्पर्क, प्रभात फेरी, स्थानीय बैठकों तथा अन्य जागरूकता गतिविधियों को महत्त्व दिया गया।
इसका उद्देश्य समाज के अधिक से अधिक लोगों को शिक्षा के विकास से जोड़ना तथा अभिभावकों को बच्चों की पढ़ाई के प्रति जागरूक बनाना था।
9. स्कूल चलो अभियान की प्रमुख उपलब्धियाँ
स्कूल चलो अभियान के माध्यम से विद्यालयी नामांकन बढ़ाने तथा शिक्षा के प्रति जन-जागरूकता विकसित करने के प्रयास किए गए।
पुस्तक में इसकी निम्नलिखित 3 प्रमुख उपलब्धियाँ बताई गई हैं।
1. ग्राम स्तर पर प्राथमिक शिक्षा का विस्तार
पुस्तक के अनुसार स्कूल चलो अभियान के माध्यम से ग्राम स्तर पर प्राथमिक शिक्षा के विकास में महत्त्वपूर्ण प्रयास किए गए।
पुस्तक में वर्ष 2004 के सन्दर्भ में अनेक गाँवों को शैक्षिक प्रयासों से जोड़ने तथा प्राथमिक शिक्षा के केन्द्र खोले जाने का उल्लेख है।
इससे ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा की सुविधाओं का विस्तार करने का प्रयास किया गया।
2. बच्चों के नामांकन में वृद्धि
स्कूल चलो अभियान के माध्यम से अभिभावकों तथा समुदाय में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया गया।
पुस्तक के अनुसार इसके परिणामस्वरूप बच्चों के विद्यालयी नामांकन में वृद्धि होने लगी।
अभिभावकों को शिक्षा का महत्त्व समझ में आने के कारण वे अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए अधिक प्रेरित हुए।
3. बालिकाओं के नामांकन में वृद्धि
स्कूल चलो अभियान के अन्तर्गत बालिका शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन दिया गया।
पुस्तक के अनुसार अभियान के माध्यम से विद्यालयों में बालिकाओं के नामांकन में तेजी आई।
इससे बालिकाओं को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ने तथा शैक्षिक असमानता कम करने के प्रयासों को सहायता मिली।
ध्यान दें— ये उपलब्धियाँ मूल पुस्तक के विवरण पर आधारित हैं। पुस्तक में नामांकन वृद्धि के लिए कोई निश्चित प्रतिशत या कुल संख्या नहीं दी गई है।
10. स्कूल चलो अभियान का शैक्षिक महत्त्व
स्कूल चलो अभियान प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण जन-जागरूकता प्रयास है।
इस अभियान में विद्यालयों की स्थापना अथवा सुविधाओं के विकास के साथ समाज में शिक्षा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने को भी महत्त्व दिया गया।
इसके माध्यम से विद्यालय न जाने वाले बच्चों की पहचान, अभिभावकों से सम्पर्क तथा बच्चों का नामांकन बढ़ाने के प्रयास किए गए।
विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक समुदाय तथा बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहन दिया गया।
इस अभियान में जिला शिक्षा परियोजना समितियों, ब्लॉक स्तर के जनप्रतिनिधियों तथा ग्राम शिक्षा समितियों के सहयोग से शैक्षिक गतिविधियाँ संचालित करने पर बल दिया गया।
इस प्रकार स्कूल चलो अभियान का प्रमुख शैक्षिक महत्त्व सभी बच्चों को विद्यालयों से जोड़ना, बालिका शिक्षा का विकास करना, विद्यालय छोड़ने की समस्या कम करना तथा सामुदायिक सहभागिता से प्रारम्भिक शिक्षा का प्रसार करना था।
समग्र निष्कर्ष
स्कूल चलो अभियान बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने तथा प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के उद्देश्य से संचालित एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक जन-जागरूकता अभियान है।
पुस्तक के अनुसार जुलाई 1996 में कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को विद्यालयों के प्रति आकर्षित करने के लिए यह अभियान चलाया गया था।
इसके बाद पुस्तक में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1 से 31 जुलाई 2006 तक विशेष स्कूल चलो अभियान चलाने का उल्लेख किया गया है।
इस अभियान की प्रमुख गतिविधियाँ जनपद, ब्लॉक तथा ग्राम स्तर पर आयोजित की गईं। इनके अन्तर्गत बैठकें, कार्ययोजना निर्माण, जनप्रतिनिधियों से सम्पर्क, प्रभात फेरी तथा घर-घर जाकर अभिभावकों को जागरूक करने जैसे कार्य शामिल थे।
पुस्तक के अनुसार इसके 7 प्रमुख उद्देश्य तथा 3 उपलब्धियाँ बताई गई हैं।
इस अभियान का मुख्य उद्देश्य विद्यालय न जाने वाले बच्चों को शिक्षा से जोड़ना, बालिकाओं का नामांकन बढ़ाना तथा विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या कम करना था।
इस प्रकार स्कूल चलो अभियान ने जन-सहभागिता और शिक्षा के प्रति जागरूकता के माध्यम से सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास किया।
- स्कूल चलो अभियान (School Chalo Abhiyan) बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने वाला शैक्षिक जन-जागरूकता अभियान है।
- इसका मुख्य उद्देश्य विद्यालयी नामांकन बढ़ाना तथा प्रारम्भिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण करना है।
- अभियान का प्रमुख लक्षित आयु वर्ग 6 से 14 वर्ष तथा कक्षाएँ 1 से 8 हैं।
- मूल पुस्तक में इस अभियान की शुरुआत जुलाई 1996 बताई गई है। इसके प्रथम प्रारम्भ-वर्ष को लेकर स्वतंत्र स्रोतों में मतभेद हैं।
- पुस्तक के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 जुलाई से 31 जुलाई 2006 तक विशेष स्कूल चलो अभियान संचालित करने का निर्णय लिया।
- अभियान को केवल सरकारी कार्यक्रम न मानकर जन-आन्दोलन के रूप में संचालित करने पर बल दिया गया।
- अभियान की प्रमुख गतिविधियाँ 3 स्तरों—जनपद, ब्लॉक तथा ग्राम स्तर पर आयोजित की गईं।
- 20 जून— जिला शिक्षा परियोजना समिति की बैठक एवं नामांकन रणनीति तैयार करना।
- 22–25 जून— जनपद के जनप्रतिनिधियों से सम्पर्क तथा ब्लॉक स्तर पर विशेष बैठकें।
- 25–30 जून— ग्राम शिक्षा समिति अथवा वार्ड शिक्षा समिति की बैठक एवं कार्ययोजना।
- 1–2 जुलाई— ग्राम स्तर पर प्रभात फेरी का आयोजन।
- 3–6 जुलाई— घर-घर जाकर अभिभावकों से सम्पर्क करना।
- पुस्तक में स्कूल चलो अभियान के 7 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
- प्रमुख उद्देश्य थे—विद्यालय न जाने वाले बच्चों को शिक्षा से जोड़ना, शैक्षिक असमानता कम करना तथा बालिकाओं के नामांकन में वृद्धि करना।
- विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या न्यूनतम करना भी अभियान का प्रमुख उद्देश्य था।
- अभियान में 6–14 वर्ष के सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा से जोड़ने पर बल दिया गया।
- पुस्तक में सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत केन्द्र एवं राज्य सरकारों के 75:25 ऐतिहासिक वित्तीय अनुपात का उल्लेख है।
- सर्व शिक्षा अभियान के उद्देश्यों का व्यापक प्रचार-प्रसार करना भी स्कूल चलो अभियान का उद्देश्य था।
- पुस्तक में स्कूल चलो अभियान की 3 प्रमुख उपलब्धियाँ बताई गई हैं।
- ये उपलब्धियाँ थीं—ग्राम स्तर पर प्राथमिक शिक्षा का विस्तार, बच्चों के नामांकन में वृद्धि तथा बालिकाओं के नामांकन में वृद्धि।
- अभियान में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक समुदाय तथा शैक्षिक रूप से वंचित बच्चों की शिक्षा को महत्त्व दिया गया।
- सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य— स्कूल चलो अभियान का मूल उद्देश्य सभी बच्चों को विद्यालय से जोड़ना तथा जन-सहभागिता के माध्यम से प्रारम्भिक शिक्षा का प्रसार करना है।
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना (KGBV)—परिचय, उद्देश्य, कार्यक्षेत्र एवं संचालन करने वाली संस्थाएँ
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना का परिचय
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना (Kasturba Gandhi Balika Vidyalaya—KGBV) भारत सरकार द्वारा बालिकाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए प्रारम्भ की गई एक महत्त्वपूर्ण आवासीय विद्यालय योजना है।
इस योजना की शुरुआत जुलाई 2004 में की गई थी। इसका प्रमुख उद्देश्य शैक्षिक रूप से पिछड़े तथा दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाली ऐसी बालिकाओं को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना था, जो सामाजिक, आर्थिक अथवा भौगोलिक कारणों से नियमित विद्यालयों में नहीं जा पा रही थीं।
इस योजना के अन्तर्गत विशेष रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अल्पसंख्यक समुदाय तथा गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों की बालिकाओं को प्राथमिकता दी गई।
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों की प्रमुख विशेषता यह है कि ये आवासीय विद्यालय (Residential Schools) हैं।
आवासीय विद्यालय का अर्थ है ऐसा विद्यालय जहाँ विद्यार्थियों के लिए शिक्षा के साथ रहने की व्यवस्था भी उपलब्ध हो।
इससे दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाली तथा विद्यालय तक नियमित रूप से नहीं पहुँच पाने वाली बालिकाओं को अपनी शिक्षा जारी रखने में सहायता मिलती है।
योजना का मुख्य उद्देश्य वंचित वर्गों की बालिकाओं को आवासीय विद्यालयों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना तथा बालिका शिक्षा में व्याप्त सामाजिक एवं लैंगिक असमानताओं को कम करना था।
1. कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना की पृष्ठभूमि
भारत में बालिका शिक्षा के विकास के लिए समय-समय पर अनेक शैक्षिक नीतियाँ एवं कार्यक्रम लागू किए गए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में भी स्त्री शिक्षा के विकास एवं विस्तार पर विशेष बल दिया गया था।
इन नीतियों के बाद बालिकाओं की शिक्षा में सुधार के प्रयास किए गए, लेकिन ग्रामीण तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में अनेक बालिकाएँ विद्यालयी शिक्षा से वंचित थीं।
इसके प्रमुख कारणों में गरीबी, विद्यालयों की दूरी, परिवहन सुविधाओं का अभाव तथा सामाजिक एवं पारिवारिक परिस्थितियाँ शामिल थीं।
विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग एवं अल्पसंख्यक समुदायों की बालिकाओं के लिए शिक्षा के अतिरिक्त अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता थी।
इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने जुलाई 2004 में कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना प्रारम्भ की।
इस योजना में बालिकाओं को आवासीय विद्यालयों के माध्यम से शिक्षा उपलब्ध कराने पर बल दिया गया, जिससे विद्यालय की दूरी तथा रहने की समस्या उनकी पढ़ाई में बाधा न बन सके।
योजना के प्रमुख ऐतिहासिक तथ्य
| विवरण | महत्त्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|
| पूरा नाम | कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय (KGBV)। |
| प्रारम्भ | जुलाई 2004। |
| प्रारम्भिक स्वरूप | बालिकाओं के लिए आवासीय उच्च प्राथमिक विद्यालय। |
| लक्षित वर्ग | SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक तथा गरीब परिवारों की वंचित बालिकाएँ। |
| प्रमुख कार्यक्षेत्र | शैक्षिक रूप से पिछड़े एवं दुर्गम क्षेत्र। |
| सर्व शिक्षा अभियान में विलय | 1 अप्रैल 2007। |
| प्रारम्भिक आरक्षण व्यवस्था | 75% स्थान वंचित समुदायों की बालिकाओं के लिए तथा शेष 25% में गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की बालिकाओं को प्राथमिकता। |
2. कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना का विकास
योजना के प्रारम्भिक चरण में शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में 750 आवासीय विद्यालयों की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया था।
इन विद्यालयों का उद्देश्य विशेष रूप से ऐसी बालिकाओं को शिक्षा उपलब्ध कराना था जो दूरस्थ क्षेत्रों में रहने अथवा सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों के कारण विद्यालय नहीं जा पाती थीं।
पुस्तक में बाद के एक ऐतिहासिक चरण में 2,180 विद्यालयों की स्थापना का उल्लेख किया गया है।
इसके अतिरिक्त पुस्तक के अनुसार वर्ष 2014–15 तक लगभग 3,600 विद्यालयों को स्वीकृति प्रदान की जा चुकी थी तथा लगभग 3,590 विद्यालय खोले जा चुके थे।
इन आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि योजना के अन्तर्गत समय के साथ आवासीय विद्यालयों के विस्तार पर बल दिया गया।
ध्यान दें— उपर्युक्त विद्यालयों की संख्याएँ मूल पुस्तक में दिए गए ऐतिहासिक विवरण पर आधारित हैं। इन्हें वर्तमान समय में संचालित विद्यालयों की संख्या नहीं समझना चाहिए।
3. सर्व शिक्षा अभियान से सम्बन्ध
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना प्रारम्भ में एक अलग शैक्षिक योजना के रूप में संचालित की गई थी।
इसका उद्देश्य विशेष रूप से शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों की वंचित बालिकाओं को आवासीय विद्यालयों के माध्यम से शिक्षा उपलब्ध कराना था।
इसके बाद 1 अप्रैल 2007 से इसे सर्व शिक्षा अभियान (SSA) में सम्मिलित कर दिया गया।
इससे बालिका शिक्षा, विद्यालयी सुविधाओं तथा प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण से सम्बन्धित प्रयासों में बेहतर समन्वय स्थापित करने का अवसर मिला।
इस प्रकार कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना और सर्व शिक्षा अभियान का प्रमुख साझा उद्देश्य सभी बच्चों, विशेष रूप से वंचित बालिकाओं को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराना था।
4. कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना के उद्देश्य
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना का मुख्य उद्देश्य वंचित वर्गों की बालिकाओं को सुरक्षित आवासीय वातावरण में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना था।
पुस्तक में इस योजना के 5 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
1. वंचित बालिकाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना
इस योजना का प्रथम उद्देश्य विशेष परिस्थितियों में जीवनयापन करने वाली तथा शिक्षा से वंचित बालिकाओं को आवासीय विद्यालयों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना था।
अनेक बालिकाएँ विद्यालय की दूरी, आर्थिक कठिनाइयों तथा अन्य समस्याओं के कारण शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाती थीं।
आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था करके ऐसी बालिकाओं को अपनी पढ़ाई जारी रखने के अवसर प्रदान किए गए।
2. माता-पिता एवं अभिभावकों को प्रोत्साहित करना
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना का दूसरा उद्देश्य माता-पिता तथा अभिभावकों को बालिकाओं की शिक्षा के प्रति जागरूक एवं प्रोत्साहित करना था।
इसका उद्देश्य अभिभावकों को अपनी बेटियों को आवासीय विद्यालयों में भेजने के लिए प्रेरित करना था।
अभिभावकों की सहमति तथा सहयोग मिलने से विद्यालय से बाहर बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ना अधिक सरल हो सकता है।
3. विद्यालय से बाहर 10 वर्ष से अधिक आयु की बालिकाओं पर विशेष ध्यान
इस योजना में मुख्य रूप से ऐसी बालिकाओं को प्राथमिकता दी गई जो 10 वर्ष से अधिक आयु की थीं तथा विद्यालय में नामांकित नहीं थीं।
इसमें वे बालिकाएँ भी सम्मिलित थीं जो पहले विद्यालय जाती थीं, लेकिन किसी कारण से अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं कर सकीं।
ऐसी बालिकाओं को आवासीय विद्यालयों के माध्यम से पुनः शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया गया।
इसका उद्देश्य विद्यालय छोड़ चुकी बालिकाओं को उनकी शिक्षा पूरी करने के अवसर प्रदान करना था।
4. एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने वाले समुदायों की बालिकाओं की शिक्षा
इस योजना में ऐसे समुदायों की बालिकाओं पर भी विशेष ध्यान दिया गया जो रोजगार अथवा अन्य कारणों से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं।
ऐसे समुदायों को प्रवासी अथवा घुमन्तू समुदाय कहा जा सकता है।
नियमित निवास स्थान के अभाव तथा विद्यालयों की दूरी के कारण इन समुदायों की बालिकाओं को शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाइयाँ होती थीं।
इसलिए योजना में दूरस्थ तथा बिखरी हुई बस्तियों की बालिकाओं के लिए आवासीय शिक्षा की व्यवस्था को महत्त्व दिया गया।
5. वंचित एवं गरीब परिवारों की बालिकाओं को प्राथमिकता देना
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की बालिकाओं के लिए विशेष स्थान निर्धारित किए गए।
पुस्तक के अनुसार इसकी प्रारम्भिक व्यवस्था निम्नलिखित थी—
- 75 प्रतिशत स्थान— अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक समुदायों की बालिकाओं के लिए।
- शेष 25 प्रतिशत स्थान— गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों की बालिकाओं को प्राथमिकता के आधार पर।
इस व्यवस्था का उद्देश्य उन बालिकाओं को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना था जिन्हें सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियों के कारण शिक्षा प्राप्त करने में अधिक कठिनाइयाँ होती थीं।
5. कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना का कार्यक्षेत्र
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना मुख्य रूप से ऐसे क्षेत्रों में लागू की गई जहाँ बालिकाओं की शिक्षा की स्थिति कमजोर थी तथा आवासीय विद्यालयों की आवश्यकता थी।
पुस्तक के अनुसार इन विद्यालयों की स्थापना विशेष रूप से शैक्षिक रूप से पिछड़े विकास खण्डों में करने का प्रावधान था।
इन क्षेत्रों की पहचान के लिए वर्ष 2001 की जनगणना के महिला साक्षरता तथा लैंगिक साक्षरता अंतर सम्बन्धी आँकड़ों का उपयोग किया गया।
शैक्षिक रूप से पिछड़े विकास खण्ड का अर्थ
शैक्षिक रूप से पिछड़ा विकास खण्ड (Educationally Backward Block—EBB) ऐसा क्षेत्र है जहाँ महिला साक्षरता की स्थिति राष्ट्रीय औसत से कमजोर हो तथा पुरुषों और महिलाओं के बीच साक्षरता का अंतर अधिक हो।
योजना के ऐतिहासिक सरकारी मानदण्ड के अनुसार वर्ष 2001 की जनगणना में राष्ट्रीय ग्रामीण महिला साक्षरता दर 46.13% तथा लैंगिक साक्षरता अंतर 21.59% को आधार माना गया था।
स्रोत सम्बन्धी स्पष्टता— मूल पुस्तक में ये आँकड़े क्रमशः 46.58% तथा 21.70% लिखे हैं। यहाँ सरकारी योजना-दिशानिर्देशों में दिए गए आँकड़ों का उपयोग किया गया है।
पुस्तक में इस योजना के 5 प्रमुख कार्यक्षेत्र बताए गए हैं।
1. वंचित समुदायों की बालिकाओं के कम नामांकन वाले क्षेत्र
ऐसे क्षेत्र जहाँ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग तथा अल्पसंख्यक समुदायों की बालिकाएँ विद्यालयों में प्रवेश नहीं ले पा रही थीं।
इन क्षेत्रों में कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों की स्थापना करके बालिकाओं को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने पर बल दिया गया।
इसका उद्देश्य सामाजिक रूप से वंचित समुदायों की बालिकाओं के नामांकन में वृद्धि करना था।
2. कम महिला साक्षरता वाले क्षेत्र
ऐसे क्षेत्रों में कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय स्थापित किए गए जहाँ महिलाओं की साक्षरता दर अपेक्षाकृत कम थी।
इन क्षेत्रों में बालिका शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन देने की आवश्यकता थी।
आवासीय विद्यालयों के माध्यम से बालिकाओं को शिक्षा के अधिक अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।
3. परिवहन सुविधाओं से वंचित क्षेत्र
ऐसे क्षेत्र जहाँ बालिकाओं को विद्यालय तक आने-जाने के लिए उचित परिवहन सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं।
कुछ बालिकाओं को विद्यालय जाने के लिए अधिक दूरी तय करनी पड़ती थी। परिवहन के साधनों की कमी के कारण वे नियमित रूप से विद्यालय नहीं जा पाती थीं।
ऐसी परिस्थितियों में आवासीय विद्यालय बालिकाओं को विद्यालय के निकट रहने तथा नियमित रूप से शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करते थे।
4. बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालयों का अभाव
ऐसे क्षेत्रों में कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों की स्थापना की गई जहाँ बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था नहीं थी।
इसका उद्देश्य दूरस्थ स्थानों में रहने वाली बालिकाओं को आवश्यक आवासीय एवं शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना था।
इससे विद्यालय की दूरी तथा रहने की समस्या के कारण शिक्षा से वंचित होने वाली बालिकाओं को सहायता मिल सकती थी।
5. वंचित एवं गरीब वर्गों की बालिकाओं के लिए स्थान निर्धारित करना
योजना के अन्तर्गत चयनित क्षेत्रों में विद्यालयों के स्थान सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित बालिकाओं को प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराए गए।
इसके अन्तर्गत—
- 75% स्थान अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग एवं अल्पसंख्यक समुदायों की बालिकाओं के लिए निर्धारित किए गए।
- 25% स्थानों पर गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों की बालिकाओं को प्राथमिकता दी गई।
इस प्रकार योजना का मुख्य कार्यक्षेत्र उन बालिकाओं की शिक्षा से सम्बन्धित था जिन्हें सामान्य विद्यालयी व्यवस्था का लाभ प्राप्त करने में कठिनाइयाँ होती थीं।
6. कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय के स्थान का चयन
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों की स्थापना के लिए ऐसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई जहाँ बालिकाओं की शिक्षा की स्थिति कमजोर थी।
पुस्तक के अनुसार विद्यालय के स्थान का चयन करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाता था—
- क्षेत्र में महिला साक्षरता की स्थिति।
- बालिकाओं के विद्यालयी नामांकन की स्थिति।
- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य वंचित समुदायों की आबादी।
- विद्यालय से बाहर बालिकाओं की संख्या।
- परिवहन तथा आवासीय विद्यालयों की उपलब्धता।
- दूर-दूर स्थित छोटी तथा बिखरी हुई बस्तियाँ।
- विद्यालय के लिए उपयुक्त स्थान एवं पर्याप्त भूमि की उपलब्धता।
यदि किसी क्षेत्र में एक से अधिक स्थानों पर विद्यालय स्थापित करने की सम्भावना होती थी, तो बालिकाओं की संख्या तथा आवश्यक भूमि की उपलब्धता को ध्यान में रखकर उपयुक्त स्थान का चयन किया जाता था।
इस प्रकार विद्यालय स्थापना का उद्देश्य अधिकतम आवश्यकता वाले क्षेत्रों की अधिक से अधिक बालिकाओं को आवासीय शिक्षा उपलब्ध कराना था।
7. कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना की वित्तीय व्यवस्था
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना के संचालन के लिए केन्द्र तथा राज्य सरकारों की संयुक्त वित्तीय सहभागिता की व्यवस्था की गई।
पुस्तक में इस योजना के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों के बीच 50:50 के अनुपात में व्यय करने का उल्लेख है।
ऐतिहासिक स्पष्टता— भारत सरकार की मूल योजना के अनुसार दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान केन्द्र तथा राज्यों के बीच वित्तीय अनुपात 75:25 निर्धारित किया गया था और उसके बाद 50:50 की व्यवस्था प्रस्तावित थी।
इसलिए 50:50 को योजना के सभी वर्षों में लागू एकमात्र वित्तीय अनुपात नहीं समझना चाहिए।
इसके अतिरिक्त केन्द्र शासित प्रदेशों में योजना के वित्तीय उत्तरदायित्व के लिए केन्द्र सरकार की व्यवस्था का उल्लेख पुस्तक में किया गया है।
8. कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों को संचालित करने वाली संस्थाएँ
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों के सफल संचालन के लिए विभिन्न सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाओं की सहभागिता को महत्त्व दिया गया।
इन संस्थाओं का उद्देश्य विद्यालयों के संचालन, बालिकाओं की शिक्षा, आवश्यक संसाधनों तथा निगरानी की व्यवस्था में सहयोग प्रदान करना था।
पुस्तक में निम्नलिखित 3 प्रमुख संस्थाओं का उल्लेख किया गया है।
1. जिला स्तरीय समिति एवं DIET
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों के संचालन तथा पर्यवेक्षण में जिला स्तरीय समिति को महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व प्रदान किया गया।
इस व्यवस्था में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) का भी उल्लेख किया गया है।
DIET का प्रमुख सम्बन्ध शिक्षक प्रशिक्षण तथा शैक्षिक सहायता से है।
इस प्रकार जिला स्तरीय समिति तथा सम्बन्धित शैक्षिक संस्थाएँ विद्यालयों के प्रभावशाली संचालन और निगरानी में सहयोग प्रदान करती थीं।
2. गैर-सरकारी संगठन (NGO)
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों के संचालन में गैर-सरकारी संगठनों (Non-Governmental Organisations—NGO) की सहायता भी ली जा सकती थी।
इन संगठनों का प्रमुख योगदान बालिका शिक्षा के प्रति जागरूकता, वंचित समुदायों तक पहुँच तथा विद्यालयी गतिविधियों में सहयोग प्रदान करना था।
इससे समाज के विभिन्न वर्गों की सहभागिता बढ़ाने तथा बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ने के प्रयासों को सहायता मिलती थी।
3. महिला समाख्या
महिला समाख्या (Mahila Samakhya) महिलाओं की शिक्षा, जागरूकता एवं सशक्तीकरण से सम्बन्धित कार्यक्रम था।
इस कार्यक्रम के माध्यम से महिलाओं तथा बालिकाओं की शैक्षिक आवश्यकताओं को समझने तथा उनके विकास में सहयोग प्रदान करने पर बल दिया गया।
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों के संचालन में महिला समाख्या की सहभागिता का उद्देश्य बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करना तथा सामाजिक बाधाओं को कम करना था।
इस प्रकार पुस्तक के अनुसार कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों के संचालन में जिला स्तरीय समिति, गैर-सरकारी संगठन तथा महिला समाख्या प्रमुख संस्थाएँ थीं।
9. कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय की जिला स्तरीय समिति
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों के संचालन एवं पर्यवेक्षण के लिए जिला स्तर पर एक समिति का गठन किया गया।
इस समिति में प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षा विभाग के प्रतिनिधि, शिक्षक तथा सामाजिक संगठनों से सम्बन्धित व्यक्तियों को सम्मिलित किया गया।
पुस्तक में जिला स्तरीय समिति की निम्नलिखित 10 सदस्य श्रेणियों का उल्लेख किया गया है।
| क्रम | समिति के सदस्य | पद |
|---|---|---|
| 1. | जिलाधिकारी (DM) | अध्यक्ष |
| 2. | मुख्य विकास अधिकारी (CDO) | उपाध्यक्ष |
| 3. | प्राचार्य, DIET | सदस्य |
| 4. | बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) | सदस्य सचिव |
| 5. | जिला कार्यक्रम अधिकारी (DPO) | सदस्य |
| 6. | प्रधानाचार्य, राजकीय बालिका इंटर कॉलेज (GGIC) | सदस्य |
| 7. | जिला समन्वयक (DC) | सदस्य |
| 8. | जिलाधिकारी द्वारा नामित दो राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अध्यापक | सदस्य |
| 9. | जिलाधिकारी द्वारा नामित दो स्वैच्छिक संस्थाओं के प्रतिनिधि | सदस्य |
| 10. | महिला समाख्या कार्यक्रम वाले जनपदों में महिला समाख्या का प्रतिनिधि | सदस्य |
परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण— पुस्तक के अनुसार जिला स्तरीय समिति के अध्यक्ष जिलाधिकारी (DM), उपाध्यक्ष मुख्य विकास अधिकारी (CDO) तथा सदस्य सचिव बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) होते थे।
यह तालिका पुस्तक में वर्णित ऐतिहासिक जिला स्तरीय समिति की संरचना पर आधारित है।
10. जिला स्तरीय समिति की भूमिका
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों के संचालन तथा पर्यवेक्षण के लिए जिला स्तरीय समिति महत्त्वपूर्ण थी।
पुस्तक में समिति की संरचना तथा संचालन एवं निगरानी के उत्तरदायित्व का उल्लेख किया गया है।
इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य विभिन्न प्रशासनिक एवं शैक्षिक संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करना तथा विद्यालयों के संचालन को प्रभावशाली बनाना था।
इसमें सरकारी अधिकारियों के साथ शिक्षकों, स्वैच्छिक संगठनों तथा महिला समाख्या के प्रतिनिधियों की सहभागिता को भी महत्त्व दिया गया।
इस प्रकार जिला स्तरीय समिति विद्यालयों के संचालन, प्रशासनिक समन्वय तथा पर्यवेक्षण से सम्बन्धित थी।
11. कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना का शैक्षिक महत्त्व
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना बालिका शिक्षा के विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।
इस योजना के माध्यम से उन बालिकाओं को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान किए गए जो सामाजिक, आर्थिक तथा भौगोलिक कठिनाइयों के कारण नियमित विद्यालयों में नहीं जा पाती थीं।
आवासीय विद्यालयों की स्थापना से दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाली बालिकाओं को विद्यालय की दूरी और परिवहन सम्बन्धी समस्याओं से राहत प्रदान करने का प्रयास किया गया।
इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक तथा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बालिकाओं की शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया गया।
इस योजना ने विद्यालय से बाहर तथा पढ़ाई बीच में छोड़ चुकी बालिकाओं को पुनः शिक्षा से जोड़ने के लिए भी महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान किए।
इस प्रकार कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना का प्रमुख शैक्षिक महत्त्व बालिका शिक्षा का विस्तार, लैंगिक असमानता में कमी, वंचित वर्गों को समान शैक्षिक अवसर तथा गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा उपलब्ध कराना था।
12. कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना की वर्तमान स्थिति
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना की शुरुआत वर्ष 2004 में मुख्य रूप से उच्च प्राथमिक स्तर की वंचित बालिकाओं की आवासीय शिक्षा के लिए की गई थी।
बाद में इसे सर्व शिक्षा अभियान में सम्मिलित किया गया।
वर्ष 2018–19 से समग्र शिक्षा के अन्तर्गत कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों की व्यवस्था का विस्तार उच्चतर कक्षाओं तक किया गया।
समग्र शिक्षा के अन्तर्गत अब ऐसे विद्यालयों में आवश्यकता एवं निर्धारित व्यवस्थाओं के अनुसार कक्षा 6 से 12 तक की बालिकाओं के लिए आवासीय एवं शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
ध्यान दें— पुस्तक में वर्णित योजना का प्रारम्भिक स्वरूप और वर्तमान समग्र शिक्षा के अन्तर्गत उपलब्ध सुविधाएँ अलग-अलग ऐतिहासिक चरणों से सम्बन्धित हैं।
समग्र निष्कर्ष
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना (KGBV) की शुरुआत जुलाई 2004 में शैक्षिक रूप से पिछड़े एवं दुर्गम क्षेत्रों की वंचित बालिकाओं को आवासीय विद्यालयों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए की गई थी।
इस योजना का प्रमुख उद्देश्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक तथा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बालिकाओं को शिक्षा के अवसर प्रदान करना था।
इसमें विशेष रूप से 10 वर्ष से अधिक आयु की विद्यालय से बाहर बालिकाओं तथा दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाली बालिकाओं पर ध्यान दिया गया।
पुस्तक के अनुसार इस योजना के 5 प्रमुख उद्देश्य तथा 5 कार्यक्षेत्र बताए गए हैं।
योजना के प्रारम्भिक प्रावधानों में 75% स्थान वंचित समुदायों की बालिकाओं के लिए तथा शेष 25% स्थानों पर गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की बालिकाओं को प्राथमिकता दी गई।
इस योजना को 1 अप्रैल 2007 से सर्व शिक्षा अभियान में सम्मिलित किया गया।
इसके संचालन में जिला स्तरीय समिति, गैर-सरकारी संगठन तथा महिला समाख्या जैसी संस्थाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी।
इस प्रकार कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना ने वंचित बालिकाओं की शिक्षा में समानता, गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा तथा बालिका सशक्तीकरण को प्रोत्साहित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- KGBV का पूरा नाम Kasturba Gandhi Balika Vidyalaya है।
- कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना की शुरुआत जुलाई 2004 में हुई।
- योजना का मुख्य उद्देश्य वंचित वर्गों की बालिकाओं को आवासीय विद्यालयों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना था।
- प्रारम्भिक रूप में यह योजना मुख्यतः उच्च प्राथमिक स्तर की आवासीय शिक्षा से सम्बन्धित थी।
- योजना के प्रमुख लक्षित वर्ग SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक समुदाय तथा गरीब परिवारों की बालिकाएँ थीं।
- योजना में 10 वर्ष से अधिक आयु की विद्यालय से बाहर बालिकाओं को विशेष प्राथमिकता दी गई।
- इस योजना का प्रमुख कार्यक्षेत्र शैक्षिक रूप से पिछड़े विकास खण्ड (EBBs) थे।
- योजना की शुरुआत में लगभग 750 आवासीय विद्यालयों की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया।
- पुस्तक में एक ऐतिहासिक चरण में 2,180 विद्यालयों का उल्लेख किया गया है।
- पुस्तक के अनुसार वर्ष 2014–15 तक लगभग 3,600 विद्यालयों को स्वीकृति तथा लगभग 3,590 विद्यालयों के खोले जाने का उल्लेख है।
- कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना को 1 अप्रैल 2007 से सर्व शिक्षा अभियान में सम्मिलित किया गया।
- पुस्तक में इस योजना के 5 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
- ये उद्देश्य हैं—वंचित बालिकाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अभिभावकों को प्रोत्साहन, 10 वर्ष से अधिक आयु की विद्यालय से बाहर बालिकाओं को शिक्षा, घुमन्तू समुदायों की बालिकाओं पर विशेष ध्यान तथा वंचित वर्गों के लिए स्थान निर्धारित करना।
- योजना की प्रारम्भिक व्यवस्था में 75% स्थान SC, ST, OBC एवं अल्पसंख्यक समुदायों की बालिकाओं के लिए रखे गए।
- शेष 25% स्थानों पर गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों की बालिकाओं को प्राथमिकता दी गई।
- पुस्तक में इस योजना के 5 प्रमुख कार्यक्षेत्र बताए गए हैं।
- प्रमुख कार्यक्षेत्र थे—वंचित बालिकाओं के कम नामांकन वाले क्षेत्र, कम महिला साक्षरता वाले क्षेत्र, परिवहन सुविधाओं से वंचित क्षेत्र तथा आवासीय विद्यालयों की कमी वाले क्षेत्र।
- वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार सरकारी योजना-दिशानिर्देशों में राष्ट्रीय ग्रामीण महिला साक्षरता दर 46.13% तथा लैंगिक साक्षरता अंतर 21.59% का मानदण्ड दिया गया है।
- पुस्तक में योजना के लिए 50:50 वित्तीय अनुपात का उल्लेख है। मूल सरकारी व्यवस्था में दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 75:25 तथा उसके बाद 50:50 का प्रावधान था।
- विद्यालयों के संचालन में प्रमुख रूप से जिला स्तरीय समिति, NGO तथा महिला समाख्या को सम्मिलित किया गया।
- जिला स्तरीय समिति के अध्यक्ष जिलाधिकारी (DM) होते थे।
- समिति के उपाध्यक्ष मुख्य विकास अधिकारी (CDO) तथा सदस्य सचिव बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) होते थे।
- पुस्तक में जिला स्तरीय समिति की 10 सदस्य श्रेणियों का उल्लेख है।
- वर्तमान समग्र शिक्षा व्यवस्था के अन्तर्गत KGBV की सुविधाओं का विस्तार कक्षा 6 से 12 तक किया गया है।
- योजना का मूल उद्देश्य बालिका शिक्षा में लैंगिक एवं सामाजिक असमानता कम करना और वंचित बालिकाओं को गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा प्रदान करना था।
प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECCE)—परिचय, उद्देश्य, आयु सीमा एवं कार्यक्षेत्र
प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा का परिचय
प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (Early Childhood Care and Education—ECCE) एक ऐसी शैक्षिक एवं देखभाल सम्बन्धी व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत छोटे बच्चों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक तथा बौद्धिक विकास पर ध्यान दिया जाता है।
इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश करने से पहले आवश्यक अनुभव, अच्छी आदतें तथा प्रारम्भिक सीखने के अवसर प्रदान करना है।
प्रारम्भिक बाल्यावस्था बच्चे के विकास की एक महत्त्वपूर्ण अवस्था होती है। इस अवस्था में बच्चे खेल, गतिविधियों, बातचीत तथा अपने आसपास के वातावरण से बहुत कुछ सीखते हैं।
इसलिए ECCE में बच्चों को केवल पढ़ना-लिखना सिखाने के बजाय उनके सर्वांगीण विकास तथा विद्यालयी शिक्षा की तैयारी को महत्त्व दिया जाता है।
पुस्तक में ECCE को एक सार्वभौमिक कार्यक्रम बताया गया है, जिसके माध्यम से पूर्व-प्राथमिक आयु वर्ग के बच्चों को देखभाल एवं शिक्षा की सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं।
इसका उद्देश्य बच्चों को औपचारिक विद्यालयी वातावरण से परिचित कराना तथा उनमें आवश्यक व्यक्तिगत एवं सामाजिक क्षमताएँ विकसित करना है।
1. ECCE का अर्थ एवं अवधारणा
ECCE का पूरा नाम Early Childhood Care and Education है। इसका हिन्दी अर्थ प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा है।
इसमें दो प्रमुख पक्ष शामिल होते हैं।
1. बाल्यावस्था देखभाल (Early Childhood Care)
इसका सम्बन्ध छोटे बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, उचित देखभाल तथा आवश्यक आदतों के विकास से है।
बच्चों की आवश्यकताओं को समझकर उन्हें ऐसा वातावरण उपलब्ध कराना, जिसमें वे सुरक्षित एवं सहज अनुभव करें, बाल्यावस्था देखभाल का प्रमुख उद्देश्य है।
2. बाल्यावस्था शिक्षा (Early Childhood Education)
इसका सम्बन्ध बच्चों को प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश करने से पहले आवश्यक प्रारम्भिक शैक्षिक अनुभव प्रदान करने से है।
इसके अन्तर्गत बच्चों को खेल, बातचीत, चित्र, कविता तथा विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से सीखने के अवसर दिए जाते हैं।
इससे बच्चों की भाषा, समझने की क्षमता, सामाजिक व्यवहार तथा विद्यालय के प्रति रुचि विकसित करने में सहायता मिलती है।
इस प्रकार ECCE देखभाल तथा शिक्षा का समन्वित कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य छोटे बच्चों का सर्वांगीण विकास एवं प्रारम्भिक विद्यालयी तैयारी सुनिश्चित करना है।
2. ECCE कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएँ
पुस्तक में वर्णित अवधारणा के आधार पर ECCE की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।
- पूर्व-प्राथमिक शिक्षा— यह बच्चों को प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश से पहले प्रारम्भिक शिक्षा एवं अनुभव प्रदान करता है।
- देखभाल एवं शिक्षा का समन्वय— इसमें बच्चों की देखभाल के साथ उनकी सीखने सम्बन्धी आवश्यकताओं पर ध्यान दिया जाता है।
- सर्वांगीण विकास— बच्चों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा भावनात्मक विकास को महत्त्व दिया जाता है।
- विद्यालयी तैयारी— बच्चों को औपचारिक विद्यालयी वातावरण से परिचित कराया जाता है।
- अच्छी आदतों का विकास— बच्चों में स्वच्छता, व्यक्तिगत व्यवहार तथा अच्छी दैनिक आदतें विकसित करने पर बल दिया जाता है।
- विभिन्न संस्थाओं की सहभागिता— पूर्व-प्राथमिक शिक्षा तथा बाल्यावस्था देखभाल के विकास में सरकारी, सामुदायिक तथा अन्य संस्थाओं का सहयोग लिया जा सकता है।
3. ECCE कार्यक्रम के उद्देश्य
प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के लिए तैयार करना तथा उनके व्यक्तिगत एवं मानसिक विकास को प्रोत्साहित करना है।
पुस्तक के अनुसार इस कार्यक्रम के 8 प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं।
1. बालक को औपचारिक अनुभवों के लिए तैयार करना
ECCE का प्रथम उद्देश्य छोटे बच्चों को औपचारिक विद्यालयी वातावरण के लिए तैयार करना है।
बच्चे सामान्यतः अपने परिवार अथवा अन्य परिचित वातावरण में रहते हैं। विद्यालय में प्रवेश लेने पर उन्हें नए शिक्षकों, विद्यार्थियों तथा गतिविधियों से परिचित होना पड़ता है।
इसलिए इस कार्यक्रम के माध्यम से उन्हें आवश्यक प्रारम्भिक अनुभव प्रदान किए जाते हैं, जिससे विद्यालय में समायोजन करना आसान हो सके।
2. बालकों में अच्छी आदतों का विकास करना
इस कार्यक्रम का दूसरा उद्देश्य बच्चों में अच्छी व्यक्तिगत एवं सामाजिक आदतें विकसित करना है।
इसके अन्तर्गत बच्चों को उचित व्यवहार, अनुशासन, सहयोग तथा दैनिक जीवन की अच्छी आदतों के लिए प्रेरित किया जाता है।
इससे बच्चों के व्यक्तित्व एवं व्यवहार के विकास में सहायता मिलती है।
3. विद्यालय के परिवेश से परिचित कराना
ECCE कार्यक्रम बच्चों को विद्यालय के वातावरण तथा वहाँ होने वाली विभिन्न गतिविधियों से परिचित कराता है।
बच्चे शिक्षक, कक्षा तथा अन्य विद्यार्थियों के साथ सहज रूप से व्यवहार करना सीखते हैं।
इससे उनके मन में विद्यालय के प्रति रुचि तथा सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है।
4. बालक के सर्वांगीण विकास को प्रोत्साहित करना
सर्वांगीण विकास का अर्थ है बालक के विकास के सभी महत्त्वपूर्ण पक्षों पर ध्यान देना।
इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित पक्ष शामिल हैं—
- शारीरिक विकास।
- मानसिक एवं बौद्धिक विकास।
- सामाजिक विकास।
- भावनात्मक विकास।
- भाषायी एवं प्रारम्भिक शैक्षिक विकास।
इस प्रकार ECCE बच्चों को विभिन्न गतिविधियों तथा अनुभवों के माध्यम से संतुलित विकास के अवसर प्रदान करता है।
5. बालक के मानसिक स्तर को कुशाग्र बनाना
ECCE कार्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य बच्चों की मानसिक क्षमताओं का विकास करना है।
इसके अन्तर्गत बच्चों की समझने, पहचानने, ध्यान देने तथा सीखने की क्षमताओं को प्रोत्साहित किया जाता है।
इससे बच्चों की प्रारम्भिक बौद्धिक तैयारी मजबूत होती है और वे नई परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
6. व्यक्तिगत आदतों का विकास करना
इस कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों को आवश्यक व्यक्तिगत आदतें सिखाई जाती हैं।
इनमें अपने छोटे-छोटे कार्य करने, व्यक्तिगत वस्तुओं को व्यवस्थित रखने तथा उचित व्यवहार करने जैसी आदतें शामिल हो सकती हैं।
इसका उद्देश्य बच्चों में आत्मनिर्भरता एवं व्यक्तिगत उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना है।
7. स्वच्छता के प्रति जागरूक करना
ECCE का एक उद्देश्य बच्चों को स्वच्छता का महत्त्व समझाना है।
इसके माध्यम से बच्चों को हाथों की सफाई, व्यक्तिगत स्वच्छता तथा आसपास के वातावरण को साफ रखने जैसी आवश्यक आदतों के लिए प्रेरित किया जाता है।
इससे बच्चों में स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के प्रति जागरूकता विकसित होती है।
8. आत्म-अभिव्यक्ति एवं प्रदर्शन के अवसर प्रदान करना
इस कार्यक्रम का आठवाँ उद्देश्य बच्चों को अपनी भावनाएँ, विचार तथा क्षमताएँ व्यक्त करने के अवसर प्रदान करना है।
इसके लिए बच्चों को कविता, खेल तथा अन्य रोचक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
इससे बच्चों में आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति की क्षमता तथा सक्रिय सहभागिता विकसित करने में सहायता मिलती है।
4. ECCE कार्यक्रम की अवधि एवं संचालन व्यवस्था
पुस्तक में ECCE कार्यक्रम के संचालन के लिए निम्नलिखित समय-सारणी दी गई है।
- प्रतिदिन— 3 घंटे।
- प्रति सप्ताह— 5 दिन।
- प्रतिवर्ष— 38 सप्ताह।
यह समय-सारणी आयरलैंड के नि:शुल्क ECCE प्री-स्कूल कार्यक्रम से सम्बन्धित है।
आयरलैंड के आधिकारिक नियमों के अनुसार इसका कार्यक्रम वर्ष सामान्यतः सितम्बर से जून तक चलता है।
इसका उद्देश्य निर्धारित आयु वर्ग के बच्चों को प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश से पहले नियमित रूप से प्रारम्भिक शैक्षिक अनुभव प्रदान करना है।
तथ्यात्मक स्पष्टता— पुस्तक में समयावधि के सन्दर्भ में जून से सितम्बर लिखा है, जबकि आयरलैंड के सरकारी अभिलेखों में सितम्बर से जून तक की व्यवस्था दी गई है।
इन समय सम्बन्धी नियमों को भारत के सभी आँगनबाड़ी अथवा पूर्व-प्राथमिक शिक्षा केन्द्रों पर लागू नहीं समझना चाहिए।
5. ECCE कार्यक्रम की योग्य आयु सीमा
पुस्तक में ECCE कार्यक्रम के लिए वर्ष 2016 तथा 2018 में निर्धारित आयु सम्बन्धी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है।
ये विवरण आयरलैंड के ECCE Programme से सम्बन्धित हैं।
1. सितम्बर 2016 की व्यवस्था
पुस्तक के अनुसार सितम्बर 2016 से 3 वर्ष की आयु पूरी करने वाले बच्चों को ECCE कार्यक्रम में प्रवेश देने की व्यवस्था की गई।
इसके अन्तर्गत बच्चे निर्धारित आयु सीमा तक अथवा प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश लेने तक पूर्व-प्राथमिक शिक्षा की सुविधा प्राप्त कर सकते थे।
इस अवधि में कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रवेश के लिए तीन अवसर उपलब्ध थे—
- सितम्बर।
- जनवरी।
- अप्रैल।
इस व्यवस्था का उद्देश्य वर्ष के विभिन्न समय पर तीन वर्ष की आयु पूरी करने वाले बच्चों को कार्यक्रम में प्रवेश के अवसर प्रदान करना था।
2. सितम्बर 2018 की व्यवस्था
सितम्बर 2018 से आयरलैंड के ECCE कार्यक्रम की प्रवेश आयु सम्बन्धी व्यवस्था में परिवर्तन किया गया।
इसके अन्तर्गत बच्चों के लिए न्यूनतम पात्र आयु 2 वर्ष 8 माह निर्धारित की गई।
इस बदलाव का उद्देश्य बच्चों को प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश से पहले अधिक समय तक पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना था।
सितम्बर 2018 से सामान्य प्रवेश व्यवस्था वर्ष में एक बार, अर्थात सितम्बर में कर दी गई।
3. अधिकतम आयु सीमा
आयरलैंड के ECCE कार्यक्रम में 5 वर्ष 6 माह की आयु ऊपरी पात्रता सीमा से सम्बन्धित है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक बच्चे को प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश लेने के लिए 5 वर्ष 6 माह का होना अनिवार्य है।
पुस्तक में इस आयु को प्राथमिक विद्यालय के नामांकन की अनिवार्य आयु के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जबकि आधिकारिक ECCE नियमों में इसका सम्बन्ध पूर्व-प्राथमिक कार्यक्रम की पात्रता से है।
आयु सम्बन्धी प्रमुख तथ्यों का सारांश
| वर्ष | प्रमुख व्यवस्था |
|---|---|
| 2016 | 3 वर्ष की आयु से प्रवेश तथा सितम्बर, जनवरी और अप्रैल में प्रवेश के अवसर। |
| 2018 | न्यूनतम प्रवेश आयु 2 वर्ष 8 माह तथा सितम्बर में एक प्रवेश अवधि। |
| ऊपरी आयु सीमा | 5 वर्ष 6 माह से सम्बन्धित ECCE पात्रता नियम। |
परीक्षा के लिए ध्यान दें— उपर्युक्त 2016 और 2018 के परिवर्तन आयरलैंड के ECCE Programme के नियम हैं, भारत की सार्वभौमिक प्रवेश आयु नहीं।
6. ECCE के अन्तर्गत उपलब्ध प्रारम्भिक बाल्यावस्था सेवाएँ
पुस्तक में ECCE के सन्दर्भ में छोटे बच्चों की देखभाल तथा पूर्व-प्राथमिक शिक्षा से सम्बन्धित निम्नलिखित सेवाओं का उल्लेख किया गया है।
1. सत्रीय सुविधा (Sessional Facility)
इस व्यवस्था में बच्चों को दिन के निर्धारित समय के लिए प्रारम्भिक शिक्षा एवं देखभाल सम्बन्धी गतिविधियों में भाग लेने के अवसर मिलते हैं।
इसका उद्देश्य सीमित समय में बच्चों को उपयोगी शैक्षिक अनुभव प्रदान करना है।
2. डे-केयर सुविधा (Day-Care Facility)
डे-केयर व्यवस्था में बच्चों की दिन के समय देखभाल की जाती है।
इसमें बच्चों की सुरक्षा, आवश्यक देखभाल तथा दैनिक गतिविधियों पर ध्यान दिया जाता है।
3. क्रेच सुविधा (Creche Facility)
क्रेच छोटे बच्चों की देखभाल के लिए स्थापित एक सुविधा है।
इसके माध्यम से बच्चों को सुरक्षित वातावरण में आवश्यक देखभाल उपलब्ध कराई जाती है।
4. प्ले-स्कूल सुविधा (Play-School Facility)
प्ले-स्कूल में बच्चों को खेल तथा विभिन्न रोचक गतिविधियों के माध्यम से सीखने के अवसर दिए जाते हैं।
इसका उद्देश्य बच्चों में भाषा, सामाजिक व्यवहार, कल्पनाशीलता तथा सीखने के प्रति रुचि विकसित करना है।
स्पष्टता— ये प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न सेवाएँ हैं। आयरलैंड के नि:शुल्क ECCE सत्र के अतिरिक्त डे-केयर या क्रेच की सभी सेवाएँ स्वतः नि:शुल्क हों, यह आवश्यक नहीं है।
7. ECCE कार्यक्रम का कार्यक्षेत्र
प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा का कार्यक्षेत्र केवल बच्चों को पूर्व-प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने तक सीमित नहीं है।
इसके अन्तर्गत शैक्षिक संस्थाओं का विकास, शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम निर्माण, अनुसंधान तथा विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय जैसे कार्य भी शामिल हैं।
पुस्तक के अनुसार ECCE के 6 प्रमुख कार्यक्षेत्र निम्नलिखित हैं।
1. राष्ट्रीय संसाधनों एवं साधनों का उपयोग करना
ECCE के विकास के लिए उपलब्ध शैक्षिक साधनों तथा राष्ट्रीय संसाधनों का उचित उपयोग करना।
इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्यों पर बल दिया गया है—
- प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा से सम्बन्धित खोज एवं अनुसंधान।
- शिक्षकों तथा सम्बन्धित कर्मचारियों का प्रशिक्षण।
- शैक्षिक संसाधनों एवं कार्यक्रमों का विकास।
- उपयोगी शैक्षिक जानकारी तथा कार्यक्रमों का प्रसार।
इसका उद्देश्य उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना है।
2. राज्यों की शैक्षिक क्षमता का विकास करना
ECCE का दूसरा कार्यक्षेत्र राज्यों को प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा के प्रभावशाली संचालन के लिए सक्षम बनाना है।
इसके अन्तर्गत शैक्षिक संस्थाओं तथा प्रशिक्षण व्यवस्थाओं के विकास को महत्त्व दिया गया है।
पुस्तक में विशेष रूप से निम्नलिखित संस्थाओं के विकास हेतु सहायता का उल्लेख किया गया है—
- SCERT— राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद।
- DIET— जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान।
इन संस्थाओं की सहायता से प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा से सम्बन्धित प्रशिक्षण तथा शैक्षिक गतिविधियों के विकास में सहयोग प्राप्त किया जा सकता है।
3. प्रशिक्षण एवं डिप्लोमा पाठ्यक्रमों का विकास करना
ECCE के अन्तर्गत प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा से सम्बन्धित प्रशिक्षण एवं डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के विकास पर बल दिया गया है।
इसका उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों को तैयार करना है जो छोटे बच्चों की देखभाल तथा प्रारम्भिक शिक्षा की आवश्यकताओं को समझकर प्रभावशाली ढंग से कार्य कर सकें।
पुस्तक के अनुसार इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से निम्नलिखित वर्गों को लाभ पहुँचाने का प्रयास किया जाता है—
- अध्यापक एवं प्रशिक्षक।
- प्रारम्भिक बाल्यावस्था के बच्चे।
- माता-पिता एवं अभिभावक।
इस प्रकार प्रशिक्षण कार्यक्रमों का उद्देश्य बालकों की आवश्यकताओं के अनुरूप शैक्षिक एवं विकासात्मक गतिविधियों का संचालन करना है।
4. राज्य स्तरीय समन्वय समितियों का विकास करना
प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा के प्रभावशाली संचालन के लिए विभिन्न विभागों तथा संस्थाओं के बीच समन्वय आवश्यक है।
इसलिए पुस्तक में राज्य स्तरीय समन्वय समितियों के विकास को महत्त्व दिया गया है।
इन समितियों का उद्देश्य राज्य की आवश्यकताओं के अनुसार ECCE सम्बन्धी योजनाएँ तैयार करना तथा विभिन्न विभागों के बीच सहयोग स्थापित करना है।
विशेष रूप से शिक्षा विभाग तथा महिला एवं बाल विकास से सम्बन्धित विभागों के बीच समन्वय विकसित करने पर बल दिया गया है।
इससे बच्चों की देखभाल तथा शिक्षा से सम्बन्धित गतिविधियों का संचालन अधिक व्यवस्थित ढंग से किया जा सकता है।
5. शिक्षण सामग्री एवं विभिन्न संस्थाओं की सहभागिता
ECCE के विकास के लिए छोटे बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप शैक्षिक सामग्री तथा उपयोगी संसाधनों की व्यवस्था करना।
पुस्तक में निम्नलिखित कार्यों का उल्लेख किया गया है—
- बच्चों के लिए उपयोगी संचार एवं शैक्षिक सामग्री का विकास।
- प्रयोगशाला तथा गतिविधि सम्बन्धी किट की व्यवस्था।
- गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की सहभागिता को प्रोत्साहित करना।
- अन्य निजी संस्थाओं का सहयोग प्राप्त करना।
- आँगनबाड़ी तथा पूर्व-प्राथमिक शिक्षा केन्द्रों के विकास में सहायता करना।
इसका उद्देश्य प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा से सम्बन्धित संस्थाओं में आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना तथा विभिन्न संगठनों का सहयोग प्राप्त करना है।
6. अनुसंधान एवं अध्ययन को बढ़ावा देना
ECCE का छठा कार्यक्षेत्र प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा से सम्बन्धित अनुसंधान एवं अध्ययन को प्रोत्साहित करना है।
इसके अन्तर्गत बच्चों की आवश्यकताओं तथा शैक्षिक गतिविधियों से प्राप्त अनुभवों का अध्ययन किया जाता है।
इन अनुभवों के आधार पर प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा के कार्यक्रमों तथा शिक्षण-विधियों में आवश्यक सुधार किए जा सकते हैं।
इस प्रकार अनुसंधान का उद्देश्य बालकों के विकास तथा प्रारम्भिक शिक्षा की गुणवत्ता को अधिक प्रभावशाली बनाना है।
8. ECCE के प्रमुख कार्यक्षेत्रों का सारांश
| कार्यक्षेत्र | प्रमुख कार्य |
|---|---|
| राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग | उपलब्ध साधनों, प्रशिक्षण, खोज एवं शैक्षिक संसाधनों का उपयोग। |
| राज्यों की क्षमता का विकास | राज्य स्तर पर शैक्षिक व्यवस्था को मजबूत बनाना तथा SCERT और DIET के विकास में सहयोग। |
| प्रशिक्षण कार्यक्रम | डिप्लोमा तथा अन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित करना। |
| राज्य स्तरीय समन्वय | शिक्षा तथा महिला एवं बाल विकास सम्बन्धी विभागों में सहयोग स्थापित करना। |
| शैक्षिक सामग्री एवं संस्थागत सहयोग | शिक्षण सामग्री, गतिविधि किट, NGO तथा आँगनबाड़ी केन्द्रों के विकास को प्रोत्साहित करना। |
| अनुसंधान एवं अध्ययन | अनुभवों तथा शोध के आधार पर कार्यक्रमों में सुधार करना। |
9. भारत में ECCE की शैक्षिक व्यवस्था
भारत में प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा का सम्बन्ध मुख्य रूप से छोटे बच्चों के विकास तथा पूर्व-प्राथमिक शिक्षा से है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में 3 से 8 वर्ष की आयु को आधारभूत शिक्षा की व्यापक अवस्था में रखा गया है।
इसके अन्तर्गत 3 से 6 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए पूर्व-प्राथमिक शिक्षा तथा 6 से 8 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए कक्षा 1 और 2 को सम्मिलित किया गया है।
भारत में ECCE से सम्बन्धित सुविधाएँ आँगनबाड़ी, बालवाटिका तथा अन्य पूर्व-प्राथमिक शिक्षा केन्द्रों के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती हैं।
इन व्यवस्थाओं में बच्चों के लिए खेल एवं गतिविधि-आधारित अधिगम, भाषा विकास, सामाजिक व्यवहार तथा विद्यालयी तैयारी को महत्त्व दिया जाता है।
महत्त्वपूर्ण अंतर— भारत में ECCE की शैक्षिक अवधारणा और आयरलैंड के विशेष सरकारी ECCE Programme की आयु पात्रता, प्रवेश अवधि तथा वित्तीय व्यवस्था को एक समान नहीं समझना चाहिए।
10. ECCE का शैक्षिक महत्त्व
प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा बच्चों के भावी शैक्षिक विकास की आधारशिला है।
इसके माध्यम से बच्चों को प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश करने से पहले आवश्यक अनुभव एवं सीखने के अवसर प्रदान किए जाते हैं।
यह कार्यक्रम बच्चों में अच्छी आदतें, स्वच्छता, आत्मविश्वास तथा सामाजिक व्यवहार विकसित करने में सहायक है।
इसके अतिरिक्त बच्चों की मानसिक क्षमताओं, भाषा तथा आत्म-अभिव्यक्ति के विकास को भी प्रोत्साहन मिलता है।
ECCE के अन्तर्गत प्रशिक्षण संस्थाओं, शिक्षकों, अभिभावकों तथा समुदाय की सहभागिता को महत्त्व दिया जाता है।
इस प्रकार ECCE का प्रमुख महत्त्व छोटे बच्चों की उचित देखभाल, सर्वांगीण विकास तथा प्राथमिक शिक्षा के लिए आवश्यक तैयारी से सम्बन्धित है।
समग्र निष्कर्ष
प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECCE) छोटे बच्चों की देखभाल तथा पूर्व-प्राथमिक शिक्षा से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण व्यवस्था है।
इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को औपचारिक विद्यालयी शिक्षा के लिए तैयार करना तथा उनके शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं भावनात्मक विकास को प्रोत्साहित करना है।
पुस्तक में ECCE के 8 प्रमुख उद्देश्य तथा 6 कार्यक्षेत्र बताए गए हैं।
इसके उद्देश्य हैं—औपचारिक अनुभवों की तैयारी, अच्छी आदतों का विकास, विद्यालयी परिवेश से परिचय, सर्वांगीण विकास, मानसिक क्षमता, व्यक्तिगत आदतें, स्वच्छता तथा आत्म-अभिव्यक्ति का विकास।
इसके कार्यक्षेत्रों में राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग, राज्यों की क्षमता का विकास, शिक्षक प्रशिक्षण, समन्वय समितियाँ, शैक्षिक सामग्री तथा अनुसंधान शामिल हैं।
पुस्तक में वर्णित वर्ष 2016 और 2018 की आयु सम्बन्धी व्यवस्थाएँ आयरलैंड के विशिष्ट ECCE Programme से सम्बन्धित हैं।
इस प्रकार ECCE बच्चों की प्रारम्भिक देखभाल, सर्वांगीण विकास तथा विद्यालयी शिक्षा की तैयारी का एक महत्त्वपूर्ण आधार है।
- ECCE का पूरा नाम Early Childhood Care and Education है।
- इसका हिन्दी अर्थ प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा है।
- इसका मुख्य उद्देश्य छोटे बच्चों का सर्वांगीण विकास तथा उन्हें प्राथमिक विद्यालय के लिए तैयार करना है।
- ECCE में बाल्यावस्था देखभाल तथा प्रारम्भिक शिक्षा दोनों को महत्त्व दिया जाता है।
- पुस्तक के अनुसार ECCE के 8 प्रमुख उद्देश्य हैं।
- प्रमुख उद्देश्य हैं—औपचारिक अनुभवों के लिए तैयार करना, अच्छी आदतें विकसित करना तथा विद्यालयी परिवेश से परिचित कराना।
- बालकों का सर्वांगीण विकास, मानसिक क्षमताओं का विकास तथा व्यक्तिगत आदतें सिखाना भी इसके उद्देश्य हैं।
- स्वच्छता के प्रति जागरूकता तथा आत्म-अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करना भी इसके उद्देश्य हैं।
- पुस्तक में वर्णित विशिष्ट ECCE Programme के नियम आयरलैंड से सम्बन्धित हैं।
- आयरलैंड में सरकारी ECCE Programme की शुरुआत 2010 में हुई।
- आयरलैंड के ECCE Programme की अवधि 3 घंटे प्रतिदिन, 5 दिन प्रति सप्ताह तथा 38 सप्ताह प्रतिवर्ष है।
- इसका कार्यक्रम वर्ष सामान्यतः सितम्बर से जून तक होता है।
- सितम्बर 2016— 3 वर्ष की आयु से प्रवेश तथा सितम्बर, जनवरी और अप्रैल में प्रवेश के अवसर।
- सितम्बर 2018— न्यूनतम आयु 2 वर्ष 8 माह तथा वर्ष में एक प्रवेश अवधि।
- 5 वर्ष 6 माह आयरलैंड के ECCE कार्यक्रम की ऊपरी पात्रता सीमा से सम्बन्धित है।
- पुस्तक में सत्रीय सुविधा, डे-केयर, क्रेच तथा प्ले-स्कूल जैसी सेवाओं का उल्लेख किया गया है।
- पुस्तक में ECCE के 6 प्रमुख कार्यक्षेत्र बताए गए हैं।
- पहला कार्यक्षेत्र राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग तथा खोज, प्रशिक्षण, विकास एवं प्रसार को प्रोत्साहित करना है।
- दूसरा कार्यक्षेत्र राज्यों की शैक्षिक क्षमता का विकास तथा SCERT एवं DIET को सहयोग प्रदान करना है।
- तीसरा कार्यक्षेत्र प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा से सम्बन्धित प्रशिक्षण एवं डिप्लोमा पाठ्यक्रमों का विकास करना है।
- चौथा कार्यक्षेत्र राज्य स्तरीय समन्वय समितियों तथा शिक्षा और महिला एवं बाल विकास विभागों में सहयोग स्थापित करना है।
- पाँचवाँ कार्यक्षेत्र शैक्षिक सामग्री, गतिविधि किट, NGO तथा आँगनबाड़ी और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा केन्द्रों का विकास करना है।
- छठा कार्यक्षेत्र ECCE से सम्बन्धित अनुसंधान एवं अध्ययन को बढ़ावा देना है।
- भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में 3 से 8 वर्ष की आयु को आधारभूत शिक्षा की व्यापक अवस्था में रखा गया है।
- सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य— ECCE का मूल उद्देश्य बच्चों की उचित देखभाल, अच्छी आदतों, मानसिक क्षमताओं एवं सामाजिक व्यवहार का विकास करके उन्हें विद्यालयी शिक्षा के लिए तैयार करना है।
बालश्रम परियोजना—परिचय, उद्देश्य, लक्षित समूह, रणनीतियाँ एवं अपेक्षित परिणाम
बालश्रम परियोजना का परिचय
बालश्रम परियोजना (Child Labour Project) भारत सरकार द्वारा बालश्रम की समस्या को दूर करने तथा श्रमिक बच्चों को शिक्षा एवं पुनर्वास के अवसर उपलब्ध कराने के लिए संचालित एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम था।
बालश्रम से आशय बच्चों से ऐसे कार्य करवाने से है जो उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा शारीरिक एवं मानसिक विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं।
अनेक बच्चे गरीबी, पारिवारिक कठिनाइयों तथा अन्य सामाजिक-आर्थिक कारणों से कम आयु में ही विभिन्न कार्यों में लग जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे विद्यालयी शिक्षा से वंचित रह सकते हैं।
इस समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार ने बालश्रम पर रोक लगाने, श्रमिक बच्चों की पहचान करने, उन्हें खतरनाक कार्यों से निकालने तथा उनकी शिक्षा एवं पुनर्वास की व्यवस्था करने पर बल दिया।
इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना (National Child Labour Project—NCLP) की शुरुआत वर्ष 1988 में की गई।
इस परियोजना का प्रमुख उद्देश्य बालश्रम से मुक्त कराए गए बच्चों को विशेष शिक्षण केन्द्रों, प्रारम्भिक शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, स्वास्थ्य सेवाओं तथा अन्य पुनर्वास सुविधाओं के माध्यम से सामान्य जीवन और विद्यालयी शिक्षा से जोड़ना था।
इस प्रकार बालश्रम परियोजना का मुख्य उद्देश्य बालश्रम का उन्मूलन, बच्चों का पुनर्वास तथा उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा में सम्मिलित करना था।
1. बालश्रम परियोजना की पृष्ठभूमि
भारत में बालश्रम की समस्या को दूर करने के लिए श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने विभिन्न कानूनी, शैक्षिक तथा सामाजिक उपाय अपनाए।
पुस्तक में बालश्रम उन्मूलन के लिए निम्नलिखित तीन प्रमुख दृष्टिकोणों का उल्लेख किया गया है।
1. बालश्रम का निषेध एवं नियमन
इस दृष्टिकोण के अन्तर्गत बालश्रम को रोकने तथा बच्चों के कार्य करने की परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए कानूनी प्रावधान किए गए।
इसके लिए बालश्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 महत्त्वपूर्ण था।
इस अधिनियम का उद्देश्य निर्धारित खतरनाक व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं में बच्चों के नियोजन को रोकना तथा अन्य कार्यों की परिस्थितियों का नियमन करना था।
2. बालश्रमिक परिवारों के लिए विकास कार्यक्रम
बालश्रम को रोकने के लिए केवल कानूनी प्रतिबन्ध पर्याप्त नहीं हैं। बच्चों के परिवारों की आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में सुधार करना भी आवश्यक है।
इसलिए सरकार की विभिन्न विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बालश्रमिक परिवारों तक पहुँचाने पर बल दिया गया।
इसका उद्देश्य परिवारों की आर्थिक कठिनाइयाँ कम करना था, ताकि बच्चों को काम पर भेजने के बजाय विद्यालय भेजा जा सके।
3. राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना की स्थापना
तीसरे दृष्टिकोण के अन्तर्गत बालश्रम की अधिकता वाले क्षेत्रों में विशेष परियोजनाएँ संचालित करने की व्यवस्था की गई।
इसके माध्यम से श्रमिक बच्चों की पहचान, कार्य से मुक्ति, पुनर्वास तथा विद्यालयी शिक्षा की व्यवस्था करने का प्रयास किया गया।
इसी दृष्टिकोण के आधार पर राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना (NCLP) का विकास किया गया।
2. बालश्रम उन्मूलन से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण तिथियाँ
| वर्ष / तिथि | महत्त्वपूर्ण घटना |
|---|---|
| 1986 | बालश्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम बनाया गया। |
| 14 अगस्त 1987 | केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने राष्ट्रीय बालश्रम नीति को स्वीकृति दी। |
| 1988 | राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना (NCLP) प्रारम्भ की गई। |
| दसवीं पंचवर्षीय योजना | बालश्रम परियोजना का 150 अतिरिक्त जिलों में विस्तार करने की व्यवस्था की गई। |
| 2010 | खतरनाक उद्योगों में बालश्रम समाप्त करने का ऐतिहासिक लक्ष्य निर्धारित किया गया था। |
परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण— राष्ट्रीय बालश्रम नीति की स्वीकृति 14 अगस्त 1987 को हुई थी, जबकि राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना की शुरुआत 1988 में हुई।
राष्ट्रीय बालश्रम नीति तथा राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना दो सम्बन्धित लेकिन अलग व्यवस्थाएँ थीं।
3. राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना के अन्तर्गत प्रमुख गतिविधियाँ
पुस्तक में दसवीं पंचवर्षीय योजना के सन्दर्भ में बालश्रम परियोजना के अन्तर्गत निम्नलिखित 9 प्रमुख गतिविधियों का उल्लेख किया गया है।
1. बालश्रम कानूनों के पालन को सुनिश्चित करना
बालश्रम सम्बन्धी कानूनों को प्रभावशाली ढंग से लागू करना तथा निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करना।
इसका उद्देश्य बच्चों को हानिकारक कार्यों में लगाए जाने से रोकना तथा उनका शोषण कम करना था।
2. विशेष विद्यालयों की स्थापना करना
बालश्रम से मुक्त कराए गए बच्चों के लिए विशेष विद्यालय अथवा बालश्रम पुनर्वास केन्द्र स्थापित करना।
इन केन्द्रों के माध्यम से बच्चों को औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।
इनका उद्देश्य श्रमिक बच्चों को सामान्य विद्यालयों में प्रवेश के लिए तैयार करना था।
3. पोषण, स्वास्थ्य एवं शिक्षक प्रशिक्षण की व्यवस्था
बालश्रम परियोजना के अन्तर्गत विशेष विद्यालयों के बच्चों के लिए आवश्यक पोषण सम्बन्धी तथा स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था करना।
इसके अतिरिक्त ऐसे बच्चों की शैक्षिक आवश्यकताओं को समझने के लिए शिक्षकों को उपयुक्त प्रशिक्षण प्रदान करना।
इससे बच्चों के स्वास्थ्य तथा अधिगम सम्बन्धी कठिनाइयों को दूर करने में सहायता मिल सकती थी।
4. व्यावसायिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराना
बालश्रम से मुक्त कराए गए बच्चों एवं पात्र किशोरों के लिए आयु के अनुरूप व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।
इसका उद्देश्य उन्हें उपयोगी कौशल विकसित करने के अवसर प्रदान करना था।
ध्यान दें— व्यावसायिक प्रशिक्षण का उद्देश्य बच्चों को पुनः श्रम में लगाना नहीं, बल्कि शिक्षा एवं पुनर्वास में सहायता प्रदान करना था।
5. बालश्रम के हानिकारक प्रभावों के प्रति जागरूकता
समाज तथा अभिभावकों को बालश्रम के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करना।
बच्चों से कम आयु में हानिकारक कार्य करवाने से उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य तथा विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इसलिए बालश्रम रोकने तथा बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए जन-जागरूकता को महत्त्व दिया गया।
6. परिवारों के लिए आय एवं रोजगार के अवसर
बालश्रमिक परिवारों को विभिन्न आयवृद्धि तथा रोजगार सम्बन्धी गतिविधियों से जोड़ना।
इसका उद्देश्य परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार करना था, जिससे बच्चों पर काम करने का दबाव कम हो सके।
7. बालश्रमिक बच्चों के प्रत्यक्ष पुनर्वास की व्यवस्था
बालश्रम से मुक्त कराए गए बच्चों को उपयुक्त शिक्षा, देखभाल तथा अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराकर उनका पुनर्वास करना।
पुनर्वास (Rehabilitation) का अर्थ है बालश्रम से मुक्त बच्चे को शिक्षा तथा आवश्यक सहायता प्रदान करके उसे सामान्य जीवन की ओर लौटने में सहयोग करना।
8. सार्वजनिक जागरूकता को बढ़ावा देना
बालश्रम उन्मूलन के लिए व्यापक जन-जागरूकता अभियान संचालित करना।
इसके माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को बालश्रम रोकने तथा बच्चों की शिक्षा में सहयोग देने के लिए प्रेरित करना।
9. सर्वेक्षण एवं मूल्यांकन करना
बालश्रम से प्रभावित क्षेत्रों में सर्वेक्षण के माध्यम से श्रमिक बच्चों की पहचान करना।
इसके अतिरिक्त परियोजना की गतिविधियों तथा उपलब्धियों का समय-समय पर मूल्यांकन करना।
इससे कार्यक्रम की कमियों की पहचान करके आवश्यक सुधार किए जा सकते थे।
4. दसवीं पंचवर्षीय योजना में बालश्रम परियोजना का विस्तार
दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना के विस्तार तथा उसके क्रियान्वयन को प्रभावशाली बनाने पर विशेष बल दिया गया।
पुस्तक में इस सम्बन्ध में निम्नलिखित 5 प्रमुख रणनीतियाँ बताई गई हैं।
- 150 अतिरिक्त जिलों में विस्तार— राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना को 150 अतिरिक्त जिलों में संचालित करने की व्यवस्था करना।
- सर्व शिक्षा अभियान से समन्वय— बालश्रम से मुक्त बच्चों को शिक्षा का अधिकार एवं विद्यालयी अवसर उपलब्ध कराने के लिए सर्व शिक्षा अभियान से सहयोग स्थापित करना।
- औपचारिक विद्यालयी व्यवस्था को मजबूत करना— बच्चों को विद्यालयी शिक्षा उपलब्ध कराकर उनकी पढ़ाई में आने वाले अवरोध तथा शिक्षा से वंचित रहने की समस्या को कम करना।
- प्रभावशाली निगरानी प्रणाली— बालश्रम से सम्बन्धित गतिविधियों की पहचान तथा निगरानी के लिए बेहतर व्यवस्था विकसित करना।
- स्वैच्छिक संगठनों की सहायता— बालश्रम परियोजना के अन्तर्गत संचालित विशेष विद्यालयों एवं पुनर्वास गतिविधियों में गैर-सरकारी तथा स्वैच्छिक संगठनों का सहयोग प्राप्त करना।
सरकारी अभिलेखों के अनुसार दसवीं पंचवर्षीय योजना में पहले से संचालित 100 परियोजनाओं के अतिरिक्त 150 नई परियोजनाएँ स्वीकृत की गई थीं। इस प्रकार कार्यक्रम का विस्तार कुल 250 जिलों तक करने की व्यवस्था बनी।
5. बालश्रम परियोजना के उद्देश्य
राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना का प्रमुख उद्देश्य श्रमिक बच्चों को हानिकारक कार्यों से मुक्त कराना तथा उनके पुनर्वास एवं शिक्षा की व्यवस्था करना था।
पुस्तक के अनुसार परियोजना के उद्देश्यों को मुख्य रूप से 4 भागों में प्रस्तुत किया गया है।
1. बालश्रम के सभी रूपों को समाप्त करना
बालश्रम परियोजना का पहला प्रमुख उद्देश्य बच्चों को बालश्रम से मुक्त कराना तथा उन्हें शिक्षा एवं विकास के अवसर प्रदान करना था।
इसके अन्तर्गत निम्नलिखित तीन कार्यों पर विशेष बल दिया गया—
- बालश्रमिक बच्चों की पहचान एवं मुक्ति— परियोजना क्षेत्र में काम करने वाले बच्चों की पहचान करके उन्हें बालश्रम से मुक्त कराना।
- शिक्षा एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण— बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा तथा आवश्यकतानुसार उपयुक्त व्यावसायिक प्रशिक्षण के माध्यम से पुनर्वासित करना।
- सरकारी सेवाओं का अभिसरण— बच्चों तथा उनके परिवारों को विभिन्न सरकारी विभागों एवं एजेंसियों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं का लाभ दिलाना।
अभिसरण (Convergence) का अर्थ है विभिन्न विभागों एवं योजनाओं के बीच सहयोग स्थापित करके लाभार्थियों तक आवश्यक सेवाएँ पहुँचाना।
इस प्रकार प्रथम उद्देश्य का मुख्य आधार बालश्रमिक बच्चों की पहचान, मुक्ति, शिक्षा तथा पुनर्वास था।
2. किशोर श्रमिकों को खतरनाक व्यवसायों से मुक्त कराना
परियोजना का दूसरा प्रमुख उद्देश्य किशोर श्रमिकों को खतरनाक व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं से मुक्त कराना तथा उनके कौशल विकास के लिए उपयुक्त अवसर उपलब्ध कराना था।
पुस्तक में इसके निम्नलिखित दो उपबिन्दु दिए गए हैं—
- खतरनाक कार्यों से पहचान एवं मुक्ति— खतरनाक व्यवसायों में काम करने वाले किशोर श्रमिकों की पहचान करके उन्हें इन कार्यों से मुक्त कराना।
- कौशल विकास एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण— पात्र किशोरों को आयु के अनुरूप कौशल विकास कार्यक्रमों तथा उपयुक्त व्यावसायिक प्रशिक्षण से जोड़ना।
इसका उद्देश्य किशोरों को असुरक्षित कार्यों से बचाना तथा उनके विकास के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराना था।
3. बालश्रम के प्रति जागरूकता बढ़ाना
बालश्रम परियोजना का तीसरा उद्देश्य बालश्रम तथा किशोर श्रमिकों से सम्बन्धित समस्याओं के प्रति समाज को जागरूक बनाना था।
इसके अन्तर्गत विशेष रूप से निम्नलिखित समूहों में जागरूकता बढ़ाने पर बल दिया गया—
- नियोक्ता एवं हितधारक।
- बालश्रम से प्रभावित समुदाय।
- अभिभावक एवं स्थानीय लोग।
इससे बालश्रम के दुष्प्रभावों के प्रति सामाजिक जागरूकता विकसित करने तथा बच्चों को विद्यालयी शिक्षा से जोड़ने में सहायता मिल सकती थी।
4. निगरानी, ट्रैकिंग एवं रिपोर्टिंग प्रणाली विकसित करना
बालश्रम परियोजना का चौथा उद्देश्य बालश्रम से सम्बन्धित जानकारी एकत्र करने तथा गतिविधियों की निगरानी के लिए प्रभावशाली प्रणाली विकसित करना था।
इसके अन्तर्गत Monitoring, Tracking and Reporting System के विकास पर बल दिया गया।
Monitoring का अर्थ निगरानी करना, Tracking का अर्थ सम्बन्धित मामलों की प्रगति पर नज़र रखना तथा Reporting का अर्थ प्राप्त जानकारी का व्यवस्थित विवरण तैयार करना है।
इससे बालश्रमिक बच्चों की पहचान, पुनर्वास तथा विद्यालयी शिक्षा से जुड़ने की स्थिति का मूल्यांकन किया जा सकता था।
6. बालश्रम परियोजना का लक्षित समूह
लक्षित समूह (Target Group) से आशय उन बच्चों अथवा व्यक्तियों से है जिनके लिए कोई कार्यक्रम विशेष रूप से संचालित किया जाता है।
बालश्रम परियोजना में मुख्य रूप से बालश्रम से प्रभावित बच्चों, किशोर श्रमिकों तथा उनके परिवारों को लक्षित किया गया।
पुस्तक में इसके 3 प्रमुख लक्षित समूह बताए गए हैं।
1. 14 वर्ष से कम आयु के बालश्रमिक
परियोजना में 14 वर्ष से कम आयु के ऐसे बच्चों की पहचान करने पर बल दिया गया जो बालश्रम से सम्बन्धित कार्यों में लगे हुए थे।
इसके अन्तर्गत विशेष रूप से खतरनाक व्यवसायों तथा प्रक्रियाओं में काम करने वाले बच्चों को मुक्त कराने तथा उनका पुनर्वास करने का प्रयास किया गया।
इन बच्चों को विशेष शिक्षण केन्द्रों के माध्यम से सामान्य विद्यालयी शिक्षा से जोड़ना परियोजना का प्रमुख उद्देश्य था।
स्पष्टता— राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना के विशेष प्रशिक्षण केन्द्रों का एक प्रमुख ऐतिहासिक लक्षित आयु वर्ग 9 से 14 वर्ष था।
2. 18 वर्ष से कम आयु के किशोर श्रमिक
परियोजना में 18 वर्ष से कम आयु के ऐसे किशोरों पर भी ध्यान दिया गया जो खतरनाक व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं में काम कर रहे थे।
इन किशोरों को हानिकारक कार्यों से मुक्त कराने तथा उपयुक्त कौशल विकास एवं पुनर्वास सम्बन्धी अवसर प्रदान करने पर बल दिया गया।
वर्ष 2016 में संशोधित भारतीय कानून के अनुसार 14 से 18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं में नियोजित करना प्रतिबन्धित है।
3. बालश्रम से प्रभावित परिवार
बालश्रम परियोजना का तीसरा लक्षित समूह उन परिवारों को माना गया जिनके बच्चे बालश्रम में लगे हुए थे।
ऐसे परिवारों की आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में सुधार करना आवश्यक था, ताकि बच्चों को काम पर भेजने की आवश्यकता कम हो सके।
इसके लिए परिवारों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं तथा आय एवं रोजगार सम्बन्धी अवसरों से जोड़ने पर बल दिया गया।
7. बालश्रम परियोजना का क्षेत्रीय विस्तार
राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना का संचालन उन क्षेत्रों में किया गया जहाँ बालश्रम की समस्या अधिक थी।
पुस्तक के पृष्ठ 137–138 पर विभिन्न राज्यों तथा उनसे सम्बन्धित जिलों की संख्या दी गई है।
यह तालिका पुस्तक में वर्णित ऐतिहासिक क्षेत्रीय विस्तार को दर्शाती है। इसे वर्तमान समय में संचालित परियोजनाओं की संख्या नहीं समझना चाहिए।
| राज्य | जिलों की संख्या |
|---|---|
| जम्मू एवं कश्मीर | 2 |
| पंजाब | 3 |
| उत्तराखण्ड | 1 |
| हरियाणा | 3 |
| राजस्थान | 27 |
| उत्तर प्रदेश | 47 |
| बिहार | 24 |
| नागालैण्ड | 1 |
| असम | 3 |
| पश्चिम बंगाल | 19 |
| झारखण्ड | 8 |
| ओडिशा | 18 |
| छत्तीसगढ़ | 7 |
| मध्य प्रदेश | 21 |
| गुजरात | 9 |
| महाराष्ट्र | 16 |
| आन्ध्र प्रदेश | 11 |
| कर्नाटक | 17 |
| तमिलनाडु | 16 |
| तेलंगाना | 10 |
परीक्षा उपयोगी तथ्य— मूल पुस्तक की तालिका के अनुसार उत्तर प्रदेश में 47 जिले, राजस्थान में 27 जिले तथा बिहार में 24 जिले शामिल बताए गए हैं।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख उदाहरणों में सीतापुर, अलीगढ़, रामपुर, आजमगढ़, बुलन्दशहर, मेरठ, मुरादाबाद, सुलतानपुर, आगरा, उन्नाव तथा वाराणसी आदि का उल्लेख मिलता है।
ध्यान दें— इस तालिका की राज्यवार संख्याएँ पुस्तक के अनुसार दी गई हैं। अलग-अलग वर्षों में परियोजना का क्षेत्रीय विस्तार बदलता रहा था।
8. बालश्रम परियोजना की प्रमुख रणनीतियाँ
राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना को प्रभावशाली बनाने के लिए बच्चों की शिक्षा, पुनर्वास तथा विभिन्न सरकारी एवं सामाजिक संस्थाओं के सहयोग को महत्त्व दिया गया।
पुस्तक में इसके क्रियान्वयन के लिए 2 प्रमुख रणनीतियाँ बताई गई हैं।
1. बालश्रमिक बच्चों के लिए सक्षम वातावरण तैयार करना
इस रणनीति का उद्देश्य परियोजना क्षेत्र में ऐसा वातावरण विकसित करना था जिसमें बच्चों को बालश्रम से मुक्त कराकर विद्यालयों में प्रवेश दिलाया जा सके।
इसके लिए बच्चों तथा उनके परिवारों को शिक्षा का महत्त्व समझाना और उन्हें आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना महत्त्वपूर्ण था।
बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने के साथ उनके परिवारों को आर्थिक विकास के वैकल्पिक अवसर उपलब्ध कराने पर भी बल दिया गया।
इस रणनीति के मुख्य पक्ष निम्नलिखित थे—
- बालश्रमिक बच्चों की पहचान करना।
- उन्हें बालश्रम से मुक्त कराना।
- बच्चों को विद्यालयों में प्रवेश दिलाना।
- उनकी शिक्षा में निरन्तरता बनाए रखना।
- परिवारों को वैकल्पिक आय एवं रोजगार के अवसरों से जोड़ना।
इस प्रकार इस रणनीति का उद्देश्य बालश्रम से मुक्ति के साथ बच्चों की शिक्षा एवं परिवारों की आर्थिक परिस्थितियों में सुधार करना था।
2. प्रशासन एवं सामाजिक संस्थाओं के साथ समन्वय स्थापित करना
बालश्रम परियोजना का प्रभावशाली क्रियान्वयन विभिन्न सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाओं के सहयोग पर निर्भर करता था।
इसलिए परियोजना में निम्नलिखित संस्थाओं की सहभागिता को महत्त्व दिया गया—
- राज्य एवं जिला प्रशासन।
- श्रम एवं रोजगार मंत्रालय।
- राज्य सरकारों के सम्बन्धित विभाग।
- स्थानीय निकाय।
- नागरिक समाज संगठन।
- गैर-सरकारी संगठन (NGO)।
- शिक्षाविद् एवं अन्य सम्बन्धित संस्थाएँ।
इन संस्थाओं के सहयोग से बालश्रमिक बच्चों की पहचान, पुनर्वास, शिक्षा तथा आवश्यक सेवाओं की व्यवस्था करने का प्रयास किया गया।
पुस्तक में इस बात पर भी बल दिया गया है कि परियोजना का कार्य केवल योजनाएँ बनाना नहीं, बल्कि उनके प्रभावशाली क्रियान्वयन, निगरानी एवं पर्यवेक्षण को सुनिश्चित करना भी है।
9. बालश्रम परियोजना के अपेक्षित परिणाम
अपेक्षित परिणाम (Expected Outcomes) से आशय उन उपलब्धियों से है जिन्हें किसी परियोजना के सफल संचालन के बाद प्राप्त करने का लक्ष्य रखा जाता है।
बालश्रम परियोजना के प्रमुख अपेक्षित परिणाम बच्चों को श्रम से मुक्त कराना, उनका पुनर्वास करना तथा उन्हें शिक्षा के अवसर प्रदान करना थे।
पुस्तक में निम्नलिखित 8 अपेक्षित परिणाम बताए गए हैं।
1. बालश्रम के सभी रूपों की पहचान एवं उन्मूलन
बालश्रम से सम्बन्धित विभिन्न गतिविधियों की पहचान करके उन्हें रोकने के प्रयासों में सफलता प्राप्त करना।
इसका उद्देश्य अधिक से अधिक बच्चों को बालश्रम से मुक्त कराना तथा उन्हें शिक्षा एवं पुनर्वास की सुविधाओं से जोड़ना था।
2. खतरनाक कार्यों से किशोर श्रमिकों को मुक्त कराना
खतरनाक व्यवसायों में लगे किशोर श्रमिकों की पहचान करके उन्हें ऐसे कार्यों से मुक्त कराना।
इसके माध्यम से किशोरों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की रक्षा करना तथा उनके विकास के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराना अपेक्षित था।
3. बालश्रमिक बच्चों को नियमित विद्यालयों से जोड़ना
बालश्रम तथा पुनर्वास कार्यक्रमों से मुक्त कराए गए बच्चों को सामान्य विद्यालयों की मुख्यधारा में सम्मिलित करना।
इसका उद्देश्य बच्चों को केवल विशेष केन्द्रों तक सीमित न रखकर नियमित विद्यालयी शिक्षा से जोड़ना था।
इससे बच्चे अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने की दिशा में आगे बढ़ सकते थे।
4. किशोर श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण एवं कौशल विकास
खतरनाक व्यवसायों से मुक्त कराए गए किशोर श्रमिकों को आवश्यक प्रशिक्षण एवं कौशल विकास के अवसर प्रदान करना।
इसका उद्देश्य किशोरों को सुरक्षित तथा आयु के अनुरूप उपयोगी कौशल विकसित करने में सहायता देना था।
5. सामाजिक जागरूकता में वृद्धि
बालश्रम के दुष्प्रभावों के प्रति समुदाय, लक्षित समूहों तथा सामान्य जनता में जागरूकता विकसित करना।
इसके लिए विभिन्न सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों तथा जनसम्पर्क गतिविधियों को महत्त्व दिया गया।
इससे समाज को बालश्रम रोकने तथा बच्चों की शिक्षा में सहयोग देने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता था।
6. परियोजना कर्मचारियों का प्रशिक्षण
बालश्रम से सम्बन्धित समस्याओं को प्रभावशाली ढंग से समझने तथा उनका समाधान करने के लिए परियोजना कर्मचारियों को प्रशिक्षण प्रदान करना।
इससे बच्चों की पहचान, पुनर्वास, शिक्षा तथा अन्य सेवाओं के संचालन में सुधार करना अपेक्षित था।
7. बालश्रमिक बच्चों के पुनर्वास की व्यवस्था
बालश्रम से मुक्त कराए गए बच्चों के पुनर्वास के लिए आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना।
पुस्तक में जिला स्तर पर गठित परियोजना समितियों के माध्यम से पुनर्वास कार्यों के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का उल्लेख किया गया है।
इसका उद्देश्य बच्चों को सामान्य जीवन तथा विद्यालयी शिक्षा से जोड़ने की प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाना था।
8. विशेष विद्यालयों में बच्चों का नामांकन
सर्वेक्षण के दौरान पहचाने गए बालश्रमिक बच्चों को विशेष विद्यालयों अथवा पुनर्वास केन्द्रों में प्रवेश दिलाना।
इन केन्द्रों में बच्चों को आवश्यक प्रारम्भिक शिक्षा तथा अन्य सहायक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती थीं।
इसका उद्देश्य बच्चों को नियमित विद्यालयों में प्रवेश के लिए तैयार करना था।
10. बालश्रम परियोजना में शिक्षा एवं पुनर्वास का महत्त्व
बालश्रम की समस्या का समाधान केवल बच्चों को काम से हटाने तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए उनके पुनर्वास तथा शिक्षा की उचित व्यवस्था भी आवश्यक है।
राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना में इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विशेष विद्यालयों तथा पुनर्वास केन्द्रों को महत्त्व दिया गया।
इन केन्द्रों के माध्यम से बच्चों को निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध कराने पर बल दिया गया—
- सेतु शिक्षा (Bridge Education)— बच्चों को नियमित विद्यालयों में प्रवेश के लिए आवश्यक प्रारम्भिक शिक्षण।
- व्यावसायिक प्रशिक्षण— आयु के अनुरूप उपयोगी कौशल विकसित करने के अवसर।
- पोषण सम्बन्धी सुविधाएँ— बच्चों के स्वास्थ्य एवं विकास के लिए भोजन की व्यवस्था।
- स्वास्थ्य सेवाएँ— आवश्यक स्वास्थ्य परीक्षण तथा देखभाल।
- आर्थिक सहायता— निर्धारित व्यवस्था के अनुसार बच्चों के पुनर्वास में सहयोग।
- नियमित विद्यालयों से जोड़ना— विशेष शिक्षण के बाद बच्चों का सामान्य विद्यालयी शिक्षा में प्रवेश कराना।
इस प्रकार परियोजना में शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य तथा पुनर्वास को एक-दूसरे से सम्बन्धित आवश्यकताओं के रूप में महत्त्व दिया गया।
11. बालश्रम परियोजना का शैक्षिक महत्त्व
राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना उन बच्चों की शिक्षा के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रयास थी जो बालश्रम के कारण विद्यालयी शिक्षा से वंचित रह गए थे।
इसके माध्यम से बच्चों की पहचान करके उन्हें कार्य से मुक्त कराने तथा पुनर्वास के माध्यम से शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया गया।
विशेष शिक्षण केन्द्रों के माध्यम से बच्चों को नियमित विद्यालयों में प्रवेश के लिए आवश्यक तैयारी प्रदान की गई।
इसके अतिरिक्त बालश्रमिक परिवारों को कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने तथा समाज में बालश्रम के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर बल दिया गया।
इस परियोजना का प्रमुख शैक्षिक महत्त्व निम्नलिखित था—
- शिक्षा से वंचित बच्चों की पहचान करना।
- बालश्रमिक बच्चों को विद्यालयी शिक्षा से जोड़ना।
- शिक्षा के सार्वभौमीकरण में सहयोग देना।
- बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं विकास को महत्त्व देना।
- बालश्रमिक परिवारों तथा समुदाय में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
इस प्रकार बालश्रम परियोजना का उद्देश्य बालश्रम उन्मूलन के साथ बच्चों के शैक्षिक अधिकारों एवं सर्वांगीण विकास को प्रोत्साहित करना था।
12. बालश्रम परियोजना की वर्तमान स्थिति
राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना की शुरुआत वर्ष 1988 में बालश्रमिक बच्चों की पहचान, पुनर्वास तथा शिक्षा के उद्देश्य से की गई थी।
इसके बाद बालश्रम से सम्बन्धित कानूनी तथा शैक्षिक व्यवस्थाओं में समय-समय पर परिवर्तन किए गए।
वर्ष 2016 में बालश्रम सम्बन्धी कानून में संशोधन किया गया। संशोधित कानून में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के नियोजन पर व्यापक प्रतिबन्ध तथा 14 से 18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं में लगाने पर प्रतिबन्ध का प्रावधान है। बच्चों के सम्बन्ध में कानून में कुछ निर्धारित अपवाद एवं शर्तें भी हैं।
इसके अतिरिक्त 1 अप्रैल 2021 से राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना को समग्र शिक्षा कार्यक्रम में समाहित कर दिया गया।
इसलिए पुस्तक में वर्णित राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना की विभिन्न व्यवस्थाओं को उसके ऐतिहासिक सन्दर्भ में समझना चाहिए।
समग्र निष्कर्ष
राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना (NCLP) की शुरुआत वर्ष 1988 में बालश्रमिक बच्चों की पहचान, मुक्ति, शिक्षा तथा पुनर्वास के उद्देश्य से की गई थी।
इसकी पृष्ठभूमि में बालश्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 तथा 14 अगस्त 1987 को स्वीकृत राष्ट्रीय बालश्रम नीति का महत्त्वपूर्ण स्थान था।
परियोजना के अन्तर्गत विशेष विद्यालयों की स्थापना, शिक्षण व्यवस्था, व्यावसायिक प्रशिक्षण, स्वास्थ्य सेवाएँ तथा बालश्रमिक परिवारों के कल्याण को महत्त्व दिया गया।
पुस्तक में इसके 4 प्रमुख उद्देश्य, 3 लक्षित समूह, 2 रणनीतियाँ तथा 8 अपेक्षित परिणाम बताए गए हैं।
परियोजना का मुख्य उद्देश्य बालश्रम से मुक्त कराए गए बच्चों को सामान्य विद्यालयों की मुख्यधारा में सम्मिलित करना तथा उन्हें शिक्षा पूरी करने के अवसर उपलब्ध कराना था।
इस प्रकार बालश्रम परियोजना बच्चों को शोषण से बचाने, उनका पुनर्वास करने तथा शिक्षा के माध्यम से उनके जीवन एवं विकास के अवसर बेहतर बनाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास थी।
- NCLP का पूरा नाम National Child Labour Project है।
- इसका हिन्दी नाम राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना है।
- इसका प्रमुख उद्देश्य बालश्रमिक बच्चों की पहचान, मुक्ति, पुनर्वास एवं शिक्षा था।
- बालश्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम वर्ष 1986 में बनाया गया।
- राष्ट्रीय बालश्रम नीति को 14 अगस्त 1987 को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल द्वारा स्वीकृति दी गई।
- राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना (NCLP) वर्ष 1988 में प्रारम्भ की गई।
- बालश्रम उन्मूलन के 3 प्रमुख दृष्टिकोण थे—कानूनी निषेध एवं नियमन, बालश्रमिक परिवारों के लिए विकास कार्यक्रम तथा राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना।
- पुस्तक में बालश्रम परियोजना के अन्तर्गत 9 प्रमुख गतिविधियों का उल्लेख है।
- इनमें कानूनी प्रावधानों का पालन, विशेष विद्यालयों की स्थापना, पोषण एवं स्वास्थ्य सुविधाएँ तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रमुख थे।
- अन्य गतिविधियाँ थीं—जन-जागरूकता, परिवारों के लिए रोजगार के अवसर, पुनर्वास तथा सर्वेक्षण एवं मूल्यांकन।
- दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान परियोजना का 150 अतिरिक्त जिलों में विस्तार करने की व्यवस्था की गई।
- सरकारी अभिलेखों के अनुसार इस विस्तार के बाद कुल 250 जिलों में परियोजना संचालित करने का प्रावधान था।
- पुस्तक में परियोजना के 4 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
- ये उद्देश्य हैं—बालश्रम का उन्मूलन, खतरनाक कार्यों से किशोर श्रमिकों को मुक्त कराना, जन-जागरूकता बढ़ाना तथा निगरानी एवं रिपोर्टिंग प्रणाली विकसित करना।
- परियोजना के 3 प्रमुख लक्षित समूह थे—14 वर्ष से कम आयु के बालश्रमिक, 18 वर्ष से कम आयु के खतरनाक कार्यों में लगे किशोर तथा बालश्रम से प्रभावित परिवार।
- राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना के विशेष प्रशिक्षण केन्द्रों का एक प्रमुख ऐतिहासिक लक्षित आयु वर्ग 9 से 14 वर्ष था।
- पुस्तक की ऐतिहासिक तालिका के अनुसार उत्तर प्रदेश में 47 जिले परियोजना के अन्तर्गत सम्मिलित बताए गए हैं।
- पुस्तक में बालश्रम परियोजना की 2 प्रमुख रणनीतियाँ बताई गई हैं।
- पहली रणनीति बालश्रमिक बच्चों के लिए शिक्षा एवं पुनर्वास के अनुकूल वातावरण तैयार करना थी।
- दूसरी रणनीति राज्य एवं जिला प्रशासन, श्रम मंत्रालय, स्थानीय निकायों तथा गैर-सरकारी संगठनों के बीच समन्वय स्थापित करना थी।
- पुस्तक में बालश्रम परियोजना के 8 अपेक्षित परिणाम बताए गए हैं।
- प्रमुख अपेक्षित परिणाम थे—बालश्रम का उन्मूलन, खतरनाक कार्यों से किशोरों की मुक्ति तथा बच्चों को नियमित विद्यालयों से जोड़ना।
- अन्य अपेक्षित परिणाम थे—कौशल विकास, जन-जागरूकता, परियोजना कर्मचारियों का प्रशिक्षण, पुनर्वास तथा विशेष विद्यालयों में नामांकन।
- सेतु शिक्षा (Bridge Education) का उद्देश्य विद्यालय से बाहर बच्चों को नियमित विद्यालयी शिक्षा के लिए तैयार करना है।
- पुस्तक के अनुसार खतरनाक उद्योगों से वर्ष 2010 तक बालश्रम समाप्त करना एक ऐतिहासिक लक्ष्य था।
- वर्ष 2016 के कानूनी संशोधन के अनुसार 14 से 18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं में नियोजित करना प्रतिबन्धित है।
- 1 अप्रैल 2021 से राष्ट्रीय बालश्रम परियोजना को समग्र शिक्षा कार्यक्रम में समाहित कर दिया गया।
- सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य— बालश्रम परियोजना का मूल उद्देश्य बच्चों को बालश्रम से मुक्त कराकर उनका पुनर्वास करना तथा उन्हें विद्यालयी शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना था।
मिड-डे मील योजना—परिचय, उद्देश्य, कार्यक्षेत्र, आवश्यकता, क्रियान्वयन, शैक्षिक प्रभाव एवं मूल्यांकन
मिड-डे मील योजना का परिचय
मिड-डे मील योजना (Mid-Day Meal Scheme) भारत सरकार द्वारा विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को दोपहर के समय निःशुल्क पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के लिए प्रारम्भ की गई एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक एवं पोषण सम्बन्धी योजना है।
इस योजना का राष्ट्रीय स्तर पर शुभारम्भ 15 अगस्त 1995 को किया गया। इसका प्रारम्भिक आधिकारिक नाम प्राथमिक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पोषण सहायता कार्यक्रम (National Programme of Nutritional Support to Primary Education—NP-NSPE) था।
इस योजना का मुख्य उद्देश्य बच्चों की पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करना तथा विद्यालयों में नामांकन, नियमित उपस्थिति एवं प्रतिधारण में वृद्धि करना था।
भारत में अनेक बच्चे गरीबी तथा पर्याप्त भोजन के अभाव के कारण विद्यालयी शिक्षा से वंचित रह जाते थे। कुछ बच्चों को उचित पोषण नहीं मिलने के कारण उनके स्वास्थ्य एवं सीखने की क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था।
इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए विद्यालयों में भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई, जिससे बच्चों को पोषण सम्बन्धी सहायता मिलने के साथ विद्यालय आने के लिए प्रोत्साहन भी प्राप्त हो।
मिड-डे मील योजना के माध्यम से बच्चों को एक साथ बैठकर भोजन करने के अवसर भी मिलते हैं, जिससे उनमें सहयोग, समानता तथा सामाजिक सद्भाव की भावना विकसित करने का प्रयास किया जाता है।
इस प्रकार मिड-डे मील योजना का मुख्य उद्देश्य बच्चों के पोषण स्तर में सुधार करना तथा प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण को प्रोत्साहित करना है।
1. मिड-डे मील योजना की पृष्ठभूमि एवं विकास
स्वतन्त्रता के बाद भारत में सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए अनेक प्रयास किए गए।
इन प्रयासों के अन्तर्गत बच्चों के नामांकन, नियमित उपस्थिति तथा विद्यालय में बने रहने की समस्या को दूर करने पर विशेष ध्यान दिया गया।
पुस्तक में मिड-डे मील योजना की पृष्ठभूमि में निम्नलिखित प्रमुख शैक्षिक प्रयासों का उल्लेख किया गया है।
1. अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षा परिषद—1957
पुस्तक के अनुसार वर्ष 1957 में प्राथमिक शिक्षा के प्रसार एवं उन्नयन के लिए अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षा परिषद का गठन किया गया।
इस परिषद ने प्राथमिक शिक्षा के विकास के सम्बन्ध में विभिन्न सुझाव प्रस्तुत किए।
2. कोठारी आयोग—1964–66
वर्ष 1964–66 में गठित कोठारी शिक्षा आयोग ने शिक्षा के विकास तथा शैक्षिक अवसरों की समानता पर विशेष बल दिया।
इस आयोग के अनुसार जाति, धर्म, लिंग तथा सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी बच्चों को शिक्षा के अवसर मिलने चाहिए।
3. राष्ट्रीय शिक्षा नीति—1968
कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की गई।
इस नीति में प्राथमिक शिक्षा के विस्तार तथा सभी बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया गया।
4. राष्ट्रीय शिक्षा नीति—1986
वर्ष 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण को प्रमुख लक्ष्य बनाया गया।
इसके अन्तर्गत विद्यालयी सुविधाओं के विकास तथा शिक्षा से वंचित बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने के प्रयास किए गए।
5. शिक्षा सबके लिए विश्व सम्मेलन—1990
वर्ष 1990 में आयोजित विश्व सम्मेलन में सभी के लिए शिक्षा उपलब्ध कराने पर विशेष बल दिया गया।
इससे विभिन्न देशों में प्रारम्भिक शिक्षा के विस्तार तथा शैक्षिक असमानताओं को कम करने के प्रयासों को प्रोत्साहन मिला।
6. जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम—1994
वर्ष 1994 में जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP) प्रारम्भ किया गया।
इसका उद्देश्य शैक्षिक रूप से पिछड़े जिलों में प्राथमिक शिक्षा का विस्तार तथा विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना था।
7. मिड-डे मील योजना का प्रारम्भ—1995
भारत सरकार ने 15 अगस्त 1995 को राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिक शिक्षा के लिए पोषण सहायता कार्यक्रम प्रारम्भ किया।
इसका उद्देश्य बच्चों को पोषण सम्बन्धी सहायता देकर विद्यालयों में प्रवेश, नियमित उपस्थिति तथा पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करना था।
प्रारम्भिक वर्षों में इस कार्यक्रम के अन्तर्गत मुख्य रूप से खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता था। बाद में विद्यालयों में पका हुआ भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था विकसित की गई।
2. मिड-डे मील योजना के विकास की प्रमुख तिथियाँ
| वर्ष / तिथि | महत्त्वपूर्ण घटना |
|---|---|
| 15 अगस्त 1995 | प्राथमिक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पोषण सहायता कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। |
| 1997–98 | कार्यक्रम का विस्तार देश के सभी विकास खण्डों तक किया गया। |
| 28 नवम्बर 2001 | सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी एवं सहायता प्राप्त प्राथमिक विद्यालयों में पका हुआ भोजन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। |
| 2002 | शिक्षा गारंटी योजना तथा वैकल्पिक एवं नवाचारी शिक्षा केन्द्रों तक कार्यक्रम का विस्तार किया गया। |
| सितम्बर 2004 | राष्ट्रीय कार्यक्रम में पके हुए मध्याह्न भोजन की व्यवस्था को मजबूत किया गया। |
| अक्टूबर 2007 | शैक्षिक रूप से पिछड़े विकास खण्डों के उच्च प्राथमिक विद्यालयों तक योजना का विस्तार हुआ। |
| 1 अप्रैल 2008 | सभी पात्र क्षेत्रों के उच्च प्राथमिक विद्यालयों को भी योजना में सम्मिलित किया गया। |
| 2021 | मध्याह्न भोजन योजना को प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (PM POSHAN) के रूप में जारी रखने की स्वीकृति दी गई। |
परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण— राष्ट्रीय मिड-डे मील योजना का प्रारम्भ 15 अगस्त 1995 को हुआ। इसका विस्तार उच्च प्राथमिक स्तर पर वर्ष 2007–08 के दौरान किया गया।
3. मिड-डे मील योजना के उद्देश्य
मिड-डे मील योजना का उद्देश्य विद्यालयों में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक विकास में सहयोग प्रदान करना था।
पुस्तक में इस योजना के निम्नलिखित 5 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
1. विद्यालयों में नामांकन बढ़ाना
मिड-डे मील योजना का पहला उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों के प्रवेश एवं नामांकन की संख्या में वृद्धि करना है।
गरीब परिवारों के बच्चों को विद्यालय में भोजन मिलने से अभिभावकों को अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलता है।
इससे विद्यालय से बाहर रहने वाले बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने में सहायता मिल सकती है।
2. अपव्यय एवं विद्यालय छोड़ने की समस्या कम करना
इस योजना का दूसरा उद्देश्य विद्यालयों में शैक्षिक अपव्यय को रोकना तथा बच्चों को पढ़ाई पूरी होने तक विद्यालय में बनाए रखना है।
शैक्षिक अपव्यय (Wastage) से आशय ऐसी स्थिति से है जिसमें विद्यार्थी शिक्षा पूरी किए बिना विद्यालय छोड़ देते हैं और उन पर लगाए गए शैक्षिक संसाधनों का अपेक्षित लाभ प्राप्त नहीं हो पाता।
मिड-डे मील के माध्यम से बच्चों को नियमित विद्यालय आने तथा अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
3. विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति बढ़ाना
विद्यालयों में बच्चों की नियमित उपस्थिति में वृद्धि करना मिड-डे मील योजना का एक प्रमुख उद्देश्य है।
विद्यालय में निर्धारित समय पर भोजन मिलने से बच्चों को नियमित रूप से विद्यालय आने के लिए प्रोत्साहन प्राप्त होता है।
नियमित उपस्थिति से बच्चों को शिक्षण गतिविधियों में भाग लेने तथा पाठ्यक्रम को समझने के अधिक अवसर मिलते हैं।
4. बच्चों को पोषण एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी लाभ देना
इस योजना का चौथा उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराकर उनके पोषण स्तर एवं स्वास्थ्य में सुधार करना है।
बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए पर्याप्त ऊर्जा, प्रोटीन तथा अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है।
इसलिए मिड-डे मील के अन्तर्गत भोजन की पौष्टिकता को महत्त्व दिया गया है।
5. समानता एवं भाईचारे की भावना विकसित करना
मिड-डे मील योजना का पाँचवाँ उद्देश्य बच्चों में सामाजिक समानता, भाईचारे तथा सहयोग की भावना विकसित करना है।
विभिन्न जातियों, धर्मों एवं सामाजिक वर्गों के बच्चे जब एक साथ बैठकर भोजन करते हैं, तो उनमें पारस्परिक सम्पर्क तथा सहयोग के अवसर बढ़ते हैं।
इससे सामाजिक एवं जातिगत भेदभाव कम करने की दिशा में सहायता मिल सकती है।
इस प्रकार मिड-डे मील योजना के प्रमुख उद्देश्य नामांकन, उपस्थिति एवं प्रतिधारण बढ़ाना, पोषण स्तर सुधारना तथा सामाजिक समानता को प्रोत्साहित करना हैं।
4. मिड-डे मील योजना का कार्यक्षेत्र
मिड-डे मील योजना प्रारम्भ में सरकारी एवं सहायता प्राप्त प्राथमिक विद्यालयों के बच्चों के लिए संचालित की गई थी।
समय के साथ इसका विस्तार विभिन्न विद्यालयों तथा उच्च प्राथमिक कक्षाओं तक किया गया।
1. प्राथमिक विद्यालयों तक विस्तार
वर्ष 1995 में योजना की शुरुआत मुख्य रूप से प्राथमिक स्तर अर्थात कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों के लिए की गई।
वर्ष 1997–98 तक कार्यक्रम का विस्तार देश के सभी विकास खण्डों तक हो गया था।
2. वैकल्पिक शिक्षा केन्द्रों को शामिल करना
वर्ष 2002 में योजना का विस्तार शिक्षा गारंटी योजना (EGS) तथा वैकल्पिक एवं नवाचारी शिक्षा (AIE) केन्द्रों में पढ़ने वाले पात्र बच्चों तक किया गया।
इसका उद्देश्य नियमित विद्यालयों के अतिरिक्त अन्य शैक्षिक व्यवस्थाओं से जुड़े बच्चों को भी पोषण सहायता प्रदान करना था।
3. उच्च प्राथमिक विद्यालयों तक विस्तार
वर्ष 2007 में शैक्षिक रूप से पिछड़े विकास खण्डों के उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को भी योजना में सम्मिलित किया गया।
इसके बाद 1 अप्रैल 2008 से सभी पात्र क्षेत्रों के उच्च प्राथमिक विद्यालयों तक इसका विस्तार कर दिया गया।
इस प्रकार योजना के अन्तर्गत कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को पोषण सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था विकसित हुई।
4. अन्य पात्र विद्यालयों तक विस्तार
योजना के अन्तर्गत सरकारी, स्थानीय निकायों द्वारा संचालित तथा सरकारी सहायता प्राप्त प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों को सम्मिलित किया गया।
इसके अतिरिक्त निर्धारित सरकारी मानदण्डों के अनुसार पात्र मदरसों तथा अन्य शैक्षिक केन्द्रों के बच्चों को भी योजना का लाभ उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई।
पुस्तक में वर्ष 2014–15 के सन्दर्भ में लगभग 11.5 लाख विद्यालयों तथा लगभग 10.5 करोड़ बच्चों के लाभान्वित होने का उल्लेख है।
ये पुस्तक में दिए गए ऐतिहासिक आँकड़े हैं। इन्हें वर्तमान समय की संख्या नहीं समझना चाहिए।
5. मिड-डे मील योजना की आवश्यकता
मिड-डे मील योजना की आवश्यकता केवल बच्चों की भूख दूर करने तक सीमित नहीं है। इसका सम्बन्ध बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण, विद्यालयी उपस्थिति तथा शिक्षा की गुणवत्ता से भी है।
पुस्तक में विश्व खाद्य कार्यक्रम (World Food Programme—WFP) के सहयोग तथा पोषण सम्बन्धी प्रयासों के सन्दर्भ में इस योजना की आवश्यकता का वर्णन किया गया है।
इसके अन्तर्गत निम्नलिखित 3 प्रमुख आवश्यकताओं को स्पष्ट किया गया है।
1. भोजन में सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता
बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए ऊर्जा तथा प्रोटीन के साथ विभिन्न सूक्ष्म पोषक तत्व भी आवश्यक होते हैं।
सूक्ष्म पोषक तत्वों में आयरन, आयोडीन, फोलिक एसिड तथा विभिन्न विटामिन शामिल हैं।
इनकी कमी से बच्चों के स्वास्थ्य एवं विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इसलिए मिड-डे मील के अन्तर्गत भोजन की पौष्टिकता बढ़ाने के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता पर बल दिया गया।
खाद्य सुदृढ़ीकरण (Food Fortification)
फूड फोर्टिफिकेशन का अर्थ है खाद्य पदार्थों में आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व मिलाकर उनकी पौष्टिक गुणवत्ता बढ़ाना।
पुस्तक में चावल तथा गेहूँ जैसे प्रमुख खाद्यान्नों में पोषक तत्वों के सुदृढ़ीकरण का उल्लेख किया गया है।
इसमें ओडिशा के एक जिले में चावल में आयरन सम्बन्धी पोषक तत्व मिलाने के प्रयास का उदाहरण दिया गया है।
पुस्तक के अनुसार इस प्रयास के बाद एक वर्ष के भीतर एनीमिया के मामलों में लगभग 5 प्रतिशत कमी का उल्लेख किया गया है।
यह पुस्तक में प्रस्तुत एक विशिष्ट उदाहरण है। इसे सभी विद्यालयों अथवा सभी बच्चों में होने वाला निश्चित परिणाम नहीं समझना चाहिए।
2. सुरक्षित एवं स्वच्छ आदतों का विकास
विद्यालयों में भोजन उपलब्ध कराने के साथ उसकी स्वच्छता तथा सुरक्षा सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
यदि भोजन तैयार करने, रखने अथवा परोसने में स्वच्छता का ध्यान नहीं रखा जाता, तो बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इसलिए पुस्तक में निम्नलिखित व्यवस्थाओं को महत्त्व दिया गया है—
- भोजन तैयार करने वाले स्थान एवं रसोई की नियमित सफाई।
- भोजन बनाने तथा परोसने से पहले हाथों की सफाई।
- बच्चों को भोजन से पहले हाथ धोने के लिए प्रेरित करना।
- भोजन तैयार करने के लिए स्वच्छ जल की उपलब्धता।
- स्वच्छ बर्तनों एवं रसोई उपकरणों का उपयोग।
- भोजन को सुरक्षित ढंग से रखने तथा परोसने की व्यवस्था।
- भोजन के अवशेषों एवं कचरे का उचित निस्तारण।
- विद्यालयों में शौचालय एवं आवश्यक स्वच्छता सुविधाओं की व्यवस्था।
इस प्रकार स्वच्छ भोजन तथा अच्छी स्वास्थ्य सम्बन्धी आदतें बच्चों के पोषण एवं विकास के लिए आवश्यक हैं।
3. विद्यालय प्रबन्धन में सुधार
मिड-डे मील योजना की सफलता के लिए विद्यालयों में उचित प्रबन्धन की व्यवस्था आवश्यक है।
इसके अन्तर्गत भोजन तैयार करने वाले कर्मचारियों, विद्यालय प्रशासन तथा विद्यार्थियों के बीच सहयोग महत्त्वपूर्ण है।
पुस्तक में रसोई कर्मचारियों के स्वास्थ्य परीक्षण तथा स्वच्छता सम्बन्धी आदतों को अपनाने पर विशेष बल दिया गया है।
भोजन पकाने वाले कर्मचारियों को स्वच्छ हाथ, साफ बर्तन तथा साफ रसोई का उपयोग करना चाहिए।
इसके अतिरिक्त खाद्य सामग्री की गुणवत्ता, भोजन की सुरक्षा तथा पोषण सम्बन्धी व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी भी आवश्यक है।
इस प्रकार विद्यालय प्रबन्धन में सुधार करके मिड-डे मील योजना को अधिक सुरक्षित एवं प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
6. मिड-डे मील योजना की कार्यप्रणाली
मिड-डे मील योजना के प्रभावशाली क्रियान्वयन के लिए भोजन की व्यवस्था, खाद्य सामग्री की उपलब्धता, भोजन तैयार करने तथा वितरण की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना आवश्यक है।
पुस्तक के अनुसार इस योजना का संचालन राज्य सरकारों की सम्बन्धित समितियों तथा स्थानीय व्यवस्थाओं के सहयोग से किया जाता था।
इन समितियों का कार्य अपने क्षेत्र में भोजन वितरण सम्बन्धी गतिविधियों की निगरानी करना था।
1. भोजन तैयार करने की व्यवस्था
पुस्तक में ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में भोजन तैयार कराने तथा शहरी क्षेत्रों में निर्धारित ठेकेदारों के माध्यम से भोजन उपलब्ध कराने जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख है।
इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य पात्र बच्चों तक निर्धारित समय पर पका हुआ भोजन पहुँचाना था।
वास्तविक भोजन तैयार करने एवं वितरण की व्यवस्था राज्य, स्थानीय परिस्थितियों तथा समय के अनुसार भिन्न हो सकती थी।
2. खाद्य सामग्री की उपलब्धता
मिड-डे मील योजना के अन्तर्गत बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए अनाज, दाल, सब्जियाँ तथा अन्य आवश्यक सामग्री की व्यवस्था की जाती है।
इसका उद्देश्य बच्चों को निर्धारित पोषण मानकों के अनुसार भोजन उपलब्ध कराना है।
3. भोजन वितरण एवं निगरानी
योजना के अन्तर्गत पात्र बच्चों को विद्यालय के कार्य दिवसों में भोजन उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
विद्यालय प्रशासन तथा सम्बन्धित समितियों द्वारा भोजन की मात्रा, गुणवत्ता, स्वच्छता और वितरण व्यवस्था की निगरानी की जाती है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों को सुरक्षित एवं निर्धारित पोषण स्तर वाला भोजन प्राप्त हो।
4. रसोइयों एवं सहायकों की व्यवस्था
विद्यालयों में भोजन तैयार करने तथा वितरण के लिए रसोइयों एवं सहायकों की आवश्यकता होती है।
पुस्तक में 25 बच्चों पर एक रसोइया तथा अधिक बच्चों के लिए अतिरिक्त रसोइयों एवं सहायकों की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
यह पुस्तक में वर्णित पुरानी व्यवस्था है। इसे वर्तमान राष्ट्रीय स्तर पर लागू रसोइयों की संख्या का मानक नहीं समझना चाहिए।
7. मिड-डे मील योजना के पोषण मानक
मिड-डे मील योजना के अन्तर्गत प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए अलग-अलग पोषण मानक निर्धारित किए गए हैं।
इन मानकों का उद्देश्य बच्चों की आयु तथा विकास सम्बन्धी आवश्यकताओं के अनुसार पर्याप्त ऊर्जा एवं प्रोटीन उपलब्ध कराना है।
1. ऊर्जा एवं प्रोटीन के मानक
| शिक्षा का स्तर | ऊर्जा | प्रोटीन |
|---|---|---|
| प्राथमिक स्तर (कक्षा 1–5) | 450 कैलोरी | 12 ग्राम |
| उच्च प्राथमिक स्तर (कक्षा 6–8) | 700 कैलोरी | 20 ग्राम |
परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण— प्राथमिक स्तर के लिए 450 कैलोरी और 12 ग्राम प्रोटीन तथा उच्च प्राथमिक स्तर के लिए 700 कैलोरी और 20 ग्राम प्रोटीन निर्धारित हैं।
2. खाद्यान्न की निर्धारित मात्रा
पुस्तक में प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए अलग-अलग मात्रा में अनाज उपलब्ध कराने का उल्लेख है।
| शिक्षा का स्तर | प्रति बच्चा प्रतिदिन खाद्यान्न |
|---|---|
| प्राथमिक स्तर (कक्षा 1–5) | 100 ग्राम |
| उच्च प्राथमिक स्तर (कक्षा 6–8) | 150 ग्राम |
स्पष्टता— 100 ग्राम तथा 150 ग्राम की मात्रा अनाज अर्थात चावल या गेहूँ जैसे खाद्यान्न की निर्धारित मात्रा है। इसे दाल, सब्जी तथा अन्य सामग्री सहित तैयार भोजन का कुल वजन नहीं समझना चाहिए।
भोजन को संतुलित बनाने के लिए अनाज के साथ दाल, सब्जियाँ, तेल तथा अन्य आवश्यक खाद्य पदार्थ भी उपयोग किए जाते हैं।
इस प्रकार मिड-डे मील योजना में भोजन की मात्रा के साथ उसकी पौष्टिक गुणवत्ता को भी महत्त्व दिया गया है।
8. शैक्षिक परिणामों पर मिड-डे मील योजना का प्रभाव
मिड-डे मील योजना का उद्देश्य केवल बच्चों को भोजन उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि उनके विद्यालयी जीवन तथा शैक्षिक उपलब्धियों में सुधार करना भी है।
इस योजना के प्रभाव का मूल्यांकन मुख्य रूप से बच्चों के नामांकन, उपस्थिति, प्रतिधारण, स्वास्थ्य एवं शैक्षिक प्रदर्शन के आधार पर किया जाता है।
पुस्तक में मिड-डे मील योजना के शैक्षिक प्रभावों का अध्ययन करने के लिए 30 विद्यालयों के एक तुलनात्मक अध्ययन का उल्लेख किया गया है।
इस अध्ययन में मिड-डे मील योजना वाले विद्यालयों तथा योजना के बिना विद्यालयों की तुलना की गई।
अध्ययन के अन्तर्गत दोनों प्रकार के विद्यालयों की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों में समानता रखने का प्रयास किया गया।
पुस्तक के अनुसार प्रत्येक विद्यालय से पाँच लड़कों तथा पाँच लड़कियों को विभिन्न परीक्षणों के लिए चुना गया।
इस अध्ययन में बच्चों की विद्यालयी स्थिति, पोषण तथा शैक्षिक प्रदर्शन से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों का परीक्षण किया गया।
9. मिड-डे मील योजना के प्रभाव के मूल्यांकन के आधार
पुस्तक में तुलनात्मक अध्ययन के लिए निम्नलिखित 4 प्रमुख मूल्यांकन आधारों का उल्लेख किया गया है।
- विद्यालयी स्थिति— बच्चों के नामांकन, नियमित उपस्थिति, प्रतिधारण तथा विद्यालय छोड़ने की दर का अध्ययन।
- पोषण सम्बन्धी स्थिति— बच्चों की लम्बाई, वजन तथा रक्त के नमूनों के आधार पर स्वास्थ्य एवं पोषण का परीक्षण।
- शैक्षिक प्रदर्शन— वार्षिक परीक्षाओं में विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त अंकों का अध्ययन।
- पोषक तत्वों की उपलब्धता— भोजन से मिलने वाली ऊर्जा एवं प्रोटीन तथा उनके उपयोग का अध्ययन।
इन आधारों का उद्देश्य मिड-डे मील योजना के बच्चों की शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को समझना था।
10. मिड-डे मील योजना के अध्ययन से प्राप्त प्रमुख निष्कर्ष
पुस्तक के अनुसार बच्चों की पोषण स्थिति का अध्ययन मिड-डे मील वाले विद्यालयों के 1,361 बच्चों तथा मिड-डे मील के बिना विद्यालयों के 1,333 बच्चों पर किया गया।
इस अध्ययन में नामांकन, उपस्थिति, प्रतिधारण, विद्यालय छोड़ने की समस्या तथा शैक्षिक प्रदर्शन के सम्बन्ध में निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए।
1. नामांकन पर प्रभाव
मिड-डे मील योजना के माध्यम से विद्यालयों में बच्चों के नामांकन को प्रोत्साहन मिलने का उल्लेख किया गया है।
पुस्तक में सम्बन्धित अध्ययन के सन्दर्भ में नामांकन की स्थिति में सुधार तथा लगभग 68 प्रतिशत के आँकड़े का उल्लेख है।
यह आँकड़ा पुस्तक में वर्णित विशिष्ट अध्ययन से सम्बन्धित है। इसे देशभर में मिड-डे मील योजना से नामांकन में 68 प्रतिशत वृद्धि होने का प्रमाण नहीं समझना चाहिए।
2. नियमित उपस्थिति में वृद्धि
पुस्तक के अनुसार मिड-डे मील योजना से बच्चों की विद्यालयी उपस्थिति में वृद्धि देखी गई।
विद्यालय में भोजन उपलब्ध होने से बच्चों को नियमित विद्यालय आने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन मिल सकता है।
नियमित उपस्थिति के कारण बच्चों को अधिक शिक्षण-अधिगम गतिविधियों में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है।
3. प्रतिधारण दर पर प्रभाव
प्रतिधारण दर (Retention Rate) से आशय विद्यालय में प्रवेश लेने वाले बच्चों का आगे की कक्षाओं में बने रहना तथा अपनी शिक्षा जारी रखना है।
पुस्तक में मिड-डे मील वाले विद्यालयों की प्रथम कक्षा में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों के सम्बन्ध में 80.2 प्रतिशत का उल्लेख किया गया है।
अध्ययन के अनुसार भोजन की सुविधा से बच्चों को विद्यालय में बनाए रखने में सहायता मिलने का निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक के इस अनुभाग में प्रतिधारण के सम्बन्ध में कुछ वाक्यों का प्रयोग अस्पष्ट है। शैक्षिक दृष्टि से योजना का अपेक्षित प्रभाव प्रतिधारण बढ़ाना तथा ड्रॉपआउट कम करना है।
4. विद्यालय छोड़ने की समस्या में कमी
मिड-डे मील योजना बच्चों को विद्यालय में बनाए रखने तथा बीच में पढ़ाई छोड़ने की समस्या कम करने में सहायक हो सकती है।
विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए निःशुल्क भोजन विद्यालय आने का अतिरिक्त प्रोत्साहन है।
पुस्तक में मिड-डे मील वाले विद्यालयों में बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखने के प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव बताया गया है।
5. शैक्षिक प्रदर्शन में सुधार
पुस्तक में विद्यालयों के विद्यार्थियों के वार्षिक परीक्षा परिणामों का भी तुलनात्मक अध्ययन किया गया।
इसके अनुसार मिड-डे मील वाले विद्यालयों में ग्रेड A प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के अनुपात में वृद्धि का उल्लेख किया गया है।
इससे यह संकेत मिलता है कि नियमित उपस्थिति तथा बेहतर पोषण की सहायता से बच्चों की शैक्षिक गतिविधियों में सहभागिता को बढ़ावा मिल सकता है।
हालाँकि, शैक्षिक उपलब्धि पर शिक्षण की गुणवत्ता, पारिवारिक वातावरण तथा अन्य अनेक परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है।
11. मिड-डे मील योजना का शैक्षिक महत्त्व
मिड-डे मील योजना प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण तथा बच्चों के पोषण स्तर में सुधार करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।
इसके माध्यम से विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ शिक्षा के प्रति उनकी रुचि एवं नियमित उपस्थिति बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।
इस योजना का प्रमुख शैक्षिक महत्त्व निम्नलिखित है—
- नामांकन में वृद्धि— विद्यालय से बाहर बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
- नियमित उपस्थिति— बच्चों को प्रतिदिन विद्यालय आने के लिए प्रेरणा मिलती है।
- प्रतिधारण में सुधार— बच्चों को शिक्षा पूरी होने तक विद्यालय में बनाए रखने के प्रयासों को सहयोग मिलता है।
- पोषण स्तर में सुधार— बच्चों को निर्धारित मात्रा में ऊर्जा, प्रोटीन एवं अन्य आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराए जाते हैं।
- सामाजिक समानता— विभिन्न वर्गों के बच्चों के एक साथ भोजन करने से सहयोग एवं भाईचारे की भावना विकसित करने के अवसर मिलते हैं।
- शैक्षिक सहभागिता— बेहतर पोषण एवं नियमित उपस्थिति से बच्चों को शिक्षण गतिविधियों में भाग लेने के अधिक अवसर प्राप्त हो सकते हैं।
12. मिड-डे मील योजना का मूल्यांकन
किसी भी शैक्षिक कार्यक्रम का मूल्यांकन उसकी उपलब्धियों तथा कमियों के आधार पर किया जाता है।
मिड-डे मील योजना के मूल्यांकन में यह देखा जाता है कि इससे बच्चों के पोषण स्तर, विद्यालयी उपस्थिति, नामांकन तथा शिक्षा की निरन्तरता पर क्या प्रभाव पड़ा।
पुस्तक में मिड-डे मील योजना के 4 प्रमुख गुण तथा 4 प्रमुख दोष बताए गए हैं।
13. मिड-डे मील योजना के प्रमुख गुण
1. विद्यालयों में नामांकन में वृद्धि
पुस्तक के अनुसार मिड-डे मील योजना लागू होने के बाद प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या बढ़ाने में सहायता मिली।
इससे विशेष रूप से गरीब तथा वंचित परिवारों के बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने के प्रयासों को प्रोत्साहन मिला।
2. वंचित वर्गों के बच्चों की शिक्षा को प्रोत्साहन
पुस्तक में पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा मुस्लिम समुदाय के बच्चों के नामांकन में वृद्धि का उल्लेख किया गया है।
इसके माध्यम से विभिन्न सामाजिक वर्गों के बच्चों को शिक्षा तथा पोषण सम्बन्धी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।
3. विद्यालय छोड़ने की समस्या में कमी
मिड-डे मील योजना से बच्चों को नियमित विद्यालय आने तथा अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
पुस्तक में योजना के बाद विद्यालय छोड़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या में कमी आने का उल्लेख किया गया है।
इस प्रकार यह योजना शैक्षिक अपव्यय कम करने तथा प्रतिधारण बढ़ाने में सहायक मानी गई है।
4. पोषण एवं सामाजिक समानता में सुधार
मिड-डे मील योजना के माध्यम से गरीब परिवारों के बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया।
इससे बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण स्तर में सुधार की सम्भावना बढ़ती है।
इसके अतिरिक्त विभिन्न सामाजिक वर्गों के बच्चों के एक साथ बैठकर भोजन करने से जातिगत भेदभाव कम करने तथा भाईचारे की भावना विकसित करने के अवसर मिलते हैं।
14. मिड-डे मील योजना के प्रमुख दोष एवं समस्याएँ
पुस्तक में योजना के क्रियान्वयन से सम्बन्धित निम्नलिखित चार प्रमुख कमियाँ बताई गई हैं।
1. सरकारी धन का उचित उपयोग न होना
पुस्तक में मिड-डे मील योजना के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली धनराशि के उचित उपयोग को लेकर समस्याओं का उल्लेख किया गया है।
यदि भोजन तथा अन्य सुविधाओं के लिए निर्धारित धन का सही उपयोग नहीं किया जाता, तो बच्चों को अपेक्षित लाभ प्राप्त नहीं हो पाता।
इसलिए योजना में वित्तीय पारदर्शिता तथा नियमित निगरानी आवश्यक है।
2. भोजन की स्वच्छता एवं गुणवत्ता सम्बन्धी समस्याएँ
पुस्तक के अनुसार कुछ स्थानों पर भोजन तैयार करते समय स्वच्छता का पर्याप्त ध्यान नहीं रखने के कारण बच्चों के अस्वस्थ होने की घटनाएँ सामने आई थीं।
ऐसी समस्याएँ भोजन की गुणवत्ता, भण्डारण तथा रसोई सम्बन्धी व्यवस्थाओं की कमियों को दर्शाती हैं।
इसलिए भोजन तैयार करने, रखने और परोसने की प्रक्रिया में स्वच्छता एवं सुरक्षा सम्बन्धी नियमों का पालन आवश्यक है।
3. विद्यालय स्तर पर योजना के प्रति पर्याप्त गम्भीरता का अभाव
पुस्तक में कुछ विद्यालयों द्वारा योजना के संचालन में पर्याप्त गम्भीरता नहीं दिखाए जाने की समस्या बताई गई है।
इससे भोजन वितरण, गुणवत्ता नियंत्रण तथा अन्य व्यवस्थाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
इस समस्या को दूर करने के लिए विद्यालय प्रशासन तथा सम्बन्धित अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।
4. योजना के संचालन में लापरवाही
पुस्तक के अनुसार कुछ स्थानों पर योजना के क्रियान्वयन में लापरवाही के कारण अपेक्षित लाभ बच्चों तक नहीं पहुँच पाते।
इसलिए भोजन की गुणवत्ता, मात्रा, वितरण, वित्तीय व्यवस्था तथा बच्चों की सुरक्षा की नियमित जाँच आवश्यक है।
योजना से जुड़े व्यक्तियों को अपने निर्धारित उत्तरदायित्वों का ईमानदारी एवं सावधानी से पालन करना चाहिए।
15. मिड-डे मील योजना को प्रभावशाली बनाने के उपाय
पुस्तक में वर्णित समस्याओं के आधार पर मिड-डे मील योजना को प्रभावशाली बनाने के लिए निम्नलिखित उपाय महत्त्वपूर्ण हैं।
- पौष्टिक भोजन— बच्चों को निर्धारित ऊर्जा एवं प्रोटीन मानकों के अनुसार भोजन उपलब्ध कराया जाए।
- स्वच्छता— भोजन तैयार करने, रखने तथा परोसने में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाए।
- गुणवत्ता नियंत्रण— खाद्य सामग्री तथा तैयार भोजन की गुणवत्ता की नियमित जाँच की जाए।
- पारदर्शी व्यवस्था— योजना के लिए प्राप्त धन तथा खाद्य सामग्री का उचित अभिलेख रखा जाए।
- नियमित निरीक्षण— विद्यालयों में भोजन वितरण सम्बन्धी व्यवस्थाओं की निगरानी की जाए।
- उत्तरदायित्व निर्धारण— भोजन तैयार करने तथा वितरण से जुड़े कर्मचारियों और अधिकारियों की जिम्मेदारियाँ स्पष्ट हों।
- शिक्षण कार्य प्रभावित न हो— भोजन सम्बन्धी व्यवस्थाएँ इस प्रकार संचालित हों कि शिक्षकों का मुख्य शिक्षण कार्य प्रभावित न हो।
इन उपायों से योजना के संचालन में सुधार किया जा सकता है तथा बच्चों को बेहतर पोषण एवं शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
16. मिड-डे मील योजना की वर्तमान व्यवस्था—PM POSHAN
मिड-डे मील योजना को आगे चलकर प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (Pradhan Mantri Poshan Shakti Nirman—PM POSHAN) के नाम से जारी रखा गया।
भारत सरकार ने 29 सितम्बर 2021 को वर्ष 2021–22 से 2025–26 की अवधि के लिए PM POSHAN योजना को स्वीकृति प्रदान की।
इसका मुख्य उद्देश्य पात्र सरकारी एवं सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में बच्चों को पका हुआ गर्म भोजन उपलब्ध कराना तथा उनके पोषण एवं शिक्षा में सुधार करना था।
इसके अन्तर्गत कक्षा 1 से 8 तक के पात्र विद्यार्थियों को भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था जारी रखी गई। निर्धारित व्यवस्थाओं के अनुसार सरकारी प्राथमिक विद्यालयों से सम्बन्धित बालवाटिका के बच्चों को भी सम्मिलित करने का प्रावधान किया गया।
इस प्रकार मिड-डे मील योजना का मूल उद्देश्य वर्तमान व्यवस्था में भी भूख और कुपोषण की समस्या कम करना तथा बच्चों की नियमित विद्यालयी उपस्थिति को प्रोत्साहित करना है।
समग्र निष्कर्ष
मिड-डे मील योजना (Mid-Day Meal Scheme) भारत सरकार की एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक एवं पोषण सम्बन्धी योजना है, जिसका राष्ट्रीय स्तर पर शुभारम्भ 15 अगस्त 1995 को किया गया।
इस योजना का मुख्य उद्देश्य विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराकर उनके नामांकन, नियमित उपस्थिति एवं प्रतिधारण में वृद्धि करना था।
पुस्तक में इसके 5 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं, जिनमें नामांकन बढ़ाना, शैक्षिक अपव्यय कम करना, नियमित उपस्थिति बढ़ाना, पोषण स्तर सुधारना तथा सामाजिक समानता विकसित करना शामिल हैं।
मिड-डे मील योजना का विस्तार वर्ष 2007–08 के दौरान उच्च प्राथमिक स्तर तक किया गया।
इस योजना में प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए 450 कैलोरी एवं 12 ग्राम प्रोटीन तथा उच्च प्राथमिक स्तर के लिए 700 कैलोरी एवं 20 ग्राम प्रोटीन का मानक निर्धारित है।
योजना के माध्यम से बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ उनकी नियमित उपस्थिति तथा शैक्षिक सहभागिता बढ़ाने का प्रयास किया गया।
हालाँकि भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता, वित्तीय पारदर्शिता तथा विद्यालयी प्रबन्धन से सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं को दूर करना आवश्यक है।
इस प्रकार मिड-डे मील योजना बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा के सार्वभौमीकरण तथा सामाजिक समानता को प्रोत्साहित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है।
- मिड-डे मील योजना का राष्ट्रीय स्तर पर शुभारम्भ 15 अगस्त 1995 को हुआ।
- इसका प्रारम्भिक आधिकारिक नाम National Programme of Nutritional Support to Primary Education (NP-NSPE) था।
- मिड-डे मील योजना का मुख्य उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना तथा विद्यालयों में नामांकन, उपस्थिति एवं प्रतिधारण बढ़ाना है।
- पुस्तक में इस योजना के 5 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।
- प्रमुख उद्देश्य हैं—नामांकन में वृद्धि, शैक्षिक अपव्यय में कमी, नियमित उपस्थिति, पोषण एवं स्वास्थ्य लाभ तथा सामाजिक समानता।
- वर्ष 1997–98 तक कार्यक्रम का विस्तार देश के सभी विकास खण्डों तक किया गया।
- 28 नवम्बर 2001 को सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी एवं सहायता प्राप्त प्राथमिक विद्यालयों में पका हुआ भोजन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
- वर्ष 2002 में शिक्षा गारंटी योजना तथा वैकल्पिक शिक्षा केन्द्रों के पात्र बच्चों को भी शामिल किया गया।
- वर्ष 2007 में शैक्षिक रूप से पिछड़े विकास खण्डों के उच्च प्राथमिक विद्यालयों में योजना का विस्तार हुआ।
- 1 अप्रैल 2008 से सभी पात्र क्षेत्रों के उच्च प्राथमिक विद्यालयों को भी सम्मिलित किया गया।
- मिड-डे मील योजना का प्रमुख लक्षित वर्ग कक्षा 1 से 8 तक के पात्र विद्यार्थी हैं।
- पुस्तक में योजना की आवश्यकता के 3 प्रमुख पक्ष बताए गए हैं—सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता, स्वच्छता तथा विद्यालय प्रबन्धन में सुधार।
- फूड फोर्टिफिकेशन का अर्थ खाद्य पदार्थों में आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व मिलाकर उनकी पौष्टिक गुणवत्ता बढ़ाना है।
- प्राथमिक स्तर के लिए भोजन का पोषण मानक 450 कैलोरी एवं 12 ग्राम प्रोटीन है।
- उच्च प्राथमिक स्तर के लिए भोजन का पोषण मानक 700 कैलोरी एवं 20 ग्राम प्रोटीन है।
- प्राथमिक स्तर पर प्रति बच्चा प्रतिदिन 100 ग्राम खाद्यान्न का मानक है।
- उच्च प्राथमिक स्तर पर प्रति बच्चा प्रतिदिन 150 ग्राम खाद्यान्न का मानक है।
- 100 ग्राम तथा 150 ग्राम खाद्यान्न की मात्रा है, तैयार भोजन का कुल वजन नहीं।
- योजना के शैक्षिक प्रभाव का मूल्यांकन नामांकन, उपस्थिति, प्रतिधारण, पोषण स्थिति एवं परीक्षा परिणामों के आधार पर किया जाता है।
- पुस्तक में 30 विद्यालयों के तुलनात्मक अध्ययन का उल्लेख है।
- पुस्तक के अनुसार पोषण सम्बन्धी अध्ययन में 1,361 मिड-डे मील वाले विद्यालयों के बच्चे तथा 1,333 अन्य विद्यालयों के बच्चे शामिल थे।
- पुस्तक में नामांकन, उपस्थिति, प्रतिधारण तथा शैक्षिक प्रदर्शन पर योजना के सकारात्मक प्रभावों का उल्लेख किया गया है।
- पुस्तक में मिड-डे मील योजना के 4 प्रमुख गुण बताए गए हैं।
- प्रमुख गुण हैं—नामांकन बढ़ना, वंचित बच्चों की शिक्षा को प्रोत्साहन, ड्रॉपआउट में कमी तथा पोषण एवं सामाजिक समानता में सुधार।
- पुस्तक में योजना के 4 प्रमुख दोष बताए गए हैं।
- प्रमुख दोष हैं—धन का अनुचित उपयोग, भोजन की स्वच्छता सम्बन्धी समस्याएँ, पर्याप्त गम्भीरता का अभाव तथा संचालन में लापरवाही।
- योजना की सफलता के लिए पौष्टिक भोजन, स्वच्छ रसोई, गुणवत्ता नियंत्रण, वित्तीय पारदर्शिता तथा नियमित निरीक्षण आवश्यक हैं।
- 29 सितम्बर 2021 को मिड-डे मील योजना को PM POSHAN के रूप में जारी रखने की स्वीकृति दी गई।
- PM POSHAN का पूरा नाम Pradhan Mantri Poshan Shakti Nirman है।
- सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य— मिड-डे मील योजना का मूल उद्देश्य पौष्टिक भोजन के माध्यम से बच्चों के स्वास्थ्य, नियमित उपस्थिति तथा प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण में सुधार करना है।
छात्रवृत्ति वितरण एवं अन्य प्रोत्साहन योजनाएँ—छात्रवृत्ति, फर्नीचर, निःशुल्क पाठ्यपुस्तक एवं यूनिफॉर्म
छात्रवृत्ति वितरण एवं अन्य प्रोत्साहन योजनाओं का परिचय
प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के लिए सभी बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिलाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी शिक्षा में आने वाली आर्थिक एवं सामाजिक बाधाओं को दूर करना भी आवश्यक है।
अनेक बच्चे गरीबी तथा आवश्यक शैक्षिक सामग्री के अभाव में नियमित रूप से विद्यालय नहीं जा पाते। कुछ विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकें, गणवेश तथा अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध न होने के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
इन समस्याओं को कम करने के लिए सरकार द्वारा छात्रवृत्ति वितरण एवं अन्य शैक्षिक प्रोत्साहन योजनाएँ संचालित की जाती हैं।
इन योजनाओं के अन्तर्गत विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता, निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें, गणवेश तथा विद्यालयों में आवश्यक फर्नीचर जैसी सुविधाएँ प्रदान करने की व्यवस्था की जाती है।
इनका मुख्य उद्देश्य शिक्षा की आर्थिक बाधाएँ कम करना, विद्यार्थियों का नामांकन एवं नियमित उपस्थिति बढ़ाना तथा सभी बच्चों को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराना है।
1. छात्रवृत्ति का अर्थ एवं परिभाषा
छात्रवृत्ति (Scholarship) वह आर्थिक सहायता है, जो किसी विद्यार्थी को उसकी शिक्षा जारी रखने अथवा पूरी करने के उद्देश्य से प्रदान की जाती है।
छात्रवृत्ति का उद्देश्य विद्यार्थियों की आर्थिक कठिनाइयों को कम करना तथा उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
सरल परिभाषा— किसी विद्यार्थी को उसकी शिक्षा पूरी करने के लिए प्रदान की जाने वाली ऐसी आर्थिक सहायता, जिसे सामान्यतः वापस नहीं करना पड़ता, छात्रवृत्ति कहलाती है।
छात्रवृत्ति सामान्य ऋण से अलग होती है, क्योंकि निर्धारित शर्तों के अनुसार दी गई छात्रवृत्ति की धनराशि सामान्यतः वापस नहीं करनी होती।
2. छात्रवृत्ति वितरण की पृष्ठभूमि
भारत में शिक्षा के विकास तथा विद्यार्थियों को समान शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न शिक्षा आयोगों ने सुझाव दिए।
पुस्तक के अनुसार कोठारी शिक्षा आयोग (1964–66) ने भी छात्रवृत्ति योजनाओं तथा अन्य शैक्षिक प्रोत्साहन सुविधाओं को लागू करने की सिफारिश की थी।
इससे पहले के शिक्षा आयोगों द्वारा भी विद्यार्थियों की शिक्षा को सुगम बनाने के लिए आर्थिक सहायता सम्बन्धी सुझाव दिए गए थे।
इन सुझावों का प्रमुख उद्देश्य यह था कि किसी योग्य अथवा आवश्यकता वाले विद्यार्थी की शिक्षा केवल आर्थिक कठिनाइयों के कारण बाधित न हो।
इसी उद्देश्य से विद्यार्थियों की आर्थिक स्थिति, शैक्षिक उपलब्धियों तथा अन्य निर्धारित मानदण्डों के आधार पर छात्रवृत्ति प्रदान करने की व्यवस्था विकसित की गई।
3. छात्रवृत्ति प्रदान करने के प्रमुख आधार
छात्रवृत्ति सभी विद्यार्थियों को एक ही आधार पर प्रदान नहीं की जाती। इसके लिए सम्बन्धित योजना के अनुसार विभिन्न पात्रता मानदण्ड निर्धारित किए जाते हैं।
पुस्तक में छात्रवृत्ति प्रदान करने के निम्नलिखित प्रमुख आधार बताए गए हैं।
1. मेधावी विद्यार्थी
ऐसे विद्यार्थी जो अध्ययन में अच्छा प्रदर्शन करते हैं तथा परीक्षाओं में निर्धारित शैक्षिक उपलब्धियाँ प्राप्त करते हैं, उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की जा सकती है।
इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को परिश्रम करने तथा शैक्षिक उपलब्धियों में सुधार करने के लिए प्रेरित करना है।
2. आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थी
ऐसे विद्यार्थी जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है और जिन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने में कठिनाई होती है।
छात्रवृत्ति के माध्यम से उनकी शिक्षा सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता प्रदान की जाती है।
3. सामाजिक रूप से वंचित विद्यार्थी
सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए विशेष छात्रवृत्ति योजनाएँ संचालित की जाती हैं।
इनका उद्देश्य शैक्षिक असमानता कम करना तथा वंचित विद्यार्थियों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना है।
4. कम आय वाले परिवारों के विद्यार्थी
ऐसे विद्यार्थियों को भी छात्रवृत्ति प्रदान की जा सकती है जिनके परिवार की आय सम्बन्धित योजना की निर्धारित सीमा से कम होती है।
इसका उद्देश्य पारिवारिक आय की कमी को विद्यार्थियों की शिक्षा में बाधा बनने से रोकना है।
ध्यान दें— किसी भी छात्रवृत्ति की वास्तविक पात्रता, आय सीमा तथा धनराशि सम्बन्धित सरकारी योजना के नियमों के अनुसार निर्धारित होती है।
4. छात्रवृत्ति वितरण की व्यवस्था
पुस्तक के अनुसार छात्रवृत्ति वितरण के मानक सरकार द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
विद्यार्थियों की पात्रता के आधार पर छात्रवृत्ति की धनराशि प्रदान करने की व्यवस्था की जाती है।
1. बैंक खाते के माध्यम से छात्रवृत्ति
पुस्तक में छात्रवृत्ति की धनराशि विद्यार्थियों के बैंक खातों में स्थानान्तरित करने का उल्लेख है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य छात्रवृत्ति की धनराशि सम्बन्धित विद्यार्थी तक पहुँचाना तथा वितरण प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाना है।
2. छोटे बच्चों की छात्रवृत्ति
पुस्तक में 10 वर्ष से कम आयु के विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति की धनराशि उनके अभिभावकों के खाते अथवा उनके संरक्षण में उपलब्ध कराने का उल्लेख है।
इसका उद्देश्य छोटे बच्चों की आर्थिक सहायता का उचित उपयोग सुनिश्चित करना था।
यह पुस्तक में वर्णित व्यवस्था है। वर्तमान भुगतान प्रक्रिया सम्बन्धित छात्रवृत्ति योजना के नियमों के अनुसार निर्धारित होती है।
3. शिक्षा के स्तर के अनुसार छात्रवृत्ति
पुस्तक के अनुसार प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक स्तर के विद्यार्थियों को अलग-अलग धनराशि की छात्रवृत्ति प्रदान करने की व्यवस्था का उल्लेख है।
इसका कारण विभिन्न शिक्षा स्तरों पर विद्यार्थियों की आवश्यकताओं में अन्तर होना है।
4. छात्रवृत्ति वितरण करने वाले विभाग
पुस्तक में छात्रवृत्ति वितरण से सम्बन्धित निम्नलिखित विभागों का उल्लेख किया गया है—
- जनजाति कल्याण विभाग।
- अल्पसंख्यक कल्याण विभाग।
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति से सम्बन्धित कल्याण विभाग।
- अन्य सम्बन्धित सरकारी एवं शैक्षिक संस्थाएँ।
इन विभागों के माध्यम से पात्र विद्यार्थियों को निर्धारित योजनाओं के अन्तर्गत आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।
5. ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में छात्रवृत्ति वितरण
पुस्तक में ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में छात्रवृत्ति वितरण की अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है।
ये व्यवस्थाएँ पुस्तक के ऐतिहासिक विवरण पर आधारित हैं।
1. ग्रामीण क्षेत्रों में छात्रवृत्ति वितरण
पुस्तक के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में कक्षा 1 से 10 तक के विद्यार्थियों के छात्रवृत्ति वितरण में स्थानीय प्रतिनिधियों तथा विद्यालय के अधिकारियों की भूमिका का उल्लेख किया गया है।
इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित व्यक्ति शामिल थे—
- ग्राम प्रधान।
- सम्बन्धित स्थानीय प्रतिनिधि।
- प्रधानाध्यापक।
- वरिष्ठ अध्यापक।
इस व्यवस्था का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के पात्र विद्यार्थियों तक छात्रवृत्ति की सुविधा पहुँचाना था।
2. शहरी क्षेत्रों में छात्रवृत्ति वितरण
पुस्तक के अनुसार शहरी क्षेत्रों में कक्षा 1 से 10 तक के विद्यार्थियों के छात्रवृत्ति वितरण में निम्नलिखित व्यक्तियों तथा संस्थाओं की भूमिका का उल्लेख है—
- प्रधानाध्यापक।
- नगर पालिका के सभासद।
- विद्यालय प्रबन्ध समिति के सदस्य।
- वरिष्ठ अध्यापक।
- विद्यालय प्रबन्धक द्वारा नामित प्रतिनिधि।
इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य पात्र विद्यार्थियों की पहचान तथा छात्रवृत्ति वितरण की प्रक्रिया में स्थानीय संस्थाओं का सहयोग प्राप्त करना था।
स्पष्टता— पुस्तक में वर्णित ग्रामीण एवं शहरी वितरण व्यवस्थाएँ पुरानी प्रशासनिक प्रक्रिया से सम्बन्धित हैं। वर्तमान समय में छात्रवृत्ति आवेदन, सत्यापन तथा भुगतान की प्रक्रिया सम्बन्धित योजना के अनुसार अलग हो सकती है।
6. छात्रवृत्ति वितरण का शैक्षिक महत्त्व
छात्रवृत्ति वितरण विद्यार्थियों को शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करने वाली महत्त्वपूर्ण व्यवस्था है।
इसका शैक्षिक महत्त्व निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है—
- आर्थिक सहायता— निर्धन विद्यार्थियों की शिक्षा सम्बन्धी आर्थिक कठिनाइयों को कम करना।
- शिक्षा के समान अवसर— वंचित एवं कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करना।
- शैक्षिक प्रोत्साहन— मेधावी विद्यार्थियों को बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करना।
- शिक्षा में निरन्तरता— आर्थिक कारणों से पढ़ाई बाधित होने की सम्भावना कम करना।
- सामाजिक न्याय— शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की शिक्षा को प्रोत्साहित करना।
7. अन्य शैक्षिक प्रोत्साहन योजनाएँ
छात्रवृत्ति के अतिरिक्त विद्यार्थियों की शिक्षा को सुगम बनाने के लिए अन्य प्रोत्साहन सुविधाएँ भी उपलब्ध कराई जाती हैं।
पुस्तक में सर्व शिक्षा अभियान के सन्दर्भ में निम्नलिखित 3 प्रमुख प्रोत्साहन सुविधाओं का उल्लेख किया गया है।
- विद्यार्थियों हेतु फर्नीचर की व्यवस्था।
- निःशुल्क पाठ्यपुस्तकों का वितरण।
- निःशुल्क यूनिफॉर्म अथवा गणवेश का वितरण।
इन सुविधाओं का उद्देश्य विद्यार्थियों को आवश्यक शैक्षिक संसाधन उपलब्ध कराना तथा शिक्षा में आने वाली आर्थिक कठिनाइयों को कम करना है।
8. विद्यार्थियों हेतु फर्नीचर की व्यवस्था
विद्यालयों में प्रभावशाली शिक्षण-अधिगम के लिए उपयुक्त बैठने तथा लिखने की सुविधाओं की आवश्यकता होती है।
इसलिए सरकार द्वारा प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए फर्नीचर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाती है।
1. प्राथमिक स्तर पर फर्नीचर
पुस्तक में प्राथमिक स्तर पर विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित पुरानी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है—
- कक्षा 1 से 3— विद्यार्थियों के बैठने एवं लिखने के लिए चौकी की व्यवस्था।
- कक्षा 4 से 5— विद्यार्थियों के बैठने के लिए टाटपट्टी की व्यवस्था।
पुस्तक में यह भी बताया गया है कि समय के साथ इन व्यवस्थाओं में परिवर्तन किए गए तथा विद्यार्थियों के लिए अधिक उपयुक्त फर्नीचर उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया गया।
2. उच्च प्राथमिक स्तर पर फर्नीचर
उच्च प्राथमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए मेज तथा कुर्सियों की व्यवस्था हेतु सरकारी अनुदान प्रदान करने का उल्लेख किया गया है।
इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को बैठने एवं अध्ययन करने के लिए उपयुक्त सुविधाएँ उपलब्ध कराना है।
3. फर्नीचर की व्यवस्था का महत्त्व
विद्यालयों में उपयुक्त फर्नीचर उपलब्ध होने से विद्यार्थियों को कक्षा में बैठने, लिखने तथा अध्ययन करने में सुविधा मिलती है।
इसके अतिरिक्त शिक्षण-अधिगम के लिए अधिक व्यवस्थित एवं सुविधाजनक वातावरण विकसित करने में सहायता मिलती है।
इस प्रकार फर्नीचर की व्यवस्था विद्यालयों की आवश्यक भौतिक सुविधाओं का महत्त्वपूर्ण भाग है।
9. मेधावी विद्यार्थियों के लिए विशेष छात्रवृत्ति
पुस्तक में सामान्य छात्रवृत्ति वितरण के अतिरिक्त माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों के लिए विशेष छात्रवृत्ति की ऐतिहासिक व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया गया है।
इनका उद्देश्य परीक्षाओं में उच्च स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना था।
1. हाईस्कूल परीक्षा में स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति
पुस्तक के अनुसार प्रदेश स्तर की हाईस्कूल परीक्षा में प्रथम 10 स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित छात्रवृत्ति की व्यवस्था का उल्लेख है।
| प्राप्त स्थान | छात्रवृत्ति | अवधि |
|---|---|---|
| प्रथम स्थान | ₹300 प्रतिमाह | 20 माह |
| द्वितीय एवं तृतीय स्थान | ₹250 प्रतिमाह | 20 माह |
| चतुर्थ से दसवाँ स्थान | ₹200 प्रतिमाह | 20 माह |
ये धनराशियाँ पुस्तक में दी गई ऐतिहासिक छात्रवृत्ति दरें हैं। इनका वर्तमान समय में लागू होना प्रमाणित नहीं है।
2. हायर सेकेण्डरी परीक्षा के मेधावी विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति
पुस्तक में हायर सेकेण्डरी परीक्षा में प्रदेश स्तर पर संकायवार उत्कृष्ट स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए भी छात्रवृत्ति का उल्लेख है।
इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित संकाय सम्मिलित बताए गए हैं—
- विज्ञान।
- वाणिज्य।
- कला।
- कृषि।
- गृह विज्ञान।
- फाइन आर्ट्स।
पुस्तक के अनुसार प्रत्येक संकाय में प्रथम तीन स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित छात्रवृत्ति का प्रावधान था।
| प्राप्त स्थान | छात्रवृत्ति | अवधि |
|---|---|---|
| प्रथम स्थान | ₹250 प्रतिमाह | 10 माह |
| द्वितीय एवं तृतीय स्थान | ₹200 प्रतिमाह | 10 माह |
इस व्यवस्था का उद्देश्य माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक स्तर पर मेधावी विद्यार्थियों को शिक्षा जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करना था।
ध्यान दें— हाईस्कूल तथा हायर सेकेण्डरी की उपर्युक्त छात्रवृत्तियाँ पुस्तक में दी गई अतिरिक्त ऐतिहासिक जानकारी हैं। ये प्रारम्भिक शिक्षा की कक्षा 1 से 8 तक की सामान्य छात्रवृत्ति दरें नहीं हैं।
10. निःशुल्क पाठ्यपुस्तक वितरण की व्यवस्था
निःशुल्क पाठ्यपुस्तक वितरण एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक प्रोत्साहन व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत पात्र विद्यार्थियों को बिना शुल्क के पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराई जाती हैं।
इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक कठिनाइयों के कारण विद्यार्थियों की शिक्षा में आने वाली बाधाओं को कम करना है।
पुस्तक में सरकारी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने की विभिन्न व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है।
1. प्राथमिक विद्यालयों में निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें
पुस्तक के अनुसार शासकीय प्राथमिक विद्यालयों में नामांकित सभी बालक-बालिकाओं को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने की व्यवस्था का उल्लेख है।
इसका उद्देश्य प्रारम्भिक कक्षाओं के सभी विद्यार्थियों को आवश्यक अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना है।
2. माध्यमिक स्तर पर पात्र विद्यार्थियों को सुविधा
पुस्तक में माध्यमिक स्तर पर बालिकाओं तथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के पात्र विद्यार्थियों के लिए निःशुल्क पाठ्यपुस्तकों की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
इन सुविधाओं का उद्देश्य वंचित तथा आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को शिक्षा जारी रखने के लिए सहायता देना था।
3. कक्षा 1 से 8 तक पाठ्यपुस्तक वितरण
पुस्तक में विशेष रूप से बताया गया है कि परिषदीय प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा 1 से 8 तक के सभी विद्यार्थियों को प्रतिवर्ष निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने की व्यवस्था थी।
इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को समय पर आवश्यक पाठ्यसामग्री उपलब्ध कराना तथा शिक्षा में समान अवसर प्रदान करना है।
4. पाठ्यपुस्तकों का वितरण
पुस्तक में पाठ्यपुस्तकों के वितरण के लिए प्रधानाध्यापक, विद्यालय प्रमुख तथा सम्बन्धित विद्यालयी समितियों की भूमिका का उल्लेख किया गया है।
इसके अतिरिक्त कक्षा 9 से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए भी विभिन्न पात्रता व्यवस्थाओं के अन्तर्गत संस्थाध्यक्ष के माध्यम से पाठ्यपुस्तक उपलब्ध कराने का उल्लेख है।
ये वितरण सम्बन्धी व्यवस्थाएँ पुस्तक के ऐतिहासिक विवरण पर आधारित हैं। वर्तमान पात्रता एवं वितरण प्रक्रिया सम्बन्धित सरकारी नियमों के अनुसार निर्धारित होती है।
11. निःशुल्क पाठ्यपुस्तक वितरण का महत्त्व
निःशुल्क पाठ्यपुस्तक वितरण विद्यार्थियों को आवश्यक शैक्षिक सामग्री उपलब्ध कराने की एक महत्त्वपूर्ण व्यवस्था है।
इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं—
- आर्थिक सहायता— विद्यार्थियों के परिवारों पर पाठ्यपुस्तक खरीदने का आर्थिक भार कम होता है।
- समान शैक्षिक अवसर— आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को भी आवश्यक पाठ्यसामग्री प्राप्त होती है।
- अध्ययन में सुविधा— विद्यार्थियों को कक्षा में पढ़ाए जाने वाले विषयों का नियमित अध्ययन करने में सहायता मिलती है।
- शिक्षा में निरन्तरता— आवश्यक पाठ्यपुस्तकों की कमी के कारण पढ़ाई में आने वाली बाधाएँ कम होती हैं।
- प्रारम्भिक शिक्षा का विकास— सभी विद्यार्थियों को अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराकर प्राथमिक शिक्षा के प्रसार में सहयोग मिलता है।
12. निःशुल्क यूनिफॉर्म अथवा गणवेश वितरण
निःशुल्क यूनिफॉर्म वितरण एक ऐसी शैक्षिक प्रोत्साहन व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत पात्र विद्यार्थियों को विद्यालय में पहनने के लिए गणवेश उपलब्ध कराया जाता है।
इस योजना का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों के परिवारों का आर्थिक भार कम करना तथा उन्हें नियमित विद्यालय आने के लिए प्रोत्साहित करना है।
पुस्तक में कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों के लिए निःशुल्क गणवेश उपलब्ध कराने की विभिन्न व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है।
1. गणवेश के लिए आर्थिक सहायता
पुस्तक के अनुसार एक पुरानी व्यवस्था में प्रत्येक विद्यार्थी के गणवेश हेतु ₹90 की धनराशि विद्यालय की सम्बन्धित समिति को उपलब्ध कराने का उल्लेख किया गया है।
इस धनराशि के माध्यम से विद्यार्थियों को गणवेश प्रदान करने की व्यवस्था की जाती थी।
महत्त्वपूर्ण— ₹90 प्रति विद्यार्थी की यह राशि केवल पुस्तक में दिया गया ऐतिहासिक प्रावधान है। यह वर्तमान उत्तर प्रदेश की यूनिफॉर्म सहायता राशि नहीं है।
2. गणवेश वितरण करने वाली संस्थाएँ
पुस्तक में गणवेश वितरण के लिए विद्यालय की सम्बन्धित समिति तथा विद्यालय प्रमुख की भूमिका का उल्लेख किया गया है।
इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित व्यक्ति एवं संस्थाएँ सम्मिलित थीं—
- विद्यालय की पालक-शिक्षक समिति अथवा सम्बन्धित समिति।
- समिति के अध्यक्ष।
- प्रधानाध्यापक।
- सम्बन्धित विद्यालय प्रशासन।
इस व्यवस्था का उद्देश्य पात्र विद्यार्थियों तक गणवेश की सुविधा पहुँचाना था।
3. बालिकाओं एवं ब्रिज कोर्स के विद्यार्थियों को गणवेश
पुस्तक में कक्षा 8 तक अध्ययनरत बालिकाओं तथा ब्रिज कोर्स में नामांकित पात्र विद्यार्थियों को भी गणवेश उपलब्ध कराने का उल्लेख है।
ब्रिज कोर्स (Bridge Course) ऐसी विशेष शिक्षण व्यवस्था है, जिसके माध्यम से विद्यालयी शिक्षा से वंचित बच्चों को नियमित कक्षाओं में प्रवेश के लिए तैयार किया जाता है।
गणवेश की सुविधा का उद्देश्य ऐसे विद्यार्थियों को विद्यालयी गतिविधियों में सम्मिलित होने के लिए प्रोत्साहित करना था।
4. दो सेट निःशुल्क यूनिफॉर्म की व्यवस्था
पुस्तक के अनुसार बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों तथा पात्र अशासकीय सहायता प्राप्त उच्च प्राथमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए दो सेट निःशुल्क यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों को आवश्यक विद्यालयी गणवेश उपलब्ध कराना तथा आर्थिक कठिनाइयों को कम करना था।
ध्यान दें— पुस्तक में ₹90 की पुरानी सहायता राशि तथा दो सेट यूनिफॉर्म की व्यवस्था अलग-अलग सन्दर्भों में दी गई है। इन्हें एक ही समय की समान सरकारी व्यवस्था नहीं समझना चाहिए।
13. निःशुल्क गणवेश वितरण का शैक्षिक महत्त्व
निःशुल्क गणवेश वितरण आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को विद्यालयी सुविधाएँ प्रदान करने की एक महत्त्वपूर्ण व्यवस्था है।
इसके प्रमुख शैक्षिक लाभ निम्नलिखित हैं—
- आर्थिक भार में कमी— गरीब परिवारों को विद्यार्थियों के गणवेश पर होने वाले खर्च से राहत मिलती है।
- नियमित उपस्थिति को प्रोत्साहन— आवश्यक विद्यालयी सुविधा मिलने से बच्चों को नियमित विद्यालय आने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
- समानता की भावना— सभी विद्यार्थियों के एक समान गणवेश पहनने से विद्यालय में समानता एवं सामूहिकता की भावना विकसित करने में सहायता मिलती है।
- वंचित बच्चों को सहायता— आर्थिक एवं सामाजिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को विद्यालयी गतिविधियों में भाग लेने के बेहतर अवसर मिलते हैं।
- शैक्षिक प्रोत्साहन— आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध होने से बच्चों की शिक्षा में आने वाली कुछ आर्थिक बाधाएँ कम होती हैं।
14. छात्रवृत्ति एवं अन्य प्रोत्साहन योजनाओं का तुलनात्मक सारांश
| योजना | प्रमुख सुविधा | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|
| छात्रवृत्ति वितरण | पात्र विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता। | आर्थिक कठिनाइयाँ कम करना तथा शिक्षा जारी रखने में सहयोग देना। |
| फर्नीचर की व्यवस्था | चौकी, मेज, कुर्सी तथा अन्य आवश्यक फर्नीचर। | कक्षा में सुविधाजनक शिक्षण-अधिगम वातावरण उपलब्ध कराना। |
| निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें | विद्यार्थियों को बिना शुल्क अध्ययन सामग्री। | पाठ्यपुस्तकों की कमी के कारण शिक्षा में आने वाली बाधाएँ कम करना। |
| निःशुल्क गणवेश | पात्र विद्यार्थियों को विद्यालयी यूनिफॉर्म। | आर्थिक सहायता देना तथा नियमित विद्यालय आने के लिए प्रोत्साहित करना। |
15. छात्रवृत्ति एवं प्रोत्साहन योजनाओं का समग्र शैक्षिक महत्त्व
छात्रवृत्ति वितरण एवं अन्य प्रोत्साहन योजनाएँ प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण की दिशा में महत्त्वपूर्ण सहयोग प्रदान करती हैं।
इन योजनाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को आवश्यक आर्थिक सहायता तथा शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
छात्रवृत्ति निर्धन एवं मेधावी विद्यार्थियों को शिक्षा जारी रखने में सहायता प्रदान करती है।
निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों को अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराती हैं, जबकि गणवेश वितरण से परिवारों का आर्थिक भार कम करने में सहयोग मिलता है।
विद्यालयों में फर्नीचर की उपलब्धता से बच्चों को सुविधाजनक वातावरण में अध्ययन करने का अवसर प्राप्त होता है।
इस प्रकार इन योजनाओं के माध्यम से शैक्षिक समानता, विद्यालयी सहभागिता तथा शिक्षा में निरन्तरता को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
समग्र निष्कर्ष
छात्रवृत्ति वितरण एवं अन्य प्रोत्साहन योजनाएँ विद्यार्थियों को आर्थिक एवं शैक्षिक सहायता प्रदान करने वाली महत्त्वपूर्ण व्यवस्थाएँ हैं।
छात्रवृत्ति का अर्थ है किसी विद्यार्थी को उसकी शिक्षा पूरी करने के उद्देश्य से प्रदान की जाने वाली ऐसी आर्थिक सहायता, जिसे सामान्यतः वापस नहीं करना पड़ता।
पुस्तक के अनुसार छात्रवृत्ति देने के प्रमुख आधार मेधावी विद्यार्थी, निर्धन विद्यार्थी, वंचित विद्यार्थी तथा कम आय वाले परिवार हैं।
छात्रवृत्ति के अतिरिक्त विद्यालयों में फर्नीचर, निःशुल्क पाठ्यपुस्तकों तथा निःशुल्क गणवेश की व्यवस्था भी की जाती है।
इन सुविधाओं का उद्देश्य विद्यार्थियों की शिक्षा में आने वाली आर्थिक कठिनाइयों को कम करना तथा उन्हें नियमित विद्यालय आने के लिए प्रोत्साहित करना है।
इस प्रकार छात्रवृत्ति वितरण एवं अन्य प्रोत्साहन योजनाएँ विद्यार्थियों को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराने तथा प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण में सहयोग प्रदान करने के महत्त्वपूर्ण साधन हैं।
- छात्रवृत्ति (Scholarship) वह आर्थिक सहायता है, जो विद्यार्थी को उसकी शिक्षा जारी रखने अथवा पूरी करने के लिए प्रदान की जाती है।
- छात्रवृत्ति में प्राप्त धनराशि सामान्यतः वापस नहीं करनी पड़ती।
- कोठारी शिक्षा आयोग (1964–66) ने छात्रवृत्ति एवं अन्य शैक्षिक प्रोत्साहन योजनाओं की सिफारिश की थी।
- छात्रवृत्ति के प्रमुख आधार हैं—मेधावी विद्यार्थी, निर्धन विद्यार्थी, वंचित विद्यार्थी तथा कम आय वाले परिवार।
- छात्रवृत्ति की पात्रता एवं धनराशि सम्बन्धित सरकार तथा योजना के निर्धारित मानकों पर आधारित होती है।
- पुस्तक में छात्रवृत्ति की धनराशि विद्यार्थियों के बैंक खातों में स्थानान्तरित करने का उल्लेख है।
- पुस्तक के अनुसार 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों की छात्रवृत्ति उनके अभिभावकों के खाते अथवा संरक्षण में प्रदान करने की व्यवस्था थी।
- प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर पर छात्रवृत्ति की धनराशि अलग-अलग हो सकती है।
- छात्रवृत्ति वितरण में जनजाति कल्याण, अल्पसंख्यक कल्याण तथा अन्य सम्बन्धित विभागों की भूमिका होती है।
- पुस्तक में ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के लिए छात्रवृत्ति वितरण की अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं का उल्लेख है।
- पुस्तक में 3 प्रमुख अन्य प्रोत्साहन सुविधाएँ बताई गई हैं—फर्नीचर, निःशुल्क पाठ्यपुस्तक तथा निःशुल्क यूनिफॉर्म।
- फर्नीचर की व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों को कक्षा में सुविधाजनक अध्ययन वातावरण प्रदान करना है।
- पुस्तक में प्राथमिक स्तर पर कक्षा 1–3 के लिए चौकी तथा कक्षा 4–5 के लिए टाटपट्टी की पुरानी व्यवस्था का उल्लेख है।
- उच्च प्राथमिक स्तर पर मेज एवं कुर्सियों के लिए अनुदान देने की व्यवस्था का उल्लेख है।
- पुस्तक के अनुसार हाईस्कूल परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त विद्यार्थी को ₹300 प्रतिमाह की ऐतिहासिक छात्रवृत्ति का प्रावधान था।
- हाईस्कूल परीक्षा में द्वितीय एवं तृतीय स्थान के लिए ₹250 प्रतिमाह तथा चतुर्थ से दसवें स्थान तक ₹200 प्रतिमाह का उल्लेख है।
- हाईस्कूल के उपर्युक्त छात्रवृत्ति प्रावधान की अवधि 20 माह थी।
- हायर सेकेण्डरी स्तर पर संकायवार प्रथम स्थान के लिए ₹250 प्रतिमाह तथा द्वितीय एवं तृतीय स्थान के लिए ₹200 प्रतिमाह का उल्लेख है।
- हायर सेकेण्डरी की उक्त छात्रवृत्ति अवधि 10 माह थी।
- ये सभी छात्रवृत्ति दरें पुस्तक की ऐतिहासिक व्यवस्थाएँ हैं, वर्तमान दरें नहीं।
- निःशुल्क पाठ्यपुस्तक वितरण का उद्देश्य विद्यार्थियों को बिना शुल्क आवश्यक अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना है।
- पुस्तक में परिषदीय प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के कक्षा 1 से 8 तक सभी विद्यार्थियों के लिए निःशुल्क पाठ्यपुस्तकों का उल्लेख है।
- निःशुल्क पाठ्यपुस्तक वितरण से परिवारों का आर्थिक भार कम होता है तथा विद्यार्थियों को अध्ययन में सहायता मिलती है।
- निःशुल्क यूनिफॉर्म वितरण का उद्देश्य विद्यार्थियों को विद्यालयी गणवेश उपलब्ध कराना तथा शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना है।
- पुस्तक में यूनिफॉर्म के लिए ₹90 प्रति विद्यार्थी की एक पुरानी सहायता व्यवस्था का उल्लेख है।
- पुस्तक में पात्र विद्यार्थियों के लिए दो सेट निःशुल्क यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने की व्यवस्था का भी उल्लेख है।
- निःशुल्क यूनिफॉर्म तथा पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों की शिक्षा में आने वाली आर्थिक कठिनाइयाँ कम करने में सहायक हैं।
- सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य— छात्रवृत्ति एवं अन्य प्रोत्साहन योजनाओं का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को आर्थिक एवं शैक्षिक सहायता देकर शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराना तथा प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण को प्रोत्साहित करना है।