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Home Study Material Semester 2 प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास पाठ्यचर्या एवं शिक्षक शिक्षा
Chapter 4 • प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास

पाठ्यचर्या एवं शिक्षक शिक्षा

UP DELED Semester 2 के विषय प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास के इस अध्याय में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 की पृष्ठभूमि, अर्थ, उद्देश्य, आवश्यकता, प्रमुख बिन्दुओं, मार्गदर्शक सिद्धान्तों, विभिन्न शैक्षिक स्तरों की पाठ्यचर्या, समस्याओं एवं समाधानों तथा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष उद्देश्यों, आवश्यकता और महत्त्व का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

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Topic 1 राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005—परिचय, पाठ्यचर्या का अर्थ, ढाँचा, उद्देश्य एवं आवश्यकता

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005—परिचय, पाठ्यचर्या का अर्थ, ढाँचा, उद्देश्य एवं आवश्यकता

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 का परिचय

भारत एक बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक तथा विविधताओं वाला देश है। यहाँ अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों की भाषाएँ, सामाजिक परिस्थितियाँ, संस्कृति और शैक्षिक आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न हैं।

ऐसी स्थिति में यह प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि देश के सभी बच्चों के लिए विद्यालयी शिक्षा कैसी होनी चाहिए तथा उन्हें क्या और किस प्रकार पढ़ाया जाना चाहिए।

इन्हीं प्रश्नों का समाधान करने तथा विद्यालयी शिक्षा को बच्चों के जीवन और आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 (National Curriculum Framework—NCF 2005) तैयार की गई।

इस रूपरेखा में शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान प्राप्त करने तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि बच्चों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व, अनुभव, सृजनात्मकता तथा सामाजिक जीवन के विकास पर भी बल दिया गया।

1. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 की पृष्ठभूमि

भारत में शिक्षा की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार समय-समय पर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या में सुधार किए जाते रहे हैं।

सन् 2000 में एक राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा तैयार की गई थी। इसके बाद देश की सामाजिक परिस्थितियों, शैक्षिक आवश्यकताओं तथा शिक्षा सम्बन्धी विचारों में परिवर्तन हुआ।

सन् 2004 में केन्द्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के स्थान पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की सरकार बनी।

पुस्तक के अनुसार तत्कालीन सरकार ने वर्ष 2000 की पाठ्यचर्या के कुछ प्रावधानों की धार्मिक दृष्टि से आलोचना की तथा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप नई पाठ्यचर्या तैयार करने पर बल दिया।

इसके अतिरिक्त तेजी से बदलती वैज्ञानिक, तकनीकी तथा सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए भी विद्यालयी शिक्षा में सुधार आवश्यक माना गया।

इसी पृष्ठभूमि में नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा तैयार करने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई।

2. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 का निर्माण

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के निर्माण के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय की पहल पर विभिन्न शिक्षाविदों, अध्यापकों तथा शिक्षा से सम्बन्धित संस्थाओं की सहायता ली गई।

1. राष्ट्रीय संचालन समिति का गठन

नई पाठ्यचर्या रूपरेखा तैयार करने के लिए प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय संचालन समिति (National Steering Committee) का गठन किया गया।

इस समिति का प्रमुख कार्य नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या के निर्माण को उचित दिशा प्रदान करना था।

2. राष्ट्रीय फोकस समूहों का गठन

पाठ्यचर्या के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करने के लिए 21 राष्ट्रीय फोकस समूह (National Focus Groups) बनाए गए।

इन समूहों का उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं, विषयों तथा आवश्यकताओं पर विचार करके उपयोगी सुझाव प्रस्तुत करना था।

3. NCERT की बैठक

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा 14 जुलाई 2004 से 19 जुलाई 2004 तक छह दिवसीय बैठक आयोजित की गई।

इस बैठक में विद्यालयी शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।

4. विभिन्न वर्गों की सहभागिता

नई पाठ्यचर्या के निर्माण में केवल शिक्षाविदों के विचारों को ही महत्त्व नहीं दिया गया, बल्कि शिक्षा से जुड़े विभिन्न वर्गों के सुझाव भी प्राप्त किए गए।

इस प्रक्रिया में निम्नलिखित व्यक्तियों एवं संस्थाओं ने भाग लिया—

  • प्रतिष्ठित शिक्षाविद् एवं शिक्षा विशेषज्ञ।
  • विद्यालयों के शिक्षक।
  • अभिभावक।
  • गैर-सरकारी संस्थाओं के प्रतिनिधि।
  • शिक्षा से सम्बन्धित अन्य व्यक्ति एवं संस्थाएँ।

इस व्यापक विचार-विमर्श का उद्देश्य ऐसी पाठ्यचर्या तैयार करना था जो बच्चों की वास्तविक आवश्यकताओं तथा इक्कीसवीं शताब्दी की चुनौतियों के अनुरूप हो।

3. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 का प्रकाशन

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा के पुनरीक्षण की प्रक्रिया के अन्तर्गत सन् 2005 में नई रूपरेखा तैयार की गई।

इसका प्रकाशन दिसम्बर 2005 में किया गया।

पुस्तक के अनुसार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में पाठ्यचर्या के समय-समय पर पुनरीक्षण की बात कही गई थी। प्रत्येक 5 वर्ष के अन्तराल पर पाठ्यचर्या की समीक्षा और आवश्यक संशोधन करने पर बल दिया गया।

इसी क्रम में वर्ष 2000 की पाठ्यचर्या के बाद वर्ष 2005 की नई रूपरेखा तैयार की गई।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में कक्षा 1 से 12 तक की विद्यालयी शिक्षा के लिए पाठ्यचर्या सम्बन्धी दिशा-निर्देश प्रस्तुत किए गए।

इसमें विभिन्न शैक्षिक स्तरों पर क्या पढ़ाया जाए, कैसे पढ़ाया जाए तथा बच्चों के अधिगम का आकलन किस प्रकार किया जाए, इन विषयों पर विशेष ध्यान दिया गया।

4. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के पाँच अध्याय

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 का मूल दस्तावेज 5 अध्यायों में विभाजित है।

इन अध्यायों में शिक्षा के उद्देश्यों, अधिगम की प्रकृति, पाठ्यचर्या, विद्यालयी वातावरण तथा शिक्षा-व्यवस्था में सुधार से सम्बन्धित विषय शामिल हैं।

अध्याय शीर्षक
प्रथम परिप्रेक्ष्य
द्वितीय सीखना और ज्ञान
तृतीय पाठ्यचर्या के क्षेत्र, स्कूल की अवस्थाएँ और आकलन
चतुर्थ विद्यालय एवं कक्षा का वातावरण
पंचम व्यवस्थागत सुधार

इस प्रकार NCF-2005 में केवल पाठ्यविषयों का निर्धारण नहीं किया गया, बल्कि सीखने की प्रक्रिया, मूल्यांकन, विद्यालयी वातावरण तथा शिक्षा-व्यवस्था के सुधार को भी महत्त्व दिया गया।

5. पाठ्यचर्या का अर्थ

पाठ्यचर्या (Curriculum) से आशय विद्यालय में बालकों को प्राप्त होने वाले समस्त शैक्षिक अनुभवों, अधिगम गतिविधियों तथा पाठ्यक्रम आदि के समग्र रूप से है।

सरल शब्दों में, विद्यालय में बच्चा जो कुछ पढ़ता है, सीखता है तथा विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से अनुभव प्राप्त करता है, उन सभी का समग्र रूप पाठ्यचर्या कहलाता है।

पाठ्यचर्या का मुख्य उद्देश्य बालक के पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करना है।

इसमें केवल विभिन्न विषयों का ज्ञान प्रदान करना ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि बच्चों में उचित अभिवृत्तियों तथा जीवन-शैलियों का विकास करना भी आवश्यक समझा जाता है।

पाठ्यचर्या की प्रमुख विशेषताएँ
  • पाठ्यचर्या में विद्यालय के सभी महत्त्वपूर्ण शैक्षिक एवं अधिगम अनुभव शामिल होते हैं।
  • यह केवल पाठ्यपुस्तकों अथवा निर्धारित विषयों तक सीमित नहीं होती।
  • इसका प्रमुख लक्ष्य बालक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करना है।
  • पाठ्यचर्या ज्ञान के साथ उपयुक्त अभिवृत्तियों और जीवन-शैलियों के विकास पर भी ध्यान देती है।
  • यह बालक की शैक्षिक आवश्यकताओं तथा उसके विकास से सम्बन्धित अनुभवों को महत्त्व देती है।

6. पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम में अन्तर

पाठ्यचर्या के अर्थ को समझने के लिए पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्या के बीच अन्तर समझना उपयोगी है।

पाठ्यक्रम (Syllabus) किसी विषय में पढ़ाई जाने वाली निर्धारित विषयवस्तु को दर्शाता है, जबकि पाठ्यचर्या (Curriculum) में पाठ्यक्रम के साथ बालक के समस्त शैक्षिक अनुभव और अधिगम गतिविधियाँ भी शामिल होती हैं।

उदाहरण के लिए, गणित के निर्धारित अध्याय पाठ्यक्रम का भाग हैं। लेकिन गणित पढ़ने के साथ विभिन्न गतिविधियों में भाग लेना, समस्याएँ हल करना तथा अनुभव प्राप्त करना व्यापक पाठ्यचर्या का हिस्सा है।

अतः पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या का एक अंग है, जबकि पाठ्यचर्या का क्षेत्र उससे अधिक व्यापक होता है।

7. पाठ्यचर्या ढाँचे का अर्थ

पाठ्यचर्या ढाँचा (Curriculum Framework) एक व्यापक रूपरेखा है, जिसके आधार पर शिक्षा के किसी विशेष स्तर के उद्देश्य, विषयवस्तु, शिक्षण-विधियाँ तथा अधिगम की रणनीतियाँ निर्धारित की जाती हैं।

इसमें शिक्षा के प्रमुख तत्त्वों और उनकी प्राप्ति के सम्भावित उपायों के सम्बन्ध में मार्गदर्शन दिया जाता है।

पाठ्यचर्या ढाँचा विद्यालयों, समुदायों तथा शिक्षा से सम्बन्धित संस्थाओं को पाठ्यचर्या के निर्माण और क्रियान्वयन के लिए आवश्यक दिशा प्रदान करता है।

सरल शब्दों में— पाठ्यचर्या ढाँचा यह निर्धारित करने में सहायता करता है कि बच्चों को क्या पढ़ाया जाए, कितना पढ़ाया जाए, किस प्रकार पढ़ाया जाए तथा सीखने के लिए किन संसाधनों की आवश्यकता होगी।

8. पाठ्यचर्या ढाँचा किस प्रकार सहायता करता है?

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा के अनुसार पाठ्यचर्या ढाँचा विद्यालयी शिक्षा को व्यवस्थित करने तथा बालकों की आवश्यकताओं के अनुरूप अधिगम अनुभव प्रदान करने में सहायता करता है।

पुस्तक में पाठ्यचर्या ढाँचे के निम्नलिखित 6 प्रमुख कार्य बताए गए हैं।

1. बालक-केंद्रित अधिगम क्षेत्रों का निर्धारण

पाठ्यचर्या ढाँचा बच्चों को शिक्षा का केन्द्र-बिन्दु मानकर अधिगम क्षेत्रों को निर्धारित करने में सहायता करता है।

इसका अर्थ है कि पाठ्यचर्या का निर्माण केवल विषयों को ध्यान में रखकर न किया जाए, बल्कि बालकों की सीखने की आवश्यकताओं को भी महत्त्व दिया जाए।

2. अधिगम क्षेत्रों का विस्तार एवं समय निर्धारण

पाठ्यचर्या ढाँचा प्रत्येक अधिगम क्षेत्र की विषयवस्तु तथा उसके विस्तार का निर्धारण करने में सहायता करता है।

इसके साथ ही विभिन्न अधिगम क्षेत्रों के लिए शिक्षण समय का उचित आवंटन करने का मार्गदर्शन भी प्रदान करता है।

3. शैक्षिक सामग्री का विकास

पाठ्यचर्या ढाँचे के आधार पर विद्यार्थियों के लिए आवश्यक शैक्षिक पैकेज तथा सहायक शिक्षण सामग्री विकसित की जाती है।

इसका उद्देश्य शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना है।

4. विद्यालयी संसाधनों की पहचान एवं प्रबन्धन

पाठ्यचर्या ढाँचा विद्यालयों के भौतिक तथा मानवीय संसाधनों की पहचान करने और उनका उचित प्रबन्धन करने में सहायता करता है।

भौतिक संसाधनों में विद्यालय भवन और शिक्षण सामग्री जैसी सुविधाएँ आती हैं, जबकि मानवीय संसाधनों में शिक्षक तथा अन्य कर्मचारी शामिल होते हैं।

5. न्यूनतम अधिगम स्तर का निर्धारण

पाठ्यचर्या ढाँचा न्यूनतम अधिगम स्तर (Minimum Level of Learning) की धारणा को परिभाषित करने में सहायता करता है।

इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि शिक्षा के किसी विशेष स्तर पर बालकों से न्यूनतम रूप से क्या सीखने की अपेक्षा की जानी चाहिए और पाठ्यचर्या में उसे किस प्रकार स्थान दिया जाए।

6. प्रत्येक बालक की आवश्यकताओं के अनुसार योजना

सभी बच्चों की रुचियाँ, योग्यताएँ तथा सीखने की आवश्यकताएँ समान नहीं होतीं।

इसलिए पाठ्यचर्या ढाँचा प्रत्येक बालक की व्यक्तिगत आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अधिगम अनुभवों की योजना बनाने में सहायता करता है।

इस प्रकार पाठ्यचर्या ढाँचा विद्यालयी शिक्षा को अधिक व्यवस्थित, बालक-केंद्रित तथा आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

9. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के उद्देश्य

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 का मुख्य उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा को बच्चों के जीवन, अनुभवों तथा सीखने की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ना था।

इसके अन्तर्गत शिक्षा को अधिक सृजनात्मक, लचीला तथा बालक के व्यक्तित्व विकास के अनुकूल बनाने पर बल दिया गया।

पुस्तक में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा के निम्नलिखित 6 प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं।

1. विभिन्न विषयों में सम्बन्ध स्थापित करना

शिक्षा के विभिन्न विषयों अथवा अनुशासनों (Disciplines) के बीच उचित सम्बन्ध स्थापित करना।

इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को अलग-अलग विषयों के ज्ञान को परस्पर जोड़कर समझने के अवसर प्रदान करना था।

2. शिक्षा को विद्यालय के बाहरी जीवन से जोड़ना

विद्यालय में प्राप्त शिक्षा और ज्ञान को वास्तविक जीवन से जोड़ा जाए।

बच्चों को ऐसा सामान्य ज्ञान प्रदान किया जाए, जिसका उपयोग वे जीवन की विभिन्न परिस्थितियों और क्षेत्रों में कर सकें।

इससे शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान न रहकर दैनिक जीवन में उपयोगी बन सकेगी।

3. सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विकास

बालकों के सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक विकास पर ध्यान दिया जाए।

इसका उद्देश्य बच्चों को उचित जीवन-मूल्यों तथा सांस्कृतिक समझ के विकास के अवसर प्रदान करना था।

4. शिक्षण-अधिगम में सृजनात्मकता का विकास

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के विभिन्न पक्षों में विविध शिक्षण उपागमों का प्रयोग किया जाए।

विभिन्न प्रकार की शिक्षण-विधियों और गतिविधियों के माध्यम से बच्चों की सृजनात्मकता तथा सीखने की क्षमता विकसित की जाए।

5. परीक्षा प्रणाली को लचीला बनाना

परीक्षा प्रणाली को अधिक लचीला तथा एकीकृत बनाया जाए।

इसका उद्देश्य ऐसी मूल्यांकन व्यवस्था विकसित करना था जो बच्चों की सीखने की प्रक्रिया के साथ उचित सम्बन्ध स्थापित कर सके।

6. बच्चों को स्वयं ज्ञान निर्माण के योग्य बनाना

बालकों को अपने अनुभवों के आधार पर स्वयं ज्ञान का निर्माण करने में समर्थ बनाया जाए।

इसके लिए उनकी सामाजिक, आर्थिक तथा जातीय पृष्ठभूमि को मजबूत बनाने और उसे शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में महत्त्व देने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य यह था कि बच्चे केवल शिक्षक द्वारा बताई गई बातें याद न करें, बल्कि अपने अनुभवों और समझ के आधार पर ज्ञान प्राप्त कर सकें।

10. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 की आवश्यकता

भारतीय समाज तथा शिक्षा-व्यवस्था में समय के साथ अनेक परिवर्तन हो रहे थे। इक्कीसवीं शताब्दी की नई आवश्यकताओं, सामाजिक विविधताओं तथा आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप शिक्षा को विकसित करना आवश्यक हो गया था।

इसी कारण राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 तैयार की गई।

पुस्तक में इसकी आवश्यकता के निम्नलिखित 7 प्रमुख कारण बताए गए हैं।

1. इक्कीसवीं शताब्दी की माँग

इक्कीसवीं शताब्दी में शिक्षा की भूमिका पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक हो गई है।

वर्तमान समय में शिक्षा को सामाजिक एवं आर्थिक विकास के साथ कमजोर वर्गों के सशक्तीकरण का महत्त्वपूर्ण साधन माना जाता है।

इसके अतिरिक्त वैश्विक सभ्यता के विकास तथा आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं में भी शिक्षा का विशेष योगदान है।

इसलिए बदलते समय के अनुरूप एक सुव्यवस्थित तथा आधुनिक पाठ्यचर्या तैयार करना आवश्यक था।

2. भारतीय समाज में विविधता

भारत में विभिन्न प्रकार के क्षेत्र, भाषाएँ, धर्म, आर्थिक परिस्थितियाँ तथा सामाजिक स्तर पाए जाते हैं।

इन विविधताओं के कारण बच्चों की शैक्षिक आवश्यकताएँ भी अलग-अलग होती हैं।

ऐसी पाठ्यचर्या आवश्यक थी जो भारतीय समाज की विविधताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा प्रदान करने तथा उनसे सम्बन्धित समस्याओं के समाधान में सहायता कर सके।

इसलिए भारतीय समाज की विविधता राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण कारण बनी।

3. शिक्षा-व्यवस्था में परिवर्तन की आवश्यकता

शिक्षा की स्थिति तथा उसकी प्रभावशीलता के सम्बन्ध में शिक्षकों, अभिभावकों, समाज के विभिन्न वर्गों और स्वयं बच्चों द्वारा असन्तोष व्यक्त किया जा रहा था।

विभिन्न समूहों ने विचार-विमर्श के दौरान तत्कालीन शिक्षा-व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता बताई।

इन परिस्थितियों में बच्चों की आवश्यकताओं और समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप पाठ्यचर्या में परिवर्तन करना आवश्यक हो गया।

4. संवैधानिक बाध्यता

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था समानता तथा समता के मूल्यों पर आधारित है।

संविधान से जुड़े ये मूल्य देश की सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षिक व्यवस्था को भी प्रभावित करते हैं।

इसलिए ऐसी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की आवश्यकता थी जो लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप हो तथा शिक्षा में समानता और समता की भावना को महत्त्व दे।

इस प्रकार संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप शिक्षा का विकास भी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण कारण था।

5. NCERT द्वारा आवधिक पुनरीक्षण

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रावधानों के अनुसार पाठ्यचर्या का समय-समय पर पुनरीक्षण किया जाना आवश्यक माना गया।

पुस्तक के अनुसार NCERT द्वारा लगभग प्रत्येक 5 वर्ष में पाठ्यचर्या की समीक्षा तथा आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए।

इसका कारण यह था कि शिक्षा के उद्देश्यों, मूल्यों तथा सामाजिक आवश्यकताओं में तेजी से परिवर्तन होते रहते हैं।

इसलिए पाठ्यचर्या को भी नवीन परिस्थितियों और बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करते रहना आवश्यक था।

6. शिक्षा का आधुनिकीकरण

आधुनिक युग में विज्ञान, तकनीकी, संचार तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में निरन्तर विकास हो रहा है।

इन परिवर्तनों के अनुसार शिक्षा की विषयवस्तु और शिक्षण-प्रक्रिया का आधुनिकीकरण भी आवश्यक है।

इसलिए ऐसी पाठ्यचर्या की आवश्यकता थी जो आधुनिक परिस्थितियों तथा शिक्षा की नवीन आवश्यकताओं के अनुरूप हो।

7. शिक्षा के लिए व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करना

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 की आवश्यकता केवल नए पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए नहीं थी।

इसका उद्देश्य बच्चों की विद्यालयी शिक्षा के लिए एक विस्तृत एवं स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत करना भी था।

इस रूपरेखा के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया कि बच्चों की शिक्षा के लिए क्या वांछनीय है तथा पाठ्यचर्या का निर्धारण किन आधारों पर किया जाना चाहिए।

इसके लिए बच्चों के सीखने से सम्बन्धित विषयों, ज्ञान की प्रकृति तथा विद्यालय को एक संस्था के रूप में समझने पर विशेष बल दिया गया।

इस प्रकार NCF-2005 ने शिक्षा से जुड़े व्यक्तियों और संस्थाओं को पाठ्यचर्या के निर्माण के लिए एक व्यापक आधार प्रदान किया।

11. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 का शैक्षिक महत्त्व

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 ने विद्यालयी शिक्षा को बच्चों की आवश्यकताओं तथा वास्तविक जीवन से जोड़ने के लिए एक व्यापक दिशा प्रस्तुत की।

इसमें शिक्षा को केवल निर्धारित पाठ्यपुस्तकों और विषयवस्तु तक सीमित रखने के बजाय बालकों के अनुभवों, अधिगम प्रक्रियाओं तथा सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास पर बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त विभिन्न विषयों में सम्बन्ध स्थापित करने, सृजनात्मकता विकसित करने, परीक्षा प्रणाली को लचीला बनाने तथा बच्चों को स्वयं ज्ञान निर्माण के योग्य बनाने को महत्त्व दिया गया।

इस प्रकार NCF-2005 का मुख्य उद्देश्य ऐसी पाठ्यचर्या के विकास का आधार प्रदान करना था जो बालक-केंद्रित, जीवन से सम्बन्धित, आधुनिक, समतामूलक तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए उपयोगी हो।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • NCF का पूरा नाम National Curriculum Framework तथा हिन्दी नाम राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा है।
  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 का निर्माण NCERT द्वारा किया गया तथा इसका प्रकाशन दिसम्बर 2005 में हुआ।
  • इसके निर्माण के लिए प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में राष्ट्रीय संचालन समिति का गठन किया गया।
  • पाठ्यचर्या के विभिन्न पक्षों पर विचार करने के लिए 21 राष्ट्रीय फोकस समूह बनाए गए।
  • NCERT द्वारा 14 से 19 जुलाई 2004 तक छह दिवसीय बैठक आयोजित की गई।
  • NCF-2005 में कक्षा 1 से 12 तक की विद्यालयी शिक्षा के लिए पाठ्यचर्या सम्बन्धी रूपरेखा प्रस्तुत की गई।
  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 का मूल दस्तावेज कुल 5 अध्यायों में विभाजित है।
  • इसके पाँच अध्याय हैं—परिप्रेक्ष्य, सीखना और ज्ञान, पाठ्यचर्या के क्षेत्र एवं आकलन, विद्यालय एवं कक्षा का वातावरण तथा व्यवस्थागत सुधार।
  • पाठ्यचर्या विद्यालय में बच्चों को प्राप्त होने वाले समस्त शैक्षिक अनुभवों, अधिगम गतिविधियों तथा पाठ्यक्रम का समग्र रूप है।
  • पाठ्यचर्या का मुख्य उद्देश्य बालक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करना है।
  • पाठ्यचर्या ढाँचा शिक्षा के उद्देश्यों, विषयवस्तु, शिक्षण-विधियों तथा अधिगम रणनीतियों के निर्धारण के लिए व्यापक रूपरेखा प्रदान करता है।
  • पाठ्यचर्या ढाँचे के प्रमुख कार्य हैं—बालक-केंद्रित अधिगम क्षेत्रों का निर्धारण, समय आवंटन, शैक्षिक सामग्री का विकास, संसाधनों का प्रबन्धन, न्यूनतम अधिगम स्तर तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार योजना।
  • NCF-2005 का एक प्रमुख उद्देश्य विद्यालयी ज्ञान को बाहरी जीवन से जोड़ना था।
  • इसके अन्य उद्देश्य थे—विभिन्न विषयों में सम्बन्ध, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विकास, सृजनात्मकता, लचीली परीक्षा प्रणाली तथा स्वयं ज्ञान निर्माण की क्षमता का विकास।
  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा की आवश्यकता का प्रमुख कारण इक्कीसवीं शताब्दी की बदलती माँगें थीं।
  • भारतीय समाज की भाषायी, धार्मिक, सामाजिक तथा आर्थिक विविधता भी नई पाठ्यचर्या की आवश्यकता का महत्त्वपूर्ण कारण थी।
  • शिक्षा-व्यवस्था में परिवर्तन, संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप शिक्षा, NCERT द्वारा आवधिक पुनरीक्षण तथा आधुनिकीकरण भी इसके प्रमुख कारण थे।
  • NCF-2005 ने बच्चों के सीखने, ज्ञान की प्रकृति तथा विद्यालयी शिक्षा के लिए व्यापक एवं स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
Topic 2 राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005—प्रमुख बिन्दु, आदर्श शिक्षक के गुण एवं मार्गदर्शक सिद्धान्त

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005—प्रमुख बिन्दु, आदर्श शिक्षक के गुण एवं मार्गदर्शक सिद्धान्त

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के प्रमुख बिन्दु

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 (NCF-2005) का मुख्य उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा को बच्चों के लिए अधिक उपयोगी, रुचिकर तथा जीवन से सम्बन्धित बनाना है।

इस रूपरेखा में शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तकों के ज्ञान तक सीमित न रखकर बच्चों के अनुभवों, सामाजिक जीवन तथा सृजनात्मक गतिविधियों से जोड़ने पर बल दिया गया।

NCF-2005 का एक महत्त्वपूर्ण विचार बच्चों को शिक्षा के अनावश्यक बोझ से मुक्त करना तथा उनमें स्वतंत्र चिन्तन, समझने की क्षमता और सृजनात्मकता विकसित करना है।

इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पाठ्यचर्या, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, परीक्षा प्रणाली, शिक्षक शिक्षा तथा विद्यालयी व्यवस्था में सुधार को महत्त्व दिया गया।

पुस्तक के अनुसार राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के 7 प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं।

1. NCF-2005 के सात प्रमुख बिन्दु

1. व्यवस्थागत सुधार एवं परीक्षा प्रणाली

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में शिक्षा-व्यवस्था तथा परीक्षा प्रणाली में सुधार को महत्त्व दिया गया।

इसके अन्तर्गत विद्यालयों की कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने तथा परीक्षा को केवल याद किए गए ज्ञान की जाँच तक सीमित न रखने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य ऐसी शिक्षा-व्यवस्था विकसित करना था जिसमें बच्चों के वास्तविक अधिगम तथा विकास को उचित महत्त्व मिल सके।

2. बालकों का विकास एवं सीखना

NCF-2005 में बालकों के विकास और अधिगम को पाठ्यचर्या का महत्त्वपूर्ण आधार माना गया।

बच्चे केवल शिक्षक द्वारा दी गई जानकारी प्राप्त नहीं करते, बल्कि अपने अनुभवों, गतिविधियों तथा आसपास के वातावरण से भी सीखते हैं।

इसलिए शिक्षण प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो बच्चों की रुचि, अनुभव, क्षमता तथा विकासात्मक आवश्यकताओं को ध्यान में रखे।

3. विभिन्न विषयों के शिक्षण पर विचार

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में विद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले विभिन्न विषयों की पाठ्यचर्या तथा शिक्षण प्रक्रिया पर विचार किया गया।

इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित विषय शामिल हैं—

  • भाषा शिक्षण— बच्चों की भाषा सम्बन्धी समझ और अभिव्यक्ति का विकास।
  • सामाजिक विज्ञान— समाज और सामाजिक जीवन की समझ विकसित करना।
  • गणित— तार्किक चिन्तन तथा समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करना।
  • विज्ञान— वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जिज्ञासा तथा प्रयोगात्मक अधिगम को महत्त्व देना।
  • कला शिक्षण— सृजनात्मकता तथा कलात्मक अभिव्यक्ति का विकास।
  • स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा— बच्चों के शारीरिक विकास और स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरूकता को बढ़ावा देना।

इस प्रकार विभिन्न विषयों के माध्यम से बच्चों के बौद्धिक, सामाजिक, शारीरिक तथा सृजनात्मक विकास पर ध्यान दिया गया।

4. पाठ्यचर्या के क्षेत्र एवं मूल्यांकन

NCF-2005 में पाठ्यचर्या के विभिन्न क्षेत्रों तथा विद्यार्थियों के मूल्यांकन पर विशेष ध्यान दिया गया।

पाठ्यचर्या में केवल निर्धारित विषयवस्तु ही नहीं, बल्कि बच्चों के अधिगम अनुभव, गतिविधियाँ तथा अन्य विकासात्मक अवसर भी शामिल किए जाने चाहिए।

इसके साथ मूल्यांकन ऐसा होना चाहिए जो बच्चों की वास्तविक समझ तथा सीखने की प्रगति को पहचानने में सहायता करे।

5. गुणवत्ता सुधार एवं परीक्षा प्रणाली

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने तथा परीक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने पर बल दिया गया।

शिक्षा की गुणवत्ता का सम्बन्ध केवल परीक्षा में प्राप्त अंकों से नहीं है, बल्कि बच्चों की समझ, ज्ञान के उपयोग तथा विभिन्न क्षमताओं के विकास से भी है।

इसलिए शिक्षण और मूल्यांकन की व्यवस्था में सुधार आवश्यक माना गया।

6. पाठ्यचर्या नवीनीकरण के लिए शिक्षक शिक्षा

NCF-2005 में पाठ्यचर्या के सफल नवीनीकरण के लिए शिक्षक शिक्षा (Teacher Education) को महत्त्वपूर्ण माना गया।

नई पाठ्यचर्या तभी प्रभावी हो सकती है जब शिक्षक उसके उद्देश्यों और शिक्षण-विधियों को समझकर कक्षा में उनका उचित प्रयोग कर सकें।

इसलिए शिक्षकों को नवीन शिक्षण-विधियों, बालक-केंद्रित शिक्षा तथा अधिगम गतिविधियों के लिए तैयार करना आवश्यक है।

7. परीक्षा सुधार

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में परीक्षा प्रणाली में सुधार को एक अलग महत्त्वपूर्ण बिन्दु के रूप में भी स्थान दिया गया।

परीक्षा को बच्चों के लिए अनावश्यक तनाव का कारण बनाने के बजाय उसे शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया से जोड़ा जाना चाहिए।

इसके लिए लचीली परीक्षा प्रणाली तथा बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को महत्त्व देने वाले मूल्यांकन पर बल दिया गया।

NCF-2005 के प्रमुख बिन्दुओं का महत्त्व

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के इन बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि इसका उद्देश्य केवल पाठ्यपुस्तकों या विषयों में परिवर्तन करना नहीं था।

इसमें विद्यालयी व्यवस्था, शिक्षक शिक्षा, शिक्षण-विधियों तथा मूल्यांकन को भी बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने पर बल दिया गया।

इस प्रकार NCF-2005 ने बालक-केंद्रित, अनुभव-आधारित तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विकास के लिए व्यापक दिशा प्रस्तुत की।

2. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के अनुसार आदर्श शिक्षक के गुण

विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए शिक्षक की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है।

NCF-2005 में शिक्षक को केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं माना गया, बल्कि उसे बच्चों के अधिगम का सहयोगी, मार्गदर्शक तथा सामाजिक विकास में योगदान देने वाला व्यक्ति माना गया।

एक आदर्श शिक्षक को बच्चों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं, सामाजिक परिस्थितियों और सीखने के अनुभवों को समझना चाहिए।

पुस्तक में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के अनुसार आदर्श शिक्षक के सात प्रमुख गुण बताए गए हैं।

1. ग्रहणशील एवं निरन्तर सीखने वाला

आदर्श शिक्षक ग्रहणशील तथा निरन्तर सीखने वाला होना चाहिए।

ग्रहणशीलता का अर्थ है नए विचारों, अनुभवों तथा उपयोगी ज्ञान को स्वीकार करने की क्षमता।

शिक्षक को अपने ज्ञान और शिक्षण-कौशल को लगातार विकसित करते रहना चाहिए, ताकि वह बदलती शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुसार विद्यार्थियों को प्रभावी शिक्षा प्रदान कर सके।

2. विद्यार्थियों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों को समझने वाला

एक आदर्श शिक्षक में विद्यार्थियों को उनके सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक सन्दर्भों में समझने की क्षमता होनी चाहिए।

सभी बच्चों की पारिवारिक परिस्थितियाँ, भाषाएँ, सामाजिक अनुभव तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि समान नहीं होतीं।

इसलिए शिक्षक को इन विविधताओं को समझते हुए बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण करना चाहिए।

3. ज्ञान को व्यक्ति एवं समाज से जोड़कर देखने वाला

आदर्श शिक्षक को ज्ञान केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं मानना चाहिए।

उसे ज्ञान को व्यक्ति और समाज के साझा सन्दर्भ में समझना चाहिए।

अर्थात शिक्षक को यह समझना चाहिए कि ज्ञान का सम्बन्ध बच्चों के व्यक्तिगत अनुभवों, सामाजिक परिस्थितियों तथा दैनिक जीवन से भी होता है।

इससे शिक्षक विद्यालयी शिक्षा को बच्चों के वास्तविक जीवन से जोड़ सकता है।

4. उत्पादक कार्य एवं करके सीखने को महत्त्व देने वाला

एक आदर्श शिक्षक को उत्पादक कार्य (Productive Work) के महत्त्व को समझना चाहिए।

उसे कक्षा के अन्दर तथा बाहर बच्चों को व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने के अवसर प्रदान करने चाहिए।

इसके लिए शिक्षक को कार्य तथा गतिविधियों को शिक्षण का माध्यम बनाना चाहिए।

इस प्रकार शिक्षक करके सीखना (Learning by Doing) की शिक्षण-विधि का उपयोग करके बच्चों को सक्रिय रूप से सीखने में सहायता करता है।

5. सामाजिक उत्तरदायित्व को समझने वाला

आदर्श शिक्षक को समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझना चाहिए।

शिक्षक का कार्य केवल विद्यालय में विषयों का अध्यापन करना नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को समाज के प्रति जागरूक एवं उत्तरदायी बनाना भी है।

इसलिए शिक्षक को समाज की उन्नति तथा एक बेहतर विश्व के निर्माण के लिए कार्य करने वाला होना चाहिए।

6. विद्यार्थियों के साथ मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने वाला

आदर्श शिक्षक को विद्यार्थियों के साथ मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने में सक्षम होना चाहिए।

शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच सम्मान, सहयोग, विश्वास तथा संवेदनशीलता का सम्बन्ध होना आवश्यक है।

ऐसे सम्बन्धों से बच्चे अपनी समस्याओं और विचारों को सहजता से व्यक्त कर सकते हैं तथा कक्षा में सीखने के प्रति उनकी रुचि बढ़ सकती है।

7. आधुनिक सामाजिक चुनौतियों का सामना करने वाला

आदर्श शिक्षक को बदलते सामाजिक तथा वैश्विक परिवेश में उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होना चाहिए।

पुस्तक में विशेष रूप से निम्नलिखित परिवर्तनों और परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है—

  • वैश्वीकरण।
  • सार्वजनीकरण।
  • निजीकरण।
  • सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन।
  • भौगोलिक एवं राजनीतिक परिस्थितियाँ।

शिक्षक को इन परिवर्तनों से उत्पन्न चुनौतियों को समझना चाहिए तथा आवश्यकतानुसार अपने शिक्षण और व्यवहार में सुधार करना चाहिए।

इस प्रकार शिक्षक आधुनिक समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा प्रदान करने में सक्षम बनता है।

NCF-2005 के अनुसार आदर्श शिक्षक की भूमिका

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के अनुसार आदर्श शिक्षक केवल ज्ञान प्रदान करने वाला नहीं, बल्कि स्वयं सीखने वाला, बच्चों को समझने वाला तथा उनके अधिगम में सक्रिय सहयोग देने वाला व्यक्ति होता है।

उसे बच्चों के सामाजिक जीवन से शिक्षा को जोड़ना, व्यावहारिक अनुभव प्रदान करना तथा विद्यार्थियों के साथ मानवीय सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए।

इस प्रकार आदर्श शिक्षक का उद्देश्य बच्चों के ज्ञान, व्यक्तित्व, सृजनात्मकता तथा सामाजिक उत्तरदायित्व के विकास में सहायता करना है।

3. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के मार्गदर्शक सिद्धान्त

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के निर्माण से पहले वर्ष 2000 की पाठ्यचर्या की समीक्षा की गई थी।

पुस्तक के अनुसार इस समीक्षा के बाद भी विद्यालयी पाठ्यचर्या तथा परीक्षा प्रणाली से सम्बन्धित अनेक समस्याएँ बनी रहीं।

शिक्षा में रटने की प्रवृत्ति अधिक थी तथा बच्चों का अधिगम मुख्यतः पाठ्यपुस्तकों और विद्यालय तक सीमित हो रहा था।

इसलिए NCF-2005 में शिक्षा के उद्देश्यों, बच्चों के सामाजिक परिवेश, ज्ञान की प्रकृति तथा सीखने की प्रक्रिया पर विशेष ध्यान दिया गया।

इन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पुस्तक में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के 15 मार्गदर्शक सिद्धान्त बताए गए हैं।

1. ज्ञान को विद्यालय के बाहरी जीवन से जोड़ना

विद्यालय में प्राप्त ज्ञान को बच्चों के दैनिक जीवन तथा वास्तविक अनुभवों से जोड़ा जाए।

बच्चों को केवल पुस्तकों में लिखी बातें न पढ़ाई जाएँ, बल्कि उन्हें यह समझने का अवसर मिले कि सीखे गए ज्ञान का उपयोग उनके आसपास के जीवन में कैसे होता है।

इससे शिक्षा अधिक उपयोगी तथा अर्थपूर्ण बनती है।

2. शिक्षा को रटने की प्रणाली से मुक्त करना

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में केवल तथ्यों और उत्तरों को याद कराने के स्थान पर विषयवस्तु को समझने तथा विचार करने पर बल दिया जाए।

बच्चों में प्रश्न पूछने, तर्क करने तथा अपने अनुभवों के आधार पर सीखने की क्षमता विकसित की जाए।

इसका उद्देश्य शिक्षा को यान्त्रिक रटने की प्रक्रिया से मुक्त करना है।

3. परीक्षा प्रणाली को लचीला बनाना

परीक्षा प्रणाली को अधिक लचीला बनाया जाए तथा उसे कक्षागत गतिविधियों से जोड़ा जाए।

विद्यार्थियों के मूल्यांकन में केवल लिखित परीक्षा को ही महत्त्व न देकर उनकी सीखने की प्रक्रिया तथा कक्षा की गतिविधियों को भी ध्यान में रखा जाए।

इससे परीक्षा और शिक्षण-अधिगम के बीच उचित सम्बन्ध स्थापित किया जा सकेगा।

4. बालकों के चहुँमुखी विकास के अवसर प्रदान करना

पाठ्यचर्या को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाए कि बच्चों को चहुँमुखी विकास के अवसर मिलें।

इसका अर्थ है कि शिक्षा केवल बौद्धिक विकास तक सीमित न रहे, बल्कि बच्चों के शारीरिक, सामाजिक, भावनात्मक तथा सृजनात्मक विकास को भी महत्त्व दिया जाए।

इसके लिए पाठ्यचर्या में विभिन्न प्रकार की उपयोगी गतिविधियों को स्थान दिया जाना चाहिए।

5. शिक्षा के अनावश्यक बोझ को कम करना

पाठ्यचर्या के बोझ को शिक्षा बिना बोझ के (Learning Without Burden) की भावना के आधार पर कम किया जाए।

इस सिद्धान्त का उद्देश्य बच्चों को अत्यधिक पाठ्यवस्तु, अनावश्यक दबाव तथा रटने की प्रवृत्ति से मुक्त करना है।

बच्चों को उनकी आयु, समझ और आवश्यकताओं के अनुरूप अधिगम अनुभव प्रदान किए जाने चाहिए।

6. पाठ्यचर्या सुधार से व्यवस्थागत परिवर्तन लाना

पाठ्यचर्या में सुधार के माध्यम से शिक्षा-व्यवस्था में सुसंगत व्यवस्थागत परिवर्तन लाए जाएँ।

अर्थात पाठ्यचर्या के उद्देश्यों और वास्तविक विद्यालयी व्यवस्था के बीच उचित समन्वय होना चाहिए।

इसके लिए शिक्षण-विधियों, शैक्षिक सुविधाओं तथा विद्यालयी कार्यप्रणाली में आवश्यक सुधार किए जाने चाहिए।

7. सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना

प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया जाए।

शिक्षा की गुणवत्ता केवल कुछ विशेष विद्यालयों या विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

इसका उद्देश्य सभी बच्चों को सीखने और विकास के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराना है।

8. कला, संगीत एवं शिल्प द्वारा संस्कृति का संरक्षण

विद्यालयी शिक्षा में कला, संगीत तथा शिल्प को उचित स्थान दिया जाए।

इन गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में सांस्कृतिक समझ और कलात्मक अभिव्यक्ति का विकास किया जा सकता है।

इसका उद्देश्य भारतीय संस्कृति का संरक्षण एवं विकास करना है।

9. कक्षा में समावेशी वातावरण विकसित करना

सभी बच्चों के लिए कक्षा में समावेशी वातावरण (Inclusive Environment) विकसित किया जाए।

समावेशी वातावरण का अर्थ है ऐसी कक्षा जहाँ सभी बच्चों को उनकी सामाजिक, भाषायी तथा व्यक्तिगत भिन्नताओं के बावजूद सीखने और भाग लेने के उचित अवसर मिलें।

शिक्षक को प्रत्येक विद्यार्थी के प्रति सम्मानपूर्ण तथा सहयोगात्मक व्यवहार करना चाहिए।

10. तर्क, विचार एवं अमूर्त चिन्तन का विकास

बच्चों में तार्किक चिन्तन, विचार करने तथा अमूर्त चिन्तन की क्षमता विकसित की जाए।

अमूर्त चिन्तन का अर्थ है ऐसी अवधारणाओं और विचारों को समझने की क्षमता जो हमेशा प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देते।

शिक्षण के माध्यम से बच्चों को विभिन्न समस्याओं पर विचार करने, तर्क प्रस्तुत करने तथा उचित निष्कर्ष निकालने के अवसर दिए जाने चाहिए।

11. शिक्षा के माध्यम से शान्ति के मूल्यों का विकास

विद्यालयी शिक्षा के विभिन्न विषयों में उपयुक्त गतिविधियों के माध्यम से शान्ति के मूल्यों का विकास किया जाए।

बच्चों में सहयोग, सहिष्णुता, परस्पर सम्मान तथा शांतिपूर्ण व्यवहार की भावना विकसित करने पर ध्यान दिया जाए।

इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को समाज में शान्तिपूर्ण एवं सहयोगपूर्ण जीवन व्यतीत करने योग्य बनाना है।

12. लोकतान्त्रिक व्यवहार एवं मूल्यों का विकास

शिक्षा के माध्यम से ऐसे नागरिक तैयार किए जाएँ जो लोकतान्त्रिक व्यवहारों एवं मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हों।

बच्चों में समानता, स्वतंत्र विचार, दूसरों के प्रति सम्मान तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित की जाए।

इससे विद्यार्थी लोकतान्त्रिक समाज के जिम्मेदार नागरिक बन सकेंगे।

13. स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा को महत्त्व देना

विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा तथा शारीरिक शिक्षा को उचित स्थान दिया जाए।

पुस्तक में स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा को विद्यालयों में बच्चों के नामांकन, उपस्थिति तथा ठहराव को बनाए रखने से भी जोड़ा गया है।

इन गतिविधियों के माध्यम से बच्चों के स्वास्थ्य और शारीरिक विकास पर ध्यान दिया जाता है तथा विद्यालयी जीवन को अधिक सक्रिय और रुचिकर बनाया जा सकता है।

14. बालक के विकास एवं अधिगम के प्रति सर्वांगीण दृष्टिकोण

बच्चों के विकास तथा उनकी सीखने की प्रक्रिया को समग्र रूप में समझा जाए।

शिक्षक को केवल विद्यार्थी की परीक्षा सम्बन्धी उपलब्धियों पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि उसकी रुचि, अनुभव तथा विभिन्न विकासात्मक आवश्यकताओं को भी समझना चाहिए।

इसका उद्देश्य बालकों के विकास और अधिगम के प्रति सर्वांगीण दृष्टिकोण अपनाना है।

15. प्रयोगात्मक कार्यों से सक्रियता एवं रचनात्मकता का विकास

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में प्रयोगात्मक कार्यों तथा व्यावहारिक गतिविधियों को महत्त्व दिया जाए।

बच्चों को स्वयं कार्य करने, अनुभव प्राप्त करने तथा नए विचार प्रस्तुत करने के अवसर मिलने चाहिए।

इससे उनकी सक्रियता, रुचि तथा रचनात्मकता का विकास होता है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के मार्गदर्शक सिद्धान्तों का महत्त्व

NCF-2005 के मार्गदर्शक सिद्धान्त विद्यालयी शिक्षा को अधिक प्रभावी तथा बच्चों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने की दिशा प्रदान करते हैं।

इन सिद्धान्तों में शिक्षा को जीवन से जोड़ने, रटने की प्रवृत्ति समाप्त करने, परीक्षा प्रणाली को लचीला बनाने तथा बच्चों को सक्रिय रूप से सीखने के अवसर प्रदान करने पर बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण एवं समावेशी शिक्षा, कला एवं संस्कृति का संरक्षण, लोकतान्त्रिक मूल्यों का विकास तथा स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा को भी महत्त्व दिया गया।

इस प्रकार इन सिद्धान्तों का मुख्य उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा को बालक-केंद्रित, बोझमुक्त, अनुभव-आधारित, समावेशी तथा सृजनात्मक बनाना है।

समग्र निष्कर्ष

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 ने पाठ्यचर्या, शिक्षक की भूमिका तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के सम्बन्ध में व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

इसके प्रमुख बिन्दुओं में बच्चों का विकास, विभिन्न विषयों की शिक्षा, पाठ्यचर्या का नवीनीकरण, शिक्षक शिक्षा तथा परीक्षा सुधार को महत्त्व दिया गया।

NCF-2005 के अनुसार आदर्श शिक्षक को निरन्तर सीखने वाला, संवेदनशील, सामाजिक उत्तरदायित्व समझने वाला तथा बच्चों को व्यावहारिक अनुभवों से सीखने में सहायता करने वाला होना चाहिए।

इसके मार्गदर्शक सिद्धान्तों में शिक्षा को वास्तविक जीवन से जोड़ने, अनावश्यक बोझ कम करने, तर्कशीलता एवं सृजनात्मकता विकसित करने तथा सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने पर बल दिया गया।

इस प्रकार NCF-2005 की मूल भावना बच्चों को केवल जानकारी याद कराने के बजाय समझने, सोचने, अनुभव करने तथा स्वयं सीखने के अवसर प्रदान करना है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 का प्रमुख उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा को बोझमुक्त, बालक-केंद्रित तथा सृजनात्मक बनाना था।
  • NCF-2005 ने पाठ्यपुस्तकीय ज्ञान को बच्चों के सामाजिक जीवन एवं अनुभवों से जोड़ने पर बल दिया।
  • पुस्तक में NCF-2005 के 7 प्रमुख बिन्दु बताए गए हैं।
  • प्रमुख बिन्दुओं में व्यवस्थागत सुधार, परीक्षा प्रणाली, बालकों का विकास एवं अधिगम तथा विभिन्न विषयों के शिक्षण पर विचार शामिल हैं।
  • अन्य प्रमुख बिन्दु हैं—पाठ्यचर्या के क्षेत्र एवं मूल्यांकन, गुणवत्ता सुधार, पाठ्यचर्या नवीनीकरण के लिए शिक्षक शिक्षा तथा परीक्षा सुधार।
  • NCF-2005 के अनुसार आदर्श शिक्षक ग्रहणशील तथा निरन्तर सीखने वाला होना चाहिए।
  • शिक्षक को विद्यार्थियों की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों को समझने में सक्षम होना चाहिए।
  • आदर्श शिक्षक को ज्ञान को पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर उसे व्यक्ति और समाज के सन्दर्भ में समझना चाहिए।
  • शिक्षक को उत्पादक कार्य तथा करके सीखना (Learning by Doing) की शिक्षण-विधि को महत्त्व देना चाहिए।
  • शिक्षक में सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना तथा विद्यार्थियों के साथ मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने की क्षमता होनी चाहिए।
  • आदर्श शिक्षक को वैश्वीकरण, निजीकरण तथा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिवर्तनों से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होना चाहिए।
  • पुस्तक में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के 15 मार्गदर्शक सिद्धान्त बताए गए हैं।
  • प्रमुख सिद्धान्त हैं—ज्ञान को विद्यालय के बाहरी जीवन से जोड़ना, रटने की प्रणाली से मुक्ति तथा परीक्षा प्रणाली को लचीला बनाना।
  • पाठ्यचर्या के माध्यम से बच्चों के चहुँमुखी विकास तथा अनावश्यक शैक्षिक बोझ कम करने पर बल दिया गया।
  • शिक्षा बिना बोझ के (Learning Without Burden) की भावना को पाठ्यचर्या सुधार का महत्त्वपूर्ण आधार माना गया।
  • पाठ्यचर्या सुधार से व्यवस्थागत परिवर्तन लाने तथा सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने का सुझाव दिया गया।
  • कला, संगीत और शिल्प के माध्यम से संस्कृति के संरक्षण एवं विकास पर बल दिया गया।
  • कक्षा में समावेशी वातावरण विकसित करने तथा बच्चों में तर्क, विचार और अमूर्त चिन्तन की क्षमता बढ़ाने का सुझाव दिया गया।
  • विद्यालयी गतिविधियों के माध्यम से शान्ति, लोकतान्त्रिक व्यवहार तथा सामाजिक मूल्यों का विकास करने पर बल दिया गया।
  • स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा को बच्चों के नामांकन, उपस्थिति और विद्यालय में ठहराव से जोड़ा गया।
  • बच्चों के विकास एवं अधिगम के प्रति सर्वांगीण दृष्टिकोण अपनाने तथा प्रयोगात्मक कार्यों से सक्रियता और रचनात्मकता विकसित करने पर बल दिया गया।
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Topic 3 राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005—विभिन्न शैक्षिक स्तरों की पाठ्यचर्या एवं विषयवार शिक्षण

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005—विभिन्न शैक्षिक स्तरों की पाठ्यचर्या एवं विषयवार शिक्षण

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में विभिन्न स्तरों की पाठ्यचर्या

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 (NCF-2005) में विद्यालयी शिक्षा को बच्चों की आयु, विकासात्मक अवस्था तथा अधिगम की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने पर बल दिया गया।

इस रूपरेखा में विद्यालयी शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर पढ़ाए जाने वाले विषयों तथा उनकी शिक्षण-व्यवस्था के सम्बन्ध में सुझाव प्रस्तुत किए गए।

पाठ्यचर्या का उद्देश्य केवल निर्धारित विषयों का ज्ञान प्रदान करना नहीं है, बल्कि बच्चों में भाषायी दक्षता, तार्किक चिन्तन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक समझ, सृजनात्मकता तथा व्यावहारिक कौशल विकसित करना भी है।

पुस्तक में NCF-2005 के अन्तर्गत विद्यालयी पाठ्यचर्या को चार प्रमुख स्तरों पर प्रस्तुत किया गया है।

1. प्राथमिक स्तर की पाठ्यचर्या

प्राथमिक स्तर बच्चों की विद्यालयी शिक्षा का प्रारम्भिक चरण है। इस स्तर पर बच्चों में भाषा, गणित, पर्यावरण तथा दैनिक जीवन से सम्बन्धित आधारभूत ज्ञान और कौशल विकसित करना महत्त्वपूर्ण है।

पुस्तक के अनुसार प्राथमिक स्तर पर निम्नलिखित 7 विषयों एवं क्षेत्रों को पाठ्यचर्या में स्थान दिया जाना चाहिए।

प्राथमिक स्तर के विषय
  1. मातृभाषा।
  2. अंग्रेजी।
  3. गणित।
  4. पर्यावरण अध्ययन (एकीकृत)।
  5. कला एवं हस्तशिल्प।
  6. स्वास्थ्य शिक्षा।
  7. कार्यानुभव।
प्रमुख विशेषताएँ
  • भाषा विकास— मातृभाषा तथा अंग्रेजी के माध्यम से बच्चों की भाषा सम्बन्धी समझ और अभिव्यक्ति विकसित करने पर ध्यान दिया गया।
  • गणितीय ज्ञान— गणित के माध्यम से बच्चों में संख्या-ज्ञान तथा प्रारम्भिक तार्किक क्षमता विकसित करने पर बल दिया गया।
  • एकीकृत पर्यावरण अध्ययन— बच्चों को उनके आसपास के प्राकृतिक एवं सामाजिक वातावरण से परिचित कराने के लिए पर्यावरण अध्ययन को एकीकृत रूप में रखा गया।
  • कला एवं हस्तशिल्प— बच्चों की कलात्मक अभिव्यक्ति तथा सृजनात्मक क्षमता विकसित करने के लिए कला और हस्तशिल्प को स्थान दिया गया।
  • स्वास्थ्य एवं कार्यानुभव— स्वास्थ्य सम्बन्धी आवश्यक ज्ञान तथा विभिन्न कार्यों के माध्यम से व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने पर बल दिया गया।

इस प्रकार प्राथमिक स्तर की पाठ्यचर्या में बच्चों के भाषायी, बौद्धिक, शारीरिक तथा सृजनात्मक विकास से सम्बन्धित विषयों को सम्मिलित किया गया।

2. उच्च प्राथमिक स्तर की पाठ्यचर्या

उच्च प्राथमिक स्तर पर बच्चों की समझ और ज्ञान का क्षेत्र पहले की अपेक्षा विस्तृत होने लगता है। इसलिए इस स्तर पर भाषाओं, विज्ञान, गणित, सामाजिक अध्ययन तथा अन्य विषयों का अधिक व्यवस्थित अध्ययन कराया जाता है।

पुस्तक के अनुसार उच्च प्राथमिक स्तर पर निम्नलिखित 9 विषयों एवं क्षेत्रों की व्यवस्था होनी चाहिए।

उच्च प्राथमिक स्तर के विषय
  1. मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा।
  2. आधुनिक भारतीय भाषा।
  3. अंग्रेजी।
  4. गणित।
  5. विज्ञान।
  6. सामाजिक अध्ययन।
  7. स्वास्थ्य शिक्षा।
  8. कला।
  9. कार्यानुभव।
प्रमुख विशेषताएँ
  • भाषाओं का अध्ययन— मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा के साथ आधुनिक भारतीय भाषा तथा अंग्रेजी को स्थान दिया गया।
  • विज्ञान शिक्षा— बच्चों को वैज्ञानिक तथ्यों, प्राकृतिक घटनाओं तथा उनके कारणों को समझने के अवसर प्रदान किए जाएँ।
  • सामाजिक अध्ययन— विद्यार्थियों को समाज और सामाजिक जीवन से सम्बन्धित आवश्यक जानकारी दी जाए।
  • गणित शिक्षा— बच्चों की गणितीय समझ तथा समस्याओं को हल करने की क्षमता विकसित की जाए।
  • कला, स्वास्थ्य एवं कार्यानुभव— विद्यार्थियों के शारीरिक, सृजनात्मक और व्यावहारिक विकास के लिए इन क्षेत्रों को पाठ्यचर्या का अंग बनाया जाए।

इस स्तर पर प्राथमिक शिक्षा में प्राप्त आधारभूत ज्ञान को अधिक विकसित करके विद्यार्थियों को आगे की शिक्षा के लिए तैयार करने पर ध्यान दिया गया।

3. माध्यमिक स्तर की पाठ्यचर्या

माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों की विषयगत समझ तथा अध्ययन की क्षमता अधिक विकसित होती है।

इसलिए इस स्तर पर भाषाओं, विज्ञान, गणित, सामाजिक अध्ययन तथा आधुनिक तकनीकी से सम्बन्धित विषयों को पाठ्यचर्या में स्थान दिया गया।

पुस्तक के अनुसार माध्यमिक स्तर के लिए निम्नलिखित 9 विषय एवं क्षेत्र बताए गए हैं।

माध्यमिक स्तर के विषय
  1. मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा।
  2. अंग्रेजी।
  3. संस्कृत, उर्दू अथवा अन्य भाषा।
  4. विज्ञान।
  5. गणित।
  6. सामाजिक अध्ययन।
  7. कार्यानुभव।
  8. कम्प्यूटर शिक्षा।
  9. कला।
प्रमुख विशेषताएँ
  • भाषायी शिक्षा— मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, अंग्रेजी तथा संस्कृत, उर्दू अथवा अन्य भाषा के अध्ययन की व्यवस्था प्रस्तुत की गई।
  • विज्ञान एवं गणित— विद्यार्थियों में वैज्ञानिक समझ, तार्किक चिन्तन तथा समस्याओं के समाधान की क्षमता विकसित करने पर बल दिया गया।
  • सामाजिक अध्ययन— विद्यार्थियों को सामाजिक जीवन तथा समाज की विभिन्न परिस्थितियों का ज्ञान प्रदान किया जाए।
  • कम्प्यूटर शिक्षा— आधुनिक समय में कम्प्यूटर के बढ़ते महत्त्व को ध्यान में रखते हुए इसे पाठ्यचर्या में स्थान दिया गया।
  • कार्यानुभव एवं कला— विद्यार्थियों में व्यावहारिक कौशल तथा सृजनात्मक क्षमताओं के विकास के लिए इन विषयों को महत्त्व दिया गया।

इस प्रकार माध्यमिक स्तर पर सामान्य शिक्षा के साथ विज्ञान, तकनीकी, भाषा तथा व्यावहारिक अधिगम के विकास पर ध्यान दिया गया।

4. उच्च माध्यमिक स्तर की पाठ्यचर्या

उच्च माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों की रुचि और आगे की शिक्षा की आवश्यकताओं के अनुसार विषयों का अध्ययन अधिक विशिष्ट हो जाता है।

पुस्तक में इस स्तर पर कुछ अनिवार्य विषयों के साथ कला, वाणिज्य तथा विज्ञान वर्गों के अनुसार अलग-अलग विषयों की व्यवस्था बताई गई है।

1. अनिवार्य विषय

पुस्तक के अनुसार उच्च माध्यमिक स्तर पर निम्नलिखित तीन विषय अनिवार्य रूप में प्रस्तुत किए गए हैं—

  1. मातृभाषा।
  2. अंग्रेजी।
  3. गणित।

ये विषय पुस्तक में दिए गए उच्च माध्यमिक पाठ्यचर्या के प्रस्ताव का भाग हैं।

2. कला वर्ग के विषय

कला वर्ग में समाज तथा मानव जीवन से सम्बन्धित विभिन्न विषयों को सम्मिलित किया गया।

पुस्तक के अनुसार कला वर्ग के प्रमुख विषय निम्नलिखित हैं—

  1. इतिहास।
  2. भूगोल।
  3. नागरिक शास्त्र।
  4. अर्थशास्त्र।
  5. समाजशास्त्र।
  6. मनोविज्ञान।

इन विषयों के अध्ययन का सम्बन्ध सामाजिक व्यवस्था, ऐतिहासिक घटनाओं, भौगोलिक परिस्थितियों, आर्थिक गतिविधियों तथा मानव व्यवहार को समझने से है।

3. वाणिज्य वर्ग के विषय

वाणिज्य वर्ग में व्यापार तथा उससे सम्बन्धित व्यावहारिक ज्ञान को महत्त्व दिया गया।

पुस्तक में वाणिज्य वर्ग के निम्नलिखित विषय बताए गए हैं—

  1. एकाउन्टेन्सी (लेखाशास्त्र)।
  2. टाइपिंग।
  3. व्यापार।

इन विषयों के माध्यम से विद्यार्थियों को लेखा सम्बन्धी कार्य, टाइपिंग तथा व्यापार की आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के अवसर दिए जाते हैं।

4. विज्ञान वर्ग के विषय

विज्ञान वर्ग में वैज्ञानिक विषयों के साथ अन्य उपयोगी एवं ऐच्छिक विषयों को भी स्थान दिया गया।

पुस्तक के अनुसार विज्ञान वर्ग में निम्नलिखित विषय शामिल हैं—

  1. भौतिक विज्ञान।
  2. रसायन विज्ञान।
  3. जीव विज्ञान।
  4. अन्य विषय।
  5. कम्प्यूटर।
  6. कला।
  7. अन्य ऐच्छिक विषय।

विज्ञान वर्ग में विद्यार्थियों को वैज्ञानिक अवधारणाओं, प्राकृतिक घटनाओं तथा विज्ञान से सम्बन्धित विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन करने के अवसर प्रदान किए जाते हैं।

विभिन्न शैक्षिक स्तरों की पाठ्यचर्या का सारांश

शैक्षिक स्तर पुस्तक में दिए गए प्रमुख विषय
प्राथमिक मातृभाषा, अंग्रेजी, गणित, एकीकृत पर्यावरण अध्ययन, कला एवं हस्तशिल्प, स्वास्थ्य शिक्षा, कार्यानुभव।
उच्च प्राथमिक मातृभाषा/क्षेत्रीय भाषा, आधुनिक भारतीय भाषा, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, स्वास्थ्य शिक्षा, कला, कार्यानुभव।
माध्यमिक मातृभाषा/क्षेत्रीय भाषा, अंग्रेजी, अन्य भाषा, विज्ञान, गणित, सामाजिक अध्ययन, कार्यानुभव, कम्प्यूटर शिक्षा, कला।
उच्च माध्यमिक अनिवार्य विषयों के साथ कला, वाणिज्य एवं विज्ञान वर्ग के विषय।

इस प्रकार पुस्तक में NCF-2005 के अन्तर्गत विद्यार्थियों की शैक्षिक अवस्था के अनुसार पाठ्यचर्या के क्रमिक विकास को प्रस्तुत किया गया है।

5. विभिन्न विषयों के शिक्षण सम्बन्धी सुझाव

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में केवल विषयों की सूची प्रस्तुत करना ही पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि विभिन्न विषयों को किस प्रकार पढ़ाया जाए, इस पर भी ध्यान दिया गया।

पुस्तक के अनुसार विद्यालयी शिक्षा में भाषा, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, गणित, कम्प्यूटर, कार्यानुभव, कला तथा स्वास्थ्य शिक्षा के शिक्षण को विशेष महत्त्व दिया गया।

इन आठ विषयों के शिक्षण सम्बन्धी प्रमुख विचार निम्नलिखित हैं।

6. भाषा शिक्षण

भारत एक बहुभाषी देश है, जहाँ विभिन्न क्षेत्रों में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं।

इस भाषायी विविधता को ध्यान में रखते हुए पुस्तक में बच्चों को एक से अधिक भाषाओं का ज्ञान प्रदान करने की आवश्यकता बताई गई है।

प्रमुख सुझाव
  • बच्चों को एक से अधिक भाषाओं के अध्ययन के अवसर प्रदान किए जाएँ।
  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या में तीन भाषाओं के ज्ञान को महत्त्व दिया गया।
  • भाषा शिक्षण की व्यवस्था प्राथमिक स्तर से ही विकसित की जाए।
  • विभिन्न भाषाओं के अध्ययन के लिए अच्छी पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराई जाएँ।
  • विद्यालयों में पर्याप्त पुस्तकालयों की व्यवस्था की जाए, जिससे विद्यार्थियों को भाषायी अध्ययन में सहायता मिल सके।

भाषा शिक्षण का मुख्य उद्देश्य बच्चों को विभिन्न भाषाओं को समझने तथा उनका उचित प्रयोग करने के अवसर प्रदान करना है।

7. विज्ञान शिक्षण

विज्ञान शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थी प्राकृतिक घटनाओं तथा उनके कारणों को समझना सीखते हैं।

पुस्तक के अनुसार विज्ञान के माध्यम से बालक अवलोकन, परिकल्पना, निष्कर्ष तथा परीक्षण जैसी प्रक्रियाओं का अध्ययन करते हैं।

विज्ञान शिक्षण के प्रमुख उद्देश्य
  • अवलोकन क्षमता— विभिन्न घटनाओं और वस्तुओं का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना सीखना।
  • परिकल्पना निर्माण— किसी घटना के सम्भावित कारणों के सम्बन्ध में विचार करना।
  • परीक्षण एवं निष्कर्ष— प्रयोगों और परीक्षणों के आधार पर उचित निष्कर्ष निकालना।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण— विद्यार्थियों में अन्धविश्वास, अज्ञानता तथा कुरीतियों के स्थान पर वैज्ञानिक सोच विकसित करना।

पुस्तक में सुझाव दिया गया है कि विज्ञान की पाठ्यवस्तु का चयन वैज्ञानिक वेधता, प्रक्रिया तथा प्रणालियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

इस प्रकार विज्ञान शिक्षण का उद्देश्य विद्यार्थियों को वैज्ञानिक तथ्यों का ज्ञान देने के साथ उनमें निरीक्षण, परीक्षण तथा तर्कपूर्ण निष्कर्ष निकालने की क्षमता विकसित करना है।

8. सामाजिक अध्ययन का शिक्षण

सामाजिक अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों को समाज की वास्तविक परिस्थितियों और सामाजिक जीवन से परिचित कराना है।

पुस्तक में कहा गया है कि विद्यार्थियों को समाज की वास्तविकता से परिचित कराना आवश्यक है।

इसलिए विद्यालयी शिक्षा में सामाजिक अध्ययन को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिए।

प्रमुख उद्देश्य
  • विद्यार्थियों को समाज और सामाजिक जीवन का ज्ञान प्रदान करना।
  • समाज की वास्तविक परिस्थितियों को समझने के अवसर देना।
  • विद्यार्थियों में सामाजिक जीवन के प्रति समझ विकसित करना।

इस प्रकार सामाजिक अध्ययन बच्चों को अपने आसपास के समाज को समझने में सहायता करता है।

9. गणित शिक्षण

गणित शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों में तार्किक ढंग से सोचने-समझने तथा समस्याओं को हल करने की क्षमता विकसित करना है।

गणित के अध्ययन से विद्यार्थियों में विचार करने और उचित निष्कर्ष तक पहुँचने की योग्यता का विकास होता है।

प्रमुख उद्देश्य
  • तार्किक चिन्तन— किसी प्रश्न या समस्या पर क्रमबद्ध ढंग से विचार करने की क्षमता विकसित करना।
  • अमूर्त चिन्तन— संख्याओं, गणितीय सम्बन्धों तथा अमूर्त अवधारणाओं को समझने की क्षमता विकसित करना।
  • समस्या-समाधान— गणितीय समस्याओं को समझकर उनका उचित समाधान खोजने की योग्यता विकसित करना।

इस प्रकार गणित शिक्षण विद्यार्थियों के तर्क, अमूर्त चिन्तन तथा समस्या-समाधान कौशल के विकास के लिए आवश्यक है।

10. कम्प्यूटर शिक्षण

आधुनिक समय में कम्प्यूटर का महत्त्व निरन्तर बढ़ रहा है। शिक्षा के साथ जीवन के अनेक क्षेत्रों में कम्प्यूटर का उपयोग किया जाता है।

पुस्तक में कम्प्यूटर के आधुनिक महत्त्व को देखते हुए विद्यार्थियों के लिए कम्प्यूटर शिक्षा की आवश्यकता बताई गई है।

इसके अन्तर्गत विद्यार्थियों को कम्प्यूटर का अध्ययन करने और उसकी उपयोगिता समझने के अवसर प्रदान करने पर बल दिया गया।

इस प्रकार कम्प्यूटर शिक्षण का उद्देश्य विद्यार्थियों को आधुनिक समय की तकनीकी आवश्यकताओं के प्रति जागरूक बनाना है।

11. कार्यानुभव का शिक्षण

कार्यानुभव (Work Experience) का अर्थ है विद्यार्थियों को विभिन्न उपयोगी कार्यों के माध्यम से व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने के अवसर प्रदान करना।

पुस्तक के अनुसार कार्यानुभव की शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों में आपसी सहयोग तथा सहभागिता की भावना विकसित करना है।

प्रमुख उद्देश्य
  • विद्यार्थियों को विभिन्न कार्यों के माध्यम से व्यावहारिक अनुभव प्रदान करना।
  • बच्चों में एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करने की भावना विकसित करना।
  • विद्यार्थियों में सहयोग तथा सहभागिता के गुण विकसित करना।
  • अच्छे चरित्र तथा व्यक्तित्व के विकास में सहायता करना।

इस प्रकार कार्यानुभव विद्यार्थियों के व्यावहारिक कौशल, सहयोग की भावना तथा व्यक्तित्व विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

12. कला शिक्षण

कला शिक्षा बच्चों की कलात्मक तथा सृजनात्मक क्षमताओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पुस्तक के अनुसार कला शिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों में कलात्मक क्षमता, सांस्कृतिक समझ तथा सौन्दर्यात्मक जागरूकता विकसित की जा सकती है।

प्रमुख उद्देश्य
  • विद्यार्थियों की कलात्मक क्षमताओं का विकास करना।
  • बच्चों में संस्कृति के प्रति समझ और जागरूकता विकसित करना।
  • सौन्दर्य सम्बन्धी समझ तथा संवेदनशीलता विकसित करना।
  • बच्चों को अपनी सृजनात्मक क्षमताओं के विकास के अवसर प्रदान करना।

इस प्रकार कला शिक्षा विद्यार्थियों के सांस्कृतिक, सौन्दर्यात्मक तथा सृजनात्मक विकास के लिए आवश्यक मानी गई है।

13. स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा

स्वास्थ्य शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों को स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा शारीरिक विकास के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्रदान करना है।

पुस्तक में इस विचार पर बल दिया गया है कि स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन निवास करता है।

प्रमुख सुझाव
  • विद्यार्थियों को स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के सम्बन्ध में आवश्यक ज्ञान दिया जाए।
  • बच्चों के शारीरिक विकास पर उचित ध्यान दिया जाए।
  • विद्यालयों में खेलकूद की गतिविधियों का आयोजन किया जाए।
  • स्वास्थ्य तथा शारीरिक शिक्षा को विद्यालयी शिक्षण का महत्त्वपूर्ण अंग माना जाए।

इस प्रकार स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को स्वस्थ जीवन तथा उचित शारीरिक विकास के लिए आवश्यक ज्ञान और अवसर प्रदान करना है।

विभिन्न विषयों के शिक्षण का समग्र उद्देश्य

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में विभिन्न विषयों के शिक्षण को विद्यार्थियों की अलग-अलग क्षमताओं के विकास से जोड़ा गया।

भाषा शिक्षण से भाषायी दक्षता, विज्ञान से वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक अध्ययन से सामाजिक समझ तथा गणित से तार्किक चिन्तन का विकास करने पर बल दिया गया।

इसी प्रकार कम्प्यूटर शिक्षा से तकनीकी ज्ञान, कार्यानुभव से व्यावहारिक कौशल, कला से सृजनात्मकता तथा स्वास्थ्य शिक्षा से शारीरिक विकास को महत्त्व दिया गया।

इस प्रकार विभिन्न विषयों का उद्देश्य केवल परीक्षा के लिए ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के बौद्धिक, सामाजिक, शारीरिक तथा सृजनात्मक विकास में सहायता करना भी है।

पाठ्यपुस्तक में प्रस्तुत आलोचनात्मक टिप्पणी

पुस्तक के लेखक ने इस अनुभाग के अन्त में प्राथमिक स्तर से मातृभाषा के साथ अंग्रेजी भाषा की शिक्षा देने तथा बार-बार नई पाठ्यचर्या समितियाँ गठित करने की आवश्यकता पर प्रश्न उठाए हैं।

लेखक के अनुसार मातृभाषा का प्रयोग सभी बच्चों के जीवन से जुड़ा होता है, जबकि अंग्रेजी भाषा के प्रयोग की आवश्यकता सभी व्यक्तियों के लिए एक जैसी नहीं होती।

लेखक ने यह भी टिप्पणी की है कि पाठ्यचर्या में सुझाए गए कई विषय पहले से प्रचलित थे और उनमें पर्याप्त नवीनता नहीं दिखाई देती।

ध्यान दें: ये पुस्तक के लेखक के आलोचनात्मक विचार हैं। इन्हें NCF-2005 के आधिकारिक उद्देश्यों या सिद्धान्तों के रूप में नहीं समझना चाहिए।

समग्र निष्कर्ष

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के अन्तर्गत विद्यालयी शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर बच्चों की शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुसार विषयों की व्यवस्था प्रस्तुत की गई।

प्राथमिक स्तर पर आधारभूत भाषायी ज्ञान, गणित, पर्यावरण अध्ययन तथा सृजनात्मक गतिविधियों को महत्त्व दिया गया।

उच्च प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर पर भाषाओं, विज्ञान, गणित, सामाजिक अध्ययन तथा अन्य विषयों के माध्यम से विद्यार्थियों के ज्ञान और कौशल को विकसित करने पर बल दिया गया।

उच्च माध्यमिक स्तर पर अनिवार्य विषयों के साथ कला, वाणिज्य तथा विज्ञान वर्ग के विषयों का उल्लेख किया गया।

इसके अतिरिक्त विभिन्न विषयों के शिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों में तर्क, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक समझ, सहयोग, सृजनात्मकता तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरूकता विकसित करने पर बल दिया गया।

इस प्रकार NCF-2005 की पाठ्यचर्या सम्बन्धी दृष्टि बच्चों के ज्ञान, कौशल तथा सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास को महत्त्व देती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में विद्यालयी शिक्षा के चार प्रमुख स्तरों की पाठ्यचर्या प्रस्तुत की गई है।
  • ये चार स्तर हैं—प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च माध्यमिक।
  • प्राथमिक स्तर पर 7 विषय एवं क्षेत्र बताए गए हैं—मातृभाषा, अंग्रेजी, गणित, एकीकृत पर्यावरण अध्ययन, कला एवं हस्तशिल्प, स्वास्थ्य शिक्षा तथा कार्यानुभव।
  • उच्च प्राथमिक स्तर पर 9 विषय एवं क्षेत्र बताए गए हैं, जिनमें भाषाएँ, गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन, स्वास्थ्य शिक्षा, कला तथा कार्यानुभव शामिल हैं।
  • माध्यमिक स्तर पर 9 विषय एवं क्षेत्र बताए गए हैं, जिनमें भाषा, विज्ञान, गणित, सामाजिक अध्ययन, कार्यानुभव, कम्प्यूटर शिक्षा तथा कला प्रमुख हैं।
  • उच्च माध्यमिक स्तर पर पुस्तक में मातृभाषा, अंग्रेजी और गणित को अनिवार्य विषयों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  • उच्च माध्यमिक स्तर पर कला, वाणिज्य तथा विज्ञान वर्गों के अनुसार अलग-अलग विषयों का उल्लेख किया गया है।
  • कला वर्ग के प्रमुख विषय हैं—इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान।
  • वाणिज्य वर्ग में एकाउन्टेन्सी, टाइपिंग तथा व्यापार विषय बताए गए हैं।
  • विज्ञान वर्ग में भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, कम्प्यूटर तथा अन्य ऐच्छिक विषयों का उल्लेख किया गया है।
  • भाषा शिक्षण में एक से अधिक भाषाओं के ज्ञान तथा तीन भाषाओं के अध्ययन को महत्त्व दिया गया।
  • विज्ञान शिक्षण से विद्यार्थियों में अवलोकन, परिकल्पना, परीक्षण तथा निष्कर्ष निकालने की क्षमता विकसित करने पर बल दिया गया।
  • विज्ञान शिक्षा में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करके अन्धविश्वास, अज्ञानता तथा कुरीतियों को दूर करने पर बल दिया गया।
  • सामाजिक अध्ययन का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को समाज की वास्तविक परिस्थितियों से परिचित कराना है।
  • गणित शिक्षण का उद्देश्य तार्किक चिन्तन, अमूर्त चिन्तन तथा समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करना है।
  • आधुनिक तकनीकी के बढ़ते महत्त्व को ध्यान में रखते हुए कम्प्यूटर शिक्षा को आवश्यक माना गया।
  • कार्यानुभव का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों में आपसी सहयोग, सहभागिता तथा व्यावहारिक कौशल का विकास करना है।
  • कला शिक्षण से कलात्मक क्षमता, सांस्कृतिक समझ तथा सौन्दर्यात्मक जागरूकता विकसित होती है।
  • स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा में स्वच्छता, स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान, शारीरिक विकास तथा खेलकूद को महत्त्व दिया गया।
  • NCF-2005 में विभिन्न विषयों के शिक्षण को बच्चों के बौद्धिक, सामाजिक, शारीरिक तथा सृजनात्मक विकास से जोड़ा गया।
Topic 4 राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005—प्रमुख समस्याएँ एवं उनके समाधान

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005—प्रमुख समस्याएँ एवं उनके समाधान

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 की प्रमुख समस्याएँ

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 (NCF-2005) का उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा को बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सुधार करना था।

लेकिन किसी भी पाठ्यचर्या को तैयार करना और उसे देश के सभी विद्यालयों में प्रभावी ढंग से लागू करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में भाषायी, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा शैक्षिक परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं।

पुस्तक के लेखक ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए NCF-2005 के निर्माण एवं क्रियान्वयन से सम्बन्धित 11 प्रमुख समस्याओं का उल्लेख किया है।

इन समस्याओं का सम्बन्ध शिक्षकों की उपलब्धता, भाषा, समाज की अपेक्षाओं, राजनीति, धर्म, विचारों की विविधता, धन, परम्पराओं, वैश्वीकरण, निर्णय प्रक्रिया तथा संसाधनों की कमी से है।

1. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 की ग्यारह प्रमुख समस्याएँ

1. शिक्षक सम्बन्धी समस्याएँ

किसी भी पाठ्यचर्या की सफलता काफी हद तक विद्यालयों में उपलब्ध शिक्षकों की संख्या और उनकी योग्यता पर निर्भर करती है।

जब शिक्षकों की संख्या कम होती है, तब पाठ्यचर्या के सभी प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करना कठिन हो जाता है।

पुस्तक में उदाहरण दिया गया है कि प्रारम्भिक दो वर्षों में बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा देने की बात कही गई है। लेकिन एक ही विद्यालय में विभिन्न मातृभाषाओं के विद्यार्थी हो सकते हैं।

ऐसी स्थिति में प्रत्येक भाषा का ज्ञान रखने वाले पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराना कठिन हो जाता है।

अतः शिक्षकों की अपर्याप्त संख्या और भाषायी योग्यता में भिन्नता पाठ्यचर्या के क्रियान्वयन में प्रमुख समस्या उत्पन्न करती है।

2. भाषाओं की समस्या

भारत एक बहुभाषी देश है। यहाँ विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं।

इस कारण पाठ्यचर्या निर्माण के समय यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि शिक्षा का माध्यम कौन-सी भाषा हो तथा किस भाषा को पाठ्यक्रम में कितना महत्त्व दिया जाए।

पुस्तक के अनुसार विभिन्न राज्यों में अपनी-अपनी भाषाओं को प्रमुख स्थान दिलाने की अपेक्षाओं के कारण विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।

भाषायी विविधता के कारण सभी क्षेत्रों के लिए एक समान भाषा-व्यवस्था निर्धारित करना कठिन हो जाता है।

इस प्रकार शिक्षा के माध्यम, भाषाओं के चयन तथा भाषायी प्राथमिकताओं से सम्बन्धित समस्याएँ राष्ट्रीय पाठ्यचर्या के निर्माण और क्रियान्वयन को प्रभावित करती हैं।

3. समाज की आकांक्षाओं की समस्या

समाज के विभिन्न वर्गों की शिक्षा से अलग-अलग अपेक्षाएँ होती हैं।

पुस्तक के लेखक के अनुसार अनेक अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे शिक्षा प्राप्त करके इंजीनियर, डॉक्टर, आई.ए.एस., आई.पी.एस. अथवा अन्य प्रतिष्ठित पदों पर पहुँचें।

इस दृष्टिकोण में शिक्षा की सफलता को मुख्यतः रोजगार तथा उच्च पद प्राप्त करने से जोड़कर देखा जाता है।

लेकिन पाठ्यचर्या का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करने की तैयारी कराना नहीं, बल्कि बच्चों के ज्ञान, कौशल तथा व्यक्तित्व का विकास करना भी है।

इसलिए समाज की विभिन्न अपेक्षाओं और पाठ्यचर्या के व्यापक शैक्षिक उद्देश्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करना कठिन हो सकता है।

अतः समाज की विविध आकांक्षाएँ भी पाठ्यचर्या निर्माण की एक महत्त्वपूर्ण समस्या हैं।

4. राजनीतिक समस्याएँ

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में समय-समय पर सरकारों का परिवर्तन होता रहता है।

शिक्षा सम्बन्धी नीतियों और पाठ्यचर्या के निर्माण में सरकार तथा प्रशासन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

पुस्तक के लेखक के अनुसार पाठ्यचर्या निर्माण में कभी-कभी राजनीतिक संगठनों और धार्मिक समूहों के प्रभाव के कारण मतभेद उत्पन्न हो जाते हैं।

इन मतभेदों के कारण पाठ्यचर्या के स्वरूप पर सहमति बनाना तथा निष्पक्ष निर्णय लेना कठिन हो सकता है।

इस प्रकार राजनीतिक हस्तक्षेप तथा विभिन्न समूहों के परस्पर विरोधी विचार पाठ्यचर्या निर्माण और उसके क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।

5. धर्म सम्बन्धी समस्या

भारत में विभिन्न धर्मों और धार्मिक मान्यताओं के लोग निवास करते हैं।

पुस्तक के लेखक के अनुसार धर्मनिरपेक्ष शिक्षा की व्यवस्था होने के बावजूद पाठ्यचर्या में धर्म तथा धार्मिक विचारों के स्थान को लेकर मतभेद उत्पन्न होते रहे हैं।

कुछ समूह शिक्षा में अपनी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यताओं को महत्त्व देने की अपेक्षा करते हैं, जबकि अन्य समूह भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में पाठ्यचर्या का ऐसा स्वरूप तैयार करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है जिसे विभिन्न समुदाय स्वीकार कर सकें।

इसलिए धार्मिक मतभेद तथा पाठ्यचर्या में धार्मिक विचारों के स्थान को लेकर विवाद एक समस्या के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।

6. विचारों की समस्या

समाज में शिक्षा के उद्देश्यों, विषयवस्तु और शिक्षण-विधियों के सम्बन्ध में विभिन्न विचारधाराएँ प्रचलित हैं।

किसी विषय पर सभी व्यक्तियों के विचार समान नहीं होते। इसलिए पाठ्यचर्या निर्माण के समय अलग-अलग विचारों के बीच सहमति स्थापित करना कठिन हो सकता है।

पुस्तक में उदाहरण के रूप में आदर्शवाद तथा प्रयोगवाद का उल्लेख किया गया है।

  • आदर्शवादी दृष्टिकोण— शिक्षा में आदर्शों तथा मूल्यों को विशेष महत्त्व देता है।
  • प्रयोगवादी दृष्टिकोण— शिक्षा में अनुभव, उपयोगिता तथा व्यावहारिक कार्यों को महत्त्व देता है।

जब विभिन्न विचारधाराओं के समर्थक अपनी-अपनी मान्यताओं को अधिक महत्त्व देते हैं, तब एक सर्वमान्य पाठ्यचर्या तैयार करना कठिन हो सकता है।

इसलिए विचारों एवं शैक्षिक दृष्टिकोणों की विविधता पाठ्यचर्या निर्माण की एक प्रमुख समस्या मानी गई है।

7. धन सम्बन्धी समस्या

नई पाठ्यचर्या के निर्माण और उसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है।

पुस्तक के अनुसार धन की कमी के कारण पाठ्यचर्या में कुछ आवश्यक विषयों और सुविधाओं का समुचित समावेश नहीं हो पाता।

उदाहरण के लिए, आधुनिक समय में कम्प्यूटर का सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक ज्ञान महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

लेकिन धनाभाव के कारण अनेक विद्यालयों में पर्याप्त कम्प्यूटर उपलब्ध कराना तथा कम्प्यूटर शिक्षा की उचित व्यवस्था करना कठिन हो सकता है।

इस प्रकार पर्याप्त धनराशि और आवश्यक शैक्षिक सुविधाओं का अभाव पाठ्यचर्या के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करता है।

8. परम्पराओं की समस्या

भारतीय समाज में विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराएँ प्रचलित हैं।

ये परम्पराएँ समाज के जीवन, व्यवहार और शिक्षा सम्बन्धी विचारों को प्रभावित करती हैं।

पुस्तक के लेखक के अनुसार पाठ्यचर्या निर्माण के समय परम्परागत विचारों तथा आधुनिक शैक्षिक दृष्टिकोणों के बीच मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं।

एक ओर आधुनिक शिक्षा में नवीन विचारों तथा सुधारों को महत्त्व दिया जाता है, वहीं दूसरी ओर समाज के कुछ वर्ग परम्परागत व्यवस्थाओं को बनाए रखने पर बल देते हैं।

इन परिस्थितियों में पाठ्यचर्या में भारतीय परम्पराओं तथा नवीन शैक्षिक विचारों के बीच उचित समन्वय स्थापित करना कठिन हो सकता है।

अतः सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं और रूढ़िवादिता से उत्पन्न बाधाएँ भी पाठ्यचर्या निर्माण की समस्या हैं।

9. वैश्वीकरण का प्रभाव

वैश्वीकरण (Globalisation) के कारण विभिन्न देशों की शिक्षा-व्यवस्थाओं, शैक्षिक विचारों तथा उद्देश्यों का प्रभाव एक-दूसरे पर पड़ता है।

पुस्तक के लेखक का विचार है कि विदेशी शिक्षा-व्यवस्थाओं से प्रभावित होकर तैयार की गई पाठ्यचर्या आवश्यक नहीं कि भारत की परिस्थितियों के लिए पूरी तरह उपयुक्त हो।

भारत की सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक आवश्यकताएँ अन्य देशों से भिन्न हो सकती हैं।

इसलिए विदेशी शैक्षिक विचारों को अपनाते समय भारतीय परिस्थितियों और विद्यार्थियों की आवश्यकताओं पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

इस सन्दर्भ में पुस्तक ने वैश्वीकरण के प्रभाव और स्थानीय आवश्यकताओं के बीच सामंजस्य को पाठ्यचर्या निर्माण की समस्या के रूप में प्रस्तुत किया है।

10. कार्यान्वयन एवं निर्णय की समस्या

पाठ्यचर्या निर्माण के लिए विभिन्न विशेषज्ञों तथा समितियों के माध्यम से निर्णय लिए जाते हैं।

इन समितियों के सदस्यों के विचार और सुझाव अलग-अलग हो सकते हैं।

पुस्तक के अनुसार विचारों की इस विविधता के कारण किसी विषयवस्तु या प्रकरण को पाठ्यचर्या में शामिल करने के सम्बन्ध में निर्णय लेना कठिन हो जाता है।

इसके अतिरिक्त पाठ्यचर्या में दिए गए सुझावों को विद्यालयों में सही ढंग से लागू करना भी आवश्यक है।

यदि पाठ्यचर्या का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं किया जाता, तो उसके निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति सम्भव नहीं हो पाती।

इसलिए निर्णय लेने में कठिनाई तथा पाठ्यचर्या के प्रभावी क्रियान्वयन का अभाव एक प्रमुख समस्या है।

11. संसाधनों का अभाव

किसी पाठ्यचर्या का निर्माण उपलब्ध संसाधनों तथा विद्यालयों की वास्तविक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

भारत जैसे विशाल देश में सभी क्षेत्रों और विद्यालयों के पास समान शैक्षिक संसाधन उपलब्ध नहीं होते।

पुस्तक के अनुसार संसाधनों की कमी के कारण पाठ्यचर्या के विभिन्न विषयों और प्रावधानों पर पर्याप्त विचार-विमर्श तथा उनका क्रियान्वयन प्रभावित हो सकता है।

इसलिए पर्याप्त संसाधनों का अभाव भी पाठ्यचर्या निर्माण और उसकी सफलता में एक महत्त्वपूर्ण बाधा है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 सम्बन्धी समस्याओं का सारांश

समस्या मुख्य कारण
शिक्षक सम्बन्धी पर्याप्त एवं उपयुक्त योग्यता वाले शिक्षकों की कमी।
भाषायी शिक्षा के माध्यम एवं विभिन्न भाषाओं के चयन पर मतभेद।
सामाजिक आकांक्षाएँ शिक्षा से समाज के विभिन्न वर्गों की अलग-अलग अपेक्षाएँ।
राजनीतिक राजनीतिक हस्तक्षेप एवं विभिन्न समूहों के मतभेद।
धार्मिक धार्मिक विचारों तथा पाठ्यचर्या में उनके स्थान को लेकर विवाद।
विचार सम्बन्धी विभिन्न शैक्षिक विचारधाराओं के बीच असहमति।
धन सम्बन्धी आर्थिक सहायता और शैक्षिक सुविधाओं की कमी।
परम्पराएँ परम्परागत तथा आधुनिक विचारों के बीच मतभेद।
वैश्वीकरण विदेशी शैक्षिक विचारों एवं भारतीय आवश्यकताओं में अन्तर।
कार्यान्वयन एवं निर्णय निर्णय लेने में कठिनाई और सुझावों का प्रभावी क्रियान्वयन न होना।
संसाधनों का अभाव विद्यालयों एवं विभिन्न क्षेत्रों में आवश्यक संसाधनों की कमी।

2. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 सम्बन्धी समस्याओं के समाधान

पाठ्यचर्या का सफल निर्माण और क्रियान्वयन तभी सम्भव है, जब उससे सम्बन्धित समस्याओं को समझकर उनके समाधान के लिए उचित प्रयास किए जाएँ।

पुस्तक के लेखक ने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान के लिए 8 प्रमुख सुझाव प्रस्तुत किए हैं।

1. समाज के प्रति निष्ठा एवं उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना

समाज के व्यक्तियों में निष्ठा तथा उत्तरदायित्व की भावना विकसित की जानी चाहिए।

शिक्षा के प्रति ऐसा दृष्टिकोण अपनाया जाए जिसमें केवल पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करना ही प्रमुख उद्देश्य न हो, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास को भी महत्त्व दिया जाए।

इससे शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों को समझने और पाठ्यचर्या के निर्माण में सहयोग करने की भावना विकसित हो सकती है।

2. शिक्षकों में आत्मविश्वास एवं कर्तव्यपरायणता का विकास

शिक्षकों में आत्मविश्वास की भावना विकसित की जानी चाहिए।

इसके साथ ही शिक्षकों को अपने शैक्षिक उत्तरदायित्वों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाया जाना चाहिए।

आत्मविश्वासी तथा कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक पाठ्यचर्या के उद्देश्यों को समझकर शिक्षण कार्य अधिक प्रभावी ढंग से कर सकते हैं।

3. भाषा सम्बन्धी समस्याओं का समाधान

पाठ्यचर्या के निर्माण में उत्पन्न होने वाले भाषायी विवादों को दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

पुस्तक के अनुसार भाषा सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए ऐसी सर्वस्वीकार्य भाषायी व्यवस्था निर्धारित की जानी चाहिए, जिस पर अनावश्यक विवाद न हो।

इसका उद्देश्य शिक्षा के माध्यम और भाषाओं के चयन को लेकर उत्पन्न मतभेदों को कम करना है।

4. शिक्षा के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराना

सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में अधिक मात्रा में आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए।

विद्यालयों में पाठ्यचर्या के अनुसार आवश्यक शिक्षण सामग्री तथा अन्य सुविधाओं की व्यवस्था के लिए पर्याप्त धनराशि आवश्यक है।

पुस्तक में शिक्षा को राष्ट्र एवं समाज के उत्थान का महत्त्वपूर्ण साधन मानते हुए इस क्षेत्र के लिए आर्थिक सहायता बढ़ाने पर बल दिया गया है।

5. आधुनिक विचारों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना

पाठ्यचर्या निर्माण में भारतीय समाज के विकसित दृष्टिकोण को स्थान देते हुए आधुनिक विचारधाराओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न विचारों का अध्ययन करके उनके उपयोगी पक्षों को पाठ्यचर्या में सम्मिलित किया जा सकता है।

इससे पाठ्यचर्या को बदलती सामाजिक और शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने में सहायता मिलेगी।

6. धार्मिक संकीर्णता को दूर करना

पाठ्यचर्या निर्माण में धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर विचार किया जाना चाहिए।

पुस्तक में सुझाव दिया गया है कि शिक्षा में मानव कल्याण तथा मानव विकास की भावना को महत्त्व दिया जाए।

इससे शिक्षा के उद्देश्यों को व्यापक मानवीय हितों से जोड़ने तथा धार्मिक मतभेदों के प्रभाव को कम करने में सहायता मिल सकती है।

7. शिक्षा में राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करना

शिक्षा को राजनीतिक समस्याओं से बचाने के लिए राजनीतिक व्यक्तियों में शिक्षा के महत्त्व के प्रति जागरूकता विकसित की जानी चाहिए।

उन्हें शिक्षा के विकास तथा विद्यार्थियों की आवश्यकताओं पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

इससे पाठ्यचर्या निर्माण में अनावश्यक राजनीतिक हस्तक्षेप कम करने तथा शैक्षिक उद्देश्यों को प्राथमिकता देने में सहायता मिलेगी।

8. पाठ्यचर्या निर्माण समितियों में योग्य एवं अनुभवी व्यक्तियों का चयन

पाठ्यचर्या निर्माण एक महत्त्वपूर्ण और उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य है।

इसलिए पाठ्यचर्या निर्माण समितियों में योग्य, अनुभवी तथा शिक्षा की वास्तविक समस्याओं को समझने वाले व्यक्तियों को स्थान दिया जाना चाहिए।

पुस्तक के अनुसार उपलब्ध संसाधनों और शैक्षिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सर्वोत्तम पाठ्यचर्या का निर्माण करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

योग्य एवं अनुभवी व्यक्तियों की सहभागिता से पाठ्यचर्या अधिक उपयोगी तथा व्यावहारिक बन सकती है।

समस्याओं के समाधान का महत्त्व

पाठ्यचर्या की सफलता केवल उसके निर्माण पर निर्भर नहीं करती, बल्कि विद्यालयों में उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी निर्भर करती है।

इसलिए शिक्षकों में आत्मविश्वास तथा कर्तव्यनिष्ठा विकसित करना, भाषा सम्बन्धी विवादों को कम करना, पर्याप्त धन उपलब्ध कराना तथा योग्य व्यक्तियों को पाठ्यचर्या निर्माण में सम्मिलित करना आवश्यक है।

इसके साथ ही सामाजिक उत्तरदायित्व, आधुनिक विचारों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण तथा धार्मिक और राजनीतिक संकीर्णता से ऊपर उठकर शिक्षा के विकास पर ध्यान देना भी महत्त्वपूर्ण है।

पुस्तक के अनुसार इन उपायों से पाठ्यचर्या को अधिक उपयुक्त, व्यावहारिक तथा प्रभावी बनाने में सहायता मिल सकती है।

समग्र निष्कर्ष

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 का उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा में सुधार करना तथा बच्चों को अधिक उपयोगी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की दिशा निर्धारित करना था।

पुस्तक के लेखक ने इसके निर्माण एवं क्रियान्वयन से सम्बन्धित शिक्षक, भाषा, सामाजिक आकांक्षाओं, राजनीति, धर्म, विचारों, धन, परम्पराओं, वैश्वीकरण, निर्णय प्रक्रिया तथा संसाधनों की कमी जैसी 11 प्रमुख समस्याओं का उल्लेख किया है।

इन समस्याओं के समाधान के लिए लेखक ने सामाजिक उत्तरदायित्व, शिक्षकों में आत्मविश्वास, भाषायी समस्याओं के समाधान, शिक्षा के लिए पर्याप्त धन, आधुनिक विचारों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, धार्मिक संकीर्णता से मुक्ति, राजनीतिक जागरूकता तथा योग्य विशेषज्ञों की सहभागिता पर बल दिया है।

इस प्रकार पाठ्यचर्या का सफल क्रियान्वयन शिक्षकों, समाज, सरकार तथा शिक्षा से सम्बन्धित संस्थाओं के सहयोग पर निर्भर करता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पुस्तक में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के निर्माण एवं क्रियान्वयन से सम्बन्धित 11 प्रमुख समस्याएँ बताई गई हैं।
  • शिक्षक सम्बन्धी समस्या— पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षकों तथा विभिन्न मातृभाषाओं का ज्ञान रखने वाले शिक्षकों की कमी।
  • भाषायी समस्या— शिक्षा के माध्यम तथा पाठ्यक्रम में विभिन्न भाषाओं के स्थान को लेकर विवाद।
  • समाज की आकांक्षाएँ— शिक्षा से केवल उच्च पद एवं प्रतिष्ठित रोजगार प्राप्त करने की अपेक्षा।
  • राजनीतिक समस्या— पाठ्यचर्या निर्माण में राजनीतिक हस्तक्षेप तथा विभिन्न समूहों के मतभेद।
  • धर्म सम्बन्धी समस्या— पाठ्यचर्या में धार्मिक विचारों के स्थान को लेकर विवाद।
  • विचारों की समस्या— आदर्शवाद तथा प्रयोगवाद जैसी विभिन्न शैक्षिक विचारधाराओं के बीच मतभेद।
  • धन सम्बन्धी समस्या— पर्याप्त आर्थिक सहायता के अभाव में आवश्यक शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध न होना।
  • परम्पराओं की समस्या— परम्परागत विचारों और आधुनिक शैक्षिक दृष्टिकोणों के बीच सामंजस्य का अभाव।
  • वैश्वीकरण का प्रभाव— विदेशी शैक्षिक विचारों और भारतीय परिस्थितियों के बीच उपयुक्त तालमेल स्थापित करने की चुनौती।
  • कार्यान्वयन एवं निर्णय की समस्या— पाठ्यचर्या निर्माण में मतभेद तथा उसके सुझावों को प्रभावी ढंग से लागू न कर पाना।
  • संसाधनों का अभाव— विद्यालयों एवं विभिन्न क्षेत्रों में आवश्यक शैक्षिक संसाधनों की कमी।
  • पुस्तक में इन समस्याओं के समाधान के लिए 8 प्रमुख सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं।
  • समाज में निष्ठा एवं उत्तरदायित्व तथा शिक्षकों में आत्मविश्वास एवं कर्तव्यपरायणता विकसित की जाए।
  • भाषा सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए सर्वस्वीकार्य भाषायी व्यवस्था निर्धारित करने का प्रयास किया जाए।
  • सरकार द्वारा शिक्षा के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराई जाए।
  • आधुनिक विचारों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाए तथा धार्मिक संकीर्णता के स्थान पर मानव कल्याण को महत्त्व दिया जाए।
  • राजनीतिक व्यक्तियों को शिक्षा के विकास के प्रति जागरूक बनाया जाए, जिससे अनावश्यक राजनीतिक हस्तक्षेप कम हो।
  • पाठ्यचर्या निर्माण समितियों में योग्य एवं अनुभवी व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाए।
  • पाठ्यचर्या का सफल क्रियान्वयन उपयुक्त शिक्षकों, पर्याप्त संसाधनों, उचित निर्णयों तथा समाज और सरकार के सहयोग पर निर्भर करता है।
Topic 5 राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009—परिचय एवं प्रत्यक्ष उद्देश्य

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009—परिचय एवं प्रत्यक्ष उद्देश्य

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 का परिचय

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 (National Curriculum Framework for Teacher Education—NCFTE 2009) शिक्षक शिक्षा को अधिक गुणवत्तापूर्ण, प्रभावशाली तथा आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण रूपरेखा है।

शिक्षा की गुणवत्ता में शिक्षक की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। शिक्षक केवल विद्यार्थियों को विषयों का ज्ञान नहीं देता, बल्कि उनके व्यक्तित्व, व्यवहार तथा भविष्य के निर्माण में भी योगदान देता है।

प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में शिक्षक के कार्यों और उत्तरदायित्वों को विशेष सम्मान दिया गया है। शिक्षक को राष्ट्र-निर्माण का महत्त्वपूर्ण आधार माना जाता है।

आधुनिक समय में शिक्षण की नई विधियों और तकनीकों का विकास हुआ है, लेकिन इसके बावजूद शिक्षा में शिक्षक का महत्त्व कम नहीं हुआ है।

इसलिए ऐसे शिक्षकों का निर्माण आवश्यक है जो बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपने ज्ञान, शिक्षण-कौशल तथा व्यवहार में सुधार कर सकें।

1. राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 की पृष्ठभूमि

शिक्षा-व्यवस्था में सुधार के लिए समय-समय पर विभिन्न आयोगों और समितियों का गठन किया जाता रहा है।

इन आयोगों और समितियों ने शिक्षक शिक्षा, प्रशिक्षण, शिक्षकों की कार्य-प्रणाली तथा शैक्षिक सुविधाओं में सुधार के लिए सुझाव प्रस्तुत किए।

इन सुधारों का प्रमुख उद्देश्य योग्य, प्रशिक्षित तथा प्रभावशाली शिक्षकों का निर्माण करना था।

पुस्तक के अनुसार शिक्षक शिक्षा में सुधार के लिए निम्नलिखित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया—

  • सेवारत शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था।
  • शिक्षक शिक्षा में अनुसंधान को प्रोत्साहन।
  • शिक्षक शिक्षा संस्थाओं की मान्यता एवं सुधार।
  • शिक्षण में नवीन विचारों तथा नवाचारों का प्रयोग।
  • शिक्षकों के प्रशिक्षण को समय की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना।

इसके अतिरिक्त शिक्षा के सार्वभौमीकरण तथा विद्यार्थियों के साक्षरता स्तर को बढ़ाने के प्रयासों से भी शिक्षकों के उत्तरदायित्वों में वृद्धि हुई।

निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 ने सभी बच्चों तक शिक्षा पहुँचाने के उद्देश्य को विशेष महत्त्व दिया।

इन परिस्थितियों में शिक्षकों को अपने उत्तरदायित्व प्रभावी ढंग से निभाने के लिए उचित प्रशिक्षण और व्यावसायिक दक्षता प्रदान करना आवश्यक हो गया।

2. राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 की आवश्यकता

विद्यालयी शिक्षा की सफलता काफी हद तक शिक्षकों की योग्यता तथा उनकी शिक्षण-विधियों पर निर्भर करती है।

अभिभावक और समाज शिक्षक से अपेक्षा करते हैं कि वह बच्चों को अच्छी शिक्षा प्रदान करने के साथ उनकी शैक्षिक उपलब्धियों तथा व्यवहार में भी सुधार करे।

लेकिन इन अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए शिक्षक का केवल विषय-ज्ञान पर्याप्त नहीं है। उसे बच्चों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं, सामाजिक परिस्थितियों तथा आधुनिक शिक्षण-विधियों का भी ज्ञान होना चाहिए।

इसलिए ऐसी शिक्षक शिक्षा पाठ्यचर्या की आवश्यकता अनुभव की गई जो—

  • भावी शिक्षकों को प्रभावशाली शिक्षण के लिए तैयार करे।
  • शिक्षकों में आवश्यक व्यावसायिक योग्यताओं का विकास करे।
  • नवीन शिक्षण-विधियों तथा तकनीकों के प्रयोग को प्रोत्साहित करे।
  • बच्चों की व्यक्तिगत एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को समझने में सहायता करे।
  • शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाए तथा उसे समाज की आवश्यकताओं से जोड़े।

इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 प्रस्तुत की गई।

3. राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के उद्देश्य

पुस्तक के अनुसार राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 का प्रमुख उद्देश्य ऐसे आदर्श शिक्षकों का निर्माण करना है जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के साथ राष्ट्र की प्रगति में भी योगदान दे सकें।

इसके अन्तर्गत शिक्षकों के ज्ञान, व्यवहार, कार्यकुशलता तथा व्यावसायिक योग्यताओं के विकास पर बल दिया गया।

पुस्तक में NCFTE-2009 के उद्देश्यों को दो प्रकारों में विभाजित किया गया है—

  1. प्रत्यक्ष उद्देश्य (Direct Objectives)।
  2. अप्रत्यक्ष उद्देश्य (Indirect Objectives)।

प्रत्यक्ष उद्देश्यों का सम्बन्ध शिक्षक की योग्यता, कार्य तथा व्यवहार में प्रत्यक्ष सुधार से है।

जबकि अप्रत्यक्ष उद्देश्यों का सम्बन्ध शिक्षक के कार्यों के माध्यम से विद्यार्थियों के विकास तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में होने वाले सुधारों से है।

इस Topic में पुस्तक के अनुसार शिक्षक शिक्षा के प्रत्यक्ष उद्देश्यों का अध्ययन किया गया है।

4. राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के प्रत्यक्ष उद्देश्य

प्रत्यक्ष उद्देश्य वे उद्देश्य हैं जिनका सम्बन्ध शिक्षक के ज्ञान, व्यवहार, योग्यता, प्रशिक्षण तथा कार्यकुशलता में सीधे सुधार करने से होता है।

इन उद्देश्यों के माध्यम से शिक्षक को ऐसा बनाया जाता है कि वह विद्यार्थियों के अधिगम, व्यवहार तथा व्यक्तित्व विकास में प्रभावशाली भूमिका निभा सके।

पुस्तक में NCFTE-2009 के निम्नलिखित 10 प्रत्यक्ष उद्देश्य बताए गए हैं।

1. शिक्षक शिक्षा हेतु उचित पाठ्यचर्या का निर्माण

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 का एक प्रमुख उद्देश्य शिक्षक शिक्षा के लिए उचित पाठ्यचर्या तैयार करना है।

शिक्षक शिक्षा की पाठ्यचर्या ऐसी होनी चाहिए जो भावी शिक्षकों में आदर्श शिक्षक के आवश्यक गुणों तथा व्यावसायिक योग्यताओं का विकास कर सके।

इसके लिए केवल शिक्षण सम्बन्धी विषयों का ज्ञान देना पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि समाज और दर्शन से सम्बन्धित विचारों को भी शिक्षक शिक्षा का अंग बनाने पर बल दिया गया।

प्रमुख सुझाव—

  • शिक्षक शिक्षा की पाठ्यचर्या को गुणवत्तापूर्ण बनाया जाए।
  • इसमें समाज से सम्बन्धित आवश्यक ज्ञान सम्मिलित किया जाए।
  • शैक्षिक एवं दार्शनिक विचारों को उचित स्थान दिया जाए।
  • भावी शिक्षकों में आदर्श शिक्षक के गुण विकसित किए जाएँ।

इस प्रकार उचित पाठ्यचर्या का निर्माण शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का महत्त्वपूर्ण आधार माना गया।

2. शिक्षक शिक्षा के लिए उचित समयावधि का निर्धारण

शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता के लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की उचित अवधि तथा प्रवेश योग्यता निर्धारित करना भी आवश्यक है।

पुस्तक में NCFTE-2009 के अन्तर्गत शिक्षक प्रशिक्षण की समयावधि और आवश्यक शैक्षिक योग्यताओं का उल्लेख किया गया है।

प्रशिक्षण पाठ्यक्रम पुस्तक में वर्णित अवधि प्रवेश योग्यता
डी.एड. (D.Ed.) 2 वर्ष इण्टरमीडिएट
बी.एड. (B.Ed.) 1 वर्ष स्नातक

पुस्तक के अनुसार डी.एड. को डिप्लोमा पाठ्यक्रम तथा बी.एड. को डिग्री पाठ्यक्रम के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य शिक्षक प्रशिक्षण की समयावधि तथा आवश्यक योग्यताओं को स्पष्ट करना था।

महत्त्वपूर्ण: ऊपर दी गई अवधियाँ पुस्तक में वर्णित तत्कालीन शिक्षक शिक्षा व्यवस्था के अनुसार हैं। इन्हें वर्तमान समय के सभी शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की अवधि नहीं समझना चाहिए।

3. शिक्षकों के व्यावसायिक विकास के अवसर उपलब्ध कराना

NCFTE-2009 का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य शिक्षकों को व्यावसायिक विकास (Professional Growth) के पर्याप्त अवसर प्रदान करना है।

व्यावसायिक विकास का अर्थ है शिक्षक के विषय-ज्ञान, शिक्षण-कौशल तथा कार्यकुशलता में निरन्तर सुधार करना।

इसके लिए शिक्षकों तथा छात्राध्यापकों के प्रशिक्षण की उचित व्यवस्था करने पर बल दिया गया।

पुस्तक में जिला स्तर पर स्थापित DIET (जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान) तथा BRC (ब्लॉक संसाधन केन्द्र) के माध्यम से प्रशिक्षण की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।

प्रमुख उद्देश्य
  • शिक्षकों को व्यावसायिक विकास के अवसर देना।
  • प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षण-कौशल में सुधार करना।
  • नई शिक्षण तकनीकों तथा नवाचारों से परिचित कराना।
  • शिक्षकों की शिक्षण-शैली को अधिक प्रभावी बनाना।

इस प्रकार नियमित प्रशिक्षण और नवीन विचारों के प्रयोग से शिक्षकों की व्यावसायिक क्षमता विकसित करने पर बल दिया गया।

4. शिक्षक की योग्यताओं एवं गुणों का विकास करना

एक प्रभावशाली शिक्षक के लिए केवल विषय का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। उसमें शिक्षण कार्य से सम्बन्धित विभिन्न योग्यताओं तथा गुणों का विकास होना भी आवश्यक है।

NCFTE-2009 में शिक्षकों की योग्यता, क्षमता तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों को विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया गया।

पुस्तक के अनुसार शिक्षक में निम्नलिखित योग्यताएँ विकसित की जानी चाहिए—

  • प्रस्तुतीकरण की योग्यता— विषयवस्तु को सरल, स्पष्ट तथा प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता।
  • शिक्षण-अधिगम वातावरण की समझ— कक्षा में उपयुक्त वातावरण विकसित करने की योग्यता।
  • विद्यार्थियों की मनःस्थिति समझना— बच्चों की मानसिक अवस्था, रुचि तथा आवश्यकताओं को समझने की क्षमता।
  • शिक्षण-कौशल का विकास— विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुरूप उचित शिक्षण-विधियों का प्रयोग करना।

इन योग्यताओं का विकास करने का मुख्य उद्देश्य शिक्षक की कार्यकुशलता के साथ विद्यार्थियों के अधिगम स्तर में सुधार करना है।

5. शिक्षक शिक्षा का क्रमबद्ध प्रस्तुतीकरण

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 में शिक्षक शिक्षा को क्रमबद्ध तथा सुव्यवस्थित बनाने पर भी बल दिया गया।

इसका उद्देश्य भावी शिक्षकों को व्यवस्थित प्रशिक्षण देकर आदर्श शिक्षक के रूप में तैयार करना है।

पुस्तक के अनुसार शिक्षक शिक्षा की पाठ्यचर्या को निम्नलिखित तीन भागों में प्रस्तुत किया गया है—

  1. शिक्षा के आधार— शिक्षा के मूल विचारों तथा आधारभूत सिद्धान्तों का अध्ययन।
  2. शिक्षाशास्त्र— शिक्षण-अधिगम से सम्बन्धित ज्ञान तथा शिक्षण-विधियों का अध्ययन।
  3. पाठ्यक्रम— पाठ्यक्रम तथा उससे सम्बन्धित शिक्षण विषयवस्तु का अध्ययन।

इस प्रकार शिक्षक शिक्षा को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करके भावी शिक्षकों की समझ और शिक्षण-कौशल विकसित करने पर बल दिया गया।

6. शिक्षक का विकास एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में

शिक्षक का कार्य केवल विद्यालय में अध्यापन करना नहीं है। वह समाज के विकास तथा शिक्षा के प्रसार में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।

इसलिए NCFTE-2009 में शिक्षक को सामाजिक कार्यकर्ता (Social Worker) के रूप में विकसित करने को महत्त्व दिया गया।

विशेष रूप से प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक विद्यार्थियों की शिक्षा के साथ उनके अभिभावकों तथा समुदाय से भी सम्बन्ध स्थापित करता है।

सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में शिक्षक की भूमिका
  • विद्यार्थियों तथा अभिभावकों के हित में कार्य करना।
  • विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में सहयोग करना।
  • विद्यालयों में छात्र संख्या बढ़ाने के प्रयासों में योगदान देना।
  • समुदाय तथा विद्यालय के बीच सहयोग स्थापित करना।
  • समाज के विभिन्न कार्यक्रमों और गतिविधियों में भाग लेना।
  • आवश्यकतानुसार समाज के अनुभवी व्यक्तियों को विद्यालयी कार्यक्रमों से जोड़ना।

इस प्रकार शिक्षक समाज और विद्यालय के बीच सम्बन्ध स्थापित करके सामुदायिक सहयोग तथा शैक्षिक विकास में योगदान देता है।

7. शिक्षक का विकास एक मनोवैज्ञानिक के रूप में

आधुनिक शिक्षा में बालक-केंद्रित शिक्षण को विशेष महत्त्व दिया जाता है।

प्रत्येक विद्यार्थी की मानसिक अवस्था, रुचि, योग्यता, भावना तथा सीखने की गति अलग-अलग हो सकती है।

इसलिए शिक्षक को बच्चों की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं का ज्ञान होना आवश्यक है।

NCFTE-2009 में शिक्षक को मनोवैज्ञानिक (Psychologist) के रूप में विकसित करने पर बल दिया गया।

मनोवैज्ञानिक के रूप में शिक्षक की भूमिका
  • विद्यार्थियों की मानसिक अवस्था को समझना।
  • बच्चों की व्यक्तिगत भिन्नताओं की पहचान करना।
  • विद्यार्थियों की रुचियों, इच्छाओं तथा भावनाओं को समझना।
  • बच्चों की अधिगम सम्बन्धी समस्याओं की पहचान करना।
  • उनकी आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण-विधियों का चयन करना।

उदाहरण के लिए, यदि किसी विद्यार्थी को कोई विषय समझने में कठिनाई हो रही है, तो शिक्षक उसकी समस्या को समझकर शिक्षण की उपयुक्त विधि अपना सकता है।

इस प्रकार मनोवैज्ञानिक समझ रखने वाला शिक्षक विद्यार्थियों को उनकी क्षमताओं और आवश्यकताओं के अनुरूप सीखने में सहायता करता है।

8. शिक्षक का विकास एक विचारक के रूप में

शिक्षक का विद्यार्थियों के विचारों, व्यवहार तथा व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

विद्यालय में विद्यार्थी शिक्षक के विचारों तथा व्यवहार को आदर्श मानकर उनका अनुसरण कर सकते हैं।

इसलिए शिक्षक में स्वतन्त्र चिन्तन, विवेक तथा विचार करने की क्षमता होना आवश्यक है।

NCFTE-2009 में शिक्षक को एक विचारक (Thinker) के रूप में विकसित करने पर बल दिया गया।

विचारक के रूप में शिक्षक की भूमिका
  • विभिन्न शैक्षिक एवं दार्शनिक विचारों का अध्ययन करना।
  • शिक्षण की विषयवस्तु तथा उद्देश्यों पर विचार करना।
  • विद्यार्थियों के लिए उपयोगी तथा सार्थक शिक्षण का चयन करना।
  • समस्याओं और परिस्थितियों पर विवेकपूर्ण निर्णय लेना।
  • अपने विचारों तथा व्यवहार से विद्यार्थियों को उचित दिशा प्रदान करना।

इस प्रकार एक विचारशील शिक्षक शिक्षा को अधिक उद्देश्यपूर्ण, सार्थक तथा प्रभावशाली बनाने में सहायता करता है।

9. शिक्षक का विकास एक ज्ञान-स्रोत के रूप में

शिक्षक विद्यार्थियों के ज्ञान के विकास में प्रमुख भूमिका निभाता है।

इसलिए NCFTE-2009 में शिक्षक को ज्ञान-स्रोत (Source of Knowledge) के रूप में विकसित करने पर भी बल दिया गया।

शिक्षक को केवल अपने शिक्षण विषय का ज्ञान ही नहीं, बल्कि बालक और समाज के विकास से सम्बन्धित अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों की समझ भी होनी चाहिए।

पुस्तक में शिक्षक के ज्ञानात्मक विकास के लिए निम्नलिखित क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है—

  • मनोविज्ञान।
  • बाल विकास।
  • सामाजिक विकास।
  • पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ।
  • विभिन्न दार्शनिक विचारधाराएँ।

इन क्षेत्रों का ज्ञान प्राप्त करके शिक्षक विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझ सकता है।

इसके अतिरिक्त वह विद्यार्थियों तथा अभिभावकों को उपयोगी जानकारी और उचित मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है।

इस प्रकार शिक्षक का ज्ञानात्मक विकास विद्यार्थियों, समाज तथा राष्ट्र के विकास में सहायक होता है।

10. शिक्षक का विकास एक निर्देशनकर्ता एवं परामर्शदाता के रूप में

आधुनिक समय में विद्यार्थियों के सामने अध्ययन के लिए विभिन्न विषयों, पाठ्यक्रमों तथा भविष्य के व्यवसायों के अनेक विकल्प उपलब्ध हैं।

इन विकल्पों में से अपनी योग्यता तथा रुचि के अनुसार उचित चयन करना सभी विद्यार्थियों के लिए सरल नहीं होता।

इसलिए शिक्षक को निर्देशनकर्ता एवं परामर्शदाता (Guide and Counsellor) के रूप में भी विकसित करना आवश्यक है।

निर्देशनकर्ता एवं परामर्शदाता के रूप में शिक्षक की भूमिका
  • विद्यार्थियों की रुचियों तथा योग्यताओं को समझना।
  • विभिन्न विषयों एवं पाठ्यक्रमों के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी देना।
  • विद्यार्थियों को उचित विषयों के चयन में सहायता करना।
  • भविष्य की शिक्षा तथा व्यवसाय सम्बन्धी निर्णयों में मार्गदर्शन देना।
  • छात्रों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार उचित परामर्श प्रदान करना।

उदाहरण के लिए, यदि कोई विद्यार्थी आगे की पढ़ाई के लिए विषय चुनने में कठिनाई अनुभव कर रहा है, तो शिक्षक उसकी रुचि और क्षमता को ध्यान में रखकर उचित मार्गदर्शन दे सकता है।

इस प्रकार शिक्षक विद्यार्थियों को उचित शैक्षिक निर्णय लेने तथा भविष्य की तैयारी करने में सहायता करता है।

5. राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के प्रत्यक्ष उद्देश्यों का महत्त्व

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के प्रत्यक्ष उद्देश्यों का मुख्य सम्बन्ध शिक्षक की योग्यता, प्रशिक्षण, व्यवहार तथा व्यावसायिक विकास से है।

इन उद्देश्यों के माध्यम से शिक्षक को केवल विषय पढ़ाने वाला व्यक्ति न मानकर उसके विभिन्न उत्तरदायित्वों को महत्त्व दिया गया।

पुस्तक में शिक्षक को सामाजिक कार्यकर्ता, मनोवैज्ञानिक, विचारक, ज्ञान-स्रोत तथा निर्देशनकर्ता एवं परामर्शदाता के रूप में विकसित करने पर विशेष बल दिया गया है।

इन भूमिकाओं को निभाने के लिए शिक्षक में विषय-ज्ञान, बच्चों की मनोवैज्ञानिक समझ, सामाजिक उत्तरदायित्व, उचित शिक्षण-कौशल तथा निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए।

इस प्रकार प्रत्यक्ष उद्देश्यों का महत्त्व योग्य, संवेदनशील, प्रशिक्षित तथा प्रभावशाली शिक्षकों का निर्माण करना है।

समग्र निष्कर्ष

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 का उद्देश्य शिक्षक शिक्षा में सुधार करना तथा भावी शिक्षकों को आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करना है।

पुस्तक के अनुसार इसके उद्देश्यों को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दो भागों में विभाजित किया गया है।

प्रत्यक्ष उद्देश्यों में शिक्षक शिक्षा की उचित पाठ्यचर्या का निर्माण, प्रशिक्षण की समयावधि का निर्धारण, व्यावसायिक विकास, आवश्यक योग्यताओं का विकास तथा शिक्षक शिक्षा के क्रमबद्ध प्रस्तुतीकरण को महत्त्व दिया गया।

इसके अतिरिक्त शिक्षक को सामाजिक कार्यकर्ता, मनोवैज्ञानिक, विचारक, ज्ञान-स्रोत तथा निर्देशनकर्ता एवं परामर्शदाता के रूप में विकसित करने पर बल दिया गया।

इस प्रकार NCFTE-2009 के प्रत्यक्ष उद्देश्यों का मूल लक्ष्य ऐसे योग्य एवं प्रभावशाली शिक्षकों का निर्माण करना है जो विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को समझकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर सकें।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • NCFTE का पूरा नाम National Curriculum Framework for Teacher Education है।
  • राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता तथा प्रभावशीलता बढ़ाने से सम्बन्धित है।
  • इसका प्रमुख उद्देश्य योग्य, प्रशिक्षित तथा आदर्श शिक्षकों का निर्माण करना है।
  • पुस्तक में NCFTE-2009 के उद्देश्यों को दो भागों—प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष उद्देश्य में विभाजित किया गया है।
  • प्रत्यक्ष उद्देश्य शिक्षक के ज्ञान, व्यवहार, योग्यता, प्रशिक्षण तथा कार्यकुशलता में सीधे सुधार से सम्बन्धित हैं।
  • पुस्तक के अनुसार राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के 10 प्रत्यक्ष उद्देश्य हैं।
  • प्रथम उद्देश्य— शिक्षक शिक्षा के लिए ऐसी उचित पाठ्यचर्या तैयार करना जो भावी शिक्षकों में आदर्श गुणों का विकास करे।
  • द्वितीय उद्देश्य— शिक्षक शिक्षा की उचित समयावधि तथा आवश्यक शैक्षिक योग्यताओं का निर्धारण करना।
  • पुस्तक में डी.एड. की अवधि 2 वर्ष तथा बी.एड. की तत्कालीन अवधि 1 वर्ष बताई गई है।
  • तृतीय उद्देश्य— शिक्षकों को व्यावसायिक विकास तथा प्रशिक्षण के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराना।
  • शिक्षक प्रशिक्षण के लिए DIET तथा BRC जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है।
  • चतुर्थ उद्देश्य— शिक्षक की प्रस्तुतीकरण क्षमता, शिक्षण-अधिगम वातावरण की समझ तथा विद्यार्थियों की मनःस्थिति समझने की योग्यता विकसित करना।
  • पंचम उद्देश्य— शिक्षक शिक्षा को क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करना।
  • पुस्तक के अनुसार शिक्षक शिक्षा की पाठ्यचर्या के तीन भाग हैं—शिक्षा के आधार, शिक्षाशास्त्र एवं पाठ्यक्रम।
  • षष्ठ उद्देश्य— शिक्षक को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में विकसित करना, जिससे वह विद्यालय एवं समुदाय के बीच सहयोग स्थापित कर सके।
  • सप्तम उद्देश्य— शिक्षक को मनोवैज्ञानिक के रूप में विकसित करना, जिससे वह विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं, रुचियों तथा भावनाओं को समझ सके।
  • अष्टम उद्देश्य— शिक्षक को विचारक के रूप में विकसित करना, जिससे वह उचित शैक्षिक एवं दार्शनिक विचारों के आधार पर प्रभावशाली शिक्षण कर सके।
  • नवम उद्देश्य— शिक्षक को ज्ञान-स्रोत के रूप में विकसित करना तथा उसके मनोविज्ञान, बाल विकास, सामाजिक विकास आदि के ज्ञान में वृद्धि करना।
  • दशम उद्देश्य— शिक्षक को निर्देशनकर्ता एवं परामर्शदाता के रूप में विकसित करना, जिससे वह विद्यार्थियों को विषयों एवं पाठ्यक्रमों के चयन में सहायता कर सके।
  • प्रत्यक्ष उद्देश्यों का समग्र लक्ष्य शिक्षक की व्यावसायिक दक्षता बढ़ाना तथा विद्यार्थियों के अधिगम स्तर में सुधार करना है।
Topic 6 राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009—अप्रत्यक्ष उद्देश्य, आवश्यकता एवं महत्त्व

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009—अप्रत्यक्ष उद्देश्य, आवश्यकता एवं महत्त्व

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के अप्रत्यक्ष उद्देश्य

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 (NCFTE-2009) का प्रमुख उद्देश्य ऐसे योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों का निर्माण करना है जो विद्यार्थियों को प्रभावशाली शिक्षा प्रदान करने के साथ उनके सम्पूर्ण विकास में सहायता कर सकें।

पुस्तक के अनुसार इसके उद्देश्यों को दो भागों में विभाजित किया गया है—प्रत्यक्ष उद्देश्य तथा अप्रत्यक्ष उद्देश्य।

प्रत्यक्ष उद्देश्यों का सम्बन्ध शिक्षक के ज्ञान, योग्यता, प्रशिक्षण तथा कार्यकुशलता के विकास से होता है, जबकि अप्रत्यक्ष उद्देश्य शिक्षक के कार्यों के माध्यम से विद्यार्थियों के विकास तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में होने वाले सुधारों से सम्बन्धित होते हैं।

अप्रत्यक्ष उद्देश्यों का अर्थ

अप्रत्यक्ष उद्देश्य वे उद्देश्य हैं जिनकी प्राप्ति शिक्षक के शिक्षण कार्य, व्यवहार तथा विभिन्न शैक्षिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप होती है।

इनका मुख्य लक्ष्य विद्यार्थियों की छिपी हुई प्रतिभाओं को पहचानना, उनकी क्षमताओं का विकास करना तथा उन्हें सफल एवं उत्तरदायी व्यक्ति बनने में सहायता करना है।

एक प्रभावशाली शिक्षक अपने शिक्षण कार्य के माध्यम से विद्यार्थियों के ज्ञान, व्यवहार, विचार, व्यक्तित्व तथा विभिन्न योग्यताओं का विकास करता है।

पुस्तक में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के 10 अप्रत्यक्ष उद्देश्य बताए गए हैं।

1. NCFTE-2009 के दस अप्रत्यक्ष उद्देश्य

1. छात्रों के सर्वांगीण विकास का उद्देश्य

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 का एक महत्त्वपूर्ण अप्रत्यक्ष उद्देश्य विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करना है।

सर्वांगीण विकास का अर्थ है बालक की विभिन्न योग्यताओं और क्षमताओं का विकास करना, जिससे उसका व्यक्तित्व संतुलित और प्रभावशाली बन सके।

इसके लिए शिक्षक को केवल पाठ्यविषयों का ज्ञान देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों की विभिन्न प्रतिभाओं तथा कौशलों के विकास पर भी ध्यान देना चाहिए।

पुस्तक के अनुसार एक कुशल शिक्षक उचित पाठ्यचर्या तथा शैक्षिक गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों की सभी महत्त्वपूर्ण दक्षताओं को विकसित कर सकता है।

इस प्रकार इस उद्देश्य का मुख्य लक्ष्य विद्यार्थियों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व तथा अन्तर्निहित क्षमताओं का विकास करना है।

2. शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया की प्रभावशीलता का उद्देश्य

NCFTE-2009 का दूसरा अप्रत्यक्ष उद्देश्य शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाना है।

शिक्षण तभी सफल माना जाता है जब विद्यार्थी पढ़ाई गई विषयवस्तु को समझ सकें तथा अपेक्षित ज्ञान और कौशल प्राप्त कर सकें।

इसके लिए शिक्षक को विभिन्न शिक्षण-विधियों, अधिगम सामग्री तथा उपयुक्त कक्षागत वातावरण का ज्ञान होना चाहिए।

प्रमुख उपाय
  • उपयुक्त शिक्षण-विधियों का प्रयोग करना।
  • आवश्यक शिक्षण-अधिगम सामग्री का निर्माण एवं उपयोग करना।
  • विद्यार्थियों के लिए अनुकूल अधिगम वातावरण तैयार करना।
  • बच्चों की आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण प्रक्रिया में सुधार करना।

इन उपायों के माध्यम से शिक्षक विद्यार्थियों को अधिक प्रभावी ढंग से सीखने में सहायता कर सकता है।

3. सामाजिक अपेक्षाओं की पूर्ति का उद्देश्य

वर्तमान समय में शिक्षक का कार्य केवल विद्यालय में शिक्षा प्रदान करना नहीं है। समाज भी शिक्षक से विभिन्न प्रकार की अपेक्षाएँ रखता है।

इसलिए राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 में शिक्षकों की सामाजिक दक्षताओं तथा उत्तरदायित्वों के विकास पर बल दिया गया।

पुस्तक के अनुसार शिक्षक शिक्षा के पाठ्यक्रम में समाज से सम्बन्धित विभिन्न गतिविधियों को शामिल किया गया है।

शिक्षक को इन गतिविधियों में समाज के लोगों की सहभागिता प्राप्त करने तथा विद्यालय और समुदाय के बीच सहयोग स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए।

इस प्रकार इस उद्देश्य का सम्बन्ध शिक्षा के माध्यम से समाज की अपेक्षाओं को पूरा करने तथा सामाजिक सहयोग विकसित करने से है।

4. बाल-केंद्रित शिक्षा का उद्देश्य

आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था में बाल-केंद्रित शिक्षा (Child-Centred Education) को विशेष महत्त्व दिया जाता है।

बाल-केंद्रित शिक्षा का अर्थ है ऐसी शिक्षण व्यवस्था जिसमें बालक की रुचियों, आवश्यकताओं, क्षमताओं और गतिविधियों को शिक्षण प्रक्रिया का केन्द्र बनाया जाए।

इस व्यवस्था में शिक्षक केवल निर्देश देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि विद्यार्थियों का मार्गदर्शक तथा सहयोगी होता है।

पुस्तक के अनुसार शिक्षक को विद्यार्थियों की अधिगम सम्बन्धी गतिविधियों का निरीक्षण करना चाहिए तथा आवश्यकता पड़ने पर उनकी सहायता करनी चाहिए।

इससे विद्यार्थी सीखने की प्रक्रिया में अधिक सक्रिय रहते हैं और अपनी क्षमताओं का विकास कर सकते हैं।

अतः इसका प्रमुख उद्देश्य शिक्षक-केंद्रित शिक्षा के स्थान पर बाल-केंद्रित एवं सक्रिय अधिगम को बढ़ावा देना है।

5. पोषणीय विकास का उद्देश्य

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 में विद्यार्थियों के पोषण सम्बन्धी विकास को भी महत्त्वपूर्ण माना गया है।

बालकों के उचित विकास के लिए उनकी पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं को समझना आवश्यक है।

इसलिए शिक्षक को पोषण से सम्बन्धित आवश्यक अवधारणाओं तथा पोषण के महत्त्व का ज्ञान होना चाहिए।

पुस्तक के अनुसार शिक्षक को निम्नलिखित बातों की समझ विकसित करनी चाहिए—

  • बच्चों की पोषण सम्बन्धी आवश्यकताएँ।
  • पोषण का बालकों के विकास में महत्त्व।
  • पोषण सम्बन्धी विभिन्न अवधारणाएँ।
  • पोषण के लिए आवश्यक तत्त्वों का ज्ञान।

इस ज्ञान के माध्यम से शिक्षक विद्यार्थियों की पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझ सकता है।

इस प्रकार इस उद्देश्य का मुख्य सम्बन्ध बालकों के पोषण एवं उचित विकास के प्रति शिक्षक की जागरूकता से है।

6. उचित मूल्यांकन का उद्देश्य

विद्यार्थियों की शैक्षिक प्रगति तथा उनकी क्षमताओं का पता लगाने के लिए उचित मूल्यांकन आवश्यक है।

मूल्यांकन का उद्देश्य केवल परीक्षा में प्राप्त अंकों को जानना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की उपलब्धियों और विकास की स्थिति को समझना भी है।

पुस्तक के अनुसार मूल्यांकन के माध्यम से विद्यार्थियों की छिपी हुई प्रतिभाओं का भी पता लगाया जा सकता है।

इसलिए शिक्षक को मूल्यांकन की विभिन्न विधियों का ज्ञान होना चाहिए तथा उनका उचित प्रयोग करना चाहिए।

प्रमुख उद्देश्य
  • विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धियों का आकलन करना।
  • बच्चों की छिपी हुई प्रतिभाओं और क्षमताओं की पहचान करना।
  • मूल्यांकन की विभिन्न विधियों का ज्ञान प्राप्त करना।
  • नवीन मूल्यांकन विधियों का उचित प्रयोग करना।

इस प्रकार उचित मूल्यांकन से विद्यार्थियों की वास्तविक प्रगति तथा व्यक्तिगत क्षमताओं को समझने में सहायता मिलती है।

7. तर्क एवं चिन्तन के विकास का उद्देश्य

NCFTE-2009 का एक महत्त्वपूर्ण अप्रत्यक्ष उद्देश्य विद्यार्थियों में तार्किक चिन्तन तथा विचार करने की क्षमता विकसित करना है।

तार्किक चिन्तन का अर्थ है किसी तथ्य, विचार या समस्या को समझकर उसके सम्बन्ध में उचित तर्क प्रस्तुत करना तथा निष्कर्ष निकालना।

पुस्तक के अनुसार इसके लिए शिक्षक शिक्षा में विभिन्न दार्शनिक विचारों तथा चिन्तन सम्बन्धी विषयों को स्थान दिया गया है।

इनका अध्ययन करके शिक्षक स्वयं एक विचारशील तथा तर्कशील व्यक्ति बन सकता है।

इसके बाद वह अपने विद्यार्थियों में भी विचार करने, तर्क प्रस्तुत करने तथा समस्याओं को समझने की योग्यता विकसित कर सकता है।

इस प्रकार इस उद्देश्य का प्रमुख लक्ष्य शिक्षक एवं विद्यार्थियों में तार्किक और चिन्तनशील दृष्टिकोण का विकास करना है।

8. प्रभावी शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का उद्देश्य

पुस्तक में शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाने का उल्लेख एक अलग अप्रत्यक्ष उद्देश्य के रूप में भी किया गया है।

इसके अन्तर्गत बच्चों की मनोदशा, रुचियों तथा सीखने के तरीकों को समझकर उपयुक्त शिक्षण गतिविधियों का प्रयोग करने पर बल दिया गया।

पुस्तक में प्रभावी शिक्षण के लिए निम्नलिखित गतिविधियों के उदाहरण दिए गए हैं—

  • विद्यार्थियों की मनोदशा तथा आवश्यकताओं का पता लगाना।
  • बच्चों को कहानियाँ सुनाना।
  • गीतों के माध्यम से शिक्षण करना।
  • खेल तथा अन्य गतिविधियों को शिक्षण का माध्यम बनाना।

इन गतिविधियों से बच्चों की शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में रुचि तथा सहभागिता बढ़ाई जा सकती है।

इस प्रकार शिक्षक विभिन्न गतिविधियों को अपनाकर अधिगम प्रक्रिया को रोचक, सक्रिय तथा प्रभावशाली बना सकता है।

9. अधिगम वातावरण के सृजन का उद्देश्य

प्रभावी शिक्षण के लिए विद्यालय तथा कक्षा में अनुकूल अधिगम वातावरण का होना आवश्यक है।

अधिगम वातावरण से आशय ऐसी शैक्षिक परिस्थितियों से है जिनमें विद्यार्थी सहजता तथा रुचि के साथ सीख सकें।

पुस्तक के अनुसार उपयुक्त अधिगम वातावरण विकसित करने के लिए शिक्षक को विभिन्न शिक्षण गतिविधियों का प्रयोग करना चाहिए।

प्रमुख उपाय
  • पाठ-योजना निर्माण— शिक्षण के उद्देश्यों के अनुसार उचित पाठ-योजना तैयार करना।
  • प्रस्तावना का प्रयोग— शिक्षण प्रारम्भ करते समय विद्यार्थियों को विषय से परिचित कराना।
  • अधिगम सामग्री का उपयोग— विषय को सरल और प्रभावशाली बनाने के लिए उपयुक्त सामग्री का प्रयोग करना।
  • गीत एवं कहानियाँ— बच्चों की रुचि और सहभागिता बढ़ाने के लिए गीतों तथा कहानियों का प्रयोग करना।

इन उपायों के माध्यम से शिक्षक कक्षा में ऐसा वातावरण विकसित कर सकता है जिसमें बच्चे अधिक सहजता तथा सक्रियता से सीख सकें।

10. पर्यावरणीय मूल्यों के विकास का उद्देश्य

वर्तमान समय में पर्यावरण प्रदूषण तथा पर्यावरणीय असन्तुलन महत्त्वपूर्ण समस्याएँ बन गई हैं।

इन समस्याओं को समझने तथा पर्यावरण के प्रति उचित दृष्टिकोण विकसित करने के लिए विद्यार्थियों में पर्यावरणीय मूल्यों का विकास आवश्यक है।

पुस्तक के अनुसार शिक्षक शिक्षा में पर्यावरण सम्बन्धी मूल्यों तथा उनके विकास को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

प्रमुख उद्देश्य
  • शिक्षकों को पर्यावरणीय मूल्यों का ज्ञान प्रदान करना।
  • पर्यावरण प्रदूषण तथा असन्तुलन जैसी समस्याओं की समझ विकसित करना।
  • पर्यावरणीय सन्तुलन के महत्त्व को समझना।
  • विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता एवं उचित मूल्य विकसित करना।

इस प्रकार पर्यावरणीय मूल्यों का विकास शिक्षक तथा विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण और सन्तुलन के प्रति जागरूक बनाने में सहायक है।

अप्रत्यक्ष उद्देश्यों का समग्र महत्त्व

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के अप्रत्यक्ष उद्देश्यों का मुख्य सम्बन्ध विद्यार्थियों के सम्पूर्ण विकास तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सुधार से है।

इनके माध्यम से बाल-केंद्रित शिक्षा, उचित मूल्यांकन, पोषण सम्बन्धी जागरूकता, तर्कशीलता तथा पर्यावरणीय मूल्यों के विकास को महत्त्व दिया गया।

इसके अतिरिक्त शिक्षक को ऐसा अधिगम वातावरण विकसित करने के लिए तैयार किया जाता है जिसमें बच्चे अपनी रुचियों तथा क्षमताओं के अनुसार प्रभावी ढंग से सीख सकें।

इस प्रकार अप्रत्यक्ष उद्देश्यों की प्राप्ति का मुख्य साधन शिक्षक का प्रभावशाली शिक्षण एवं व्यवहार है और इनका प्रमुख लाभ विद्यार्थियों के विकास के रूप में प्राप्त होता है।

2. राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 की आवश्यकता एवं महत्त्व

समय के साथ शिक्षा के उद्देश्यों, शिक्षण-विधियों, सामाजिक परिस्थितियों तथा विद्यार्थियों की आवश्यकताओं में परिवर्तन होता रहता है।

इन परिवर्तनों के कारण शिक्षक शिक्षा में भी निरन्तर सुधार करना आवश्यक होता है।

किसी राष्ट्र का शैक्षिक और सामाजिक विकास काफी हद तक उसके शिक्षकों की योग्यता तथा कार्यकुशलता पर निर्भर करता है।

इसलिए ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता होती है जो आधुनिक शिक्षण-विधियों का प्रयोग कर सकें, विद्यार्थियों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं को समझें तथा समाज के विकास में योगदान दें।

इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षक शिक्षा की पाठ्यचर्या में सुधार को महत्त्व दिया गया।

पुस्तक में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 की आवश्यकता एवं महत्त्व के 10 प्रमुख कारण बताए गए हैं।

3. NCFTE-2009 की आवश्यकता एवं महत्त्व के दस प्रमुख कारण

1. शिक्षा के सार्वभौमीकरण के लिए

शिक्षा का सार्वभौमीकरण (Universalisation of Education) का अर्थ है शिक्षा के अवसरों को सभी बच्चों तक पहुँचाना।

शिक्षा के सार्वभौमीकरण की सफलता के लिए पर्याप्त संख्या में योग्य तथा प्रशिक्षित शिक्षकों का होना आवश्यक है।

पुस्तक के अनुसार NCFTE-2009 में शिक्षक के उन कौशलों तथा योग्यताओं के विकास पर बल दिया गया जो शिक्षा के सार्वभौमीकरण में सहायक हो सकते हैं।

इसके अन्तर्गत शिक्षक को विद्यार्थियों के प्रति सद्व्यवहार करने तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को रुचिकर बनाने के लिए तैयार किया जाता है।

इस प्रकार प्रशिक्षित शिक्षक बच्चों की शिक्षा में रुचि बढ़ाकर शिक्षा के सार्वभौमीकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता कर सकते हैं।

2. निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के लिए

भारत में 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

पुस्तक में इस सन्दर्भ में शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 तथा बच्चों की विद्यालयी शिक्षा को महत्त्व दिया गया है।

इस उद्देश्य को सफल बनाने के लिए ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है जो बच्चों को विद्यालय से जोड़ सकें तथा उन्हें प्रभावशाली शिक्षा प्रदान कर सकें।

इसलिए शिक्षक शिक्षा में विभिन्न शिक्षण-कौशलों और सकारात्मक व्यवहार के विकास को आवश्यक माना गया।

पुस्तक के अनुसार इन प्रयासों से विद्यालयों में नामांकित विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने तथा अनिवार्य शिक्षा को सफल बनाने में सहायता मिल सकती है।

3. परिवर्तित समाज की आवश्यकताओं के लिए

समाज में समय-समय पर सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक तथा तकनीकी परिवर्तन होते रहते हैं।

वैश्वीकरण तथा सामाजिक परिवर्तन के कारण शिक्षा की आवश्यकताएँ और शिक्षण के तरीके भी प्रभावित होते हैं।

इसलिए शिक्षक शिक्षा की पाठ्यचर्या को बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करना आवश्यक है।

पुस्तक के अनुसार NCFTE-2009 में आधुनिक समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित विषयों को महत्त्व दिया गया—

  • आधुनिक शिक्षण-कौशल एवं तकनीकें।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण।
  • पर्यावरणीय मूल्य।
  • आर्थिक एवं सामाजिक मूल्य।
  • दार्शनिक विचार एवं मानवीय मूल्य।

इनके माध्यम से शिक्षक बदलते समाज की आवश्यकताओं को समझकर विद्यार्थियों को उपयोगी शिक्षा प्रदान कर सकता है।

4. शैक्षिक असमानता को कम करने के लिए

भारतीय समाज में विभिन्न प्रकार की लैंगिक, आर्थिक तथा शैक्षिक असमानताएँ पाई जाती हैं।

इन असमानताओं के कारण अनेक बच्चे शिक्षा के उचित अवसर प्राप्त नहीं कर पाते अथवा विद्यालय की पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं।

इसलिए शिक्षकों को सभी विद्यार्थियों के प्रति सकारात्मक, निष्पक्ष तथा समानतापूर्ण व्यवहार करने के लिए तैयार करना आवश्यक है।

प्रमुख उपाय
  • सभी विद्यार्थियों के प्रति समानता का व्यवहार करना।
  • बच्चों के साथ किसी प्रकार का अनुचित भेदभाव न करना।
  • शिक्षा से वंचित तथा कमजोर परिस्थितियों वाले बच्चों को प्रोत्साहित करना।
  • विद्यार्थियों में विद्यालय और अध्ययन के प्रति रुचि विकसित करना।

इस प्रकार योग्य शिक्षक शिक्षा के अवसरों में असमानता को कम करने तथा विद्यार्थियों की विद्यालयी सहभागिता बढ़ाने में सहायता कर सकते हैं।

5. नवीन चुनौतियों के समाधान के लिए

समाज में समय के साथ अनेक नई चुनौतियाँ उत्पन्न होती रहती हैं।

पुस्तक में विशेष रूप से रूढ़िवादिता तथा अन्धविश्वास को सामाजिक विकास के लिए बाधक माना गया है।

इसके अतिरिक्त शिक्षकों के सामने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा पर्यावरण सम्बन्धी चुनौतियाँ भी आती हैं।

ऐसी परिस्थितियों में शिक्षक को इन समस्याओं की समझ तथा उनसे निपटने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल प्रदान करना चाहिए।

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 में शिक्षक शिक्षा के माध्यम से इन चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित करने पर बल दिया गया।

इस प्रकार प्रशिक्षित शिक्षक समाज में उत्पन्न नई समस्याओं को समझकर उचित शैक्षिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण विकसित कर सकते हैं।

6. शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया की प्रभावशीलता के लिए

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया की सफलता के लिए शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच सद्भाव तथा सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध होना आवश्यक है।

यदि शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच सहयोग तथा परस्पर सम्मान का सम्बन्ध हो, तो कक्षा में सीखने के लिए अधिक अनुकूल परिस्थितियाँ विकसित होती हैं।

पुस्तक के अनुसार NCFTE-2009 में शिक्षक तथा विद्यार्थियों के बीच अच्छे सम्बन्ध स्थापित करने और शिक्षण-अधिगम को अधिक प्रभावी बनाने के उपायों को महत्त्व दिया गया।

इस प्रकार इस रूपरेखा की आवश्यकता शिक्षक-विद्यार्थी सम्बन्धों में सुधार तथा प्रभावशाली शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के विकास के लिए भी है।

7. छात्रों की अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास के लिए

प्रत्येक विद्यार्थी में कुछ विशेष योग्यताएँ, रुचियाँ तथा क्षमताएँ होती हैं।

इनमें से अनेक क्षमताएँ प्रारम्भ में स्पष्ट दिखाई नहीं देतीं। इसलिए शिक्षक को विद्यार्थियों की अन्तर्निहित प्रतिभाओं की पहचान करने में सक्षम होना चाहिए।

पुस्तक के अनुसार इसके लिए शिक्षक शिक्षा में निम्नलिखित क्षेत्रों को महत्त्व दिया गया—

  • बालकों की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं का ज्ञान।
  • मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों की समझ।
  • शिक्षण-कौशल का विकास।
  • विद्यार्थियों के व्यवहार एवं क्षमताओं का निरीक्षण।
  • उपयुक्त शैक्षिक वातावरण की समझ।

इन योग्यताओं के माध्यम से शिक्षक विद्यार्थियों की छिपी हुई प्रतिभाओं को पहचानकर उनके विकास के उचित अवसर प्रदान कर सकता है।

इस प्रकार NCFTE-2009 का महत्त्व विद्यार्थियों की व्यक्तिगत क्षमताओं तथा प्रतिभाओं के विकास से भी सम्बन्धित है।

8. जीवन कौशलों के विकास के लिए

शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को जीवन की विभिन्न परिस्थितियों के लिए तैयार करना भी है।

इसके लिए बच्चों में जीवन कौशल (Life Skills) विकसित करना आवश्यक है।

जीवन कौशलों का सम्बन्ध दैनिक जीवन में उपयोगी व्यवहार, सहयोग, उत्तरदायित्व तथा विभिन्न परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता से है।

पुस्तक में जीवन कौशलों के विकास के लिए निम्नलिखित गतिविधियों का उल्लेख किया गया है—

  • समाज सेवा सम्बन्धी कार्यक्रम।
  • श्रमदान।
  • स्काउटिंग कैम्प।

इन गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों में समाज के साथ सहयोग करने तथा सामाजिक कार्यों में भाग लेने की भावना विकसित की जा सकती है।

इस प्रकार शिक्षक शिक्षा में जीवन कौशलों को महत्त्व देना बच्चों के व्यावहारिक तथा सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है।

9. समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए

विद्यालय समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। इसलिए शिक्षा का सम्बन्ध विद्यार्थियों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं के साथ समाज की आवश्यकताओं से भी होना चाहिए।

पुस्तक के अनुसार ऐसी पाठ्यचर्या की आवश्यकता अनुभव की गई जो विद्यार्थियों के विकास के साथ-साथ सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति में भी सहायक हो।

इसके लिए शिक्षक को विद्यालय और समाज के बीच सहयोग स्थापित करने तथा विद्यार्थियों को सामाजिक गतिविधियों से जोड़ने के लिए तैयार करना आवश्यक है।

प्रमुख उद्देश्य
  • विद्यार्थियों में सामाजिक सहयोग की भावना विकसित करना।
  • विद्यालय एवं समाज के बीच सम्बन्ध स्थापित करना।
  • सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण गतिविधियों को महत्त्व देना।
  • विद्यार्थियों को समाज के प्रति उत्तरदायी बनाना।

इस प्रकार शिक्षक शिक्षा की उपयुक्त पाठ्यचर्या समाज तथा विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करने में सहायता करती है।

10. अन्तरराष्ट्रीय सद्भाव के लिए

वर्तमान समय में वैश्वीकरण के कारण विभिन्न देशों और समाजों के बीच सम्बन्ध बढ़ रहे हैं।

इसलिए विद्यार्थियों में केवल राष्ट्रीय भावना का विकास करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अन्य देशों तथा समाजों के प्रति सद्भाव और सहयोग की भावना विकसित करना भी आवश्यक है।

पुस्तक के अनुसार राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 में अन्तरराष्ट्रीय सद्भाव (International Harmony) के विकास को महत्त्व दिया गया।

इसके लिए शिक्षक शिक्षा की पाठ्यचर्या में अन्तरराष्ट्रीय सद्भाव तथा उससे सम्बन्धित विभिन्न विषयों को स्थान देने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य ऐसे शिक्षक तैयार करना है जो विद्यार्थियों में विश्व के विभिन्न देशों और समाजों के प्रति सम्मान, सहयोग तथा सद्भावना विकसित कर सकें।

4. राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 का शैक्षिक महत्त्व

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 शिक्षक शिक्षा को अधिक उपयोगी, प्रभावशाली तथा समाज की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने की दिशा प्रदान करती है।

इसके माध्यम से शिक्षक को केवल विषयों का अध्यापन करने के लिए तैयार नहीं किया जाता, बल्कि उसे विद्यार्थियों की व्यक्तिगत क्षमताओं को समझने, सामाजिक असमानताओं को कम करने तथा जीवन कौशलों के विकास में सहायता करने के योग्य बनाने पर भी बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त शिक्षा के सार्वभौमीकरण, निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा, प्रभावी शिक्षण-अधिगम, सामाजिक सहयोग तथा अन्तरराष्ट्रीय सद्भाव जैसे उद्देश्यों की प्राप्ति में शिक्षक शिक्षा को महत्त्वपूर्ण माना गया।

इस प्रकार NCFTE-2009 का व्यापक शैक्षिक महत्त्व योग्य शिक्षक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास तथा समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा से सम्बन्धित है।

5. प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष उद्देश्यों में अन्तर

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के दोनों प्रकार के उद्देश्य परस्पर सम्बन्धित हैं, लेकिन उनके मुख्य केन्द्र अलग-अलग हैं।

आधार प्रत्यक्ष उद्देश्य अप्रत्यक्ष उद्देश्य
मुख्य केन्द्र शिक्षक का विकास। विद्यार्थियों एवं अधिगम का विकास।
सम्बन्ध शिक्षक के ज्ञान, योग्यता, व्यवहार तथा प्रशिक्षण से। शिक्षक के कार्यों से प्राप्त शैक्षिक परिणामों से।
प्रमुख लक्ष्य योग्य एवं प्रभावशाली शिक्षक तैयार करना। विद्यार्थियों की क्षमताओं तथा व्यक्तित्व का विकास करना।
उदाहरण शिक्षक को मनोवैज्ञानिक, विचारक तथा परामर्शदाता के रूप में विकसित करना। बाल-केंद्रित शिक्षा, सर्वांगीण विकास, उचित मूल्यांकन तथा तर्कशीलता का विकास।

सरल शब्दों में— प्रत्यक्ष उद्देश्य शिक्षक को बेहतर बनाने से सम्बन्धित हैं, जबकि अप्रत्यक्ष उद्देश्य उस बेहतर शिक्षक के माध्यम से विद्यार्थियों के विकास से सम्बन्धित हैं।

समग्र निष्कर्ष

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के अप्रत्यक्ष उद्देश्यों में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास, प्रभावी शिक्षण-अधिगम, सामाजिक अपेक्षाओं की पूर्ति, बाल-केंद्रित शिक्षा, पोषणीय विकास, उचित मूल्यांकन, तार्किक चिन्तन, अनुकूल अधिगम वातावरण तथा पर्यावरणीय मूल्यों के विकास पर बल दिया गया।

इसके अतिरिक्त पुस्तक में शिक्षक शिक्षा की आवश्यकता को शिक्षा के सार्वभौमीकरण, निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा, बदलते समाज, शैक्षिक समानता, नवीन चुनौतियों, जीवन कौशलों तथा अन्तरराष्ट्रीय सद्भाव से जोड़ा गया है।

इस प्रकार NCFTE-2009 का मुख्य महत्त्व ऐसे प्रशिक्षित एवं उत्तरदायी शिक्षकों का निर्माण करना है जो विद्यार्थियों को प्रभावशाली शिक्षा प्रदान करने के साथ उनके व्यक्तिगत, सामाजिक तथा बौद्धिक विकास में सहायता कर सकें।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • NCFTE-2009 का पूरा नाम National Curriculum Framework for Teacher Education, 2009 है।
  • पुस्तक के अनुसार इसके उद्देश्यों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दो भागों में विभाजित किया गया है।
  • प्रत्यक्ष उद्देश्य शिक्षक के ज्ञान, योग्यता, प्रशिक्षण तथा कार्यकुशलता के विकास से सम्बन्धित हैं।
  • अप्रत्यक्ष उद्देश्य शिक्षक के कार्यों के परिणामस्वरूप विद्यार्थियों के विकास तथा शिक्षण-अधिगम में होने वाले सुधारों से सम्बन्धित हैं।
  • पुस्तक में NCFTE-2009 के 10 अप्रत्यक्ष उद्देश्य बताए गए हैं।
  • सर्वांगीण विकास— विद्यार्थियों की विभिन्न योग्यताओं, प्रतिभाओं तथा सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करना।
  • शिक्षण-अधिगम की प्रभावशीलता— उपयुक्त शिक्षण-विधियों, अधिगम सामग्री तथा अनुकूल वातावरण का प्रयोग करना।
  • सामाजिक अपेक्षाओं की पूर्ति— शिक्षक में सामाजिक उत्तरदायित्व तथा समुदाय के साथ सहयोग की भावना विकसित करना।
  • बाल-केंद्रित शिक्षा— बालक को शिक्षण का केन्द्र मानकर शिक्षक को मार्गदर्शक एवं सहयोगी की भूमिका निभानी चाहिए।
  • पोषणीय विकास— शिक्षक को बालकों की पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं तथा पोषण के महत्त्व का ज्ञान होना चाहिए।
  • उचित मूल्यांकन— विद्यार्थियों की उपलब्धियों और छिपी हुई प्रतिभाओं की पहचान के लिए नवीन मूल्यांकन विधियों का प्रयोग करना।
  • तर्क एवं चिन्तन— शिक्षक तथा विद्यार्थियों में तार्किक सोच और विचार करने की क्षमता विकसित करना।
  • प्रभावी शिक्षण— बच्चों की मनोदशा समझकर कहानी, गीत, खेल तथा अन्य गतिविधियों से अधिगम को प्रभावशाली बनाना।
  • अधिगम वातावरण— पाठ-योजना, प्रस्तावना, शिक्षण सामग्री, गीत तथा कहानियों द्वारा सीखने का अनुकूल वातावरण तैयार करना।
  • पर्यावरणीय मूल्य— विद्यार्थियों में पर्यावरणीय सन्तुलन, प्रदूषण तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता विकसित करना।
  • पुस्तक में NCFTE-2009 की आवश्यकता एवं महत्त्व के 10 प्रमुख कारण बताए गए हैं।
  • शिक्षा का सार्वभौमीकरण— सभी बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करने के लिए योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों का विकास।
  • निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा— 6 से 14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा के लक्ष्य को सफल बनाने के लिए प्रभावशाली शिक्षकों की आवश्यकता।
  • परिवर्तित समाज— सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक तथा तकनीकी परिवर्तनों के अनुसार शिक्षक शिक्षा में सुधार।
  • शैक्षिक असमानता— लैंगिक, आर्थिक एवं शैक्षिक असमानताओं को कम करने के लिए शिक्षकों में निष्पक्षता तथा समान व्यवहार का विकास।
  • नवीन चुनौतियाँ— रूढ़िवादिता, अन्धविश्वास तथा सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित करना।
  • प्रभावी शिक्षण-अधिगम— शिक्षक एवं विद्यार्थियों के बीच सद्भाव तथा सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध विकसित करना।
  • अन्तर्निहित क्षमताएँ— विद्यार्थियों की छिपी हुई प्रतिभाओं को पहचानकर उनके विकास के अवसर प्रदान करना।
  • जीवन कौशल— समाज सेवा, श्रमदान तथा स्काउटिंग कैम्प जैसी गतिविधियों से सहयोग एवं व्यावहारिक कौशल विकसित करना।
  • समाज की आवश्यकताएँ— शिक्षा को सामाजिक आवश्यकताओं से जोड़ना तथा विद्यालय एवं समुदाय के बीच सहयोग स्थापित करना।
  • अन्तरराष्ट्रीय सद्भाव— विद्यार्थियों में विश्व के विभिन्न देशों और समाजों के प्रति सद्भाव, सम्मान एवं सहयोग की भावना विकसित करना।
  • NCFTE-2009 का समग्र उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षक शिक्षा, प्रभावशाली शिक्षण तथा विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करने की दिशा प्रदान करना है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 किसके लिए बनाई गई?

व्याख्या: राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 (NCF-2005) में कक्षा 1 से 12 तक की विद्यालयी शिक्षा के लिए पाठ्यचर्या सम्बन्धी दिशा-निर्देश प्रस्तुत किए गए हैं।
Q 2

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 की संरचना एवं क्रियान्वयन सम्बन्धी प्रमुख समस्याएँ हैं—

व्याख्या: NCF-2005 के निर्माण एवं क्रियान्वयन से सम्बन्धित प्रमुख समस्याओं में शिक्षकों की कमी, भाषायी विविधता तथा समाज की अलग-अलग शैक्षिक आकांक्षाएँ शामिल हैं।
Q 3

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में माध्यमिक स्तर पर कौन-से विषय शामिल हैं?

व्याख्या: NCF-2005 के अन्तर्गत माध्यमिक स्तर की पाठ्यचर्या में मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा तथा गणित दोनों को स्थान दिया गया है।
Q 4

पाठ्यचर्या 2005 में प्राथमिक स्तर पर कितने विषय एवं क्षेत्र बताए गए हैं?

व्याख्या: पुस्तक के अनुसार प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा, अंग्रेजी, गणित, एकीकृत पर्यावरण अध्ययन, कला एवं हस्तशिल्प, स्वास्थ्य शिक्षा तथा कार्यानुभव सहित कुल 7 विषय एवं क्षेत्र बताए गए हैं।
Q 5

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 की आवश्यकता किन कारणों से हुई?

व्याख्या: NCF-2005 की आवश्यकता के प्रमुख कारणों में 21वीं सदी की बदलती आवश्यकताएँ, संवैधानिक मूल्य तथा भारतीय समाज की भाषायी, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता तीनों शामिल हैं।
Q 6

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में किन बिन्दुओं पर विशेष ध्यान दिया गया है?

व्याख्या: NCF-2005 में व्यवस्थागत सुधार तथा परीक्षा प्रणाली दोनों को महत्त्व दिया गया है। इसके अन्तर्गत शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और मूल्यांकन को अधिक लचीला बनाने पर बल दिया गया।
Q 7

पुस्तक में उच्च माध्यमिक स्तर की पाठ्यचर्या को अनिवार्य विषयों सहित कितने प्रमुख समूहों में प्रस्तुत किया गया है?

व्याख्या: पुस्तक में उच्च माध्यमिक स्तर की पाठ्यचर्या को चार समूहों में प्रस्तुत किया गया है—अनिवार्य विषय, कला वर्ग, वाणिज्य वर्ग तथा विज्ञान वर्ग। इनमें तीन विषय-वर्ग हैं और एक अनिवार्य विषयों का समूह है।
Q 8

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 का प्रत्यक्ष उद्देश्य है—

व्याख्या: NCFTE-2009 के प्रत्यक्ष उद्देश्यों में शिक्षक शिक्षा के लिए उचित पाठ्यचर्या का निर्माण शामिल है। इसका उद्देश्य भावी शिक्षकों में आवश्यक ज्ञान, कौशल तथा आदर्श शिक्षक के गुण विकसित करना है।
Q 9

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 की आवश्यकता है—

व्याख्या: NCFTE-2009 की आवश्यकता शिक्षा के सार्वभौमीकरण, निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा तथा शैक्षिक असमानताओं को कम करने सहित अनेक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अनुभव की गई।
Q 10

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के निर्माण हेतु गठित राष्ट्रीय संचालन समिति के अध्यक्ष कौन थे?

व्याख्या: राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के निर्माण के लिए प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में राष्ट्रीय संचालन समिति का गठन किया गया था।
Q 11

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 का मूल दस्तावेज कितने अध्यायों में विभाजित है?

व्याख्या: NCF-2005 का मूल दस्तावेज कुल 5 अध्यायों में विभाजित है—परिप्रेक्ष्य, सीखना और ज्ञान, पाठ्यचर्या के क्षेत्र एवं आकलन, विद्यालय एवं कक्षा का वातावरण तथा व्यवस्थागत सुधार।
Q 12

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के प्रथम अध्याय का शीर्षक क्या है?

व्याख्या: राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के प्रथम अध्याय का शीर्षक परिप्रेक्ष्य (Perspective) है। दूसरे अध्याय का शीर्षक सीखना और ज्ञान है।
Q 13

स्वतन्त्रता के बाद भारत की साक्षरता दर में क्या परिवर्तन हुआ?

व्याख्या: स्वतन्त्रता के बाद भारत में शिक्षा के प्रसार, विद्यालयों की संख्या में वृद्धि तथा साक्षरता सम्बन्धी कार्यक्रमों के कारण साक्षरता दर में वृद्धि हुई है।
Q 14

निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम किस वर्ष बना?

व्याख्या: निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 में बनाया गया। यह 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों की निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा से सम्बन्धित है।
Q 15

पुस्तक के अनुसार NCFTE-2009 में 10+2 के बाद कितने वर्ष के शिक्षक-प्रशिक्षण की चर्चा की गई है?

व्याख्या: पुस्तक के अभ्यास प्रश्न की उत्तरमाला के अनुसार 10+2 के बाद 4 या 5 वर्षीय शिक्षक-प्रशिक्षण का उल्लेख है। यह सामान्य दो वर्षीय डी.एड. प्रशिक्षण से अलग अवधि का सन्दर्भ है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 2 के विषय प्रारम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास के अध्याय पाठ्यचर्या एवं शिक्षक शिक्षा से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के उद्देश्य लिखिए।

Q 2

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा की आवश्यकता किन कारणों से हुई?

Q 3

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के अनुसार आदर्श शिक्षक की विशेषताएँ बताइए।

Q 4

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के मार्गदर्शक सिद्धान्त बताइए।

Q 5

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 सम्बन्धी समस्याओं के समाधान बताइए।

Q 6

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा 2009 के प्रत्यक्ष उद्देश्य का उल्लेख कीजिए।

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