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Chapter 7 • विज्ञान

विभिन्न मॉडल

UP DELED Semester 1 विज्ञान विषय के इस अध्याय में वर्षा जल संचयन, उसकी विभिन्न पुनर्भरण विधियाँ, राजस्थान के पारम्परिक जल स्रोत, उनकी उपयोगिता एवं पतन के कारण, न्यूटन के गति के नियमों पर आधारित मॉडल, विद्युत चुम्बकीय बल, विद्युत आवेश, धन एवं ऋण आवेश तथा डोर बेल की संरचना एवं क्रियाविधि का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

8
Topics
15
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10+
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Notes
Topic 1 वर्षा जल संचयन: परिचय, आवश्यकता एवं महत्व

वर्षा जल संचयन: परिचय, आवश्यकता एवं महत्व

वर्षा जल संचयन का अर्थ

वर्षा के जल को किसी विशेष माध्यम से एकत्रित या संचित करने की प्रक्रिया को वर्षा जल संचयन कहते हैं।

इस प्रक्रिया में वर्षा से प्राप्त जल को व्यर्थ बहने देने के स्थान पर संग्रहित किया जाता है अथवा भूमि के भीतर पहुँचाकर भूजल का पुनर्भरण किया जाता है।

वर्षा जल संचयन की आवश्यकता

विश्व के अनेक भागों में पेयजल की कमी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। इसके साथ-साथ पृथ्वी का जलस्तर भी लगातार नीचे जा रहा है।

मानसून के समय वर्षा का बहुत-सा जल बहकर अन्ततः समुद्र में मिल जाता है। इसलिए इस जल का संचयन तथा पुनर्भरण आवश्यक है, ताकि भूजल संसाधनों का संरक्षण किया जा सके।

भारत में भूजल की स्थिति

भारत में भूजल भण्डारण का आकलन लगभग 214 बिलियन घन मीटर (BCM) किया गया है, जिसमें से लगभग 160 BCM की पुनः प्राप्ति की जा सकती है।

इस उपलब्ध जल का उचित संरक्षण एवं पुनर्भरण जल की बढ़ती आवश्यकता को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

वर्षा जल संचयन का महत्व

वर्षा जल संचयन जल की कमी की समस्या के समाधान का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसका उपयोग विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जा सकता है।

  • पशुओं के पीने के पानी की उपलब्धता बढ़ाने में।
  • फसलों की सिंचाई के लिए वैकल्पिक जल स्रोत के रूप में।
  • भूजल संसाधनों के संरक्षण में।
  • वर्षा के बहते हुए जल को उपयोगी रूप में संचित करने में।
  • भूमिगत जल के पुनर्भरण में।

इन्हीं उपयोगों के कारण वर्षा जल संचयन प्रणालियों को विश्व के अनेक क्षेत्रों में अपनाया जा रहा है।

वर्षा जल संचयन के लिए उपयुक्त क्षेत्र

वर्षा जल संचयन प्रणाली विशेष रूप से उन स्थानों के लिए उपयुक्त मानी जाती है जहाँ प्रतिवर्ष कम-से-कम 200 मिमी वर्षा होती है।

किसी क्षेत्र में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था वहाँ उपलब्ध जल, वर्षा की मात्रा तथा जल की आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

पारम्परिक जल संग्रह प्रणालियों की स्थिति

देश और प्रदेश में पहले अनेक पारम्परिक जल संग्रह प्रणालियाँ प्रचलित थीं, किन्तु वर्तमान समय में इनमें से अनेक प्रणालियाँ समाप्त होती जा रही हैं।

इसलिए उपलब्ध जल संसाधनों का उचित उपयोग करने के लिए जल संचयन एवं जल प्रबन्धन की प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है।

वर्षा जल संचयन प्रणाली के प्रमुख भाग

घर की छत पर गिरने वाले वर्षा जल को एक सरल संचयन व्यवस्था द्वारा संग्रहित अथवा भूजल पुनर्भरण के लिए उपयोग किया जा सकता है। ऐसी व्यवस्था में मुख्य रूप से निम्न भाग होते हैं—

  • संग्रह क्षेत्र
  • नाली
  • पाइप लाइन
  • भण्डारण टंकी
  • पुनर्भरण सुविधा

छत पर गिरने वाला वर्षा जल संग्रह क्षेत्र से नाली एवं पाइप के माध्यम से भण्डारण टंकी तक पहुँचाया जा सकता है। आवश्यकता के अनुसार इस जल को पुनर्भरण सुविधा द्वारा भूमि के भीतर भी पहुँचाया जा सकता है।

वर्षा जल संचयन एक नजर में

आधार मुख्य तथ्य
अर्थ वर्षा जल को किसी माध्यम से एकत्रित या संचित करना
मुख्य आवश्यकता जल की कमी तथा गिरते भूजल स्तर को कम करना
प्रमुख उद्देश्य जल का संचयन एवं भूजल पुनर्भरण
प्रमुख उपयोग पेयजल की उपलब्धता, पशुओं के लिए जल तथा सिंचाई का विकल्प
उपयुक्त क्षेत्र जहाँ वार्षिक वर्षा न्यूनतम लगभग 200 मिमी हो
प्रमुख संरचनाएँ संग्रह क्षेत्र, नाली, पाइप लाइन, भण्डारण टंकी एवं पुनर्भरण सुविधा
घर की छत से वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण की व्यवस्था
छत से प्राप्त वर्षा जल का संग्रह, भण्डारण एवं भूजल पुनर्भरण
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वर्षा जल को किसी विशेष माध्यम से एकत्रित या संचित करने की प्रक्रिया वर्षा जल संचयन कहलाती है।
  • जल की कमी तथा लगातार नीचे जाते भूजल स्तर के कारण वर्षा जल संचयन आवश्यक है।
  • मानसून का बहुत-सा जल बहकर समुद्र में मिल जाता है, इसलिए उसका संचयन एवं पुनर्भरण किया जाना चाहिए।
  • भारत में भूजल भण्डारण का आकलन लगभग 214 BCM किया गया है, जिसमें से लगभग 160 BCM की पुनः प्राप्ति की जा सकती है।
  • वर्षा जल संचयन पशुओं के पेयजल तथा फसलों की सिंचाई के वैकल्पिक स्रोत के रूप में उपयोगी है।
  • यह प्रणाली उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है जहाँ प्रतिवर्ष न्यूनतम लगभग 200 मिमी वर्षा होती है।
  • वर्षा जल संचयन के मुख्य भाग संग्रह क्षेत्र, नाली, पाइप लाइन, भण्डारण टंकी और पुनर्भरण सुविधा हैं।
Topic 2 वर्षा जल संचयन की विधियाँ

वर्षा जल संचयन की विधियाँ

वर्षा जल संचयन की प्रमुख विधियाँ

छत पर प्राप्त वर्षा जल को भूमिगत जलाशयों में पहुँचाकर भूजल पुनर्भरण किया जा सकता है। इसके लिए विभिन्न प्रकार की पुनर्भरण संरचनाओं का उपयोग किया जाता है।

वर्षा जल संचयन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं—

  1. बन्द या बेकार पड़े कुएँ द्वारा
  2. बन्द पड़े या चालू नलकूप द्वारा
  3. पुनर्भरण पिट (गड्ढा) द्वारा
  4. पुनर्भरण खाई द्वारा
  5. गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुएँ द्वारा
  6. पुनर्भरण शाफ्ट द्वारा

1. बन्द या बेकार पड़े कुएँ द्वारा

सूखे तथा अनुपयोगी कुएँ का उपयोग वर्षा जल के पुनर्भरण के लिए किया जा सकता है।

छत से एकत्रित किए गए वर्षा जल को पाइप के माध्यम से कुएँ के तल या उसके जल स्तर के नीचे पहुँचाया जाता है। इससे कुएँ के तल पर गड्ढे बनने तथा जलभृत में हवा के बुलबुले फँसने की समस्या को कम किया जा सकता है।

मुख्य सावधानियाँ एवं विशेषताएँ
  • कुएँ को पुनर्भरण संरचना के रूप में उपयोग करने से पहले उसका तल साफ करना चाहिए।
  • कुएँ में उपस्थित निक्षेप एवं गाद को हटा देना चाहिए।
  • पुनर्भरण के लिए जाने वाला वर्षा जल गाद-मुक्त होना चाहिए।
  • कुएँ की नियमित रूप से सफाई करनी चाहिए।
  • यह विधि उन बड़े भवनों के लिए उपयुक्त है जिनकी छत का क्षेत्रफल 1000 वर्ग मीटर से अधिक हो।
  • जीवाणु-संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए आवश्यकता के अनुसार क्लोरीन का प्रयोग करना चाहिए।

इस व्यवस्था में वर्षा जल को लगभग 100 मिमी व्यास के पाइप द्वारा कुएँ तक पहुँचाया जा सकता है।

2. बन्द पड़े या चालू नलकूप द्वारा

बन्द पड़े अथवा चालू नलकूप का उपयोग भी भूजल पुनर्भरण के लिए किया जा सकता है।

यह विधि छोटे भवनों के लिए उपयुक्त है, जिनकी छत का क्षेत्रफल लगभग 150 वर्ग मीटर तक हो।

कार्यविधि
  • छत पर एकत्रित वर्षा जल को पाइप द्वारा नलकूप या हैंडपम्प तक पहुँचाया जाता है।
  • इस कार्य के लिए लगभग 50 से 100 मिमी व्यास का पाइप उपयोग किया जा सकता है।
  • चालू हैंडपम्प के चूषण पाइप में हवा का प्रवेश रोकना आवश्यक होता है।
  • इसके लिए हैंडपम्प के समीप जल प्रवाह प्रणाली में वाल्व लगाया जाता है।
  • पुनर्भरण के लिए प्रयुक्त जल गाद-मुक्त होना चाहिए।

3. पुनर्भरण पिट (गड्ढा) द्वारा

पुनर्भरण पिट का निर्माण मुख्य रूप से ऐसे क्षेत्रों में किया जाता है जहाँ छिछला जलभृत उपलब्ध हो।

यह एक ऐसा गड्ढा होता है जिसमें छत से प्राप्त वर्षा जल पहुँचाया जाता है और वहाँ से जल धीरे-धीरे भूमि में रिसकर भूजल का पुनर्भरण करता है।

निर्माण
  • पुनर्भरण पिट सामान्यतः 1 से 2 मीटर चौड़ा बनाया जाता है।
  • इसकी गहराई लगभग 2 से 3 मीटर होती है।
  • खुदाई के बाद पिट को शिलाखण्ड, रोड़ी तथा बजरी से भरा जाता है।
  • ऊपरी भाग में रेत की परत डाली जाती है।
  • पुनर्भरण के लिए आने वाला जल गाद-मुक्त होना चाहिए।

यह विधि लगभग 100 वर्ग मीटर तक छत क्षेत्रफल वाले छोटे भवनों के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

पुनर्भरण पिट गोलाकार, वर्गाकार या आयताकार बनाया जा सकता है। यदि उसके किनारे ढलानदार हों तो ढलान ऐसी रखी जाती है कि गाद आसानी से जमा न हो।

4. पुनर्भरण खाई द्वारा

जहाँ जलभृत कम गहराई पर उपलब्ध हो, वहाँ पुनर्भरण खाई का निर्माण किया जा सकता है।

यह छिछली गहराई वाली लम्बी खाई होती है, जिसे शिलाखण्ड और रोड़ी आदि से भरा जाता है। इसका निर्माण सामान्यतः जमीन की ढलान के आर-पार किया जाता है।

आकार एवं उपयोग
  • चौड़ाई लगभग 0.5 से 1 मीटर हो सकती है।
  • गहराई लगभग 1 से 1.5 मीटर रखी जा सकती है।
  • लम्बाई लगभग 10 से 20 मीटर तक हो सकती है।
  • यह लगभग 200 से 300 वर्ग मीटर छत क्षेत्र वाले भवनों के लिए उपयुक्त है।
  • पुनर्भरण खाई की समय-समय पर सफाई आवश्यक है।

खाई में भरी रोड़ी एवं अन्य छिद्रयुक्त सामग्री जल को छनने तथा नीचे की ओर रिसने में सहायता करती है।

5. गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुएँ द्वारा

बोरवेल अथवा नलकूप को भी पुनर्भरण संरचना के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इसमें छत से एकत्रित वर्षा जल गुरुत्वीय प्रवाह द्वारा नीचे पहुँचकर जलभृत का पुनर्भरण करता है।

यह विधि कहाँ उपयोगी है?
  • जहाँ जमीन की उपलब्धता सीमित हो।
  • जहाँ जलभृत गहराई पर स्थित हो।
  • जहाँ जलभृत के ऊपर चिकनी मिट्टी की परत हो।
  • जहाँ भूजल स्तर नीचे हो।
मुख्य विशेषताएँ
  • छत से प्राप्त वर्षा जल लगातार कुएँ तक पहुँचाया जाता है।
  • जल गुरुत्वीय बहाव के कारण नीचे जाकर पुनर्भरण करता है।
  • पुनर्भरण जल गाद-मुक्त होना चाहिए।
  • इस संरचना का उपयोग आवश्यकता पड़ने पर पानी की निकासी के लिए भी किया जा सकता है।

पुनर्भरण संरचनाओं की संख्या भवनों के चारों ओर उपलब्ध सीमित क्षेत्र, छत के क्षेत्रफल तथा जलभृत की प्रकृति को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती है।

चित्र में इस प्रकार के पुनर्भरण कुएँ का व्यास लगभग 100 से 300 मिमी तथा गहराई लगभग 20 से 30 मीटर दिखाई गई है।

6. पुनर्भरण शाफ्ट द्वारा

पुनर्भरण शाफ्ट का उपयोग भी वर्षा जल को भूमि के भीतर पहुँचाकर जलभृत के पुनर्भरण के लिए किया जाता है।

पुनर्भरण शाफ्ट की खुदाई हाथ द्वारा अथवा रिवर्स डायरेक्टरी प्रक्रिया से की जा सकती है।

निर्माण एवं आकार
  • शाफ्ट का व्यास लगभग 0.5 से 3 मीटर तक हो सकता है।
  • व्यास का निर्धारण उपलब्ध पुनर्भरण जल की मात्रा के अनुसार किया जाता है।
  • इसका निर्माण वहाँ किया जाता है जहाँ छिछला जलभृत चिकनी मिट्टी की सतह के नीचे हो।
  • शाफ्ट का निचला तल रेत जैसी पारगम्य संरचना में होना चाहिए।
  • शाफ्ट की गहराई भूमि स्तर से लगभग 10 से 15 मीटर तक हो सकती है।
  • सुरक्षा की दृष्टि से इसका निर्माण भवन से लगभग 10 से 15 मीटर की दूरी पर करना चाहिए।
रख-रखाव

शाफ्ट के ऊपरी भाग में लगी रेत की परत को समय-समय पर हटाकर साफ करना चाहिए तथा आवश्यकता के अनुसार नई रेत भरनी चाहिए।

वर्षा जल संचयन की छह विधियाँ एक नजर में

विधि उपयुक्त स्थिति मुख्य विशेषता
बन्द/बेकार कुआँ बड़े भवन, छत क्षेत्र 1000 वर्ग मीटर से अधिक पुराने अनुपयोगी कुएँ द्वारा भूजल पुनर्भरण
बन्द/चालू नलकूप लगभग 150 वर्ग मीटर तक छत क्षेत्र वर्षा जल को नलकूप या हैंडपम्प तक पहुँचाना
पुनर्भरण पिट छिछला जलभृत, लगभग 100 वर्ग मीटर छत क्षेत्र 1–2 मीटर चौड़ा तथा 2–3 मीटर गहरा पिट
पुनर्भरण खाई छिछला जलभृत, 200–300 वर्ग मीटर छत क्षेत्र 0.5–1 मीटर चौड़ी तथा 10–20 मीटर लम्बी खाई
गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुआँ कम भूमि और गहरा जलभृत गुरुत्वीय प्रवाह द्वारा गहरे जलभृत तक जल पहुँचाना
पुनर्भरण शाफ्ट चिकनी मिट्टी के नीचे स्थित छिछला जलभृत लगभग 0.5–3 मीटर व्यास और 10–15 मीटर गहराई

सभी पुनर्भरण विधियों में आवश्यक सावधानी

वर्षा जल पुनर्भरण की लगभग सभी विधियों में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि पुनर्भरण के लिए भेजा जाने वाला जल गाद एवं अन्य अशुद्धियों से यथासम्भव मुक्त हो तथा पुनर्भरण संरचना की नियमित सफाई की जाए।

वर्षा जल संचयन की छह प्रमुख पुनर्भरण विधियाँ
वर्षा जल को भूजल में पहुँचाने की विभिन्न पुनर्भरण विधियाँ
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • छत से प्राप्त वर्षा जल का भूजल में पुनर्भरण छह प्रमुख संरचनाओं द्वारा किया जा सकता है।
  • सूखे एवं अनुपयोगी कुएँ को साफ करके पुनर्भरण संरचना के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
  • बन्द या चालू नलकूप द्वारा छोटे भवनों से प्राप्त वर्षा जल को भूजल में पहुँचाया जा सकता है।
  • पुनर्भरण पिट सामान्यतः 1–2 मीटर चौड़ा तथा 2–3 मीटर गहरा बनाया जाता है।
  • पुनर्भरण खाई सामान्यतः 0.5–1 मीटर चौड़ी, 1–1.5 मीटर गहरी तथा 10–20 मीटर लम्बी हो सकती है।
  • गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुआँ कम भूमि तथा गहरे जलभृत वाले क्षेत्रों में उपयोगी है।
  • पुनर्भरण शाफ्ट का व्यास लगभग 0.5–3 मीटर तथा गहराई लगभग 10–15 मीटर तक हो सकती है।
  • पुनर्भरण के लिए प्रयुक्त वर्षा जल गाद-मुक्त होना चाहिए और संरचनाओं की नियमित सफाई आवश्यक है।
Topic 3 राजस्थान में वर्षा जल संचयन एवं पारम्परिक जल स्रोत

राजस्थान में वर्षा जल संचयन एवं पारम्परिक जल स्रोत

राजस्थान में वर्षा जल संचयन

भारत में जल प्रबन्धन की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है। पुरातात्विक स्थलों की खुदाई तथा प्राचीन अभिलेखों से जल संचयन और जल प्रबन्धन की विकसित व्यवस्था का प्रमाण मिलता है।

प्राचीन एवं मध्यकालीन ग्रन्थों में नहरों, झीलों, तालाबों, कुओं और बाँधों का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत में जल संसाधनों के संरक्षण और उपयोग की परम्परा बहुत पुरानी है।

भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार जल प्रबन्धन

भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों और जल उपलब्धता के अनुसार विभिन्न जल संचयन प्रणालियाँ विकसित हुईं।

हिमालयी क्षेत्रों में नदियों के माध्यम से जल संचयन और उपयोग की व्यवस्थाएँ विकसित हुईं, जबकि राजस्थान के अधिकांश क्षेत्रों में वर्षा जल को एकत्रित करके उपयोग करने की परम्परा विकसित हुई।

राजस्थान में घरों की छतों पर गिरने वाले वर्षा जल को भी संचय करने की तकनीक अपनाई गई। मरुस्थलीय क्षेत्रों में जल की कमी के कारण लोगों ने वाड़ी, तालाब, जोहड़, बाँध और सागर-सरोवर जैसे अनेक कृत्रिम जल स्रोत विकसित किए।

राजस्थान के पारम्परिक जल स्रोत

राजस्थान में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अनेक प्रकार की पारम्परिक जल संरचनाएँ विकसित हुईं। प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं—

  1. झीलें
  2. नाड़ी
  3. बावड़ी
  4. टांका
  5. खड़ीन
  6. टोबा
  7. झालरा
  8. तालाब
  9. बेरी या छोटी कुई
  10. जोहड़

1. झीलें

राजस्थान में झीलें पारम्परिक जल संरक्षण का महत्वपूर्ण स्रोत रही हैं। इनका उपयोग पेयजल तथा सिंचाई दोनों कार्यों के लिए किया जाता है।

राजाओं, सेठों, बंजारों तथा स्थानीय जनता द्वारा अनेक झीलों का निर्माण कराया गया।

राजस्थान की प्रसिद्ध झीलों में लालसागर, कैलाना, तखतसागर, उम्मेदसागर तथा धार्मिक महत्व की पुष्कर झील का उल्लेख किया जाता है।

2. नाड़ी

नाड़ी एक प्रकार का पोखर है जिसमें वर्षा का जल संचित किया जाता है।

कच्ची नाड़ी के विकास से भूमिगत जल स्तर में भी वृद्धि होती है।

नाड़ी सामान्यतः लगभग 3 से 12 मीटर तक गहरी हो सकती है।

इसका निर्माण मुख्य रूप से पश्चिमी राजस्थान, विशेषकर जोधपुर, नागौर तथा जैसलमेर के क्षेत्रों में किया जाता है।

नाड़ी के निर्माण की प्राचीन परम्परा रही है। सन् 1520 ई. में राव जोधाजी द्वारा नाड़ी निर्माण का उल्लेख मिलता है।

3. बावड़ी

बावड़ी राजस्थान की एक प्राचीन जल संचयन संरचना है। यह एक सीढ़ीदार विशाल कुएँ के समान होती है।

बावड़ी में वर्षा जल के साथ-साथ भूमिगत जल का भी संग्रह होता है।

इसका उपयोग मुख्य रूप से पेयजल, सिंचाई तथा स्नान आदि के लिए किया जाता रहा है।

राजस्थान में शेखावाटी और बूंदी क्षेत्र की बावड़ियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध रही हैं।

बावड़ी निर्माण का उल्लेख प्राचीन साहित्य में भी मिलता है।

4. टांका

टांका राजस्थान के रेतीले क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रह करने की एक महत्वपूर्ण पारम्परिक प्रणाली है। इसे कुण्ड भी कहा जाता है।

यह एक भूमिगत सरोवर के समान होता है, जिसे ऊपर से ढककर रखा जाता है। इसका उपयोग विशेष रूप से पेयजल के लिए किया जाता है।

टांका की संरचना
  • टांका जमीन या चबूतरे की ढलान के अनुसार बनाया जाता है।
  • वर्षा जल जिस क्षेत्र से बहकर टांके में पहुँचता है, उसे आगोर या पायतान कहा जाता है।
  • पायतान को साफ रखा जाता है ताकि वर्षा जल स्वच्छ रूप में टांके तक पहुँच सके।
  • टांके के मुहाने पर सुराख तथा उसके ऊपर जाली लगाई जाती है, ताकि कचरा भीतर न जा सके।
  • टांके को सामान्यतः ढककर रखा जाता है।
  • पानी निकालने के लिए सीढ़ियों अथवा अन्य व्यवस्था का उपयोग किया जाता है।

टांकों का निर्माण मकानों की तलहटी, घर की छतों, आँगन तथा खेतों आदि में किया जाता है।

5. खड़ीन

खड़ीन जल संग्रह की एक प्राचीन प्रणाली है। इसका प्रचलन 15वीं शताब्दी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा किया गया था।

यह मिट्टी के बाँधनुमा तालाब के समान होती है। इसे ढाल वाली भूमि के निचले भाग में बनाया जाता है।

इसके निर्माण में मिट्टी की पाल उठाई जाती है तथा आवश्यकता के अनुसार पत्थर की दीवार बनाई जाती है, जिससे बहकर आने वाला जल संचित हो सके।

खड़ीन बहुउद्देशीय पारम्परिक तकनीक है। इसका क्षेत्र लगभग 5 से 7 किलोमीटर तक विस्तृत हो सकता है।

बहकर आने वाला जल अपने साथ उपजाऊ मिट्टी भी लाता है, जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है और फसलों की उपज अच्छी होती है।

6. टोबा

टोबा राजस्थान का एक महत्वपूर्ण पारम्परिक जल प्रबन्धन स्रोत है।

यह आकार में नाड़ी के समान होता है, लेकिन नाड़ी की अपेक्षा अधिक गहरा होता है।

टोबा निर्माण के लिए ऐसी सघन संरचना वाली भूमि उपयुक्त मानी जाती है जिसमें पानी का रिसाव कम होता हो।

7. झालरा

झालरा जल संचयन की दृष्टि से महत्वपूर्ण पारम्परिक संरचना है। इसका आकार सामान्यतः आयताकार होता है और इसकी तीन ओर सीढ़ियाँ बनी होती हैं।

झालरा अपने आसपास स्थित तालाबों और झीलों के रिसाव से जल प्राप्त करता है।

इसका अपना अलग आगोर या पायतान नहीं होता।

झालरा का जल सामान्यतः पीने के लिए उपयोग नहीं किया जाता था। इसका उपयोग धार्मिक रीति-रिवाजों तथा सामूहिक स्नान आदि कार्यों के लिए किया जाता था।

8. तालाब

राजस्थान में प्राचीन समय से ही तालाबों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है।

तालाब ऐसी जल संरचना है जिसका जल भण्डारण क्षेत्र अपेक्षाकृत बड़ा होता है और जल एकत्र करने के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध होता है।

तालाब सामान्यतः वाड़ी की तुलना में अधिक क्षेत्र में फैला तथा कम गहराई वाला होता है।

इसे प्रायः पहाड़ियों के जल को संरक्षित करके ऐसे स्थान पर बनाया जाता है जहाँ जल भण्डारण की सम्भावना अधिक हो और बाँध सुरक्षित रह सके।

राजस्थान में सर्वाधिक तालाब भीलवाड़ा क्षेत्र में बताए गए हैं।

9. बेरी या छोटी कुई

पारम्परिक जल प्रबन्धन में स्थानीय ज्ञान पर आधारित छोटी कुई को बेरी कहा जाता है।

इसे सामान्यतः तालाब के निकट बनाया जाता है, जिससे तालाब से रिसने वाला जल इसमें एकत्र हो सके।

बेरी की गहराई सामान्यतः लगभग 10 से 12 मीटर तक होती है।

यह प्रणाली पश्चिमी राजस्थान में अधिक पाई जाती है।

10. जोहड़

जोहड़ टांके के समान एक पारम्परिक जल संरचना है, परन्तु इसका ऊपरी भाग टांके की तुलना में बड़ा, गोलाकार और खुला होता है।

यह नाड़ी की अपेक्षा कम आकार का होता है तथा इसकी पाल पत्थरों की बनाई जाती है।

जोहड़ में एक छोटा घाट तथा सीढ़ियाँ भी हो सकती हैं।

इनका उपयोग सामूहिक रूप से पशुओं के लिए पानी उपलब्ध कराने में किया जाता है। पशुओं के पेयजल के लिए प्रयुक्त ऐसी संरचनाओं को टोपा भी कहा गया है।

जोहड़ विशेष रूप से शेखावाटी क्षेत्र में बनाए जाते रहे हैं।

राजस्थान के पारम्परिक जल स्रोत एक नजर में

जल स्रोत मुख्य विशेषता प्रमुख उपयोग/क्षेत्र
झील बड़ा जल संग्रह स्रोत पेयजल एवं सिंचाई
नाड़ी वर्षा जल से भरने वाला पोखर पश्चिमी राजस्थान
बावड़ी सीढ़ीदार विशाल कुआँ पेयजल, सिंचाई एवं स्नान
टांका ढका हुआ भूमिगत जल भण्डार रेतीले क्षेत्र एवं पेयजल
खड़ीन बाँधनुमा जल संग्रह प्रणाली जल संचयन एवं कृषि भूमि की उर्वरता
टोबा नाड़ी के समान लेकिन अधिक गहरा कम रिसाव वाली भूमि
झालरा आयताकार तथा तीन ओर सीढ़ियाँ धार्मिक एवं सामूहिक स्नान
तालाब विस्तृत और अपेक्षाकृत कम गहरा जल भण्डार वर्षा एवं पहाड़ी जल का संरक्षण
बेरी तालाब के पास बनाई जाने वाली छोटी कुई पश्चिमी राजस्थान
जोहड़ गोलाकार और खुली जल संरचना मुख्यतः पशुओं के पेयजल हेतु
राजस्थान के पारम्परिक जल स्रोत
राजस्थान में विकसित प्रमुख पारम्परिक वर्षा जल संचयन एवं जल संरक्षण संरचनाएँ
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • राजस्थान में भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार वर्षा जल को संचित करने की अनेक पारम्परिक प्रणालियाँ विकसित हुईं।
  • राजस्थान के प्रमुख पारम्परिक जल स्रोत झील, नाड़ी, बावड़ी, टांका, खड़ीन, टोबा, झालरा, तालाब, बेरी और जोहड़ हैं।
  • नाड़ी वर्षा जल संग्रह करने वाला पोखर है और सामान्यतः 3 से 12 मीटर तक गहरी हो सकती है।
  • बावड़ी सीढ़ीदार विशाल कुएँ के समान संरचना है, जिसका उपयोग पेयजल, सिंचाई तथा स्नान में किया जाता था।
  • टांका रेतीले क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रह करने वाला ढका हुआ भूमिगत जल भण्डार है।
  • खड़ीन मिट्टी के बाँध जैसी जल संग्रह प्रणाली है, जो जल संचयन के साथ कृषि भूमि की उर्वरता बढ़ाने में भी सहायक है।
  • टोबा नाड़ी के समान लेकिन अधिक गहरा जल स्रोत है।
  • झालरा आयताकार संरचना है, जिसकी तीन ओर सीढ़ियाँ होती हैं और इसका जल मुख्यतः धार्मिक तथा सामूहिक स्नान आदि में उपयोग किया जाता था।
  • बेरी सामान्यतः तालाब के पास बनाई जाने वाली लगभग 10 से 12 मीटर गहरी छोटी कुई है।
  • जोहड़ का उपयोग विशेष रूप से पशुओं के लिए पानी उपलब्ध कराने में किया जाता रहा है।
Topic 4 राजस्थान के पारम्परिक जल स्रोतों की प्रासंगिकता, उपयोगिता एवं पतन

राजस्थान के पारम्परिक जल स्रोतों की प्रासंगिकता, उपयोगिता एवं पतन

राजस्थान में पारम्परिक जल स्रोतों की प्रासंगिकता

राजस्थान में जल संरक्षण की पारम्परिक प्रणालियाँ स्थानीय समाज और जीवन-पद्धति से गहराई से जुड़ी रही हैं। यहाँ जल संचयन की परम्परा केवल जल प्राप्त करने का साधन नहीं रही, बल्कि सामाजिक ढाँचे का भी महत्वपूर्ण भाग रही है।

राजस्थान के अनेक क्षेत्रों में जल के महत्व से सम्बन्धित लोककथाएँ प्रचलित हैं और अनेक जल स्रोतों को पूजा भी जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि यहाँ जल संरक्षण का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी रहा है।

राजस्थान में जल संरक्षण की आवश्यकता

राजस्थान क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य है तथा जनसंख्या की दृष्टि से सातवें स्थान पर बताया गया है।

यहाँ देश की लगभग 5.5 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, जबकि देश में उपलब्ध कुल जल का केवल लगभग 1 प्रतिशत भाग राजस्थान को प्राप्त होता है।

जल की उपलब्धता जीवन की गुणवत्ता तथा विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करती है। इसलिए राजस्थान जैसे कम जल उपलब्धता वाले राज्य में जल संरक्षण का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

पारम्परिक जल प्रबन्धन प्रणालियों का महत्व

राजस्थान में लगातार कम होते जल स्तर को रोकने तथा उपलब्ध जल को सुरक्षित रखने के लिए जल संरक्षण संसाधनों का विकास आवश्यक है।

इस कार्य में पारम्परिक जल प्रबन्धन प्रणालियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इन प्रणालियों को पुनर्जीवित करके जल संग्रहण से सम्बन्धित अनेक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

राजस्थान में पारम्परिक जल स्रोतों की उपयोगिता

पारम्परिक जल स्रोत केवल पानी एकत्र करने के साधन नहीं हैं, बल्कि उनका आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय महत्व भी है।

1. कृषि अर्थव्यवस्था की उन्नति

पारम्परिक जल प्रबन्धन प्रणालियों के पुनरुद्धार से राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।

इन जल स्रोतों के माध्यम से वर्षा जल का संरक्षण तथा सिंचाई के लिए जल की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है।

2. सूखे एवं अकाल में जल आपूर्ति

पारम्परिक जल स्रोतों के उचित प्रबन्धन से प्राकृतिक आपदाओं, विशेषकर सूखे और अकाल के समय जल की कमी का सामना करने में सहायता मिल सकती है।

संकट के समय संचित जल स्थानीय लोगों तथा कृषि कार्यों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत बन सकता है।

3. रोजगार के अवसर

पारम्परिक जल स्रोतों की पुनर्स्थापना, मरम्मत और संरक्षण से नए रोजगार के अवसर उत्पन्न किए जा सकते हैं।

इस प्रकार इन प्रणालियों का पुनर्जीवन जल संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दे सकता है।

राजस्थान में पारम्परिक जल प्रबन्धन प्रणालियों का पतन

समय के साथ राजस्थान की अनेक पारम्परिक जल प्रबन्धन प्रणालियाँ उपेक्षा और बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के कारण कमजोर होती गईं।

इनके पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—

1. बढ़ती जनसंख्या एवं जल की बढ़ती माँग

जनसंख्या बढ़ने के साथ जल की आवश्यकता भी बढ़ती गई। पारम्परिक जल स्रोतों द्वारा बढ़ी हुई जल माँग को पूरी तरह पूरा करना कठिन हो गया।

इसके कारण धीरे-धीरे इन प्रणालियों की उपेक्षा होने लगी।

2. कृषि का व्यवसायीकरण एवं नकदी फसलों का विस्तार

कृषि के व्यवसायीकरण तथा नकदी फसलों की बढ़ती व्यापकता ने जल की आवश्यकता और कृषि पद्धतियों में परिवर्तन किया।

इस कारण अनेक पारम्परिक जल प्रबन्धन प्रणालियाँ बदलती कृषि आवश्यकताओं के सामने प्रभावी नहीं रह सकीं।

3. सामुदायिक भागीदारी का समाप्त होना

सरकारी प्रोत्साहन द्वारा व्यक्तियों को लाभ पहुँचाने वाली योजनाओं के कारण पारम्परिक जल प्रणालियों के रख-रखाव में सक्रिय सामुदायिक भागीदारी धीरे-धीरे समाप्त होती गई।

जब समुदाय की प्रत्यक्ष भूमिका कम हुई, तो इन जल स्रोतों की देखभाल और नियमित रख-रखाव भी प्रभावित हुआ।

4. व्यापक जल प्रबन्धन की समझ का अभाव

जल को पर्यावरण के व्यापक प्रबन्धन के साथ जोड़कर समझने में सरकारी संस्थाओं की असमर्थता भी पारम्परिक जल प्रबन्धन प्रणालियों के पतन का एक प्रमुख कारण रही।

प्रासंगिकता, उपयोगिता एवं पतन एक नजर में

पक्ष मुख्य बिन्दु
प्रासंगिकता कम जल उपलब्धता, गिरता जल स्तर तथा सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व
जल स्थिति लगभग 5.5% जनसंख्या, परन्तु उपलब्ध जल का लगभग 1% भाग
कृषि उपयोगिता कृषि अर्थव्यवस्था की उन्नति और सिंचाई में सहायता
आपदा उपयोगिता सूखे एवं अकाल के समय जल उपलब्धता
रोजगार पुनर्स्थापना एवं संरक्षण से रोजगार के अवसर
पतन का कारण 1 बढ़ती जनसंख्या एवं जल की माँग
पतन का कारण 2 कृषि का व्यवसायीकरण एवं नकदी फसलें
पतन का कारण 3 सामुदायिक भागीदारी में कमी
पतन का कारण 4 व्यापक जल प्रबन्धन की समझ का अभाव
राजस्थान के पारम्परिक जल स्रोतों की उपयोगिता और पतन के कारण
पारम्परिक जल स्रोतों की उपयोगिता तथा उनके पतन के प्रमुख कारण
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • राजस्थान में जल संचयन की परम्परा सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन से जुड़ी रही है।
  • राजस्थान में देश की लगभग 5.5% जनसंख्या निवास करती है, जबकि उपलब्ध जल का लगभग 1% भाग ही इसे प्राप्त होता है।
  • कम होते जल स्तर को रोकने तथा जल संरक्षण के लिए पारम्परिक जल प्रबन्धन प्रणालियों का पुनर्जीवन महत्वपूर्ण है।
  • इन प्रणालियों के पुनरुद्धार से कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
  • सूखे और अकाल के समय पारम्परिक जल स्रोत जल आपूर्ति में सहायक होते हैं।
  • पारम्परिक जल स्रोतों की पुनर्स्थापना से रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न हो सकते हैं।
  • बढ़ती जनसंख्या और जल की बढ़ती माँग इनके पतन का एक प्रमुख कारण है।
  • कृषि का व्यवसायीकरण तथा नकदी फसलों की बढ़ती व्यापकता ने भी इन प्रणालियों को प्रभावित किया।
  • सामुदायिक भागीदारी में कमी के कारण इनका रख-रखाव कमजोर हुआ।
  • जल को व्यापक पर्यावरणीय प्रबन्धन के रूप में समझने की कमी भी इनके पतन का कारण बनी।
Topic 5 गति के नियमों पर मॉडल: न्यूटन के तीनों नियम

गति के नियमों पर मॉडल: न्यूटन के तीनों नियम

न्यूटन के गति के नियम

सर आइजक न्यूटन ने सन् 1687 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक प्रिंसिपिया में गति के नियमों का प्रतिपादन किया। इसी कारण गति के इन नियमों को न्यूटन के गति के नियम कहा जाता है।

न्यूटन के गति के तीन प्रमुख नियम हैं—

  1. न्यूटन का प्रथम नियम
  2. न्यूटन का द्वितीय नियम
  3. न्यूटन का तृतीय नियम

1. न्यूटन का प्रथम नियम

न्यूटन के प्रथम नियमानुसार, यदि कोई वस्तु विरामावस्था में है तो वह तब तक विरामावस्था में ही रहेगी, जब तक उस पर बाहरी बल लगाकर उसे गतिशील न किया जाए।

इसी प्रकार यदि कोई वस्तु गतिशील है, तो उस पर बाहरी बल लगाकर ही उसे विरामावस्था में पहुँचाया जा सकता है।

न्यूटन के प्रथम नियम को जड़त्व का नियम भी कहा जाता है।

न्यूटन के प्रथम नियम के उदाहरण
  1. रुकी हुई गाड़ी अचानक चलने लगे तो उसमें बैठे यात्री पीछे की ओर झुक जाते हैं।
  2. चलती हुई गाड़ी अचानक रुक जाए तो उसमें बैठे यात्री आगे की ओर झुक जाते हैं।
  3. पेड़ को हिलाने पर उसके फल टूटकर नीचे गिर जाते हैं।
  4. कैरम बोर्ड पर स्ट्राइकर को गोटियों के बण्डल की सबसे नीचे वाली गोटी से तेजी से टकराने पर केवल सबसे नीचे वाली गोटी हटती है।

2. न्यूटन का द्वितीय नियम

न्यूटन के द्वितीय नियमानुसार किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर उस वस्तु पर लगाए गए बल के अनुक्रमानुपाती होती है।

संवेग में होने वाला परिवर्तन आरोपित बल की दिशा में ही होता है।

न्यूटन के द्वितीय नियम के उदाहरण
उदाहरण 1: क्रिकेट की गेंद पकड़ना

जब क्रिकेट खिलाड़ी तेजी से आती हुई गेंद को पकड़ता है, तो वह गेंद के वेग को कम करने के लिए अपने हाथों को पीछे की ओर खींच लेता है।

ऐसा करने से गेंद को रोकने की प्रक्रिया कुछ समय में पूरी होती है और खिलाड़ी के हाथों पर लगने वाली चोट कम हो जाती है।

उदाहरण 2: कठोर और मुलायम सतह पर गिरना

सीमेंट के फर्श की तुलना में गद्दे या मिट्टी के फर्श पर गिरने से कम चोट आती है।

3. न्यूटन का तृतीय नियम

न्यूटन के तृतीय नियमानुसार, प्रत्येक क्रिया के बराबर तथा विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।

इस नियम को क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम भी कहा जाता है।

जब दो वस्तुएँ एक-दूसरे पर पारस्परिक प्रभाव डालती हैं, तो पहली वस्तु द्वारा दूसरी वस्तु पर लगाए गए बल को क्रिया तथा दूसरी वस्तु द्वारा पहली वस्तु पर लगाए गए बल को प्रतिक्रिया कहते हैं।

क्रिया और प्रतिक्रिया बल परिमाण में समान तथा दिशाओं में एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।

न्यूटन के तृतीय नियम के उदाहरण
1. गोली चलने पर बन्दूक का प्रतिक्षेप

बन्दूक से गोली चलाने पर बन्दूक गोली पर आगे की दिशा में बल लगाती है। यह क्रिया बल है।

इसके साथ ही गोली बन्दूक पर बराबर बल पीछे की दिशा में लगाती है। यह प्रतिक्रिया बल है। इसी कारण बन्दूक पीछे की ओर प्रतिक्षेपित होती है।

2. नाव चलाना

नाव चलाते समय नाविक पतवार की सहायता से पानी को पीछे की ओर धकेलता है। इसके परिणामस्वरूप प्रतिक्रिया बल नाव को आगे की ओर बढ़ाता है।

3. तैरते हुए व्यक्ति का आगे बढ़ना

तैरते समय व्यक्ति अपने हाथों द्वारा पानी को पीछे की ओर धकेलता है। प्रतिक्रिया के कारण उसका शरीर आगे की ओर बढ़ता है।

4. रॉकेट प्रणोदन

रॉकेट से गैसें नीचे की ओर निकलती हैं। गैसों पर नीचे की ओर लगने वाला बल क्रिया है, जबकि इसके विपरीत दिशा में रॉकेट पर लगने वाला बल प्रतिक्रिया है। इसी प्रतिक्रिया के कारण रॉकेट ऊपर की ओर बढ़ता है।

ऊँचाई से कूदने पर चोट लगना भी क्रिया-प्रतिक्रिया के प्रभाव का उदाहरण है।

न्यूटन के तीनों नियम एक नजर में

नियम मुख्य विचार उदाहरण
प्रथम नियम बाहरी बल के बिना वस्तु अपनी विराम या गति की अवस्था बनाए रखती है। गाड़ी के अचानक चलने या रुकने पर यात्री का झुकना
द्वितीय नियम संवेग परिवर्तन की दर लगाए गए बल के अनुक्रमानुपाती होती है और परिवर्तन बल की दिशा में होता है। गेंद पकड़ते समय हाथ पीछे खींचना
तृतीय नियम प्रत्येक क्रिया के बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। बन्दूक का प्रतिक्षेप, नाव चलाना, तैरना, रॉकेट प्रणोदन
न्यूटन के तीनों गति नियम और उनके उदाहरण
न्यूटन के प्रथम, द्वितीय और तृतीय गति नियमों के दैनिक जीवन के उदाहरण
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सर आइजक न्यूटन ने सन् 1687 में अपनी पुस्तक प्रिंसिपिया में गति के नियमों का प्रतिपादन किया।
  • न्यूटन का प्रथम नियम जड़त्व का नियम भी कहलाता है।
  • प्रथम नियम के अनुसार बाहरी बल के बिना वस्तु अपनी विराम या गति की अवस्था बनाए रखती है।
  • न्यूटन के द्वितीय नियम के अनुसार संवेग परिवर्तन की दर लगाए गए बल के अनुक्रमानुपाती होती है।
  • संवेग में परिवर्तन लगाए गए बल की दिशा में होता है।
  • गेंद पकड़ते समय हाथ पीछे खींचना द्वितीय नियम का उदाहरण है।
  • न्यूटन का तृतीय नियम क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम कहलाता है।
  • प्रत्येक क्रिया के बराबर तथा विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।
  • बन्दूक का प्रतिक्षेप, नाव चलाना, तैरना और रॉकेट का आगे बढ़ना तृतीय नियम के उदाहरण हैं।
Topic 6 विद्युत चुम्बकीय बल एवं विद्युत आवेशन की घटनाएँ

विद्युत चुम्बकीय बल एवं विद्युत आवेशन की घटनाएँ

विद्युत चुम्बकीय बल का परिचय

किसी विद्युत ऊर्जा उत्पादक उपकरण द्वारा उत्पन्न किया गया वह बल, जो किसी चालक या परिपथ में इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह को स्थापित करता है, विद्युत बल कहलाता है।

विद्युत से सम्बन्धित अनेक घटनाओं को हम दैनिक जीवन में अनुभव करते हैं। इनमें किसी पदार्थ को रगड़ने पर उसमें थोड़े समय के लिए दूसरे हल्के पदार्थों को आकर्षित करने की क्षमता उत्पन्न होना प्रमुख है।

विद्युत आवेशन

जब कोई पदार्थ रगड़ने पर कुछ समय के लिए आवेशित स्वभाव प्रदर्शित करता है, तो इस घटना को विद्युत आवेशन कहते हैं।

कंघी, गुब्बारे तथा नायलॉन के कपड़े आदि में रगड़ने के बाद ऐसी घटनाएँ देखी जा सकती हैं।

स्थिर विद्युत आवेश

रगड़ने के कारण पदार्थ में उत्पन्न आवेश स्थायी नहीं रहता। थोड़े समय बाद उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है।

इस प्रकार के आवेश को स्थिर विद्युत आवेश कहा जाता है।

विद्युत आवेशन की प्रमुख घटनाएँ

1. प्लास्टिक की कंघी या पेन द्वारा कागज के टुकड़ों को आकर्षित करना

सूखे बालों या कमीज की आस्तीन पर प्लास्टिक की कंघी अथवा प्लास्टिक पेन को रगड़ने के बाद यदि उसे कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों के पास लाया जाए, तो कागज के टुकड़े उसकी ओर आकर्षित होने लगते हैं।

यह घटना विद्युत आवेशन का सरल उदाहरण है।

2. गुब्बारे का दीवार से चिपकना

हवा से भरे गुब्बारे को किसी ऊनी वस्त्र के साथ रगड़ने पर उसमें आवेश उत्पन्न हो जाता है।

यदि इस आवेशित गुब्बारे को दीवार के समीप ले जाया जाए, तो वह दीवार से चिपक सकता है।

3. नायलॉन या ऐक्रिलिक कपड़ों में चट-चट की आवाज

नायलॉन या ऐक्रिलिक से बने कपड़ों को उतारते समय कभी-कभी चट-चट की आवाज सुनाई देती है।

इसके साथ सूक्ष्म विद्युत चिंगारियाँ भी दिखाई दे सकती हैं। यह भी विद्युत आवेशन के कारण होता है।

4. अम्बर को रगड़ने पर हल्की वस्तुओं का आकर्षण

प्राचीन समय में थेल्स नामक यूनानी व्यक्ति ने प्रयोगों द्वारा पाया कि अम्बर नामक पदार्थ को ऊन या बिल्ली की खाल से रगड़ने पर वह पक्षियों के पंख, पत्तियाँ तथा धूल के कणों जैसी हल्की वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करने लगता है।

थेल्स द्वारा प्रयुक्त अम्बर पदार्थ के लिए यूनानी भाषा में प्रयुक्त शब्द से ही विद्युत से सम्बन्धित शब्द की उत्पत्ति मानी गई।

5. वस्तुओं का आकर्षित होना

रगड़ने के बाद किसी पदार्थ द्वारा दूसरे पदार्थ को आकर्षित करने की इस घटना को विद्युत अथवा स्थिर विद्युत से सम्बन्धित घटना माना जाता है।

विद्युत आवेशन की घटनाएँ एक नजर में

घटना क्या होता है?
कंघी/पेन को रगड़ना कागज के छोटे टुकड़े आकर्षित होते हैं।
गुब्बारा ऊनी वस्त्र से रगड़ना गुब्बारा दीवार से चिपक सकता है।
नायलॉन/ऐक्रिलिक कपड़े उतारना चट-चट की आवाज तथा सूक्ष्म चिंगारियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
अम्बर को ऊन या बिल्ली की खाल से रगड़ना पंख, पत्तियाँ और धूल के कण आकर्षित होते हैं।
विद्युत आवेशन की दैनिक जीवन की घटनाएँ
रगड़ने से उत्पन्न स्थिर विद्युत आवेश के सामान्य उदाहरण
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • चालक या परिपथ में इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह को स्थापित करने वाला बल विद्युत बल कहलाता है।
  • किसी पदार्थ को रगड़ने पर उसमें थोड़े समय के लिए आवेशित गुण उत्पन्न हो सकता है।
  • रगड़ने से आवेशित होने की घटना को विद्युत आवेशन कहते हैं।
  • थोड़े समय तक रहने वाले आवेश को स्थिर विद्युत आवेश कहा जाता है।
  • रगड़ी हुई प्लास्टिक कंघी या पेन कागज के छोटे टुकड़ों को आकर्षित कर सकती है।
  • ऊनी वस्त्र से रगड़ा हुआ गुब्बारा दीवार से चिपक सकता है।
  • नायलॉन या ऐक्रिलिक कपड़ों को उतारते समय चट-चट की आवाज तथा सूक्ष्म चिंगारियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • अम्बर को ऊन या बिल्ली की खाल से रगड़ने पर वह हल्की वस्तुओं को आकर्षित करता है।
Topic 7 विद्युत आवेश: धन एवं ऋण आवेश, आवेश संरक्षण तथा आकर्षण-प्रतिकर्षण

विद्युत आवेश: धन एवं ऋण आवेश, आवेश संरक्षण तथा आकर्षण-प्रतिकर्षण

विद्युत आवेश

किसी पदार्थ का वह भौतिक गुण, जिसके कारण उसमें विद्युत तथा चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न होते हैं, विद्युत आवेश कहलाता है।

विद्युत आवेश को q से प्रदर्शित किया जाता है।

किसी वस्तु को रगड़ने पर इलेक्ट्रॉनों का एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानान्तरण हो सकता है। इसी कारण वस्तुएँ धन अथवा ऋण आवेशित हो जाती हैं।

काँच की छड़ और रेशम का उदाहरण

जब काँच की छड़ को रेशम से रगड़ा जाता है, तो काँच के परमाणुओं से कुछ इलेक्ट्रॉन निकलकर रेशम में चले जाते हैं।

इलेक्ट्रॉनों की कमी के कारण काँच की छड़ पर धन आवेश की अधिकता हो जाती है, जबकि अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन प्राप्त करने के कारण रेशम पर ऋण आवेश की अधिकता हो जाती है।

अतः काँच की छड़ धन-आवेशित तथा रेशम ऋण-आवेशित हो जाता है।

आबनूस की छड़ का उदाहरण

जब आबनूस की छड़ को बिल्ली की खाल से रगड़ा जाता है, तो खाल से कुछ इलेक्ट्रॉन आबनूस की छड़ में चले जाते हैं।

इलेक्ट्रॉनों की अधिकता के कारण आबनूस की छड़ ऋण-आवेशित हो जाती है, जबकि इलेक्ट्रॉनों की कमी के कारण बिल्ली की खाल धन-आवेशित हो जाती है।

आवेश संरक्षण नियम

एक वस्तु से जितने इलेक्ट्रॉन निकलते हैं, उतने ही इलेक्ट्रॉन दूसरी वस्तु में चले जाते हैं। इसलिए दोनों वस्तुओं के कुल आवेश का मान मिलाकर शून्य रहता है।

इससे स्पष्ट होता है कि विद्युत आवेश न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। इसे विद्युत आवेश संरक्षण नियम कहते हैं।

धन तथा ऋण आवेश

वस्तुओं को रगड़ने पर वे आवेशित हो सकती हैं, किन्तु विभिन्न पदार्थों पर उत्पन्न आवेश अलग-अलग प्रकार के हो सकते हैं।

आवेश मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं—

  1. धनात्मक आवेश
  2. ऋणात्मक आवेश

प्रयोग 1: दो धन-आवेशित काँच की छड़ें

  1. काँच की एक छड़ लें।
  2. उसे रेशम के कपड़े से रगड़कर आवेशित करें।
  3. छड़ के मध्य भाग में रेशम की डोरी बाँधकर उसे स्टैण्ड से स्वतंत्र रूप से लटकाएँ।
  4. काँच की दूसरी छड़ को भी रेशम के कपड़े से रगड़कर लटकी हुई छड़ के समीप लाएँ।

दूसरी काँच की छड़ लटकी हुई काँच की छड़ को प्रतिकर्षित करती है।

दोनों काँच की छड़ों पर समान प्रकार का धन आवेश उत्पन्न होता है। अतः समान प्रकार के आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।

प्रयोग 2: दो ऋण-आवेशित आबनूस की छड़ें

  1. आबनूस की दो छड़ें लें।
  2. दोनों को फलालैन के कपड़े से रगड़कर आवेशित करें।
  3. एक छड़ को रेशम के पतले धागे से बाँधकर स्वतंत्र रूप से लटकाएँ।
  4. दूसरी आवेशित छड़ को लटकी हुई छड़ के समीप लाएँ।

दूसरी आबनूस की छड़ लटकी हुई आबनूस की छड़ को प्रतिकर्षित करके दूर कर देती है।

दोनों छड़ों पर समान प्रकार का ऋण आवेश होता है। इससे भी सिद्ध होता है कि समान प्रकार के आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।

प्रयोग 3: धन और ऋण आवेश के बीच आकर्षण

  1. काँच की एक छड़ लें और उसे रेशम के कपड़े से रगड़कर आवेशित करें।
  2. छड़ के मध्य भाग में धागा बाँधकर उसे स्टैण्ड से स्वतंत्र रूप से लटकाएँ।
  3. अब आबनूस की एक छड़ लें।
  4. आबनूस की छड़ को फलालैन के कपड़े से रगड़कर आवेशित करें।
  5. आवेशित आबनूस की छड़ को लटकी हुई काँच की छड़ के समीप लाएँ।

काँच की छड़ आबनूस की छड़ की ओर आकर्षित होती है।

काँच की छड़ और आबनूस की छड़ पर विपरीत प्रकार के आवेश होते हैं। इसलिए विपरीत प्रकार के आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।

प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्ष

  • आवेश दो प्रकार के होते हैं—धनात्मक तथा ऋणात्मक।
  • समान प्रकार के आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।
  • विपरीत प्रकार के आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।

आकर्षण और प्रतिकर्षण का महत्व

एक आवेशित वस्तु किसी अनावेशित वस्तु को भी आकर्षित कर सकती है, लेकिन उसे प्रतिकर्षित नहीं कर सकती।

इसलिए केवल आकर्षण से यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि दोनों वस्तुएँ आवेशित हैं। प्रतिकर्षण को वस्तु के आवेशित होने का वास्तविक प्रमाण माना जाता है।

विद्युत आवेश एक नजर में

स्थिति परिणाम
काँच + रेशम काँच धन-आवेशित तथा रेशम ऋण-आवेशित
आबनूस + बिल्ली की खाल आबनूस ऋण-आवेशित तथा खाल धन-आवेशित
धन + धन प्रतिकर्षण
ऋण + ऋण प्रतिकर्षण
धन + ऋण आकर्षण
आवेश संरक्षण आवेश न उत्पन्न होता है, न नष्ट; केवल स्थानान्तरित होता है
धन और ऋण आवेश में आकर्षण तथा प्रतिकर्षण
समान आवेशों में प्रतिकर्षण तथा विपरीत आवेशों में आकर्षण
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • विद्युत तथा चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न करने वाला पदार्थ का भौतिक गुण विद्युत आवेश कहलाता है।
  • विद्युत आवेश को q से प्रदर्शित किया जाता है।
  • इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण के कारण वस्तुएँ धन अथवा ऋण आवेशित होती हैं।
  • काँच की छड़ को रेशम से रगड़ने पर काँच धन तथा रेशम ऋण आवेशित होता है।
  • आबनूस की छड़ को बिल्ली की खाल से रगड़ने पर आबनूस ऋण तथा खाल धन आवेशित होती है।
  • विद्युत आवेश न उत्पन्न किया जा सकता है और न नष्ट; इसे आवेश संरक्षण नियम कहते हैं।
  • आवेश दो प्रकार के होते हैं—धनात्मक और ऋणात्मक।
  • समान प्रकार के आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।
  • विपरीत प्रकार के आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।
  • प्रतिकर्षण वस्तु के आवेशित होने का वास्तविक प्रमाण माना जाता है।
Topic 8 डोर बेल का मॉडल: संरचना एवं क्रियाविधि

डोर बेल का मॉडल: संरचना एवं क्रियाविधि

डोर बेल का मॉडल

डोर बेल एक विद्युत चुम्बकीय घंटी है। इसमें विद्युत चुम्बकीय प्रभाव की सहायता से लोहे के स्ट्राइकर को आकर्षित किया जाता है और स्ट्राइकर घंटी पर प्रहार करके ध्वनि उत्पन्न करता है।

इस प्रकार डोर बेल विद्युत चुम्बकीय बल पर आधारित होती है और विद्युत चुम्बकीय प्रभाव को ध्वनि में परिवर्तित करती है।

इसका उपयोग मुख्य रूप से घर के मुख्य द्वार पर आगन्तुक के आने की सूचना प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

डोर बेल के प्रकार

ध्वनि की आवश्यकता एवं उपयोग के आधार पर विभिन्न प्रकार की डोर बेल प्रयोग में लाई जाती हैं—

  1. क्लैपर डोर बेल
  2. चाइम डोर बेल
  3. ताररहित डोर बेल
  4. अपार्टमेंट डोर बेल

डोर बेल के प्रमुख भाग

डोर बेल के चित्र में निम्न प्रमुख भाग प्रदर्शित किए गए हैं—

  • घंटी
  • स्ट्राइकर
  • सम्पर्क
  • स्प्रिंग
  • स्विच
  • विद्युत चुम्बकीय भाग

विद्युत चुम्बकीय भाग को चित्र में उत्तर (N) तथा दक्षिण (S) ध्रुवों के साथ दर्शाया गया है।

डोर बेल की सामान्य कार्यविधि

जब डोर बेल की कुण्डली सक्रिय होती है, तो विद्युत चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न होता है। यह लोहे के स्ट्राइकर को अपनी ओर आकर्षित करता है।

स्ट्राइकर आगे बढ़कर घंटी पर प्रहार करता है, जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है। इस प्रकार विद्युत चुम्बकीय बल के कारण डोर बेल कार्य करती है।

डोर बेल की संरचना

डोर बेल की संरचना के विवरण में एक खोखले धातु के सिलेंडर का उल्लेख किया गया है, जिसे दो भागों D1 और D2 में विभाजित किया जाता है। ये दोनों एक रिक्त कक्ष में संलग्न रहते हैं और इन्हें डीज कहा गया है।

डीज विद्युत चुम्बकत्व का कार्य करते हैं। इन्हें सतत ए.सी. धारा प्रदान की जाती है तथा डी.सी. धारा की आपूर्ति के आधार पर इनकी ध्रुवता बदलती है।

डीज तथा आयनों के स्रोत के बीच स्थान रखा जाता है। इस स्थान पर विद्युत चुम्बक के पोल-टुकड़े रखे जाते हैं।

चुम्बकीय क्षेत्र डीज के लम्बवत होता है तथा डीज उच्च कम्पन वाले यन्त्र से जुड़ा होता है।

क्रियाविधि का वर्णन

जब q आवेश तथा m द्रव्यमान वाला धनात्मक आयन स्रोत से उत्सर्जित होता है, तो वह डीज की ओर त्वरित होता है।

चुम्बकीय क्षेत्र के कारण आयन चुम्बकीय लोरेंज बल का अनुभव करता है और वृत्तीय पथ में गति करता है।

जब आयन दोनों डीज के बीच के खाली स्थान में पहुँचता है, तो डीज की ध्रुवता बदल जाती है। इसके कारण आयन दूसरी डीज की ओर गति करने लगता है।

प्रत्येक बार आयन का वेग बढ़ता है तथा उसके वृत्तीय पथ की त्रिज्या भी बढ़ती जाती है। इस प्रकार आयन क्रमशः सर्पिल पथ पर आगे बढ़ता है।

किनारे पर पहुँचने पर आयन झुकाने वाली प्लेट की सहायता से आगे बढ़ता है और अन्त में उच्च ऊर्जा वाला आयन लक्ष्य से टकराता है।

डोर बेल एक नजर में

आधार मुख्य तथ्य
प्रकृति विद्युत चुम्बकीय घंटी
मुख्य सिद्धान्त विद्युत चुम्बकीय बल
ध्वनि उत्पन्न होना स्ट्राइकर द्वारा घंटी पर प्रहार
प्रमुख भाग घंटी, स्ट्राइकर, सम्पर्क, स्प्रिंग, स्विच एवं विद्युत चुम्बकीय भाग
प्रमुख उपयोग मुख्य द्वार पर आगन्तुक के आने की सूचना
प्रकार क्लैपर, चाइम, ताररहित तथा अपार्टमेंट डोर बेल
विद्युत चुम्बकीय डोर बेल की संरचना और कार्यविधि
विद्युत चुम्बकीय डोर बेल के प्रमुख भाग और स्ट्राइकर द्वारा ध्वनि उत्पन्न होना
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • डोर बेल एक विद्युत चुम्बकीय घंटी है।
  • डोर बेल विद्युत चुम्बकीय बल के आधार पर कार्य करती है।
  • कुण्डली सक्रिय होने पर लोहे का स्ट्राइकर आकर्षित होकर घंटी पर प्रहार करता है।
  • स्ट्राइकर के घंटी से टकराने पर ध्वनि उत्पन्न होती है।
  • डोर बेल के प्रमुख भाग घंटी, स्ट्राइकर, सम्पर्क, स्प्रिंग, स्विच तथा विद्युत चुम्बकीय भाग हैं।
  • डोर बेल के चार प्रकार बताए गए हैं—क्लैपर, चाइम, ताररहित तथा अपार्टमेंट डोर बेल।
  • डोर बेल का उपयोग मुख्य द्वार पर आगन्तुक के आने की सूचना के लिए किया जाता है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

विद्युत आवेश के प्रकार हैं—

व्याख्या: विद्युत आवेश दो प्रकार के होते हैं—धनात्मक आवेश और ऋणात्मक आवेश।
Q 2

न्यूटन के तृतीय नियम का उदाहरण है—

व्याख्या: बन्दूक का प्रतिक्षेप, नाव चलाना और तैरते हुए आगे बढ़ना—तीनों क्रिया-प्रतिक्रिया अर्थात् न्यूटन के तृतीय नियम के उदाहरण हैं।
Q 3

सबसे पहले गति के नियमों को किसने प्रतिपादित किया—

व्याख्या: सर आइजक न्यूटन ने सन् 1687 में अपनी पुस्तक प्रिंसिपिया में गति के नियमों का प्रतिपादन किया।
Q 4

राजस्थान में परम्परागत जल स्रोत हैं—

व्याख्या: तालाब, झीलें और नाड़ी—तीनों राजस्थान के पारम्परिक जल स्रोतों में शामिल हैं।
Q 5

प्रत्येक क्रिया के बराबर तथा विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है, यह न्यूटन का कौन-सा नियम है—

व्याख्या: न्यूटन के तृतीय नियम को क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम कहा जाता है।
Q 6

वर्षा जल एकत्रित करने के लिए बनाया गया हौद कहलाता है—

व्याख्या: राजस्थान के रेतीले क्षेत्रों में वर्षा जल के संग्रह के लिए बनाई गई भूमिगत संरचना को टांका कहा जाता है।
Q 7

रुकी हुई गाड़ी के अचानक चलने पर उसमें बैठे यात्री पीछे की ओर झुक जाते हैं, यह उदाहरण न्यूटन के किस नियम पर आधारित है—

व्याख्या: यह जड़त्व का उदाहरण है और जड़त्व का नियम न्यूटन का प्रथम नियम कहलाता है।
Q 8

वर्षा जल संचयन प्रणाली उन स्थानों के लिए उपयुक्त है जहाँ प्रतिवर्ष न्यूनतम वर्षा लगभग होती है—

व्याख्या: वर्षा जल संचयन प्रणाली उन स्थानों के लिए उपयुक्त बताई गई है जहाँ प्रतिवर्ष न्यूनतम लगभग 200 मिमी वर्षा होती है।
Q 9

पुनर्भरण पिट की सामान्य गहराई होती है—

व्याख्या: पुनर्भरण पिट सामान्यतः 1 से 2 मीटर चौड़ा तथा 2 से 3 मीटर गहरा बनाया जाता है।
Q 10

राजस्थान में नाड़ी सामान्यतः कितनी गहरी होती है—

व्याख्या: नाड़ी एक प्रकार का पोखर है और इसकी गहराई सामान्यतः 3 से 12 मीटर तक बताई गई है।
Q 11

विद्युत आवेश को किस प्रतीक से प्रदर्शित किया जाता है—

व्याख्या: विद्युत आवेश को q से प्रदर्शित किया जाता है।
Q 12

समान प्रकार के विद्युत आवेश एक-दूसरे को—

व्याख्या: समान प्रकार के आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं, जबकि विपरीत प्रकार के आवेश आकर्षित करते हैं।
Q 13

काँच की छड़ को रेशम से रगड़ने पर काँच की छड़ हो जाती है—

व्याख्या: काँच की छड़ से इलेक्ट्रॉन रेशम में चले जाते हैं, इसलिए काँच की छड़ धन-आवेशित हो जाती है।
Q 14

पुनर्भरण शाफ्ट की गहराई भूमि स्तर से लगभग कितनी हो सकती है—

व्याख्या: पुनर्भरण शाफ्ट की गहराई भूमि स्तर से लगभग 10 से 15 मीटर तक हो सकती है।
Q 15

डोर बेल मुख्यतः किस बल के आधार पर कार्य करती है—

व्याख्या: डोर बेल विद्युत चुम्बकीय प्रभाव से स्ट्राइकर को आकर्षित करके घंटी पर प्रहार कराती है, इसलिए यह विद्युत चुम्बकीय बल पर आधारित होती है।

पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय विज्ञान के अध्याय विभिन्न मॉडल से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

वर्षा जल संचयन से आप क्या समझते हैं?

Q 2

विद्युत आवेश से क्या तात्पर्य है?

Q 3

डोर बेल की संरचना का वर्णन कीजिए।

Q 4

बन्द बेकार पड़े कुएँ द्वारा वर्षा जल का संचयन किस प्रकार किया जाता है?

Q 5

राजस्थान में परम्परागत जल प्रबन्धन प्रणालियों के पतन के कारणों को समझाइए।

Q 6

राजस्थान में परम्परागत जल स्रोतों की उपयोगिता बताइए।

Q 7

गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुएँ द्वारा वर्षा जल का संचयन किस प्रकार किया जाता है?

Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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