Home
App Install Updates
Home Study Material Semester 1 विज्ञान सजीव वस्तुएँ
Chapter 1 • विज्ञान

सजीव वस्तुएँ

UP DELED Semester 1 विज्ञान विषय के इस अध्याय में सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं के लक्षण एवं अन्तर, प्राकृतिक और मानव निर्मित वस्तुएँ, पौधों एवं जन्तुओं में पोषण, उनकी समानताएँ एवं विभिन्नताएँ तथा पौधों और जन्तुओं में विभिन्न प्रकार के वातावरणीय अनुकूलन का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

10
Topics
15
MCQs
10+
PYQs
PDF
Notes
Topic 1 सजीव एवं निर्जीव वस्तुएँ: अर्थ, लक्षण एवं अन्तर

सजीव एवं निर्जीव वस्तुएँ: अर्थ, लक्षण एवं अन्तर

सजीव तथा निर्जीव वस्तुएँ

हमारे चारों ओर अनेक प्रकार की वस्तुएँ पाई जाती हैं। इनमें कुछ वस्तुएँ सजीव होती हैं और कुछ निर्जीव। इन दोनों के बीच अन्तर करने का मुख्य आधार जीवन है।

पादप, जन्तु, कीट, पक्षी तथा सूक्ष्म जीव सजीव वस्तुओं के उदाहरण हैं, जबकि बोतल, पेन, पेंसिल, कुर्सी, मेज, पत्थर, लकड़ी, दरवाजा, कम्प्यूटर और मोबाइल आदि निर्जीव वस्तुएँ हैं।

सजीव वस्तुएँ सूक्ष्म इकाइयों से बनी होती हैं, जिन्हें कोशिका (Cell) कहा जाता है। इसके विपरीत निर्जीव वस्तुएँ कोशिकाओं से निर्मित नहीं होती हैं।

सजीव वस्तुएँ (Living Things)

वे वस्तुएँ जिनमें जीवन पाया जाता है, सजीव वस्तुएँ कहलाती हैं। सजीवों का निर्माण कोशिकाओं से होता है। विभिन्न कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं, ऊतक मिलकर अंग बनाते हैं तथा विभिन्न अंग मिलकर अंग तंत्र (Organ System) का निर्माण करते हैं।

मनुष्य, पादप, कीट, पक्षी, जन्तु, कवक, जीवाणु (Bacteria), शैवाल (Algae) और प्रोटोजोआ आदि सजीवों के उदाहरण हैं।

सजीव वस्तुओं के मुख्य लक्षण

  1. गति, वृद्धि एवं विकास— सजीवों में गति पाई जाती है तथा समय के साथ उनमें वृद्धि और विकास होता है।
  2. कोशिकीय संरचना— सजीव वस्तुएँ एक कोशिका या अनेक कोशिकाओं से बनी होती हैं।
  3. भोजन— सभी सजीवों को भोजन की आवश्यकता होती है। पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, जबकि अन्य जीव भोजन के लिए पौधों या अन्य जन्तुओं पर निर्भर रहते हैं।
  4. पोषण— सजीवों को शरीर की वृद्धि, विकास और ऊर्जा के लिए पोषण की आवश्यकता होती है।
  5. उत्सर्जन— सजीव अपने शरीर में बनने वाले अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालते हैं।
  6. प्रजनन— सजीव अपनी जाति की निरन्तरता बनाए रखने के लिए नए जीवों को जन्म देते हैं।
  7. संवेदनशीलता— सजीव बाहरी वातावरण और विभिन्न उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं।
  8. अनुकूलन— सजीव विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार अपने को अनुकूलित कर जीवित रहने का प्रयास करते हैं।
  9. श्वसन— सजीव कोशिकाओं में श्वसन क्रिया होती है।
  10. आनुवंशिक पदार्थ— DNA लगभग सभी जीवित जीवों का आनुवंशिक पदार्थ (Genetic Material) होता है।

निर्जीव वस्तुएँ (Non-Living Things)

वे वस्तुएँ जिनमें जीवन के लक्षण नहीं पाए जाते, निर्जीव वस्तुएँ कहलाती हैं। इनमें प्रजनन, वृद्धि एवं विकास, श्वसन, अनुकूलन, उत्सर्जन तथा स्वाभाविक गति जैसी जीवन क्रियाएँ नहीं होती हैं।

लकड़ी, प्लास्टिक, लोहा, धातु, चिमटा, कम्पास, पेन, की-बोर्ड, गैजेट्स और रॉक आदि निर्जीव वस्तुओं के उदाहरण हैं।

निर्जीव वस्तुओं के मुख्य लक्षण

  1. इनमें कोशिका नहीं होती है।
  2. इनमें वृद्धि एवं विकास नहीं होता है।
  3. इनमें स्वयं की गति या संचालन नहीं होता है।
  4. इन्हें भोजन की आवश्यकता नहीं होती है।
  5. इनमें श्वसन क्रिया नहीं होती है।
  6. ये प्रजनन नहीं कर सकती हैं।
  7. इनकी कोई जीवन अवधि नहीं होती है।
  8. इनमें किसी प्रकार की जैविक उत्तेजना नहीं होती है।
  9. इनमें मृत्यु का अनुभव नहीं होता है।

सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं में अन्तर

तुलना का आधार सजीव वस्तुएँ निर्जीव वस्तुएँ
कोशिकीय संरचना सजीवों की सूक्ष्म संरचनात्मक इकाई कोशिका होती है। निर्जीव वस्तुओं में कोशिकीय संरचना नहीं होती है।
संवेदनशीलता सजीव बाहरी उद्दीपनों के प्रति संवेदनशील होते हैं और प्रतिक्रिया करते हैं। निर्जीव वस्तुएँ बाहरी उद्दीपनों के प्रति संवेदनशील नहीं होती हैं।
चयापचय (Metabolism) सजीवों में एनाबोलिज्म तथा कैटाबोलिज्म जैसी उपापचयी क्रियाएँ होती हैं। निर्जीव वस्तुओं में ऐसी जैविक उपापचयी क्रियाएँ नहीं होती हैं।
वृद्धि एवं विकास सजीवों में नियमित रूप से वृद्धि एवं विकास होता है। निर्जीव वस्तुओं में जैविक वृद्धि एवं विकास नहीं होता है।
वातावरणीय नियंत्रण सजीव अपने आन्तरिक वातावरण को नियंत्रित कर कोशिकाओं के कार्य के लिए उपयुक्त दशाएँ बनाए रखते हैं। निर्जीव वस्तुओं को इस प्रकार का आन्तरिक नियंत्रण बनाए रखने की आवश्यकता नहीं होती।
आकार एवं आकृति सजीव वस्तुओं की निश्चित आकृति एवं आकार होता है। निर्जीव वस्तुओं का आकार एवं आकृति अनिश्चित हो सकती है।
संगठन सजीवों में कोशिकाओं से ऊतक, ऊतकों से अंग तथा अंगों से अंग तंत्र का निर्माण होता है। निर्जीव वस्तुओं में इस प्रकार का जैविक संगठन नहीं होता है।
आवश्यकताएँ सजीवों को भोजन, पानी और हवा जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ होती हैं। निर्जीव वस्तुओं को ऐसी जैविक आवश्यकताएँ नहीं होती हैं।
श्वसन सभी सजीव श्वसन क्रिया में भाग लेते हैं। निर्जीव वस्तुओं में श्वसन क्रिया नहीं होती है।
प्रजनन सजीव अपनी जाति की निरन्तरता के लिए प्रजनन करते हैं। निर्जीव वस्तुओं में प्रजनन नहीं होता है।
जीवन-चक्र सजीवों की निश्चित आयु होती है और अन्ततः उनकी मृत्यु होती है। निर्जीव वस्तुओं का जैविक जीवन-चक्र नहीं होता है।

वायरस: सजीव एवं निर्जीव के बीच की कड़ी

वायरस को सजीव तथा निर्जीव के बीच की कड़ी माना जाता है। जब वायरस किसी सजीव के शरीर में होता है, तब वह सक्रिय होकर अपनी संख्या बढ़ाने में सक्षम होता है, जबकि सजीव शरीर से बाहर वह निर्जीव जैसी अवस्था प्रदर्शित करता है।

सजीव एवं निर्जीव में गति का अन्तर

अधिकांश जन्तु एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्वयं गति कर सकते हैं। पौधे सामान्यतः एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं, लेकिन उनमें भी वृद्धि एवं अन्य प्रकार की गतियाँ होती हैं, जैसे प्रकाश की ओर झुकना।

इसके विपरीत निर्जीव वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने के लिए बाहरी माध्यम या बल की आवश्यकता होती है।

सजीव और निर्जीव वस्तुओं के लक्षण एवं अन्तर
सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं के प्रमुख लक्षण और अन्तर
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जिन वस्तुओं में जीवन पाया जाता है उन्हें सजीव तथा जिनमें जीवन के लक्षण नहीं होते उन्हें निर्जीव कहते हैं।
  • सजीव वस्तुओं की मूल संरचनात्मक इकाई कोशिका है।
  • वृद्धि, पोषण, श्वसन, उत्सर्जन, प्रजनन, संवेदनशीलता और अनुकूलन सजीवों के प्रमुख लक्षण हैं।
  • निर्जीव वस्तुओं में कोशिका, श्वसन, प्रजनन और जैविक वृद्धि-विकास नहीं होता है।
  • वायरस को सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी माना जाता है।
Topic 2 प्राकृतिक वस्तुएँ, प्राकृतिक संसाधन एवं उनकी उपयोगिता

प्राकृतिक वस्तुएँ, प्राकृतिक संसाधन एवं उनकी उपयोगिता

प्राकृतिक वस्तुएँ (Natural Things)

वे वस्तुएँ जो हमें प्रकृति से प्राप्त होती हैं और जिनका उपयोग हम सामान्यतः बिना उनका मूल रूप बदले कर सकते हैं, प्राकृतिक वस्तुएँ अथवा प्राकृतिक संसाधन कहलाती हैं।

मिट्टी, पेड़-पौधे, खनिज, सूर्य और चन्द्रमा आदि प्राकृतिक वस्तुओं के उदाहरण हैं। हमारे दैनिक जीवन की अनेक आवश्यकताएँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों से पूरी होती हैं।

प्राकृतिक वस्तुओं का वर्गीकरण

प्राकृतिक वस्तुओं को उनके उपलब्ध रहने अथवा समाप्त होने की दृष्टि से दो भागों में बाँटा गया है—

  1. समाप्त न होने वाली वस्तुएँ— वायु, मिट्टी और ऊर्जा।
  2. समाप्त होने वाली वस्तुएँ— वन, जीव-जन्तु, खनिज, कोयला एवं पेट्रोलियम आदि।

प्रमुख प्राकृतिक संसाधन

1. हवा या वायु

वायु हमारे जीवन का अत्यन्त आवश्यक प्राकृतिक संसाधन है। मनुष्य तथा अन्य जीव श्वसन के लिए वायु का प्रयोग करते हैं। इसलिए जीवन के लिए वायु का विशेष महत्त्व है।

2. पेड़-पौधे

पेड़-पौधे भी महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन हैं। इनसे हमें अनेक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं, जैसे—

  • फल
  • फूल
  • सब्जियाँ
  • औषधियाँ
  • लकड़ी

लकड़ी का उपयोग मेज, कुर्सी, पलंग तथा अन्य प्रकार के Furniture बनाने में भी किया जाता है।

3. मृदा या मिट्टी

मिट्टी एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। इसका उपयोग घर बनाने, मिट्टी के बर्तन बनाने तथा खेती करने में किया जाता है।

4. झील, नदी एवं तालाब

झील, नदी और तालाब से प्राप्त जल हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी प्राकृतिक संसाधन है। इसका उपयोग दैनिक जीवन तथा अन्य आवश्यक कार्यों में किया जाता है।

ऊर्जा के प्राकृतिक स्रोत

कोयला, लकड़ी, पेट्रोलियम तथा जलशक्ति आदि ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं। ऊर्जा के स्रोतों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा गया है—

1. अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (Non-Renewable Energy Sources)

वे ऊर्जा स्रोत जो प्रकृति में बहुत लम्बे समय से संचित हैं और जिनका लगातार उपयोग करने पर वे समाप्त हो सकते हैं, अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत कहलाते हैं।

इसके प्रमुख उदाहरण हैं—

  • कोयला
  • पेट्रोलियम
  • प्राकृतिक गैस
2. नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (Renewable Energy Sources)

वे ऊर्जा स्रोत जिनका प्रकृति में निरन्तर उत्पादन होता रहता है और जिनका बार-बार उपयोग किया जा सकता है, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत कहलाते हैं।

इनके प्रमुख उदाहरण हैं—

  • सौर ऊर्जा
  • जल ऊर्जा
  • पवन ऊर्जा
  • समुद्रीय ऊर्जा
  • भू-तापीय ऊर्जा
नवीकरणीय और अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत
नवीकरणीय एवं अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के प्रमुख उदाहरण

कोयला एवं पेट्रोलियम

कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को जीवाश्म ईंधन कहा जाता है। ये ऊर्जा के उपयोगी प्राकृतिक स्रोत हैं।

कोयले के भंजक आसवन से अनेक उपयोगी पदार्थ प्राप्त किए जाते हैं, जैसे—

  • कोल गैस
  • अमोनिया द्रव
  • कोलतार
  • कोक

पेट्रोलियम से भी अनेक उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते हैं और आधुनिक परिवहन तथा दैनिक जीवन में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।

प्राकृतिक वस्तुओं की उपयोगिता

प्राकृतिक वस्तुओं की सहायता से मनुष्य की अनेक प्राथमिक आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। जल, वन, मिट्टी और पेट्रोलियम जैसे प्राकृतिक संसाधन हमारे दैनिक जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।

जल जीवन-यापन की मूलभूत आवश्यकता है। वन और मिट्टी से भोजन, आवास तथा विभिन्न उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। पेट्रोलियम का उपयोग विशेष रूप से वाहनों और परिवहन से सम्बन्धित कार्यों में किया जाता है।

इस प्रकार प्राकृतिक वस्तुएँ मानव जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं और दैनिक जीवन की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्रकृति से प्राप्त वस्तुओं को प्राकृतिक वस्तुएँ अथवा प्राकृतिक संसाधन कहते हैं।
  • वायु, मिट्टी, पेड़-पौधे, जल, खनिज, कोयला और पेट्रोलियम प्रमुख प्राकृतिक संसाधन हैं।
  • ऊर्जा स्रोत मुख्यतः नवीकरणीय और अनवीकरणीय दो प्रकार के होते हैं।
  • कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उदाहरण हैं।
  • सौर, जल, पवन, समुद्रीय और भू-तापीय ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत हैं।
  • कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को जीवाश्म ईंधन कहा जाता है।
Topic 3 मानव निर्मित वस्तुएँ एवं प्रमुख सामग्रियाँ

मानव निर्मित वस्तुएँ एवं प्रमुख सामग्रियाँ

मानव निर्मित वस्तुएँ (Man Made Things)

वे वस्तुएँ जिनका निर्माण मनुष्य अपनी बुद्धि, ज्ञान और कौशल का प्रयोग करके अपनी आवश्यकताओं एवं सुविधाओं के अनुसार करता है, मानव निर्मित वस्तुएँ कहलाती हैं।

कम्प्यूटर, मकान, गाड़ी, साइकिल, साबुन, कपड़ा, उर्वरक, रेशम, काँच, प्लास्टिक, चार्ट और मॉडल आदि मानव निर्मित वस्तुओं के उदाहरण हैं।

1. प्लास्टिक (Plastic)

प्लास्टिक मुख्यतः कार्बनिक यौगिकों से बना पदार्थ है। कार्बन परमाणुओं में श्रृंखला बनाने का विशेष गुण पाया जाता है। इस गुण के कारण अनेक छोटे अणु आपस में जुड़कर एक बड़े और दीर्घ अणु का निर्माण कर सकते हैं।

छोटे-छोटे अणुओं के आपस में जुड़कर बड़े अणु के निर्माण की प्रक्रिया को बहुलकीकरण (Polymerisation) कहा जाता है तथा इस प्रकार बनने वाले बड़े अणु को बहुलक (Polymer) कहते हैं।

पॉलीथीन प्लास्टिक का एक अत्यन्त प्रचलित रूप है। एथीन गैस के बहुलकीकरण द्वारा पॉलीथीन के निर्माण का उदाहरण दिया गया है।

प्लास्टिक के उपयोग

आज दैनिक जीवन में प्लास्टिक से बनी अनेक वस्तुओं का उपयोग किया जाता है, जैसे—

  • कुर्सी और मेज
  • डिब्बे और स्टूल
  • पॉलीबैग
  • पॉलीथीन की थैलियाँ
  • खाद्य एवं अन्य वस्तुओं के भण्डारण और संरक्षण की सामग्री

2. साबुन (Soap)

साबुन एक मानव निर्मित पदार्थ है। इसे वनस्पति तेल अथवा वसा की कॉस्टिक सोडा (NaOH) या कॉस्टिक पोटाश (KOH) के साथ अभिक्रिया द्वारा तैयार किया जाता है।

उच्च अणुभार वाले मोनोकार्बोक्सिलिक अम्लों के Sodium अथवा Potassium लवणों को साबुन कहा जाता है। साबुन के निर्माण की इस प्रक्रिया को साबुनीकरण (Saponification) कहते हैं।

साबुन का सामान्य रूप—

R–COONa अथवा R–COOK

साबुन के उदाहरण के रूप में C17H35COONa तथा C17H35COOK का उल्लेख किया गया है। Sodium Stearate साबुन का एक उदाहरण है।

साबुनीकरण अभिक्रिया

वसा अथवा तेल की NaOH या KOH से अभिक्रिया कराने पर ग्लिसरीन तथा साबुन प्राप्त होते हैं। इसी अभिक्रिया को साबुनीकरण कहा जाता है।

साबुन के प्रकार
  1. कठोर साबुन— इसका उपयोग मुख्यतः कपड़े धोने के लिए किया जाता है। इसके निर्माण में कॉस्टिक सोडा (NaOH) का प्रयोग अपेक्षाकृत अधिक किया जाता है।
  2. मृदु साबुन— इसका उपयोग नहाने के लिए किया जाता है। इसे कॉस्टिक पोटाश (KOH) की सहायता से बनाया जाता है तथा इसमें सुगन्धित पदार्थ भी मिलाए जा सकते हैं।
  3. पारदर्शक साबुन— सामान्य साबुन को Alcohol में घोलकर तथा Alcohol के वाष्पीकरण द्वारा पारदर्शक साबुन बनाया जाता है।
  4. कार्बोलिक साबुन— इसमें थोड़ा Phenol मिलाया जाता है। यह साबुन सफाई के कार्य में उपयोग किया जाता है।

3. मॉडल या चार्ट (Model or Chart)

शिक्षक तथा छात्र शैक्षिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विभिन्न विषयों से सम्बन्धित Model और Chart तैयार करते हैं।

इनका निर्माण प्रायः कम मूल्य वाली तथा सरलता से उपलब्ध सामग्रियों से किया जा सकता है। Model तथा Chart की सहायता से शिक्षण अधिक प्रभावशाली बनता है और विद्यार्थियों को विषयवस्तु का स्थायी ज्ञान प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

स्वनिर्मित Model और Chart तैयार करने से विद्यार्थियों में सृजनशीलता और आत्मविश्वास का भी विकास होता है।

4. कम्प्यूटर (Computer)

कम्प्यूटर एक मानव निर्मित इलेक्ट्रॉनिक युक्ति (Electronic Device) है। इसका निर्माण गणना तथा बड़ी मात्रा में सूचनाओं के संग्रह और उपयोग के लिए किया गया है।

Computer शब्द की उत्पत्ति अंग्रेजी के शब्द Compute से मानी गई है, जिसका अर्थ है—गणना करना।

कम्प्यूटर में उच्च तार्किक शक्ति तथा Memory की क्षमता होती है। यह दिए गए निर्देशों को स्वीकार करता है, उन्हें Memory में सुरक्षित रख सकता है तथा उनका क्रमबद्ध पालन कर सकता है।

सरल शब्दों में, कम्प्यूटर ऐसी इलेक्ट्रॉनिक युक्ति है जो प्राप्त सूचनाओं को दिए गए निर्देशों के अनुसार विश्लेषित करके बहुत कम समय में परिणाम प्रस्तुत करती है।

Input और Output

कम्प्यूटर में जिन क्रियाओं या सूचनाओं को आदान (Input) के रूप में दिया जाता है, उन्हें Process करके वह अपेक्षित परिणाम प्रदान (Output) करता है।

5. बेकिंग सोडा (Baking Soda)

बेकिंग सोडा का रासायनिक नाम Sodium Bicarbonate है तथा इसका रासायनिक सूत्र NaHCO3 है।

इसके निर्माण की प्रक्रिया निम्न प्रकार दी गई है—

2NaOH + CO2 → Na2CO3 + H2O

इसके बाद—

Na2CO3 + CO2 + H2O → 2NaHCO3

बेकिंग सोडा के गुणधर्म
  1. यह सफेद रंग का क्रिस्टलीय पदार्थ है और जल में अल्प मात्रा में विलेय होता है।
  2. इसका जलीय विलयन क्षारीय होता है।
  3. अम्लों के साथ अभिक्रिया करने पर लवण और जल बनते हैं तथा Carbon Dioxide गैस निकलती है।
  4. इसे गर्म करने पर यह अपघटित होकर Sodium Carbonate, Carbon Dioxide और जलवाष्प बनाता है।

उदाहरण—

NaHCO3 + HCl → NaCl + H2O + CO2

2NaHCO3 + H2SO4 → Na2SO4 + 2H2O + 2CO2

गर्म करने पर—

2NaHCO3 → Na2CO3 + H2O + CO2

बेकिंग सोडा के उपयोग
  1. प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में।
  2. झागदार पेय पदार्थ बनाने में।
  3. आग बुझाने वाले यंत्रों में।
  4. कच्चे दूध में मिलाने पर दूध को शीघ्र फटने से बचाने में।
  5. Antacid के रूप में।
  6. पेट की अम्लता (Acidity) को कम करने में।
  7. ब्रेड बनाने में।
साबुनीकरण अभिक्रिया और बेकिंग सोडा
साबुन निर्माण की साबुनीकरण प्रक्रिया एवं बेकिंग सोडा के प्रमुख गुण

अन्य मानव निर्मित सामग्रियाँ

निम्न मानव निर्मित सहायक सामग्रियों एवं उपकरणों का भी उल्लेख किया गया है—

  • रेडियो
  • टेलीविजन
  • प्रोजेक्टर
  • अमीटर, वोल्टमीटर एवं धारामापी
  • वोल्ट मीटर
  • भाप का इंजन
  • वायर गेज
  • मीटर पैमाना
  • हैण्ड लेंस
  • बैरोमीटर
  • विद्युत मोटर
  • कैमरा
  • ग्रामोफोन
  • पेरिस्कोप
  • परखनली होल्डर
  • वर्षामापी
  • सिरिंज
  • विद्युत सेल
  • इलेक्ट्रोमीटर
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मनुष्य द्वारा बुद्धि और कौशल से बनाई गई वस्तुओं को मानव निर्मित वस्तुएँ कहते हैं।
  • छोटे अणुओं के जुड़कर बड़े अणु बनाने की प्रक्रिया बहुलकीकरण तथा बने बड़े अणु को बहुलक कहते हैं।
  • तेल या वसा की NaOH/KOH से अभिक्रिया द्वारा साबुन बनाने की प्रक्रिया साबुनीकरण कहलाती है।
  • साबुन के प्रमुख प्रकार कठोर, मृदु, पारदर्शक और कार्बोलिक साबुन हैं।
  • कम्प्यूटर एक मानव निर्मित इलेक्ट्रॉनिक युक्ति है जो Input को Process करके Output प्रदान करती है।
  • बेकिंग सोडा का रासायनिक सूत्र NaHCO3 है तथा इसका उपयोग Antacid, ब्रेड निर्माण और आग बुझाने वाले यंत्रों आदि में किया जाता है।
Topic 4 पौधे एवं जन्तु: परिचय तथा पोषण के प्रकार

पौधे एवं जन्तु: परिचय तथा पोषण के प्रकार

पौधे एवं जन्तु: परिचय

पौधे और जन्तु दोनों सजीव हैं, परन्तु उनकी संरचना, भोजन प्राप्त करने की विधि तथा जीवन-क्रियाओं में अनेक अन्तर पाए जाते हैं। मानव जीवन के लिए पौधों का विशेष महत्त्व है, क्योंकि वे जीवन की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता करते हैं।

पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा भोजन बनाते हैं और इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन भी मुक्त करते हैं। यही ऑक्सीजन अन्य जीवों के जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

पादप कोशिका की कोशिका-भित्ति मुख्यतः Cellulose से बनी होती है। हरे पौधों के Chloroplast में Chlorophyll पाया जाता है, जो उनके हरे रंग तथा प्रकाश संश्लेषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पौधे लैंगिक, अलैंगिक तथा कायिक प्रजनन द्वारा अपनी संतति उत्पन्न कर सकते हैं।

पौधों एवं जन्तुओं में पोषण

प्रत्येक सजीव को वृद्धि, विकास, ऊर्जा तथा जीवन-क्रियाओं के संचालन के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने की प्रक्रिया को पोषण (Nutrition) कहा जाता है।

पौधों और जन्तुओं में भोजन प्राप्त करने की विधियाँ अलग-अलग होती हैं। पौधों में पोषण को मुख्यतः स्वपोषी और विषमपोषी रूप में तथा जन्तुओं में भोजन की प्रकृति के आधार पर शाकाहारी, माँसाहारी और सर्वाहारी रूप में समझा जाता है।

पौधों में पोषण के प्रकार

पौधों में पोषण मुख्यतः दो प्रकार का होता है—

1. स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition)

वे पौधे जो सरल अकार्बनिक पदार्थों, जैसे जल और कार्बन डाइऑक्साइड, की सहायता से सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, स्वपोषी कहलाते हैं।

हरे पौधे सूर्य से प्रकाश ऊर्जा प्राप्त करते हैं। इसलिए इन्हें प्रकाश स्वपोषी (Phototroph) भी कहा जाता है। पौधों द्वारा भोजन बनाने की इस प्रक्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं।

2. विषमपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition)

वे जीव अथवा पादप जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते और भोजन के लिए दूसरे जीवों या अन्य स्रोतों पर निर्भर रहते हैं, विषमपोषी कहलाते हैं।

इस प्रकार के पोषण को विषमपोषी पोषण कहा जाता है। इसके प्रमुख रूप निम्न हैं—

(i) मृतजीवी पोषण

मृतजीवी अपना पोषण मृत तथा सड़े-गले जैविक पदार्थों से प्राप्त करते हैं। ऐसे जीव क्षयमान कार्बनिक पदार्थों पर पाए जाते हैं और उन्हीं से पोषक पदार्थ ग्रहण करते हैं।

जीवाणु और कवक इसके प्रमुख उदाहरण हैं। Monotropa भी इसका उदाहरण है।

(ii) परजीवी पोषण

वे जीव या पादप जो अपना भोजन किसी दूसरे जीव से प्राप्त करते हैं, परजीवी कहलाते हैं।

परजीवी भोजन के लिए अपने पोषक जीव पर निर्भर रहता है। अमरबेल अथवा आकाशबेल (Cuscuta/Dodder) इसका प्रमुख उदाहरण है।

(iii) कीटाहारी / कीटभक्षी पौधे

वे पौधे जो छोटे-छोटे कीटों को अपनी ओर आकर्षित करके पकड़ते और उनका पाचन करते हैं, कीटाहारी या कीटभक्षी पौधे कहलाते हैं।

ऐसे पौधे प्रायः उन स्थानों पर पाए जाते हैं जहाँ मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी होती है।

प्रमुख उदाहरण—

  • नेपेन्थीस (घटपर्णी)
  • सनड्यू
  • वीनस फ्लाई ट्रैप
  • ब्लैडरवर्ट

जन्तुओं में पोषण के प्रकार

जन्तु अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते। वे भोजन के लिए पौधों, अन्य जन्तुओं अथवा दोनों पर निर्भर रहते हैं। भोजन की प्रकृति के आधार पर जन्तुओं को मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जाता है।

1. शाकाहारी (Herbivorous)

वे जन्तु जो भोजन के रूप में मुख्यतः पेड़-पौधों अथवा उनके भागों का सेवन करते हैं, शाकाहारी जन्तु कहलाते हैं।

उदाहरण— गाय, भैंस और बकरी।

2. माँसाहारी (Carnivorous)

वे जन्तु जो भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं और उनका माँस खाते हैं, माँसाहारी जन्तु कहलाते हैं।

उदाहरण— शेर, बाघ, छिपकली और मेंढक।

3. सर्वाहारी (Omnivorous)

वे जन्तु जो पौधों तथा जन्तुओं दोनों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं, सर्वाहारी जन्तु कहलाते हैं।

उदाहरण— कौआ, भालू, कुत्ता, बिल्ली और मनुष्य।

पौधों और जन्तुओं में पोषण के प्रकार
पौधों एवं जन्तुओं में पोषण के प्रमुख प्रकार

पौधों और जन्तुओं के पोषण में मुख्य अन्तर

आधार पौधे जन्तु
भोजन निर्माण हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बना सकते हैं। जन्तु अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते हैं।
निर्भरता स्वपोषी पौधे जल, कार्बन डाइऑक्साइड और सूर्य के प्रकाश का उपयोग करते हैं। कुछ पौधे विषमपोषी भी होते हैं। जन्तु भोजन के लिए पौधों, अन्य जन्तुओं अथवा दोनों पर निर्भर रहते हैं।
प्रमुख प्रकार स्वपोषी और विषमपोषी। शाकाहारी, माँसाहारी और सर्वाहारी।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • भोजन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने की प्रक्रिया को पोषण कहते हैं।
  • पौधों में पोषण मुख्यतः स्वपोषी और विषमपोषी दो प्रकार का होता है।
  • हरे पौधे सूर्य के प्रकाश में जल और कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं।
  • मृतजीवी, परजीवी और कीटाहारी पोषण विषमपोषी पोषण के प्रमुख रूप हैं।
  • अमरबेल परजीवी तथा नेपेन्थीस, सनड्यू, वीनस फ्लाई ट्रैप और ब्लैडरवर्ट कीटाहारी पौधों के उदाहरण हैं।
  • जन्तु भोजन के आधार पर शाकाहारी, माँसाहारी और सर्वाहारी तीन प्रमुख वर्गों में बाँटे जाते हैं।
Topic 5 पौधों एवं जन्तुओं में समानताएँ एवं विभिन्नताएँ

पौधों एवं जन्तुओं में समानताएँ एवं विभिन्नताएँ

पौधों एवं जन्तुओं में समानताएँ

पौधे और जन्तु दोनों सजीव होते हैं। यद्यपि उनकी संरचना तथा जीवन-शैली में अनेक अन्तर पाए जाते हैं, फिर भी उनमें भोजन, श्वसन, वृद्धि, गति, प्रजनन, उत्सर्जन और संवेदनशीलता जैसी अनेक समान जीवन-क्रियाएँ होती हैं।

1. भोजन (Food)

पौधों और जन्तुओं दोनों को ऊर्जा प्राप्त करने तथा जीवन-क्रियाओं को चलाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है।

जन्तु पौधों या अन्य जन्तुओं से भोजन प्राप्त करते हैं, जबकि हरे पौधे मिट्टी से जल एवं पोषक तत्व लेकर सूर्य के प्रकाश की सहायता से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।

कुछ पौधे अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते और सड़े-गले पदार्थों या अन्य जीवों से पोषण प्राप्त करते हैं। उदाहरण के रूप में कुकुरमुत्ता तथा परजीवी पौधों का उल्लेख किया गया है।

2. श्वसन (Respiration)

पौधों और जन्तुओं दोनों में श्वसन क्रिया होती है। श्वसन की सहायता से जीवों को भोजन से ऊर्जा प्राप्त होती है।

जन्तुओं में श्वसन के लिए विभिन्न अंग पाए जाते हैं, जबकि पौधों में गैसीय आदान-प्रदान के लिए पत्तियों की सतह पर छोटे-छोटे छिद्र पाए जाते हैं जिन्हें रन्ध्र (Stomata) कहा जाता है।

3. उत्सर्जन (Excretion)

पौधे और जन्तु दोनों अपने शरीर में बनने वाले अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालते हैं। इस प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं।

पौधे अपनी पुरानी छाल, पत्तियाँ और शाखाएँ अलग करके भी कुछ अपशिष्ट पदार्थों को बाहर करते हैं, जबकि जन्तु अपने शरीर से विभिन्न अपशिष्ट पदार्थों का नियमित उत्सर्जन करते हैं।

4. वृद्धि (Growth)

पौधे और जन्तु दोनों में वृद्धि होती है। पौधों में नई पत्तियाँ, शाखाएँ, फूल और फल बनते हैं, जबकि जन्तुओं के शरीर का आकार आयु के साथ बढ़ता है।

जन्तुओं की वृद्धि सामान्यतः एक निश्चित आयु तक होती है।

5. गति (Movement)

पौधे और जन्तु दोनों किसी न किसी रूप में गति करते हैं।

पौधों में गति बहुत धीमी होती है। उदाहरण के लिए वे प्रकाश की दिशा की ओर झुक सकते हैं। जन्तु सामान्यतः एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा सकते हैं, जैसे पक्षी उड़ते हैं, साँप रेंगते हैं और घोड़े दौड़ते हैं।

6. प्रजनन (Reproduction)

पौधे और जन्तु दोनों अपनी जाति की निरन्तरता बनाए रखने के लिए प्रजनन करते हैं।

पौधे नए बीज बनाकर नई संतति उत्पन्न करते हैं, जबकि जन्तु अपनी जैसी नई संतति पैदा करके अपनी जाति को आगे बढ़ाते हैं।

7. संवेदनशीलता (Sensitivity)

पौधे और जन्तु दोनों अपने वातावरण के प्रति संवेदनशील होते हैं तथा बाहरी उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं।

पौधे प्रकाश तथा अन्य प्रभावों के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं, जबकि जन्तुओं में ज्ञानेंद्रियाँ पाई जाती हैं जिनकी सहायता से वे वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को अनुभव करते हैं।

पौधों एवं जन्तुओं में विभिन्नताएँ

पौधे और जन्तु दोनों सजीव होने के बावजूद गति, पोषण, श्वसन, कोशिकीय संरचना तथा संवेदनशीलता के आधार पर एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।

आधार पौधे जन्तु
गति पौधे सामान्यतः एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं और एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्वतंत्र रूप से नहीं जा सकते। अधिकांश जन्तु एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्वतंत्र रूप से गति कर सकते हैं।
पोषण हरे पौधों में Chlorophyll पाया जाता है और वे सामान्यतः अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। जन्तु अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते तथा भोजन के लिए पौधों या अन्य जन्तुओं पर निर्भर रहते हैं।
श्वसन पौधों में गैसीय आदान-प्रदान के लिए पत्तियों के रन्ध्र आदि संरचनाएँ सहायक होती हैं। जन्तुओं में श्वसन के लिए शरीर की बनावट के अनुसार विशिष्ट अंग पाए जाते हैं।
संरचना पादप कोशिकाओं में कोशिका-भित्ति पाई जाती है। जन्तु कोशिकाओं में कोशिका-भित्ति नहीं पाई जाती और उनकी कोशिकीय संरचना पौधों से भिन्न होती है।
संवेदनशीलता पौधों में संवेदना अथवा प्रतिक्रिया की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है। जन्तुओं में अधिक विकसित संवेदी तथा तंत्रिका तंत्र पाया जाता है।
पौधों और जन्तुओं में समानताएँ एवं विभिन्नताएँ
पौधों एवं जन्तुओं की प्रमुख समानताएँ और विभिन्नताएँ
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पौधे और जन्तु दोनों सजीव हैं तथा भोजन, श्वसन, उत्सर्जन, वृद्धि, गति, प्रजनन और संवेदनशीलता जैसी जीवन-क्रियाएँ करते हैं।
  • हरे पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, जबकि जन्तु भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं।
  • पौधे सामान्यतः एक स्थान पर स्थिर रहते हैं, जबकि अधिकांश जन्तु स्वतंत्र रूप से स्थान परिवर्तन कर सकते हैं।
  • पादप कोशिकाओं में कोशिका-भित्ति होती है, जबकि जन्तु कोशिकाओं में कोशिका-भित्ति नहीं होती।
  • जन्तुओं में संवेदी तथा तंत्रिका तंत्र पौधों की तुलना में अधिक विकसित होता है।
Topic 6 अनुकूलन: अर्थ, आवश्यकता एवं वातावरणीय अनुकूलन

अनुकूलन: अर्थ, आवश्यकता एवं वातावरणीय अनुकूलन

अनुकूलन (Adaptation)

अनुकूलन शब्द लैटिन शब्द Adaptare से लिया गया है, जिसका अर्थ है—योग्य बनाना

अनुकूलन वह विशेष गुण या परिवर्तन है जो किसी पौधे या जन्तु को किसी विशेष स्थान अथवा निवास-क्षेत्र में रहने योग्य बनाता है। अलग-अलग वातावरण में रहने वाले जीवों में उनकी परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग प्रकार के अनुकूलन पाए जाते हैं।

उदाहरण के लिए रेगिस्तानी पौधों की विशेषताएँ समुद्री अथवा पर्वतीय क्षेत्रों के पौधों से भिन्न होती हैं, क्योंकि प्रत्येक क्षेत्र की जलवायु, जल की उपलब्धता, तापमान तथा अन्य परिस्थितियाँ अलग होती हैं।

अनुकूलन की आवश्यकता एवं महत्त्व

प्रत्येक जीव को जीवित रहने के लिए अपने पर्यावरण की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए अनुकूलन जीवों के अस्तित्व और विकास के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

अनुकूलन जीवों को—

  • विशेष निवास-स्थान में जीवित रहने योग्य बनाता है।
  • भोजन एवं अन्य आवश्यक संसाधन प्राप्त करने में सहायता करता है।
  • प्रतिकूल वातावरण का सामना करने में सक्षम बनाता है।
  • अपनी संतति को बनाए रखने और प्रजनन में सहायता करता है।

वातावरणीय अनुकूलन (Environmental Adaptation)

सूक्ष्म जीवों से लेकर पौधों और जन्तुओं तक सभी जीव किसी-न-किसी पर्यावरण में रहते हैं। उन्हें अपने वातावरण के अनुसार सूखे, गर्म, ठंडे अथवा अधिक आर्द्र क्षेत्रों में जीवित रहने के लिए विभिन्न परिवर्तन करने पड़ते हैं।

किसी पौधे या जन्तु में पाया जाने वाला वह परिवर्तन या विशेषता, जिसके कारण वह किसी विशिष्ट वातावरण में अपना अस्तित्व बनाए रखने और संतति उत्पन्न करने में सक्षम होता है, वातावरणीय अनुकूलन कहलाता है।

ये परिवर्तन जीव की शारीरिक बनावट अथवा व्यवहार से सम्बन्धित हो सकते हैं। इस प्रकार अनुकूलन जीव को अपने पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सहायता करता है।

पर्वतीय क्षेत्रों में पौधों एवं जन्तुओं का अनुकूलन

पर्वतीय क्षेत्रों में परिस्थितियाँ तेजी से बदलती रहती हैं। वहाँ कठोर जलवायु, कम तापमान, बर्फ, ऊँचाई तथा भोजन की सीमित उपलब्धता पौधों और जन्तुओं के लिए कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।

इन परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए पर्वतीय क्षेत्रों के पौधों एवं जन्तुओं में अनेक विशेष अनुकूलन विकसित होते हैं।

पर्वतीय पौधों में अनुकूलन

पर्वतीय क्षेत्रों में बसन्त और गर्मी का समय सीमित होता है। इसके बाद ठंड बढ़ने लगती है और पर्वत-श्रृंखलाएँ बर्फ से ढक जाती हैं। इसलिए पौधों को कम समय में अपने जीवन की आवश्यक क्रियाएँ पूरी करनी पड़ती हैं।

पर्वतीय पौधों की प्रमुख आवश्यकताएँ निम्न हैं—

  • भोजन का संग्रह करना।
  • नमी का संग्रह करना।
  • ऊर्जा का संग्रह करना।
  • पर्वतीय परिस्थितियों में वृद्धि करने के लिए अनुकूलित होना।
पर्वतीय जन्तुओं में अनुकूलन

पर्वतीय क्षेत्रों के जन्तुओं को सर्दियों के महीनों में अत्यधिक ठंड और भोजन की कमी का सामना करना पड़ता है। इसलिए वे ऐसी परिस्थितियों के अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन करते हैं।

कुछ पर्वतीय जन्तु सर्दियों में लंबे समय तक शीत निष्क्रियता (Hibernation) में चले जाते हैं। इससे वे अत्यधिक ठंड और भोजन की कमी के समय ऊर्जा की बचत कर पाते हैं।

उदाहरण— Alpine Marmot सर्दियों में ठंड से बचने के लिए वर्ष के लगभग नौ महीने तक Hibernation कर सकता है।

पर्वतीय क्षेत्रों में पौधों एवं जन्तुओं का वातावरणीय अनुकूलन
पर्वतीय वातावरण में पौधों एवं जन्तुओं के प्रमुख अनुकूलन

अनुकूलन का सार

अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण जीवों में अलग-अलग प्रकार के गुण विकसित होते हैं। यही गुण उन्हें अपने निवास-स्थान में जीवित रहने, भोजन प्राप्त करने, प्रतिकूल परिस्थितियों से बचने और अपनी संतति को आगे बढ़ाने में सहायता करते हैं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अनुकूलन का अर्थ किसी जीव को विशेष स्थान या निवास में रहने योग्य बनाने वाला गुण या परिवर्तन है।
  • अनुकूलन जीवों को वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीवित रहने और प्रजनन में सहायता करता है।
  • वातावरणीय अनुकूलन शारीरिक बनावट अथवा व्यवहार से सम्बन्धित हो सकता है।
  • पर्वतीय पौधे भोजन, नमी और ऊर्जा के संग्रह के लिए अनुकूलित होते हैं।
  • कुछ पर्वतीय जन्तु अत्यधिक ठंड से बचने के लिए शीत निष्क्रियता (Hibernation) करते हैं।
Topic 7 जन्तुओं में अनुकूलन के प्रकार

जन्तुओं में अनुकूलन के प्रकार

जन्तुओं में अनुकूलन

जन्तुओं को अपने निवास-स्थान की जलवायु, भोजन, जल की उपलब्धता तथा अन्य परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना पड़ता है। इसके कारण उनके शरीर, व्यवहार अथवा जीवन-क्रियाओं में ऐसे परिवर्तन दिखाई देते हैं जो उन्हें अपने वातावरण में जीवित रहने में सहायता करते हैं।

जन्तुओं के अनुकूलन को मुख्यतः तीन प्रकारों में बाँटा गया है—

  1. बाह्य/शारीरिक अनुकूलन
  2. मनोवैज्ञानिक अनुकूलन
  3. व्यवहारात्मक अनुकूलन

1. बाह्य/शारीरिक अनुकूलन (External/Physical Adaptation)

जब किसी जन्तु के बाहरी अंगों अथवा शरीर की बनावट में ऐसे परिवर्तन हो जाते हैं जो उसे कठिन परिस्थितियों का सामना करने में सहायता करें, तो इसे बाह्य अथवा शारीरिक अनुकूलन कहते हैं।

ऐसे परिवर्तन पानी और ऑक्सीजन की कमी, अत्यधिक ठंड, विपरीत वातावरण तथा अन्य कठिन परिस्थितियों से बचने में सहायक होते हैं।

इस प्रकार के अनुकूलन में जन्तु के हाथ, पैर, नाक, कान, त्वचा अथवा शरीर के अन्य बाहरी अंगों में परिवर्तन देखा जा सकता है।

बाह्य/शारीरिक अनुकूलन के उदाहरण
  • जिराफ की लम्बी गर्दन— जिराफ की लम्बी गर्दन उसे ऊँचे स्थानों पर उपलब्ध भोजन तक पहुँचने में सहायता करती है।
  • ऊँट का कूबड़— ऊँट के शरीर में विकसित कूबड़ मरुस्थलीय जीवन के लिए उसके शारीरिक अनुकूलन का उदाहरण है।
  • ध्रुवीय भालू का फर— ध्रुवीय भालू के शरीर पर घना फर अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्र में जीवित रहने में सहायता करता है।

2. मनोवैज्ञानिक अनुकूलन (Psychological Adaptation)

कुछ जन्तुओं में सीखने, संकेत देने अथवा परिस्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया करने से सम्बन्धित ऐसे व्यवहार पाए जाते हैं जिन्हें मनोवैज्ञानिक अनुकूलन के अन्तर्गत रखा गया है।

इन अनुकूलनों की सहायता से जीव खतरे को पहचानने, एक-दूसरे को सूचना देने तथा शिकारियों से बचने में सक्षम होते हैं।

मनोवैज्ञानिक अनुकूलन के उदाहरण
  • बन्दरों में कुछ भावनात्मक तथा सामाजिक व्यवहार मनुष्य के व्यवहार से मिलते-जुलते पाए जाते हैं।
  • वर्वेट बन्दर विभिन्न प्रकार की आवाजों का प्रयोग करके एक-दूसरे को शिकारी के आने की चेतावनी देते हैं।
  • गिरगिट अपने परिवेश के अनुरूप स्वयं को ढालकर आसानी से दिखाई न देने तथा शिकारियों से बचने में सहायता प्राप्त करता है।

3. व्यवहारात्मक अनुकूलन (Behavioural Adaptation)

जब किसी जीव के शरीर में कोई नई बाहरी संरचना विकसित होने के बजाय वह अपने व्यवहार में परिवर्तन करके वातावरण के अनुकूल होता है, तो इसे व्यवहारात्मक अनुकूलन कहते हैं।

इसमें जीव मौसम, तापमान, भोजन की उपलब्धता तथा अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार अपने रहने, चलने, सोने या स्थान बदलने के तरीके में परिवर्तन करता है।

प्रवास (Migration)

कुछ जीव प्रतिकूल मौसम या अन्य परिस्थितियों से बचने के लिए एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र की ओर चले जाते हैं। इस स्थान परिवर्तन को प्रवास (Migration) कहते हैं।

साइबेरियन क्रेन हजारों मील की यात्रा करके साइबेरिया से राजस्थान तक पहुँचती है।

शीत निष्क्रियता (Hibernation)

कुछ जीव अत्यधिक ठंड के समय अपनी गतिविधियाँ बहुत कम कर देते हैं और लम्बे समय तक निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं। इसे शीत निष्क्रियता कहते हैं।

उदाहरण के लिए भालू सर्दियों के मौसम में अधिक समय तक सोता है।

ग्रीष्म निष्क्रियता (Aestivation)

कुछ जीव अत्यधिक गर्मी से बचने के लिए गर्म मौसम में निष्क्रिय अवस्था में चले जाते हैं। इस अवस्था को ग्रीष्म निष्क्रियता कहा जाता है।

समय के अनुसार सक्रियता

कुछ जीव अपने वातावरण के तापमान के अनुसार अपनी सक्रियता का समय बदल लेते हैं। मरुस्थलीय क्षेत्रों के कुछ जीव दिन की गर्मी से बचने के लिए रात में सक्रिय होते हैं।

साँप गर्म क्षेत्रों में प्रायः बिलों से रात के समय बाहर निकलता है।

जन्तुओं में अनुकूलन के प्रकार
जन्तुओं में बाह्य, मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहारात्मक अनुकूलन

जन्तु अनुकूलन के तीनों प्रकारों में अन्तर

अनुकूलन का प्रकार मुख्य विशेषता उदाहरण
बाह्य/शारीरिक शरीर अथवा बाहरी अंगों की बनावट में परिवर्तन जिराफ की लम्बी गर्दन, ऊँट का कूबड़, ध्रुवीय भालू का फर
मनोवैज्ञानिक सीखने, संकेत देने या परिस्थिति के प्रति विशेष प्रतिक्रिया से सम्बन्धित अनुकूलन वर्वेट बन्दर की चेतावनी देने वाली आवाजें
व्यवहारात्मक वातावरण के अनुसार व्यवहार या गतिविधि में परिवर्तन प्रवास, शीत निष्क्रियता, ग्रीष्म निष्क्रियता
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जन्तुओं में अनुकूलन मुख्यतः बाह्य/शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और व्यवहारात्मक तीन प्रकार का बताया गया है।
  • बाह्य/शारीरिक अनुकूलन में शरीर या बाहरी अंगों की बनावट में उपयोगी परिवर्तन होते हैं।
  • जिराफ की लम्बी गर्दन, ऊँट का कूबड़ और ध्रुवीय भालू का फर शारीरिक अनुकूलन के उदाहरण हैं।
  • वर्वेट बन्दर द्वारा अलग-अलग आवाजों से खतरे की चेतावनी देना मनोवैज्ञानिक अनुकूलन का उदाहरण है।
  • प्रवास, शीत निष्क्रियता और ग्रीष्म निष्क्रियता व्यवहारात्मक अनुकूलन के प्रमुख उदाहरण हैं।
Topic 8 विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में जन्तु अनुकूलन

विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में जन्तु अनुकूलन

विभिन्न प्राकृतिक परिस्थितियों में जन्तु अनुकूलन

पृथ्वी पर गर्मी, सर्दी, वर्षा, सूखा तथा जल की उपलब्धता जैसी प्राकृतिक परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। इन परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए जन्तुओं में उनके निवास-स्थान के अनुसार विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।

1. रेगिस्तानी क्षेत्रों में जन्तु अनुकूलन

रेगिस्तान में रहने वाले जीवों को मुख्य रूप से पानी की कमी और अधिक तापमान का सामना करना पड़ता है। इसलिए उनमें जल की बचत, गर्मी से सुरक्षा तथा भोजन प्राप्त करने से सम्बन्धित विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।

रेगिस्तानी जीवों के प्रमुख अनुकूलन
  • कंगारू चूहा तथा साँप जैसे जीव बिलों में रहते हैं, जहाँ तापमान बाहरी वातावरण की तुलना में अधिक स्थिर रहता है।
  • ऐसे जीव प्रायः दिन में बिलों में रहते हैं और रात में भोजन या शिकार के लिए बाहर निकलते हैं।
  • बिच्छू तथा मकड़ियों के शरीर पर मोटा बाहरी आवरण पाया जाता है, जो शरीर की नमी को बनाए रखने में सहायता करता है।
  • रेगिस्तानी जीवों के गुर्दे मूत्र को अधिक गाढ़ा बनाते हैं, जिससे शरीर से कम जल बाहर निकलता है।
ऊँट में अनुकूलन

ऊँट को रेगिस्तान का प्रमुख अनुकूलित जन्तु माना जाता है। इसके निम्न अनुकूलन हैं—

  1. ऊँट के कूबड़ में वसा संचित रहती है, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।
  2. इसके पैर चौड़े होते हैं, जिससे यह रेत पर आसानी से चल सकता है।
  3. इसके होंठ मोटे होते हैं, जिससे यह काँटेदार पौधों को भी खा सकता है।
  4. इसकी त्वचा का रंग रेत के समान होता है, जिससे यह वातावरण में आसानी से घुल-मिल जाता है।
  5. इसकी नाक छोटी होती है तथा कानों में बाल पाए जाते हैं, जो रेत और धूल से सुरक्षा प्रदान करते हैं।

2. उष्णकटिबंधीय घासभूमि (सवाना) में जन्तु अनुकूलन

उष्णकटिबंधीय घासभूमि में रहने वाले जीवों को भोजन प्राप्त करने के लिए तेज गति, शक्ति तथा विशेष शिकार-व्यवहार की आवश्यकता होती है।

प्रमुख उदाहरण
  • चीता— बहुत तेज गति से दौड़ने में सक्षम होता है। इसकी गति लगभग 80 मील प्रति घंटा बताई गई है।
  • शेर— धीरे-धीरे और घात लगाकर शिकार करता है।
  • हायना— समूह में शिकार करने का व्यवहार प्रदर्शित करता है।
  • जिराफ— एक बार में बड़ी मात्रा में पानी पी सकता है और पत्तियों पर जमा ओस से भी जल प्राप्त कर सकता है।
  • छिपकली— शिकारी के आक्रमण के समय अपनी पूँछ काटकर गिरा सकती है, जिससे शिकारी भ्रमित हो जाता है।

3. आर्कटिक क्षेत्रों में जन्तु अनुकूलन

आर्कटिक क्षेत्र अत्यधिक ठंडे और बर्फ से ढके होते हैं। वहाँ रहने वाले जीवों में शरीर की ऊष्मा बनाए रखने तथा बर्फ पर चलने या जल में तैरने के लिए विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।

ध्रुवीय भालू

ध्रुवीय भालू अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों में रहता है। इसके शरीर में—

  • त्वचा के नीचे वसा की मोटी परत होती है।
  • शरीर के ऊपर घना फर होता है।
  • पैर चौड़े होते हैं, जो बर्फ पर चलने में सहायता करते हैं।
पेंगुइन

पेंगुइन ठंडे क्षेत्र में रहने वाला ऐसा पक्षी है जो उड़ने के स्थान पर तैरने के लिए अधिक अनुकूलित होता है। इसके पैर झिल्लीदार होते हैं, जिससे जल में तैरना सरल होता है।

4. उभयचर क्षेत्रों में जन्तु अनुकूलन

वे जीव जो जल और स्थल दोनों स्थानों पर निवास करते हैं, उनमें दोनों प्रकार के वातावरण के अनुसार विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।

मेंढक में अनुकूलन
  • मेंढक में शिकार को निगलने में सहायता देने वाली विशेष शारीरिक बनावट पाई जाती है।
  • स्थल पर वह त्वचा द्वारा श्वसन कर सकता है।
  • जल में श्वसन के लिए गलफड़ों का प्रयोग किया जाता है।
  • इसकी आँखों की संरचना बड़े शिकार को निगलने में भी सहायता करती है।

Dyeing Poison Tree Frog के चमकीले रंग शिकारियों को चेतावनी देने का कार्य करते हैं। इसकी उँगलियों तथा पैरों की उँगलियों में चिपकने वाली संरचनाएँ होती हैं, जिनसे यह चढ़ने में सक्षम होता है।

मेंढक, मगरमच्छ, घोंघा और सीप आदि ऐसे जीवों के उदाहरण हैं जिनमें जल तथा स्थल से सम्बन्धित अनुकूलन पाए जाते हैं।

5. वायवीय जीवों में अनुकूलन

वायवीय जीवों में उड़ने तथा वातावरण में सक्रिय रहने के लिए विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं। पक्षियों में उड़ने की क्षमता उनके प्रमुख अनुकूलनों में से एक है।

रात्रिचर जीवों में रात के समय देखने अथवा एक-दूसरे की उपस्थिति पहचानने से सम्बन्धित विशेषताएँ भी पाई जाती हैं।

जुगनू, चमगादड़ और उल्लू ऐसे जीवों के उदाहरण हैं जिनमें रात के वातावरण के अनुसार विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।

विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में जन्तु अनुकूलन
विभिन्न प्राकृतिक परिस्थितियों में जन्तुओं के प्रमुख अनुकूलन

विभिन्न क्षेत्रों के जन्तु अनुकूलन एक नजर में

क्षेत्र प्रमुख जन्तु मुख्य अनुकूलन
रेगिस्तान ऊँट, कंगारू चूहा, साँप जल संरक्षण, बिल में रहना, चौड़े पैर, मोटे होंठ
सवाना चीता, शेर, हायना, जिराफ तेज गति, घात लगाना, समूह में शिकार, जल प्राप्त करने के विशेष तरीके
आर्कटिक ध्रुवीय भालू, पेंगुइन मोटी वसा, घना फर, चौड़े या झिल्लीदार पैर
उभयचर क्षेत्र मेंढक आदि जल और स्थल दोनों के अनुकूल श्वसन तथा शरीर की संरचना
वायवीय पक्षी, चमगादड़, उल्लू उड़ना तथा दिन/रात्रि के अनुसार सक्रियता
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • रेगिस्तानी जन्तुओं में जल संरक्षण और अधिक तापमान से बचने के विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।
  • ऊँट का कूबड़, चौड़े पैर और मोटे होंठ उसके रेगिस्तानी अनुकूलन के प्रमुख उदाहरण हैं।
  • सवाना क्षेत्र में चीता तेज गति तथा शेर घात लगाकर शिकार करने के लिए अनुकूलित है।
  • ध्रुवीय भालू में मोटी वसा, घना फर और चौड़े पैर ठंडे क्षेत्रों के अनुकूलन हैं।
  • उभयचर जीव जल और स्थल दोनों के अनुसार अनुकूलन प्रदर्शित करते हैं।
  • वायवीय जीवों में उड़ने और दिन अथवा रात के अनुसार सक्रिय रहने से सम्बन्धित अनुकूलन पाए जाते हैं।
Topic 9 पौधों में वातावरणीय अनुकूलन एवं अनुकूलन के प्रकार

पौधों में वातावरणीय अनुकूलन एवं अनुकूलन के प्रकार

पौधों में वातावरणीय अनुकूलन

पौधों को अलग-अलग क्षेत्रों में जीवित रहने और वृद्धि करने के लिए अपने वातावरण के अनुसार अनुकूलित होना पड़ता है। किसी पौधे में पाया जाने वाला ऐसा विशेष गुण या परिवर्तन, जो उसे किसी विशेष स्थान या निवास में जीवित रहने में सहायता करता है, पादप अनुकूलन कहलाता है।

अलग-अलग क्षेत्रों की जलवायु, जल की उपलब्धता, तापमान और मिट्टी की परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं। इसलिए सभी प्रकार के पौधे प्रत्येक स्थान पर समान रूप से नहीं पाए जाते।

उदाहरण के लिए रेगिस्तानी पौधे कम जल में जीवित रहने के लिए अनुकूलित होते हैं, जबकि समुद्री शैवाल जल के भीतर के वातावरण के अनुसार अनुकूलित होते हैं। कुछ पौधों में काँटे तथा अन्य रक्षा संरचनाएँ भी विकसित होती हैं, जो उन्हें अन्य जीवों से सुरक्षा प्रदान करती हैं।

वनस्पति अनुकूलन के उदाहरण

पौधों में अनुकूलन केवल जीवित रहने के लिए ही नहीं, बल्कि भोजन प्राप्त करने, जल एवं पोषक तत्व ग्रहण करने, प्रजनन करने तथा स्वयं की रक्षा करने के लिए भी पाया जाता है।

फूलों के चमकीले रंग तथा मधुरस विभिन्न परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं। कुछ मीठे फल पक्षियों एवं अन्य जीवों को आकर्षित करते हैं, जो बीजों को दूसरे स्थानों तक पहुँचाने में सहायता करते हैं।

कुछ पौधों में मौसम के अनुसार विशेष व्यवहार भी दिखाई देता है। ये अनुकूलन पौधों को प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना अस्तित्व बनाए रखने में सहायता करते हैं।

पौधों में अनुकूलन के प्रकार

पौधों के अनुकूलन को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है—

  1. संरचनात्मक अनुकूलन
  2. व्यवहारात्मक अनुकूलन
  3. शारीरिक अनुकूलन

1. संरचनात्मक अनुकूलन (Structural Adaptation)

जब पौधे की बाहरी संरचना या उसके विभिन्न अंगों में ऐसे परिवर्तन पाए जाते हैं जो उसे भोजन, जल, पोषण, प्रजनन अथवा सुरक्षा में सहायता करते हैं, तो इसे संरचनात्मक अनुकूलन कहा जाता है।

(i) भोजन प्राप्त करने हेतु अनुकूलन

पौधों की पत्तियाँ और तना सूर्य के प्रकाश की सहायता से भोजन निर्माण में भाग लेते हैं। इस प्रकार इन अंगों की संरचना भोजन प्राप्त करने और निर्माण करने के लिए महत्त्वपूर्ण होती है।

(ii) प्रजनन हेतु अनुकूलन

अनेक पौधों में चमकीले रंग के फूल तथा मधुरस पाया जाता है। ये पक्षियों, तितलियों और कीटों जैसे परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं।

कुछ पौधों के मीठे फल भी जीवों को आकर्षित करते हैं। ये जीव फलों या बीजों को दूसरे स्थानों तक ले जाकर बीजों के प्रसार में सहायता करते हैं। कुछ बीज वायु के माध्यम से भी फैलते हैं।

(iii) जल एवं पोषण प्राप्त करने हेतु अनुकूलन

पौधों की जड़ें मिट्टी से जल और पोषक तत्व प्राप्त करती हैं तथा उन्हें पौधे के विभिन्न भागों तक पहुँचाने में सहायता करती हैं।

(iv) प्रतिरक्षा हेतु अनुकूलन

कई पौधों में काँटे तथा शूल जैसी संरचनाएँ विकसित होती हैं, जो उन्हें शाकाहारी जन्तुओं से बचाती हैं।

Poison Ivy और Poison Oak जैसे पौधों में ऐसे पदार्थ पाए जाते हैं जो छूने पर खुजली या जलन उत्पन्न कर सकते हैं।

2. व्यवहारात्मक अनुकूलन (Behavioural Adaptation)

जब पौधे परिस्थितियों के अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन करके वातावरण से सामंजस्य स्थापित करते हैं, तो इसे व्यवहारात्मक अनुकूलन कहा जाता है।

(i) भोजन प्राप्त करने हेतु व्यवहारात्मक अनुकूलन

पौधे प्रकाश की दिशा में बढ़ते हैं। उनकी जड़ें मिट्टी के भीतर नीचे की ओर तथा लताएँ सूर्य का प्रकाश प्राप्त करने के लिए ऊपर की ओर बढ़ती हैं।

वीनस फ्लाई ट्रैप जैसे पौधे भोजन प्राप्त करने के लिए कीटों को अपने जाल में फँसा लेते हैं।

(ii) जल एवं पोषण हेतु व्यवहारात्मक अनुकूलन

कुछ रेगिस्तानी पौधे कई महीनों तक निष्क्रिय अवस्था में रह सकते हैं और वर्षा होने पर पुनः सक्रिय हो जाते हैं।

(iii) प्रजनन हेतु व्यवहारात्मक अनुकूलन

विभिन्न पौधे अपनी नई संतति के प्रसार के लिए बीजों को गिराते अथवा अलग-अलग माध्यमों से फैलाते हैं।

3. शारीरिक अनुकूलन (Physiological Adaptation)

शारीरिक अनुकूलन पौधे के भीतर होने वाली ऐसी आन्तरिक प्रक्रिया है, जो उसके जीवित रहने की संभावना को बढ़ाती है।

इस प्रकार के अनुकूलन में पौधे के भीतर ऐसी जैविक क्रियाएँ होती हैं जो उसे प्रतिकूल परिस्थितियों से बचने में सहायता करती हैं।

शारीरिक अनुकूलन के प्रमुख उदाहरण
  • कुछ पौधे अपनी रक्षा के लिए विषैले पदार्थ उत्पन्न करते हैं। Nightshade Plant इसका उदाहरण है।
  • कुछ पौधों में पत्तियाँ न होने पर तने प्रकाश संश्लेषण का कार्य करते हैं।
  • कुछ पौधों में रात के समय ठंड होने पर फूल खिलते हैं।
  • पौधे Antibiotics अथवा कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्राप्त कर सकते हैं।
पौधों में अनुकूलन के प्रकार
पौधों में संरचनात्मक, व्यवहारात्मक एवं शारीरिक अनुकूलन

पौधों के तीनों अनुकूलनों में अन्तर

अनुकूलन का प्रकार मुख्य विशेषता उदाहरण
संरचनात्मक अनुकूलन पौधे के अंगों या बाहरी संरचना में उपयोगी विशेषताएँ काँटे, जड़ें, फूलों के चमकीले रंग
व्यवहारात्मक अनुकूलन परिस्थितियों के अनुसार पौधे के व्यवहार में परिवर्तन प्रकाश की ओर बढ़ना, निष्क्रिय अवस्था, बीज प्रसार
शारीरिक अनुकूलन पौधे के भीतर होने वाली जीवन-रक्षक आन्तरिक प्रक्रियाएँ विष निर्माण, तने में प्रकाश संश्लेषण, प्रतिरोधक क्षमता
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पौधों में अनुकूलन उन्हें अलग-अलग वातावरण में जीवित रहने और वृद्धि करने में सहायता करता है।
  • पादप अनुकूलन मुख्यतः संरचनात्मक, व्यवहारात्मक और शारीरिक तीन प्रकार का होता है।
  • संरचनात्मक अनुकूलन भोजन, प्रजनन, जल-पोषण तथा सुरक्षा से सम्बन्धित हो सकता है।
  • वीनस फ्लाई ट्रैप द्वारा कीट पकड़ना तथा पौधों का प्रकाश की ओर बढ़ना व्यवहारात्मक अनुकूलन के उदाहरण हैं।
  • विष निर्माण, तने में प्रकाश संश्लेषण तथा प्रतिरोधक क्षमता शारीरिक अनुकूलन के उदाहरण हैं।
Topic 10 विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में पादप अनुकूलन

विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में पादप अनुकूलन

विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में पादप अनुकूलन

अलग-अलग प्राकृतिक क्षेत्रों में तापमान, वर्षा, जल की उपलब्धता, मिट्टी, हवा तथा अन्य परिस्थितियाँ अलग होती हैं। इसलिए वहाँ पाए जाने वाले पौधों में भी वातावरण के अनुसार विशेष अनुकूलन विकसित होते हैं।

पादप अनुकूलन के पाँच प्रमुख क्षेत्र हैं—

  1. मरुस्थलीय क्षेत्र
  2. प्राकृतिक मैदानी/घासभूमि क्षेत्र
  3. टैगा प्रदेश
  4. आर्द्रभूमि एवं जलीय क्षेत्र
  5. उष्णकटिबंधीय वर्षा वन

1. मरुस्थलीय क्षेत्रों में पादप अनुकूलन

मरुस्थलीय क्षेत्रों में जल की कमी और अधिक तापमान प्रमुख समस्याएँ हैं। इसलिए यहाँ के पौधों में जल को सुरक्षित रखने और वाष्पीकरण कम करने वाले विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।

मरुस्थलीय पौधों के प्रमुख अनुकूलन
  1. कुछ पौधे रसीले या फूले हुए होते हैं और अपने तने अथवा पत्तियों में जल का भण्डारण करते हैं।
  2. कई पौधों में पत्तियाँ नहीं होतीं या बहुत छोटी होती हैं। कुछ पौधों में पत्तियाँ केवल वर्षा के बाद निकलती हैं। पत्तियों की कमी से जल की हानि कम होती है और हरा तना प्रकाश संश्लेषण करता है।
  3. इनकी जड़ें बहुत लम्बी होती हैं और जल प्राप्त करने के लिए जमीन में अधिक गहराई तथा दूर तक फैल सकती हैं।
  4. कुछ पौधों की पत्तियों पर रोएँ पाए जाते हैं, जो छाया प्रदान करके जल की हानि कम करने में सहायता करते हैं। कुछ पौधों की पत्तियाँ दिनभर अपनी दिशा बदलती रहती हैं, जिससे अधिक गर्मी का प्रभाव कम हो।
  5. तनों और पत्तियों पर मोम जैसा आवरण पाया जाता है, जो पानी की हानि को कम करता है।
  6. पौधों में काँटे पाए जाते हैं, जो उन्हें जन्तुओं द्वारा खाए जाने से बचाते हैं।
कैक्टस में अनुकूलन

कैक्टस मरुस्थलीय अनुकूलन का प्रमुख उदाहरण है। इसकी पत्तियाँ काँटों में परिवर्तित हो जाती हैं, जिससे वाष्पीकरण कम होता है तथा पौधे को जन्तुओं से सुरक्षा भी मिलती है।

इसका तना मांसल होता है और जल का संग्रह करता है। तने की मोटी बाहरी परत भी जल को सुरक्षित रखने में सहायता करती है। वर्षा के बाद इसकी जड़ें शीघ्रता से जल ग्रहण करने के लिए छोटी-छोटी जड़िकाएँ विकसित कर सकती हैं।

2. प्राकृतिक घासभूमि में पादप अनुकूलन

प्राकृतिक घासभूमि में आग, तेज हवा, कम जल तथा पशुओं द्वारा चराई जैसी परिस्थितियाँ पौधों को प्रभावित करती हैं। यहाँ के पौधों में इन परिस्थितियों से बचने के लिए विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।

  1. आग लगने पर घास का ऊपरी भाग नष्ट हो सकता है, लेकिन उसकी जड़ें जीवित रहती हैं और बाद में पौधा पुनः उग आता है।
  2. कुछ मैदानी वृक्षों की छाल मोटी होती है, जिससे उन्हें आग से सुरक्षा मिलती है।
  3. मैदानी झाड़ियाँ आग के बाद पुनः आसानी से उग सकती हैं।
  4. घास की जड़ें जमीन में गहराई तथा दूर तक फैली रहती हैं, जिससे अधिक नमी प्राप्त की जा सके।
  5. जड़ों का विस्तृत जाल पौधों को चरने वाले जन्तुओं द्वारा आसानी से उखड़ने से भी बचाता है।
  6. इन क्षेत्रों के पौधों की पत्तियाँ संकीर्ण होती हैं, जिससे चौड़ी पत्तियों की तुलना में कम जल की हानि होती है।
  7. घास की वृद्धि का महत्त्वपूर्ण भाग जमीन के निकट रहता है, इसलिए आग लगने या जन्तुओं द्वारा चर लिए जाने पर भी पौधा पूर्णतः नष्ट नहीं होता।
  8. अनेक पौधे परागण के लिए वायु की सहायता लेते हैं।
  9. लचीले तने तेज हवा में पौधों को टूटने से बचाते हैं।

3. टैगा प्रदेश में पादप अनुकूलन

टैगा प्रदेश में अत्यधिक ठंड और बर्फबारी होती है। इसलिए यहाँ के पौधों में कम तापमान, बर्फ और जल की हानि से बचने वाले अनुकूलन पाए जाते हैं।

  1. अनेक पौधे सदाबहार होते हैं, जिससे तापमान अनुकूल होते ही वे प्रकाश संश्लेषण कर सकें।
  2. कई पौधों की पत्तियाँ सुई के समान नुकीली होती हैं। ये कम जल की हानि करती हैं और उन पर बर्फ आसानी से नहीं टिकती।
  3. नुकीली पत्तियों पर मोम की परत होती है, जो वाष्पीकरण कम करती है।
  4. अनेक वृक्षों की शाखाएँ नीचे की ओर झुकी रहती हैं, जिससे अधिक बर्फ का भार शाखाओं पर न टिके और उनके टूटने की सम्भावना कम हो।

4. आर्द्रभूमि एवं जलीय क्षेत्रों में पादप अनुकूलन

जलीय पौधों को पानी के प्रवाह, जल के भीतर गैसों तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता के अनुसार अनुकूलित होना पड़ता है।

  1. जलीय पौधों के तने और पत्तियाँ लचीले होते हैं, जिससे वे पानी के बहाव के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकें।
  2. कुछ जलीय पौधों के तनों में वायु से भरे स्थान होते हैं, जो उन्हें पानी में तैरने या स्थिर रहने में सहायता करते हैं।
  3. जलमग्न पौधों में मजबूत संवहनी तंत्र का अभाव हो सकता है। उनकी पत्तियाँ पानी से सीधे पोषक तत्व तथा घुली हुई गैसें ग्रहण कर सकती हैं।
  4. इनमें जड़ें या मूल-रोम कम अथवा अनुपस्थित हो सकते हैं, क्योंकि जड़ों का प्रमुख कार्य पौधे को स्थिर रखना होता है।
  5. कुछ पौधों की पत्तियाँ पानी की सतह पर तैरती हैं, जिससे उन्हें सूर्य का प्रकाश प्राप्त हो सके। कुछ पौधों के बीज भी पानी पर तैर सकते हैं।

5. उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में पादप अनुकूलन

उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में अधिक वर्षा, नमी तथा घनी वनस्पति पाई जाती है। सूर्य का प्रकाश प्राप्त करने, अतिरिक्त जल हटाने तथा कमजोर ऊपरी मिट्टी से पोषण प्राप्त करने के लिए पौधों में विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।

  1. पत्तियों की चिकनी या मोमयुक्त सतह तथा नुकीले सिरे पानी को शीघ्र नीचे गिरा देते हैं। इससे पत्तियों पर अधिक जल नहीं रुकता और कवक तथा बैक्टीरिया के जमाव की सम्भावना कम होती है।
  2. सहायक तथा विस्तृत जड़ें ऊँचे पौधों को मजबूत सहारा देती हैं।
  3. कुछ पौधे, जैसे बेलें, सूर्य का प्रकाश प्राप्त करने के लिए दूसरे वृक्षों पर चढ़ जाती हैं।
  4. वन के निचले तल पर कुछ पुष्प परागण करने वाले जन्तुओं को आकर्षित करने के लिए विशेष गन्ध उत्पन्न करते हैं।
  5. पत्तियों के नुकीले सिरे और चिकनी सतह वर्षा के जल को तेजी से नीचे गिराने में सहायता करते हैं।
  6. कई पौधों की जड़ें जमीन में अधिक गहराई तक न जाकर ऊपरी सतह के निकट फैली रहती हैं, जिससे वे मिट्टी की ऊपरी परत से पोषक तत्व प्राप्त कर सकें।
  7. कुछ अधिजीवी पौधों, जैसे Orchid, की जड़ें खुली हवा में रहती हैं। वे अन्य वृक्षों का सहारा लेकर ऊपर बढ़ते हैं और वातावरण से जल प्राप्त करते हैं।
विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में पादप अनुकूलन
विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में पौधों के प्रमुख अनुकूलन

विभिन्न क्षेत्रों में पादप अनुकूलन एक नजर में

प्राकृतिक क्षेत्र प्रमुख अनुकूलन
मरुस्थल जल संग्रह, काँटे, लम्बी जड़ें, मोमयुक्त आवरण और छोटी पत्तियाँ
घासभूमि गहरी जड़ें, संकीर्ण पत्तियाँ, आग के बाद पुनः वृद्धि और लचीले तने
टैगा प्रदेश सदाबहार प्रकृति, सुईनुमा पत्तियाँ, मोम की परत और झुकी शाखाएँ
जलीय क्षेत्र लचीले तने-पत्तियाँ, वायु स्थान, कम जड़ें और तैरती पत्तियाँ
वर्षा वन नुकीली पत्तियाँ, चिकनी सतह, सहायक जड़ें, बेलें और अधिजीवी पौधे
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मरुस्थलीय पौधों में जल संरक्षण के लिए मांसल तना, काँटे, लम्बी जड़ें और मोमयुक्त आवरण पाए जाते हैं।
  • घासभूमि के पौधे आग, चराई और तेज हवा से बचने के लिए गहरी जड़ों, संकीर्ण पत्तियों और लचीले तनों द्वारा अनुकूलित होते हैं।
  • टैगा प्रदेश के पौधों में सुईनुमा पत्तियाँ, मोम की परत और नीचे की ओर झुकी शाखाएँ पाई जाती हैं।
  • जलीय पौधों में लचीले तने-पत्तियाँ, वायु स्थान और तैरने वाली पत्तियाँ प्रमुख अनुकूलन हैं।
  • उष्णकटिबंधीय वर्षा वन के पौधों में नुकीली पत्तियाँ, चिकनी सतह, सहायक जड़ें, बेलें तथा अधिजीवी प्रकृति पाई जाती है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

सजीवों के शरीर की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है—

व्याख्या: सजीव एक या अनेक कोशिकाओं से बने होते हैं। कोशिका जीवों की मूल संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है।
Q 2

सजीव एवं निर्जीव के बीच की कड़ी किसे माना जाता है—

व्याख्या: विषाणु जीवित कोशिका के भीतर सक्रिय होकर अपनी संख्या बढ़ाता है, जबकि बाहर निर्जीव जैसा व्यवहार करता है।
Q 3

निम्नलिखित में से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है—

व्याख्या: सौर ऊर्जा प्रकृति में निरन्तर उपलब्ध होती है, इसलिए यह नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है।
Q 4

कोयला, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस कहलाते हैं—

व्याख्या: कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को जीवाश्म ईंधन कहा जाता है।
Q 5

साबुन बनाने की प्रक्रिया कहलाती है—

व्याख्या: वसा या तेल की NaOH अथवा KOH के साथ अभिक्रिया द्वारा साबुन बनाने की प्रक्रिया को साबुनीकरण कहते हैं।
Q 6

हरे पौधे अपना भोजन किस प्रक्रिया द्वारा बनाते हैं—

व्याख्या: हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में जल और कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं।
Q 7

अमरबेल किस प्रकार का पौधा है—

व्याख्या: अमरबेल या आकाशबेल भोजन के लिए दूसरे पौधे पर निर्भर रहती है, इसलिए यह परजीवी पौधा है।
Q 8

निम्नलिखित में से कीटभक्षी पौधा है—

व्याख्या: नेपेन्थीस या घटपर्णी छोटे कीटों को पकड़कर उनका पाचन करता है, इसलिए यह कीटभक्षी पौधा है।
Q 9

गाय, भैंस एवं बकरी किस प्रकार के जन्तु हैं—

व्याख्या: गाय, भैंस और बकरी मुख्यतः पेड़-पौधों एवं उनके भागों को भोजन के रूप में ग्रहण करती हैं, इसलिए ये शाकाहारी हैं।
Q 10

श्वसन क्रिया होती है—

व्याख्या: पौधे और जन्तु दोनों सजीव हैं तथा दोनों में श्वसन जीवन की आवश्यक क्रिया है।
Q 11

कोशिका-भित्ति पाई जाती है—

व्याख्या: पादप कोशिका में कोशिका-भित्ति पाई जाती है, जबकि जन्तु कोशिका में कोशिका-भित्ति नहीं होती।
Q 12

किसी जीव को विशेष वातावरण में रहने योग्य बनाने वाला गुण कहलाता है—

व्याख्या: जीव में पाया जाने वाला वह विशेष गुण या परिवर्तन जो उसे किसी विशेष वातावरण में रहने योग्य बनाता है, अनुकूलन कहलाता है।
Q 13

साइबेरियन क्रेन का एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना किस अनुकूलन का उदाहरण है—

व्याख्या: प्रतिकूल परिस्थितियों से बचने के लिए एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवास करना व्यवहारात्मक अनुकूलन का उदाहरण है।
Q 14

ऊँट के कूबड़ में मुख्यतः संग्रहित रहता है—

व्याख्या: ऊँट के कूबड़ में वसा संचित रहती है, जो आवश्यकता पड़ने पर उसे ऊर्जा प्रदान करती है।
Q 15

मरुस्थलीय पौधों में पत्तियाँ प्रायः काँटों में परिवर्तित हो जाती हैं, जिससे—

व्याख्या: मरुस्थलीय पौधों में पत्तियों का काँटों में परिवर्तन वाष्पीकरण द्वारा होने वाली जल की हानि को कम करता है और सुरक्षा भी प्रदान करता है।

पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय विज्ञान के अध्याय सजीव वस्तुएँ से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

उष्णकटिबन्धीय वर्षा वनों में पादप अनुकूलन किस प्रकार होता है?

Q 2

पौधों में पर्यावरणीय अनुकूलन को समझाइए।

Q 3

जन्तुओं में पर्यावरणीय अनुकूलन से क्या तात्पर्य है?

Q 4 2020

सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं के मध्य अन्तर लिखिए।

Q 5 2016

मरुस्थलीय पौधों की पत्तियाँ प्रायः नुकीली क्यों होती हैं? इन पौधों के मुख्य लक्षण क्या हैं?

Q 6 2017

पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले जन्तुओं एवं पौधों में अनुकूलन हेतु क्या-क्या लक्षण होते हैं? लिखिए।

Q 7 2023

ऊर्जा के नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय स्रोतों से आप क्या समझते हैं? उदाहरण देकर समझाइए।

Q 8 2023

पोषण के आधार पर पादप और जन्तु में अन्तर समझाइए।

Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

Join Telegram