सजीव एवं निर्जीव वस्तुएँ: अर्थ, लक्षण एवं अन्तर
सजीव तथा निर्जीव वस्तुएँ
हमारे चारों ओर अनेक प्रकार की वस्तुएँ पाई जाती हैं। इनमें कुछ वस्तुएँ सजीव होती हैं और कुछ निर्जीव। इन दोनों के बीच अन्तर करने का मुख्य आधार जीवन है।
पादप, जन्तु, कीट, पक्षी तथा सूक्ष्म जीव सजीव वस्तुओं के उदाहरण हैं, जबकि बोतल, पेन, पेंसिल, कुर्सी, मेज, पत्थर, लकड़ी, दरवाजा, कम्प्यूटर और मोबाइल आदि निर्जीव वस्तुएँ हैं।
सजीव वस्तुएँ सूक्ष्म इकाइयों से बनी होती हैं, जिन्हें कोशिका (Cell) कहा जाता है। इसके विपरीत निर्जीव वस्तुएँ कोशिकाओं से निर्मित नहीं होती हैं।
सजीव वस्तुएँ (Living Things)
वे वस्तुएँ जिनमें जीवन पाया जाता है, सजीव वस्तुएँ कहलाती हैं। सजीवों का निर्माण कोशिकाओं से होता है। विभिन्न कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं, ऊतक मिलकर अंग बनाते हैं तथा विभिन्न अंग मिलकर अंग तंत्र (Organ System) का निर्माण करते हैं।
मनुष्य, पादप, कीट, पक्षी, जन्तु, कवक, जीवाणु (Bacteria), शैवाल (Algae) और प्रोटोजोआ आदि सजीवों के उदाहरण हैं।
सजीव वस्तुओं के मुख्य लक्षण
- गति, वृद्धि एवं विकास— सजीवों में गति पाई जाती है तथा समय के साथ उनमें वृद्धि और विकास होता है।
- कोशिकीय संरचना— सजीव वस्तुएँ एक कोशिका या अनेक कोशिकाओं से बनी होती हैं।
- भोजन— सभी सजीवों को भोजन की आवश्यकता होती है। पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, जबकि अन्य जीव भोजन के लिए पौधों या अन्य जन्तुओं पर निर्भर रहते हैं।
- पोषण— सजीवों को शरीर की वृद्धि, विकास और ऊर्जा के लिए पोषण की आवश्यकता होती है।
- उत्सर्जन— सजीव अपने शरीर में बनने वाले अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालते हैं।
- प्रजनन— सजीव अपनी जाति की निरन्तरता बनाए रखने के लिए नए जीवों को जन्म देते हैं।
- संवेदनशीलता— सजीव बाहरी वातावरण और विभिन्न उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं।
- अनुकूलन— सजीव विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार अपने को अनुकूलित कर जीवित रहने का प्रयास करते हैं।
- श्वसन— सजीव कोशिकाओं में श्वसन क्रिया होती है।
- आनुवंशिक पदार्थ— DNA लगभग सभी जीवित जीवों का आनुवंशिक पदार्थ (Genetic Material) होता है।
निर्जीव वस्तुएँ (Non-Living Things)
वे वस्तुएँ जिनमें जीवन के लक्षण नहीं पाए जाते, निर्जीव वस्तुएँ कहलाती हैं। इनमें प्रजनन, वृद्धि एवं विकास, श्वसन, अनुकूलन, उत्सर्जन तथा स्वाभाविक गति जैसी जीवन क्रियाएँ नहीं होती हैं।
लकड़ी, प्लास्टिक, लोहा, धातु, चिमटा, कम्पास, पेन, की-बोर्ड, गैजेट्स और रॉक आदि निर्जीव वस्तुओं के उदाहरण हैं।
निर्जीव वस्तुओं के मुख्य लक्षण
- इनमें कोशिका नहीं होती है।
- इनमें वृद्धि एवं विकास नहीं होता है।
- इनमें स्वयं की गति या संचालन नहीं होता है।
- इन्हें भोजन की आवश्यकता नहीं होती है।
- इनमें श्वसन क्रिया नहीं होती है।
- ये प्रजनन नहीं कर सकती हैं।
- इनकी कोई जीवन अवधि नहीं होती है।
- इनमें किसी प्रकार की जैविक उत्तेजना नहीं होती है।
- इनमें मृत्यु का अनुभव नहीं होता है।
सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं में अन्तर
| तुलना का आधार | सजीव वस्तुएँ | निर्जीव वस्तुएँ |
|---|---|---|
| कोशिकीय संरचना | सजीवों की सूक्ष्म संरचनात्मक इकाई कोशिका होती है। | निर्जीव वस्तुओं में कोशिकीय संरचना नहीं होती है। |
| संवेदनशीलता | सजीव बाहरी उद्दीपनों के प्रति संवेदनशील होते हैं और प्रतिक्रिया करते हैं। | निर्जीव वस्तुएँ बाहरी उद्दीपनों के प्रति संवेदनशील नहीं होती हैं। |
| चयापचय (Metabolism) | सजीवों में एनाबोलिज्म तथा कैटाबोलिज्म जैसी उपापचयी क्रियाएँ होती हैं। | निर्जीव वस्तुओं में ऐसी जैविक उपापचयी क्रियाएँ नहीं होती हैं। |
| वृद्धि एवं विकास | सजीवों में नियमित रूप से वृद्धि एवं विकास होता है। | निर्जीव वस्तुओं में जैविक वृद्धि एवं विकास नहीं होता है। |
| वातावरणीय नियंत्रण | सजीव अपने आन्तरिक वातावरण को नियंत्रित कर कोशिकाओं के कार्य के लिए उपयुक्त दशाएँ बनाए रखते हैं। | निर्जीव वस्तुओं को इस प्रकार का आन्तरिक नियंत्रण बनाए रखने की आवश्यकता नहीं होती। |
| आकार एवं आकृति | सजीव वस्तुओं की निश्चित आकृति एवं आकार होता है। | निर्जीव वस्तुओं का आकार एवं आकृति अनिश्चित हो सकती है। |
| संगठन | सजीवों में कोशिकाओं से ऊतक, ऊतकों से अंग तथा अंगों से अंग तंत्र का निर्माण होता है। | निर्जीव वस्तुओं में इस प्रकार का जैविक संगठन नहीं होता है। |
| आवश्यकताएँ | सजीवों को भोजन, पानी और हवा जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ होती हैं। | निर्जीव वस्तुओं को ऐसी जैविक आवश्यकताएँ नहीं होती हैं। |
| श्वसन | सभी सजीव श्वसन क्रिया में भाग लेते हैं। | निर्जीव वस्तुओं में श्वसन क्रिया नहीं होती है। |
| प्रजनन | सजीव अपनी जाति की निरन्तरता के लिए प्रजनन करते हैं। | निर्जीव वस्तुओं में प्रजनन नहीं होता है। |
| जीवन-चक्र | सजीवों की निश्चित आयु होती है और अन्ततः उनकी मृत्यु होती है। | निर्जीव वस्तुओं का जैविक जीवन-चक्र नहीं होता है। |
वायरस: सजीव एवं निर्जीव के बीच की कड़ी
वायरस को सजीव तथा निर्जीव के बीच की कड़ी माना जाता है। जब वायरस किसी सजीव के शरीर में होता है, तब वह सक्रिय होकर अपनी संख्या बढ़ाने में सक्षम होता है, जबकि सजीव शरीर से बाहर वह निर्जीव जैसी अवस्था प्रदर्शित करता है।
सजीव एवं निर्जीव में गति का अन्तर
अधिकांश जन्तु एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्वयं गति कर सकते हैं। पौधे सामान्यतः एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं, लेकिन उनमें भी वृद्धि एवं अन्य प्रकार की गतियाँ होती हैं, जैसे प्रकाश की ओर झुकना।
इसके विपरीत निर्जीव वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने के लिए बाहरी माध्यम या बल की आवश्यकता होती है।
- जिन वस्तुओं में जीवन पाया जाता है उन्हें सजीव तथा जिनमें जीवन के लक्षण नहीं होते उन्हें निर्जीव कहते हैं।
- सजीव वस्तुओं की मूल संरचनात्मक इकाई कोशिका है।
- वृद्धि, पोषण, श्वसन, उत्सर्जन, प्रजनन, संवेदनशीलता और अनुकूलन सजीवों के प्रमुख लक्षण हैं।
- निर्जीव वस्तुओं में कोशिका, श्वसन, प्रजनन और जैविक वृद्धि-विकास नहीं होता है।
- वायरस को सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी माना जाता है।
प्राकृतिक वस्तुएँ, प्राकृतिक संसाधन एवं उनकी उपयोगिता
प्राकृतिक वस्तुएँ (Natural Things)
वे वस्तुएँ जो हमें प्रकृति से प्राप्त होती हैं और जिनका उपयोग हम सामान्यतः बिना उनका मूल रूप बदले कर सकते हैं, प्राकृतिक वस्तुएँ अथवा प्राकृतिक संसाधन कहलाती हैं।
मिट्टी, पेड़-पौधे, खनिज, सूर्य और चन्द्रमा आदि प्राकृतिक वस्तुओं के उदाहरण हैं। हमारे दैनिक जीवन की अनेक आवश्यकताएँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों से पूरी होती हैं।
प्राकृतिक वस्तुओं का वर्गीकरण
प्राकृतिक वस्तुओं को उनके उपलब्ध रहने अथवा समाप्त होने की दृष्टि से दो भागों में बाँटा गया है—
- समाप्त न होने वाली वस्तुएँ— वायु, मिट्टी और ऊर्जा।
- समाप्त होने वाली वस्तुएँ— वन, जीव-जन्तु, खनिज, कोयला एवं पेट्रोलियम आदि।
प्रमुख प्राकृतिक संसाधन
1. हवा या वायु
वायु हमारे जीवन का अत्यन्त आवश्यक प्राकृतिक संसाधन है। मनुष्य तथा अन्य जीव श्वसन के लिए वायु का प्रयोग करते हैं। इसलिए जीवन के लिए वायु का विशेष महत्त्व है।
2. पेड़-पौधे
पेड़-पौधे भी महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन हैं। इनसे हमें अनेक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं, जैसे—
- फल
- फूल
- सब्जियाँ
- औषधियाँ
- लकड़ी
लकड़ी का उपयोग मेज, कुर्सी, पलंग तथा अन्य प्रकार के Furniture बनाने में भी किया जाता है।
3. मृदा या मिट्टी
मिट्टी एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। इसका उपयोग घर बनाने, मिट्टी के बर्तन बनाने तथा खेती करने में किया जाता है।
4. झील, नदी एवं तालाब
झील, नदी और तालाब से प्राप्त जल हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी प्राकृतिक संसाधन है। इसका उपयोग दैनिक जीवन तथा अन्य आवश्यक कार्यों में किया जाता है।
ऊर्जा के प्राकृतिक स्रोत
कोयला, लकड़ी, पेट्रोलियम तथा जलशक्ति आदि ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं। ऊर्जा के स्रोतों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा गया है—
1. अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (Non-Renewable Energy Sources)
वे ऊर्जा स्रोत जो प्रकृति में बहुत लम्बे समय से संचित हैं और जिनका लगातार उपयोग करने पर वे समाप्त हो सकते हैं, अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत कहलाते हैं।
इसके प्रमुख उदाहरण हैं—
- कोयला
- पेट्रोलियम
- प्राकृतिक गैस
2. नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (Renewable Energy Sources)
वे ऊर्जा स्रोत जिनका प्रकृति में निरन्तर उत्पादन होता रहता है और जिनका बार-बार उपयोग किया जा सकता है, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत कहलाते हैं।
इनके प्रमुख उदाहरण हैं—
- सौर ऊर्जा
- जल ऊर्जा
- पवन ऊर्जा
- समुद्रीय ऊर्जा
- भू-तापीय ऊर्जा
कोयला एवं पेट्रोलियम
कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को जीवाश्म ईंधन कहा जाता है। ये ऊर्जा के उपयोगी प्राकृतिक स्रोत हैं।
कोयले के भंजक आसवन से अनेक उपयोगी पदार्थ प्राप्त किए जाते हैं, जैसे—
- कोल गैस
- अमोनिया द्रव
- कोलतार
- कोक
पेट्रोलियम से भी अनेक उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते हैं और आधुनिक परिवहन तथा दैनिक जीवन में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।
प्राकृतिक वस्तुओं की उपयोगिता
प्राकृतिक वस्तुओं की सहायता से मनुष्य की अनेक प्राथमिक आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। जल, वन, मिट्टी और पेट्रोलियम जैसे प्राकृतिक संसाधन हमारे दैनिक जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।
जल जीवन-यापन की मूलभूत आवश्यकता है। वन और मिट्टी से भोजन, आवास तथा विभिन्न उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। पेट्रोलियम का उपयोग विशेष रूप से वाहनों और परिवहन से सम्बन्धित कार्यों में किया जाता है।
इस प्रकार प्राकृतिक वस्तुएँ मानव जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं और दैनिक जीवन की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
- प्रकृति से प्राप्त वस्तुओं को प्राकृतिक वस्तुएँ अथवा प्राकृतिक संसाधन कहते हैं।
- वायु, मिट्टी, पेड़-पौधे, जल, खनिज, कोयला और पेट्रोलियम प्रमुख प्राकृतिक संसाधन हैं।
- ऊर्जा स्रोत मुख्यतः नवीकरणीय और अनवीकरणीय दो प्रकार के होते हैं।
- कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उदाहरण हैं।
- सौर, जल, पवन, समुद्रीय और भू-तापीय ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत हैं।
- कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को जीवाश्म ईंधन कहा जाता है।
पौधे एवं जन्तु: परिचय तथा पोषण के प्रकार
पौधे एवं जन्तु: परिचय
पौधे और जन्तु दोनों सजीव हैं, परन्तु उनकी संरचना, भोजन प्राप्त करने की विधि तथा जीवन-क्रियाओं में अनेक अन्तर पाए जाते हैं। मानव जीवन के लिए पौधों का विशेष महत्त्व है, क्योंकि वे जीवन की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता करते हैं।
पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा भोजन बनाते हैं और इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन भी मुक्त करते हैं। यही ऑक्सीजन अन्य जीवों के जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
पादप कोशिका की कोशिका-भित्ति मुख्यतः Cellulose से बनी होती है। हरे पौधों के Chloroplast में Chlorophyll पाया जाता है, जो उनके हरे रंग तथा प्रकाश संश्लेषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पौधे लैंगिक, अलैंगिक तथा कायिक प्रजनन द्वारा अपनी संतति उत्पन्न कर सकते हैं।
पौधों एवं जन्तुओं में पोषण
प्रत्येक सजीव को वृद्धि, विकास, ऊर्जा तथा जीवन-क्रियाओं के संचालन के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने की प्रक्रिया को पोषण (Nutrition) कहा जाता है।
पौधों और जन्तुओं में भोजन प्राप्त करने की विधियाँ अलग-अलग होती हैं। पौधों में पोषण को मुख्यतः स्वपोषी और विषमपोषी रूप में तथा जन्तुओं में भोजन की प्रकृति के आधार पर शाकाहारी, माँसाहारी और सर्वाहारी रूप में समझा जाता है।
पौधों में पोषण के प्रकार
पौधों में पोषण मुख्यतः दो प्रकार का होता है—
1. स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition)
वे पौधे जो सरल अकार्बनिक पदार्थों, जैसे जल और कार्बन डाइऑक्साइड, की सहायता से सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, स्वपोषी कहलाते हैं।
हरे पौधे सूर्य से प्रकाश ऊर्जा प्राप्त करते हैं। इसलिए इन्हें प्रकाश स्वपोषी (Phototroph) भी कहा जाता है। पौधों द्वारा भोजन बनाने की इस प्रक्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं।
2. विषमपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition)
वे जीव अथवा पादप जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते और भोजन के लिए दूसरे जीवों या अन्य स्रोतों पर निर्भर रहते हैं, विषमपोषी कहलाते हैं।
इस प्रकार के पोषण को विषमपोषी पोषण कहा जाता है। इसके प्रमुख रूप निम्न हैं—
(i) मृतजीवी पोषण
मृतजीवी अपना पोषण मृत तथा सड़े-गले जैविक पदार्थों से प्राप्त करते हैं। ऐसे जीव क्षयमान कार्बनिक पदार्थों पर पाए जाते हैं और उन्हीं से पोषक पदार्थ ग्रहण करते हैं।
जीवाणु और कवक इसके प्रमुख उदाहरण हैं। Monotropa भी इसका उदाहरण है।
(ii) परजीवी पोषण
वे जीव या पादप जो अपना भोजन किसी दूसरे जीव से प्राप्त करते हैं, परजीवी कहलाते हैं।
परजीवी भोजन के लिए अपने पोषक जीव पर निर्भर रहता है। अमरबेल अथवा आकाशबेल (Cuscuta/Dodder) इसका प्रमुख उदाहरण है।
(iii) कीटाहारी / कीटभक्षी पौधे
वे पौधे जो छोटे-छोटे कीटों को अपनी ओर आकर्षित करके पकड़ते और उनका पाचन करते हैं, कीटाहारी या कीटभक्षी पौधे कहलाते हैं।
ऐसे पौधे प्रायः उन स्थानों पर पाए जाते हैं जहाँ मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी होती है।
प्रमुख उदाहरण—
- नेपेन्थीस (घटपर्णी)
- सनड्यू
- वीनस फ्लाई ट्रैप
- ब्लैडरवर्ट
जन्तुओं में पोषण के प्रकार
जन्तु अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते। वे भोजन के लिए पौधों, अन्य जन्तुओं अथवा दोनों पर निर्भर रहते हैं। भोजन की प्रकृति के आधार पर जन्तुओं को मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जाता है।
1. शाकाहारी (Herbivorous)
वे जन्तु जो भोजन के रूप में मुख्यतः पेड़-पौधों अथवा उनके भागों का सेवन करते हैं, शाकाहारी जन्तु कहलाते हैं।
उदाहरण— गाय, भैंस और बकरी।
2. माँसाहारी (Carnivorous)
वे जन्तु जो भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं और उनका माँस खाते हैं, माँसाहारी जन्तु कहलाते हैं।
उदाहरण— शेर, बाघ, छिपकली और मेंढक।
3. सर्वाहारी (Omnivorous)
वे जन्तु जो पौधों तथा जन्तुओं दोनों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं, सर्वाहारी जन्तु कहलाते हैं।
उदाहरण— कौआ, भालू, कुत्ता, बिल्ली और मनुष्य।
पौधों और जन्तुओं के पोषण में मुख्य अन्तर
| आधार | पौधे | जन्तु |
|---|---|---|
| भोजन निर्माण | हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बना सकते हैं। | जन्तु अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते हैं। |
| निर्भरता | स्वपोषी पौधे जल, कार्बन डाइऑक्साइड और सूर्य के प्रकाश का उपयोग करते हैं। कुछ पौधे विषमपोषी भी होते हैं। | जन्तु भोजन के लिए पौधों, अन्य जन्तुओं अथवा दोनों पर निर्भर रहते हैं। |
| प्रमुख प्रकार | स्वपोषी और विषमपोषी। | शाकाहारी, माँसाहारी और सर्वाहारी। |
- भोजन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने की प्रक्रिया को पोषण कहते हैं।
- पौधों में पोषण मुख्यतः स्वपोषी और विषमपोषी दो प्रकार का होता है।
- हरे पौधे सूर्य के प्रकाश में जल और कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं।
- मृतजीवी, परजीवी और कीटाहारी पोषण विषमपोषी पोषण के प्रमुख रूप हैं।
- अमरबेल परजीवी तथा नेपेन्थीस, सनड्यू, वीनस फ्लाई ट्रैप और ब्लैडरवर्ट कीटाहारी पौधों के उदाहरण हैं।
- जन्तु भोजन के आधार पर शाकाहारी, माँसाहारी और सर्वाहारी तीन प्रमुख वर्गों में बाँटे जाते हैं।
पौधों एवं जन्तुओं में समानताएँ एवं विभिन्नताएँ
पौधों एवं जन्तुओं में समानताएँ
पौधे और जन्तु दोनों सजीव होते हैं। यद्यपि उनकी संरचना तथा जीवन-शैली में अनेक अन्तर पाए जाते हैं, फिर भी उनमें भोजन, श्वसन, वृद्धि, गति, प्रजनन, उत्सर्जन और संवेदनशीलता जैसी अनेक समान जीवन-क्रियाएँ होती हैं।
1. भोजन (Food)
पौधों और जन्तुओं दोनों को ऊर्जा प्राप्त करने तथा जीवन-क्रियाओं को चलाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है।
जन्तु पौधों या अन्य जन्तुओं से भोजन प्राप्त करते हैं, जबकि हरे पौधे मिट्टी से जल एवं पोषक तत्व लेकर सूर्य के प्रकाश की सहायता से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
कुछ पौधे अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते और सड़े-गले पदार्थों या अन्य जीवों से पोषण प्राप्त करते हैं। उदाहरण के रूप में कुकुरमुत्ता तथा परजीवी पौधों का उल्लेख किया गया है।
2. श्वसन (Respiration)
पौधों और जन्तुओं दोनों में श्वसन क्रिया होती है। श्वसन की सहायता से जीवों को भोजन से ऊर्जा प्राप्त होती है।
जन्तुओं में श्वसन के लिए विभिन्न अंग पाए जाते हैं, जबकि पौधों में गैसीय आदान-प्रदान के लिए पत्तियों की सतह पर छोटे-छोटे छिद्र पाए जाते हैं जिन्हें रन्ध्र (Stomata) कहा जाता है।
3. उत्सर्जन (Excretion)
पौधे और जन्तु दोनों अपने शरीर में बनने वाले अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालते हैं। इस प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं।
पौधे अपनी पुरानी छाल, पत्तियाँ और शाखाएँ अलग करके भी कुछ अपशिष्ट पदार्थों को बाहर करते हैं, जबकि जन्तु अपने शरीर से विभिन्न अपशिष्ट पदार्थों का नियमित उत्सर्जन करते हैं।
4. वृद्धि (Growth)
पौधे और जन्तु दोनों में वृद्धि होती है। पौधों में नई पत्तियाँ, शाखाएँ, फूल और फल बनते हैं, जबकि जन्तुओं के शरीर का आकार आयु के साथ बढ़ता है।
जन्तुओं की वृद्धि सामान्यतः एक निश्चित आयु तक होती है।
5. गति (Movement)
पौधे और जन्तु दोनों किसी न किसी रूप में गति करते हैं।
पौधों में गति बहुत धीमी होती है। उदाहरण के लिए वे प्रकाश की दिशा की ओर झुक सकते हैं। जन्तु सामान्यतः एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा सकते हैं, जैसे पक्षी उड़ते हैं, साँप रेंगते हैं और घोड़े दौड़ते हैं।
6. प्रजनन (Reproduction)
पौधे और जन्तु दोनों अपनी जाति की निरन्तरता बनाए रखने के लिए प्रजनन करते हैं।
पौधे नए बीज बनाकर नई संतति उत्पन्न करते हैं, जबकि जन्तु अपनी जैसी नई संतति पैदा करके अपनी जाति को आगे बढ़ाते हैं।
7. संवेदनशीलता (Sensitivity)
पौधे और जन्तु दोनों अपने वातावरण के प्रति संवेदनशील होते हैं तथा बाहरी उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं।
पौधे प्रकाश तथा अन्य प्रभावों के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं, जबकि जन्तुओं में ज्ञानेंद्रियाँ पाई जाती हैं जिनकी सहायता से वे वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को अनुभव करते हैं।
पौधों एवं जन्तुओं में विभिन्नताएँ
पौधे और जन्तु दोनों सजीव होने के बावजूद गति, पोषण, श्वसन, कोशिकीय संरचना तथा संवेदनशीलता के आधार पर एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।
| आधार | पौधे | जन्तु |
|---|---|---|
| गति | पौधे सामान्यतः एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं और एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्वतंत्र रूप से नहीं जा सकते। | अधिकांश जन्तु एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्वतंत्र रूप से गति कर सकते हैं। |
| पोषण | हरे पौधों में Chlorophyll पाया जाता है और वे सामान्यतः अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। | जन्तु अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते तथा भोजन के लिए पौधों या अन्य जन्तुओं पर निर्भर रहते हैं। |
| श्वसन | पौधों में गैसीय आदान-प्रदान के लिए पत्तियों के रन्ध्र आदि संरचनाएँ सहायक होती हैं। | जन्तुओं में श्वसन के लिए शरीर की बनावट के अनुसार विशिष्ट अंग पाए जाते हैं। |
| संरचना | पादप कोशिकाओं में कोशिका-भित्ति पाई जाती है। | जन्तु कोशिकाओं में कोशिका-भित्ति नहीं पाई जाती और उनकी कोशिकीय संरचना पौधों से भिन्न होती है। |
| संवेदनशीलता | पौधों में संवेदना अथवा प्रतिक्रिया की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है। | जन्तुओं में अधिक विकसित संवेदी तथा तंत्रिका तंत्र पाया जाता है। |
- पौधे और जन्तु दोनों सजीव हैं तथा भोजन, श्वसन, उत्सर्जन, वृद्धि, गति, प्रजनन और संवेदनशीलता जैसी जीवन-क्रियाएँ करते हैं।
- हरे पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, जबकि जन्तु भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं।
- पौधे सामान्यतः एक स्थान पर स्थिर रहते हैं, जबकि अधिकांश जन्तु स्वतंत्र रूप से स्थान परिवर्तन कर सकते हैं।
- पादप कोशिकाओं में कोशिका-भित्ति होती है, जबकि जन्तु कोशिकाओं में कोशिका-भित्ति नहीं होती।
- जन्तुओं में संवेदी तथा तंत्रिका तंत्र पौधों की तुलना में अधिक विकसित होता है।
अनुकूलन: अर्थ, आवश्यकता एवं वातावरणीय अनुकूलन
अनुकूलन (Adaptation)
अनुकूलन शब्द लैटिन शब्द Adaptare से लिया गया है, जिसका अर्थ है—योग्य बनाना।
अनुकूलन वह विशेष गुण या परिवर्तन है जो किसी पौधे या जन्तु को किसी विशेष स्थान अथवा निवास-क्षेत्र में रहने योग्य बनाता है। अलग-अलग वातावरण में रहने वाले जीवों में उनकी परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग प्रकार के अनुकूलन पाए जाते हैं।
उदाहरण के लिए रेगिस्तानी पौधों की विशेषताएँ समुद्री अथवा पर्वतीय क्षेत्रों के पौधों से भिन्न होती हैं, क्योंकि प्रत्येक क्षेत्र की जलवायु, जल की उपलब्धता, तापमान तथा अन्य परिस्थितियाँ अलग होती हैं।
अनुकूलन की आवश्यकता एवं महत्त्व
प्रत्येक जीव को जीवित रहने के लिए अपने पर्यावरण की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए अनुकूलन जीवों के अस्तित्व और विकास के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
अनुकूलन जीवों को—
- विशेष निवास-स्थान में जीवित रहने योग्य बनाता है।
- भोजन एवं अन्य आवश्यक संसाधन प्राप्त करने में सहायता करता है।
- प्रतिकूल वातावरण का सामना करने में सक्षम बनाता है।
- अपनी संतति को बनाए रखने और प्रजनन में सहायता करता है।
वातावरणीय अनुकूलन (Environmental Adaptation)
सूक्ष्म जीवों से लेकर पौधों और जन्तुओं तक सभी जीव किसी-न-किसी पर्यावरण में रहते हैं। उन्हें अपने वातावरण के अनुसार सूखे, गर्म, ठंडे अथवा अधिक आर्द्र क्षेत्रों में जीवित रहने के लिए विभिन्न परिवर्तन करने पड़ते हैं।
किसी पौधे या जन्तु में पाया जाने वाला वह परिवर्तन या विशेषता, जिसके कारण वह किसी विशिष्ट वातावरण में अपना अस्तित्व बनाए रखने और संतति उत्पन्न करने में सक्षम होता है, वातावरणीय अनुकूलन कहलाता है।
ये परिवर्तन जीव की शारीरिक बनावट अथवा व्यवहार से सम्बन्धित हो सकते हैं। इस प्रकार अनुकूलन जीव को अपने पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सहायता करता है।
पर्वतीय क्षेत्रों में पौधों एवं जन्तुओं का अनुकूलन
पर्वतीय क्षेत्रों में परिस्थितियाँ तेजी से बदलती रहती हैं। वहाँ कठोर जलवायु, कम तापमान, बर्फ, ऊँचाई तथा भोजन की सीमित उपलब्धता पौधों और जन्तुओं के लिए कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।
इन परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए पर्वतीय क्षेत्रों के पौधों एवं जन्तुओं में अनेक विशेष अनुकूलन विकसित होते हैं।
पर्वतीय पौधों में अनुकूलन
पर्वतीय क्षेत्रों में बसन्त और गर्मी का समय सीमित होता है। इसके बाद ठंड बढ़ने लगती है और पर्वत-श्रृंखलाएँ बर्फ से ढक जाती हैं। इसलिए पौधों को कम समय में अपने जीवन की आवश्यक क्रियाएँ पूरी करनी पड़ती हैं।
पर्वतीय पौधों की प्रमुख आवश्यकताएँ निम्न हैं—
- भोजन का संग्रह करना।
- नमी का संग्रह करना।
- ऊर्जा का संग्रह करना।
- पर्वतीय परिस्थितियों में वृद्धि करने के लिए अनुकूलित होना।
पर्वतीय जन्तुओं में अनुकूलन
पर्वतीय क्षेत्रों के जन्तुओं को सर्दियों के महीनों में अत्यधिक ठंड और भोजन की कमी का सामना करना पड़ता है। इसलिए वे ऐसी परिस्थितियों के अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन करते हैं।
कुछ पर्वतीय जन्तु सर्दियों में लंबे समय तक शीत निष्क्रियता (Hibernation) में चले जाते हैं। इससे वे अत्यधिक ठंड और भोजन की कमी के समय ऊर्जा की बचत कर पाते हैं।
उदाहरण— Alpine Marmot सर्दियों में ठंड से बचने के लिए वर्ष के लगभग नौ महीने तक Hibernation कर सकता है।
अनुकूलन का सार
अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण जीवों में अलग-अलग प्रकार के गुण विकसित होते हैं। यही गुण उन्हें अपने निवास-स्थान में जीवित रहने, भोजन प्राप्त करने, प्रतिकूल परिस्थितियों से बचने और अपनी संतति को आगे बढ़ाने में सहायता करते हैं।
- अनुकूलन का अर्थ किसी जीव को विशेष स्थान या निवास में रहने योग्य बनाने वाला गुण या परिवर्तन है।
- अनुकूलन जीवों को वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीवित रहने और प्रजनन में सहायता करता है।
- वातावरणीय अनुकूलन शारीरिक बनावट अथवा व्यवहार से सम्बन्धित हो सकता है।
- पर्वतीय पौधे भोजन, नमी और ऊर्जा के संग्रह के लिए अनुकूलित होते हैं।
- कुछ पर्वतीय जन्तु अत्यधिक ठंड से बचने के लिए शीत निष्क्रियता (Hibernation) करते हैं।
जन्तुओं में अनुकूलन के प्रकार
जन्तुओं में अनुकूलन
जन्तुओं को अपने निवास-स्थान की जलवायु, भोजन, जल की उपलब्धता तथा अन्य परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना पड़ता है। इसके कारण उनके शरीर, व्यवहार अथवा जीवन-क्रियाओं में ऐसे परिवर्तन दिखाई देते हैं जो उन्हें अपने वातावरण में जीवित रहने में सहायता करते हैं।
जन्तुओं के अनुकूलन को मुख्यतः तीन प्रकारों में बाँटा गया है—
- बाह्य/शारीरिक अनुकूलन
- मनोवैज्ञानिक अनुकूलन
- व्यवहारात्मक अनुकूलन
1. बाह्य/शारीरिक अनुकूलन (External/Physical Adaptation)
जब किसी जन्तु के बाहरी अंगों अथवा शरीर की बनावट में ऐसे परिवर्तन हो जाते हैं जो उसे कठिन परिस्थितियों का सामना करने में सहायता करें, तो इसे बाह्य अथवा शारीरिक अनुकूलन कहते हैं।
ऐसे परिवर्तन पानी और ऑक्सीजन की कमी, अत्यधिक ठंड, विपरीत वातावरण तथा अन्य कठिन परिस्थितियों से बचने में सहायक होते हैं।
इस प्रकार के अनुकूलन में जन्तु के हाथ, पैर, नाक, कान, त्वचा अथवा शरीर के अन्य बाहरी अंगों में परिवर्तन देखा जा सकता है।
बाह्य/शारीरिक अनुकूलन के उदाहरण
- जिराफ की लम्बी गर्दन— जिराफ की लम्बी गर्दन उसे ऊँचे स्थानों पर उपलब्ध भोजन तक पहुँचने में सहायता करती है।
- ऊँट का कूबड़— ऊँट के शरीर में विकसित कूबड़ मरुस्थलीय जीवन के लिए उसके शारीरिक अनुकूलन का उदाहरण है।
- ध्रुवीय भालू का फर— ध्रुवीय भालू के शरीर पर घना फर अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्र में जीवित रहने में सहायता करता है।
2. मनोवैज्ञानिक अनुकूलन (Psychological Adaptation)
कुछ जन्तुओं में सीखने, संकेत देने अथवा परिस्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया करने से सम्बन्धित ऐसे व्यवहार पाए जाते हैं जिन्हें मनोवैज्ञानिक अनुकूलन के अन्तर्गत रखा गया है।
इन अनुकूलनों की सहायता से जीव खतरे को पहचानने, एक-दूसरे को सूचना देने तथा शिकारियों से बचने में सक्षम होते हैं।
मनोवैज्ञानिक अनुकूलन के उदाहरण
- बन्दरों में कुछ भावनात्मक तथा सामाजिक व्यवहार मनुष्य के व्यवहार से मिलते-जुलते पाए जाते हैं।
- वर्वेट बन्दर विभिन्न प्रकार की आवाजों का प्रयोग करके एक-दूसरे को शिकारी के आने की चेतावनी देते हैं।
- गिरगिट अपने परिवेश के अनुरूप स्वयं को ढालकर आसानी से दिखाई न देने तथा शिकारियों से बचने में सहायता प्राप्त करता है।
3. व्यवहारात्मक अनुकूलन (Behavioural Adaptation)
जब किसी जीव के शरीर में कोई नई बाहरी संरचना विकसित होने के बजाय वह अपने व्यवहार में परिवर्तन करके वातावरण के अनुकूल होता है, तो इसे व्यवहारात्मक अनुकूलन कहते हैं।
इसमें जीव मौसम, तापमान, भोजन की उपलब्धता तथा अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार अपने रहने, चलने, सोने या स्थान बदलने के तरीके में परिवर्तन करता है।
प्रवास (Migration)
कुछ जीव प्रतिकूल मौसम या अन्य परिस्थितियों से बचने के लिए एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र की ओर चले जाते हैं। इस स्थान परिवर्तन को प्रवास (Migration) कहते हैं।
साइबेरियन क्रेन हजारों मील की यात्रा करके साइबेरिया से राजस्थान तक पहुँचती है।
शीत निष्क्रियता (Hibernation)
कुछ जीव अत्यधिक ठंड के समय अपनी गतिविधियाँ बहुत कम कर देते हैं और लम्बे समय तक निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं। इसे शीत निष्क्रियता कहते हैं।
उदाहरण के लिए भालू सर्दियों के मौसम में अधिक समय तक सोता है।
ग्रीष्म निष्क्रियता (Aestivation)
कुछ जीव अत्यधिक गर्मी से बचने के लिए गर्म मौसम में निष्क्रिय अवस्था में चले जाते हैं। इस अवस्था को ग्रीष्म निष्क्रियता कहा जाता है।
समय के अनुसार सक्रियता
कुछ जीव अपने वातावरण के तापमान के अनुसार अपनी सक्रियता का समय बदल लेते हैं। मरुस्थलीय क्षेत्रों के कुछ जीव दिन की गर्मी से बचने के लिए रात में सक्रिय होते हैं।
साँप गर्म क्षेत्रों में प्रायः बिलों से रात के समय बाहर निकलता है।
जन्तु अनुकूलन के तीनों प्रकारों में अन्तर
| अनुकूलन का प्रकार | मुख्य विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| बाह्य/शारीरिक | शरीर अथवा बाहरी अंगों की बनावट में परिवर्तन | जिराफ की लम्बी गर्दन, ऊँट का कूबड़, ध्रुवीय भालू का फर |
| मनोवैज्ञानिक | सीखने, संकेत देने या परिस्थिति के प्रति विशेष प्रतिक्रिया से सम्बन्धित अनुकूलन | वर्वेट बन्दर की चेतावनी देने वाली आवाजें |
| व्यवहारात्मक | वातावरण के अनुसार व्यवहार या गतिविधि में परिवर्तन | प्रवास, शीत निष्क्रियता, ग्रीष्म निष्क्रियता |
- जन्तुओं में अनुकूलन मुख्यतः बाह्य/शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और व्यवहारात्मक तीन प्रकार का बताया गया है।
- बाह्य/शारीरिक अनुकूलन में शरीर या बाहरी अंगों की बनावट में उपयोगी परिवर्तन होते हैं।
- जिराफ की लम्बी गर्दन, ऊँट का कूबड़ और ध्रुवीय भालू का फर शारीरिक अनुकूलन के उदाहरण हैं।
- वर्वेट बन्दर द्वारा अलग-अलग आवाजों से खतरे की चेतावनी देना मनोवैज्ञानिक अनुकूलन का उदाहरण है।
- प्रवास, शीत निष्क्रियता और ग्रीष्म निष्क्रियता व्यवहारात्मक अनुकूलन के प्रमुख उदाहरण हैं।
विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में जन्तु अनुकूलन
विभिन्न प्राकृतिक परिस्थितियों में जन्तु अनुकूलन
पृथ्वी पर गर्मी, सर्दी, वर्षा, सूखा तथा जल की उपलब्धता जैसी प्राकृतिक परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। इन परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए जन्तुओं में उनके निवास-स्थान के अनुसार विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।
1. रेगिस्तानी क्षेत्रों में जन्तु अनुकूलन
रेगिस्तान में रहने वाले जीवों को मुख्य रूप से पानी की कमी और अधिक तापमान का सामना करना पड़ता है। इसलिए उनमें जल की बचत, गर्मी से सुरक्षा तथा भोजन प्राप्त करने से सम्बन्धित विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।
रेगिस्तानी जीवों के प्रमुख अनुकूलन
- कंगारू चूहा तथा साँप जैसे जीव बिलों में रहते हैं, जहाँ तापमान बाहरी वातावरण की तुलना में अधिक स्थिर रहता है।
- ऐसे जीव प्रायः दिन में बिलों में रहते हैं और रात में भोजन या शिकार के लिए बाहर निकलते हैं।
- बिच्छू तथा मकड़ियों के शरीर पर मोटा बाहरी आवरण पाया जाता है, जो शरीर की नमी को बनाए रखने में सहायता करता है।
- रेगिस्तानी जीवों के गुर्दे मूत्र को अधिक गाढ़ा बनाते हैं, जिससे शरीर से कम जल बाहर निकलता है।
ऊँट में अनुकूलन
ऊँट को रेगिस्तान का प्रमुख अनुकूलित जन्तु माना जाता है। इसके निम्न अनुकूलन हैं—
- ऊँट के कूबड़ में वसा संचित रहती है, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।
- इसके पैर चौड़े होते हैं, जिससे यह रेत पर आसानी से चल सकता है।
- इसके होंठ मोटे होते हैं, जिससे यह काँटेदार पौधों को भी खा सकता है।
- इसकी त्वचा का रंग रेत के समान होता है, जिससे यह वातावरण में आसानी से घुल-मिल जाता है।
- इसकी नाक छोटी होती है तथा कानों में बाल पाए जाते हैं, जो रेत और धूल से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
2. उष्णकटिबंधीय घासभूमि (सवाना) में जन्तु अनुकूलन
उष्णकटिबंधीय घासभूमि में रहने वाले जीवों को भोजन प्राप्त करने के लिए तेज गति, शक्ति तथा विशेष शिकार-व्यवहार की आवश्यकता होती है।
प्रमुख उदाहरण
- चीता— बहुत तेज गति से दौड़ने में सक्षम होता है। इसकी गति लगभग 80 मील प्रति घंटा बताई गई है।
- शेर— धीरे-धीरे और घात लगाकर शिकार करता है।
- हायना— समूह में शिकार करने का व्यवहार प्रदर्शित करता है।
- जिराफ— एक बार में बड़ी मात्रा में पानी पी सकता है और पत्तियों पर जमा ओस से भी जल प्राप्त कर सकता है।
- छिपकली— शिकारी के आक्रमण के समय अपनी पूँछ काटकर गिरा सकती है, जिससे शिकारी भ्रमित हो जाता है।
3. आर्कटिक क्षेत्रों में जन्तु अनुकूलन
आर्कटिक क्षेत्र अत्यधिक ठंडे और बर्फ से ढके होते हैं। वहाँ रहने वाले जीवों में शरीर की ऊष्मा बनाए रखने तथा बर्फ पर चलने या जल में तैरने के लिए विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।
ध्रुवीय भालू
ध्रुवीय भालू अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों में रहता है। इसके शरीर में—
- त्वचा के नीचे वसा की मोटी परत होती है।
- शरीर के ऊपर घना फर होता है।
- पैर चौड़े होते हैं, जो बर्फ पर चलने में सहायता करते हैं।
पेंगुइन
पेंगुइन ठंडे क्षेत्र में रहने वाला ऐसा पक्षी है जो उड़ने के स्थान पर तैरने के लिए अधिक अनुकूलित होता है। इसके पैर झिल्लीदार होते हैं, जिससे जल में तैरना सरल होता है।
4. उभयचर क्षेत्रों में जन्तु अनुकूलन
वे जीव जो जल और स्थल दोनों स्थानों पर निवास करते हैं, उनमें दोनों प्रकार के वातावरण के अनुसार विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।
मेंढक में अनुकूलन
- मेंढक में शिकार को निगलने में सहायता देने वाली विशेष शारीरिक बनावट पाई जाती है।
- स्थल पर वह त्वचा द्वारा श्वसन कर सकता है।
- जल में श्वसन के लिए गलफड़ों का प्रयोग किया जाता है।
- इसकी आँखों की संरचना बड़े शिकार को निगलने में भी सहायता करती है।
Dyeing Poison Tree Frog के चमकीले रंग शिकारियों को चेतावनी देने का कार्य करते हैं। इसकी उँगलियों तथा पैरों की उँगलियों में चिपकने वाली संरचनाएँ होती हैं, जिनसे यह चढ़ने में सक्षम होता है।
मेंढक, मगरमच्छ, घोंघा और सीप आदि ऐसे जीवों के उदाहरण हैं जिनमें जल तथा स्थल से सम्बन्धित अनुकूलन पाए जाते हैं।
5. वायवीय जीवों में अनुकूलन
वायवीय जीवों में उड़ने तथा वातावरण में सक्रिय रहने के लिए विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं। पक्षियों में उड़ने की क्षमता उनके प्रमुख अनुकूलनों में से एक है।
रात्रिचर जीवों में रात के समय देखने अथवा एक-दूसरे की उपस्थिति पहचानने से सम्बन्धित विशेषताएँ भी पाई जाती हैं।
जुगनू, चमगादड़ और उल्लू ऐसे जीवों के उदाहरण हैं जिनमें रात के वातावरण के अनुसार विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।
विभिन्न क्षेत्रों के जन्तु अनुकूलन एक नजर में
| क्षेत्र | प्रमुख जन्तु | मुख्य अनुकूलन |
|---|---|---|
| रेगिस्तान | ऊँट, कंगारू चूहा, साँप | जल संरक्षण, बिल में रहना, चौड़े पैर, मोटे होंठ |
| सवाना | चीता, शेर, हायना, जिराफ | तेज गति, घात लगाना, समूह में शिकार, जल प्राप्त करने के विशेष तरीके |
| आर्कटिक | ध्रुवीय भालू, पेंगुइन | मोटी वसा, घना फर, चौड़े या झिल्लीदार पैर |
| उभयचर क्षेत्र | मेंढक आदि | जल और स्थल दोनों के अनुकूल श्वसन तथा शरीर की संरचना |
| वायवीय | पक्षी, चमगादड़, उल्लू | उड़ना तथा दिन/रात्रि के अनुसार सक्रियता |
- रेगिस्तानी जन्तुओं में जल संरक्षण और अधिक तापमान से बचने के विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।
- ऊँट का कूबड़, चौड़े पैर और मोटे होंठ उसके रेगिस्तानी अनुकूलन के प्रमुख उदाहरण हैं।
- सवाना क्षेत्र में चीता तेज गति तथा शेर घात लगाकर शिकार करने के लिए अनुकूलित है।
- ध्रुवीय भालू में मोटी वसा, घना फर और चौड़े पैर ठंडे क्षेत्रों के अनुकूलन हैं।
- उभयचर जीव जल और स्थल दोनों के अनुसार अनुकूलन प्रदर्शित करते हैं।
- वायवीय जीवों में उड़ने और दिन अथवा रात के अनुसार सक्रिय रहने से सम्बन्धित अनुकूलन पाए जाते हैं।
पौधों में वातावरणीय अनुकूलन एवं अनुकूलन के प्रकार
पौधों में वातावरणीय अनुकूलन
पौधों को अलग-अलग क्षेत्रों में जीवित रहने और वृद्धि करने के लिए अपने वातावरण के अनुसार अनुकूलित होना पड़ता है। किसी पौधे में पाया जाने वाला ऐसा विशेष गुण या परिवर्तन, जो उसे किसी विशेष स्थान या निवास में जीवित रहने में सहायता करता है, पादप अनुकूलन कहलाता है।
अलग-अलग क्षेत्रों की जलवायु, जल की उपलब्धता, तापमान और मिट्टी की परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं। इसलिए सभी प्रकार के पौधे प्रत्येक स्थान पर समान रूप से नहीं पाए जाते।
उदाहरण के लिए रेगिस्तानी पौधे कम जल में जीवित रहने के लिए अनुकूलित होते हैं, जबकि समुद्री शैवाल जल के भीतर के वातावरण के अनुसार अनुकूलित होते हैं। कुछ पौधों में काँटे तथा अन्य रक्षा संरचनाएँ भी विकसित होती हैं, जो उन्हें अन्य जीवों से सुरक्षा प्रदान करती हैं।
वनस्पति अनुकूलन के उदाहरण
पौधों में अनुकूलन केवल जीवित रहने के लिए ही नहीं, बल्कि भोजन प्राप्त करने, जल एवं पोषक तत्व ग्रहण करने, प्रजनन करने तथा स्वयं की रक्षा करने के लिए भी पाया जाता है।
फूलों के चमकीले रंग तथा मधुरस विभिन्न परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं। कुछ मीठे फल पक्षियों एवं अन्य जीवों को आकर्षित करते हैं, जो बीजों को दूसरे स्थानों तक पहुँचाने में सहायता करते हैं।
कुछ पौधों में मौसम के अनुसार विशेष व्यवहार भी दिखाई देता है। ये अनुकूलन पौधों को प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना अस्तित्व बनाए रखने में सहायता करते हैं।
पौधों में अनुकूलन के प्रकार
पौधों के अनुकूलन को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है—
- संरचनात्मक अनुकूलन
- व्यवहारात्मक अनुकूलन
- शारीरिक अनुकूलन
1. संरचनात्मक अनुकूलन (Structural Adaptation)
जब पौधे की बाहरी संरचना या उसके विभिन्न अंगों में ऐसे परिवर्तन पाए जाते हैं जो उसे भोजन, जल, पोषण, प्रजनन अथवा सुरक्षा में सहायता करते हैं, तो इसे संरचनात्मक अनुकूलन कहा जाता है।
(i) भोजन प्राप्त करने हेतु अनुकूलन
पौधों की पत्तियाँ और तना सूर्य के प्रकाश की सहायता से भोजन निर्माण में भाग लेते हैं। इस प्रकार इन अंगों की संरचना भोजन प्राप्त करने और निर्माण करने के लिए महत्त्वपूर्ण होती है।
(ii) प्रजनन हेतु अनुकूलन
अनेक पौधों में चमकीले रंग के फूल तथा मधुरस पाया जाता है। ये पक्षियों, तितलियों और कीटों जैसे परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं।
कुछ पौधों के मीठे फल भी जीवों को आकर्षित करते हैं। ये जीव फलों या बीजों को दूसरे स्थानों तक ले जाकर बीजों के प्रसार में सहायता करते हैं। कुछ बीज वायु के माध्यम से भी फैलते हैं।
(iii) जल एवं पोषण प्राप्त करने हेतु अनुकूलन
पौधों की जड़ें मिट्टी से जल और पोषक तत्व प्राप्त करती हैं तथा उन्हें पौधे के विभिन्न भागों तक पहुँचाने में सहायता करती हैं।
(iv) प्रतिरक्षा हेतु अनुकूलन
कई पौधों में काँटे तथा शूल जैसी संरचनाएँ विकसित होती हैं, जो उन्हें शाकाहारी जन्तुओं से बचाती हैं।
Poison Ivy और Poison Oak जैसे पौधों में ऐसे पदार्थ पाए जाते हैं जो छूने पर खुजली या जलन उत्पन्न कर सकते हैं।
2. व्यवहारात्मक अनुकूलन (Behavioural Adaptation)
जब पौधे परिस्थितियों के अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन करके वातावरण से सामंजस्य स्थापित करते हैं, तो इसे व्यवहारात्मक अनुकूलन कहा जाता है।
(i) भोजन प्राप्त करने हेतु व्यवहारात्मक अनुकूलन
पौधे प्रकाश की दिशा में बढ़ते हैं। उनकी जड़ें मिट्टी के भीतर नीचे की ओर तथा लताएँ सूर्य का प्रकाश प्राप्त करने के लिए ऊपर की ओर बढ़ती हैं।
वीनस फ्लाई ट्रैप जैसे पौधे भोजन प्राप्त करने के लिए कीटों को अपने जाल में फँसा लेते हैं।
(ii) जल एवं पोषण हेतु व्यवहारात्मक अनुकूलन
कुछ रेगिस्तानी पौधे कई महीनों तक निष्क्रिय अवस्था में रह सकते हैं और वर्षा होने पर पुनः सक्रिय हो जाते हैं।
(iii) प्रजनन हेतु व्यवहारात्मक अनुकूलन
विभिन्न पौधे अपनी नई संतति के प्रसार के लिए बीजों को गिराते अथवा अलग-अलग माध्यमों से फैलाते हैं।
3. शारीरिक अनुकूलन (Physiological Adaptation)
शारीरिक अनुकूलन पौधे के भीतर होने वाली ऐसी आन्तरिक प्रक्रिया है, जो उसके जीवित रहने की संभावना को बढ़ाती है।
इस प्रकार के अनुकूलन में पौधे के भीतर ऐसी जैविक क्रियाएँ होती हैं जो उसे प्रतिकूल परिस्थितियों से बचने में सहायता करती हैं।
शारीरिक अनुकूलन के प्रमुख उदाहरण
- कुछ पौधे अपनी रक्षा के लिए विषैले पदार्थ उत्पन्न करते हैं। Nightshade Plant इसका उदाहरण है।
- कुछ पौधों में पत्तियाँ न होने पर तने प्रकाश संश्लेषण का कार्य करते हैं।
- कुछ पौधों में रात के समय ठंड होने पर फूल खिलते हैं।
- पौधे Antibiotics अथवा कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्राप्त कर सकते हैं।
पौधों के तीनों अनुकूलनों में अन्तर
| अनुकूलन का प्रकार | मुख्य विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| संरचनात्मक अनुकूलन | पौधे के अंगों या बाहरी संरचना में उपयोगी विशेषताएँ | काँटे, जड़ें, फूलों के चमकीले रंग |
| व्यवहारात्मक अनुकूलन | परिस्थितियों के अनुसार पौधे के व्यवहार में परिवर्तन | प्रकाश की ओर बढ़ना, निष्क्रिय अवस्था, बीज प्रसार |
| शारीरिक अनुकूलन | पौधे के भीतर होने वाली जीवन-रक्षक आन्तरिक प्रक्रियाएँ | विष निर्माण, तने में प्रकाश संश्लेषण, प्रतिरोधक क्षमता |
- पौधों में अनुकूलन उन्हें अलग-अलग वातावरण में जीवित रहने और वृद्धि करने में सहायता करता है।
- पादप अनुकूलन मुख्यतः संरचनात्मक, व्यवहारात्मक और शारीरिक तीन प्रकार का होता है।
- संरचनात्मक अनुकूलन भोजन, प्रजनन, जल-पोषण तथा सुरक्षा से सम्बन्धित हो सकता है।
- वीनस फ्लाई ट्रैप द्वारा कीट पकड़ना तथा पौधों का प्रकाश की ओर बढ़ना व्यवहारात्मक अनुकूलन के उदाहरण हैं।
- विष निर्माण, तने में प्रकाश संश्लेषण तथा प्रतिरोधक क्षमता शारीरिक अनुकूलन के उदाहरण हैं।
विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में पादप अनुकूलन
विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में पादप अनुकूलन
अलग-अलग प्राकृतिक क्षेत्रों में तापमान, वर्षा, जल की उपलब्धता, मिट्टी, हवा तथा अन्य परिस्थितियाँ अलग होती हैं। इसलिए वहाँ पाए जाने वाले पौधों में भी वातावरण के अनुसार विशेष अनुकूलन विकसित होते हैं।
पादप अनुकूलन के पाँच प्रमुख क्षेत्र हैं—
- मरुस्थलीय क्षेत्र
- प्राकृतिक मैदानी/घासभूमि क्षेत्र
- टैगा प्रदेश
- आर्द्रभूमि एवं जलीय क्षेत्र
- उष्णकटिबंधीय वर्षा वन
1. मरुस्थलीय क्षेत्रों में पादप अनुकूलन
मरुस्थलीय क्षेत्रों में जल की कमी और अधिक तापमान प्रमुख समस्याएँ हैं। इसलिए यहाँ के पौधों में जल को सुरक्षित रखने और वाष्पीकरण कम करने वाले विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।
मरुस्थलीय पौधों के प्रमुख अनुकूलन
- कुछ पौधे रसीले या फूले हुए होते हैं और अपने तने अथवा पत्तियों में जल का भण्डारण करते हैं।
- कई पौधों में पत्तियाँ नहीं होतीं या बहुत छोटी होती हैं। कुछ पौधों में पत्तियाँ केवल वर्षा के बाद निकलती हैं। पत्तियों की कमी से जल की हानि कम होती है और हरा तना प्रकाश संश्लेषण करता है।
- इनकी जड़ें बहुत लम्बी होती हैं और जल प्राप्त करने के लिए जमीन में अधिक गहराई तथा दूर तक फैल सकती हैं।
- कुछ पौधों की पत्तियों पर रोएँ पाए जाते हैं, जो छाया प्रदान करके जल की हानि कम करने में सहायता करते हैं। कुछ पौधों की पत्तियाँ दिनभर अपनी दिशा बदलती रहती हैं, जिससे अधिक गर्मी का प्रभाव कम हो।
- तनों और पत्तियों पर मोम जैसा आवरण पाया जाता है, जो पानी की हानि को कम करता है।
- पौधों में काँटे पाए जाते हैं, जो उन्हें जन्तुओं द्वारा खाए जाने से बचाते हैं।
कैक्टस में अनुकूलन
कैक्टस मरुस्थलीय अनुकूलन का प्रमुख उदाहरण है। इसकी पत्तियाँ काँटों में परिवर्तित हो जाती हैं, जिससे वाष्पीकरण कम होता है तथा पौधे को जन्तुओं से सुरक्षा भी मिलती है।
इसका तना मांसल होता है और जल का संग्रह करता है। तने की मोटी बाहरी परत भी जल को सुरक्षित रखने में सहायता करती है। वर्षा के बाद इसकी जड़ें शीघ्रता से जल ग्रहण करने के लिए छोटी-छोटी जड़िकाएँ विकसित कर सकती हैं।
2. प्राकृतिक घासभूमि में पादप अनुकूलन
प्राकृतिक घासभूमि में आग, तेज हवा, कम जल तथा पशुओं द्वारा चराई जैसी परिस्थितियाँ पौधों को प्रभावित करती हैं। यहाँ के पौधों में इन परिस्थितियों से बचने के लिए विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।
- आग लगने पर घास का ऊपरी भाग नष्ट हो सकता है, लेकिन उसकी जड़ें जीवित रहती हैं और बाद में पौधा पुनः उग आता है।
- कुछ मैदानी वृक्षों की छाल मोटी होती है, जिससे उन्हें आग से सुरक्षा मिलती है।
- मैदानी झाड़ियाँ आग के बाद पुनः आसानी से उग सकती हैं।
- घास की जड़ें जमीन में गहराई तथा दूर तक फैली रहती हैं, जिससे अधिक नमी प्राप्त की जा सके।
- जड़ों का विस्तृत जाल पौधों को चरने वाले जन्तुओं द्वारा आसानी से उखड़ने से भी बचाता है।
- इन क्षेत्रों के पौधों की पत्तियाँ संकीर्ण होती हैं, जिससे चौड़ी पत्तियों की तुलना में कम जल की हानि होती है।
- घास की वृद्धि का महत्त्वपूर्ण भाग जमीन के निकट रहता है, इसलिए आग लगने या जन्तुओं द्वारा चर लिए जाने पर भी पौधा पूर्णतः नष्ट नहीं होता।
- अनेक पौधे परागण के लिए वायु की सहायता लेते हैं।
- लचीले तने तेज हवा में पौधों को टूटने से बचाते हैं।
3. टैगा प्रदेश में पादप अनुकूलन
टैगा प्रदेश में अत्यधिक ठंड और बर्फबारी होती है। इसलिए यहाँ के पौधों में कम तापमान, बर्फ और जल की हानि से बचने वाले अनुकूलन पाए जाते हैं।
- अनेक पौधे सदाबहार होते हैं, जिससे तापमान अनुकूल होते ही वे प्रकाश संश्लेषण कर सकें।
- कई पौधों की पत्तियाँ सुई के समान नुकीली होती हैं। ये कम जल की हानि करती हैं और उन पर बर्फ आसानी से नहीं टिकती।
- नुकीली पत्तियों पर मोम की परत होती है, जो वाष्पीकरण कम करती है।
- अनेक वृक्षों की शाखाएँ नीचे की ओर झुकी रहती हैं, जिससे अधिक बर्फ का भार शाखाओं पर न टिके और उनके टूटने की सम्भावना कम हो।
4. आर्द्रभूमि एवं जलीय क्षेत्रों में पादप अनुकूलन
जलीय पौधों को पानी के प्रवाह, जल के भीतर गैसों तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता के अनुसार अनुकूलित होना पड़ता है।
- जलीय पौधों के तने और पत्तियाँ लचीले होते हैं, जिससे वे पानी के बहाव के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकें।
- कुछ जलीय पौधों के तनों में वायु से भरे स्थान होते हैं, जो उन्हें पानी में तैरने या स्थिर रहने में सहायता करते हैं।
- जलमग्न पौधों में मजबूत संवहनी तंत्र का अभाव हो सकता है। उनकी पत्तियाँ पानी से सीधे पोषक तत्व तथा घुली हुई गैसें ग्रहण कर सकती हैं।
- इनमें जड़ें या मूल-रोम कम अथवा अनुपस्थित हो सकते हैं, क्योंकि जड़ों का प्रमुख कार्य पौधे को स्थिर रखना होता है।
- कुछ पौधों की पत्तियाँ पानी की सतह पर तैरती हैं, जिससे उन्हें सूर्य का प्रकाश प्राप्त हो सके। कुछ पौधों के बीज भी पानी पर तैर सकते हैं।
5. उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में पादप अनुकूलन
उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में अधिक वर्षा, नमी तथा घनी वनस्पति पाई जाती है। सूर्य का प्रकाश प्राप्त करने, अतिरिक्त जल हटाने तथा कमजोर ऊपरी मिट्टी से पोषण प्राप्त करने के लिए पौधों में विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं।
- पत्तियों की चिकनी या मोमयुक्त सतह तथा नुकीले सिरे पानी को शीघ्र नीचे गिरा देते हैं। इससे पत्तियों पर अधिक जल नहीं रुकता और कवक तथा बैक्टीरिया के जमाव की सम्भावना कम होती है।
- सहायक तथा विस्तृत जड़ें ऊँचे पौधों को मजबूत सहारा देती हैं।
- कुछ पौधे, जैसे बेलें, सूर्य का प्रकाश प्राप्त करने के लिए दूसरे वृक्षों पर चढ़ जाती हैं।
- वन के निचले तल पर कुछ पुष्प परागण करने वाले जन्तुओं को आकर्षित करने के लिए विशेष गन्ध उत्पन्न करते हैं।
- पत्तियों के नुकीले सिरे और चिकनी सतह वर्षा के जल को तेजी से नीचे गिराने में सहायता करते हैं।
- कई पौधों की जड़ें जमीन में अधिक गहराई तक न जाकर ऊपरी सतह के निकट फैली रहती हैं, जिससे वे मिट्टी की ऊपरी परत से पोषक तत्व प्राप्त कर सकें।
- कुछ अधिजीवी पौधों, जैसे Orchid, की जड़ें खुली हवा में रहती हैं। वे अन्य वृक्षों का सहारा लेकर ऊपर बढ़ते हैं और वातावरण से जल प्राप्त करते हैं।
विभिन्न क्षेत्रों में पादप अनुकूलन एक नजर में
| प्राकृतिक क्षेत्र | प्रमुख अनुकूलन |
|---|---|
| मरुस्थल | जल संग्रह, काँटे, लम्बी जड़ें, मोमयुक्त आवरण और छोटी पत्तियाँ |
| घासभूमि | गहरी जड़ें, संकीर्ण पत्तियाँ, आग के बाद पुनः वृद्धि और लचीले तने |
| टैगा प्रदेश | सदाबहार प्रकृति, सुईनुमा पत्तियाँ, मोम की परत और झुकी शाखाएँ |
| जलीय क्षेत्र | लचीले तने-पत्तियाँ, वायु स्थान, कम जड़ें और तैरती पत्तियाँ |
| वर्षा वन | नुकीली पत्तियाँ, चिकनी सतह, सहायक जड़ें, बेलें और अधिजीवी पौधे |
- मरुस्थलीय पौधों में जल संरक्षण के लिए मांसल तना, काँटे, लम्बी जड़ें और मोमयुक्त आवरण पाए जाते हैं।
- घासभूमि के पौधे आग, चराई और तेज हवा से बचने के लिए गहरी जड़ों, संकीर्ण पत्तियों और लचीले तनों द्वारा अनुकूलित होते हैं।
- टैगा प्रदेश के पौधों में सुईनुमा पत्तियाँ, मोम की परत और नीचे की ओर झुकी शाखाएँ पाई जाती हैं।
- जलीय पौधों में लचीले तने-पत्तियाँ, वायु स्थान और तैरने वाली पत्तियाँ प्रमुख अनुकूलन हैं।
- उष्णकटिबंधीय वर्षा वन के पौधों में नुकीली पत्तियाँ, चिकनी सतह, सहायक जड़ें, बेलें तथा अधिजीवी प्रकृति पाई जाती है।