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Home Study Material Semester 1 विज्ञान पदार्थ एवं उनकी अवस्थाएँ
Chapter 6 • विज्ञान

पदार्थ एवं उनकी अवस्थाएँ

UP DELED Semester 1 विज्ञान विषय के इस अध्याय में पदार्थ की अवधारणा, विशेषताएँ एवं गुण, ठोस, द्रव और गैस की संरचना एवं गुण, तत्व, यौगिक और मिश्रण, पदार्थ की अवस्था में परिवर्तन, गलनांक, हिमांक, वाष्पीकरण, वाष्पन एवं क्वथन, विलेयता एवं विलयन, मिश्रण के प्रकार तथा मिश्रणों के पृथक्करण की विभिन्न विधियों का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

10
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15
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Notes
Topic 1 पदार्थ की अवधारणा, विशेषताएँ एवं गुण

पदार्थ की अवधारणा, विशेषताएँ एवं गुण

पदार्थ (Matter)

रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान में ऐसी वस्तु को पदार्थ कहते हैं जो स्थान घेरती है और जिसमें द्रव्यमान होता है।

हमारे चारों ओर अनेक वस्तुएँ पदार्थ से बनी हुई हैं। मिट्टी, लोहा, गिलास, लकड़ी और पत्थर जैसी वस्तुओं को हम देख सकते हैं, जबकि वायु जैसी कुछ वस्तुओं को हम देख नहीं सकते। फिर भी उनमें द्रव्यमान होता है और वे स्थान घेरती हैं, इसलिए वे भी पदार्थ हैं।

उदाहरण के लिए एक कार का निश्चित वजन होता है और वह स्थान भी घेरती है, इसलिए कार पदार्थ का उदाहरण है।

पदार्थ की अवस्थाएँ

पदार्थ की मुख्य तीन अवस्थाएँ हैं—

  1. ठोस
  2. द्रव
  3. गैस

कुछ विशेष परिस्थितियों में पदार्थ प्लाज्मा, अति तरल तथा अतिठोस जैसी अवस्थाएँ भी ग्रहण कर सकता है।

पदार्थ की विशेषताएँ

पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है। पदार्थ के कणों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. पदार्थ के कण अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं।
  2. पदार्थ के कणों के बीच रिक्त स्थान होता है।
  3. पदार्थ के कण निरन्तर गति करते रहते हैं।
  4. पदार्थ के कण एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।

पदार्थ के गुण

पदार्थ के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं—

1. आकार (Shape)

ठोस वस्तुओं का एक निश्चित आकार होता है, जबकि द्रव और गैस का अपना निश्चित आकार नहीं होता। द्रव और गैस जिस बर्तन में रखे जाते हैं, उसी बर्तन का आकार ग्रहण कर लेते हैं।

उदाहरण के लिए पानी को अलग-अलग आकार के बर्तनों में रखने पर वह उसी बर्तन का आकार ले लेता है। इसी प्रकार किसी बर्तन में धुआँ भरने पर गैस भी उस बर्तन का आकार ग्रहण कर लेती है।

2. पदार्थ स्थान घेरते हैं

ठोस और द्रव द्वारा स्थान घेरना सरलता से देखा जा सकता है। गैस भी स्थान घेरती है, यद्यपि इसे प्रत्यक्ष रूप से देखना कठिन होता है।

गैस द्वारा स्थान घेरने का सरल प्रयोग

एक चौड़े मुँह वाली बोतल में पानी भरकर उस पर कॉर्क लगाकर बन्द कर दें। कॉर्क में एक रबड़ की नली लगाएँ और नली के दूसरे सिरे को ड्रिप सेट से जोड़ दें।

अब बोतल को पानी से भरे बड़े बर्तन में उल्टा करके रखें और नली से बोतल में हवा फूँकें। जैसे-जैसे हवा बोतल में प्रवेश करती है, वैसे-वैसे पानी बोतल से बाहर निकलने लगता है।

इससे स्पष्ट होता है कि हवा स्थान घेरती है। बोतल में प्रवेश करने वाली हवा ने पानी का स्थान ग्रहण कर लिया, इसलिए पानी बाहर निकल गया।

3. पदार्थ में भार होता है

ठोस, द्रव तथा गैस सभी में भार होता है।

ठोस एवं द्रव का भार

ठोस वस्तु का भार तुला की सहायता से आसानी से दिखाया जा सकता है। इसी प्रकार किसी बर्तन में द्रव रखकर उसका भार भी मापा जा सकता है।

गैस का भार

गैस का भार दिखाने के लिए एक गुब्बारे को तुला के एक पलड़े में रखकर दूसरे पलड़े में उसके बराबर भार रखा जा सकता है। इसके बाद उसी गुब्बारे को फुलाकर फिर से तौलने पर तुला नीचे की ओर झुकती है।

इससे पता चलता है कि गुब्बारे में भरी हुई हवा का भी भार होता है।

4. विलेयता या घुलनशीलता (Solubility)

पदार्थ के अणुओं के बीच खाली स्थान होता है। जब कोई विलेय पदार्थ किसी विलायक में घुलता है, तो विलेय पदार्थ के कण इन खाली स्थानों में प्रवेश कर जाते हैं और दोनों पदार्थ आपस में घुल-मिल जाते हैं।

इसे चीनी और पानी अथवा नमक और पानी के प्रयोग से समझा जा सकता है। पानी में चीनी या नमक मिलाने पर वे घुलकर एक विलयन बना लेते हैं।

इसके विपरीत मिट्टी या बालू पानी में पूर्ण रूप से नहीं घुलते। ऐसे पदार्थ अविलेय होते हैं।

विलेय पदार्थ को घोलने पर आयतन में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं होती, क्योंकि विलेय के कण विलायक के कणों के बीच उपस्थित खाली स्थानों में समा जाते हैं।

विलेय एवं अविलेय पदार्थ
  • चीनी, नमक और लोहे की कीलें आदि कुछ परिस्थितियों में जल में घुलनशील पदार्थों के उदाहरण दिए गए हैं।
  • मिट्टी और बालू पानी में नहीं घुलते, इसलिए इन्हें अविलेय पदार्थ कहा जाता है।

5. विसरण (Diffusion)

द्रव और गैस के कण एक-दूसरे में फैलकर मिश्रित हो सकते हैं। इस प्रक्रिया को विसरण कहते हैं।

द्रव में विसरण

एक गिलास पानी में स्याही की एक बूँद डालने पर स्याही का रंग धीरे-धीरे पूरे पानी में फैल जाता है। यह द्रव में विसरण का उदाहरण है।

गैस में विसरण

कमरे के एक कोने में अगरबत्ती जलाने पर कुछ समय बाद उसकी सुगन्ध पूरे कमरे में फैल जाती है। यह गैसों के विसरण के कारण होता है।

पदार्थ की विशेषताएँ एवं गुण एक नजर में

विशेषता/गुण मुख्य बात उदाहरण
सूक्ष्म कण पदार्थ अत्यन्त छोटे कणों से बना है। सभी पदार्थ
कणों के बीच स्थान कणों के बीच रिक्त स्थान होता है। पानी में चीनी का घुलना
कणों की गति कण निरन्तर गति करते रहते हैं। विसरण
आकर्षण कण एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। पदार्थ के कणों का आपस में जुड़े रहना
स्थान घेरना ठोस, द्रव और गैस सभी स्थान घेरते हैं। बोतल में हवा भरने पर पानी का बाहर निकलना
भार पदार्थ में भार होता है। फुला हुआ गुब्बारा
विलेयता कुछ पदार्थ दूसरे पदार्थ में घुल जाते हैं। चीनी या नमक का पानी में घुलना
विसरण कण एक-दूसरे में फैलते हैं। पानी में स्याही, कमरे में अगरबत्ती की सुगन्ध
पदार्थ के कणों की विशेषताएँ विलेयता और विसरण
पदार्थ के कणों की प्रमुख विशेषताएँ तथा विलेयता और विसरण
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जो वस्तु स्थान घेरती है और जिसमें द्रव्यमान होता है, उसे पदार्थ कहते हैं।
  • पदार्थ की मुख्य तीन अवस्थाएँ ठोस, द्रव और गैस हैं।
  • पदार्थ के कण अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं और उनके बीच रिक्त स्थान होता है।
  • पदार्थ के कण निरन्तर गति करते हैं तथा एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।
  • ठोस का निश्चित आकार होता है, जबकि द्रव और गैस बर्तन का आकार ग्रहण करते हैं।
  • ठोस, द्रव और गैस सभी स्थान घेरते हैं तथा उनमें भार होता है।
  • किसी पदार्थ की दूसरे पदार्थ में घुलने की क्षमता को विलेयता या घुलनशीलता कहते हैं।
  • द्रव और गैस के कणों का एक-दूसरे में फैलना विसरण कहलाता है।
  • पानी में स्याही का फैलना द्रव में तथा अगरबत्ती की सुगन्ध का कमरे में फैलना गैस में विसरण का उदाहरण है।
Topic 2 ठोस अवस्था: संरचना एवं गुण

ठोस अवस्था: संरचना एवं गुण

पदार्थ की भौतिक संरचना

पदार्थ की भौतिक संरचना उसके कणों के बीच विद्यमान आणविक बलों पर निर्भर करती है। भौतिक संरचना के आधार पर पदार्थ मुख्यतः तीन अवस्थाओं में पाए जाते हैं—

  1. ठोस
  2. द्रव
  3. गैस

किसी निश्चित ताप और दाब पर पदार्थ किस अवस्था में रहेगा, यह मुख्य रूप से दो प्रभावों पर निर्भर करता है—

  • कणों के बीच आकर्षण या आणविक बल
  • कणों की ऊष्मीय ऊर्जा

आणविक आकर्षण बल कणों को एक-दूसरे के समीप रखने का प्रयास करता है, जबकि ऊष्मीय ऊर्जा कणों को अधिक गतिशील बनाकर एक-दूसरे से दूर करने का प्रयास करती है।

ठोस अवस्था (Solid)

ठोस पदार्थ में कणों के बीच का अन्तराणुक स्थान बहुत कम होता है। कण एक-दूसरे के बहुत समीप स्थित रहते हैं और उनके बीच आकर्षण बल अधिक होता है।

कणों के बीच अधिक आकर्षण बल होने के कारण ठोस पदार्थों का आकार और आयतन निश्चित होता है।

उदाहरण— पत्थर, ईंट, गेंद, कार और बस आदि।

ठोस पदार्थों के गुण

ठोस पदार्थों के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं—

1. आकृति और आयतन (Shape and Volume)

ठोस पदार्थ की आकृति तथा उसका आयतन निश्चित होता है।

पुस्तक, मेज, चीनी आदि ठोस पदार्थों के उदाहरण हैं, जिनकी अपनी निश्चित आकृति और आयतन होता है।

आयतन को प्रायः घनमीटर (m3) में व्यक्त किया जाता है।

2. घनत्व (Density)

ठोस पदार्थों का घनत्व प्रायः अधिक होता है।

किसी पदार्थ के इकाई आयतन में उपस्थित द्रव्यमान को उसका घनत्व कहते हैं।

घनत्व = द्रव्यमान / आयतन

आयतन से सम्बन्धित उपयोगी सम्बन्ध
  • 1 L = 0.001 m3
  • 1 L = 1000 ml
  • 1 L = 1000 cm3

3. गलनांक और क्वथनांक

ठोस पदार्थों के गलनांक और क्वथनांक प्रायः उच्च होते हैं।

ठोस पदार्थों के गलनांक और क्वथनांक सामान्यतः कमरे के ताप से अधिक होते हैं।

4. कणों की अवस्था

ठोस पदार्थ में उसके अवयवी कण नियमित रूप से व्यवस्थित रहते हैं।

कणों की इस नियमित व्यवस्था को जालक (Lattice) कहते हैं।

5. संपीड्यता (Compressibility)

ठोस पदार्थ प्रायः असंपीड्य होते हैं।

अर्थात् ठोस पदार्थ पर दाब बढ़ाने या घटाने पर उसके आयतन में आसानी से परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

6. बहाव (Flow)

ठोस पदार्थों में बहने की प्रवृत्ति नहीं होती।

इसी कारण ठोस पदार्थ अपना निश्चित आकार बनाए रखते हैं।

7. प्रसार या संकुचन (Expansion or Contraction)

ठोस पदार्थों को गर्म या ठंडा करने पर उनमें प्रसार या संकुचन बहुत कम होता है।

इसलिए ताप के प्रभाव से ठोस पदार्थों के आयतन में होने वाला परिवर्तन द्रव और गैस की तुलना में बहुत कम होता है।

8. ऊर्ध्वपातन (Sublimation)

वह प्रक्रिया जिसमें कोई ठोस पदार्थ गर्म करने पर द्रव अवस्था में परिवर्तित हुए बिना सीधे वाष्प अवस्था में बदल जाता है और उस वाष्प को ठंडा करने पर वह बिना द्रव बने सीधे अपनी मूल ठोस अवस्था में वापस आ जाता है, ऊर्ध्वपातन कहलाती है।

ऊर्ध्वपातन के परिणामस्वरूप प्राप्त ठोस पदार्थ को ऊर्ध्वपाती पदार्थ कहा जाता है।

उदाहरण— अमोनियम क्लोराइड (नौसादर), आयोडीन, कपूर और नेफ्थलीन।

9. विसरण (Diffusion)

विसरण वह प्रक्रिया है जिसमें किसी द्रव के कण किसी अन्य द्रव में प्रवेश करते हैं।

इस प्रक्रिया में पदार्थ के कण धीरे-धीरे एक-दूसरे के बीच फैलते हैं।

ठोस अवस्था के गुण एक नजर में

गुण ठोस पदार्थ की विशेषता
आकृति निश्चित
आयतन निश्चित
घनत्व प्रायः अधिक
कणों की व्यवस्था नियमित एवं सघन
अन्तराणुक स्थान बहुत कम
आकर्षण बल अधिक
संपीड्यता बहुत कम या लगभग असंपीड्य
बहाव नहीं होता
प्रसार/संकुचन बहुत कम
ठोस पदार्थ की आणविक संरचना और जालक
ठोस पदार्थ में कणों की सघन एवं नियमित व्यवस्था
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • भौतिक संरचना के आधार पर पदार्थ की तीन मुख्य अवस्थाएँ ठोस, द्रव और गैस हैं।
  • पदार्थ की अवस्था कणों के बीच आकर्षण बल और ऊष्मीय ऊर्जा के सम्मिलित प्रभाव पर निर्भर करती है।
  • ठोस पदार्थ में कणों के बीच अन्तराणुक स्थान बहुत कम तथा आकर्षण बल अधिक होता है।
  • ठोस पदार्थ का आकार और आयतन निश्चित होता है।
  • ठोस पदार्थों का घनत्व प्रायः अधिक होता है और घनत्व = द्रव्यमान/आयतन होता है।
  • ठोस के कण नियमित रूप से व्यवस्थित रहते हैं; इस व्यवस्था को जालक कहते हैं।
  • ठोस पदार्थ प्रायः असंपीड्य होते हैं और उनमें बहाव की प्रवृत्ति नहीं होती।
  • गर्म या ठंडा करने पर ठोस पदार्थों में प्रसार या संकुचन बहुत कम होता है।
  • ठोस से सीधे वाष्प और वाष्प से सीधे ठोस में परिवर्तन की प्रक्रिया को ऊर्ध्वपातन कहते हैं।
  • अमोनियम क्लोराइड, आयोडीन, कपूर और नेफ्थलीन ऊर्ध्वपाती पदार्थों के उदाहरण हैं।
Topic 3 द्रव अवस्था: संरचना एवं गुण

द्रव अवस्था: संरचना एवं गुण

द्रव अवस्था (Liquid)

द्रव पदार्थों में कणों के बीच बन्ध ठोस पदार्थों की तुलना में कम होते हैं। इसलिए द्रव के कण अपेक्षाकृत अधिक गतिशील होते हैं।

द्रव का अपना कोई निश्चित आकार नहीं होता। उसे जिस बर्तन में रखा जाता है, वह उसी बर्तन का आकार ग्रहण कर लेता है। लेकिन द्रव का आयतन निश्चित रहता है।

अर्थात् द्रव पदार्थ ऐसी अवस्था है जिसमें आयतन निश्चित होता है, परन्तु आकृति निश्चित नहीं होती।

द्रव पदार्थों के गुण

द्रव पदार्थों के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं—

1. आकृति और आयतन (Shape and Volume)

द्रव पदार्थ की आकृति निश्चित नहीं होती, लेकिन उसका आयतन निश्चित होता है।

द्रव को जिस बर्तन में रखा जाता है, वह उसी बर्तन का आकार ग्रहण कर लेता है।

उदाहरण के लिए पानी को गिलास, बोतल या कटोरे में रखने पर उसका आकार बर्तन के अनुसार बदल जाता है, लेकिन पानी की मात्रा वही रहती है।

2. घनत्व (Density)

द्रव पदार्थ का घनत्व उसके ठोस रूप के घनत्व से कम होता है।

इसका कारण यह है कि द्रव के कण ठोस की तुलना में कम सघन रूप से व्यवस्थित रहते हैं।

3. संपीड्यता (Compressibility)

द्रव पदार्थ प्रायः असंपीड्य होते हैं, अर्थात् दाब लगाने पर उनके आयतन में बहुत कम परिवर्तन होता है।

फिर भी ठोस पदार्थों की तुलना में द्रव थोड़े अधिक संपीड्य होते हैं।

4. गलनांक और क्वथनांक

द्रव पदार्थों के गलनांक और क्वथनांक ठोस पदार्थों की तुलना में प्रायः कम होते हैं।

5. तरलता (Fluidity)

द्रव पदार्थों में बहने की प्रवृत्ति पाई जाती है। इस गुण को तरलता कहते हैं।

इसी कारण द्रव को एक बर्तन से दूसरे बर्तन में आसानी से डाला जा सकता है।

6. द्रव का जमना (Freezing of Liquid)

किसी द्रव का ठोस अवस्था में परिवर्तित होना द्रव का जमना कहलाता है।

उदाहरण के लिए पानी को पर्याप्त ठंडा करने पर वह बर्फ में परिवर्तित हो जाता है।

7. वाष्पन (Evaporation)

किसी द्रव का कमरे के ताप अथवा उसके क्वथनांक से कम ताप पर धीरे-धीरे वाष्प बनकर वायुमण्डल में जाने की प्रक्रिया को वाष्पन कहते हैं।

इस प्रक्रिया में द्रव की सतह से कण धीरे-धीरे गैसीय अवस्था में बदलकर वायु में मिलते रहते हैं।

8. क्वथन और क्वथनांक (Boiling and Boiling Point)

द्रव को गर्म करने पर उसका वाष्पदाब धीरे-धीरे बढ़ता है। जब किसी द्रव का वाष्पदाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर हो जाता है, तब वह द्रव उबलने लगता है।

द्रव के उबलने की इस प्रक्रिया को क्वथन या उबलना कहते हैं।

जिस ताप पर कोई द्रव उबलना प्रारम्भ करता है, उस ताप को उसका क्वथनांक कहते हैं।

9. क्वथनांक पर दाब का प्रभाव

किसी द्रव का क्वथनांक वायुमण्डलीय दाब पर निर्भर करता है।

वायुमण्डलीय दाब अधिक होने पर द्रव का क्वथनांक बढ़ जाता है।

इसके विपरीत वायुमण्डलीय दाब कम होने पर द्रव का क्वथनांक भी कम हो जाता है।

द्रव अवस्था के गुण एक नजर में

गुण द्रव पदार्थ की विशेषता
आकृति निश्चित नहीं, बर्तन का आकार ग्रहण करती है
आयतन निश्चित
कणों के बीच बन्ध ठोस की तुलना में कम
कणों की गति ठोस की तुलना में अधिक
घनत्व ठोस अवस्था की तुलना में कम
संपीड्यता बहुत कम, ठोस से थोड़ी अधिक
बहाव बहने की प्रवृत्ति होती है
जमना द्रव का ठोस अवस्था में परिवर्तन
वाष्पन कम ताप पर धीरे-धीरे वाष्प में परिवर्तन
क्वथन वाष्पदाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर होने पर उबलना
द्रव पदार्थ की आणविक संरचना और गुण
द्रव पदार्थ में कणों की व्यवस्था, निश्चित आयतन तथा अनिश्चित आकार
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • द्रव में कणों के बीच बन्ध ठोस की तुलना में कम होते हैं, इसलिए उसके कण अधिक गतिशील होते हैं।
  • द्रव का आकार निश्चित नहीं होता, लेकिन उसका आयतन निश्चित होता है।
  • द्रव जिस बर्तन में रखा जाता है, उसी बर्तन का आकार ग्रहण कर लेता है।
  • द्रव का घनत्व सामान्यतः उसके ठोस रूप के घनत्व से कम होता है।
  • द्रव प्रायः असंपीड्य होते हैं, लेकिन ठोस की तुलना में थोड़े अधिक संपीड्य होते हैं।
  • द्रव में बहने की प्रवृत्ति होती है, जिसे तरलता कहते हैं।
  • द्रव का ठोस अवस्था में परिवर्तन जमना कहलाता है।
  • द्रव का कमरे के ताप या क्वथनांक से कम ताप पर धीरे-धीरे वाष्प में बदलना वाष्पन कहलाता है।
  • वाष्पदाब के वायुमण्डलीय दाब के बराबर होने पर द्रव उबलने लगता है।
  • वायुमण्डलीय दाब बढ़ने पर क्वथनांक बढ़ता है तथा दाब घटने पर क्वथनांक कम होता है।
Topic 4 गैस अवस्था एवं पदार्थ की तीनों अवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन

गैस अवस्था एवं पदार्थ की तीनों अवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन

गैस अवस्था (Gas)

गैस में कणों के बीच पारस्परिक आकर्षण बल ठोस और द्रव की तुलना में बहुत कम होता है। इसलिए गैस के कण बहुत अधिक गतिशील होते हैं और एक-दूसरे से काफी दूरी पर रहते हैं।

गैस का न तो कोई निश्चित आकार होता है और न ही निश्चित आयतन। गैस को जिस बर्तन में रखा जाता है, वह उसी बर्तन का आकार तथा आयतन ग्रहण कर लेती है।

उदाहरण— वायु, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन आदि।

गैसों के गुण

गैसों के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं—

1. आकृति और आयतन (Shape and Volume)

गैस की न तो कोई निश्चित आकृति होती है और न कोई निश्चित आयतन।

गैस को जिस पात्र में रखा जाता है, वह उसी पात्र की आकृति तथा उसके उपलब्ध आयतन को ग्रहण कर लेती है।

2. घनत्व (Density)

ठोस और द्रव की तुलना में गैसों का घनत्व बहुत कम होता है।

इसका कारण गैस के कणों के बीच अधिक रिक्त स्थान का होना है।

3. गलनांक और क्वथनांक

सामान्य वायुमण्डलीय दाब पर गैसों के गलनांक और क्वथनांक कमरे के ताप से कम होते हैं।

4. संपीड्यता (Compressibility)

गैसों की संपीड्यता बहुत अधिक होती है।

गैस के कणों के बीच पर्याप्त रिक्त स्थान होने के कारण दाब लगाकर उनके आयतन को काफी कम किया जा सकता है।

5. ऊष्मा और ठंड का प्रभाव

गैस को गर्म करने पर उसका प्रसार होता है, जबकि ठंडा करने पर उसका संकुचन होता है।

अर्थात् ताप बढ़ाने पर गैस का आयतन बढ़ सकता है और ताप घटाने पर कम हो सकता है।

6. गैसों का विसरण (Diffusion of Gases)

गैसों के कणों का एक-दूसरे में स्वतः मिल जाना गैसों का विसरण कहलाता है।

गैसों के घनत्व में अन्तर होने पर भी वे आपस में मिश्रित हो सकती हैं।

उदाहरण के लिए किसी स्थान पर फैली सुगन्ध कुछ समय बाद आसपास की वायु में फैल जाती है।

7. गैसों का संघनन (Condensation of Gases)

पदार्थ की गैसीय अवस्था का द्रव अवस्था में परिवर्तन गैस का संघनन कहलाता है।

अर्थात् गैस या वाष्प को ठंडा करने पर उसका द्रव में बदलना संघनन है।

8. गैस का दाब (Pressure of Gas)

गैस के कण लगातार गति करते हुए पात्र की दीवारों से टकराते रहते हैं। पात्र की दीवारों के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर गैस के कणों द्वारा लगाए गए बल को गैस का दाब कहते हैं।

वायु द्वारा उत्पन्न दाब को वायुमण्डलीय दाब कहते हैं। समुद्र तल पर वायु का दाब एक वायुमण्डलीय दाब माना जाता है।

गैस तथा वाष्प के बीच अन्तर

गैस वाष्प
गैस पदार्थ की एक अवस्था होती है। वाष्प को गैस के समान पदार्थ की स्थायी अवस्था नहीं माना जाता।
गैस का कोई निश्चित आकार नहीं होता। वाष्प गैसीय रूप में उपस्थित पदार्थ को व्यक्त करती है।
गैस के कण अनियमित रूप से गति करते हैं। वाष्प के कण भी अनियमित रूप से गति करते हैं।

ठोस, द्रव तथा गैस का तुलनात्मक अध्ययन

गुण ठोस द्रव गैस
आयतन निश्चित होता है। निश्चित होता है। अनिश्चित होता है और पात्र का उपलब्ध आयतन ग्रहण करती है।
आकार निश्चित होता है। अनिश्चित होता है और पात्र का आकार ग्रहण करता है। अनिश्चित होता है और पात्र का आकार ग्रहण करती है।
बहने का गुण बहते नहीं हैं। बहते हैं। चारों दिशाओं में फैलते एवं बहते हैं।
घनत्व प्रायः द्रव से अधिक तथा गैस से बहुत अधिक होता है। प्रायः ठोस से कम तथा गैस से अधिक होता है। ठोस तथा द्रव की तुलना में बहुत कम होता है।
ऊष्मा का प्रभाव ऊष्मा से बहुत कम प्रसार होता है। ठोस की तुलना में अधिक तथा गैस की तुलना में कम प्रसार होता है। ऊष्मा के प्रभाव से बहुत अधिक प्रसार होता है।
दाब का प्रभाव आयतन पर बहुत कम प्रभाव होता है। आयतन पर कम प्रभाव होता है। आयतन पर दाब का प्रभाव बहुत अधिक होता है।
कणों का जुड़ना कणों को सरलता से अलग नहीं किया जा सकता। द्रव की छोटी-छोटी बूँदों को मिलाकर बड़ी बूँद बनाई जा सकती है। गैस के कण बहुत सरलता से आपस में मिल जाते हैं।
उदाहरण लकड़ी, पत्थर, मोम, बर्फ, लोहा, कॉपर, गंधक तथा कोयला जल, दूध, ग्लिसरीन, ब्रोमीन तथा पारा वायु, हाइड्रोजन, हीलियम, नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन

तीनों अवस्थाओं में कणों की स्थिति

  • ठोस में कण बहुत पास-पास और नियमित रूप से व्यवस्थित रहते हैं। आकर्षण बल अधिक तथा रिक्त स्थान बहुत कम होता है।
  • द्रव में कण ठोस की अपेक्षा कुछ दूर होते हैं और उनका आकर्षण बल कम होता है। इसलिए वे एक-दूसरे के पास से खिसक सकते हैं।
  • गैस में कण एक-दूसरे से काफी दूर होते हैं और आकर्षण बल बहुत कम होता है। इसलिए वे स्वतंत्र रूप से तीव्र गति करते हैं।
ठोस द्रव और गैस की आणविक संरचना का तुलनात्मक अध्ययन
ठोस, द्रव और गैस में कणों की व्यवस्था तथा उनके प्रमुख गुण
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • गैस में कणों के बीच आकर्षण बल बहुत कम तथा रिक्त स्थान अधिक होता है।
  • गैस की न तो निश्चित आकृति होती है और न निश्चित आयतन।
  • गैसें अत्यधिक संपीड्य होती हैं और ठोस व द्रव की तुलना में उनका घनत्व बहुत कम होता है।
  • गर्म करने पर गैस का प्रसार तथा ठंडा करने पर संकुचन होता है।
  • गैसों का स्वतः एक-दूसरे में मिलना विसरण कहलाता है।
  • गैसीय अवस्था का द्रव अवस्था में परिवर्तन संघनन कहलाता है।
  • पात्र की दीवारों पर प्रति इकाई क्षेत्रफल में गैस के कणों द्वारा लगाए गए बल को गैस का दाब कहते हैं।
  • ठोस का आकार और आयतन निश्चित, द्रव का आयतन निश्चित पर आकार अनिश्चित तथा गैस का आकार और आयतन दोनों अनिश्चित होते हैं।
  • ठोस में आकर्षण बल सबसे अधिक तथा गैस में सबसे कम होता है।
  • गैस में दाब का प्रभाव तथा ऊष्मीय प्रसार ठोस और द्रव की तुलना में अधिक होता है।
Topic 5 पदार्थ की रासायनिक संरचना: तत्व, यौगिक एवं मिश्रण

पदार्थ की रासायनिक संरचना: तत्व, यौगिक एवं मिश्रण

पदार्थ की रासायनिक संरचना

रासायनिक संरचना के आधार पर पदार्थों को मुख्य रूप से तीन समूहों में बाँटा जाता है—

  1. तत्व
  2. यौगिक
  3. मिश्रण

1. तत्व (Element)

तत्व वह शुद्ध मौलिक पदार्थ है जिसे किसी ज्ञात भौतिक या रासायनिक विधि द्वारा दो या दो से अधिक सरल पदार्थों में विभाजित नहीं किया जा सकता और न ही अन्य सरल पदार्थों के संयोग से बनाया जा सकता है।

राबर्ट बॉयल के अनुसार तत्व वे पदार्थ हैं जिन्हें किसी भी विधि से दो या दो से अधिक भिन्न गुणों वाले पदार्थों में विभाजित नहीं किया जा सकता और न ही उनसे बनाया जा सकता है।

तत्व की यह परिभाषा राबर्ट बॉयल ने सन् 1660 में दी थी।

उदाहरण— लोहा (Fe), कॉपर (Cu), मरकरी (Hg), ब्रोमीन (Br) तथा ऑक्सीजन (O)।

2. यौगिक (Compound)

दो या दो से अधिक तत्वों के निश्चित अनुपात में रासायनिक संयोग से बनने वाले शुद्ध पदार्थ को यौगिक कहते हैं।

यौगिक के गुण उसके अवयव तत्वों के गुणों से भिन्न होते हैं।

उदाहरण: जल

जल (H2O) एक यौगिक है। यह हाइड्रोजन और ऑक्सीजन तत्वों के रासायनिक संयोग से बनता है।

जल के गुण हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों के गुणों से भिन्न होते हैं।

जल में हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन का भार के अनुसार अनुपात सदैव 1 : 8 रहता है।

जल के प्रत्येक अणु में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के परमाणुओं का अनुपात 2 : 1 होता है।

3. मिश्रण (Mixture)

दो या दो से अधिक शुद्ध पदार्थों को किसी भी अनिश्चित अनुपात में भौतिक रूप से मिलाने पर बनने वाले पदार्थ को मिश्रण कहते हैं।

मिश्रण के अवयव पदार्थ अपने मूल गुणों को बनाए रखते हैं और उन्हें सरल भौतिक या यांत्रिक विधियों द्वारा अलग किया जा सकता है।

उदाहरण— पीतल, जो कॉपर और जिंक का मिश्रण है।

यौगिक तथा मिश्रण में अन्तर

यौगिक मिश्रण
यौगिक दो या दो से अधिक तत्वों के निश्चित अनुपात में रासायनिक संयोग से बनते हैं। मिश्रण दो या दो से अधिक पदार्थों को किसी भी अनुपात में मिलाने से बनते हैं।
यौगिक के गुण उसके अवयव तत्वों के गुणों से भिन्न होते हैं। उदाहरण—जल के गुण हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के गुणों से अलग हैं। मिश्रण के गुण उसके अवयवों के गुणों का मिश्रण होते हैं। उदाहरण—जल और चीनी के मिश्रण में दोनों के गुण विद्यमान रहते हैं।
यौगिक के अवयवों को भौतिक विधियों जैसे छानना, निथारना, छानना या उबालना आदि द्वारा अलग नहीं किया जा सकता। मिश्रण के अवयवों को भौतिक विधियों द्वारा अलग किया जा सकता है।
दो या दो से अधिक तत्वों के रासायनिक संयोग से यौगिक बनने पर ऊष्मा उत्पन्न या अवशोषित हो सकती है। मिश्रण बनने पर सामान्यतः ऊष्मा में उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं होता।
यौगिक के प्रत्येक भाग का संघटन समान होता है, इसलिए यह समांगी पदार्थ होता है। कुछ मिश्रणों के प्रत्येक भाग का संघटन समान होता है, जिन्हें समांगी मिश्रण कहते हैं; जबकि जिनका संघटन समान नहीं होता, उन्हें विषमांगी मिश्रण कहते हैं।

तत्व तथा यौगिक में अन्तर

तत्व यौगिक
तत्व एक ही प्रकार के परमाणुओं से बने होते हैं। यौगिक विभिन्न तत्वों से बने होते हैं।
तत्व को विभाजित कर कोई नया तत्व प्राप्त नहीं किया जा सकता। यौगिक को विभाजित करके उसके विभिन्न तत्व प्राप्त किए जा सकते हैं।
तत्व के सूक्ष्मतम कण परमाणु होते हैं। यौगिक के सूक्ष्मतम कण अणु होते हैं।
ज्ञात तत्वों की कुल संख्या 118 है। यौगिक लाखों की संख्या में उपलब्ध हैं।

तत्व, यौगिक एवं मिश्रण एक नजर में

आधार तत्व यौगिक मिश्रण
संरचना एक ही प्रकार के परमाणु दो या अधिक तत्वों का रासायनिक संयोग दो या अधिक पदार्थों का भौतिक संयोग
अनुपात लागू नहीं निश्चित अनिश्चित
गुण स्वयं के निश्चित गुण अवयव तत्वों से भिन्न अवयवों के गुण विद्यमान रहते हैं
पृथक्करण सरल पदार्थों में विभाजित नहीं किया जा सकता भौतिक विधियों से पृथक नहीं किया जा सकता भौतिक या यांत्रिक विधियों से पृथक किया जा सकता है
उदाहरण लोहा, ऑक्सीजन जल पीतल
तत्व यौगिक और मिश्रण का तुलनात्मक अध्ययन
तत्व, यौगिक एवं मिश्रण की संरचना और उनके बीच मुख्य अन्तर
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • रासायनिक संरचना के आधार पर पदार्थों को तत्व, यौगिक और मिश्रण में बाँटा जाता है।
  • तत्व ऐसा शुद्ध पदार्थ है जिसे सरल पदार्थों में विभाजित नहीं किया जा सकता।
  • लोहा, कॉपर, मरकरी, ब्रोमीन और ऑक्सीजन तत्वों के उदाहरण हैं।
  • दो या अधिक तत्वों के निश्चित अनुपात में रासायनिक संयोग से यौगिक बनता है।
  • जल एक यौगिक है और इसमें हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के परमाणुओं का अनुपात 2 : 1 होता है।
  • मिश्रण दो या अधिक पदार्थों के अनिश्चित अनुपात में भौतिक संयोग से बनता है।
  • मिश्रण के अवयवों को सरल भौतिक या यांत्रिक विधियों द्वारा अलग किया जा सकता है।
  • यौगिक के गुण उसके अवयव तत्वों से भिन्न होते हैं, जबकि मिश्रण में अवयवों के गुण बने रहते हैं।
  • तत्व के सूक्ष्मतम कण परमाणु तथा यौगिक के सूक्ष्मतम कण अणु होते हैं।
  • ज्ञात तत्वों की कुल संख्या 118 बताई गई है, जबकि यौगिक लाखों की संख्या में उपलब्ध हैं।
Topic 6 पदार्थ की अवस्था में परिवर्तन, गलनांक एवं हिमांक

पदार्थ की अवस्था में परिवर्तन, गलनांक एवं हिमांक

पदार्थ की अवस्था में परिवर्तन

ताप में परिवर्तन करके पदार्थ को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तित किया जा सकता है। ठोस को द्रव या गैस में, द्रव को ठोस या गैस में तथा गैस को द्रव या ठोस अवस्था में बदला जा सकता है।

पदार्थ की तीन मुख्य भौतिक अवस्थाएँ हैं—

  1. ठोस अवस्था
  2. द्रव अवस्था
  3. गैस अवस्था

जल इसका सरल उदाहरण है। जल बर्फ के रूप में ठोस, पानी के रूप में द्रव तथा भाप के रूप में गैसीय अवस्था में पाया जा सकता है।

तीनों अवस्थाओं के बीच परिवर्तन

अवस्था परिवर्तन प्रक्रिया
ठोस → द्रव गलन
द्रव → ठोस हिमीकरण या जमना
द्रव → गैस वाष्पीकरण
गैस → द्रव संघनन
ठोस → गैस ऊर्ध्वपातन
गैस → ठोस निक्षेपण

गलन या पिघलना (Melting)

जब किसी ठोस पदार्थ को गर्म किया जाता है, तो उसका ताप बढ़ता है। लगातार गर्म करने पर एक अवस्था ऐसी आती है जब ठोस पदार्थ द्रव में बदलना प्रारम्भ कर देता है।

ठोस पदार्थ के द्रव अवस्था में परिवर्तित होने की इस प्रक्रिया को गलन, द्रवण या पिघलना कहते हैं।

गलन प्रारम्भ हो जाने के बाद लगातार ऊष्मा देने पर भी कुछ समय तक पदार्थ का ताप नहीं बढ़ता। यह स्थिति तब तक बनी रहती है जब तक सम्पूर्ण ठोस पदार्थ द्रव में परिवर्तित नहीं हो जाता।

गलनांक (Melting Point)

वह निश्चित ताप जिस पर किसी विशेष दाब पर कोई ठोस पदार्थ द्रव अवस्था में परिवर्तित होना प्रारम्भ करता है, उसका गलनांक कहलाता है।

दूसरे शब्दों में, किसी निश्चित दाब पर वह नियत ताप जिस पर ठोस पदार्थ पिघलकर द्रव में बदलता है, उसका गलनांक है।

अधिकांश ठोस पदार्थों का अवस्था परिवर्तन एक विशेष दाब और एक निश्चित ताप पर होता है।

हिमीकरण या जमना (Freezing)

जब किसी द्रव को लगातार ठंडा किया जाता है, तो एक अवस्था ऐसी आती है जब वह जमना प्रारम्भ कर देता है और ठोस अवस्था में परिवर्तित होने लगता है।

द्रव के ठोस अवस्था में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को हिमीकरण या जमना कहते हैं।

उदाहरण के लिए पानी को ठंडा करने पर वह बर्फ में परिवर्तित हो जाता है।

हिमीकरण की प्रक्रिया गलन की विपरीत प्रक्रिया है।

हिमांक (Freezing Point)

किसी विशेष दाब पर वह निश्चित ताप जिस पर कोई द्रव जमकर ठोस अवस्था में परिवर्तित होने लगता है, उसका हिमांक कहलाता है।

हिमांक सामान्यतः पदार्थ के ठोस रूप के गलनांक के बराबर होता है।

अतिशीतन (Supercooling)

अनेक द्रव ऐसे होते हैं जो ठंडा किए जाने पर अपने सामान्य हिमांक पर तुरंत ठोस अवस्था में परिवर्तित नहीं होते। वे हिमांक से भी कम ताप तक द्रव अवस्था में बने रह सकते हैं।

इस अवस्था को अतिशीतित अवस्था कहते हैं।

ऐसे द्रव कुछ समय बाद अपने सामान्य हिमांक से कम ताप पर ठोस अवस्था में परिवर्तित हो सकते हैं। इसलिए ऐसे द्रवों का हिमांक उनके ठोस रूप के गलनांक के बराबर माना जाता है।

गलनांक एवं हिमांक में सम्बन्ध

आधार गलनांक हिमांक
अवस्था परिवर्तन ठोस से द्रव द्रव से ठोस
प्रक्रिया गलन या पिघलना हिमीकरण या जमना
ताप का अर्थ जिस निश्चित ताप पर ठोस पिघलता है जिस निश्चित ताप पर द्रव जमता है
आपसी सम्बन्ध हिमांक सामान्यतः उसी पदार्थ के गलनांक के बराबर होता है।

जल द्वारा अवस्था परिवर्तन को समझना

  • बर्फ को गर्म करने पर वह पिघलकर पानी बनती है—यह गलन है।
  • पानी को ठंडा करने पर वह जमकर बर्फ बनता है—यह हिमीकरण है।
  • पानी गैसीय अवस्था में भाप के रूप में रह सकता है।
पदार्थ की अवस्थाओं में परिवर्तन गलन और हिमीकरण
ठोस, द्रव और गैस के बीच अवस्था परिवर्तन तथा गलन एवं हिमीकरण
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पदार्थ ठोस, द्रव और गैस अवस्थाओं में परिवर्तित हो सकता है।
  • ठोस से द्रव में परिवर्तन को गलन, द्रवण या पिघलना कहते हैं।
  • जिस निश्चित ताप पर ठोस पदार्थ द्रव में बदलना प्रारम्भ करता है, उसे गलनांक कहते हैं।
  • गलन के दौरान सम्पूर्ण ठोस के द्रव में बदलने तक ताप कुछ समय स्थिर रहता है।
  • द्रव से ठोस अवस्था में परिवर्तन को हिमीकरण या जमना कहते हैं।
  • जिस निश्चित ताप पर किसी विशेष दाब पर द्रव जमता है, उसे हिमांक कहते हैं।
  • हिमीकरण, गलन की विपरीत प्रक्रिया है।
  • हिमांक सामान्यतः उसी पदार्थ के गलनांक के बराबर होता है।
  • कुछ द्रव हिमांक पर न जमकर उससे कम ताप तक द्रव बने रह सकते हैं; इस अवस्था को अतिशीतन कहते हैं।
  • ठोस से गैस ऊर्ध्वपातन, गैस से ठोस निक्षेपण, द्रव से गैस वाष्पीकरण तथा गैस से द्रव परिवर्तन संघनन कहलाता है।
Topic 7 वाष्पीकरण, वाष्पन एवं क्वथन

वाष्पीकरण, वाष्पन एवं क्वथन

वाष्पीकरण (Vaporisation)

द्रव के वाष्प या गैसीय अवस्था में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं।

वाष्पीकरण मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है—

  1. वाष्पन
  2. क्वथन

1. वाष्पन (Evaporation)

किसी द्रव का सामान्य ताप पर अथवा उसके क्वथनांक से कम ताप पर धीरे-धीरे गैसीय अवस्था में परिवर्तित होकर वायुमण्डल में मिलना वाष्पन कहलाता है।

जब किसी द्रव को वायु में खुला छोड़ दिया जाता है, तो उसकी सतह के कण धीरे-धीरे वाष्प में बदलकर वायुमण्डल में चले जाते हैं।

वाष्पन के उदाहरण

यदि थोड़ी मात्रा में जल को प्लेट में रखकर खुली वायु में छोड़ दिया जाए, तो कुछ समय बाद वह जल धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। ऐसा जल के वाष्पन के कारण होता है।

इसी प्रकार भीगे हुए कपड़ों को हवा में फैलाने पर वे कुछ समय बाद सूख जाते हैं। इसका कारण भी कपड़ों में उपस्थित जल का वाष्पन है।

वाष्पन की गति को प्रभावित करने वाले कारक

वाष्पन की गति निम्न परिस्थितियों में बढ़ जाती है—

  1. द्रव का ताप बढ़ाने पर— ताप बढ़ने से द्रव के कण अधिक तेजी से वाष्प अवस्था में जाने लगते हैं।
  2. द्रव का सतही क्षेत्रफल बढ़ाने पर— अधिक सतह वायु के सम्पर्क में आने से वाष्पन की गति बढ़ जाती है।
  3. वायु का प्रवाह तेज होने पर— तेज हवा द्रव की सतह के पास बनी वाष्प को हटाती रहती है, जिससे वाष्पन तेजी से होता है।

वायु की आर्द्रता का प्रभाव

जल के वाष्पन की गति वायु में उपस्थित आर्द्रता पर भी निर्भर करती है।

शुष्क वायु की उपस्थिति में वाष्पन की गति अधिक होती है। वायु में नमी अधिक होने पर वाष्पन अपेक्षाकृत धीमा हो जाता है।

द्रव की प्रकृति का प्रभाव

वाष्पन की गति द्रव की प्रकृति पर भी निर्भर करती है। कुछ द्रव बहुत तेजी से वाष्पित होते हैं।

उदाहरण— पेट्रोल और ईथर तेजी से वाष्पित होने वाले द्रव हैं।

वाष्पशीलता (Volatility)

किसी द्रव के आसानी या तेजी से वाष्पित होने के गुण को उसकी वाष्पशीलता कहते हैं।

जिन द्रवों का वाष्पन शीघ्रता से होता है, उनकी वाष्पशीलता अधिक होती है। ऐसे द्रव अधिक वाष्पशील कहलाते हैं।

वाष्पन का शीतलन प्रभाव

वाष्पन की प्रक्रिया में द्रव का ताप कम हो जाता है।

इसी कारण वाष्पन के साथ शीतलन का प्रभाव अनुभव किया जा सकता है।

2. क्वथन (Boiling)

जब किसी द्रव को गर्म किया जाता है, तो उसका ताप बढ़ता है और उसके वाष्पन की गति भी बढ़ती जाती है।

वाष्पन की प्रक्रिया मुख्यतः द्रव की सतह पर होती है, अर्थात् सतह पर उपस्थित कण पहले गैसीय अवस्था में परिवर्तित होते हैं।

ताप लगातार बढ़ाने पर एक अवस्था ऐसी आती है जब केवल सतह के कण ही नहीं, बल्कि द्रव के भीतर उपस्थित कण भी तेजी से गैसीय अवस्था में परिवर्तित होने लगते हैं।

इस समय द्रव के भीतर बुलबुले बनने और ऊपर उठने लगते हैं तथा सम्पूर्ण द्रव तेजी से वाष्प अवस्था में बदलने लगता है। इस प्रक्रिया को क्वथन या उबलना कहते हैं।

क्वथन के समय ताप

क्वथन प्रारम्भ होने के बाद कुछ समय तक द्रव का ताप स्थिर रहता है, जबकि द्रव लगातार गैसीय अवस्था में परिवर्तित होता रहता है।

क्वथनांक (Boiling Point)

जिस निश्चित ताप पर कोई द्रव उबलना प्रारम्भ करता है, उस ताप को उसका क्वथनांक कहते हैं।

वाष्पन तथा क्वथन में अन्तर

वाष्पन क्वथन
वाष्पन की प्रक्रिया किसी भी सामान्य ताप पर हो सकती है। क्वथन एक निश्चित ताप पर होता है।
वाष्पन में केवल द्रव की सतह पर उपस्थित कण गैसीय अवस्था में परिवर्तित होते हैं। क्वथन में द्रव के प्रत्येक भाग के कण गैसीय अवस्था में परिवर्तित होने लगते हैं।
वाष्पन की प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है। क्वथन की प्रक्रिया तेजी से होती है।
वाष्पन की गति वायु के प्रवाह तथा वायु की आर्द्रता से प्रभावित होती है। क्वथन की प्रक्रिया वायु के प्रवाह की गति तथा वायु की आर्द्रता से प्रभावित नहीं होती।

वाष्पन और क्वथन को सरल उदाहरण से समझें

  • प्लेट में रखा पानी सामान्य ताप पर धीरे-धीरे समाप्त होता है—यह वाष्पन है।
  • चूल्हे पर पानी को लगातार गर्म करने पर उसमें बुलबुले बनने लगते हैं और वह तेजी से भाप में बदलता है—यह क्वथन है।
वाष्पन और क्वथन का तुलनात्मक अध्ययन
वाष्पन और क्वथन की प्रक्रिया तथा उनके बीच मुख्य अन्तर
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • द्रव से वाष्प में परिवर्तन की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं।
  • वाष्पीकरण दो प्रकार का होता है—वाष्पन और क्वथन।
  • वाष्पन सामान्य ताप या क्वथनांक से कम ताप पर धीरे-धीरे होने वाली सतही प्रक्रिया है।
  • ताप और सतही क्षेत्रफल बढ़ाने तथा वायु का प्रवाह तेज करने पर वाष्पन की गति बढ़ती है।
  • शुष्क वायु में वाष्पन अधिक तथा अधिक आर्द्र वायु में कम होता है।
  • पेट्रोल और ईथर अधिक वाष्पशील द्रवों के उदाहरण हैं।
  • किसी द्रव के शीघ्र वाष्पित होने के गुण को वाष्पशीलता कहते हैं।
  • वाष्पन के कारण द्रव का ताप कम होता है।
  • क्वथन में द्रव की सतह के साथ उसके भीतर के कण भी तेजी से गैसीय अवस्था में परिवर्तित होते हैं।
  • जिस निश्चित ताप पर कोई द्रव उबलता है, उसे क्वथनांक कहते हैं।
  • वाष्पन धीरे-धीरे और किसी भी सामान्य ताप पर हो सकता है, जबकि क्वथन तेजी से और निश्चित ताप पर होता है।
Topic 8 पदार्थों की विलेयता एवं विलयन

पदार्थों की विलेयता एवं विलयन

विलेयता (Solubility)

जब दो या दो से अधिक पदार्थ आपस में मिलते हैं, तो उनके बीच अलग-अलग प्रकार के परिणाम हो सकते हैं।

दो पदार्थों को एक-दूसरे के सम्पर्क में लाने पर निम्न स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं—

  1. दोनों पदार्थ एक-दूसरे के सम्पर्क में आने पर भी अलग-अलग बने रहें।
  2. यदि उनमें से एक पदार्थ द्रव हो, तो वे मिलकर पायस बना सकते हैं।
  3. दोनों पदार्थ मिलकर एक समांगी मिश्रण बना सकते हैं।
  4. दोनों पदार्थों के बीच रासायनिक क्रिया होकर एक या अधिक नए यौगिक बन सकते हैं।

पायस (Emulsion)

जब दो ऐसे द्रव आपस में मिलाए जाते हैं जो एक-दूसरे में पूर्ण रूप से नहीं घुलते, लेकिन कुछ समय के लिए एक-दूसरे में फैले रहते हैं, तो ऐसी अवस्था को पायस कहते हैं।

उदाहरण के रूप में खड़िया को महीन पीसकर पानी में मिलाने पर उसका बहुत महीन भाग कुछ समय तक पानी के साथ मिला हुआ दिखाई देता है।

विलेय, विलायक और विलयन

जो पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ में घुलता है, उसे विलेय कहते हैं।

जिस पदार्थ में विलेय को घोला जाता है, उसे विलायक कहते हैं।

विलेय को विलायक में घोलने पर जो समांगी मिश्रण प्राप्त होता है, उसे विलयन कहते हैं।

विलेय तथा विलायक दोनों ठोस, द्रव या गैस अवस्था में हो सकते हैं।

उदाहरण: नमक का जल में विलयन

जब नमक को पानी में घोला जाता है, तो नमक विलेय, पानी विलायक तथा प्राप्त नमक-जल विलयन कहलाता है।

विलेयता या घुलनशीलता

किसी विलायक में किसी विलेय की जितनी मात्रा घुलाई जा सकती है, उसे उस विलेय की विलेयता या घुलनशीलता कहते हैं।

दूसरे शब्दों में, किसी पदार्थ की किसी द्रव में घुलने की क्षमता को विलेयता कहा जाता है।

विलेयता को प्रभावित करने वाले कारक

किसी विलेय की विलेयता केवल विलेय और विलायक के भौतिक एवं रासायनिक गुणों पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि निम्न कारकों से भी प्रभावित होती है—

  • ताप
  • दाब
  • pH मान

अवक्षेप (Precipitate)

किसी विलायक में विलेय मिलाते समय एक सीमा के बाद विलयन का सामर्थ्य नहीं बढ़ता। इसके बाद डाला गया अतिरिक्त विलेय घुलने के बजाय अलग होकर नीचे या बाहर दिखाई देने लगता है।

इस प्रकार अलग होने वाले ठोस पदार्थ को अवक्षेप कहते हैं।

घुलनशील एवं अघुलनशील पदार्थ

कुछ पदार्थ किसी विलायक में आसानी से घुल जाते हैं, जबकि कुछ पदार्थ उसमें नहीं घुलते।

उदाहरण के लिए नमक पानी में घुल जाता है, जबकि खड़िया पानी में वास्तविक रूप से नहीं घुलती।

खड़िया और पानी का उदाहरण

यदि खड़िया या चॉक के कुछ टुकड़ों को पानी में डालकर अच्छी तरह हिलाया जाए, तो खड़िया के बड़े टुकड़े नीचे बैठ जाते हैं और उनके चारों ओर पानी रहता है।

यदि खड़िया को बहुत महीन पीसकर पानी में मिलाया जाए, तो उसके छोटे-छोटे कण पानी में फैलकर कुछ समय के लिए दूध जैसा रूप उत्पन्न कर सकते हैं।

फिर भी खड़िया पानी में वास्तविक रूप से घुलती नहीं है। इसलिए खड़िया को जल में अविलेय पदार्थ माना जाता है।

यदि इस मिश्रण को छाना जाए, तो खड़िया पानी से अलग हो जाती है।

नमक और पानी का उदाहरण

यदि नमक के टुकड़ों को पानी में डालकर मिलाया जाए, तो कुछ समय बाद नमक पानी में घुलकर दिखाई देना बंद कर देता है।

प्राप्त द्रव देखने में पानी जैसा ही दिखाई देता है, लेकिन उसका स्वाद नमकीन होता है। इस प्रकार प्राप्त समांगी मिश्रण नमक का जलीय विलयन कहलाता है।

संतृप्त विलयन (Saturated Solution)

किसी निश्चित ताप और दाब पर जब किसी विलायक में विलेय की अधिकतम मात्रा घुल चुकी हो और उसमें अधिक विलेय न घुल सके, तो उस विलयन को संतृप्त विलयन कहते हैं।

अर्थात् संतृप्त विलयन में उस निश्चित परिस्थिति में और अधिक विलेय घोलना सम्भव नहीं होता।

असंतृप्त विलयन (Unsaturated Solution)

जिस विलयन में अभी और अधिक मात्रा में विलेय घुल सकता हो, उसे असंतृप्त विलयन कहते हैं।

असंतृप्त विलयन में विलेय की मात्रा उस मात्रा से कम होती है जो उसी परिस्थिति में संतृप्त विलयन में उपस्थित हो सकती है।

अतिसंतृप्त विलयन (Supersaturated Solution)

जिस विलयन में विलेय की मात्रा उसी परिस्थिति में संतृप्त विलयन में उपस्थित मात्रा से अधिक हो, उसे अतिसंतृप्त विलयन कहते हैं।

अतिसंतृप्त विलयन सामान्यतः अस्थायी होते हैं और विशेष परिस्थितियों में ही बनते हैं।

ऐसे विलयन से अतिरिक्त घुला हुआ ठोस कभी भी अलग होकर बाहर आ सकता है।

विलायक एवं विलेय की पहचान

जब कोई गैस या ठोस किसी द्रव में घुलता है, तो सामान्यतः द्रव को विलायक तथा गैस या ठोस को विलेय कहा जाता है।

जब एक द्रव दूसरे द्रव में घुलता है, तो अधिक मात्रा वाले द्रव को विलायक तथा कम मात्रा वाले द्रव को विलेय कहा जाता है।

विलयन की अवस्थाएँ एक नजर में

विलयन का प्रकार मुख्य विशेषता
असंतृप्त विलयन इसमें और विलेय घुल सकता है।
संतृप्त विलयन निश्चित ताप और दाब पर और विलेय नहीं घुल सकता।
अतिसंतृप्त विलयन संतृप्त विलयन की अपेक्षा अधिक विलेय उपस्थित होता है।

विलेय, विलायक एवं विलयन एक नजर में

शब्द अर्थ उदाहरण
विलेय जो पदार्थ घुलता है नमक
विलायक जिसमें विलेय घुलता है पानी
विलयन विलेय और विलायक से बना समांगी मिश्रण नमक का जल में विलयन
विलेयता विलेय विलायक तथा संतृप्त असंतृप्त और अतिसंतृप्त विलयन
विलेय, विलायक, विलयन तथा संतृप्त, असंतृप्त एवं अतिसंतृप्त विलयन
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जो पदार्थ घुलता है उसे विलेय और जिसमें वह घुलता है उसे विलायक कहते हैं।
  • विलेय और विलायक से प्राप्त समांगी मिश्रण को विलयन कहते हैं।
  • किसी विलायक में विलेय की घुलने की क्षमता को विलेयता या घुलनशीलता कहते हैं।
  • विलेयता ताप, दाब, pH तथा विलेय-विलायक के गुणों पर निर्भर करती है।
  • नमक पानी में विलेय है, जबकि खड़िया जल में अविलेय है।
  • एक सीमा के बाद न घुलने वाला अतिरिक्त ठोस अवक्षेप के रूप में अलग हो सकता है।
  • जिस विलयन में और विलेय घुल सकता है, वह असंतृप्त विलयन है।
  • जिस विलयन में निश्चित ताप और दाब पर और अधिक विलेय न घुल सके, वह संतृप्त विलयन है।
  • संतृप्त अवस्था से भी अधिक विलेय रखने वाला विलयन अतिसंतृप्त विलयन कहलाता है।
  • अतिसंतृप्त विलयन सामान्यतः अस्थायी होते हैं।
Topic 9 मिश्रण एवं उसके प्रकार

मिश्रण एवं उसके प्रकार

मिश्रण (Mixture)

दो या दो से अधिक द्रव्यों को किसी भी अनुपात में मिलाने पर बनने वाले पदार्थ को मिश्रण कहते हैं।

मिश्रण के गुण उसके अवयव पदार्थों के गुणों का सम्मिलित रूप होते हैं। अर्थात् मिश्रण बनाने वाले पदार्थ अपने मूल गुणों को बनाए रखते हैं।

उदाहरण— चीनी और नमक का मिश्रण, नमक तथा पानी का मिश्रण, लकड़ी के बुरादे और लोहे के कणों का मिश्रण आदि।

मिश्रण के प्रकार

मिश्रण मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं—

  1. समांगी मिश्रण
  2. विषमांगी मिश्रण

1. समांगी मिश्रण (Homogeneous Mixture)

जिस मिश्रण के किसी भी भाग का संघटन उसके अन्य भागों के संघटन के समान होता है, उसे समांगी मिश्रण कहते हैं।

समांगी मिश्रण में अवयव इस प्रकार मिले रहते हैं कि मिश्रण के प्रत्येक भाग के गुण समान होते हैं।

रसायन विज्ञान में निश्चित अनुपात में अवयवों को मिलाने से समांगी मिश्रण का निर्माण बताया गया है।

उदाहरण— नमक तथा जल का मिश्रण और चीनी तथा जल का मिश्रण।

समांगी मिश्रण की मुख्य विशेषताएँ
  • मिश्रण के प्रत्येक भाग का संघटन समान होता है।
  • इसके प्रत्येक भाग के गुण समान होते हैं।
  • इसके विभिन्न अवयवों की सीमाएँ अलग-अलग दिखाई नहीं देतीं।
  • विलयन समांगी मिश्रण का उदाहरण है।

2. विषमांगी मिश्रण (Heterogeneous Mixture)

जिस मिश्रण के विभिन्न भागों का संघटन एक-दूसरे से भिन्न होता है, उसे विषमांगी मिश्रण कहते हैं।

रसायन विज्ञान में अनिश्चित अनुपात में अवयवों को मिलाने से विषमांगी मिश्रण का निर्माण बताया गया है।

विषमांगी मिश्रण के विभिन्न भागों के गुण तथा उनके संघटक एक-दूसरे से भिन्न हो सकते हैं।

उदाहरण— चीनी तथा नमक का मिश्रण और जल तथा तेल का मिश्रण।

विषमांगी मिश्रण की मुख्य विशेषताएँ
  • मिश्रण के विभिन्न भागों का संघटन समान नहीं होता।
  • इसके विभिन्न भागों के गुण भिन्न हो सकते हैं।
  • अवयवों की सीमाओं को अलग-अलग देखा जा सकता है।
  • जल और तेल का मिश्रण विषमांगी मिश्रण का उदाहरण है।

समांगी एवं विषमांगी मिश्रण में अन्तर

समांगी मिश्रण विषमांगी मिश्रण
मिश्रण के प्रत्येक भाग का संघटन एक समान होता है। मिश्रण के प्रत्येक भाग का संघटन एक समान नहीं होता।
तत्व, यौगिक तथा समांगी मिश्रण या विलयन समांगी द्रव्य माने जाते हैं। विषमांगी मिश्रण विषमांगी द्रव्य होता है।
विभिन्न अवयवों की सीमाओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। विभिन्न अवयवों की सीमाओं को अलग-अलग देखा जा सकता है।
उदाहरण—जल तथा चीनी का मिश्रण। उदाहरण—लोहे की छीलन, बालू-रेत तथा चीनी का मिश्रण।

समांगी एवं विषमांगी मिश्रण को उदाहरण से समझें

चीनी और पानी

चीनी को पानी में घोलने पर वह पूरे पानी में समान रूप से मिल जाती है। मिश्रण के किसी भी भाग को लेने पर उसका संघटन लगभग समान रहता है। इसलिए चीनी और पानी का मिश्रण समांगी मिश्रण है।

तेल और पानी

तेल और पानी को मिलाने पर वे पूरी तरह एक-दूसरे में समान रूप से नहीं मिलते और अलग-अलग भागों के रूप में दिखाई देते हैं। इसलिए तेल और पानी का मिश्रण विषमांगी मिश्रण है।

मिश्रण के प्रकार एक नजर में

आधार समांगी मिश्रण विषमांगी मिश्रण
संघटन प्रत्येक भाग में समान विभिन्न भागों में भिन्न
अवयवों की सीमा अलग दिखाई नहीं देती अलग दिखाई दे सकती है
गुण प्रत्येक भाग में समान विभिन्न भागों में भिन्न हो सकते हैं
उदाहरण नमक-जल, चीनी-जल जल-तेल, चीनी-नमक
समांगी और विषमांगी मिश्रण का तुलनात्मक अध्ययन
समांगी और विषमांगी मिश्रण में संघटन एवं अवयवों की व्यवस्था का अन्तर
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • दो या दो से अधिक द्रव्यों को किसी भी अनुपात में मिलाने पर मिश्रण बनता है।
  • मिश्रण के दो मुख्य प्रकार हैं—समांगी और विषमांगी मिश्रण।
  • जिस मिश्रण के प्रत्येक भाग का संघटन समान हो, उसे समांगी मिश्रण कहते हैं।
  • नमक-जल और चीनी-जल समांगी मिश्रण के उदाहरण हैं।
  • जिस मिश्रण के विभिन्न भागों का संघटन अलग-अलग हो, उसे विषमांगी मिश्रण कहते हैं।
  • जल-तेल तथा चीनी-नमक विषमांगी मिश्रण के उदाहरण हैं।
  • समांगी मिश्रण में अवयवों की सीमाएँ अलग-अलग दिखाई नहीं देतीं।
  • विषमांगी मिश्रण में विभिन्न अवयवों को अलग-अलग पहचाना जा सकता है।
Topic 10 मिश्रणों का पृथक्करण: आवश्यकता एवं विधियाँ

मिश्रणों का पृथक्करण: आवश्यकता एवं विधियाँ

मिश्रणों का पृथक्करण

किसी मिश्रण से उसके विभिन्न घटकों को अलग-अलग करने की प्रक्रिया को पृथक्करण कहते हैं।

पृथक्करण द्वारा मिश्रण में उपस्थित अनावश्यक पदार्थों को हटाया जाता है तथा लाभदायक या शुद्ध पदार्थों को अलग प्राप्त किया जाता है।

किसी मिश्रण के घटकों को अलग करने के लिए उनके आकार, भार, घुलनशीलता, चुम्बकीय गुण, क्वथनांक तथा अन्य भौतिक गुणों के अन्तर का उपयोग किया जाता है।

मिश्रण के तत्वों को पृथक करने की आवश्यकता

मिश्रण से उसके घटकों को अलग करने की आवश्यकता मुख्य रूप से निम्न कारणों से होती है—

  1. अनावश्यक तत्वों को हटाने के लिए— मिश्रण में उपस्थित अनुपयोगी या अनावश्यक पदार्थों को हटाने के लिए पृथक्करण किया जाता है।
  2. लाभदायक तत्वों की प्राप्ति के लिए— मिश्रण में उपस्थित उपयोगी पदार्थों को अलग प्राप्त करने के लिए पृथक्करण किया जाता है।
  3. शुद्ध पदार्थ प्राप्त करने के लिए— किसी पदार्थ में मिली अशुद्धियों को हटाकर शुद्ध पदार्थ प्राप्त करने के लिए पृथक्करण किया जाता है।
  4. मिश्रण के तत्वों का अनुपात ज्ञात करने के लिए— मिश्रण के विभिन्न घटकों को पृथक करके उनकी मात्रा या अनुपात ज्ञात किया जा सकता है।

पृथक्करण की विधियाँ

किसी मिश्रण से उसके घटकों को अलग करने के लिए ऐसी विधि चुनी जाती है जो उन घटकों के गुणों के अन्तर पर आधारित हो।

मिश्रणों के पृथक्करण की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं—

1. बीनना

कुछ अनाजों जैसे गेहूँ, चावल अथवा दाल में कंकड़, मिट्टी तथा अन्य अनावश्यक पदार्थ मिले हो सकते हैं। इन पदार्थों का आकार, आकृति या रंग अनाज से अलग होने के कारण उन्हें हाथ से चुनकर अलग किया जा सकता है।

हाथ से अनावश्यक पदार्थों को चुनकर अलग करने की प्रक्रिया को बीनना कहते हैं।

2. चालना

जब किसी मिश्रण के घटकों के कणों के आकार में अन्तर होता है, तो उन्हें छलनी की सहायता से अलग किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए आटे से भूसी को अलग करने के लिए आटे को छलनी में रखकर छाना जाता है। महीन आटा छलनी के छिद्रों से निकल जाता है और बड़े कण ऊपर रह जाते हैं।

इस विधि को चालना कहते हैं।

3. फटकना

फटकने की विधि द्वारा हल्के पदार्थों को भारी पदार्थों से अलग किया जाता है।

उदाहरण के लिए सूप की सहायता से गेहूँ को फटकने पर हल्का भूसा तथा अन्य अनावश्यक हल्की वस्तुएँ अलग हो जाती हैं।

4. ओसाना

इस विधि में अनाज और हल्की भूसी के मिश्रण को किसी ऊँचे स्थान से नीचे गिराया जाता है।

किसान जब भूसीयुक्त अनाज को ऊँचाई से गिराता है, तो भारी अनाज पास में गिरता है, जबकि हल्की भूसी वायु के साथ कुछ दूर चली जाती है।

इस प्रकार वायु की सहायता से हल्के और भारी पदार्थों को अलग करने की विधि को ओसाना कहते हैं।

5. चुम्बकीय पृथक्करण

जब किसी मिश्रण में कोई चुम्बकीय पदार्थ उपस्थित होता है, तो उसे चुम्बक की सहायता से अन्य पदार्थों से अलग किया जा सकता है।

इस विधि को चुम्बकीय पृथक्करण कहते हैं।

उदाहरण के लिए लोहे के बुरादे और नमक के मिश्रण के पास चुम्बक लाने पर लोहे के कण चुम्बक की ओर आकर्षित होकर अलग हो जाते हैं, जबकि नमक वहीं रह जाता है।

6. ऊर्ध्वपातन

ऊर्ध्वपातन द्वारा ऐसे दो ठोस पदार्थों के मिश्रण को अलग किया जाता है जिनमें से एक पदार्थ गर्म करने पर बिना द्रव अवस्था में आए सीधे गैसीय अवस्था में बदल जाता है, जबकि दूसरा पदार्थ ऐसा नहीं करता।

ऐसे पदार्थ जो गर्म करने पर ठोस से सीधे वाष्प में बदलते हैं, ऊर्ध्वपाती पदार्थ कहलाते हैं।

उदाहरण— कपूर, आयोडीन तथा नौसादर।

7. छानना

द्रव में उपस्थित अघुलनशील ठोस पदार्थ को फिल्टर पेपर की सहायता से अलग करने की प्रक्रिया को छानना कहते हैं।

इसके लिए फिल्टर पेपर को शंकु के आकार में मोड़कर कीप में लगाया जाता है। मिश्रण को फिल्टर पेपर पर डालने पर द्रव उसके छिद्रों से होकर नीचे निकल जाता है, जबकि अघुलनशील ठोस पदार्थ फिल्टर पेपर पर रह जाता है।

8. भारण

पानी में उपस्थित ऐसे सूक्ष्म अशुद्ध कण जो आसानी से नीचे नहीं बैठते, उन्हें भारी बनाकर नीचे बैठाने की प्रक्रिया को भारण कहते हैं।

उदाहरण के लिए तालाब या नदी के गंदे पानी में फिटकरी का बड़ा टुकड़ा धागे से बाँधकर पानी में घुमाया जा सकता है।

फिटकरी के प्रभाव से मिट्टी के सूक्ष्म कण भारी होकर नीचे बैठने लगते हैं। इसके बाद ऊपर के स्वच्छ पानी को निथारकर अलग किया जा सकता है।

9. तलछटीकरण

द्रव में उपस्थित अघुलनशील भारी ठोस कणों को कुछ समय तक स्थिर रखने पर वे नीचे बैठ जाते हैं। इस प्रक्रिया को तलछटीकरण कहते हैं।

उदाहरण के लिए रेत मिले पानी को बीकर में कुछ समय तक रखने पर रेत नीचे बैठ जाती है और पानी ऊपर रह जाता है।

ऊपरी स्वच्छ पानी को सावधानी से दूसरे बर्तन में डालकर रेत से अलग किया जा सकता है।

10. अपकेन्द्रण

इस विधि द्वारा द्रव में मिले विभिन्न घनत्व वाले घटकों को तीव्र गति से घुमाकर अलग किया जाता है।

उदाहरण के लिए दूध को मथनी से तीव्र गति से मथने पर उससे मक्खन या क्रीम अलग की जा सकती है।

तीव्र घूर्णन के कारण भारी घटक एक ओर तथा हल्के घटक दूसरी ओर एकत्र होने लगते हैं, जिससे उन्हें अलग करना आसान हो जाता है।

11. आसवन

जब दो द्रवों के क्वथनांकों में पर्याप्त अन्तर होता है, तो उनके मिश्रण को आसवन विधि द्वारा अलग किया जा सकता है।

इस विधि में मिश्रण के अधिक वाष्पशील द्रव को गर्म करके वाष्प में बदला जाता है। बाद में उस वाष्प को ठंडा करके पुनः द्रव में परिवर्तित कर लिया जाता है।

इस प्रकार आसवन में वाष्पीकरण और संघनन दोनों प्रक्रियाएँ होती हैं।

आसवन = वाष्पीकरण + संघनन

12. प्रभाजी आसवन

ऐसे मिश्रित द्रव जिनके क्वथनांकों में अन्तर बहुत कम होता है, उन्हें प्रभाजी आसवन द्वारा अलग किया जाता है।

इस विधि का प्रयोग उन द्रवों के पृथक्करण में किया जाता है जिनके क्वथनांकों में लगभग 10°C से 60°C तक का अन्तर हो।

उदाहरण: जल और एल्कोहॉल

जल का क्वथनांक 100°C तथा एल्कोहॉल का क्वथनांक लगभग 80°C है।

जल और एल्कोहॉल के मिश्रण को प्रभाजी आसवन फ्लास्क में लेकर लगभग 80°C तक गर्म करने पर एल्कोहॉल पहले वाष्पित होने लगता है।

एल्कोहॉल की वाष्प को संघनित्र द्वारा ठंडा करके अलग एकत्र कर लिया जाता है, जबकि फ्लास्क में जल शेष रहता है।

इस विधि को आंशिक आसवन या प्रभाजी आसवन भी कहते हैं।

13. क्रिस्टलीकरण

द्रव में घुले हुए ठोस पदार्थ को शुद्ध रूप में अलग प्राप्त करने की विधि को क्रिस्टलीकरण कहते हैं।

इस विधि में अशुद्ध ठोस पदार्थ को पर्याप्त मात्रा में गर्म द्रव में घोला जाता है। प्राप्त घोल को फिल्टर पेपर द्वारा छानकर अशुद्धियों को अलग किया जाता है।

इसके बाद विलयन को ठंडा करने पर शुद्ध पदार्थ के क्रिस्टल प्राप्त होते हैं।

उदाहरण— फिटकरी तथा मिश्री के क्रिस्टल इस विधि द्वारा बनाए जा सकते हैं।

पृथक्करण की विधियाँ एक नजर में

विधि किस आधार पर पृथक्करण उदाहरण
बीनना आकार, आकृति या रंग का अन्तर अनाज से कंकड़
चालना कणों के आकार का अन्तर आटे से भूसी
फटकना हल्के और भारी कण गेहूँ से भूसा
ओसाना भार तथा वायु का प्रभाव अनाज से भूसी
चुम्बकीय पृथक्करण चुम्बकीय गुण नमक से लोहे का बुरादा
ऊर्ध्वपातन ऊर्ध्वपाती गुण कपूर, आयोडीन, नौसादर
छानना अघुलनशील ठोस कण द्रव से ठोस अशुद्धि
भारण सूक्ष्म कणों को भारी बनाना फिटकरी द्वारा गंदे पानी की अशुद्धियाँ
तलछटीकरण भारी अघुलनशील कणों का नीचे बैठना रेत और पानी
अपकेन्द्रण तीव्र घूर्णन दूध से क्रीम या मक्खन
आसवन क्वथनांक में पर्याप्त अन्तर मिश्रित द्रवों का पृथक्करण
प्रभाजी आसवन क्वथनांक में कम अन्तर जल और एल्कोहॉल
क्रिस्टलीकरण विलयन से शुद्ध ठोस प्राप्त करना फिटकरी, मिश्री

पदार्थ की अवस्था सम्बन्धी गतिविधियाँ

गतिविधि 1: ठोस से द्रव और पुनः द्रव से ठोस

एक बर्तन में मोम रखकर उसे गर्म करें। गर्म करने पर मोम पिघलकर द्रव अवस्था में बदल जाएगा।

अब पिघले हुए मोम को कुछ समय के लिए ठंडा होने दें। ठंडा होने पर वह पुनः ठोस अवस्था में बदल जाएगा।

इस गतिविधि से स्पष्ट होता है कि ताप में परिवर्तन द्वारा पदार्थ की अवस्था बदली जा सकती है।

गतिविधि 2: द्रव से गैस और गैस से द्रव

एक बर्तन में पानी लेकर उसे गर्म करें। कुछ समय बाद पानी भाप में परिवर्तित होकर ऊपर उठने लगेगा।

अब उठती हुई भाप के ऊपर एक ठंडी प्लेट रखें। प्लेट को सुरक्षित दूरी से किसी सँडसी की सहायता से पकड़ें।

भाप ठंडी प्लेट से टकराकर पुनः पानी में बदल जाएगी और प्लेट पर पानी की बूँदें दिखाई देने लगेंगी।

इन बूँदों को किसी बर्तन में एकत्र भी किया जा सकता है।

इस गतिविधि से द्रव से गैस तथा गैस से द्रव में अवस्था परिवर्तन को समझा जा सकता है।

मिश्रणों के पृथक्करण की प्रमुख विधियाँ
मिश्रण के विभिन्न घटकों को उनके गुणों के आधार पर पृथक करने की प्रमुख विधियाँ
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मिश्रण से उसके विभिन्न घटकों को अलग करने की प्रक्रिया पृथक्करण कहलाती है।
  • पृथक्करण द्वारा अनावश्यक तत्व हटाए जाते हैं, उपयोगी एवं शुद्ध पदार्थ प्राप्त किए जाते हैं तथा घटकों का अनुपात ज्ञात किया जा सकता है।
  • बीनना, चालना, फटकना और ओसाना दैनिक जीवन में प्रयुक्त सरल पृथक्करण विधियाँ हैं।
  • चुम्बकीय पदार्थ को मिश्रण से चुम्बक द्वारा अलग करने की विधि चुम्बकीय पृथक्करण कहलाती है।
  • ऊर्ध्वपातन द्वारा ऐसे ठोसों को अलग किया जाता है जिनमें से एक गर्म करने पर सीधे वाष्प में बदलता है।
  • छानने द्वारा द्रव में उपस्थित अघुलनशील ठोस पदार्थ अलग किए जाते हैं।
  • भारण में सूक्ष्म अशुद्ध कणों को भारी बनाकर नीचे बैठाया जाता है।
  • तलछटीकरण में भारी अघुलनशील कण नीचे बैठ जाते हैं।
  • अपकेन्द्रण में मिश्रण को तीव्र गति से घुमाकर उसके घटक अलग किए जाते हैं।
  • आसवन में वाष्पीकरण और संघनन दोनों प्रक्रियाओं का प्रयोग होता है।
  • कम क्वथनांक-अन्तर वाले मिश्रित द्रवों को प्रभाजी आसवन से अलग किया जाता है।
  • क्रिस्टलीकरण द्वारा विलयन से शुद्ध ठोस क्रिस्टल प्राप्त किए जाते हैं।
  • गर्म करने और ठंडा करने द्वारा पदार्थ को ठोस, द्रव और गैस अवस्थाओं में परिवर्तित किया जा सकता है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

पदार्थ की अवस्थाएँ होती हैं—

व्याख्या: पदार्थ की तीन मुख्य भौतिक अवस्थाएँ होती हैं—ठोस, द्रव और गैस।
Q 2

पानी का क्वथनांक होता है—

व्याख्या: सामान्य दशाओं में पानी का क्वथनांक 100°C होता है।
Q 3

निम्नलिखित में से किस पदार्थ की आकृति एवं आयतन दोनों अनिश्चित होते हैं—

व्याख्या: हाइड्रोजन गैस है। गैस की आकृति और आयतन दोनों निश्चित नहीं होते।
Q 4

मार्श-गैस है—

व्याख्या: मार्श-गैस मीथेन है।
Q 5

उपापचय क्रिया होती है—

व्याख्या: उपापचय क्रिया दो प्रकार की मानी जाती है।
Q 6

जो पदार्थ जल में घुल जाते हैं, वे होते हैं—

व्याख्या: जो पदार्थ किसी विलायक में घुलता है, उसे विलेय कहते हैं।
Q 7

नमक के विलयन से नमक प्राप्त करने की विधि है—

व्याख्या: नमक के विलयन से जल को वाष्पित करने पर नमक शेष रह जाता है।
Q 8

मिश्रण में विलेय तथा अविलेय पदार्थ को अलग करने को कहते हैं—

व्याख्या: मिश्रण के विभिन्न घटकों को अलग-अलग करने की प्रक्रिया पृथक्करण कहलाती है।
Q 9

निम्नलिखित में से यौगिक है—

व्याख्या: जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के निश्चित अनुपात में रासायनिक संयोग से बना यौगिक है।
Q 10

निम्नलिखित में से कौन-सी विधि घुलनशील ठोस पदार्थों को द्रव से पृथक करना है—

व्याख्या: घुले हुए ठोस पदार्थ को द्रव से अलग करने के लिए द्रव का वाष्पीकरण किया जा सकता है।
Q 11

दही को मथनी द्वारा तीव्र गति से मथने से प्राप्त मक्खन को पृथक करने की विधि का नाम है—

व्याख्या: दही को तीव्र गति से मथकर मक्खन अलग करना अपकेन्द्रण का उदाहरण है।
Q 12

बालू और लोहे की छीलन को पृथक किया जाता है—

व्याख्या: लोहे की छीलन चुम्बक की ओर आकर्षित होती है, इसलिए उसे बालू से चुम्बकीय पृथक्करण द्वारा अलग किया जाता है।
Q 13

यौगिक का उदाहरण है—

व्याख्या: चीनी एक यौगिक है, जबकि वायु, धुआँ और चीनी का विलयन मिश्रण हैं।
Q 14

ऊर्ध्वपातज पदार्थ नहीं है—

व्याख्या: नौसादर, आयोडीन और कपूर ऊर्ध्वपातन प्रदर्शित करते हैं, जबकि नमक ऊर्ध्वपातज पदार्थ नहीं है।
Q 15

नमक के विलयन से नमक प्राप्त करने की विधि है—

व्याख्या: नमक के विलयन से पानी का वाष्पन करने पर नमक प्राप्त किया जा सकता है।

पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय विज्ञान के अध्याय पदार्थ एवं उनकी अवस्थाएँ से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

यौगिक तथा मिश्रण में अन्तर बताइए।

Q 2

पदार्थ की ठोस, द्रव तथा गैस अवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।

Q 3

पदार्थ के गुण लिखिए।

Q 4 2023

वाष्पन तथा क्वथन में अन्तर बताइए।

Q 5 2020

मिश्रण कितने प्रकार का होता है? व्याख्या कीजिए।

Q 6 2018

वाष्प तथा गैस में क्या अन्तर है? लिखिए।

Q 7 2016

बीनना एवं फटकना पृथक्करण की विधियों को सोदाहरण समझाइए।

Q 8 2017, 2023

ठोस, द्रव एवं गैस की आणविक संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।

Q 9 2020

20 मीटर/सेकण्ड की चाल से चलने वाली वस्तु 120 मीटर की दूरी कितने समय में तय करेगी?

Q 10 2022

पदार्थों के पृथक्करण से आप क्या समझते हैं? पृथक्करण की किन्हीं चार विधियों के नाम लिखिए।

Q 11 2022

तत्व तथा यौगिक में अन्तर लिखिए।

Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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