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Chapter 5 • विज्ञान

गति एवं बल

UP DELED Semester 1 विज्ञान विषय के इस अध्याय में गति की अवधारणा एवं प्रकार, न्यूटन के गति के नियम, जड़त्व, संवेग, क्रिया-प्रतिक्रिया, गुरुत्वाकर्षण, चाल एवं उसके प्रकार, बल की अवधारणा एवं प्रभाव, बल के विभिन्न प्रकार तथा घर्षण बल का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

9
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15
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Notes
Topic 1 गति की अवधारणा एवं निर्देश तंत्र

गति की अवधारणा एवं निर्देश तंत्र

गति (Motion)

जब किसी पिण्ड की स्थिति समय के साथ बदलती है, तो वह पिण्ड गतिमान अवस्था में माना जाता है। किसी पिण्ड की स्थिति में समय के साथ होने वाले परिवर्तन को गति कहते हैं।

किसी वस्तु की गति का अध्ययन करने के लिए यह जानना आवश्यक होता है कि उसकी स्थिति किसके सापेक्ष बदल रही है। इसलिए गति का वर्णन किसी निश्चित निर्देश तंत्र के सापेक्ष किया जाता है।

निर्देश तंत्र (Frame of Reference)

वह चुना हुआ आधार या व्यवस्था जिसके सापेक्ष किसी पिण्ड की स्थिति अथवा गति का वर्णन किया जाता है, निर्देश तंत्र कहलाता है।

किसी वस्तु को गतिमान या विराम अवस्था में बताना चुने गए निर्देश तंत्र पर निर्भर करता है। यदि किसी पिण्ड के निर्देशांक चुने हुए निर्देश तंत्र के सापेक्ष समय के साथ बदलते हैं, तो पिण्ड गतिमान होता है। यदि उसके निर्देशांक समय के साथ नहीं बदलते, तो वह उस निर्देश तंत्र के सापेक्ष विराम अवस्था में होता है।

गति एवं विराम की सापेक्षता

एक ही वस्तु किसी एक व्यक्ति के लिए विराम अवस्था में तथा दूसरे व्यक्ति के लिए गतिमान दिखाई दे सकती है। इसलिए गति और विराम का निर्धारण निर्देश तंत्र के आधार पर किया जाता है।

उदाहरण के लिए पृथ्वी पर खड़े व्यक्ति को उसके आसपास के पेड़-पौधे विराम अवस्था में दिखाई देते हैं। इसके विपरीत चलती हुई रेलगाड़ी में बैठे व्यक्ति को बाहर की वस्तुएँ अपनी स्थिति बदलती हुई दिखाई देती हैं।

निर्देशांकों के आधार पर गति

किसी पिण्ड की स्थिति को तीन निर्देशांकों X, Y और Z द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। समय के साथ कितने निर्देशांक बदलते हैं, इसके आधार पर गति को एकविमीय, द्विविमीय और त्रिविमीय गति में बाँटा जाता है।

1. एकविमीय गति (One Dimensional Motion)

जब किसी पिण्ड के X, Y और Z निर्देशांकों में से केवल एक निर्देशांक समय के साथ परिवर्तित होता है, तो उसकी गति एकविमीय गति कहलाती है।

ऐसी गति में पिण्ड एक सरल रेखा में गति करता है। इसलिए इसे सरल रेखीय गति (Rectilinear Motion) भी कहा जाता है।

2. द्विविमीय गति (Two Dimensional Motion)

जब किसी पिण्ड के दो निर्देशांक समय के साथ परिवर्तित होते हैं, तो वह पिण्ड एक समतल में गति करता है। ऐसी गति को द्विविमीय गति अथवा समतल में गति (Motion in a Plane) कहते हैं।

3. त्रिविमीय गति (Three Dimensional Motion)

जब किसी पिण्ड के तीनों निर्देशांक समय के साथ परिवर्तित होते हैं, तो उसकी गति त्रिविमीय गति कहलाती है।

यह गति अन्तरिक्ष में होती है, इसलिए इसे अन्तरिक्ष में गति (Motion in Space) भी कहा जाता है।

एकविमीय, द्विविमीय एवं त्रिविमीय गति में अन्तर

गति समय के साथ बदलने वाले निर्देशांक गति का क्षेत्र
एकविमीय गति केवल एक निर्देशांक सरल रेखा
द्विविमीय गति दो निर्देशांक समतल
त्रिविमीय गति तीनों निर्देशांक अन्तरिक्ष
गति निर्देश तंत्र तथा एकविमीय द्विविमीय और त्रिविमीय गति
निर्देश तंत्र के सापेक्ष गति तथा एकविमीय, द्विविमीय एवं त्रिविमीय गति
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • किसी पिण्ड की स्थिति में समय के साथ होने वाले परिवर्तन को गति कहते हैं।
  • गति का वर्णन किसी चुने हुए निर्देश तंत्र के सापेक्ष किया जाता है।
  • निर्देशांक समय के साथ बदलने पर पिण्ड गतिमान तथा न बदलने पर विराम अवस्था में माना जाता है।
  • एक निर्देशांक बदलने पर एकविमीय, दो निर्देशांक बदलने पर द्विविमीय तथा तीनों निर्देशांक बदलने पर त्रिविमीय गति होती है।
  • एकविमीय गति को सरल रेखीय गति, द्विविमीय गति को समतल में गति तथा त्रिविमीय गति को अन्तरिक्ष में गति भी कहा जाता है।
Topic 2 गति के प्रकार

गति के प्रकार

गति के प्रकार

किसी पिण्ड की गति उसके पथ, दिशा तथा गति के स्वरूप के अनुसार अलग-अलग प्रकार की हो सकती है। गति के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं—

  1. रेखीय या स्थानान्तरण गति
  2. वृतीय गति
  3. घूर्णन गति
  4. दोलन या कम्पनिक गति
  5. प्रक्षेप्य गति
  6. लुढ़कन गति
  7. आवर्ती गति

1. रेखीय या स्थानान्तरण गति (Linear / Translatory Motion)

जब कोई पिण्ड एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर सरल रेखा में गति करता है, तो उसकी गति को रेखीय या स्थानान्तरण गति कहते हैं।

यदि समतल पर रखे किसी पिण्ड को धक्का दिया जाए और वह सरल रेखा में आगे बढ़ने लगे, तो उसमें स्थानान्तरण गति होती है। इस प्रकार की गति में पिण्ड के प्रत्येक कण की गति समान प्रकार से होती है।

इसे सरल रेखीय गति भी कहा जाता है।

2. वृतीय गति (Circular Motion)

जब कोई पिण्ड वृत्ताकार पथ पर गति करता है, तो उसकी गति को वृतीय गति कहते हैं।

सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की गति, वृत्ताकार पथ पर खिलौने की गति तथा वृत्ताकार मार्ग पर चलने वाली वस्तुएँ इसके उदाहरण हैं।

यदि कोई पिण्ड वृत्ताकार पथ पर एकसमान चाल से चलता है, तब भी उसका वेग लगातार बदलता रहता है, क्योंकि गति की दिशा बदलती रहती है। किसी बिन्दु पर वेग की दिशा वृत्ताकार पथ की स्पर्श रेखा की दिशा में होती है, जबकि उत्पन्न त्वरण की दिशा वृत्त के केन्द्र की ओर होती है।

3. घूर्णन गति (Rotational Motion)

जब कोई पिण्ड किसी स्थिर अक्ष के चारों ओर घूमता है, तो उसकी गति को घूर्णन गति कहते हैं।

घूर्णन गति में पिण्ड अपनी जगह पर अक्ष के चारों ओर घूमता है। इसमें सम्पूर्ण पिण्ड का एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना आवश्यक नहीं होता।

उदाहरण— छत के पंखे की गति, चक्की के पाटों की गति तथा घूमते हुए लट्टू की गति।

वृतीय एवं घूर्णन गति में सरल अन्तर

वृतीय गति घूर्णन गति
पिण्ड वृत्ताकार पथ पर गति करता है। पिण्ड किसी स्थिर अक्ष के चारों ओर घूमता है।
गति का पथ वृत्ताकार होता है। पिण्ड के विभिन्न भाग अक्ष के चारों ओर घूमते हैं।
उदाहरण—पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना। उदाहरण—पंखे के पंखों या लट्टू का घूमना।

4. दोलन या कम्पनिक गति (Oscillation and Vibration Motion)

जब कोई वस्तु अपनी साम्य स्थिति के दोनों ओर बार-बार इधर-उधर, ऊपर-नीचे अथवा आगे-पीछे गति करती है, तो उसकी गति को दोलन या कम्पनिक गति कहते हैं।

उदाहरण— दीवार घड़ी के पेण्डुलम की गति, सिलाई मशीन की सुई की गति, सरल लोलक की गति तथा स्प्रिंग को नीचे खींचकर छोड़ने पर होने वाली गति।

साम्य स्थिति

वह निश्चित स्थिति जिसके दोनों ओर कोई वस्तु बार-बार दोलन करती है, उसकी साम्य स्थिति या माध्य स्थिति कहलाती है।

वस्तु साम्य स्थिति से एक ओर जाती है, फिर वापस साम्य स्थिति में आती है और इसके बाद दूसरी ओर जाती है। यह प्रक्रिया लगातार दोहराई जा सकती है।

दोलन गति से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण तथ्य
  • प्रत्येक दोलन या कम्पन गति आवर्ती गति होती है, लेकिन प्रत्येक आवर्ती गति का दोलन गति होना आवश्यक नहीं है।
  • उदाहरण के लिए चन्द्रमा का पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाना आवर्ती गति है, लेकिन यह दोलन गति नहीं है क्योंकि चन्द्रमा किसी साम्य स्थिति के दोनों ओर गति नहीं करता।
  • दोलन करती वस्तु पर एक बल कार्य करता है जिसकी दिशा साम्य स्थिति की ओर होती है। इसे प्रत्यावर्तन बल कहते हैं।
  • इस बल के कारण वस्तु में त्वरण उत्पन्न होता है और वह साम्य स्थिति की ओर लौटने का प्रयास करती है।

5. प्रक्षेप्य गति (Projectile Motion)

जब किसी पिण्ड को कुछ प्रारम्भिक वेग से फेंका जाता है और वह गुरुत्वीय बल के प्रभाव में परवलयाकार पथ पर गति करता है, तो इस गति को प्रक्षेप्य गति कहते हैं।

उदाहरण— खिलाड़ी द्वारा फेंकी गई गेंद तथा पृथ्वी से ऊपर की ओर फेंके गए पत्थर की गति।

6. लुढ़कन गति (Rolling Motion)

जब कोई पिण्ड किसी तल पर लुढ़कते हुए गति करता है, तो उसकी गति को लुढ़कन गति कहते हैं।

लुढ़कन गति में पिण्ड में दो प्रकार की गतियाँ एक साथ उपस्थित होती हैं—

  • स्थानान्तरण गति
  • घूर्णन गति

अर्थात् लुढ़कती हुई वस्तु आगे भी बढ़ती है और साथ-साथ अपने अक्ष के चारों ओर घूमती भी है।

7. आवर्ती गति (Periodic Motion)

जब कोई पिण्ड निश्चित समय अन्तराल के बाद अपनी गति को बार-बार दोहराता है, तो उसकी गति को आवर्ती गति कहते हैं।

उदाहरण— एकसमान वृतीय गति, सरल लोलक की गति, झूला झूलते बालक की गति तथा स्प्रिंग को खींचने पर होने वाली गति।

गति के प्रकार एक नजर में

गति का प्रकार मुख्य विशेषता उदाहरण
रेखीय/स्थानान्तरण सरल रेखा में स्थान परिवर्तन सीधे पथ पर चलता पिण्ड
वृतीय वृत्ताकार पथ पर गति पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर घूमना
घूर्णन स्थिर अक्ष के चारों ओर घूमना पंखा, लट्टू
दोलन/कम्पनिक साम्य स्थिति के दोनों ओर बार-बार गति सरल लोलक, स्प्रिंग
प्रक्षेप्य गुरुत्व के प्रभाव में परवलयाकार पथ फेंकी गई गेंद
लुढ़कन स्थानान्तरण और घूर्णन साथ-साथ लुढ़कती हुई वस्तु
आवर्ती निश्चित समय के बाद गति की पुनरावृत्ति सरल लोलक, एकसमान वृतीय गति
गति के विभिन्न प्रकार
रेखीय, वृतीय, घूर्णन, दोलन, प्रक्षेप्य, लुढ़कन एवं आवर्ती गति
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सरल रेखा में होने वाली गति को रेखीय या स्थानान्तरण गति कहते हैं।
  • वृत्ताकार पथ पर होने वाली गति वृतीय गति कहलाती है।
  • किसी स्थिर अक्ष के चारों ओर पिण्ड का घूमना घूर्णन गति है।
  • साम्य स्थिति के दोनों ओर बार-बार होने वाली गति को दोलन या कम्पनिक गति कहते हैं।
  • प्रारम्भिक वेग से फेंका गया पिण्ड गुरुत्व के प्रभाव में परवलयाकार पथ पर चले तो उसकी गति प्रक्षेप्य गति कहलाती है।
  • लुढ़कन गति में स्थानान्तरण और घूर्णन गति दोनों एक साथ होती हैं।
  • निश्चित समय अन्तराल के बाद दोहराई जाने वाली गति को आवर्ती गति कहते हैं।
  • प्रत्येक दोलन गति आवर्ती होती है, लेकिन प्रत्येक आवर्ती गति दोलन गति नहीं होती।
Topic 3 न्यूटन के गति के नियम

न्यूटन के गति के नियम

न्यूटन के गति के नियम

सर आइजैक न्यूटन ने सन् 1687 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक प्रिंसिपिया (Principia) में गति के नियमों को प्रतिपादित किया। ये नियम वस्तुओं की गति तथा उन पर लगने वाले बल के बीच सम्बन्ध को समझाते हैं।

न्यूटन के गति के तीन नियम हैं—

  1. प्रथम नियम अथवा जड़त्व का नियम
  2. द्वितीय नियम अथवा संवेग का नियम
  3. तृतीय नियम अथवा क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम

1. न्यूटन का प्रथम गति नियम अथवा जड़त्व का नियम

यदि कोई वस्तु विरामावस्था में है, तो वह तब तक विरामावस्था में बनी रहती है जब तक उस पर कोई बाह्य बल लगाकर उसे गतिशील न किया जाए। इसी प्रकार यदि कोई वस्तु गतिशील है, तो उसकी गति की अवस्था में परिवर्तन करने के लिए भी बाह्य बल की आवश्यकता होती है।

न्यूटन के प्रथम गति नियम को जड़त्व का नियम (Law of Inertia) भी कहा जाता है।

जड़त्व (Inertia)

जड़त्व किसी वस्तु का वह गुण है जिसके कारण वह अपनी विरामावस्था अथवा सरल रेखा में एक समान गति की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करती है।

अर्थात् कोई स्थिर वस्तु स्थिर बने रहना चाहती है और कोई गतिशील वस्तु अपनी गति की अवस्था बनाए रखना चाहती है, जब तक उस पर कोई बाह्य बल कार्य न करे।

प्रथम नियम के उदाहरण

उदाहरण 1: कैरम की गोटियाँ

कैरम की कई गोटियों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर नीचे वाली गोटी पर स्ट्राइकर से आघात किया जाता है। आघात के कारण नीचे वाली गोटी खिसककर दूर चली जाती है, जबकि ऊपर की गोटियाँ जड़त्व के कारण अपनी स्थिति में बनी रहती हैं।

उदाहरण 2: चलती गाड़ी में यात्री

जब कोई गाड़ी अचानक चलना प्रारम्भ करती है, तो उसमें बैठा यात्री पीछे की ओर झुक जाता है। उसका शरीर गाड़ी के साथ आगे बढ़ने लगता है, लेकिन शरीर का ऊपरी भाग जड़त्व के कारण अपनी पूर्व विरामावस्था बनाए रखना चाहता है।

उदाहरण 3: घास काटना

जब माली तेज धार वाले ब्लेड से घास की जड़ के पास तेजी से प्रहार करता है, तो घास का ऊपरी भाग जड़त्व के कारण अपनी स्थिति बनाए रखने का प्रयास करता है और तीक्ष्ण ब्लेड घास को काट देता है।

प्रथम नियम को समझने की गतिविधि

  1. एक सूखा गिलास लें और उसके ऊपर एक पोस्टकार्ड रखें।
  2. पोस्टकार्ड के ऊपर एक सिक्का रखें।
  3. पोस्टकार्ड के किनारे पर क्षैतिज दिशा में तेज झटका दें।
  4. पोस्टकार्ड खिसक जाता है, जबकि सिक्का जड़त्व के कारण अपनी स्थिति बनाए रखने का प्रयास करता है और गिलास में गिर जाता है।

2. न्यूटन का द्वितीय गति नियम अथवा संवेग का नियम

न्यूटन का प्रथम नियम यह बताता है कि किसी वस्तु की गति की अवस्था बदलने के लिए बल आवश्यक है, लेकिन उससे बल के परिमाण का ज्ञान नहीं होता। बल के परिमाण और गति में होने वाले परिवर्तन के सम्बन्ध को न्यूटन का द्वितीय गति नियम स्पष्ट करता है।

इस नियम के अनुसार किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर लगाए गए बल के अनुक्रमानुपाती होती है तथा संवेग में परिवर्तन उसी दिशा में होता है जिस दिशा में बल लगाया जाता है।

हम अपने दैनिक अनुभव से देखते हैं कि अधिक भारी अथवा अधिक गतिशील वस्तु को रोकने के लिए अधिक बल की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए गतिमान भारी इंजन को रोकना रुके हुए इंजन की तुलना में कठिन होता है।

बल, द्रव्यमान एवं गति से सम्बन्धित उदाहरण
  • वस्तु जितनी अधिक गतिशील होती है, उसे रोकने में उतना अधिक धक्का अनुभव होता है।
  • बन्दूक की गोली का तीव्र प्रभाव उसके अधिक वेग के कारण होता है।
  • आँधी में वायु-कणों की तीव्र गति के कारण वायु अधिक विनाशकारी हो सकती है।
  • समान वेग से चलने वाली दो वस्तुओं में अधिक द्रव्यमान वाली वस्तु को रोकने के लिए अधिक बल की आवश्यकता होती है।
  • एक साधारण चोट से पत्थर की गेंद दूर जा सकती है, जबकि बड़े लोहे के गोले पर उसी चोट का प्रभाव बहुत कम हो सकता है।
संवेग संरक्षण का नियम

यदि दो वस्तुओं पर कोई असन्तुलित बाह्य बल कार्य नहीं कर रहा है, तो उनके टकराने से पहले का कुल संवेग और टकराने के बाद का कुल संवेग समान रहता है।

अर्थात् किसी पृथक तंत्र में कुल संवेग संरक्षित रहता है। इसे संवेग संरक्षण का नियम कहते हैं।

द्वितीय नियम से सम्बन्धित उदाहरण

उदाहरण 1: क्रिकेट की गेंद को पकड़ना

क्रिकेट खिलाड़ी तेज गति से आती गेंद को पकड़ते समय अपने हाथों को पीछे की ओर खींच लेता है। इससे गेंद के वेग को कम करने में अधिक समय मिलता है और हाथों पर लगने वाली चोट कम हो जाती है।

उदाहरण 2: मिट्टी और कठोर फर्श पर गिरना

कठोर सीमेंट के फर्श पर गिरने की तुलना में गद्दे या मुलायम मिट्टी पर गिरने से कम चोट लगती है। मुलायम सतह वस्तु को रोकने के लिए अधिक समय देती है, जिससे चोट का प्रभाव कम होता है।

3. न्यूटन का तृतीय गति नियम अथवा क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम

न्यूटन के तृतीय गति नियम के अनुसार—

प्रत्येक क्रिया के बराबर तथा विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।

जब कोई वस्तु दूसरी वस्तु पर बल लगाती है, तो दूसरी वस्तु भी पहली वस्तु पर समान परिमाण का बल विपरीत दिशा में लगाती है।

इस नियम को क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम (Law of Action and Reaction) भी कहा जाता है।

तृतीय नियम के उदाहरण

उदाहरण 1: बन्दूक का पीछे की ओर झटका

जब बन्दूक से गोली छोड़ी जाती है, तो गोली आगे की ओर जाती है और बन्दूक पीछे की ओर झटका देती है। गोली का आगे जाना क्रिया तथा बन्दूक का पीछे हटना प्रतिक्रिया है।

उदाहरण 2: नाव से जमीन पर कूदना

जब कोई व्यक्ति पानी में खड़ी नाव से जमीन पर कूदता है, तो वह नाव को पीछे की ओर बल देता है। इसके फलस्वरूप नाव विपरीत दिशा में पीछे हटती है।

उदाहरण 3: रॉकेट का आगे बढ़ना

रॉकेट से गैसें पीछे की ओर निकलती हैं और उनकी प्रतिक्रिया के कारण रॉकेट आगे की ओर बढ़ता है।

उदाहरण 4: जमीन पर पैर पटकना

जब हम जमीन पर पैर पटकते हैं, तो हम जमीन पर नीचे की ओर बल लगाते हैं और जमीन भी हमारे पैर पर विपरीत दिशा में बल लगाती है।

उदाहरण 5: ऊँचाई से कूदना

ऊँचाई से जमीन पर कूदने पर व्यक्ति जमीन पर बल लगाता है और जमीन भी शरीर पर विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया बल लगाती है। इसी प्रतिक्रिया के कारण चोट लग सकती है।

न्यूटन के तीनों गति नियम एक नजर में

नियम मुख्य विचार उदाहरण
प्रथम नियम बाह्य बल के अभाव में वस्तु अपनी विराम अथवा गति की अवस्था बनाए रखती है। कैरम की गोटी, अचानक चलती गाड़ी में यात्री
द्वितीय नियम संवेग में परिवर्तन की दर लगाए गए बल के अनुक्रमानुपाती होती है। क्रिकेट की गेंद पकड़ते समय हाथ पीछे खींचना
तृतीय नियम प्रत्येक क्रिया की बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। बन्दूक का पीछे हटना, नाव का पीछे जाना
न्यूटन के तीन गति नियम
न्यूटन के प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय गति नियमों के सरल उदाहरण
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • न्यूटन ने गति के तीन नियम प्रतिपादित किए, जो वस्तु की गति और बल के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करते हैं।
  • प्रथम नियम के अनुसार बाह्य बल के अभाव में वस्तु अपनी विराम अथवा एक समान गति की अवस्था बनाए रखती है।
  • प्रथम गति नियम को जड़त्व का नियम भी कहते हैं।
  • जड़त्व वह गुण है जिसके कारण वस्तु अपनी गति या विराम की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करती है।
  • द्वितीय नियम के अनुसार संवेग में परिवर्तन की दर लगाए गए बल के अनुक्रमानुपाती होती है और परिवर्तन बल की दिशा में होता है।
  • असन्तुलित बाह्य बल के अभाव में किसी तंत्र का कुल संवेग संरक्षित रहता है।
  • तृतीय नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया की बराबर तथा विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।
  • बन्दूक का पीछे हटना, नाव का पीछे जाना और रॉकेट का आगे बढ़ना क्रिया-प्रतिक्रिया के उदाहरण हैं।
Topic 4 गुरुत्वाकर्षण एवं न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम

गुरुत्वाकर्षण एवं न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम

गुरुत्वाकर्षण (Gravitation)

जब किसी वस्तु को ऊँचाई से गिराया जाता है, तो वह पृथ्वी की ओर गिरती है। इसी प्रकार चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है और सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।

इन घटनाओं के आधार पर न्यूटन ने बताया कि इनके लिए एक आकर्षण बल उत्तरदायी है, जिसे गुरुत्वाकर्षण बल कहा जाता है।

गुरुत्व किसी पिण्ड का वह गुण है, जिसके कारण वह दूसरे पिण्ड को अपनी ओर आकर्षित करता है।

गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force)

किन्हीं दो पिण्डों के बीच उनके द्रव्यमान के कारण लगने वाला पारस्परिक आकर्षण बल गुरुत्वाकर्षण बल कहलाता है।

यह बल दोनों पिण्डों को एक-दूसरे की ओर आकर्षित करता है और इसकी दिशा दोनों पिण्डों के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश होती है।

न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम

न्यूटन ने सन् 1686 में गुरुत्वाकर्षण से सम्बन्धित नियम प्रस्तुत किया। इसके अनुसार—

किन्हीं दो पिण्डों के बीच कार्य करने वाला आकर्षण बल उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

इस आकर्षण बल का मान पिण्डों की प्रकृति तथा उनके बीच उपस्थित माध्यम पर निर्भर नहीं करता।

गुरुत्वाकर्षण बल का गणितीय रूप

माना दो पिण्ड A और B के द्रव्यमान क्रमशः m1 और m2 हैं तथा उनके केन्द्रों के बीच की दूरी r है। उनके बीच लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल F है।

नियम के अनुसार बल दोनों पिण्डों के द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती होता है—

F ∝ m1m2

साथ ही गुरुत्वाकर्षण बल दोनों पिण्डों के बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है—

F ∝ 1/r2

दोनों सम्बन्धों को संयुक्त करने पर—

F ∝ m1m2 / r2

अतः,

F = G × m1m2 / r2

जहाँ—

  • F = दोनों पिण्डों के बीच लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल
  • m1 = प्रथम पिण्ड का द्रव्यमान
  • m2 = द्वितीय पिण्ड का द्रव्यमान
  • r = दोनों पिण्डों के केन्द्रों के बीच की दूरी
  • G = समानुपाती नियतांक

गुरुत्वाकर्षण नियतांक (Gravitational Constant)

सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम के सूत्र में प्रयुक्त समानुपाती नियतांक G को गुरुत्वाकर्षण नियतांक कहते हैं।

G का मान सभी पदार्थों के लिए समान रहता है।

इस नियतांक की विमा तथा उसका आँकिक मान प्रयुक्त इकाइयों पर निर्भर करता है।

गुरुत्वाकर्षण नियम से प्राप्त मुख्य बातें

  1. पिण्डों के द्रव्यमान बढ़ने पर उनके बीच गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ता है।
  2. गुरुत्वाकर्षण बल दोनों पिण्डों के द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती होता है।
  3. पिण्डों के बीच की दूरी बढ़ने पर गुरुत्वाकर्षण बल कम होता है।
  4. गुरुत्वाकर्षण बल दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
  5. बल की दिशा दोनों पिण्डों के केन्द्रों को जोड़ने वाली रेखा के अनुदिश होती है।
  6. इसका मान पिण्डों की प्रकृति और उनके बीच उपस्थित माध्यम पर निर्भर नहीं करता।

गुरुत्वाकर्षण के उदाहरण

  • ऊँचाई से छोड़ी गई वस्तु का पृथ्वी की ओर गिरना।
  • चन्द्रमा का पृथ्वी की परिक्रमा करना।
  • ग्रहों का सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करना।
न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम
दो पिण्डों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल तथा द्रव्यमान और दूरी से उसका सम्बन्ध
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • दो पिण्डों के बीच उनके द्रव्यमान के कारण लगने वाला आकर्षण बल गुरुत्वाकर्षण बल कहलाता है।
  • गुरुत्व वह गुण है जिसके कारण कोई पिण्ड दूसरे पिण्ड को आकर्षित करता है।
  • न्यूटन ने सन् 1686 में सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम प्रस्तुत किया।
  • गुरुत्वाकर्षण बल दोनों पिण्डों के द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती होता है।
  • यह बल दोनों पिण्डों के बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
  • सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम का सूत्र F = Gm1m2/r2 है।
  • G को गुरुत्वाकर्षण नियतांक कहते हैं।
Topic 5 चाल: परिभाषा, सूत्र, मात्रक एवं प्रकार

चाल: परिभाषा, सूत्र, मात्रक एवं प्रकार

चाल (Speed)

किसी वस्तु की गति कितनी तेज या धीमी है, इसे चाल द्वारा व्यक्त किया जाता है। चाल एक अदिश राशि है, अर्थात् इसमें केवल परिमाण होता है, दिशा का विचार नहीं किया जाता।

किसी वस्तु द्वारा इकाई समय में तय की गई दूरी को चाल कहते हैं।

चाल का सूत्र एवं मात्रक

चाल ज्ञात करने के लिए वस्तु द्वारा तय की गई दूरी को उस दूरी को तय करने में लगे समय से भाग दिया जाता है।

चाल = दूरी / समय

SI पद्धति में चाल का मात्रक मीटर/सेकण्ड (m/s) है।

मीटर/सेकण्ड में दी गई चाल को किलोमीटर/घण्टा में बदलने के लिए उसे 18/5 से गुणा किया जाता है।

उदाहरण 1: चाल की गणना

एक व्यक्ति 600 मीटर की दूरी 2 मिनट 30 सेकण्ड में तय करता है।

कुल समय = 2 मिनट 30 सेकण्ड = 150 सेकण्ड

चाल = 600 / 150 = 4 मीटर/सेकण्ड

किलोमीटर/घण्टा में—

4 × 18/5 = 14.4 किलोमीटर/घण्टा

अतः व्यक्ति की चाल 4 मीटर/सेकण्ड अथवा 14.4 किलोमीटर/घण्टा है।

उदाहरण 2: समय की गणना

20 मीटर/सेकण्ड की चाल से चलने वाली वस्तु को 120 मीटर की दूरी तय करनी है।

चाल = दूरी / समय

अतः,

समय = दूरी / चाल

समय = 120 / 20 = 6 सेकण्ड

अतः वस्तु 120 मीटर की दूरी 6 सेकण्ड में तय करेगी।

औसत चाल (Average Speed)

किसी पिण्ड द्वारा तय की गई कुल दूरी और उस दूरी को तय करने में लगे कुल समय के अनुपात को उसकी औसत चाल कहते हैं।

औसत चाल = तय की गई कुल दूरी / लिया गया कुल समय

यदि अलग-अलग दूरियाँ d1, d2, d3 ... dn को क्रमशः t1, t2, t3 ... tn समय में तय किया गया हो, तो—

औसत चाल = (d1 + d2 + d3 + ... + dn) / (t1 + t2 + t3 + ... + tn)

समान दूरी को दो अलग चालों से तय करने पर औसत चाल

यदि कोई व्यक्ति X से Y तक समान दूरी A मीटर/सेकण्ड की चाल से तथा Y से X तक उसी दूरी को B मीटर/सेकण्ड की चाल से तय करता है, तो पूरी यात्रा की औसत चाल—

औसत चाल = 2AB / (A + B)

उदाहरण: वर्गाकार पथ पर औसत चाल

एक कार किसी वर्ग की चार समान भुजाओं को क्रमशः 200, 400, 600 और 800 किलोमीटर/घण्टा की चाल से तय करती है।

यदि प्रत्येक भुजा की लम्बाई x मानी जाए, तो कुल दूरी = 4x होगी।

कुल समय—

x/200 + x/400 + x/600 + x/800

इन मानों का प्रयोग करने पर औसत चाल का मान—

384 किलोमीटर/घण्टा

प्राप्त होता है।

तात्कालिक चाल (Instantaneous Speed)

किसी वस्तु की किसी विशेष क्षण की चाल को तात्कालिक चाल कहा जाता है। इसे औसत चाल की उस स्थिति के रूप में समझा जाता है, जिसमें समय-अन्तराल लगातार बहुत छोटा होकर शून्य की ओर बढ़ता है।

सापेक्ष चाल (Relative Speed)

दो गतिशील वस्तुओं की एक-दूसरे के सापेक्ष गति को सापेक्ष चाल द्वारा व्यक्त किया जाता है।

1. वस्तुएँ विपरीत दिशाओं में चल रही हों

यदि दो पिण्ड क्रमशः X और Y चाल से विपरीत दिशाओं में गति कर रहे हों, तो उनकी सापेक्ष चाल दोनों चालों का योग होती है।

सापेक्ष चाल = X + Y

2. वस्तुएँ समान दिशा में चल रही हों

यदि दोनों पिण्ड एक ही दिशा में गति कर रहे हों, तो उनकी सापेक्ष चाल दोनों चालों का अन्तर होती है।

सापेक्ष चाल = X − Y

दो ट्रेनों की सापेक्ष चाल

यदि दो ट्रेनों की चाल क्रमशः X और Y तथा उनकी लम्बाइयाँ L1 और L2 हों, तो एक ट्रेन को दूसरी ट्रेन को पूरी तरह पार करने के लिए दोनों ट्रेनों की कुल लम्बाई तय करनी होती है।

विपरीत दिशा में चलने पर

समय = (L1 + L2) / (X + Y)

समान दिशा में चलने पर

समय = (L1 + L2) / (X − Y)

वृत्तीय पथ में दूरी एवं विस्थापन का उदाहरण

यदि r त्रिज्या के वृत्तीय पथ पर कोई कण डेढ़ चक्कर लगाता है, तो तय की गई कुल दूरी—

2πr + πr = 3πr

होती है।

इस स्थिति में प्रारम्भिक और अन्तिम बिन्दु वृत्त के व्यास के दोनों सिरों पर होते हैं, इसलिए विस्थापन—

s = 2r

होगा।

चाल से सम्बन्धित मुख्य सूत्र

स्थिति सूत्र
सामान्य चाल चाल = दूरी / समय
समय समय = दूरी / चाल
औसत चाल कुल दूरी / कुल समय
समान दूरी A और B चाल से 2AB / (A + B)
विपरीत दिशा में सापेक्ष चाल X + Y
समान दिशा में सापेक्ष चाल X − Y
चाल औसत चाल और सापेक्ष चाल
चाल के मूल सूत्र तथा समान और विपरीत दिशा में सापेक्ष चाल
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • किसी वस्तु द्वारा इकाई समय में तय की गई दूरी को चाल कहते हैं।
  • चाल एक अदिश राशि है और इसका SI मात्रक मीटर/सेकण्ड है।
  • चाल का सूत्र दूरी/समय है।
  • औसत चाल कुल तय की गई दूरी और कुल समय का अनुपात होती है।
  • समान दूरी को A और B चाल से तय करने पर औसत चाल 2AB/(A+B) होती है।
  • विपरीत दिशा में चलते दो पिण्डों की सापेक्ष चाल उनकी चालों का योग होती है।
  • समान दिशा में चलते दो पिण्डों की सापेक्ष चाल उनकी चालों का अन्तर होती है।
Topic 6 बल: अवधारणा, सूत्र, मात्रक एवं प्रभाव

बल: अवधारणा, सूत्र, मात्रक एवं प्रभाव

बल (Force)

बल एक सदिश राशि है। किसी वस्तु पर बल लगाने से उसकी गति, दिशा, आकार अथवा स्थिति में परिवर्तन हो सकता है।

सरल रूप में, बल वह बाह्य कारक है जो किसी वस्तु की विरामावस्था अथवा सरल रेखा में एक समान गति की अवस्था को परिवर्तित कर सकता है।

केवल बल लगाने से वस्तु की अवस्था में परिवर्तन होना आवश्यक नहीं है। उदाहरण के लिए यदि कोई छोटा बालक किसी विशाल वृक्ष को धक्का देता है, तो बल लगाने के बाद भी वृक्ष अपनी जगह पर खड़ा रह सकता है। इसलिए बल को ऐसे बाह्य कारक के रूप में समझना अधिक उचित है, जो वस्तु की विरामावस्था अथवा सरल रेखा में एक समान गति की अवस्था को परिवर्तित कर सकता है।

यदि कोई वस्तु स्थिर है, तो बल लगाकर उसे गतिशील किया जा सकता है। इसी प्रकार किसी गतिशील वस्तु पर उचित बल लगाकर उसकी गति को कम किया जा सकता है या उसे रोका जा सकता है।

बल की अवधारणा

न्यूटन के गति के द्वितीय नियम के अनुसार बल का सम्बन्ध संवेग परिवर्तन की दर से है। इससे बल के परिमाण को समझने और दो बलों की तुलना करने में सहायता मिलती है।

किसी गतिशील वस्तु को रोकने पर हमें धक्के का अनुभव होता है। हल्की वस्तु की अपेक्षा अधिक द्रव्यमान वाली गतिशील वस्तु को रोकने के लिए अधिक बल की आवश्यकता होती है।

बल किसी वस्तु में विरूपण भी उत्पन्न कर सकता है। उदाहरण के लिए स्प्रिंग या रबर को खींचने पर उसका आकार बदल जाता है।

बल के कारण किसी पिण्ड का विरूपण या चूर्णन भी हो सकता है तथा दाब में परिवर्तन हो सकता है।

यदि बल के कारण किसी वस्तु की कोणीय गति में परिवर्तन होता है, तो इस प्रभाव को बल-आघूर्ण से सम्बन्धित माना जाता है।

बल का सूत्र

बल का मान वस्तु के द्रव्यमान और उसमें उत्पन्न त्वरण के गुणनफल के बराबर होता है।

F = m × a

अर्थात्—

बल = द्रव्यमान × त्वरण

जहाँ—

  • F = बल
  • m = द्रव्यमान
  • a = त्वरण

बल का मात्रक

बल का SI मात्रक न्यूटन (N) है।

1 न्यूटन = 1 kg m/s2

बल के अन्य मात्रकों में डाइन (Dyne), पाउण्डल (Poundal) तथा पाउण्ड-बल (Pound-Force) भी सम्मिलित हैं।

त्वरण के आधार पर बल का रूप

त्वरण के लिए दिया गया सम्बन्ध है—

a = v/t

जहाँ v वेग तथा t लिया गया समय है।

इसे बल के सूत्र F = ma में रखने पर—

F = mv/t

प्राप्त होता है।

प्रकृति में प्रमुख मूल बल

प्रकृति में चार मूल बल माने गए हैं—

  1. गुरुत्वाकर्षण बल
  2. विद्युत-चुम्बकीय बल
  3. प्रबल नाभिकीय बल
  4. दुर्बल नाभिकीय बल

बल के प्रभाव (Effects of Force)

किसी वस्तु पर बल लगाने से उसके ऊपर अनेक प्रकार के प्रभाव उत्पन्न हो सकते हैं। प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं—

1. वस्तु की गति की अवस्था बदलना

बल लगाकर किसी स्थिर वस्तु को गतिशील किया जा सकता है तथा किसी गतिशील वस्तु को रोका जा सकता है।

उदाहरण के लिए रुकी हुई गेंद को धक्का देने पर वह चलने लगती है। उसी प्रकार चलती हुई गेंद को पकड़कर या रोककर उसकी गति समाप्त की जा सकती है।

2. गति या दिशा में परिवर्तन करना

बल किसी गतिशील वस्तु की चाल और दिशा दोनों को परिवर्तित कर सकता है।

चलती हुई साइकिल को रोकने के लिए बल लगाया जाता है। इसी प्रकार साइकिल की गति बढ़ाने के लिए भी अधिक बल का प्रयोग किया जाता है।

3. वस्तु के आकार एवं आकृति में परिवर्तन करना

बल किसी वस्तु के आकार या आकृति को बदल सकता है।

स्प्रिंग या रबर को खींचने पर उसका आकार बदल जाता है। दैनिक जीवन में अनेक वस्तुओं का आकार भी बल लगाकर बदला जाता है।

4. वस्तु की स्थिति में परिवर्तन करना

बल लगाकर किसी वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाया जा सकता है। इस प्रकार बल वस्तु की स्थिति बदलने में भी सहायक होता है।

उदाहरण के लिए किसी वस्तु को उठाकर दूसरे स्थान पर रखने के लिए बल का प्रयोग करना पड़ता है।

बल के प्रभाव एक नजर में

बल का प्रभाव उदाहरण
स्थिर वस्तु को गतिशील करना रुकी हुई गेंद को धक्का देना
गतिशील वस्तु को रोकना चलती गेंद को पकड़ना
गति या दिशा बदलना साइकिल की गति बढ़ाना या रोकना
आकार बदलना स्प्रिंग या रबर को खींचना
स्थिति बदलना वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखना
बल के प्रमुख प्रभाव
बल द्वारा वस्तु की गति, दिशा, आकार एवं स्थिति में परिवर्तन
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • बल एक सदिश राशि है।
  • बल किसी वस्तु की विरामावस्था अथवा समान गति की अवस्था को बदल सकता है।
  • बल का सूत्र F = m × a है।
  • बल का SI मात्रक न्यूटन (N) है तथा 1 N = 1 kg m/s2 होता है।
  • बल किसी स्थिर वस्तु को गतिशील तथा गतिशील वस्तु को स्थिर कर सकता है।
  • बल वस्तु की चाल, दिशा, आकार, आकृति और स्थिति में परिवर्तन कर सकता है।
  • प्रकृति के चार मूल बल—गुरुत्वाकर्षण, विद्युत-चुम्बकीय, प्रबल नाभिकीय और दुर्बल नाभिकीय बल हैं।
Topic 7 बल के प्रकार

बल के प्रकार

बल के प्रकार

हमारे आसपास विभिन्न प्रकार के बल कार्य करते हैं। कुछ बल वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, कुछ गति का विरोध करते हैं और कुछ जीवों द्वारा मांसपेशियों की सहायता से लगाए जाते हैं।

बल के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं—

  1. चुम्बकीय बल
  2. गुरुत्वाकर्षण बल
  3. नाभिकीय बल
  4. पेशीय बल
  5. विद्युत बल
  6. घर्षण बल

1. चुम्बकीय बल (Magnetic Force)

चुम्बक द्वारा वस्तुओं पर लगाया जाने वाला बल चुम्बकीय बल कहलाता है। इसका प्रभाव विशेष रूप से लौह पदार्थों पर देखा जा सकता है।

चुम्बकीय बल के कारण चुम्बक लोहे से बनी वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है।

2. गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force)

पृथ्वी अपने आसपास उपस्थित वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। पृथ्वी द्वारा लगाया जाने वाला यह आकर्षण बल गुरुत्वाकर्षण बल कहलाता है।

ऊँचाई से छोड़ी गई वस्तु का पृथ्वी की ओर गिरना गुरुत्वाकर्षण बल का सामान्य उदाहरण है।

3. नाभिकीय बल (Nuclear Force)

परमाणु के नाभिक में उपस्थित सूक्ष्म कणों को बाँधे रखने वाला बल नाभिकीय बल कहलाता है।

यह अत्यन्त शक्तिशाली बल होता है। नाभिक के कणों के बीच कार्य करने वाला यह बल गुरुत्वाकर्षण तथा विद्युत बल की तुलना में बहुत अधिक शक्तिशाली बताया गया है।

4. पेशीय बल (Muscular Force)

मनुष्य तथा जन्तु अपनी मांसपेशियों की सहायता से जो बल लगाते हैं, उसे पेशीय बल कहते हैं।

हमारे दैनिक जीवन के अनेक कार्य पेशीय बल की सहायता से किए जाते हैं। नियमित व्यायाम से मांसपेशियों की क्षमता विकसित की जा सकती है।

घोड़े में अधिक पेशीय बल पाया जाता है। किसी खिलाड़ी द्वारा फुटबॉल को पैर से मारना भी पेशीय बल का उदाहरण है।

5. विद्युत बल (Electric Force)

विद्युत ऊर्जा से सम्बन्धित बल को विद्युत बल कहा जाता है। विद्युत प्रभाव के कारण चालक में इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह स्थापित होता है।

विद्युत बल आवेशित कणों के बीच कार्य करता है और उनके बीच आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण का प्रभाव उत्पन्न हो सकता है।

6. घर्षण बल (Friction Force)

जब कोई वस्तु किसी समतल या झुकी हुई सतह पर चलती अथवा खिसकती है, तो उसकी गति की विपरीत दिशा में एक बल कार्य करता है। इस बल को घर्षण बल कहते हैं।

घर्षण बल दो सम्पर्क में आने वाली सतहों के बीच उत्पन्न होता है और वस्तु की गति का विरोध करता है।

घर्षण बल का मान सम्पर्क में आने वाली वस्तुओं तथा उनकी सतहों की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

बल के प्रकार एक नजर में

बल का प्रकार मुख्य विशेषता उदाहरण
चुम्बकीय बल चुम्बक द्वारा लगाया गया बल लोहे की वस्तु का चुम्बक की ओर आकर्षित होना
गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी द्वारा वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करना वस्तु का पृथ्वी पर गिरना
नाभिकीय बल नाभिक के कणों को बाँधे रखने वाला बल परमाणु के नाभिक में कार्य करने वाला बल
पेशीय बल मांसपेशियों द्वारा लगाया गया बल फुटबॉल को पैर से मारना
विद्युत बल विद्युत प्रभाव से उत्पन्न बल आवेशित कणों के बीच बल
घर्षण बल गति की विपरीत दिशा में कार्य करता है सतह पर खिसकती वस्तु
बल के विभिन्न प्रकार
चुम्बकीय, गुरुत्वाकर्षण, नाभिकीय, पेशीय, विद्युत एवं घर्षण बल
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • बल के प्रमुख प्रकार—चुम्बकीय, गुरुत्वाकर्षण, नाभिकीय, पेशीय, विद्युत और घर्षण बल हैं।
  • चुम्बक द्वारा लगाया गया बल चुम्बकीय बल कहलाता है।
  • पृथ्वी द्वारा वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करने वाला बल गुरुत्वाकर्षण बल है।
  • परमाणु के नाभिक के कणों को बाँधे रखने वाला बल नाभिकीय बल कहलाता है।
  • मनुष्य और जन्तुओं द्वारा मांसपेशियों की सहायता से लगाया गया बल पेशीय बल है।
  • विद्युत प्रभाव से सम्बन्धित बल को विद्युत बल कहते हैं।
  • दो सम्पर्क सतहों के बीच गति का विरोध करने वाला बल घर्षण बल कहलाता है।
Topic 8 घर्षण बल: प्रकार, विशेषताएँ एवं उपयोगिता

घर्षण बल: प्रकार, विशेषताएँ एवं उपयोगिता

घर्षण बल (Friction Force)

जब कोई वस्तु किसी सतह पर चलती, खिसकती या लुढ़कती है, तो उसकी गति की विपरीत दिशा में एक बल कार्य करता है। इस बल को घर्षण बल कहते हैं।

घर्षण बल दो सम्पर्क में आने वाली सतहों के बीच उत्पन्न होता है और वस्तु की गति का विरोध करता है।

घर्षण बल के प्रकार

घर्षण बल को मुख्य रूप से तीन प्रकारों में बाँटा गया है—

  1. स्थैतिक घर्षण बल
  2. सर्पी घर्षण बल
  3. लोटनिक घर्षण बल

1. स्थैतिक घर्षण बल

जब किसी स्थिर वस्तु को किसी सतह पर खिसकाने या गति में लाने का प्रयास किया जाता है, तो उसकी गति प्रारम्भ होने का विरोध करने वाला बल स्थैतिक घर्षण बल कहलाता है।

अर्थात् यह घर्षण वस्तु को उसकी स्थिर अवस्था से गति में आने से रोकने का प्रयास करता है।

2. सर्पी घर्षण बल

जब कोई वस्तु किसी सतह पर खिसकती हुई गति करती है, तो उसके और सतह के बीच उत्पन्न होने वाला घर्षण सर्पी घर्षण बल कहलाता है।

यह बल खिसकती हुई वस्तु की गति की विपरीत दिशा में कार्य करता है।

3. लोटनिक घर्षण बल

जब कोई वस्तु किसी सतह पर लुढ़कती हुई गति करती है, तो लुढ़कती वस्तु और सतह के बीच उत्पन्न घर्षण को लोटनिक घर्षण बल कहते हैं।

लोटनिक घर्षण का प्रभाव स्थैतिक तथा सर्पी घर्षण की अपेक्षा कम होता है।

घर्षण बल की प्रमुख विशेषताएँ

  1. दो सतहों के बीच उत्पन्न घर्षण उनके सम्पर्क क्षेत्रफल पर निर्भर नहीं करता।
  2. लोटनिक घर्षण सबसे कम होता है, जबकि स्थैतिक घर्षण सबसे अधिक होता है।
  3. घर्षण को कम करने के लिए ग्रीस जैसे स्नेहकों का प्रयोग किया जाता है।
  4. घर्षण के कारण मनुष्य जमीन पर सीधा खड़ा रह सकता है और चल सकता है।
  5. मशीनों में घर्षण के कारण उनके भागों में घिसाव होता है।

दैनिक जीवन में घर्षण का महत्त्व

घर्षण केवल गति का विरोध करने वाला बल नहीं है, बल्कि दैनिक जीवन के अनेक कार्यों के लिए आवश्यक भी है।

हमारे पैरों और जमीन के बीच घर्षण होने के कारण हम बिना फिसले खड़े रह पाते हैं और चल सकते हैं।

इसी प्रकार सड़क तथा वाहन के पहियों के बीच घर्षण होने के कारण वाहन सड़क पर आगे बढ़ पाते हैं।

इस प्रकार घर्षण एक ओर गति में बाधा उत्पन्न करता है, तो दूसरी ओर अनेक कार्यों को सम्भव भी बनाता है।

घर्षण के लाभ एवं हानि

घर्षण के लाभ घर्षण की हानि
मनुष्य को खड़े रहने और चलने में सहायता करता है। गति का विरोध करता है।
वाहनों के पहियों को सड़क पर चलने में सहायता करता है। मशीनों के भागों में घिसाव उत्पन्न करता है।

घर्षण के प्रकार एक नजर में

प्रकार स्थिति
स्थैतिक घर्षण स्थिर वस्तु को गति में लाने का विरोध करता है।
सर्पी घर्षण सतह पर खिसकती वस्तु की गति का विरोध करता है।
लोटनिक घर्षण सतह पर लुढ़कती वस्तु पर कार्य करता है।
स्थैतिक सर्पी और लोटनिक घर्षण
स्थैतिक, सर्पी एवं लोटनिक घर्षण
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • दो सम्पर्क सतहों के बीच गति का विरोध करने वाला बल घर्षण बल कहलाता है।
  • घर्षण बल तीन प्रकार का होता है—स्थैतिक, सर्पी और लोटनिक घर्षण।
  • स्थैतिक घर्षण गति प्रारम्भ होने का विरोध करता है।
  • सर्पी घर्षण खिसकती हुई वस्तु तथा लोटनिक घर्षण लुढ़कती हुई वस्तु पर कार्य करता है।
  • लोटनिक घर्षण सबसे कम तथा स्थैतिक घर्षण सबसे अधिक होता है।
  • ग्रीस जैसे स्नेहक का प्रयोग करके घर्षण को कम किया जा सकता है।
  • घर्षण के कारण हम जमीन पर खड़े रह सकते हैं, चल सकते हैं और वाहन सड़क पर चल पाते हैं।
  • मशीनों में घर्षण के कारण उनके भागों में घिसाव होता है।
Topic 9 गति एवं बल के लिए गतिविधि

गति एवं बल के लिए गतिविधि

गति एवं बल के लिए गतिविधि

गति और बल की अवधारणाओं को केवल परिभाषाओं द्वारा ही नहीं, बल्कि सरल कक्षा गतिविधियों के माध्यम से भी आसानी से समझा जा सकता है। विद्यार्थियों द्वारा स्वयं वस्तुओं को उठाने, स्थान बदलने, चलने और वस्तुओं को गति देने से बल तथा गति का सम्बन्ध स्पष्ट होता है।

गतिविधि की प्रक्रिया

  1. विद्यार्थियों को छोटे-छोटे समूहों में बाँटें। प्रत्येक समूह में तीन या चार विद्यार्थी रखे जा सकते हैं।
  2. प्रत्येक समूह को कक्षा में उपस्थित वस्तुओं से सम्बन्धित अलग-अलग कार्य करने के निर्देश दें।
  3. पहले समूह से किसी सीट को उसके स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रखने के लिए कहें।
  4. विद्यार्थियों से पूछें कि सीट की स्थिति बदलने के लिए उन्हें किसकी आवश्यकता पड़ी। विद्यार्थी बताएँगे कि इसके लिए बल लगाना पड़ा।
  5. सीट की पहले और बाद की स्थिति की तुलना कराकर समझाएँ कि बल लगाने से किसी वस्तु की स्थिति में परिवर्तन किया जा सकता है।
  6. दूसरे समूह के विद्यार्थियों से श्यामपट्ट पर वृत्त, रेखा अथवा अन्य आकृतियाँ बनाने के लिए कहें।
  7. उनसे पूछें कि अपनी जगह से श्यामपट्ट तक जाने और लिखने के लिए उन्होंने क्या किया। उनके चलने तथा लिखने में बल का प्रयोग हुआ।
  8. विद्यार्थियों के अपनी जगह से श्यामपट्ट तक जाने की क्रिया को गति से जोड़कर समझाएँ। जब उनकी स्थिति समय के साथ बदलती है, तो वे गतिशील होते हैं।
  9. किसी अन्य समूह से श्यामपट्ट पर लिखी हुई वस्तु को मिटाने, सरल रेखा में चलने, वक्र मार्ग पर चलने अथवा किसी वस्तु के चारों ओर घूमने के लिए कहें। इन गतिविधियों की सहायता से गति के विभिन्न प्रकारों को समझाएँ।
  10. किसी वस्तु को उछालकर अथवा गति देकर विद्यार्थियों को समझाएँ कि वस्तु की गति उत्पन्न करने या उसकी अवस्था में परिवर्तन करने के लिए बल की आवश्यकता होती है।

गतिविधि से समझने योग्य बातें

  • किसी वस्तु को उठाने या उसका स्थान बदलने के लिए बल लगाया जाता है।
  • बल लगाने से वस्तु की स्थिति में परिवर्तन हो सकता है।
  • जब किसी व्यक्ति या वस्तु की स्थिति समय के साथ बदलती है, तो वह गति में होती है।
  • सीधे, वक्र अथवा वृत्ताकार मार्ग पर चलने से गति के अलग-अलग स्वरूप समझे जा सकते हैं।
  • किसी वस्तु को गति देने के लिए उस पर बल लगाया जा सकता है।

गति और बल का सम्बन्ध

इन गतिविधियों से स्पष्ट होता है कि गति और बल एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। बल के प्रयोग से किसी वस्तु की स्थिति अथवा गति की अवस्था में परिवर्तन किया जा सकता है। इसी प्रकार किसी वस्तु की स्थिति में समय के साथ परिवर्तन होने पर उसकी गति का पता चलता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वस्तु की स्थिति बदलने के लिए बल का प्रयोग किया जा सकता है।
  • समय के साथ स्थिति में परिवर्तन गति को दर्शाता है।
  • कक्षा की सरल गतिविधियों द्वारा गति और बल की अवधारणाओं को व्यावहारिक रूप से समझाया जा सकता है।
  • सीधी, वक्र तथा किसी वस्तु के चारों ओर होने वाली गति द्वारा गति के विभिन्न स्वरूप समझे जा सकते हैं।
  • वस्तु को गति देने अथवा उसकी गति की अवस्था बदलने में बल की भूमिका होती है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

गति का नियम किसने प्रतिपादित किया?

व्याख्या: गति के नियमों का प्रतिपादन सर आइजैक न्यूटन ने किया था।
Q 2

सरल रेखा में चलने वाली गति कहलाती है—

व्याख्या: जब कोई पिण्ड सरल रेखा में गति करता है, तो उसकी गति रेखीय गति कहलाती है।
Q 3

चाल का सूत्र है—

व्याख्या: किसी वस्तु की चाल ज्ञात करने के लिए तय की गई दूरी को लिए गए समय से भाग दिया जाता है।
Q 4

चाल के प्रकार हैं—

व्याख्या: दिए गए विकल्पों में एक समान चाल, औसत चाल और असमान चाल सभी चाल से संबंधित प्रकार हैं।
Q 5

मनुष्य एवं जन्तुओं द्वारा शरीर से लगाया जाने वाला बल है—

व्याख्या: मनुष्य और जन्तु अपनी मांसपेशियों की सहायता से जो बल लगाते हैं, उसे पेशीय बल कहते हैं।
Q 6

घर्षण बल निर्भर करता है—

व्याख्या: घर्षण का मान सम्पर्क में आने वाली सतहों की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
Q 7

बल में होता है—

व्याख्या: बल एक सदिश राशि है, इसलिए इसमें परिमाण और दिशा दोनों होते हैं।
Q 8

घर्षण बल कितने प्रकार का होता है?

व्याख्या: घर्षण बल के तीन प्रकार हैं—स्थैतिक घर्षण, सर्पी घर्षण और लोटनिक घर्षण।
Q 9

पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर गति कहलाती है—

व्याख्या: सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की गति वृत्तीय गति का उदाहरण है।
Q 10

पहलवान द्वारा भार उठाने में किस बल का प्रयोग होता है?

व्याख्या: भार उठाने के लिए पहलवान अपनी मांसपेशियों का प्रयोग करता है, इसलिए इसमें पेशीय बल लगता है।
Q 11

बल का मात्रक है—

व्याख्या: डाइन बल का एक मात्रक है। बल का SI मात्रक न्यूटन होता है।
Q 12

न्यूटन का कौन-सा गति नियम क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम कहलाता है?

व्याख्या: न्यूटन का तृतीय गति नियम बताता है कि प्रत्येक क्रिया के बराबर तथा विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।
Q 13

पेड़ से फल का पृथ्वी पर गिरना किस बल का उदाहरण है?

व्याख्या: पृथ्वी वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है, इसलिए पेड़ से फल का गिरना गुरुत्वाकर्षण बल का उदाहरण है।
Q 14

घर्षण बल निर्भर करता है—

व्याख्या: इस प्रश्न में दिए गए विकल्पों के आधार पर सही उत्तर "ये सभी" है।
Q 15

कुम्हार के चाक की गति होती है—

व्याख्या: कुम्हार का चाक अपने अक्ष के चारों ओर घूमता है, इसलिए उसकी गति घूर्णन गति कहलाती है।

पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय विज्ञान के अध्याय गति एवं बल से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

गति के तीसरे नियम पर टिप्पणी कीजिए।

Q 2

गति किसे कहते हैं? गति के कौन-कौन से नियम हैं? लिखिए।

Q 3

घूर्णन गति किसे कहते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।

Q 4 2016

गुरुत्वाकर्षण/गुरुत्व बल एवं पेशीय बल को उदाहरण सहित समझाइए।

Q 5 2018

संवेग-संरक्षण का नियम लिखिए।

Q 6 2020

न्यूटन के गतिविषयक प्रथम नियम (जड़त्व का नियम) को उदाहरण सहित लिखिए।

Q 7 2020

घर्षण बल क्या है? दैनिक जीवन में इसके उपयोग लिखिए।

Q 8 2022

किसी वस्तु का रेखीय संवेग कब संरक्षित रहता है? स्पष्ट कीजिए।

Q 9 2022

दोलन तथा कम्पन गति में उदाहरण सहित अन्तर स्पष्ट कीजिए।

Q 10 2023

‘बल’ से क्या अभिप्राय है? बल के विभिन्न प्रकारों का उदाहरण सहित संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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