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Home Study Material Semester 1 शिक्षण-अधिगम के सिद्धान्त शिक्षण प्रविधियाँ एवं नवीन उपागम
Chapter 2 • शिक्षण-अधिगम के सिद्धान्त

शिक्षण प्रविधियाँ एवं नवीन उपागम

UP DELED Semester 1 के विषय शिक्षण-अधिगम के सिद्धान्त के इस अध्याय में शिक्षण प्रविधियों, प्रश्नोत्तर, व्याख्यान, निरीक्षण, प्रयोगात्मक, वाद-विवाद, कार्यशाला एवं भ्रमण प्रविधियों तथा बाल-केन्द्रित, गतिविधि आधारित, रुचिपूर्ण, सहभागी, दक्षता आधारित, उपचारात्मक, बहुकक्षा एवं बहुस्तरीय शिक्षण का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

20
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Topic 1 शिक्षण प्रविधि—अर्थ, परिभाषाएँ, विशेषताएँ, आवश्यकता, महत्त्व एवं शिक्षण विधि से अन्तर

शिक्षण प्रविधि—अर्थ, परिभाषाएँ, विशेषताएँ, आवश्यकता, महत्त्व एवं शिक्षण विधि से अन्तर

शिक्षण प्रविधि का अर्थ

शिक्षण प्रविधि (Teaching Technique) से अभिप्राय ऐसी व्यूह-रचना से है जिसे शिक्षक शिक्षण अथवा अनुदेशन के निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयोग करता है। किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अपनाई गई नीति को भी व्यूह-रचना कहा जाता है।

विद्यार्थियों के सामने पाठ्य-वस्तु को प्रस्तुत करने के लिए शिक्षक जिन शिक्षण-पद्धतियों का प्रयोग करता है, उनका प्रभावपूर्ण एवं कुशल उपयोग शिक्षण प्रविधि से सम्बन्धित है। इसलिए एक कुशल शिक्षक के लिए केवल विभिन्न प्रविधियों का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके उचित प्रयोग में दक्ष होना भी आवश्यक है।

शिक्षण प्रविधि का चयन शिक्षण के उद्देश्य, विषय-वस्तु, विद्यार्थियों की आवश्यकता तथा शिक्षण-परिस्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है। उचित प्रविधि शिक्षण को अधिक व्यवस्थित, सरल और प्रभावशाली बनाने में सहायता करती है।

शिक्षण प्रविधि की प्रमुख परिभाषाएँ

एम. पी. मुफात के अनुसार

शिक्षण प्रविधियाँ प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया के अनुरूप तथा अध्ययन-विषय के वांछित उद्देश्यों से सम्बन्धित होनी चाहिए। शिक्षक इनका प्रयोग बालकों का मार्गदर्शन करने और सीखने में सहायता देने के लिए करता है। किसी निश्चित समय में सर्वोत्तम उद्देश्य की प्राप्ति के साधन के रूप में उपयुक्त प्रविधि का चयन किया जाना चाहिए।

बी. ओ. स्मिथ के अनुसार

शिक्षण प्रविधियाँ उन कार्यों के रूप हैं जिनके द्वारा कुछ पूर्व-निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।

स्ट्रेसर के अनुसार

शिक्षण प्रविधि ऐसी योजना है जिसमें शिक्षण उद्देश्यों, व्यवहारगत परिवर्तन, विषय-वस्तु, कार्य-विश्लेषण, अधिगम-अनुभव तथा विद्यार्थियों के परिपक्व अनुभवों को विशेष महत्त्व दिया जाता है।

ब्राउडी के अनुसार

शिक्षण व्यूह-रचना का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। इसके अन्तर्गत विभिन्न शिक्षण विधियाँ, प्रविधियाँ तथा युक्तियाँ सम्मिलित होती हैं।

बेन्सले के अनुसार

शिक्षण प्रविधि शिक्षक द्वारा संचालित वह क्रिया है जिसके माध्यम से विद्यार्थियों को ज्ञान की प्राप्ति होती है।

बिनिंग के अनुसार

शिक्षण प्रविधि शिक्षक-प्रक्रिया का गतिशील कार्य है।

भट्ट एवं गेरबेरिच के अनुसार

शिक्षण विधि क्रियाओं की एक सुपरिभाषित संरचना है, जिसमें परिस्थितियों की माँग के अनुसार विभिन्न प्रविधियाँ तथा युक्तियाँ निहित होती हैं।

उत्तम शिक्षण प्रविधि की विशेषताएँ

  1. उत्तम शिक्षण प्रविधि वही है जो पूर्व-निर्धारित शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक हो।
  2. प्रविधि का चयन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि उसका प्रयोग शिक्षण-परिस्थिति में उचित रूप से किया जा सके।
  3. उत्तम शिक्षण पद्धति कलात्मक होती है और शिक्षक को वांछित तथा अवांछित दोनों प्रकार की स्थितियों का ज्ञान प्रदान करती है।
  4. उत्तम शिक्षण प्रविधि का चयन व्यक्तिगत आधार तथा विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
  5. यह विद्यार्थियों में वांछित परिवर्तन लाती है तथा अच्छी आदतों के विकास में सहायता करती है।
  6. यह विद्यार्थियों में विषय-वस्तु के प्रति रुचि उत्पन्न करने वाली होनी चाहिए।
  7. यह विद्यार्थियों को शिक्षा का सक्रिय सदस्य बनाती है और आवश्यक स्थानों पर उन्हें पर्याप्त क्रियाएँ करने का अवसर देती है।
  8. उत्तम शिक्षण प्रविधि विद्यार्थियों को स्वाध्याय के लिए प्रेरित करती है।
  9. यह विद्यार्थियों की तर्क, निर्णय तथा विश्लेषण शक्ति का विकास करती है और उनकी वैयक्तिक भिन्नताओं को मान्यता देती है।

शिक्षण प्रविधि की आवश्यकता एवं महत्त्व

शिक्षण प्रविधियों की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए बिनिंग ने शिक्षक की तुलना सैनिक से की है। जिस प्रकार सैनिक को विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान के साथ उनके प्रयोग का भी ज्ञान होना चाहिए, उसी प्रकार शिक्षक के लिए विषय-वस्तु के ज्ञान के साथ उपयुक्त शिक्षण प्रविधियों का ज्ञान और उनका कुशल प्रयोग आवश्यक है।

शिक्षण प्रविधियों की प्रमुख आवश्यकता एवं महत्त्व निम्नलिखित हैं—

  1. शिक्षण की प्रकृति का निर्माण एवं उसे व्यवस्थित रूप प्रदान करने में सहायता करती हैं।
  2. शिक्षण एवं अधिगम के बीच सम्बन्ध स्थापित करने के लिए आवश्यक हैं।
  3. शिक्षक को शिक्षण की नवीन तकनीकों एवं प्रविधियों की जानकारी प्रदान करती हैं।
  4. शिक्षण-अनुदेशों के निर्माण में सहायता करती हैं।
  5. शिक्षण उद्देश्यों का निर्धारण करने में सहायक होती हैं।
  6. सुनियोजित एवं सुसंगठित ढंग से पाठ-योजनाओं को क्रियान्वित करने तथा शिक्षण के विभिन्न चरणों की भूमिका और उनके पारस्परिक सम्बन्ध को समझने में सहायता करती हैं।
  7. शिक्षण-कौशलों के निर्माण एवं अनुरक्षण के लिए आवश्यक हैं तथा शिक्षण को व्यवस्थित करने में मार्गदर्शिका का कार्य करती हैं।
  8. शिक्षण प्रविधियों द्वारा बालक के पूर्व-व्यवहार से लेकर मूल्यांकन तक की प्रक्रिया का नियोजन किया जा सकता है। इससे शिक्षण को वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्राप्त होता है।
  9. कक्षा-कक्ष में प्रभावशाली शिक्षण के लिए उपयुक्त शिक्षण प्रविधियों का प्रयोग आवश्यक है।

शिक्षण विधि तथा शिक्षण प्रविधि में अन्तर

शिक्षण विधि और शिक्षण प्रविधि एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं, परन्तु दोनों समान नहीं हैं। शिक्षण विधि का प्रत्यक्ष सम्बन्ध शिक्षण उद्देश्यों से होता है और वह शिक्षण को दिशा तथा गति प्रदान करती है, जबकि शिक्षण प्रविधि का प्रत्यक्ष सम्बन्ध शिक्षण विधि से तथा अप्रत्यक्ष सम्बन्ध शिक्षण उद्देश्यों से होता है।

अन्तर का आधार शिक्षण प्रविधि शिक्षण विधि
चयन प्रक्रिया शिक्षण व्यूह-रचना का चयन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है। शिक्षण विधि का चयन मुख्यतः पाठ्य-वस्तु की प्रकृति को ध्यान में रखकर किया जाता है।
ध्यान शिक्षण व्यूह-रचना व्यवहार तथा सम्बन्धों पर ध्यान देती है। शिक्षण विधि में पाठ्य-वस्तु के प्रस्तुतीकरण पर ध्यान दिया जाता है।
स्वरूप शिक्षण व्यूह-रचना शिक्षण कार्य को विज्ञान के रूप में प्रकट करती है। शिक्षण विधियों को शिक्षण में कला के रूप में माना जाता है।
मुख्य कार्य इसका मुख्य कार्य सीखने के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न करना है। इसका मुख्य कार्य पाठ अथवा विषय-वस्तु का प्रस्तुतीकरण करना है।
मूल्यांकन इसका मूल्यांकन शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति के आधार पर किया जाता है। इसका मूल्यांकन पाठ्य-वस्तु पर अधिकार प्राप्त करने के आधार पर किया जाता है।

शिक्षण में प्रविधि का स्थान

शिक्षण प्रविधि शिक्षक द्वारा विद्यार्थियों के सामने पाठ्य-सामग्री प्रस्तुत करने का ढंग है। उदाहरण के लिए शिक्षक किसी विषय को समझाने के लिए प्रश्नोत्तर, उदाहरण, स्पष्टीकरण, कहानी, निरीक्षण आदि प्रविधियों का प्रयोग कर सकता है। इनका उचित चयन और प्रयोग शिक्षण को रोचक, प्रभावशाली एवं सरल बनाने में सहायता करता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • शिक्षण प्रविधि निश्चित शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षक द्वारा अपनाई गई व्यूह-रचना है।
  • बी. ओ. स्मिथ के अनुसार शिक्षण प्रविधियाँ उन कार्यों के रूप हैं जिनसे पूर्व-निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति होती है।
  • उत्तम शिक्षण प्रविधि उद्देश्यपरक, रुचिकर, क्रियाशील और वैयक्तिक भिन्नताओं को स्वीकार करने वाली होती है।
  • यह विद्यार्थियों में वांछित व्यवहार, अच्छी आदतों, स्वाध्याय, तर्क, निर्णय तथा विश्लेषण शक्ति के विकास में सहायक है।
  • शिक्षण प्रविधियाँ शिक्षण-अधिगम सम्बन्ध स्थापित करने, उद्देश्यों के निर्धारण, पाठ-योजना के क्रियान्वयन और प्रभावी कक्षा-शिक्षण में उपयोगी हैं।
  • शिक्षण विधि का मुख्य सम्बन्ध पाठ्य-वस्तु के प्रस्तुतीकरण से है, जबकि शिक्षण प्रविधि सीखने की उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न करने तथा शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता करती है।

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Topic 2 प्रश्नोत्तर प्रविधि—उद्देश्य, अच्छे प्रश्न, महत्त्व, गुण-दोष एवं सुझाव

प्रश्नोत्तर प्रविधि—उद्देश्य, अच्छे प्रश्न, महत्त्व, गुण-दोष एवं सुझाव

प्रश्नोत्तर प्रविधि का अर्थ

प्रश्नोत्तर प्रविधि (Questionnaire Technique) ऐसी शिक्षण प्रविधि है जिसमें शिक्षक प्रश्नों के माध्यम से विद्यार्थियों को सोचने, उत्तर देने तथा नवीन ज्ञान की ओर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। इसका निर्माण प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात ने किया था, इसलिए इसे सुकरात प्रविधि भी कहा जाता है।

यह एक जनतान्त्रिक व्यूह-रचना है। सुकरात का विचार था कि शैक्षिक पाठ्यक्रम को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि बालक सत्य की जाँच करके स्वयं उसे आत्मसात कर सके।

प्राचीन शिक्षा में प्रश्नों का प्रयोग मुख्यतः विद्यार्थियों के ज्ञान की जाँच के लिए किया जाता था, जबकि वर्तमान शिक्षा में प्रश्न शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने तथा अनेक शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयुक्त होते हैं।

प्रश्नोत्तर प्रविधि की परिभाषाएँ

पार्कर के अनुसार

प्रश्न आदत एवं कौशल के स्तर से ऊपर उठकर विभिन्न मानसिक क्रियाओं की कुंजी का कार्य करता है।

काउडर के अनुसार

शिक्षण मुख्य रूप से प्रश्नों के माध्यम से होना चाहिए।

प्रश्नोत्तर प्रविधि के उद्देश्य

  1. विद्यार्थियों में नवीन ज्ञान के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करना।
  2. विद्यार्थियों में उचित रुचियों, आदतों एवं आदर्शों का निर्माण करना।
  3. विद्यार्थियों की सृजनात्मक क्षमता का विकास करना।

अच्छे प्रश्नों की विशेषताएँ

प्रश्नोत्तर प्रविधि की सफलता काफी हद तक प्रश्नों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। अच्छे प्रश्नों में निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए—

  1. प्रश्न की भाषा स्पष्ट और निश्चित होनी चाहिए, ताकि विद्यार्थी उसे भली-भाँति समझ सके।
  2. प्रश्नों की रचना बालक की व्यावहारिक भाषा के अनुरूप होनी चाहिए।
  3. प्रश्न शिक्षण के उद्देश्य से सम्बन्धित होने चाहिए।
  4. एक प्रश्न में केवल एक ही विचार होना चाहिए। एक साथ दो या अधिक विचारों वाले प्रश्न विद्यार्थियों को भ्रमित कर सकते हैं।
  5. यथासम्भव शब्द-लोप प्रधान प्रश्नों से बचना चाहिए।
  6. प्रश्न विद्यार्थियों के शिक्षण-स्तर के अनुकूल होने चाहिए।
  7. प्रश्नों में क्रमबद्धता होनी चाहिए, जिससे विद्यार्थी एक विचार से दूसरे विचार की ओर सरलता से बढ़ सके।

प्रश्नों के प्रमुख रूप

शिक्षण में प्रश्नों को सामान्यतः निम्न रूपों में प्रस्तुत किया जा सकता है—

  • क्या?
  • कब?
  • कौन?
  • क्यों?
  • कैसे?
  • कहाँ?

प्रश्न पूछने की आवश्यकता एवं महत्त्व

  1. प्रश्नों द्वारा विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान का पता लगाया जाता है और उसी से नवीन ज्ञान का सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है।
  2. बालक का मन चंचल होता है। प्रश्नों के प्रयोग से शिक्षक उसका ध्यान पुनः कक्षा और पाठ की ओर आकर्षित कर सकता है।
  3. प्रश्नों के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि विद्यार्थियों ने पढ़ाए गए पाठ का कितना ज्ञान अर्जित किया है।
  4. पाठ के पुनरावलोकन के लिए प्रश्न आवश्यक होते हैं।
  5. प्रश्न विद्यार्थियों को प्रेरित करते हैं तथा उनमें नवीन ज्ञान के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं।
  6. विद्यार्थियों की समस्याओं को जानने तथा उनके समाधान की दिशा निर्धारित करने में भी प्रश्न सहायक होते हैं।

प्रश्नोत्तर प्रविधि के गुण

  1. प्रश्नोत्तर के प्रयोग द्वारा विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान की जाँच की जा सकती है।
  2. इस प्रविधि में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों क्रियाशील रहते हैं।
  3. विद्यार्थियों की सक्रियता के कारण कक्षा में अनुशासनहीनता की समस्या कम होती है।
  4. इसके माध्यम से विद्यार्थियों की कमजोरी, कठिनाई तथा अधिगम-क्षमता की जानकारी प्राप्त होती है।
  5. यह विद्यार्थियों को स्वयं सोचने का अवसर देती है, जिससे वे अपनी समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करते हैं।
  6. विद्यार्थियों में नवीन ज्ञान की जिज्ञासा बनी रहती है।
  7. सीखे हुए ज्ञान एवं कौशल की पुनरावृत्ति से विद्यार्थियों के मस्तिष्क में व्यवस्थित ज्ञान-रचना विकसित होती है।
  8. यह विद्यार्थियों में रुचि, आदत एवं आदर्शों के निर्माण में सहायक है।
  9. इससे मौलिकता, कल्पनाशीलता तथा स्वयं के प्रयास से आगे बढ़ने जैसी सृजनात्मक क्षमताओं का विकास होता है।

प्रश्नोत्तर प्रविधि के दोष

  1. इसका प्रभावी प्रयोग स्वयं एक कला है। शिक्षक में आवश्यक निपुणता न होने पर यह प्रविधि प्रभावशाली नहीं रहती।
  2. कभी-कभी शिक्षक बहुत अधिक प्रश्न पूछता है और कभी बहुत कम, जिससे शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का संतुलन प्रभावित होता है।
  3. यह प्रविधि उच्च शिक्षा के लिए सभी परिस्थितियों में उपयोगी नहीं मानी जाती।
  4. केवल प्रश्नोत्तर के माध्यम से विद्यार्थी को सम्पूर्ण पाठ्य-वस्तु का ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।
  5. सभी अध्यापक प्रभावी और अच्छे प्रश्नों का निर्माण नहीं कर पाते, जिसका प्रभाव शिक्षण-अधिगम पर पड़ता है।
  6. अनुचित या अत्यधिक प्रयोग से कक्षा में नीरसता उत्पन्न हो सकती है।

प्रश्नोत्तर प्रविधि के प्रभावी प्रयोग हेतु सुझाव

  1. शिक्षक को शिक्षण से पहले पूरी तैयारी करनी चाहिए। प्रस्तावना, प्रस्तुतीकरण आदि विभिन्न चरणों में पूछे जाने वाले प्रश्न पहले से योजनाबद्ध होने चाहिए।
  2. प्रश्न स्पष्ट, संक्षिप्त तथा सरल और बोधगम्य भाषा में होने चाहिए।
  3. आवश्यकता होने पर प्रश्न में प्रयुक्त प्रत्यय अथवा विचार का उचित स्पष्टीकरण किया जाना चाहिए।
  4. प्रश्न पूरी कक्षा को सम्बोधित करके पूछा जाए, लेकिन उत्तर किसी एक विद्यार्थी से लिया जाए।
  5. शिक्षक के प्रश्नों में विविधता होनी चाहिए।
  6. विद्यार्थी जब उत्तर दे रहा हो तो उसे बीच में नहीं रोकना चाहिए, क्योंकि इससे उसके चिन्तन तथा मानसिक सन्तुलन पर प्रभाव पड़ सकता है।
  7. ऐसे सुझावात्मक प्रश्न पूछे जाने चाहिए जो पाठ के विकास में सहायता करें।
  8. प्रश्नोत्तर के बीच उचित हास्य-विनोद का स्थान रखा जा सकता है, जिससे कक्षा की नीरसता कम हो।

शिक्षण में प्रश्नोत्तर प्रविधि का स्थान

प्रश्नोत्तर प्रविधि केवल विद्यार्थियों के ज्ञान की परीक्षा लेने का साधन नहीं है। इसका उचित प्रयोग पूर्वज्ञान जानने, ध्यान आकर्षित करने, पाठ का विकास करने, पुनरावृत्ति कराने, कठिनाइयों को पहचानने तथा विद्यार्थियों को स्वयं सोचने के लिए प्रेरित करने में किया जाता है। इसलिए प्रभावी शिक्षण में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्रश्नोत्तर प्रविधि का निर्माण सुकरात ने किया था, इसलिए इसे सुकरात प्रविधि भी कहा जाता है।
  • इस प्रविधि में प्रश्नों द्वारा विद्यार्थियों को सोचने, उत्तर देने और नवीन ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
  • अच्छे प्रश्न स्पष्ट, निश्चित, उद्देश्य से सम्बन्धित, स्तरानुकूल और क्रमबद्ध होने चाहिए तथा एक प्रश्न में एक ही विचार होना चाहिए।
  • प्रश्नों द्वारा पूर्वज्ञान की जाँच, ध्यान आकर्षण, पुनरावलोकन, ज्ञान की जाँच तथा विद्यार्थियों की समस्याओं की पहचान की जाती है।
  • प्रश्नोत्तर प्रविधि शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को सक्रिय रखती है तथा जिज्ञासा, चिन्तन और सृजनात्मकता के विकास में सहायक होती है।
  • इसका प्रभावी प्रयोग करने के लिए प्रश्नों की पूर्व-योजना, स्पष्ट एवं सरल भाषा, उचित क्रम तथा प्रश्नों में विविधता आवश्यक है।
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Topic 3 विवरण एवं वर्णन प्रविधि—अर्थ, विशेषताएँ, सीमाएँ एवं तुलना

विवरण एवं वर्णन प्रविधि—अर्थ, विशेषताएँ, सीमाएँ एवं तुलना

विवरण प्रविधि का अर्थ

विवरण प्रविधि (Narration Technique) में शिक्षक किसी वस्तु, घटना अथवा विषय-वस्तु का क्रमबद्ध कथन विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत करता है। विवरण के कथन को शिक्षक स्वकथन भी कहा जाता है।

इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों के मस्तिष्क में विषय का ऐसा मानसिक चित्र बनाना है जिससे वे विषय-वस्तु को पूर्णता के साथ समझ सकें। विवरण प्रस्तुत करते समय शिक्षक अपनी कथन-शक्ति का प्रयोग करके किसी वस्तु या घटना को उत्साहपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।

प्रश्नोत्तर या व्याख्या द्वारा जब किसी तथ्य को पूरी तरह स्पष्ट करना सम्भव न हो, तब विवरण प्रविधि उपयोगी होती है। यह विज्ञान और गणित की अपेक्षा सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों में अधिक उपयोगी मानी गई है।

विवरण प्रविधि की विशेषताएँ

  1. शिक्षक विद्यार्थियों के समक्ष विषय का विवरण प्रस्तुत करता है। प्रभावशाली विवरण विद्यार्थियों के मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव डाल सकता है।
  2. इसके माध्यम से विद्यार्थियों को पर्याप्त ज्ञान एक साथ प्राप्त हो सकता है, जिससे उन्हें अलग-अलग अनेक पुस्तकों को पढ़ने की आवश्यकता कम पड़ती है।
  3. इसमें विषय-वस्तु के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालकर उसकी पूर्ण समीक्षा प्रस्तुत की जाती है।
  4. विद्यार्थियों को अपेक्षाकृत कम समय में आवश्यक ज्ञान दिया जा सकता है।
  5. यह विद्यार्थियों की तार्किक शक्ति के विकास तथा नवीन ज्ञान के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करने में सहायक है।
  6. प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया विवरण विद्यार्थियों में विषय को ध्यानपूर्वक समझने की क्षमता विकसित करता है।

विवरण प्रविधि की सीमाएँ

  1. इसमें शिक्षक अधिक सक्रिय रहता है, जबकि विद्यार्थी मुख्यतः श्रोता बने रहते हैं।
  2. यदि भाषा रोचक, बोधगम्य, शुद्ध और उपयुक्त न हो तो इस प्रविधि की प्रभावशीलता कम हो जाती है।
  3. इसके प्रयोग के लिए शिक्षक में विशेष दक्षता आवश्यक है, ताकि वह विवरण को तार्किक एवं मनोवैज्ञानिक क्रम में प्रस्तुत कर सके।
  4. अत्यधिक प्रयोग करने पर पाठ नीरस हो सकता है।
  5. विवरण कहाँ से प्रारम्भ किया जाए और कितना विवरण पर्याप्त है, इसका निर्णय करना कभी-कभी शिक्षक के लिए कठिन होता है।

विवरण प्रविधि के प्रभावी प्रयोग हेतु सुझाव

  • विवरण विद्यार्थियों की आयु तथा मानसिक स्तर के अनुरूप होना चाहिए।
  • विवरण बहुत अधिक लम्बा नहीं होना चाहिए, अन्यथा विद्यार्थी भ्रमित हो सकते हैं।
  • भाषा-शैली स्पष्ट, सरल और विद्यार्थियों के मानसिक स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
  • आवश्यकतानुसार प्रश्नोत्तर प्रविधि तथा सहायक सामग्री का उचित स्थानों पर प्रयोग करना चाहिए।

वर्णन प्रविधि का अर्थ

जिस प्रविधि के माध्यम से किसी विषय-वस्तु या घटना का विद्यार्थियों के सामने पूर्ण शाब्दिक चित्र प्रस्तुत किया जाता है, उसे वर्णन प्रविधि (Descriptive Technique) कहते हैं।

इस प्रविधि द्वारा किसी घटना, दृश्य, नियम या सिद्धान्त का विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है। केवल प्रश्नोत्तर या संक्षिप्त विवरण से जब विद्यार्थियों के मस्तिष्क में विषय का सम्पूर्ण चित्र नहीं बन पाता, तब शिक्षक वर्णन प्रविधि का प्रयोग करता है।

वर्णन को विवरण प्रविधि का विस्तृत रूप कहा जा सकता है। इसमें विषय-वस्तु का सांगोपांग विवेचन एवं प्रस्तुतीकरण किया जाता है, किन्तु विश्लेषण, आलोचना तथा टीका-टिप्पणी की भावना नहीं होती।

वर्णन एक कला है। सजीव और रोचक वर्णन करने के लिए शिक्षक में विशेष कौशल आवश्यक होता है। उचित वर्णन द्वारा शिक्षक विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते हुए विषय की पूर्ण समीक्षा भी करा सकता है।

वर्णन को प्रभावशाली बनाने वाले तत्त्व

  1. वर्णन करते समय विषय से सम्बन्धित भावों में उचित उतार-चढ़ाव, मुद्रा-विचार तथा स्वर का आरोह-अवरोह प्रभावशाली होना चाहिए। भाषा सरल, सहज, स्पष्ट और सुबोध होनी चाहिए।
  2. वर्णन स्वयं में सम्पूर्ण, सर्वांगीण, व्यापक तथा बहुपक्षीय होना चाहिए।
  3. वर्णन विद्यार्थियों की रुचि एवं विकास-अवस्था के अनुकूल होना चाहिए, तभी वह उनके मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव डाल सकता है।
  4. वर्णनीय विषय को विद्यार्थियों के मानसिक स्तर तथा सामाजिक पृष्ठभूमि से जोड़ना उपयोगी होता है।

वर्णन प्रस्तुत करने के प्रमुख तरीके

  • चित्र एवं मॉडलों के माध्यम से
  • भ्रमण द्वारा
  • स्वयं करके अथवा प्रयोग द्वारा

वर्णन प्रविधि को सफल बनाने हेतु सुझाव

  1. वर्णन विषय-वस्तु से सम्बन्धित होना चाहिए।
  2. वर्णन की भाषा-शैली सरल एवं स्पष्ट होनी चाहिए।
  3. वर्णन समग्र रूप में किया जाना चाहिए।
  4. वर्णन क्रमबद्ध तथा आवश्यकतानुसार होना चाहिए।
  5. वर्णन विद्यार्थियों के स्तर के अनुकूल होना चाहिए।

वर्णन प्रविधि की सीमाएँ

  1. इसमें शिक्षक अधिक सक्रिय रहता है और विद्यार्थियों की क्रियाशीलता कम हो जाती है।
  2. वर्णन अत्यधिक लम्बा होने पर वह भाषण जैसा बन सकता है, जिससे विद्यार्थी ऊबने लगते हैं।
  3. भाषा और विषय-वस्तु उपयुक्त न होने पर शिक्षण नीरस एवं यान्त्रिक हो सकता है तथा विद्यार्थियों का ध्यान कम हो जाता है।
  4. सभी शिक्षक समान रूप से प्रभावशाली वर्णन नहीं कर सकते। इसके लिए प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति और विशेष कौशल आवश्यक है।

विवरण एवं वर्णन प्रविधि में अन्तर

विवरण प्रविधि वर्णन प्रविधि
विवरण संक्षिप्त होता है। वर्णन विस्तृत एवं लम्बा होता है।
इसकी प्रकृति अधिक विश्लेषणात्मक होती है। आवश्यकतानुसार इसकी प्रकृति अधिक संश्लेषणात्मक होती है।
विभिन्न तथ्यों को तार्किक क्रम में प्रस्तुत किया जाता है। तथ्यों को तार्किक तथा मनोवैज्ञानिक दोनों क्रमों में प्रस्तुत किया जाता है।
विषय-वस्तु के स्पष्टीकरण के लिए कभी-कभी इसका प्रयोग किया जाता है। सजीव एवं सर्वांगीण शाब्दिक चित्र प्रस्तुत करने के लिए इसका निरन्तर प्रयोग किया जाता है।
विवरण अधिकांशतः मौखिक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। वर्णन मौखिक तथा लिखित दोनों रूपों में हो सकता है।

विवरण एवं वर्णन प्रविधि का शैक्षिक उपयोग

दोनों प्रविधियाँ विषय-वस्तु को विद्यार्थियों के लिए स्पष्ट और बोधगम्य बनाने में सहायक हैं। विवरण अपेक्षाकृत संक्षिप्त रूप से तथ्यों को क्रमबद्ध करता है, जबकि वर्णन विषय का विस्तृत एवं सजीव शाब्दिक चित्र प्रस्तुत करता है। शिक्षक विषय, विद्यार्थियों के स्तर और शिक्षण की आवश्यकता के अनुसार इनका प्रयोग करता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • विवरण प्रविधि में शिक्षक किसी विषय या घटना का क्रमबद्ध कथन प्रस्तुत करता है; इसे शिक्षक स्वकथन भी कहा जाता है।
  • विवरण प्रविधि कम समय में विषय के विभिन्न पक्षों का ज्ञान देने तथा तार्किक शक्ति और जिज्ञासा के विकास में सहायक है।
  • वर्णन प्रविधि में किसी विषय, घटना, दृश्य, नियम या सिद्धान्त का पूर्ण एवं विस्तृत शाब्दिक चित्र प्रस्तुत किया जाता है।
  • वर्णन को प्रभावी बनाने के लिए भाषा सरल, स्पष्ट एवं सुबोध तथा प्रस्तुति क्रमबद्ध, सर्वांगीण और विद्यार्थियों के स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
  • वर्णन चित्र-मॉडल, भ्रमण तथा स्वयं करके या प्रयोग द्वारा भी प्रभावी बनाया जा सकता है।
  • विवरण संक्षिप्त और मुख्यतः मौखिक होता है, जबकि वर्णन विस्तृत होता है तथा मौखिक और लिखित दोनों रूपों में प्रस्तुत किया जा सकता है।
Topic 4 व्याख्यान एवं स्पष्टीकरण प्रविधि

व्याख्यान एवं स्पष्टीकरण प्रविधि

व्याख्यान प्रविधि का अर्थ

व्याख्यान प्रविधि (Lecture Technique) शिक्षण की प्राचीनतम प्रविधियों में से एक है। प्राचीन भारतीय शिक्षा में गुरुकुलों में गुरु अपने शिष्यों को उपदेश, उदाहरण तथा मौखिक प्रस्तुतीकरण के माध्यम से ज्ञान प्रदान करते थे।

इस प्रविधि में शिक्षक किसी विषय से सम्बन्धित तथ्यों, सिद्धान्तों, विचारों तथा सूचनाओं को व्यवस्थित रूप से मौखिक रूप में विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत करता है। इसके माध्यम से कम समय में अधिक विद्यार्थियों को एक साथ पर्याप्त ज्ञान दिया जा सकता है।

कार्टर गुड के शैक्षिक शब्दकोश में भी व्याख्यान को एक शिक्षण प्रविधि के रूप में स्वीकार किया गया है। व्याख्यान केवल बोलने तक सीमित नहीं है; आवश्यकतानुसार इसमें उदाहरण, विवरण, वर्णन, प्रश्न, निर्देश तथा मानचित्र, चार्ट और अन्य दृश्य-सामग्री का भी प्रयोग किया जा सकता है।

इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, धर्म, दर्शन तथा सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों में इसका विशेष उपयोग होता है। विस्तृत पाठ्यक्रम को सीमित समय में पूरा करने में भी यह उपयोगी प्रविधि है।

व्याख्यान प्रविधि की परिभाषाएँ

थॉमस एम. रिस्क के अनुसार

व्याख्यान ऐसी प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक उन तथ्यों, सिद्धान्तों तथा उनके पारस्परिक सम्बन्धों को प्रस्तुत करता है जिन्हें वह श्रोताओं को समझाना चाहता है।

जेम्स एम. ली के अनुसार

व्याख्यान वह शिक्षण विधि है जिसमें शिक्षक किसी विषय पर औपचारिक तथा क्रमबद्ध रूप से मौखिक प्रस्तुति देता है।

व्याख्यान प्रविधि की प्रक्रिया

एक प्रभावशाली व्याख्यान को सामान्यतः निम्न क्रम में प्रस्तुत किया जाता है—

  1. उद्देश्य — पाठ के उद्देश्य को स्पष्ट करना।
  2. प्रस्तावना — विद्यार्थियों को विषय के लिए तैयार करना।
  3. प्रस्तुतीकरण — विषय-वस्तु को क्रमबद्ध एवं स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना।
  4. उदाहरण — आवश्यकतानुसार उदाहरणों द्वारा विषय को बोधगम्य बनाना।
  5. प्रश्नोत्तर — विद्यार्थियों की समझ की जाँच तथा कठिनाइयों का समाधान करना।
  6. निष्कर्ष — मुख्य बातों को संक्षेप में स्पष्ट करना।

व्याख्यान प्रविधि का प्रयोग कब किया जाए?

  1. किसी पाठ या विषय के मुख्य तथ्यों का सारांश प्रस्तुत करने के लिए।
  2. विद्यार्थियों को किसी नवीन विषय के अध्ययन के लिए प्रेरित करने हेतु।
  3. कम समय में अधिक विषय-वस्तु प्रस्तुत करके समय की बचत करने के लिए।
  4. कठिन पारिभाषिक शब्दों, प्रत्ययों, सम्बन्धों तथा सिद्धान्तों को स्पष्ट करने के लिए।
  5. विद्यार्थियों को गृहकार्य अथवा अन्य कार्य के सम्बन्ध में निर्देश देने के लिए।
  6. पाठ्यपुस्तक से अतिरिक्त आवश्यक ज्ञान एवं सूचनाएँ प्रदान करने के लिए।

व्याख्यान प्रविधि के गुण

  1. इसमें विशेष वैज्ञानिक उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती और एक साथ बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को पढ़ाया जा सकता है। इसलिए यह अपेक्षाकृत कम खर्चीली प्रविधि है।
  2. कम समय में अधिक जानकारी प्रदान की जा सकती है।
  3. शिक्षक के लिए इसका प्रयोग सरल एवं सुविधाजनक होता है।
  4. तथ्यात्मक ज्ञान तथा ऐतिहासिक विषय-वस्तु के प्रस्तुतीकरण में यह विशेष उपयोगी है।
  5. अन्य शिक्षण प्रविधियों के साथ सहायक प्रविधि के रूप में इसका प्रयोग किया जा सकता है।
  6. विषय-वस्तु को तार्किक एवं क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत करने में सहायता मिलती है।
  7. उच्च कक्षाओं में शिक्षक अपने विषय-ज्ञान और योग्यता का प्रभावशाली उपयोग कर सकता है।
  8. व्याख्यान के बीच प्रश्न पूछकर विद्यार्थियों की समझ और ध्यान को बढ़ाया जा सकता है।
  9. विषय-वस्तु की पुनरावृत्ति तथा मुख्य तथ्यों को दोहराने में यह उपयोगी है।
  10. महान व्यक्तियों के जीवन, विचारों और कार्यों से सम्बन्धित विषयों के शिक्षण में इसका विशेष महत्त्व है।

व्याख्यान प्रविधि के दोष

  1. इसमें विद्यार्थियों की सीखने की तत्परता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
  2. प्रयोगात्मक एवं व्यावहारिक कार्यों की उपेक्षा होने की सम्भावना रहती है।
  3. विद्यार्थियों की वैयक्तिक भिन्नताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
  4. करके सीखने के सिद्धान्त की उपेक्षा होती है।
  5. विद्यार्थी प्रायः निष्क्रिय श्रोता बने रहते हैं।
  6. विद्यार्थियों में तर्क तथा निरीक्षण की क्षमताओं के विकास के अवसर सीमित हो जाते हैं।
  7. मानसिक शक्तियों का उचित विकास नहीं हो पाता।
  8. आलोचनात्मक दृष्टिकोण के विकास के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिलता।
  9. यह प्रविधि स्मरण-प्रधान शिक्षण को बढ़ावा दे सकती है।
  10. शिक्षक की पढ़ाने की गति कभी-कभी विद्यार्थियों की सीखने की गति से अधिक हो जाती है।
  11. यदि केवल शिक्षक ही बोलता रहे तो कक्षा में लोकतान्त्रिक वातावरण विकसित नहीं हो पाता।

व्याख्यान प्रविधि को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव

  1. व्याख्यान को यथासम्भव लोकतान्त्रिक बनाना चाहिए तथा विद्यार्थियों को भी सहभागिता का अवसर देना चाहिए।
  2. व्याख्यान विद्यार्थियों की आयु और मानसिक स्तर के अनुकूल होना चाहिए।
  3. विद्यार्थियों की वैयक्तिक भिन्नताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  4. नीरसता दूर करने के लिए आवश्यक स्थानों पर उदाहरण, कहानी तथा अन्य उपयुक्त प्रविधियों का प्रयोग करना चाहिए।
  5. विद्यार्थियों को अपनी जिज्ञासा के आधार पर प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।

स्पष्टीकरण प्रविधि का अर्थ

स्पष्टीकरण प्रविधि (Explanation Technique) वह प्रविधि है जिसके द्वारा शिक्षक किसी कठिन विषय, तथ्य, घटना, शब्द, अवधारणा या सिद्धान्त को सरल और बोधगम्य रूप में विद्यार्थियों के सामने स्पष्ट करता है। इसे उद्घाटन विधि भी कहा गया है।

जटिल एवं कठिन विषय-वस्तु को समझाने में इस प्रविधि का विशेष महत्त्व है। उदाहरण के लिए वाणिज्य में डेबिट-क्रेडिट अथवा लेजर जैसे प्रत्ययों को समझाने के लिए शिक्षक स्पष्टीकरण का सहारा ले सकता है।

यह प्रविधि ज्ञात से अज्ञात की ओर शिक्षण-सूत्र पर आधारित होती है। शिक्षक विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान से सम्बन्ध स्थापित करते हुए नवीन और कठिन तथ्य को सरल रूप में स्पष्ट करता है।

स्पष्टीकरण की परिभाषा

गालिक के अनुसार

स्पष्टीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी शब्द, शब्द-समूह अथवा कथन के अर्थ में उपस्थित जटिलता को दूर किया जाता है।

प्रभावी स्पष्टीकरण के लिए ध्यान देने योग्य बातें

  1. स्पष्टीकरण केवल आवश्यक और उचित स्थान पर ही किया जाना चाहिए।
  2. स्पष्टीकरण के बाद यह जाँचना चाहिए कि विद्यार्थियों ने कठिन शब्दों एवं प्रत्ययों को कितना समझा है।
  3. शिक्षक को विषय का स्पष्टीकरण आत्मविश्वास के साथ करना चाहिए।
  4. स्पष्टीकरण की भाषा सरल, स्पष्ट और बोधगम्य होनी चाहिए।
  5. विषय का स्पष्टीकरण विद्यार्थियों के मानसिक स्तर के अनुरूप होना चाहिए।
  6. स्पष्टीकरण विषय से पूर्णतः सम्बन्धित हो तथा न अत्यधिक लम्बा और न ही अत्यधिक संक्षिप्त हो।
  7. शिक्षक को जिस तथ्य का स्पष्टीकरण करना है, उसका स्पष्ट ज्ञान पहले से होना चाहिए।
  8. यदि शिक्षक स्वयं किसी तथ्य के विषय में निश्चित न हो तो गलत जानकारी देने की अपेक्षा उसका स्पष्टीकरण बाद में करना उचित है।
  9. शिक्षक में विषय को रोचक तथा प्रभावशाली ढंग से स्पष्ट करने की क्षमता होनी चाहिए।
  10. आवश्यकता होने पर चित्र, मॉडल, चार्ट अथवा अन्य सहायक सामग्री का प्रयोग किया जाना चाहिए।

स्पष्टीकरण प्रविधि की सीमाएँ

  1. विषय-वस्तु के किन विशेष पक्षों का स्पष्टीकरण आवश्यक है, इसका निर्धारण करना कभी-कभी कठिन होता है।
  2. स्पष्टीकरण का कोई एक निश्चित मानदण्ड नहीं होता; इसका स्वरूप शिक्षक की समझ और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।
  3. विद्यार्थियों के लिए कितना और किस स्तर का स्पष्टीकरण उपयुक्त होगा, इसका निर्णय कठिन हो सकता है।
  4. तार्किक एवं व्यवस्थित स्पष्टीकरण के लिए शिक्षक को पर्याप्त पूर्व-तैयारी करनी पड़ती है।
  5. केवल शिक्षण-कला पर्याप्त नहीं है; प्रभावी स्पष्टीकरण के लिए शिक्षक में विषय का उचित ज्ञान भी आवश्यक है।

व्याख्यान एवं स्पष्टीकरण प्रविधि का शैक्षिक महत्त्व

व्याख्यान प्रविधि व्यापक विषय-वस्तु को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करने में उपयोगी है, जबकि स्पष्टीकरण प्रविधि कठिन शब्दों, प्रत्ययों और सिद्धान्तों को सरल एवं स्पष्ट बनाने में सहायता करती है। आवश्यकता के अनुसार दोनों का संयुक्त प्रयोग करने से शिक्षण अधिक बोधगम्य एवं प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • व्याख्यान प्रविधि में शिक्षक तथ्यों, सिद्धान्तों एवं सूचनाओं को मौखिक और क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करता है।
  • थॉमस एम. रिस्क तथा जेम्स एम. ली ने व्याख्यान को व्यवस्थित मौखिक प्रस्तुतीकरण के रूप में स्पष्ट किया है।
  • व्याख्यान का प्रमुख लाभ कम समय में अधिक विद्यार्थियों को अधिक ज्ञान देना है, जबकि इसकी मुख्य सीमा विद्यार्थियों का निष्क्रिय श्रोता बन जाना है।
  • स्पष्टीकरण प्रविधि कठिन विषय, शब्द, प्रत्यय या सिद्धान्त की जटिलता दूर करके उसे सरल एवं बोधगम्य बनाती है।
  • स्पष्टीकरण प्रविधि ज्ञात से अज्ञात की ओर शिक्षण-सूत्र पर आधारित है।
  • प्रभावी स्पष्टीकरण के लिए सरल भाषा, विद्यार्थियों के स्तर का ध्यान, विषय का स्पष्ट ज्ञान तथा आवश्यकतानुसार सहायक सामग्री का प्रयोग आवश्यक है।
Topic 5 कथावाचन / कहानी कथन प्रविधि

कथावाचन / कहानी कथन प्रविधि

कथावाचन / कहानी कथन प्रविधि का अर्थ

कथावाचन या कहानी कथन प्रविधि (Story Telling Technique) ऐसी शिक्षण प्रविधि है जिसमें किसी घटना, विचार या विषय-वस्तु को कहानी के रूप में रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। इसका प्रयोग विशेष रूप से छोटी कक्षाओं में अधिक उपयोगी माना जाता है, क्योंकि बालक कहानी सुनने में स्वाभाविक रूप से रुचि लेते हैं।

यह प्रविधि मुख्यतः प्राथमिक स्तर के लिए उपयोगी है, परन्तु विषय-ज्ञान और कथन-कौशल में दक्ष शिक्षक इसका प्रयोग उच्च कक्षाओं में भी आवश्यकता के अनुसार कर सकता है। कहानी में मनोरंजन का तत्त्व होने के कारण विद्यार्थी ध्यानपूर्वक सुनते हैं और विषय-वस्तु को सरलता से ग्रहण करते हैं।

कहानी के सम्बन्ध में प्रमुख विचार

चार्ल्स बैरेट के अनुसार

कहानी एक संक्षिप्त वर्णनात्मक रचना है जिसमें वास्तविक जीवन को कलात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाता है और जिसका प्रमुख उद्देश्य मनोरंजन करना होता है।

कोपलैण्ड नाइट के अनुसार

आधुनिक कहानी में नाटक के समान गुण पाए जाते हैं। इसमें समस्या, बाधा, संघर्ष तथा चरम-बिन्दु जैसी स्थितियाँ हो सकती हैं, जो कहानी को प्रभावशाली बनाती हैं।

कहानी कथन के सम्बन्ध में एला कैटन के सुझाव

  • कहानी सरल और बच्चों के समझने योग्य होनी चाहिए।
  • कहानी का सम्बन्ध बच्चों तथा उनके दैनिक जीवन से होना चाहिए।
  • छोटे बच्चों को अत्यधिक भय उत्पन्न करने वाली कहानियाँ नहीं सुनानी चाहिए।
  • कहानी के पात्रों और घटनाओं को बालक के आसपास के वातावरण से जोड़ना उपयोगी होता है।
  • आवश्यकतानुसार ध्वनि-प्रभाव तथा भावपूर्ण प्रस्तुति कहानी को अधिक प्रभावशाली बना सकती है।

कथावाचन प्रविधि के उद्देश्य

  1. विद्यार्थियों की सृजनात्मक क्षमता का विकास करना।
  2. विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों तथा अच्छी प्रवृत्तियों का विकास करना।
  3. कल्पनाशक्ति एवं स्मरणशक्ति का विकास करना।
  4. पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक तथा सामाजिक घटनाओं के माध्यम से मानव जीवन का ज्ञान प्रदान करना।
  5. विद्यार्थियों के शब्द-भण्डार में वृद्धि करना।
  6. मौखिक अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास करना।
  7. क्रमबद्ध रूप से सोचने एवं विचार करने की क्षमता विकसित करना।
  8. सद्गुणों एवं अच्छी आदतों के विकास में सहायता करना।
  9. ध्यानपूर्वक सुनने तथा कहानी के भाव को समझने की क्षमता विकसित करना।
  10. पशु-पक्षियों, मानव-स्वभाव तथा सांस्कृतिक मूल्यों से सम्बन्धित ज्ञान प्रदान करना।

कथावाचन प्रविधि के गुण

  1. कहानी के प्रति विद्यार्थियों की स्वाभाविक रुचि होने के कारण शिक्षण आकर्षक बनता है।
  2. छोटे बच्चे कठिन बातों को भी कहानी के माध्यम से सरलता से समझ लेते हैं।
  3. यह विद्यार्थियों की निर्णय शक्ति एवं कल्पनाशक्ति के विकास में सहायक है।
  4. नीरस और कठिन तथ्यों को भी रोचक एवं प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है।
  5. कहानी के पात्रों और घटनाओं के माध्यम से अच्छे चरित्र-गुणों का विकास किया जा सकता है।
  6. यह बालकों के मनोवैज्ञानिक विकास में सहायक होती है।

कथावाचन प्रविधि के दोष

  1. यह प्रविधि उच्च कक्षाओं के लिए सभी परिस्थितियों में उपयुक्त नहीं होती।
  2. सभी विषयों और सभी प्रकार की पाठ्य-वस्तु को कहानी के माध्यम से नहीं पढ़ाया जा सकता।
  3. प्रभावी कहानी कथन के लिए शिक्षक में विशेष कथन-कौशल आवश्यक होता है।

कथावाचन को प्रभावी बनाने के लिए ध्यान देने योग्य बातें

  1. कहानी विद्यार्थियों की आयु, कक्षा तथा मानसिक स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
  2. कहानी की भाषा सरल, स्पष्ट और बोधगम्य होनी चाहिए।
  3. कथन करते समय प्रसंग के अनुसार भाव-भंगिमा तथा स्वर में उचित आरोह-अवरोह का प्रयोग करना चाहिए।
  4. आवश्यकता के अनुसार चित्र, मॉडल या अन्य शिक्षण-सहायक सामग्री का प्रयोग किया जा सकता है।
  5. कहानी समाप्त होने के बाद विद्यार्थियों से सम्बन्धित प्रश्न पूछकर उनकी समझ की जाँच करनी चाहिए।

शिक्षण में कथावाचन प्रविधि का महत्त्व

कथावाचन प्रविधि बालकों की स्वाभाविक रुचि और मनोरंजन की प्रवृत्ति का उपयोग शिक्षण में करती है। इसके माध्यम से कठिन अथवा नीरस विषय-वस्तु को सरल, रोचक और स्मरणीय बनाया जा सकता है। साथ ही यह कल्पना, स्मृति, मौखिक अभिव्यक्ति, नैतिक मूल्यों तथा सृजनात्मकता के विकास में भी सहायक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कथावाचन प्रविधि में विषय-वस्तु को कहानी के रूप में रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।
  • यह प्रविधि विशेष रूप से प्राथमिक स्तर के बालकों के लिए उपयोगी मानी जाती है।
  • चार्ल्स बैरेट के अनुसार कहानी एक संक्षिप्त वर्णनात्मक रचना है जिसका प्रमुख उद्देश्य मनोरंजन करना है।
  • यह कल्पनाशक्ति, स्मरणशक्ति, शब्द-भण्डार, मौखिक अभिव्यक्ति तथा सृजनात्मकता के विकास में सहायक है।
  • प्रभावी कहानी सरल, स्तरानुकूल, रोचक तथा भावपूर्ण होनी चाहिए।
  • कहानी के बाद प्रश्न पूछकर विद्यार्थियों की समझ की जाँच करना उपयोगी होता है।

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Topic 6 निरीक्षण एवं उदाहरण प्रविधि

निरीक्षण एवं उदाहरण प्रविधि

निरीक्षण प्रविधि का अर्थ

निरीक्षण प्रविधि (Observation Technique) ऐसी शिक्षण प्रविधि है जिसमें विद्यार्थी किसी वस्तु, घटना, परिस्थिति या व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन करके ज्ञान प्राप्त करता है। इसमें शिक्षक स्वयं प्रत्येक तथ्य का वर्णन करने के स्थान पर विद्यार्थियों को देखने, समझने और निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित करता है।

इस प्रविधि का विकास उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में परम्परागत शिक्षण की कमियों को दूर करने के उद्देश्य से हुआ। निरीक्षण के द्वारा विद्यार्थियों में सूक्ष्म अवलोकन, स्वतन्त्र चिन्तन तथा उचित-अनुचित में भेद करने की क्षमता विकसित होती है।

निरीक्षण मुख्यतः दो रूपों में किया जा सकता है—नियन्त्रित निरीक्षण तथा अनियन्त्रित निरीक्षण। नियन्त्रित निरीक्षण को प्रयोगात्मक निरीक्षण भी कहा जाता है, जबकि अनियन्त्रित निरीक्षण प्राकृतिक परिस्थितियों में किया जाता है।

कोर्सिनिक के अनुसार निरीक्षण के प्रकार

1. औपचारिक निरीक्षण

इसमें निरीक्षक पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार नियंत्रित परिस्थितियों में व्यक्ति के व्यवहार का व्यवस्थित निरीक्षण करता है। जिस व्यक्ति का निरीक्षण किया जा रहा होता है, उसे इसकी जानकारी हो सकती है; इसलिए उसके व्यवहार में कृत्रिमता आने की सम्भावना रहती है।

2. अनौपचारिक निरीक्षण

इसमें किसी निश्चित योजना या नियंत्रित परिस्थिति के बिना स्वाभाविक वातावरण में निरीक्षण किया जाता है। प्रायः व्यक्ति को यह ज्ञात नहीं होता कि उसका निरीक्षण किया जा रहा है, इसलिए उसका व्यवहार अधिक स्वाभाविक रहता है।

निरीक्षण की अवस्थाएँ

  1. निर्धारण — सबसे पहले यह निश्चित किया जाता है कि किस वस्तु, घटना या व्यवहार का निरीक्षण करना है।
  2. ध्यान केन्द्रित करना — निर्धारित तथ्य पर ध्यान केन्द्रित करके उसका सावधानीपूर्वक अवलोकन किया जाता है।
  3. लेखबद्ध करना — निरीक्षण से प्राप्त तथ्यों एवं निष्कर्षों को क्रमबद्ध रूप से लिख लिया जाता है।

निरीक्षण प्रविधि के गुण

  1. यह अपेक्षाकृत वस्तुनिष्ठ एवं वैज्ञानिक प्रविधि है, क्योंकि ज्ञान प्रत्यक्ष अवलोकन पर आधारित होता है।
  2. योजनाबद्ध निरीक्षण से प्राप्त तथ्य अधिक विश्वसनीय तथा प्रामाणिक हो सकते हैं।
  3. यह अपेक्षाकृत कम खर्चीली प्रविधि है, क्योंकि इसके लिए हमेशा महँगे प्रयोगशाला उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती।
  4. इसका प्रयोग अनेक प्रकार की परिस्थितियों, घटनाओं और व्यवहारों के अध्ययन में किया जा सकता है।
  5. इससे विभिन्न व्यक्तियों एवं समूहों के व्यवहार का अध्ययन तथा तुलनात्मक निरीक्षण सम्भव होता है।
  6. व्यक्तिगत तथा सामूहिक दोनों प्रकार के व्यवहार का अध्ययन किया जा सकता है।
  7. यह प्रयोगात्मक प्रविधि के लिए आधार तैयार करती है, क्योंकि प्रयोग में भी बाह्य व्यवहार एवं घटनाओं का निरीक्षण आवश्यक होता है।
  8. शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े, प्रतिभाशाली अथवा समस्याग्रस्त विद्यार्थियों के व्यवहार को समझने में इसका उपयोग किया जा सकता है।
  9. इससे विद्यार्थियों की रुचि, जिज्ञासा, चिन्तन, विश्लेषण तथा विभिन्न कौशलों का विकास होता है।
  10. प्रत्यक्ष अनुभव के कारण प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी हो सकता है तथा शिक्षक-विद्यार्थी सम्बन्ध भी बेहतर बन सकते हैं।

निरीक्षण प्रविधि की सीमाएँ

  1. प्रभावी निरीक्षण के लिए प्रशिक्षित एवं कुशल निरीक्षक की आवश्यकता होती है। अनुभवहीन व्यक्ति अनुपयोगी या गलत तथ्य एकत्र कर सकता है।
  2. निरीक्षक की व्यक्तिगत प्रवृत्तियाँ तथा पक्षपात परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
  3. औपचारिक निरीक्षण में व्यक्ति को निरीक्षण की जानकारी होने पर उसका व्यवहार कृत्रिम हो सकता है।
  4. किसी विशेष घटना के पुनः घटित होने की प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है, जिससे अधिक समय लग सकता है।
  5. व्यक्ति की निजी एवं व्यक्तिगत अनुभूतियों का प्रत्यक्ष निरीक्षण करना सम्भव नहीं होता।
  6. आन्तरिक व्यवहार, भावनाओं तथा मानसिक प्रक्रियाओं को सीधे नहीं देखा जा सकता।
  7. अचेतन मन से सम्बन्धित तथ्यों की जानकारी निरीक्षण द्वारा सरलता से प्राप्त नहीं होती।
  8. कुछ परिस्थितियों में निरीक्षण अपूर्ण, कठिन तथा व्यय-साध्य भी हो सकता है।
  9. लापरवाहीपूर्वक किया गया निरीक्षण गलत निष्कर्ष उत्पन्न कर सकता है तथा कक्षा में अनुशासन की समस्या भी हो सकती है।

शिक्षण में निरीक्षण प्रविधि की उपयोगिता

निरीक्षण प्रविधि लगभग सभी विषयों में उपयोगी हो सकती है, किन्तु भूगोल, अर्थशास्त्र तथा ऐसे विषयों में इसका विशेष महत्त्व है जहाँ वस्तुओं, स्थानों, परिस्थितियों या व्यवहारों का प्रत्यक्ष अध्ययन किया जा सकता है। इसके प्रभावी प्रयोग से पहले विद्यार्थियों को निरीक्षण करने की उचित विधि का प्रशिक्षण देना आवश्यक है।

उदाहरण प्रविधि का अर्थ

उदाहरण प्रविधि (Example Technique) में कठिन, अमूर्त या जटिल विचारों को सरल और स्पष्ट बनाने के लिए उपयुक्त उदाहरणों का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण विद्यार्थियों के लिए अमूर्त विचारों को मूर्त रूप देते हैं और विषय-वस्तु को अधिक रोचक तथा बोधगम्य बनाते हैं।

उदाहरणों के माध्यम से शिक्षक नवीन ज्ञान को विद्यार्थियों के पूर्व अनुभवों से जोड़ता है। इसलिए यह प्रविधि कठिन नियमों, सिद्धान्तों और अवधारणाओं को स्पष्ट करने में विशेष उपयोगी है।

एस. के. कोचर के अनुसार

उदाहरण के अन्तर्गत प्रतिमान, चित्र, चार्ट आदि ऐसी वस्तुएँ आती हैं जिनके माध्यम से जटिल विचारों को सरल रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इनके प्रयोग से विद्यार्थियों की कल्पना एवं भावनाएँ सक्रिय होती हैं तथा विचार अधिक स्पष्ट होते हैं।

उदाहरण प्रविधि के प्रकार

1. मौखिक उदाहरण

इनमें शिक्षक शब्दों द्वारा ऐसे सरल और परिचित उदाहरण देता है जो किसी कठिन सिद्धान्त या सामान्य नियम को स्पष्ट कर सकें। मौखिक उदाहरण विद्यार्थियों के दैनिक जीवन एवं परिचित परिस्थितियों से सम्बन्धित होने चाहिए।

2. प्रदर्शनात्मक उदाहरण

इनमें चित्र, मॉडल, मानचित्र, चार्ट, ग्राफ तथा रेखाचित्र आदि का प्रयोग किया जाता है। ये विद्यार्थियों का ध्यान आकर्षित करते हैं और विषय को अधिक स्पष्ट एवं सजीव बनाते हैं।

उदाहरण प्रविधि के उद्देश्य

  1. विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रेरित करना।
  2. पाठ की ओर विद्यार्थियों का ध्यान आकर्षित करना।
  3. विद्यार्थियों के अनुभवों का विकास करना।
  4. कठिन विषय-वस्तु को सरल एवं बोधगम्य बनाना।
  5. ज्ञात विचारों, वस्तुओं एवं घटनाओं का अज्ञात विचारों, वस्तुओं एवं घटनाओं से सम्बन्ध स्थापित करना।

उदाहरण देते समय ध्यान देने योग्य बातें

  1. उदाहरण विद्यार्थियों के स्तर के अनुकूल होने चाहिए।
  2. उदाहरण स्पष्ट, सरल एवं आकर्षक होने चाहिए।
  3. उदाहरण का सीधा सम्बन्ध पढ़ाई जा रही विषय-वस्तु से होना चाहिए।
  4. अनावश्यक तथा असम्बन्धित उदाहरणों से बचना चाहिए।
  5. एक ही उदाहरण को अनावश्यक रूप से बार-बार दोहराना नहीं चाहिए।
  6. मौखिक उदाहरणों की भाषा सरल, स्पष्ट तथा बोधगम्य होनी चाहिए।
  7. अमूर्त एवं कठिन तथ्यों को पढ़ाते समय उपयुक्त उदाहरणों का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

निरीक्षण एवं उदाहरण प्रविधि का शैक्षिक महत्त्व

निरीक्षण प्रविधि विद्यार्थियों को प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा ज्ञान प्राप्त करने का अवसर देती है, जबकि उदाहरण प्रविधि कठिन एवं अमूर्त ज्ञान को सरल और स्पष्ट बनाती है। दोनों प्रविधियों का उचित प्रयोग विद्यार्थियों की रुचि, जिज्ञासा, कल्पना, चिन्तन एवं समझ के विकास में सहायक होता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • निरीक्षण प्रविधि में विद्यार्थी वस्तु, घटना या व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन करके ज्ञान प्राप्त करता है।
  • निरीक्षण औपचारिक एवं अनौपचारिक तथा नियंत्रित एवं अनियन्त्रित रूप में किया जा सकता है।
  • निरीक्षण की प्रमुख अवस्थाएँ निर्धारण, ध्यान केन्द्रित करना और प्राप्त तथ्यों को लेखबद्ध करना हैं।
  • निरीक्षण से सूक्ष्म अवलोकन, चिन्तन, विश्लेषण तथा प्रत्यक्ष अनुभव का विकास होता है।
  • उदाहरण प्रविधि कठिन एवं अमूर्त विषय-वस्तु को सरल और बोधगम्य बनाने के लिए प्रयोग की जाती है।
  • उदाहरण दो प्रकार के होते हैं—मौखिक तथा प्रदर्शनात्मक।
  • अच्छा उदाहरण स्तरानुकूल, स्पष्ट, विषय से सम्बन्धित और विद्यार्थियों के अनुभवों से जुड़ा होना चाहिए।
Topic 7 खेल / गतिविधि प्रविधि

खेल / गतिविधि प्रविधि

खेल / गतिविधि प्रविधि का अर्थ

खेल / गतिविधि प्रविधि (Play / Activity Technique) ऐसी शिक्षण प्रविधि है जिसमें बालकों की स्वाभाविक खेल-प्रवृत्ति और क्रियाशीलता का उपयोग करके उन्हें सीखने के अवसर दिए जाते हैं। इसका आधार यह विचार है कि बालक जब किसी कार्य को रुचि और आनन्द के साथ स्वयं करता है, तब उसका अधिगम अधिक सहज एवं प्रभावशाली होता है।

हेनरी काल्डवेल कुक ने बालकों की स्वाभाविक खेल-प्रवृत्ति को शिक्षा में प्रयोग करने पर विशेष बल दिया। यह प्रविधि विशेष रूप से छोटी कक्षाओं में उपयोगी मानी जाती है और भाषा, साहित्य, इतिहास तथा नागरिकशास्त्र जैसे विषयों में इसका प्रभावी प्रयोग किया जा सकता है।

खेल आधारित शिक्षण से सम्बन्धित प्रमुख विचार

फ्रोबेल

फ्रोबेल की किण्डरगार्टन पद्धति खेल एवं गतिविधि पर आधारित है। उन्होंने विद्यालय को उद्यान के समान माना, जहाँ बालक को अपनी स्वाभाविक शक्तियों के विकास के लिए अनुकूल वातावरण मिलना चाहिए।

डाल्टन पद्धति

डाल्टन पद्धति में बालक अपनी रुचि और इच्छा के अनुसार कार्य करता है। विभिन्न कार्यों को पूरा करने के लिए उसे उपयुक्त अवसर और साधन दिए जाते हैं, जिससे उसमें उत्तरदायित्व की भावना तथा व्यक्तित्व का विकास होता है।

मॉन्टेसरी पद्धति

मॉन्टेसरी ने बालक को स्वतन्त्र व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया। इस पद्धति में बालक को खेल, गतिविधि, ज्ञानार्जन तथा विकास सम्बन्धी कार्यों में स्वतन्त्र रूप से भाग लेने का अवसर दिया जाता है।

खेल की प्रमुख परिभाषाएँ

गुलिक के अनुसार

खेल वह कार्य है जिसे बालक स्वतन्त्र वातावरण में अपनी इच्छा से करता है। इसमें करने या न करने की स्वतंत्रता होती है तथा यह कल्पना और आनन्द से सम्बन्धित होता है।

ह्यूजेस एवं ह्यूजेस के अनुसार

वह पद्धति जिसमें बालक उसी उत्साह के साथ सीखता है जिस उत्साह के साथ वह स्वाभाविक रूप से खेलता है, खेल-पद्धति कहलाती है।

वैलेन्टाइन के अनुसार

खेल किसी क्रिया के माध्यम से प्राप्त होने वाला एक प्रकार का मनोरंजन है।

खेल / गतिविधि प्रविधि की विशेषताएँ

  1. इसमें बालक की रुचि एवं क्रियाशीलता को प्रमुख स्थान दिया जाता है।
  2. खेल एवं गतिविधि द्वारा अर्जित ज्ञान अधिक स्थायी होता है।
  3. कठिन एवं नीरस विषय-वस्तु को सरल और रोचक बनाया जा सकता है।
  4. बालकों के चरित्र-निर्माण में सहायता मिलती है।
  5. बालकों में सामाजिकता की भावना विकसित होती है।
  6. समन्वय, सद्भावना तथा सहयोग की भावना का विकास होता है।
  7. बालक के शारीरिक तथा मानसिक विकास में सहायता मिलती है।
  8. खेल और गतिविधियों द्वारा बालक के संज्ञानात्मक विकास को भी प्रोत्साहन मिलता है।

खेल / गतिविधि प्रविधि का शैक्षिक महत्त्व

यह प्रविधि बालक को केवल सुनने वाला निष्क्रिय श्रोता नहीं बनाती, बल्कि उसे शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सक्रिय रूप से सम्मिलित करती है। खेल के माध्यम से बालक स्वयं अनुभव करता है, सहयोग करता है और विभिन्न कार्यों में भाग लेते हुए सीखता है।

इससे शिक्षण अधिक स्वाभाविक, रुचिकर और आनन्ददायी बनता है। विशेष रूप से छोटी कक्षाओं में यह बालकों की रुचि बनाए रखने तथा कठिन विषय-वस्तु को सरल बनाने में उपयोगी है।

खेल / गतिविधि प्रविधि की सीमाएँ

  1. सभी विषयों एवं सभी प्रकार की विषय-वस्तु को खेल के माध्यम से नहीं पढ़ाया जा सकता।
  2. यदि गतिविधियों का उचित नियोजन न हो तो शैक्षिक उपलब्धि एवं शिक्षण के निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति प्रभावित हो सकती है।
  3. कभी-कभी इसमें मानसिक एवं भावात्मक विकास की अपेक्षा शारीरिक विकास को अधिक महत्त्व मिलने की सम्भावना रहती है।

खेल / गतिविधि प्रविधि का प्रयोग करते समय ध्यान देने योग्य बातें

  • खेल या गतिविधि विद्यार्थियों की आयु एवं मानसिक स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
  • गतिविधि का सम्बन्ध शिक्षण के निश्चित उद्देश्य से होना चाहिए।
  • बालकों को सक्रिय भागीदारी का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
  • खेल केवल मनोरंजन न बन जाए; उससे अपेक्षित ज्ञान अथवा कौशल की प्राप्ति भी होनी चाहिए।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • खेल / गतिविधि प्रविधि में बालकों की स्वाभाविक खेल-प्रवृत्ति और क्रियाशीलता का उपयोग शिक्षा में किया जाता है।
  • हेनरी काल्डवेल कुक ने शिक्षा में खेल-प्रवृत्ति के प्रयोग पर विशेष बल दिया।
  • फ्रोबेल की किण्डरगार्टन, डाल्टन तथा मॉन्टेसरी पद्धतियाँ खेल, गतिविधि और करके सीखने को महत्त्व देती हैं।
  • यह प्रविधि बालकों की रुचि, सामाजिकता, सहयोग, चरित्र तथा शारीरिक-मानसिक विकास में सहायक है।
  • खेल द्वारा प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी तथा कठिन विषय-वस्तु अधिक सरल और रोचक हो सकती है।
  • इसकी मुख्य सीमा यह है कि सभी विषयों को खेल के माध्यम से नहीं पढ़ाया जा सकता।
Topic 8 समूह / सामूहिक चर्चा प्रविधि

समूह / सामूहिक चर्चा प्रविधि

समूह / सामूहिक चर्चा प्रविधि का अर्थ

समूह या सामूहिक चर्चा प्रविधि (Group Discussion Technique) ऐसी शिक्षण प्रविधि है जिसमें किसी निश्चित विषय या समस्या से सम्बन्धित विभिन्न विचारों को समूह के सामने क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया जाता है। इसमें विषय के विभिन्न पक्षों पर विचार किया जाता है, जिससे श्रोताओं को उस विषय की व्यापक समझ प्राप्त होती है।

सामूहिक चर्चा को बौद्धिक मनोरंजन का एक माध्यम भी माना गया है। आधुनिक अर्थ में यह ऐसी सभा है जिसमें विभिन्न वक्ता किसी निश्चित विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक वक्ता को विषय से सम्बन्धित अपने विचार रखने की स्वतंत्रता होती है।

इस प्रविधि का मुख्य उद्देश्य श्रोताओं को किसी विषय के विभिन्न पक्षों और विचारों से परिचित कराना है। चर्चा में आवश्यक नहीं कि कोई एक निश्चित निर्णय ही निकले; श्रोता विभिन्न मतों को सुनकर स्वयं अपनी समझ एवं निर्णय विकसित कर सकते हैं।

समूह / सामूहिक चर्चा प्रविधि की विशेषताएँ

  1. किसी विषय या समस्या के विभिन्न पक्षों की व्यापक जानकारी प्राप्त होती है।
  2. वक्ताओं को अपने विचार व्यक्त करने तथा श्रोताओं को स्वयं निर्णय लेने की स्वतंत्रता रहती है।
  3. यह विशेष रूप से उच्च कक्षाओं में विशिष्ट विषयों एवं समस्याओं के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी देने में उपयोगी होती है।
  4. विद्यार्थियों में समायोजन एवं सहयोग की भावना का विकास होता है।
  5. विभिन्न विचारों का मूल्यांकन एवं संश्लेषण करने की क्षमता विकसित होती है।
  6. श्रोताओं को किसी विषय के पक्ष तथा विपक्ष दोनों प्रकार के विचार सुनने का अवसर मिलता है।

सामूहिक चर्चा के उद्देश्य

  1. किसी वर्तमान समस्या के विभिन्न पक्षों को समझना तथा उनकी पहचान करना।
  2. विषय के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट एवं बोधगम्य बनाना।
  3. विद्यार्थियों में निर्णय लेने की क्षमता का विकास करना।
  4. किसी विषय या समस्या के प्रति व्यापक दृष्टिकोण विकसित करना।
  5. विद्यार्थियों की शंकाओं एवं कठिनाइयों को स्पष्ट करने में सहायता करना।
  6. उच्च स्तरीय संज्ञानात्मक क्षमताओं के विकास में सहायता करना।

सामूहिक चर्चा की प्रक्रिया

  1. चर्चा का आयोजन किसी विभाग, संस्था अथवा संगठन द्वारा किया जाता है।
  2. आयोजक या अनुदेशक सबसे पहले चर्चा के लिए विषय अथवा समस्या का निर्धारण करता है।
  3. इसके बाद उपयुक्त वक्ताओं का चयन किया जाता है तथा स्थान, तिथि एवं समय निश्चित किया जाता है।
  4. प्रत्येक वक्ता को विषय के किसी विशेष पक्ष की तैयारी करने तथा अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए निश्चित समय दिया जाता है।
  5. विषय को अधिक स्पष्ट करने के लिए एक वक्ता उसके समर्थन में तथा दूसरा उसके विरोध में विचार प्रस्तुत कर सकता है।
  6. सभी वक्ताओं के विचार प्रस्तुत होने के बाद अध्यक्ष चर्चा के प्रमुख बिन्दुओं की समीक्षा करता है।
  7. आवश्यकता के अनुसार चर्चा की रिपोर्ट अथवा अभिलेख तैयार किया जाता है और उसे पुस्तिका या अन्य रूप में वितरित किया जा सकता है।

सामूहिक चर्चा में शिक्षक / आयोजक की भूमिका

सामूहिक चर्चा की सफलता के लिए शिक्षक या आयोजक को विषय, वक्ताओं, समय और विचारों के क्रम का उचित नियोजन करना चाहिए। उसका कार्य केवल चर्चा प्रारम्भ कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि विषय के सभी महत्त्वपूर्ण पक्ष उचित रूप से सामने आएँ।

सामूहिक चर्चा के आयोजन में सावधानियाँ

  1. आयोजक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वक्ताओं ने विषय की उचित तैयारी की हो और उन्हें चर्चा की प्रक्रिया तथा प्रस्तुतीकरण के नियमों की जानकारी हो। विचारों की अनावश्यक पुनरावृत्ति से बचना चाहिए।
  2. अध्यक्ष या अनुदेशक को चर्चा की रूपरेखा और क्रम पहले से तैयार करना चाहिए, जिससे विषय के महत्त्वपूर्ण तथा विरोधी विचार छूट न जाएँ।
  3. प्रश्न पूछने की स्थिति का भी पूर्व-नियोजन होना चाहिए। सामान्यतः प्रस्तुतीकरण के अन्त में स्पष्टीकरण के लिए प्रश्न लिए जा सकते हैं।

सामूहिक चर्चा का शैक्षिक महत्त्व

सामूहिक चर्चा विद्यार्थियों को किसी विषय को केवल एक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि अनेक दृष्टिकोणों से समझने का अवसर देती है। इससे वे विभिन्न मतों को सुनते, उनका मूल्यांकन करते और अपनी समझ के आधार पर निष्कर्ष तक पहुँचने का प्रयास करते हैं।

यह प्रविधि विद्यार्थियों में व्यापक दृष्टिकोण, सहयोग, समायोजन, विचारों के मूल्यांकन तथा निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने में विशेष उपयोगी है। इसलिए उच्च कक्षाओं में समसामयिक समस्याओं एवं जटिल विषयों के अध्ययन के लिए इसका विशेष महत्त्व है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सामूहिक चर्चा में किसी निश्चित विषय या समस्या के विभिन्न पक्षों पर क्रमबद्ध रूप से विचार प्रस्तुत किए जाते हैं।
  • इसका उद्देश्य विषय की व्यापक समझ विकसित करना तथा विद्यार्थियों को विभिन्न मतों से परिचित कराना है।
  • इस प्रविधि में वक्ताओं को विचार रखने और श्रोताओं को स्वयं निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती है।
  • यह सहयोग, समायोजन, मूल्यांकन, संश्लेषण तथा निर्णय लेने की क्षमता के विकास में सहायक है।
  • सामूहिक चर्चा में विषय, वक्ता, समय और प्रस्तुतीकरण के क्रम का पूर्व-नियोजन आवश्यक है।
  • यह प्रविधि विशेष रूप से उच्च कक्षाओं में विशिष्ट विषयों एवं समस्याओं के व्यापक अध्ययन के लिए उपयोगी है।
Topic 9 प्रयोगात्मक प्रविधि—विशेषताएँ, सोपान, गुण-दोष एवं सुझाव

प्रयोगात्मक प्रविधि—विशेषताएँ, सोपान, गुण-दोष एवं सुझाव

प्रयोगात्मक प्रविधि का अर्थ

प्रयोगात्मक प्रविधि (Experimental Technique) वह शिक्षण प्रविधि है जिसमें विद्यार्थी स्वयं प्रयोग करके, उसका निरीक्षण करके तथा प्राप्त परिणाम के आधार पर ज्ञान प्राप्त करता है। यह प्रविधि वैज्ञानिक एवं तार्किक आधार पर निर्मित है और करके सीखने के सिद्धान्त को महत्त्व देती है।

इसमें विद्यार्थी केवल शिक्षक की बात सुनने वाला श्रोता नहीं रहता, बल्कि शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेता है। प्रयोग करते समय उसकी विभिन्न इन्द्रियाँ सक्रिय रहती हैं, जिससे विषय-वस्तु को समझना सरल होता है और अर्जित ज्ञान अधिक स्थायी बनता है।

भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान तथा भू-विज्ञान जैसे विषयों के शिक्षण में प्रयोगात्मक प्रविधि का विशेष महत्त्व है। विद्यार्थी प्रयोग करता है, उसका निरीक्षण करता है और प्राप्त तथ्यों से निष्कर्ष निकालता है, जबकि शिक्षक उसके कार्य का निरीक्षण एवं आवश्यक मार्गदर्शन करता है।

प्रयोगात्मक प्रविधि की विशेषताएँ

  1. यह समस्या-समाधान पर आधारित प्रविधि है। विद्यार्थी समस्या को समझकर प्रयोग द्वारा उसके समाधान की ओर बढ़ता है।
  2. उच्च कक्षाओं में इसका शैक्षिक महत्त्व अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि विद्यार्थी जटिल तथ्यों एवं सिद्धान्तों को प्रयोग द्वारा समझ सकते हैं।
  3. इसके माध्यम से विद्यार्थी नियमों, तथ्यों एवं सिद्धान्तों की सत्यता की जाँच कर सकता है।
  4. यह विद्यार्थियों की निरीक्षण एवं तर्क शक्ति का विकास करती है।
  5. प्रयोगशाला के उपकरणों एवं सामग्री का सावधानीपूर्वक प्रयोग करने की आदत विकसित होती है।
  6. विद्यार्थियों में आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास तथा आत्मानुशासन का विकास होता है।
  7. हाथ से कार्य करने के कारण विद्यार्थियों में श्रम के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है।

प्रयोगात्मक प्रविधि के सोपान

1. आयोजन / नियोजन

प्रयोग प्रारम्भ करने से पहले शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर उसके उद्देश्य, आवश्यक साधनों, सामग्री तथा कार्य-विधि पर विचार करते हैं। उपलब्ध सुविधाओं एवं सम्भावित कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए प्रयोग की योजना निश्चित की जाती है।

2. क्रियान्वयन

इस अवस्था में विद्यार्थी योजना के अनुसार स्वयं प्रयोग करता है। शिक्षक उपकरणों एवं सामग्री के उचित प्रयोग के सम्बन्ध में मार्गदर्शन देता है और कठिनाई आने पर आवश्यक सहायता प्रदान करता है।

शिक्षक विद्यार्थियों को स्वयं सोचने, प्रश्न पूछने तथा सक्रिय रूप से कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। प्रयोग का वातावरण सहयोगपूर्ण होना चाहिए और विद्यार्थियों पर अनावश्यक दबाव नहीं होना चाहिए।

3. मूल्यांकन

प्रयोग समाप्त होने के बाद शिक्षक के मार्गदर्शन में विद्यार्थी अपने कार्य एवं परिणामों का मूल्यांकन करते हैं। इसमें यह देखा जाता है कि प्रयोग के उद्देश्य कितने प्राप्त हुए, समय का उचित उपयोग हुआ या नहीं तथा प्राप्त ज्ञान का पूर्वज्ञान से क्या सम्बन्ध है।

इस अवस्था में यह भी देखा जाता है कि विद्यार्थी प्राप्त तथ्यों से उचित निष्कर्ष एवं सामान्यीकरण कर पा रहा है या नहीं।

प्रयोगात्मक प्रविधि के गुण

  1. विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित होता है और वे प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष निकालना सीखते हैं।
  2. विद्यार्थी सक्रिय रहता है और उसका ध्यान निश्चित उद्देश्य की ओर केन्द्रित रहता है।
  3. प्रयोग के माध्यम से पुस्तकीय ज्ञान की सत्यता की जाँच की जा सकती है।
  4. स्वयं प्रयोग करके प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी होता है तथा सिद्धान्तों को स्पष्ट रूप से समझने में सहायता मिलती है।

प्रयोगात्मक प्रविधि के दोष

  1. छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए इसका प्रयोग हमेशा उपयुक्त नहीं होता, क्योंकि वे सभी उपकरणों एवं प्रयोगों को स्वतन्त्र रूप से नहीं कर सकते।
  2. पिछड़े तथा मन्द-बुद्धि विद्यार्थियों के लिए जटिल प्रयोग करना कठिन हो सकता है।
  3. इसमें अधिक समय लगता है, इसलिए विस्तृत पाठ्यक्रम को निर्धारित समय में पूरा करना कठिन हो सकता है।
  4. बड़ी कक्षा में शिक्षक के लिए प्रत्येक विद्यार्थी के प्रयोगात्मक कार्य का अलग-अलग निरीक्षण करना कठिन होता है।
  5. प्रयोगशाला, उपकरण एवं सामग्री की आवश्यकता के कारण यह प्रविधि खर्चीली हो सकती है।

प्रयोगात्मक प्रविधि को सफल बनाने हेतु सुझाव

  1. शिक्षक में शारीरिक श्रम के प्रति निष्ठा होनी चाहिए और उसे स्वयं भी परिश्रमी होना चाहिए।
  2. प्रयोगात्मक कार्य का चयन उसके शैक्षिक महत्त्व तथा निर्धारित उद्देश्यों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
  3. प्रयोग प्रारम्भ करने से पहले उसका उचित एवं व्यवस्थित नियोजन किया जाना चाहिए।
  4. क्रियान्वयन के समय शिक्षक को विद्यार्थियों को आवश्यक मार्गदर्शन एवं सहयोग देना चाहिए।
  5. विद्यार्थियों को अधिक-से-अधिक सक्रिय रखते हुए यथासम्भव कम खर्च में प्रयोगात्मक कार्य सम्पन्न कराया जाना चाहिए।

प्रयोग प्रदर्शन का महत्त्व

विज्ञान शिक्षण में कुछ विषयों, प्रक्रियाओं और उपकरणों को समझाने के लिए प्रयोग-प्रदर्शन भी उपयोगी होता है। किसी नवीन तथ्य को प्रयोग द्वारा प्रदर्शित करने से उसे समझना सरल हो जाता है और ज्ञान अधिक समय तक स्मरण रहता है।

शिक्षण में प्रयोगात्मक प्रविधि का महत्त्व

प्रयोगात्मक प्रविधि विद्यार्थियों को प्रत्यक्ष अनुभव प्रदान करती है तथा उनमें निरीक्षण, तर्क, चिन्तन और निष्कर्ष निकालने की क्षमता विकसित करती है। यह पुस्तकीय ज्ञान को व्यवहार से जोड़ती है और विद्यार्थियों को स्वयं कार्य करके सीखने का अवसर प्रदान करती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्रयोगात्मक प्रविधि में विद्यार्थी स्वयं प्रयोग, निरीक्षण तथा निष्कर्ष द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है।
  • यह करके सीखने के सिद्धान्त पर आधारित वैज्ञानिक एवं तार्किक शिक्षण प्रविधि है।
  • इसके तीन मुख्य सोपान हैं—आयोजन, क्रियान्वयन तथा मूल्यांकन।
  • यह निरीक्षण, तर्क, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, आत्मानुशासन तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करती है।
  • इससे पुस्तकीय ज्ञान की सत्यता की जाँच होती है और अर्जित ज्ञान अधिक स्थायी बनता है।
  • अधिक समय, खर्च, उपकरणों की आवश्यकता तथा प्रत्येक विद्यार्थी के कार्य का निरीक्षण कठिन होना इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं।

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Topic 10 वाद-विवाद प्रविधि—उद्देश्य, प्रकार, उपयोग, गुण एवं आयोजन

वाद-विवाद प्रविधि—उद्देश्य, प्रकार, उपयोग, गुण एवं आयोजन

वाद-विवाद प्रविधि का अर्थ

वाद-विवाद प्रविधि (Discussion / Debate Technique) ऐसी शिक्षण प्रविधि है जिसमें किसी निश्चित विषय या समस्या पर विद्यार्थी विचार करते हैं, अपने मत प्रस्तुत करते हैं तथा अन्य व्यक्तियों के विचारों को सुनते हैं। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को स्वतन्त्र, स्वाभाविक और सक्रिय रूप से कार्य करने का अवसर मिलता है।

इस प्रविधि में सभी सदस्यों को विचार व्यक्त करने का समान अवसर दिया जाता है। इससे विद्यार्थी किसी समस्या के विभिन्न पक्षों को समझते हैं, तर्क करते हैं और उचित निष्कर्ष तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। लोकतान्त्रिक जीवन के लिए आवश्यक सहयोग, सहिष्णुता तथा दूसरों के विचारों का सम्मान भी इससे विकसित होता है।

सम्मेलन, विचार-गोष्ठी, विचार-समिति तथा कार्यशाला जैसी उच्च स्तरीय शिक्षण गतिविधियों में भी वाद-विवाद अथवा विचार-विमर्श का प्रयोग किया जा सकता है।

वाद-विवाद प्रविधि का विकास

हैरी ए. ओवरस्ट्रीट ने सन् 1929 में समूह वाद-विवाद का प्रयोग किया। इसमें एक छोटे समूह को निश्चित समय के लिए किसी विषय पर विचार-विमर्श करने का अवसर दिया गया तथा श्रोताओं ने उनके विचारों को सुना। बाद में प्रश्नोत्तर और छूटे हुए बिन्दुओं के स्पष्टीकरण को भी इस प्रक्रिया में स्थान मिला।

वर्तमान समय में रेडियो, टेलीविजन तथा अन्य सार्वजनिक माध्यमों पर भी समसामयिक विषयों और समस्याओं पर वाद-विवाद का व्यापक प्रयोग किया जाता है।

वाद-विवाद प्रविधि की प्रमुख परिभाषाएँ

जेम्स एम. ली के अनुसार

विचार-विमर्श एक ऐसी शैक्षिक समूह-क्रिया है जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी किसी समस्या अथवा विषय पर परस्पर बातचीत करते हैं।

रिस्क के अनुसार

विचार-विमर्श का आशय अध्ययन की किसी समस्या में निहित सम्बन्धों का विचारपूर्वक विवेचन करना है।

सिम्पसन एवं योकम के अनुसार

वाद-विवाद अथवा विचार-विमर्श बातचीत का एक विशेष रूप है, जिसमें सामान्य बातचीत की अपेक्षा विचारों का अधिक विस्तृत और तार्किक आदान-प्रदान होता है।

वाद-विवाद प्रविधि के उद्देश्य

  1. नवीन ज्ञान से परिचित कराने के लिए उपयुक्त योजना तैयार करना।
  2. किसी विषय से सम्बन्धित अनेक सूचनाएँ प्रदान करना तथा भविष्य के कार्य की दिशा निर्धारित करने में सहायता करना।
  3. किसी विषय अथवा समस्या से सम्बन्धित विचारों को स्पष्ट करना।
  4. विद्यार्थियों को किसी समस्या के प्रति जागरूक बनाना।
  5. विद्यार्थियों द्वारा अर्जित ज्ञान का मूल्यांकन करना।

वाद-विवाद प्रविधि के प्रकार

1. औपचारिक वाद-विवाद

औपचारिक वाद-विवाद निश्चित नियमों के अनुसार आयोजित किया जाता है। इसमें एक अध्यक्ष का चयन किया जाता है, जो चर्चा को नियंत्रित करता है। आवश्यकतानुसार सचिव अथवा अन्य उत्तरदायित्व भी विद्यार्थियों को दिए जा सकते हैं। इस प्रकार की चर्चा को पैनल के रूप में भी आयोजित किया जा सकता है।

2. अनौपचारिक वाद-विवाद

अनौपचारिक वाद-विवाद में कठोर नियमों का बन्धन नहीं होता। शिक्षक और विद्यार्थी किसी विषय पर स्वतन्त्र रूप से अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। इससे विद्यार्थियों को निर्भीक एवं स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का अभ्यास मिलता है। शिक्षक इसमें मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है।

वाद-विवाद प्रविधि के उपयोग

  1. सामाजिक अधिगम को प्रोत्साहित करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।
  2. उच्च स्तरीय ज्ञानात्मक एवं भावात्मक उद्देश्यों की प्राप्ति में यह उपयोगी है। निम्न स्तर के उद्देश्यों के लिए इसका प्रयोग अपेक्षाकृत कम किया जाता है।
  3. ज्ञान-वृद्धि के साथ-साथ समस्या-समाधान, तर्क तथा आलोचनात्मक चिन्तन के विकास में यह सहायक है।
  4. विद्यार्थियों की रुचियों एवं अभिवृत्तियों का विकास होता है तथा वे दूसरों के विचारों का सम्मान करना सीखते हैं।
  5. विषय-वस्तु की बोधगम्यता तथा उसके आत्मसातीकरण में सहायता मिलती है।

वाद-विवाद प्रविधि के गुण

  1. विद्यार्थी विषय से सम्बन्धित तथ्यों एवं विचारों के चयन, संगठन और प्रस्तुतीकरण में कुशल बनते हैं।
  2. चर्चा को निश्चित उद्देश्य पर केन्द्रित रखने का अभ्यास विकसित होता है।
  3. नियंत्रित वातावरण में कार्य करने से विद्यार्थियों में आत्मानुशासन का विकास होता है।
  4. इस प्रविधि का उपयोग निम्न तथा उच्च दोनों स्तर की कक्षाओं में आवश्यकता के अनुसार किया जा सकता है।
  5. विचारों के स्पष्टीकरण से विद्यार्थियों को नवीन ज्ञान प्राप्त होता है और उनके पूर्वज्ञान में वृद्धि होती है।

वाद-विवाद के प्रभावी आयोजन हेतु सुझाव

  1. अनुदेशक को समूह का निर्माण सावधानी से करना चाहिए तथा ऐसी परिस्थितियों से बचना चाहिए जिनसे अनावश्यक व्यक्तिगत संघर्ष उत्पन्न हो।
  2. अध्यक्ष को सभी सदस्यों को विचार व्यक्त करने का उचित अवसर देना चाहिए और चर्चा पर आवश्यक नियंत्रण बनाए रखना चाहिए। इसके लिए योग्य व्यक्ति को अध्यक्ष चुना जाना चाहिए।
  3. बैठने की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि सदस्य एक-दूसरे को देख सकें तथा अध्यक्ष से लगभग समान दूरी पर हों। श्रोताओं को भी सभी वक्ताओं को देखने की सुविधा होनी चाहिए।
  4. अध्यक्ष को उन बिन्दुओं पर चर्चा को प्रोत्साहित करना चाहिए जहाँ रचनात्मक सुझाव और आलोचना की सम्भावना हो।

शिक्षण में वाद-विवाद प्रविधि का महत्त्व

वाद-विवाद प्रविधि विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ग्रहण करने तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें विचार प्रस्तुत करने, दूसरों के मत सुनने, तर्क करने और समस्या का विश्लेषण करने का अवसर देती है। इससे स्वतन्त्र चिन्तन, निर्णय-क्षमता तथा लोकतान्त्रिक व्यवहार का विकास होता है।

उच्च स्तरीय ज्ञानात्मक एवं भावात्मक उद्देश्यों, समस्या-समाधान तथा आलोचनात्मक चिन्तन के विकास के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी प्रविधि है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वाद-विवाद प्रविधि में किसी विषय या समस्या पर विचारों का तार्किक आदान-प्रदान किया जाता है।
  • हैरी ए. ओवरस्ट्रीट ने सन् 1929 में समूह वाद-विवाद का प्रयोग किया।
  • इसके दो प्रमुख प्रकार हैं—औपचारिक तथा अनौपचारिक वाद-विवाद।
  • यह समस्या-समाधान, तर्क, आलोचनात्मक चिन्तन, स्वतन्त्र अभिव्यक्ति तथा निर्णय-क्षमता के विकास में सहायक है।
  • विद्यार्थी दूसरों के विचारों का सम्मान करना तथा लोकतान्त्रिक ढंग से अपने विचार रखना सीखते हैं।
  • सफल आयोजन के लिए उचित समूह, योग्य अध्यक्ष, उपयुक्त बैठने की व्यवस्था तथा सभी को समान अवसर देना आवश्यक है।
Topic 11 कार्यशाला प्रविधि—क्षेत्र, विशेषताएँ, उद्देश्य, भूमिकाएँ, संरचना एवं सीमाएँ

कार्यशाला प्रविधि—क्षेत्र, विशेषताएँ, उद्देश्य, भूमिकाएँ, संरचना एवं सीमाएँ

कार्यशाला प्रविधि का अर्थ

शिक्षा-प्रक्रिया के दो प्रमुख पक्ष माने जाते हैं—सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक। सैद्धान्तिक ज्ञान के साथ किसी कार्य को स्वयं करके सीखने तथा व्यावहारिक कौशल विकसित करने के लिए कार्यशाला प्रविधि (Workshop Technique) का प्रयोग किया जाता है।

विशेष रूप से सेवारत शिक्षकों को नवीन परीक्षाओं की रचना, अनुदेशन-सामग्री के निर्माण, नवीन पाठ-योजनाओं तथा शिक्षण-अधिगम उद्देश्यों को व्यवहारिक रूप में लिखने का प्रशिक्षण देने में कार्यशाला उपयोगी होती है। इसमें प्रशिक्षणार्थियों को केवल जानकारी नहीं दी जाती, बल्कि उन्हें स्वयं कार्य करने और अभ्यास करने का अवसर भी मिलता है।

कार्यशाला की परिभाषा

शिक्षा शब्दकोष के अनुसार, कार्यशाला ऐसी शैक्षिक प्रविधि है जिसमें समान रुचियों एवं समस्याओं वाले व्यक्ति उपयुक्त विशेषज्ञों के साथ प्रायः आवासिक रूप में कई दिनों के लिए एकत्र होते हैं। वे आवश्यक सूचनाएँ प्राप्त करते हैं तथा समूह-अध्ययन द्वारा अपनी समस्याओं का समाधान खोजते हैं।

कार्यशाला प्रविधि का क्षेत्र

  1. अध्यापक-शिक्षा में नवीन पाठ-योजनाओं के प्रयोग एवं निर्माण के लिए।
  2. पाठ-योजना अथवा परीक्षा-निर्माण के उद्देश्यों को व्यवहारिक रूप में लिखने के लिए।
  3. नवीन प्रकार की परीक्षाओं के प्रश्न-पत्रों का निर्माण करने के लिए।
  4. अनुदेशन-सामग्री, जैसे अभिक्रमित अनुदेशन, के निर्माण के लिए।
  5. कक्षा-अन्तःक्रिया को समझने तथा निरीक्षण एवं अध्यापन के लिए।
  6. सूक्ष्म शिक्षण, अनुकरणीय शिक्षण तथा टोली-शिक्षण के प्रयोग का प्रशिक्षण देने के लिए।
  7. क्रियात्मक अनुसंधान के प्रयोग एवं प्रशिक्षण के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है।

कार्यशाला प्रविधि की विशेषताएँ

  1. इसके द्वारा शिक्षा के उच्च ज्ञानात्मक तथा क्रियात्मक उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।
  2. नवीन शैक्षिक उपागमों के सैद्धान्तिक तथा क्रियात्मक दोनों पक्षों का बोध कराया जाता है।
  3. व्यावसायिक क्षमताओं के विकास में सहायता मिलती है।
  4. शिक्षण-कौशलों का विकास एवं सुधार किया जाता है।
  5. उच्च स्तर की व्यक्तिगत क्रियाओं का अभ्यास करने का अवसर मिलता है।
  6. समूह में कार्य करने तथा सहयोग की भावना का विकास होता है।
  7. व्यावसायिक समस्याओं के गहन अध्ययन का अवसर मिलता है।
  8. समस्याओं के समाधान तथा व्यावसायिक कौशलों के विकास के लिए सुझाव एवं निर्देशन प्राप्त होता है।
  9. नवीन प्रत्ययों एवं उपागमों से परिचित कराया जाता है तथा उनकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जाता है।
  10. प्रशिक्षणार्थियों का व्यावसायिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण व्यापक होता है।

कार्यशाला प्रविधि के उद्देश्य

कार्यशाला के उद्देश्यों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जा सकता है—

1. ज्ञानात्मक उद्देश्य
  1. शिक्षण-व्यवसाय से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान खोजने में सहायता करना।
  2. शिक्षा से सम्बन्धित परिस्थितियों के सामाजिक अथवा दार्शनिक पक्षों का विस्तृत अध्ययन करना।
  3. शिक्षा एवं व्यवसाय से सम्बन्धित उद्देश्यों और प्रविधियों का सामूहिक रूप से निर्धारण करना।
  4. किसी विषय या प्रकरण को स्पष्ट करना तथा उसके व्यावहारिक महत्त्व को समझना।
2. क्रियात्मक उद्देश्य
  1. शिक्षण से सम्बन्धित विशिष्ट व्यावसायिक क्षमताओं का विकास करना।
  2. व्यक्तिगत रूप से भाग लेने तथा स्वयं कार्य करने की योग्यता विकसित करना।
  3. प्रभावशाली शिक्षण-प्रविधियों एवं विधियों का निर्धारण करना।
  4. शिक्षा से सम्बन्धित नवीन उपागमों का प्रशिक्षण प्रदान करना।

कार्यशाला का प्रमुख उद्देश्य सेवारत शिक्षकों तथा विद्यार्थियों को नवीन प्रविधियों, विधियों एवं उपागमों से परिचित कराना और उनके प्रयोग का प्रशिक्षण देना है, ताकि वे कक्षा-शिक्षण में उनका प्रभावशाली उपयोग कर सकें।

कार्यशाला प्रविधि का स्रोत

कार्यशाला शब्द इंजीनियरिंग क्षेत्र से लिया गया है। इंजीनियरिंग की कार्यशालाओं में व्यक्ति स्वयं कार्य करके उत्पादन अथवा मरम्मत सम्बन्धी कौशल प्राप्त करता है, जैसे रोडवेज या रेलवे कार्यशाला।

इसी विचार को शिक्षा में अपनाकर प्रश्न-बैंक निर्माण, नवीन परीक्षा-प्रश्नों की रचना तथा अन्य व्यावहारिक शैक्षिक कार्यों के प्रशिक्षण के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है।

कार्यशाला में प्रमुख भूमिकाएँ

1. अनुदेशक / व्यवस्थापक

अनुदेशक कार्यशाला की योजना बनाता है तथा पूरी व्यवस्था करता है। वह प्रकरण और स्रोत व्यक्तियों का निर्धारण करता है, उनसे सम्पर्क स्थापित करता है तथा कार्यशाला के स्थान, विधियों और कार्यक्रम के सम्बन्ध में निर्णय लेकर आवश्यक व्यवस्थाएँ करता है।

2. अध्यक्ष / संचालक

अध्यक्ष का चयन अनुदेशक करता है। अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसे कार्यशाला के प्रकरण तथा उसकी व्यावहारिक उपयोगिता का पूर्ण ज्ञान हो। कार्यशाला की प्रारम्भिक अवस्था में उसकी भूमिका विशेष महत्त्वपूर्ण होती है।

3. विशेषज्ञ / स्रोत व्यक्ति

विशेषज्ञ अथवा स्रोत व्यक्ति कार्यशाला में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे प्रशिक्षणार्थियों को नवीन उपागमों के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी देते हैं और उनके प्रयोग का प्रशिक्षण भी प्रदान करते हैं। इससे प्रशिक्षणार्थियों के ज्ञानात्मक तथा क्रियात्मक पक्षों का विकास होता है।

4. भागीदार / प्रशिक्षणार्थी

प्रशिक्षणार्थियों की नवीन उपागमों में रुचि तथा प्रकरण से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होना आवश्यक है। प्रारम्भिक अवस्था में वे विषय को समझते एवं स्पष्ट करते हैं, अभ्यास के समय आवश्यकता पड़ने पर स्रोत व्यक्ति से सहायता लेते हैं और बाद में अपने विद्यालय या कार्यक्षेत्र में सीखी हुई प्रविधि का प्रयोग करके उसकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन करते हैं।

कार्यशाला की संरचना

सामान्यतः कार्यशाला की अवधि 3 दिन से 10 दिन तक रखी जाती है, यद्यपि आवश्यकता के अनुसार इससे अधिक भी हो सकती है। कार्यशाला की तीन प्रमुख अवस्थाएँ होती हैं—

प्रथम अवस्था—प्रकरण का प्रस्तुतीकरण एवं स्पष्टीकरण

इस अवस्था में स्रोत व्यक्ति प्रकरण से सम्बन्धित पाठ्य-वस्तु को स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करता है। प्रशिक्षणार्थियों को प्रकरण या समस्या का गहन अध्ययन करने तथा अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त करने का अवसर दिया जाता है।

स्रोत व्यक्ति नवीन उपागम या प्रविधि के प्रयोग के सोपानों को उदाहरणों सहित स्पष्ट करता है।

द्वितीय अवस्था—उपागम के प्रयोग का अभ्यास

इस अवस्था में प्रशिक्षणार्थियों को छोटे-छोटे समूहों में बाँटा जाता है। समूहों का निर्माण कार्य की प्रकृति अथवा विषय के आधार पर किया जा सकता है और प्रत्येक समूह का नेतृत्व एक स्रोत व्यक्ति करता है।

प्रत्येक समूह अपने निर्धारित कार्य की योजना बनाकर उसका अभ्यास करता है। प्रशिक्षणार्थियों को अपने कार्य के चयन एवं निर्माण में पर्याप्त स्वतंत्रता दी जाती है। कार्य पूर्ण होने के बाद समूह अपनी आख्या प्रस्तुत करता है और सभी समूहों की रिपोर्ट तैयार की जा सकती है।

तृतीय अवस्था—तैयार सामग्री की जाँच एवं मूल्यांकन

इस अवस्था को अनुसरण-प्रविधि भी कहा गया है। प्रशिक्षणार्थी अपने विद्यालय या कार्यक्षेत्र में जाकर कार्यशाला में तैयार की गई शिक्षण-सामग्री अथवा उपागम का प्रयोग करते हैं, उसमें आवश्यक सुधार करते हैं तथा उसकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन करते हैं।

आवश्यकता पड़ने पर अनुदेशक प्रशिक्षणार्थियों को पुनः एकत्र करके उनकी आख्या प्राप्त कर सकता है। इस अवस्था में सदस्यों के व्यक्तिगत कार्य का मूल्यांकन करने की अपेक्षा उपागम की व्यावहारिकता तथा उसके प्रयोग की दक्षता पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

कार्यशाला प्रविधि की सीमाएँ

  1. प्रशिक्षणार्थियों को अपेक्षाकृत अधिक समय तक कार्य करना पड़ता है, इसलिए कभी-कभी उनकी रुचि कम हो जाती है। व्यवस्था प्रायः ज्ञान-स्तर तक सीमित भी रह सकती है।
  2. अधिक सदस्यों के लिए कार्यशाला की व्यवस्था करना कठिन होता है, क्योंकि विशेष प्रकार की सामग्री की व्यवस्था करनी पड़ती है।
  3. कुछ सेवारत शिक्षक नवीन प्रयोगों एवं उपागमों में रुचि नहीं लेते, क्योंकि उनके प्रति उनकी अनुकूल अभिवृत्ति विकसित नहीं होती।
  4. शिक्षकों में सहयोग की भावना का अभाव कार्यशाला की सफलता में बाधा बन सकता है।
  5. कई कार्यशालाओं में अनुसरण अवस्था का अभाव रहता है, जिससे सदस्यों को सीखे हुए उपागम की वास्तविक प्रभावशीलता का बोध नहीं हो पाता।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कार्यशाला प्रविधि सैद्धान्तिक ज्ञान के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण और स्वयं कार्य करने के अवसर प्रदान करती है।
  • इसका प्रयोग पाठ-योजना, प्रश्न-पत्र, अनुदेशन-सामग्री, सूक्ष्म शिक्षण, अनुकरणीय शिक्षण, टोली-शिक्षण तथा क्रियात्मक अनुसंधान के प्रशिक्षण में किया जाता है।
  • कार्यशाला के उद्देश्य ज्ञानात्मक तथा क्रियात्मक—दो वर्गों में विभाजित किए जाते हैं।
  • कार्यशाला की चार प्रमुख भूमिकाएँ हैं—अनुदेशक/व्यवस्थापक, अध्यक्ष/संचालक, विशेषज्ञ/स्रोत व्यक्ति तथा भागीदार/प्रशिक्षणार्थी।
  • कार्यशाला की सामान्य अवधि 3 से 10 दिन होती है और इसकी तीन अवस्थाएँ हैं—प्रस्तुतीकरण एवं स्पष्टीकरण, प्रयोग का अभ्यास तथा जाँच एवं मूल्यांकन।
  • तृतीय अवस्था को अनुसरण-प्रविधि कहा गया है, जिसमें प्रशिक्षणार्थी सीखी हुई प्रविधि का अपने कार्यक्षेत्र में प्रयोग एवं मूल्यांकन करते हैं।
Topic 12 भ्रमण / पर्यटन प्रविधि—आधार, उद्देश्य, संगठन, उपयोगिता एवं सीमाएँ

भ्रमण / पर्यटन प्रविधि—आधार, उद्देश्य, संगठन, उपयोगिता एवं सीमाएँ

भ्रमण / पर्यटन प्रविधि का अर्थ

भ्रमण / पर्यटन प्रविधि (Excursion Technique) ऐसी शिक्षण प्रविधि है जिसमें विद्यार्थियों को विद्यालय से बाहर किसी निश्चित स्थान पर ले जाकर वहाँ की वस्तुओं, परिस्थितियों, संस्थाओं एवं घटनाओं का प्रत्यक्ष निरीक्षण कराया जाता है। इससे विद्यार्थी पुस्तकीय ज्ञान को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से जोड़कर समझते हैं।

शैक्षिक भ्रमण विद्यालय द्वारा शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आयोजित यात्रा है, जिसमें विद्यार्थियों को ऐसे स्थानों पर ले जाया जाता है जहाँ शिक्षण-सामग्री और उससे सम्बन्धित कार्यों का वास्तविक परिस्थितियों में प्रत्यक्ष अध्ययन किया जा सके।

भ्रमण का मूल आधार निरीक्षण है। विद्यार्थियों को वास्तविक स्थानों पर ले जाकर देखने, समझने और अनुभव करने का अवसर दिया जाता है, जिससे उनकी मानसिक शक्तियों एवं ज्ञान का विकास होता है।

भ्रमण / पर्यटन प्रविधि का विकास

शैक्षिक पर्यटन प्रविधि के विकास का श्रेय प्रोफेसर रेन को दिया गया है। उन्होंने भूगोल, प्राकृतिक अध्ययन, इतिहास, वनस्पति विज्ञान, जीव-विज्ञान तथा अन्य विषयों के शिक्षण में भ्रमण को उपयोगी माना।

इस प्रविधि में विद्यार्थियों को खुले एवं स्वतन्त्र वातावरण में सीखने का अवसर मिलता है। स्थानीय निरीक्षण के माध्यम से उद्योग, भौगोलिक परिस्थितियों, ऐतिहासिक स्थलों, व्यापार, बैंक, कचहरी तथा सरकारी भवनों आदि का वास्तविक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

व्यावसायिक एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी भ्रमण उपयोगी है। उदाहरण के लिए कृषि-प्रशिक्षण के विद्यार्थियों को कृषि फार्म पर ले जाकर उन्हें वास्तविक कार्य-परिस्थितियों का अनुभव कराया जा सकता है।

भ्रमण / पर्यटन प्रविधि के सैद्धान्तिक आधार

  1. यह मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है। प्रत्यक्षीकरण तथा दृश्य ज्ञानेन्द्रियों के प्रयोग से विद्यार्थियों को सीखने में सुविधा होती है।
  2. विद्यार्थियों को वास्तविक अनुभवों द्वारा सीखने का अवसर मिलता है।
  3. यह सामाजिक सिद्धान्तों पर आधारित है और विद्यार्थियों में सहयोग की भावना विकसित करती है।
  4. विद्यार्थियों को निरीक्षण, कल्पनाशक्ति तथा अन्वेषण जैसी क्षमताओं के विकास के लिए वास्तविक परिस्थितियाँ प्राप्त होती हैं।
  5. विद्यार्थी विभिन्न स्थानों एवं दृश्यों की सौन्दर्यानुभूति का वास्तविक अनुभव प्राप्त करते हैं।

जहाँ वास्तविक भ्रमण बहुत महँगा अथवा कठिन हो, वहाँ मॉडल, चार्ट, फिल्म, मानचित्र तथा फिल्म-स्ट्रिप जैसी दृश्य-श्रव्य सामग्री द्वारा भी स्थानों और संस्थाओं का अनुभव कराने का प्रयास किया जा सकता है।

भ्रमण / पर्यटन प्रविधि के उद्देश्य

  1. कक्षा-शिक्षण को अधिक रोचक एवं बोधगम्य बनाना।
  2. विद्यार्थियों को सामाजिक वातावरण से परिचित कराना तथा उनमें सहयोग एवं सहानुभूति की भावना विकसित करना।
  3. विद्यार्थियों की अवलोकन-शक्ति का विकास करना तथा विभिन्न स्थानों, वस्तुओं, तथ्यों एवं प्रक्रियाओं का वास्तविक ज्ञान प्रदान करना।
  4. प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा विभिन्न प्रत्ययों एवं अवधारणाओं का बोध कराना।
  5. प्राकृतिक, भौगोलिक तथा मानव-निर्मित कृतियों के प्रति प्रेम एवं प्रशंसा की भावना विकसित करना।
  6. विद्यार्थियों में अनुशासन, उत्तरदायित्व, पारस्परिक सहायता तथा सहयोग की भावना विकसित करना।
  7. ज्ञानात्मक एवं भावात्मक योग्यताओं का विकास करना।
  8. प्राकृतिक, भौगोलिक एवं ऐतिहासिक भ्रमणों द्वारा सौन्दर्य-बोध विकसित करना।
  9. विद्यार्थियों को नए अनुभव प्रदान करना तथा समुदाय से सम्बन्धित व्यावहारिक ज्ञान विकसित करना।
  10. वस्तुओं, चित्रों, नमूनों आदि का संग्रह करने की आदत विकसित करना।

भ्रमण / पर्यटन का संगठन

भ्रमण एक उद्देश्यपूर्ण शैक्षिक क्रिया है। इसके सफल आयोजन के लिए शिक्षक और विद्यार्थियों को सहयोगपूर्वक योजना बनानी चाहिए। भ्रमण के संगठन को मुख्यतः निम्न चरणों में समझा जा सकता है—

1. योजना निर्माण

शैक्षिक भ्रमण की सफलता के लिए पहले से योजना बनाना आवश्यक है। शिक्षक एवं विद्यार्थी मिलकर उपयुक्त स्थान का चयन करते हैं और समय, धन तथा उपलब्ध साधनों को ध्यान में रखते हैं।

  • चयनित स्थान के विषय में आवश्यक जानकारी एकत्र की जाती है।
  • यात्रा का मार्ग, खर्च तथा कठिनाइयों का पूर्व अनुमान किया जाता है।
  • सुरक्षित स्थान के लिए आवश्यक स्वीकृतियाँ एवं अनुमति प्राप्त की जाती हैं।
  • मानचित्र, कैमरा, डायरी, पेन, प्राथमिक चिकित्सा-बॉक्स, पानी आदि आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था की जाती है।
  • बस, रेल अथवा अन्य परिवहन साधन की व्यवस्था कम-से-कम खर्च में सुविधानुसार की जाती है।
  • प्रधानाचार्य, अभिभावकों तथा अन्य आवश्यक अधिकारियों की अनुमति पहले प्राप्त कर ली जाती है।
2. पूर्व शैक्षिक तैयारी

भ्रमण पर जाने से पहले विद्यार्थियों को भ्रमण के उद्देश्य, चुने गए स्थान, वहाँ देखी जाने वाली वस्तुओं तथा सम्बन्धित विषय-वस्तु के बारे में आवश्यक जानकारी दी जानी चाहिए।

विद्यार्थियों को यह भी स्पष्ट किया जाता है कि उन्हें किन बातों का निरीक्षण करना है, कौन-से तथ्य लिखने हैं तथा भ्रमण के बाद किस प्रकार का कार्य करना होगा।

3. भ्रमण का संचालन

भ्रमण की सफलता शिक्षक की कुशलता पर निर्भर करती है। शिक्षक विद्यार्थियों को आवश्यक निर्देश देता है, उन पर निगरानी रखता है और उन्हें स्वानुशासन बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है।

विद्यार्थियों को अनावश्यक रूप से इधर-उधर जाने या ऐसी गतिविधि करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए जिससे अनुशासनहीनता उत्पन्न हो।

4. दृश्य-स्थल का निरीक्षण एवं तथ्यों का संकलन

भ्रमण-स्थल पर शिक्षक विद्यार्थियों को निर्धारित वस्तुओं, घटनाओं एवं प्रक्रियाओं का सावधानीपूर्वक निरीक्षण करने का निर्देश देता है। विद्यार्थी आँकड़े, तथ्य एवं अन्य आवश्यक सामग्री एकत्र करते हैं।

विद्यार्थियों को डायरी में मुख्य बातें एवं तिथि लिखनी चाहिए। आवश्यकता के अनुसार चित्र बनाना, नमूने एवं वस्तुएँ एकत्र करना, मानचित्र तैयार करना तथा फोटो लेना भी उपयोगी हो सकता है।

5. भ्रमण प्रतिवेदन प्रस्तुत करना

भ्रमण से लौटने के बाद विद्यार्थियों को प्राप्त ज्ञान एवं तथ्यों के आधार पर प्रतिवेदन (Report) तैयार करना चाहिए। कक्षा में भ्रमण से प्राप्त अनुभवों पर सामूहिक चर्चा भी कराई जा सकती है।

भ्रमण के दौरान संग्रह की गई वस्तुओं तथा चित्रों का विद्यालय में उचित प्रदर्शन किया जा सकता है। अन्त में भ्रमण के निर्धारित उद्देश्यों के आधार पर उसकी सफलता का मूल्यांकन किया जाता है।

भ्रमण / पर्यटन प्रविधि की विशेषताएँ एवं उपयोगिता

  1. विद्यार्थी प्रत्यक्ष निरीक्षण द्वारा स्वयं सीखते हैं।
  2. विद्यार्थियों को आर्थिक व्यवस्था, संगठन, सभ्यता तथा संस्कृति का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है।
  3. स्थानों, घटनाओं एवं वस्तुओं का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त होता है।
  4. विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं एवं शंकाओं का समाधान होता है।
  5. स्वानुशासन, सहयोग तथा सद्भावना की भावना विकसित होती है।
  6. स्वस्थ मनोरंजन के साथ अनेक उपयोगी तथ्यों का ज्ञान प्राप्त होता है।
  7. शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच निकट सम्पर्क स्थापित होता है।

भ्रमण / पर्यटन प्रविधि के दोष एवं सीमाएँ

  1. विद्यार्थियों की संख्या अधिक होने पर भ्रमण का आयोजन करना कठिन हो जाता है।
  2. विद्यालय की नियमित समय-सारणी में भ्रमण की व्यवस्था करना कठिन हो सकता है।
  3. इसमें पर्याप्त समय की आवश्यकता होती है, इसलिए समयाभाव की समस्या बनी रहती है।
  4. धन की कमी भ्रमण के आयोजन में प्रमुख बाधा बन सकती है।
  5. परिवहन की व्यवस्था से सम्बन्धित अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

शिक्षण में भ्रमण प्रविधि का महत्त्व

भ्रमण प्रविधि पुस्तकीय ज्ञान और वास्तविक जीवन के बीच सम्बन्ध स्थापित करती है। विद्यार्थी किसी विषय को केवल पढ़ते या सुनते नहीं, बल्कि वस्तुओं, स्थानों और प्रक्रियाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखकर सीखते हैं। इसलिए इसका प्रयोग भूगोल, इतिहास, सामाजिक अध्ययन, विज्ञान तथा व्यावसायिक शिक्षा जैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से उपयोगी है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • भ्रमण / पर्यटन प्रविधि में विद्यार्थियों को वास्तविक स्थान पर ले जाकर प्रत्यक्ष निरीक्षण द्वारा ज्ञान प्रदान किया जाता है।
  • भ्रमण का मूल आधार निरीक्षण है और इसके विकास का श्रेय प्रोफेसर रेन को दिया गया है।
  • यह वास्तविक अनुभव, सामाजिक सहयोग, निरीक्षण, कल्पना एवं अन्वेषण की क्षमताओं के विकास पर आधारित है।
  • भ्रमण के प्रमुख चरण हैं—योजना निर्माण, पूर्व शैक्षिक तैयारी, भ्रमण संचालन, निरीक्षण एवं तथ्य-संकलन तथा भ्रमण प्रतिवेदन।
  • इससे प्रत्यक्ष ज्ञान, जिज्ञासा का समाधान, स्वानुशासन, सहयोग, सामाजिक ज्ञान तथा शिक्षक-विद्यार्थी निकटता विकसित होती है।
  • अधिक छात्र संख्या, समयाभाव, धन की कमी तथा परिवहन सम्बन्धी कठिनाइयाँ इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं।
Topic 13 शिक्षण के नवीन उपागम—अवधारणा एवं उद्देश्य

शिक्षण के नवीन उपागम—अवधारणा एवं उद्देश्य

शिक्षण के नवीन उपागम की अवधारणा

शिक्षण के नवीन उपागम (New Approaches of Teaching) से अभिप्राय ऐसी आधुनिक शिक्षण-विधियों एवं दृष्टिकोणों से है जिनके द्वारा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक सक्रिय, प्रभावशाली, बालोपयोगी तथा उद्देश्यपूर्ण बनाया जाता है।

शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया है। इस पर किसी देश की शासन-प्रणाली, सामाजिक दर्शन, सामाजिक परिस्थितियों, मूल्यों तथा संस्कृति का प्रभाव पड़ता है। प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में व्यक्ति की इच्छाओं और गरिमा का सम्मान किया जाता है; इसलिए शिक्षण में भी शिक्षक तथा विद्यार्थी दोनों की सक्रिय भूमिका को महत्त्व दिया जाता है।

नवीन शिक्षण व्यवस्था में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच शाब्दिक तथा अशाब्दिक अन्तःक्रिया निरन्तर चलती रहती है। शिक्षक का प्रमुख उद्देश्य यह होता है कि बालक अधिक-से-अधिक सीख सके और कक्षा का प्रत्येक विद्यार्थी शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया से लाभान्वित हो।

नवीन उपागम में शिक्षक की भूमिका

नवीन उपागमों में शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं रहता, बल्कि वह विद्यार्थियों के अधिगम को सुगम बनाने वाला मार्गदर्शक बनता है। इसके लिए वह अपने पूर्ण मनोयोग, पूर्व अनुभव, दक्षताओं तथा विभिन्न शिक्षण विधियों एवं प्रविधियों का प्रयोग करता है।

उपयुक्त विधियों एवं उपागमों का प्रयोग शिक्षक की शिक्षण-कला को अधिक सुगम एवं प्रभावशाली बनाता है। उसका प्रयास रहता है कि विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण की व्यवस्था की जाए और प्रत्येक बालक को सीखने का उचित अवसर प्राप्त हो।

शिक्षण के नवीन उपागमों के उद्देश्य

  1. प्रशिक्षित शिक्षकों को शिक्षण की नवीन विधियों एवं उपागमों की जानकारी प्रदान करना।
  2. बालकों के सर्वांगीण विकास से सम्बन्धित आवश्यक जानकारी प्रदान करना।
  3. गतिविधि आधारित शिक्षण का ज्ञान देना तथा बच्चों में स्वयं करके सीखने की प्रवृत्ति विकसित करने की दिशा में शिक्षकों को तैयार करना।
  4. रुचिपूर्ण शिक्षण द्वारा खेल-खेल में बच्चों को पढ़ाने की विधियों से परिचित कराना।
  5. उपचारात्मक तथा बहुकक्षा शिक्षण के क्रियान्वयन से सम्बन्धित जानकारी प्रदान करना।

प्रमुख नवीन शिक्षण उपागम

इस अध्याय में प्रमुख नवीन शिक्षण उपागमों के रूप में निम्न विधियों का उल्लेख किया गया है—

  • बाल-केन्द्रित शिक्षण
  • रुचिपूर्ण / आनन्ददायी शिक्षण
  • सहभागी / सह-शिक्षण
  • दक्षता आधारित शिक्षण
  • उपचारात्मक शिक्षण

नवीन उपागमों का शैक्षिक महत्त्व

नवीन उपागम शिक्षण को शिक्षक-प्रधान प्रक्रिया तक सीमित न रखकर विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता पर बल देते हैं। इनके माध्यम से शिक्षण को बच्चों की आवश्यकताओं, रुचियों, क्षमताओं तथा अनुभवों के अधिक निकट लाया जाता है।

इस प्रकार नवीन उपागमों का उद्देश्य केवल विषय-वस्तु का ज्ञान देना नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षण-परिस्थितियाँ तैयार करना है जिनमें विद्यार्थी सक्रिय रूप से सीख सके और उसका सर्वांगीण विकास सम्भव हो।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया है, जिस पर शासन-प्रणाली, सामाजिक परिस्थितियों, मूल्यों और संस्कृति का प्रभाव पड़ता है।
  • नवीन उपागमों में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों सक्रिय रहते हैं तथा उनके बीच शाब्दिक और अशाब्दिक अन्तःक्रिया होती है।
  • इनका मुख्य उद्देश्य प्रत्येक विद्यार्थी को अधिक-से-अधिक सीखने का अवसर प्रदान करना है।
  • नवीन उपागमों द्वारा शिक्षकों को आधुनिक विधियों, गतिविधि आधारित शिक्षण, रुचिपूर्ण शिक्षण, उपचारात्मक तथा बहुकक्षा शिक्षण की जानकारी दी जाती है।
  • प्रमुख नवीन उपागम हैं—बाल-केन्द्रित, रुचिपूर्ण, सहभागी, दक्षता आधारित तथा उपचारात्मक शिक्षण।
  • नवीन उपागम शिक्षण को सक्रिय, बालोपयोगी, प्रभावशाली और सर्वांगीण विकास की दिशा में उन्मुख बनाते हैं।

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Topic 14 बाल-केन्द्रित शिक्षण—विशेषताएँ, उद्देश्य, शिक्षक की भूमिका, महत्त्व एवं अन्तर

बाल-केन्द्रित शिक्षण—विशेषताएँ, उद्देश्य, शिक्षक की भूमिका, महत्त्व एवं अन्तर

बाल-केन्द्रित शिक्षण का अर्थ

बाल-केन्द्रित शिक्षण (Child-Centred Teaching) ऐसी शिक्षण-व्यवस्था है जिसमें बालक को शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का केन्द्र माना जाता है। पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधि और कक्षा की गतिविधियों का निर्धारण बालक की रुचि, आवश्यकता, क्षमता, सामाजिक वातावरण तथा अधिगम की शैली को ध्यान में रखकर किया जाता है।

इस शिक्षण में बालक को अधिगम में स्वायत्तता एवं स्वतंत्रता दी जाती है तथा आवश्यक जिम्मेदारियाँ भी उसे सौंपी जाती हैं। शिक्षक का कार्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि बालक की रुचियों को पहचानना, उसका मार्गदर्शन करना और आवश्यकता के अनुसार प्रेरणा देना है।

बाल-केन्द्रित शिक्षा विद्यार्थियों के हितों को प्राथमिकता देती है। इसमें इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता है कि बालक क्या सीखेगा, कैसे सीखेगा और अपने सीखे हुए ज्ञान का मूल्यांकन किस प्रकार करेगा

आधुनिक शिक्षा को बाल-केन्द्रित बनाने पर रूसो, टैगोर, फ्रोबेल, पेस्टालॉजी और मॉन्टेसरी जैसे शिक्षाशास्त्रियों ने अलग-अलग समय पर बल दिया।

बाल-केन्द्रित शिक्षण की विशेषताएँ

1. स्वतंत्रता

पेस्टालॉजी ने बाल-केन्द्रित शिक्षा में स्वतंत्रता को विशेष महत्त्व दिया। बालक को स्वयं कार्य करने, खोजने और सीखने का अवसर मिलना चाहिए। शिक्षा किसी एक व्यक्ति या वर्ग का विशेषाधिकार न होकर प्रत्येक बालक के लिए उपलब्ध होनी चाहिए।

2. स्व-क्रियाएँ

फ्रोबेल ने बालकों की स्व-क्रियाओं और गतिविधियों पर विशेष बल दिया। खेल, गीत एवं पहेलियों जैसी गतिविधियाँ बालक को स्वयं करके सीखने का अवसर देती हैं और अधिगम को स्वाभाविक बनाती हैं।

3. पाठ्य-सहगामी क्रियाओं का महत्त्व

बाल-केन्द्रित शिक्षण में कक्षा के भीतर तथा बाहर की पाठ्य-सहगामी गतिविधियों को महत्त्व दिया जाता है। इनका आयोजन बालकों की रुचि एवं अभिरुचि के अनुसार किया जाता है।

4. आत्मानुशासन पर बल

विद्यार्थियों को स्वतंत्र रूप से सीखने और दूसरों से अन्तःक्रिया करने का अवसर मिलता है। इससे वे स्वयं अपने अधिगम से सम्बन्धित रणनीतियाँ बनाते हैं और उनमें आत्मानुशासन का विकास होता है।

5. पाठ्यक्रम में विविधता

बालकों की वैयक्तिक भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम में विविधता रखी जाती है। प्रत्येक बालक की आवश्यकता और रुचि समान नहीं होती, इसलिए एक ही प्रकार का पाठ्यक्रम सभी के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता।

6. मनोवैज्ञानिक शिक्षण-पद्धति का प्रयोग

शिक्षण-अधिगम को सरल एवं रोचक बनाने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों, विधियों तथा प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है।

7. दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग

बालकों के समझ-स्तर और अध्ययन की आवश्यकता के अनुसार दृश्य-श्रव्य उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। इससे शिक्षण अधिक रोचक, मनोरंजक और बोधगम्य बनता है।

8. नैसर्गिक विकास की प्रक्रिया

प्रत्येक बालक की विकास-गति स्वाभाविक होती है। शिक्षक का दायित्व बालक की प्रकृति और विकास को समझना तथा उसे स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त होने का अवसर देना है।

9. रुचियों एवं आवश्यकताओं का विकास

बालक की शिक्षा उसकी रुचि और आवश्यकता के अनुसार निर्धारित की जाती है। उसका शारीरिक, सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास बाल-केन्द्रित शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य है।

10. अनुभव आधारित शिक्षा

बाल-केन्द्रित शिक्षण में बालकों को नए अनुभव और स्थायी ज्ञान प्रदान करने पर बल दिया जाता है। खेल, गीत, पहेली आदि शैक्षिक माध्यमों से उन्हें सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार के अनुभव दिए जाते हैं।

बाल-केन्द्रित शिक्षण के उद्देश्य

  1. बालकों का चहुँमुखी विकास करना।
  2. बालकों में स्वयं करके सीखने की प्रवृत्ति विकसित करना।
  3. बालकों में आत्मविश्वास की भावना विकसित करना।
  4. चिन्तन, मनन तथा जिज्ञासा जैसी प्रवृत्तियों का विकास करना।
  5. बालकों में सहयोग की भावना विकसित करना।
  6. स्वतंत्र रूप से कार्य करने की प्रवृत्ति विकसित करना।
  7. पुनर्बलन द्वारा शिक्षण को प्रभावी बनाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना।
  8. पढ़ाने की क्रिया की अपेक्षा सीखने की क्रिया पर अधिक बल देना।
  9. शारीरिक दण्ड की प्रक्रिया को हतोत्साहित करना।
  10. प्रेक्षण, सूचना, संचालन तथा निष्कर्ष निकालने की दक्षता विकसित करना।
  11. शिक्षकों को बालकों के सहयोगी एवं मार्गदर्शक के रूप में तैयार करना।

बाल-केन्द्रित शिक्षण में शिक्षक की भूमिका

बाल-केन्द्रित शिक्षण में शिक्षक की भूमिका समाप्त नहीं होती, बल्कि उसका स्वरूप बदल जाता है। शिक्षक ज्ञान का एकमात्र स्रोत न रहकर सहयोगी, मार्गदर्शक एवं प्रेरक बनता है। इसके सफल क्रियान्वयन के लिए शिक्षक को निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए—

  1. केवल व्यवस्था या प्रणाली को दोष देने के स्थान पर शिक्षक को उपलब्ध परिस्थितियों में योजनाबद्ध ढंग से कार्य करना चाहिए। अधिक छात्र संख्या होने पर विद्यार्थियों के छोटे समूह बनाकर क्रम से उन पर ध्यान दिया जा सकता है।
  2. समय और विद्यार्थियों की अधिक संख्या के कारण व्याख्यान का प्रयोग करना पड़े तो भी शिक्षक को ऐसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए जिससे विद्यार्थियों की रुचि बनी रहे। सही मूल्यों को शिक्षण में सम्मिलित करने के लिए शिक्षक का सेवापूर्व प्रशिक्षण उपयोगी है।
  3. सहायक शिक्षण-सामग्री की कमी के बावजूद शिक्षक दैनिक जीवन की वस्तुओं, खिलौनों, चित्रों, सब्जियों अथवा इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के उदाहरणों द्वारा विषय को स्पष्ट कर सकता है। इससे शिक्षण-अधिगम एक सुखद अनुभव बन सकता है।
  4. शिक्षक को पाठ्य-वस्तु का कक्षा के अनुरूप पूर्व-नियोजन करना चाहिए। विद्यार्थियों की रुचि एवं आवश्यकता के अनुसार शिक्षण कार्य को संगठित करना बाल-केन्द्रित शिक्षण के लिए आवश्यक है।
  5. शिक्षक को अपने मुख्य शिक्षण कार्य के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। शिक्षण से असम्बन्धित अतिरिक्त कार्यों का बोझ कम होने पर वह पाठ-योजना, संगठन तथा छात्र-केन्द्रित अधिगम पर अधिक ध्यान दे सकता है।

बाल-केन्द्रित शिक्षण का महत्त्व

  1. इसमें बालक को प्रधान मानकर शिक्षण की व्यवस्था की जाती है, इसलिए उसकी रुचि और आवश्यकताओं को विशेष महत्त्व मिलता है।
  2. बाल-केन्द्रित शिक्षण सरल एवं रुचिपूर्ण होता है।
  3. बालकों को अभिव्यक्ति का अवसर मिलता है और वे आनन्दपूर्वक सीखते हैं, जिससे उनकी अभिव्यक्ति-क्षमता विकसित होती है।
  4. इसमें ज्ञानेन्द्रिय-प्रशिक्षण पर बल दिया जाता है।
  5. विद्यार्थियों को व्यावहारिक एवं सामाजिक ज्ञान प्राप्त होता है।
  6. स्वयं करके सीखने पर बल दिया जाता है। खेल एवं गतिविधियों के माध्यम से बालक सक्रिय होकर ज्ञान प्राप्त करता है।
  7. बार-बार अभ्यास द्वारा विद्यार्थियों की कठिनाइयाँ दूर की जाती हैं। इस प्रकार यह शिक्षण क्रियाशीलता पर आधारित है।

बाल-केन्द्रित शिक्षण एवं बाल-केन्द्रित उपागम में अन्तर

बाल-केन्द्रित शिक्षण

बाल-केन्द्रित शिक्षण में बालक की रुचियों, प्रवृत्तियों और क्षमताओं को ध्यान में रखकर शिक्षण की व्यवस्था की जाती है। बालक के व्यक्तित्व का सम्मान करते हुए उसके सर्वांगीण विकास का प्रयास किया जाता है। पाठ्यक्रम, पाठ्य-सामग्री, समय, स्थान और मूल्यांकन-पद्धतियाँ भी बालक के अनुकूल रखी जाती हैं।

बाल-केन्द्रित उपागम

बाल-केन्द्रित उपागम एक व्यापक दृष्टिकोण है जिसमें शिक्षक के स्थान पर बालक को शैक्षिक कार्यक्रम का मुख्य आधार माना जाता है। इसमें बाल-केन्द्रित शिक्षण से सम्बन्धित सभी पक्ष—विद्यार्थी, शिक्षक, विषय-वस्तु, शैक्षिक सामग्री, शिक्षण-प्रणाली, शिक्षण-प्रविधि, भौतिक परिवेश तथा शैक्षिक उद्देश्यों के मूल्यांकन—का समावेश होता है।

बाल-केन्द्रित तथा शिक्षक-केन्द्रित शिक्षण में अन्तर

बाल-केन्द्रित शिक्षण शिक्षक-केन्द्रित शिक्षण
बालक शिक्षण का प्रमुख केन्द्र होता है। शिक्षक शिक्षण का प्रमुख केन्द्र होता है।
बालक की स्वायत्तता एवं स्वतंत्रता को महत्त्व दिया जाता है। शिक्षक का निर्देश एवं निर्णय अधिक महत्त्वपूर्ण होता है।
विद्यार्थी अधिगम में सक्रिय रूप से भाग लेता है। विद्यार्थी अपेक्षाकृत निष्क्रिय रूप से ज्ञान ग्रहण करता है।
शिक्षक सहयोग द्वारा विद्यार्थी को प्रोत्साहित करता है। शिक्षक विद्यार्थी का मार्गदर्शन एवं निरीक्षण करता है।
विद्यार्थी स्वयं करके सीखता है और ज्ञान का निर्माण करता है। विद्यार्थी शिक्षक से तैयार ज्ञान प्राप्त करता है।
अधिगम कक्षा की चारदीवारी के बाहर भी विस्तृत सामाजिक संदर्भ में हो सकता है। अधिगम मुख्यतः कक्षा की चारदीवारी के भीतर होता है।
यह बहु-अनुशासनात्मक शैक्षिक दृष्टिकोण है। यह अपेक्षाकृत अनुशासनात्मक दृष्टिकोण है।
विद्यार्थी को बहुविध अनुभव प्राप्त होते हैं। विद्यार्थी को अपेक्षाकृत रैखिक अनुभव प्राप्त होते हैं।

बाल-केन्द्रित शिक्षण का मूल स्वरूप

बाल-केन्द्रित शिक्षण का सार यह है कि शिक्षा को बालक के अनुरूप बनाया जाए, न कि बालक को एक निश्चित शिक्षण-व्यवस्था के अनुरूप ढाला जाए। इसमें शिक्षक बालक की रुचि, आवश्यकता, क्षमता एवं विकास-गति को पहचानकर उसे उपयुक्त अनुभव, स्वतंत्रता और मार्गदर्शन प्रदान करता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • बाल-केन्द्रित शिक्षण में बालक शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का केन्द्र होता है।
  • इसमें बालक की रुचि, आवश्यकता, क्षमता, स्वतंत्रता तथा स्वयं करके सीखने पर बल दिया जाता है।
  • रूसो, टैगोर, फ्रोबेल, पेस्टालॉजी और मॉन्टेसरी ने बाल-केन्द्रित शिक्षा पर बल दिया।
  • इसके प्रमुख आधार स्वतंत्रता, स्व-क्रियाएँ, पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ, आत्मानुशासन, मनोवैज्ञानिक शिक्षण, दृश्य-श्रव्य सामग्री तथा अनुभव आधारित शिक्षा हैं।
  • शिक्षक की भूमिका ज्ञानदाता की अपेक्षा सहयोगी, मार्गदर्शक एवं प्रेरक की होती है।
  • बाल-केन्द्रित शिक्षण का उद्देश्य चहुँमुखी विकास, आत्मविश्वास, जिज्ञासा, सहयोग, स्वतंत्र कार्य तथा सक्रिय अधिगम का विकास करना है।
  • शिक्षक-केन्द्रित शिक्षण की तुलना में बाल-केन्द्रित शिक्षण विद्यार्थी की सक्रिय सहभागिता, स्वतंत्रता तथा बहुविध अनुभवों को अधिक महत्त्व देता है।
Topic 15 गतिविधि आधारित अधिगम—विशेषताएँ, प्रकार, उद्देश्य एवं महत्त्व

गतिविधि आधारित अधिगम—विशेषताएँ, प्रकार, उद्देश्य एवं महत्त्व

गतिविधि आधारित अधिगम का अर्थ

गतिविधि आधारित अधिगम (Activity Based Learning—ABL) ऐसी शिक्षण व्यवस्था है जिसमें बालक विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए सीखता है। इसमें पाठ्यक्रम को छोटी-छोटी इकाइयों में व्यवस्थित करके विद्यार्थियों को अभ्यास एवं क्रियाओं के माध्यम से आगे बढ़ने का अवसर दिया जाता है।

गतिविधि आधारित अधिगम केवल कक्षा के वातावरण को बेहतर नहीं बनाता, बल्कि बहुस्तरीय कक्षाओं की आवश्यकताओं को भी सम्बोधित करता है। प्रारम्भ में इसे कक्षा 1 और 2 के हिन्दी, अंग्रेजी तथा गणित जैसे विषयों में अपनाया गया और बाद में कक्षा 4 तक विस्तारित किया गया।

इसका मूल विचार यह है कि बालक केवल सुनकर या पढ़कर ही नहीं, बल्कि स्वयं क्रिया करके भी सीखता है। गतिविधियाँ उसकी क्षमता और स्तर के अनुरूप रखी जाती हैं, जिससे वह अपनी गति से अधिगम कर सके।

गतिविधि आधारित अधिगम की विशेषताएँ

  1. बच्चों को उनकी अभ्यास-क्षमता के अनुसार सीखने की स्वतंत्रता मिलती है।
  2. बच्चे विभिन्न प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से सीखते हैं।
  3. प्रत्येक बालक अपने स्तर के अनुसार सीखने का प्रयास करता है।
  4. इसके माध्यम से मल्टीग्रेड एवं बहुस्तरीय शिक्षण की व्यवस्था सम्भव होती है।
  5. खेल एवं विभिन्न गतिविधियों द्वारा अभ्यास कराते हुए शिक्षण को आनन्ददायक बनाया जा सकता है।
  6. परीक्षा के भय को कम करने के लिए उपयुक्त मूल्यांकन-प्रणाली अपनाई जा सकती है।
  7. शिक्षक को प्रत्येक बालक की आवश्यकता के अनुसार उस पर ध्यान देने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं।
  8. इससे बच्चों के स्कूल-बैग का बोझ कुछ सीमा तक कम किया जा सकता है।
  9. बच्चों को अभ्यास करने के अनेक अवसर प्राप्त होते हैं।
  10. अभ्यास के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध कराना और उसका उचित उपयोग सुनिश्चित करना आवश्यक होता है।
  11. बच्चों के लिए अनुकूल कक्षा, गतिविधियाँ और अधिगम-वातावरण उपलब्ध कराया जाता है।
  12. शिक्षक बच्चों की कठिनाइयों के प्रति जागरूक रहता है और उनके समाधान में सहायता करता है।

गतिविधियों के प्रकार

गतिविधियों को मुख्यतः तीन प्रकारों में बाँटा गया है—

1. शारीरिक गतिविधि

ऐसी गतिविधियाँ जिनमें शरीर की क्रियाशीलता प्रमुख होती है। जैसे—पी.टी. करना, कदमताल करना, हाथ ऊपर-नीचे करना तथा उछल-कूद करना।

2. मानसिक गतिविधि

ऐसी गतिविधियाँ जिनमें चिन्तन, मनन और मानसिक क्रियाओं का प्रयोग होता है। जैसे—तर्क करना, वार्तालाप करना, वर्ग-पहेली, पहेली पूछना, लेखन तथा भाषण देना।

3. शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार की गतिविधि

इनमें शरीर और मस्तिष्क दोनों सक्रिय रहते हैं। उदाहरण के लिए पशु-पक्षियों के नाम लेते हुए आगे या पीछे कूदना जैसी गतिविधियाँ।

गतिविधि आधारित अधिगम के उद्देश्य

  1. विभिन्न गतिविधियों द्वारा बच्चों में अनेक दक्षताओं का विकास करना।
  2. कक्षा में गतिविधि आधारित शिक्षण का प्रयोग करना।
  3. बच्चों की रुचियों, मनोवृत्तियों तथा स्तर को समझते हुए शिक्षण की व्यवस्था करना।
  4. बच्चों को विभिन्न शैक्षिक क्रियाकलापों से परिचित कराना।
  5. शिक्षण को रोचक एवं प्रभावपूर्ण बनाना।
  6. खेल-खेल में शिक्षा प्रदान करना।
  7. बच्चों में सक्रियता का विकास करना।

गतिविधि आधारित अधिगम में ध्यान देने योग्य बातें

  1. कक्षा के सभी बच्चों को गतिविधि में भाग लेने का अवसर दिया जाना चाहिए।
  2. गतिविधि के समय बच्चों में किसी प्रकार का भय नहीं होना चाहिए और गतिविधि स्वयं भी रुचिकर होनी चाहिए।
  3. गतिविधियाँ बच्चों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करने वाली होनी चाहिए।
  4. गतिविधियाँ बच्चों में जिज्ञासा उत्पन्न करने वाली होनी चाहिए।
  5. गतिविधियाँ केवल शारीरिक उछल-कूद तक सीमित नहीं होनी चाहिए; उनमें मानसिक अभ्यास भी शामिल होना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार गतिविधियों में परिवर्तन भी किया जाना चाहिए।
  6. गतिविधियों को केवल खेल के मैदान तक सीमित न रखकर पाठ्यपुस्तक एवं पाठ्य-वस्तु से जोड़कर बच्चों को सीखने का अवसर देना चाहिए।

गतिविधि आधारित अधिगम की उपयोगिता एवं महत्त्व

  1. विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में अनेक दक्षताओं का विकास होता है।
  2. बच्चों की रुचि, मनोवृत्ति और स्तर के अनुसार शिक्षण होने से वे अधिगम में अधिक रुचि लेते हैं।
  3. बच्चे विभिन्न शैक्षिक क्रियाकलापों से परिचित होते हैं।
  4. शिक्षण अधिक रोचक एवं प्रभावपूर्ण बनता है।
  5. खेल-खेल में सीखने से बालक सहज रूप से ज्ञान प्राप्त करता है।
  6. बच्चों में सक्रियता का विकास होता है।
  7. गतिविधियों द्वारा प्राप्त ज्ञान अपेक्षाकृत अधिक स्थायी होता है।
  8. विद्यार्थियों में सामाजिकता की भावना का विकास होता है।
  9. गतिविधि आधारित शिक्षण बालकों के शारीरिक एवं मानसिक विकास में सहायक होता है।

गतिविधि आधारित अधिगम का मूल स्वरूप

गतिविधि आधारित अधिगम में शिक्षक का कार्य केवल विषय-वस्तु समझाना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ तैयार करना है जिनमें बालक सक्रिय रूप से भाग लेकर स्वयं सीख सके। गतिविधि बालक की आयु, रुचि, क्षमता और मानसिक स्तर के अनुरूप होनी चाहिए तथा उसका स्पष्ट सम्बन्ध शिक्षण के उद्देश्य एवं पाठ्य-वस्तु से होना चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • गतिविधि आधारित अधिगम में बालक विभिन्न गतिविधियों द्वारा सक्रिय रूप से सीखता है।
  • इसमें बच्चे अपनी क्षमता और स्तर के अनुसार सीख सकते हैं तथा मल्टीग्रेड एवं बहुस्तरीय शिक्षण सम्भव होता है।
  • गतिविधियाँ तीन प्रकार की हैं—शारीरिक, मानसिक तथा शारीरिक एवं मानसिक दोनों।
  • इसका उद्देश्य दक्षताओं, सक्रियता, रुचि और शैक्षिक क्रियाशीलता का विकास करना तथा शिक्षण को रोचक बनाना है।
  • गतिविधियाँ भयमुक्त, रुचिकर, जिज्ञासापूर्ण तथा बालक के स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
  • गतिविधि आधारित अधिगम से ज्ञान अधिक स्थायी होता है तथा सामाजिक, शारीरिक और मानसिक विकास में सहायता मिलती है।
Topic 16 रुचिपूर्ण / आनन्ददायी शिक्षण—अर्थ, विशेषताएँ, उद्देश्य एवं क्रियाविधि

रुचिपूर्ण / आनन्ददायी शिक्षण—अर्थ, विशेषताएँ, उद्देश्य एवं क्रियाविधि

रुचिपूर्ण / आनन्ददायी शिक्षण का अर्थ

रुचिपूर्ण या आनन्ददायी शिक्षण (Joyful Teaching) ऐसा शिक्षण उपागम है जिसमें विद्यार्थियों में विषय के प्रति रुचि और जिज्ञासा उत्पन्न करके अधिगम कराया जाता है। जब विद्यार्थी किसी विषय में रुचि लेने लगते हैं तो वे स्वयं सीखने के लिए प्रेरित होते हैं और शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया अधिक प्रभावशाली बन जाती है।

रुचि एक मानसिक संवेग है और प्रत्येक बालक की रुचि अलग-अलग हो सकती है। इसलिए शिक्षक को विद्यार्थियों की रुचियों को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त शिक्षण-सहायक सामग्री एवं गतिविधियों का चयन करना चाहिए।

विषय के अनुसार चार्ट, मॉडल, चित्र तथा प्रोजेक्टर आदि का प्रयोग करके शिक्षण को सरल, आकर्षक और रुचिकर बनाया जा सकता है। इस प्रकार रुचिपूर्ण शिक्षण एक बाल-केन्द्रित व्यवस्था है जिसमें शिक्षक विद्यार्थियों के लिए आनन्ददायी क्रियाकलापों की व्यवस्था करता है और उनसे मित्रवत एवं आत्मीय व्यवहार करता है।

केवल पुस्तकीय ज्ञान जीवन की सभी परिस्थितियों का सामना करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। इसलिए विद्यालय का वातावरण ऐसा बनाया जाना चाहिए जिसमें विद्यार्थी आनन्दपूर्वक सक्रिय होकर सीख सकें और शिक्षा के सर्वांगीण उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके।

रुचिपूर्ण शिक्षण की विशेषताएँ

  1. विद्यार्थियों की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करके उनके सर्वांगीण विकास का प्रयास किया जाता है।
  2. शिक्षण के रुचिपूर्ण तरीकों को अपनाकर शिक्षण-कार्य को विद्यार्थियों की रुचियों के अनुरूप बनाया जाता है।
  3. विद्यार्थियों को करके सीखने के लिए प्रेरित किया जाता है।
  4. बालकों के लिए रुचिपूर्ण एवं आनन्ददायी शिक्षण का प्रयोग किया जाता है।
  5. उबाऊ एवं अनाकर्षक वातावरण को हटाकर रोचक शिक्षण-वातावरण बनाया जाता है।
  6. शिक्षण-सहायक सामग्रियों का प्रयोग करके शिक्षण को अधिक रुचिकर बनाने का प्रयास किया जाता है।

रुचिपूर्ण शिक्षण के उद्देश्य

  1. विद्यालय का बाह्य एवं आन्तरिक सौन्दर्यीकरण करके उसे एक आनन्दमयी केन्द्र के रूप में विकसित करना।
  2. शिक्षक को विद्यार्थियों के मित्र एवं सहयोगी के रूप में विकसित करना।
  3. शिक्षण में समुदाय का सहयोग प्राप्त करना।
  4. शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को रुचिपूर्ण बनाकर प्रत्येक बालक की सहभागिता सुनिश्चित करना।
  5. निर्धारित अपेक्षित कौशलों का विकास करके उचित अधिगम-स्तर प्राप्त करना।
  6. शिक्षकों में परस्पर सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करना तथा उनकी बौद्धिक, रचनात्मक एवं कलात्मक योग्यताओं का उचित उपयोग करना।
  7. बालकों का नामांकन, ठहराव तथा गुणात्मक शिक्षा सुनिश्चित करना।
  8. रुचिपूर्ण शिक्षण के माध्यम से विद्यालयी ह्रास एवं अवरोध को रोकना।
  9. विद्यालय के वातावरण को सरल, आकर्षक, शैक्षिक एवं सौन्दर्यपूर्ण बनाना।

रुचिपूर्ण शिक्षण की क्रियाविधि

विद्यार्थियों के अधिगम में गतिविधियों का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। जब किसी योग्यता या विषय-वस्तु को गतिविधि के माध्यम से सिखाया जाता है तो उसका विद्यार्थियों पर अधिक प्रभाव पड़ता है और प्राप्त अधिगम अधिक स्थायी होता है।

रुचिपूर्ण शिक्षण में निम्न गतिविधियों का प्रयोग किया जा सकता है—

1. गीत / कविता

बालकों की गीत, कहानी तथा कविताओं में स्वाभाविक रुचि होती है। यदि विषय-वस्तु को गीत या कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए तो विद्यार्थियों को वह अधिक रुचिकर लगती है और उनकी समझ भी शीघ्र विकसित होती है।

2. कहानी-चित्रण

शिक्षक कहानी को चित्रों एवं अन्य सामग्रियों की सहायता से रोचक बना सकता है। विद्यार्थियों को कहानी से सम्बन्धित चित्र दिखाकर उसके आधार पर कहानी बनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। इससे उनकी रुचि एवं अधिगम-प्रेरणा बढ़ती है।

3. खेल

खेल के माध्यम से विद्यार्थियों में सीखने के प्रति रुचि उत्पन्न की जा सकती है। सभी विद्यार्थियों को खेल में सक्रिय रूप से भाग लेने का अवसर देना चाहिए। उचित खेल-गतिविधियाँ शिक्षण को आनन्ददायी वातावरण प्रदान करती हैं।

4. नाटक

विद्यालय में विभिन्न अवसरों पर नाटक आयोजित करके रुचिपूर्ण अधिगम का वातावरण बनाया जा सकता है। अभिनय विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी को बढ़ाता है और विषय को जीवन्त बनाता है।

5. भ्रमण

शैक्षिक भ्रमण के माध्यम से विद्यार्थी विभिन्न वस्तुओं एवं स्थानों का प्रत्यक्ष निरीक्षण करते हैं। इससे उन्हें वास्तविक अनुभव प्राप्त होता है और उनका अधिगम अधिक प्रभावशाली बनता है।

6. पहेली

शिक्षण में पहेलियों का प्रयोग करके नीरसता और थकान को कम किया जा सकता है। पहेलियाँ मनोरंजन के साथ विद्यार्थियों को सोचने के लिए प्रेरित करती हैं और कक्षा को रुचिकर बनाती हैं।

7. वार्तालाप

शिक्षक विद्यार्थियों के साथ मित्रवत वार्तालाप करके रुचिपूर्ण शिक्षण का वातावरण बना सकता है। इससे विद्यार्थी अपनी समस्याएँ सरलता से शिक्षक के सामने रखते हैं और शिक्षक उनके समाधान में सहायता कर सकता है।

8. विभिन्न वस्तुओं का प्रयोग

शिक्षण-सहायक सामग्री के रूप में विभिन्न वस्तुओं का प्रयोग करके शिक्षण को रुचिपूर्ण बनाया जा सकता है। नई-नई गतिविधियों तथा उपयुक्त सामग्रियों का प्रयोग विद्यार्थियों की रुचि को बनाए रखता है।

रुचिपूर्ण शिक्षण का शैक्षिक महत्त्व

रुचिपूर्ण शिक्षण में मनोवैज्ञानिक तथ्यों तथा विविध अधिगम-गतिविधियों का समावेश किया जाता है। इससे विद्यार्थी स्वाभाविक रूप से सक्रिय होते हैं, करके सीखने के लिए प्रेरित होते हैं और विषय-वस्तु को अधिक सहजता से ग्रहण करते हैं।

इस प्रकार रुचिपूर्ण शिक्षण केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि ऐसी सुनियोजित शिक्षण-व्यवस्था है जो विद्यार्थियों की रुचि, सक्रियता और सहभागिता के माध्यम से उनके सर्वांगीण विकास में सहायता करती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • रुचिपूर्ण शिक्षण में विद्यार्थियों की रुचि एवं जिज्ञासा उत्पन्न करके अधिगम कराया जाता है।
  • यह बाल-केन्द्रित शिक्षण व्यवस्था है जिसमें शिक्षक विद्यार्थियों के लिए आनन्ददायी एवं सक्रिय गतिविधियाँ आयोजित करता है।
  • इसमें करके सीखने, शिक्षण-सहायक सामग्री और रोचक वातावरण को विशेष महत्त्व दिया जाता है।
  • इसके प्रमुख उद्देश्य विद्यालय को आनन्दमयी बनाना, बालक की सहभागिता बढ़ाना, अपेक्षित कौशल विकसित करना तथा गुणात्मक शिक्षा प्रदान करना हैं।
  • रुचिपूर्ण शिक्षण की प्रमुख गतिविधियाँ हैं—गीत/कविता, कहानी-चित्रण, खेल, नाटक, भ्रमण, पहेली, वार्तालाप तथा विभिन्न वस्तुओं का प्रयोग।
  • इससे विद्यार्थी सक्रिय होकर सीखते हैं और प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी एवं प्रभावशाली बनता है।
Topic 17 सहभागी / सह-शिक्षण—उद्देश्य, प्रकार, लाभ एवं सीमाएँ

सहभागी / सह-शिक्षण—उद्देश्य, प्रकार, लाभ एवं सीमाएँ

सहभागी / सह-शिक्षण का अर्थ

सहभागी या सह-शिक्षण (Co-operative Teaching) ऐसी शिक्षण-प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों सक्रिय रूप से भाग लेते हैं तथा परस्पर सहयोग द्वारा अधिगम को प्रभावशाली बनाया जाता है। इसमें शिक्षार्थी को भी शिक्षण-प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण पक्ष माना जाता है।

उदाहरण के लिए शिक्षक प्रश्न पूछता है और विद्यार्थी उत्तर देते हैं; शिक्षक निर्देश देता है और विद्यार्थी उसका पालन करते हैं। शिक्षक फ्लैशकार्ड, चार्ट, श्यामपट्ट पर अभ्यास, नाटक आदि गतिविधियों का प्रयोग करके शिक्षण को रोचक तथा सहभागितापूर्ण बनाता है।

सहभागी शिक्षण की परिभाषाएँ

प्रो. श्रीकृष्ण दुबे के अनुसार

सहभागी शिक्षण वह शिक्षण-प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक एवं शिक्षार्थी की पूर्ण सहभागिता सुनिश्चित की जाती है और इसी सहभागिता द्वारा शिक्षण-प्रक्रिया प्रभावशाली एवं उद्देश्यपूर्ण बनती है।

आर. के. शर्मा के अनुसार

जिस शिक्षण-प्रक्रिया में शिक्षार्थी का सहयोग प्राप्त करके उसे यह अनुभव कराया जाता है कि वह भी शिक्षण-प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण पक्ष है, उसे सहभागी शिक्षण कहा जाता है।

सहभागी / सह-शिक्षण के उद्देश्य

  1. शिक्षक तथा विद्यार्थी दोनों को शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में क्रियाशील बनाना।
  2. कक्षा के वातावरण को रुचिकर एवं आनन्ददायी बनाना।
  3. विद्यार्थियों में चिन्तन, मनन, कल्पना, तर्क तथा जिज्ञासा जैसी प्रवृत्तियों का विकास करना।
  4. विषय-वस्तु के प्रस्तुतीकरण को सरल एवं बोधगम्य बनाना।
  5. विद्यार्थियों का चहुँमुखी विकास करना।
  6. विद्यार्थियों की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करना।
  7. विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुसार कक्षा-अभ्यास का निर्धारण करना।
  8. विद्यार्थियों को यथार्थ ज्ञान प्रदान करना।
  9. शिक्षकों की सुविधाओं, अधिगम तथा ज्ञान के बीच समन्वय स्थापित करना।
  10. सहयोग एवं सहकारिता की भावना का विकास करना।

प्रभावी सहभागी / सह-शिक्षण के प्रकार

1. सहयोगात्मक सह-शिक्षण

इस व्यवस्था में एक शिक्षक मुख्य भूमिका निभाता है, जबकि अन्य शिक्षक विद्यार्थियों की सहायता के लिए क्रमशः अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं। विद्यार्थी अपनी समस्याएँ, जिज्ञासाएँ तथा कठिनाइयाँ शिक्षक के सामने स्वतंत्र रूप से रख सकते हैं।

इसमें कभी-कभी सहायक शिक्षक या विद्यार्थी मुख्य शिक्षक के प्रति निर्भर अथवा अमानवीय व्यवहार कर सकते हैं तथा अत्यधिक नियंत्रण से कठोर अनुशासन की स्थिति बन सकती है।

2. समानान्तर सह-शिक्षण

इसमें कक्षा के आधे विद्यार्थियों को एक शिक्षक तथा शेष विद्यार्थियों को दूसरा शिक्षक पढ़ाता है। दोनों शिक्षक एक ही विषय-वस्तु का शिक्षण एक ही समय में करते हैं। इससे शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात कम हो जाता है।

इस व्यवस्था में एक ही कक्षा में अलग-अलग गतिविधियाँ चलने से शोर हो सकता है तथा एक शिक्षक के निर्देश के बाद दूसरे शिक्षक के लिए प्रभावी निर्देश देना कठिन हो सकता है।

3. पूरक सह-शिक्षण

इसमें सह-शिक्षण समूह का एक सदस्य दूसरे शिक्षक के शिक्षण को पूरक बनाता है। जो विषय या प्रकरण विद्यार्थियों को ठीक प्रकार से समझ नहीं आते, उन्हें दूसरा शिक्षक पुनः समझाता है।

इसमें उचित निरीक्षण एवं निगरानी की आवश्यकता होती है तथा सह-शिक्षक के केवल विषय-विशेषज्ञ के रूप में सीमित हो जाने की सम्भावना रहती है।

4. टोली शिक्षण

टोली शिक्षण (Team Teaching) में शिक्षक समूह के सदस्य मिलकर योजना बनाते हैं, शिक्षण करते हैं तथा विद्यार्थियों के आकलन का उत्तरदायित्व निभाते हैं। इससे शिक्षक पाठ्यक्रम को रुचिकर बना सकते हैं और विद्यार्थियों को प्रश्नोत्तर के माध्यम से सक्रिय रखते हैं।

इसमें विद्यार्थियों पर पर्याप्त निगरानी की आवश्यकता होती है तथा अधिक शिक्षकों के कारण कभी-कभी शिक्षण-बिन्दुओं की पुनरावृत्ति एवं शिक्षक-विद्यार्थी अन्तःक्रिया में कमी आ सकती है।

5. स्टेशन शिक्षण

स्टेशन शिक्षण (Station Teaching) में विद्यार्थियों को अलग-अलग समूहों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक समूह को एक शिक्षक किसी निश्चित कार्य या प्रकरण का अनुदेशन देता है और निर्धारित समय के बाद विद्यार्थी दूसरे स्टेशन पर जाते हैं।

6. एक शिक्षक, एक निरीक्षण

इस व्यवस्था में एक शिक्षक शिक्षण-कार्य करता है, जबकि दूसरा शिक्षक कक्षा, शिक्षण तथा विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाओं और प्रदत्त सूचनाओं का निरीक्षण करता है। प्राप्त निरीक्षण के आधार पर शिक्षण में आवश्यक सुधार किए जाते हैं।

7. वैकल्पिक अथवा विभेदित सह-शिक्षण

इसमें एक ही विषय-वस्तु या सूचना को दो अलग-अलग उपागमों से प्रस्तुत किया जाता है। अधिगम-परिणाम सभी विद्यार्थियों के लिए समान रहता है, परन्तु विद्यार्थियों की आवश्यकता के अनुसार शिक्षण का तरीका भिन्न हो सकता है।

सहभागी / सह-शिक्षण के लाभ

  1. वैकल्पिक शिक्षण-साधनों और शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात में सुधार से प्रत्येक विद्यार्थी पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है।
  2. शिक्षण कार्यक्रम की तीव्रता एवं निरन्तरता में सुधार होता है। विशिष्ट शिक्षा में प्रयुक्त प्रभावी रणनीतियों को सामान्य शिक्षा में भी उपयोग किया जा सकता है।
  3. विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थियों की सीखने की कठिनाइयाँ कम की जा सकती हैं। समावेशी वातावरण में उन्हें अन्य विद्यार्थियों के साथ सीखने का अवसर मिलता है।
  4. शिक्षकों तथा सम्बन्धित सेवा-कर्मियों के बीच सहयोग बढ़ता है और उनके व्यावसायिक कौशलों का भी विकास होता है।
  5. विशिष्ट बालकों के आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, सामाजिक कौशल तथा सहकर्मी सम्बन्धों में सुधार होता है।
  6. विद्यार्थियों को विभिन्न अवधारणाओं एवं विचारों को समझने में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने में सहायता मिलती है।

सहभागी / सह-शिक्षण की सीमाएँ

  1. अलग-अलग शिक्षण-शैलियों के कारण विद्यार्थी कभी-कभी भ्रमित हो सकते हैं और अधिगम कठिन लग सकता है।
  2. सह-शिक्षण के लिए शिक्षकों को अधिक योजना एवं तैयारी करनी पड़ती है, जिससे पर्याप्त समय की आवश्यकता होती है।
  3. शिक्षकों में आपसी मतभेद अथवा समन्वय की कमी होने पर शिक्षण-कार्य प्रभावित हो सकता है।
  4. विशिष्ट तथा सामान्य विद्यार्थियों के बीच सहयोग की कमी होने पर संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
  5. विशिष्ट बालकों की शिक्षा के सम्बन्ध में शिक्षकों एवं अन्य कर्मचारियों के दृष्टिकोण में अन्तर होने पर शिक्षण की प्रभावशीलता प्रभावित होती है।

सहभागी शिक्षण का शैक्षिक महत्त्व

सहभागी शिक्षण में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को सक्रिय स्थान मिलता है। सहयोग, प्रश्नोत्तर, समूह-कार्य तथा विभिन्न शिक्षण गतिविधियों के माध्यम से अधिगम को अधिक सरल, रोचक और उद्देश्यपूर्ण बनाया जाता है।

यह विशेष रूप से विद्यार्थियों की वैयक्तिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखने, शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात को बेहतर बनाने तथा सामान्य एवं विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थियों को साथ लेकर चलने में उपयोगी है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सहभागी / सह-शिक्षण में शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों की सक्रिय सहभागिता और सहयोग को महत्त्व दिया जाता है।
  • इसका उद्देश्य कक्षा को रुचिकर बनाना, विद्यार्थियों की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करना तथा सहयोग और सहकारिता की भावना उत्पन्न करना है।
  • इसके प्रमुख प्रकार हैं—सहयोगात्मक, समानान्तर, पूरक, टोली, स्टेशन, एक शिक्षक-एक निरीक्षण तथा वैकल्पिक/विभेदित सह-शिक्षण।
  • सह-शिक्षण से प्रत्येक विद्यार्थी पर अधिक ध्यान देना तथा विशिष्ट आवश्यकता वाले विद्यार्थियों को समावेशी वातावरण में शिक्षा देना सम्भव होता है।
  • यह आत्मविश्वास, सामाजिक कौशल, शिक्षक-सहयोग तथा विषय की समझ बढ़ाने में सहायक है।
  • अधिक तैयारी, शिक्षकों में समन्वय की कमी, अलग शिक्षण-शैलियाँ तथा दृष्टिकोण का अन्तर इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं।

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Topic 18 दक्षता आधारित शिक्षण—अर्थ, चरण, उद्देश्य, प्रकार, क्षेत्र एवं आधार

दक्षता आधारित शिक्षण—अर्थ, चरण, उद्देश्य, प्रकार, क्षेत्र एवं आधार

दक्षता आधारित शिक्षण का अर्थ

दक्षता आधारित शिक्षण (Skill Based Teaching) ऐसी शिक्षण-व्यवस्था है जिसमें विद्यार्थियों को केवल ज्ञान प्रदान करने के स्थान पर किसी निश्चित कार्य को कुशलतापूर्वक करने योग्य बनाया जाता है। आधुनिक प्रतिस्पर्धात्मक युग में ज्ञान के साथ-साथ चिन्तन, समस्या-समाधान, शाब्दिक कौशल, गणितीय गणना, वाचन, भाषण, संगीत एवं कला जैसी विभिन्न दक्षताओं का विकास आवश्यक माना गया है।

विषय-अधिगम में विद्यार्थियों से न्यूनतम अधिगम स्तर (MLL) प्राप्त करने की अपेक्षा की जाती है। ज्ञान और दक्षता जब साथ-साथ कार्य करते हैं तो अधिगम के परिणाम अधिक प्रभावी होते हैं। इस प्रक्रिया में अभ्यास का नियम तथा प्रभाव का नियम विशेष रूप से उपयोगी माने गए हैं।

दक्षता का अभिप्राय

दक्षता से अभिप्राय व्यावसायिक योग्यता, अर्जित ज्ञान तथा किसी उच्च स्तर की अवधारणा को प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने की योग्यता से है। दक्षता का विकास विद्यार्थियों को कार्यकुशल तथा व्यवहारिक रूप से सक्षम बनाने से सम्बन्धित है।

शिक्षक-शिक्षा में दक्षता का विशेष महत्त्व है, क्योंकि केवल विषय-ज्ञान पर्याप्त नहीं है। शिक्षक को शिक्षण-कौशल, उचित ज्ञान, नवीन दृष्टिकोण तथा शैक्षिक समस्याओं के समाधान की क्षमता से भी युक्त होना चाहिए।

दक्षता आधारित शिक्षण के चरण

  1. पूर्व तैयारी — शिक्षक विषय-वस्तु का पहले से अध्ययन करता है तथा पाठ के उद्देश्य एवं आवश्यक शिक्षण-अधिगम सामग्री (TLM) की व्यवस्था करता है।
  2. विषय-वस्तु का प्रस्तुतीकरण — विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान से सम्बन्ध स्थापित करते हुए विषय-वस्तु को सरल एवं स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
  3. नियम — सीखी जा रही प्रक्रिया या विषय से सम्बन्धित नियमों एवं निर्णयों का समन्वय कराया जाता है।
  4. अभ्यास — विद्यार्थियों को पर्याप्त अभ्यास करने का अवसर दिया जाता है और आवश्यकता पड़ने पर शिक्षक सहायता करता है।
  5. अभ्यास कार्य में सुधार — अभ्यास के दौरान हुई त्रुटियों को पहचानकर उनका सुधार कराया जाता है।
  6. प्रयोग — सीखे हुए ज्ञान एवं कौशल को वास्तविक अथवा नवीन परिस्थितियों में प्रयोग करने में विद्यार्थियों की सहायता की जाती है।

दक्षता विकास में ध्यान देने योग्य बातें

  1. दक्षता विद्यार्थियों के स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
  2. अभ्यास के समय विद्यार्थियों की थकान पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
  3. विद्यार्थियों की अन्तर्निहित शक्तियों को पहचानकर उनके अनुसार दक्षताओं का विकास करना चाहिए।
  4. विद्यार्थियों को दक्षता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
  5. दक्षता को विद्यार्थियों के तत्कालीन जीवन एवं अनुभवों से सम्बन्धित करना चाहिए।
  6. शिक्षक और विद्यार्थियों को मिलकर अधिगम की सफल प्राप्ति के लिए कार्य करना चाहिए।

दक्षता आधारित शिक्षण के उद्देश्य

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) ने दक्षता आधारित शिक्षा के उद्देश्यों में केवल सामान्य संज्ञानात्मक, बौद्धिक एवं भावात्मक उद्देश्यों तक सीमित न रहकर परिणामात्मक तथा अन्वेषणात्मक उद्देश्यों को भी सम्मिलित करने पर बल दिया है।

  • विद्यार्थियों के ज्ञानात्मक एवं बौद्धिक पक्षों का विकास करना।
  • भावात्मक पक्ष का विकास करके उचित अभिवृत्तियाँ एवं मूल्य विकसित करना।
  • विद्यार्थियों के वास्तविक निष्पादन एवं कार्य-क्षमता को विकसित करना।
  • विद्यार्थियों को ऐसी परिस्थितियाँ प्रदान करना जिनमें वे स्वयं जिज्ञासु एवं क्रियाशील होकर ज्ञान प्राप्त कर सकें।
  • अर्जित ज्ञान का सफलतापूर्वक व्यवहारिक उपयोग करने की क्षमता विकसित करना।

दक्षता आधारित शिक्षण के प्रकार

दक्षताओं को सामान्यतः पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है—

  1. संज्ञान आधारित दक्षता
  2. प्रदर्शन आधारित दक्षता
  3. परिणाम आधारित दक्षता
  4. प्रभावात्मक दक्षता
  5. अन्वेषणात्मक दक्षता

दक्षता आधारित शिक्षण के क्षेत्र

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) ने सन् 1988 में दक्ष शिक्षकों के लिए निम्न प्रमुख दक्षता-क्षेत्रों का निर्धारण किया—

  1. सीखने के संसाधनों का संगठन करना।
  2. पाठ्यचर्या के आदान-प्रदान की योजना बनाना तथा परिणामों का मूल्यांकन करना।
  3. साक्षरता शिक्षा कार्यक्रमों एवं पर्यावरण-जागरूकता को बढ़ावा देना।
  4. शिक्षकों को नवीन भूमिकाओं के निर्वहन के लिए तैयार करना।
  5. समस्याओं के समाधान के लिए विद्यार्थियों को प्रशिक्षण एवं अनुवर्ती शिक्षा प्रदान करना।
  6. लोकतान्त्रिक नागरिकता के विकास के लिए सामूहिक सेवा एवं विकास कार्यक्रमों का आयोजन और क्रियान्वयन करना।

दक्षता आधारित शिक्षण के आधार

  1. नैतिक एवं वैधानिक उत्तरदायित्वों को पूरा करना।
  2. आवश्यकता के अनुसार उपयुक्त शिक्षण-प्रविधियों का चयन करना।
  3. विद्यालय तथा विद्यार्थियों के बीच समन्वय स्थापित करना।
  4. पर्यावरण एवं समाजोपयोगी कार्यों के प्रति विद्यार्थियों को क्रियाशील बनाए रखना।
  5. आचरण की शुद्धता एवं स्वस्थ नागरिकता की भावना विकसित करना।

दक्षता आधारित शिक्षक-शिक्षा में सुधार

दक्षता आधारित शिक्षक-शिक्षा द्वारा छात्राध्यापकों के व्यवहार, कार्यकुशलता एवं शिक्षण-व्यवहार में सुधार किया जा सकता है। इसके लिए निम्न प्रकार के प्रशिक्षण उपयोगी माने गए हैं—

  • व्यवहार से सम्बन्धित संवाद का अभ्यास।
  • अकादमिक गतिविधियों का आयोजन।
  • विद्यार्थियों की क्रियाओं का निरीक्षण।
  • अधिगम-परिणामों के विषय में संवाद।
  • विशेष आवश्यकताओं की पहचान।
  • स्व-निर्देशन सामग्री का विकास।
  • क्रियाकलाप आधारित सोच का अभ्यास।
  • अनुकूल अधिगम-वातावरण का निर्माण।

दक्षता आधारित शिक्षण के लिए प्रमुख सुझाव

  1. शिक्षक केवल ज्ञान के स्रोत के रूप में कार्य न करे, बल्कि सामाजिक एवं व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान में भी सहायक बने।
  2. शिक्षक में मनोवैज्ञानिक, उन्मुख एवं पेशेवर दृष्टिकोण होना चाहिए।
  3. शिक्षण-कार्य करने वाले को अधिक स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी दी जानी चाहिए।
  4. शैक्षिक क्रियाकलापों में समुदाय का अधिक सहयोग प्राप्त किया जाना चाहिए।
  5. समूह समस्याओं के समाधान एवं सामाजिक सामंजस्य के लिए उपयुक्त निर्देशन-तकनीकों का विकास किया जाना चाहिए।
  6. शिक्षक-शिक्षा में व्यक्तिगत एवं आत्मगत निर्देशन की व्यवस्था होनी चाहिए।
  7. सूचनाओं का वितरण एवं संग्रह एक व्यापक शैक्षिक प्रयास के रूप में होना चाहिए।
  8. शिक्षार्थी को शैक्षिक निर्णयों के लिए जिम्मेदार एवं जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
  9. शिक्षक और विद्यार्थी के बीच आमने-सामने की अन्तःक्रिया होनी चाहिए।

आचार्य राममूर्ति समिति (1990) ने भी तत्कालीन परिस्थितियों में प्रशिक्षण कार्यक्रमों को दक्षता आधारित बनाने पर बल दिया। इससे शिक्षकों में संज्ञानात्मक एवं मनःचालित पक्षों में शिक्षण-क्षमता, सृजनात्मक कार्य एवं नवाचार की अभिवृत्ति, शैक्षिक प्रक्रिया के व्यावसायीकरण के प्रति तत्परता, विशेष क्षेत्रों की योग्यता तथा विकेन्द्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था में अपनी भूमिका समझने जैसे गुण विकसित किए जा सकते हैं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • दक्षता आधारित शिक्षण में ज्ञान के साथ किसी कार्य को कुशलतापूर्वक करने की क्षमता विकसित की जाती है।
  • इसके प्रमुख चरण हैं—पूर्व तैयारी, विषय-वस्तु का प्रस्तुतीकरण, नियम, अभ्यास, अभ्यास में सुधार तथा प्रयोग।
  • दक्षताओं के पाँच प्रकार हैं—संज्ञान आधारित, प्रदर्शन आधारित, परिणाम आधारित, प्रभावात्मक तथा अन्वेषणात्मक दक्षता।
  • NCTE ने 1988 में दक्ष शिक्षकों के लिए विभिन्न दक्षता-क्षेत्रों का निर्धारण किया।
  • दक्षता आधारित शिक्षण में पर्याप्त अभ्यास, त्रुटियों का सुधार, प्रेरणा तथा अर्जित ज्ञान का व्यवहारिक प्रयोग आवश्यक है।
  • आचार्य राममूर्ति समिति (1990) ने शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों को दक्षता आधारित बनाने पर बल दिया।
Topic 19 उपचारात्मक शिक्षण—अर्थ, उद्देश्य, विधियाँ एवं विषय-क्षेत्र

उपचारात्मक शिक्षण—अर्थ, उद्देश्य, विधियाँ एवं विषय-क्षेत्र

उपचारात्मक शिक्षण का अर्थ

उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching) ऐसी शिक्षण-व्यवस्था है जिसका प्रयोग किसी विद्यार्थी या विद्यार्थियों के समूह की किसी विषय अथवा प्रकरण से सम्बन्धित विशेष कठिनाइयों, कमजोरियों या अधिगम-दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।

जिस प्रकार चिकित्सा में पहले रोग का निदान किया जाता है और उसके बाद उपयुक्त उपचार दिया जाता है, उसी प्रकार शिक्षा में पहले विद्यार्थी की अधिगम-सम्बन्धी कठिनाइयों, कमजोरियों, अक्षमताओं एवं त्रुटियों के कारणों का पता लगाया जाता है और फिर उन्हें दूर करने के लिए उपचारात्मक शिक्षण दिया जाता है।

अतः उपचारात्मक शिक्षण का मुख्य आधार निदानात्मक परीक्षण है। निदान द्वारा यह निर्धारित किया जाता है कि विद्यार्थी कहाँ और क्यों कठिनाई अनुभव कर रहा है, और उसी के आधार पर उपचार की योजना बनाई जाती है।

उपचारात्मक शिक्षण की प्रमुख परिभाषाएँ

नन के अनुसार

“बचाव निदान का उच्चतम स्तर है।” अर्थात् कठिनाइयों की पहचान जितनी सही होगी, उनके उपचार की सम्भावना उतनी ही अधिक होगी।

योकम एवं सिम्पसन के अनुसार

उपचारात्मक शिक्षण उचित रूप से निदानात्मक शिक्षण के बाद आता है। इसका उद्देश्य अधिगम में होने वाली विभिन्न प्रकार की त्रुटियों को सुधारने के लिए प्रभावशाली उपायों का विकास करना है।

ब्लेयर एवं जोन्स के अनुसार

उपचारात्मक शिक्षण ऐसा उत्तम शिक्षण है जो विद्यार्थी को उसकी वास्तविक स्थिति का ज्ञान कराता है और उचित क्रियाओं के माध्यम से उसकी कमजोरियों को दूर करके उसे अधिक योग्य बनाने का प्रयास करता है।

योकम एवं सिम्पसन ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बालक के शारीरिक, संवेगात्मक तथा सामाजिक दोषों का सफल उपचार न किया जाए तो केवल अधिगम की यांत्रिक त्रुटियों के आधार पर किए गए उपचारात्मक उपाय पूर्णतः सफल नहीं हो सकते।

उपचारात्मक शिक्षण के उद्देश्य

  1. विद्यार्थियों की अधिगम-सम्बन्धी दुर्बलताओं एवं अक्षमताओं को दूर करना।
  2. अधिगम की कठिनाइयों एवं कमजोरियों का निराकरण करना तथा भविष्य में उन दोषों की पुनरावृत्ति को कम करना।
  3. विद्यार्थियों की दोषपूर्ण आदतों, कौशलों एवं मनोवृत्तियों में सुधार करके उनके स्थान पर उचित एवं आदर्श व्यवहार विकसित करना।
  4. विद्यार्थियों की अवांछनीय रुचियों, आदतों एवं दृष्टिकोणों को वांछनीय रुचियों, आदतों और दृष्टिकोणों में बदलना।
  5. विद्यार्थियों में शिक्षण एवं अधिगम के प्रति रुचि उत्पन्न करना।
  6. विद्यार्थियों में आत्मविश्वास की भावना विकसित करना।

उपचारात्मक शिक्षण की विधियाँ

योकम एवं सिम्पसन ने विद्यार्थियों को उपचारात्मक सहायता देने के लिए निम्न प्रमुख विधियों का उल्लेख किया है—

  1. विद्यार्थियों की त्रुटियों को समय-समय पर सुधारते रहना।
  2. प्रत्येक विद्यार्थी की अधिगम-सम्बन्धी कठिनाइयों का व्यक्तिगत रूप से अध्ययन करके उनके समाधान के उपाय करना।
  3. विद्यार्थियों की वैयक्तिक भिन्नताओं के अनुसार उन्हें अलग-अलग समूहों में विभाजित करके शिक्षण की व्यवस्था करना।
  4. विद्यार्थियों को छोटे-छोटे समूहों में बाँटकर उनकी आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा प्रदान करना।
  5. विद्यार्थियों के अधिगम-दोषों, कमजोरियों एवं बुरी आदतों का निदान करके उन्हें दूर करने का प्रयास करना।

मन्द-बुद्धि विद्यार्थियों के लिए उपचारात्मक शिक्षण

मन्द-बुद्धि अथवा अधिक कठिनाई अनुभव करने वाले विद्यार्थियों के लिए निम्न उपाय उपयोगी माने गए हैं—

  • निर्देशों को स्पष्ट एवं सरल शब्दों में आवश्यकतानुसार कई बार दोहराया जाए।
  • कार्य समझाने के लिए सरल खेलों का प्रयोग किया जाए।
  • विषय से सम्बन्धित मॉडल प्रदर्शित किए जाएँ।
  • सूचनाओं को छोटे-छोटे भागों में प्रस्तुत किया जाए।
  • विद्यार्थियों को पर्याप्त अवसर तथा प्रोत्साहन दिया जाए।
  • जहाँ सम्भव हो, सूचनाओं को मूर्त एवं प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया जाए।

उपचारात्मक शिक्षण का विषय-क्षेत्र

उपचारात्मक शिक्षण का क्षेत्र निदानात्मक शिक्षण की अपेक्षा अधिक व्यापक है। बालक को विभिन्न विषयों में अलग-अलग प्रकार की अधिगम कठिनाइयाँ हो सकती हैं, इसलिए उपचारात्मक सहायता विद्यालयी पाठ्यक्रम के लगभग सभी विषयों में आवश्यक हो सकती है।

फिर भी इसका विशेष उपयोग उन आधारभूत क्षेत्रों में अधिक होता है जहाँ विद्यार्थियों को प्रारम्भिक कौशलों में कठिनाई आती है। इनमें प्रमुख रूप से—

  • वाचन
  • लेखन
  • उच्चारण
  • भाषा
  • गणित

जैसे विषय विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। इन क्षेत्रों में उत्पन्न कमियाँ अन्य विषयों के अधिगम को भी प्रभावित कर सकती हैं, इसलिए उनका समय पर निदान और उपचार आवश्यक है।

निदानात्मक एवं उपचारात्मक शिक्षण का सम्बन्ध

निदानात्मक शिक्षण द्वारा विद्यार्थी की कठिनाई, कमजोरी या त्रुटि के कारण का पता लगाया जाता है, जबकि उपचारात्मक शिक्षण द्वारा उसी कठिनाई को दूर करने के लिए उपयुक्त उपाय किए जाते हैं। इसलिए दोनों प्रक्रियाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं।

सरल शब्दों में—पहले निदान, फिर उपचार। सही निदान के बिना उपचारात्मक शिक्षण प्रभावी नहीं हो सकता।

उपचारात्मक शिक्षण का शैक्षिक महत्त्व

उपचारात्मक शिक्षण विद्यार्थियों की कमियों को केवल पहचानता नहीं, बल्कि उन्हें दूर करने के लिए उनकी आवश्यकता के अनुसार विशेष सहायता प्रदान करता है। इससे विद्यार्थी अपनी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करके सामान्य अधिगम-प्रक्रिया में पुनः प्रभावी रूप से आगे बढ़ सकता है।

यह शिक्षण विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, सीखने की रुचि तथा सही अध्ययन-अभ्यास विकसित करने में भी सहायक होता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • उपचारात्मक शिक्षण का उद्देश्य विद्यार्थियों की अधिगम-सम्बन्धी कठिनाइयों, कमजोरियों एवं त्रुटियों को दूर करना है।
  • इसका मुख्य आधार निदानात्मक परीक्षण है—पहले कठिनाई का कारण ज्ञात किया जाता है, फिर उसका उपचार किया जाता है।
  • योकम एवं सिम्पसन के अनुसार उपचारात्मक शिक्षण उचित रूप से निदानात्मक शिक्षण के बाद आता है।
  • इसके प्रमुख उद्देश्य कमजोरियों का निराकरण, दोषपूर्ण आदतों में सुधार, रुचि उत्पन्न करना तथा आत्मविश्वास विकसित करना हैं।
  • उपचारात्मक शिक्षण में व्यक्तिगत अध्ययन, छोटे समूह, त्रुटि-सुधार, सरल निर्देश, मॉडल और पर्याप्त अभ्यास का प्रयोग किया जाता है।
  • वाचन, लेखन, उच्चारण, भाषा और गणित उपचारात्मक शिक्षण के प्रमुख विषय-क्षेत्र हैं।
Topic 20 बहुकक्षा एवं बहुस्तरीय शिक्षण—अवधारणा, प्रक्रिया, योजना, महत्त्व एवं सीमाएँ

बहुकक्षा एवं बहुस्तरीय शिक्षण—अवधारणा, प्रक्रिया, योजना, महत्त्व एवं सीमाएँ

बहुकक्षा एवं बहुस्तरीय शिक्षण की अवधारणा

हमारे देश में अनेक ऐसे विद्यालय हैं जहाँ कक्षाएँ कई होती हैं, लेकिन शिक्षकों की संख्या कम होती है। ऐसी स्थिति में एक ही शिक्षक को एक समय में एक से अधिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को शिक्षण देना पड़ सकता है। इसके साथ ही एक ही कक्षा में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की योग्यता, रुचि, उपलब्धि तथा सीखने की गति भी अलग-अलग हो सकती है।

इन परिस्थितियों में विद्यार्थियों को उनकी कक्षा तथा अधिगम-स्तर के अनुसार समूहों में बाँटकर शिक्षण की व्यवस्था की जाती है। शिक्षक एक समूह के साथ प्रत्यक्ष शिक्षण करता है, जबकि अन्य समूह गतिविधियों, अभ्यास-कार्य अथवा मॉनीटर की सहायता से सीखते हैं।

बहुकक्षा शिक्षण का अर्थ

बहुकक्षा शिक्षण (Multiclass Teaching) से अभिप्राय ऐसी शिक्षण-व्यवस्था से है जिसमें एक शिक्षक एक ही समय में एक से अधिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाता है।

ऐसी व्यवस्था प्रायः उन विद्यालयों में आवश्यक होती है जहाँ पर्याप्त कक्षा-कक्ष या शिक्षक उपलब्ध नहीं होते। शिक्षक को पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकों, समय-विभाजन, बैठने की व्यवस्था तथा विद्यार्थियों के समूहों का उचित प्रबन्ध करना पड़ता है।

बहुकक्षा शिक्षण में बच्चों को छोटे-छोटे समूहों में बाँटा जा सकता है। जब शिक्षक एक समूह को कार्य देता है, तब वह दूसरे समूह के साथ कार्य करता है। इससे विद्यार्थी एक-दूसरे से चर्चा करते हुए एवं सहयोग द्वारा भी सीखते हैं।

बहुस्तरीय शिक्षण का अर्थ

बहुस्तरीय शिक्षण (Multigrade Teaching) को मानसिक स्तरीय शिक्षण भी कहा गया है। एक ही कक्षा में ऐसे विद्यार्थी हो सकते हैं जो अलग-अलग स्तर तथा अलग-अलग गति से सीखते हैं। जब शिक्षक विद्यार्थियों को उनके अधिगम-स्तर के आधार पर समूहों में बाँटकर शिक्षण देता है, तब उसे बहुस्तरीय शिक्षण कहा जाता है।

उदाहरण के लिए गणित में कुछ विद्यार्थी तेज, कुछ मध्यम तथा कुछ धीमी गति से सीखते हैं। उन्हें उनकी क्षमता के अनुसार कठिन, मध्यम तथा सरल प्रश्न देकर अभ्यास कराया जा सकता है।

विद्यार्थियों के उपलब्धि-स्तर का निर्धारण A, B, C, D ग्रेड के आधार पर करके उनकी मानसिक क्षमता एवं सीखने की गति के अनुरूप शिक्षण देना भी इस व्यवस्था का भाग है।

बहुस्तरीय शिक्षण के उद्देश्य

  • विद्यार्थियों के समय का सदुपयोग करना।
  • विद्यार्थियों में सृजनात्मक शक्ति का विकास करना।

बहुकक्षा एवं बहुस्तरीय शिक्षण की आवश्यकता, महत्त्व एवं उपयोगिता

  1. जहाँ कक्षा-कक्ष या शिक्षकों की कमी होती है, वहाँ बहुकक्षा शिक्षण द्वारा शिक्षण-कार्य को निरन्तर रखा जा सकता है।
  2. इसमें टाइम-टेबल, मॉनीटर, बैठने की योजना तथा मूल्यांकन की उचित व्यवस्था का विशेष महत्त्व होता है।
  3. इसके सफल संचालन के लिए शिक्षक की सूझ-बूझ, समय तथा ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
  4. यह आधुनिक समय की उपयोगी शिक्षण-व्यवस्था है।
  5. मॉनीटर शिक्षक का महत्त्वपूर्ण सहयोगी बन सकता है। वह छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों की सहायता के साथ विद्यालय की विभिन्न गतिविधियों में भी सहयोग देता है।
  6. सभी कक्षाओं के लिए पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध न होने की स्थिति में यह शिक्षण विशेष रूप से उपयोगी होता है।
  7. इसके द्वारा एक साथ विभिन्न कक्षाओं को व्यवस्थित रूप से पढ़ाने तथा अनुशासन बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।
  8. बहुकक्षा शिक्षण द्वारा व्यवस्थित एवं सार्थक अध्ययन कराया जा सकता है।
  9. इस व्यवस्था में शिक्षक की कुशलता तथा प्रबन्धन-क्षमता का विशेष महत्त्व होता है।
  10. शिक्षक प्रत्येक कक्षा में होशियार एवं समझदार विद्यार्थियों को पहचानकर मॉनीटर बना सकता है।
  11. बहुस्तरीय शिक्षण की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि विद्यार्थियों का उपलब्धि-स्तर तथा सीखने की गति समान नहीं होती।

बहुकक्षा एवं बहुस्तरीय शिक्षण के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहलू

बहुस्तरीय कक्षा एवं शिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए मुख्यतः निम्न तीन पक्षों पर ध्यान देना आवश्यक है—

  1. बहुस्तरीय कक्षा-संचालन के तौर-तरीके एवं वातावरण।
  2. बहुस्तरीय शिक्षण-प्रक्रिया।
  3. बहुस्तरीय शिक्षण-योजना का निर्माण।

बहुस्तरीय कक्षा-संचालन

समूह बनाना एवं उनका संचालन

एक ही कक्षा में बच्चों के पूर्वज्ञान और सीखने के स्तर में अन्तर होता है। इसलिए लगभग समान स्तर के विद्यार्थियों को एक समूह में रखा जाना चाहिए। जैसे-जैसे किसी विद्यार्थी का स्तर बदलता है, उसके समूह में भी परिवर्तन किया जा सकता है।

एक विद्यार्थी का स्तर प्रत्येक विषय में समान होना आवश्यक नहीं है। सम्भव है कि वह गणित में एक स्तर पर तथा हिन्दी या पर्यावरण अध्ययन में दूसरे स्तर पर हो। इसलिए समूहीकरण की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहनी चाहिए।

शिक्षक को विद्यार्थियों के स्तर की नियमित जाँच करनी चाहिए और उसका व्यवस्थित अभिलेख रखना चाहिए। यह अभिलेख दैनिक, साप्ताहिक अथवा मासिक आधार पर रखा जा सकता है और इसी के आधार पर समूहों तथा शिक्षण-योजना में परिवर्तन किया जाता है।

बैठने की व्यवस्था

कक्षा में बैठने की व्यवस्था विद्यार्थियों द्वारा किए जा रहे कार्य के अनुसार होनी चाहिए। बातचीत, चर्चा, गीत अथवा कहानी के लिए बच्चे गोल घेरे में बैठ सकते हैं। छोटे समूहों के कार्य के लिए अलग-अलग समूह तथा श्यामपट्ट-कार्य के लिए पंक्तियों अथवा अर्द्धवृत्ताकार व्यवस्था का प्रयोग किया जा सकता है।

स्वस्थ शिक्षण-वातावरण का निर्माण

बहुस्तरीय शिक्षण के लिए भय और दण्ड पर आधारित वातावरण उपयुक्त नहीं माना जाता। भय बच्चों में विद्यालय के प्रति लगाव कम करता है और सीखने में बाधा उत्पन्न करता है।

  • शिक्षक एवं विद्यार्थी के सम्बन्ध आत्मीय तथा स्नेहपूर्ण होने चाहिए।
  • एक-दूसरे की गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए।
  • बाहरी दबाव के स्थान पर विद्यार्थियों में स्व-अनुशासन विकसित किया जाना चाहिए।
  • विद्यार्थियों को अपने कार्य एवं व्यवहार की जिम्मेदारी लेना सीखना चाहिए।

बहुस्तरीय शिक्षण-प्रक्रिया

1. ज्ञान-सृजन के लिए अध्यापन

केवल ज्ञान को याद करा देना पर्याप्त नहीं है। सार्थक अधिगम तब होता है जब विद्यार्थी स्वयं अपने ज्ञान का निर्माण करता है और उसे जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में प्रयोग करना सीखता है।

इसके लिए आवश्यक है कि विद्यार्थी सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय रहे, उसका अधिगम जीवन के अनुभवों से जुड़ा हो तथा शिक्षक-विद्यार्थी एवं विद्यार्थी-विद्यार्थी संवाद को प्रोत्साहित किया जाए।

2. शिक्षक की भूमिका

शिक्षक का कार्य ऐसा लोकतान्त्रिक वातावरण बनाना है जिसमें सभी विद्यार्थी जाति, धर्म, क्षेत्र, समुदाय अथवा लिंग के भेदभाव के बिना सक्रिय रूप से भाग ले सकें।

शिक्षक को विद्यार्थियों को ज्ञान के अनेक स्रोतों से परिचित कराना चाहिए। पाठ्यपुस्तक के ज्ञान के साथ स्थानीय ज्ञान तथा बालकों के अपने जीवन-अनुभवों को भी अधिगम से जोड़ना चाहिए।

शिक्षक को—

  • सीखने की विभिन्न परिस्थितियाँ उपलब्ध करानी चाहिए।
  • प्रत्येक बालक को सक्रिय रूप से अधिगम में जोड़ना चाहिए।
  • विद्यार्थियों को तुलना, विचार-विमर्श एवं परस्पर संवाद के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • आवश्यकता पड़ने पर सहायता प्रदान करनी चाहिए।
  • विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण-परिस्थितियों की योजना बनानी चाहिए।
  • अधिगम के प्रबन्धन एवं मूल्यांकन के विषय में उचित निर्णय लेना चाहिए।
  • Collaborative Learning अर्थात् साथ-साथ मिलकर सीखने को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • विद्यार्थियों का मूल्यांकन उनके सीखने के कार्यों के आधार पर करना चाहिए।

बहुस्तरीय शिक्षण की आधारभूत मान्यताएँ

प्रत्येक विद्यार्थी में सीखने की क्षमता होती है

प्रत्येक बालक अनुभव एवं जन्मजात क्षमताओं के माध्यम से ज्ञान का निर्माण कर सकता है। यदि कोई विद्यार्थी अपेक्षित रूप से नहीं सीख रहा है तो केवल उसे दोषी मानने के स्थान पर पाठ्य-सामग्री, शिक्षण-विधि, कक्षा-वातावरण तथा उसकी रुचि जैसे कारणों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

प्रत्येक विद्यार्थी अपनी गति से सीखता है

विद्यार्थियों की क्षमताएँ, रुचियाँ तथा सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। इसलिए उनकी सीखने की गति भी समान नहीं हो सकती। किसी विद्यार्थी की गति कभी तेज तथा कभी धीमी हो सकती है।

इसी कारण बहुस्तरीय शिक्षण में प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी गति से सीखने का अवसर प्रदान करना आवश्यक है।

बहुस्तरीय शिक्षण-योजना बनाना

बहुस्तरीय शिक्षण में शिक्षक को विद्यार्थियों की अलग-अलग सीखने की गति को ध्यान में रखते हुए प्रतिदिन उनके लिए कार्य की योजना बनानी चाहिए। यदि शिक्षक समूह में पहुँचने के बाद ही कार्य सोचता है तो अन्य विद्यार्थी खाली बैठ सकते हैं।

इसलिए प्रत्येक समूह के पास जाने से पहले शिक्षक को उसके कार्य की योजना तथा आवश्यक सामग्री तैयार रखनी चाहिए।

प्रतिदिन की योजना बनाने के लिए शिक्षक को यह जानकारी होनी चाहिए कि प्रत्येक विद्यार्थी ने—

  • क्या सीखा,
  • कितना सीखा,
  • और किस प्रकार सीखा।

इसके लिए विद्यार्थियों के प्रतिदिन किए गए कार्य का लिखित अभिलेख रखा जाता है। स्रोत में इसे “अंकन” कहा गया है। इसी अंकन के आधार पर शिक्षक अगले दिन के कार्य की योजना तथा तैयारी करता है।

बहुकक्षा एवं बहुस्तरीय शिक्षण की सीमाएँ / हानियाँ

  1. भारी आबादी वाले बड़े विद्यालयों में बहुकक्षा एवं बहुस्तरीय शिक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करना कठिन हो सकता है।
  2. उपलब्ध पाठ्यपुस्तकें प्रायः एक कक्षा अथवा मोनो-ग्रेड शिक्षण को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, इसलिए वे बहुकक्षा व्यवस्था की सभी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करतीं।
  3. ऐसे विद्यालयों में पर्याप्त भौतिक संसाधनों का अभाव भी शिक्षण को प्रभावित करता है।
  4. दूर-दराज क्षेत्रों में शिक्षकों की निष्क्रियता एवं अनियमितता इस व्यवस्था की प्रभावशीलता को कम कर सकती है।
  5. खराब योजना, गैर-जवाबदेही तथा शिक्षकों का गैर-शैक्षिक गतिविधियों में अधिक व्यस्त रहना विद्यालयी शिक्षण को प्रभावित करता है।

बहुकक्षा और बहुस्तरीय शिक्षण में मूल अन्तर

बहुकक्षा शिक्षण बहुस्तरीय शिक्षण
एक शिक्षक एक ही समय में एक से अधिक कक्षाओं को पढ़ाता है। एक ही कक्षा के अलग-अलग अधिगम-स्तर वाले विद्यार्थियों को उनके स्तर के अनुसार पढ़ाया जाता है।
इसका प्रमुख आधार कक्षाओं की संख्या तथा शिक्षकों की उपलब्धता है। इसका प्रमुख आधार विद्यार्थियों की उपलब्धि एवं सीखने की गति में अन्तर है।
शिक्षक अलग-अलग कक्षाओं के लिए समूह एवं कार्य निर्धारित करता है। शिक्षक समान अधिगम-स्तर वाले विद्यार्थियों के समूह बनाकर शिक्षण देता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • बहुकक्षा शिक्षण में एक शिक्षक एक ही समय में एक से अधिक कक्षाओं को पढ़ाता है।
  • बहुस्तरीय शिक्षण में एक ही कक्षा के विद्यार्थियों को उनके अलग-अलग अधिगम-स्तर एवं सीखने की गति के अनुसार समूहों में बाँटकर पढ़ाया जाता है।
  • बहुस्तरीय शिक्षण के प्रमुख पहलू हैं—कक्षा-संचालन एवं वातावरण, शिक्षण-प्रक्रिया तथा शिक्षण-योजना।
  • विद्यार्थियों का समूहीकरण स्थायी नहीं होता; उनके स्तर एवं विषय के अनुसार समूहों में परिवर्तन किया जा सकता है।
  • प्रत्येक विद्यार्थी में सीखने की क्षमता होती है और प्रत्येक विद्यार्थी अपनी गति से सीखता है—ये बहुस्तरीय शिक्षण की प्रमुख मान्यताएँ हैं।
  • शिक्षक को दैनिक कार्य का अभिलेख या “अंकन” रखकर उसके आधार पर अगले दिन की योजना बनानी चाहिए।
  • शिक्षकों की कमी में बहुकक्षा शिक्षण उपयोगी है, जबकि विद्यार्थियों की उपलब्धि एवं सीखने की गति में अन्तर होने के कारण बहुस्तरीय शिक्षण आवश्यक होता है।
  • अपर्याप्त संसाधन, मोनो-ग्रेड पाठ्यपुस्तकें, खराब योजना तथा शिक्षक-अनियमितता इसकी प्रमुख सीमाएँ हैं।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

बच्चे में कल्पनाशक्ति का विकास किया जा सकता है—

व्याख्या: कहानी सुनने और घटनाओं की मानसिक कल्पना करने से बालक की कल्पनाशक्ति का विकास होता है।
Q 2

प्रश्नोत्तर प्रविधि के जन्मदाता हैं—

व्याख्या: प्रश्नोत्तर प्रविधि का विकास सुकरात ने किया था। इसी कारण इसे सुकराती प्रविधि भी कहा जाता है।
Q 3

पाठशाला/विद्यालय को उद्यान की संज्ञा किसने दी है?

व्याख्या: फ्रोबेल ने अपनी किण्डरगार्टन पद्धति में विद्यालय को उद्यान तथा बालकों को विकसित होने वाले पौधों के समान माना।
Q 4

‘प्रयोग-प्रदर्शन विधि’ सर्वाधिक प्रयुक्त होती है—

व्याख्या: विज्ञान में नियमों, प्रक्रियाओं और सिद्धान्तों को प्रयोग द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित किया जा सकता है।
Q 5

प्राचीन कालीन शिक्षण विधियाँ थीं—

व्याख्या: प्राचीन शिक्षण-व्यवस्था में शिक्षक ज्ञान का मुख्य स्रोत और शिक्षण-प्रक्रिया का केन्द्र होता था।
Q 6

व्याख्यान-विधि में छात्र बने रहते हैं—

व्याख्या: व्याख्यान विधि में शिक्षक प्रमुख रूप से बोलता है और विद्यार्थी अधिकतर श्रोता रहते हैं, इसलिए उनकी सक्रियता सीमित रहती है।
Q 7

पर्यटन विधि से छात्रों में विकास होता है—

व्याख्या: शैक्षिक पर्यटन में विद्यार्थी वस्तुओं, स्थानों और घटनाओं का प्रत्यक्ष निरीक्षण करते हैं, जिससे उनकी अवलोकन-शक्ति विकसित होती है।
Q 8

‘प्रोजेक्ट पद्धति’ के जन्मदाता हैं—

व्याख्या: प्रोजेक्ट पद्धति के जन्मदाता किलपैट्रिक माने जाते हैं।
Q 9

सुकराती प्रविधि कहते हैं—

व्याख्या: सुकरात ने प्रश्नों के माध्यम से सत्य की खोज और ज्ञान प्राप्ति पर बल दिया, इसलिए प्रश्नोत्तर प्रविधि को सुकराती प्रविधि कहा जाता है।
Q 10

निदान की प्रक्रिया से सम्पादित होता है—

व्याख्या: निदान का मुख्य कार्य विद्यार्थी की अधिगम-सम्बन्धी समस्या, त्रुटि या कठिनाई की पहचान करना है।
Q 11

कक्षा-कक्षों की कमी होने पर शिक्षक अपनाता है—

व्याख्या: बहुकक्षा शिक्षण में एक शिक्षक एक ही समय में एक से अधिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाता है।
Q 12

छात्रों को अपने भावों एवं विचारों को व्यवस्थित ढंग से अभिव्यक्त करना किस प्रविधि में आता है?

व्याख्या: वाद-विवाद में विद्यार्थी अपने विचारों को क्रमबद्ध, तार्किक और स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने का अभ्यास करते हैं।
Q 13

भ्रमण-प्रविधि के चरण हैं—

व्याख्या: शैक्षिक भ्रमण में उद्देश्य निर्धारित करना, स्थान चुनना तथा आवश्यक सामग्री की व्यवस्था करना सभी आवश्यक चरण हैं।
Q 14

शिक्षण को आनन्ददायक, मनोरंजक और रुचिपूर्ण बनाने हेतु उत्तम प्रविधि है—

व्याख्या: खेल और गतिविधियों के माध्यम से बालक सक्रिय एवं आनन्दपूर्वक सीखता है, जिससे शिक्षण रुचिपूर्ण बनता है।
Q 15

सहयोग की भावना का विकास सम्भव है—

व्याख्या: समूह कार्य में विद्यार्थी मिलकर कार्य करते हैं, जिससे उनमें सहयोग और सहकारिता की भावना विकसित होती है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय शिक्षण-अधिगम के सिद्धान्त के अध्याय शिक्षण प्रविधियाँ एवं नवीन उपागम से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

दक्षता आधारित शिक्षण का क्या अभिप्राय है? स्पष्ट कीजिए।

Q 2

रुचिपूर्ण शिक्षण का अर्थ एवं विशेषताएँ लिखिए।

Q 3 2016, 2022

बहुस्तरीय शिक्षण से आप क्या समझते हैं?

Q 4 2016, 2017

बाल केन्द्रित शिक्षण में शिक्षक की क्या भूमिका है?

Q 5 2016

बाल केन्द्रित व शिक्षक केन्द्रित शिक्षण में क्या अन्तर है?

Q 6 2017

बहुकक्षा शिक्षण की क्या उपयोगिता है? स्पष्ट कीजिए।

Q 7 2017, 2018, 2020

गतिविधि आधारित शिक्षण की उपयोगिता व महत्त्व का उल्लेख कीजिए।

Q 8 2016, 2022

उपचारात्मक शिक्षण से आप क्या समझते हैं? मन्द बुद्धि छात्रों के लिए किस प्रकार उपचारात्मक शिक्षण किया जाना चाहिए।

Q 9 2016, 2018

बहुकक्षा शिक्षण क्या है? शिक्षण में इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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