शिक्षण—अर्थ, परिभाषाएँ, क्षेत्र एवं प्रकृति
शिक्षण का अर्थ
शिक्षण (Teaching) एक द्वि-मार्गीय प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच विचारों तथा ज्ञान का आदान-प्रदान होता है। सामान्य अर्थ में शिक्षण का अर्थ पढ़ाना, शिक्षा देना तथा ज्ञान प्रदान करना है।
शिक्षण शिक्षक और शिक्षार्थी की उपस्थिति में सम्पन्न होने वाली अन्तःक्रियात्मक प्रक्रिया है, जिसमें पाठ्यवस्तु माध्यम का कार्य करती है। शिक्षक निर्धारित विषयों से सम्बन्धित ज्ञान एवं कौशल प्रदान करता है और शिक्षार्थी उन्हें ग्रहण करके अपने ज्ञान, कौशल तथा व्यवहार में परिवर्तन लाता है।
शिक्षणशास्त्र (Pedagogy) शिक्षण के अध्ययन की कला है। प्रभावी शिक्षण में केवल जानकारी देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि विद्यार्थी को सीखने, समझने और व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाने के लिए उचित मार्गदर्शन देना भी आवश्यक है।
शिक्षण की प्रमुख परिभाषाएँ
बी. ओ. स्मिथ के अनुसार
शिक्षण क्रियाओं की ऐसी व्यवस्थित प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य अधिगम उत्पन्न करना होता है।
रायबर्न के अनुसार
शिक्षा में तीन प्रमुख केन्द्र-बिन्दु होते हैं—शिक्षक, बालक और पाठ्यवस्तु। शिक्षण इन तीनों के बीच स्थापित होने वाला सम्बन्ध है।
बर्टन के अनुसार
शिक्षण अधिगम के लिए उद्दीपन, मार्गदर्शन, दिशाबोध तथा प्रोत्साहन प्रदान करने की प्रक्रिया है।
क्लार्क के अनुसार
शिक्षण वह नियोजित प्रक्रिया है जिसका निर्माण और क्रियान्वयन विद्यार्थियों के व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए किया जाता है।
बी. एफ. स्किनर के अनुसार
शिक्षण पुनर्बलन की आकस्मिकताओं का क्रम है। अर्थात् उचित पुनर्बलन द्वारा शिक्षार्थी के अपेक्षित व्यवहार को विकसित किया जाता है।
बी. ओ. स्मिथ के एक अन्य कथन के अनुसार
शिक्षण एक उद्देश्य-निर्देशित क्रिया है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक शिक्षण कार्य किसी निश्चित शैक्षिक उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया जाता है।
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शिक्षण केवल ज्ञान देने की क्रिया नहीं है, बल्कि यह शिक्षक, शिक्षार्थी और विषय-वस्तु के बीच उद्देश्यपूर्ण अन्तःक्रिया है, जिसके द्वारा अधिगम तथा व्यवहार परिवर्तन सम्भव होता है।
शिक्षण का क्षेत्र एवं प्रकृति
शिक्षण का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में किसी न किसी रूप में शिक्षण की आवश्यकता होती है। शिक्षण की प्रकृति को निम्नलिखित विशेषताओं द्वारा समझा जा सकता है—
1. शिक्षण एक सोद्देश्य प्रक्रिया है
प्रत्येक शिक्षण कार्य का कोई निश्चित उद्देश्य होता है। शिक्षक उसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर शिक्षण की योजना बनाता है और शिक्षार्थियों को निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति की ओर ले जाता है।
2. शिक्षण एक अन्तःक्रियात्मक प्रक्रिया है
शिक्षण शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों की सक्रिय भागीदारी से सम्पन्न होता है। दोनों के बीच पारस्परिक अन्तःक्रिया के बिना प्रभावी शिक्षण सम्भव नहीं है।
3. शिक्षण कला और विज्ञान दोनों है
शिक्षण में शिक्षक की सृजनात्मकता, प्रस्तुतीकरण और परिस्थिति के अनुसार कार्य करने की क्षमता के कारण यह कला है। साथ ही इसके आधारभूत सिद्धान्त, नियम और व्यवस्थित प्रक्रियाएँ होने के कारण इसे विज्ञान भी माना जाता है।
4. शिक्षण एक विकासात्मक प्रक्रिया है
शिक्षण का उद्देश्य बालक का सर्वांगीण विकास करना है। प्रभावी शिक्षण द्वारा उसके ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक पक्षों का विकास किया जाता है और उसके व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाया जाता है।
5. शिक्षण एक सामाजिक एवं व्यावसायिक प्रक्रिया है
शिक्षण शिक्षक और शिक्षार्थी के सहयोग तथा सामाजिक वातावरण में सम्पन्न होता है, इसलिए यह सामाजिक प्रक्रिया है। शिक्षक इसे आजीविका तथा विशिष्ट कौशल वाले व्यवसाय के रूप में अपनाता है, इसलिए इसकी प्रकृति व्यावसायिक भी है।
6. शिक्षण निर्देशन की प्रक्रिया है
शिक्षण में शिक्षक केवल सूचना देने वाला नहीं, बल्कि मार्गदर्शक भी होता है। वह विद्यार्थियों की रुचि, क्षमता, अभिरुचि और आवश्यकता को ध्यान में रखकर उन्हें उचित दिशा प्रदान करता है।
7. शिक्षण एक त्रिध्रुवीय प्रक्रिया है
शिक्षण को त्रिध्रुवीय प्रक्रिया माना गया है। ब्लूम ने इसके तीन प्रमुख पक्ष बताए हैं—
- शिक्षण के उद्देश्य
- सीखने के अनुभव
- व्यवहार परिवर्तन
इन तीनों का परस्पर सम्बन्ध प्रभावी शिक्षण को पूर्णता प्रदान करता है।
8. शिक्षण में भाषा सम्प्रेषण का कार्य करती है
शिक्षण में तथ्यों, प्रत्ययों, सिद्धान्तों, नियमों और विचारों का बोध मुख्यतः भाषा के माध्यम से कराया जाता है। विद्यार्थी भी अपनी समस्याएँ, विचार और प्रतिक्रियाएँ भाषा द्वारा शिक्षक के सामने प्रस्तुत करता है।
9. शिक्षण मनुष्य को सामाजिक समायोजन के योग्य बनाता है
शिक्षण व्यक्ति को समाज की विभिन्न परिस्थितियों के अनुकूल व्यवहार करना सिखाता है। इसके द्वारा वह समस्याओं का समाधान करना और सामाजिक वातावरण में उचित समायोजन करना सीखता है।
10. शिक्षण शिक्षार्थी को क्रियाशील बनाता है
प्रभावी शिक्षक विद्यार्थियों को केवल निष्क्रिय श्रोता नहीं रहने देता, बल्कि उन्हें विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय करता है। इस सक्रियता के माध्यम से उनके ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक गुणों का विकास होता है।
शिक्षण की प्रकृति को संक्षेप में समझें
- शिक्षण निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
- यह शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच पारस्परिक अन्तःक्रिया पर आधारित है।
- इसमें शिक्षक, शिक्षार्थी तथा पाठ्यवस्तु का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
- यह कला और विज्ञान दोनों की विशेषताओं से युक्त है।
- यह बालक के सर्वांगीण विकास एवं व्यवहार परिवर्तन में सहायक है।
- यह सामाजिक, व्यावसायिक, निर्देशनात्मक तथा विकासात्मक प्रक्रिया है।
- शिक्षण शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच होने वाली उद्देश्यपूर्ण एवं द्वि-मार्गीय अन्तःक्रिया है।
- शिक्षण में शिक्षक, शिक्षार्थी और पाठ्यवस्तु तीन महत्त्वपूर्ण पक्ष होते हैं।
- बी. ओ. स्मिथ ने शिक्षण को अधिगम उत्पन्न करने वाली क्रियाओं की व्यवस्था तथा उद्देश्य-निर्देशित क्रिया माना है।
- बर्टन के अनुसार शिक्षण अधिगम हेतु उद्दीपन, मार्गदर्शन, दिशाबोध और प्रोत्साहन है।
- शिक्षण सोद्देश्य, अन्तःक्रियात्मक, विकासात्मक, सामाजिक एवं व्यावसायिक प्रक्रिया है तथा इसकी प्रकृति कला और विज्ञान दोनों की है।
- ब्लूम के अनुसार शिक्षण की त्रिध्रुवीय प्रक्रिया में शिक्षण के उद्देश्य, सीखने के अनुभव और व्यवहार परिवर्तन सम्मिलित हैं।
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शिक्षण की विशेषताएँ, उद्देश्य, आवश्यकता एवं महत्त्व
शिक्षण की विशेषताएँ
शिक्षण केवल ज्ञान प्रदान करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से शिक्षार्थी के ज्ञान, कौशल, व्यवहार और सामाजिक गुणों का विकास किया जाता है। शिक्षण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
1. अधिगम में सहायक
शिक्षण विद्यार्थियों को विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करता है। इसके माध्यम से उन्हें ऐसे अनुभव दिए जाते हैं जो उनके सर्वांगीण विकास में उपयोगी होते हैं।
2. सूचना सम्प्रेषण
शिक्षण ज्ञान और सूचनाओं के सम्प्रेषण की प्रक्रिया है। शिक्षक विभिन्न प्रकार की सूचनाओं को शिक्षार्थियों तक पहुँचाकर उनके ज्ञान में वृद्धि करता है।
3. कौशल-क्षमता का विकास
शिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों में विभिन्न प्रकार के कौशल और क्षमताओं का विकास किया जाता है। इससे वे प्राप्त ज्ञान का व्यवहार में उपयोग करना सीखते हैं।
4. विद्यार्थियों के व्यवहार में परिवर्तन
शिक्षण व्यवहार परिवर्तन की प्रक्रिया है। शिक्षक द्वारा दी गई उचित सूचनाएँ एवं अनुभव विद्यार्थियों को अपेक्षित व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
5. बेहतर सम्बन्धों का निर्माण
शिक्षण शिक्षक, शिक्षार्थी और पाठ्यवस्तु के बीच उचित सम्बन्ध स्थापित करता है। शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच अन्तःक्रिया से सामाजिक एवं लोकतांत्रिक सम्बन्ध भी विकसित होते हैं।
6. उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की प्राप्ति
शिक्षण एक उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है। इसके माध्यम से निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों तथा लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
ब्लूम ने शिक्षण के तीन प्रमुख उद्देश्य बताए हैं—
- ज्ञानात्मक उद्देश्य
- भावात्मक उद्देश्य
- क्रियात्मक उद्देश्य
7. सामाजिक विकास
शिक्षण सामाजिक वातावरण में शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच सम्पन्न होता है। उचित शिक्षण द्वारा विद्यार्थी के व्यक्तिगत विकास के साथ उसके सामाजिक गुणों का भी विकास होता है।
8. अनुकूलन में सहायक
शिक्षण विद्यार्थी को अपने वातावरण के साथ उचित अनुकूलन एवं सामंजस्य स्थापित करने में सहायता करता है। इससे उसे संवेगात्मक स्थिरता प्राप्त करने में भी सहायता मिलती है।
9. व्यावसायिक प्रक्रिया
शिक्षण एक व्यावसायिक प्रक्रिया भी है। इसके माध्यम से शिक्षक विद्यार्थियों में विभिन्न कौशलों का विकास करके उन्हें भविष्य के व्यवसाय एवं जीवन के लिए तैयार करता है।
शिक्षण के उद्देश्य
शिक्षण का उद्देश्य केवल विषय का ज्ञान प्रदान करना नहीं है, बल्कि विद्यार्थी के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों का विकास करना है। शिक्षण के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
- विद्यार्थी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकसित करना, जिससे वह अपने जीवन से सम्बन्धित उचित निर्णय स्वयं लेने में सक्षम बन सके।
- विद्यार्थी के आन्तरिक और बाह्य अनुभवों के बीच उचित सामंजस्य स्थापित करना।
- विद्यार्थियों को उनके स्वयं के अनुभवों और प्रत्यक्ष परिस्थितियों से समायोजन करते हुए वास्तविकता का बोध कराना तथा उनमें सीखने की प्रेरणा उत्पन्न करना।
- विद्यार्थियों की मानसिक शक्तियों का विकास करना।
- विद्यार्थियों की पाशविक प्रवृत्तियों में सुधार करके मानवीय गुणों का विकास करना तथा उनमें क्रियाशीलता, संगठन-क्षमता और व्यावहारिक गुण विकसित करना।
- विद्यार्थियों को प्राप्त सैद्धान्तिक ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग करने के लिए प्रेरित करना तथा वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता विकसित करना।
- विद्यार्थियों में आत्मनिर्भरता जागृत करना तथा उन्हें आत्मानुभूति करने योग्य बनाना।
- विद्यार्थियों की सृजनात्मक क्षमता का विकास करना और उन्हें रचनात्मक कार्यों के लिए प्रेरित करना।
शिक्षण की आवश्यकता एवं महत्त्व
व्यक्ति के ज्ञान, कौशल, व्यवहार तथा सर्वांगीण विकास में शिक्षण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसकी आवश्यकता और महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है—
1. ज्ञान एवं कौशल प्रदान करने में
शिक्षण एक कौशलयुक्त प्रक्रिया है जिसका प्रमुख कार्य विद्यार्थियों को ज्ञान प्रदान करना तथा उनकी विभिन्न क्षमताओं को विकसित करना है।
2. व्यवहार एवं मनोवृत्तियों में परिवर्तन
उचित शिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों के व्यवहार और मनोवृत्तियों में अपेक्षित परिवर्तन लाया जा सकता है। इससे उनके व्यक्तित्व को सही दिशा मिलती है।
3. वर्तमान एवं भावी जीवन की सफलता के लिए
शिक्षण विद्यार्थी को वर्तमान जीवन में सफल होने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी तैयार करता है। प्रशिक्षण एवं अनुदेशन के लिए भी शिक्षण वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।
4. सर्वांगीण विकास में सहायक
शिक्षण बालक के सर्वांगीण विकास में सहायक है। इसके द्वारा उसकी ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक क्षमताओं का विकास किया जाता है।
शिक्षण विद्यार्थियों की सृजनात्मक शक्ति को भी विकसित करता है, जिससे वे नवीन ज्ञान की खोज, नवीन चिन्तन तथा रचनात्मक कार्यों की ओर अग्रसर होते हैं।
5. सीखने के प्रति उत्सुकता उत्पन्न करना
प्रभावी शिक्षण विद्यार्थियों में सीखने की रुचि और उत्सुकता उत्पन्न करता है। इससे वे शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में अधिक सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
6. प्रशिक्षण एवं अनुदेशन में सहायक
शिक्षण द्वारा विद्यार्थियों में विभिन्न प्रकार के अनुबन्ध, प्रशिक्षण, अनुदेशन तथा प्रतिपादन से सम्बन्धित क्षमताओं का विकास किया जाता है।
7. व्यावहारिक एवं सामाजिक गुणों का विकास
शिक्षण विद्यार्थियों में क्रियाशीलता, संगठन-क्षमता, समानता तथा व्यावहारिक गुण विकसित करता है। साथ ही उनके संवेगों को प्रशिक्षित करके उन्हें सामाजिक समायोजन के योग्य बनाया जाता है।
- शिक्षण अधिगम, सूचना सम्प्रेषण, कौशल-विकास और व्यवहार परिवर्तन में सहायक होता है।
- शिक्षण द्वारा शिक्षक-शिक्षार्थी सम्बन्ध, सामाजिक विकास और वातावरण से अनुकूलन की क्षमता विकसित होती है।
- शिक्षण का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व, मानसिक शक्तियों, आत्मनिर्भरता और सृजनात्मक क्षमता का विकास करना है।
- ब्लूम के अनुसार शिक्षण के उद्देश्य ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक तीन प्रकार के हैं।
- शिक्षण विद्यार्थियों को सैद्धान्तिक ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग करने तथा वर्तमान एवं भावी जीवन के लिए तैयार करने में सहायक है।
- शिक्षण का महत्त्व ज्ञान देने तक सीमित नहीं है; यह व्यवहार, कौशल, सृजनात्मकता तथा सामाजिक समायोजन का भी विकास करता है।
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शिक्षण को प्रभावित करने वाले कारक, शिक्षक की दृष्टि से प्रासंगिकता तथा शिक्षण-प्रशिक्षण-अनुदेशन में अन्तर
शिक्षण को प्रभावित करने वाले कारक
शिक्षण की सफलता केवल शिक्षक के ज्ञान पर निर्भर नहीं करती। शिक्षण के उद्देश्य, विद्यार्थियों की विशेषताएँ, विषय-वस्तु, कक्षा का वातावरण, शिक्षण की योजना तथा उपलब्ध सुविधाएँ आदि अनेक कारक शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।
- शिक्षा के विभिन्न उद्देश्य शिक्षण के स्वरूप और उसकी संरचना को प्रभावित करते हैं। जैसे—कौशलात्मक, अनुप्रयोगात्मक, ज्ञानात्मक, अवबोधात्मक तथा श्लाघात्मक उद्देश्यों के लिए शिक्षण की प्रक्रिया भी अलग-अलग हो सकती है।
- प्रत्येक विद्यार्थी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, रचनात्मक तथा संवेगात्मक रूप से दूसरे विद्यार्थी से भिन्न होता है। उनकी रुचि, आवश्यकता, योग्यता और क्षमता में भी अन्तर होता है, इसलिए शिक्षण में व्यक्तिगत भिन्नताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।
- विद्यार्थियों का मनोशारीरिक स्तर भी शिक्षण को प्रभावित करता है। बालकों की मानसिक और शारीरिक अवस्था के अनुसार ही शिक्षण के स्वरूप और विधियों का चयन किया जाना चाहिए।
- विषय-वस्तु का स्वरूप और उसका स्तर शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावित करता है। सभी विषयों अथवा किसी एक विषय की सम्पूर्ण सामग्री को एक ही प्रकार से प्रस्तुत करने पर प्रभावी शिक्षण सम्भव नहीं होता।
- कक्षा-कक्ष की संरचना और वातावरण का शिक्षण पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। विद्यालय का सामाजिक एवं भौतिक वातावरण जितना अनुकूल होगा, शिक्षण उतना ही सरल और प्रभावपूर्ण होगा।
- शिक्षण क्रिया का उचित नियोजन आवश्यक है। पाठ-योजना में शिक्षक पाठ्यवस्तु, अधिगम सामग्री, शिक्षण-विधि, शिक्षण-बिन्दुओं, आयोजन और व्यवस्था पर पहले से विचार करता है, जिससे शिक्षण क्रमबद्ध तथा प्रभावी बनता है।
- शिक्षक की शारीरिक, मानसिक और शैक्षिक योग्यताएँ, कौशल, पात्रता, क्षमता तथा व्यक्तित्व भी शिक्षण के स्वरूप को प्रभावित करते हैं। प्रशिक्षित और शैक्षिक नवाचारों में रुचि रखने वाला शिक्षक शिक्षण को अधिक रोचक एवं प्रभावशाली बना सकता है।
- विद्यालय में उपलब्ध भौतिक सुविधाएँ और विषयानुकूल अधिगम-सामग्री भी शिक्षण की सफलता को प्रभावित करती हैं। पर्याप्त एवं विविध शिक्षण-साधनों की उपलब्धता से शिक्षक अधिक प्रभावी ढंग से शिक्षण कर सकता है।
शिक्षक की दृष्टि से शिक्षण की प्रासंगिकता
शिक्षण केवल विद्यार्थियों के विकास के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि शिक्षक के कार्य को भी उद्देश्यपूर्ण और प्रभावी बनाता है। शिक्षक की दृष्टि से इसकी प्रमुख प्रासंगिकताएँ निम्नलिखित हैं—
- शिक्षण द्वारा शिक्षक विद्यार्थियों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाने का प्रयास करता है और उनमें सीखने की उत्सुकता उत्पन्न करता है।
- शिक्षण शिक्षक को विद्यार्थियों की कमियों की पहचान करने तथा उनमें सुधार के लिए आवश्यक उपाय करने में सहायता करता है। शिक्षण की विभिन्न क्रियाएँ प्रशिक्षण और अनुदेशन के लिए भी वैज्ञानिक आधार प्रदान करती हैं।
- शिक्षक शिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों के ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक पक्षों का विकास कर सकता है। साथ ही उनमें क्रियाशीलता, संगठन-क्षमता तथा व्यावहारिक गुणों का विकास किया जा सकता है।
- शिक्षण के माध्यम से शिक्षक विद्यार्थियों की सृजनात्मक शक्ति विकसित करता है। इससे विद्यार्थी नवीन ज्ञान, नवीन चिन्तन और नवीन आविष्कारों की ओर प्रेरित होते हैं तथा भावी जीवन और सामाजिक समायोजन के लिए तैयार होते हैं।
प्रशिक्षण का अर्थ
प्रशिक्षण (Training) एक सतत प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति में ज्ञान, कौशल, दक्षता, कार्य-क्षमता तथा निष्पादन-क्षमता का विकास किया जाता है, ताकि वह सौंपे गए कार्य को कुशलतापूर्वक सम्पन्न कर सके।
डेविस के अनुसार
प्रशिक्षण को तथ्यों, नियमों तथा प्रविधियों और किसी संगठित संस्था से सम्बन्धित जानकारी के विकास की प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है।
इस प्रकार प्रशिक्षण किसी विशिष्ट कार्य को अधिक कुशलता से करने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल के विकास से सम्बन्धित होता है।
शिक्षण एवं प्रशिक्षण में अन्तर
| भेद का आधार | शिक्षण | प्रशिक्षण |
|---|---|---|
| अर्थ | शिक्षण का अर्थ पढ़ाना, शिक्षा देना और ज्ञान प्रदान करना है। यह शिक्षक एवं शिक्षार्थी की उपस्थिति में सम्पन्न होने वाली अन्तःक्रिया है। | प्रशिक्षण एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया है जिसके द्वारा निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ज्ञान एवं कौशल सिखाए जाते हैं। |
| प्रकृति | शिक्षण को कला एवं विज्ञान दोनों माना गया है। | प्रशिक्षण की प्रकृति वैज्ञानिक विधियों पर आधारित होती है। |
| लक्ष्य एवं उद्देश्य | शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य शिक्षार्थियों के मानसिक स्तर को बेहतर बनाना है। | प्रशिक्षण का प्रमुख उद्देश्य व्यक्तियों की आदतों एवं निष्पादन में सुधार करना है। |
| समयावधि | शिक्षण की समयावधि सामान्यतः दीर्घकालिक होती है। | प्रशिक्षण सामान्यतः अल्पकालिक होता है, जैसे 3 माह, 6 माह या 1 वर्ष। |
अनुदेशन का अर्थ
अनुदेशन (Instruction) का सामान्य अर्थ निर्देशन देना अथवा सूचना प्रदान करना है। यह शिक्षण का ही एक अंग है और इसका वास्तविक रूप कक्षा-शिक्षण में देखा जा सकता है।
अनुदेशन में शिक्षक विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार के निर्देश देकर ज्ञानात्मक सूचनाएँ प्रदान करता है। इसका प्रभाव मुख्यतः विद्यार्थियों के ज्ञान को स्मृति-स्तर तक पहुँचाने पर होता है और यह व्यवहार परिवर्तन की अपेक्षा ज्ञानात्मक पक्ष पर अधिक ध्यान देता है।
गेट्स के अनुसार
अनुदेशन वह प्रक्रिया है जो विद्यार्थियों को विशिष्ट उद्देश्यों की ओर प्रभावित करती है।
हेंडरसन के अनुसार
अनुदेशन प्रक्रिया शिक्षा एवं शिक्षण का एक संक्षिप्त रूप है।
शिक्षण एवं अनुदेशन में अन्तर
| अन्तर का आधार | शिक्षण | अनुदेशन |
|---|---|---|
| अर्थ | शिक्षण में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच पारस्परिक अन्तःक्रिया होती है, जिसके फलस्वरूप विद्यार्थी उद्देश्यों की ओर अग्रसर होते हैं। | अनुदेशन में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच पारस्परिक अन्तःक्रिया आवश्यक नहीं होती। विद्यार्थी स्वयं भी निर्धारित उद्देश्य की ओर अग्रसर हो सकता है। |
| समावेशन | शिक्षण में अनुदेशन निहित होता है। | अनुदेशन में शिक्षण का होना आवश्यक नहीं है। |
| विकास | शिक्षण द्वारा विद्यार्थियों के ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक तीनों पक्षों का विकास किया जा सकता है। | अनुदेशन द्वारा मुख्यतः ज्ञानात्मक पक्ष का विकास किया जाता है। |
शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुदेशन को सरल रूप में समझें
- शिक्षण व्यापक प्रक्रिया है जिसमें ज्ञान, अन्तःक्रिया और विद्यार्थी के विभिन्न पक्षों का विकास सम्मिलित है।
- प्रशिक्षण किसी विशिष्ट कार्य से सम्बन्धित ज्ञान, कौशल और दक्षता विकसित करने पर केन्द्रित होता है।
- अनुदेशन मुख्यतः निर्देश और सूचनाएँ प्रदान करने तथा ज्ञानात्मक पक्ष को विकसित करने से सम्बन्धित है।
- शिक्षण को शिक्षा के उद्देश्य, व्यक्तिगत भिन्नता, विद्यार्थियों के मनोशारीरिक स्तर, विषय-वस्तु, कक्षा वातावरण, नियोजन, शिक्षक की योग्यताओं और भौतिक सुविधाओं जैसे कारक प्रभावित करते हैं।
- शिक्षक की दृष्टि से शिक्षण व्यवहार परिवर्तन, कमियों के सुधार, विद्यार्थियों के विभिन्न पक्षों के विकास और सृजनात्मकता को बढ़ाने में उपयोगी है।
- प्रशिक्षण का उद्देश्य किसी विशिष्ट कार्य के लिए ज्ञान, कौशल और निष्पादन-क्षमता विकसित करना है।
- शिक्षण दीर्घकालिक तथा कला और विज्ञान दोनों से सम्बन्धित है, जबकि प्रशिक्षण सामान्यतः अल्पकालिक एवं वैज्ञानिक विधियों पर आधारित होता है।
- अनुदेशन का अर्थ निर्देशन या सूचना प्रदान करना है और यह मुख्यतः ज्ञानात्मक पक्ष को प्रभावित करता है।
- शिक्षण में अनुदेशन निहित होता है, लेकिन अनुदेशन में शिक्षण का होना आवश्यक नहीं है।
सम्प्रेषण—अर्थ, परिभाषाएँ, प्रकृति, विशेषताएँ, आवश्यकता एवं महत्त्व
सम्प्रेषण का अर्थ
सम्प्रेषण (Communication) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के Communis (कम्यूनिस) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ सामान्य या साझा होता है। सम्प्रेषण का सामान्य अर्थ किसी विचार, सूचना, भावना या संदेश को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाना तथा उनका परस्पर आदान-प्रदान करना है।
सम्प्रेषण केवल एक ओर से संदेश भेजने की क्रिया नहीं है। इसमें प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों की सहभागिता होती है तथा विचारों, भावनाओं, अनुभवों और सूचनाओं का पारस्परिक विनिमय होता है।
इस प्रक्रिया में दो या दो से अधिक व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं। सम्प्रेषण में शाब्दिक (Verbal) तथा अशाब्दिक (Non-Verbal) दोनों प्रकार के संकेतों का प्रयोग किया जा सकता है।
सम्प्रेषण की प्रमुख परिभाषाएँ
एडगर डेल के अनुसार
सम्प्रेषण पारस्परिकता के वातावरण में विचारों एवं भावनाओं को एक-दूसरे के साथ जानने, समझने और साझा करने की प्रक्रिया है।
लूमिस एवं वीगल के अनुसार
सम्प्रेषण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सामाजिक व्यवस्था में सूचनाओं, निर्देशों और निर्णयों द्वारा लोगों के विचारों, मतों तथा अभिवृत्तियों में परिवर्तन लाया जाता है।
लीगन्स के अनुसार
सम्प्रेषण ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्ति विचारों, तथ्यों, भावनाओं और प्रभावों का इस प्रकार आदान-प्रदान करते हैं कि प्राप्त संदेश को सभी सम्बन्धित व्यक्ति समझ सकें।
एण्डरसन के अनुसार
सम्प्रेषण एक गतिशील प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति प्रतीकों या अन्य साधनों के माध्यम से दूसरे व्यक्ति के संज्ञानात्मक ढाँचे को प्रभावित करता है।
न्यूमर एवं समर के अनुसार
सम्प्रेषण दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच विचारों, तथ्यों, मतों तथा भावनाओं के आदान-प्रदान की कला है।
कीथ डेविस के अनुसार
सम्प्रेषण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक सूचना और समझ पहुँचाने की प्रक्रिया है।
सम्प्रेषण की प्रकृति एवं विशेषताएँ
- सम्प्रेषण एक उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है। प्रत्येक सम्प्रेषण के पीछे सूचना देना, विचार साझा करना, निर्देश देना अथवा किसी प्रतिक्रिया को प्राप्त करना जैसे उद्देश्य होते हैं।
- सम्प्रेषण पारस्परिक समन्वय स्थापित करने की प्रक्रिया है। इसके माध्यम से दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं का सम्बन्ध स्थापित होता है।
- सम्प्रेषण में विचार-विमर्श तथा विचार-विनिमय को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इससे एक-दूसरे की बात समझने और उचित प्रतिक्रिया देने में सहायता मिलती है।
- प्रभावशाली सम्प्रेषण उत्तम शिक्षण का आवश्यक पक्ष है। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच स्पष्ट सम्प्रेषण के बिना शिक्षण-अधिगम प्रभावी नहीं हो सकता।
- सम्प्रेषण सामाजिक एवं मानवीय वातावरण को सुचारु रूप से संचालित करने में सहायक होता है। इसमें भावनाएँ, विचार, संवेग, सूचनाएँ और संवेदनाएँ भी सम्मिलित होती हैं।
- सम्प्रेषण एक गतिशील (Dynamic) प्रक्रिया है। इसमें प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच निरन्तर अन्तःक्रिया और पृष्ठपोषण होता है।
- प्रभावी सम्प्रेषण में प्राप्तकर्ता द्वारा संदेश का सही प्रत्ययीकरण आवश्यक है। यदि संदेश को उचित अर्थ में न समझा जाए तो सम्प्रेषण सफल नहीं माना जा सकता।
- सूचनाएँ वस्तुनिष्ठ हो सकती हैं, परन्तु सम्प्रेषण में व्यक्ति की व्यक्तिगत व्याख्या भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- सम्प्रेषण सामान्यतः द्विपक्षीय प्रक्रिया है। इसमें एक पक्ष संदेश देता है और दूसरा उसे ग्रहण करके प्रतिक्रिया देता है।
सम्प्रेषण की आवश्यकता एवं महत्त्व
व्यक्तिगत जीवन, सामाजिक सम्बन्धों और शिक्षा में सम्प्रेषण की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसकी आवश्यकता निम्नलिखित रूपों में स्पष्ट होती है—
1. विचारों के स्थानान्तरण के लिए
हर व्यक्ति के पास अपने विचार और अनुभव होते हैं। सम्प्रेषण के माध्यम से इन्हें एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाया जा सकता है तथा उपयोगी विचारों को व्यवहार में लागू किया जा सकता है।
2. सामाजिक पारस्परिक प्रभाव के लिए
मनुष्य समाज में रहते हुए अन्य लोगों के साथ निरन्तर विचारों और प्रतिक्रियाओं का आदान-प्रदान करता है। स्वस्थ सामाजिक सम्बन्धों और सहयोग के लिए प्रभावी सम्प्रेषण आवश्यक है।
3. शिक्षा के लिए
शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच पाठ्यवस्तु, विचारों और अनुभवों का आदान-प्रदान सम्प्रेषण द्वारा होता है। ऑडियो, वीडियो, पुस्तक और व्याख्यान जैसे माध्यम शिक्षण सम्प्रेषण को प्रभावी बनाते हैं।
4. स्वयं को अद्यतन रखने के लिए
सम्प्रेषण के माध्यम से व्यक्ति वर्तमान घटनाओं, नई सूचनाओं और विश्व में हो रहे परिवर्तनों से परिचित रहता है। इस प्रकार यह व्यक्ति को समय के अनुसार स्वयं को अद्यतन रखने में सहायता करता है।
5. मनोरंजन के लिए
फिल्म, नाटक तथा अन्य मनोरंजनात्मक कार्यक्रम भी सम्प्रेषण के माध्यम से ही लोगों तक पहुँचते हैं। इसलिए आधुनिक जीवन में मनोरंजन और सम्प्रेषण एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।
6. वैश्विक जानकारी के लिए
सम्प्रेषण व्यक्ति को अपने सीमित परिवेश से बाहर विश्व की घटनाओं और परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त करने में सहायता करता है। इसके द्वारा विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित ज्ञान तथा जीवनोपयोगी सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं।
शिक्षा में सम्प्रेषण का विशेष महत्त्व
- शिक्षक अपने ज्ञान और विचारों को विद्यार्थियों तक प्रभावी ढंग से पहुँचा सकता है।
- विद्यार्थी अपनी जिज्ञासाएँ, समस्याएँ तथा प्रतिक्रियाएँ शिक्षक के सामने प्रस्तुत कर सकते हैं।
- शिक्षक को विद्यार्थियों के अधिगम की स्थिति जानने में सहायता मिलती है।
- प्रभावी सम्प्रेषण से कक्षा में सक्रिय सहभागिता, समझ और पारस्परिक विश्वास विकसित होता है।
- विभिन्न शाब्दिक और अशाब्दिक माध्यम शिक्षण को अधिक स्पष्ट, सरल और प्रभावपूर्ण बनाते हैं।
- सम्प्रेषण शब्द लैटिन के Communis शब्द से बना है, जिसका अर्थ सामान्य या साझा होता है।
- सम्प्रेषण विचारों, सूचनाओं, भावनाओं और अनुभवों के पारस्परिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया है।
- सम्प्रेषण उद्देश्यपूर्ण, गतिशील, अन्तःक्रियात्मक तथा सामान्यतः द्विपक्षीय प्रक्रिया है।
- प्रभावी सम्प्रेषण में प्रेषक के साथ प्राप्तकर्ता द्वारा संदेश को सही अर्थ में समझना भी आवश्यक है।
- सम्प्रेषण विचारों के स्थानान्तरण, सामाजिक सम्बन्ध, शिक्षा, स्वयं को अद्यतन रखने, मनोरंजन तथा वैश्विक जानकारी के लिए आवश्यक है।
- शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच प्रभावी सम्प्रेषण उत्तम शिक्षण का आवश्यक आधार है।
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सम्प्रेषण की प्रक्रिया एवं घटक—प्रेषक, संदेश, माध्यम, ग्राही एवं प्रतिपुष्टि
सम्प्रेषण की प्रक्रिया
सम्प्रेषण एक सामाजिक एवं द्विपक्षीय प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से व्यक्तियों के बीच विचारों, सूचनाओं और भावनाओं का आदान-प्रदान होता है। इसके द्वारा व्यक्तियों के बीच मानवीय सम्बन्ध स्थापित होते हैं और वे एक-दूसरे के विचारों को समझ पाते हैं।
सम्प्रेषण प्रक्रिया में किसी विचार या संदेश को स्रोत से प्राप्तकर्ता तक पहुँचाया जाता है। प्राप्तकर्ता संदेश को ग्रहण करता है और उसके बाद अपनी प्रतिक्रिया देता है। इस प्रतिक्रिया से यह ज्ञात होता है कि संदेश सही प्रकार से समझा गया है या नहीं।
सम्प्रेषण प्रक्रिया का क्रम
सम्प्रेषण की प्रक्रिया को सरल रूप में निम्न क्रम से समझा जा सकता है—
प्रेषक → संदेश → माध्यम → ग्राही → प्रतिपुष्टि → प्रेषक
यह क्रम सम्प्रेषण को एक निरन्तर प्रक्रिया बनाता है। प्रतिपुष्टि प्राप्त होने पर प्रेषक यह समझ सकता है कि उसका संदेश कितना प्रभावी रहा।
सम्प्रेषण के प्रमुख घटक
सम्प्रेषण की प्रक्रिया में मुख्य रूप से निम्नलिखित पाँच घटक कार्य करते हैं—
- प्रेषक (Sender or Communicator)
- संदेश (Message)
- माध्यम (Media)
- ग्राही (Achiever/Receiver)
- प्रतिपुष्टि (Feedback)
1. प्रेषक (Sender or Communicator)
सम्प्रेषण की प्रक्रिया जिस व्यक्ति से प्रारम्भ होती है, उसे प्रेषक कहते हैं। प्रेषक अपने विचारों, भावनाओं, सूचनाओं या ज्ञान को किसी दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाता है।
शिक्षण-सम्प्रेषण में सामान्यतः शिक्षक प्रेषक की भूमिका निभाता है। प्रभावी सम्प्रेषण के लिए प्रेषक में सामाजिक निष्पक्षता होनी चाहिए तथा उसका संदेश प्रेम, सहानुभूति, सहयोग, सह-अस्तित्व और आपसी सौहार्द को बढ़ाने वाला होना चाहिए।
शिक्षण में प्रेषक को ध्यान रखने योग्य बातें
शिक्षक जब प्रेषक की भूमिका निभाता है, तब उसे विद्यार्थियों और शिक्षण की परिस्थितियों से सम्बन्धित निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए—
- बालकों का बौद्धिक स्तर।
- शिक्षण के उद्देश्यों की स्पष्ट जानकारी।
- स्वयं का व्यक्तित्व।
- उपयुक्त विषय-सामग्री का चयन।
- पाठ-योजना का उचित निर्माण।
- उचित शिक्षण-विधियों एवं सहायक सामग्री का प्रयोग।
- विद्यार्थियों की वैयक्तिक भिन्नताओं का ध्यान।
- कक्षा-कक्ष का वातावरण।
- बालक का मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य।
- विभिन्न विषयों के सह-सम्बन्ध को ध्यान में रखते हुए शिक्षण-सम्प्रेषण।
इस प्रकार प्रभावी प्रेषक वही है जो संदेश देने से पहले प्राप्तकर्ता की योग्यता, आवश्यकता, रुचि तथा परिस्थिति को समझता है।
2. संदेश (Message)
सम्प्रेषण प्रक्रिया में प्रेषक द्वारा ग्राही तक पहुँचाई जाने वाली विचार, सूचना, ज्ञान या विषय-वस्तु को संदेश कहते हैं। संदेश सम्प्रेषण प्रक्रिया का मुख्य विषय होता है।
शैक्षिक सम्प्रेषण में पाठ्यवस्तु अथवा शिक्षक द्वारा विद्यार्थियों को दिया जाने वाला ज्ञान संदेश का रूप लेता है। शिक्षक अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर संदेश को विद्यार्थियों तक पहुँचाता है।
उदाहरण के लिए यदि शिक्षक विद्यार्थियों को किसी शब्द का शुद्ध उच्चारण और लेखन सिखाना चाहता है, तो उस शब्द से सम्बन्धित ज्ञान उसका संदेश होगा। यदि विद्यार्थी उसे ठीक प्रकार से न समझ पाए तो शिक्षक उदाहरण, श्यामपट्ट या चार्ट की सहायता से संदेश को अधिक स्पष्ट कर सकता है।
3. माध्यम (Media)
जिस साधन की सहायता से संदेश को प्रेषक से ग्राही तक पहुँचाया जाता है, उसे माध्यम कहते हैं। माध्यम प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच संपर्क स्थापित करने का कार्य करता है।
सम्प्रेषण के लिए रेडियो, टेलीविजन, ओवरहेड प्रोजेक्टर, टेलीफोन आदि विभिन्न माध्यमों का प्रयोग किया जा सकता है। आवश्यकता के अनुसार एक माध्यम अथवा अनेक माध्यमों का संयुक्त रूप से भी प्रयोग किया जा सकता है।
एक प्रभावी माध्यम सर्वसुलभ, सस्ता, लोकप्रिय, व्यावहारिक तथा क्रियाविधि के अनुकूल होना चाहिए। माध्यम का चयन संदेश और प्राप्तकर्ता की आवश्यकता के अनुसार किया जाना चाहिए।
4. ग्राही (Achiever/Receiver)
प्रेषक द्वारा भेजे गए संदेश को जो व्यक्ति ग्रहण करता है, उसे ग्राही या प्राप्तकर्ता कहते हैं। शिक्षण-सम्प्रेषण में सामान्यतः विद्यार्थी ग्राही की भूमिका निभाता है।
सम्प्रेषण तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक संदेश प्राप्तकर्ता तक पहुँचकर उसके द्वारा ग्रहण और समझ न लिया जाए। इसलिए सम्प्रेषण की सफलता केवल संदेश भेजने पर नहीं, बल्कि उसे सही प्रकार से ग्रहण करने पर भी निर्भर करती है।
शिक्षक विद्यार्थियों की सहभागिता, उत्तरों और व्यवहार को देखकर यह जान सकता है कि उन्होंने विषय को कितना समझा है। यदि किसी विद्यार्थी की उपलब्धि कम हो तो शिक्षक उसकी आवश्यकता और प्रकृति के अनुसार व्यक्तिगत ध्यान देकर कमी को दूर कर सकता है।
ग्राही को प्रापक, प्राप्तकर्ता, ग्रहणकर्ता या विषयी आदि नामों से भी सम्बोधित किया जाता है।
5. प्रतिपुष्टि (Feedback)
सन्देश प्राप्त करने वाले व्यक्ति द्वारा प्रेषक को दी जाने वाली प्रतिक्रिया को प्रतिपुष्टि (Feedback) कहते हैं। इससे प्रेषक को यह पता चलता है कि उसका संदेश प्राप्तकर्ता ने सही प्रकार से समझा है या नहीं।
अधिगम में जिस प्रकार विद्यार्थी को बीच-बीच में पुनर्बलन देकर सीखने की दिशा में आगे बढ़ाया जाता है, उसी प्रकार सम्प्रेषण में भी समय-समय पर प्रतिपुष्टि आवश्यक होती है। इससे सम्प्रेषण में निरन्तरता, क्रमबद्धता तथा ध्यान की एकाग्रता बनी रहती है।
प्रतिपुष्टि से ग्राही में नई ऊर्जा और संचार उत्पन्न होता है। वह प्राप्त संदेश को व्यवहार में प्रयोग करने की ओर प्रेरित होता है तथा उसकी ज्ञानात्मक और भावात्मक विचारधाराएँ क्रियात्मकता की ओर अग्रसर होती हैं।
शिक्षण में प्रतिपुष्टि का महत्त्व
- शिक्षक को यह ज्ञात होता है कि विद्यार्थी ने विषय को कितना समझा है।
- विद्यार्थियों की कठिनाइयों और कमियों की पहचान की जा सकती है।
- आवश्यकता के अनुसार शिक्षण-विधि या प्रस्तुतीकरण में सुधार किया जा सकता है।
- विद्यार्थी को सीखने की सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए सहायता मिलती है।
सम्प्रेषण प्रक्रिया को सरल उदाहरण से समझें
यदि शिक्षक किसी पाठ का ज्ञान विद्यार्थियों को देता है, तो शिक्षक प्रेषक, पढ़ाई जाने वाली पाठ्यवस्तु संदेश, भाषा अथवा प्रयुक्त शिक्षण-साधन माध्यम और विद्यार्थी ग्राही होता है। विद्यार्थी द्वारा उत्तर देना, प्रश्न पूछना अथवा अन्य प्रतिक्रिया व्यक्त करना प्रतिपुष्टि कहलाता है।
इस प्रकार सम्प्रेषण तभी प्रभावी और पूर्ण होता है जब प्रेषक द्वारा दिया गया संदेश उचित माध्यम से ग्राही तक पहुँचे, ग्राही उसे समझे तथा उसकी प्रतिक्रिया पुनः प्रेषक तक पहुँचे।
- सम्प्रेषण एक द्विपक्षीय प्रक्रिया है जिसमें विचारों, सूचनाओं और भावनाओं का आदान-प्रदान होता है।
- सम्प्रेषण प्रक्रिया का क्रम है—प्रेषक → संदेश → माध्यम → ग्राही → प्रतिपुष्टि।
- प्रेषक सम्प्रेषण का प्रारम्भिक बिन्दु है और शिक्षण में सामान्यतः शिक्षक प्रेषक होता है।
- प्रेषक द्वारा दी जाने वाली सूचना, ज्ञान या विषय-वस्तु संदेश कहलाती है तथा उसे पहुँचाने वाला साधन माध्यम होता है।
- संदेश को ग्रहण करने वाला व्यक्ति ग्राही कहलाता है; शिक्षण में विद्यार्थी मुख्यतः ग्राही की भूमिका निभाता है।
- ग्राही द्वारा प्रेषक को दी गई प्रतिक्रिया प्रतिपुष्टि कहलाती है, जिससे सम्प्रेषण की प्रभावशीलता का पता चलता है।
सम्प्रेषण के सिद्धान्त एवं प्रकार
सम्प्रेषण के सिद्धान्त
सम्प्रेषण एक द्विपक्षीय अथवा बहुपक्षीय प्रक्रिया है, जिसमें प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। सम्प्रेषण को उद्देश्यपूर्ण, स्पष्ट और प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ सिद्धान्तों का पालन आवश्यक होता है।
1. अभिप्रेरणा एवं तत्परता का सिद्धान्त
प्रभावी सम्प्रेषण के लिए सम्प्रेषणकर्ता और प्राप्तकर्ता दोनों का सजग, तत्पर तथा अभिप्रेरित होना आवश्यक है। यदि दोनों में से कोई एक भी सम्प्रेषण में रुचि नहीं लेता, तो संदेश का अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता।
शिक्षण में इसका अर्थ है कि शिक्षक को विद्यार्थियों में सीखने की इच्छा उत्पन्न करनी चाहिए और विद्यार्थियों को भी संदेश ग्रहण करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए।
2. सक्षमता एवं योग्यता का सिद्धान्त
उत्तम सम्प्रेषण के लिए प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों में आवश्यक योग्यता एवं क्षमता होनी चाहिए। शिक्षक को अपने विषय का उचित ज्ञान और सम्प्रेषण-कौशल होना चाहिए तथा विद्यार्थी में भी संदेश को समझने की आवश्यक योग्यता होनी चाहिए।
यदि शिक्षक विषय को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं कर पाता अथवा विद्यार्थी उसकी बात को समझने की स्थिति में नहीं है, तो सम्प्रेषण प्रभावी नहीं हो सकता।
3. भागीदारी एवं अन्तःक्रिया का सिद्धान्त
सम्प्रेषण एक द्विपक्षीय प्रक्रिया है, इसलिए इसमें दोनों पक्षों की सक्रिय भागीदारी और अन्तःक्रिया आवश्यक है। कक्षा में शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच उचित प्रश्नोत्तर, विचार-विनिमय और सहभागिता सम्प्रेषण को अधिक प्रभावशाली बनाती है।
सम्प्रेषण में जितनी अधिक सार्थक भागीदारी होगी, उसका प्रभाव भी उतना ही अधिक होगा।
4. सम्प्रेषण सामग्री की उपयुक्तता का सिद्धान्त
सम्प्रेषण में दी जाने वाली सामग्री प्राप्तकर्ता की योग्यता, क्षमता और ज्ञान के अनुरूप होनी चाहिए। अनुपयुक्त अथवा कठिन सामग्री सम्प्रेषण के उद्देश्य को प्रभावित कर सकती है।
सम्प्रेषण सामग्री का चयन उद्देश्य, उपलब्ध परिस्थितियों, माध्यम तथा विद्यार्थियों की योग्यता और ज्ञान को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
5. उचित प्रतिपुष्टि का सिद्धान्त
सम्प्रेषण प्रभावी हुआ है या नहीं, इसकी जानकारी प्रतिपुष्टि (Feedback) से प्राप्त होती है। प्राप्तकर्ता की प्रतिक्रिया से प्रेषक यह समझ सकता है कि संदेश सही रूप में ग्रहण किया गया है या उसमें सुधार की आवश्यकता है।
कक्षा में विद्यार्थियों के उत्तर, प्रश्न, रुचि तथा सहभागिता शिक्षक को प्रतिपुष्टि प्रदान करते हैं। इससे शिक्षक अपनी सम्प्रेषण प्रक्रिया में आवश्यक सुधार कर सकता है।
6. सहायक एवं बाधक तत्त्वों का सिद्धान्त
सम्प्रेषण की प्रक्रिया अनेक परिस्थितियों और तत्त्वों से प्रभावित होती है। कुछ तत्त्व सम्प्रेषण में सहायता करते हैं, जबकि कुछ बाधा उत्पन्न करते हैं।
शोर, प्रकाश का अभाव तथा देखने-सुनने में होने वाली कठिनाइयाँ सम्प्रेषण में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं। इसलिए प्रभावशाली सम्प्रेषण के लिए बाधक तत्त्वों को यथासम्भव कम करना आवश्यक है।
7. सम्प्रेषण माध्यम की उपयुक्तता का सिद्धान्त
सम्प्रेषण माध्यम प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच संदेश पहुँचाने वाली कड़ी है। माध्यम जितना अधिक उपयुक्त और सशक्त होगा, सम्प्रेषण उतना ही प्रभावशाली होगा।
कक्षा में शिक्षक को आवश्यकता के अनुसार शाब्दिक तथा अशाब्दिक माध्यमों का प्रयोग करना चाहिए। सम्प्रेषण को निरन्तर, प्रभावपूर्ण और सजीव बनाने के लिए दृश्य, श्रव्य तथा अन्य संवेदनात्मक साधनों का भी उचित प्रयोग किया जा सकता है।
सम्प्रेषण के प्रकार
शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सक्रिय और प्रभावशाली बनाने के लिए सम्प्रेषण की निरन्तरता आवश्यक है। सम्प्रेषण को मुख्यतः दो प्रकारों में विभाजित किया गया है—
- शाब्दिक सम्प्रेषण (Verbal Communication)
- अशाब्दिक सम्प्रेषण (Non-Verbal Communication)
1. शाब्दिक सम्प्रेषण
जिस सम्प्रेषण में संदेश के आदान-प्रदान के लिए भाषा और शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उसे शाब्दिक सम्प्रेषण कहते हैं। इसके माध्यम से विचारों, तथ्यों और भावनाओं को स्पष्ट रूप से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाया जाता है।
शाब्दिक सम्प्रेषण के दो प्रमुख प्रकार हैं—
(i) मौखिक सम्प्रेषण
जिस सम्प्रेषण में तथ्यों और सूचनाओं का आदान-प्रदान बोलकर किया जाता है, उसे मौखिक सम्प्रेषण कहते हैं। इसमें सामान्यतः सूचना देने वाला और सूचना प्राप्त करने वाला एक-दूसरे के सामने होते हैं।
व्याख्या, वार्ता, परिचर्चा, सामूहिक चर्चा, प्रश्नोत्तर तथा कहानी आदि मौखिक सम्प्रेषण के प्रमुख उदाहरण हैं।
(ii) लिखित सम्प्रेषण
जिस सम्प्रेषण में संदेश को लिखित शब्दों अथवा संकेतों के माध्यम से पहुँचाया जाता है, उसे लिखित सम्प्रेषण कहते हैं। इसमें संदेश देने वाले और प्राप्त करने वाले का एक-दूसरे के सामने उपस्थित होना आवश्यक नहीं है।
लिखित सम्प्रेषण की भाषा सरल, सुगम और बोधगम्य होनी चाहिए, जिससे प्राप्तकर्ता संदेश का सही अर्थ आसानी से समझ सके।
2. अशाब्दिक सम्प्रेषण
जिस सम्प्रेषण में विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सामान्य भाषा या लिखित शब्दों के स्थान पर अन्य संकेतों का प्रयोग किया जाता है, उसे अशाब्दिक सम्प्रेषण कहते हैं।
अशाब्दिक सम्प्रेषण के प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं—
(i) वाणी संकेत
इस प्रकार के सम्प्रेषण में व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं की अभिव्यक्ति व्यक्तिगत रूप से अथवा छोटे समूहों में आमने-सामने रहकर वाणी के माध्यम से करता है।
(ii) चक्षु सम्पर्क एवं मुख-मुद्राएँ
चक्षु सम्पर्क और मुख-मुद्राएँ अशाब्दिक सम्प्रेषण में अत्यन्त प्रभावशाली मानी जाती हैं। शिक्षक विद्यार्थियों के चेहरे और आँखों के भावों को देखकर उनकी मानसिक स्थिति और प्रतिक्रिया का अनुमान लगा सकता है।
मुख-मुद्राओं से प्रसन्नता, भय, क्रोध, शोक और आश्चर्य आदि भाव व्यक्त किए जा सकते हैं। इस प्रकार बिना स्पष्ट शब्दों के भी अनेक भावों का सम्प्रेषण सम्भव होता है।
(iii) स्पर्श सम्पर्क
जिस सम्प्रेषण में स्पर्श को भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जाता है, उसे स्पर्श सम्पर्क कहते हैं।
उदाहरण के लिए हाथ मिलाने के ढंग से व्यक्ति मैत्री या अन्य भावों का संकेत दे सकता है। दृष्टिहीन बालकों के लिए स्पर्श सम्पर्क विशेष रूप से उपयोगी माना गया है।
सम्प्रेषण के प्रकारों का संक्षिप्त वर्गीकरण
| मुख्य प्रकार | उप-प्रकार |
|---|---|
| शाब्दिक सम्प्रेषण | मौखिक सम्प्रेषण, लिखित सम्प्रेषण |
| अशाब्दिक सम्प्रेषण | वाणी संकेत, चक्षु सम्पर्क एवं मुख-मुद्राएँ, स्पर्श सम्पर्क |
शाब्दिक एवं अशाब्दिक सम्प्रेषण में मूल अन्तर
| शाब्दिक सम्प्रेषण | अशाब्दिक सम्प्रेषण |
|---|---|
| संदेश के लिए भाषा एवं शब्दों का प्रयोग किया जाता है। | संदेश के लिए विभिन्न संकेतों, मुख-मुद्राओं, चक्षु सम्पर्क अथवा स्पर्श आदि का प्रयोग किया जाता है। |
| यह मौखिक अथवा लिखित रूप में हो सकता है। | यह शब्दों के सामान्य प्रयोग के बिना भी भावों एवं विचारों को व्यक्त कर सकता है। |
| विचारों और सूचनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में उपयोगी है। | भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को व्यक्त करने में विशेष रूप से उपयोगी है। |
- प्रभावी सम्प्रेषण के लिए प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों का अभिप्रेरित, तत्पर और सक्षम होना आवश्यक है।
- सम्प्रेषण में भागीदारी, उचित सामग्री, प्रतिपुष्टि तथा उपयुक्त माध्यम महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- सम्प्रेषण में उपस्थित बाधक तत्त्वों को कम करने से उसकी प्रभावशीलता बढ़ती है।
- सम्प्रेषण के दो मुख्य प्रकार—शाब्दिक और अशाब्दिक सम्प्रेषण हैं।
- शाब्दिक सम्प्रेषण के दो रूप मौखिक और लिखित सम्प्रेषण हैं।
- अशाब्दिक सम्प्रेषण में वाणी संकेत, चक्षु सम्पर्क एवं मुख-मुद्राएँ तथा स्पर्श सम्पर्क सम्मिलित हैं।
शैक्षिक सम्प्रेषण—वैयक्तिक एवं सामूहिक सम्प्रेषण तथा उनके गुण-दोष
शैक्षिक सम्प्रेषण का अर्थ
शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच ज्ञान, विचार, निर्देश तथा अनुभवों का जो आदान-प्रदान होता है, उसे शैक्षिक सम्प्रेषण (Educational Communication) कहा जाता है। इसके माध्यम से शिक्षक विद्यार्थियों तक विषय-वस्तु पहुँचाता है और उनकी आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण प्रदान करता है।
शैक्षिक सम्प्रेषण मुख्यतः दो प्रकार का होता है—
- वैयक्तिक सम्प्रेषण (Individual Communication)
- सामूहिक सम्प्रेषण (Collective Communication)
1. वैयक्तिक सम्प्रेषण
जब शिक्षक प्रत्येक विद्यार्थी को व्यक्तिगत रूप से अलग-अलग शिक्षण प्रदान करता है, तो उसे वैयक्तिक सम्प्रेषण कहते हैं। इसमें शिक्षक एक समय में किसी विशेष विद्यार्थी की रुचि, आवश्यकता, योग्यता और मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर शिक्षण करता है।
ए. पी. मेलविन के अनुसार
वैयक्तिक सम्प्रेषण का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत वार्तालाप और विचारों के आदान-प्रदान द्वारा बालक की अध्ययन में सहायता करना तथा उसे आवश्यक आदेश और निर्देशन प्रदान करना है। इसके लिए शिक्षक प्रत्येक विद्यार्थी से अलग-अलग सम्पर्क करता है।
वैयक्तिक सम्प्रेषण के उद्देश्य
- विद्यार्थियों की वैयक्तिक भिन्नताओं, रुचियों, अभिरुचियों, आवश्यकताओं तथा मानसिक योग्यताओं के अनुसार शिक्षण प्रदान करना।
- विद्यार्थियों की विशिष्ट योग्यताओं तथा व्यक्तित्व का विकास करना।
- विद्यार्थियों को सक्रिय एवं क्रियाशील बनने के अवसर प्रदान करना।
- विशिष्ट योग्यता वाले बालकों को उनकी रुचि के अनुसार किसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर देना।
- सामान्य विद्यार्थियों को भी आवश्यकतानुसार व्यक्तिगत सम्प्रेषण प्रदान करना।
वैयक्तिक सम्प्रेषण के गुण
- विद्यार्थी को क्रियाशील बनाकर अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
- शिक्षण विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं के आधार पर प्रदान किया जाता है।
- इसमें शिक्षण का केन्द्र-बिन्दु बालक होता है, इसलिए यह बालकेन्द्रित मनोवैज्ञानिक विधि है।
- शिक्षक के व्यक्तित्व का प्रभाव विद्यार्थी के व्यक्तित्व पर पड़ता है।
- यह अधिगम के वैयक्तिक सिद्धान्त पर आधारित होता है।
- बालक की प्रकृति और आवश्यकता के अनुसार शिक्षण प्रदान किया जाता है।
- यह मन्दबुद्धि तथा प्रखरबुद्धि दोनों प्रकार के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकता है।
- शिक्षक प्रत्येक विद्यार्थी पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान दे सकता है।
- इसमें विद्यार्थी को स्वयं करके सीखने का अवसर मिलता है।
- व्यक्तिगत सम्पर्क के कारण विद्यार्थी अधिक प्रभावित होते हैं और शीघ्र सीख सकते हैं।
वैयक्तिक सम्प्रेषण के दोष
- प्रत्येक विद्यार्थी के लिए अलग-अलग शिक्षक अथवा व्यक्तिगत व्यवस्था करना कठिन होता है।
- यह अत्यधिक खर्चीली विधि है, इसलिए प्रत्येक समाज में इसकी व्यवस्था करना सम्भव नहीं होता।
- व्यक्तिगत शिक्षण के कारण विद्यार्थियों में सामाजिकता के गुणों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाता।
- इसमें शिक्षक और विद्यार्थी दोनों के समय का अधिक व्यय होता है।
- संगीत, गायन और वादन जैसे कुछ विषयों को व्यक्तिगत रूप से पढ़ाने पर विद्यार्थियों में नीरसता उत्पन्न हो सकती है।
- यह विधि कई परिस्थितियों में अव्यावहारिक सिद्ध हो सकती है।
- इससे विद्यार्थियों में प्रेरणा, प्रोत्साहन और प्रतिस्पर्धा जैसे सामाजिक भावों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाता।
- अधिक व्यक्तिगत शिक्षण से विद्यार्थी का दृष्टिकोण संकुचित हो सकता है।
- प्रत्येक विद्यार्थी के लिए यह विधि समान रूप से उपयुक्त नहीं होती।
2. सामूहिक सम्प्रेषण
सामूहिक सम्प्रेषण का अभिप्राय सामान्यतः कक्षा-शिक्षण से है। इसमें समान अथवा लगभग समान मानसिक क्षमता वाले विद्यार्थियों के समूह बनाए जाते हैं और शिक्षक पूरी कक्षा को एक साथ शिक्षण प्रदान करता है।
कक्षा एक सामूहिक इकाई होती है। शिक्षक कक्षा के सभी विद्यार्थियों को एक साथ विषय-वस्तु प्रस्तुत करता है और विद्यार्थी भी सामूहिक रूप से शिक्षक से सम्प्रेषण करते हैं।
सामूहिक सम्प्रेषण के गुण
- यह सरल एवं व्यावहारिक विधि है।
- सामूहिक शिक्षण से विद्यार्थियों में नेतृत्व के गुण विकसित होते हैं।
- विद्यार्थियों में तर्क, चिन्तन तथा कल्पना-शक्ति का विकास होता है।
- विद्यार्थियों को सुझाव एवं नवीन ज्ञान प्राप्त होता है।
- इसका प्रयोग अधिकांश विषयों के शिक्षण में किया जा सकता है।
- विद्यार्थी सामूहिक भावना से कार्य करना सीखते हैं तथा उनमें प्रतियोगिता एवं प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होती है।
- विद्यार्थियों में सम्प्रेषण की भावना तथा प्रश्नों के उत्तर देने की प्रवृत्ति का विकास होता है।
- यह विद्यार्थियों को योग्य नागरिक बनने तथा भावी जीवन के लिए तैयार करने में सहायक है।
- विद्यार्थियों में अनुकरण की भावना का विकास होता है।
- यह सरल होने के साथ अपेक्षाकृत कम खर्चीली विधि है।
सामूहिक सम्प्रेषण के दोष
- एक ही शिक्षक पूरी कक्षा को सामूहिक रूप से पढ़ाता है, इसलिए शिक्षक और प्रत्येक विद्यार्थी के बीच व्यक्तिगत सम्प्रेषण पर्याप्त रूप से नहीं हो पाता।
- विद्यार्थियों की अलग-अलग रुचियों, अभिरुचियों और आवश्यकताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
- व्यक्तिगत सम्पर्क के अभाव में विद्यार्थियों की कुछ शैक्षिक समस्याओं का उचित समाधान नहीं हो पाता।
- यह विधि कक्षा-केंद्रित हो सकती है, जबकि शिक्षण को बालकेन्द्रित होना चाहिए।
- विशिष्ट आवश्यकता या योग्यता वाले विद्यार्थियों के लिए यह विधि हमेशा उपयुक्त नहीं होती।
- इसमें वैयक्तिक भिन्नताओं की उपेक्षा हो सकती है और सभी विद्यार्थियों को समान रूप से शिक्षण दिया जाता है।
- समय-सारणी और निर्धारित पाठ्यक्रम के कारण शिक्षक और विद्यार्थी एक निश्चित दायरे में बँध जाते हैं। इससे अन्य गतिविधियों एवं अनुभवों की ओर ध्यान कम हो सकता है।
वैयक्तिक एवं सामूहिक सम्प्रेषण का मूल आधार
वैयक्तिक सम्प्रेषण में मुख्य ध्यान एक विद्यार्थी की व्यक्तिगत आवश्यकता पर रहता है, जबकि सामूहिक सम्प्रेषण में पूरी कक्षा या समूह को एक साथ शिक्षण प्रदान किया जाता है। दोनों विधियों का उपयोग विद्यार्थियों की संख्या, आवश्यकता, विषय-वस्तु तथा शिक्षण-परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है।
- शैक्षिक सम्प्रेषण मुख्यतः वैयक्तिक और सामूहिक दो प्रकार का होता है।
- वैयक्तिक सम्प्रेषण में प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी रुचि, आवश्यकता, योग्यता और वैयक्तिक भिन्नता के अनुसार शिक्षण दिया जाता है।
- वैयक्तिक सम्प्रेषण बालकेन्द्रित एवं मनोवैज्ञानिक है, परन्तु यह खर्चीला और समय लेने वाला होता है।
- सामूहिक सम्प्रेषण में शिक्षक पूरी कक्षा को एक साथ शिक्षण प्रदान करता है।
- सामूहिक सम्प्रेषण सरल, व्यावहारिक और कम खर्चीला है तथा नेतृत्व, तर्क, चिन्तन, सहयोग और प्रतिस्पर्धा के विकास में सहायक है।
- सामूहिक सम्प्रेषण की प्रमुख सीमा यह है कि इसमें वैयक्तिक भिन्नताओं और व्यक्तिगत समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा सकता।
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सम्प्रेषण के कार्य, कारक एवं शिक्षण में उपयोगिता
सम्प्रेषण के कार्य
सम्प्रेषण के माध्यम से व्यक्ति सूचना देता है, विचारों का विनिमय करता है, दूसरों की बातें सुनता है तथा अपने विचार और भावनाएँ दूसरों तक पहुँचाता है। इस प्रकार सम्प्रेषण सामाजिक सम्बन्धों और पारस्परिक समझ को विकसित करने वाली महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।
सम्प्रेषण के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—
- सम्प्रेषण के माध्यम से व्यक्ति एक-दूसरे को सूचनाएँ प्रदान करते और प्राप्त करते हैं। इससे ज्ञान एवं आवश्यक जानकारी का आदान-प्रदान सम्भव होता है।
- सम्प्रेषण द्वारा संदेश, निर्देश अथवा आदेश एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाए जाते हैं। इस प्रकार संदेशों का प्रभावी प्रसारण सम्भव होता है।
- सम्प्रेषण व्यक्तियों में एक-दूसरे के प्रति विश्वास उत्पन्न करने में सहायता करता है। स्पष्ट विचार-विनिमय से पारस्परिक सम्बन्ध मजबूत होते हैं।
- सम्प्रेषण विभिन्न व्यक्तियों के बीच समन्वय स्थापित करता है। इससे वे एक-दूसरे के विचारों को समझकर मिल-जुलकर कार्य कर सकते हैं।
इस प्रकार सम्प्रेषण एक गतिशील, उद्देश्यपूर्ण और द्विपक्षीय प्रक्रिया है, जिसमें सूचना तथा विचारों का प्रेषण और ग्रहण मौखिक, लिखित अथवा विभिन्न संकेतों के माध्यम से होता है।
सम्प्रेषण को प्रभावित करने वाले कारक
प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच सम्प्रेषण करते समय अनेक प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इनसे संदेश का सही अर्थ ग्रहण नहीं हो पाता और सम्प्रेषण की प्रभावशीलता कम हो जाती है।
- संवेग तथा भावनाएँ व्यक्ति की प्रतिक्रिया को प्रभावित करती हैं। अनुकूल शब्दों से सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त होती है, जबकि प्रतिकूल शब्दों से संदेश का अर्थ गलत भी समझा जा सकता है।
- किसी शब्द या वाक्य को उसके परिस्थितिगत सन्दर्भ से अलग करके समझने पर उसका अर्थ बदल सकता है। इसलिए संदेश को उचित सन्दर्भ में समझना आवश्यक है।
- भाषा में एक ही शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं। शब्द का प्रयोग कहाँ और किस उद्देश्य से किया गया है, यह स्पष्ट न होने पर संदेश ग्रहण करने में भ्रम उत्पन्न हो सकता है।
- शोर सम्प्रेषण की प्रमुख बाधाओं में से एक है। अधिक शोर के कारण संदेश ठीक प्रकार से सुनाई नहीं देता और प्राप्तकर्ता गलत अर्थ ग्रहण कर सकता है।
- प्रेषक अथवा प्राप्तकर्ता में रुचि का अभाव होने पर सम्प्रेषण प्रभावहीन और असफल हो सकता है।
- सम्प्रेषण माध्यम प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच सेतु का कार्य करता है। यदि माध्यम कमजोर, निष्क्रिय या अनुपयुक्त हो, तो संदेश का सही आदान-प्रदान नहीं हो पाता।
- सम्प्रेषण सामग्री यदि प्राप्तकर्ता की रुचि, आवश्यकता, योग्यता और क्षमता के अनुरूप न हो, तो सम्प्रेषण का प्रवाह बाधित हो जाता है। अव्यवस्थित या परस्पर विरोधी सामग्री भी भ्रम उत्पन्न कर सकती है।
- वातावरण की प्रतिकूल परिस्थितियाँ सम्प्रेषण की प्रभावशीलता को कम कर सकती हैं। इनमें मौसम की प्रतिकूलता, प्रकाश, बिजली, पानी या वायु जैसी सुविधाओं की कमी, उत्साह एवं प्रेरणा का अभाव तथा पारस्परिक असहयोग या प्रतिस्पर्धापूर्ण व्यवहार सम्मिलित हैं।
- प्राप्तकर्ता में पर्याप्त रुचि, योग्यता या क्षमता का अभाव तथा उसकी प्रतिकूल शारीरिक और मानसिक स्थिति भी सम्प्रेषण में बाधा उत्पन्न कर सकती है।
शिक्षण में सम्प्रेषण की उपयोगिता
कक्षा-शिक्षण मूल रूप से शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच होने वाली सम्प्रेषण प्रक्रिया है। प्रभावी सम्प्रेषण शिक्षण को सक्रिय, स्पष्ट तथा रुचिपूर्ण बनाने में सहायता करता है।
- सम्प्रेषण द्वारा शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच विचारों एवं भावनाओं का आदान-प्रदान होता है।
- प्रतिपुष्टि प्रदान करने में सम्प्रेषण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इससे शिक्षक जान सकता है कि विद्यार्थियों ने विषय को कितना समझा है।
- सम्प्रेषण शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच अन्तःक्रिया स्थापित करने के लिए उत्तरदायी होता है।
- यह कक्षा-अध्यापन में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों पक्षों को क्रियाशील बनाए रखने में सहायता करता है।
- सम्प्रेषण विद्यार्थियों के भाषा-विकास में सहयोग करता है।
- यह विद्यार्थियों को पुनर्बलन तथा प्रेरणा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- सम्प्रेषण द्वारा विद्यार्थियों के शाब्दिक तथा अशाब्दिक सम्प्रेषण अनुभवों में वृद्धि होती है।
- प्रभावी सम्प्रेषण कक्षा-अध्यापन को सक्रिय तथा रुचिपूर्ण बनाने में सहायता करता है।
प्रभावी शिक्षण और सम्प्रेषण का सम्बन्ध
प्रभावी शिक्षण के लिए केवल विषय-ज्ञान पर्याप्त नहीं है। शिक्षक द्वारा दिए गए संदेश का विद्यार्थियों तक स्पष्ट रूप से पहुँचना, विद्यार्थियों द्वारा उसे सही अर्थ में ग्रहण करना तथा उचित प्रतिपुष्टि मिलना भी आवश्यक है।
यदि भाषा अस्पष्ट हो, वातावरण प्रतिकूल हो, माध्यम अनुपयुक्त हो या विद्यार्थियों में रुचि का अभाव हो, तो अच्छा विषय-ज्ञान होने के बावजूद शिक्षण प्रभावी नहीं हो सकता। इसलिए शिक्षण की सफलता में प्रभावी सम्प्रेषण का विशेष स्थान है।
- सम्प्रेषण का प्रमुख कार्य सूचना देना, संदेश एवं निर्देश पहुँचाना, विश्वास उत्पन्न करना तथा व्यक्तियों में समन्वय स्थापित करना है।
- संवेग एवं भावनाएँ, परिस्थितिगत सन्दर्भ, भाषा, शोर और रुचि का अभाव सम्प्रेषण को प्रभावित करते हैं।
- अनुपयुक्त माध्यम, अनुचित सम्प्रेषण सामग्री, प्रतिकूल वातावरण तथा प्राप्तकर्ता सम्बन्धी कमियाँ भी प्रभावी सम्प्रेषण में बाधा डालती हैं।
- शिक्षण में सम्प्रेषण विचारों एवं भावनाओं के आदान-प्रदान तथा प्रतिपुष्टि प्राप्त करने में सहायक होता है।
- सम्प्रेषण शिक्षक और विद्यार्थियों को सक्रिय रखता है तथा भाषा-विकास, पुनर्बलन और प्रेरणा में सहायता करता है।
- प्रभावी सम्प्रेषण कक्षा-शिक्षण को सक्रिय, स्पष्ट एवं रुचिपूर्ण बनाता है।
प्रभावी सम्प्रेषण—विधियाँ, तरीके एवं सम्प्रेषण की बाधाओं का निवारण
प्रभावी सम्प्रेषण का अर्थ
सम्प्रेषण तभी प्रभावी माना जाता है जब प्रेषक का संदेश प्राप्तकर्ता तक स्पष्ट रूप से पहुँचे, वह उसका सही अर्थ समझे और उचित प्रतिक्रिया दे। शिक्षण में प्रभावी सम्प्रेषण के लिए शिक्षक को विद्यार्थियों की रुचि, आवश्यकता, पूर्वज्ञान और कक्षा-परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त विधियों तथा माध्यमों का प्रयोग करना चाहिए।
प्रभावी सम्प्रेषण की विधियाँ
सम्प्रेषण को अधिक सरल, प्रभावी और उपयोगी बनाने के लिए विभिन्न विधियों का विकास हुआ है। इन्हें मुख्यतः निम्नलिखित रूपों में समझा जा सकता है—
1. सम्प्रेषण की परम्परागत विधि
परम्परागत सम्प्रेषण में उन माध्यमों का प्रयोग किया जाता है जो समाज की परम्पराओं और सांस्कृतिक जीवन से जुड़े होते हैं। विशेष रूप से ग्रामीण समाज में इनका महत्त्व अधिक रहा है।
लोक-परम्पराओं के माध्यम से एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी तक अपने सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभवों को पहुँचाती है। इसमें स्वर, संगीत, नृत्य और अभिनय जैसी कलाओं का उपयोग किया जाता है।
कठपुतली का खेल, लोककथा, लोकगाथा, लोकगीत, लोकनाट्य तथा समुदाय-विशेष के नृत्य आदि परम्परागत सम्प्रेषण के प्रमुख साधन हैं। ये संदेश को रोचक और आसानी से समझने योग्य बनाते हैं।
2. सम्प्रेषण की आधुनिक विधि
आधुनिक सम्प्रेषण ने संदेश को एक स्थान से दूर-दूर स्थित अनेक व्यक्तियों तक पहुँचाना सम्भव बनाया है। इससे जनसंचार का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत हुआ है।
समाचार-पत्र जैसे मुद्रित माध्यम, रेडियो जैसे श्रव्य माध्यम तथा टेलीविजन जैसे दृश्य-श्रव्य माध्यम आधुनिक सम्प्रेषण के प्रमुख साधन हैं।
मुद्रित सम्प्रेषण का विकास बहुत पुराना है। सन् 1450 में जॉन गुटेनबर्ग द्वारा मुद्रण कला के विकास ने एक ही संदेश को एक साथ अनेक लोगों तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया। भारत में इस विधि का आगमन लगभग 1780 के आसपास माना गया है।
3. सम्प्रेषण की प्रौद्योगिक सन्दर्भ विधि
प्रौद्योगिकी के विकास के साथ विभिन्न संचार तकनीकों को मिलाकर नए सम्प्रेषण माध्यम विकसित हुए हैं। इन माध्यमों ने संदेश को अधिक तीव्र, व्यापक और प्रभावशाली बनाया है।
नवीन मीडिया में अन्तरवैयक्तिक तथा जनसम्प्रेषण दोनों की विशेषताएँ पाई जाती हैं। आधुनिक तकनीक की सहायता से दूर बैठे व्यक्ति तक ध्वनि, चित्र और शब्दों के माध्यम से तत्काल संदेश पहुँचाया जा सकता है।
प्रभावी सम्प्रेषण के तरीके
कक्षा में प्रभावी सम्प्रेषण के लिए केवल संदेश देना पर्याप्त नहीं है। शिक्षक को सम्पूर्ण शिक्षण वातावरण, विद्यार्थियों की सहभागिता तथा विषय-वस्तु के प्रस्तुतीकरण पर भी ध्यान देना चाहिए।
- सम्प्रेषण उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए। शिक्षण के उद्देश्य पहले से स्पष्ट एवं निश्चित होने चाहिए, क्योंकि उद्देश्यहीन सम्प्रेषण प्रभावी नहीं होता।
- शिक्षण आदेशनात्मक के स्थान पर निर्देशात्मक होना चाहिए। कक्षा का वातावरण कठोरता और नीरसता के बजाय सरलता, सहजता, सौहार्द, स्नेह और सहानुभूति से युक्त होना चाहिए।
- सम्प्रेषण अभिप्रेरणापूर्ण होना चाहिए। इसे विद्यार्थियों के पूर्व अनुभवों, रुचियों और प्रवृत्तियों से जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए।
- सम्प्रेषण बालकेन्द्रित होना चाहिए। विद्यार्थियों की वैयक्तिक भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए उनकी सक्रिय सहभागिता के साथ शिक्षण किया जाना चाहिए।
- सम्प्रेषण सुनियोजित होना चाहिए। शिक्षक को पहले से योजना बनाकर विषय-वस्तु, विधि और आवश्यक साधनों का उचित निर्धारण करना चाहिए।
- कक्षा में प्रजातान्त्रिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। शिक्षक का व्यवहार सभी विद्यार्थियों के प्रति समान होना चाहिए, चाहे वे किसी भी वर्ग, जाति या लिंग के हों।
- शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को सक्रिय रहना चाहिए। एकतरफा सम्प्रेषण में विद्यार्थी निष्क्रिय श्रोता बन जाते हैं, इसलिए प्रश्नोत्तर और सहभागिता आवश्यक है।
- शिक्षक की विषय पर मजबूत पकड़ होनी चाहिए। विषय-वस्तु का क्रम टूटने या अस्पष्ट प्रस्तुतीकरण से विद्यार्थी भ्रमित हो सकते हैं।
- कक्षा में सहयोग की भावना विकसित की जानी चाहिए। शिक्षक और विद्यार्थियों की पारस्परिक सहभागिता से जिज्ञासा तथा शिक्षण के प्रति रुचि बढ़ती है।
- प्रभावी सम्प्रेषण के लिए शिक्षक को पाठ की पूरी तैयारी पहले से करनी चाहिए, ताकि वह विद्यार्थियों की समस्याओं का उचित समाधान कर सके।
- नया ज्ञान विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान से सम्बन्धित होना चाहिए। पाठ शुरू करने से पहले शिक्षक को यह जान लेना चाहिए कि विद्यार्थियों को विषय से सम्बन्धित पहले से कितना ज्ञान है।
- सहायक सामग्री का उचित और समुचित प्रयोग करना चाहिए। श्यामपट्ट, चार्ट, मॉडल, चार्ट-पटिका, फ्लैशकार्ड तथा वीडियो क्लिप आदि शिक्षण को अधिक स्पष्ट और रोचक बना सकते हैं।
- कक्षा का वातावरण अनुशासित होने के साथ स्वतंत्र भी होना चाहिए, ताकि विद्यार्थियों में अधिक रुचि विकसित हो और वे निर्भय होकर भाग ले सकें।
- अच्छी तैयारी शिक्षक में आत्मविश्वास उत्पन्न करती है। आत्मविश्वासी शिक्षक विषय को स्पष्टता से प्रस्तुत कर सकता है और विद्यार्थियों की समस्याओं का समाधान भी बेहतर ढंग से कर सकता है।
- यदि विद्यार्थी दिए गए ज्ञान को ठीक प्रकार ग्रहण नहीं कर पा रहा है, तो शिक्षक को उसकी कमी दूर करने के लिए उपचारात्मक शिक्षण का प्रयोग करना चाहिए।
- विद्यार्थियों को क्रियाशील रहने और अपनी बात कहने के अवसर देने चाहिए। परिचित विषयों पर प्रश्न और बातचीत करने से उनमें शिक्षण के प्रति रुचि और लगन विकसित होती है।
सम्प्रेषण में आने वाली बाधाओं का निवारण
सम्प्रेषण को प्रभावशाली बनाने के लिए केवल उचित संदेश और माध्यम पर्याप्त नहीं हैं। सम्प्रेषण में आने वाली बाधाओं को पहचानकर उन्हें दूर करना भी आवश्यक है।
- सम्प्रेषण में सरल, सुगम, सुबोध और स्पष्ट भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
- संदेश इस प्रकार लिखा या प्रस्तुत किया जाना चाहिए कि प्राप्तकर्ता उसे सरलता से समझ सके।
- सम्प्रेषण प्रक्रिया में बाधक तत्त्वों पर पूरी दृष्टि रखनी चाहिए और उन्हें यथासम्भव दूर करना चाहिए।
- प्रतिपुष्टि की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे यह जाना जा सके कि संदेश सही रूप में समझा गया है या नहीं।
- यदि किसी विशेष बिन्दु पर बल देना हो तो आवश्यक शब्द या विचार की पुनरावृत्ति की जानी चाहिए।
- सम्प्रेषण में आने वाले विलम्बित तत्त्वों पर नियंत्रण रखा जाना चाहिए।
- प्रभावी सम्प्रेषण के लिए व्यक्ति में श्रेष्ठ श्रवणकर्ता के गुण होने चाहिए।
- संदेश को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए, क्योंकि सही श्रवण से ही संदेश का सही अर्थ ग्रहण किया जा सकता है।
- विद्यार्थियों में सक्रिय श्रवण की आदत विकसित की जानी चाहिए।
- एक उत्तम श्रवणकर्ता ही उत्तम सम्प्रेषणकर्ता बन सकता है।
- तथ्यों और संदेश को पूर्ण रूप से सुनना चाहिए। अधूरी जानकारी से गलत अर्थ निकल सकता है।
- लिखित संदेश को गम्भीरता और ध्यान से पढ़ना चाहिए।
- शीघ्रता तथा संवेगों से बचते हुए संदेश को शान्त और विचारपूर्ण ढंग से ग्रहण करना चाहिए।
प्रभावी कक्षा-सम्प्रेषण के लिए मुख्य बात
प्रभावी कक्षा-सम्प्रेषण में शिक्षक को स्पष्ट उद्देश्य, उपयुक्त भाषा, विद्यार्थियों का पूर्वज्ञान, विषय पर पकड़, उचित सहायक सामग्री, सक्रिय सहभागिता तथा प्रतिपुष्टि—इन सभी का समन्वय करना चाहिए। इससे शिक्षण केवल सूचना देने की प्रक्रिया न रहकर वास्तविक अधिगम की प्रक्रिया बन जाता है।
- प्रभावी सम्प्रेषण की प्रमुख विधियाँ—परम्परागत, आधुनिक तथा प्रौद्योगिक सन्दर्भ विधि हैं।
- परम्परागत सम्प्रेषण में लोककथा, लोकगीत, लोकनाट्य, कठपुतली और नृत्य जैसे माध्यमों का प्रयोग होता है।
- आधुनिक सम्प्रेषण में मुद्रित माध्यम, रेडियो तथा टेलीविजन जैसे जनसंचार माध्यमों का विशेष महत्त्व है।
- प्रभावी कक्षा-सम्प्रेषण उद्देश्यपूर्ण, अभिप्रेरणापूर्ण, बालकेन्द्रित, सुनियोजित तथा सक्रिय सहभागिता पर आधारित होना चाहिए।
- शिक्षक को विषय पर मजबूत पकड़, विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान की जानकारी तथा सहायक सामग्री का समुचित प्रयोग करना चाहिए।
- सम्प्रेषण की बाधाएँ दूर करने के लिए स्पष्ट भाषा, उचित प्रतिपुष्टि, ध्यानपूर्वक श्रवण और सक्रिय श्रवण की आदत आवश्यक है।
शिक्षण सिद्धान्त—अर्थ, परिभाषाएँ, आवश्यकता एवं महत्त्व
शिक्षण सिद्धान्त का अर्थ
शिक्षण एक जटिल प्रक्रिया है। इसे सरल, रुचिकर और प्रभावशाली बनाने के लिए शिक्षक विभिन्न प्रकार की शिक्षण क्रियाओं तथा मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग करता है। विद्यार्थियों की रुचि, अभिरुचि, आवश्यकता और अभिप्रेरणा को ध्यान में रखते हुए शिक्षण को व्यवस्थित करने वाले नियम एवं सामान्यीकरण शिक्षण सिद्धान्त कहलाते हैं।
शिक्षण सिद्धान्त शिक्षक को यह समझने में सहायता करते हैं कि शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाए, किन परिस्थितियों में कौन-सी शिक्षण क्रिया उपयोगी होगी तथा विद्यार्थियों को निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों की ओर कैसे अग्रसर किया जाए।
शिक्षण के सिद्धान्तों के विकास के लिए बी. ओ. स्मिथ, एन. एल. गेज, एन. ए. फ्लैण्डर्स, बी. एफ. स्किनर, ब्रूनर तथा शिव के. मित्रा आदि विद्वानों ने प्रयास किए। फिर भी शिक्षण का कोई एक सर्वमान्य एवं अन्तिम सिद्धान्त अभी तक निर्धारित नहीं किया जा सका है।
शिक्षण सिद्धान्त की प्रमुख परिभाषाएँ
डिक्शनरी ऑफ एजुकेशन के अनुसार
शिक्षण सिद्धान्त ऐसे प्रत्यय अथवा सामान्यीकरण हैं जो शिक्षक को शिक्षार्थियों को शैक्षिक उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की ओर निर्देशित करने में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
ट्रेवर्स के अनुसार
शिक्षण सिद्धान्त ऐसे कथनों या प्रतिज्ञप्तियों का समूह है जो शैक्षिक परिणामों और विद्यार्थियों की विशेषताओं के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट करता है।
ब्रूनर के अनुसार
शिक्षण सिद्धान्त की प्रकृति निर्देशात्मक या मानकात्मक होती है। यह ज्ञान और कौशल प्राप्त करने की प्रभावी विधियों से सम्बन्धित नियमों को निर्धारित करता है तथा शिक्षण एवं अधिगम के मूल्यांकन के लिए मानदण्ड प्रदान करता है।
कालिंगर के अनुसार
शिक्षण सिद्धान्त में शिक्षण से सम्बन्धित प्रत्ययों और चरों को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया जाता है तथा उनके पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट किया जाता है। इससे शिक्षण सम्बन्धी घटनाओं की व्याख्या करने और उनके परिणामों का अनुमान लगाने में सहायता मिलती है।
शिक्षण सिद्धान्त की आवश्यकता एवं महत्त्व
शिक्षक के लिए केवल विषय का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। शिक्षण को वैज्ञानिक, योजनाबद्ध और प्रभावशाली बनाने के लिए शिक्षण सिद्धान्तों की जानकारी आवश्यक है। इनकी प्रमुख आवश्यकता एवं महत्त्व निम्नलिखित हैं—
- शिक्षक-प्रशिक्षण के लिए शिक्षण सिद्धान्त आवश्यक हैं। इनके ज्ञान के बिना शिक्षण प्रक्रिया का पूर्ण एवं व्यवस्थित विकास सम्भव नहीं है।
- शिक्षण सिद्धान्त शिक्षण और अधिगम के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट करने में सहायता करते हैं।
- इनके आधार पर शिक्षण की योजना, संगठन तथा मूल्यांकन को वैज्ञानिक रूप से व्यवस्थित किया जा सकता है।
- शिक्षण सिद्धान्त शिक्षक को शिक्षण प्रक्रिया को समझने, उसका पूर्वानुमान करने तथा उस पर नियंत्रण रखने में सहायता करते हैं।
- ये ऐसे नियमों एवं प्रत्ययों का आधार प्रदान करते हैं जिनके अनुसार शैक्षिक परिस्थितियों और शिक्षण व्यवस्था को उचित रूप दिया जा सकता है।
- शिक्षण सिद्धान्तों का मुख्य उद्देश्य शिक्षण को अधिक प्रभावशाली एवं परिणामदायक बनाना है।
- इनमें शिक्षण से सम्बन्धित अनुभवों और परम्पराओं का समावेश होता है, जिससे शिक्षण का अपना व्यवस्थित एवं स्वतंत्र ज्ञान-क्षेत्र विकसित होता है।
- शिक्षण के विभिन्न स्तरों, प्रतिमानों तथा स्वरूपों को समझने में शिक्षण सिद्धान्त उपयोगी होते हैं।
- शिक्षण और अधिगम के बीच पाए जाने वाले सम्बन्धों को विस्तारपूर्वक समझने और उनकी व्याख्या करने में सहायता मिलती है।
- शिक्षण सिद्धान्त शिक्षण से सम्बन्धित अनुसन्धान एवं उसके अनुप्रयोग के लिए नए आयाम प्रदान करते हैं।
- शिक्षक-प्रशिक्षुओं को शिक्षण की प्रकृति समझने तथा आवश्यक शिक्षण-कौशलों के विकास में सहायता मिलती है।
शिक्षण सिद्धान्तों का व्यावहारिक महत्त्व
शिक्षण सिद्धान्त शिक्षक के लिए मार्गदर्शक का कार्य करते हैं। इनके आधार पर शिक्षक विद्यार्थियों की विशेषताओं, शिक्षण के उद्देश्यों और उपलब्ध परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उपयुक्त शिक्षण व्यवस्था कर सकता है।
इस प्रकार शिक्षण सिद्धान्त शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को केवल अनुभव पर आधारित न रखकर उसे अधिक क्रमबद्ध, वैज्ञानिक और उद्देश्यपूर्ण बनाने में सहायता करते हैं।
- शिक्षण सिद्धान्त वे नियम एवं सामान्यीकरण हैं जो शिक्षक को विद्यार्थियों को शैक्षिक उद्देश्यों की ओर ले जाने में मार्गदर्शन देते हैं।
- बी. ओ. स्मिथ, एन. एल. गेज, एन. ए. फ्लैण्डर्स, बी. एफ. स्किनर, ब्रूनर और शिव के. मित्रा आदि ने शिक्षण सिद्धान्त के विकास में योगदान दिया।
- ब्रूनर के अनुसार शिक्षण सिद्धान्त की प्रकृति निर्देशात्मक है और यह प्रभावी शिक्षण-अधिगम के लिए नियम एवं मानदण्ड निर्धारित करता है।
- शिक्षण सिद्धान्त शिक्षण और अधिगम के सम्बन्ध को स्पष्ट करते हैं तथा योजना, संगठन और मूल्यांकन को वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं।
- इनसे शिक्षण प्रक्रिया को समझने, उसका पूर्वानुमान करने तथा प्रभावी रूप से नियंत्रित करने में सहायता मिलती है।
- शिक्षक-प्रशिक्षण, शिक्षण-कौशलों के विकास तथा शिक्षण सम्बन्धी अनुसन्धान के लिए शिक्षण सिद्धान्त अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।
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शिक्षण के सामान्य सिद्धान्त
शिक्षण के सामान्य सिद्धान्त
शिक्षण को सरल, प्रभावशाली, रुचिकर तथा उद्देश्यपूर्ण बनाने के लिए कुछ सामान्य सिद्धान्तों का पालन किया जाता है। ये सिद्धान्त शिक्षक को शिक्षण की योजना बनाने, विद्यार्थियों को सक्रिय रखने तथा अधिगम को अधिक स्थायी बनाने में सहायता करते हैं।
शिक्षण के प्रमुख सामान्य सिद्धान्त निम्नलिखित हैं—
1. स्वयं करके सीखने का सिद्धान्त
इस सिद्धान्त का आधार Learning by Doing अर्थात् स्वयं कार्य करके सीखना है। केवल सुनने की अपेक्षा विद्यार्थी जब किसी कार्य को स्वयं करता है तो उसे विषय का अधिक स्पष्ट और स्थायी ज्ञान प्राप्त होता है।
फ्रोबेल ने बालक की क्रियाशीलता और स्वयं करके सीखने को विशेष महत्त्व दिया। इसलिए शिक्षक को विद्यार्थियों को प्रयोग, अभ्यास और विभिन्न गतिविधियों में भाग लेने के अवसर देने चाहिए।
2. प्रेरणा का सिद्धान्त
अधिगम के लिए विद्यार्थी का प्रेरित होना आवश्यक है। शिक्षक को विद्यार्थियों में सीखने की इच्छा और उत्साह उत्पन्न करना चाहिए, जिससे वे शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लें।
प्रेरणा शाब्दिक तथा अशाब्दिक दोनों प्रकार से दी जा सकती है। शाबाशी, अच्छा और उत्तम जैसे शब्द शाब्दिक प्रेरणा के उदाहरण हैं, जबकि पुरस्कार आदि अशाब्दिक प्रेरणा के साधन हो सकते हैं।
3. रुचि का सिद्धान्त
विद्यार्थी जिस विषय में रुचि लेता है, उसे अधिक आसानी से सीखता है। इसलिए शिक्षक को विषय-वस्तु को विद्यार्थियों की रुचि, आयु और आवश्यकता के अनुरूप प्रस्तुत करना चाहिए।
रुचिकर उदाहरणों, क्रियाओं और उपयुक्त शिक्षण-सामग्री द्वारा शिक्षण में विद्यार्थियों की रुचि बनाए रखी जा सकती है।
4. क्रियाशीलता का सिद्धान्त
बालक स्वभाव से क्रियाशील होता है। इसलिए प्रभावी शिक्षण में उसे केवल निष्क्रिय श्रोता न बनाकर विभिन्न शिक्षण क्रियाओं में सक्रिय रूप से भाग लेने का अवसर देना चाहिए।
क्रियाशीलता के माध्यम से विद्यार्थी—
- कार्य अथवा पाठ को अच्छी तरह सीखता है।
- उसमें आत्मविश्वास विकसित होता है।
- उसके व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन आता है।
- सीखा हुआ ज्ञान अधिक स्थायी बनता है।
5. निश्चित उद्देश्य का सिद्धान्त
प्रत्येक शिक्षण कार्य के उद्देश्य पहले से निश्चित होने चाहिए। स्पष्ट उद्देश्य शिक्षक को यह निर्धारित करने में सहायता करते हैं कि क्या पढ़ाना है, किस प्रकार पढ़ाना है तथा शिक्षण के बाद विद्यार्थियों में कौन-सा परिवर्तन अपेक्षित है।
6. नियोजन का सिद्धान्त
प्रभावी शिक्षण के लिए पूर्व नियोजन आवश्यक है। शिक्षक को पाठ पढ़ाने से पहले विषय-वस्तु, शिक्षण-विधि, सहायक सामग्री, समय तथा विद्यार्थियों की आवश्यकता आदि पर विचार कर लेना चाहिए।
उचित नियोजन से शिक्षण क्रमबद्ध और उद्देश्यपूर्ण बनता है तथा समय और श्रम का बेहतर उपयोग होता है।
7. चुनाव का सिद्धान्त
शिक्षक को पाठ्यवस्तु, शिक्षण-विधि और शिक्षण-साधनों का चयन विद्यार्थियों की आवश्यकता तथा शिक्षण के उद्देश्यों के अनुसार करना चाहिए।
उपयुक्त चुनाव से विषय सरल और बोधगम्य बनता है तथा अनावश्यक सामग्री से बचा जा सकता है।
8. वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धान्त
सभी विद्यार्थी बुद्धि, रुचि, योग्यता, क्षमता, गति और आवश्यकताओं की दृष्टि से समान नहीं होते। इसलिए शिक्षण में वैयक्तिक भिन्नताओं का ध्यान रखना आवश्यक है।
शिक्षक को विद्यार्थियों की भिन्न क्षमताओं के अनुरूप शिक्षण अवसर और आवश्यक सहायता प्रदान करनी चाहिए।
9. लोकतंत्रीय व्यवहार का सिद्धान्त
कक्षा में शिक्षक का व्यवहार लोकतांत्रिक होना चाहिए। विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने, अपने विचार व्यक्त करने और शिक्षण गतिविधियों में भाग लेने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए।
इससे शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच सहयोग, सम्मान तथा स्वस्थ सम्बन्ध विकसित होते हैं।
10. जीवन से सम्बन्ध स्थापित करने का सिद्धान्त
शिक्षण को विद्यार्थियों के वास्तविक जीवन और अनुभवों से जोड़ना चाहिए। जब नया ज्ञान उनके दैनिक जीवन से सम्बन्धित होता है तो उसे समझना और व्यवहार में प्रयोग करना अधिक सरल हो जाता है।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, 2005 (NCF 2005) में भी विद्यालयी ज्ञान को बालक के विद्यालय के बाहर के जीवन से जोड़ने पर बल दिया गया है।
11. आवृत्ति या पुनरावृत्ति का सिद्धान्त
सीखे हुए ज्ञान को स्थायी बनाने के लिए समय-समय पर उसकी पुनरावृत्ति आवश्यक है। पुनरावृत्ति से विद्यार्थी पूर्व में सीखी गई विषय-वस्तु को याद रखता है और उसकी समझ मजबूत होती है।
इसके लिए शिक्षक गृहकार्य, मासिक परीक्षा तथा विद्यार्थियों से पाठ दोहराने जैसी विधियों का प्रयोग कर सकता है।
12. निर्माण एवं मनोरंजन का सिद्धान्त
शिक्षण में ऐसी गतिविधियाँ होनी चाहिए जिनसे विद्यार्थी कुछ नया बनाने, खोजने अथवा रचनात्मक कार्य करने के अवसर प्राप्त करें। साथ ही शिक्षण में मनोरंजन का उचित समावेश उसकी रुचि बनाए रखता है।
निर्माणात्मक एवं मनोरंजक गतिविधियाँ विद्यार्थियों की सृजनात्मक क्षमता तथा सक्रियता के विकास में सहायक होती हैं।
13. विभाजन अथवा लघु सोपानों का सिद्धान्त
कठिन अथवा विस्तृत विषय-वस्तु को छोटे-छोटे तथा क्रमबद्ध सोपानों में बाँटकर पढ़ाना चाहिए। इससे विद्यार्थी प्रत्येक चरण को समझते हुए धीरे-धीरे सम्पूर्ण विषय तक पहुँच सकता है।
यह सिद्धान्त विशेष रूप से जटिल विषय-वस्तु को सरल बनाने में उपयोगी है।
14. अनुभव का सिद्धान्त
शिक्षण को विद्यार्थियों के पूर्व अनुभवों पर आधारित होना चाहिए। नया ज्ञान यदि पहले से प्राप्त अनुभवों से जोड़कर दिया जाए तो उसे समझना अधिक सरल हो जाता है।
प्रत्यक्ष अनुभव विद्यार्थियों में विषय के प्रति स्पष्टता तथा स्थायी अधिगम विकसित करने में सहायता करते हैं।
15. मानसिक तैयारी का सिद्धान्त
शिक्षण प्रारम्भ करने से पहले विद्यार्थी का मानसिक रूप से तैयार होना आवश्यक है। यदि वह सीखने के लिए तत्पर नहीं है तो शिक्षण का अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता।
शिक्षक प्रश्न, उदाहरण अथवा प्रेरक गतिविधि के माध्यम से विद्यार्थियों को नए पाठ के लिए मानसिक रूप से तैयार कर सकता है।
16. स्वतंत्रता का सिद्धान्त
विद्यार्थियों को सीखने और कार्य करने के लिए उचित स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। अनावश्यक नियन्त्रण उनकी स्वाभाविक क्रियाशीलता और सृजनात्मकता को बाधित कर सकता है।
मॉन्टेसरी ने बालक की स्वतंत्रता को विशेष महत्त्व दिया। उचित स्वतंत्रता से विद्यार्थी आत्मनिर्भर होकर अपनी क्षमताओं का विकास कर सकता है।
17. सह-सम्बद्धता का सिद्धान्त
शिक्षण में एक विषय के ज्ञान को दूसरे सम्बन्धित विषय या पूर्व ज्ञान से जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए। इससे विद्यार्थी अलग-अलग तथ्यों के बीच सम्बन्ध स्थापित कर पाता है।
सह-सम्बद्ध शिक्षण ज्ञान को अधिक अर्थपूर्ण, स्पष्ट और उपयोगी बनाने में सहायता करता है।
शिक्षण के सामान्य सिद्धान्तों का महत्त्व
- ये शिक्षण को उद्देश्यपूर्ण, योजनाबद्ध और क्रमबद्ध बनाते हैं।
- विद्यार्थियों की रुचि, सक्रियता और सहभागिता बढ़ाते हैं।
- वैयक्तिक भिन्नताओं और पूर्व अनुभवों के अनुसार शिक्षण करने में सहायता करते हैं।
- सीखे हुए ज्ञान को अधिक स्पष्ट, व्यावहारिक और स्थायी बनाते हैं।
- शिक्षक को उपयुक्त विषय-वस्तु, विधियों और शिक्षण गतिविधियों के चयन में मार्गदर्शन देते हैं।
- शिक्षण के सामान्य सिद्धान्त शिक्षण को सरल, प्रभावशाली, रुचिकर तथा उद्देश्यपूर्ण बनाने में सहायता करते हैं।
- स्वयं करके सीखना, प्रेरणा, रुचि और क्रियाशीलता प्रभावी अधिगम के प्रमुख आधार हैं।
- शिक्षण में निश्चित उद्देश्य, नियोजन, उचित चुनाव तथा वैयक्तिक भिन्नताओं का ध्यान रखना आवश्यक है।
- शिक्षण को वास्तविक जीवन एवं विद्यार्थियों के पूर्व अनुभवों से जोड़ना चाहिए तथा समय-समय पर पुनरावृत्ति करनी चाहिए।
- जटिल विषय-वस्तु को लघु सोपानों में बाँटकर पढ़ाना तथा विद्यार्थी को मानसिक रूप से तैयार करना शिक्षण को सरल बनाता है।
- मॉन्टेसरी ने स्वतंत्रता तथा फ्रोबेल ने स्वयं करके सीखने एवं क्रियाशीलता को विशेष महत्त्व दिया।
- सह-सम्बद्धता द्वारा विभिन्न विषयों एवं पूर्व ज्ञान को जोड़कर शिक्षण को अधिक अर्थपूर्ण बनाया जाता है।
शिक्षण सूत्र—अर्थ, परिभाषाएँ, उपयोगिता एवं महत्त्व
शिक्षण सूत्र का अर्थ
शिक्षण को सरल, प्रभावशाली तथा वैज्ञानिक बनाने के लिए अनुभवी शिक्षकों, मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों और शिक्षाशास्त्रियों ने अपने अनुभवों तथा निष्कर्षों के आधार पर कुछ सामान्य नियम प्रस्तुत किए हैं। इन्हीं नियमों को शिक्षण सूत्र (Maxims of Teaching) कहा जाता है।
शिक्षण सूत्र बालक की प्रकृति और सीखने की प्रक्रिया को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। ये शिक्षक को यह मार्गदर्शन देते हैं कि विषय-वस्तु को किस क्रम और किस प्रकार प्रस्तुत किया जाए, जिससे विद्यार्थी उसे आसानी से समझ सके।
शिक्षण सूत्र कोई कठोर नियम नहीं हैं, बल्कि शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक सरल, स्वाभाविक और प्रभावी बनाने वाले व्यावहारिक मार्गदर्शक सिद्धान्त हैं।
शिक्षण सूत्र की प्रमुख परिभाषाएँ
ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार
शिक्षण सूत्र विज्ञान अथवा अनुभव से प्राप्त ऐसी सामान्य सत्यात्मक मान्यताएँ हैं, जो अच्छे शिक्षण में सहायता करती हैं। प्रारम्भिक कक्षाओं के शिक्षण में इनका विशेष महत्त्व होता है।
रेमॉण्ट के अनुसार
शिक्षण सूत्र वह मार्ग दिखाते हैं जिसके द्वारा सिद्धान्त से व्यवहार की ओर बढ़ते हुए शिक्षण में सहायता प्राप्त की जा सकती है।
शिक्षण सूत्रों की उपयोगिता एवं महत्त्व
शिक्षण सूत्र शिक्षक के लिए मार्गदर्शक का कार्य करते हैं। इनके उचित प्रयोग से शिक्षण अधिक क्रमबद्ध, स्पष्ट तथा विद्यार्थी की समझ के अनुरूप बनाया जा सकता है।
- शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति तथा विद्यार्थी के सर्वांगीण व्यक्तित्व-विकास में शिक्षण सूत्र सहायक होते हैं। शिक्षण को सफल बनाना शिक्षक की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है और शिक्षण सूत्र इस कार्य में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
- शिक्षण सूत्र शिक्षक को विषय-वस्तु को सरल, रोचक, बोधगम्य तथा बालक की प्रकृति के अनुकूल प्रस्तुत करने में सहायता करते हैं।
- इनके प्रयोग से विद्यार्थियों की उपलब्धि को अपेक्षित स्तर तक पहुँचाने में सहायता मिलती है। उचित क्रम से प्रस्तुत किया गया ज्ञान विद्यार्थियों के लिए समझना और ग्रहण करना सरल हो जाता है।
- शिक्षण सूत्रों का प्रभावी प्रयोग करने के लिए शिक्षक को उनका पर्याप्त ज्ञान और दक्षता होना आवश्यक है। इनके उचित प्रयोग से समय और श्रम की बचत होती है, विद्यार्थी सीखने के लिए प्रेरित होते हैं तथा शिक्षण के निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करना सरल हो जाता है।
शिक्षण में शिक्षण सूत्रों की भूमिका
- शिक्षक को विषय-वस्तु प्रस्तुत करने का उचित क्रम बताते हैं।
- कठिन ज्ञान को विद्यार्थी के लिए सरल और समझने योग्य बनाने में सहायता करते हैं।
- शिक्षण को बालक की प्रकृति और उसकी सीखने की क्षमता के अनुरूप बनाने में मार्गदर्शन देते हैं।
- शिक्षक को सिद्धान्त से व्यवहार की ओर आगे बढ़ने में सहायता करते हैं।
- शिक्षण को अधिक रुचिकर, क्रमबद्ध तथा प्रभावशाली बनाने में उपयोगी होते हैं।
शिक्षण सिद्धान्त और शिक्षण सूत्र में सामान्य अन्तर
शिक्षण सिद्धान्त शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के व्यापक नियमों और आधारों को स्पष्ट करते हैं, जबकि शिक्षण सूत्र शिक्षक को विषय-वस्तु प्रस्तुत करने के व्यावहारिक क्रम और दिशा का मार्गदर्शन देते हैं। इस प्रकार शिक्षण सूत्रों का सम्बन्ध मुख्यतः शिक्षण को व्यवहार में सरल और प्रभावी बनाने से है।
- अनुभवी शिक्षकों एवं शिक्षाविदों के अनुभवों से प्राप्त व्यावहारिक नियमों को शिक्षण सूत्र कहा जाता है।
- शिक्षण सूत्र बालक की प्रकृति और अधिगम प्रक्रिया को ध्यान में रखकर शिक्षण को सरल एवं प्रभावी बनाने में सहायता करते हैं।
- ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार शिक्षण सूत्र विज्ञान या अनुभव से प्राप्त सामान्य सत्य हैं, जो अच्छे शिक्षण में सहायक होते हैं।
- रेमॉण्ट के अनुसार शिक्षण सूत्र सिद्धान्त से व्यवहार की ओर जाने का मार्ग दिखाते हैं।
- शिक्षण सूत्र विषय-वस्तु को सरल, रोचक, बोधगम्य और बालक के अनुकूल बनाने में सहायता करते हैं।
- इनके उचित प्रयोग से समय एवं श्रम की बचत होती है, विद्यार्थियों को प्रेरणा मिलती है और शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति सरल होती है।
प्रमुख शिक्षण सूत्र
प्रमुख शिक्षण सूत्र
शिक्षण सूत्र शिक्षक को विषय-वस्तु को उचित क्रम में प्रस्तुत करने का व्यावहारिक मार्ग बताते हैं। इनका उद्देश्य शिक्षण को बालक की समझ, अनुभव और मानसिक विकास के अनुरूप बनाना है। प्रमुख शिक्षण सूत्र निम्नलिखित हैं—
1. सरल से जटिल की ओर
शिक्षण का आरम्भ ऐसी विषय-वस्तु से करना चाहिए जिसे विद्यार्थी आसानी से समझ सके और इसके बाद धीरे-धीरे जटिल ज्ञान की ओर बढ़ना चाहिए। इससे विद्यार्थी नए ज्ञान को बिना कठिनाई के क्रमशः ग्रहण कर पाता है।
अर्थात् पहले सरल तथ्य, नियम या क्रियाएँ सिखाई जाएँ और उनके आधार पर अधिक कठिन विषय-वस्तु प्रस्तुत की जाए।
2. ज्ञात से अज्ञात की ओर
विद्यार्थी के पास पहले से जो ज्ञान और अनुभव उपलब्ध हैं, उनसे सम्बन्ध स्थापित करके नया ज्ञान देना चाहिए। परिचित वस्तु या तथ्य के आधार पर अपरिचित ज्ञान को समझना अधिक सरल होता है।
इसलिए शिक्षक को नया पाठ प्रारम्भ करते समय विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान का उपयोग करना चाहिए।
3. स्थूल से सूक्ष्म की ओर
बालक ऐसी वस्तुओं और तथ्यों को अधिक आसानी से समझता है जिन्हें वह प्रत्यक्ष रूप से देख या अनुभव कर सकता है। इसलिए शिक्षण में पहले स्थूल या मूर्त वस्तुओं का ज्ञान देकर उसके बाद सूक्ष्म या अमूर्त विचारों की ओर बढ़ना चाहिए।
इसे मूर्त से अमूर्त की ओर का शिक्षण सूत्र भी कहा जाता है।
4. पूर्ण से अंश की ओर
इस सूत्र के अनुसार विद्यार्थी को पहले किसी वस्तु, तथ्य या विषय का सम्पूर्ण स्वरूप समझाना चाहिए और बाद में उसके अलग-अलग भागों का अध्ययन कराना चाहिए।
यह सूत्र गेस्टाल्ट मनोविज्ञान (Gestalt Psychology) के सिद्धान्त पर आधारित है, जिसके अनुसार व्यक्ति किसी वस्तु को पहले सम्पूर्ण रूप में ग्रहण करता है और उसके बाद उसके विभिन्न अंशों की ओर ध्यान देता है।
5. अनिश्चित से निश्चित की ओर
प्रारम्भ में बालक का ज्ञान अनेक विषयों के बारे में अस्पष्ट और अनिश्चित हो सकता है। शिक्षक को उचित उदाहरण, स्पष्टीकरण और अनुभवों द्वारा इस अस्पष्ट ज्ञान को क्रमशः निश्चित और स्पष्ट बनाना चाहिए।
इस प्रकार शिक्षण विद्यार्थी की सामान्य अथवा अधूरी धारणा को स्पष्ट ज्ञान में परिवर्तित करता है।
6. प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर
जिन वस्तुओं या घटनाओं को विद्यार्थी प्रत्यक्ष रूप से देख और अनुभव कर सकता है, उनका ज्ञान पहले देना चाहिए। इसके आधार पर ऐसी वस्तुओं, घटनाओं या विचारों को समझाया जाना चाहिए जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखना सम्भव नहीं है।
प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त आधार अप्रत्यक्ष ज्ञान को समझने में सहायता करता है।
7. विशिष्ट से सामान्य की ओर
इस सूत्र में पहले कुछ विशिष्ट उदाहरण, तथ्य या दृष्टान्त प्रस्तुत किए जाते हैं और उनके आधार पर विद्यार्थी सामान्य नियम या सिद्धान्त तक पहुँचता है।
इसे दृष्टान्त से सिद्धान्त की ओर भी कहा जाता है। यह आगमन विधि (Inductive Method) का आधार है।
उदाहरण के लिए अनेक विशेष स्थितियों का निरीक्षण करने के बाद उनसे सम्बन्धित सामान्य नियम स्थापित किया जाता है।
8. विश्लेषण से संश्लेषण की ओर
विश्लेषण में किसी सम्पूर्ण वस्तु या समस्या को छोटे-छोटे भागों में बाँटकर समझा जाता है, जबकि संश्लेषण में उन भागों को पुनः जोड़कर सम्पूर्ण रूप को समझा जाता है।
शिक्षण में आवश्यकता के अनुसार पहले विषय का विश्लेषण करके उसके विभिन्न पक्ष स्पष्ट किए जाने चाहिए और फिर उनके बीच सम्बन्ध स्थापित करके सम्पूर्ण ज्ञान का निर्माण करना चाहिए।
9. मनोवैज्ञानिक से तार्किक की ओर
प्रारम्भिक अवस्था में शिक्षण बालक की रुचि, क्षमता, आवश्यकता और मानसिक विकास के अनुसार होना चाहिए। धीरे-धीरे विद्यार्थी के विकास के साथ विषय-वस्तु को तार्किक एवं व्यवस्थित क्रम में प्रस्तुत किया जा सकता है।
एस. के. अग्रवाल के अनुसार निम्न कक्षाओं में मनोवैज्ञानिक क्रम को अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए और उच्च कक्षाओं में धीरे-धीरे तार्किक क्रम की ओर बढ़ना चाहिए।
10. अनुभव से युक्तिसंगत की ओर
विद्यार्थी पहले अपने अनुभवों के आधार पर अनेक बातें सीखता है। शिक्षक को इन अनुभवों को आधार बनाकर उसे उनके पीछे निहित कारण, नियम और तर्क समझाने चाहिए।
इस प्रकार विद्यार्थी केवल अनुभव पर निर्भर न रहकर किसी तथ्य को तर्क एवं कारण के आधार पर भी समझने लगता है।
11. प्रकृति का अनुसरण
शिक्षण बालक की प्राकृतिक प्रवृत्तियों, रुचियों, क्षमताओं और विकास की अवस्था के अनुरूप होना चाहिए। बालक पर उसकी प्रकृति के विपरीत ज्ञान या गतिविधियाँ थोपने के स्थान पर उसके स्वाभाविक विकास को ध्यान में रखकर शिक्षण प्रदान करना चाहिए।
इस सूत्र का उद्देश्य शिक्षण को बालक के स्वभाव और विकास की प्राकृतिक प्रक्रिया के अनुकूल बनाना है।
प्रमुख शिक्षण सूत्र एक दृष्टि में
- सरल से जटिल की ओर
- ज्ञात से अज्ञात की ओर
- स्थूल से सूक्ष्म की ओर
- पूर्ण से अंश की ओर
- अनिश्चित से निश्चित की ओर
- प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर
- विशिष्ट से सामान्य की ओर
- विश्लेषण से संश्लेषण की ओर
- मनोवैज्ञानिक से तार्किक की ओर
- अनुभव से युक्तिसंगत की ओर
- प्रकृति का अनुसरण
शिक्षण में इन सूत्रों का महत्त्व
- विषय-वस्तु को व्यवस्थित और उचित क्रम में प्रस्तुत करने में सहायता करते हैं।
- नए और कठिन ज्ञान को विद्यार्थियों के लिए सरल तथा बोधगम्य बनाते हैं।
- विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान, अनुभव और मानसिक स्तर का उपयोग करने में सहायता करते हैं।
- शिक्षण को बालक की प्रकृति और विकास के अनुरूप बनाते हैं।
- विद्यार्थियों को उदाहरण और अनुभव से नियम, तर्क तथा व्यापक ज्ञान की ओर ले जाते हैं।
- शिक्षण सूत्र शिक्षक को विषय-वस्तु प्रस्तुत करने का उचित एवं व्यावहारिक क्रम प्रदान करते हैं।
- सरल से जटिल और ज्ञात से अज्ञात की ओर बढ़ने से नया ज्ञान समझना आसान होता है।
- स्थूल से सूक्ष्म को मूर्त से अमूर्त की ओर भी कहा जाता है।
- पूर्ण से अंश की ओर का सूत्र गेस्टाल्ट मनोविज्ञान पर आधारित है।
- विशिष्ट से सामान्य की ओर को दृष्टान्त से सिद्धान्त की ओर भी कहा जाता है और यह आगमन विधि का आधार है।
- निम्न कक्षाओं में मनोवैज्ञानिक क्रम तथा उच्च कक्षाओं में धीरे-धीरे तार्किक क्रम को महत्त्व दिया जाता है।
- शिक्षण बालक की प्रकृति, अनुभव और विकास की अवस्था के अनुरूप होना चाहिए।
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