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Home Study Material Semester 1 शिक्षण-अधिगम के सिद्धान्त अपेक्षित अधिगम स्तर एवं शिक्षण अधिगम सामग्री
Chapter 4 • शिक्षण-अधिगम के सिद्धान्त

अपेक्षित अधिगम स्तर एवं शिक्षण अधिगम सामग्री

UP DELED Semester 1 के विषय शिक्षण-अधिगम के सिद्धान्त के इस अध्याय में अपेक्षित एवं न्यूनतम अधिगम स्तर, अधिगम अनुभव, शिक्षण सहायक सामग्री के उद्देश्य, महत्त्व, चयन, वर्गीकरण तथा श्यामपट्ट, पाठ्य-पुस्तक, चार्ट, प्रतिमान, रेडियो, कम्प्यूटर, टेलीविजन एवं अन्य श्रव्य-दृश्य सामग्रियों का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

17
Topics
15
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10+
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Notes
Topic 1 अपेक्षित अधिगम स्तर—प्रत्यय, अर्थ, परिभाषा एवं उद्देश्य

अपेक्षित अधिगम स्तर—प्रत्यय, अर्थ, परिभाषा एवं उद्देश्य

अपेक्षित अधिगम स्तर का प्रत्यय

अपेक्षित अधिगम स्तर से आशय उस निश्चित न्यूनतम ज्ञान एवं दक्षता से है, जिसे किसी कक्षा और विषय का अध्ययन करने के बाद प्रत्येक विद्यार्थी से प्राप्त करने की अपेक्षा की जाती है। प्रत्येक कक्षा एवं विषय के लिए कुछ निश्चित न्यूनतम दक्षताएँ निर्धारित की जाती हैं, जिन्हें विद्यार्थियों को उस कक्षा के अंत तक प्राप्त कर लेना चाहिए।

अधिगम की अधिकतम सीमा निश्चित नहीं होती। विद्यार्थी अपनी क्षमता, रुचि और गति के अनुसार इससे आगे भी सीख सकता है। अपेक्षित अधिगम स्तर का उद्देश्य केवल न्यूनतम सीमा निर्धारित करना है, जिससे प्रत्येक विद्यार्थी आगे की कक्षा की विषय-वस्तु को समझने के लिए आवश्यक आधार प्राप्त कर सके।

  • सभी विद्यार्थियों को आवश्यक न्यूनतम दक्षताओं तक पहुँचाना इसका प्रमुख लक्ष्य है।
  • विद्यार्थियों को उपयुक्त अवसर, वातावरण तथा अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना आवश्यक है।
  • यह शिक्षा में गुणवत्ता और समानता स्थापित करने का प्रयास है।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में प्रत्येक बालक के लिए आवश्यक न्यूनतम अधिगम सुनिश्चित करने पर बल दिया गया।
  • संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 में इसे अनिवार्य अधिगम स्तर (Essential Level of Learning — ELL) कहा गया।
  • वर्ष 1990 में गठित दवे समिति ने प्राथमिक स्तर पर कक्षा 1 से 5 तक भाषा, गणित तथा पर्यावरण अध्ययन के न्यूनतम अपेक्षित अधिगम स्तर निर्धारित किए।

अपेक्षित अधिगम स्तर का अर्थ

‘अपेक्षित अधिगम स्तर’ तीन शब्दों—अपेक्षित, अधिगम और स्तर—से मिलकर बना है।

  • अपेक्षित (Expected)—वह निर्धारित न्यूनतम दक्षता जिसकी प्राप्ति विद्यार्थी से अपेक्षित होती है।
  • अधिगम (Learning)—सीखने, ज्ञान ग्रहण करने, समझ विकसित करने तथा कौशल के माध्यम से व्यवहार में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया।
  • स्तर (Level)—प्राप्त ज्ञान अथवा उपलब्धि की निश्चित न्यूनतम सीमा।

अपेक्षित अधिगम स्तर की परिभाषा

अपेक्षित अधिगम स्तर वह प्रक्रिया है जिसमें यह निश्चित किया जाता है कि किसी निश्चित स्तर पर बालक अथवा छात्र को कम-से-कम कितना सीखना चाहिए

अर्थात प्रत्येक कक्षा और विषय के लिए निर्धारित आवश्यक दक्षताओं को निश्चित समय में प्रत्येक विद्यार्थी द्वारा प्राप्त कर लेना अपेक्षित अधिगम स्तर कहलाता है।

अपेक्षित अधिगम स्तर के उद्देश्य

  • सभी विद्यार्थियों को बिना किसी भेदभाव के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना तथा उन्हें निर्धारित दक्षताओं में पारंगत बनाना।
  • विद्यार्थियों में समान शैक्षिक गुणवत्ता की प्राप्ति सुनिश्चित करना।
  • विभिन्न विद्यार्थियों के उपलब्धि स्तर में पाई जाने वाली अत्यधिक असमानताओं को कम करना।
  • शिक्षक के लिए स्पष्ट शैक्षिक लक्ष्य निर्धारित करना, जिससे उसका कार्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना न रहकर विद्यार्थियों को निर्धारित योग्यता स्तर तक पहुँचाना हो।
  • उपयुक्त शिक्षण-अधिगम विधियों के चयन, विद्यार्थी उपलब्धि के मूल्यांकन तथा उनकी कठिनाइयों के निराकरण में शिक्षक की सहायता करना।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अपेक्षित अधिगम स्तर प्रत्येक कक्षा एवं विषय के लिए निर्धारित न्यूनतम आवश्यक ज्ञान और दक्षता है।
  • अधिगम की अधिकतम सीमा निश्चित नहीं होती; केवल आवश्यक न्यूनतम स्तर निर्धारित किया जाता है।
  • इसका प्रमुख उद्देश्य सभी विद्यार्थियों को निर्धारित दक्षताओं तक पहुँचाकर शिक्षा में गुणवत्ता एवं समानता सुनिश्चित करना है।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में न्यूनतम अधिगम स्तर पर बल दिया गया तथा संशोधित नीति 1992 में इसे ELL कहा गया।
  • 1990 की दवे समिति ने प्राथमिक स्तर पर भाषा, गणित और पर्यावरण अध्ययन के न्यूनतम अपेक्षित अधिगम स्तर निर्धारित किए।

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Topic 2 अपेक्षित अधिगम स्तर—आवश्यकता, क्षेत्र एवं अधिगम अनुभवों का संयोजन

अपेक्षित अधिगम स्तर—आवश्यकता, क्षेत्र एवं अधिगम अनुभवों का संयोजन

अपेक्षित अधिगम स्तर की आवश्यकता

सभी विद्यार्थियों की योग्यता, सीखने की गति तथा उपलब्धि का स्तर समान नहीं होता। इसलिए प्रत्येक कक्षा के लिए एक ऐसा न्यूनतम अधिगम स्तर निर्धारित करना आवश्यक है, जिसे सभी विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त किया जा सके। अपेक्षित अधिगम स्तर निर्धारित करने की प्रमुख आवश्यकताएँ निम्नलिखित हैं—

  • विद्यार्थियों के अधिगम एवं उपलब्धि स्तर में पाए जाने वाले अंतर को कम करना।
  • शिक्षा के गिरते हुए स्तर में सुधार कर गुणवत्तापूर्ण अधिगम सुनिश्चित करना।
  • शिक्षा में होने वाले अपव्यय एवं अवरोधन को कम करना।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की कार्ययोजना में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए न्यूनतम अधिगम स्तर निर्धारित करने पर विशेष बल दिया गया। प्राथमिक शिक्षा में अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या पर हार्टोग समिति ने भी ध्यान आकर्षित किया था।

अपेक्षित अधिगम स्तर के क्षेत्र

बालक के अधिगम अनुभव उसके वातावरण, परिस्थितियों और सीखने के अवसरों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। अपेक्षित अधिगम स्तर केवल पाठ्य-वस्तु के ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न बौद्धिक एवं व्यावहारिक क्षमताओं के विकास से भी संबंधित है।

इसके प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं—

  • अध्ययन करना।
  • लेखन करना।
  • विचार-विमर्श करना।
  • वर्गीकरण करना।
  • निरीक्षण करना।
  • सामान्यीकरण करना।
  • तुलना करना।
  • तर्क करना।
  • निष्कर्ष निकालना।

अपेक्षित अधिगम स्तर की सम्प्राप्ति में अधिगम अनुभवों का संयोजन

सीखने की प्रक्रिया के दौरान तथा सीखने के बाद विद्यार्थी को जो अनुभव प्राप्त होते हैं, उन्हें अधिगम अनुभव कहा जाता है। अधिगम स्तर और अधिगम अनुभवों में घनिष्ठ संबंध होता है। अच्छे और विविध अधिगम अनुभव विद्यार्थी को निर्धारित अधिगम स्तर प्राप्त करने में सहायता करते हैं।

  • न्यूनतम अपेक्षित अधिगम स्तर प्राप्त करने के बाद विद्यार्थी में विषय की आधारभूत समझ विकसित होती है और वह प्राप्त ज्ञान का व्यावहारिक जीवन में उपयोग कर सकता है।
  • विद्यार्थी अपने प्राप्त अधिगम का उपयोग भविष्य की परिस्थितियों में करता है, जिससे उसके कार्य और अनुभव अधिक प्रभावी बनते हैं।
  • अपेक्षित अधिगम स्तर नए अनुभव प्राप्त करने में सहायता करता है तथा प्राप्त अनुभव आगे के अधिगम को सुगम बनाते हैं।
  • शिक्षक को विद्यार्थियों को विविध अधिगम अवसर प्रदान करने चाहिए, क्योंकि अधिगम की सफलता समृद्ध अनुभवों पर निर्भर करती है।

अधिगम अनुभवों के प्रकार

1. ज्ञानात्मक अधिगम अनुभव

ज्ञानात्मक अनुभवों का संबंध ज्ञान और मानसिक क्रियाओं से होता है। इनमें जानना, समझना, चिन्तन करना, तर्क करना, कल्पना करना, विश्लेषण करना तथा पूर्वानुमान लगाना आदि सम्मिलित हैं।

इनका मूल्यांकन अध्ययन, लेखन, अभ्यास कार्य, गृहकार्य, इकाई परीक्षा, मासिक परीक्षा, अर्द्धवार्षिक तथा वार्षिक परीक्षा आदि के माध्यम से किया जा सकता है।

2. भावात्मक अधिगम अनुभव

भावात्मक अनुभव बालक की भावनाओं, रुचियों, आदतों, प्रवृत्तियों, मूल्यों तथा आदर्शों से संबंधित होते हैं। इनके माध्यम से बालक के व्यवहार और व्यक्तित्व का भावात्मक पक्ष विकसित होता है।

नियमितता, समयबद्धता, स्वच्छता, परिश्रम, सहभागिता, उत्तरदायित्व, सत्यनिष्ठा तथा देशप्रेम आदि भावात्मक अधिगम से संबंधित व्यवहार हैं।

3. क्रियात्मक अधिगम अनुभव

क्रियात्मक अनुभवों का संबंध शारीरिक, मांसपेशीय एवं रचनात्मक क्रियाओं से होता है। इसमें कार्य करना, वस्तुओं का निर्माण करना, विभिन्न कौशलों का अभ्यास, खेलकूद, पी.टी. तथा योगासन आदि सम्मिलित हैं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अपेक्षित अधिगम स्तर की आवश्यकता विद्यार्थियों के स्तर में अंतर, शिक्षा के गिरते स्तर तथा अपव्यय एवं अवरोधन को कम करने के लिए होती है।
  • इसके प्रमुख क्षेत्र अध्ययन, लेखन, विचार-विमर्श, वर्गीकरण, निरीक्षण, सामान्यीकरण, तुलना, तर्क तथा निष्कर्ष निकालना हैं।
  • अधिगम स्तर और अधिगम अनुभव परस्पर संबंधित हैं; समृद्ध अनुभव आगे के अधिगम को अधिक प्रभावी बनाते हैं।
  • अधिगम अनुभव तीन प्रकार के होते हैं—ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक।
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Topic 3 अपेक्षित अधिगम प्रतिफल, पुनर्बलन, क्रियान्वयन एवं न्यूनतम अधिगम स्तर

अपेक्षित अधिगम प्रतिफल, पुनर्बलन, क्रियान्वयन एवं न्यूनतम अधिगम स्तर

अपेक्षित अधिगम प्रतिफल

किसी कक्षा या विषय के लिए निर्धारित दक्षताओं को विद्यार्थी द्वारा सफलतापूर्वक प्राप्त कर लेना अपेक्षित अधिगम प्रतिफल कहलाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के बाद विद्यार्थी से किस प्रकार के ज्ञान, समझ और कौशल की अपेक्षा की जाती है।

अपेक्षित अधिगम स्तर प्राप्त करने के बाद विद्यार्थी को विषय की सामान्य एवं आधारभूत जानकारी प्राप्त हो जाती है, जो आगे के अध्ययन के लिए आधार का कार्य करती है।

अधिगम पुनर्बलन में अपेक्षित अधिगम प्रतिफल का महत्त्व

पुनर्बलन का अर्थ विद्यार्थी को सीखने, सही उत्तर देने और अच्छे कार्य को दोहराने के लिए प्रोत्साहित करना है। अपेक्षित अधिगम प्रतिफलों की प्राप्ति में शिक्षक द्वारा दिया गया उचित पुनर्बलन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

  • यह विद्यार्थियों में सीखने के प्रति रुचि और उत्साह उत्पन्न करता है।
  • सही उत्तर तथा प्रशंसनीय कार्य को दोहराने की प्रेरणा देता है।
  • विद्यार्थियों में आवश्यक योग्यताओं एवं दक्षताओं के विकास में सहायता करता है।
  • विषय-वस्तु को रोचक और आनन्ददायक बनाकर अधिगम को प्रभावशाली करता है।
  • प्राप्त ज्ञान को आगे के अध्ययन तथा जीवन की परिस्थितियों में उपयोग करने का आधार प्रदान करता है।

विद्यार्थियों के अधिगम पर उनके पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। इसलिए शिक्षक को उनके सही एवं प्रशंसनीय कार्य की सराहना करनी चाहिए।

शिक्षक शाब्दिक तथा अशाब्दिक पुनर्बलन, प्रशंसा और पुरस्कार का प्रयोग कर सकता है। विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए सकारात्मक पुनर्बलन का प्रयोग नकारात्मक पुनर्बलन की अपेक्षा अधिक किया जाना चाहिए।

अपेक्षित अधिगम स्तर लागू करते समय ध्यान देने योग्य बातें

अपेक्षित अधिगम स्तर निर्धारित करते समय केवल पाठ्यक्रम को आधार बनाना पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थी की अवस्था और उपलब्ध परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

  • विद्यार्थियों की आयु को ध्यान में रखा जाए।
  • उनकी कक्षा के स्तर के अनुसार अपेक्षित अधिगम निर्धारित किया जाए।
  • भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए।
  • विद्यार्थियों के मनोवैज्ञानिक स्तर का ध्यान रखा जाए।
  • अन्य देशों में प्रचलित संबंधित अधिगम स्तरों पर भी विचार किया जा सकता है।
  • विद्यार्थियों के मानसिक विकास के स्तर को आधार बनाया जाए।
  • परिस्थितियों, उपलब्ध साधनों तथा सुविधाओं का ध्यान रखा जाए।
  • अधिगम के उद्देश्य निश्चित और स्पष्ट होने चाहिए।
  • निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति का समय-समय पर मूल्यांकन एवं निरीक्षण किया जाए।

न्यूनतम अधिगम स्तर हेतु प्रयास

न्यूनतम अधिगम स्तर (Minimum Level of Learning—MLL) से आशय उस न्यूनतम वृद्धि से है, जो शिक्षा के किसी स्तर को पूरा करने के बाद विद्यार्थी के ज्ञान, भावनाओं और कौशलों में होनी चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर गुणात्मक सुधार के लिए न्यूनतम अधिगम स्तर निश्चित करने पर विशेष बल दिया गया। इस कार्यक्रम को लागू करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा शत-प्रतिशत सहायता प्रदान की गई।

न्यूनतम अधिगम स्तर के विकास के लिए प्रमुख प्रयास
  • प्राथमिक स्तर पर भाषा, गणित और पर्यावरण अध्ययन के लिए आवश्यक शिक्षण सामग्री तैयार की गई।
  • पाठ्य-पुस्तकों, कार्य-पुस्तिकाओं तथा मूल्यांकन सामग्री का विकास किया गया।
  • आन्ध्र प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली, केरल, जम्मू, राजस्थान, तमिलनाडु और पंजाब आदि राज्यों में इस दिशा में कार्य किया गया।
  • SCERT तथा DIET से संबंधित शिक्षा-कर्मियों को प्रशिक्षण देकर कार्यक्रम में सम्मिलित किया गया।
  • NCERT द्वारा न्यूनतम अधिगम स्तर से संबंधित सेमिनार एवं कार्यशालाएँ आयोजित की गईं।
  • NCERT द्वारा न्यूनतम अधिगम स्तर की रूपरेखाएँ तैयार कर प्रकाशित की गईं।

न्यूनतम अधिगम स्तर की सीमा

न्यूनतम अधिगम स्तर को सीखने की अंतिम सीमा नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी पाठ्यक्रम के लिए वास्तविक रूप से न्यूनतम और अधिकतम अधिगम की कठोर सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। ये स्तर केवल आवश्यक उपलब्धि के मानदण्ड हैं। विद्यार्थी को निर्धारित स्तर प्राप्त करने के बाद भी अधिक से अधिक सीखने के अवसर दिए जाने चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • निर्धारित दक्षताओं की प्राप्ति को अपेक्षित अधिगम प्रतिफल कहते हैं।
  • पुनर्बलन विद्यार्थी को सीखने और सही व्यवहार को दोहराने के लिए प्रेरित करता है; सकारात्मक पुनर्बलन को अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए।
  • अपेक्षित अधिगम स्तर लागू करते समय आयु, कक्षा, मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक स्तर, भौगोलिक परिस्थितियाँ, उपलब्ध साधन और मूल्यांकन का ध्यान रखना चाहिए।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में न्यूनतम अधिगम स्तर निर्धारित कर शिक्षा में गुणात्मक सुधार पर बल दिया गया।
  • न्यूनतम अधिगम स्तर सीखने की अंतिम सीमा नहीं, बल्कि आवश्यक उपलब्धि का मानदण्ड है।
Topic 4 शिक्षण सहायक सामग्री—अर्थ, परिभाषाएँ एवं उद्देश्य

शिक्षण सहायक सामग्री—अर्थ, परिभाषाएँ एवं उद्देश्य

शिक्षण सहायक सामग्री का परिचय

शिक्षण का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को सूचना देना नहीं, बल्कि उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करना है। इस उद्देश्य को प्रभावी ढंग से प्राप्त करने के लिए शिक्षक विभिन्न साधनों और उपकरणों का प्रयोग करता है। ये साधन शिक्षण को सरल, रोचक, आकर्षक, बोधगम्य तथा प्रभावशाली बनाते हैं।

ऐसी सामग्री, जिसके माध्यम से विद्यार्थी देखकर, सुनकर अथवा दोनों प्रकार की इन्द्रियों का प्रयोग करके सीखते हैं, शिक्षण सहायक सामग्री कहलाती है। इन्हें श्रव्य, दृश्य तथा श्रव्य-दृश्य सामग्री भी कहा जाता है।

श्रव्य-दृश्य शिक्षा का विकास

  • जनवरी 1948 में अखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन में श्रव्य-दृश्य शिक्षा पर पहली बार चर्चा की गई।
  • अप्रैल 1949 में शैक्षिक फिल्मों के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए प्रेस नोट जारी किया गया।
  • प्रो. टी. एल. ग्रीन के भारत आगमन के बाद इस क्षेत्र को अधिक प्रोत्साहन मिला।
  • 1951 में अखिल भारतीय श्रव्य-दृश्य शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया गया।
  • 1952 में राष्ट्रीय श्रव्य-दृश्य शिक्षा परिषद की स्थापना की गई।
  • अगस्त 1965 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा नई दिल्ली में भारतीय सामूहिक संचार संस्थान की स्थापना की गई।

शिक्षण सहायक सामग्री का अर्थ

शिक्षण सहायक सामग्री से आशय उन उपकरणों, साधनों तथा वस्तुओं से है जिनका प्रयोग शिक्षक विद्यार्थियों के सामने विषय-वस्तु को अधिक स्पष्ट, सरल और प्रभावी बनाने के लिए करता है।

इन सामग्रियों की सहायता से विद्यार्थी केवल शब्दों पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि उन्हें प्रत्यक्ष या प्रतिनिधिक अनुभव प्राप्त होते हैं। इससे कठिन और अमूर्त विषय-वस्तु भी सरलता से समझी जा सकती है।

शिक्षण सहायक सामग्री की परिभाषाएँ

शिक्षा शब्दकोश के अनुसार

श्रव्य-दृश्य उपकरण ऐसी युक्तियाँ हैं जिनके माध्यम से दृष्टि और अनुभव की सहायता से अधिगम प्रक्रिया को आगे बढ़ाया तथा प्रोत्साहित किया जाता है।

एम. पी. मफात के अनुसार

शिक्षण सहायक सामग्री विद्यार्थियों को अनुभव प्रदान करती है, शब्दों और वस्तुओं के बीच संबंध स्थापित करती है, सरल एवं विश्वसनीय सूचना देती है तथा जटिल विषय-वस्तु को समझने में सहायता करती है।

मैकक्योन एवं रॉबर्ट्स के अनुसार

इन साधनों के प्रयोग से शिक्षक विद्यार्थियों की एक से अधिक इन्द्रियों को सक्रिय करता है, जिससे पाठ्य-वस्तु अधिक सरल, रोचक, प्रभावशाली और स्थायी बनती है।

एडगर डेल के अनुसार

श्रव्य-दृश्य सामग्री अमूर्त विचारों को ठोस आधार प्रदान करती है और अर्थपूर्ण प्रत्ययों के निर्माण में सहायता करती है। यह केवल शब्दों पर आधारित शिक्षण की कमी को दूर करती है।

क्रो एवं क्रो के अनुसार

श्रव्य-दृश्य उपकरण विद्यार्थियों को व्यक्तियों, घटनाओं, वस्तुओं तथा कारण-प्रभाव संबंधों से जुड़े प्रतिनिधिक अनुभव प्राप्त करने का अवसर देते हैं।

शिक्षण सहायक सामग्री के उद्देश्य

  • विद्यार्थियों का ध्यान विषय-वस्तु की ओर आकर्षित करना तथा निरीक्षण शक्ति का विकास करना।
  • पाठ के प्रति रुचि उत्पन्न करना।
  • तथ्यात्मक जानकारी एवं ज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत करना।
  • अध्ययन सामग्री को अधिक पठनीय और बोधगम्य बनाना।
  • भाषा संबंधी त्रुटियों और भ्रमों को दूर करना।
  • विद्यार्थियों को नए ज्ञान के लिए मानसिक रूप से तैयार करना।
  • अर्जित ज्ञान को अधिक स्थायी बनाना।
  • अमूर्त विषय-वस्तु को मूर्त एवं स्पष्ट रूप देना।
  • कक्षा की नीरसता दूर कर विद्यार्थियों को सक्रिय बनाना।
  • विषय को सरल, स्पष्ट और सुबोध बनाना।
  • श्रवण एवं दृष्टि इन्द्रियों को प्रशिक्षित करना।
  • शिक्षण को आकर्षक और प्रभावशाली बनाना।
  • विद्यार्थियों में तर्क एवं चिन्तन शक्ति का विकास करना।
  • जिज्ञासा तथा सीखने की प्रेरणा उत्पन्न करना।
  • सिद्धान्तों एवं प्रत्ययों को स्पष्ट करना।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • शिक्षण सहायक सामग्री शिक्षण को सरल, रोचक, स्पष्ट और प्रभावशाली बनाने वाली सामग्री है।
  • इनका प्रयोग विद्यार्थियों की एक या एक से अधिक इन्द्रियों को सक्रिय कर अधिगम को स्थायी बनाने के लिए किया जाता है।
  • एम. पी. मफात, मैकक्योन एवं रॉबर्ट्स, एडगर डेल तथा क्रो एवं क्रो ने शिक्षण सहायक सामग्री के महत्त्व को अलग-अलग रूप में स्पष्ट किया है।
  • इसके प्रमुख उद्देश्य ध्यान, रुचि, निरीक्षण, तर्क, जिज्ञासा तथा स्थायी अधिगम का विकास करना हैं।
Topic 5 अच्छी शिक्षण सहायक सामग्री—विशेषताएँ, आवश्यकता एवं महत्त्व

अच्छी शिक्षण सहायक सामग्री—विशेषताएँ, आवश्यकता एवं महत्त्व

अच्छी शिक्षण सहायक सामग्री की विशेषताएँ

शिक्षण सहायक सामग्री तभी प्रभावी होती है जब वह विद्यार्थियों की आयु, रुचि, मानसिक स्तर और पाठ के उद्देश्यों के अनुरूप हो। अच्छी शिक्षण सहायक सामग्री की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1. बिना लागत की सामग्री

जहाँ तक सम्भव हो, शिक्षण सामग्री ऐसी होनी चाहिए जिसे बेकार या आसानी से उपलब्ध वस्तुओं से बिना खर्च के बनाया जा सके। गत्ता, बटन, बोर्ड, कागज, पिन और पुराने सेल आदि से उपयोगी सामग्री तैयार की जा सकती है। प्राथमिक स्तर पर ऐसी सामग्री विशेष रूप से उपयोगी होती है।

2. अल्प लागत की सामग्री

सहायक सामग्री कम खर्च में तथा आस-पास उपलब्ध वस्तुओं से तैयार की जा सके तो उसका प्रयोग अधिक सरल हो जाता है। जैसे किसी फूल के भाग समझाने के लिए वास्तविक फूल तथा स्थानों की जानकारी के लिए मानचित्र का प्रयोग किया जा सकता है।

3. बहुउद्देशीयता

अच्छी शिक्षण सामग्री ऐसी होनी चाहिए जिसका प्रयोग एक से अधिक पाठों, कक्षाओं अथवा उद्देश्यों के लिए किया जा सके। मानचित्र, ग्लोब, पोस्टर आदि बहुउद्देशीय सामग्री के उदाहरण हैं।

4. विषय के अनुरूप

सामग्री का चयन विषय-वस्तु की प्रकृति के अनुसार होना चाहिए। जैसे भूगोल पढ़ाते समय मानचित्र, एटलस अथवा उपयुक्त दृश्य सामग्री अधिक प्रभावी होती है।

5. शैक्षिक उपयोगिता

सहायक सामग्री विद्यार्थियों के ज्ञानात्मक तथा क्रियात्मक विकास में उपयोगी होनी चाहिए। उसका प्रयोग केवल आकर्षण के लिए न होकर शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक होना चाहिए।

6. आयु, रुचि एवं मानसिक स्तर के अनुकूल

सामग्री विद्यार्थियों की आयु, रुचि और मानसिक योग्यता के अनुसार होनी चाहिए। प्राथमिक स्तर पर गतिविधि एवं खेल आधारित सामग्री अधिक उपयोगी होती है, जबकि उच्च कक्षाओं में श्रव्य-दृश्य तथा आधुनिक तकनीकी साधनों का प्रयोग किया जा सकता है।

7. उचित आकार

सहायक सामग्री का आकार कक्षा की व्यवस्था और विद्यार्थियों की संख्या के अनुरूप होना चाहिए। वह इतनी स्पष्ट हो कि कक्षा के सभी विद्यार्थी उसे आसानी से देख और समझ सकें।

8. प्रयोग में सरल

अच्छी सामग्री का संचालन और प्रबन्धन सरल होना चाहिए। शिक्षक उसे बिना अनावश्यक कठिनाई के कक्षा में प्रस्तुत कर सके और उसका प्रयोग शिक्षण की गति में बाधा न बने।

शिक्षण सहायक सामग्री की आवश्यकता एवं महत्त्व

कक्षा में केवल मौखिक व्याख्या द्वारा प्रत्येक विषय को समान रूप से स्पष्ट करना सम्भव नहीं होता। शिक्षण सहायक सामग्री विद्यार्थियों की इन्द्रियों को सक्रिय करके विषय-वस्तु को प्रत्यक्ष, सरल और रुचिकर बनाती है। इसलिए शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में इसका विशेष महत्त्व है।

  • विषय-वस्तु को रोचक और आकर्षक बनाती है।
  • शिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाकर शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता करती है।
  • भाषा संबंधी त्रुटियों और भ्रमों को दूर करने में सहायक होती है।
  • नीरस कक्षा को रुचिकर बनाकर विद्यार्थियों को सक्रिय रखती है।
  • सीखे हुए ज्ञान को पुनर्बलन प्रदान करती है।
  • विद्यार्थियों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक होती है।
  • प्राप्त ज्ञान को अधिक स्थायी बनाती है।
  • श्रवण और दृष्टि इन्द्रियों के प्रशिक्षण में सहायता करती है।
  • विद्यार्थियों का ध्यान केन्द्रित करने तथा एकाग्रता बढ़ाने में उपयोगी होती है।
  • शिक्षक को कठिन तथ्यों और विषय-वस्तु को समझाने में सुविधा प्रदान करती है।
  • सूक्ष्म एवं अमूर्त बातों को मूर्त और प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत करती है।
  • विद्यार्थियों में अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन लाने में सहायता करती है।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण, निरीक्षण शक्ति, स्मरण शक्ति और क्रियाशीलता का विकास करती है।
  • शिक्षण में समय और शक्ति की बचत करती है।
  • विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रेरित करती है।
  • विद्यार्थियों को कार्य में व्यस्त रखकर अनुशासनहीनता को कम करने में सहायता करती है।
  • शिक्षण बिन्दुओं के विकास और स्पष्टीकरण को सरल बनाती है।
  • कल्पना, तर्क तथा निर्णय शक्ति के विकास में सहायक होती है।
  • अधिगम में पीछे रह जाने वाले विद्यार्थियों के लिए विषय-वस्तु को अधिक सरल और बोधगम्य बनाती है।

शिक्षण में सहायक सामग्री की भूमिका

शिक्षण सहायक सामग्री शिक्षक का स्थान नहीं लेती, बल्कि उसके शिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाती है। उचित सामग्री के माध्यम से विद्यार्थी किसी तथ्य को केवल सुनता ही नहीं, बल्कि उसे देखता, समझता और आवश्यकतानुसार अनुभव भी करता है। इससे अधिगम अधिक स्पष्ट और स्थायी होता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अच्छी शिक्षण सहायक सामग्री कम लागत वाली, बहुउद्देशीय, विषयानुकूल, उपयोगी तथा विद्यार्थियों की आयु और मानसिक स्तर के अनुरूप होनी चाहिए।
  • उसका आकार कक्षा के अनुसार उपयुक्त तथा प्रयोग सरल होना चाहिए।
  • शिक्षण सहायक सामग्री कठिन एवं अमूर्त विषयों को सरल, प्रत्यक्ष और रोचक बनाती है।
  • यह ध्यान, निरीक्षण, स्मरण, तर्क, कल्पना और निर्णय शक्ति के विकास में सहायता करती है।
  • इसके प्रयोग से ज्ञान अधिक स्थायी होता है तथा शिक्षक के समय और शक्ति की बचत होती है।

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Topic 6 कक्षा-शिक्षण में सहायक सामग्री—उपयोग, चयन के सिद्धान्त एवं सावधानियाँ

कक्षा-शिक्षण में सहायक सामग्री—उपयोग, चयन के सिद्धान्त एवं सावधानियाँ

कक्षा-शिक्षण में सहायक सामग्री का उपयोग

शिक्षण सहायक सामग्री का लाभ तभी मिलता है जब उसका प्रयोग उचित समय, उचित स्थान और शिक्षण उद्देश्य के अनुसार किया जाए। शिक्षक को सामग्री का प्रयोग केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि विषय-वस्तु को स्पष्ट करने और विद्यार्थियों के अधिगम को प्रभावी बनाने के लिए करना चाहिए।

1. शिक्षण की विभिन्न अवस्थाओं में प्रयोग

सहायक सामग्री का प्रयोग शिक्षण की प्रमुख अवस्थाओं में किया जा सकता है—

  • प्रस्तावना के समय विद्यार्थियों में पाठ के प्रति रुचि उत्पन्न करने के लिए।
  • प्रस्तुतीकरण के समय कठिन प्रत्ययों और विषय-वस्तु को सरल एवं स्पष्ट बनाने के लिए।
  • पुनरावृत्ति के समय विद्यार्थियों की समझ को दृढ़ करने के लिए।
2. आवश्यकता के अनुसार प्रयोग

सहायक सामग्री का प्रयोग वहीं किया जाना चाहिए जहाँ उसकी वास्तविक आवश्यकता हो। अनावश्यक अथवा अत्यधिक प्रयोग विद्यार्थियों का ध्यान मुख्य विषय से भटका सकता है।

3. अवलोकन एवं चिन्तन का अवसर

सामग्री प्रदर्शित करने के बाद विद्यार्थियों को उसे ध्यानपूर्वक देखने, समझने और उसके विषय में सोचने के लिए पर्याप्त समय देना चाहिए। शिक्षक को विद्यार्थियों के प्रश्नों और शंकाओं का भी समाधान करना चाहिए।

4. सामग्री में विविधता

शिक्षक को एक ही प्रकार की सामग्री का लगातार प्रयोग करने के स्थान पर आवश्यकता के अनुसार विभिन्न प्रकार की सामग्री का प्रयोग करना चाहिए। इससे विद्यार्थियों की रुचि बनी रहती है।

5. व्यवस्थित प्रदर्शन

सहायक सामग्री को क्रमबद्ध तथा इस प्रकार प्रदर्शित करना चाहिए कि सभी विद्यार्थी उसे स्पष्ट रूप से देख सकें। सामग्री को हाथ में लेकर इधर-उधर घुमाते हुए प्रदर्शित नहीं करना चाहिए।

6. प्रयोग के बाद सामग्री हटाना

जिस सामग्री का उपयोग समाप्त हो जाए, उसे विद्यार्थियों के सामने से हटा देना चाहिए। अनावश्यक रूप से सामने रखी सामग्री उनका ध्यान पाठ से भटका सकती है।

शिक्षण सामग्री के चयन के सिद्धान्त

1. चयन का सिद्धान्त

चयनित सामग्री का शैक्षिक महत्त्व होना चाहिए। वह विद्यार्थियों के लिए रुचिकर हो, उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करे तथा निर्धारित शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता करे।

2. तैयारी का सिद्धान्त

सामग्री का प्रयोग करने से पहले शिक्षक को स्वयं उसका पूर्ण निरीक्षण कर लेना चाहिए। साथ ही विद्यार्थियों को भी उसके प्रयोग के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार करना चाहिए।

3. उचित प्रस्तुतीकरण का सिद्धान्त

पाठ्य-वस्तु और सहायक सामग्री में उचित समन्वय होना चाहिए। सामग्री पाठ की पूरक हो तथा शिक्षक को उसके सही प्रयोग का ज्ञान होना चाहिए।

4. नियन्त्रण का सिद्धान्त

पूरे शिक्षण काल में सहायक सामग्री शिक्षक के नियन्त्रण में रहनी चाहिए। उसका प्रयोग योजनाबद्ध और उद्देश्यपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए।

शिक्षण अधिगम सामग्री के प्रयोग में सावधानियाँ

  • सामग्री का प्रयोग उसके महत्त्व और शिक्षण उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया जाए।
  • विद्यार्थियों की आवश्यकता और रुचि के अनुसार सामग्री का चयन किया जाए।
  • चयनित सामग्री का प्रयोग से पहले पुनः निरीक्षण किया जाए और आवश्यक सुधार कर लिए जाएँ।
  • पहले यह निश्चित किया जाए कि किस प्रकार की विषय-वस्तु अथवा सम्प्रेषण संबंधी कठिनाई को स्पष्ट करना है।
  • कक्षा में प्रस्तुत की जाने वाली सामग्री पूर्ण और क्रमबद्ध होनी चाहिए।
  • कक्षा में प्रकाश की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  • विद्यार्थियों के बैठने की व्यवस्था ऐसी हो कि सभी सामग्री को स्पष्ट रूप से देख या सुन सकें।
  • विद्यार्थियों को सामग्री के प्रयोग की आवश्यकता और उद्देश्य से परिचित कराया जाए।
  • सामग्री से संबंधित नए शब्दों एवं शब्दावली को पहले स्पष्ट किया जाए।
  • सामग्री का प्रस्तुतीकरण प्रभावशाली और स्पष्ट होना चाहिए।
  • प्रयोग में लगने वाले समय का उचित ध्यान रखा जाए।
  • शिक्षक विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाओं पर निरन्तर ध्यान देता रहे।
  • प्रस्तुतीकरण के बाद पुनरावृत्ति के लिए प्रश्न पूछे जाएँ।
  • विद्यार्थियों की शंकाओं और कठिनाइयों का समय-समय पर समाधान किया जाए।
  • आवश्यकतानुसार विद्यार्थियों के अधिगम का परीक्षण किया जाए।
  • विद्यार्थियों को प्राप्त नवीन ज्ञान के प्रयोग के अवसर दिए जाएँ।
  • शिक्षक को अपने शिक्षण उद्देश्य का स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए।
  • श्रव्य-दृश्य सामग्री के प्रयोग के लिए उपयुक्त अवसर का चयन किया जाना चाहिए।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सहायक सामग्री का प्रयोग प्रस्तावना, प्रस्तुतीकरण तथा पुनरावृत्ति—तीनों अवस्थाओं में आवश्यकता के अनुसार किया जा सकता है।
  • सामग्री का चयन शैक्षिक महत्त्व, पूर्व तैयारी, उचित प्रस्तुतीकरण और शिक्षक के नियन्त्रण के आधार पर किया जाना चाहिए।
  • सामग्री सभी विद्यार्थियों को स्पष्ट दिखाई या सुनाई दे तथा उसके अवलोकन और चिन्तन के लिए पर्याप्त समय दिया जाए।
  • प्रयोग के समय प्रकाश, बैठने की व्यवस्था, विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया, समय, पुनरावृत्ति और मूल्यांकन का ध्यान रखना आवश्यक है।
  • सहायक सामग्री का प्रयोग उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए; अनावश्यक प्रयोग विद्यार्थियों का ध्यान भटका सकता है।
Topic 7 शिक्षण सहायक सामग्री के प्रकार एवं वर्गीकरण

शिक्षण सहायक सामग्री के प्रकार एवं वर्गीकरण

शिक्षण सहायक सामग्री का वर्गीकरण

शिक्षण सहायक सामग्री अनेक प्रकार की होती है। इनके स्वरूप, प्रयोग, इन्द्रियों पर प्रभाव तथा उपलब्धता के आधार पर इन्हें अलग-अलग वर्गों में बाँटा जाता है। शिक्षण सहायक सामग्री का प्रमुख वर्गीकरण निम्नलिखित आधारों पर किया गया है—

  1. प्रौद्योगिकी के आधार पर
  2. इन्द्रियों के आधार पर
  3. प्रक्षेपण के आधार पर
  4. उपलब्धता के आधार पर

1. प्रौद्योगिकी के आधार पर

प्रौद्योगिकी अथवा तकनीकी आधार पर शिक्षण सहायक सामग्री को दो भागों में बाँटा जाता है—

हार्डवेयर सामग्री

ऐसे उपकरण जिनकी सहायता से शिक्षण सामग्री को प्रस्तुत, प्रदर्शित अथवा प्रसारित किया जाता है, हार्डवेयर कहलाते हैं।

  • रेडियो
  • टेलीविजन
  • टेली-कॉन्फ्रेंसिंग
  • रिकॉर्ड प्लेयर
  • एपीडायस्कोप
  • प्रोजेक्टर
  • सिनेमा
  • कम्प्यूटर
सॉफ्टवेयर सामग्री

वह विषय-वस्तु या सामग्री जिसे शिक्षण के लिए प्रत्यक्ष रूप से उपयोग किया जाता है, सॉफ्टवेयर सामग्री कहलाती है।

  • चित्र
  • ग्राफ
  • चार्ट
  • पुस्तक
  • मानचित्र
  • कहानी
  • प्रतिमान

2. इन्द्रियों के आधार पर

जिस इन्द्रिय के माध्यम से विद्यार्थी प्रमुख रूप से ज्ञान प्राप्त करता है, उसके आधार पर सहायक सामग्री तीन प्रकार की होती है—

श्रव्य सामग्री

जिस सामग्री से मुख्य रूप से सुनकर ज्ञान प्राप्त किया जाता है, उसे श्रव्य सामग्री कहते हैं।

  • रेडियो
  • ग्रामोफोन / लिंग्वाफोन
  • श्रव्य टेली-कॉन्फ्रेंसिंग
  • टेप-रिकॉर्डर
दृश्य सामग्री

जिस सामग्री को देखकर विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करता है, उसे दृश्य सामग्री कहते हैं।

  • वास्तविक वस्तुएँ
  • प्रतिमान
  • चित्र
  • मानचित्र
  • रेखाचित्र
  • ग्राफ एवं चार्ट
  • बुलेटिन बोर्ड
  • फ्लैनल बोर्ड
  • मैजिक लैन्टर्न
  • ओवरहेड प्रोजेक्टर
  • संग्रहालय
  • स्लाइड एवं फिल्म-स्ट्रिप
  • प्रोजेक्टर
श्रव्य-दृश्य सामग्री

जिस सामग्री में सुनने और देखने दोनों इन्द्रियों का एक साथ प्रयोग होता है, उसे श्रव्य-दृश्य सामग्री कहते हैं।

  • चलचित्र अथवा सिनेमा
  • समाचार फिल्म
  • टेलीविजन
  • नाटक

3. प्रक्षेपण के आधार पर

प्रक्षेपण के आधार पर शिक्षण सहायक सामग्री को दो वर्गों में रखा जाता है—

अप्रक्षेपित सामग्री

जिस सामग्री को किसी प्रक्षेपण उपकरण की सहायता के बिना सीधे विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत किया जाता है, वह अप्रक्षेपित सामग्री कहलाती है।

  • श्यामपट्ट
  • चित्र
  • चार्ट
  • रेखाचित्र
  • प्रतिमान
  • फ्लैनल बोर्ड
  • वास्तविक वस्तुएँ
  • बुलेटिन बोर्ड
प्रक्षेपित सामग्री

इस वर्ग में ऐसी सामग्री और उपकरण सम्मिलित किए जाते हैं जिनके माध्यम से शिक्षण विषय-वस्तु को विद्यार्थियों तक प्रस्तुत किया जाता है।

  • ओवरहेड प्रोजेक्टर
  • स्लाइड प्रोजेक्टर
  • टेलीविजन
  • कम्प्यूटर
  • मल्टीमीडिया
  • एल.सी.डी. प्रोजेक्टर
  • इण्टरएक्टिव बोर्ड
  • रेडियो
  • टेप-रिकॉर्डर
  • ग्रामोफोन
  • चलचित्र

4. उपलब्धता के आधार पर

सामग्री कहाँ से प्राप्त होती है, इसके आधार पर इसे चार प्रकारों में बाँटा जाता है—

  1. अध्यापकों एवं बालकों द्वारा निर्मित सामग्री।
  2. बाजार से क्रय की गई सामग्री।
  3. विभाग द्वारा प्रदत्त सामग्री।
  4. प्रकृति से प्राप्त सामग्री।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • शिक्षण सहायक सामग्री का वर्गीकरण मुख्यतः प्रौद्योगिकी, इन्द्रियों, प्रक्षेपण और उपलब्धता के आधार पर किया जाता है।
  • प्रौद्योगिकी के आधार पर सामग्री हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दो प्रकार की होती है।
  • इन्द्रियों के आधार पर सामग्री श्रव्य, दृश्य और श्रव्य-दृश्य तीन प्रकार की होती है।
  • प्रक्षेपण के आधार पर सामग्री प्रक्षेपित तथा अप्रक्षेपित दो प्रकार की मानी जाती है।
  • उपलब्धता के आधार पर सामग्री स्वनिर्मित, बाजार से क्रय, विभाग द्वारा प्रदत्त तथा प्रकृति से प्राप्त होती है।
Topic 8 उपलब्धता के आधार पर शिक्षण सामग्री—स्वनिर्मित, बाजार, विभाग एवं प्रकृति से प्राप्त सामग्री

उपलब्धता के आधार पर शिक्षण सामग्री—स्वनिर्मित, बाजार, विभाग एवं प्रकृति से प्राप्त सामग्री

उपलब्धता के आधार पर शिक्षण सामग्री

शिक्षण सामग्री कहाँ से प्राप्त होती है अथवा किसके द्वारा तैयार की जाती है, इस आधार पर इसे मुख्य रूप से चार भागों में बाँटा जाता है—

  1. अध्यापकों एवं बालकों द्वारा निर्मित सामग्री
  2. बाजार से क्रय की गई सामग्री
  3. विभाग द्वारा प्रदत्त सामग्री
  4. प्रकृति से प्राप्त सामग्री

1. अध्यापकों एवं बालकों द्वारा निर्मित सामग्री

शिक्षक और विद्यार्थी अपने आसपास उपलब्ध साधारण वस्तुओं की सहायता से अनेक उपयोगी शिक्षण सामग्रियाँ स्वयं तैयार कर सकते हैं। ऐसी सामग्री तैयार करने में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी होती है, जिससे उनका अधिगम अधिक रुचिकर और स्थायी बनता है।

उदाहरण के लिए मिट्टी की गोलियों द्वारा गिनती सिखाना, लकड़ी अथवा गत्ते से हिन्दी वर्णमाला बनाना तथा चार्ट, पोस्टर, रेखाचित्र और वृत्त आदि तैयार करना।

  • विद्यार्थी स्वयं कार्य करके सीखते हैं।
  • उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मांसपेशियाँ सक्रिय रहती हैं।
  • रचनात्मकता और विभिन्न कौशलों का विकास होता है।
  • प्रत्यक्ष अनुभव मिलने से अधिगम अधिक स्थायी होता है।

2. बाजार से क्रय की गई सामग्री

कुछ शिक्षण सामग्रियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें स्वयं तैयार करने में अधिक समय, श्रम या धन लग सकता है। ऐसी स्थिति में आवश्यक सामग्री बाजार से खरीदी जा सकती है।

बाजार से सामग्री खरीदते समय केवल आकर्षक रूप को नहीं, बल्कि उसकी शैक्षिक उपयोगिता को महत्त्व देना चाहिए।

  • सामग्री की गुणवत्ता अच्छी होनी चाहिए।
  • वह निर्धारित शिक्षण उद्देश्य के अनुरूप होनी चाहिए।
  • विद्यार्थियों की कक्षा और मानसिक स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
  • उसका आकार कक्षा में उपस्थित विद्यार्थियों की संख्या के अनुसार उपयुक्त होना चाहिए।

3. विभाग द्वारा प्रदत्त सामग्री

विद्यालयों में शिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षा विभाग द्वारा भी विभिन्न प्रकार की शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। उत्तर प्रदेश में शिक्षा विभाग द्वारा विद्यालयों को अनेक उपयोगी सामग्रियाँ प्रदान की जाती रही हैं।

  • ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड से संबंधित सामग्री
  • गणित किट
  • विज्ञान किट
  • पाठ्य-पुस्तकें
  • प्रशिक्षण सामग्री
  • पूरक अध्ययन सामग्री
  • शिक्षक संदर्शिका एवं संदर्भ पुस्तकें

इन सामग्रियों का उद्देश्य विद्यालयों को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराकर शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाना है।

4. प्रकृति से प्राप्त सामग्री

प्राकृतिक वातावरण शिक्षण सामग्री का एक महत्त्वपूर्ण और सहज स्रोत है। आसपास उपलब्ध जड़, बीज, शाखाएँ, पत्तियाँ, रेत, पत्थर तथा कंकड़ जैसी वस्तुओं का प्रत्यक्ष अध्ययन कराकर विद्यार्थियों को वास्तविक अनुभव दिया जा सकता है।

जड़
  • जड़ पौधे का भूमिगत भाग होती है।
  • जड़ों पर मूलरोम पाए जाते हैं, जो जल के अवशोषण में सहायक होते हैं।
  • कुछ जड़ों में मूलरोम नहीं भी पाए जाते।
बीज
  • बीज एकबीजपत्री अथवा द्विबीजपत्री हो सकते हैं।
  • बीज के ऊपर आवरण पाया जाता है।
  • उचित परिस्थितियों में बीज का अंकुरण होकर नया पौधा उत्पन्न होता है।
  • बीज में भोजन का संचय भी होता है।
शाखाएँ एवं पत्तियाँ
  • शाखाओं पर पत्तियाँ, फूल और फल पाए जाते हैं।
  • पक्षी भी शाखाओं पर अपना आश्रय बनाते हैं।
  • पत्तियाँ सामान्यतः हरे रंग की होती हैं और पौधे के लिए भोजन निर्माण में सहायक होती हैं।
रेत, पत्थर एवं कंकड़
  • रेत मिट्टी के अत्यन्त छोटे कणों से बनी होती है तथा जल में घुलती नहीं है।
  • पत्थर कठोर, निर्जीव तथा सामान्यतः प्रतिक्रिया न करने वाली प्राकृतिक वस्तु है। पत्थरों के अपक्षय से मिट्टी के निर्माण में सहायता मिलती है।
  • कंकड़ छोटे, चिकने, चमकीले तथा विभिन्न रंगों के हो सकते हैं और नदियों तथा समुद्र तटों पर पाए जाते हैं।

प्राकृतिक सामग्री की शैक्षिक उपयोगिता

  • विद्यार्थियों को वास्तविक वस्तुओं का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त होता है।
  • विषय-वस्तु को केवल मौखिक रूप से समझाने के बजाय उसे देखकर और छूकर समझा जा सकता है।
  • पर्यावरण के प्रति विद्यार्थियों की रुचि और निरीक्षण शक्ति का विकास होता है।
  • आसपास उपलब्ध होने के कारण ऐसी सामग्री सरलता से प्राप्त की जा सकती है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • उपलब्धता के आधार पर शिक्षण सामग्री चार प्रकार की होती है—स्वनिर्मित, बाजार से क्रय, विभाग द्वारा प्रदत्त तथा प्रकृति से प्राप्त।
  • शिक्षक और विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई सामग्री सहभागिता, कौशल और स्थायी अधिगम को बढ़ाती है।
  • बाजार से सामग्री खरीदते समय गुणवत्ता, उद्देश्य, कक्षा-स्तर और आकार का ध्यान रखना चाहिए।
  • शिक्षा विभाग द्वारा गणित किट, विज्ञान किट, पाठ्य-पुस्तक, प्रशिक्षण एवं पूरक अध्ययन सामग्री आदि प्रदान की जाती है।
  • जड़, बीज, शाखा, पत्ती, रेत, पत्थर और कंकड़ जैसी प्राकृतिक वस्तुएँ प्रत्यक्ष एवं अनुभवात्मक शिक्षण में उपयोगी हैं।
Topic 9 श्यामपट्ट—विशेषताएँ, लाभ, सीमाएँ एवं प्रयोग में सावधानियाँ

श्यामपट्ट—विशेषताएँ, लाभ, सीमाएँ एवं प्रयोग में सावधानियाँ

श्यामपट्ट का परिचय

श्यामपट्ट कक्षा-शिक्षण में प्रयुक्त एक महत्त्वपूर्ण दृश्य सहायक सामग्री है। इसका आविष्कार जेम्स विलियम (James William) ने किया था। परम्परागत रूप में दीवार पर काला रंग करके अथवा लकड़ी या रेक्सीन से बने बोर्ड का प्रयोग किया जाता है। आधुनिक समय में सफेद बोर्ड का भी प्रयोग होता है, जिस पर मार्कर से लिखा जाता है।

श्यामपट्ट का प्रमुख उद्देश्य शिक्षक द्वारा लिखी गई बातों, रेखाचित्रों और आवश्यक शिक्षण बिन्दुओं को विद्यार्थियों के सामने स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करना है।

श्यामपट्ट की विशेषताएँ

  • यह ऐसा साधन है जिसे विद्यालयों में आसानी से उपलब्ध कराया जा सकता है।
  • प्रत्येक शिक्षक अपनी आवश्यकता और सुविधा के अनुसार इसका प्रयोग कर सकता है।
  • इसके माध्यम से शिक्षक सुलेख का आदर्श प्रस्तुत कर सकता है।
  • श्यामपट्ट पर लिखी गई बातें केवल मौखिक कथन की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती हैं।
  • शिक्षक लिखते समय विषय-वस्तु को मौखिक रूप से भी समझा सकता है, जिससे विद्यार्थियों को पाठ समझने में सुविधा होती है।
  • भूगोल आदि विषयों की आकृतियों और रेखाचित्रों को श्यामपट्ट पर आसानी से समझाया जा सकता है।
  • विद्यार्थी भी श्यामपट्ट पर कार्य करके समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं, जिससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है।

श्यामपट्ट के लाभ एवं उपयोग

  • इसके प्रयोग के लिए बिजली की आवश्यकता नहीं होती।
  • इसका रख-रखाव सरल होता है और इस पर अधिक खर्च नहीं आता।
  • कम श्रम में इसे लंबे समय तक उपयोग किया जा सकता है।
  • इसका प्रयोग कक्षा के अन्दर तथा आवश्यकता पड़ने पर बाहर भी किया जा सकता है।
  • कक्षा में इसका प्रयोग तुरंत किया जा सकता है; विशेष पूर्व तैयारी की आवश्यकता नहीं होती।
  • शिक्षक इसके माध्यम से अपना शिक्षण कार्य तेजी से कर सकता है।
  • लिखते समय हुई गलती को तुरंत मिटाकर सुधारा जा सकता है।
  • विद्यार्थियों से श्यामपट्ट पर लिखित कार्य करवाया जा सकता है।
  • विद्यार्थी अपने लिखित उत्तर या कार्य को श्यामपट्ट पर प्रस्तुत कर सकते हैं।
  • इसे अन्य दृश्य-श्रव्य शिक्षण सामग्री के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
  • पाठ का सारांश लिखने में यह उपयोगी होता है।
  • पाठ की रूपरेखा प्रस्तुत करने में भी इसका प्रयोग किया जाता है।

श्यामपट्ट की सीमाएँ

  • श्यामपट्ट पर लिखते समय शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच दृष्टि-संपर्क (Eye-to-Eye Contact) टूट जाता है।
  • शिक्षक जब लिखता है तो विद्यार्थियों को लिखित सामग्री आंशिक रूप से ही दिखाई देती है। शिक्षक को बीच-बीच में हटना पड़ता है, जिससे शिक्षण का प्रवाह बाधित होता है और अधिक समय लग सकता है।

श्यामपट्ट के प्रयोग में सावधानियाँ

  • श्यामपट्ट पर क्या और किस क्रम में लिखना है, इसकी योजना पहले ही बना लेनी चाहिए।
  • श्यामपट्ट पर लिखते समय शिक्षक को मुख्य बातों को बोलते भी रहना चाहिए।
  • लिखते समय शिक्षक की दृष्टि केवल श्यामपट्ट पर न रहे; उसे विद्यार्थियों पर भी ध्यान देना चाहिए।
  • लिखते समय शिक्षक को पूरा श्यामपट्ट अपने शरीर से नहीं ढकना चाहिए।
  • लिखने के बाद शिक्षक को एक ओर खड़ा हो जाना चाहिए, जिससे सभी विद्यार्थी लिखी हुई सामग्री देख सकें।
  • श्यामपट्ट पर साफ, सुन्दर और स्पष्ट रूप से लिखना चाहिए।
  • लिखे हुए कार्य को शिक्षक को स्वयं पढ़कर देख लेना चाहिए, जिससे किसी त्रुटि को तुरंत सुधारा जा सके।
  • कार्य पूरा होने के बाद श्यामपट्ट को साफ कर देना चाहिए।
  • व्याख्या करते समय चॉक को लेकर उछालना अथवा उससे खेलना नहीं चाहिए।
  • समय-समय पर विद्यार्थियों से भी श्यामपट्ट पर लिखवाना चाहिए, जिससे उन्हें अभ्यास का अवसर मिले।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • श्यामपट्ट एक सरल, सुलभ और महत्त्वपूर्ण दृश्य शिक्षण साधन है; इसके आविष्कारक जेम्स विलियम माने गए हैं।
  • यह लिखित सामग्री, रेखाचित्र, पाठ-सारांश तथा रूपरेखा प्रस्तुत करने में उपयोगी है।
  • इसके लिए बिजली या विशेष पूर्व तैयारी की आवश्यकता नहीं होती और गलतियों को तुरंत सुधारा जा सकता है।
  • इसकी प्रमुख सीमा लिखते समय शिक्षक का विद्यार्थियों से दृष्टि-संपर्क टूटना है।
  • प्रयोग करते समय साफ लेखन, पूर्व योजना, विद्यार्थियों पर दृष्टि तथा कार्य के बाद श्यामपट्ट की सफाई का ध्यान रखना चाहिए।

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Topic 10 पाठ्य-पुस्तक एवं पूरक सामग्री—अर्थ, उपयोग, लाभ एवं स्रोत

पाठ्य-पुस्तक एवं पूरक सामग्री—अर्थ, उपयोग, लाभ एवं स्रोत

पाठ्य-पुस्तक का अर्थ

पाठ्य-पुस्तक शिक्षण की प्रमुख अनुदेशात्मक सामग्री है। यह किसी विषय के ज्ञान को एक स्थान पर क्रमबद्ध, संगठित एवं व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करती है। इसके माध्यम से विद्यार्थी पूर्व पीढ़ियों द्वारा संचित ज्ञान और अनुभवों से परिचित होते हैं।

पाठ्य-पुस्तक शिक्षक और विद्यार्थी दोनों के लिए उपयोगी होती है। यह शिक्षक को विषय-वस्तु के संगठन में सहायता देती है तथा विद्यार्थियों के समय और श्रम की बचत करती है। फिर भी इसका प्रयोग संतुलित रूप से होना चाहिए; शिक्षण केवल पाठ्य-पुस्तक पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

पाठ्य-पुस्तक की परिभाषाएँ

बेकन के अनुसार

पाठ्य-पुस्तक ऐसी पुस्तक है जिसे कक्षा में प्रयोग के लिए विशेषज्ञों द्वारा सावधानीपूर्वक तैयार किया जाता है तथा जिसमें आवश्यक शिक्षण युक्तियाँ सम्मिलित होती हैं।

डगलस के अनुसार

अध्यापक पाठ्य-पुस्तकों का विश्लेषण करने के बाद इस बात का आधार प्राप्त करते हैं कि विद्यार्थियों को क्या और किस प्रकार पढ़ाया जाए

पाठ्य-पुस्तक का उपयोग

पाठ्य-पुस्तक का क्षेत्र विस्तृत होना चाहिए, परन्तु उसका प्रयोग आवश्यकता और उद्देश्य के अनुसार किया जाना चाहिए। शिक्षण में इसके प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं—

1. पठन-पाठन तकनीक के रूप में

पाठ्य-पुस्तक के किसी भाग को पढ़कर उसका पुनः वाचन किया जा सकता है। पाठ पूरा होने के बाद किसी अंश को पढ़कर पूरी कक्षा में उस पर विचार-विमर्श भी कराया जा सकता है। इसका अत्यधिक और बिना विचार के प्रयोग नहीं करना चाहिए।

2. पाठ की प्रस्तावना हेतु

नवीन पाठ प्रारम्भ करने से पहले विद्यार्थियों में रुचि और मानसिक तत्परता उत्पन्न करना आवश्यक है। पाठ्य-पुस्तक का उचित अंश पाठ की प्रस्तावना के लिए प्रभावशाली साधन बन सकता है।

3. अधिन्यास विधि में

अधिन्यास विधि में सैद्धान्तिक और प्रयोगात्मक कार्य साथ-साथ चलते हैं। विद्यार्थी पहले पाठ्य-पुस्तक के संबंधित पृष्ठों का अध्ययन करते हैं और फिर शिक्षक के मार्गदर्शन में प्रयोगात्मक कार्य करते हैं।

4. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का ज्ञान देने में

किसी व्यक्ति, विचार, आविष्कार या विषय के विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझाने के लिए पाठ्य-पुस्तक उपयोगी होती है। इससे विद्यार्थियों में स्वयं पढ़ने की रुचि भी विकसित की जा सकती है।

5. संदर्भ के रूप में

विभिन्न स्थानों पर बिखरे ज्ञान को एक स्थान पर व्यवस्थित रूप से प्राप्त करने के लिए पाठ्य-पुस्तक का संदर्भ सामग्री के रूप में प्रयोग किया जाता है। इससे विद्यार्थियों में स्वाध्याय की आदत भी विकसित होती है।

6. उदाहरणों एवं चित्रों के प्रयोग में

पाठ्य-पुस्तक में दिए गए उपयुक्त उदाहरण, चित्र और फोटोग्राफ विषय-वस्तु को वास्तविक, रोचक और प्रभावशाली बनाने में सहायता करते हैं। शिक्षक इन्हें चार्ट आदि के सहयोग से भी प्रस्तुत कर सकता है।

7. पाठ्य-वस्तु की पुनरावृत्ति हेतु

पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद तथा विशेष रूप से परीक्षा से पहले पुनरावृत्ति के लिए पाठ्य-पुस्तक अत्यन्त उपयोगी होती है।

8. प्रयोगशाला में

विद्यार्थी प्रयोगशाला में पुस्तक में दिए गए प्रयोगों को शिक्षक की सहायता से कर सकते हैं। इससे उनमें आत्मविश्वास विकसित होता है तथा वे तथ्यों और सिद्धान्तों का स्वयं सत्यापन करना सीखते हैं।

पूरक सामग्री का अर्थ

जब किसी विषय की मुख्य शिक्षण सामग्री उपलब्ध न हो अथवा वह पर्याप्त न हो, तब उसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जिस वैकल्पिक सामग्री का प्रयोग किया जाता है, उसे पूरक सामग्री कहते हैं।

पूरक सामग्री मुख्य सामग्री का स्थान लेने के लिए नहीं, बल्कि उसे अधिक समृद्ध, व्यापक और उपयोगी बनाने के लिए प्रयुक्त की जाती है।

पूरक सामग्री के लाभ

  • विद्यार्थियों में अच्छी पठन आदतों का विकास करती है।
  • पूर्व आर्थिक क्रियाओं और परिस्थितियों के विषय में ज्ञान देती है।
  • बुद्धिमत्ता एवं सूक्ष्मतम अभिवृत्तियों के विकास में सहायक होती है।
  • विद्यार्थियों में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है।
  • स्वतंत्र पठन और विचार करने का प्रशिक्षण देती है।

बिनिंग और बिनिंग के अनुसार किशोरावस्था में जब बालकों की पढ़ने की रुचि, अच्छी आदतें और अभिवृत्तियाँ विकसित हो रही होती हैं, तब उनके कौशलात्मक विकास के लिए पूरक सामग्री का प्रयोग उपयोगी होता है।

पूरक सामग्री के प्रमुख स्रोत

1. आत्मकथा

आत्मकथाओं के अध्ययन से विद्यार्थी भाषा के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का भी ज्ञान प्राप्त करते हैं।

2. उपन्यास

उपन्यासों से विद्यार्थियों को पूर्वकालीन इतिहास, आर्थिक व्यवस्था, जीवन-शैली, भोजन, व्यापार तथा जीवन-निर्वाह से संबंधित जानकारी प्राप्त होती है।

3. आर्थिक पत्रिकाएँ

आर्थिक पत्रिकाएँ देश की आर्थिक संरचना, व्यापार, लागत-आगम, मुद्रा तथा कारखानों आदि से संबंधित जानकारी प्रदान करती हैं।

4. समाचार-पत्र

समाचार-पत्र दैनिक घटनाओं के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक और वैश्विक परिस्थितियों का ज्ञान देते हैं तथा विद्यार्थियों के शब्द-भण्डार में वृद्धि करते हैं।

5. नाटक

नाटक विद्यार्थियों को प्रत्यक्ष अनुभव प्रदान करते हैं। इनके माध्यम से वे भाषा, संस्कृति तथा सामाजिक और आर्थिक व्यवहारों को समझते हैं।

6. कविता

कविता से स्वर, लय और भाषायी कौशल का विकास होता है तथा विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का परिचय मिलता है।

7. वर्क-बुक

वर्क-बुक विद्यार्थियों को अध्ययन सामग्री का अभ्यास करने का अवसर देती है। इसके माध्यम से विद्यार्थी अभ्यास कार्य करते हुए अपने शैक्षिक विकास को आगे बढ़ा सकते हैं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पाठ्य-पुस्तक किसी विषय के ज्ञान को क्रमबद्ध और संगठित रूप में प्रस्तुत करने वाली प्रमुख शिक्षण सामग्री है।
  • इसका प्रयोग पठन-पाठन, पाठ की प्रस्तावना, अधिन्यास, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, संदर्भ, उदाहरण-चित्र, पुनरावृत्ति तथा प्रयोगशाला कार्य में किया जाता है।
  • मुख्य शिक्षण सामग्री की अनुपलब्धता या अपर्याप्तता में प्रयुक्त वैकल्पिक सामग्री को पूरक सामग्री कहते हैं।
  • पूरक सामग्री स्वतंत्र पठन, विचार, निर्णय तथा अच्छी अध्ययन आदतों के विकास में सहायक होती है।
  • आत्मकथा, उपन्यास, आर्थिक पत्रिकाएँ, समाचार-पत्र, नाटक, कविता और वर्क-बुक पूरक सामग्री के प्रमुख स्रोत हैं।
Topic 11 प्रदर्शन पट्ट, बुलेटिन बोर्ड, फ्लैनल बोर्ड, प्लास्टिक/ऐक्रेलिक एवं चुम्बकीय बोर्ड

प्रदर्शन पट्ट, बुलेटिन बोर्ड, फ्लैनल बोर्ड, प्लास्टिक/ऐक्रेलिक एवं चुम्बकीय बोर्ड

प्रदर्शन पट्ट (Display Board)

प्रदर्शन पट्ट एक प्रकार का दृश्य शिक्षण साधन है, जिस पर विद्यार्थियों द्वारा निर्मित सामग्री, चित्र, रेखाचित्र, लेख, सूचनाएँ, नोटिस, पुस्तकों एवं पत्रिकाओं से संबंधित सामग्री आदि प्रदर्शित की जाती है। यह सामान्यतः नरम गत्ते के बोर्ड या प्लाईवुड से बनाया जाता है और इसे आकर्षक बनाने के लिए उस पर फ्लैनल जैसा मोटा कपड़ा लगाया जा सकता है।

प्रदर्शन पट्ट का आकार प्रायः श्यामपट्ट के समान रखा जाता है। सामान्यतः इसका आकार 4 × 4 फुट अथवा 4 × 6 फुट उपयुक्त माना गया है।

प्रदर्शन पट्ट का उपयोग
  • विद्यार्थियों द्वारा निर्मित सामग्री को प्रदर्शित करने के लिए।
  • चित्र, रेखाचित्र, लेख, नोटिस तथा पत्रिकाओं से प्राप्त उपयोगी सामग्री दिखाने के लिए।
  • कक्षा तथा उससे संबंधित अध्यापकों और विद्यार्थियों का ध्यान शैक्षिक सामग्री की ओर आकर्षित करने के लिए।
  • विद्यार्थियों को अपनी रचनात्मक सामग्री प्रदर्शित करने का अवसर देने के लिए।
  • विद्यार्थियों में स्वस्थ प्रतियोगिता उत्पन्न करने के लिए।
  • इसे भित्ति-पत्रिका (Wall Magazine) के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।
प्रदर्शन के समय ध्यान देने योग्य बातें
  • प्रदर्शित सामग्री का आकार इतना बड़ा हो कि उसे आसानी से देखा जा सके।
  • चित्रों पर स्पष्ट एवं शुद्ध नामांकन होना चाहिए।
  • प्रदर्शित सामग्री का चयन शिक्षक के मार्गदर्शन में किया जाना चाहिए।
  • विद्यार्थियों को छोटे-छोटे समूहों में बाँटकर प्रदर्शन पट्ट की व्यवस्था सौंपना उपयोगी होता है।

बुलेटिन बोर्ड (Bulletin Board)

बुलेटिन बोर्ड का प्रयोग समाचार, रोचक घटनाएँ, सूचनाएँ, घोषणाएँ तथा आवश्यक निर्देश विद्यार्थियों तक पहुँचाने के लिए किया जाता है। इसका आकार प्रदर्शन पट्ट के लगभग समान होता है।

बुलेटिन बोर्ड पर सामान्यतः ताला लगी काँच अथवा जाली की खिड़की होती है। इससे प्रदर्शित सूचना सुरक्षित रहती है और उसे फटने, खराब होने अथवा विद्यार्थियों द्वारा अनधिकृत परिवर्तन से बचाया जा सकता है।

  • महत्त्वपूर्ण घोषणाओं और सूचनाओं को सुरक्षित रूप से प्रदर्शित करता है।
  • विद्यार्थियों को समय पर आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराता है।
  • प्रदर्शित सामग्री को नुकसान या परिवर्तन से सुरक्षित रखता है।

फ्लैनल बोर्ड (Flannel Board)

फ्लैनल बोर्ड एक प्रकार का प्रदर्शन पट्ट है। इसका आकार सामान्यतः 3 × 2 फुट अथवा 4 × 3 फुट होता है। प्लाईवुड या बोर्ड पर फेल्ट अथवा फ्लैनल नामक रेशेदार मोटा कपड़ा कसकर लगाया जाता है।

फ्लैनल को दो तख्तों के बीच फैलाकर अथवा दो रोलरों के साथ बाँधकर दीवार पर भी लगाया जा सकता है। शिक्षण सामग्री को कक्षा में क्रमशः प्रदर्शित करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

फ्लैनल बोर्ड की विशेषताएँ
  • सामान्यतः सफेद रंग का फ्लैनल उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि उस पर विभिन्न रंगों की सामग्री स्पष्ट दिखाई देती है।
  • नीला, हरा या लाल जैसे गहरे रंग का फ्लैनल भी प्रयोग किया जा सकता है।
  • शिक्षक अपनी आवश्यकता के अनुसार कटआउट स्वयं तैयार कर सकता है।
  • कम वजन वाली सामग्री जैसे चित्र, कागजी आकृतियाँ और कटआउट आसानी से लगाए जा सकते हैं।
कटआउट लगाने की विधि

कटआउट के पीछे रेगमाल या सैंड पेपर लगाया जाता है। फ्लैनल बोर्ड को स्टैण्ड की सहायता से लगभग 45° के कोण पर पीछे की ओर झुकाकर रखने से सामग्री बोर्ड पर अच्छी तरह चिपकी रहती है और नीचे नहीं फिसलती।

प्लास्टिक / ऐक्रेलिक बोर्ड (Plastic/Acrylic Board)

प्लास्टिक अथवा ऐक्रेलिक बोर्ड काँच, प्लास्टिक या ऐक्रेलिक की चिकनी, समतल और पॉलिश की हुई सतह से बना होता है। इस पर प्लास्टिक या ऐक्रेलिक से बने विभिन्न कटआउट प्रदर्शित किए जा सकते हैं।

इन कटआउटों के पीछे सैंड पेपर लगाने की आवश्यकता नहीं होती। चिकनी सतहों के परस्पर सम्पर्क से उत्पन्न प्रभाव के कारण कटआउट बोर्ड पर चिपक जाते हैं।

व्हाइट बोर्ड

प्लास्टिक बोर्ड सामान्यतः सफेद रंग के होते हैं और प्रायः पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC) से बने होते हैं। इसी कारण इन्हें व्हाइट बोर्ड भी कहा जाता है।

  • इन पर मार्कर पेन और चाइनाग्राफ पेंसिल से लिखा जा सकता है।
  • Dry Wipe Marker को सूखे डस्टर से साफ किया जा सकता है।
  • Water Soluble Marker को गीले कपड़े से साफ करना पड़ता है।
  • ये अधिक टिकाऊ, हल्के तथा बहुउद्देशीय होते हैं।
  • इनका प्रयोग ओवरहेड प्रोजेक्टर अथवा स्लाइड प्रोजेक्शन की स्क्रीन के रूप में भी किया जा सकता है।
  • चिकनी और सफेद सतह के कारण लेखन तथा रंगीन आकृतियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं।
  • चॉक का प्रयोग न होने के कारण चॉक-धूल से होने वाली असुविधा नहीं होती।
  • रख-रखाव कम होता है और इनका प्रयोग सुविधाजनक होता है।

चुम्बकीय बोर्ड (Magnetic Board)

चुम्बकीय बोर्ड एक उपयोगी दृश्य शिक्षण साधन है। यह गैल्वेनाइज्ड आयरन (Galvanised Iron) अथवा माइल्ड स्टील (Mild Steel) का बना होता है। इसकी सतह पर सामान्यतः काला अथवा हरा (Olive Green) स्प्रे पेंट किया जाता है।

इस बोर्ड पर सामान्य लेखन के साथ-साथ चुम्बकीय कटआउट भी प्रदर्शित किए जा सकते हैं। कटआउट थर्माकोल या लकड़ी की सरल ज्यामितीय आकृतियों से बनाए जाते हैं और उनके पीछे चुम्बक लगाया जाता है। चुम्बकीय आकर्षण के कारण वे बोर्ड पर आसानी से चिपक जाते हैं।

  • लेखन और चुम्बकीय आकृतियों का एक साथ प्रयोग किया जा सकता है।
  • कटआउट को आवश्यकता के अनुसार आसानी से लगाया और हटाया जा सकता है।
  • बोर्ड की दोनों सतहों पर स्प्रे पेंट कर उनका उपयोग किया जा सकता है।
  • रोलिंग ट्रॉली या कैस्टर व्हील्स पर रखकर इसे आवश्यकतानुसार एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सकता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्रदर्शन पट्ट का प्रयोग चित्र, लेख, नोटिस तथा विद्यार्थियों द्वारा निर्मित सामग्री प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है; इसका सामान्य आकार 4 × 4 या 4 × 6 फुट होता है।
  • बुलेटिन बोर्ड पर सूचनाएँ एवं घोषणाएँ प्रदर्शित की जाती हैं और इसकी काँच या जाली वाली खिड़की सामग्री को सुरक्षित रखती है।
  • फ्लैनल बोर्ड सामान्यतः 3 × 2 या 4 × 3 फुट का होता है और उस पर सैंड पेपर लगे हल्के कटआउट प्रदर्शित किए जाते हैं।
  • प्लास्टिक/ऐक्रेलिक बोर्ड सामान्यतः सफेद PVC से बने होते हैं; इन पर मार्कर से लिखा जाता है और इन्हें व्हाइट बोर्ड भी कहा जाता है।
  • चुम्बकीय बोर्ड गैल्वेनाइज्ड आयरन या माइल्ड स्टील से बना होता है और उस पर चुम्बकीय कटआउट आसानी से लगाए जा सकते हैं।
Topic 12 चित्र, ग्राफ, चार्ट एवं प्रतिमान—अर्थ, प्रकार एवं शैक्षिक उपयोग

चित्र, ग्राफ, चार्ट एवं प्रतिमान—अर्थ, प्रकार एवं शैक्षिक उपयोग

चित्र (Diagram)

चित्र एक सरल दृश्य सामग्री है, जिसमें किसी वस्तु, स्थिति अथवा उसके विभिन्न भागों के आपसी संबंधों को रेखाओं और संकेतों के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है। जटिल विषय-वस्तु को कम शब्दों में स्पष्ट करने के लिए चित्र का प्रयोग विशेष रूप से उपयोगी होता है।

चित्र में किसी वस्तु के सभी बाहरी विवरण दिखाना आवश्यक नहीं होता। केवल उन आवश्यक तत्त्वों को रेखाओं, संकेतों और रूपरेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जो विषय को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण हों।

चित्र के प्रयोग में सावधानियाँ
  • चित्र का निर्माण शिक्षण उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
  • एक चित्र में केवल उसी विषय से संबंधित आवश्यक सामग्री दिखाई जाए।
  • चित्र की रूपरेखा स्पष्ट और सरल होनी चाहिए।
  • नामांकन शुद्ध, स्वच्छ और स्पष्ट होना चाहिए।
  • अनावश्यक संकेतों और अत्यधिक विवरण से बचना चाहिए।

ग्राफ (Graph)

ग्राफ का प्रयोग आंकिक आँकड़ों (Numerical Data) को प्रभावशाली और सरल रूप में प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। तालिका में दिए गए आँकड़ों की तुलना में ग्राफ द्वारा उनकी प्रवृत्तियों, विभिन्नताओं और संबंधों को अधिक आसानी से समझा जा सकता है।

एक अच्छा ग्राफ बिना विस्तृत व्याख्या के भी एक दृष्टि में अनेक आवश्यक सूचनाएँ प्रदान कर सकता है।

ग्राफ की शैक्षिक उपयोगिता
  • संख्यात्मक आँकड़ों को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करता है।
  • तथ्यों की प्रवृत्तियों और विभिन्नताओं को समझने में सहायता करता है।
  • दो या अधिक आँकड़ों के बीच संबंध स्पष्ट करता है।
  • जटिल सूचनाओं को कम समय में समझने योग्य बनाता है।

चार्ट (Chart)

चार्ट का उद्देश्य ऐसे प्रत्यय, सिद्धान्त, संबंध अथवा प्रक्रिया को दृश्य रूप में प्रस्तुत करना है जिसे केवल शब्दों द्वारा समझाना कठिन हो। इसका प्रयोग किसी सूचना को संक्षिप्त करने, संबंध दिखाने, अमूर्त विचार को मूर्त रूप देने तथा किसी प्रक्रिया की निरन्तरता समझाने के लिए किया जाता है।

चार्ट के प्रमुख प्रकार

1. ट्री चार्ट (Tree Chart)

ट्री चार्ट का प्रयोग विभिन्न कारकों, शाखाओं अथवा घटकों के बीच संबंध और उनके विकास को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।

2. प्रवाह चार्ट (Flow Chart)

प्रवाह चार्ट का प्रयोग किसी प्रक्रिया के क्रमिक विकास अथवा प्रवाह को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। इसमें विभिन्न चरणों को आयत, वर्ग, त्रिभुज आदि आकृतियों तथा दिशा बताने वाली रेखाओं के माध्यम से दिखाया जाता है।

3. तालिका चार्ट (Table Chart)

तालिका चार्ट का प्रयोग तथ्यों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने अथवा उनका तुलनात्मक अध्ययन कराने के लिए किया जाता है।

चार्ट की शैक्षिक उपयोगिता

  • कठिन शिक्षण बिन्दुओं को सरल और स्पष्ट करता है।
  • कक्षा में उपयुक्त शैक्षिक वातावरण बनाने में सहायता करता है।
  • पूर्वनिर्मित होने के कारण श्यामपट्ट की तुलना में समय की बचत करता है।
  • चित्रों और संबंधों को अधिक स्वच्छ तथा व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करता है।

प्रतिमान (Models)

जब किसी वास्तविक वस्तु अथवा प्रत्यय को केवल मौखिक वर्णन या द्विआयामी चित्रों द्वारा स्पष्ट करना कठिन हो, तब प्रतिमान का प्रयोग किया जाता है। प्रतिमान वास्तविक वस्तु का त्रिआयामी रूप होता है, जिसमें लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई का अनुपात प्रदर्शित किया जाता है।

यदि वास्तविक वस्तु आसानी से उपलब्ध, सरल और निरीक्षण योग्य हो तो उसी का प्रयोग अधिक उपयुक्त होता है। प्रतिमान की आवश्यकता विशेष परिस्थितियों में पड़ती है।

प्रतिमान की आवश्यकता

प्रतिमान का प्रयोग मुख्यतः तब किया जाता है जब—

  • वास्तविक वस्तु इतनी छोटी हो कि उसे खुली आँखों से स्पष्ट न देखा जा सके।
  • वस्तु इतनी बड़ी हो कि उसे कक्षा में उपलब्ध न कराया जा सके, जैसे—नदी, डेल्टा या ज्वालामुखी।
  • वस्तु ऐसी जगह स्थित हो जहाँ उसका प्रत्यक्ष निरीक्षण सम्भव न हो।
  • वस्तु इतनी तीव्र गति से गतिशील हो कि उसका ठीक प्रकार से निरीक्षण न किया जा सके।
  • किसी अमूर्त प्रत्यय को मूर्त और समझने योग्य रूप देना हो।

प्रतिमानों का प्रभावी प्रयोग

  • प्रतिमान का आकार देखकर यह निर्धारित करना चाहिए कि उसे कक्षा में ले जाना उचित है या प्रयोगशाला में रखना।
  • प्रतिमान को आवश्यकता न होने पर विद्यार्थियों की दृष्टि से दूर रखना चाहिए, अन्यथा वह उनका ध्यान भटका सकता है।
  • प्रतिमान के साथ प्रश्नोत्तर, पूछताछ, सामूहिक परिचर्चा तथा प्रदर्शन विधि का प्रयोग शिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाता है।
  • विद्यार्थियों को प्रतिमान छूकर और देखकर समझने का अवसर देना चाहिए, क्योंकि इससे अधिगम अधिक स्थायी होता है।
  • प्रतिमान बहुत अधिक महँगा नहीं होना चाहिए, जिससे उसके खराब होने के भय के कारण उसका प्रयोग बाधित न हो।
  • आवश्यकतानुसार प्रतिमान के साथ बोर्ड, ओवरहेड प्रोजेक्टर, स्लाइड और फिल्म आदि अन्य शिक्षण सहायक सामग्री का भी प्रयोग किया जा सकता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • चित्र में जटिल वस्तु या संबंधों को रेखाओं और संकेतों द्वारा सरल रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
  • ग्राफ संख्यात्मक आँकड़ों, उनकी प्रवृत्तियों और विभिन्नताओं को एक दृष्टि में समझने में सहायक होता है।
  • चार्ट के प्रमुख प्रकार ट्री चार्ट, प्रवाह चार्ट और तालिका चार्ट हैं।
  • प्रतिमान वास्तविक वस्तु का त्रिआयामी रूप है और उसका प्रयोग तब किया जाता है जब वास्तविक वस्तु का प्रत्यक्ष निरीक्षण कठिन हो।
  • प्रतिमान के साथ प्रश्नोत्तर, परिचर्चा और प्रदर्शन विधि का प्रयोग अधिगम को अधिक प्रभावशाली बनाता है।
Topic 13 रेडियो—प्रकार एवं शैक्षिक महत्त्व

रेडियो—प्रकार एवं शैक्षिक महत्त्व

रेडियो का परिचय

रेडियो विद्युत तथा बैटरी से चलने वाला एक महत्त्वपूर्ण श्रव्य शिक्षण साधन है। इसका प्रयोग विद्यार्थियों तक विभिन्न प्रकार की शैक्षिक सूचनाएँ, व्याख्यान, वार्ताएँ, कविताएँ, नाटक तथा सामान्य ज्ञान पहुँचाने के लिए किया जाता है।

रेडियो का आविष्कार लगभग 1895 ई. में इटली के इंजीनियर मारकोनी द्वारा किया गया माना जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में इसका उपयोग विशेष रूप से उन विषयों और घटनाओं की जानकारी देने में किया जाता है जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से कक्षा में प्रस्तुत करना कठिन होता है।

आकाशवाणी (AIR) तथा बी.बी.सी. लंदन जैसे प्रसारण केन्द्रों द्वारा वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा समसामयिक विषयों से संबंधित व्याख्यान, वाद-विवाद, नाटक और अन्य कार्यक्रम प्रसारित किए जाते रहे हैं।

रेडियो प्रसारण के प्रकार

रेडियो प्रसारण मुख्यतः दो प्रकार के माने गए हैं—

1. साधारण प्रसारण (Central Relay)

इस प्रकार के प्रसारण में सामान्य घटनाओं, परिस्थितियों तथा विभिन्न विषयों से संबंधित सामान्य जानकारी दी जाती है। इसका उद्देश्य व्यापक जनसमूह को उपयोगी सूचनाएँ प्रदान करना होता है।

2. शैक्षिक प्रसारण (Educational Relay)

शैक्षिक प्रसारण विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए तैयार किए जाते हैं। इनमें विभिन्न कक्षाओं और विषयों के अनुसार ऐसे कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं जो निश्चित शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक हों।

रेडियो द्वारा बालकों, युवाओं, प्रौढ़ों तथा वृद्ध व्यक्तियों के लिए अलग-अलग प्रकार के कार्यक्रम भी प्रसारित किए जा सकते हैं।

रेडियो का शैक्षिक महत्त्व

  • रेडियो के माध्यम से दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले बालकों तथा अन्य लोगों तक ज्ञान, कला और संसार से संबंधित नवीन जानकारी पहुँचाई जा सकती है।
  • जहाँ विद्युत या अन्य आधुनिक साधनों की उपलब्धता सीमित हो, वहाँ भी बैटरी से चलने वाला रेडियो शिक्षा और मनोरंजन का उपयोगी माध्यम बन सकता है।
  • रेडियो प्रसारण को कक्षा में सुनाकर शिक्षक विद्यार्थियों के मन में उत्पन्न प्रश्नों और शंकाओं का समाधान कर सकता है तथा उनमें तर्क एवं चिन्तन शक्ति का विकास कर सकता है।
  • इसके द्वारा शैक्षिक तथा अन्य क्षेत्रों से संबंधित नवीन और अद्यतन जानकारी प्राप्त होती है।
  • रेडियो के प्रयोग से कक्षा-शिक्षण में विविधता आती है, नीरसता दूर होती है और विद्यार्थियों में सीखने के प्रति रुचि उत्पन्न होती है।
  • रेडियो प्रसारण से शिक्षक को भी उपयोगी ज्ञान और नवीन जानकारी प्राप्त होती है, जिसका उपयोग वह अपने शिक्षण कार्य में कर सकता है।
  • विद्यार्थियों को क्षेत्रीय, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं की जानकारी प्राप्त होती है।
  • भाषण, संगीत तथा अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों को रिकॉर्ड करके आवश्यकता के अनुसार पुनः शिक्षण में प्रयोग किया जा सकता है।
  • रेडियो से नियमित रूप से प्रसारित समाचारों को सुनकर विद्यार्थी महत्त्वपूर्ण घटनाओं को नोट कर सकते हैं और स्वयं को नवीन जानकारी से परिचित रख सकते हैं।

कक्षा में रेडियो का प्रभावी प्रयोग

  • प्रसारण सुनाने से पहले शिक्षक को कार्यक्रम के विषय और उद्देश्य से विद्यार्थियों को परिचित करा देना चाहिए।
  • रेडियो को ऐसी जगह रखना चाहिए जहाँ सभी विद्यार्थी स्पष्ट रूप से सुन सकें।
  • प्रसारण के दौरान विद्यार्थियों को ध्यानपूर्वक सुनने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
  • कार्यक्रम समाप्त होने के बाद विद्यार्थियों के प्रश्नों और शंकाओं का समाधान करना चाहिए।
  • प्राप्त ज्ञान के मूल्यांकन के लिए आवश्यक प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • रेडियो एक श्रव्य शिक्षण साधन है और इसका आविष्कार लगभग 1895 ई. में मारकोनी ने किया माना जाता है।
  • रेडियो प्रसारण मुख्यतः साधारण प्रसारण और शैक्षिक प्रसारण—दो प्रकार के होते हैं।
  • शैक्षिक प्रसारण विद्यार्थियों के लिए निश्चित शैक्षिक उद्देश्यों को ध्यान में रखकर तैयार किए जाते हैं।
  • रेडियो दूरस्थ क्षेत्रों तक नवीन ज्ञान पहुँचाने, कक्षा की नीरसता दूर करने तथा विद्यार्थियों में तर्क, चिन्तन और सामान्य ज्ञान के विकास में सहायक है।
  • रेडियो कार्यक्रम सुनाने के बाद शिक्षक को विद्यार्थियों की शंकाओं का समाधान तथा प्राप्त ज्ञान का मूल्यांकन करना चाहिए।

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Topic 14 टेप-रिकॉर्डर एवं ग्रामोफोन—प्रकार, उपयोगिता, लाभ एवं सावधानियाँ

टेप-रिकॉर्डर एवं ग्रामोफोन—प्रकार, उपयोगिता, लाभ एवं सावधानियाँ

टेप-रिकॉर्डर (Tape-Recorder)

टेप-रिकॉर्डर एक महत्त्वपूर्ण श्रव्य शिक्षण साधन है। इसमें चुम्बकीय टेप की सहायता से आवाज को रिकॉर्ड किया जाता है। भाषण, गीत, विचार-विमर्श, व्याख्यान आदि को एक बार रिकॉर्ड करने के बाद उन्हें आवश्यकता के अनुसार बार-बार सुना जा सकता है।

टेप-रिकॉर्डर के प्रकार

टेप-रिकॉर्डर मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—

1. कैसेट टाइप

इसमें कैसेट लगाकर विभिन्न प्रकार की आवाज रिकॉर्ड की जाती है। यह प्रायः पारिवारिक तथा शैक्षिक कार्यों में उपयोग किया जाता है। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से ले जाया जा सकता है तथा यह बैटरी या विद्युत दोनों से संचालित हो सकता है।

2. स्पूल टाइप

स्पूल टाइप टेप-रिकॉर्डर आकार में बड़ा होता है और केवल विद्युत से संचालित होता है। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना अपेक्षाकृत कठिन होता है।

शिक्षा में टेप-रिकॉर्डर की उपयोगिता

  • शिक्षा से संबंधित किसी भी उपयोगी प्रसारण को रिकॉर्ड करके आवश्यकता के समय पुनः सुना जा सकता है।
  • उच्चारण संबंधी दोषों को दूर करने में यह उपयोगी है; सही उच्चारण को बार-बार सुनाकर विद्यार्थियों को अभ्यास कराया जा सकता है।
  • देश-विदेश के महान व्यक्तियों के भाषण तथा व्याख्यान रिकॉर्ड करके विद्यार्थियों को सुनाए जा सकते हैं।
  • शिक्षक अपने शिक्षण कार्य या व्याख्यान को रिकॉर्ड करके उसका स्वयं मूल्यांकन कर सकता है।
  • फिल्म-पट्टियों तथा स्लाइडों के लिए आवश्यक व्याख्यात्मक वर्णन तैयार करने में इसका प्रयोग किया जा सकता है।
  • उपचारात्मक शिक्षण, कौशल अधिगम, अभ्यास कार्य तथा पुनर्बलन में इसका उपयोग किया जा सकता है।
  • शिक्षक उपयोगी शिक्षण सामग्री को रिकॉर्ड करके आवश्यकता के अनुसार कभी भी प्रयोग कर सकता है।
  • पुरानी रिकॉर्डिंग अनुपयोगी हो जाने पर उसी टेप पर पुनः नई सामग्री रिकॉर्ड की जा सकती है।
  • इसके उचित प्रयोग से विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता की समस्या को काफी सीमा तक कम किया जा सकता है।
  • विद्यालय में आयोजित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों को रिकॉर्ड करके सुरक्षित रखा जा सकता है।

ग्रामोफोन (Gramophone)

ग्रामोफोन भी रेडियो की भाँति एक महत्त्वपूर्ण श्रव्य शिक्षण उपकरण है। इसके द्वारा विद्यार्थियों को भाषा, गीत तथा शुद्ध उच्चारण का अभ्यास कराया जा सकता है। शिक्षक आवश्यकता के अनुसार इसका प्रयोग करके रिकॉर्ड की गई सामग्री विद्यार्थियों को सुना सकता है।

ग्रामोफोन शिक्षक का स्थान नहीं लेता। रिकॉर्ड की गई सामग्री सुनाने के बाद शिक्षक को विषय-वस्तु को स्पष्ट करना चाहिए, जिससे विद्यार्थी प्राप्त ज्ञान को ठीक प्रकार से समझ सकें।

ग्रामोफोन के शैक्षिक लाभ

  • इसके माध्यम से दूरस्थ स्थानों पर बैठे व्यक्ति भी रिकॉर्ड की गई सामग्री का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
  • महान व्यक्तियों की आवाज, भाषण तथा जीवन से संबंधित उपयोगी कथन विद्यार्थियों को सुनाए जा सकते हैं।
  • उच्च स्तर के ज्ञानवर्धक नाटक सुनाकर विद्यार्थियों के ज्ञान और विकास में सहायता की जा सकती है।
  • सामूहिक रूप से विद्यार्थियों को ज्ञान प्रदान करने में इसका प्रयोग किया जा सकता है।
  • इसके प्रयोग से विद्यार्थियों की कल्पना-शक्ति को विकसित करने में सहायता मिलती है।

ग्रामोफोन के प्रयोग में सावधानियाँ

  • बहुत बड़े समूह में ग्रामोफोन सुनाने की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे विद्यार्थियों के ज्ञान ग्रहण में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है।
  • ग्रामोफोन कार्यक्रम सुनाने के बाद विद्यार्थियों से सामूहिक रूप से चर्चा एवं विवेचना करानी चाहिए।
  • विद्यार्थियों के बैठने की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि प्रत्येक विद्यार्थी ग्रामोफोन का प्रसारण आसानी से सुन सके।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • टेप-रिकॉर्डर चुम्बकीय टेप पर आवाज रिकॉर्ड करने वाला श्रव्य शिक्षण साधन है और इसके दो प्रमुख प्रकार—कैसेट टाइप तथा स्पूल टाइप—हैं।
  • टेप-रिकॉर्डर उच्चारण सुधार, भाषण एवं व्याख्यान रिकॉर्ड करने, उपचारात्मक शिक्षण, अभ्यास और पुनर्बलन में उपयोगी है।
  • ग्रामोफोन का प्रयोग भाषा, गीत, शुद्ध उच्चारण तथा रिकॉर्ड की गई ज्ञानवर्धक सामग्री सुनाने में किया जाता है।
  • ग्रामोफोन विद्यार्थियों की कल्पना-शक्ति और सामूहिक अधिगम के विकास में सहायक है।
  • ग्रामोफोन का प्रयोग छोटे एवं व्यवस्थित समूह में करना तथा कार्यक्रम के बाद विद्यार्थियों से चर्चा कराना चाहिए।
Topic 15 कम्प्यूटर—विशेषताएँ, उपयोगिता एवं शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग

कम्प्यूटर—विशेषताएँ, उपयोगिता एवं शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग

कम्प्यूटर का परिचय

सूचना एवं सम्प्रेषण के युग में कम्प्यूटर एक महत्त्वपूर्ण शिक्षण सहायक सामग्री है। इसका प्रयोग लगभग सभी विषयों में किया जा सकता है। कम्प्यूटर की सहायता से विद्यार्थी भूत, वर्तमान और भविष्य से संबंधित विभिन्न प्रकार की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं तथा अपनी गति के अनुसार सीख सकते हैं।

कम्प्यूटर विद्यार्थियों में सीखने की रुचि उत्पन्न करता है, उन्हें अधिगम के लिए प्रेरित करता है तथा स्व-अनुशासन के विकास में भी सहायक होता है। इसलिए आधुनिक शिक्षा में कम्प्यूटर का विशेष स्थान है।

कम्प्यूटर की विशेषताएँ एवं उपयोगिता

  • कम्प्यूटर विश्वसनीय आँकड़े और सूचनाएँ प्रदान करने वाली एक बौद्धिक मशीन है।
  • शिक्षक एवं विद्यार्थी विभिन्न तथ्यों, आँकड़ों और सूचनाओं को शीघ्र प्राप्त कर सकते हैं।
  • इसमें बड़ी मात्रा में सूचनाओं और आँकड़ों का भण्डारण किया जा सकता है तथा उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
  • लम्बी एवं जटिल गणनाएँ बहुत कम समय में की जा सकती हैं।
  • इंटरनेट कनेक्शन के माध्यम से विश्व की नवीनतम जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
  • विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार की अनुिक्रयाएँ करने का अवसर मिलता है।
  • विद्यार्थियों को उनके उत्तर के संबंध में तत्काल पुनर्बलन प्राप्त हो सकता है।
  • पाठ्य-वस्तु को आवश्यकता के अनुसार बार-बार दोहराया जा सकता है।
  • कम्प्यूटर सीखने की प्रक्रिया को सरल और प्रभावशाली बनाता है।
  • यह मूल्यांकन प्रक्रिया में सहायक होता है।
  • विद्यार्थियों को पर्याप्त अभ्यास के अवसर प्रदान करता है।
  • विभिन्न विषयों और क्षेत्रों से संबंधित वेबसाइटों का अध्ययन किया जा सकता है।
  • कम समय में अधिक जानकारी प्राप्त कर आवश्यकतानुसार उसका उपयोग किया जा सकता है।
  • विद्यार्थियों को स्व-अधिगम तथा स्वाध्याय के अवसर प्राप्त होते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में कम्प्यूटर का प्रयोग

शिक्षा के क्षेत्र में कम्प्यूटर केवल सूचना प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि शिक्षण, अधिगम, अभ्यास, मूल्यांकन, अभिलेख-रक्षण और उपचारात्मक शिक्षण में भी उपयोगी है।

  • शिक्षा से संबंधित तथ्य, आँकड़े और सूचनाएँ शीघ्र प्राप्त की जा सकती हैं।
  • कम्प्यूटर सह-अनुदेशन के माध्यम से विद्यार्थियों को व्यक्तिगत अनुदेशन दिया जा सकता है, जिससे वे अपनी गति और क्षमता के अनुसार सीख सकें।
  • जटिल गणनाएँ कम समय में की जा सकती हैं।
  • आवश्यक सूचनाओं और तथ्यों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
  • विद्यार्थी किसी विषय-वस्तु को अपनी आवश्यकता के अनुसार बार-बार दोहरा सकते हैं।
  • कम्प्यूटर द्वारा किया गया मूल्यांकन निष्पक्ष हो सकता है।
  • उच्च शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में कम्प्यूटर अत्यन्त उपयोगी है।
  • विद्यालयों में विद्यार्थियों को उपचारात्मक शिक्षण देने में इसका प्रयोग किया जा सकता है।
  • पाठ्य-वस्तु को विद्यार्थियों की आवश्यकता और क्षमता के अनुसार प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • विद्यार्थियों के अभिलेख कम्प्यूटर में सुरक्षित रखे जा सकते हैं।
  • शिक्षक अपनी शिक्षण सामग्री को कम्प्यूटर में संग्रहीत कर भविष्य में आवश्यकता के अनुसार पुनः प्रयोग कर सकता है, जिससे समय और श्रम की बचत होती है।
  • विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार के प्रयोग और अभ्यास करने के अवसर मिलते हैं।

विद्यार्थियों के लिए कम्प्यूटर का महत्त्व

  • विद्यार्थी अपनी गति और क्षमता के अनुसार सीख सकते हैं।
  • कठिन विषय-वस्तु को बार-बार देखकर और दोहराकर समझ सकते हैं।
  • तत्काल प्रतिक्रिया एवं पुनर्बलन से अधिगम अधिक प्रभावी होता है।
  • स्व-अधिगम, स्वाध्याय और अभ्यास की प्रवृत्ति विकसित होती है।
  • नवीन सूचनाओं तक शीघ्र पहुँच होने से ज्ञान का विस्तार होता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कम्प्यूटर आधुनिक शिक्षा का महत्त्वपूर्ण सहायक साधन है, जो सूचना, अभ्यास, मूल्यांकन और स्व-अधिगम में उपयोगी है।
  • इसकी प्रमुख विशेषताएँ—सूचना भण्डारण, तीव्र गणना, इंटरनेट से नवीन जानकारी, तत्काल पुनर्बलन और पाठ्य-वस्तु की पुनरावृत्ति हैं।
  • शिक्षा में इसका प्रयोग व्यक्तिगत अनुदेशन, उपचारात्मक शिक्षण, अभिलेख-रक्षण तथा निष्पक्ष मूल्यांकन में किया जाता है।
  • कम्प्यूटर विद्यार्थियों को अपनी गति एवं क्षमता के अनुसार सीखने और स्वाध्याय करने का अवसर देता है।
  • शिक्षक अपनी सामग्री सुरक्षित रखकर भविष्य में पुनः प्रयोग कर सकता है, जिससे समय और श्रम की बचत होती है।
Topic 16 टेलीविजन—शिक्षा में उपयोग, महत्त्व एवं सीमाएँ

टेलीविजन—शिक्षा में उपयोग, महत्त्व एवं सीमाएँ

टेलीविजन का परिचय

टेलीविजन शिक्षा का एक प्रभावशाली श्रव्य-दृश्य शिक्षण माध्यम है। इसके द्वारा किसी घटना, विषय या प्रक्रिया को देखकर और सुनकर समझा जा सकता है। इसलिए ऐसे विषय जिन्हें केवल मौखिक रूप से समझाना कठिन, खर्चीला या जोखिमपूर्ण हो, उन्हें टेलीविजन की सहायता से अधिक सरल और रोचक रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

टेलीविजन के माध्यम से विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गए पाठ एक ही समय में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों तक पहुँचाए जा सकते हैं। रिकॉर्ड किए गए कार्यक्रमों को आवश्यकता के अनुसार दोबारा भी दिखाया जा सकता है।

शिक्षा में टेलीविजन का उपयोग

  • कठिन, जटिल या प्रत्यक्ष रूप से दिखाना कठिन विषयों को दृश्य रूप में समझाने के लिए।
  • विशेषज्ञों द्वारा तैयार शैक्षिक कार्यक्रम बड़ी संख्या में विद्यार्थियों तक पहुँचाने के लिए।
  • रिकॉर्ड किए गए कार्यक्रमों को आवश्यकता के अनुसार पुनः दिखाने के लिए।
  • समय की बचत करते हुए एक साथ अनेक विद्यार्थियों को शिक्षित करने के लिए।
  • दूरस्थ घटनाओं और वस्तुओं को कक्षा के निकट लाने के लिए।
  • वस्तुओं के आकार को आवश्यकता के अनुसार बड़ा या छोटा करके स्पष्ट रूप में दिखाने के लिए।
  • औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों प्रकार की शिक्षा प्रदान करने के लिए।
  • विश्व को कक्षा में तथा कक्षा को घर तक पहुँचाने के लिए।
  • प्रशिक्षित शिक्षकों और सुसज्जित प्रयोगशालाओं की कमी को कुछ सीमा तक पूरा करने के लिए।

टेलीविजन कार्यक्रम के प्रयोग से पूर्व शिक्षक की तैयारी

कक्षा में शैक्षिक कार्यक्रम दिखाने से पहले शिक्षक को उचित तैयारी करनी चाहिए, जिससे विद्यार्थी कार्यक्रम को उद्देश्यपूर्ण ढंग से देख सकें।

  • विद्यार्थियों को कार्यक्रम की तिथि, समय और संबंधित कक्षा की जानकारी पहले से दी जाए।
  • कार्यक्रम के विषय और उसके उद्देश्य स्पष्ट कर दिए जाएँ।
  • विद्यार्थियों के बैठने की व्यवस्था सुव्यवस्थित हो।
  • टेलीविजन ऐसी जगह रखा जाए जहाँ सभी विद्यार्थी उसे स्पष्ट रूप से देख सकें।
  • ध्वनि इतनी स्पष्ट हो कि सभी विद्यार्थी कार्यक्रम सुन सकें।
  • कक्षा में अनावश्यक शोर न हो।
  • कार्यक्रम समाप्त होने पर विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं और शंकाओं का समाधान किया जाए।
  • प्राप्त ज्ञान के मूल्यांकन के लिए प्रश्न पूछे जाएँ।
  • जो बातें स्पष्ट न हुई हों, उन्हें शिक्षक पुनः समझाए।

टेलीविजन का शैक्षिक महत्त्व

  • टेलीविजन एक श्रव्य-दृश्य सामग्री है, इसलिए विद्यार्थी किसी कार्यक्रम को देख और सुन दोनों सकते हैं।
  • यह शिक्षक के निजी और व्यावसायिक विकास में भी सहायक हो सकता है।
  • टेलीविजन कार्यक्रम पाठ्यक्रम को विस्तृत करने तथा शैक्षिक कार्यक्रमों में सरलता और रोचकता लाने में सहायक होते हैं।
  • स्क्रीन के माध्यम से कक्षा में वास्तविक संसार का अनुभव प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • इसके द्वारा बालकों के सर्वांगीण विकास में सहायता मिलती है।
  • यह विद्यार्थियों का ध्यान आकर्षित करने का प्रभावशाली साधन है।
  • शैक्षिक कार्यक्रमों को रिकॉर्ड करके आवश्यकता के समय पुनः देखा या दिखाया जा सकता है।
  • इसके प्रयोग से शिक्षण में गतिशीलता बनी रहती है।
  • किसी क्रिया या कार्य में लगने वाला समय व्यर्थ नहीं होता।
  • यह अपेक्षाकृत कम खर्च में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को एक साथ शिक्षित करने में सहायक है।

टेलीविजन की सीमाएँ

  • रेडियो की तरह यह भी मुख्यतः एकतरफा माध्यम है।
  • इसमें तत्काल पुष्पोषण (Feedback) की व्यवस्था नहीं होती।
  • व्यक्तिगत विभिन्नताओं की पूर्ति इस माध्यम से पूरी तरह संभव नहीं होती।
  • विद्युत व्यवस्था के अभाव में इसका प्रयोग संभव नहीं है।
  • कार्यक्रम के दौरान बिजली जाने, तकनीकी खराबी आने या संकेत स्पष्ट न मिलने से शिक्षण में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • टेलीविजन एक प्रभावशाली श्रव्य-दृश्य शिक्षण माध्यम है, जिसमें विद्यार्थी विषय-वस्तु को देखकर और सुनकर सीखते हैं।
  • यह कठिन विषयों को सरल बनाने, विशेषज्ञ पाठ प्रसारित करने तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को एक साथ शिक्षित करने में उपयोगी है।
  • शैक्षिक कार्यक्रम दिखाने से पहले शिक्षक को समय, उद्देश्य, बैठने की व्यवस्था, ध्वनि तथा मूल्यांकन की तैयारी करनी चाहिए।
  • टेलीविजन शिक्षण में वास्तविकता, रोचकता, गतिशीलता तथा विद्यार्थियों का ध्यान बढ़ाता है।
  • इसकी प्रमुख सीमाएँ एकतरफा संचार, तत्काल फीडबैक का अभाव, व्यक्तिगत भिन्नताओं की सीमित पूर्ति तथा बिजली और तकनीकी व्यवस्था पर निर्भरता हैं।
Topic 17 वीडियो टेप एवं शैक्षिक सी.डी.—शिक्षण-अधिगम में उपयोगिता

वीडियो टेप एवं शैक्षिक सी.डी.—शिक्षण-अधिगम में उपयोगिता

वीडियो टेप (Video Tape)

वीडियो टेप दूरवर्ती शिक्षा के लिए एक महत्त्वपूर्ण एवं सशक्त श्रव्य-दृश्य शिक्षण साधन है। दूरदर्शन की तुलना में इसकी विशेषता यह है कि विद्यार्थी इसमें उपलब्ध सामग्री को अपनी आवश्यकता और सुविधानुसार बार-बार देख सकता है।

वीडियो टेप में सम्प्रेषण चित्रों का प्रयोग किया जाता है, इसलिए अशिक्षित व्यक्तियों को भी इसके माध्यम से शिक्षण प्रदान किया जा सकता है। इसका उपयोग शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट, रुचिकर और प्रभावशाली बनाने के लिए किया जाता है।

शिक्षण में वीडियो टेप की उपयोगिता

  • दूरवर्ती शिक्षा के लिए यह एक प्रभावी शिक्षण साधन है।
  • रिकॉर्ड की गई सामग्री को भविष्य में आवश्यकता के अनुसार कभी भी देखा जा सकता है।
  • विद्यार्थी अपनी आवश्यकता के अनुसार किसी विषय को बार-बार देख सकता है।
  • इसमें चित्रों के माध्यम से विषय-वस्तु प्रस्तुत होने के कारण समझना सरल होता है।
  • विद्यार्थी अपनी सुविधा और गति के अनुसार अधिगम कर सकता है।
  • किसी कठिन अंश को दोबारा देखकर अपनी शंकाओं और प्रश्नों का समाधान कर सकता है।
  • वीडियो तकनीक को आवश्यकतानुसार व्यवस्थित करके पाठ्य-वस्तु प्राप्त की जा सकती है।
  • यह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में दृश्य और श्रव्य अनुभव को एक साथ उपलब्ध कराता है।

शैक्षिक सी.डी. (Educational C.D.)

विज्ञान और संचार तकनीक के विकास के साथ शिक्षा के स्वरूप में भी परिवर्तन आया है। परम्परागत साधनों के साथ आधुनिक संचार साधनों का प्रयोग बढ़ा है, जिनमें शैक्षिक सी.डी. का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

शैक्षिक सी.डी. के माध्यम से विद्यार्थियों को विषय-वस्तु को बार-बार देखने और सुनने का अवसर मिलता है। इससे कठिन विषयों, अवधारणाओं और समस्याओं को अधिक आसानी से समझा जा सकता है।

शैक्षिक सी.डी. एवं अन्तःक्रियात्मक अधिगम

शैक्षिक सी.डी. विद्यार्थियों में परस्पर संवादात्मक अधिगम (Interactive Learning) को बढ़ावा देती है। इसमें एनिमेशन, डायग्राम, चित्र तथा विभिन्न संकल्पनाओं के माध्यम से तथ्य, प्रश्न और समस्याएँ समझाई जा सकती हैं।

  • एनिमेशन और चित्रों द्वारा जटिल विषयों को सरल बनाया जा सकता है।
  • कठिन संकल्पनाओं को दृश्य रूप में समझने में सहायता मिलती है।
  • विद्यार्थी किसी अवधारणा या समस्या को आवश्यकता के अनुसार पुनः देख और समझ सकता है।
  • सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

शिक्षण में शैक्षिक सी.डी. की उपयोगिता

  • कम शिक्षकों की सहायता से अधिक विद्यार्थियों तक शिक्षण पहुँचाया जा सकता है।
  • कम लागत में अधिक शैक्षिक प्रतिफल प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
  • विद्यार्थियों को कठिन समस्या या अवधारणा बार-बार दिखाकर और सुनाकर समझाई जा सकती है।
  • विभिन्न विषयों को उनके स्वरूप के अनुसार अलग-अलग माध्यमों से स्पष्ट किया जा सकता है।
  • गणित जैसे विषयों को चार्ट और डायग्राम के माध्यम से समझाया जा सकता है।
  • हिन्दी जैसे विषयों में विद्वानों की विचारधारा, जीवनियाँ और उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
  • विद्यार्थियों के ज्ञान, तर्क-शक्ति, अध्ययन में रुचि तथा व्यावहारिक ज्ञान के विकास में सहायता मिलती है।
  • विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में सहायक होती है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वीडियो टेप एक महत्त्वपूर्ण श्रव्य-दृश्य साधन है, जिसका प्रयोग विशेष रूप से दूरवर्ती शिक्षा में किया जाता है।
  • वीडियो टेप की सामग्री को विद्यार्थी अपनी आवश्यकता और सुविधा के अनुसार बार-बार देख सकता है।
  • शैक्षिक सी.डी. एनिमेशन, चित्र, डायग्राम और संकल्पनाओं के माध्यम से कठिन विषयों को सरल बनाती है।
  • शैक्षिक सी.डी. परस्पर संवादात्मक अधिगम को बढ़ावा देती है तथा सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनों प्रकार के ज्ञान में सहायक होती है।
  • वीडियो टेप और शैक्षिक सी.डी. दोनों शिक्षण को सरल, रुचिकर, पुनरावृत्तिमूलक और प्रभावशाली बनाते हैं।

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अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

शिक्षण सहायक सामग्री का प्रकार है—

व्याख्या: शिक्षण सहायक सामग्री को विभिन्न आधारों पर हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर तथा श्रव्य-दृश्य आदि रूपों में वर्गीकृत किया जाता है।
Q 2

प्रदर्शन पट्ट की माप कितनी होनी चाहिए?

व्याख्या: प्रदर्शन पट्ट का सामान्य आकार 4 × 4 फुट अथवा 4 × 6 फुट रखा जा सकता है।
Q 3

रेडियो का आविष्कार किसने किया?

व्याख्या: लगभग 1895 ई. में इटली के इंजीनियर मारकोनी द्वारा रेडियो का आविष्कार किया गया माना जाता है।
Q 4

श्रव्य-दृश्य शिक्षा सम्बन्धी अखिल भारतीय सम्मेलन का आयोजन कब किया गया?

व्याख्या: वर्ष 1951 में अखिल भारतीय श्रव्य-दृश्य शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया गया।
Q 5

कक्षा शिक्षण करते समय शिक्षक द्वारा टी.एल.एम. का प्रयोग करने से—

व्याख्या: टी.एल.एम. विषय-वस्तु को सरल और बोधगम्य बनाने के साथ विद्यार्थियों के मानसिक एवं बौद्धिक विकास में भी सहायक होती है।
Q 6

फ्लैनल बोर्ड किस प्रकार का टी.एल.एम. है?

व्याख्या: फ्लैनल बोर्ड पर चित्र और कटआउट प्रदर्शित किए जाते हैं, इसलिए यह दृश्य शिक्षण सहायक सामग्री है।
Q 7

कौन-सा प्रकृति से प्राप्त टी.एल.एम. नहीं है?

व्याख्या: कंकड़-पत्थर, टहनियाँ और पत्तियाँ प्रकृति से सीधे प्राप्त होती हैं, जबकि मानचित्र निर्मित शिक्षण सामग्री है।
Q 8

निम्नलिखित में से श्रव्य-दृश्य सामग्री नहीं है—

व्याख्या: रेडियो मुख्यतः श्रव्य सामग्री है क्योंकि इससे ज्ञान सुनने के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।
Q 9

गणित किट का उपकरण है—

व्याख्या: फ्रैक्शन डिस्क गणितीय अवधारणाओं, विशेषकर भिन्नों को समझाने में प्रयुक्त गणित किट का उपकरण है।
Q 10

अपेक्षित अधिगम स्तर का निर्धारण करने वाली समिति थी—

व्याख्या: वर्ष 1990 में दवे समिति ने प्राथमिक कक्षाओं के लिए भाषा, गणित और पर्यावरण अध्ययन में न्यूनतम अपेक्षित अधिगम स्तर निर्धारित किए।
Q 11

टेलीविजन सहायक सामग्री है—

व्याख्या: टेलीविजन में विद्यार्थी विषय-वस्तु को देख और सुन दोनों सकता है, इसलिए यह दृश्य-श्रव्य सामग्री है।
Q 12

उत्तम शिक्षण-अधिगम सामग्री होनी चाहिए—

व्याख्या: अच्छी शिक्षण-अधिगम सामग्री कम लागत वाली, बहुउद्देशीय तथा विद्यार्थियों की आयु और मानसिक स्तर के अनुरूप होनी चाहिए।
Q 13

प्रदर्शन युक्ति किस स्तर के छात्रों के लिए उपयोगी है?

व्याख्या: प्राथमिक स्तर पर प्रत्यक्ष प्रदर्शन और गतिविधि आधारित सामग्री बालकों को विषय-वस्तु सरलता से समझने में विशेष रूप से सहायक होती है।
Q 14

सहायक सामग्री का सर्वाधिक प्रयोग किया जा सकता है—

व्याख्या: विज्ञान में वस्तुओं, प्रयोगों, प्रतिमानों और अन्य सहायक सामग्रियों द्वारा अवधारणाओं को प्रत्यक्ष रूप से समझाने की विशेष आवश्यकता होती है।
Q 15

दृश्य सामग्री है—

व्याख्या: श्यामपट्ट ऐसी सामग्री है जिसे देखकर ज्ञान प्राप्त किया जाता है, इसलिए यह दृश्य शिक्षण सामग्री है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय शिक्षण-अधिगम के सिद्धान्त के अध्याय अपेक्षित अधिगम स्तर एवं शिक्षण अधिगम सामग्री से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1 2016

अपेक्षित अधिगम स्तर किसे कहते हैं?

Q 2

शिक्षण सामग्री चयन के प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।

Q 3

प्रकृति से प्राप्त शिक्षण सहायक सामग्री के अन्तर्गत कौन-कौन सी सहायक सामग्री आती हैं?

Q 4

पूरक सामग्री के स्रोत बताइए।

Q 5

शिक्षण-अधिगम-सामग्री के रख-रखाव में क्या सावधानी रखनी चाहिए?

Q 6 2016, 2019

अपेक्षित अधिगम स्तर सम्प्राप्ति के चार उपाय लिखिए।

Q 7 2019

श्रव्य-दृश्य शिक्षण अधिगम सामग्री की चार विशेषताएँ लिखिए।

Q 8 2018

कक्षा-शिक्षण में शिक्षण-अधिगम सामग्री की आवश्यकता तथा महत्त्व पर प्रकाश डालिए।

Q 9 2017

अपेक्षित अधिगम स्तर की संप्राप्ति में अधिगम अनुभवों की क्या भूमिका है?

Q 10 2017

दूरदर्शन का शिक्षा में क्या महत्त्व है?

Q 11 2016, 2017

उत्तम शिक्षण-अधिगम सामग्री की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Q 12 2016

अपेक्षित अधिगम स्तर की संकल्पना को स्पष्ट कीजिए।

Q 13

शिक्षण अधिगम सामग्री से आप क्या समझते हैं? शिक्षण में दृश्य उपकरणों की उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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