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Home Study Material Semester 1 संस्कृत संस्कृत वन्दना एवं नीतिपरक वाक्यों का ज्ञान
Chapter 5 • संस्कृत

संस्कृत वन्दना एवं नीतिपरक वाक्यों का ज्ञान

UP DELED Semester 1 के संस्कृत विषय के इस अध्याय में सस्वर वाचन, वन्दना के रूप एवं महत्व, संस्कृत वन्दना और श्लोकों का वाचन, नीतिपरक वाक्यों का अर्थ एवं विकास, श्लोकों के अर्थ-ज्ञान की शिक्षण विधियाँ तथा प्रमुख श्लोकों एवं नीतिपरक वाक्यों के अर्थ का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

8
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15
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Topic 1 सस्वर वाचन—अर्थ एवं महत्व

सस्वर वाचन—अर्थ एवं महत्व

सस्वर वाचन का अर्थ

सस्वर वाचन का अर्थ है किसी लिखित सामग्री को स्पष्ट, शुद्ध और प्रभावपूर्ण ढंग से उचित स्वर के साथ पढ़ना। इसमें शब्दों का सही उच्चारण, प्रत्येक ध्वनि को मधुरता के साथ बोलना तथा उचित बल और विराम का प्रयोग करना आवश्यक होता है।

सस्वर वाचन करते समय प्रत्येक शब्द को दूसरे शब्दों से स्पष्ट रूप से अलग करके पढ़ना चाहिए, जिससे सुनने वाला व्यक्ति कथ्य को आसानी से समझ सके।

सस्वर वाचन की प्रमुख विशेषताएँ

  • वाचन स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए।
  • शब्दों का उच्चारण सही होना चाहिए।
  • प्रत्येक ध्वनि को मधुरता के साथ उच्चारित करना चाहिए।
  • शब्दों को एक-दूसरे से स्पष्ट रूप से अलग करके पढ़ना चाहिए।
  • उचित स्थान पर बल और विराम का प्रयोग करना चाहिए।
  • वाचन इतना प्रभावपूर्ण होना चाहिए कि श्रोता उसके भाव और अर्थ को समझ सकें।

शिक्षण में सस्वर वाचन

पाठ्यपुस्तक पढ़ाते समय सर्वप्रथम शिक्षक को प्रस्तुत अंश का सस्वर वाचन करना चाहिए। इसके बाद विद्यार्थियों से उसी अंश का सस्वर वाचन कराया जाना चाहिए। शिक्षक का आदर्श वाचन विद्यार्थियों को सही उच्चारण, उचित स्वर, बल और विराम सीखने में सहायता करता है।

सस्वर वाचन के नियमित अभ्यास से विद्यार्थियों की मौखिक अभिव्यक्ति से सम्बन्धित शंकाएँ और संकोच दूर होते हैं।

वाचन का अर्थ

किसी भी भाषा को सीखने के लिए चार प्रमुख कौशलों—पढ़ना, लिखना, बोलना तथा सुनना—की आवश्यकता होती है। इन चारों कौशलों का विकास होने पर ही भाषा-ज्ञान को पूर्ण माना जाता है।

‘वाचन’ शब्द ‘वाक्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ शब्द, वाणी अथवा कथन है।

वाचन के रूप

वाचन को मुख्य रूप से दो अर्थों में समझा जा सकता है—

रूप अर्थ
संकुचित अर्थ लिखे हुए अथवा छपे हुए शब्दों का उच्चारण करना।
व्यापक अर्थ ध्वनियों के प्रतीकों और लिपिबद्ध शब्दों को उचित गति से पढ़कर उनका अर्थ ग्रहण करना।

आदर्श वाचन या पठन

लिखित शब्दों को केवल बोल देना ही पूर्ण वाचन नहीं है। जब शब्दों को उचित गति, शुद्ध उच्चारण और सही भाव के साथ पढ़ते हुए उनका अर्थ भी ग्रहण किया जाए, तब उसे आदर्श वाचन या पठन कहा जाता है।

केशरिन ओकानर के अनुसार, “वाचन सीखने की वह जटिल प्रक्रिया है जिससे सुनने के गतिवाही माध्यमों का मानसिक पक्षों से सम्बन्ध होता है।”

सस्वर वाचन का महत्व

  • यह शुद्ध और स्पष्ट उच्चारण का अभ्यास कराता है।
  • विद्यार्थियों को उचित बल और विराम का ज्ञान होता है।
  • वाणी में मधुरता और प्रभावशीलता आती है।
  • श्रोता पाठ के भाव और अर्थ को आसानी से समझ पाते हैं।
  • विद्यार्थियों की मौखिक अभिव्यक्ति बेहतर होती है।
  • बोलने और पढ़ने से सम्बन्धित संकोच तथा शंकाएँ दूर होती हैं।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • स्पष्ट, शुद्ध और उचित स्वर के साथ पढ़ना सस्वर वाचन कहलाता है।
  • सस्वर वाचन में सही उच्चारण, मधुरता, उचित बल और विराम आवश्यक हैं।
  • भाषा सीखने के चार कौशल—पढ़ना, लिखना, बोलना और सुनना हैं।
  • वाचन का संकुचित अर्थ लिखित या मुद्रित शब्दों का उच्चारण करना है।
  • वाचन का व्यापक अर्थ शब्दों को उचित गति से पढ़कर उनका अर्थ ग्रहण करना है।
  • सस्वर वाचन विद्यार्थियों की मौखिक अभिव्यक्ति को प्रभावी बनाता है और संकोच दूर करता है।

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Topic 2 वन्दना—अर्थ, रूप एवं सामूहिक वन्दना का महत्व

वन्दना—अर्थ, रूप एवं सामूहिक वन्दना का महत्व

वन्दना का अर्थ

मनुष्य अपने विचारों की अभिव्यक्ति अपनी वाणी के माध्यम से करता है। प्रातःकाल भगवान की स्तुति करते समय उसकी वाणी में स्वतः मधुरता, सहजता और सरलता आ जाती है। व्यक्ति अपने इष्ट देव के प्रति अपने भावों को वन्दना, स्तुति अथवा श्लोकों के रूप में प्रकट करता है।

वन्दना और श्लोक मनुष्य को ज्ञान, उल्लास तथा अपने मूल्यों की पहचान कराते हैं। जब वन्दना को उच्च स्वर में स्पष्ट और मधुर रूप से पढ़ा जाता है, तो वह स्वयं समझने योग्य होने के साथ-साथ श्रोताओं को भी आकर्षित करती है।

वन्दना का महत्व

वन्दना मनुष्य के लिए एक प्रकार की शक्ति है। सच्चे मन और ध्यानपूर्वक उच्च स्वर में की गई वन्दना मन को ऊर्जा प्रदान करती है। शुभ कार्य के आरम्भ में की जाने वाली वन्दना सभी के मन में उत्साह उत्पन्न करती है।

अपने इष्ट की पूजा और वन्दना सस्वर वाचन के माध्यम से की जाती है। यह वन्दना पूरे दिन को ऊर्जा से भर देती है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र और प्रत्येक समय में पूजा एवं वन्दना करने का संस्कार मानव में गहराई से विद्यमान है।

वन्दना के रूप

वन्दना को दो रूपों में समझा जाता है—

  1. व्यक्तिगत वन्दना
  2. सामूहिक वन्दना

1. व्यक्तिगत वन्दना

जब कोई व्यक्ति अपनी अनुभूति और आत्मशान्ति के लिए स्वयं प्रभु की वन्दना करता है तथा उससे प्राप्त आनन्द का अनुभव स्वयं करता है, तो उसे व्यक्तिगत वन्दना कहते हैं।

अर्थात् आत्मशान्ति के लिए व्यक्तिगत रूप से की जाने वाली वन्दना व्यक्तिगत वन्दना कहलाती है।

2. सामूहिक वन्दना

समूह का अर्थ पाँच-छः से अधिक व्यक्तियों के समूह से है। जब किसी समूह के सभी व्यक्ति पारस्परिक रूप से एक साथ वन्दना करते हैं, तो उसे सामूहिक वन्दना कहते हैं।

विद्यालय में सामूहिक वन्दना का महत्व

विद्यालय में सामूहिक वन्दना का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों में सामुदायिक भावना का विकास करना है। एक साथ वन्दना करने से पूरे समूह में अपनत्व की भावना उत्पन्न होती है तथा उनमें वैचारिक एकाग्रता विकसित होती है।

सामूहिक वन्दना विद्यार्थियों में अधिक सीखने की इच्छा उत्पन्न करती है। संस्कृत शिक्षण में वन्दना के साथ नीतिपरक श्लोकों, वाक्यों और सूक्तियों का सस्वर वाचन भी कराया जाता है। इससे विद्यार्थी नीतिपरक श्लोकों को व्यवस्थित रूप से कंठस्थ कर पाते हैं तथा कठिन संस्कृत श्लोकों को बोलने और समझने में सहायता मिलती है।

नीतिपरक श्लोकों और वाक्यों का सस्वर वाचन तभी प्रभावी रूप से कराया जा सकता है जब विद्यार्थी उन्हें पढ़ना जानते हों। इसलिए विद्यार्थियों में पढ़ने की योग्यता विकसित करना आवश्यक है। यह प्रक्रिया पहले परिवार और फिर विद्यालय में आगे बढ़ती है।

सामूहिक वन्दना से होने वाले लाभ

  • विद्यार्थियों में सामुदायिक भावना का विकास होता है।
  • समूह के सदस्यों में अपनत्व और एकता की भावना उत्पन्न होती है।
  • वैचारिक एकाग्रता बढ़ती है।
  • अधिक सीखने की इच्छा जागृत होती है।
  • नीतिपरक श्लोकों, वाक्यों और सूक्तियों का ज्ञान प्राप्त होता है।
  • श्लोकों को कंठस्थ करने में सहायता मिलती है।
  • कठिन संस्कृत श्लोकों को बोलना और समझना सरल होता है।
  • आत्मविश्वास की वृद्धि होती है।
  • जीवन की नीतियों का ज्ञान प्राप्त होता है।
  • व्यक्ति अपने परिवार तथा समाज के सर्वांगीण विकास में सक्षम बनता है।

भाषा और विचारों के विकास में महत्व

वन्दना और श्लोकों के सस्वर वाचन से उच्चारण सम्बन्धी त्रुटियों का ज्ञान होता है तथा भाषा-ज्ञान में वृद्धि होती है। विद्यार्थियों के विचारों में नवीनता आती है और वे केवल ‘स्व’ की भावना तक सीमित न रहकर ‘वयम्’ अर्थात् हम सब की भावना को महत्व देना सीखते हैं।

इस प्रकार उनके मन में—

  • ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ — सभी सुखी हों,
  • ‘परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः’ — वृक्ष दूसरों के उपकार के लिए फलते हैं,
  • ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव’ — माता और पिता को देवतुल्य मानने

जैसी भावनाएँ विकसित होती हैं। इन भावों के साथ विद्यार्थी जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में आत्मविश्वास और आनन्द का अनुभव करते हैं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वन्दना इष्ट देव के प्रति भावों को स्तुति या श्लोकों के रूप में प्रकट करना है।
  • वन्दना मनुष्य को ज्ञान, उल्लास, ऊर्जा और अपने मूल्यों की पहचान कराती है।
  • वन्दना के दो रूप—व्यक्तिगत और सामूहिक वन्दना हैं।
  • व्यक्तिगत वन्दना आत्मशान्ति और व्यक्तिगत आनन्द के लिए की जाती है।
  • समूह के व्यक्तियों द्वारा एक साथ की गई वन्दना सामूहिक वन्दना कहलाती है।
  • विद्यालय में सामूहिक वन्दना से सामुदायिक भावना, अपनत्व, एकाग्रता, आत्मविश्वास और सीखने की इच्छा बढ़ती है।
  • सस्वर वन्दना और श्लोक-पाठ से उच्चारण सुधरता है, भाषा-ज्ञान बढ़ता है और नैतिक मूल्यों का विकास होता है।
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Topic 3 वन्दना एवं श्लोकों का सस्वर वाचन

वन्दना एवं श्लोकों का सस्वर वाचन

वन्दना एवं श्लोकों का सस्वर वाचन

वन्दना और संस्कृत श्लोकों का वाचन स्पष्ट, शुद्ध और उचित स्वर के साथ कराया जाना चाहिए। शिक्षक पहले स्वयं आदर्श वाचन करे और उसके बाद विद्यार्थियों से वन्दना तथा श्लोकों का सस्वर वाचन कराए।

सरस्वती स्तोत्रम्

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥ १॥

दोर्भिर्युक्ता चतुर्भिः स्फटिकमणिनिभैरक्षमालान्दधाना
हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण।
भासा कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकमणिनिभा भासमानासमाना
सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना॥ २॥

सुरासुरसेवितपादपङ्कजा
करे विराजत्कमनीयपुस्तका।
विरिञ्चिपत्नी कमलासनस्थिता
सरस्वती नृत्यतु वाचि मे सदा॥ ३॥

सरस्वती सरसिजकेसरप्रभा
तपस्विनी सितकमलासनप्रिया।
घनस्तनी कमलविलोललोचना
मनस्विनी भवतु वरप्रसादिनी॥ ४॥

सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥ ५॥

सस्वर वाचन हेतु श्लोक

श्लोक 1

अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम्।
अधनस्य कुतो मित्रम्, अमित्रस्य कुतः सुखम्॥

श्लोक 2

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥

श्लोक 3

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति॥

श्लोक 4

बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धनः।
श्रुतवानपि मूर्खोऽसौ यो धर्मविमुखो जनः॥

श्लोक 5

जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं,
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं,
सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥

श्लोक 6

चन्दनं शीतलं लोके, चन्दनादपि चन्द्रमाः।
चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः॥

श्लोक 7

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

श्लोक 8

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥

श्लोक 9

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन,
दानेन पाणिर्न तु कंकणेन,
विभाति कायः करुणापराणां,
परोपकारैः न तु चन्दनेन॥

श्लोक 10

पुस्तकस्था तु या विद्या, परहस्तगतं च धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने सा विद्या न तद् धनम्॥

श्लोक 11

विद्या मित्रं प्रवासेषु, भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च॥

श्लोक 12

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः॥

श्लोक 13

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥

श्लोक 14

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

श्लोक 15

नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः।
शुष्क वृक्षाश्च मूर्खाश्च न नमन्ति कदाचन॥

श्लोक 16

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥

सस्वर वाचन में ध्यान रखने योग्य बातें

  • श्लोकों का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए।
  • वाचन उचित स्वर, गति और लय के साथ किया जाना चाहिए।
  • शिक्षक पहले आदर्श वाचन करे और फिर विद्यार्थियों से वाचन कराए।
  • श्लोक के प्रत्येक शब्द को स्पष्ट रूप से उच्चारित किया जाए।
  • नियमित सस्वर वाचन से श्लोकों को बोलने और याद करने का अभ्यास होता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वन्दना एवं श्लोकों का वाचन शुद्ध उच्चारण और उचित स्वर के साथ करना चाहिए।
  • सरस्वती स्तोत्र के पाँच पदों का सस्वर वाचन कराया जाता है।
  • विद्यार्थियों को दिए गए सभी श्लोकों का स्पष्ट और क्रमबद्ध वाचन करना चाहिए।
  • शिक्षक का आदर्श वाचन विद्यार्थियों को सही उच्चारण, स्वर और गति सीखने में सहायता करता है।
  • सस्वर वाचन से संस्कृत श्लोकों के अध्ययन और कंठस्थीकरण में सहायता मिलती है।

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Topic 4 नीतिपरक वाक्य—अर्थ, उद्भव, विकास एवं सस्वर वाचन

नीतिपरक वाक्य—अर्थ, उद्भव, विकास एवं सस्वर वाचन

नीति का अर्थ

उचित समय और उचित स्थान पर उचित कार्य करने की कला को नीति कहते हैं। नीति सोच-समझकर बनाई गई ऐसी प्रणाली है, जो मनुष्य को उचित निर्णय लेने और उसके अच्छे परिणाम प्राप्त करने में सहायता करती है।

नीति को जीवन में एक प्रक्रिया अथवा नवाचार के रूप में अपनाया जाता है। नीति के अनुसार आचरण करने से मनुष्य का जीवन सुखी और मधुर बनता है। नीतिमान व्यक्तियों के द्वारा ही श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण होता है।

नीतिपरक वाक्यों का अर्थ एवं उद्देश्य

नीतिपरक श्लोक और नीति-वचन बच्चों में नैतिकता की भावना का विकास करते हैं। इनके अध्ययन से दया, प्रेम और सहिष्णुता जैसी भावनाएँ विकसित होती हैं।

बालक अपने परिवार से ही दया, प्रेम और आपसी सहिष्णुता की भावना सीखता है। इन भावों से सम्बन्धित नीति-वचनों और श्लोकों का शुद्ध उच्चारण तथा अर्थ-बोध कराने से विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों का विकास किया जा सकता है।

नीतिपरक श्लोकों एवं वाक्यों का उद्भव और विकास

नीतिपरक श्लोकों और वाक्यों की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। इसका आरम्भ विश्व साहित्य के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद से माना गया है। ब्राह्मण ग्रन्थों, उपनिषदों, रामायण और महाभारत में भी नीति सम्बन्धी सदुपदेश प्राप्त होते हैं। नीति-ग्रन्थों का विकास स्मृति-ग्रन्थों से भी माना जाता है।

चाणक्य नीति

नीतिशास्त्र का सर्वप्रथम संग्रह ‘चाणक्य संग्रह’ है, जिसे चाणक्य नीति के नाम से भी जाना जाता है। इसमें व्यवहार सम्बन्धी श्लोकों के साथ राजनीति सम्बन्धी श्लोक भी मिलते हैं।

इन नीतिपरक सदुपदेशों का सम्बन्ध चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रसिद्ध गुरु अमात्य चाणक्य के साथ जोड़ा जाता है, परन्तु यह स्पष्ट नहीं है कि इसके लेखक अर्थशास्त्र के रचयिता चाणक्य ही हैं।

चाणक्य नीतिशास्त्र में 108 श्लोक हैं, जो अनुष्टुप छन्द में रचित हैं।

भर्तृहरि का नीति शतक

नीतिशास्त्र का पूर्ण विकास भर्तृहरि के समय में हुआ। भर्तृहरि द्वारा रचित नीति शतक नीतिकाव्यों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमें मानव जीवन से सम्बन्धित विभिन्न विषयों और समस्याओं का वर्णन मिलता है।

नीति शतक में सच्चा मानव उसे माना गया है, जो अपने मन में परम सन्तोष का अनुभव करता है।

भर्तृहरि ने नीति शतक में कहा है—

वाण्येकोऽपि समलंकरोति पुरुषं या संस्कृताधीयते।
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥

नीतिपरक वाक्यों का सस्वर वाचन

नीतिपरक वाक्यों का वाचन स्पष्ट, शुद्ध और उचित स्वर के साथ करना चाहिए। शिक्षक पहले उनका आदर्श वाचन कर सकता है और इसके बाद विद्यार्थियों से सस्वर वाचन कराया जा सकता है।

1.

कार्यकाले समुत्पन्ने सा विद्या न तद् धनम्॥

2.

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।

3.

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।

4.

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।

5.

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।

6.

सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥

7.

चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः॥

8.

परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥

9.

परोपकारैः न तु चन्दनेन॥

10.

विद्या धनं सर्वं धनं प्रधानम्।

11.

आचारः परमो धर्मः।

12.

सत्यमेव जयते नानृतम्।

नीतिपरक वाक्यों का शैक्षिक महत्व

  • विद्यार्थियों में नैतिकता की भावना विकसित होती है।
  • दया, प्रेम और सहिष्णुता जैसे गुणों का विकास होता है।
  • अच्छे और उचित आचरण की प्रेरणा मिलती है।
  • सस्वर वाचन से शुद्ध उच्चारण का अभ्यास होता है।
  • विद्यार्थियों में नीति-वचनों के अर्थ और नैतिक मूल्यों को समझने की क्षमता विकसित होती है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • उचित समय और स्थान पर उचित कार्य करने की कला को नीति कहते हैं।
  • नीतिपरक वाक्य दया, प्रेम, सहिष्णुता और नैतिकता की भावना विकसित करते हैं।
  • नीतिपरक श्लोकों और वाक्यों की परम्परा ऋग्वेद से मानी गई है।
  • ब्राह्मण ग्रन्थों, उपनिषदों, रामायण और महाभारत में भी नीति के सदुपदेश मिलते हैं।
  • नीतिशास्त्र का सर्वप्रथम संग्रह ‘चाणक्य संग्रह’ है, जिसे चाणक्य नीति भी कहा जाता है।
  • चाणक्य नीतिशास्त्र में 108 श्लोक हैं और वे अनुष्टुप छन्द में रचित हैं।
  • भर्तृहरि का नीति शतक नीतिकाव्यों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
  • नीतिपरक वाक्यों का सस्वर वाचन शुद्ध एवं स्पष्ट उच्चारण के साथ करना चाहिए।
Topic 5 श्लोकों का अर्थ ज्ञान—प्रमुख शिक्षण विधियाँ

श्लोकों का अर्थ ज्ञान—प्रमुख शिक्षण विधियाँ

श्लोकों के अर्थ-ज्ञान की शिक्षण विधियाँ

संस्कृत शिक्षण में नीतिपरक श्लोकों और वाक्यों का विशेष महत्व है। विद्यार्थियों को श्लोकों का अर्थ अनेक शिक्षण विधियों द्वारा समझाया जा सकता है। इन विधियों से विद्यार्थियों में रुचि, लगन और उत्साह उत्पन्न होता है तथा वे संस्कृत के काव्यगत श्लोकों का अर्थ सरलता से ग्रहण कर पाते हैं।

1. परम्परागत विधि

इस विधि में शिक्षक पहले स्वयं श्लोक का वाचन करता है। इसके बाद विद्यार्थियों से शुद्ध उच्चारण के साथ श्लोक का वाचन कराया जाता है। श्लोक-पाठ में उचित शैली, आरोह-अवरोह, ताल, यति, गति और लय का ध्यान रखा जाता है।

शिक्षक एक-एक पंक्ति का उच्चारण करता है और विद्यार्थी उसका अनुकरण करते हैं। इससे श्लोक का सस्वर वाचन मधुर बनता है और विद्यार्थियों को अर्थ समझने में भी सरलता होती है।

उदाहरण—

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूपम्॥

शब्दार्थ
संस्कृत शब्द हिन्दी अर्थ
त्वम्तुम
आदिदेवसबसे पहले देवता
विश्वस्यसंसार के
निधानम्खजाना
अर्थ

अर्जुन भगवान कृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहते हैं—हे भगवान! तुम्हीं सर्वप्रथम देवता हो, तुम्हीं सर्वप्रथम पुरुष हो, तुम्हीं इस संसार के सबसे बड़े खजाने हो, तुम्हीं जानने योग्य वस्तुओं के ज्ञाता हो, तुम्हीं सबसे बड़े धाम हो और तुम्हीं इस संसार में अनेक रूपों में फैले हुए हो।

2. गीत एवं नाट्य प्रणाली

इस प्रणाली में संगीतमय वातावरण बनाकर श्लोकों का गायन कराया जाता है। यह विधि प्रारम्भिक स्तर पर अधिक उपयोगी होती है। उचित लय और ताल के साथ गायन करने से विद्यार्थियों में रुचि उत्पन्न होती है और वे श्लोक के अर्थ को सरलता से समझ पाते हैं।

शिक्षक मधुर स्वर में श्लोक का गायन करता है और उसके बाद विद्यार्थियों को भी श्लोक गाकर पढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

उदाहरण—

त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देव देवः॥

अर्थ

तुम्हीं माता हो, तुम्हीं पिता हो। तुम्हीं बन्धु-बान्धव हो और तुम ही मित्र हो। तुम्हीं विद्या अर्थात् ज्ञान हो, तुम ही धन-धान्य हो। हे देवों के देव! तुम ही ईश्वर और मेरे सब कुछ हो।

3. व्याख्या विधि

इस विधि में शिक्षक श्लोक के प्रत्येक शब्द का अर्थ समझाता है और उसके बाद पूरे श्लोक का भावार्थ तथा व्याख्या स्पष्ट करता है। इससे विद्यार्थी एक-एक शब्द की गहराई तक जाकर श्लोक का सही अर्थ समझ पाते हैं।

उदाहरण—

साहित्य संगीत कला विहीनः
साक्षात्पशुः पुच्छविषाण हीनः।
तृणं न खादन्नपि जीवमानः
तद्भागधेयं परमं पशूनाम्॥

शब्दार्थ
संस्कृत शब्द हिन्दी अर्थ
साहित्य संगीत कलाविहीनः साहित्य, संगीत और कला से रहित
साक्षात् पशु पुच्छ विषाणहीनः पूँछ और सींग रहित पशु
तृणं तिनका, घास-फूस
न खादन्नपि न खाते हुए भी
जीवमानः जीवित रहता है
तत् वह
पशूनाम् पशुओं का
भागधेयम् सौभाग्य है
भावार्थ

साहित्य, संगीत और कला के ज्ञान से विहीन मनुष्य बिना पूँछ और सींग वाले पशु के समान होता है। वह घास-फूस न खाते हुए भी जीवित रहता है, यही पशुओं का सौभाग्य है।

व्याख्या

मनुष्य का जन्म बड़ी कठिन तपस्या के पश्चात् प्राप्त होता है, इसलिए मनुष्य को अपने जीवन के उचित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तत्पर रहना चाहिए। यदि मनुष्य विद्या, कला और संगीत का ज्ञान प्राप्त नहीं करता तो वह अशिक्षित रह जाता है। इसलिए मनुष्य को साहित्य, संगीत और कलाओं में रुचि लेकर उनमें अधिक से अधिक सहभागिता करनी चाहिए।

4. अन्वय विधि

अन्वय विधि से शिक्षक विद्यार्थियों को श्लोक के शब्दों का सही क्रम, उनका परस्पर सम्बन्ध और श्लोक का भाव समझाता है। इस विधि से विद्यार्थी श्लोक का अर्थ आसानी से समझते हैं।

अन्वय विधि के दो प्रकार हैं—

  1. दण्डान्वय विधि
  2. खण्डान्वय विधि

4.1 दण्डान्वय विधि

इस विधि में श्लोक की विभक्ति और प्रत्ययों को ध्यान में रखकर कर्ता, कर्म, क्रिया और विशेषण आदि को खोजा जाता है। इसके बाद शब्दों को क्रम से व्यवस्थित करके पूर्ण वाक्य या दण्ड बनाया जाता है।

उदाहरण—

तं तथा कृपयाविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥

प्रश्नोत्तर द्वारा अर्थ-ज्ञान

प्रश्न— अस्मिन् श्लोके कः कर्ता अस्ति?
उत्तर— मधुसूदनः कर्ता अस्ति।

प्रश्न— अस्मिन् श्लोके क्रिया का अस्ति?
उत्तर— अस्मिन् श्लोके ‘उवाच’ क्रिया अस्ति।

प्रश्न— कः कर्मः अस्ति?
उत्तर— इदम् वाक्यम् कर्मः अस्ति।

अन्वय

तथा कृपयाविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् विषीदन्तम् तं (अर्जुनं) मधुसूदनः इदम् वाक्यम् उवाच।

अर्थ

इस प्रकार करुणा के कारण अश्रुपूरित व्याकुल नेत्र वाले उस अर्जुन से मधुसूदन अर्थात् कृष्ण ने यह वाक्य कहे।

4.2 खण्डान्वय विधि

खण्डान्वय में सबसे पहले श्लोक का प्रधान वाक्य ढूँढा जाता है। इसके बाद प्रश्न और उत्तर के माध्यम से शेष अंश का ज्ञान कराया जाता है। इन प्रश्नों के द्वारा कर्ता, क्रिया, कर्म, विशेषण और अव्यय आदि को समझाया जाता है।

उदाहरण—

प्रीणाति यः सुचरितैः पितरं स पुत्रो
यद् भर्तुरेव हितमिच्छति तत् कलत्रम्।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत्त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते॥

शिक्षक प्रश्न— सुपुत्रः कः भवति?
छात्र उत्तर— यः पुत्रः पितरं सुचरितैः प्रीणाति सः सुपुत्रः भवति।

शिक्षक प्रश्न— सुकलत्रम् का भवति?
छात्र उत्तर— यद् भर्तुरेव हितम् इच्छति तत् सुकलत्रम् भवति।

शिक्षक प्रश्न— सुमित्रं किम् भवति?
छात्र उत्तर— यद् आपदि सुखे च समक्रियं तत् सुमित्रं भवति।

शिक्षक प्रश्न— जगति एतत्त्रयं के लभन्ते?
छात्र उत्तर— जगति एतत्त्रयं पुण्यकृतो लभन्ते।

भावार्थ

जो अपने अच्छे आचरण से माता-पिता को प्रसन्न रखता है, वह सच्चा पुत्र है। जो अपने पति के हित की इच्छा करती है, वह अच्छी पत्नी है। जो संकट और सुख दोनों स्थितियों में समान व्यवहार करता है, वह सच्चा मित्र है। ये तीनों संसार में पुण्य कर्म करने वाले व्यक्ति को ही प्राप्त होते हैं।

5. चित्रों द्वारा श्लोकों एवं नीति-वाक्यों का अर्थ ज्ञान

चित्रों के माध्यम से श्लोकों का अर्थ सरल और आकर्षक ढंग से समझाया जा सकता है। चित्र विद्यार्थियों में रुचि उत्पन्न करते हैं और श्लोक के भाव को समझने में सहायता करते हैं।

गणेश भगवान से सम्बन्धित श्लोक

अभीप्सितार्थ सिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः।
सर्व विघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः॥

शिक्षक प्रश्न— प्रस्तुत चित्रे त्वम् किं पश्यसि?
छात्र उत्तर— अहम् गजाननम् पश्यामि।

शिक्षक प्रश्न— विघ्नहर्ता कः अस्ति?
छात्र उत्तर— विघ्नहर्ता गजाननः अस्ति।

शिक्षक प्रश्न— सुखकर्ता कः अस्ति?
छात्र उत्तर— सुखकर्ता गजाननः अस्ति।

श्लोकार्थ

जो गणेश भगवान देवता और राक्षसों के द्वारा पूजे जाते हैं तथा जो सभी विघ्नों का नाश करने वाले हैं, उनको मैं अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिए नमस्कार करता हूँ।

सूर्य से सम्बन्धित श्लोक

उदेति सविता ताम्रस्ताम्र एवास्तमेति।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥

शिक्षक प्रश्न— अस्मिन् चित्रे त्वम् किं पश्यसि?
छात्र उत्तर— अहम् सूर्यम् पश्यामि।

शिक्षक प्रश्न— सूर्यः कस्यां दिशायाम् उदेति?
छात्र उत्तर— सूर्यः पूर्वस्यां दिशायाम् उदेति।

शिक्षक प्रश्न— सूर्यस्य प्रकाशः कीदृशं अस्ति?
छात्र उत्तर— सूर्यस्य प्रकाशः अरुणः भवति।

श्लोकार्थ

जिस प्रकार सूर्य लाल ही उदय होता है और लाल ही अस्त होता है, उसी प्रकार सम्पत्ति और विपत्ति में महापुरुष एक समान रहते हैं।

सुखी और दुःखी व्यक्तियों के चित्र दिखाकर भी विद्यार्थियों को इस भाव को सरलता से समझाया जा सकता है।

6. फ्लैश कार्ड द्वारा अर्थ-ज्ञान

इस विधि में शिक्षक रंग-बिरंगे फ्लैश कार्ड तैयार करता है। कार्ड के एक ओर संस्कृत शब्द और दूसरी ओर उसका हिन्दी अर्थ लिखा जाता है। इससे विद्यार्थियों की पढ़ने और समझने में रुचि बढ़ती है।

उदाहरण—

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥

शब्दार्थ
संस्कृत शब्द हिन्दी अर्थ
नमःनमस्कार है
पुरस्तात्सामने से या आगे से
पृष्ठतेपीछे से
तेतुम्हारे लिए
सर्वत्रसब जगह
अनन्तअत्यधिक
वीर्यःसामर्थ्य
अमितविक्रमःबहुत पराक्रमी
सर्वंसमस्त संसार को
समाप्नोषिप्राप्त किए हुए है
ततःइससे
सर्वःसर्वरूप
असिहो
भावार्थ

हे ईश्वर! हम आपको आगे से और पीछे से भी नमस्कार करते हैं। हे सर्वात्मन्! हम आपको सभी ओर से नमस्कार करते हैं। आप अनन्त पराक्रमी हैं। आप सारे संसार को प्राप्त किए हुए हैं, इसलिए आप ही सर्वरूप हैं।

7. तुलनात्मक विधि या भावसाम्य विधि

इस विधि में किसी श्लोक की तुलना उसी प्रकार के अर्थ और भाव वाले दूसरे श्लोक या पद से की जाती है। इससे विद्यार्थियों की विषय के प्रति रुचि बढ़ती है और श्लोक का अर्थ समझना आसान होता है।

इस विधि से विद्यार्थियों में भावसाम्यता, तर्क-शक्ति, निरीक्षण-शक्ति और चिन्तन-शक्ति का विकास होता है।

उदाहरण—

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥

भावसाम्य पद

वृक्ष कबहुँ नहि फल भखै नदी न संच नीर।
परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर॥

शब्दार्थ
  • परोपकाराय = पर + उपकाराय
  • पर = दूसरों या दूसरा
  • उपकार = भलाई
  • उपकाराय = चतुर्थी विभक्ति में ‘आय’ अर्थात् ‘के लिए’—दूसरों की भलाई के लिए।

अन्य सरल शब्द–वाक्य–अर्थ अभ्यास

श्लोकों के अर्थ-ज्ञान के लिए संस्कृत के कठिन शब्दों को अलग करके उनसे सम्बन्धित सूक्ति या वाक्य के माध्यम से अर्थ भी समझाया जा सकता है।

संस्कृत शब्द वाक्य अर्थ
विद्या विद्या धर्मेण शोभते। विद्या धर्म से ही शोभा देती है।
सतां परोपकाराय सतां विभूतयः। सज्जनों की सम्पदा परोपकार के लिए ही होती है।
करोति समय एव करोति बलाबलम्। समय ही मनुष्य को सबल एवं निर्बल बनाता है।
यत्र यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता। जहाँ नारियाँ पूजी जाती हैं अर्थात् स्त्रियों का आदर-सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।
अविवेकः अविवेकः परमापदां पदम्। अज्ञान समस्त आपत्तियों का आधार है।
किं बुभुक्षितं किं न करोति पापम्। भूखा व्यक्ति कौन-सा पाप नहीं करता।
भोग्या वीर भोग्या वसुन्धरा। यह पृथ्वी वीर पुरुषों के लिए भोगनीय है।
घटं जल बिन्दु निपातेन एव घटं पूर्यति। एक-एक बूँद से घड़ा भर जाता है।
हितं हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः। हितकारी एवं मनोहर वचन दुर्लभ हैं।
पन्था महाजनः येन गतः सः पन्थाः। सज्जन व्यक्ति जिस रास्ते पर चलते हैं, वही रास्ता श्रेष्ठ होता है।
जायेत कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति। पुत्र कुपुत्र पैदा हो सकता है, पर माता कभी भी कुमाता अर्थात् बुरी माता नहीं होती।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • श्लोकों का अर्थ समझाने के लिए परम्परागत, गीत एवं नाट्य, व्याख्या, अन्वय, चित्र, फ्लैश कार्ड और तुलनात्मक विधि का प्रयोग किया जा सकता है।
  • परम्परागत विधि में शिक्षक के आदर्श वाचन के बाद विद्यार्थी श्लोक का अनुकरण करते हैं।
  • व्याख्या विधि में शब्दार्थ, भावार्थ और व्याख्या द्वारा अर्थ स्पष्ट किया जाता है।
  • अन्वय विधि के दो प्रकार—दण्डान्वय और खण्डान्वय हैं।
  • चित्र और फ्लैश कार्ड विद्यार्थियों के लिए अर्थ-ज्ञान को अधिक सरल एवं रोचक बनाते हैं।
  • तुलनात्मक या भावसाम्य विधि में समान भाव वाले श्लोकों की तुलना करके अर्थ समझाया जाता है।

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Topic 6 नीति वचन एवं सुभाषितानि से सम्बन्धित गतिविधियाँ

नीति वचन एवं सुभाषितानि से सम्बन्धित गतिविधियाँ

नीति वचन एवं सुभाषितानि से सम्बन्धित गतिविधियाँ

नीति-वचनों, सूक्तियों और सुभाषितों को केवल पढ़ने के स्थान पर गतिविधियों के माध्यम से भी समझाया जा सकता है। सुमेलन, वाक्य-पठन और अर्थ-बोध जैसी गतिविधियाँ विद्यार्थियों को संस्कृत के शब्दों, वाक्यों और उनके भाव को समझने में सहायता करती हैं।

गतिविधि 1 : उचित पदों का सुमेलन

विद्यार्थियों को दो वर्गों में दिए गए पदों को उचित रूप से मिलाने का अभ्यास कराया जाए।

वर्ग क वर्ग ख
प्रातः सूर्यः जगतः तस्थुषश्च
रविवारस्तु उदेति
सूर्यः आत्मा सप्ताहारम्भः भवति

इस प्रकार की गतिविधि से विद्यार्थी संस्कृत पदों को ध्यानपूर्वक पढ़कर उनके आपसी सम्बन्ध को पहचानने का अभ्यास करते हैं।

गतिविधि 2 : संस्कृत भाषा के महत्व का ज्ञान

संस्कृत भाषा के महत्व को सरलता और सहजता से समझाने के लिए उससे सम्बन्धित संस्कृत वाक्यों का पठन कराया जा सकता है तथा विद्यार्थियों से उनके अर्थ पर चर्चा कराई जा सकती है।

संस्कृत भाषा के महत्व से सम्बन्धित वाक्य
  1. संस्कृत भाषा विश्वस्य सर्वासु भाषासु प्राचीनतमा भाषा अस्ति।
  2. संस्कृता भाषा परिशुद्धा व्याकरण सम्बन्धिदोषादिरहिता संस्कृतं भाषितं निगद्यते।
  3. संस्कृतभाषा जीवनस्य सर्वसंस्कारेषु संस्कृतस्य प्रयोगः भवति।
  4. सर्वासामेतासां भाषाणाम् इयं जननी।
  5. वेदाः, रामायणः, महाभारतः, भगवद् गीता इत्यादि ग्रन्थाः संस्कृतभाषायां एव विरचितानि।
  6. इयं भाषायाः महत्त्वं विदेशराज्येष्वपि प्रसिद्धं।
  7. संस्कृतवाङ्मयं विश्ववाङ्मये स्वस्य अद्वितीयं स्थानम् अलङ्करोति।

गतिविधियों का शैक्षिक महत्व

  • विद्यार्थियों को नीति-वचनों और संस्कृत वाक्यों के अध्ययन में सक्रिय भाग लेने का अवसर मिलता है।
  • सुमेलन द्वारा शब्दों और पदों के परस्पर सम्बन्ध को समझने का अभ्यास होता है।
  • संस्कृत वाक्यों के माध्यम से संस्कृत भाषा के महत्व का ज्ञान कराया जा सकता है।
  • पठन और अर्थ-बोध की प्रक्रिया विद्यार्थियों के लिए अधिक सहज बनती है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • नीति-वचन और सुभाषित गतिविधियों के माध्यम से भी पढ़ाए जा सकते हैं।
  • सुमेलन गतिविधि से संस्कृत पदों के परस्पर सम्बन्ध की पहचान होती है।
  • संस्कृत भाषा को विश्व की प्राचीन भाषाओं में बताया गया है।
  • वेद, रामायण, महाभारत और भगवद्गीता जैसे ग्रन्थ संस्कृत से सम्बन्धित हैं।
  • संस्कृत भाषा का महत्व विदेशों में भी प्रसिद्ध बताया गया है।
  • संस्कृत वाङ्मय का विश्व वाङ्मय में अद्वितीय स्थान है।
Topic 7 प्रमुख श्लोकों का अर्थ ज्ञान

प्रमुख श्लोकों का अर्थ ज्ञान

प्रमुख श्लोक एवं उनके अर्थ

संस्कृत के श्लोकों में जीवन, शिक्षा, सदाचार, परोपकार, विद्या, विनय, धर्म और भक्ति से सम्बन्धित अनेक महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए गए हैं। श्लोक को समझने के लिए उसके भाव को सरल हिन्दी में जानना आवश्यक है।

1. परोपकार का महत्व

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनम् द्वयम्।
परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्॥

अर्थ— अठारह पुराणों में व्यास के दो सारगर्भित वचन हैं—दूसरों का उपकार करना पुण्य का कार्य है और दूसरों को सताना पाप का कार्य है।

2. पाँच दुर्लभ ‘ज’

जननी जन्मभूमिश्च जाह्नवी च जनार्दनः।
जनकः पंचमश्चैव, जकाराः पञ्चदुर्लभाः॥

अर्थ— जननी अर्थात् माता, जन्मभूमि अर्थात् देश, जाह्नवी अर्थात् गंगा, जनार्दन अर्थात् ईश्वर और जनक अर्थात् पिता—ये पाँच ‘ज’ से आरम्भ होने वाले संसार में कठिनता से प्राप्त होते हैं।

3. सज्जन विपत्ति में दुःखी नहीं होते

छिन्नोऽपि रोहति तरुश्चन्द्रः क्षीणोऽपि वर्धते लोके।
इति विमृशन्तः सन्तः सन्तप्यन्ते न लोकेऽस्मिन्॥

अर्थ— हरा वृक्ष काटने पर भी पुनः उग जाता है और चन्द्रमा क्षीण होने के बाद भी संसार में पुनः बढ़ता है। ऐसा विचार करने वाले सज्जन पुरुष संसार में दुःख और संताप से विचलित नहीं होते।

4. सज्जन और दुर्जन का स्वभाव

शरदि न वर्षति गर्जति, वर्षति वर्षासु निःस्वनो मेघः।
नीचो वदति न कुरुते, न वदति सुजनः करोत्येव॥

अर्थ— शरद ऋतु में बादल गरजता है, पर बरसता नहीं है और वर्षा ऋतु में वह बरसता है, पर गरजता नहीं है। उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति बोलता बहुत है, पर कार्य नहीं करता, जबकि सज्जन व्यक्ति कार्य करता है, उसका दिखावा नहीं करता।

5. सरस्वती वन्दना

जय जय हे भगवति सुरभारति!
तव चरणौ प्रणमामः।
नाद ब्रह्म स्वरूप वाली हे वागीश्वरी!
शरणं ते गच्छामः॥

अर्थ— हे भगवती सरस्वती देवी! तुम्हारी जय हो। हम तुम्हारे चरणों में प्रणाम करते हैं। नाद ब्रह्म स्वरूप वाली हे वागीश्वरी! तुम्हारी जय हो। हम सब तुम्हारी शरण में जाते हैं।

6. बुद्धि-विकास की प्रार्थना

आसीना भव मानसहंसे
कुन्दतुहिन शशि धवले!
हर जड़तां कुरु बुद्धिविकासं
सितपङ्कजरुचिविमले॥

अर्थ— हे देवी! तुम कुन्द के फूल और बर्फ के समान श्वेत हो। हमारे मानस-हंस पर आसीन होकर, श्वेत कमल के समान आभा वाली हे देवी! तुम मेरी जड़ता को दूर करो तथा बुद्धि का विकास करो।

7. सरस्वती को प्रणाम

करेण वीणां परिवादयन्तीं तथा जपन्तीमपरेण मालाम्।
मराल पृष्ठासनसन्निविष्टां सरस्वतीताम् शिरसा नमामि॥

अर्थ— एक हाथ से वीणा बजाने वाली तथा दूसरे हाथ से माला जपने वाली, हंस की पीठ रूपी सिंहासन पर बैठी हुई माँ सरस्वती को मैं सिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ।

8. सर्वव्यापी ईश्वर

यो देवो अग्नौ यो अप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेशः।
य औषधीषु वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः॥

अर्थ— जो प्रभु अग्नि में, जल में, औषधियों में, वनस्पतियों में तथा सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हैं, उस ईश्वर को मेरा बार-बार नमस्कार है।

9. सद्गुणों की महिमा

अकीर्तिं विनयो हन्ति हन्त्यनर्थं पराक्रमः।
हन्ति नित्यं क्षमा क्रोधमाचारो हन्त्य कुलक्षणम्॥

अर्थ— नम्रता अपयश को समाप्त कर देती है, पराक्रम से अनर्थ नष्ट होता है, क्षमा से हमेशा क्रोध समाप्त होता है और शुभ आचरण से सभी बुरे लक्षण नष्ट हो जाते हैं।

10. समदर्शी विद्वान

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनिचैव श्वपाके च, पण्डिताः समदर्शिनः॥

अर्थ— विद्वान मनुष्य ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता तथा चाण्डाल—सभी जीवों के प्रति समान दृष्टि रखते हैं।

11. विद्या से सुख तक

विद्या ददाति विनयं, विनयात् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मः ततः सुखम्॥

अर्थ— विद्या विनय देती है, विनय से योग्यता आती है, योग्यता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म की प्राप्ति होती है और धर्म से सुख मिलता है।

12. मनुष्य का वास्तविक आभूषण

नरस्याभरणं रूपं, रूपस्याभरणं गुणः।
गुणस्याभरणं ज्ञानं, ज्ञानस्याभरणं क्षमा॥

अर्थ— व्यक्ति का आभूषण सौन्दर्य अर्थात् रूप होता है, रूप का आभूषण गुण है, गुण का आभूषण ज्ञान है और ज्ञान का आभूषण क्षमा है।

13. श्रेष्ठ वस्तुएँ सर्वत्र नहीं मिलतीं

शैले शैले न माणिक्यं, मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र, चन्दनं न वने वने॥

अर्थ— प्रत्येक पर्वत पर मणि नहीं मिलती, प्रत्येक हाथी से मोती नहीं मिलता। सज्जन व्यक्ति हर स्थान पर नहीं मिलते और प्रत्येक जंगल में चन्दन नहीं मिलता।

14. एक गुणवान पुत्र का महत्व

वरमेको गुणी पुत्रो, न च मूर्खशतान्यपि।
एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारागणोऽपि॥

अर्थ— सौ मूर्ख पुत्रों की अपेक्षा एक गुणवान पुत्र अच्छा होता है। जिस प्रकार सैकड़ों तारे मिलकर भी अन्धकार दूर नहीं कर पाते, जबकि अकेला चन्द्रमा उसे दूर कर देता है।

15. विद्यार्थी के पाँच लक्षण

काकचेष्टा वकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।
अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम्॥

अर्थ— कौए जैसा प्रयत्न, बगुले जैसा ध्यान, कुत्ते जैसी नींद, कम भोजन करना और घर से दूर रहना अर्थात् त्याग करना—ये विद्यार्थी के पाँच लक्षण हैं।

16. परिश्रम का महत्व

उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

अर्थ— कार्य परिश्रम करने से सिद्ध अर्थात् सफल होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। जिस प्रकार सोते हुए शेर के मुख में हिरन स्वयं प्रवेश नहीं करता।

17. अभिवादन और बुजुर्गों की सेवा

अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम्॥

अर्थ— नमस्कार करने वाले तथा हमेशा बुजुर्गों की सेवा करने वाले व्यक्ति की चार वस्तुएँ—आयु, विद्या, यश और बल—बढ़ती हैं।

18. सज्जन और दुर्जन का गुण

अमृतं किरति हिमांशुरतिमेव फणी समुद्गिरति।
गुणमेव शक्तित साधुर्दोषम् साधुः प्रकाशयति॥

अर्थ— चन्द्रमा अमृत की वर्षा करता है तथा सर्प विष उगलता है। साधु दूसरों के गुण ही बताते हैं तथा दुष्ट दूसरों के अवगुण प्रकट करते हैं।

19. मूर्ख को उपदेश

उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये।
पयः पानं भुजंगानां केवलं विष वर्धनम्॥

अर्थ— मूर्खों को उपदेश देने से उनका क्रोध शान्त नहीं होता, बल्कि बढ़ता है। जिस प्रकार दूध पिलाने से सर्प का विष घटता नहीं, बल्कि और बढ़ता है।

20. सुपुत्र का महत्व

एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धितः।
वासितं वै वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥

अर्थ— एक ही पुष्पित और सुगन्ध वाले वृक्ष से पूरा वन सुगन्धित हो जाता है, उसी प्रकार एक योग्य पुत्र से पूरे कुल का यश बढ़ जाता है।

21. विद्या का महत्व

रूपयौवन-सम्पन्नो विशाल कुल सम्भवः।
विद्याहीनो न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥

अर्थ— व्यक्ति चाहे सौन्दर्य से भरपूर हो, यौवन से परिपूर्ण हो और महान कुल में जन्मा हो, परन्तु यदि वह विद्या रूपी धन से वंचित है तो उसकी स्थिति बिना सुगन्ध के टेसू के फूल जैसी होती है।

22. चरित्र की रक्षा

वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्, वित्तमायाति याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः॥

अर्थ— मनुष्य को अपने चरित्र की रक्षा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिए। धन तो आता-जाता रहता है। धन के नष्ट होने से मनुष्य नष्ट नहीं होता, परन्तु चरित्र के नष्ट होने पर मनुष्य सर्वस्व खो देता है।

23. ईश्वर वन्दना

त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।
त्वमेव सर्वं मम देव देवः॥

अर्थ— तुम ही माता हो, तुम ही पिता हो, तुम ही बन्धु अर्थात् भाई हो, तुम ही मित्र हो, तुम्हीं विद्या हो और तुम्हीं धन-धान्य हो। हे देवों के देव! तुम ही मेरे सब कुछ हो।

24. असत्य से सत्य की ओर

असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय।

अर्थ— हे ईश्वर! असत्य से सत्य की ओर ले चलिए, अज्ञान रूपी अन्धकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले चलिए और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलिए।

25. भगवान की कृपा

मूकं करोति वाचालं
पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे
परमानन्द माधवम्॥

अर्थ— जिस प्रभु की कृपा से गूँगा व्यक्ति बोलने में समर्थ हो जाता है और लँगड़ा व्यक्ति भी पर्वत को लाँघ लेता है, परम आनन्द प्रदान करने वाले उस भगवान की मैं वन्दना करता हूँ।

26. अविद्वान पुत्र

कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान् न धार्मिकः।
काणेन चक्षुषा किं वा चक्षुः पीडैव केवलम्॥

अर्थ— उस पुत्र के उत्पन्न होने से क्या लाभ, जो न विद्वान है और न ही नीतिवान। एक कानी आँख से क्या लाभ होगा, वह तो केवल पीड़ा देने के लिए ही होती है।

27. उन्नति चाहने वाले व्यक्ति के छह दोष

षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।
निद्रा, तन्द्रा, भयम्, क्रोधम्, आलस्यं दीर्घसूत्रता॥

अर्थ— ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले पुरुषों को नींद, तन्द्रा अर्थात् ऊँघना, डर, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता अर्थात् जल्दी हो जाने वाले कार्यों में अधिक समय लगाने की आदत—इन छह दुर्गुणों को त्याग देना चाहिए।

28. धर्म की स्थापना

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

अर्थ— साधुओं और भक्तों की रक्षा करने, पापकर्म करने वालों का विनाश करने तथा धर्म की भली-भाँति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • परोपकार को पुण्य और दूसरों को पीड़ा पहुँचाने को पाप कहा गया है।
  • विद्या से विनय, योग्यता, धन, धर्म और अन्ततः सुख की प्राप्ति होती है।
  • चरित्र को धन से अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।
  • परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं।
  • विद्यार्थी के प्रमुख गुणों में प्रयत्न, ध्यान, कम निद्रा, अल्पाहार और त्याग शामिल हैं।
  • सज्जनता, क्षमा, विनय, परोपकार और अच्छे आचरण को जीवन के महत्वपूर्ण गुण बताया गया है।
  • धर्म की स्थापना और सज्जनों की रक्षा के लिए ईश्वर के प्रकट होने का भाव व्यक्त किया गया है।

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Topic 8 नीतिपरक वाक्यों का अर्थ ज्ञान एवं गतिविधि

नीतिपरक वाक्यों का अर्थ ज्ञान एवं गतिविधि

नीतिपरक वाक्यों का अर्थ ज्ञान

नीतिपरक वाक्य जीवन में उचित आचरण, विद्या, परिश्रम, परोपकार, विनय और सत्य जैसे मूल्यों का ज्ञान कराते हैं। इनका अर्थ समझने से विद्यार्थी संस्कृत भाषा के साथ-साथ जीवनोपयोगी नैतिक विचारों को भी ग्रहण कर सकते हैं।

प्रमुख नीतिपरक वाक्य एवं उनके अर्थ

1. समय का प्रभाव

समय एव करोति बलाबलम्।

अर्थ— समय मनुष्य को बलशाली और निर्बल बनाता है।

2. विद्या और धर्म

विद्या धर्मेण शोभते।

अर्थ— विद्या की शोभा धर्म से होती है।

3. परोपकार

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः।

अर्थ— दूसरों की भलाई के लिए ही वृक्ष फल प्रदान करते हैं।

4. आलस्य सबसे बड़ा शत्रु

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।

अर्थ— आलस्य ही मनुष्य के शरीर में स्थित सबसे बड़ा शत्रु है।

5. विद्या से विनय

विद्या ददाति विनयम्।

अर्थ— विद्या से विनय गुण की प्राप्ति होती है।

6. विद्या रूपी धन

विद्या धनम् सर्वधनम् प्रधानम्।

अर्थ— विद्या रूपी धन सभी धनों में सर्वश्रेष्ठ है।

7. भूख और पाप

बुभुक्षितं किं न करोति पापम्।

अर्थ— भूखा व्यक्ति कौन-सा पाप नहीं करता।

8. असत्य से सत्य की ओर

असतो मा सद्गमय।

अर्थ— हे ईश्वर! मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलिए।

9. उठो, जागो और ज्ञान प्राप्त करो

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।

अर्थ— उठो, जागो और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो।

10. कर्म पर अधिकार

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

अर्थ— कर्म करने में तेरा अधिकार है, उसके फल की प्राप्ति में कभी नहीं।

11. वसुधैव कुटुम्बकम्

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।

अर्थ— उदार चरित्र वाले व्यक्तियों के लिए यह सारा संसार ही कुटुम्ब है।

नीतिपरक श्लोक पर आधारित गतिविधि

प्रश्नोत्तर विधि द्वारा श्लोक का अर्थ सरलता और सहजता से स्पष्ट किया जा सकता है। इसके लिए निम्न श्लोक का अभ्यास कराया जाता है—

नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः।
शुष्क वृक्षाश्च मूर्खाश्च न नमन्ति कदाचन॥

इस श्लोक में फल से युक्त वृक्षों और गुणी व्यक्तियों के झुकने तथा सूखे वृक्षों और मूर्ख व्यक्तियों के न झुकने का भाव व्यक्त किया गया है।

श्लोक-अध्ययन की गतिविधि

  1. शिक्षक स्वयं शुद्धता, यति और गति के साथ श्लोक का आदर्श वाचन करें।
  2. विद्यार्थियों से श्लोक का सामूहिक अनुवाचन कराया जाए।
  3. एक-एक विद्यार्थी से श्लोक का वाचन कराया जाए तथा उच्चारण सम्बन्धी अशुद्धियों को ठीक कराया जाए।
  4. श्लोक में आए प्रत्येक शब्द का अर्थ विद्यार्थियों से पूछा जाए। अर्थ न बता पाने पर शिक्षक उसे श्यामपट्ट पर लिखकर समझाए तथा अन्य कठिनाइयों का भी निवारण करे।
  5. श्लोक का अर्थ स्पष्ट किया जाए तथा विद्यार्थियों को यह भी समझाया जाए कि किस प्रकार के मनुष्य विनम्र नहीं होते।
  6. प्रश्नोत्तर द्वारा श्लोक के भाव को और अधिक स्पष्ट किया जाए।

प्रश्नोत्तर अभ्यास

प्रश्न— वृक्षाः कदा नमन्ति?
उत्तर— वृक्षाः फलिनो नमन्ति।

प्रश्न— कीदृशाः जनाः नमन्ति?
उत्तर— गुणिनो जनाः नमन्ति।

प्रश्न— कीदृशाः जनाः न नमन्ति?
उत्तर— मूर्खाः जनाः न नमन्ति।

प्रश्न— कीदृशाः वृक्षाः न नमन्ति?
उत्तर— शुष्क वृक्षाः न नमन्ति।

गतिविधि से होने वाला अभ्यास

  • विद्यार्थियों को शुद्ध एवं सस्वर श्लोक-वाचन का अभ्यास होता है।
  • श्लोक में आए शब्दों का अर्थ समझने की क्षमता विकसित होती है।
  • प्रश्नोत्तर द्वारा श्लोक का भाव सरलता से स्पष्ट होता है।
  • उच्चारण सम्बन्धी अशुद्धियों को पहचानकर सुधारा जा सकता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • नीतिपरक वाक्य जीवनोपयोगी नैतिक विचारों का ज्ञान कराते हैं।
  • विद्या को विनय प्रदान करने वाला और सभी धनों में श्रेष्ठ धन बताया गया है।
  • आलस्य मनुष्य का बड़ा शत्रु है तथा समय मनुष्य को सबल और निर्बल बना सकता है।
  • परोपकार, सत्य, कर्म और उदारता जैसे गुण नीतिपरक वाक्यों के प्रमुख विषय हैं।
  • फलयुक्त वृक्ष और गुणी व्यक्ति झुकते हैं, जबकि सूखे वृक्ष और मूर्ख व्यक्ति नहीं झुकते।
  • आदर्श वाचन, सामूहिक अनुवाचन, शब्दार्थ और प्रश्नोत्तर द्वारा श्लोक का अर्थ सरलता से समझाया जा सकता है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

बालकों की मौखिक अभिव्यक्ति सम्बन्धी शंकाएँ दूर की जाती हैं—

व्याख्या: सस्वर वाचन करने से बालकों की मौखिक अभिव्यक्ति सम्बन्धी शंकाएँ और संकोच दूर होते हैं।
Q 2

वन्दना के कितने रूप हैं—

व्याख्या: वन्दना के दो रूप—व्यक्तिगत वन्दना और सामूहिक वन्दना हैं।
Q 3

‘भावसाम्य विधि’ के नाम से जाना जाता है—

व्याख्या: तुलनात्मक विधि को भावसाम्य विधि के नाम से भी जाना जाता है।
Q 4

‘हितं’ का अर्थ है—

व्याख्या: ‘हितं’ का हिन्दी अर्थ हितकारी है।
Q 5

‘तत्’ का अर्थ होता है—

व्याख्या: ‘तत्’ का अर्थ ‘वह’ होता है।
Q 6

सारगर्भित वाक्यों को कहा जाता है—

व्याख्या: सारगर्भित एवं महत्वपूर्ण अर्थ वाले संक्षिप्त वाक्यों को सूक्ति कहा जाता है।
Q 7

सबसे बड़ा महाकाव्य है—

व्याख्या: दिए गए विकल्पों में महाभारत सबसे बड़ा महाकाव्य है।
Q 8

‘सर्वत्र’ शब्द का हिन्दी अर्थ है—

व्याख्या: ‘सर्वत्र’ का अर्थ सब जगह होता है।
Q 9

अपने हस्त में वीणा धारण करती हैं—

व्याख्या: सरस्वती माँ को वीणा धारण किए हुए वर्णित किया गया है।
Q 10

पद्य-पाठ हेतु संस्कृत में निम्नांकित तत्वों का ध्यान देना चाहिए—

व्याख्या: पद्य-पाठ में उचित आरोह-अवरोह, स्वर, स्पष्टता तथा शुद्ध उच्चारण सभी का ध्यान रखना चाहिए।
Q 11

चाणक्य नीतिशास्त्र में कितने श्लोक हैं—

व्याख्या: चाणक्य नीतिशास्त्र में 108 श्लोक हैं, जो अनुष्टुप छन्द में रचित हैं।
Q 12

‘नीति शतक’ के रचयिता हैं—

व्याख्या: नीति शतक की रचना भर्तृहरि ने की है।
Q 13

अन्वय विधि के कितने प्रकार हैं—

व्याख्या: अन्वय विधि के दो प्रकार—दण्डान्वय विधि और खण्डान्वय विधि हैं।
Q 14

‘विद्या ददाति विनयम्’ का अर्थ है—

व्याख्या: ‘विद्या ददाति विनयम्’ का अर्थ है—विद्या से विनय गुण की प्राप्ति होती है।
Q 15

‘परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्’ का सही भाव है—

व्याख्या: इस नीति-वचन का भाव है कि दूसरों का उपकार करना पुण्य और दूसरों को पीड़ा देना पाप है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय संस्कृत के अध्याय संस्कृत वन्दना एवं नीतिपरक वाक्यों का ज्ञान से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1 2016

निम्नलिखित नीतिपरक श्लोक का हिन्दी अर्थ लिखिए— “वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्, वित्तमायाति याति च। अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः॥”

Q 2 2017

निम्नलिखित श्लोक का हिन्दी अर्थ लिखिए— “षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता। निद्रा, तन्द्रा, भयं, क्रोधम्, आलस्यं दीर्घसूत्रता॥”

Q 3 2018

निम्नलिखित श्लोक का हिन्दी अर्थ लिखिए— “कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान् न धार्मिकः। काणेन चक्षुषा किं वा चक्षुः पीडैव केवलम्॥”

Q 4 2021

अधोलिखित श्लोक का अर्थ बताइए— “काकचेष्टा वकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च। अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम्॥”

Q 5 2019

निम्नलिखित श्लोक का अर्थ हिन्दी में लिखिए— “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥”

Q 6 2016

“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्” सूक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

Q 7 2016

‘आदर्श वाचन’ से आप क्या समझते हैं? इसकी विशेषताएँ बताइए।

Q 8 2016

कंठस्थ किया हुआ कोई एक श्लोक लिखिए जो इस प्रश्न-पत्र में न आया हो।

Q 9 2023

संस्कृत भाषा के महत्व पर पाँच वाक्य संस्कृत भाषा में लिखिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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