श्रव्य-दृश्य सामग्री—अर्थ, उद्देश्य, महत्व, गुण एवं वर्गीकरण
श्रव्य-दृश्य सामग्री का परिचय
शिक्षण एक जटिल, मनोवैज्ञानिक तथा कौशलयुक्त प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों को सरल और प्रभावपूर्ण ढंग से ज्ञान प्रदान करना है। शिक्षण को अधिक रोचक, आकर्षक और सुग्राह्य बनाने के लिए जिन साधनों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें शिक्षण सहायक या अनुदेशनात्मक सामग्री कहा जाता है।
भाषा के माध्यम से भाव और विचार व्यक्त किए जाते हैं, जबकि श्रव्य-दृश्य सामग्री इन भावों और विचारों के सूक्ष्म स्वरूप को अधिक स्पष्ट और ठोस बनाने में सहायता करती है। जितनी अधिक ज्ञानेन्द्रियाँ सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय होती हैं, अधिगम उतना ही अधिक स्थायी बनता है।
सीखने और याद रखने में इन्द्रियों की भूमिका
| हम कैसे सीखते हैं | प्रतिशत | हम कैसे याद रखते हैं | प्रतिशत |
|---|---|---|---|
| चखकर | 1% | पढ़कर | 10% |
| छूकर | 2% | सुनकर | 20% |
| सूँघकर | 3% | देखकर | 30% |
| सुनकर | 11% | देख व सुनकर | 50% |
| देखकर | 83% | कहकर | 70% |
| कहकर व सुनकर | 90% |
इससे स्पष्ट होता है कि अधिगम में श्रव्य और दृश्य साधनों की विशेष भूमिका होती है।
श्रव्य-दृश्य सामग्री का अर्थ
ज्ञान प्राप्त करने में नेत्रेन्द्रिय और श्रवणेन्द्रिय प्रमुख ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। जिन साधनों से विद्यार्थी नेत्रों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करता है, वे दृश्य साधन कहलाते हैं। जिनसे श्रवणेन्द्रिय द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है, वे श्रव्य साधन कहलाते हैं। जिन साधनों में देखने और सुनने दोनों का एक साथ प्रयोग होता है, उन्हें श्रव्य-दृश्य साधन कहते हैं।
श्रव्य-दृश्य साधन विद्यार्थियों की कल्पना को उन्नतशील बनाने तथा भाषा में सरलता, सजीवता और स्पष्टता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
श्रव्य-दृश्य सामग्री की प्रमुख परिभाषाएँ
डेन्ट के अनुसार— श्रव्य सामग्री वह सामग्री है, जो कक्षा या शिक्षण परिस्थितियों में लिखित या बोली गई पाठ्य सामग्री को समझने में सहायता प्रदान करती है।
कार्टर ए. गुड के अनुसार— ऐसी सामग्री जिसके माध्यम से शिक्षण प्रक्रिया को उद्दीप्त किया जा सके अथवा श्रवणेन्द्रिय संवेदनाओं द्वारा आगे बढ़ाया जा सके, श्रव्य-दृश्य सामग्री कहलाती है।
एलविम स्ट्रांग के अनुसार— श्रव्य-दृश्य सामग्री में वे सभी साधन सम्मिलित हैं जिनकी सहायता से विद्यार्थियों की पाठ में रुचि बनी रहती है तथा वे विषय को सफलतापूर्वक समझकर अधिगम के उद्देश्यों को प्राप्त कर लेते हैं।
बर्टन के अनुसार— श्रव्य-दृश्य सामग्री ऐन्द्रिक वस्तुएँ अथवा काल्पनिक प्रतीक हैं, जो अधिगम को पुनः शक्ति प्रदान करती हैं तथा उसे अग्रसर करती हैं।
इस प्रकार श्रव्य-दृश्य सामग्री शिक्षक की सहायक सामग्री है, जो शिक्षण को नियोजित, स्पष्ट और प्रभावशाली बनाते हुए शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता करती है।
श्रव्य-दृश्य सामग्री के उद्देश्य
- विद्यार्थियों में पाठ के प्रति रुचि जागृत करना।
- पाठ में विद्यार्थियों का ध्यान केन्द्रित करना।
- विद्यार्थियों को क्रियाशील बनाना।
- सीखने की गति में वृद्धि करना।
- तर्क करने की शक्ति का विकास करना।
- विद्यार्थियों के अनुभव का विस्तार करना।
- कल्पनाशक्ति को अभिप्रेरित करना।
- ज्ञानेन्द्रियों को सक्रिय बनाना।
- व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा प्रदान करना।
- रुचि, योग्यता, क्षमता और रुझान के अनुरूप शिक्षा देने में सहायता करना।
- पाठ्य सामग्री को सरल, रोचक तथा बोधगम्य बनाना।
- पाठ्यवस्तु के तथ्यों और विचारों को स्पष्ट रूप से समझाना।
श्रव्य-दृश्य सामग्री की उपयोगिता एवं महत्व
श्रव्य-दृश्य सामग्री भावपूर्ण अधिगम, विद्यार्थियों की रुचि और उत्साह तथा विद्यालय में सफल शिक्षण के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है।
- ज्ञानेन्द्रियों को महत्व प्रदान करती है।
- ध्यान तथा एकाग्रता को बढ़ाती है।
- शिक्षक के लिए शिक्षण कार्य को सरल बनाती है।
- शिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाती है।
- स्थूल तथा प्रत्यक्ष प्रस्तुतीकरण को महत्व देती है।
- ज्ञान को स्पष्ट और स्थायी बनाती है।
- पाठ को रोचकता प्रदान करती है।
- बालक के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाने में सहायता करती है।
- बालकों में तार्किक क्षमता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करती है।
- शिक्षण में सजीवता और गतिशीलता बनाए रखने में सहायक होती है।
- अधिगम प्रक्रिया को वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान करते हुए अधिगम संसाधनों का विस्तार करती है।
- विचारों को प्रवाहात्मकता प्रदान करती है।
- समय तथा श्रम की बचत करती है।
- भाषा सम्बन्धी कठिनाइयों को दूर करने में सहायता करती है।
- ज्ञानेन्द्रियों को उद्दीप्त करके शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सुगम बनाती है।
अच्छी श्रव्य-दृश्य सामग्री के आवश्यक गुण
- सम्बद्धता— सामग्री विषय तथा प्रकरण से पूर्णतः सम्बन्धित हो।
- परिशुद्धता— सामग्री विषय-वस्तु के आधार पर पूर्णतः सही हो।
- यथार्थता— सामग्री प्रक्रिया, विषयवस्तु और प्रत्यय को स्पष्ट करने में सहायक हो।
- रोचकता— सामग्री विद्यार्थियों की रुचि के अनुरूप हो।
- अनुकूलता— सामग्री विषय और प्रकरण के अनुकूल हो।
- सामग्री ऐसी हो जिससे समय की बचत हो।
- मितव्ययिता— कम कीमत वाली और अधिक महँगी न होने वाली सामग्री का प्रयोग किया जाए।
- उपलब्धता— सामग्री सरलता से उपलब्ध हो सके।
- स्तरानुकूलता— सामग्री विद्यार्थियों की आयु और मानसिक स्तर के अनुरूप हो।
- उद्देश्यपूर्णता— सामग्री कक्षा के अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक हो।
सहायक सामग्री के प्रयोग में सावधानियाँ
- सहायक सामग्री केवल उतनी देर दिखाई जाए जितनी देर उसका प्रयोग आवश्यक हो।
- छोटी कक्षाओं में इसका अधिक तथा बड़ी कक्षाओं में अपेक्षाकृत कम प्रयोग करना चाहिए।
- सामग्री का प्रयोग उचित समय और आवश्यकता पड़ने पर ही किया जाए।
- सहायक सामग्री के प्रयोग में समय का ध्यान रखा जाए।
- स्वनिर्मित सहायक सामग्री के प्रयोग पर अधिक बल दिया जाए।
- विद्यार्थियों को भी सहायक सामग्री स्वयं तैयार और प्रयोग करने के अवसर दिए जाएँ।
श्रव्य-दृश्य सामग्री का वर्गीकरण
1. इन्द्रियों के आधार पर
| प्रकार | ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम | उदाहरण |
|---|---|---|
| श्रव्य सामग्री | श्रवणेन्द्रिय | रेडियो, टेपरिकॉर्डर, ग्रामोफोन, लिंग्वाफोन |
| दृश्य सामग्री | नेत्रेन्द्रिय | मॉडल, चार्ट, ग्राफ, मानचित्र, बुलेटिन बोर्ड, फ्लैनल बोर्ड, संग्रहालय, श्यामपट्ट आदि |
| श्रव्य-दृश्य सामग्री | आँख और कान दोनों | टेलीविजन, चलचित्र, कम्प्यूटर सहायक सामग्री, फिल्में आदि |
2. तकनीकी के आधार पर
- सॉफ्टवेयर— चित्र, ग्राफ, चार्ट, पुस्तक, मानचित्र, मॉडल आदि।
- हार्डवेयर— रेडियो, टी.वी., रिकॉर्ड प्लेयर, कम्प्यूटर, एपिडायस्कोप तथा प्रोजेक्टर आदि।
3. प्रक्षेपण के आधार पर
- प्रक्षेपित सामग्री— जिन सामग्रियों का प्रक्षेपण किया जाता है, जैसे स्लाइड और फिल्म स्ट्रिप आदि।
- अप्रक्षेपित सामग्री— विभिन्न प्रकार के चार्ट, चित्र और प्रतिरूप आदि।
- श्रव्य-दृश्य सामग्री शिक्षण को सरल, रोचक, स्पष्ट और प्रभावशाली बनाने वाली सहायक सामग्री है।
- श्रव्य साधन से कान, दृश्य साधन से आँख और श्रव्य-दृश्य साधन से आँख तथा कान दोनों सक्रिय होते हैं।
- इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में रुचि, ध्यान, क्रियाशीलता, तर्कशक्ति, अनुभव और कल्पनाशक्ति का विकास करना है।
- यह ज्ञान को स्पष्ट एवं स्थायी बनाती है तथा समय और श्रम की बचत करती है।
- अच्छी सामग्री सम्बद्ध, शुद्ध, यथार्थ, रोचक, अनुकूल, मितव्ययी, उपलब्ध, स्तरानुकूल और उद्देश्यपूर्ण होनी चाहिए।
- श्रव्य-दृश्य सामग्री का वर्गीकरण इन्द्रियों, तकनीकी तथा प्रक्षेपण के आधार पर किया गया है।
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शिक्षक प्रशिक्षुओं के लिए गेम, वीडियो क्लिप एवं ऑडियो क्लिप
शिक्षक प्रशिक्षुओं के लिए गेम
संस्कृत शिक्षण को अधिक प्रभावशाली, रोचक, आकर्षक और सुग्राह्य बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के खेलों का प्रयोग किया जा सकता है। खेलों के माध्यम से विद्यार्थी सक्रिय होकर सीखते हैं, जिससे उनकी रुचि बढ़ती है और प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी होता है।
संस्कृत भाषा को केवल कठिन विषय के रूप में प्रस्तुत करने के स्थान पर खेल, दृश्य-श्रव्य साधन और गतिविधियों के माध्यम से उसकी सहजता तथा श्लोकों के माधुर्य का अनुभव कराया जा सकता है।
खेलों द्वारा संस्कृत शिक्षण
शिक्षक विद्यार्थियों को विभिन्न रोचक गतिविधियों द्वारा संस्कृत शब्दों, वाक्यों, अनुवाद, गिनती और दैनिक जीवन से सम्बन्धित प्रयोगों का अभ्यास करा सकता है।
1. वस्तुओं और प्रकृति के माध्यम से
यदि विद्यार्थियों को सरल भाषा में अनुवाद सिखाना हो तो शिक्षक उन्हें उपवन में ले जाकर फूलों और पत्तियों से सम्बन्धित संस्कृत वाक्य बता सकता है।
उपवने पुष्पाणि विकसितानि।
अर्थ—बाग में फूल खिले हैं।
पेड़ से पत्ते गिरते देखकर समझाया जा सकता है—
वृक्षात् पत्राणि पतन्ति।
2. गिनती का खेल
विद्यार्थियों के समूह बनाकर वस्तुओं अथवा आकृतियों को गिनवाया जा सकता है। इसके माध्यम से संस्कृत संख्या-शब्दों का अभ्यास कराया जाता है, जैसे—
- एकम्
- द्वे
- त्रीणि
3. नाटकीय गतिविधि
शिक्षक और विद्यार्थी अलग-अलग भूमिकाएँ निभाकर संस्कृत वार्तालाप का अभ्यास कर सकते हैं। एक विद्यार्थी शिक्षक और दूसरा विद्यार्थी शिष्य की भूमिका निभा सकता है।
भोजन में प्रयुक्त फल अथवा अन्य पदार्थों के नाम भी इसी प्रकार सिखाए जा सकते हैं।
शिक्षक प्रश्न— त्वम् किं खादसि?
छात्र उत्तर— मैं सेब खा रहा हूँ।
संस्कृत में— अहम् सेवम् खादामि।
शिक्षक प्रश्न— रमा त्वं किं खादसि?
छात्र उत्तर— अहम् कदलीफलम् खादामि।
इस प्रकार खेल एवं गतिविधियाँ विद्यार्थियों में संस्कृत पढ़ने की रुचि, आत्मविश्वास और सक्रिय सहभागिता बढ़ाती हैं।
वीडियो क्लिप
संस्कृत शिक्षा को अधिक रुचिकर बनाने के लिए वीडियो क्लिप का प्रयोग किया जाता है। वीडियो क्लिप एक दृश्य-श्रव्य शिक्षण सहायक सामग्री है। इसके माध्यम से विषय-वस्तु को आकर्षक, सरल, रुचिकर और सुबोध बनाया जा सकता है।
छोटी-छोटी फिल्मों के माध्यम से विद्यार्थी किसी क्रिया या घटना को स्पष्ट रूप से देख और सुन सकते हैं। इससे उनमें कल्पना करने, भावों को समझने और अधिक विचारशील बनने की प्रवृत्ति विकसित होती है।
वीडियो क्लिप के उदाहरण
विद्यार्थियों को स्वच्छता अभियान तथा ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसे विषय वीडियो क्लिप के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से दिखाए जा सकते हैं।
बड़े व्यक्तियों के अच्छे संस्कार और जीवन से जुड़ी प्रेरक घटनाओं को भी वीडियो के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है। ऐसी घटनाओं का विद्यार्थियों के मन पर स्थायी प्रभाव पड़ता है तथा स्वच्छता जैसे मूल्यों का ज्ञान भी स्थायी रूप से प्राप्त होता है।
वीडियो क्लिप का महत्व
- पाठ्यवस्तु का सजीव चित्रण प्रस्तुत होता है, जिसे विद्यार्थी सरलता से समझ लेते हैं।
- विद्यार्थियों का अधिगम स्तर स्थायी और उच्च होता है।
- विषय-वस्तु आकर्षक और रुचिपूर्ण बनती है, जिससे विद्यार्थी अधिक मन लगाकर सीखते हैं।
- कठिन विषय-वस्तु को विद्यार्थी पुनः देखकर और समझकर सीख सकते हैं।
- महापुरुषों के आदर्श तथा विकास से सम्बन्धित गतिविधियाँ इच्छानुसार देखी जा सकती हैं।
- वीडियो के माध्यम से पढ़ने में थकावट कम होती है और विद्यार्थी आनन्द का अनुभव करते हैं।
- चित्र, चार्ट और वर्णन को प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है।
- समय और स्थान का बन्धन नहीं रहता; विद्यार्थी घर पर भी सी.डी. एवं डी.वी.डी. आदि के माध्यम से अध्ययन कर सकते हैं।
- दूरस्थ विद्वानों की विचारधारा का ज्ञान भी सरलता से प्राप्त होता है।
- विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से ज्ञान अर्जित करने का यह सुगम सहायक साधन है।
- शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया प्रभावी रूप से सम्पन्न होती है।
- विद्यार्थी सक्रिय होकर प्रत्यक्ष रूप से संस्कृत शिक्षण का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।
- पाठ्यवस्तु सार्थक और बोधगम्य बनती है।
- वीडियो क्लिप विद्यार्थियों को शीघ्र सीखने में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करती है।
- विद्यार्थियों में एकाग्रता का विकास होता है और वे विषय को शीघ्र समझ लेते हैं।
ऑडियो क्लिप
संस्कृत शिक्षण में ऑडियो क्लिप एक महत्वपूर्ण श्रव्य साधन है। इसमें ज्ञान प्राप्त करने के लिए मुख्यतः श्रवणेन्द्रिय सक्रिय रहती है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों में श्रवण-कौशल, एकाग्रता और कल्पनाशक्ति का विकास होता है।
संस्कृत शिक्षण में उच्चारण सम्बन्धी कौशल, आरोह-अवरोह, स्वर और लय को समझने में ऑडियो क्लिप विशेष रूप से उपयोगी है। गद्य-पाठ, पद्य-पाठ, श्लोक-वाचन तथा श्लोकों को कंठस्थ कराने में भी इसका प्रयोग किया जा सकता है।
शिक्षक विद्वानों द्वारा किए गए आदर्श वाचन की रिकॉर्डिंग विद्यार्थियों को कक्षा अथवा भाषा प्रयोगशाला में सुना सकता है। इससे विद्यार्थी व्याकरण-वाचन के पहलुओं और नियमों को भी समझ सकते हैं।
ऑडियो क्लिप का महत्व
- बार-बार वाचन सुनने से विद्यार्थियों के संस्कृत पठन का विकास होता है।
- विद्यार्थी विषय-वस्तु को अपनी सुविधा के अनुसार बार-बार सुन सकते हैं।
- शुद्ध उच्चारण समझने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है।
- विद्वानों के सही उच्चारण वाली रिकॉर्डिंग सुनने से विद्यार्थियों में आत्मविश्वास उत्पन्न होता है।
- सस्वर वाचन सुनने से अधिगम स्तर उच्च और स्थायी होता है।
- इसमें अधिक व्यय नहीं होता; सी.डी. प्लेयर अथवा टेपरिकॉर्डर से इसे सुना जा सकता है।
- निकट तथा दूरस्थ विद्वानों की रिकॉर्डिंग सुनकर विद्यार्थी अतिरिक्त ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
- विद्यार्थी कक्षा के अतिरिक्त घर पर भी ऑडियो सुनकर विचार-विमर्श कर सकते हैं।
- ऑडियो के माध्यम से संस्कृत शिक्षण की विभिन्न विधियों और विषयों की जानकारी प्राप्त होती है तथा अध्ययन में रुचि बढ़ती है।
ऑडियो क्लिप से सम्बन्धित प्रमुख साधन
1. आकाशवाणी
आकाशवाणी ज्ञान और मनोरंजन प्राप्त करने का प्रमुख साधन है। इसके माध्यम से भाषा में निपुणता विकसित की जा सकती है। विद्वानों और लेखकों की साहित्यिक चर्चा, कविताएँ, नाटक आदि सुनाकर विद्यार्थियों को लाभान्वित किया जा सकता है।
आकाशवाणी से प्राप्त ज्ञान स्थायी होता है तथा विद्यार्थियों में एकाग्रता, कल्पनाशक्ति और चिन्तनशक्ति का विकास होता है।
2. ग्रामोफोन
आकाशवाणी के कार्यक्रम निश्चित समय पर प्रसारित होते हैं, जबकि ग्रामोफोन पर किसी विषय को बार-बार सुना जा सकता है। इसलिए यह एक उपयोगी श्रव्य साधन है।
राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, सामूहिक प्रार्थना, श्लोक, धातुरूप और शब्दरूप आदि को कंठस्थ कराने में ग्रामोफोन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। महापुरुषों के भाषण, उपदेश और काव्य-पाठ की रिकॉर्डिंग सुनाकर नैतिक शिक्षा भी प्रदान की जा सकती है।
3. ध्वनि अभिलेख (टेपरिकॉर्डर)
टेपरिकॉर्डर की सहायता से विद्यार्थियों को उच्चारण-अभ्यास कराया जा सकता है। बोलने की गति, स्वर-प्रवाह आदि का अभ्यास भी इससे कराया जा सकता है।
इसके द्वारा काव्य-रचना, व्याकरण सम्बन्धी ज्ञान और नियम आसानी से समझाए जा सकते हैं। विद्यार्थी शुद्ध भाषा, ध्वनि की पहचान और शुद्ध उच्चारण का अभ्यास सुगमता से कर सकते हैं।
4. सीतावाद्य (लिंग्वाफोन)
भाषा-शिक्षण में लिंग्वाफोन अत्यन्त उपयोगी साधन है। आदर्श वक्ताओं के अभिलेख विद्यार्थियों को सुनाकर विभिन्न ध्वनियों का सही उच्चारण कराया जा सकता है। काव्य-शिक्षण और व्याकरण-शिक्षण को भी इससे प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
5. भाषा प्रयोगशाला
भाषा प्रयोगशाला विद्युत सहायता से नियंत्रित एक कक्ष होता है, जिसमें विद्यार्थी एक साथ बैठकर भाषा सीखते हैं तथा व्यक्तिगत निर्देशन भी प्राप्त कर सकते हैं।
प्रत्येक विद्यार्थी के लिए अलग मेज-कुर्सी होती है और प्रत्येक स्थान पर ईयरफोन, टेप रिकॉर्डर आदि लगे होते हैं। शिक्षक ऐसी जगह बैठता है जहाँ से वह सभी विद्यार्थियों पर नियंत्रण रख सकता है और उन्हें आवश्यक निर्देश दे सकता है।
- गेम के माध्यम से संस्कृत शिक्षण रोचक, सक्रिय और व्यवहारिक बनाया जा सकता है।
- वीडियो क्लिप दृश्य-श्रव्य साधन है, जो विषय-वस्तु को सजीव, आकर्षक और बोधगम्य बनाती है।
- वीडियो से कठिन विषय को पुनः देखकर समझा जा सकता है और अधिगम अधिक स्थायी होता है।
- ऑडियो क्लिप से श्रवण-कौशल, शुद्ध उच्चारण, एकाग्रता, स्वर, लय और कल्पनाशक्ति का विकास होता है।
- आकाशवाणी, ग्रामोफोन, टेपरिकॉर्डर, लिंग्वाफोन और भाषा प्रयोगशाला प्रमुख श्रव्य साधन हैं।
- गेम, वीडियो और ऑडियो के उचित प्रयोग से संस्कृत शिक्षण अधिक सरल, रुचिकर और प्रभावशाली बनता है।
Semester 1 की Complete तैयारी
- Official Syllabus
- Comprehensive Notes
- Quick Revision Notes
- Visual Revision Notes
- Audio Revision
- Solved MCQs
- MCQ Tests
- 2015–2025 Previous Year Papers
- Repeated Exam Questions
- 10 Model Papers
करके सीखना विधि एवं उसका महत्व
करके सीखना विधि
संस्कृत शिक्षण को अधिक रोचक, आकर्षक और सुग्राह्य बनाने के लिए करके सीखना विधि अत्यन्त उपयोगी है। इस विधि में विद्यार्थी केवल सुनकर या देखकर ही ज्ञान प्राप्त नहीं करता, बल्कि स्वयं कार्य और गतिविधियाँ करके सीखता है।
करके सीखने से विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास सम्भव होता है। उसे अपने व्यक्तिगत गुणों और क्षमताओं को पहचानने तथा उनमें वृद्धि करने का अवसर मिलता है। स्वयं किए गए कार्य से उसमें आत्मविश्वास बढ़ता है और आगे बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त होती है।
करके सीखने की प्रक्रिया
जब विद्यार्थी स्वयं विभिन्न प्रकार के कार्यों को पूरा करने का प्रयास करता है, तब प्राप्त अधिगम अधिक स्थायी और चिरस्मरणीय होता है। कक्षा में शिक्षक को कार्य करते देखकर और फिर स्वयं उसी प्रकार कार्य करके विद्यार्थी अनेक बातें सरलता से सीख सकता है।
जैसे—
- श्यामपट्ट पर स्वयं लिखने का अभ्यास करना।
- नई-नई गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेना।
- संगीत और नृत्य जैसी गतिविधियों को स्वयं करके सीखना।
- खेलों में शिक्षक और अन्य विद्यार्थियों के साथ सक्रिय रूप से भाग लेना।
ऐसी गतिविधियाँ विद्यार्थियों को स्वयं कुछ करने के लिए प्रेरित करती हैं। इससे उनमें नई गतिविधियों को सीखने, आगे बढ़ने और अपनी क्षमता प्रदर्शित करने की इच्छा उत्पन्न होती है।
संस्कृत शिक्षण में करके सीखना
विद्यार्थियों को उनकी योग्यता और क्षमता के अनुसार संस्कृत की विषयवस्तु को क्रियात्मक रूप में समझाने का प्रयास किया जा सकता है। विद्यालय की प्रयोगशाला, कक्षा तथा खेल के मैदान में ऐसी गतिविधियाँ कराई जा सकती हैं जिनसे विद्यार्थी स्वयं कार्य करते हुए सीखें।
कक्षा में श्यामपट्ट पर लिखने का अभ्यास इसका सरल उदाहरण है। जब विद्यार्थी स्वयं लिखता है, तब उसे प्रत्येक स्वर, पद, शुद्ध-अशुद्ध अक्षर तथा शब्दों का ज्ञान होने लगता है। वह अपनी लिखी हुई सामग्री की त्रुटियों को पहचानकर उनमें सुधार भी कर सकता है।
शिक्षक विद्यार्थियों से श्यामपट्ट पर पाठ्यवस्तु से सम्बन्धित शब्दार्थ, समास, समीक्षा, संख्याएँ और श्लोक आदि लिखवा सकता है। इससे प्राप्त ज्ञान सरल और स्थायी बनता है।
करके सीखने का महत्व
- शारीरिक विकास में सहायक— विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से शिक्षण करने पर विद्यार्थियों का शारीरिक विकास होता है और वे सक्रिय बने रहते हैं।
- बालकेन्द्रित अधिगम— इसमें विद्यार्थी प्रत्येक कार्य को स्वयं करने की इच्छा रखता है। इससे वह विषयवस्तु के विभिन्न पक्षों को आसानी से सीखता है।
- चिरस्थायी अधिगम— विद्यार्थी किसी कार्य को स्वयं करके सीखता है तो उस कार्य से जुड़ी समस्या और कठिनाई का ज्ञान भी उसे स्वयं होता है। इससे प्राप्त अधिगम अधिक स्थायी होता है।
- मानसिक क्रियाओं का विकास— स्वयं करके सीखी गई क्रियाएँ और कार्य लंबे समय तक स्मृति में बने रहते हैं। अधिगम की गति भी तीव्र होती है और विद्यार्थी मानसिक रूप से तत्पर रहता है।
- क्रिया-केन्द्रित अधिगम— स्वयं करके सीखना क्रिया पर आधारित प्रक्रिया है। विद्यार्थी का शरीर और मन दोनों सक्रिय रहते हैं, इसलिए वह संस्कृत विषय को शीघ्र सीख सकता है।
- विविध कौशलों का विकास— विद्यार्थी समूह में अपने सहपाठियों के साथ विभिन्न क्रियाएँ करता है और उनके माध्यम से अनेक कौशलों का विकास करता है।
- रुचिपूर्ण अधिगम का विकास— जब विद्यार्थी स्वयं कोई क्रिया करता है और शिक्षक से प्रोत्साहन प्राप्त करता है, तो उसकी रुचि और अधिक बढ़ती है।
- अवकाश के क्षणों का सदुपयोग— विद्यार्थियों को अपने खाली समय में उपयोगी क्रियाएँ करने के अवसर देने से उनकी जिज्ञासाओं का समाधान होता है तथा कल्पनाशक्ति का विकास होता है।
- शब्द-भण्डार में वृद्धि— संस्कृत विषय को रोचक बनाने के लिए विद्यार्थी स्वयं श्यामपट्ट या फ्लैश कार्ड पर शब्द लिख सकते हैं। इससे उनके संस्कृत शब्द-भण्डार में वृद्धि होती है।
- मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों की प्रबलता— विद्यार्थियों को उनकी क्षमता, कक्षा-स्तर और रुचि के अनुसार कार्य देने से आत्मविश्वास बढ़ता है। वे अधिक मन लगाकर सक्रिय रहते हैं और अधिगम प्रभावशाली बनता है।
करके सीखने से होने वाला विकास
इस विधि से विद्यार्थियों में आत्मविश्वास और सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास होता है। साथ ही कल्पनाशक्ति, तर्कशक्ति और चिन्तनशक्ति भी विकसित होती है। इस प्रकार करके सीखना विद्यार्थियों के भावी जीवन के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व-विकास में भी सहायक है।
- करके सीखना विधि में विद्यार्थी स्वयं क्रियाएँ और कार्य करके ज्ञान प्राप्त करता है।
- स्वयं किया गया कार्य अधिगम को स्थायी और चिरस्मरणीय बनाता है।
- यह बालकेन्द्रित और क्रिया-केन्द्रित अधिगम को बढ़ावा देती है।
- इससे शारीरिक एवं मानसिक विकास, विविध कौशल, रुचि और आत्मविश्वास बढ़ते हैं।
- श्यामपट्ट, गतिविधियाँ, खेल तथा फ्लैश कार्ड आदि के माध्यम से संस्कृत का अभ्यास कराया जा सकता है।
- इस विधि से शब्द-भण्डार, कल्पनाशक्ति, तर्कशक्ति और चिन्तनशक्ति का विकास होता है।
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उच्चारणाभ्यास—विधियाँ एवं उच्चारण के भेद
उच्चारणाभ्यास
किसी भाषा के शब्दों को मुख से स्पष्ट एवं उचित ध्वनि के साथ बोलना उच्चारण कहलाता है। मनुष्य के विचार और भाव मुख के अवयवों द्वारा स्वर तथा व्यंजनयुक्त शब्दों के रूप में व्यक्त होते हैं। इसलिए भाषा को शुद्ध रूप में बोलने और समझने के लिए सही उच्चारण का विशेष महत्व है।
संस्कृत शिक्षण को सरल और रुचिकर बनाने में उच्चारण महत्वपूर्ण स्थान रखता है। शुद्ध उच्चारण से विद्यार्थी संस्कृत भाषा का ज्ञान सहजता से प्राप्त कर लेते हैं।
अच्छे उच्चारण की विशेषताएँ
उच्चारण की गुणवत्ता मधुरता, अक्षरों की स्पष्टता, पदों के पृथक-पृथक उच्चारण, सुन्दर स्वर तथा उचित लय आदि पर निर्भर करती है। सही उच्चारण में प्रत्येक वर्ण और शब्द को उसके उचित स्थान एवं प्रयत्न के अनुसार स्पष्ट रूप से बोला जाना चाहिए।
प्राचीन शिक्षा में भी शुद्ध उच्चारण को विशेष महत्व दिया जाता था। गुरु के पदों का शुद्ध उच्चारण करने वाला शिष्य ही ज्ञान को ठीक प्रकार से ग्रहण कर पाता था।
संस्कृत शिक्षण में उच्चारण-अभ्यास की विधियाँ
1. पूर्ण विधि
इस विधि में ध्वनियों और शब्दों का पूर्ण रूप से उच्चारण कराया जाता है। संस्कृत शिक्षण में उच्चारण-अभ्यास की यह एक सार्थक विधि है।
2. खण्ड विधि
इस विधि में विद्यार्थियों को स्वर और ध्वनियों के उच्चारण-स्थान तथा प्रयत्न का ज्ञान कराया जाता है। शब्द को उसके भागों में समझकर शुद्ध उच्चारण का अभ्यास कराया जाता है।
3. पूर्ण तथा खण्ड विधि
इस विधि में पहले पूर्ण विधि द्वारा उच्चारण-अभ्यास कराया जाता है और उसके बाद खण्ड विधि से स्वर एवं ध्वनियों के उच्चारण का अभ्यास कराया जाता है।
4. ध्वन्यात्मक विधि
विद्यार्थियों के उच्चारण को शुद्ध करने के लिए उनके ध्वनितन्त्र को प्रशिक्षित किया जाता है तथा समान ध्वनि वाले शब्दों का बार-बार अभ्यास कराया जाता है।
5. अनुकरण विधि
शिक्षक वाक्यों और कठिन शब्दों का आदर्श वाचन करता है तथा विद्यार्थी उसका अनुकरण करते हैं। इस प्रकार अभ्यास करने से विद्यार्थी शुद्ध उच्चारण सीखते हैं।
6. उपकरण विधि
आधुनिक समय में उच्चारण-अभ्यास के लिए विभिन्न उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। ग्रामोफोन, लिंग्वाफोन, टेपरिकॉर्डर और रेडियो आदि की सहायता से संस्कृत ध्वनियों का ज्ञान तथा शुद्ध उच्चारण कराया जा सकता है।
उच्चारण के भेद
संस्कृत भाषा के उच्चारण को मुख्य रूप से वैदिक और लौकिक रूपों में समझाया गया है।
1. वैदिक उच्चारण
वैदिक रूप में वर्णों को तीन भागों में विभाजित किया गया है—
| भेद | अर्थ |
|---|---|
| उदात्त | जिस ध्वनि का उच्चारण उच्च स्वर से किया जाता है। जिन शब्दों को तीव्रता से बोला जाता है, वे उदात्त वर्ण कहलाते हैं। |
| अनुदात्त | जिन वर्णों अथवा शब्दों का उच्चारण नीचे या निम्न स्वर से किया जाता है। |
| स्वरित | जिस उच्चारण में निम्नता और उच्चता दोनों का मिश्रण होता है। |
2. लौकिक उच्चारण
लौकिक रूप में वर्णों को उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर तीन रूपों में बाँटा गया है—
| भेद | अर्थ |
|---|---|
| ह्रस्व | जिस ध्वनि के उच्चारण में कम समय लगता है। |
| दीर्घ | जिस ध्वनि के उच्चारण में ह्रस्व से दुगुना समय लगता है। |
| प्लुत | जिस ध्वनि के उच्चारण में ह्रस्व वर्ण से तिगुना समय लगता है। |
स्वरूप की दृष्टि से उच्चारण
स्वरूप की दृष्टि से उच्चारण दो प्रकार का होता है—
1. शुद्ध उच्चारण
जिस ध्वनि का उच्चारण-स्थान और प्रयत्न निश्चित हो तथा वर्णों एवं शब्दों का उच्चारण उनके उचित स्थान और प्रयत्न के अनुसार किया जाए, उसे शुद्ध उच्चारण कहते हैं।
2. अशुद्ध उच्चारण
जब विद्यार्थी किसी शब्द का उच्चारण करते समय उसके उचित उच्चारण-स्थान और प्रयत्न पर ध्यान नहीं देता, तब वह अशुद्ध उच्चारण करता है।
शुद्ध उच्चारण का महत्व
संस्कृत भाषा का शिक्षण शुद्ध उच्चारण के आधार पर ही प्रभावशाली बनाया जा सकता है। उच्चारण भाषा की नींव के समान है। भाषा की सुन्दरता, सहजता, मधुरता, सरलता, शुद्धता और सार्थकता उचित उच्चारण पर निर्भर करती है।
महर्षि पतञ्जलि के शब्दों में—
“एकोशब्दः सम्यक् ज्ञातः, सुप्रयुक्तः स्वर्गलोके च कामधुक् भवति।”
- मुख से स्पष्ट और उचित ध्वनि के साथ शब्द बोलना उच्चारण कहलाता है।
- उच्चारण-अभ्यास की प्रमुख विधियाँ—पूर्ण, खण्ड, पूर्ण तथा खण्ड, ध्वन्यात्मक, अनुकरण और उपकरण विधि हैं।
- वैदिक उच्चारण के तीन भेद—उदात्त, अनुदात्त और स्वरित हैं।
- लौकिक उच्चारण के तीन भेद—ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत हैं।
- स्वरूप की दृष्टि से उच्चारण शुद्ध और अशुद्ध दो प्रकार का होता है।
- शुद्ध उच्चारण संस्कृत भाषा की स्पष्टता, मधुरता, सरलता और सार्थकता के लिए आवश्यक है।
सस्वर वाचन एवं अनुकरण वाचन
सस्वर वाचन
भाषा मूलतः मौखिक होती है। लिखित भाषा को उसके भाव और विचारों को समझते हुए ध्वन्यात्मक उच्चारण के साथ पढ़ना सस्वर वाचन कहलाता है। इसमें विद्यार्थी केवल लिखे हुए शब्दों को देखता ही नहीं, बल्कि उनका उचित उच्चारण करते हुए बोलकर भी पढ़ता है। इसी कारण सस्वर वाचन को मौखिक वाचन भी कहा जाता है।
सस्वर वाचन करते समय वर्णों और शब्दों का शुद्ध उच्चारण, उचित स्वर, गति तथा लय का विशेष ध्यान रखा जाता है। इससे विद्यार्थी पढ़ी गई सामग्री के अर्थ और भाव को अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाता है।
सस्वर वाचन की प्रक्रिया
सस्वर वाचन मुख्यतः निम्न चार प्रक्रियाओं पर आधारित होता है—
- लिपिबद्ध अक्षरों को देखना।
- अक्षरों और शब्दों को पहचानना।
- शब्दों के अर्थ को समझना।
- शब्दों का उचित उच्चारण करना।
सस्वर वाचन के उद्देश्य
- बालक में शुद्ध उच्चारण की योग्यता विकसित करना। विशेष रूप से श, स, ह, क्ष, छ, ष, स्न आदि अक्षरों तथा मात्रायुक्त ध्वनियों के सही उच्चारण पर ध्यान देना।
- वाचन करते समय उचित स्वर, उचित गति और लय का प्रयोग करने की क्षमता विकसित करना।
- भाषा के प्रवाह और स्पष्टता का विकास करना।
- पाठ को पढ़कर उसके अर्थ और भाव को ग्रहण करने की योग्यता विकसित करना।
- वाचन करते समय वाणी पर उचित नियंत्रण करना।
- उच्चारण और स्वर पर स्थानीय बोलियों का अनुचित प्रभाव न आने देना।
- सस्वर वाचन द्वारा बालक में आत्मविश्वास तथा आत्मनिर्भरता का विकास करना।
- वाचन को इस प्रकार करना कि उसका उद्देश्य सफल हो तथा उसका उचित प्रभाव व्यक्ति और समाज पर पड़े।
सस्वर वाचन का महत्व
सस्वर वाचन भाषा-शिक्षण का महत्वपूर्ण अंग है। शिक्षक विद्यार्थियों के सामने आदर्श रूप से पाठ पढ़ता है और विद्यार्थी उसके वाचन का अनुसरण करते हैं। इसके नियमित अभ्यास से वाचन-कौशल और भाषा-ज्ञान दोनों का विकास होता है।
- वाचन-शिक्षा प्राप्त करने और पठन में सहायता मिलती है।
- यह ज्ञानोपार्जन का साधन है। पाठ्य-पुस्तक से ज्ञान प्राप्त होता है और अन्य ग्रन्थों के अध्ययन से ज्ञान का विस्तार होता है।
- बालकों का शब्दोच्चारण शुद्ध होता है।
- अक्षर-विन्यास शुद्ध करने में सहायता मिलती है।
- बालकों के शब्द-भण्डार में वृद्धि होती है।
- ज्ञानेन्द्रियाँ क्रियाशील और प्रशिक्षित होती हैं।
- संकोच, झिझक और हिचकिचाहट दूर होती है तथा आत्मविश्वास बढ़ता है।
- निरन्तर अभ्यास से विद्यार्थी वाद-विवाद, भाषण और वाक्पटुता में प्रवीण हो सकता है।
- व्यक्ति में स्वाध्याय की आदत विकसित होती है।
संस्कृत शिक्षण में वाचन के रूप
संस्कृत शिक्षण में वाचन मुख्यतः तीन रूपों में किया जाता है—
- आदर्श वाचन / सस्वर वाचन
- अनुकरण वाचन
- मौन वाचन
प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षक सर्वप्रथम पाठ्यवस्तु का उचित आरोह-अवरोह, यति, गति और लय के साथ आदर्श अथवा सस्वर वाचन करता है। इसके बाद विद्यार्थी उसके वाचन का अनुकरण करते हैं।
अनुकरण वाचन
संस्कृत भाषा को कठिन भाषा माना जाता है। विद्यार्थी संस्कृत के श्लोकों, वाक्यों, पद्यों या कठिन शब्दों का शुद्ध वाचन आरम्भ में स्वयं नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में शिक्षक पहले आदर्श वाचन करता है और विद्यार्थी उसके बाद उसी प्रकार वाचन करते हैं। इसे अनुकरण वाचन कहा जाता है।
अनुकरण वाचन के माध्यम से विद्यार्थी शिक्षक के उच्चारण, स्वर, आरोह-अवरोह और वाचन-शैली का अनुसरण करते हुए सही वाचन का अभ्यास करते हैं।
अनुकरण वाचन के तत्व
अनुकरण वाचन में मुख्यतः चार तत्व निहित होते हैं—
- लिपिबद्ध अक्षरों को देखना।
- लिपिबद्ध अक्षरों को पहचानना।
- शब्दों को समझना और उनका उच्चारण करना।
- शब्दों का अर्थ ग्रहण करना।
अनुकरण वाचन करते समय ध्यान देने योग्य बातें
- अनुकरण वाचन शिक्षक द्वारा आदर्श वाचन किए जाने के बाद कराया जाना चाहिए।
- पुस्तक विद्यार्थी के बाएँ हाथ में हो तथा इस प्रकार पकड़ी जाए कि हाथ लगभग 135° का कोण बनाए।
- शब्दों की ध्वनियों का स्पष्ट उच्चारण होना आवश्यक है।
- वाचन उचित आरोह-अवरोह के साथ होना चाहिए।
- शब्दों के बलाघात तथा प्रयत्न-लाघव का ध्यान रखा जाना चाहिए।
- शिक्षक के आदर्श वाचन के बाद विद्यार्थी की आवाज भी स्पष्ट होनी चाहिए।
- विद्यार्थी का स्वर पूरी कक्षा में स्पष्ट सुनाई देना चाहिए।
- स्वरों का उतार-चढ़ाव व्यक्त किए जाने वाले भावों के अनुरूप होना चाहिए।
- कक्षा के सभी विद्यार्थियों से एक-एक करके अनुकरण वाचन कराना चाहिए।
- विद्यार्थियों को अनुकरण वाचन खड़े होकर करना चाहिए।
- वाचन करते समय विद्यार्थियों को अवांछनीय क्रियाएँ नहीं करनी चाहिए।
- अशुद्ध उच्चारण होने पर शिक्षक को तत्काल उचित सुधार करना चाहिए। वाचन की त्रुटियों का निराकरण शिक्षक द्वारा किया जाना आवश्यक है।
अनुकरण वाचन का परिणाम
अनुकरण वाचन के नियमित अभ्यास से विद्यार्थी स्पष्ट उच्चारण, उचित ध्वनि, भावानुकूल बल तथा प्रवाहपूर्ण वाचन का ज्ञान प्राप्त करते हैं। इससे संस्कृत भाषा का वाचन अधिक सरल और रुचिकर बनता है।
- लिखित भाषा को उचित उच्चारण और स्वर के साथ बोलकर पढ़ना सस्वर वाचन कहलाता है।
- सस्वर वाचन में शुद्ध उच्चारण, उचित स्वर, गति, लय और अर्थ-बोध पर ध्यान दिया जाता है।
- सस्वर वाचन से उच्चारण, शब्द-भण्डार, आत्मविश्वास और वाचन-कौशल का विकास होता है।
- संस्कृत शिक्षण में वाचन के तीन रूप—आदर्श/सस्वर वाचन, अनुकरण वाचन और मौन वाचन हैं।
- शिक्षक के आदर्श वाचन का अनुसरण करके पढ़ना अनुकरण वाचन कहलाता है।
- अनुकरण वाचन में स्पष्ट उच्चारण, आरोह-अवरोह, स्वर, बलाघात और भावानुकूल वाचन का ध्यान रखना आवश्यक है।
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सामूहिक कार्य एवं समूह शिक्षण
सामूहिक कार्य
संस्कृत शिक्षण में प्रशिक्षुओं में आत्मविश्वास तथा सहयोग की भावना विकसित करने के लिए सामूहिक कार्य विधि उपयोगी मानी जाती है। इसका अर्थ है—विद्यार्थियों या शिक्षकों का समूह बनाकर किसी कार्य को मिल-जुलकर पूरा करना।
जब शिक्षण कार्य केवल एक अध्यापक द्वारा न करके दो या दो से अधिक शिक्षकों के पारस्परिक सहयोग से कराया जाता है, तो इसे सामूहिक कार्य अथवा समूह शिक्षण कहा जाता है। इसमें शिक्षक आपसी सहयोग से किसी पाठ्यवस्तु या शीर्षक के शिक्षण की योजना बनाते हैं और एक छात्र-समूह के लिए निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कार्य करते हैं।
संस्कृत शिक्षण में समूह कार्य विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि इसमें अतिरिक्त ज्ञान और कौशल से युक्त विभिन्न शिक्षक मिलकर शिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाते हैं।
सामूहिक कार्य की विशेषताएँ
- सामूहिक कार्य अनेक अध्यापकों के सहयोग से संचालित किया जाता है और अनुदेशन का कार्य एक से अधिक शिक्षक करते हैं।
- इससे शिक्षकों तथा विद्यार्थियों में प्रेम-भावना और सामूहिक उत्तरदायित्व का विकास होता है।
- कक्षा में विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कार्य किया जाता है।
- विद्यार्थी सहयोग के सिद्धान्त का पालन करना सीखते हैं।
- विद्यालय में उपलब्ध साधनों और संसाधनों का उचित उपयोग किया जाता है।
- यह विधि विद्यालय की व्यवस्था के साथ समन्वित होकर चलती है।
- समूह पहले से नियोजित और निर्धारित किया जाता है।
- समूह कार्य पूर्व-नियोजित होता है।
- सुव्यवस्थित कार्य तथा सामूहिक उत्तरदायित्व इस विधि के महत्वपूर्ण सिद्धान्त हैं।
सामूहिक कार्य के सदस्य
समूह शिक्षण को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए अलग-अलग उत्तरदायित्व वाले सदस्य सम्मिलित होते हैं—
- प्रधानाध्यापक
- दल संयोजक
- वरिष्ठ अध्यापक
- अध्यापक
- प्रयोगशाला सहायक
- लिपिक
- शारीरिक शिक्षा अध्यापक
समूह शिक्षण सम्बन्धी कार्यक्रम
संस्कृत शिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए सामूहिक कार्य में निम्न कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं—
1. साधारण जनसभा
इस सभा में समूह के सभी शिक्षकों को उनकी रुचि और योग्यता के अनुसार कार्य दिया जाता है। एक शिक्षक मुख्य शिक्षक के रूप में पूरे समूह का निर्देशन करता है। अन्य शिक्षक सौंपे गए कार्य को पूरा करते हैं तथा विद्यार्थी अपनी शंकाओं का समाधान अध्यापकों की सहायता से करते हैं। सभा में विचार-विमर्श का अवसर भी मिलता है।
2. लघु आमसभा
आमसभा के बाद विद्यार्थियों को उनकी समस्याओं के समाधान के लिए छोटे-छोटे समूहों में बाँटा जाता है। प्रत्येक समूह में एक शिक्षक बैठकर विद्यार्थियों की समस्याओं को समझता और उनका समाधान करता है।
3. प्रयोगशाला सत्र
संस्कृत भाषा सीखते समय विद्यार्थी अध्यापकों के मार्गदर्शन में कार्य करते हैं। आवश्यकता के अनुसार दृश्य-श्रव्य सामग्री तथा विभिन्न उपकरणों का प्रयोग भी किया जाता है।
4. समीक्षा सत्र
विद्यार्थियों की प्रगति तथा समूह कार्य-दल की प्रभावकारिता की समीक्षा करने के लिए कुछ समय के अन्तराल पर बैठक आयोजित की जाती है। इसमें पिछले कार्यों की समीक्षा की जाती है और भावी कार्यक्रम की रूपरेखा निर्धारित की जाती है।
समूह कार्य की क्रियाविधि
समूह कार्य को सफलतापूर्वक संचालित करने के लिए इसकी क्रियाविधि तीन प्रमुख चरणों में पूरी की जाती है—
- योजना बनाना— शिक्षण के उद्देश्य और कार्यों की पूर्व योजना तैयार की जाती है।
- व्यवस्था करना— योजना के अनुसार समूह, शिक्षक, सामग्री और आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था की जाती है।
- मूल्यांकन करना— कार्य के बाद उसकी सफलता और विद्यार्थियों की प्रगति का मूल्यांकन किया जाता है।
समूह शिक्षण का महत्व
समूह शिक्षण से विद्यार्थियों में आपसी प्रेम, सहयोग और समूह में रहने की प्रवृत्ति विकसित होती है। उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है और वे बिना संकोच प्रश्न पूछना सीखते हैं। कक्षा में प्रजातान्त्रिक वातावरण का निर्माण होता है तथा विद्यार्थियों को एक से अधिक अध्यापकों के ज्ञान और अनुभव का लाभ मिलता है।
समूह के सदस्य तकनीकी तथा शैक्षिक कार्यों की योजना बनाकर निर्धारित योजना के अनुसार शिक्षण करते हैं। इससे शिक्षण व्यवस्थित, सहयोगपूर्ण और उद्देश्यपरक बनता है।
- दो या दो से अधिक शिक्षकों के सहयोग से किया गया शिक्षण समूह शिक्षण कहलाता है।
- इसमें योजना, सहयोग, उत्तरदायित्व और उपलब्ध संसाधनों के उचित उपयोग पर बल दिया जाता है।
- समूह शिक्षण के प्रमुख कार्यक्रम—साधारण जनसभा, लघु आमसभा, प्रयोगशाला सत्र और समीक्षा सत्र हैं।
- इसकी क्रियाविधि के तीन चरण—योजना बनाना, व्यवस्था करना और मूल्यांकन करना हैं।
- यह विद्यार्थियों में सहयोग, आत्मविश्वास, प्रश्न पूछने की क्षमता और सामूहिक भावना विकसित करता है।
- एक से अधिक अध्यापकों के ज्ञान और कौशल का लाभ मिलने से शिक्षण अधिक प्रभावशाली बनता है।
खेल प्रविधि एवं संस्कृत शिक्षण में खेलों का महत्व
खेल प्रविधि
संस्कृत शिक्षण को अधिक रोचक, आकर्षक, सुबोध और सरल बनाने के लिए खेल प्रविधि का प्रयोग किया जाता है। भाषा-शिक्षण में खेल एक नैसर्गिक और सशक्त माध्यम है, क्योंकि विद्यार्थी खेलते हुए कठिन शब्दों, श्लोकों और भाषा के विभिन्न पक्षों को अधिक सहजता से सीख लेते हैं।
खेल द्वारा किया गया शिक्षण रुचिकर होने के साथ-साथ अधिक स्थायी भी होता है। नाटक, वाद-विवाद, सामूहिक चर्चा, वर्तनी, लेखन, पठन, शब्द-निर्माण तथा श्लोक-कंठस्थीकरण जैसी अनेक गतिविधियाँ खेल के रूप में कराई जा सकती हैं।
गीतों का गायन करके श्लोकों का अर्थ समझाया जा सकता है। इसी प्रकार वर्तनी सिखाने के लिए शब्द बताना, अशुद्ध शब्दों को शुद्ध कराना तथा नए शब्दों की पहचान कराना भी खेल के माध्यम से सम्भव है।
संस्कृत भाषा में खेलों का आयोजन
संस्कृत शिक्षण में शिक्षक विद्यार्थियों की रुचि और कक्षा-स्तर के अनुसार अनेक प्रकार के खेल आयोजित कर सकता है।
1. संस्कृत प्रश्नोत्तरी
कक्षा को दो समूहों में बाँटकर संस्कृत से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जा सकते हैं। दोनों समूह अधिक से अधिक सही उत्तर देने का प्रयास करते हैं। इससे विद्यार्थियों में प्रतिस्पर्धा, सक्रियता और संस्कृत विषय के प्रति रुचि उत्पन्न होती है।
उदाहरण—
शिक्षक प्रश्न— सः किम् करोति?
छात्र उत्तर— सः पुस्तकम् पठति।
2. अन्त्याक्षरी
विद्यार्थियों को सरल नीति-श्लोक, सूक्तियाँ, सुभाषित श्लोक तथा वन्दना-श्लोक कंठस्थ कराकर अन्त्याक्षरी कराई जा सकती है। एक दल का विद्यार्थी श्लोक सुनाता है और दूसरा दल उसके अंतिम वर्ण से प्रारम्भ होने वाला दूसरा श्लोक सुनाता है।
3. सुभाषित श्लोक
इस खेल में विद्यार्थी कंठस्थ सुभाषित श्लोक सुनाते हैं। श्लोक के गायन में गति, यति, छन्द, लय और स्वर का ध्यान रखा जाता है। अच्छा प्रस्तुतीकरण करने वाले विद्यार्थी को अच्छे अंक दिए जा सकते हैं।
4. समस्या पूर्ति
विद्यार्थियों को किसी श्लोक के कुछ चरण देकर शेष चरण स्वयं पूरा करने के लिए कहा जाता है। इससे श्लोक-ज्ञान और रचनात्मक क्षमता का विकास होता है।
उदाहरण—
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते, आयुर्विद्या यशोबलम्।।
5. प्रहेलिका
विद्यार्थियों को छोटी-छोटी प्रहेलिकाएँ प्रस्तुत करके उत्तर पूछा जाता है। जो विद्यार्थी अधिक सही उत्तर देता है, उसे विजयी घोषित किया जा सकता है।
6. शब्द खेल
संस्कृत के शब्द फ्लैश कार्ड या पत्रों पर लिखकर विद्यार्थियों को दिए जा सकते हैं। सही उच्चारण करने अथवा सही शब्द पहचानने पर अंक दिए जाते हैं।
सरल विलोम शब्दों के कार्ड बनाकर भी खेल कराया जा सकता है। जैसे—
- पृथ्वी — नभः
- अग्निः — अर्थी
- धरती — आकाश
इसी प्रकार बहुविकल्पीय शब्द-चयन कराया जा सकता है। उदाहरण के लिए—
तारा (स्त्रीलिंग) शब्द का अर्थ चुनिए—
- नदी
- नक्षत्रम्
- तन्त्री
- सन्देहः
सही उत्तर—नक्षत्रम्
इसी प्रकार—
चञ्चरीकः (पुल्लिंग) का सही अर्थ—भ्रमरः
शब्द-ज्ञान बढ़ाने में खेल का उपयोग
शिक्षक उपसर्ग, प्रत्यय और समास से नए शब्द बनवाकर विद्यार्थियों के शब्द-ज्ञान में वृद्धि कर सकता है। जैसे—
- समक्ष = सम् + अक्ष = अव्ययीभाव समास
- शरणागतः = शरणं + आगतः = तत्पुरुष समास
- अहर्निशम् = अहः च निशा च = द्वन्द्व
ऐसी गतिविधियों से विद्यार्थी खेल-खेल में संस्कृत शब्दों, उनके अर्थ और व्याकरणिक रूपों का अभ्यास करते हैं।
संस्कृत शिक्षण में खेलों का महत्व
- खेल के माध्यम से प्रशिक्षु संस्कृत शिक्षण में खेलों के महत्व को समझते हैं और किसी कार्य को खेल-खेल में करने का साहस विकसित करते हैं।
- खेल द्वारा संस्कृत भाषा सीखने से विद्यार्थियों में अधिगम के प्रति रुचि जागृत होती है। प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी और उच्च स्तर का बनता है।
- कक्षा में विविध खेलों के आयोजन से विद्यार्थियों में उत्साह बढ़ता है।
- शिक्षक प्रशिक्षु सरलता और सहजता से संस्कृत भाषा सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करते हैं तथा आगे भी खेलों के माध्यम से नया ज्ञान सिखाने और सीखने के इच्छुक रहते हैं।
- खेल विद्यार्थियों को मानसिक रूप से पढ़ने के लिए तैयार करते हैं। प्राथमिक स्तर पर विद्यार्थियों की खेल के प्रति विशेष रुचि का उपयोग संस्कृत शिक्षण में किया जा सकता है।
- खेल के माध्यम से संस्कृत शिक्षण प्रशिक्षुओं को नीरस, रुचिहीन और कठिन नहीं लगता।
- संस्कृत के प्रत्येक प्रकरण को खेलों द्वारा रुचिपूर्ण और सरल बनाया जा सकता है।
- खेल संस्कृत शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का महत्वपूर्ण अंग है। प्राथमिक स्तर पर विभिन्न खेलों का सहारा लेकर शिक्षण देना उपयोगी माना गया है।
- खेल के माध्यम से विद्यार्थी शिक्षण कार्य में सक्रिय रहते हैं और समूह के साथ व्यवस्थित रूप से सीखते हैं।
- खेलों से विद्यार्थियों का शारीरिक और मानसिक विकास होता है। वे सक्रिय रहकर अपने सहपाठियों के साथ कार्य करना सीखते हैं।
- खेलों का ज्ञान प्रशिक्षुओं को अधिक कुशल शिक्षक बनने के लिए प्रेरित करता है। क्रियाशीलता पर आधारित अधिगम से विद्यार्थी दैनिक व्यवहार में भी सक्रिय और उत्साही रहते हैं।
- खेलों के माध्यम से प्रशिक्षुओं को अतिरिक्त जानकारी प्रदान की जा सकती है।
- संस्कृत शिक्षण का नया ज्ञान प्राप्त होने से प्रशिक्षुओं में नवीन कला और सोच का विकास होता है।
- प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक स्तर पर भी संस्कृत शिक्षण को सरल, सुग्राह्य और रोचक बनाने में खेल अत्यन्त उपयोगी हैं।
- खेल प्रविधि संस्कृत शिक्षण को रोचक, सरल, सक्रिय और स्थायी बनाती है।
- प्रश्नोत्तरी, अन्त्याक्षरी, सुभाषित श्लोक, समस्या पूर्ति, प्रहेलिका और शब्द खेल इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- खेलों द्वारा वर्तनी, शब्द-निर्माण, श्लोक, पठन, लेखन तथा व्याकरण का अभ्यास कराया जा सकता है।
- खेल विद्यार्थियों में रुचि, उत्साह, सक्रियता और समूह में सीखने की प्रवृत्ति विकसित करते हैं।
- इनसे शारीरिक एवं मानसिक विकास के साथ अधिगम अधिक स्थायी होता है।
- संस्कृत जैसे कठिन माने जाने वाले विषय को भी खेल के माध्यम से सरल और रुचिकर बनाया जा सकता है।
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अभिनय विधि
अभिनय विधि
संस्कृत भाषा के शिक्षण को अभिनय विधि द्वारा सरल और रुचिकर बनाया जा सकता है। इस विधि में विद्यार्थियों को विभिन्न परिस्थितियों, पात्रों और घटनाओं का अभिनय करने का अवसर मिलता है। इससे उनकी सहज प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है और वे विषयवस्तु को केवल पढ़ने के बजाय उसका अनुभव भी करते हैं।
अभिनय का अर्थ
अतीत या वर्तमान की किसी स्थिति को क्रियान्वित करके उसे जीवन्त रूप प्रदान करना अभिनय कहलाता है। अर्थात् किसी अवस्था या परिस्थिति का अनुकरण करके उसे प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा गया है—
“अवस्थानुकृति नाटिकम्।”
अभिनय द्वारा सीखने का उदाहरण
दशहरे के अवसर पर आयोजित होने वाली रामलीला इसका सरल उदाहरण है। रामलीला में रामायण के विभिन्न पात्रों का अभिनय देखकर उनके चरित्र और उस समय की परिस्थितियों का ज्ञान वर्तमान में सरलता से प्राप्त हो जाता है।
इसी प्रकार विद्यार्थी किसी विशेष युग के पात्रों का अभिनय करके उस युग की परिस्थितियों और अनुभूतियों को समझ सकते हैं। इससे उनकी भावनाएँ परिष्कृत होती हैं और उनके अनुभवों का विस्तार होता है।
चरित्र निर्माण में अभिनय की भूमिका
विभिन्न पात्रों का अभिनय करने से विद्यार्थियों को उनके गुणों और विशेषताओं को समझने का अवसर मिलता है। अच्छे पात्रों के गुणों का प्रभाव अभिनय करने वाले विद्यार्थी पर भी पड़ता है। साथ ही दर्शकों के मानस-पटल पर भी उन चरित्रों और उनकी विशेषताओं का स्थायी प्रभाव पड़ता है।
संस्कृत शिक्षण में महापुरुषों और विद्वानों के चरित्रों का अभिनय के माध्यम से प्रासंगिक चित्रण किया जा सकता है। ऐतिहासिक प्रसंगों को भी अभिनय द्वारा नवीन और सजीव रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
संस्कृत साहित्य में अभिनय
संस्कृत साहित्य में नाटकों का विशेष स्थान है। अभिनय के माध्यम से इन नाटकों की विषयवस्तु को विद्यार्थियों के सामने सजीव रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। संस्कृत साहित्य का प्रसिद्ध नाटक “अभिज्ञान-शाकुन्तलम्” इसका सुन्दर उदाहरण है।
संस्कृत शिक्षण में अभिनय का प्रयोग
संस्कृत शिक्षक शिक्षण के दौरान अनेक प्रकार से अभिनय का प्रयोग करता है। आदर्श वाचन, सस्वर वाचन तथा कथाकथन के समय आंगिक, वाचिक तथा सात्विक अभिनय साथ-साथ प्रयुक्त होते हैं।
पाठ्यवस्तु में निर्धारित नाटकों का अभिनय कराने के अतिरिक्त वार्षिकोत्सव, राष्ट्रीय पर्व और बालसभा जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी विद्यार्थियों से अभिनय कराया जा सकता है। इससे संस्कृत शिक्षण मनोरंजक होने के साथ-साथ अधिक प्रभावशाली भी बनता है।
अभिनय विधि का महत्व
- संस्कृत भाषा के शिक्षण को सरल और रुचिकर बनाने में सहायता करती है।
- विद्यार्थियों की सहज प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करने का अवसर प्रदान करती है।
- अतीत या वर्तमान की परिस्थितियों को सजीव रूप में समझने में सहायता करती है।
- किसी युग विशेष के पात्रों का अभिनय करने से विद्यार्थी उस युग की अनुभूतियों और परिस्थितियों को समझते हैं।
- विद्यार्थियों की भावनाओं का परिष्कार होता है तथा उनके अनुभवों में व्यापकता आती है।
- विभिन्न पात्रों के गुणों और विशेषताओं का ज्ञान प्राप्त होता है।
- महापुरुषों, विद्वानों तथा ऐतिहासिक चरित्रों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है।
- संस्कृत के नाटकों और अन्य विषयवस्तु को सजीव रूप में समझने में सहायता मिलती है।
- विद्यार्थियों में परस्पर संस्कृत भाषा में वार्तालाप करने की योग्यता विकसित होती है।
- संस्कृत भाषा को समझने की क्षमता तथा संस्कृत में पढ़ने की रुचि बढ़ती है।
- विद्यार्थियों की गहन कल्पनाशक्ति और अभिव्यक्ति-कौशल का विकास होता है।
- किसी अवस्था या परिस्थिति को क्रियान्वित करके जीवन्त रूप में प्रस्तुत करना अभिनय कहलाता है।
- रामलीला अभिनय द्वारा अतीत के पात्रों और परिस्थितियों को समझने का सरल उदाहरण है।
- संस्कृत शिक्षण में आदर्श वाचन, सस्वर वाचन और कथाकथन के साथ आंगिक, वाचिक तथा सात्विक अभिनय का प्रयोग होता है।
- “अभिज्ञान-शाकुन्तलम्” संस्कृत साहित्य में अभिनय से सम्बन्धित महत्वपूर्ण नाटक का उदाहरण है।
- अभिनय से विद्यार्थियों की भावनाओं, अनुभवों, कल्पनाशक्ति और अभिव्यक्ति-कौशल का विकास होता है।
- यह संस्कृत में वार्तालाप, भाषा को समझने और संस्कृत पढ़ने की रुचि विकसित करने में सहायक है।
श्यामपट्ट, चार्ट एवं मॉडल
श्यामपट्ट
किसी भी शिक्षण कार्य में श्यामपट्ट अध्यापक का महत्वपूर्ण सहयोगी है। कक्षा-कक्ष में इसका होना आवश्यक माना गया है। संस्कृत शिक्षण में प्राथमिक स्तर पर अक्षर-ज्ञान से लेकर उच्च स्तर पर लेखन कार्य, शुद्ध वर्तनी, उच्चारण-अभ्यास तथा कठिन शब्दों की व्याख्या तक श्यामपट्ट का उपयोग किया जाता है।
शिक्षक श्यामपट्ट पर शब्द, शब्दार्थ, समास-विग्रह, सन्धि-विच्छेद, शब्दरूप, धातुरूप आदि लिखकर विद्यार्थियों को स्पष्ट रूप से समझा सकता है। विभिन्न विषयों की महत्वपूर्ण बातों को विद्यार्थियों के मानस-पटल पर अंकित करने में भी यह उपयोगी है।
श्यामपट्ट केवल साधन है, साध्य नहीं। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों के विचारों को विकसित करना तथा शिक्षण को स्पष्ट और प्रभावशाली बनाना है। अच्छे अध्यापक के लिए इसका उचित प्रयोग आवश्यक माना गया है।
संस्कृत भाषा शिक्षण में श्यामपट्ट की उपयोगिता
- संस्कृत साहित्य की गद्य, पद्य, कथा एवं रचना आदि विधाओं का शिक्षण करते समय पाठ्यवस्तु के महत्वपूर्ण अंश, तथ्य और शब्दार्थ स्पष्ट करने में श्यामपट्ट उपयोगी है।
- कठिन पदों की व्याख्या तथा आवश्यक रेखाचित्र बनाने के लिए श्यामपट्ट का प्रयोग किया जाता है।
- व्याकरण शिक्षण में सन्धि, समास, धातुरूप और शब्दरूप आदि को समझाने में इसका विशेष उपयोग होता है।
- मूल्यांकन प्रश्न तथा अभ्यास कार्य सरलता से श्यामपट्ट पर कराया जा सकता है।
- इसके प्रयोग से विद्यार्थियों की लेखन क्षमता का विकास होता है।
- श्यामपट्ट पर लिखी हुई विषयवस्तु के कारण अर्जित ज्ञान अधिक सुदृढ़ और स्थायी बनता है।
श्यामपट्ट पर व्याकरण शिक्षण के उदाहरण
संस्कृत वाक्यों के माध्यम से विभक्ति आदि का अभ्यास कराया जा सकता है। जैसे—
- पिता पुत्रेण सह गच्छति।
- माता स्वभावेन उदारः भवति।
- मह्यम् मोदकं रोचते।
इसी प्रकार शिक्षक किसी एक शब्द के रूप श्यामपट्ट पर लिखकर विद्यार्थियों को समझा सकता है। उदाहरण के लिए राम शब्द—
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | रामः | रामौ | रामाः |
| द्वितीया | रामम् | रामौ | रामान् |
चार्ट
जब किसी वस्तु का वास्तविक मॉडल उपलब्ध न हो, तब शिक्षक चार्ट या ग्राफ की सहायता से विषयवस्तु को समझा सकता है। चार्ट द्वारा शिक्षण की विभिन्न प्रक्रियाओं, प्रत्ययों तथा सूचनाओं को व्यवस्थित और सुगम रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
जिस आकृति को श्यामपट्ट पर आसानी से नहीं बनाया जा सकता, उसका चार्ट तैयार करके विद्यार्थियों को जानकारी दी जा सकती है। किसी घटना अथवा प्रक्रिया को क्रमिक रूप में दिखाने के लिए भी चार्ट उपयोगी है।
चार्ट का आकार इतना बड़ा होना चाहिए कि कक्षा के सभी विद्यार्थी उसे आसानी से देख सकें। वह स्पष्ट, शुद्ध और प्रभावपूर्ण होना चाहिए।
चार्ट के प्रमुख प्रकार
1. ट्री चार्ट
इस प्रकार के चार्ट का प्रयोग विभिन्न कारकों अथवा तत्वों के आपसी सम्बन्धों और उनके विकास को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।
2. प्रवाह चार्ट
प्रवाह चार्ट का प्रयोग किसी प्रक्रिया के विकास या क्रम को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। इसमें चतुर्भुज वर्गों और रेखाओं के माध्यम से उद्देश्य या प्रवाह को दिखाया जाता है।
3. तालिका चार्ट
इस प्रकार के चार्ट का प्रयोग शिक्षण में किसी तथ्य के तुलनात्मक अध्ययन के लिए किया जाता है।
चार्ट के प्रभावी प्रयोग हेतु सावधानियाँ
- चार्ट सरल तथा प्रकरण-केन्द्रित होना चाहिए।
- चार्ट प्राकृतिक और कलात्मक रूप से निर्मित होना चाहिए।
- विशेष बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित कराने के लिए बड़े और स्पष्ट अक्षरों तथा रंगों का प्रयोग करना चाहिए।
- चित्रों का आकार उपयुक्त होना चाहिए; वह न बहुत छोटा हो और न अत्यधिक दीर्घाकार।
- चार्ट शुद्ध और सही होना चाहिए।
- चार्ट का प्रदर्शन केवल आवश्यकता के समय करना चाहिए। प्रयोग से पहले या बाद में उसे अनावश्यक रूप से लटकाकर नहीं रखना चाहिए।
मॉडल
जब किसी वस्तु का वास्तविक स्वरूप प्रत्यक्ष वस्तु या चित्र के माध्यम से स्पष्ट करना सम्भव न हो, तब उस वस्तु का प्रतिरूप या मॉडल दिखाकर पाठ्यवस्तु को आकर्षक और रोचक बनाया जाता है।
मॉडल वास्तविक पाठ्यवस्तु के समान होना चाहिए, ताकि विद्यार्थियों के मानस-पटल पर विषय तथा पढ़ाए जाने वाले प्रकरण का वास्तविक चित्र अंकित हो सके। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को वस्तु की आकृति, आकार, प्रकार और आयाम का ज्ञान कराया जाता है।
संस्कृत शिक्षण में महापुरुषों, ऐतिहासिक स्मारकों तथा नीति-श्लोकों से सम्बन्धित मॉडल बनाकर विद्यार्थियों को वास्तविकता के निकट ज्ञान प्रदान किया जा सकता है।
मॉडल बनाने में प्रयुक्त सामग्री
मॉडल बनाने के लिए उपलब्धता और आवश्यकता के अनुसार अनेक सामग्रियों का प्रयोग किया जा सकता है, जैसे—
- थर्मोकोल
- लोहा
- टीन
- लकड़ी
- रुई
- घास-फूस
- पत्तियाँ
- सुतली
- लकड़ी की चम्मच
- पुराने अखबार
- प्लास्टिक
- कागज की लुगदी
- कार्ड बोर्ड
- खड़िया आदि
मॉडल के प्रकार
संस्कृत शिक्षण में मुख्यतः दो प्रकार के मॉडल बनाए जा सकते हैं—
| प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| स्टील मॉडल | ये मॉडल स्थिर होते हैं और इनके द्वारा वस्तु की आकृति के विषय में ज्ञान कराया जाता है। |
| वर्किंग मॉडल | इनके माध्यम से किसी प्रक्रिया की क्रियात्मक क्रियाएँ समझाई जाती हैं। |
मॉडल निर्माण में ध्यान देने योग्य बिन्दु
- मॉडल बनाते समय उसकी स्पष्टता और आकर्षण बनाए रखना आवश्यक है।
- विद्यार्थियों को स्वयं मॉडल बनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए, जिससे उनकी सृजनात्मक शक्ति का विकास हो।
- विद्यार्थियों से सरल, सुन्दर और सहज प्रतिरूप बनवाए जाने चाहिए।
- मॉडल या प्रतिरूप बनाने में अधिक व्यय नहीं होना चाहिए।
- प्रशिक्षु अपनी कल्पनाशक्ति का प्रयोग करके प्रतिरूप में नवीनता और सुन्दरता ला सकते हैं।
- उचित मॉडल के प्रयोग से संस्कृत शिक्षण अधिक रोचक और प्रभावोत्पादक बनाया जा सकता है।
- श्यामपट्ट संस्कृत शिक्षण में अक्षर, शब्दार्थ, सन्धि, समास, शब्दरूप और धातुरूप आदि समझाने का प्रमुख साधन है।
- श्यामपट्ट विद्यार्थियों की लेखन क्षमता बढ़ाता है तथा ज्ञान को स्पष्ट और स्थायी बनाता है।
- चार्ट के प्रमुख प्रकार—ट्री चार्ट, प्रवाह चार्ट और तालिका चार्ट हैं।
- चार्ट सरल, स्पष्ट, शुद्ध, उचित आकार का तथा प्रकरण-केन्द्रित होना चाहिए।
- मॉडल किसी वास्तविक वस्तु का प्रतिरूप होता है, जिससे आकृति, आकार, प्रकार और आयाम का ज्ञान कराया जाता है।
- मॉडल दो प्रकार के होते हैं—स्टील मॉडल और वर्किंग मॉडल।
- मॉडल सरल, आकर्षक, कम खर्चीला और शिक्षण को प्रभावशाली बनाने वाला होना चाहिए।
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चित्र, शब्द/फ्लैश कार्ड एवं पट्टिका
चित्र
संस्कृत भाषा-शिक्षण को सुग्राह्य और रोचक बनाने के लिए शिक्षक रंगीन तथा आकर्षक चित्रों का प्रयोग कर सकता है। चित्रों द्वारा निर्जीव वस्तुओं को भी सजीव रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है और विद्यार्थी प्रत्यक्ष अनुभव के समान सरलता से ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं।
जब शिक्षक मौखिक वर्णन के साथ चित्रों का प्रयोग करता है, तो विषयवस्तु अधिक स्पष्ट, रुचिकर और सार्थक हो जाती है तथा प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी बनता है। चित्र वास्तविक वस्तुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिन वस्तुओं को कक्षा में प्रत्यक्ष रूप से लाना सम्भव नहीं होता, उनसे सम्बन्धित चित्र दिखाकर उनका अर्थ और विवरण समझाया जा सकता है।
संस्कृत शिक्षण में चित्रों का प्रयोग
पशु-पक्षियों, प्राकृतिक दृश्यों तथा अन्य वस्तुओं के संस्कृत नाम चित्रों के माध्यम से सरलता से सिखाए जा सकते हैं। जैसे कोयल या मोर का चित्र दिखाकर शिक्षक उनका संस्कृत नाम बताता है—
- अयं कोकिलः। — यह कोयल है।
- अयम् मयूरः। — यह मोर है।
इसके बाद चित्र के आधार पर उनसे सम्बन्धित विशेषताएँ भी समझाई जा सकती हैं। जैसे कोयल का रंग काला होता है और वह बसन्त में वृक्षों पर कूकती है, जबकि मोर के पंख रंगीन और सुन्दर होते हैं तथा वर्षा के समय वह नृत्य करता है।
चित्रों का महत्व
- संस्कृत शिक्षण में चित्रों का प्रयोग मुख्यतः शब्दार्थ-ज्ञान कराने तथा पाठ की प्रस्तावना करने में किया जाता है।
- चित्रों के माध्यम से पाठ्यवस्तु को सरल और स्पष्ट रूप में समझाया जा सकता है।
- उचित और आवश्यकता के अनुरूप बनाया गया एक चित्र बहुत विस्तृत जानकारी को संक्षिप्त रूप में व्यक्त कर सकता है।
- किसी दृश्य, उद्यान, रेलवे स्टेशन, विद्यार्थियों की वार्ता अथवा प्रातःकालीन दृश्य आदि का चित्र दिखाकर विस्तृत जानकारी दी जा सकती है।
- चित्रों के माध्यम से विद्यार्थियों को कम समय में पाठ्यवस्तु की अधिक जानकारी प्राप्त हो जाती है।
- पशु-पक्षियों और प्राकृतिक दृश्यों को चित्रों द्वारा आसानी से समझाया जा सकता है।
- ऐतिहासिक स्थलों, ऐतिहासिक भवनों, महापुरुषों तथा राम-कृष्ण की बाल-लीलाओं आदि का ज्ञान भी चित्रों द्वारा कराया जा सकता है।
- संस्कृत साहित्य में पढ़ाई जाने वाली कथा-वस्तु को समझाने में चित्रों का प्रयोग विशेष रूप से लाभदायक होता है।
चित्रों का प्रयोग करते समय सावधानियाँ
- चित्र विषयवस्तु से सम्बन्धित होना चाहिए।
- चित्र का आकार विषयवस्तु के अनुरूप होना चाहिए।
- कक्षा में चित्र लगाने की ऐसी व्यवस्था हो कि सभी विद्यार्थी उसे आसानी से देख सकें।
- चित्र स्पष्ट और आकर्षक होना चाहिए।
- चित्र को उसी समय प्रस्तुत करना चाहिए जब विषयवस्तु के अनुसार उसकी आवश्यकता हो।
- उचित वातावरण बनाने के लिए चित्र मनमोहक और रंग-बिरंगा होना चाहिए।
- चित्र में सुरुचिपूर्णता और कलात्मकता दिखाई देनी चाहिए।
- चित्र में शुद्धता तथा प्रभावशीलता स्पष्ट होनी चाहिए।
- चित्र विद्यार्थियों की योग्यता, आयु और मानसिक स्तर के अनुरूप होना चाहिए।
शिक्षण के लिए चित्र फ्री-हैण्ड, ड्राइंग, पेन्टिंग, ट्रेसिंग तथा एपिडायस्कोप आदि के माध्यम से भी बनाए जा सकते हैं।
शब्द कार्ड / फ्लैश कार्ड
विद्यार्थियों की क्षमता और बौद्धिक स्तर के अनुसार शब्दों का ज्ञान कराने के लिए शब्द कार्ड या फ्लैश कार्ड उपयोगी शिक्षण सामग्री है। फ्लैश कार्ड मोटे कागज से बना ऐसा चित्रात्मक कार्ड होता है, जिस पर आवश्यक शब्द अथवा जानकारी लिखी जाती है।
फ्लैश कार्ड का आकार आवश्यकता के अनुसार लगभग 10″ × 12″ अथवा 6″ × 15″ रखा जा सकता है। कार्ड की एक ओर शब्द और दूसरी ओर उसका अर्थ लिखा जा सकता है। संस्कृत में विभिन्न शब्दों वाले ऐसे कार्ड विद्यार्थियों को शब्द-ज्ञान कराने में उपयोगी होते हैं।
फ्लैश कार्ड की कार्यविधि
शिक्षक कार्ड पर लिखा शब्द विद्यार्थी को दिखाता है और उससे उसका अर्थ या उत्तर पूछता है। विद्यार्थी उत्तर देने के बाद कार्ड के पीछे लिखे उत्तर से अपनी प्रतिक्रिया की जाँच कर सकता है।
कार्डों पर अक्षर और शब्द विद्यार्थियों के कक्षा-स्तर के अनुसार छोटे या बड़े लिखे जा सकते हैं। ये कार्ड विद्यार्थियों की स्मृति पर शीघ्र प्रभाव डालते हैं, इसी कारण इन्हें फ्लैश कार्ड कहा जाता है।
शब्द-निर्माण में फ्लैश कार्ड
अलग-अलग अक्षरों या वर्णों वाले कार्डों को उचित क्रम में रखकर पूरा शब्द बनवाया जा सकता है। जैसे—
विद्यालयम् → वि → द्या → ल → य → म्
इस प्रकार विद्यार्थी पूरे शब्द को देखकर उसके विभिन्न अक्षरों या भागों को पहचानना सीखता है और रिक्त स्थानों की पूर्ति भी कर सकता है।
वाक्य-निर्माण में फ्लैश कार्ड
शब्द कार्डों को उचित क्रम में रखकर विद्यार्थियों से सम्पूर्ण संस्कृत वाक्य बनवाए जा सकते हैं। उदाहरण के रूप में अहम्, विद्यालयम् और गच्छामि जैसे शब्दों को उचित क्रम में रखकर वाक्य बनाया जा सकता है—
अहम् विद्यालयम् गच्छामि।
इस प्रकार फ्लैश कार्ड के माध्यम से विद्यार्थियों को वर्तनी सिखाना, शब्दों की पहचान कराना और वाक्य-संरचना का अभ्यास कराना सरल हो जाता है।
शब्द/फ्लैश कार्ड का महत्व
- विद्यार्थियों को संस्कृत शब्दों का ज्ञान कराया जा सकता है।
- शब्दों के अर्थ पहचानने का अभ्यास होता है।
- वर्णों से शब्द बनाना सिखाया जा सकता है।
- शुद्ध वर्तनी का अभ्यास कराया जा सकता है।
- रिक्त स्थानों की पूर्ति कराई जा सकती है।
- सार्थक वाक्य बनाना और वाक्य-संरचना समझाना सरल होता है।
- प्राथमिक स्तर पर संस्कृत-ज्ञान कराने में यह विशेष रूप से उपयोगी है।
- इसका प्रयोग खेल के रूप में भी किया जा सकता है।
पट्टिका
सहायक सामग्री के रूप में पट्टिका का प्रयोग भी महत्वपूर्ण है। पट्टिका सामान्यतः लकड़ी या प्लाईवुड की होती है, जिस पर फ्लैनल लगा रहता है। फ्लैनल एक प्रकार का कपड़ा है, जिसमें ऊन के रेशों के कारण खुरदरापन होता है। इसी कारण उस पर फ्लैनल या उपयुक्त सामग्री के दूसरे टुकड़े आसानी से चिपकाए जा सकते हैं।
पट्टिका का उपयोग
पट्टिका पर आवश्यकता के अनुसार चित्र, पोस्टर, रेखाचित्र, शब्दार्थ, सन्धि, रोचक विषयवस्तु तथा पुनरावृत्ति सामग्री आदि लगाई जा सकती है। इससे शिक्षक संस्कृत की विषयवस्तु को क्रमबद्ध और आकर्षक रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
पट्टिका की सहायता से शब्द-निर्माण का अभ्यास भी कराया जा सकता है। शिक्षक किसी शब्द का कुछ भाग प्रस्तुत करके विद्यार्थियों से उचित अक्षर या वर्ण खोजकर उसे पूरा करने के लिए कह सकता है। इसी प्रकार अलग-अलग वर्णों को जोड़कर नए संस्कृत शब्द भी बनवाए जा सकते हैं।
इस प्रकार के अभ्यास से विद्यार्थियों में शब्द-ज्ञान के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होती है और वे उत्साहपूर्वक संस्कृत पढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं।
पट्टिका का शैक्षिक महत्व
- संस्कृत शिक्षण को सरल और आकर्षक बनाती है।
- चित्र, शब्दार्थ और व्याकरणिक सामग्री को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- शब्द और वर्ण पहचानने का अभ्यास कराया जा सकता है।
- वर्णों को जोड़कर शब्द-निर्माण सिखाया जा सकता है।
- पुनरावृत्ति सामग्री प्रस्तुत करने में उपयोगी है।
- विद्यार्थियों में जिज्ञासा और अध्ययन के प्रति उत्साह उत्पन्न करती है।
पट्टिका का प्रयोग करते समय सावधानियाँ
- पट्टिका पर केवल शिक्षण-बिन्दु से सम्बन्धित तथा आवश्यक सामग्री ही लगानी चाहिए।
- फ्लैनल बोर्ड का प्रदर्शन आवश्यकता पड़ने पर ही करना चाहिए।
- फ्लैनल ठीक अवस्था में होना चाहिए, ताकि शिक्षण-बिन्दु से सम्बन्धित सामग्री उस पर उचित समय पर आसानी से चिपकाई जा सके।
- फ्लैनल को स्वच्छ रखना चाहिए।
- विषय-सामग्री को शिक्षण के क्रम के अनुसार ही पट्टिका पर लगाना चाहिए।
- किसी शिक्षण-बिन्दु को पढ़ाने के बाद उससे सम्बन्धित सामग्री को पट्टिका से हटा देना चाहिए।
- चित्र वास्तविक वस्तुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और संस्कृत शिक्षण को सरल, स्पष्ट तथा रुचिकर बनाते हैं।
- चित्र शब्दार्थ, कथा-वस्तु, पशु-पक्षी, प्राकृतिक दृश्य, ऐतिहासिक स्थल और महापुरुषों आदि का ज्ञान कराने में उपयोगी हैं।
- शब्द या फ्लैश कार्ड से शब्द-ज्ञान, वर्तनी, शब्द-निर्माण और वाक्य-रचना सिखाई जा सकती है।
- फ्लैश कार्ड विद्यार्थियों की स्मृति पर शीघ्र प्रभाव डालते हैं और प्राथमिक स्तर पर विशेष रूप से उपयोगी हैं।
- पट्टिका लकड़ी या प्लाईवुड पर फ्लैनल लगाकर बनाई जाती है और उस पर चित्र, शब्दार्थ, सन्धि तथा पुनरावृत्ति सामग्री प्रस्तुत की जा सकती है।
- पट्टिका के प्रयोग से विद्यार्थियों में शब्द-ज्ञान, जिज्ञासा और संस्कृत पढ़ने के प्रति उत्साह विकसित होता है।