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Home Study Material Semester 1 सामाजिक अध्ययन वैदिक एवं उपनिषद काल
Chapter 3 • सामाजिक अध्ययन

वैदिक एवं उपनिषद काल

UP DELED Semester 1 सामाजिक अध्ययन विषय के इस अध्याय में वैदिक काल, आर्यों की उत्पत्ति, पूर्व एवं उत्तर वैदिक सभ्यता, वैदिक साहित्य, महाजनपद काल, मगध साम्राज्य, सिकन्दर का भारत पर आक्रमण, उपनिषदकाल, जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म के विकास, सिद्धांतों और प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

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Topic 1 वैदिक काल एवं आर्यों की उत्पत्ति

वैदिक काल एवं आर्यों की उत्पत्ति

वैदिक काल का परिचय

सिन्धु सभ्यता के पतन के बाद भारत में एक नवीन संस्कृति का विकास हुआ। इस संस्कृति के विषय में प्रमुख जानकारी वेदों से प्राप्त होती है, इसलिए इस काल को वैदिक काल तथा इसकी संस्कृति को वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति कहा जाता है।

इस संस्कृति के प्रमुख प्रवर्तक आर्य थे, इसलिए इसे आर्य सभ्यता भी कहा जाता है। वैदिक काल लगभग 1500 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व तक माना गया है।

आर्य शब्द का अर्थ

आर्य शब्द किसी एक जाति के अर्थ में ही प्रयुक्त नहीं हुआ है। इसके प्रमुख अर्थ हैं—

  • श्रेष्ठ
  • उदात्त
  • अभिजात्य
  • कुलीन
  • उत्कृष्ट
  • स्वतंत्र

आर्यों की उत्पत्ति एवं मूल निवास का प्रश्न

आर्यों का मूल निवास कहाँ था और वे भारत में किस दिशा से आए, इस विषय में विद्वानों में मतभेद रहा है। इस प्रश्न का कोई एक सर्वमान्य उत्तर स्थापित नहीं हो सका।

भाषा-विज्ञान, वेदों और अवेस्ता का अध्ययन, भौगोलिक परिस्थितियों, प्राचीन वस्तुओं तथा जातीय विशेषताओं के आधार पर विद्वानों ने आर्यों के मूल निवास के सम्बन्ध में विभिन्न सिद्धान्त प्रस्तुत किए।

1. यूरोपीय सिद्धान्त

यूरोपीय सिद्धान्त का प्रतिपादन सन् 1786 ई. में सर विलियम जोन्स ने किया।

उन्होंने संस्कृत भाषा के अनेक शब्दों की समानता प्राचीन यूरोपीय आर्य भाषाओं के शब्दों से बताई। इस भाषायी समानता के आधार पर उन्होंने यह सम्भावना व्यक्त की कि आर्यों का मूल निवास यूरोप में रहा होगा।

2. मध्य एशिया का सिद्धान्त

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन प्रसिद्ध जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने किया। उन्होंने वेदों तथा अवेस्ता को अपने मत का महत्वपूर्ण आधार बनाया।

इन ग्रन्थों के अध्ययन से यह विचार प्रस्तुत किया गया कि भारतीय और ईरानी आर्य किसी समय साथ-साथ रहते थे। इसलिए भारत और ईरान के निकट का कोई क्षेत्र उनके प्रारम्भिक निवास का स्थान रहा होगा।

इसके बाद आर्यों की अलग-अलग शाखाएँ ईरान, भारत और यूरोप की ओर गईं।

वेदों एवं अवेस्ता में गाय, पशुपालन और कृषि से सम्बन्धित अनेक समान शब्द पाए जाते हैं। इन आधारों पर मध्य एशिया को आर्यों का मूल निवास स्थान माना गया। इस सिद्धान्त को अधिकांश विद्वानों ने स्वीकार किया।

3. आर्कटिक प्रदेश का सिद्धान्त

आर्कटिक अथवा उत्तरी ध्रुव प्रदेश को आर्यों का मूल निवास मानने वाले प्रमुख विद्वान राष्ट्रवादी नेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक थे।

तिलक ने अपने मत के समर्थन में ऋग्वेद तथा अवेस्ता में प्राप्त विवरणों को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया।

उनके अनुसार आर्यों का प्रारम्भिक निवास उत्तरी ध्रुव अथवा आर्कटिक प्रदेश में था।

4. भारतीय सिद्धान्त

भारतीय सिद्धान्त के समर्थकों में डॉ. सम्पूर्णानन्द तथा श्री अविनाश चन्द्र दास प्रमुख थे।

इन विद्वानों के अनुसार सप्त-सैन्धव प्रदेश आर्यों का मूल निवास स्थान था। सप्त-सैन्धव प्रदेश में सिन्धु नदी की पाँच सहायक नदियों तथा सरस्वती नदी से सम्बन्धित क्षेत्र को सम्मिलित किया गया है।

इस मत के समर्थन में यह तर्क दिया गया कि ऋग्वेद में जिन पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, वनस्पतियों तथा जलवायु का वर्णन मिलता है, वे उस क्षेत्र से सम्बन्धित थे।

इसी आधार पर कुछ भारतीय विद्वानों ने आर्यों का मूल निवास भारत को माना।

5. तिब्बत प्रदेश का सिद्धान्त

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने तिब्बत को आर्यों का मूल देश माना।

उनका मत ऋग्वेद में वर्णित भौगोलिक परिस्थितियों तथा तिब्बत की भौगोलिक परिस्थितियों में पाई जाने वाली समानताओं पर आधारित था।

आर्यों के मूल निवास सम्बन्धी सिद्धान्तों का संक्षिप्त तुलनात्मक रूप

सिद्धान्त प्रमुख समर्थक मूल निवास मुख्य आधार
यूरोपीय सिद्धान्त सर विलियम जोन्स यूरोप संस्कृत और यूरोपीय भाषाओं में समानता
मध्य एशिया सिद्धान्त मैक्समूलर मध्य एशिया वेद, अवेस्ता एवं समान शब्दावली
आर्कटिक सिद्धान्त बाल गंगाधर तिलक उत्तरी ध्रुव प्रदेश ऋग्वेद एवं अवेस्ता
भारतीय सिद्धान्त सम्पूर्णानन्द एवं अविनाश चन्द्र दास सप्त-सैन्धव प्रदेश ऋग्वैदिक भौगोलिक एवं प्राकृतिक विवरण
तिब्बत सिद्धान्त स्वामी दयानन्द सरस्वती तिब्बत भौगोलिक परिस्थितियों की समानता
आर्यों के मूल निवास स्थान के प्रमुख सिद्धान्त
आर्यों के मूल निवास स्थान से सम्बन्धित पाँच प्रमुख सिद्धान्त और उनके समर्थक

वैदिक सभ्यता का विभाजन

वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति के अध्ययन को सरल बनाने के लिए इसे मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है—

  1. ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक कालीन सभ्यता
  2. उत्तर वैदिक कालीन सभ्यता
ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक काल

जिस काल में ऋग्वेद की रचना हुई, उसे ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक काल कहा गया।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस काल में आर्य शब्द का प्रयोग ताँबा धातु के लिए भी किया गया।

उत्तर वैदिक काल

ऋग्वेद के अतिरिक्त अन्य तीन वेद—यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—तथा ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद आदि ग्रन्थों की रचना जिस व्यापक काल में हुई, उसे उत्तर वैदिक काल के रूप में जाना जाता है।

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

वैदिक काल भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण काल था जिसकी जानकारी मुख्य रूप से वेदों से प्राप्त होती है। आर्यों के मूल निवास के विषय में विद्वानों ने यूरोप, मध्य एशिया, आर्कटिक प्रदेश, भारत और तिब्बत से सम्बन्धित विभिन्न सिद्धान्त प्रस्तुत किए, परन्तु इस विषय में पूर्ण एकमतता नहीं है। अध्ययन की सुविधा के लिए वैदिक सभ्यता को ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक तथा उत्तर वैदिक काल में विभाजित किया जाता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वैदिक काल लगभग 1500 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व तक माना गया है।
  • वैदिक संस्कृति की प्रमुख जानकारी वेदों से प्राप्त होती है।
  • आर्य शब्द के अर्थ श्रेष्ठ, उदात्त, कुलीन, उत्कृष्ट और स्वतंत्र आदि हैं।
  • आर्यों के मूल निवास के विषय में विद्वानों में मतभेद है।
  • सर विलियम जोन्स ने 1786 ई. में यूरोपीय सिद्धान्त प्रस्तुत किया।
  • मैक्समूलर ने मध्य एशिया को आर्यों का मूल निवास माना और वेद तथा अवेस्ता को प्रमुख आधार बनाया।
  • बाल गंगाधर तिलक ने आर्कटिक अथवा उत्तरी ध्रुव प्रदेश का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।
  • सम्पूर्णानन्द एवं अविनाश चन्द्र दास ने सप्त-सैन्धव प्रदेश को आर्यों का मूल निवास माना।
  • स्वामी दयानन्द सरस्वती ने तिब्बत को आर्यों का मूल देश माना।
  • वैदिक सभ्यता को ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक और उत्तर वैदिक काल में विभाजित किया जाता है।
  • ऋग्वेद की रचना वाला काल ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक काल कहलाता है।
  • यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद आदि उत्तर वैदिक साहित्य के प्रमुख भाग हैं।

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Topic 2 पूर्व वैदिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन

पूर्व वैदिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन

पूर्व वैदिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन

पूर्व वैदिक काल में आर्यों ने धीरे-धीरे भ्रमणकारी जीवन का त्याग कर स्थायी एवं संगठित सामाजिक जीवन विकसित कर लिया था। उनके जीवन में स्थायित्व आने के साथ परिवार और समाज का व्यवस्थित संगठन भी विकसित हुआ।

1. परिवार

पूर्व वैदिक समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई परिवार था। परिवार पितृसत्तात्मक होता था और संयुक्त परिवार की व्यवस्था प्रचलित थी।

एक ही घर में कई पीढ़ियों के सदस्य साथ रहते थे। परिवार का सबसे वृद्ध पुरुष उसका मुखिया माना जाता था।

अनेक परिवारों के समूह को विश तथा अनेक कबीलों को जन कहा जाता था।

2. विवाह व्यवस्था

पूर्व वैदिक काल में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना जाता था। सामान्यतः कन्या अपने पिता की आज्ञा के अनुसार विवाह करती थी, परन्तु उसे अपने पति को चुनने की स्वतंत्रता भी प्राप्त थी।

सामान्य वर्ग में प्रायः एक-पत्नी प्रथा प्रचलित थी, जबकि उच्च एवं धनी वर्गों में बहुपत्नी प्रथा भी पाई जाती थी।

इस काल में बाल-विवाह का उल्लेख नहीं मिलता।

विवाह से सम्बन्धित दो प्रमुख संस्कार थे—

  • पाणिग्रहण
  • अग्नि परिक्रमा

3. स्त्रियों की स्थिति

यद्यपि पूर्व वैदिक समाज पितृसत्तात्मक था, फिर भी स्त्रियों को समाज में सम्माननीय स्थान प्राप्त था।

स्त्रियों की शिक्षा की उचित व्यवस्था थी। घोषा और अपाला इस काल की प्रमुख विदुषी महिलाओं में गिनी जाती थीं।

विधवा महिलाओं को भी समाज में उच्च स्थान प्राप्त था।

पत्नी धार्मिक आयोजनों और अनुष्ठानों में पति के साथ भाग लेती थी। पत्नी की उपस्थिति के बिना धार्मिक अनुष्ठान को पूर्ण नहीं माना जाता था।

इस काल में स्त्रियों में पर्दा प्रथा प्रचलित नहीं थी।

4. वर्ण व्यवस्था

वैदिक काल के प्रारम्भ में समाज में तीन वर्णों का उल्लेख मिलता है, जबकि उत्तर वैदिक काल तक आते-आते चार वर्णों का स्पष्ट उल्लेख मिलने लगता है।

चार वर्णों की उत्पत्ति को आदिपुरुष के विभिन्न अंगों से जोड़ा गया—

वर्ण उत्पत्ति
ब्राह्मण आदिपुरुष के मुख से
क्षत्रिय आदिपुरुष की भुजाओं से
वैश्य आदिपुरुष की जंघाओं से
शूद्र आदिपुरुष के चरणों से

5. आहार

पूर्व वैदिक काल के आर्य शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे।

शाकाहारी भोजन में गेहूँ और जौ आदि की रोटियाँ प्रमुख थीं। दूध, घी और मक्खन का भी बहुत अधिक प्रयोग किया जाता था।

विभिन्न प्रकार के फल और सब्जियाँ भी उनके भोजन में सम्मिलित थीं।

मांसाहारी भोजन में मुख्यतः भेड़ और बकरी का मांस खाया जाता था।

सोमरस उनका प्रिय पेय था, जिसका उपयोग विशेष रूप से धार्मिक अवसरों पर किया जाता था।

6. वेशभूषा एवं आभूषण

पूर्व वैदिक काल में सामान्यतः तीन प्रकार के वस्त्र धारण किए जाते थे—

वस्त्र प्रयोग
नीवी कमर के निचले भाग में पहना जाने वाला वस्त्र
वास चादर की भाँति शरीर पर ओढ़ा जाने वाला वस्त्र
अधिवास ऊपर से ढकने वाला वस्त्र

उत्तरीय वस्त्र स्त्री और पुरुष दोनों धारण करते थे। सिर पर पगड़ी बाँधने की परम्परा भी थी।

वस्त्रों का निर्माण सूत, ऊन और चमड़े से किया जाता था। स्त्रियाँ धोती और अंगरखा पहनती थीं।

रंगीन तथा कढ़ाईदार वस्त्रों का प्रयोग भी किया जाता था।

प्रमुख आभूषण

आर्य स्त्री-पुरुष आभूषणों का प्रयोग करते थे। प्रमुख आभूषणों में—

  • सोने के कर्णफूल
  • दस्तबन्द
  • हार
  • पायल
  • मणियों से बने आभूषण

विशेष रूप से उल्लेखनीय थे।

7. मनोरंजन

पूर्व वैदिक काल में मनोरंजन के अनेक साधन प्रचलित थे। इनमें प्रमुख थे—

  • रथ-दौड़
  • घुड़दौड़
  • नृत्य
  • संगीत
  • शिकार

उत्सवों के अवसर पर स्त्री और पुरुष दोनों नृत्य एवं संगीत में भाग लेते थे।

मनोरंजन के लिए अनेक वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता था, जिनमें वीणा, मंजीरा, बाँसुरी, ढोल और शंख प्रमुख थे।

8. शिक्षा

पूर्व वैदिक काल में स्त्री और पुरुष दोनों के लिए शिक्षा की व्यवस्था थी।

शिक्षण का प्रमुख केन्द्र गुरुकुल था। शिक्षा मुख्यतः मौखिक रूप से दी जाती थी और स्मरण शक्ति पर विशेष बल दिया जाता था।

शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं था, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास और चरित्र निर्माण करना भी था।

पूर्व वैदिक काल का सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन
पूर्व वैदिक समाज में परिवार, वेशभूषा, शिक्षा, आहार और मनोरंजन के प्रमुख स्वरूप

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

पूर्व वैदिक समाज का आधार पितृसत्तात्मक संयुक्त परिवार था। विवाह को पवित्र संस्कार माना जाता था और स्त्रियों को शिक्षा तथा धार्मिक कार्यों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। आर्यों का भोजन विविध था, वस्त्र सरल किन्तु रंगीन और अलंकृत होते थे तथा नृत्य, संगीत, रथ-दौड़ और शिकार मनोरंजन के प्रमुख साधन थे। गुरुकुल शिक्षा का मुख्य केन्द्र था और शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व विकास तथा चरित्र निर्माण करना था।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पूर्व वैदिक समाज का मुख्य आधार पितृसत्तात्मक संयुक्त परिवार था।
  • परिवार का सबसे वृद्ध पुरुष परिवार का मुखिया होता था।
  • अनेक परिवारों के समूह को विश तथा कबीलों को जन कहा जाता था।
  • विवाह को पवित्र संस्कार माना जाता था और पाणिग्रहण तथा अग्नि परिक्रमा इसके प्रमुख संस्कार थे।
  • सामान्य वर्ग में एक-पत्नी तथा उच्च एवं धनी वर्ग में बहुपत्नी प्रथा का उल्लेख मिलता है।
  • बाल-विवाह का उल्लेख नहीं मिलता।
  • स्त्रियों को सम्मान तथा शिक्षा के अवसर प्राप्त थे; घोषा और अपाला प्रमुख विदुषी थीं।
  • पत्नी की उपस्थिति के बिना धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जाता था और पर्दा प्रथा नहीं थी।
  • चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र थे।
  • गेहूँ, जौ, दूध, घी, मक्खन, फल-सब्जियाँ तथा भेड़-बकरी का मांस भोजन में प्रयुक्त होता था।
  • सोमरस धार्मिक अवसरों पर प्रयुक्त प्रिय पेय था।
  • नीवी, वास और अधिवास तीन प्रमुख प्रकार के वस्त्र थे।
  • रथ-दौड़, घुड़दौड़, नृत्य, संगीत और शिकार मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।
  • वीणा, मंजीरा, बाँसुरी, ढोल और शंख प्रमुख वाद्ययंत्र थे।
  • शिक्षा गुरुकुलों में मौखिक रूप से दी जाती थी और चरित्र निर्माण पर विशेष बल था।
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Topic 3 पूर्व वैदिक राजनीतिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन

पूर्व वैदिक राजनीतिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन

पूर्व वैदिक राजनीतिक जीवन

पूर्व वैदिक काल में राजतंत्रीय व्यवस्था का विकास हो चुका था, लेकिन शासन व्यवस्था अभी पूरी तरह केंद्रीकृत नहीं थी। आर्यों का राजनीतिक संगठन परिवार से प्रारम्भ होकर ग्राम, विश, जन और राष्ट्र तक विकसित हुआ था।

1. आर्यों के कबीले

डॉ. जैकोबी के अनुसार आर्य भारत में अलग-अलग समय पर आए और उनकी अनेक शाखाएँ यहाँ बस गईं। इनमें भरत कबीला अत्यन्त महत्वपूर्ण था।

ऋग्वेद में पाँच प्रमुख कबीलों का उल्लेख मिलता है—

  • पुरु
  • यदु
  • तुर्वश
  • अनु
  • द्रुह्यु

इन पाँचों को सामूहिक रूप से पंचजन कहा जाता था। यदु और तुर्वश को दास भी कहा गया है।

सरस्वती, दृषद्वती और आपया नदियों के किनारे रहने वाले भरत कबीले में अग्नि की पूजा का उल्लेख मिलता है।

2. आर्यों का भौगोलिक क्षेत्र

भारत में आर्यों का आगमन लगभग 1500 ईसा पूर्व से कुछ पहले माना गया है। प्रारम्भ में उन्होंने सप्त-सैन्धव प्रदेश में निवास किया।

सप्त-सैन्धव का नाम सात नदियों के आधार पर पड़ा था। इन नदियों में प्रमुख थीं—

  • सिन्धु
  • वितस्ता — झेलम
  • असिक्नी — चिनाब
  • परुष्णी — रावी
  • शतुद्री — सतलज
  • विपासा — व्यास
  • सरस्वती

इस क्षेत्र का विस्तार कश्मीर, पाकिस्तान और पंजाब के अधिकांश भागों तक था।

ऋग्वेद में अफगानिस्तान की कुछ नदियों का भी उल्लेख मिलता है—कुभा अर्थात काबुल नदी, क्रुमु अर्थात कुर्रम, गोमती अर्थात गोमल और सुवास्तु अर्थात स्वात।

हिमालय पर्वत को हिमवन्त कहा गया है। हिमालय की एक चोटी मूजवन्त का भी उल्लेख मिलता है, जो सोम के लिए प्रसिद्ध थी।

3. राजनीतिक एवं प्रशासनिक संगठन

पूर्व वैदिक समाज की सबसे छोटी राजनीतिक इकाई कुल या परिवार थी। विभिन्न इकाइयों का क्रम इस प्रकार था—

इकाई स्वरूप / अधिकारी
कुल / परिवार सबसे छोटी इकाई; मुखिया को कुलप कहा जाता था
ग्राम कई परिवारों से निर्मित; प्रधान ग्रामणी था
विश कई ग्रामों से निर्मित; प्रमुख विशपति था
जन कई विशों से निर्मित; सर्वोच्च अधिकारी राजन था
राष्ट्र देश अथवा राज्य

इस प्रकार राजनीतिक संगठन का क्रम था—

परिवार / कुल → ग्राम → विश → जन → राष्ट्र

4. पूर्व वैदिक शासन व्यवस्था

पूर्व वैदिक शासन व्यवस्था में राजा, पुरोहित, सेनानी तथा सभा-समिति का महत्वपूर्ण स्थान था।

राजा

राजा अथवा राजन राज्य या राष्ट्र का सर्वोच्च अधिकारी था। सामान्यतः राजपद वंशानुगत होता था और राजा का ज्येष्ठ पुत्र उसका उत्तराधिकारी बनता था। यदि ज्येष्ठ पुत्र योग्य न हो तो किसी अन्य योग्य राजपुत्र को राजा बनाया जा सकता था।

राजा का प्रमुख कर्तव्य प्रजा का पालन और राज्य की रक्षा करना था। आदर्श राजा को इन्द्र के समान वीर, सूर्य के समान तेजस्वी और वरुण के समान दानी माना गया।

राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि भी माना जाता था।

पुरोहित

पुरोहित राजा का प्रमुख सहयोगी था। वह शिक्षक, दार्शनिक, पथ-प्रदर्शक और मित्र के रूप में कार्य करता था।

युद्ध के समय वह राजा के साथ जाता था और धार्मिक कार्यों के साथ-साथ राजनीतिक मामलों में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

सेनानी

सेनानी सेना का सर्वोच्च अधिकारी था और उसकी नियुक्ति राजा द्वारा की जाती थी।

उसका मुख्य कार्य राज्य को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखना तथा आवश्यकता पड़ने पर दूसरे राज्यों के विरुद्ध युद्ध का नेतृत्व करना था।

5. सभा एवं समिति

राजा के अधिकारों पर नियंत्रण रखने के लिए सभा और समिति नामक दो महत्वपूर्ण संस्थाएँ थीं।

सभा

सभा अपेक्षाकृत छोटी संस्था थी। इसमें राजा के निकट सम्बन्धी तथा उच्च वर्ग के व्यक्ति सम्मिलित होते थे। इसमें उच्च स्तर के राजनीतिक विषयों पर विचार-विमर्श किया जाता था।

समिति

समिति अपेक्षाकृत बड़ी संस्था थी और इसके सदस्य सामान्य जनता से होते थे।

समिति युद्ध और सन्धि, आय और व्यय जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय करती थी तथा राजा के निर्वाचन में भी भाग लेती थी।

6. राज्य की आय के स्रोत

राज्य की आय के प्रमुख स्रोत भूमि-कर और व्यापार-कर थे।

प्रजा से लिए जाने वाले कर को बलि कहा जाता था। कर राज्य की आय का लगभग सोलहवाँ भाग था।

कर अनाज और पशुओं के रूप में भी लिया जाता था। कर एकत्र करने वाले अधिकारी को भागदुघ कहा जाता था।

7. न्याय व्यवस्था

पूर्व वैदिक न्याय व्यवस्था धर्म पर आधारित थी। राजा पुरोहित की सहायता से न्याय करता था।

चोरी, डकैती और राहजनी जैसे अपराधों का उल्लेख मिलता है। पशुओं, विशेषकर गायों की चोरी एक महत्वपूर्ण अपराध था। अनेक युद्ध भी गायों को लेकर होते थे। ऋग्वेद में युद्ध के लिए गविष्टि अर्थात गाय की खोज से सम्बन्धित शब्द का प्रयोग मिलता है।

इस समय मृत्युदण्ड की प्रथा नहीं थी। अपराधियों को शारीरिक दण्ड और जुर्माना दिया जाता था।

बदला चुकाने अथवा क्षतिपूर्ति की व्यवस्था को वेरदेय कहा जाता था। ऐसे व्यक्ति को शतदाय कहा गया जिसकी जान का मूल्य 100 गाय माना जाता था।

हत्या के लिए दण्ड धन अथवा वस्तुओं के रूप में दिया जा सकता था।

ऋण न चुकाने पर ऋणी को ऋणदाता का दास बनाया जा सकता था।

न्याय सम्बन्धी अधिकार राजा द्वारा अध्यक्ष नामक अधिकारी को दिए जाते थे। गाँव के न्याय सम्बन्धी कार्य ग्राम्य जीवन नामक अधिकारी करता था तथा छोटे विवाद ग्राम पंचायतों द्वारा निपटाए जाते थे।

पूर्व वैदिक आर्थिक जीवन

1. पशुपालन

पूर्व वैदिक आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन था।

गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊँट, हाथी, घोड़ा, बैल, कुत्ता, गधा और सुअर आदि पशु पाले जाते थे।

गाय को विशेष महत्व प्राप्त था। पशुओं की वृद्धि और सुरक्षा के लिए देवताओं से प्रार्थना की जाती थी। वास्तव में उस समय पशुओं को ही धन-सम्पत्ति का प्रमुख रूप माना जाता था।

2. कृषि

पशुपालन के बाद कृषि आर्यों का दूसरा प्रमुख व्यवसाय था।

गेहूँ, जौ, चावल, चना, धान, उड़द, गन्ना, मूंग और तिल के साथ फल एवं सब्जियाँ भी पैदा की जाती थीं।

सिंचाई के लिए वर्षा, कुओं और नहरों के जल का प्रयोग किया जाता था।

कृषि में लोहे एवं लकड़ी के औजारों का प्रयोग किया जाता था तथा बैलों की सहायता से छोटे और बड़े हल चलाए जाते थे।

कृषि से वर्ष में दो फसलें प्राप्त किए जाने का उल्लेख मिलता है।

3. शिकार

आर्य जीवन-निर्वाह तथा पशुओं की रक्षा के लिए शिकार भी करते थे। शिकार के लिए धनुष-बाण का प्रयोग किया जाता था।

4. उद्योग एवं व्यवसाय

आर्यों का प्रमुख उद्योग कपड़ा बुनना था और स्त्रियाँ बुनाई के कार्य में भाग लेती थीं।

इसके अतिरिक्त समाज में अनेक प्रकार के व्यवसाय प्रचलित थे, जैसे—

  • स्वर्णकार
  • शिकारी
  • मछुआरे
  • धोबी
  • नाई
  • जुलाहे
  • बढ़ई
  • कसाई
  • चटाई बनाने वाले
  • टोकरी बनाने वाले
  • कुम्हार
  • नट एवं गायक

5. व्यापार

पूर्व वैदिक काल में आन्तरिक और विदेशी दोनों प्रकार का व्यापार किया जाता था।

व्यापारियों को पणि कहा जाता था। विदेशी व्यापार मुख्यतः समुद्री मार्ग से तथा आन्तरिक व्यापार स्थल मार्ग से किया जाता था।

व्यापार का प्रमुख आधार वस्तु-विनिमय था, परन्तु निष्क, कृष्णल और शतमान जैसी स्वर्ण मुद्राओं के प्रयोग का भी उल्लेख मिलता है।

ब्याज पर ऋण देना भी व्यापारिक गतिविधियों का एक रूप था।

पूर्व वैदिक धार्मिक जीवन

पूर्व वैदिक आर्यों का धार्मिक जीवन प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ था। प्राकृतिक शक्तियों को मानवीय रूप प्रदान करके उनकी देवताओं के रूप में पूजा की जाती थी।

धार्मिक जीवन के तीन प्रमुख आधार थे—

  1. यज्ञ
  2. तप
  3. देवता

1. यज्ञ

यज्ञ पूर्व वैदिक धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण भाग था। यज्ञ में राजा और प्रजा दोनों भाग लेते थे तथा अलग-अलग प्रकार के पुरोहित धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न कराते थे।

यज्ञों में पशु-बलि की प्रथा का भी उल्लेख मिलता है।

2. तप

इस काल में तप का महत्व भी बढ़ने लगा था। एक मुद्रा में खड़े रहना, कम भोजन ग्रहण करना, गर्मी में धूप और सर्दी में ठंड सहना जैसी क्रियाएँ तप के रूप में की जाती थीं।

3. देवताओं का वर्गीकरण

पूर्व वैदिक आर्य प्राकृतिक शक्तियों को देवताओं के रूप में पूजते थे। इन देवताओं को तीन वर्गों में बाँटा गया—

वर्ग प्रमुख देवता
आकाश के देवता वरुण, सूर्य, सावित्री, अदिति, उषा
अन्तरिक्ष के देवता इन्द्र, रुद्र, मरुत, वायु, वात
पृथ्वी के देवता पृथ्वी, अग्नि, सोम

ऋग्वैदिक ऋषि जिस समय जिस देवता की स्तुति करते थे, उसी देवता को उस समय सर्वोच्च गुणों से युक्त मानते थे। मैक्समूलर ने इस प्रवृत्ति को हीनाथिज्म कहा।

इन्द्र

सूक्तों की संख्या के आधार पर इन्द्र ऋग्वेद के सर्वाधिक प्रमुख देवता माने जाते हैं। ऋग्वेद के लगभग 250 सूक्तों में उनका उल्लेख मिलता है।

इन्द्र को वर्षा का देवता माना गया। उन्होंने वृत्र राक्षस का वध किया, इसलिए उन्हें वृत्रहन्ता कहा गया।

अनेक दुर्गों को नष्ट करने के कारण उन्हें पुरन्दर भी कहा जाता था।

इन्द्र के पिता द्यौस, अग्नि उनके यमज भाई और मरुत उनके सहयोगी माने गए हैं। वृत्र के वध में विष्णु द्वारा इन्द्र की सहायता किए जाने का भी उल्लेख मिलता है।

इन्द्र का प्रिय आयुध वज्र था। वे रथ पर चलते थे और सोमपान से भी उनका सम्बन्ध बताया गया है। उन्हें तूफान और मेघ से सम्बन्धित शक्तिशाली देवता भी माना गया।

इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी अथवा शची थीं।

अग्नि

इन्द्र के बाद अग्नि पूर्व वैदिक काल के दूसरे महत्वपूर्ण देवता थे। उनका प्रमुख कार्य मनुष्य और देवताओं के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाना था।

अग्नि के माध्यम से देवताओं को आहुतियाँ दी जाती थीं।

ऋग्वेद के लगभग 200 सूक्तों में अग्नि का वर्णन मिलता है। अग्नि को पुरोहितों का देवता भी माना गया।

पूर्व वैदिक राजनीतिक आर्थिक एवं धार्मिक जीवन
पूर्व वैदिक काल की प्रशासनिक इकाइयाँ, प्रमुख आर्थिक गतिविधियाँ और देवताओं का वर्गीकरण

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

पूर्व वैदिक समाज की राजनीतिक व्यवस्था परिवार से राष्ट्र तक संगठित थी और राजा के साथ पुरोहित, सेनानी, सभा तथा समिति शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। आर्थिक जीवन का मुख्य आधार पशुपालन और कृषि था, जबकि उद्योग तथा देशी-विदेशी व्यापार भी विकसित थे। धार्मिक जीवन प्रकृति पूजा, यज्ञ और तप पर आधारित था। इन्द्र तथा अग्नि इस काल के सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवताओं में थे।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पूर्व वैदिक राजनीतिक संगठन का क्रम कुल → ग्राम → विश → जन → राष्ट्र था।
  • पुरु, यदु, तुर्वश, अनु और द्रुह्यु पाँच प्रमुख कबीले थे, जिन्हें पंचजन कहा जाता था।
  • आर्यों का प्रारम्भिक निवास सप्त-सैन्धव प्रदेश में था।
  • ग्राम का प्रधान ग्रामणी, विश का प्रधान विशपति तथा जन का सर्वोच्च अधिकारी राजन था।
  • राजा राज्य का सर्वोच्च अधिकारी था और पुरोहित तथा सेनानी उसके प्रमुख सहयोगी थे।
  • सभा छोटी तथा समिति बड़ी राजनीतिक संस्था थी; समिति राजा के निर्वाचन में भी भाग लेती थी।
  • भूमि और व्यापार कर राज्य की आय के प्रमुख स्रोत थे तथा कर को बलि कहा जाता था।
  • कर एकत्र करने वाले अधिकारी को भागदुघ कहा जाता था।
  • पूर्व वैदिक न्याय व्यवस्था धर्म पर आधारित थी और मृत्युदण्ड की प्रथा नहीं थी।
  • पशुपालन आर्यों का मुख्य तथा कृषि दूसरा प्रमुख व्यवसाय था।
  • गाय को धन एवं प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण आधार माना जाता था।
  • कपड़ा बुनना प्रमुख उद्योग था तथा अनेक प्रकार के शिल्प और व्यवसाय प्रचलित थे।
  • आन्तरिक और विदेशी दोनों प्रकार का व्यापार होता था; व्यापारियों को पणि कहा जाता था।
  • यज्ञ, तप और देवता पूर्व वैदिक धार्मिक जीवन के प्रमुख आधार थे।
  • देवताओं को आकाश, अन्तरिक्ष और पृथ्वी के तीन वर्गों में बाँटा गया था।
  • इन्द्र ऋग्वेद के सर्वाधिक प्रमुख देवता थे; लगभग 250 सूक्त उनसे सम्बन्धित हैं।
  • वृत्र का वध करने के कारण इन्द्र को वृत्रहन्ता और दुर्गों का नाश करने के कारण पुरन्दर कहा गया।
  • अग्नि मनुष्य और देवताओं के बीच मध्यस्थ माने गए तथा लगभग 200 सूक्तों में उनका वर्णन मिलता है।
Topic 4 उत्तर वैदिक राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन

उत्तर वैदिक राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन

उत्तर वैदिक काल का परिचय

लगभग 1000 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व तक के काल को उत्तर वैदिक काल माना गया है। यह आर्य सभ्यता के विस्तार और विकास का महत्वपूर्ण काल था। इस समय सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन में अनेक परिवर्तन हुए।

इस काल की प्रमुख पुरातात्विक विशेषता चित्रित धूसर मृद्भाण्ड थी। लोग मिट्टी के चित्रित और भूरे रंग के कटोरों तथा थालियों का प्रयोग करते थे। लोहे के हथियारों का प्रयोग भी होने लगा था।

उत्तर वैदिक कालीन राजनीतिक दशा

1. कुल और कबीलों से जनपदों का विकास

उत्तर वैदिक काल में छोटे-छोटे कबीले परस्पर मिलकर बड़े क्षेत्रीय जनपदों का निर्माण करने लगे।

उदाहरण के लिए—

  • पुरु और भरत के मिलन से कुरु जनपद का विकास हुआ।
  • तुर्वश और क्रिवि के मिलन से पांचाल जनपद का विकास हुआ।

उत्तर वैदिक काल में कुरु और पांचाल प्रमुख शक्तियाँ बन गए। इनका प्रभाव दिल्ली, दोआब के मध्य तथा ऊपरी भागों तक फैला था।

पांचाल इस काल का अत्यन्त विकसित राज्य था। शतपथ ब्राह्मण में इसे वैदिक सभ्यता का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि बताया गया है।

ऐतरेय ब्राह्मण में कुरु राज्य का विस्तृत वर्णन मिलता है। परीक्षित और जनमेजय इसके प्रमुख राजा थे। परीक्षित को मर्त्यलोक का देवता कहा गया है। कुरु कुल का इतिहास महाभारत युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है।

2. राज्य के स्वरूप में परिवर्तन

उत्तर वैदिक काल में साम्राज्यवाद की भावना विकसित होने लगी। पुराने जनराज्यों के स्थान पर बड़े प्रादेशिक राज्यों की स्थापना हुई।

इस काल के प्रमुख राज्यों में—

  • पांचाल
  • कुरु
  • मगध
  • कलिंग
  • अवन्ति
  • विदेह

आदि का उल्लेख मिलता है।

राजा अपनी शक्ति और प्रतिष्ठा प्रदर्शित करने के लिए अश्वमेध, राजसूय और वाजपेय जैसे यज्ञ कराते थे।

3. राजा एवं उसके अधिकार

उत्तर वैदिक काल में शासन व्यवस्था का मुख्य आधार राजतंत्र था, यद्यपि कुछ स्थानों पर गणराज्यों के उदाहरण भी मिलते हैं।

राजा की उत्पत्ति के सिद्धान्त का प्रथम उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है।

ऋग्वैदिक काल की तुलना में राजा की शक्ति और अधिकारों में वृद्धि हुई तथा वह अनेक बड़ी उपाधियाँ धारण करने लगा।

क्षेत्र राजकीय उपाधि
पूर्व सम्राट
पश्चिम स्वराट
दक्षिण भोज
मध्य देश राजा

राजाओं के लिए अधिराज, राजाधिराज, सम्राट और एकराट जैसी उपाधियों का भी प्रयोग होने लगा।

प्रदेश या राज्य के अर्थ में राष्ट्र शब्द का प्रयोग उत्तर वैदिक काल में अधिक स्पष्ट रूप से मिलता है।

आरम्भ में राजा का निर्वाचन किए जाने के प्रमाण मिलते हैं, परन्तु धीरे-धीरे राजपद वंशानुगत होता गया।

शतपथ ब्राह्मण में राजा के निर्वाचन का उल्लेख मिलता है और राजा को विशपति भी कहा गया। अत्याचारी राजा को जनता पदच्युत कर सकती थी।

अथर्ववेद में राजा को विशमत्ता — जनता का भक्षक कहा गया है। ऐतरेय ब्राह्मण और शतपथ ब्राह्मण में शक्तिशाली राजाओं की स्तुति भी मिलती है।

4. राज्य के प्रमुख पदाधिकारी

राज्य के विस्तार के साथ प्रशासन भी अधिक संगठित हुआ। राजा ने शासन संचालन के लिए अनेक नए पदों की व्यवस्था की।

इन अधिकारियों को रत्निन, रत्नि अथवा वीर कहा जाता था।

पदाधिकारी कार्य
संग्रहीत कोषाध्यक्ष
अक्षवाप लेखपाल तथा द्यूत से सम्बन्धित राजा का सहयोगी
भागदुघ कर एकत्र करने वाला
सूत राजा का सारथी
क्षत्री राजपरिवार का निरीक्षक
पालागल सन्देशवाहक / विदूषक
तक्षण बढ़ई
रथकार रथ निर्माता
विकर्तन राजा के साथ शतरंज खेलने वाला
गोविकर्तन वन निरीक्षक
अथापति मुख्य न्यायाधीश

5. सभा तथा समिति

वैदिक काल में राजा के अधिकारों पर अंकुश लगाने के लिए सभा और समिति महत्वपूर्ण संस्थाएँ थीं, लेकिन उत्तर वैदिक काल में इनका महत्व कुछ कम हो गया।

सभा

सभा छोटी संस्था थी। इसमें राजा के निकट सम्बन्धी तथा उच्च वर्ग के व्यक्ति सम्मिलित होते थे। उच्च स्तर के राजनीतिक विषयों पर विचार-विमर्श किया जाता था।

समिति

समिति अपेक्षाकृत बड़ी संस्था थी तथा सामान्य लोग इसके सदस्य होते थे।

समिति युद्ध, सन्धि, आय-व्यय आदि विषयों पर विचार करके निर्णय करती थी। राजा के निर्वाचन में भी इसकी भूमिका थी।

6. न्याय व्यवस्था

उत्तर वैदिक काल में न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी राजा था।

न्याय के संचालन के लिए अन्य पदाधिकारी भी राजा की सहायता करते थे। मुख्य न्यायाधीश को अथापति कहा गया है।

गाँव के सामान्य अपराधों का निर्णय ग्राम्यवादिन अधिकारी अपनी सभा में करता था। छोटे विवादों का निपटारा पंचायतों द्वारा किया जाता था।

कुछ विशेष मामलों में राजा सभा की सहायता से निर्णय करता था।

उत्तर वैदिक कालीन सामाजिक दशा

1. परिवार

पूर्व वैदिक काल की तरह उत्तर वैदिक समाज में भी पिता परिवार का प्रधान था और संयुक्त परिवार व्यवस्था प्रचलित थी।

अथर्ववेद में परिवार की शान्ति और आपसी सद्भाव के लिए प्रार्थनाओं का उल्लेख मिलता है।

2. विवाह

उत्तर वैदिक काल में विवाह को पवित्र कार्य माना जाता था और विवाह स्त्री तथा पुरुष दोनों के लिए आवश्यक माना गया।

इस काल में अन्तर्जातीय तथा सजातीय दोनों प्रकार के विवाह प्रचलित थे।

विधवा पुनर्विवाह तथा बहुविवाह का भी उल्लेख मिलता है।

3. स्त्रियों की स्थिति

उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों के सम्मान और प्रतिष्ठा में पूर्व वैदिक काल की तुलना में कमी आने लगी।

स्त्रियों को उपनयन संस्कार से वंचित कर दिया गया और कन्या के जन्म को अशुभ माना जाने लगा।

इसके बावजूद इस काल में गार्गी और मैत्रेयी जैसी प्रसिद्ध विदुषियों का उल्लेख मिलता है।

स्त्रियों की शिक्षा की व्यवस्था थी और वे संगीत तथा नृत्य में भी निपुण होती थीं।

4. वर्ण व्यवस्था

उत्तर वैदिक काल में समाज चार वर्णों—

  • ब्राह्मण
  • क्षत्रिय
  • वैश्य
  • शूद्र

में विभाजित था। इस काल में वर्ण व्यवस्था धीरे-धीरे अधिक जटिल होती गई।

5. आहार

उत्तर वैदिक काल में दूध, दही, घी, चावल, जौ, गेहूँ और सरसों आदि का भोजन में प्रयोग किया जाता था।

मांस खाना भी समाज में प्रचलित था। पेय पदार्थ के रूप में सुरा का प्रयोग किया जाता था।

6. वेशभूषा एवं आभूषण

उत्तर वैदिक काल में वस्त्रों की गुणवत्ता पूर्व काल की तुलना में कुछ अधिक विकसित हो गई थी।

वस्त्र मुख्य रूप से तीन प्रकार के थे—

वस्त्र प्रयोग
नीवी अन्दर पहनने वाला वस्त्र
वास बीच में पहनने वाला वस्त्र
अधिवास ऊपर पहनने वाला वस्त्र

स्त्री और पुरुष दोनों पगड़ी पहनते थे। ऊनी और सूती वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था।

स्त्री-पुरुष दोनों सोने और चाँदी के बहुमूल्य आभूषण भी पहनते थे।

7. मनोरंजन

उत्तर वैदिक काल में नृत्य और संगीत मनोरंजन के प्रमुख साधन थे। संगीत में वादन और गायन दोनों का प्रचलन था।

ढोल और बाँसुरी प्रमुख वाद्ययंत्रों में थे।

इसके अतिरिक्त—

  • रथ-दौड़
  • घुड़दौड़
  • जुआ

भी मनोरंजन के साधन थे।

8. शिक्षा

उत्तर वैदिक काल में शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य जीवन को समृद्ध और सुखमय बनाना था।

शिक्षा के लिए गुरुकुलों की स्थापना की गई थी। शिक्षा मौखिक रूप से दी जाती थी तथा शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता था।

विद्यार्थियों को—

  • वेद
  • उपनिषद
  • व्याकरण
  • व्यावहारिक ज्ञान

की शिक्षा दी जाती थी। इस काल में शिक्षा के अनेक महत्वपूर्ण केन्द्र भी विकसित हुए।

9. आश्रम व्यवस्था

उत्तर वैदिक काल की आश्रम व्यवस्था समाज की महत्वपूर्ण विशेषता थी। इसका पालन स्त्री और पुरुष दोनों का सामाजिक एवं नैतिक कर्तव्य माना गया।

मानव जीवन की आयु 100 वर्ष मानकर उसे चार आश्रमों में बाँटा गया—

आश्रम आयु मुख्य उद्देश्य
ब्रह्मचर्य आश्रम जन्म से 25 वर्ष विद्या अध्ययन एवं वेदों का पाठ
गृहस्थ आश्रम 26–50 वर्ष विवाह, सामाजिक रीति का पालन तथा वंश-वृद्धि
वानप्रस्थ आश्रम 51–75 वर्ष गृहस्थ जीवन का त्याग, समाज-कल्याण एवं संन्यास की ओर उन्मुख होना
संन्यास आश्रम 76 वर्ष से मृत्यु तक घर-परिवार का त्याग कर मोक्ष के लिए संन्यासी जीवन
उत्तर वैदिक काल का राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन
उत्तर वैदिक काल में जनपदों का विकास, शासन व्यवस्था, सामाजिक परिवर्तन और चार आश्रम

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

उत्तर वैदिक काल में छोटे कबीलों के स्थान पर बड़े जनपदों और प्रादेशिक राज्यों का विकास हुआ तथा राजा की शक्ति और प्रशासनिक व्यवस्था अधिक संगठित हुई। सभा और समिति का महत्व अपेक्षाकृत कम हुआ। सामाजिक जीवन में संयुक्त परिवार और विवाह संस्था बनी रही, परन्तु स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आई और वर्ण व्यवस्था अधिक जटिल हो गई। शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थी तथा मानव जीवन को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास चार आश्रमों में विभाजित किया गया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • उत्तर वैदिक काल लगभग 1000 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व तक माना गया है।
  • इस काल की विशेष पुरातात्विक पहचान चित्रित धूसर मृद्भाण्ड और लोहे के हथियार थे।
  • पुरु और भरत से कुरु तथा तुर्वश और क्रिवि से पांचाल जनपद का विकास हुआ।
  • कुरु और पांचाल उत्तर वैदिक काल के प्रमुख शक्तिशाली राज्य थे।
  • परीक्षित और जनमेजय कुरु राज्य के प्रमुख राजा थे।
  • इस काल में जनराज्यों के स्थान पर बड़े प्रादेशिक राज्यों का विकास हुआ।
  • अश्वमेध, राजसूय और वाजपेय यज्ञ राजा की शक्ति और प्रतिष्ठा से सम्बन्धित थे।
  • राजा की शक्ति बढ़ी और अधिराज, राजाधिराज, सम्राट तथा एकराट जैसी उपाधियाँ प्रचलित हुईं।
  • राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों को रत्निन, रत्नि अथवा वीर कहा जाता था।
  • सभा और समिति का महत्व उत्तर वैदिक काल में पहले की तुलना में कम हो गया।
  • न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी राजा था और मुख्य न्यायाधीश को अथापति कहा गया है।
  • संयुक्त परिवार प्रथा बनी रही तथा विवाह को पवित्र और आवश्यक माना गया।
  • विधवा पुनर्विवाह और बहुविवाह का उल्लेख मिलता है।
  • स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आई, फिर भी गार्गी और मैत्रेयी प्रमुख विदुषियाँ थीं।
  • वर्ण व्यवस्था ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्णों में विभाजित होकर अधिक जटिल होती गई।
  • नीवी, वास और अधिवास प्रमुख वस्त्र थे।
  • गुरुकुल शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था और शिक्षा मुख्यतः मौखिक थी।
  • मानव जीवन को 100 वर्ष मानकर ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास चार आश्रमों में बाँटा गया।

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Topic 5 उत्तर वैदिक आर्थिक, धार्मिक जीवन एवं वैदिक साहित्य

उत्तर वैदिक आर्थिक, धार्मिक जीवन एवं वैदिक साहित्य

उत्तर वैदिक कालीन आर्थिक जीवन

उत्तर वैदिक काल में आर्यों का आर्थिक जीवन पहले की तुलना में अधिक विकसित और विविध हो गया था। कृषि मुख्य व्यवसाय बन गई थी, जबकि पशुपालन, उद्योग-धन्धे और व्यापार भी आर्थिक जीवन के महत्वपूर्ण आधार थे।

1. कृषि

उत्तर वैदिक काल में लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। इस समय नए बीजों, नई फसलों और खेती की नई तकनीकों का विकास हुआ।

अच्छी और अधिक मात्रा में फसल प्राप्त करने के लिए खाद का प्रयोग भी किया जाने लगा।

इस काल की प्रमुख फसलें थीं—

  • चावल
  • गेहूँ
  • जौ

सिंचाई के कृत्रिम साधनों का भी प्रयोग होता था, परन्तु अधिकांश कृषि प्राकृतिक वर्षा और उपलब्ध जल पर निर्भर थी।

2. पशुपालन

कृषि के साथ पशुपालन का भी विशेष महत्व बना रहा। प्रमुख पालतू पशुओं में—

  • गाय
  • बैल
  • बकरी
  • भेड़
  • कुत्ता
  • घोड़ा
  • गधा

आदि सम्मिलित थे।

गाय का महत्व विशेष रूप से बना रहा। जिसके पास अधिक गायें होती थीं, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी अधिक मानी जाती थी। राजा किसी व्यक्ति को सम्मानित करने के लिए उसे गायें प्रदान करता था।

3. व्यवसाय एवं उद्योग

उत्तर वैदिक काल में अनेक नए उद्योग-धन्धों का विकास हुआ। विशेष रूप से वस्त्र तथा धातु उद्योग ने तीव्र प्रगति की।

इस काल में निम्न धातुओं का व्यापक प्रयोग होने लगा—

  • सोना
  • चाँदी
  • सीसा
  • टिन
  • ताँबा
  • लोहा

इन धातुओं से अस्त्र-शस्त्र, औजार, बर्तन और आभूषण बनाए जाते थे।

इसके अतिरिक्त अनेक व्यवसाय भी विकसित हुए, जैसे—

  • लोहार
  • चर्मकार
  • रथकार
  • कुम्हार
  • नर्तक

4. वाणिज्य एवं व्यापार

उत्तर वैदिक काल में आन्तरिक और विदेशी दोनों प्रकार के व्यापार में प्रगति हुई।

विदेशी व्यापार मुख्यतः समुद्री मार्ग से किया जाता था, जबकि आन्तरिक व्यापार के लिए विभिन्न यातायात साधनों का प्रयोग किया जाता था।

व्यापार सामान्यतः वस्तु-विनिमय प्रणाली पर आधारित था। गाय भी विनिमय का एक प्रमुख माध्यम थी।

धीरे-धीरे मुद्रा का प्रचलन भी प्रारम्भ हो गया। इस काल में—

  • निष्क
  • शतमान
  • कृष्णल

जैसी मुद्राओं का उल्लेख मिलता है। वस्तुओं को तौलने के लिए बाटों का भी प्रयोग किया जाता था।

उत्तर वैदिक कालीन धार्मिक जीवन

उत्तर वैदिक काल में धार्मिक जीवन में व्यापक परिवर्तन हुए। पूर्व वैदिक काल की अपेक्षा धार्मिक व्यवस्था अधिक जटिल हो गई और यज्ञ, तप, दार्शनिक चिंतन तथा नए देवताओं का महत्व बढ़ा।

1. यज्ञों का बढ़ता महत्व

उत्तर वैदिक काल में यज्ञों का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया। यज्ञ सम्बन्धी विस्तृत विधि-विधान की जानकारी गृहसूत्र और श्रौतसूत्र जैसे ग्रंथों में मिलती है।

यज्ञ की प्रक्रिया अत्यन्त जटिल हो गई थी। कुछ यज्ञ एक माह से लेकर एक वर्ष तक चलते थे।

इस काल में यज्ञ सम्पन्न करने का अधिकार मुख्य रूप से ब्राह्मणों के हाथ में आ गया।

2. तप का महत्व

उत्तर वैदिक काल में तप को ज्ञान प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण साधन माना गया।

उपनिषदों में तप को ब्रह्म की प्राप्ति और ज्ञान का साधन बताया गया है। तप के माध्यम से अलौकिक शक्ति तथा स्वर्ग की प्राप्ति की धारणा भी प्रचलित थी।

तप की प्रमुख विधियों में—

  • नुकीले काँटों पर खड़े रहना
  • बहुत कम भोजन ग्रहण करना
  • महीनों तक एक ही मुद्रा में खड़े रहना
  • ग्रीष्मकाल में धूप में खड़े रहना
  • सर्दियों में ठंड सहना

आदि सम्मिलित थीं।

3. दार्शनिक विचारों का विकास

उत्तर वैदिक काल में धार्मिक कर्मकाण्ड के साथ दार्शनिक चिंतन का भी व्यापक विकास हुआ।

इस काल में आत्मा और ब्रह्म की एकता पर विशेष बल दिया गया। कर्म के महत्व में भी वृद्धि हुई और सत्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए कर्म को आवश्यक समझा जाने लगा।

ब्रह्म को सर्वव्यापक, अन्तर्यामी और सर्वशक्तिमान माना गया।

इसी काल में निम्न विचारों का विशेष विकास हुआ—

  • आत्मा और परमात्मा
  • माया और मोक्ष
  • स्वर्ग और नरक
  • कर्म सिद्धान्त

4. नए देवताओं का उदय

उत्तर वैदिक काल में कई नए देवताओं का महत्व बढ़ गया। ब्रह्मा, विष्णु और महेश को त्रिदेव के रूप में महत्व प्राप्त हुआ।

सृष्टि के रचयिता प्रजापति को भी उच्च स्थान मिला।

विष्णु को प्रमुख यज्ञ पुरुष माना गया। रुद्र की पूजा अब शिवजी, पशुपति और महादेव के रूप में की जाने लगी।

इसके अतिरिक्त नाग, यक्ष और गन्धर्व आदि की पूजा भी प्रचलित हुई।

5. धार्मिक जीवन की जटिलता

उत्तर वैदिक काल में धर्म का स्वरूप अत्यन्त जटिल होने लगा। किसी बड़े यज्ञ को सम्पन्न करने के लिए लगभग 17 पुरोहितों की आवश्यकता पड़ती थी।

यज्ञ अधिक जटिल और दीर्घकालिक हो गए। सामान्य गृहस्थ के लिए इतने विस्तृत धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन कठिन था।

इस प्रकार धार्मिक जीवन में कर्मकाण्ड और बाह्य आडम्बर का प्रभाव बढ़ने लगा।

उत्तर वैदिक कालीन साहित्य

उत्तर वैदिक काल में धार्मिक, दार्शनिक और सामाजिक चिंतन के विकास के साथ विशाल साहित्य की रचना हुई। इस साहित्य को प्रमुख रूप से दस भागों में समझा जा सकता है।

1. वेद

वेदों की संख्या चार है—

  1. ऋग्वेद
  2. यजुर्वेद
  3. सामवेद
  4. अथर्ववेद
ऋग्वेद

ऋग्वेद आर्यों का प्राचीनतम और पवित्रतम वैदिक साहित्य माना गया है। इसमें देवताओं की गीतात्मक स्तुतियाँ मिलती हैं।

ऋग्वेद में—

  • 10 मण्डल
  • 1028 सूक्त
  • 10580 ऋचाएँ

बताई गई हैं।

ऋग्वेद से तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है। इसकी रचना उत्तर वैदिक काल के पहले हो चुकी थी, लेकिन उत्तर वैदिक काल में भी इसका पालन और अध्ययन जारी रहा।

यजुर्वेद

यजुर्वेद में यज्ञ सम्बन्धी विधि-विधानों का वर्णन मिलता है। यह गद्य और पद्य दोनों रूपों में है।

इसके दो प्रमुख भाग हैं—

  • शुक्ल यजुर्वेद — इसमें मुख्यतः श्लोक मिलते हैं।
  • कृष्ण यजुर्वेद — इसमें श्लोकों के साथ उनकी व्याख्या भी मिलती है।
सामवेद

सामवेद में ‘साम’ का अर्थ गायन है। इसमें लगभग 1549 अथवा 1810 श्लोक बताए गए हैं।

यज्ञ के अवसर पर इन श्लोकों का गायन किया जाता था।

अथर्ववेद

अथर्ववेद में 20 मण्डल, 731 ऋचाएँ और 5987 मंत्र बताए गए हैं।

इसमें तंत्र-मंत्र और जादू-टोने से सम्बन्धित मंत्रों का भी उल्लेख मिलता है।

इसके दो प्रमुख भाग हैं—

  • पैप्पलाद
  • शौनक

चारों वेद एक नजर में

वेद मुख्य विशेषता
ऋग्वेद देवताओं की स्तुतियाँ; प्राचीनतम वैदिक साहित्य
यजुर्वेद यज्ञ सम्बन्धी विधि-विधान
सामवेद यज्ञ के अवसर पर गाए जाने वाले श्लोक
अथर्ववेद तंत्र-मंत्र और जादू-टोने से सम्बन्धित मंत्र

2. ब्राह्मण ग्रंथ

वेदों की ऋचाओं की गद्य में की गई सरल व्याख्या को ब्राह्मण ग्रंथ कहा गया।

प्रत्येक वेद का अपना ब्राह्मण ग्रंथ था। कौशीतकी और ऐतरेय ऋग्वेद से सम्बन्धित प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथ थे।

ऐतरेय ब्राह्मण में राजाभिषेक, उत्सव तथा वैदिक काल के राजाओं से सम्बन्धित विवरण मिलता है।

3. आरण्यक

आरण्यक ग्रंथों में आत्मा, मृत्यु और जीवन से सम्बन्धित विषयों का वर्णन मिलता है।

इनका अध्ययन मुख्यतः वानप्रस्थी, मुनि और वनवासी लोग वन में करते थे। इसी कारण इन्हें आरण्यक कहा गया।

4. उपनिषद

उपनिषदों में ब्रह्म और आत्मा से सम्बन्धित उच्चकोटि का दार्शनिक चिंतन मिलता है।

उपनिषदों की संख्या लगभग 108 बताई गई है। इनमें 12 प्रमुख उपनिषद हैं—

  • कौशीतकी
  • ऐतरेय
  • ईश
  • बृहदारण्यक
  • केन
  • छान्दोग्य
  • तैत्तिरीय
  • कठ
  • श्वेताश्वतर
  • मुण्डक
  • माण्डूक्य
  • प्रश्न

केन और छान्दोग्य का सम्बन्ध सामवेद से, तैत्तिरीय, कठ और श्वेताश्वतर का सम्बन्ध कृष्ण यजुर्वेद से तथा मुण्डक, माण्डूक्य और प्रश्न उपनिषद का सम्बन्ध अथर्ववेद से बताया गया है।

5. वेदांग

वेदों की व्याख्या एवं उन्हें समझने के लिए वेदांगों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। वेदांगों की संख्या छह है—

  1. शिक्षा
  2. कल्प
  3. व्याकरण
  4. छन्द
  5. निरुक्त
  6. ज्योतिष

6. सूत्र साहित्य

सूत्र साहित्य में कम से कम शब्दों अथवा वाक्यों में अधिक से अधिक अर्थ व्यक्त किया जाता था।

इसके प्रमुख रूप थे—

  • श्रौतसूत्र — यज्ञों के विधि-विधान का वर्णन।
  • गृहसूत्र — जन्म से मृत्यु तक व्यक्ति के कर्तव्यों का उल्लेख।
  • धर्मसूत्र — चार वर्ण, आश्रम व्यवस्था और सामाजिक नियमों का वर्णन।

7. उपवेद

प्रत्येक वेद से एक उपवेद सम्बन्धित माना गया—

उपवेद सम्बन्ध विषय
आयुर्वेद ऋग्वेद रसायन शास्त्र, खनिज विज्ञान एवं शल्य चिकित्सा
धनुर्वेद यजुर्वेद अस्त्र-शस्त्र चलाने की विधियाँ
गन्धर्ववेद सामवेद संगीत, गायन एवं नृत्य
शिल्पवेद अथर्ववेद वास्तुकला निर्माण

8. पुराण

पुराणों की कुल संख्या 18 बताई गई है। इनके अतिरिक्त 18 उपपुराण भी बताए गए हैं।

प्रमुख पुराणों में—

  • ब्रह्म पुराण
  • मत्स्य पुराण
  • विष्णु पुराण
  • भागवत पुराण
  • अग्नि पुराण
  • वायु पुराण
  • मार्कण्डेय पुराण
  • गरुड़ पुराण

आदि महत्वपूर्ण हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से भी पुराणों का विशेष महत्व है।

9. रामायण

रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की।

इसमें मूलतः लगभग 6000 श्लोक बताए गए हैं, जिनकी संख्या बाद में बढ़ती गई।

इसकी रचना सम्भवतः ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी में प्रारम्भ हुई मानी गई है।

10. महाभारत

महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास से सम्बन्धित मानी जाती है।

यह अपने मूल रूप में वर्तमान स्वरूप जितना विशाल नहीं था। समय के साथ इसमें अनेक दन्तकथाएँ और प्रसंग जुड़ते गए।

प्रारम्भ में इसे जय संहिता के नाम से जाना जाता था।

उत्तर वैदिक काल का आर्थिक धार्मिक जीवन एवं वैदिक साहित्य
उत्तर वैदिक काल की अर्थव्यवस्था, धार्मिक परिवर्तन और प्रमुख वैदिक साहित्य का वर्गीकरण

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

उत्तर वैदिक काल में कृषि आर्थिक जीवन का मुख्य आधार बन गई और धातु उद्योग, शिल्प तथा व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। धार्मिक क्षेत्र में यज्ञ अधिक जटिल हुए, तप और दार्शनिक चिंतन का महत्व बढ़ा तथा ब्रह्म, आत्मा, कर्म और मोक्ष जैसे विचार विकसित हुए। इसी काल में वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, वेदांग, सूत्र, उपवेद, पुराण तथा महाकाव्यों से सम्बद्ध विशाल साहित्यिक परम्परा विकसित हुई।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • उत्तर वैदिक काल में कृषि लोगों का प्रमुख व्यवसाय था।
  • चावल, गेहूँ और जौ इस काल की प्रमुख फसलें थीं तथा खाद का प्रयोग भी किया जाता था।
  • गाय का सामाजिक एवं आर्थिक महत्व बना रहा।
  • वस्त्र और धातु उद्योगों का तीव्र विकास हुआ तथा सोना, चाँदी, सीसा, टिन, ताँबा और लोहा प्रयोग में आते थे।
  • आन्तरिक और विदेशी दोनों प्रकार के व्यापार में प्रगति हुई; विदेशी व्यापार समुद्री मार्ग से होता था।
  • निष्क, शतमान और कृष्णल जैसी मुद्राओं तथा बाटों का प्रयोग मिलता है।
  • उत्तर वैदिक काल में यज्ञों का महत्व बहुत बढ़ गया और वे अत्यन्त जटिल हो गए।
  • कुछ यज्ञ एक माह से एक वर्ष तक चलते थे और बड़े यज्ञ में लगभग 17 पुरोहितों की आवश्यकता होती थी।
  • तप को ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने का साधन माना गया।
  • आत्मा-ब्रह्म की एकता, कर्म, माया, मोक्ष, स्वर्ग और नरक जैसे दार्शनिक विचार विकसित हुए।
  • ब्रह्मा, विष्णु और महेश का महत्व बढ़ा तथा प्रजापति को उच्च स्थान मिला।
  • चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं।
  • ऋग्वेद में 10 मण्डल, 1028 सूक्त और 10580 ऋचाएँ बताई गई हैं।
  • यजुर्वेद में यज्ञ विधि, सामवेद में गायन और अथर्ववेद में तंत्र-मंत्र सम्बन्धी सामग्री मिलती है।
  • अथर्ववेद में 20 मण्डल, 731 ऋचाएँ और 5987 मंत्र बताए गए हैं।
  • ब्राह्मण ग्रंथ वेदों की गद्यात्मक व्याख्या तथा आरण्यक आत्मा, मृत्यु और जीवन सम्बन्धी चिंतन प्रस्तुत करते हैं।
  • उपनिषदों की संख्या लगभग 108 तथा प्रमुख उपनिषदों की संख्या 12 बताई गई है।
  • छह वेदांग—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्द, निरुक्त और ज्योतिष हैं।
  • आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और शिल्पवेद चार प्रमुख उपवेद हैं।
  • पुराणों की संख्या 18 बताई गई है।
  • रामायण के रचयिता वाल्मीकि तथा महाभारत के रचयिता वेदव्यास माने गए हैं।
  • महाभारत का प्रारम्भिक नाम जय संहिता था।
Topic 6 सिंधु घाटी एवं वैदिक सभ्यता में अन्तर

सिंधु घाटी एवं वैदिक सभ्यता में अन्तर

सिंधु घाटी सभ्यता एवं वैदिक सभ्यता में अन्तर

सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सभ्यता प्राचीन भारतीय इतिहास की दो महत्वपूर्ण सभ्यताएँ थीं। दोनों के सामाजिक जीवन, आर्थिक साधनों, पशुओं के महत्व, खान-पान, मृतक संस्कार और धार्मिक मान्यताओं में कई स्पष्ट अन्तर दिखाई देते हैं।

आधार सिंधु घाटी सभ्यता वैदिक सभ्यता
सभ्यता का स्वरूप सिंधु घाटी सभ्यता मुख्यतः नगरीय सभ्यता थी। आर्यों की वैदिक सभ्यता मुख्यतः ग्रामीण सभ्यता थी।
घोड़े का ज्ञान एवं प्रयोग सिंधु घाटी सभ्यता के निवासी घोड़े से परिचित नहीं थे। घोड़ा आर्यों का पालतू पशु था तथा वे उसका उपयोग रथ चलाने में करते थे।
लोहे का प्रयोग सिंधु घाटी सभ्यता के निवासियों को लोहे का ज्ञान नहीं था। आर्यों ने लोहे का प्रयोग आरम्भ कर दिया था।
गाय एवं बैल का महत्व सिंधु सभ्यता की मुहरों और अन्य कलाकृतियों से गाय की अपेक्षा बैल का महत्व अधिक दिखाई देता है। आर्य गाय को विशेष महत्व देते थे।
भोजन सिंधु घाटी सभ्यता के लोग भोजन में मछली का प्रयोग करते थे। आर्यों में मछली खाना वर्जित था।
मृतक संस्कार सिंधु घाटी के लोग अपने मृतकों को दफनाते थे। आर्यों ने मृतकों को जलाना आरम्भ किया।
धार्मिक जीवन सिंधु घाटी सभ्यता के निवासी मूर्ति पूजा करते थे। आर्य यज्ञ और तप को अधिक महत्व देते थे।

1. नगरीय एवं ग्रामीण स्वरूप

सिंधु घाटी सभ्यता का स्वरूप मुख्यतः नगरीय था। इसके विपरीत वैदिक आर्यों का जीवन मुख्यतः गाँवों में केन्द्रित था, इसलिए वैदिक सभ्यता को ग्रामीण सभ्यता कहा गया।

2. घोड़े का महत्व

सिंधु घाटी सभ्यता के निवासियों को घोड़े से परिचित नहीं माना गया है, जबकि वैदिक आर्यों के जीवन में घोड़े का विशेष स्थान था। घोड़ा पालतू पशु था और उसका उपयोग रथ चलाने के लिए किया जाता था।

3. लोहे का प्रयोग

सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों को लोहे का ज्ञान नहीं था। वैदिक सभ्यता में आर्यों ने लोहे का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया था।

4. गाय और बैल का महत्व

सिंधु सभ्यता की मुहरों और अन्य कलाकृतियों में गाय की तुलना में बैल का महत्व अधिक दिखाई देता है। इसके विपरीत वैदिक आर्यों के जीवन में गाय का अत्यधिक महत्व था।

5. भोजन सम्बन्धी अन्तर

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग मछली का प्रयोग भोजन में करते थे, जबकि वैदिक आर्यों में मछली खाना वर्जित माना गया।

6. मृतक संस्कार

दोनों सभ्यताओं में मृतकों के अन्तिम संस्कार की पद्धति अलग थी। सिंधु घाटी के लोग मृतकों को दफनाते थे, जबकि वैदिक आर्यों ने मृतकों को जलाना प्रारम्भ किया।

7. धार्मिक जीवन

सिंधु घाटी सभ्यता में मूर्ति पूजा का महत्व था। वैदिक आर्यों के धार्मिक जीवन में इसके स्थान पर यज्ञ और तप को अधिक महत्व दिया गया।

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सभ्यता के स्वरूप में अनेक महत्वपूर्ण अन्तर थे। सिंधु सभ्यता नगरीय थी, जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी। घोड़े और लोहे का प्रयोग, गाय-बैल का महत्व, भोजन की आदतें, मृतक संस्कार तथा धार्मिक मान्यताएँ दोनों सभ्यताओं को एक-दूसरे से अलग करती थीं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सिंधु घाटी सभ्यता नगरीय तथा वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी।
  • सिंधु घाटी के निवासी घोड़े से परिचित नहीं थे, जबकि घोड़ा आर्यों का पालतू पशु था और रथ चलाने में प्रयुक्त होता था।
  • सिंधु घाटी सभ्यता में लोहे का ज्ञान नहीं था, जबकि आर्यों ने लोहे का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया था।
  • सिंधु सभ्यता में गाय की अपेक्षा बैल का महत्व अधिक दिखाई देता है, जबकि आर्य गाय को विशेष महत्व देते थे।
  • सिंधु घाटी के लोग मछली खाते थे, जबकि आर्यों में मछली खाना वर्जित था।
  • सिंधु घाटी के लोग मृतकों को दफनाते थे, जबकि आर्य मृतकों को जलाते थे।
  • सिंधु घाटी सभ्यता में मूर्ति पूजा और वैदिक सभ्यता में यज्ञ तथा तप का विशेष महत्व था।
Topic 7 महाजनपद काल एवं प्राचीन भारत के 16 महाजनपद

महाजनपद काल एवं प्राचीन भारत के 16 महाजनपद

महाजनपद काल

छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक आते-आते प्राचीन भारत के जनपदों का काफी विस्तार हो चुका था। विस्तार की प्रवृत्ति के कारण विभिन्न जनपदों में आपसी संघर्ष होने लगे। इन संघर्षों में पराजित जनपद विजेता राज्यों में सम्मिलित होते गए।

इस प्रकार जिन जनपदों की सीमा, क्षेत्र और शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हुई, उन्हें महाजनपद कहा जाने लगा।

प्रारम्भिक भारतीय इतिहास में छठी शताब्दी ईसा पूर्व को महत्वपूर्ण परिवर्तन का काल माना जाता है। इस समय प्रारम्भिक राज्यों का विकास हुआ, लोहे का प्रयोग बढ़ा, सिक्कों का प्रचलन विकसित हुआ तथा बौद्ध और जैन सहित अनेक दार्शनिक विचारधाराएँ सामने आईं।

प्राचीन भारत के 16 महाजनपद

बौद्ध एवं जैन साहित्य तथा पाणिनि की अष्टाध्यायी से प्राचीन महाजनपदों की जानकारी प्राप्त होती है। बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तरनिकाय में सोलह महाजनपदों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

क्रम महाजनपद राजधानी
1 काशी वाराणसी
2 कोशल श्रावस्ती
3 अंग चम्पा
4 मगध गिरिव्रज
5 वज्जि मिथिला / वैशाली
6 मल्ल कुशीनारा / वैशाली
7 चेदि शुक्तिमती
8 वत्स कौशाम्बी
9 कुरु इन्द्रप्रस्थ
10 पांचाल अहिच्छत्र
11 मत्स्य विराटनगर
12 शूरसेन मथुरा
13 अश्मक पौदन
14 अवन्ति उज्जयिनी
15 गांधार तक्षशिला
16 कम्बोज राजपुर (हाटक)

महाजनपदों की शासन व्यवस्था

अधिकांश महाजनपदों में राजा का शासन था। इसके साथ ही कुछ राज्य गण और संघ के रूप में भी संगठित थे।

गण एवं संघ राज्यों में लोगों का समूह शासन करता था और उनमें से एक व्यक्ति राजा कहलाता था। भगवान महावीर और गौतम बुद्ध का सम्बन्ध भी ऐसे ही गणों से था।

महाजनपदों का संक्षिप्त परिचय

1. अंग

अंग महाजनपद के क्षेत्र में वर्तमान बिहार के मुंगेर और भागलपुर जिले आते थे। इसकी राजधानी चम्पा थी।

महाभारत एवं बौद्ध साहित्य में इसकी स्थापना राजा अंग से सम्बन्धित बताई गई है। अंग के व्यापारी अनेक देशों के साथ व्यापार करते थे। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में यहाँ का शासक ब्रह्मदत्त था।

2. मगध

बौद्ध काल और उसके बाद मगध उत्तरी भारत का अत्यन्त शक्तिशाली महाजनपद बना। इसके अन्तर्गत वर्तमान बिहार के पटना और गया जिले के क्षेत्र आते थे।

प्रारम्भ में इसकी राजधानी गिरिव्रज थी। बाद में हर्यक वंश के शासक बिम्बिसार के समय राजगृह का महत्व बढ़ा। बिम्बिसार महात्मा बुद्ध का समकालीन था।

बिम्बिसार से पहले बृहद्रथ और जरासंध के शासन का भी उल्लेख मिलता है। मगध का उल्लेख अथर्ववेद में भी मिलता है।

3. काशी

काशी प्राचीन भारत का प्रसिद्ध जनपद था और इसकी राजधानी वाराणसी थी।

पाँचवीं शताब्दी में भारत आने वाले चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा-विवरण से भी वाराणसी की जानकारी प्राप्त होती है।

हरिवंश पुराण में काशी के वंश को राजा काश से सम्बन्धित बताया गया है।

4. कोशल

कोशल उत्तरी भारत का एक प्रसिद्ध जनपद था जिसकी राजधानी श्रावस्ती थी।

वर्तमान उत्तर प्रदेश के फैजाबाद, गोण्डा और बहराइच के क्षेत्र इसके अन्तर्गत आते थे।

बुद्ध के समय कोशल का राजा प्रसेनजित था। प्रसेनजित ने काशी को जीतकर कोशल राज्य की सीमा का विस्तार किया।

5. वत्स

वत्स महाजनपद का क्षेत्र आधुनिक उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद और मिर्जापुर जिलों से सम्बन्धित था। इसकी राजधानी कौशाम्बी थी।

कौशाम्बी को पहली बार वत्स की राजधानी पाण्डवों के वंशज निचक्षु ने बनाया।

इस राज्य का अवन्ति से निरन्तर संघर्ष चलता रहता था। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में वत्स का प्रसिद्ध शासक उदयन था।

6. कुरु

कुरु जनपद हस्तिनापुर के निकट स्थित था। इसके क्षेत्र में वर्तमान थानेसर, दिल्ली तथा उत्तरी गंगा-दोआब के मेरठ और बिजनौर के कुछ भाग सम्मिलित थे।

महाभारत में भारतीय कुरु जनपद को दक्षिण कुरु कहा गया है और इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ बताई गई है।

7. पांचाल

पांचाल जनपद कानपुर से वाराणसी के बीच गंगा के मैदानों में फैला हुआ था।

इसकी दो शाखाएँ थीं—

  • उत्तरी पांचाल — राजधानी अहिच्छत्र
  • दक्षिणी पांचाल — राजधानी काम्पिल्य

8. मत्स्य

मत्स्य जनपद का सबसे प्राचीन उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

वर्तमान राजस्थान के अलवर, भरतपुर और जयपुर के पश्चिमी क्षेत्र इससे सम्बन्धित माने गए हैं।

महाभारत काल में यहाँ राजा विराट का शासन था, इसलिए इसकी राजधानी का नाम विराटनगर पड़ा।

9. शूरसेन

शूरसेन उत्तरी भारत का प्रसिद्ध महाजनपद था और इसकी राजधानी मथुरा थी।

इस जनपद का नाम भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न के पुत्र शूरसेन के नाम से सम्बन्धित बताया गया है।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार शूरसेन एक कबीला था जिसने लगभग 600–700 ईसा पूर्व के आसपास ब्रज क्षेत्र पर अधिकार स्थापित किया।

10. अश्मक

अश्मक महाजनपद दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के तट पर स्थित था। इसकी राजधानी पौदन थी।

अश्मक और अवन्ति के बीच संघर्ष चलता रहता था। अन्ततः अवन्ति ने अश्मक को अपने अधीन कर लिया।

11. अवन्ति

अवन्ति मध्य भारत का प्रमुख राज्य था और इसकी राजधानी उज्जयिनी थी।

अवन्ति राज्य के दो भाग थे—

  • उत्तरी अवन्ति — राजधानी उज्जयिनी
  • दक्षिणी अवन्ति — राजधानी महिष्मती

बुद्ध के समय अवन्ति एक शक्तिशाली राज्य था और इसका प्रसिद्ध शासक चण्ड प्रद्योत था।

12. गांधार

गांधार महाजनपद वर्तमान पाकिस्तान के पश्चिमी भाग तथा अफगानिस्तान के पूर्वी क्षेत्र में स्थित था।

इसका प्रमुख केन्द्र वर्तमान पेशावर और उसके आसपास का क्षेत्र था तथा इसकी राजधानी तक्षशिला थी।

महाभारत में धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी को गांधार की राजकुमारी बताया गया है।

13. कम्बोज

कम्बोज भारतवर्ष के प्रमुख जनपदों में गिना जाता था। प्राचीन साहित्य में इसके क्षेत्र को सामान्यतः कश्मीर से हिन्दूकुश तक विस्तृत बताया गया है।

वैदिक काल में यह आर्य संस्कृति का महत्वपूर्ण केन्द्र था। बाद में आर्य सभ्यता के पूर्व की ओर विस्तार के साथ कम्बोज की संस्कृति को अलग समझा जाने लगा।

मौर्यकाल में चन्द्रगुप्त के समय तक यह गणराज्य बन चुका था।

14. वज्जि

वज्जि उत्तर बिहार का एक प्रमुख बौद्धकालीन गणराज्य था। यह वास्तव में एक राज्य-संघ था जिसके आठ सदस्य थे।

इनमें विदेह, लिच्छवि और ज्ञातृक गण विशेष रूप से प्रसिद्ध थे।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में यह एक स्वतंत्र राज्य था, लेकिन बाद में मगध के शासक अजातशत्रु ने इसे अपने राज्य में मिला लिया।

15. मल्ल

मल्ल भी एक गण-संघ था और इसका क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश में था।

बौद्ध साहित्य में मल्ल देश की दो राजधानियों के रूप में कुशीनगर और पावापुरी का उल्लेख मिलता है।

महात्मा बुद्ध ने पावापुरी में अपना अंतिम भोजन किया तथा कुशीनगर में उनका निधन हुआ। बुद्ध की मृत्यु के कुछ समय बाद मगध साम्राज्य ने मल्ल को जीत लिया।

16. चेदि

चेदि जनपद का क्षेत्र वर्तमान बुन्देलखण्ड में माना गया है। गंगा और नर्मदा के बीच के क्षेत्र का प्राचीन नाम चेदि था।

इसकी राजधानी शुक्तिमती अथवा सोत्तिवती थी, जो केन नदी के तट पर स्थित थी।

महाभारत काल में शिशुपाल यहाँ का प्रसिद्ध राजा था। वर्तमान ग्वालियर क्षेत्र की चन्देरी को भी प्राचीन चेदि राज्य की राजधानी से सम्बन्धित बताया गया है।

महत्वपूर्ण ध्यान बिंदु

अध्याय की 16 महाजनपदों वाली तालिका में मल्ल की राजधानी कुशीनारा / वैशाली दी गई है, जबकि इसके विस्तृत वर्णन में कुशीनगर और पावापुरी दो राजधानियों का उल्लेख किया गया है। परीक्षा की तैयारी में पुस्तक के प्रश्न अथवा दिए गए विकल्प के अनुसार तथ्य को पहचानना उपयोगी रहेगा।

प्राचीन भारत के सोलह महाजनपद और उनकी राजधानियाँ
प्राचीन भारत के 16 महाजनपद, उनकी प्रमुख राजधानियाँ तथा राजतंत्र और गण-संघ व्यवस्था

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में छोटे जनपदों के विस्तार और परस्पर संघर्ष के परिणामस्वरूप बड़े और शक्तिशाली महाजनपदों का विकास हुआ। बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तरनिकाय में सोलह महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें मगध, कोशल, काशी, वत्स और अवन्ति जैसे राजतंत्रीय राज्य तथा वज्जि और मल्ल जैसे गण-संघ महत्वपूर्ण थे। यही काल आगे चलकर प्राचीन भारत में बड़े राज्यों और साम्राज्यों के निर्माण की आधारभूमि बना।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • छठी शताब्दी ईसा पूर्व में जनपदों के विस्तार से महाजनपदों का विकास हुआ।
  • महाजनपद काल में प्रारम्भिक राज्यों, लोहे के प्रयोग, सिक्कों तथा नवीन दार्शनिक विचारों का विकास हुआ।
  • अंगुत्तरनिकाय में प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
  • 16 महाजनपद थे—काशी, कोशल, अंग, मगध, वज्जि, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवन्ति, गांधार और कम्बोज।
  • काशी की राजधानी वाराणसी तथा कोशल की राजधानी श्रावस्ती थी।
  • अंग की राजधानी चम्पा तथा मगध की प्रारम्भिक राजधानी गिरिव्रज थी।
  • वत्स की राजधानी कौशाम्बी और कुरु की राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी।
  • पांचाल की उत्तरी शाखा की राजधानी अहिच्छत्र और दक्षिणी शाखा की राजधानी काम्पिल्य थी।
  • मत्स्य की राजधानी विराटनगर और शूरसेन की राजधानी मथुरा थी।
  • अश्मक गोदावरी के तट पर स्थित था तथा उसकी राजधानी पौदन थी।
  • अवन्ति की प्रमुख राजधानी उज्जयिनी थी और बुद्ध के समय चण्ड प्रद्योत इसका शक्तिशाली शासक था।
  • गांधार की राजधानी तक्षशिला थी।
  • कम्बोज का क्षेत्र कश्मीर से हिन्दूकुश तक माना गया और बाद में यह गणराज्य बना।
  • वज्जि आठ सदस्यों वाला राज्य-संघ था, जिसमें विदेह, लिच्छवि और ज्ञातृक प्रमुख थे।
  • मल्ल भी गण-संघ था और इसका क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश में था।
  • चेदि का क्षेत्र बुन्देलखण्ड में था तथा शिशुपाल इसका प्रसिद्ध राजा था।
  • अधिकांश महाजनपद राजतंत्रीय थे, जबकि कुछ राज्यों में गण एवं संघ व्यवस्था प्रचलित थी।

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Topic 8 मगध साम्राज्य का उदय एवं विस्तार

मगध साम्राज्य का उदय एवं विस्तार

मगध साम्राज्य का उदय

प्राचीन भारत में मगध का एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में विकास उसके महत्वाकांक्षी शासकों के प्रयासों से हुआ। मगध का प्रथम प्रभावशाली शासक बिम्बिसार था और मगध साम्राज्य की स्थापना का श्रेय मुख्य रूप से उसी को दिया जाता है।

बिम्बिसार छठी शताब्दी ईसा पूर्व में लगभग 544 ईसा पूर्व राजगद्दी पर बैठा। वह हर्यक वंश का शासक था।

1. बिम्बिसार

बिम्बिसार ने युद्ध के साथ-साथ वैवाहिक सम्बन्धों की नीति अपनाकर मगध की राजनीतिक स्थिति मजबूत की। उसके विवाह सम्बन्धों ने मगध के पश्चिम और उत्तर की ओर विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।

बिम्बिसार के प्रमुख वैवाहिक सम्बन्ध
  • उसकी पहली पत्नी कोशलराज की पुत्री थी, जिसे महाकोशलदेवी कहा गया।
  • उसकी दूसरी पत्नी चेल्लना थी, जो लिच्छवि राजा चेटक की पुत्री थी।
  • उसकी तीसरी पत्नी पंजाब के मद्र कुल के प्रधान की पुत्री क्षेमा थी।

इन वैवाहिक सम्बन्धों से मगध को अनेक शक्तिशाली राज्यों के साथ राजनीतिक सम्बन्ध स्थापित करने में सहायता मिली।

सेना एवं प्रशासन

बिम्बिसार को एक प्रभावशाली सैनिक शासक माना गया है। उसे श्रेणीय, अर्थात सेना से सम्पन्न शासक के रूप में भी वर्णित किया गया है।

वह प्रारम्भिक शासकों में था जिसने स्थायी और नियमित सेना का संगठन किया।

राजधानी — गिरिव्रज से राजगृह

प्रारम्भ में मगध की राजधानी गिरिव्रज थी। बाद में बिम्बिसार ने राजधानी को पटना से दक्षिण-पूर्व में लगभग 60 मील दूर राजगृह (राजगीर) स्थानान्तरित कर दिया।

राजगृह एक प्राकृतिक रूप से सुरक्षित दुर्ग के समान था और यह पाँच पहाड़ियों से घिरा हुआ था।

2. अजातशत्रु

बिम्बिसार के बाद उसका पुत्र अजातशत्रु राजगद्दी पर बैठा। उसका शासनकाल लगभग 492 ईसा पूर्व से 460 ईसा पूर्व माना गया है।

राज्याभिषेक से पहले अजातशत्रु अपने पिता की ओर से चम्पा में राजा के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर चुका था।

सत्ता प्राप्त करने के लिए उसने अपने पिता बिम्बिसार को कारागार में डलवा दिया और बाद में भूख से उसकी मृत्यु करा दी। राजा बनने के बाद उसने मगध साम्राज्य के विस्तार की नीति अपनाई।

पाटलिग्राम का दुर्ग

अजातशत्रु ने अपने अभियान को मजबूत बनाने के लिए पाटलिग्राम में एक दुर्ग बनवाया। आगे चलकर यही स्थान मगध की शक्ति के विस्तार में अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

अजातशत्रु और लिच्छवियों का युद्ध

अजातशत्रु के शासन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक लिच्छवियों के साथ युद्ध था।

इस युद्ध का प्रमुख कारण अजातशत्रु की अपने पड़ोसी लिच्छवि राज्य की शक्ति को समाप्त करके मगध का विस्तार करने की इच्छा थी।

लिच्छवि गणराज्य अत्यन्त शक्तिशाली था। इसलिए अजातशत्रु ने केवल प्रत्यक्ष युद्ध पर निर्भर न रहकर कूटनीति का भी सहारा लिया।

उसने अपने दो मंत्रियों सुनीध और वस्सकार को लिच्छवियों के बीच फूट उत्पन्न करने के लिए भेजा।

इसके साथ उसने अपनी सेना को संगठित किया और अनेक विनाशकारी शस्त्रों से सुसज्जित किया।

इस युद्ध की तैयारी लगभग सोलह वर्षों तक चलती रही। अन्ततः लिच्छवियों के क्षेत्र का एक बड़ा भाग मगध साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।

3. शिशुनाग

अजातशत्रु के बाद उसके उत्तराधिकारी अपेक्षाकृत कमजोर और अलोकप्रिय सिद्ध हुए।

लगभग 413 ईसा पूर्व में बनारस के मंत्री अथवा अमात्य शिशुनाग को राजा बनाया गया।

शिशुनाग ने अवन्ति के शासक की शक्ति समाप्त कर दी और इस प्रकार मगध का प्रभाव मध्य प्रदेश, मालवा तथा उत्तर के अन्य क्षेत्रों तक बढ़ा।

4. महापद्मनन्द और नन्द साम्राज्य

ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के लगभग मध्य में महापद्मनन्द ने शिशुनाग वंश की सत्ता समाप्त कर नन्द वंश की स्थापना की।

महापद्मनन्द को निम्न कुल का बताया गया है। पुराणों में उसे अनेक क्षत्रिय राजवंशों का संहार करने वाला शक्तिशाली शासक बताया गया है।

नन्द शासक अत्यन्त धनी और शक्तिशाली थे। उनके पास विशाल सेना थी।

सैन्य शक्ति संख्या
पैदल सैनिक 2,00,000
घुड़सवार 20,000
रथ 2,000
हाथी 3,000

नन्दों की विशाल सेना और आर्थिक शक्ति ने मगध को अत्यन्त शक्तिशाली बना दिया। नन्दों को वस्तुतः भारत में बड़े साम्राज्य के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण शासक माना गया है।

मगध के उत्कर्ष का क्रम

शासक प्रमुख योगदान
बिम्बिसार वैवाहिक सम्बन्ध, नियमित सेना, राजधानी राजगृह, राज्य विस्तार
अजातशत्रु पाटलिग्राम में दुर्ग, लिच्छवियों से युद्ध और मगध का विस्तार
शिशुनाग अवन्ति की शक्ति समाप्त कर मगध का क्षेत्र बढ़ाया
महापद्मनन्द नन्द वंश की स्थापना और विशाल शक्तिशाली साम्राज्य का विकास
मगध साम्राज्य के उदय और विस्तार का क्रम
बिम्बिसार से महापद्मनन्द तक मगध साम्राज्य के विस्तार का प्रमुख क्रम

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

मगध साम्राज्य के उत्कर्ष में बिम्बिसार, अजातशत्रु, शिशुनाग और महापद्मनन्द की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बिम्बिसार ने वैवाहिक सम्बन्धों और नियमित सेना द्वारा राज्य की नींव मजबूत की। अजातशत्रु ने लिच्छवियों को पराजित कर साम्राज्य का विस्तार किया। शिशुनाग ने अवन्ति की शक्ति समाप्त की और महापद्मनन्द ने नन्द वंश स्थापित कर मगध को विशाल सैन्य शक्ति से सम्पन्न साम्राज्य बना दिया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मगध का प्रथम प्रभावशाली शासक बिम्बिसार था और मगध साम्राज्य की स्थापना का श्रेय उसे दिया जाता है।
  • बिम्बिसार लगभग 544 ईसा पूर्व राजगद्दी पर बैठा और हर्यक वंश का शासक था।
  • बिम्बिसार ने वैवाहिक सम्बन्धों के माध्यम से मगध की शक्ति बढ़ाई।
  • महाकोशलदेवी, चेल्लना और क्षेमा उसकी प्रमुख रानियाँ थीं।
  • बिम्बिसार ने स्थायी और नियमित सेना का संगठन किया।
  • मगध की प्रारम्भिक राजधानी गिरिव्रज थी; बाद में राजधानी राजगृह स्थानान्तरित की गई।
  • राजगृह पाँच पहाड़ियों से घिरा प्राकृतिक रूप से सुरक्षित स्थान था।
  • अजातशत्रु का शासनकाल लगभग 492–460 ईसा पूर्व माना गया है।
  • अजातशत्रु ने पाटलिग्राम में एक दुर्ग बनवाया।
  • अजातशत्रु ने लिच्छवियों से दीर्घ युद्ध किया और सुनीध तथा वस्सकार की सहायता से उनमें फूट डलवाई।
  • लिच्छवियों के विरुद्ध युद्ध की तैयारी लगभग सोलह वर्षों तक चली।
  • लगभग 413 ईसा पूर्व शिशुनाग को राजा बनाया गया।
  • शिशुनाग ने अवन्ति की शक्ति समाप्त कर मगध का विस्तार किया।
  • महापद्मनन्द ने शिशुनाग वंश का अन्त कर नन्द वंश की स्थापना की।
  • नन्द सेना में लगभग 2 लाख पैदल सैनिक, 20 हजार घुड़सवार, 2 हजार रथ और 3 हजार हाथी थे।
Topic 9 सिकन्दर का भारत पर आक्रमण

सिकन्दर का भारत पर आक्रमण

सिकन्दर का भारत पर आक्रमण

सिकन्दर मकदूनिया के राजा फिलिप का पुत्र था। वह बचपन से ही अत्यन्त महत्वाकांक्षी था और विश्व-विजय का स्वप्न देखता था। 336 ईसा पूर्व में उसके पिता की मृत्यु के बाद वह लगभग 20 वर्ष की आयु में मकदूनिया के सिंहासन पर बैठा।

सिंहासन प्राप्त करने के बाद उसने अपने विजय अभियान की शुरुआत की। उसने पहले यूनान के अनेक नगर-राज्यों को जीता, फिर मिस्र पर विजय प्राप्त की और इसके बाद पश्चिमी एशिया पर अधिकार स्थापित किया।

विजय क्रम को आगे बढ़ाते हुए उसने 327 ईसा पूर्व में काबुल घाटी को जीतने के बाद भारत पर आक्रमण की योजना बनाई। मार्च 326 ईसा पूर्व में उसने भारत में प्रवेश किया। सीमावर्ती क्षेत्रों के कुछ राज्यों को उसने बिना युद्ध के अधीन कर लिया, जबकि कुछ राज्यों को युद्ध में पराजित किया।

भारत में सिकन्दर के प्रमुख युद्ध एवं अभियान

1. अश्वक जाति से युद्ध

भारत में सिकन्दर का पहला प्रमुख संघर्ष अलिसांगो-कूनर घाटी में निवास करने वाली अश्वक जाति से हुआ।

सिकन्दर ने अश्वकों को पराजित कर बंदी बनाया और उनके स्वस्थ एवं सुन्दर बैलों को उनसे छीनकर मकदूनिया भेज दिया।

2. नीसा पर आक्रमण

नीसा राज्य पर अभिजात वर्ग का अधिकार था और वहाँ का शासक अकूफिस था।

अकूफिस छोटे से संघर्ष में पराजित हो गया। इसके बाद उसने सिकन्दर की अधीनता स्वीकार कर ली और लगभग 300 घोड़े उसे भेंट किए।

3. मस्सा पर आक्रमण

मस्सा गौरी नदी के पूर्व में स्थित था। यह पश्चिम, दक्षिण और पूर्व—तीनों दिशाओं से चट्टानों, पर्वत-मालाओं और नदियों द्वारा सुरक्षित था। यहाँ का दुर्ग भी अत्यन्त मजबूत था।

इस नगर का शासक अस्सकेनस अत्यन्त वीर और साहसी था। सिकन्दर को मस्सा पर अधिकार करने के लिए भयंकर युद्ध करना पड़ा।

युद्ध में अस्सकेनस की मृत्यु हो गई। इसके बाद यहाँ की स्त्रियों ने भी सिकन्दर से युद्ध करके अपनी वीरता और शौर्य का परिचय दिया, लेकिन अन्ततः सिकन्दर को विजय प्राप्त हुई।

4. आम्भी की अधीनता

तक्षशिला का शासक आम्भी था। उसने सिकन्दर से युद्ध करने के स्थान पर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।

आम्भी ने सिकन्दर के सम्मान में एक विशाल समारोह आयोजित किया, उसे बहुमूल्य उपहार दिए और उसके विजय अभियान में सक्रिय सहयोग प्रदान किया।

5. अभिसार की अधीनता

अभिसार राज्य झेलम और चिनाब नदियों के बीच स्थित था। अभिसार तथा अन्य छोटे राज्यों ने सिकन्दर के सामने हथियार डालकर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।

6. पोरस से युद्ध

सिकन्दर के भारतीय अभियान का सबसे महत्वपूर्ण संघर्ष पोरस के साथ हुआ। पोरस चिनाब और झेलम नदियों के मध्यवर्ती प्रदेश का शासक था।

पोरस अत्यन्त वीर शासक था। उसे पराजित करने के लिए सिकन्दर को अपनी पूरी शक्ति और बुद्धि का प्रयोग करना पड़ा।

पोरस की वीरता से सिकन्दर इतना प्रभावित हुआ कि उसने उसका जीता हुआ राज्य वापस कर दिया और बाद में उससे मित्रता स्थापित कर ली।

7. ग्लोगनिकाई पर आक्रमण

ग्लोगनिकाई चिनाब नदी के पश्चिम में स्थित एक गणराज्य था। पोरस से युद्ध के बाद सिकन्दर ने इस राज्य पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की।

8. कठोई से युद्ध

कठोई गणराज्य झेलम और चिनाब के बीच स्थित बताया गया है। कठोई जाति ने अत्यन्त साहस और वीरता से सिकन्दर का सामना किया।

उनके संघर्ष ने सिकन्दर को हार के निकट पहुँचा दिया, लेकिन वे अन्ततः विजय प्राप्त नहीं कर सके।

9. सौभूति

सौभूति झेलम नदी के तट पर स्थित एक राज्य था। सिकन्दर ने इस राज्य पर भी अपना अधिकार स्थापित किया।

10. सिकन्दर की सेना का विद्रोह

सौभूति पर विजय प्राप्त करने के बाद सिकन्दर जब व्यास नदी के तट पर पहुँचा तो उसकी सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया।

सिकन्दर ने अपने सैनिकों को आगे बढ़ने के लिए समझाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन जब सेना नहीं मानी तो उसे स्वदेश लौटने का निर्णय लेना पड़ा।

11. सेना ने आगे बढ़ने से क्यों मना किया?

उत्तर-पश्चिम भारत में यूनानियों का अभियान लगभग दो वर्ष तक चला था। लगातार युद्धों से सेना थक चुकी थी।

सैनिकों को यह सूचना भी मिल चुकी थी कि गंगा के तट पर एक शक्तिशाली और सुव्यवस्थित सेना सिकन्दर की प्रतीक्षा कर रही है।

उन्हें यह भी ज्ञात था कि मगध में नन्द वंश का शासन था और उसकी सैन्य शक्ति सिकन्दर की सेना से कहीं अधिक थी। इसलिए सैनिकों ने व्यास नदी से आगे बढ़ने से स्पष्ट रूप से मना कर दिया।

12. सिकन्दर की वापसी एवं मृत्यु

सैनिकों के विरोध के कारण सिकन्दर को लौटना पड़ा। उसने जिन अधिकांश राज्यों को जीता था, उन्हें उन स्थानीय शासकों को वापस कर दिया जिन्होंने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी।

अपने अधिकार वाले क्षेत्र को उसने तीन भागों में बाँटकर उन पर तीन यूनानी गवर्नर नियुक्त किए।

325 ईसा पूर्व में सिकन्दर की बेबीलोन में मृत्यु हो गई और विश्व-साम्राज्य स्थापित करने का उसका सपना अधूरा रह गया।

भारत पर सिकन्दर के आक्रमण का प्रभाव

सिकन्दर भारत में बहुत लम्बे समय तक नहीं रहा। उसके अभियान का प्रभाव सभी क्षेत्रों में समान नहीं था, फिर भी भारतीय राजनीति, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और समाज पर इसके कुछ महत्वपूर्ण प्रभाव दिखाई देते हैं।

1. राजनीतिक प्रभाव

उत्तर-पश्चिमी भारत में राजनीतिक एकता

सिकन्दर के अभियान ने उत्तर-पश्चिमी भारत की परस्पर संघर्षरत जनजातियों और राज्यों को पराजित करके इस क्षेत्र में राजनीतिक एकता के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

इससे आगे चलकर चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए इस क्षेत्र को अपने अधिकार में करना अपेक्षाकृत सरल हो गया।

चन्द्रगुप्त मौर्य के विस्तार में सहायता

सिकन्दर के प्रस्थान के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य ने उसके सेनापति सेल्यूकस निकेटर को पराजित करके अफगानिस्तान तक उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया।

इतिहास की तिथियाँ निर्धारित करने में सहायता

सिकन्दर के भारतीय अभियान से भारतीय इतिहास की घटनाओं को तिथिवार व्यवस्थित करने में सहायता मिली।

यूनानी राज्यों की स्थापना

सिकन्दर के अभियान के परिणामस्वरूप पश्चिमी पंजाब और सिंध क्षेत्र में यूनानी राज्यों की स्थापना हुई।

युद्ध-पद्धति की कमियों का ज्ञान

इस युद्ध के अनुभव से भारतीयों को अपनी युद्ध-पद्धति की कमजोरियों और कमियों का ज्ञान हुआ।

2. सांस्कृतिक प्रभाव

गांधार कला शैली

भारतीय एवं यूनानी कला के संपर्क और सम्मिश्रण से आगे चलकर गांधार कला शैली के विकास को प्रोत्साहन मिला।

भाषा एवं साहित्य

यूनानी साहित्य और भाषा के संपर्क से भारतीय भाषा एवं साहित्य पर भी प्रभाव पड़ा। पुस्तक, कलम, फलक और सुरंग जैसे शब्दों को इस प्रभाव से जोड़ा गया है।

ज्योतिष

ज्योतिष के क्षेत्र में रोमक और पौलिस जैसे सिद्धान्तों के लिए भारतीय ज्योतिषियों को यूनानियों का ऋणी माना गया है।

औषधि एवं चिकित्सा

भारतीय और यूनानी औषधि विज्ञान तथा चिकित्सा में अनेक समानताएँ दिखाई देती हैं। दोनों परम्पराओं ने परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित किया।

सिक्का निर्माण कला

भारतीयों ने यूनानियों से अधिक सुगठित और सुन्दर सोने तथा चाँदी के सिक्के बनाने की कला सीखी।

3. आर्थिक प्रभाव

नए व्यापारिक मार्गों का विकास

सिकन्दर के अभियान के बाद भारत और पश्चिमी देशों के बीच व्यापारिक संपर्क अधिक सुगम हुआ।

भारत, ईरान तथा पश्चिमी देशों के बीच एक जलमार्ग और तीन स्थलमार्ग विकसित हुए।

भारत और यूनान के व्यापारिक सम्बन्ध

भारत और यूनान के बीच व्यापारिक सम्बन्ध अधिक घनिष्ठ हुए। भारत से मसालों का निर्यात होने लगा और विदेशी वस्तुओं का आयात भी बढ़ा।

दीनार का प्रचलन

भारत में पहली बार दीनार नामक सोने के सिक्कों का प्रचलन आरम्भ हुआ, जिन्हें यूनानी मुद्रा से प्रभावित माना गया।

स्थलमार्गों का महत्व

काबुल और बलूचिस्तान की ओर से होकर जाने वाले स्थलमार्ग व्यापारिक दृष्टि से अधिक उपयोगी सिद्ध हुए।

4. सामाजिक प्रभाव

यूनानी लेखकों और यात्रियों के विवरणों से तत्कालीन उत्तरी तथा उत्तर-पश्चिमी भारत की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

इन विवरणों से भारतीय शिल्पकला के विकसित रूप, सक्रिय विदेशी व्यापार तथा देश की आर्थिक समृद्धि का पता चलता है।

सिकन्दर के अभियान से पश्चिमी जगत को भारतीय जीवन और विचारों को समझने में सहायता मिली। भारत और पश्चिम के बीच संपर्क बढ़ने से विचारों और व्यापार दोनों का विकास हुआ।

यूरोप के लोगों को भारतीय दर्शन और धर्म के विषय में जानकारी प्राप्त हुई और भारतीय तथा यूनानी संस्कृतियों के बीच परस्पर संपर्क बढ़ा।

सिकन्दर के आक्रमण का समग्र मूल्यांकन

कुछ विदेशी लेखकों ने सिकन्दर के भारतीय अभियान के प्रभाव को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना, जबकि कुछ विद्वानों ने इसकी उपलब्धियों को सीमित माना है।

सिकन्दर भारत में केवल लगभग 19 महीने रहा और उसके द्वारा निर्मित विशाल राजनीतिक व्यवस्था शीघ्र ही समाप्त हो गई। फिर भी भारत और यूनान के बीच राजनीतिक, व्यापारिक तथा सांस्कृतिक संपर्क बढ़ाने में उसके अभियान की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

सिकन्दर का भारत पर आक्रमण और उसके प्रमुख प्रभाव
सिकन्दर के भारत अभियान का क्रम, पोरस से युद्ध, व्यास नदी से वापसी तथा प्रमुख राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभाव

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

सिकन्दर ने 326 ईसा पूर्व भारत पर आक्रमण किया और उत्तर-पश्चिमी भारत के अनेक राज्यों को पराजित अथवा अधीन किया। पोरस से उसका सबसे महत्वपूर्ण युद्ध हुआ, जिसमें पोरस की वीरता से प्रभावित होकर सिकन्दर ने उसका राज्य वापस कर दिया। व्यास नदी पर सैनिकों के विद्रोह के कारण सिकन्दर को वापस लौटना पड़ा। उसका भारतीय अभियान अल्पकालिक था, फिर भी इससे भारत और यूनान के बीच राजनीतिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्क में वृद्धि हुई तथा भारतीय इतिहास की तिथियों को व्यवस्थित करने में सहायता मिली।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सिकन्दर मकदूनिया के राजा फिलिप का पुत्र था और 336 ईसा पूर्व में लगभग 20 वर्ष की आयु में राजा बना।
  • उसने यूनान, मिस्र और पश्चिमी एशिया पर विजय प्राप्त करने के बाद भारत की ओर प्रस्थान किया।
  • 327 ईसा पूर्व में काबुल घाटी जीतने के बाद उसने भारत पर आक्रमण की योजना बनाई।
  • सिकन्दर ने मार्च 326 ईसा पूर्व में भारत में प्रवेश किया।
  • अश्वक जाति सिकन्दर से संघर्ष करने वाली प्रारम्भिक भारतीय शक्तियों में थी।
  • नीसा के शासक अकूफिस ने पराजित होकर सिकन्दर की अधीनता स्वीकार की और लगभग 300 घोड़े भेंट किए।
  • मस्सा के शासक अस्सकेनस ने सिकन्दर का वीरतापूर्वक सामना किया।
  • तक्षशिला के शासक आम्भी ने सिकन्दर की अधीनता स्वीकार कर उसके अभियान में सहयोग किया।
  • सिकन्दर का सबसे महत्वपूर्ण भारतीय युद्ध पोरस के साथ हुआ।
  • पोरस की वीरता से प्रभावित होकर सिकन्दर ने उसका राज्य वापस कर उससे मित्रता कर ली।
  • सिकन्दर की सेना ने व्यास नदी पर आगे बढ़ने से इनकार कर दिया।
  • नन्दों की विशाल सेना की सूचना भी यूनानी सैनिकों के आगे न बढ़ने के प्रमुख कारणों में थी।
  • सिकन्दर ने अपने विजित क्षेत्र को तीन भागों में बाँटकर तीन यूनानी गवर्नर नियुक्त किए।
  • 325 ईसा पूर्व में बेबीलोन में सिकन्दर की मृत्यु हुई।
  • सिकन्दर के आक्रमण ने उत्तर-पश्चिम भारत में राजनीतिक एकता का मार्ग प्रशस्त किया।
  • इस अभियान के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करना सरल हुआ।
  • भारतीय और यूनानी कला के संपर्क से गांधार कला शैली के विकास को प्रोत्साहन मिला।
  • यूनानी संपर्क से भारतीय ज्योतिष, चिकित्सा और सिक्का निर्माण कला भी प्रभावित हुई।
  • भारत, ईरान और पश्चिमी देशों के बीच एक जलमार्ग तथा तीन स्थलमार्ग विकसित हुए।
  • भारत और यूनान के बीच व्यापारिक तथा सांस्कृतिक संपर्क बढ़ा।
  • सिकन्दर के आक्रमण की तिथि ने भारतीय इतिहास की घटनाओं को कालक्रम में व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण सहायता दी।
Topic 10 उपनिषदकाल एवं जैन धर्म

उपनिषदकाल एवं जैन धर्म

उपनिषदकाल की पृष्ठभूमि

ईसा पूर्व छठी शताब्दी केवल भारत ही नहीं, बल्कि संसार के अनेक भागों में वैचारिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण काल थी। इस समय पुराने धार्मिक आदर्शों और मान्यताओं के स्थान पर नए विचारों और मान्यताओं का विकास हुआ।

भारत में यह काल विशेष रूप से दार्शनिक चिंतन और सत्य की खोज का काल था। उपनिषदों में विकसित दार्शनिक विचारों ने धार्मिक और बौद्धिक जीवन को नई दिशा प्रदान की।

इसी समय मध्य गंगा घाटी में दो प्रमुख धार्मिक परम्पराओं—जैन धर्म और बौद्ध धर्म—का विकास हुआ। इन धर्मों ने वैदिक ब्राह्मण धर्म में विकसित अनेक जटिलताओं और कर्मकाण्डों का विरोध करते हुए सामाजिक एवं धार्मिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जैन धर्म का परिचय

जैन धर्म भारत की प्राचीन श्रमण परम्परा से विकसित धर्म और दर्शन है। जैन परम्परा के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ माने जाते हैं।

वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है। मनुस्मृति में लिच्छवि, नाथ और मल्ल आदि क्षत्रियों को व्रात्यों में गिना गया है। आर्यों के समय ऋषभनाथ और अरिष्टनेमि से सम्बन्धित जैन परम्परा का उल्लेख मिलता है।

महाभारत काल में जैन धर्म के प्रमुख तीर्थंकर नेमिनाथ थे। जैन परम्परा में उन्हें भगवान कृष्ण का चचेरा भाई माना गया है। नेमिनाथ जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर थे।

जैन शब्द का अर्थ

जैन शब्द उन व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है जो जिन के अनुयायी हैं। जिन शब्द संस्कृत की जि धातु से बना है, जिसका अर्थ है—जीतना।

जिस व्यक्ति ने अपने मन, वाणी और शरीर पर विजय प्राप्त कर ली, वह जिन कहलाता है। इस प्रकार जैन धर्म का अर्थ जिन भगवान के बताए मार्ग पर चलने वाला धर्म है।

संयमित जीवन, शुद्ध शाकाहारी भोजन और निर्मल वाणी को जैन अनुयायी के महत्वपूर्ण आचरणों में माना गया।

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर

जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर माने गए हैं। इनमें ऋषभनाथ प्रथम, पार्श्वनाथ 23वें तथा वर्धमान महावीर 24वें तीर्थंकर थे।

क्रम तीर्थंकर क्रम तीर्थंकर
1 ऋषभनाथ 13 विमलनाथ
2 अजितनाथ 14 अनन्तनाथ
3 सम्भवनाथ 15 धर्मनाथ
4 अभिनन्दननाथ 16 शांतिनाथ
5 सुमतिनाथ 17 कुन्थुनाथ
6 पद्मप्रभ 18 अरनाथ
7 सुपार्श्वनाथ 19 मल्लिनाथ
8 चन्द्रप्रभ 20 मुनिसुव्रतनाथ
9 पुष्पदन्त 21 नमिनाथ
10 शीतलनाथ 22 नेमिनाथ
11 श्रेयांसनाथ 23 पार्श्वनाथ
12 वासुपूज्य 24 वर्धमान महावीर

महावीर स्वामी एवं जैन धर्म

जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक माने जाते हैं। उनका जीवन त्याग और तपस्या से परिपूर्ण था।

उनका जन्म 599 ईसा पूर्व वैशाली गणतंत्र के कुण्डलपुर में हुआ। उनके पिता का नाम सिद्धार्थ और माता का नाम त्रिशला था। वे अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे।

उनका जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था। आगे चलकर वर्धमान ही महावीर स्वामी कहलाए। उन्हें वीर, अतिवीर और सन्मति भी कहा गया।

उनके बड़े भाई का नाम नन्दिवर्धन और बहन का नाम सुदर्शना था।

महावीर का विवाह

महावीर के विवाह के विषय में जैन धर्म की दोनों प्रमुख परम्पराओं में अलग-अलग मान्यताएँ मिलती हैं।

  • श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार वर्धमान का विवाह यशोदा से हुआ था और उनकी एक पुत्री थी।
  • दिगम्बर परम्परा के अनुसार वर्धमान ने विवाह नहीं किया और वे बाल ब्रह्मचारी थे।

वर्धमान के माता-पिता जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के अनुयायी थे।

गृहत्याग एवं श्रमण जीवन

लगभग 28 वर्ष की आयु में वर्धमान के माता-पिता का निधन हो गया। अपने ज्येष्ठ भ्राता नन्दिवर्धन के अनुरोध पर वे दो वर्ष तक घर पर रहे।

लगभग 30 वर्ष की आयु में उन्होंने श्रमण दीक्षा ग्रहण की और सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया।

उन्होंने लंबे समय तक ध्यान और आत्मसाधना की तथा पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया। अपने जीवनकाल में उन्होंने जैन धर्म की नींव को अत्यन्त मजबूत किया।

लगभग 72 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी ने देहत्याग किया।

जैन धर्म की प्रमुख शाखाएँ

जैन धर्म की दो प्रमुख शाखाएँ हैं—

  1. दिगम्बर
  2. श्वेताम्बर

1. दिगम्बर

दिगम्बर सम्प्रदाय के अनुयायी वस्त्र धारण नहीं करते। दिग का अर्थ दिशा है और दिशाओं को ही वस्त्र मानने के कारण उन्हें दिगम्बर कहा गया।

दिगम्बर शाखा की प्रमुख उपशाखाओं में—

  • मन्दिरमार्गी दिगम्बर
  • मूर्तिपूजक दिगम्बर
  • तेरापंथी

का उल्लेख मिलता है।

2. श्वेताम्बर

श्वेताम्बर सम्प्रदाय के मुनि सफेद वस्त्र धारण करते हैं।

इसकी प्रमुख उपशाखाएँ हैं—

  • मन्दिरमार्गी श्वेताम्बर
  • स्थानकवासी श्वेताम्बर

स्थानकवासी मूर्तियों की पूजा नहीं करते।

जैन धर्म की अन्य शाखाओं में तेरहपंथी, बीसपंथी, तारणपंथी और यापनीय आदि का भी उल्लेख मिलता है। विभिन्न शाखाओं में कुछ मतभेद होने के बावजूद भगवान महावीर, अहिंसा, संयम और अनेकान्तवाद या स्यादवाद में समान विश्वास मिलता है।

जैन धर्म का प्रचार-प्रसार

ईसा पूर्व पहली शताब्दी में कलिंग के राजा खारवेल ने जैन धर्म को स्वीकार किया।

ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में उत्तर भारत में मथुरा तथा दक्षिण भारत में मैसूर जैन धर्म के महत्वपूर्ण केन्द्र बने।

पाँचवीं से बारहवीं शताब्दी तक दक्षिण भारत के गंग, कदम्ब, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों ने जैन धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण सहयोग दिया।

ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास चालुक्य वंश के राजा सिद्धराज और उनके पुत्र कुमारपाल ने जैन धर्म को राजधर्म का स्थान दिया तथा गुजरात में इसके व्यापक प्रचार में सहायता की।

हिन्दी के व्यापक प्रचलन से पहले जैन लेखकों ने अपभ्रंश भाषा का प्रयोग किया। प्रसिद्ध जैन विद्वान हेमचन्द्र राजा कुमारपाल के दरबार में थे।

जैन मतावलम्बी सामान्यतः शान्तिप्रिय स्वभाव के थे। समय के साथ विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा धार्मिक केन्द्रों को क्षति पहुँचने के कारण जैन धर्म के अनेक केन्द्र प्रभावित हुए। भारत के अतिरिक्त पूर्वी अफ्रीका में भी जैन धर्म के अनुयायी मिलते हैं।

जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्त

1. अनीश्वरवादिता

जैन धर्म ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। सृष्टि को अनन्त और अनादि माना गया तथा उसके निर्माण में आकाश, काल, धर्म, जीव और अधर्म आदि द्रव्यों की भूमिका मानी गई।

2. आत्मवादिता एवं अनेकात्मवादिता

जैन धर्म आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करता है। आत्मा को स्वभाव से निर्विकार और सर्वदृष्टा माना गया है।

3. निवृत्ति की प्रधानता

जैन धर्म में सांसारिक दुःखों तथा तृष्णा से मुक्ति के लिए निवृत्ति को प्रमुख उपाय माना गया।

4. कर्म तथा पुनर्जन्म में विश्वास

जैन दर्शन में पुनर्जन्म को मनुष्य के कर्मों से सम्बन्धित माना गया है। व्यक्ति के कर्म ही उसके जन्म और मृत्यु के क्रम को प्रभावित करते हैं।

5. निर्वाण या कैवल्य

जैन धर्म में कैवल्य की प्राप्ति परम लक्ष्य माना गया। कर्म के बन्धन से मुक्ति प्राप्त कर निर्वाण तक पहुँचना मनुष्य का अंतिम आध्यात्मिक उद्देश्य है।

6. तप एवं व्रत

तृष्णा का नाश कठोर तप और व्रतों के पालन से करने पर बल दिया गया।

7. तीन गुणव्रत

जैन धर्म में तीन प्रमुख गुणव्रत बताए गए हैं—

  1. दिग्व्रत — प्रत्येक दिशा में निश्चित दूरी के आगे न जाना।
  2. अनर्थ दण्डव्रत — प्रयोजनहीन वस्तुओं और कार्यों का त्याग करना।
  3. देशव्रत — समय के अनुसार भ्रमण की सीमा कम करना।

8. चार शिक्षाव्रत

जैन धर्म में चार शिक्षाव्रत बताए गए हैं—

  1. अतिथि संविभाग — दान-दक्षिणा करना।
  2. सामायिक — पाप रहित चिन्तन करना।
  3. प्रोषधोपवास — सप्ताह में एक बार व्रत-उपवास करना।
  4. भोगोपभोग — भोजन की मात्रा निर्धारित करना।

9. तीर्थंकरों में विश्वास

जैन धर्म में तीर्थंकरों के प्रति अत्यन्त श्रद्धा और विश्वास रखा जाता है।

10. त्रिरत्न

जैन धर्म में कर्मफल से छुटकारा पाने और निर्वाण प्राप्त करने के लिए त्रिरत्न का पालन आवश्यक माना गया है।

त्रिरत्न अर्थ
सम्यक ज्ञान सत्य का सही ज्ञान प्राप्त करना
सम्यक दर्शन यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा रखना
सम्यक आचरण इन्द्रियों के वशीभूत न होकर सदाचारी जीवन जीना

11. पंच महाव्रत

जैन धर्म के पाँच महाव्रत हैं—

  1. सत्य
  2. अहिंसा
  3. अस्तेय
  4. अपरिग्रह
  5. ब्रह्मचर्य
सत्य

मनुष्य को मधुरता से सत्य बोलना चाहिए। क्रोध या भय की स्थिति में मौन रहना चाहिए और बिना विचार किए कुछ नहीं बोलना चाहिए।

अहिंसा

मन, कर्म और वचन से किसी प्राणी को दुःख नहीं पहुँचाना चाहिए। पशु, पक्षी और पेड़-पौधों को भी किसी प्रकार का कष्ट पहुँचाना अहिंसा के सिद्धान्त के विरुद्ध माना गया।

अस्तेय

किसी की वस्तु अथवा धन उसकी अनुमति के बिना नहीं लेना चाहिए। बिना अनुमति किसी के घर में प्रवेश करना या वहाँ रहना भी उचित नहीं माना गया।

अपरिग्रह

भौतिक वस्तुओं का त्याग करना तथा आवश्यकता से अधिक सम्पत्ति का संग्रह न करना अपरिग्रह कहलाता है।

ब्रह्मचर्य

भोग-विलास से दूर रहकर संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करना ब्रह्मचर्य है। जैन भिक्षुओं के लिए इसका पालन अत्यन्त कठोर रूप में निर्धारित किया गया।

12. जाति प्रथा एवं लिंग भेद का विरोध

जैन धर्म जाति-भेद को स्वीकार नहीं करता। महावीर स्वामी ने जाति प्रथा का विरोध किया और माना कि मनुष्य अपने कर्म के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र होता है, जन्म के आधार पर नहीं।

महावीर स्वामी ने लिंग भेद का भी विरोध किया। उनकी दृष्टि में स्त्री और पुरुष दोनों समान थे और दोनों को मोक्ष प्राप्त करने का अधिकार था।

13. वेदों में अविश्वास

जैन धर्मावलम्बी वेदों को ईश्वरीय ज्ञान नहीं मानते, बल्कि उन्हें मनुष्य द्वारा रचित मानते हैं।

14. यज्ञ, पशु-बलि एवं कर्मकाण्डों का विरोध

जैन धर्म अहिंसा को महत्वपूर्ण मानता है। इसलिए पशुबलि तथा हिंसा से सम्बन्धित यज्ञ और कर्मकाण्डों का विरोध किया गया।

15. पंच अणुव्रत

पंच महाव्रत अत्यन्त कठोर थे और मुख्य रूप से जैन भिक्षु एवं भिक्षुणियों के लिए अनिवार्य माने गए। गृहस्थों के लिए अपेक्षाकृत सरल पंच अणुव्रत निर्धारित किए गए—

  • अहिंसा
  • अमृषा
  • अस्तेय
  • अपरिग्रह
  • ब्रह्मचर्य

16. अठारह पाप

जैन धर्म में निम्न अठारह कर्मों को पाप की श्रेणी में रखा गया है—

  1. प्राणातिपात
  2. मृषावाद
  3. अदत्तादान
  4. मैथुन
  5. परिग्रह
  6. क्रोध
  7. मान
  8. माया
  9. लोभ
  10. राग
  11. द्वेष
  12. कलह
  13. अभ्याख्यान
  14. पैशुन्य
  15. परपरिवाद
  16. रति-अरति
  17. मायामृषा
  18. मिथ्यादर्शनशल्य

इन कर्मों से मनुष्य कर्म-बन्धन में फँसता है।

जैन धर्म के धर्मग्रंथ

जैन धर्म किसी एक मूल धर्मग्रंथ पर आधारित नहीं है। भगवान महावीर ने स्वयं किसी ग्रंथ की रचना नहीं की थी। उन्होंने अपने उपदेश प्रवचनों के रूप में दिए, जिन्हें बाद में उनके गणधरों और अनुयायियों ने संकलित किया।

इन उपदेशों का प्रारम्भिक संग्रह प्राकृत भाषाओं में हुआ। जैन साहित्य में मागधी और शौरसेनी प्राकृत का महत्वपूर्ण स्थान रहा।

दिगम्बर परम्परा से सम्बन्धित आचार्य गुणधर और आचार्य धरसेन के ग्रंथों में शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग मिलता है। आचार्य धरसेन का समय लगभग 87 ईस्वी माना गया है।

आचार्य गुणधर की कसाय पाहुड सुत्त तथा आचार्य धरसेन और उनके शिष्यों आचार्य पुष्पदन्त एवं आचार्य भूतबलि से सम्बन्धित षट्खण्डागम में भी शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग मिलता है।

आगम ग्रंथों का वर्गीकरण

आगम ग्रंथों को चार अनुयोगों में बाँटा गया—

  1. प्रथमानुयोग
  2. करणानुयोग
  3. चरणानुयोग
  4. द्रव्यानुयोग

बारह अंगग्रंथ

जैन परम्परा के बारह अंगग्रंथ हैं—

  1. आचार
  2. सूत्रकृत
  3. स्थान
  4. समवाय
  5. भगवती
  6. ज्ञाता धर्मकथा
  7. उपासकदशा
  8. अन्तकृतदशा
  9. अनुत्तर उपपातिकदशा
  10. प्रश्न-व्याकरण
  11. विपाक
  12. दृष्टिवाद

इनमें ग्यारह अंग उपलब्ध बताए गए हैं, जबकि बारहवाँ दृष्टिवाद अंग उपलब्ध नहीं है।

जैन धर्म की उन्नति एवं प्रसार के कारण

भारत में जैन धर्म के प्रचार और विस्तार के प्रमुख कारण निम्न थे—

  1. तत्कालीन राजाओं का समर्थन एवं संरक्षण जैन धर्म को प्राप्त हुआ।
  2. जैन धर्म के सिद्धान्त अपेक्षाकृत सरल थे।
  3. यह धर्म सामाजिक समानता के सिद्धान्त पर आधारित था।
  4. इसके सिद्धान्त सामान्य बोलचाल की भाषा में प्रस्तुत किए गए।
  5. ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर स्वामी ने जैन संघ की स्थापना की, जिसने धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इन कारणों से जैन धर्म का व्यापक प्रचार हुआ और इसके अनुयायियों की संख्या बढ़ी।

जैन धर्म के पतन के कारण

समय के साथ जैन धर्म की लोकप्रियता कम होने लगी। इसके पतन के प्रमुख कारण निम्न थे—

  1. महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद जैन भिक्षुओं ने धर्म प्रचार में पहले जैसी सक्रियता नहीं दिखाई।
  2. मोक्ष प्राप्ति के लिए कठोर तप, शारीरिक कष्ट और उपवास पर अत्यधिक बल दिया गया।
  3. स्यादवाद, अनेकान्तवाद, द्वैतवाद और तत्वज्ञान जैसे सिद्धान्त सामान्य जनता के लिए कठिन थे, जिससे धर्म मुख्यतः तपस्वियों तक सीमित होने लगा।
  4. ब्राह्मण जैन धर्म के प्रतिद्वन्द्वी बन गए और धार्मिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
  5. जैन मतावलम्बियों के आन्तरिक मतभेद से धर्म दिगम्बर और श्वेताम्बर दो प्रमुख सम्प्रदायों में विभाजित हो गया।
  6. जैन साहित्य प्रारम्भ में प्राकृत में था, लेकिन बाद में संस्कृत का प्रयोग बढ़ने से सामान्य जनता के लिए इसे समझना कठिन हुआ।
  7. अहिंसा के सिद्धान्त पर आवश्यकता से अधिक बल दिया गया।
  8. समय के साथ जैन धर्म में भी अनेक ऐसी जटिलताएँ उत्पन्न हुईं जिनके कारण इसकी लोकप्रियता कम हुई।
महावीर स्वामी, जैन धर्म की शाखाएँ, त्रिरत्न और पंच महाव्रत
महावीर स्वामी के जीवन, जैन धर्म की प्रमुख शाखाओं, त्रिरत्न और पंच महाव्रत का सरल पुनरावर्तन

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

जैन धर्म प्राचीन भारतीय श्रमण परम्परा का महत्वपूर्ण धर्म और दर्शन है। ऋषभनाथ इसके प्रथम तथा महावीर स्वामी 24वें तीर्थंकर थे। महावीर ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, कर्म, पुनर्जन्म और निर्वाण जैसे सिद्धान्तों को विशेष महत्व दिया। जैन धर्म ने जाति और लिंग भेद का विरोध किया तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक आचरण रूपी त्रिरत्न का मार्ग बताया। सरल भाषा, सामाजिक समानता, राजकीय संरक्षण और जैन संघ के प्रयासों से इसका व्यापक प्रसार हुआ, लेकिन बाद में कठोर साधना, जटिल सिद्धान्त, सम्प्रदायगत विभाजन और अन्य कारणों से इसकी लोकप्रियता कम होने लगी।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • ईसा पूर्व छठी शताब्दी भारत में धार्मिक एवं दार्शनिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण काल थी।
  • जैन धर्म भारत की प्राचीन श्रमण परम्परा से सम्बन्धित है।
  • ऋषभनाथ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर माने जाते हैं।
  • जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हैं; पार्श्वनाथ 23वें और महावीर 24वें तीर्थंकर थे।
  • महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व कुण्डलपुर में हुआ; उनके पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला थीं।
  • महावीर ने लगभग 30 वर्ष की आयु में श्रमण दीक्षा ग्रहण की और 72 वर्ष की आयु में देहत्याग किया।
  • जैन धर्म की दो प्रमुख शाखाएँ दिगम्बर और श्वेताम्बर हैं।
  • कलिंग के राजा खारवेल ने जैन धर्म को स्वीकार किया था।
  • मथुरा और मैसूर जैन धर्म के प्रमुख प्रारम्भिक केन्द्रों में थे।
  • जैन धर्म आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म और निर्वाण में विश्वास करता है, लेकिन ईश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में स्वीकार नहीं करता।
  • जैन धर्म के त्रिरत्न हैं—सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक आचरण।
  • पंच महाव्रत हैं—सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
  • जैन धर्म जाति प्रथा और लिंग भेद का विरोध करता है।
  • जैन धर्म पशुबलि और हिंसात्मक कर्मकाण्डों का विरोध करता है।
  • गृहस्थों के लिए पंच अणुव्रत निर्धारित किए गए।
  • महावीर ने स्वयं कोई धर्मग्रंथ नहीं लिखा; उनके उपदेशों को बाद में अनुयायियों ने संकलित किया।
  • जैन आगमों को प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग चार भागों में बाँटा गया।
  • जैन परम्परा में 12 अंगग्रंथ बताए गए हैं, जिनमें दृष्टिवाद उपलब्ध नहीं है।
  • राजकीय संरक्षण, सरल सिद्धान्त, सामाजिक समानता, लोकभाषा और जैन संघ इसके प्रसार के प्रमुख कारण थे।
  • कठोर तप, जटिल सिद्धान्त, सम्प्रदायगत विभाजन और प्रचार की कमी इसके पतन के प्रमुख कारण बने।

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Topic 11 जैन धर्म के सिद्धान्त, धर्मग्रंथ, प्रचार एवं पतन

जैन धर्म के सिद्धान्त, धर्मग्रंथ, प्रचार एवं पतन

जैन धर्म का प्रचार-प्रसार

जैन धर्म को विभिन्न कालों में अनेक शासकों का संरक्षण प्राप्त हुआ। ईसा पूर्व पहली शताब्दी में कलिंग के राजा खारवेल ने जैन धर्म को स्वीकार किया।

ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में उत्तर भारत में मथुरा और दक्षिण भारत में मैसूर जैन धर्म के महत्वपूर्ण केन्द्र थे।

पाँचवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच दक्षिण भारत के गंग, कदम्ब, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों ने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में विशेष सहयोग दिया। इन राजवंशों के संरक्षण में अनेक जैन कवियों और विद्वानों को आश्रय मिला।

ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास चालुक्य वंश के राजा सिद्धराज तथा उनके पुत्र कुमारपाल ने भी जैन धर्म को संरक्षण दिया और गुजरात में इसके व्यापक प्रचार में सहायता की।

हिन्दी के व्यापक प्रचलन से पहले जैन लेखकों और कवियों ने अपभ्रंश भाषा का प्रयोग किया। प्रसिद्ध जैन विद्वान हेमचन्द्र कुमारपाल के दरबार में थे।

जैन मतावलम्बी सामान्यतः शान्तिप्रिय स्वभाव के थे। विदेशी आक्रमणों के कारण जैन धर्म के अनेक धार्मिक केन्द्रों को क्षति पहुँची और धीरे-धीरे इसका प्रभाव कुछ क्षेत्रों में कम होने लगा।

जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्त

जैन धर्म के सिद्धान्त आत्मसंयम, अहिंसा, कर्म-बन्धन से मुक्ति और निर्वाण की प्राप्ति पर बल देते हैं। इसके प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं—

1. अनीश्वरवादिता

जैन धर्म ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखता। इसके अनुसार सृष्टि अनन्त और अनादि है। सृष्टि का निर्माण आकाश, काल, धर्म, जीव, अधर्म आदि द्रव्यों से माना गया है।

2. आत्मवादिता एवं अनेकात्मवादिता

जैन धर्म आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करता है। आत्मा को स्वभाव से निर्विकार और सर्वदृष्टा माना गया है।

3. निवृत्ति की प्रधानता

जैन धर्म में निवृत्ति को विशेष महत्व दिया गया है। सांसारिक दुःख और तृष्णा से छुटकारा पाने का प्रमुख उपाय संसार के प्रति आसक्ति कम करना माना गया।

4. कर्म तथा पुनर्जन्म में विश्वास

जैन धर्म में पुनर्जन्म का सिद्धान्त मनुष्य के कर्मों पर आधारित माना गया है। व्यक्ति के कर्मों के अनुसार ही उसका जन्म और मृत्यु निर्धारित होते हैं।

5. निर्वाण या कैवल्य

जैन धर्म में कैवल्य की प्राप्ति को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। कर्म के बन्धनों से मुक्ति प्राप्त कर निर्वाण तक पहुँचना आवश्यक माना गया।

6. तप एवं व्रत

जैन धर्म में तृष्णा के नाश के लिए कठोर तप और व्रतों के पालन पर बल दिया गया।

7. गुणव्रत

जैन धर्म में तीन प्रमुख गुणव्रत बताए गए हैं—

  1. दिग्व्रत — प्रत्येक दिशा में निश्चित दूरी से आगे न जाना।
  2. अनर्थ दण्डव्रत — प्रयोजनहीन वस्तुओं और कार्यों का त्याग करना।
  3. देशव्रत — समय के अनुसार भ्रमण की सीमा कम करना।

8. शिक्षाव्रत

जैन धर्म में चार शिक्षाव्रत बताए गए हैं—

  1. अतिथि संविभाग — दान-दक्षिणा करना।
  2. सामायिक — पाप रहित चिन्तन करना।
  3. प्रोषधोपवास — सप्ताह में एक बार व्रत-उपवास करना।
  4. भोगोपभोग — भोजन की मात्रा निर्धारित करना।

9. तीर्थंकरों में विश्वास

जैन धर्म में तीर्थंकरों के प्रति अत्यन्त श्रद्धा और विश्वास रखा जाता है।

10. त्रिरत्न

जैन धर्म में कर्मफल से छुटकारा पाने और निर्वाण प्राप्त करने के लिए त्रिरत्न का पालन आवश्यक माना गया है।

त्रिरत्न अर्थ
सम्यक ज्ञान सत्य एवं पूर्व ज्ञान का सही ज्ञान
सम्यक दर्शन यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा
सम्यक आचरण इन्द्रियों के वशीभूत न होकर सदाचारी जीवन व्यतीत करना

सम्यक ज्ञान का अर्थ सत्य को सही रूप में जानना है। सम्यक दर्शन यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा है और सम्यक आचरण का अर्थ इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखते हुए सत्य, अहिंसा और ब्रह्मचर्य जैसे आदर्शों के अनुसार जीवन व्यतीत करना है।

11. पंच महाव्रत

जैन धर्म के पाँच महाव्रत हैं—

  1. सत्य
  2. अहिंसा
  3. अस्तेय
  4. अपरिग्रह
  5. ब्रह्मचर्य
सत्य

मनुष्य को सदैव मधुरता के साथ सत्य बोलना चाहिए। क्रोध और भय की स्थिति में मौन रहना तथा बिना विचार किए कुछ न बोलना उचित माना गया।

अहिंसा

किसी के प्रति मन, कर्म और वचन से ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे उसे दुःख अथवा कष्ट पहुँचे। पशु, पक्षी और पेड़-पौधों को भी कष्ट पहुँचाना हिंसा माना गया।

अस्तेय

किसी व्यक्ति की वस्तु अथवा धन उसकी अनुमति के बिना नहीं लेना चाहिए। बिना अनुमति किसी के घर में प्रवेश करना या वहाँ रहना भी उचित नहीं माना गया।

अपरिग्रह

भौतिक वस्तुओं का त्याग करना और सम्पत्ति का अनावश्यक संग्रह न करना अपरिग्रह है।

ब्रह्मचर्य

भोग-विलास से दूर रहकर संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करना ब्रह्मचर्य है। जैन साधुओं के लिए इसका पालन अत्यन्त कठोर रूप में निर्धारित था।

12. जाति प्रथा एवं लिंग भेद का विरोध

जैन धर्म जाति प्रथा के भेद को स्वीकार नहीं करता। महावीर स्वामी ने जाति प्रथा का विरोध करते हुए माना कि मनुष्य अपने कर्म के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र होता है, जन्म के आधार पर नहीं।

महावीर स्वामी ने लिंग भेद का भी विरोध किया। उनकी दृष्टि में स्त्री और पुरुष समान थे तथा दोनों ही मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी थे। इसलिए स्त्रियों के लिए भी जैन धर्म का द्वार खुला था।

13. वेदों में अविश्वास

जैन धर्मावलम्बी वेदों को ईश्वरीय ज्ञान नहीं मानते। वे इन्हें मनुष्य द्वारा रचित ग्रंथ मानते हैं।

14. यज्ञ, पशु-बलि एवं कर्मकाण्डों में अविश्वास

जैन धर्म अहिंसा में विश्वास करता है। इसलिए पशुबलि और हिंसा से जुड़े यज्ञ एवं कर्मकाण्डों का विरोध किया गया।

15. पंच अणुव्रत

पंच महाव्रत अत्यन्त कठोर थे और उनका पालन मुख्य रूप से जैन भिक्षु एवं भिक्षुणियों के लिए अनिवार्य था। गृहस्थों के लिए महावीर स्वामी ने अपेक्षाकृत सरल पंच अणुव्रत बताए।

  • अहिंसा
  • अमृषा
  • अस्तेय
  • अपरिग्रह
  • ब्रह्मचर्य

16. अठारह पाप

जैन धर्म में निम्न अठारह कर्मों को पाप की श्रेणी में रखा गया है—

  1. प्राणातिपात पाप
  2. मृषावाद पाप
  3. अदत्तादान पाप
  4. मैथुन पाप
  5. परिग्रह पाप
  6. क्रोध पाप
  7. मान पाप
  8. माया पाप
  9. लोभ पाप
  10. राग पाप
  11. द्वेष पाप
  12. कलह पाप
  13. अभ्याख्यान पाप
  14. पैशुन्य पाप
  15. परपरिवाद पाप
  16. रति-अरति पाप
  17. मायामृषा पाप
  18. मिथ्यादर्शनशल्य पाप

इन पापों के कारण मनुष्य कर्म-बन्धन में फँसता है।

जैन धर्म के धर्मग्रंथ

जैन धर्म किसी एक धर्मग्रंथ पर आधारित धर्म नहीं है। भगवान महावीर ने स्वयं किसी ग्रंथ की रचना नहीं की। उन्होंने केवल प्रवचन दिए, जिन्हें बाद में उनके गणधरों ने अमृत वचनों के रूप में संकलित किया।

ये प्रवचन मूलतः प्राकृत भाषा में थे। जैन साहित्य में विशेष रूप से मागधी और शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग मिलता है।

दिगम्बर परम्परा के आचार्य गुणधर और धरसेन के ग्रंथों में शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग हुआ। आचार्य धरसेन का समय लगभग 87 ईस्वी माना गया है।

आचार्य गुणधर की रचना कसाय पाहुड सुत्त तथा आचार्य धरसेन के शिष्यों पुष्पदन्त और भूतबलि द्वारा रचित षट्खण्डागम में भी शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग मिलता है।

आगम ग्रंथों के चार अनुयोग

समस्त आगम ग्रंथों को चार भागों में बाँटा गया है—

  1. प्रथमानुयोग
  2. करणानुयोग
  3. चरणानुयोग
  4. द्रव्यानुयोग

बारह अंगग्रंथ

जैन धर्म में बारह अंगग्रंथ बताए गए हैं—

  1. आचार
  2. सूत्रकृत
  3. स्थान
  4. समवाय
  5. भगवती
  6. ज्ञाता धर्मकथा
  7. उपासकदशा
  8. अन्तकृतदशा
  9. अनुत्तर उपपातिकदशा
  10. प्रश्न-व्याकरण
  11. विपाक
  12. दृष्टिवाद

इनमें 11 अंग उपलब्ध बताए गए हैं, जबकि बारहवाँ दृष्टिवाद उपलब्ध नहीं है।

जैन धर्म की उन्नति एवं प्रसार के कारण

भारत में जैन धर्म के प्रचार और प्रसार के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे—

  1. तत्कालीन राजाओं का समर्थन और संरक्षण जैन धर्म को प्राप्त हुआ।
  2. जैन धर्म के सिद्धान्त अत्यन्त सरल थे।
  3. जैन धर्म सामाजिक समानता के सिद्धान्त पर आधारित था।
  4. इसके सिद्धान्त सामान्य बोलचाल की भाषा में लिखे गए थे।
  5. ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर स्वामी ने जैन संघ की स्थापना की और इस संघ ने धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इन कारणों से जैन धर्म का प्रचार बड़े उत्साह से हुआ और यह भारत के प्रमुख धर्मों में स्थान प्राप्त करने लगा।

जैन धर्म के पतन के कारण

समय के साथ जैन धर्म की लोकप्रियता कम होने लगी और यह पतन की ओर अग्रसर हुआ। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे—

  1. प्रचार की कमी — महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद जैन भिक्षुओं ने धर्म के प्रचार में पर्याप्त सक्रियता नहीं दिखाई।
  2. कठोर तप और उपवास — मोक्ष प्राप्ति के लिए कठोर तप, शारीरिक कष्ट तथा उपवास पर विशेष बल दिया गया।
  3. जटिल दार्शनिक सिद्धान्त — स्यादवाद, अनेकान्तवाद, द्वैतवाद और तत्वज्ञान जैसे सिद्धान्त सामान्य जनता के लिए समझना कठिन था। परिणामस्वरूप धर्म मुख्यतः तपस्वियों तक सीमित होने लगा।
  4. ब्राह्मणों का विरोध — ब्राह्मण जैन धर्म के प्रतिद्वन्द्वी बन गए। इस धार्मिक प्रतिस्पर्धा में जैन धर्म अपनी लोकप्रियता बनाए नहीं रख सका।
  5. सम्प्रदायगत विभाजन — जैन मतावलम्बियों में आन्तरिक मतभेद होने के कारण धर्म दो प्रमुख सम्प्रदायों—दिगम्बर और श्वेताम्बर—में विभाजित हो गया।
  6. भाषा की कठिनाई — प्रारम्भ में जैन साहित्य प्राकृत भाषा में लिखा गया, परन्तु बाद में संस्कृत का प्रयोग बढ़ने से सामान्य जनता के लिए इसे समझना कठिन हो गया।
  7. अहिंसा पर अत्यधिक बल — जैन धर्म में अहिंसा पर आवश्यकता से अधिक बल दिया गया।
  8. दोषों का प्रवेश — समय के साथ जैन धर्म में भी अनेक दोष उत्पन्न हो गए, जिससे इसकी लोकप्रियता प्रभावित हुई।
जैन धर्म के त्रिरत्न, पंच महाव्रत और पंच अणुव्रत
जैन धर्म के त्रिरत्न, पंच महाव्रत और गृहस्थों के पंच अणुव्रत का सरल वर्गीकरण

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

जैन धर्म ने आत्मसंयम, अहिंसा, कर्म और पुनर्जन्म में विश्वास तथा निर्वाण की प्राप्ति को विशेष महत्व दिया। कर्म-बन्धन से मुक्ति के लिए सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक आचरण रूपी त्रिरत्न तथा सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य रूपी पंच महाव्रत बताए गए। राजकीय संरक्षण, सरल सिद्धान्त, सामाजिक समानता, लोकभाषा और जैन संघ के प्रयासों से इसका व्यापक प्रसार हुआ, परन्तु कठोर तप, जटिल सिद्धान्त, सम्प्रदायगत विभाजन तथा अन्य कारणों से बाद में इसकी लोकप्रियता घटने लगी।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जैन धर्म ईश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में स्वीकार नहीं करता और सृष्टि को अनन्त तथा अनादि मानता है।
  • जैन धर्म आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म और निर्वाण में विश्वास करता है।
  • जैन धर्म में कठोर तप और व्रत को तृष्णा के नाश का साधन माना गया।
  • तीन गुणव्रत हैं—दिग्व्रत, अनर्थ दण्डव्रत और देशव्रत।
  • चार शिक्षाव्रत हैं—अतिथि संविभाग, सामायिक, प्रोषधोपवास और भोगोपभोग।
  • त्रिरत्न हैं—सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक आचरण।
  • पंच महाव्रत हैं—सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
  • जैन धर्म जाति प्रथा और लिंग भेद का विरोध करता है।
  • जैन धर्म वेदों को ईश्वरीय ज्ञान नहीं मानता तथा पशुबलि और हिंसात्मक कर्मकाण्डों का विरोध करता है।
  • गृहस्थों के लिए पंच अणुव्रत बताए गए—अहिंसा, अमृषा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
  • जैन धर्म में 18 पापों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें कर्म-बन्धन का कारण माना गया।
  • महावीर स्वामी ने स्वयं कोई धर्मग्रंथ नहीं लिखा; उनके प्रवचनों को बाद में अनुयायियों ने संकलित किया।
  • जैन साहित्य में प्राकृत, विशेष रूप से मागधी और शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग हुआ।
  • आगम ग्रंथ चार अनुयोगों—प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग—में बाँटे गए।
  • जैन धर्म में 12 अंगग्रंथ बताए गए हैं, जिनमें दृष्टिवाद उपलब्ध नहीं है।
  • राजकीय संरक्षण, सरल सिद्धान्त, सामाजिक समानता, बोलचाल की भाषा और जैन संघ जैन धर्म के प्रसार के प्रमुख कारण थे।
  • कठोर तप, जटिल सिद्धान्त, प्रचार की कमी, आन्तरिक मतभेद और भाषा की कठिनाई जैन धर्म के पतन के प्रमुख कारण बने।
Topic 12 बौद्ध धर्म: गौतम बुद्ध, शिक्षाएँ एवं सिद्धान्त

बौद्ध धर्म: गौतम बुद्ध, शिक्षाएँ एवं सिद्धान्त

बौद्ध धर्म का परिचय

बौद्ध धर्म भारत की प्राचीन श्रमण परम्परा से विकसित एक महत्वपूर्ण धर्म एवं दर्शन है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में इसका उदय हुआ और इसके संस्थापक गौतम बुद्ध थे।

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी में हुआ तथा उनका महापरिनिर्वाण 483 ईसा पूर्व कुशीनगर में हुआ। उनके महापरिनिर्वाण के बाद लगभग पाँच शताब्दियों में बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैल गया और आगे चलकर मध्य, पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के अनेक क्षेत्रों में भी पहुँचा।

बौद्ध धर्म के प्रमुख सम्प्रदायों में हीनयान अथवा थेरवाद, महायान और वज्रयान का उल्लेख मिलता है। विभिन्न सम्प्रदाय होने के बावजूद सभी गौतम बुद्ध की मूल शिक्षाओं को महत्वपूर्ण मानते हैं।

बोधिसत्व और बुद्ध

दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करने वाले व्यक्ति को बोधिसत्व कहा जाता है। बोधिसत्व जब दस बलों अथवा भूमियों—मुदिता, विमला, दीप्ति, अर्चिष्मती, सुदुर्जया, अभिमुखी, दूरंगमा, अचल, साधुमती और धर्ममेघ—को प्राप्त कर लेता है, तब वह बुद्ध कहलाता है।

बुद्ध बनना ही बोधिसत्व के जीवन की पराकाष्ठा मानी गई है। इस पहचान को बोधि अर्थात ज्ञान कहा गया।

गौतम बुद्ध का जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी में इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर हुआ। उनकी माता का नाम महामाया था, जो कोलिय वंश से थीं।

उनकी माता का निधन जन्म के सात दिन बाद हो गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने किया।

उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया। उनके जन्म के समय आठ ऋषियों को आमंत्रित किया गया और सभी ने दो सम्भावनाएँ व्यक्त कीं—

  • वे एक महान राजा बनेंगे।
  • वे एक साधु या परिव्राजक बनेंगे।

राजा शुद्धोधन चाहते थे कि सिद्धार्थ सांसारिक जीवन में रहें। शाक्यों की परम्परा के अनुसार बीस वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने शाक्य संघ की सदस्यता ग्रहण की और लगभग आठ वर्षों तक उसके सक्रिय एवं कर्तव्यनिष्ठ सदस्य रहे।

चार दृश्य और गृहत्याग

कपिलवस्तु की सैर के दौरान सिद्धार्थ ने चार ऐसे दृश्य देखे जिन्होंने उनके जीवन की दिशा बदल दी—

  1. एक वृद्ध व्यक्ति
  2. एक बीमार व्यक्ति
  3. एक शव
  4. एक संन्यासी

इन दृश्यों ने उन्हें जीवन, मृत्यु और दुःख के विषय में गम्भीर चिंतन के लिए प्रेरित किया।

सांसारिक समस्याओं से व्यथित होकर लगभग 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने घर त्याग दिया। बौद्ध साहित्य में इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा गया है।

ज्ञान की खोज

गृहत्याग के बाद सिद्धार्थ ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा प्राप्त की। आलारकलाम उनके प्रथम गुरु माने गए।

इसके बाद उन्होंने राजगीर में रुद्रकरामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की। उरुवेला में उन्हें कौण्डिन्य, वप्पा, भद्दिया, महानाम और अस्सजी नामक पाँच साधक मिले।

लगातार लगभग छह वर्ष की तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात्रि को निरंजना नदी के किनारे पीपल के वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ।

ज्ञान प्राप्त होने के बाद वे बुद्ध कहलाए और जिस स्थान पर उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ वह बोधगया कहलाया।

प्रथम उपदेश — धर्मचक्र प्रवर्तन

ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया। बौद्ध ग्रंथों में इसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा गया।

बुद्ध ने अपने उपदेश मुख्य रूप से कोशल, कौशाम्बी और वैशाली राज्यों में पालि भाषा में दिए। उन्होंने अपना अंतिम उपदेश कोशल देश की राजधानी श्रावस्ती में दिया।

गौतम बुद्ध के प्रमुख अनुयायी

गौतम बुद्ध के प्रमुख अनुयायी शासकों में निम्न नाम मिलते हैं—

  1. बिम्बिसार
  2. प्रसेनजित
  3. उदयन

महापरिनिर्वाण

लगभग 80 वर्ष की आयु में 483 ईसा पूर्व उत्तर प्रदेश के वर्तमान कुशीनगर के समीप गौतम बुद्ध का जीवन समाप्त हुआ। बौद्ध धर्म में इसे महापरिनिर्वाण कहा गया।

मल्लों ने बुद्ध का अन्त्येष्टि संस्कार अत्यन्त सम्मानपूर्वक किया। एक परम्परा के अनुसार उनके शरीर के अवशेष आठ भागों में बाँटे गए और उन पर आठ स्तूप बनवाए गए।

बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी है तथा इसमें आत्मा की स्थायी परिकल्पना स्वीकार नहीं की गई। इसमें पुनर्जन्म को माना गया है और तृष्णा के समाप्त होने की अवस्था को निर्वाण कहा गया।

बौद्ध धर्म के अनुयायी

बुद्ध के अनुयायी मुख्यतः दो वर्गों में बाँटे गए—

  1. भिक्षु — बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए संन्यास लेने वाले लोग।
  2. उपासक — गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए बौद्ध धर्म का पालन करने वाले लोग। इनकी न्यूनतम आयु 15 वर्ष बताई गई है।

बौद्ध धर्म के त्रिरत्न

बौद्ध धर्म के तीन त्रिरत्न हैं—

  1. बुद्ध
  2. धम्म
  3. संघ

धार्मिक जुलूसों की परम्परा का उल्लेख सबसे पहले बौद्ध धर्म के संदर्भ में मिलता है। बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र त्योहार वैशाख पूर्णिमा है, जिसे बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है।

बुद्ध से जुड़े प्रमुख स्थान

स्थान महत्व
लुम्बिनी जहाँ गौतम बुद्ध का जन्म हुआ।
बोधगया जहाँ बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ।
सारनाथ जहाँ से बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश देना प्रारम्भ किया।
कुशीनगर जहाँ बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ।
दीक्षाभूमि, नागपुर जहाँ भारत में बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान हुआ।

बुद्ध की प्रमुख शिक्षाएँ

महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध धर्म के अलग-अलग सम्प्रदाय विकसित हुए, परन्तु उनमें अनेक मूल सिद्धान्त समान रहे। गौतम बुद्ध ने अपने अनुयायियों को विशेष रूप से चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग और दशशील की शिक्षा दी।

चार आर्य सत्य

चार आर्य सत्य बौद्ध धर्म की मूल शिक्षाओं में अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं—

  1. दुःख — संसार दुःखमय है। जन्म, वृद्धावस्था, बीमारी, मृत्यु, प्रिय से वियोग, अप्रिय के साथ रहना तथा इच्छित वस्तु की प्राप्ति न होना दुःख के रूप हैं।
  2. दुःख का कारण — तृष्णा अथवा इच्छा दुःख का कारण है।
  3. दुःख का निरोध — तृष्णा से मुक्ति प्राप्त करके दुःख का अन्त किया जा सकता है।
  4. दुःख निरोध का मार्ग — तृष्णा से मुक्ति के लिए अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।

अष्टांगिक मार्ग

बौद्ध धर्म में अष्टांगिक मार्ग को दुःख के निरोध का मार्ग माना गया है। इसके आठ अंग हैं—

  1. सम्यक दृष्टि — मिथ्या दृष्टि का त्याग कर यथार्थ स्वरूप को समझना।
  2. सम्यक संकल्प — मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना।
  3. सम्यक वाक् — हानिकारक और असत्य वचन न बोलना।
  4. सम्यक कर्म — हानिकारक कर्मों से बचना।
  5. सम्यक जीविका — प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से हानिकारक व्यापार न करना।
  6. सम्यक प्रयास — स्वयं को सुधारने का प्रयास करना।
  7. सम्यक स्मृति — स्पष्ट ज्ञान और मानसिक योग्यता प्राप्त करने का प्रयास करना।
  8. सम्यक समाधि — चित्त की एकाग्रता एवं निर्वाण प्राप्त करना।

दशशील

गौतम बुद्ध ने अपने अनुयायियों को दस शीलों का पालन करने की शिक्षा दी—

  1. अहिंसा — प्राणी-हिंसा से दूर रहना।
  2. अस्तेय — चोरी न करना।
  3. अपरिग्रह — धन-संग्रह से दूर रहना।
  4. सत्य — झूठ बोलने से दूर रहना।
  5. सभी नशों से विरत रहना — मदिरा एवं नशीली वस्तुओं से बचना।
  6. ब्रह्मचर्य का पालन करना।
  7. नृत्य एवं संगीत का त्याग करना।
  8. सुगन्धित पदार्थों का त्याग करना।
  9. असमय भोजन का त्याग करना।
  10. कोमल शय्या का त्याग करना।

बौद्ध दर्शन एवं प्रमुख सिद्धान्त

1. प्रतीत्यसमुत्पाद

प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धान्त बताता है कि कोई भी घटना स्वतन्त्र रूप से नहीं होती, बल्कि दूसरी घटनाओं और कारणों पर निर्भर होती है। संसार को कारण और परिणाम की श्रृंखला के रूप में समझा गया है।

मनुष्य तृष्णा का त्याग करके, ज्ञान एवं ध्यान के माध्यम से इस कारण-परिणाम के चक्र से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

2. क्षणिकवाद

बौद्ध दर्शन में संसार की सभी वस्तुओं को क्षणिक और नश्वर माना गया है। संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है।

3. अनात्मवाद

बौद्ध दर्शन स्थायी आत्मा की धारणा को स्वीकार नहीं करता। शरीर और मन निरन्तर परिवर्तनशील हैं। जिस वस्तु को मनुष्य आत्मा समझता है, उसे चेतना का निरन्तर प्रवाह माना गया।

4. अनीश्वरवाद

बौद्ध धर्म में ईश्वर अथवा महाब्रह्मा को सृष्टि का निर्माता नहीं माना गया। संसार कारण-कार्य के नियम पर चलता है।

मनुष्य के दुःख और सुख के लिए उसके कर्मों को उत्तरदायी माना गया है।

5. शून्यवाद

शून्यता महायान बौद्ध सम्प्रदाय के महत्वपूर्ण दार्शनिक सिद्धान्तों में से एक है।

6. यथार्थवाद

बौद्ध धर्म को केवल निराशावादी दर्शन नहीं माना गया। बुद्ध ने दुःख को स्वीकार करने के साथ उसके कारण, उसके निरोध और उससे मुक्त होने का व्यावहारिक मार्ग भी बताया।

बुद्ध, धम्म और संघ बौद्ध धर्म के तीन त्रिरत्न हैं। भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक और उपासिका संघ के चार प्रमुख अंग माने गए।

7. कर्मवाद

बौद्ध धर्म में व्यक्ति के कर्मों को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया। यज्ञ, पूजा, बलिदान या स्मृति मात्र से कर्मफल समाप्त नहीं होता। जैसा कर्म किया जाता है, वैसा ही फल प्राप्त होता है।

8. पुनर्जन्म

बौद्ध दर्शन पुनर्जन्म में विश्वास रखता है, परन्तु इसे स्थायी आत्मा के पुनर्जन्म के रूप में नहीं समझता। पुनर्जन्म कार्य-कारण के नियम से प्रभावित होता है।

9. वेदों में अविश्वास

बौद्ध धर्म वेदों को सर्वोच्च प्रमाण नहीं मानता। मनुष्य को अपने अनुभव और ज्ञान के द्वारा आध्यात्मिक मार्ग खोजने पर बल दिया गया।

10. निर्वाण

बौद्ध दर्शन में निर्वाण वह अवस्था है जिसमें ज्ञान के प्रकाश द्वारा अज्ञान का अन्त हो जाता है। सत्कर्मों एवं उचित आचरण के माध्यम से निर्वाण की प्राप्ति की जा सकती है।

बौद्ध साहित्य

बौद्ध साहित्य का प्रमुख आधार त्रिपिटक है। त्रिपिटक का अर्थ है—तीन पिटारे अथवा तीन संग्रह। बुद्ध की मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने उनके उपदेशों को संकलित किया।

1. सुत्तपिटक

सुत्त का अर्थ धर्मोपदेश है। इसमें बुद्ध तथा बौद्ध धर्म के उपदेशों का संग्रह है। इसमें लगभग 10 हजार सूत्र वर्णित बताए गए हैं। इसका सम्बन्ध प्रथम बौद्ध संगीति से है।

2. विनयपिटक

विनयपिटक बौद्ध संघ की अनुशासन-पुस्तक है। इसमें बौद्ध भिक्षुओं के संघ एवं दिनचर्या से सम्बन्धित आचार-विचार और नियमों का वर्णन है।

3. अभिधम्मपिटक

अभिधम्मपिटक में बौद्ध धर्म के दर्शन और सिद्धान्तों का वर्णन है। इसका सम्बन्ध तृतीय बौद्ध संगीति से बताया गया है। इसके अन्तर्गत जातक कथाएँ भी आती हैं, जिनमें महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएँ वर्णित हैं।

इसके अतिरिक्त संस्कृत में लिखे महावस्तु, बुद्धचरित, महाविभाष शास्त्र और सौन्दरानन्द आदि भी बौद्ध साहित्य के प्रमुख ग्रंथ हैं।

बौद्ध संगीतियाँ

बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और व्याख्याओं को व्यवस्थित करने के लिए सभाओं का आयोजन किया गया, जिन्हें बौद्ध संगीति कहा जाता है। चार प्रमुख बौद्ध संगीतियों का विवरण निम्नलिखित है—

बौद्ध संगीति समय स्थान शासक अध्यक्ष
प्रथम 483 ईसा पूर्व राजगृह अजातशत्रु, हर्यक वंश महाकश्यप
द्वितीय 383 ईसा पूर्व वैशाली कालाशोक, शिशुनाग वंश सर्वकामी
तृतीय 251 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र अशोक, मौर्य वंश मोग्गलिपुत्त तिस्स
चतुर्थ प्रथम शताब्दी कुण्डलवन, कश्मीर कनिष्क, कुषाण वंश वसुमित्र तथा उपाध्यक्ष अश्वघोष

बौद्ध धर्म के प्रचार एवं प्रसार के कारण

1. बुद्ध का व्यक्तित्व

गौतम बुद्ध के व्यक्तित्व में सहनशीलता, क्षमा, दया, स्नेह और करुणा जैसे गुण थे। उनकी सरलता, प्रभावशाली व्यक्तित्व और तर्कपूर्ण उपदेशों ने राजा से लेकर सामान्य जनता तक को प्रभावित किया।

2. सिद्धान्तों की सरलता एवं व्यावहारिकता

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त सरल और व्यवहारिक थे। उन्होंने सामान्य जनता को कर्तव्यों का ज्ञान कराया तथा सरल और सुखमय जीवन जीने का मार्ग बताया।

3. सामाजिक समानता

बुद्ध ने जात-पात का विरोध किया तथा समानता, नैतिकता और स्वतंत्रता पर विशेष बल दिया। इससे विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोग बौद्ध धर्म से जुड़े।

4. बौद्ध धर्म का लचीलापन

ब्राह्मण धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म अधिक लचीला था और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन की सम्भावना रखता था। इसी कारण विदेशी भी इसकी ओर आकर्षित हुए।

5. लोकभाषा एवं सरल शैली

गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश सदैव लोकभाषा पालि में दिए। उनकी भाषा सरल और रोचक थी, इसलिए सामान्य जनता आसानी से उनके विचारों को समझ सकी।

6. मठों की स्थापना

बुद्ध ने बौद्ध धर्म के विस्तार के लिए मठों की स्थापना की। इनमें बौद्ध भिक्षु निवास करते और धर्म के प्रचार-प्रसार का कार्य करते थे। इससे भिक्षुओं में भ्रातृत्व की भावना विकसित हुई और धर्म का तीव्र प्रसार हुआ।

बौद्ध धर्म के पतन के कारण

भारत में छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर गुप्त शासकों के उत्थान तक बौद्ध धर्म ने निरन्तर उन्नति की, लेकिन आगे चलकर इसकी लोकप्रियता कम होने लगी।

  1. जटिलता एवं कट्टरता — समय के साथ बौद्ध धर्म में जटिलता और कट्टरता बढ़ी तथा इसका मूल सरल स्वरूप बदलने लगा।
  2. संघ और मठों में भ्रष्टाचार — अनेक स्थानों पर अनुयायी धर्म-प्रचार के स्थान पर पारस्परिक विवादों में उलझने लगे।
  3. हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान — शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट और रामानुज जैसे दार्शनिकों ने हिन्दू धर्म में सुधार किए, जिससे लोग पुनः उसकी ओर आकर्षित होने लगे।
  4. राजकीय संरक्षण की कमी — शुंग, कण्व और सातवाहन जैसे शासकों ने ब्राह्मण धर्म को संरक्षण दिया।
  5. विदेशी आक्रमण — विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा अनेक बौद्ध मठों और विहारों को नष्ट करने से बौद्ध धर्म को गम्भीर क्षति पहुँची।
  6. राजपूत शक्ति का उदय — सम्राट हर्ष के बाद राजपूत शक्तियों का उदय हुआ। राजपूत बौद्ध धर्म के अहिंसावादी सिद्धान्त के विरोधी थे, जिससे बौद्ध धर्म के पतन को गति मिली।
गौतम बुद्ध का जीवन, चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग
गौतम बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाएँ, चार आर्य सत्य तथा दुःख निरोध के अष्टांगिक मार्ग का सरल पुनरावर्तन

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

बौद्ध धर्म का उदय ईसा पूर्व छठी शताब्दी में गौतम बुद्ध के नेतृत्व में हुआ। बुद्ध ने जीवन में दुःख का कारण तृष्णा माना और उससे मुक्ति के लिए चार आर्य सत्य तथा अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया। अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, कर्म, क्षणिकता, अनात्मवाद और निर्वाण बौद्ध दर्शन के महत्वपूर्ण तत्व हैं। बुद्ध के सरल उपदेश, पालि भाषा, सामाजिक समानता तथा मठ और संघ व्यवस्था के कारण बौद्ध धर्म का व्यापक प्रसार हुआ। बाद में जटिलता, संघों में भ्रष्टाचार, राजकीय संरक्षण की कमी, हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान और विदेशी आक्रमणों के कारण भारत में इसका प्रभाव कम होने लगा।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध थे।
  • गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी में शाक्य कुल में हुआ।
  • उनके पिता शुद्धोधन और माता महामाया थीं; पालन-पोषण महाप्रजापति गौतमी ने किया।
  • 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने गृहत्याग किया, जिसे महाभिनिष्क्रमण कहा गया।
  • लगभग छह वर्ष की तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में बोधगया में उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।
  • बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दिया, जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा गया।
  • 483 ईसा पूर्व लगभग 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण हुआ।
  • बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं—बुद्ध, धम्म और संघ।
  • बुद्ध से जुड़े चार प्रमुख स्थान हैं—लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर।
  • चार आर्य सत्य हैं—दुःख, दुःख का कारण, दुःख का निरोध तथा दुःख निरोध का मार्ग।
  • दुःख का मूल कारण तृष्णा माना गया है।
  • दुःख से मुक्ति के लिए अष्टांगिक मार्ग बताया गया।
  • अष्टांगिक मार्ग में सम्यक दृष्टि, संकल्प, वाक्, कर्म, जीविका, प्रयास, स्मृति और समाधि सम्मिलित हैं।
  • बुद्ध ने अपने अनुयायियों को दशशील का पालन करने की शिक्षा दी।
  • बौद्ध दर्शन के प्रमुख सिद्धान्तों में प्रतीत्यसमुत्पाद, क्षणिकवाद, अनात्मवाद, अनीश्वरवाद, कर्मवाद, पुनर्जन्म और निर्वाण शामिल हैं।
  • बौद्ध साहित्य का प्रमुख आधार त्रिपिटक है—सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक।
  • प्रथम बौद्ध संगीति 483 ईसा पूर्व राजगृह में अजातशत्रु के शासनकाल में हुई और इसके अध्यक्ष महाकश्यप थे।
  • द्वितीय बौद्ध संगीति वैशाली, तृतीय पाटलिपुत्र तथा चतुर्थ कुण्डलवन कश्मीर में हुई।
  • सरल सिद्धान्त, सामाजिक समानता, पालि भाषा, बुद्ध का प्रभावशाली व्यक्तित्व और मठों की स्थापना बौद्ध धर्म के प्रसार के प्रमुख कारण थे।
  • जटिलता, संघों में भ्रष्टाचार, राजकीय संरक्षण की कमी, हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान और विदेशी आक्रमण इसके पतन के प्रमुख कारण बने।
Topic 13 बौद्ध दर्शन, साहित्य, संगीतियाँ, प्रसार एवं पतन

बौद्ध दर्शन, साहित्य, संगीतियाँ, प्रसार एवं पतन

बौद्ध दर्शन

गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के आधार पर बौद्ध दर्शन का विकास हुआ। इसमें संसार, दुःख, कर्म, पुनर्जन्म और निर्वाण को तार्किक एवं व्यावहारिक रूप में समझाने का प्रयास किया गया।

बौद्ध दर्शन के अनुसार संसार की घटनाएँ कारण और परिणाम से जुड़ी होती हैं। मनुष्य अपने कर्म, ज्ञान और आचरण के माध्यम से दुःख के चक्र से मुक्त होकर निर्वाण की ओर बढ़ सकता है।

1. प्रतीत्यसमुत्पाद

बौद्ध दर्शन का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रतीत्यसमुत्पाद है। इसके अनुसार संसार में कोई भी घटना अपने आप उत्पन्न नहीं होती, बल्कि उसके पीछे कोई न कोई कारण होता है।

इस प्रकार संसार कारण और परिणाम की एक परस्पर जुड़ी हुई श्रृंखला है। मनुष्य का वर्तमान जीवन भी उसके कर्मों और परिस्थितियों से प्रभावित होता है।

ज्ञान और ध्यान के द्वारा मनुष्य तृष्णा को नियंत्रित करके इस कारण-परिणाम के चक्र से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

2. क्षणिकवाद

बौद्ध दर्शन में संसार की सभी वस्तुओं को क्षणिक और नश्वर माना गया है। कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है और प्रत्येक वस्तु निरन्तर परिवर्तनशील है।

क्षणिकवाद का यह विचार स्थायित्व की धारणा का विरोध करता है।

3. अनात्मवाद

बौद्ध धर्म स्थायी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। इसके अनुसार शरीर और मन दोनों निरन्तर परिवर्तनशील हैं।

जिसे मनुष्य अपना स्थायी आत्म-स्वरूप समझता है, वह वास्तव में निरन्तर परिवर्तित होने वाली चेतना का प्रवाह है।

4. अनीश्वरवाद

बौद्ध धर्म में ईश्वर को संसार का निर्माता नहीं माना गया है। संसार की उत्पत्ति और परिवर्तन को कारण एवं परिणाम के नियम से समझाया गया।

मनुष्य के सुख-दुःख के लिए उसके कर्मों को उत्तरदायी माना गया है।

5. शून्यवाद

शून्यवाद महायान बौद्ध दर्शन का महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इसमें संसार की वस्तुओं के स्वतंत्र और स्थायी अस्तित्व की धारणा को स्वीकार नहीं किया गया।

6. यथार्थवाद

बौद्ध धर्म केवल संसार को दुःखमय बताकर निराशा उत्पन्न नहीं करता, बल्कि दुःख का कारण और उससे मुक्ति का व्यावहारिक मार्ग भी प्रस्तुत करता है।

बौद्ध धर्म के तीन त्रिरत्न बुद्ध, धम्म और संघ हैं।

बौद्ध समुदाय में चार प्रमुख वर्ग माने गए—

  • भिक्षु
  • भिक्षुणी
  • उपासक
  • उपासिका

7. कर्मवाद

बौद्ध दर्शन में कर्म को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसे उसी के अनुसार फल प्राप्त होता है।

केवल यज्ञ, पूजा अथवा बलिदान से कर्मों के फल से मुक्ति नहीं मिलती। अच्छे कर्म और उचित आचरण को जीवन की उन्नति के लिए आवश्यक माना गया।

8. पुनर्जन्म

बौद्ध धर्म पुनर्जन्म में विश्वास करता है, परन्तु इसे स्थायी आत्मा के एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश के रूप में नहीं समझता।

पुनर्जन्म को कारण और कर्म के नियम से जुड़ी प्रक्रिया माना गया है।

9. वेदों में अविश्वास

बौद्ध धर्म वेदों को सर्वोच्च या ईश्वरीय प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं करता। मनुष्य को अपने अनुभव, ज्ञान और आचरण के आधार पर आध्यात्मिक सत्य को समझने पर बल दिया गया।

10. निर्वाण

बौद्ध दर्शन में निर्वाण जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। जब ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान का नाश हो जाता है और तृष्णा समाप्त हो जाती है, तब मनुष्य निर्वाण की अवस्था प्राप्त करता है।

अच्छे कर्म, उचित आचरण और ज्ञान के द्वारा निर्वाण की प्राप्ति की जा सकती है।

बौद्ध साहित्य

बौद्ध साहित्य का प्रमुख आधार त्रिपिटक है। त्रिपिटक का अर्थ तीन पिटारे अथवा तीन संग्रह है। गौतम बुद्ध की मृत्यु के बाद उनके उपदेशों और बौद्ध संघ के नियमों को व्यवस्थित रूप में संकलित किया गया।

1. सुत्तपिटक

सुत्त का अर्थ धर्मोपदेश है। सुत्तपिटक में गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म के उपदेशों का संग्रह है।

इसमें लगभग 10 हजार सूत्र बताए गए हैं। इसका सम्बन्ध प्रथम बौद्ध संगीति से बताया गया है।

2. विनयपिटक

विनयपिटक बौद्ध संघ की अनुशासन सम्बन्धी पुस्तक है। इसमें भिक्षुओं के आचार-विचार, संघ व्यवस्था और दैनिक जीवन से सम्बन्धित नियमों का वर्णन मिलता है।

3. अभिधम्मपिटक

अभिधम्मपिटक में बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धान्तों और विचारों का वर्णन मिलता है।

इसका सम्बन्ध तृतीय बौद्ध संगीति से बताया गया है। इसके अन्तर्गत जातक कथाओं का भी उल्लेख मिलता है, जिनमें गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएँ वर्णित हैं।

त्रिपिटक एक नजर में

पिटक मुख्य विषय
सुत्तपिटक बुद्ध के धर्मोपदेश
विनयपिटक बौद्ध संघ एवं भिक्षुओं के नियम
अभिधम्मपिटक बौद्ध दर्शन एवं सिद्धान्त

अन्य प्रमुख बौद्ध ग्रंथ

त्रिपिटक के अतिरिक्त संस्कृत भाषा में भी अनेक महत्वपूर्ण बौद्ध ग्रंथों की रचना हुई। इनमें प्रमुख हैं—

  • महावस्तु
  • बुद्धचरित
  • महाविभाष शास्त्र
  • सौन्दरानन्द

बौद्ध संगीतियाँ

गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी शिक्षाओं को सुरक्षित रखने, उनका संकलन करने और बौद्ध धर्म से सम्बन्धित विभिन्न विषयों पर विचार करने के लिए समय-समय पर सभाएँ आयोजित की गईं। इन्हें बौद्ध संगीतियाँ कहा गया।

प्रथम बौद्ध संगीति

  • समय: 483 ईसा पूर्व
  • स्थान: राजगृह
  • शासक: अजातशत्रु, हर्यक वंश
  • अध्यक्ष: महाकश्यप

यह गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद आयोजित पहली प्रमुख बौद्ध संगीति थी।

द्वितीय बौद्ध संगीति

  • समय: 383 ईसा पूर्व
  • स्थान: वैशाली
  • शासक: कालाशोक, शिशुनाग वंश
  • अध्यक्ष: सर्वकामी

तृतीय बौद्ध संगीति

  • समय: 251 ईसा पूर्व
  • स्थान: पाटलिपुत्र
  • शासक: अशोक, मौर्य वंश
  • अध्यक्ष: मोग्गलिपुत्त तिस्स

अभिधम्मपिटक का सम्बन्ध इसी बौद्ध संगीति से बताया गया है।

चतुर्थ बौद्ध संगीति

  • समय: प्रथम शताब्दी
  • स्थान: कुण्डलवन, कश्मीर
  • शासक: कनिष्क, कुषाण वंश
  • अध्यक्ष: वसुमित्र
  • उपाध्यक्ष: अश्वघोष

चारों बौद्ध संगीतियाँ एक नजर में

संगीति समय स्थान शासक अध्यक्ष
प्रथम 483 ईसा पूर्व राजगृह अजातशत्रु महाकश्यप
द्वितीय 383 ईसा पूर्व वैशाली कालाशोक सर्वकामी
तृतीय 251 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र अशोक मोग्गलिपुत्त तिस्स
चतुर्थ प्रथम शताब्दी कुण्डलवन, कश्मीर कनिष्क वसुमित्र

बौद्ध धर्म के प्रचार एवं प्रसार के कारण

गौतम बुद्ध के जीवनकाल और उनके महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध धर्म का तेजी से विस्तार हुआ। इसके प्रचार-प्रसार के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे—

1. गौतम बुद्ध का प्रभावशाली व्यक्तित्व

गौतम बुद्ध में सहनशीलता, क्षमा, दया, स्नेह और करुणा जैसे गुण थे। उनका सरल और प्रभावशाली व्यक्तित्व सामान्य जनता से लेकर राजाओं तक को आकर्षित करता था।

2. सरल एवं व्यावहारिक सिद्धान्त

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त सरल तथा व्यावहारिक थे। बुद्ध ने लोगों को उनके कर्तव्यों का ज्ञान कराया और ऐसा मार्ग बताया जिसे सामान्य व्यक्ति भी अपने जीवन में अपना सकता था।

3. सामाजिक समानता

गौतम बुद्ध ने जाति-पाँति का विरोध किया और सामाजिक समानता, नैतिकता तथा स्वतंत्रता पर बल दिया। इससे समाज के विभिन्न वर्गों के लोग बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए।

4. धर्म का लचीला स्वरूप

बौद्ध धर्म तत्कालीन ब्राह्मण धर्म की अपेक्षा अधिक लचीला था। इसमें परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन की सम्भावना थी। इसलिए विदेशी लोगों ने भी इसे अपनाया।

5. पालि भाषा का प्रयोग

गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश सामान्य जनता की लोकभाषा पालि में दिए। उनकी भाषा सरल, स्पष्ट और रोचक थी, जिससे सामान्य लोग उनके विचारों को आसानी से समझ सके।

6. मठों की स्थापना

बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए मठों की स्थापना की गई। इन मठों में भिक्षु निवास करते और धर्म के प्रचार-प्रसार का कार्य करते थे।

मठों की व्यवस्था से भिक्षुओं में भ्रातृत्व की भावना विकसित हुई और बौद्ध धर्म के संगठित प्रचार को बल मिला।

बौद्ध धर्म के पतन के कारण

भारत में छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर गुप्त शासकों के उत्थान तक बौद्ध धर्म ने पर्याप्त उन्नति की। बाद में धीरे-धीरे इसका प्रभाव कम होने लगा।

1. जटिलता एवं कट्टरता

समय के साथ बौद्ध धर्म अपने प्रारम्भिक सरल स्वरूप से दूर होता गया। इसमें अनेक जटिलताएँ और कठोरताएँ उत्पन्न हो गईं, जिससे सामान्य जनता के लिए इसे समझना कठिन होने लगा।

2. संघों एवं मठों में भ्रष्टाचार

बौद्ध संघ और मठ प्रारम्भ में धर्म प्रचार के प्रमुख केन्द्र थे, लेकिन बाद में इनमें अनेक दोष उत्पन्न होने लगे। भिक्षु पारस्परिक विवादों में उलझने लगे, जिससे धर्म के प्रचार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

3. हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान

शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट और रामानुज जैसे विद्वानों और दार्शनिकों ने हिन्दू धर्म में सुधार और उसके प्रचार का कार्य किया। इससे अनेक लोग पुनः हिन्दू धर्म की ओर आकर्षित हुए।

4. राजकीय संरक्षण की कमी

समय के साथ बौद्ध धर्म को मिलने वाला राजकीय संरक्षण कम हो गया। शुंग, कण्व और सातवाहन जैसे शासकों ने ब्राह्मण धर्म को संरक्षण प्रदान किया।

5. विदेशी आक्रमण

विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा अनेक बौद्ध मठों और विहारों को नष्ट किया गया। इससे बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण केन्द्र समाप्त हुए और उसके प्रचार-प्रसार को भारी क्षति पहुँची।

6. राजपूत शक्ति का उदय

सम्राट हर्ष के बाद भारत में राजपूत शक्तियों का उदय हुआ। राजपूत योद्धा प्रवृत्ति के थे और बौद्ध धर्म के अहिंसावादी सिद्धान्त से सहमत नहीं थे। इसे भारत में बौद्ध धर्म के पतन के प्रमुख कारणों में माना गया।

बौद्ध त्रिपिटक और चार बौद्ध संगीतियाँ
त्रिपिटक के तीन भाग तथा प्रथम से चतुर्थ बौद्ध संगीति का परीक्षा उपयोगी क्रम

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

बौद्ध दर्शन में प्रतीत्यसमुत्पाद, क्षणिकवाद, अनात्मवाद, कर्मवाद, पुनर्जन्म और निर्वाण जैसे सिद्धान्तों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। बौद्ध साहित्य का प्रमुख आधार सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक रूपी त्रिपिटक है। बुद्ध की शिक्षाओं को सुरक्षित और व्यवस्थित करने के लिए चार प्रमुख बौद्ध संगीतियों का आयोजन किया गया। बुद्ध का प्रभावशाली व्यक्तित्व, सरल सिद्धान्त, सामाजिक समानता, पालि भाषा और मठ व्यवस्था बौद्ध धर्म के विस्तार के प्रमुख कारण बने, जबकि बाद में जटिलता, संघों में दोष, राजकीय संरक्षण की कमी, हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान और विदेशी आक्रमणों के कारण भारत में इसका प्रभाव कम होने लगा।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्रतीत्यसमुत्पाद के अनुसार प्रत्येक घटना किसी कारण पर निर्भर होती है।
  • क्षणिकवाद के अनुसार संसार की सभी वस्तुएँ नश्वर और परिवर्तनशील हैं।
  • बौद्ध धर्म स्थायी आत्मा की धारणा स्वीकार नहीं करता; इसे अनात्मवाद कहा जाता है।
  • बौद्ध धर्म ईश्वर को सृष्टिकर्ता नहीं मानता और कर्म को मनुष्य के सुख-दुःख का आधार मानता है।
  • शून्यवाद महायान बौद्ध दर्शन का प्रमुख सिद्धान्त है।
  • बौद्ध धर्म कर्म और पुनर्जन्म में विश्वास करता है तथा निर्वाण को सर्वोच्च लक्ष्य मानता है।
  • बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं—बुद्ध, धम्म और संघ।
  • बौद्ध साहित्य का प्रमुख आधार त्रिपिटक है।
  • त्रिपिटक के तीन भाग हैं—सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक।
  • सुत्तपिटक में बुद्ध के धर्मोपदेश, विनयपिटक में संघ के नियम और अभिधम्मपिटक में दर्शन एवं सिद्धान्तों का वर्णन है।
  • प्रथम बौद्ध संगीति 483 ईसा पूर्व राजगृह में अजातशत्रु के समय महाकश्यप की अध्यक्षता में हुई।
  • द्वितीय बौद्ध संगीति 383 ईसा पूर्व वैशाली में कालाशोक के समय सर्वकामी की अध्यक्षता में हुई।
  • तृतीय बौद्ध संगीति 251 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में अशोक के समय मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में हुई।
  • चतुर्थ बौद्ध संगीति प्रथम शताब्दी में कुण्डलवन, कश्मीर में कनिष्क के समय वसुमित्र की अध्यक्षता में हुई और अश्वघोष इसके उपाध्यक्ष थे।
  • बुद्ध का व्यक्तित्व, सरल सिद्धान्त, सामाजिक समानता, धर्म का लचीलापन, पालि भाषा और मठों की स्थापना बौद्ध धर्म के प्रसार के प्रमुख कारण थे।
  • धर्म में जटिलता, संघों में भ्रष्टाचार, हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान, राजकीय संरक्षण की कमी, विदेशी आक्रमण और राजपूत शक्ति का उदय इसके पतन के प्रमुख कारण थे।

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अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

गद्य और पद्य दोनों में रचित वेद है—

व्याख्या: यजुर्वेद में यज्ञ सम्बन्धी विधि-विधान का वर्णन गद्य और पद्य दोनों रूपों में मिलता है।
Q 2

भारत का राष्ट्रीय ध्येय वाक्य “सत्यमेव जयते” किस उपनिषद से लिया गया है—

व्याख्या: भारत का राष्ट्रीय ध्येय वाक्य “सत्यमेव जयते” मुण्डकोपनिषद से लिया गया है।
Q 3

महात्मा बुद्ध के गृहत्याग को बौद्ध ग्रंथों में क्या कहा जाता है—

व्याख्या: सिद्धार्थ ने लगभग 29 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया। इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है।
Q 4

स्यादवाद एवं अनेकान्तवाद किस धर्म के दर्शन का आधार है—

व्याख्या: स्यादवाद और अनेकान्तवाद जैन दर्शन के महत्वपूर्ण सिद्धान्त हैं।
Q 5

श्वेताम्बर और दिगम्बर नामक सम्प्रदाय किस धर्म से सम्बन्धित हैं—

व्याख्या: जैन धर्म की दो प्रमुख शाखाएँ दिगम्बर और श्वेताम्बर हैं।
Q 6

वैदिक ग्राम का मुखिया कहलाता था—

व्याख्या: वैदिक राजनीतिक व्यवस्था में ग्राम के मुखिया को ग्रामणी कहा जाता था।
Q 7

ऋग्वेद में “अयस्” शब्द का प्रयोग किस धातु के अर्थ में हुआ है—

व्याख्या: ऋग्वैदिक काल के सन्दर्भ में “अयस्” शब्द का प्रयोग ताँबे के अर्थ में बताया गया है।
Q 8

अभिधम्मपिटक का संकलन किस बौद्ध संगीति में हुआ—

व्याख्या: अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन एवं सिद्धान्तों का वर्णन है और इसका सम्बन्ध तृतीय बौद्ध संगीति से बताया गया है।
Q 9

“साम” का अर्थ है—

व्याख्या: “साम” का अर्थ गान अथवा गीत है। सामवेद के मंत्रों का यज्ञ के अवसर पर गायन किया जाता था।
Q 10

द्वितीय बौद्ध संगीति किस शासक के समय आयोजित हुई थी—

व्याख्या: द्वितीय बौद्ध संगीति 383 ईसा पूर्व वैशाली में शिशुनाग वंश के शासक कालाशोक के समय आयोजित हुई थी।
Q 11

सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण कब किया था—

व्याख्या: सिकन्दर ने मार्च 326 ईसा पूर्व भारत में प्रवेश किया और उत्तर-पश्चिमी भारत में अपना अभियान चलाया।
Q 12

सबसे प्राचीन वेद कौन-सा है—

व्याख्या: ऋग्वेद आर्यों का प्राचीनतम वैदिक ग्रंथ माना जाता है। इसमें देवताओं की स्तुतियों का संग्रह है।
Q 13

कोशल महाजनपद की राजधानी थी—

व्याख्या: कोशल महाजनपद की राजधानी श्रावस्ती थी। बुद्ध के समय प्रसेनजित यहाँ का प्रमुख शासक था।
Q 14

त्रिपिटक किस धर्म का साहित्य है—

व्याख्या: त्रिपिटक बौद्ध साहित्य का प्रमुख संग्रह है। इसके तीन भाग सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक हैं।
Q 15

साँची का स्तूप किस राज्य में स्थित है—

व्याख्या: प्रसिद्ध साँची स्तूप मध्य प्रदेश में स्थित है और यह बौद्ध स्थापत्य का महत्वपूर्ण स्मारक है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय सामाजिक अध्ययन के अध्याय वैदिक एवं उपनिषद काल से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य क्या हैं?

Q 2 2022

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त बताइए।

Q 3

मगध का अभ्युदय समझाइए।

Q 4

पूर्व वैदिक कालीन धार्मिक व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।

Q 5

वैदिक काल से आप क्या समझते हैं? आर्यों के मूल निवास स्थान के बारे में दिए गए सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।

Q 6

पूर्व वैदिक कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक दशा पर प्रकाश डालिए।

Q 7

पूर्व वैदिक कालीन शासन व्यवस्था एवं धार्मिक व्यवस्था पर निबन्ध लिखिए।

Q 8

उत्तर वैदिक कालीन सामाजिक तथा आर्थिक जीवन पर प्रकाश डालिए।

Q 9

उत्तर वैदिक कालीन धार्मिक जीवन का वर्णन कीजिए।

Q 10

आर्यों के वैदिक साहित्य का उल्लेख कीजिए।

Q 11

आर्यों का सामाजिक जीवन आदर्शमय था। इस कथन की विवेचना कीजिए।

Q 12

प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों के विषय में आप क्या जानते हैं? प्रत्येक का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

Q 13

मगध साम्राज्य का उल्लेख कीजिए। सिकन्दर के आक्रमण का वर्णन कीजिए।

Q 14

सिकन्दर कौन था? उसने भारत पर आक्रमण क्यों किया तथा उसके आक्रमण का भारत की राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ा? स्पष्ट कीजिए।

Q 15

जैन धर्म से आप क्या समझते हैं? जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।

Q 16

जैन धर्म की स्थापना किसने की? इस धर्म के उत्थान एवं पतन के कारण बताइए।

Q 17

बौद्ध धर्म के संस्थापक कौन थे? इस धर्म के उत्थान एवं पतन के कारण लिखिए।

Q 18 2016, 2019

सिकन्दर के आक्रमण का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा?

Q 19 2016

त्रिरत्न किसे कहते हैं?

Q 20

अष्टांगिक मार्ग से आप क्या समझते हैं?

Q 21 2019

त्रिरत्न और अष्टांगिक मार्ग क्या हैं? यह किससे सम्बन्धित हैं? लिखिए।

Q 22 2018

मानव का सम्पूर्ण जीवन किन चार आश्रमों में विभक्त था? प्रत्येक आश्रम की अवधि कितनी निश्चित थी? संक्षेप में लिखिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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