सौरमण्डल का परिचय एवं सूर्य
ब्रह्माण्ड का परिचय
मानव ने विश्व को एक क्रमबद्ध इकाई के रूप में समझने का प्रयास किया। इसी व्यवस्थित विश्व की संकल्पना को ब्रह्माण्ड कहा गया। अंग्रेजी में ब्रह्माण्ड को कॉसमॉस कहा जाता है, जिसका अर्थ सुव्यवस्था है।
ब्रह्माण्ड से सम्बन्धित अध्ययन को ब्रह्माण्ड विज्ञान कहा जाता है। इसके अन्तर्गत ब्रह्माण्ड तथा उसमें स्थित विभिन्न खगोलीय पिण्डों का अध्ययन किया जाता है।
खगोलीय पिण्ड
सूर्य, चन्द्रमा तथा रात के समय आकाश में दिखाई देने वाले तारों आदि को खगोलीय पिण्ड कहा जाता है। इन्हें आकाशीय पिण्ड भी कहा जाता है।
हमारी पृथ्वी भी एक खगोलीय पिण्ड है।
तारे क्या हैं?
कुछ खगोलीय पिण्ड आकार में बहुत बड़े और अत्यन्त गर्म होते हैं। ये मुख्यतः गैसों से बने होते हैं तथा अपनी ऊर्जा और प्रकाश स्वयं उत्पन्न करते हैं।
ऐसे खगोलीय पिण्डों को तारा कहा जाता है। सूर्य भी एक तारा है।
अन्य तारों की तुलना में सूर्य पृथ्वी के बहुत निकट है, इसलिए वह हमें अधिक बड़ा और चमकीला दिखाई देता है।
ग्रह क्या हैं?
खगोलीय पिण्डों का एक अन्य वर्ग ऐसा है जिनका अपना प्रकाश और ऊष्मा नहीं होती। वे तारों से प्राप्त प्रकाश को परावर्तित करके प्रकाशित दिखाई देते हैं। ऐसे खगोलीय पिण्डों को ग्रह कहा जाता है।
अंग्रेजी में ग्रह के लिए प्रयुक्त शब्द प्लैनेट यूनानी शब्द ‘प्लेनेटाई’ से बना है, जिसका अर्थ है—चारों ओर घूमने वाला।
पृथ्वी भी एक ग्रह है। यह सूर्य से ऊष्मा और प्रकाश प्राप्त करके प्रकाशित होती है।
तारा और ग्रह में मुख्य अन्तर
| आधार | तारा | ग्रह |
|---|---|---|
| प्रकाश एवं ऊष्मा | अपना प्रकाश और ऊष्मा स्वयं उत्पन्न करता है। | अपना प्रकाश नहीं होता; तारे के प्रकाश को परावर्तित करता है। |
| उदाहरण | सूर्य | पृथ्वी |
सौरमण्डल क्या है?
सूर्य, ग्रह, उपग्रह तथा अन्य खगोलीय पिण्ड जैसे क्षुद्र ग्रह, उल्कापिण्ड और धूमकेतु आदि मिलकर सौरमण्डल का निर्माण करते हैं।
सूर्य सौरमण्डल का मुखिया अथवा प्रधान है। सौरमण्डल में सूर्य तथा उसके चारों ओर घूमने वाले सभी खगोलीय पिण्ड गुरुत्वाकर्षण बल के कारण एक-दूसरे से सम्बद्ध रहते हैं।
सूर्य केन्द्रित सौरमण्डल
कॉपरनिकस ने सबसे पहले यह सिद्धान्त प्रस्तुत किया कि सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं।
सौरमण्डल के केन्द्र में सूर्य स्थित है और इसकी समस्त ऊर्जा का प्रमुख स्रोत भी सूर्य ही है।
सौरमण्डल में सूर्य आकार की दृष्टि से सबसे बड़ा पिण्ड है। सौरमण्डल के कुल द्रव्यमान का लगभग सम्पूर्ण भाग सूर्य में केन्द्रित है।
सौरमण्डल की बाहरी सीमा पर नेप्च्यून ग्रह स्थित बताया गया है।
सूर्य
सूर्य सौरमण्डल का प्रधान या मुखिया है और यह स्वयं एक तारा है। पृथ्वी सहित सभी ग्रह सूर्य से ऊर्जा और प्रकाश प्राप्त करते हैं।
सूर्य का आकार
सूर्य का व्यास लगभग 13 लाख 92 हजार किलोमीटर बताया गया है। यह पृथ्वी के व्यास का लगभग 110 गुना है।
सूर्य को पृथ्वी की तुलना में अत्यन्त विशाल बताया गया है और पृथ्वी को सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा का केवल बहुत छोटा भाग प्राप्त होता है।
पृथ्वी से सूर्य की दूरी
पृथ्वी से सूर्य की दूरी लगभग 14.9 लाख किलोमीटर बताई गई है।
सूर्य से निकलने वाले प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में लगभग 8 मिनट 18 सेकण्ड लगते हैं।
प्रकाशमण्डल
सूर्य की वह सतह जो पृथ्वी से दिखाई देती है, प्रकाशमण्डल कहलाती है।
सूर्य की सतह का तापमान लगभग 6000 डिग्री सेल्सियस बताया गया है।
परिमण्डल या कोरोना
सूर्य की ऊपरी सतह पर वलय अथवा रिंग के समान दिखाई देने वाली परत को परिमण्डल या कोरोना कहा जाता है। इसे सूर्य का मुकुट भी कहा जाता है।
यह सूर्य ग्रहण के समय अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
प्रकाश की गति
प्रकाश की गति लगभग 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकण्ड है। इसी अत्यधिक गति से सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचता है।
सूर्य की संरचना
सूर्य की संरचना में मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम गैसों का योगदान है। इन दोनों गैसों का संयुक्त भाग लगभग 98 प्रतिशत बताया गया है।
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
सूर्य, ग्रह, उपग्रह, क्षुद्र ग्रह, उल्कापिण्ड और धूमकेतु आदि मिलकर सौरमण्डल का निर्माण करते हैं। सूर्य इसका प्रधान तथा ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है और सभी ग्रह उसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं। सूर्य स्वयं प्रकाश और ऊष्मा उत्पन्न करने वाला तारा है। इसका व्यास लगभग 13 लाख 92 हजार किलोमीटर है तथा इसका दृश्य भाग प्रकाशमण्डल कहलाता है। सूर्य मुख्यतः हाइड्रोजन और हीलियम गैसों से बना है।
- क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित विश्व की संकल्पना को ब्रह्माण्ड कहा जाता है।
- ब्रह्माण्ड के अध्ययन को ब्रह्माण्ड विज्ञान कहते हैं।
- सूर्य, चन्द्रमा, तारे और पृथ्वी आदि खगोलीय पिण्ड हैं।
- जो खगोलीय पिण्ड अपना प्रकाश एवं ऊष्मा स्वयं उत्पन्न करते हैं, उन्हें तारे कहते हैं।
- सूर्य एक तारा है।
- ग्रहों का अपना प्रकाश नहीं होता; वे तारे के प्रकाश को परावर्तित करते हैं।
- पृथ्वी एक ग्रह है और सूर्य से ऊष्मा तथा प्रकाश प्राप्त करती है।
- सूर्य, ग्रह, उपग्रह, क्षुद्र ग्रह, उल्कापिण्ड और धूमकेतु आदि मिलकर सौरमण्डल का निर्माण करते हैं।
- कॉपरनिकस ने ग्रहों के सूर्य के चारों ओर घूमने का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।
- सूर्य सौरमण्डल का प्रधान तथा उसकी ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है।
- सौरमण्डल के केन्द्र में सूर्य तथा बाहरी सीमा पर नेप्च्यून स्थित बताया गया है।
- सूर्य का व्यास लगभग 13 लाख 92 हजार किलोमीटर है, जो पृथ्वी के व्यास का लगभग 110 गुना है।
- पृथ्वी से सूर्य की दूरी लगभग 14.9 लाख किलोमीटर बताई गई है।
- सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक लगभग 8 मिनट 18 सेकण्ड में पहुँचता है।
- सूर्य के पृथ्वी से दिखाई देने वाले भाग को प्रकाशमण्डल कहते हैं।
- सूर्य की सतह का तापमान लगभग 6000 डिग्री सेल्सियस है।
- सूर्य की ऊपरी रिंग जैसी परत परिमण्डल या कोरोना कहलाती है।
- प्रकाश की गति लगभग 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकण्ड है।
- सूर्य की संरचना का लगभग 98 प्रतिशत भाग हाइड्रोजन और हीलियम से बना बताया गया है।
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सौरमण्डल के पिण्ड एवं उनका वर्गीकरण
सौरमण्डल के पिण्डों का वर्गीकरण
अन्तर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने 24 अगस्त 2006 को सौरमण्डल में विद्यमान खगोलीय पिण्डों का नया वर्गीकरण प्रस्तुत किया।
इस वर्गीकरण में सौरमण्डल के पिण्डों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बाँटा गया—
- प्रधान ग्रह
- बौने ग्रह
- लघु सौरमण्डलीय पिण्ड
इसी निर्णय के बाद प्लूटो को ग्रहों की श्रेणी से बाहर कर दिया गया और उसे बौना ग्रह माना गया।
ग्रह की नई परिभाषा
अन्तर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ के अनुसार किसी खगोलीय पिण्ड को ग्रह कहलाने के लिए निम्न प्रमुख विशेषताएँ आवश्यक हैं—
- वह अपनी निश्चित कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करता हो।
- उसका आकार लगभग गोल हो।
- वह अन्य ग्रहों की कक्षा का अतिक्रमण न करता हो।
प्लूटो की कक्षा अन्य ग्रहों की तुलना में झुकी हुई है तथा वह अरुण की कक्षा का अतिक्रमण करता है। इसी आधार पर प्लूटो को ग्रहों के परिवार से बाहर कर बौने ग्रह की श्रेणी में रखा गया।
आठ प्रधान ग्रह
सूर्य से दूरी बढ़ने के क्रम में सौरमण्डल के आठ प्रधान ग्रह हैं—
- बुध
- शुक्र
- पृथ्वी
- मंगल
- बृहस्पति
- शनि
- अरुण
- वरुण
इन आठ ग्रहों को उनकी संरचना के आधार पर दो प्रमुख समूहों में समझा जा सकता है।
1. आन्तरिक या पार्थिव ग्रह
सूर्य के निकट स्थित पहले चार ग्रह—
- बुध
- शुक्र
- पृथ्वी
- मंगल
पार्थिव अथवा आन्तरिक ग्रहों की श्रेणी में रखे गए हैं।
2. बाहरी गैसीय ग्रह
इसके बाद स्थित चार विशाल ग्रह—
- बृहस्पति
- शनि
- अरुण
- वरुण
मुख्यतः गैसों से बने बाहरी ग्रहों की श्रेणी में रखे गए हैं।
आठ ग्रहों में बुध सूर्य के सबसे निकट तथा वरुण सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह है।
बौने ग्रह
अन्तर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ के नए वर्गीकरण में कुछ खगोलीय पिण्डों को बौने ग्रह की श्रेणी में रखा गया।
प्रमुख बौने ग्रह हैं—
- यम (प्लूटो)
- एरिस
- सेरस
- हॉमिया
- माकेमाके
प्लूटो को पहले सौरमण्डल का नौवाँ ग्रह माना जाता था, लेकिन नई परिभाषा के बाद इसे बौना ग्रह माना गया।
सेरस क्षुद्रग्रह पट्टी में स्थित है। इसके अतिरिक्त वरुण से दूर स्थित प्रमुख बौने ग्रहों में यम, हॉमिया, माकेमाके और एरिस का उल्लेख मिलता है।
लघु सौरमण्डलीय पिण्ड
प्रधान ग्रहों और बौने ग्रहों के अतिरिक्त सौरमण्डल में अनेक छोटे खगोलीय पिण्ड भी पाए जाते हैं। इन्हें लघु सौरमण्डलीय पिण्ड कहा गया है।
इनमें प्रमुख रूप से—
- ज्ञात प्राकृतिक उपग्रह
- क्षुद्र ग्रह
- धूमकेतु या पुच्छल तारे
- उल्काएँ
- विभिन्न छोटे खगोलीय पिण्ड
- ग्रहों के बीच विद्यमान धूल
आदि सम्मिलित हैं।
इस वर्गीकरण में लगभग 166 ज्ञात उपग्रहों का उल्लेख किया गया है।
प्राकृतिक उपग्रह
छह ग्रहों और तीन बौने ग्रहों की परिक्रमा प्राकृतिक उपग्रह करते हैं। इन्हें सामान्य रूप से पृथ्वी के प्राकृतिक उपग्रह चन्द्रमा के आधार पर ‘चन्द्रमा’ भी कहा जाता है।
बाहरी ग्रहों के छल्ले
प्रत्येक बाहरी ग्रह धूल तथा अन्य छोटे कणों से निर्मित छल्लों से घिरा हुआ है। ये छल्ले ग्रहों के चारों ओर स्थित रहते हैं।
तीनों श्रेणियाँ एक नजर में
| श्रेणी | प्रमुख उदाहरण | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| प्रधान ग्रह | बुध से वरुण तक आठ ग्रह | निश्चित कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करते हैं। |
| बौने ग्रह | यम, एरिस, सेरस, हॉमिया, माकेमाके | ग्रहों से अलग श्रेणी में रखे गए छोटे खगोलीय पिण्ड। |
| लघु सौरमण्डलीय पिण्ड | उपग्रह, क्षुद्र ग्रह, धूमकेतु, उल्काएँ आदि | सौरमण्डल में पाए जाने वाले अन्य छोटे खगोलीय पिण्ड। |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
24 अगस्त 2006 को अन्तर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने सौरमण्डल के पिण्डों का नया वर्गीकरण प्रस्तुत किया। इसके अनुसार सौरमण्डल के पिण्डों को प्रधान ग्रह, बौने ग्रह और लघु सौरमण्डलीय पिण्डों में बाँटा गया। बुध से वरुण तक आठ प्रधान ग्रह हैं, जबकि यम, एरिस, सेरस, हॉमिया और माकेमाके प्रमुख बौने ग्रह हैं। प्लूटो को इसी नई परिभाषा के आधार पर ग्रहों की श्रेणी से हटाकर बौना ग्रह घोषित किया गया।
- अन्तर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने 24 अगस्त 2006 को सौरमण्डल के पिण्डों का नया वर्गीकरण प्रस्तुत किया।
- सौरमण्डल के पिण्डों को तीन प्रमुख श्रेणियों—प्रधान ग्रह, बौने ग्रह और लघु सौरमण्डलीय पिण्ड—में बाँटा गया।
- ग्रह सूर्य की निश्चित कक्षा में परिक्रमा करता है, लगभग गोल होता है और अन्य ग्रहों की कक्षा का अतिक्रमण नहीं करता।
- 2006 में प्लूटो को ग्रहों की श्रेणी से हटाकर बौना ग्रह घोषित किया गया।
- सूर्य से बढ़ती दूरी के क्रम में आठ ग्रह हैं—बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण।
- बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल चार पार्थिव अथवा आन्तरिक ग्रह हैं।
- बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण चार विशाल बाहरी गैसीय ग्रह हैं।
- बुध सूर्य के सबसे निकट तथा वरुण सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह है।
- प्रमुख बौने ग्रह हैं—यम, एरिस, सेरस, हॉमिया और माकेमाके।
- सेरस क्षुद्रग्रह पट्टी में स्थित बौना ग्रह है।
- यम, हॉमिया, माकेमाके और एरिस वरुण से दूर स्थित बौने ग्रह बताए गए हैं।
- लघु सौरमण्डलीय पिण्डों में उपग्रह, क्षुद्र ग्रह, धूमकेतु, उल्काएँ तथा अन्य छोटे खगोलीय पिण्ड सम्मिलित हैं।
- लगभग 166 ज्ञात प्राकृतिक उपग्रहों का उल्लेख किया गया है।
- छह ग्रहों और तीन बौने ग्रहों की परिक्रमा प्राकृतिक उपग्रह करते हैं।
- बाहरी ग्रह धूल और अन्य कणों से निर्मित छल्लों से घिरे होते हैं।
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बुध एवं शुक्र ग्रह
बुध और शुक्र सूर्य के सबसे निकट स्थित दो ग्रह हैं। दोनों पृथ्वी की कक्षा के भीतर सूर्य की परिक्रमा करते हैं, इसलिए इन्हें आन्तरिक ग्रह कहा जाता है। दोनों को कुछ विशेष परिस्थितियों में सूर्योदय से पहले अथवा सूर्यास्त के बाद आकाश में देखा जा सकता है।
1. बुध ग्रह
बुध सूर्य के सबसे निकट स्थित ग्रह है। सूर्य के अत्यधिक निकट होने के कारण इस ग्रह पर दैनिक तापान्तर बहुत अधिक पाया जाता है।
बुध सौरमण्डल का सबसे छोटा ग्रह है। इसका व्यास लगभग 4880 किलोमीटर है।
बुध का गुरुत्वाकर्षण
बुध की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की लगभग एक-चौथाई है।
बुध का कोई उपग्रह नहीं
बुध ग्रह का कोई प्राकृतिक उपग्रह नहीं है।
सौरमण्डल के दो प्राकृतिक उपग्रह—बृहस्पति का गेनीमीड और शनि का टाइटन—व्यास में बुध से बड़े हैं, लेकिन उनका द्रव्यमान बुध की तुलना में लगभग आधा है।
बुध की घूर्णन एवं परिक्रमण अवधि
| विशेषता | बुध |
|---|---|
| भूमध्यरेखीय व्यास | लगभग 4,878 कि.मी. |
| अपने अक्ष पर घूर्णन | लगभग 58.6 दिन |
| सूर्य की परिक्रमा | लगभग 88 दिन |
अर्थात बुध सूर्य की एक परिक्रमा लगभग 88 दिनों में पूरी करता है।
बुध को कब देखा जा सकता है?
बुध को सामान्यतः नंगी आँखों से सूर्यास्त के बाद अथवा सूर्योदय से ठीक पहले देखा जा सकता है।
सूर्य के अत्यधिक समीप होने के कारण आकाश में इसे देखना अपेक्षाकृत कठिन होता है।
प्रातः एवं सायं का तारा
शुक्र के अतिरिक्त बुध को भी प्रातः एवं सायं का तारा कहा जाता है, क्योंकि ये दोनों ग्रह सूर्य और पृथ्वी के मध्य स्थित आन्तरिक ग्रह हैं और सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के आसपास दिखाई देते हैं।
2. शुक्र ग्रह
शुक्र सूर्य से दूरी के क्रम में दूसरा ग्रह है। यह पृथ्वी के सबसे निकट स्थित ग्रह के रूप में बताया गया है।
आकार की दृष्टि से यह सौरमण्डल का छठा सबसे बड़ा ग्रह है।
शुक्र का कोई उपग्रह नहीं
शुक्र ग्रह का कोई प्राकृतिक उपग्रह अर्थात चन्द्रमा नहीं है। इस पर कोई चुम्बकीय क्षेत्र भी नहीं पाया जाता।
शुक्र की घूर्णन एवं परिक्रमण अवधि
| विशेषता | शुक्र |
|---|---|
| भूमध्यरेखीय व्यास | लगभग 12,102 कि.मी. |
| अपने अक्ष पर घूर्णन | लगभग 243 दिन |
| सूर्य की परिक्रमा | लगभग 224.7 दिन |
आकाश का अत्यन्त चमकीला ग्रह
शुक्र को नंगी आँखों से आसानी से देखा जा सकता है। यह आकाश में अत्यन्त चमकीला दिखाई देता है।
सूर्य और चन्द्रमा के बाद शुक्र को आकाश का सबसे अधिक चमकीला ग्रह अथवा पिण्ड बताया गया है।
भोर और शाम का तारा
शुक्र को भोर का तारा तथा शाम का तारा भी कहा जाता है।
- भोर के तारे का यूनानी नाम — इयोसफोरस
- शाम के तारे का यूनानी नाम — हेस्पेरस
प्राचीन यूनानी खगोलशास्त्रियों ने बाद में यह जाना कि भोर और शाम को दिखाई देने वाले ये दोनों चमकीले पिण्ड वास्तव में एक ही ग्रह—शुक्र—हैं।
शुक्र का उल्टा घूर्णन
शुक्र एक आन्तरिक ग्रह है और यह चन्द्रमा की तरह कलाएँ प्रदर्शित करता है।
इस ग्रह का घूर्णन सामान्य ग्रहों की दिशा के विपरीत, अर्थात घड़ी की सुई की दिशा में होता है। इसी कारण शुक्र पर सूर्य पश्चिम दिशा में उदय और पूर्व दिशा में अस्त होता दिखाई देता है।
पृथ्वी का बहन ग्रह
शुक्र आकार और कुछ अन्य विशेषताओं में पृथ्वी से मिलता-जुलता है। इसी कारण इसे पृथ्वी का “बहन ग्रह” भी कहा जाता है।
बुध और शुक्र में प्रमुख समानताएँ
- दोनों सूर्य के निकट स्थित आन्तरिक ग्रह हैं।
- दोनों का कोई प्राकृतिक उपग्रह नहीं है।
- दोनों सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के आसपास दिखाई दे सकते हैं।
- दोनों को प्रातः अथवा सायं के तारे के रूप में देखा जाता है।
बुध और शुक्र में प्रमुख अन्तर
| आधार | बुध | शुक्र |
|---|---|---|
| सूर्य से क्रम | पहला ग्रह | दूसरा ग्रह |
| आकार | सौरमण्डल का सबसे छोटा ग्रह | आकार में बुध से काफी बड़ा |
| सूर्य की परिक्रमा | लगभग 88 दिन | लगभग 224.7 दिन |
| अपने अक्ष पर घूर्णन | लगभग 58.6 दिन | लगभग 243 दिन |
| विशेष पहचान | सूर्य के सबसे निकट ग्रह | अत्यन्त चमकीला तथा पृथ्वी का बहन ग्रह |
| उपग्रह | कोई नहीं | कोई नहीं |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
बुध और शुक्र सूर्य के निकट स्थित आन्तरिक ग्रह हैं। बुध सूर्य का सबसे निकटवर्ती और सौरमण्डल का सबसे छोटा ग्रह है तथा लगभग 88 दिनों में सूर्य की परिक्रमा करता है। शुक्र सूर्य से दूसरा तथा पृथ्वी के सबसे निकट स्थित ग्रह है। यह अत्यन्त चमकीला दिखाई देता है, इसलिए इसे भोर और शाम का तारा कहा जाता है। शुक्र की घूर्णन दिशा सामान्य ग्रहों के विपरीत है और पृथ्वी से समानता के कारण इसे बहन ग्रह भी कहा जाता है। बुध और शुक्र दोनों का कोई प्राकृतिक उपग्रह नहीं है।
- बुध सूर्य के सबसे निकट स्थित ग्रह है।
- बुध सौरमण्डल का सबसे छोटा ग्रह है और इसका व्यास लगभग 4880 कि.मी. है।
- बुध की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी की लगभग एक-चौथाई है।
- बुध का कोई प्राकृतिक उपग्रह नहीं है।
- बुध लगभग 58.6 दिनों में अपने अक्ष पर घूमता और लगभग 88 दिनों में सूर्य की परिक्रमा करता है।
- बुध को सूर्यास्त के बाद अथवा सूर्योदय से पहले देखा जा सकता है।
- शुक्र सूर्य से दूसरा तथा पृथ्वी के सबसे निकट स्थित ग्रह है।
- शुक्र का व्यास लगभग 12,102 कि.मी. है।
- शुक्र लगभग 243 दिनों में अपने अक्ष पर घूमता और लगभग 224.7 दिनों में सूर्य की परिक्रमा करता है।
- शुक्र का कोई प्राकृतिक उपग्रह नहीं है।
- शुक्र पर चुम्बकीय क्षेत्र नहीं पाया जाता।
- सूर्य और चन्द्रमा के बाद शुक्र आकाश में अत्यन्त चमकीला दिखाई देता है।
- शुक्र को भोर का तारा और शाम का तारा कहा जाता है।
- शुक्र सामान्य ग्रहों के विपरीत घड़ी की सुई की दिशा में घूमता है।
- शुक्र पर सूर्य पश्चिम में उदय और पूर्व में अस्त होता दिखाई देता है।
- पृथ्वी से समानता के कारण शुक्र को “बहन ग्रह” कहा जाता है।
- बुध और शुक्र दोनों के कोई प्राकृतिक उपग्रह नहीं हैं।
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पृथ्वी एवं मंगल ग्रह
पृथ्वी और मंगल दोनों सौरमण्डल के आन्तरिक अथवा पार्थिव ग्रह हैं। सूर्य से दूरी के क्रम में पृथ्वी तीसरे और मंगल चौथे स्थान पर स्थित है। दोनों ग्रहों की अपनी विशिष्ट भौतिक विशेषताएँ हैं।
1. पृथ्वी
पृथ्वी आकार की दृष्टि से सौरमण्डल का पाँचवाँ सबसे बड़ा ग्रह है और सूर्य से दूरी के क्रम में तीसरा ग्रह है।
पृथ्वी सौरमण्डल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन पाया जाता है। इसकी आकृति त्रिविमीय बताई गई है।
पृथ्वी का आकार
पृथ्वी का भूमध्यरेखीय व्यास लगभग 12,756 किलोमीटर तथा ध्रुवीय व्यास लगभग 12,714 किलोमीटर है।
पृथ्वी का अक्षीय झुकाव
पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग 23½° झुकी हुई है।
पृथ्वी की घूर्णन एवं परिक्रमण अवधि
| विशेषता | पृथ्वी |
|---|---|
| भूमध्यरेखीय व्यास | लगभग 12,756 कि.मी. |
| अपने अक्ष पर घूर्णन | लगभग 23.9 घंटे |
| सूर्य की परिक्रमा | लगभग 365.26 दिन |
| सूर्य से दूरी | लगभग 14.9 करोड़ कि.मी. |
पृथ्वी — नीला ग्रह
पृथ्वी की सतह के लगभग 71 प्रतिशत भाग पर जल उपस्थित है। इसी कारण अन्तरिक्ष से देखने पर पृथ्वी नीली दिखाई देती है।
इसी विशेषता के कारण पृथ्वी को “नीला ग्रह” कहा जाता है।
पृथ्वी — हरित ग्रह
पृथ्वी पर मनुष्य, वनस्पतियों, पेड़-पौधों तथा अन्य जीव-जंतुओं के विकास और निवास के लिए अनुकूल वातावरण पाया जाता है।
वनस्पतियों और पेड़-पौधों की व्यापक उपलब्धता के कारण पृथ्वी को “हरित ग्रह” भी कहा जाता है।
पृथ्वी का उपग्रह
पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह चन्द्रमा है।
2. मंगल
मंगल सूर्य से दूरी के क्रम में चौथा ग्रह है तथा आकार की दृष्टि से सौरमण्डल का सातवाँ सबसे बड़ा ग्रह है।
मंगल ग्रह को नंगी आँखों से भी देखा जा सकता है।
मंगल — युद्ध का भगवान
मंगल ग्रह को “युद्ध का भगवान” भी कहा जाता है। इसका यह नाम इसकी रक्तिम अर्थात लाल आभा से सम्बन्धित बताया गया है।
मंगल — लाल ग्रह
पृथ्वी से देखने पर मंगल लाल दिखाई देता है। इसका लाल रंग मुख्यतः आयरन ऑक्साइड की अधिकता के कारण है।
इसी कारण मंगल को “लाल ग्रह” कहा जाता है।
मंगल की घूर्णन एवं परिक्रमण अवधि
| विशेषता | मंगल |
|---|---|
| भूमध्यरेखीय व्यास | लगभग 6,787 कि.मी. |
| अपने अक्ष पर घूर्णन | लगभग 24.6 घंटे |
| सूर्य की परिक्रमा | लगभग 387 दिन |
| सूर्य से दूरी | लगभग 22.8 करोड़ कि.मी. |
मंगल के उपग्रह
मंगल के दो प्राकृतिक उपग्रह हैं—
- फोबोस
- डीमोस
ओलिम्पस मॉन्स
मंगल ग्रह पर सौरमण्डल का सबसे ऊँचा पर्वत ओलिम्पस मॉन्स स्थित है।
ओलिम्पस मॉन्स एक ज्वालामुखी पर्वत है।
पृथ्वी और मंगल में प्रमुख अन्तर
| आधार | पृथ्वी | मंगल |
|---|---|---|
| सूर्य से क्रम | तीसरा ग्रह | चौथा ग्रह |
| आकार का क्रम | पाँचवाँ सबसे बड़ा ग्रह | सातवाँ सबसे बड़ा ग्रह |
| व्यास | लगभग 12,756 कि.मी. | लगभग 6,787 कि.मी. |
| घूर्णन अवधि | लगभग 23.9 घंटे | लगभग 24.6 घंटे |
| परिक्रमण अवधि | लगभग 365.26 दिन | लगभग 387 दिन |
| प्रमुख पहचान | नीला ग्रह एवं हरित ग्रह | लाल ग्रह |
| प्राकृतिक उपग्रह | चन्द्रमा | फोबोस और डीमोस |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
पृथ्वी सूर्य से तीसरा और मंगल चौथा ग्रह है। पृथ्वी सौरमण्डल का एकमात्र जीवनयुक्त ग्रह है तथा इसकी सतह पर लगभग 71 प्रतिशत जल होने के कारण इसे नीला ग्रह कहा जाता है। वनस्पतियों की व्यापक उपलब्धता के कारण इसे हरित ग्रह भी कहते हैं। मंगल अपने लाल रंग के कारण लाल ग्रह कहलाता है और इसके दो उपग्रह फोबोस तथा डीमोस हैं। मंगल पर स्थित ओलिम्पस मॉन्स सौरमण्डल का सबसे ऊँचा पर्वत है।
- पृथ्वी सूर्य से तीसरा तथा आकार में पाँचवाँ सबसे बड़ा ग्रह है।
- पृथ्वी सौरमण्डल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन पाया जाता है।
- पृथ्वी का भूमध्यरेखीय व्यास लगभग 12,756 कि.मी. और ध्रुवीय व्यास लगभग 12,714 कि.मी. है।
- पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग 23½° झुकी हुई है।
- पृथ्वी लगभग 23.9 घंटे में अपने अक्ष पर घूमती है।
- पृथ्वी लगभग 365.26 दिनों में सूर्य की परिक्रमा करती है।
- पृथ्वी की सूर्य से दूरी लगभग 14.9 करोड़ कि.मी. है।
- पृथ्वी की सतह के लगभग 71 प्रतिशत भाग पर जल है, इसलिए इसे नीला ग्रह कहा जाता है।
- वनस्पतियों और पेड़-पौधों की व्यापक उपलब्धता के कारण पृथ्वी को हरित ग्रह कहा जाता है।
- चन्द्रमा पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है।
- मंगल सूर्य से चौथा तथा आकार में सातवाँ सबसे बड़ा ग्रह है।
- मंगल का व्यास लगभग 6,787 कि.मी. है।
- मंगल लगभग 24.6 घंटे में अपने अक्ष पर घूमता और लगभग 387 दिनों में सूर्य की परिक्रमा करता है।
- मंगल की सूर्य से दूरी लगभग 22.8 करोड़ कि.मी. है।
- आयरन ऑक्साइड की अधिकता के कारण मंगल लाल दिखाई देता है और इसे लाल ग्रह कहा जाता है।
- मंगल को युद्ध का भगवान भी कहा जाता है।
- फोबोस और डीमोस मंगल के दो प्राकृतिक उपग्रह हैं।
- मंगल पर स्थित ओलिम्पस मॉन्स सौरमण्डल का सबसे ऊँचा पर्वत है और यह एक ज्वालामुखी पर्वत है।
बृहस्पति एवं शनि ग्रह
बृहस्पति और शनि सौरमण्डल के विशाल बाहरी ग्रह हैं। सूर्य से दूरी के क्रम में बृहस्पति पाँचवें और शनि छठे स्थान पर स्थित हैं। दोनों ग्रह मुख्यतः गैसों से बने हैं और आकार की दृष्टि से सौरमण्डल के दो सबसे बड़े ग्रह हैं।
1. बृहस्पति
बृहस्पति सौरमण्डल का सबसे बड़ा ग्रह है। अपने विशाल आकार के कारण इसे “देवताओं का स्वामी” भी कहा जाता है।
इस ग्रह का रंग पीला बताया गया है। बृहस्पति में अन्य ग्रहों की तुलना में सर्वाधिक हाइड्रोजन पाया जाता है।
बृहस्पति का आकार एवं गति
| विशेषता | बृहस्पति |
|---|---|
| भूमध्यरेखीय व्यास | लगभग 1,42,800 कि.मी. |
| अपने अक्ष पर घूर्णन | लगभग 9.9 घंटे |
| सूर्य की परिक्रमा | लगभग 11.9 वर्ष |
| सूर्य से दूरी | लगभग 77.8 करोड़ कि.मी. |
बृहस्पति की संरचना
बृहस्पति मुख्यतः हाइड्रोजन और हीलियम गैसों से मिलकर बना है। इसमें हाइड्रोजन की मात्रा विशेष रूप से अधिक है।
इसकी संरचना गैसीय है और बृहस्पति मिथेन गैस के रूप में भी विद्यमान बताया गया है।
बृहस्पति का विशाल द्रव्यमान
बृहस्पति का द्रव्यमान बहुत अधिक है। इसका द्रव्यमान शेष सभी ग्रहों के सम्मिलित द्रव्यमान से भी अधिक बताया गया है।
बृहस्पति के उपग्रह
बृहस्पति के कुल 28 प्राकृतिक उपग्रह ज्ञात बताए गए हैं।
2. शनि
शनि आकार की दृष्टि से बृहस्पति के बाद सौरमण्डल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है।
आकाश में यह पीले तारे के समान दिखाई देता है।
शनि का आकार एवं गति
| विशेषता | शनि |
|---|---|
| भूमध्यरेखीय व्यास | लगभग 1,20,500 कि.मी. |
| अपने अक्ष पर घूर्णन | लगभग 10.3 घंटे |
| सूर्य की परिक्रमा | लगभग 29.5 वर्ष |
| सूर्य से दूरी | लगभग 142.7 करोड़ कि.मी. |
शनि की गैसीय प्रकृति
शनि को गैसों का गोला भी कहा जाता है। इसका गुरुत्व पानी से भी कम बताया गया है।
शनि — सौर परिवार का सबसे चपटा ग्रह
शनि अपने अक्ष पर बहुत तेजी से घूमता है। अपने तीव्र घूर्णन के कारण यह सौर परिवार का सबसे चपटा ग्रह बताया गया है।
शनि के वलय
शनि ग्रह के चारों ओर तीन वलय बताए गए हैं। इन वलयों को नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता।
इन छल्लेनुमा वलयों की विशेषता के कारण शनि को “आकाशगंगा सदृश ग्रह” भी कहा जाता है।
शनि के उपग्रह
शनि के सर्वाधिक 30 उपग्रह बताए गए हैं।
इनमें टाइटन शनि का सबसे बड़ा उपग्रह है।
बृहस्पति और शनि की तुलना
| आधार | बृहस्पति | शनि |
|---|---|---|
| सूर्य से क्रम | पाँचवाँ ग्रह | छठा ग्रह |
| आकार | सौरमण्डल का सबसे बड़ा ग्रह | सौरमण्डल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह |
| भूमध्यरेखीय व्यास | लगभग 1,42,800 कि.मी. | लगभग 1,20,500 कि.मी. |
| घूर्णन अवधि | लगभग 9.9 घंटे | लगभग 10.3 घंटे |
| परिक्रमण अवधि | लगभग 11.9 वर्ष | लगभग 29.5 वर्ष |
| सूर्य से दूरी | लगभग 77.8 करोड़ कि.मी. | लगभग 142.7 करोड़ कि.मी. |
| प्रमुख पहचान | सबसे बड़ा ग्रह | वलयों वाला एवं सबसे चपटा ग्रह |
| प्राकृतिक उपग्रह | 28 ज्ञात | 30 बताए गए |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
बृहस्पति और शनि सौरमण्डल के दो सबसे बड़े बाहरी ग्रह हैं। बृहस्पति सौरमण्डल का सबसे बड़ा ग्रह है और मुख्यतः हाइड्रोजन तथा हीलियम गैसों से बना है। शनि आकार में दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है तथा अपने तीव्र घूर्णन और वलयों के कारण विशेष रूप से पहचाना जाता है। बृहस्पति के 28 प्राकृतिक उपग्रह ज्ञात बताए गए हैं, जबकि शनि के 30 उपग्रह बताए गए हैं और टाइटन उसका सबसे बड़ा उपग्रह है।
- बृहस्पति सूर्य से पाँचवाँ और सौरमण्डल का सबसे बड़ा ग्रह है।
- बृहस्पति को “देवताओं का स्वामी” भी कहा जाता है।
- बृहस्पति का रंग पीला बताया गया है।
- बृहस्पति का भूमध्यरेखीय व्यास लगभग 1,42,800 कि.मी. है।
- बृहस्पति लगभग 9.9 घंटे में अपने अक्ष पर घूमता और लगभग 11.9 वर्षों में सूर्य की परिक्रमा करता है।
- बृहस्पति की सूर्य से दूरी लगभग 77.8 करोड़ कि.मी. है।
- बृहस्पति मुख्यतः हाइड्रोजन और हीलियम गैसों से बना है तथा इसमें हाइड्रोजन की मात्रा सर्वाधिक बताई गई है।
- बृहस्पति का द्रव्यमान शेष सभी ग्रहों के सम्मिलित द्रव्यमान से भी अधिक बताया गया है।
- बृहस्पति के 28 प्राकृतिक उपग्रह ज्ञात बताए गए हैं।
- शनि सूर्य से छठा और आकार में सौरमण्डल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है।
- शनि का भूमध्यरेखीय व्यास लगभग 1,20,500 कि.मी. है।
- शनि लगभग 10.3 घंटे में अपने अक्ष पर घूमता और लगभग 29.5 वर्षों में सूर्य की परिक्रमा करता है।
- शनि की सूर्य से दूरी लगभग 142.7 करोड़ कि.मी. है।
- शनि को गैसों का गोला कहा जाता है और इसका गुरुत्व पानी से भी कम बताया गया है।
- तीव्र घूर्णन के कारण शनि सौर परिवार का सबसे चपटा ग्रह बताया गया है।
- शनि के चारों ओर तीन वलय बताए गए हैं, जिन्हें नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता।
- वलयों के कारण शनि को “आकाशगंगा सदृश ग्रह” कहा जाता है।
- शनि के 30 उपग्रह बताए गए हैं और टाइटन उसका सबसे बड़ा उपग्रह है।
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अरुण, वरुण एवं बौने ग्रह
अरुण और वरुण सौरमण्डल के बाहरी ग्रह हैं। सूर्य से दूरी के क्रम में अरुण सातवाँ तथा वरुण आठवाँ ग्रह है। इनके अतिरिक्त सौरमण्डल में कुछ छोटे खगोलीय पिण्डों को बौने ग्रहों की अलग श्रेणी में रखा गया है।
1. अरुण ग्रह
अरुण आकार की दृष्टि से सौरमण्डल का तीसरा सबसे बड़ा ग्रह है। सूर्य से दूरी के क्रम में यह सातवें स्थान पर स्थित है।
अरुण की खोज
अरुण ग्रह की खोज 1781 ई. में विलियम हर्शेल ने की थी।
अरुण का आकार एवं गति
| विशेषता | अरुण |
|---|---|
| भूमध्यरेखीय व्यास | लगभग 51,400 कि.मी. |
| अपने अक्ष पर घूर्णन | लगभग 16.2 घंटे |
| सूर्य की परिक्रमा | लगभग 84 वर्ष |
| सूर्य से दूरी | लगभग 286.9 करोड़ कि.मी. |
अरुण के वलय
अरुण ग्रह के चारों ओर नौ वलय बताए गए हैं।
इनमें पाँच प्रमुख वलयों के नाम हैं—
- अल्फा
- बीटा
- गामा
- डेल्टा
- एप्सिलॉन
अरुण का वायुमण्डल
अरुण ग्रह पर घना वायुमण्डल पाया जाता है। इसमें मुख्य रूप से हाइड्रोजन तथा अन्य गैसें विद्यमान हैं।
2. वरुण ग्रह
वरुण सौरमण्डल का आठवाँ ग्रह है और नई खगोलीय व्यवस्था में सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह बताया गया है।
वरुण की खोज
वरुण ग्रह की खोज 1846 ई. में जर्मन खगोलशास्त्री जॉन गले और अर्बेन ले वेरियर द्वारा की गई।
वरुण का आकार एवं सूर्य से दूरी
| विशेषता | वरुण |
|---|---|
| भूमध्यरेखीय व्यास | लगभग 48,600 कि.मी. |
| सूर्य से दूरी | लगभग 449.6 करोड़ कि.मी. |
वरुण की घूर्णन एवं परिक्रमण अवधि
वरुण के वर्णन में इसे लगभग 166 वर्षों में सूर्य की परिक्रमा करने तथा लगभग 12.7 घंटे में अपनी दैनिक गति पूरी करने वाला ग्रह बताया गया है।
अध्याय की ग्रह-सारणी में वरुण की घूर्णन अवधि 18.5 घंटे तथा परिक्रमण अवधि 164.8 वर्ष दी गई है। इसलिए परीक्षा में प्रश्न के स्वरूप अथवा दिए गए विकल्पों के अनुसार अध्याय में दिए तथ्य को पहचानना आवश्यक है।
अरुण और वरुण की तुलना
| आधार | अरुण | वरुण |
|---|---|---|
| सूर्य से क्रम | सातवाँ ग्रह | आठवाँ ग्रह |
| आकार | तीसरा सबसे बड़ा ग्रह | अरुण से छोटा |
| व्यास | लगभग 51,400 कि.मी. | लगभग 48,600 कि.मी. |
| सूर्य से दूरी | लगभग 286.9 करोड़ कि.मी. | लगभग 449.6 करोड़ कि.मी. |
| खोज | 1781 ई., विलियम हर्शेल | 1846 ई., जॉन गले और अर्बेन ले वेरियर |
बौने ग्रह
अन्तर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ के नए वर्गीकरण के बाद कुछ छोटे खगोलीय पिण्डों को बौने ग्रह की श्रेणी में रखा गया।
प्रमुख बौने ग्रह हैं—
- यम (प्लूटो)
- एरिस
- सेरस
- हॉमिया
- माकेमाके
प्लूटो को पहले सौरमण्डल का नौवाँ ग्रह माना जाता था, लेकिन नई परिभाषा के बाद इसे ग्रहों की श्रेणी से बाहर कर बौना ग्रह माना गया।
3. यम या प्लूटो
यम (प्लूटो) की खोज 1930 ई. में क्लाइड टॉम्बॉ ने की थी।
रोमन मिथकों में प्लूटो को पाताल का देवता माना गया है। सूर्य से अत्यधिक दूर होने के कारण इसे अँधेरे अथवा पाताल से जोड़ा गया।
प्लूटो नाम के प्रारम्भिक अक्षर PL को खगोलशास्त्री पर्सीवल लावेल के आद्याक्षरों से भी जोड़ा गया है।
4. सेरस
सेरस की खोज इटली के खगोलशास्त्री पियाजी ने की थी।
अन्तर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ की नई परिभाषा के अनुसार सेरस को बौने ग्रहों की श्रेणी में रखा गया है।
सेरस क्षुद्रग्रह पट्टी में स्थित है और इसे संख्या 1 से भी जाना जाता है।
अन्य प्रमुख बौने ग्रह
यम और सेरस के अतिरिक्त प्रमुख बौने ग्रहों में—
- एरिस
- हॉमिया
- माकेमाके
सम्मिलित हैं।
सेरस क्षुद्रग्रह पट्टी में स्थित है, जबकि वरुण से दूर स्थित चार प्रमुख बौने ग्रहों के रूप में यम, हॉमिया, माकेमाके और एरिस का उल्लेख मिलता है।
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
अरुण सूर्य से सातवाँ और आकार में तीसरा सबसे बड़ा ग्रह है, जिसकी खोज 1781 ई. में विलियम हर्शेल ने की थी। वरुण सूर्य से आठवाँ और सबसे दूर स्थित ग्रह है तथा इसकी खोज 1846 ई. में जॉन गले और अर्बेन ले वेरियर ने की। अन्तर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ के नए वर्गीकरण में यम, एरिस, सेरस, हॉमिया और माकेमाके को प्रमुख बौने ग्रहों में रखा गया है। यम की खोज 1930 ई. में क्लाइड टॉम्बॉ ने तथा सेरस की खोज पियाजी ने की थी।
- अरुण सूर्य से सातवाँ तथा आकार में सौरमण्डल का तीसरा सबसे बड़ा ग्रह है।
- अरुण की खोज 1781 ई. में विलियम हर्शेल ने की थी।
- अरुण का भूमध्यरेखीय व्यास लगभग 51,400 कि.मी. है।
- अरुण लगभग 16.2 घंटे में अपने अक्ष पर घूमता और लगभग 84 वर्षों में सूर्य की परिक्रमा करता है।
- अरुण की सूर्य से दूरी लगभग 286.9 करोड़ कि.मी. है।
- अरुण के चारों ओर नौ वलय बताए गए हैं; पाँच प्रमुख वलय अल्फा, बीटा, गामा, डेल्टा और एप्सिलॉन हैं।
- अरुण के घने वायुमण्डल में मुख्य रूप से हाइड्रोजन तथा अन्य गैसें पाई जाती हैं।
- वरुण सूर्य से आठवाँ तथा सबसे दूर स्थित ग्रह है।
- वरुण की खोज 1846 ई. में जॉन गले और अर्बेन ले वेरियर ने की थी।
- वरुण का भूमध्यरेखीय व्यास लगभग 48,600 कि.मी. और सूर्य से दूरी लगभग 449.6 करोड़ कि.मी. है।
- प्रमुख बौने ग्रह हैं—यम, एरिस, सेरस, हॉमिया और माकेमाके।
- यम या प्लूटो की खोज 1930 ई. में क्लाइड टॉम्बॉ ने की थी।
- प्लूटो को पहले नौवाँ ग्रह माना जाता था, लेकिन अब इसे बौना ग्रह माना जाता है।
- सेरस की खोज इटली के खगोलशास्त्री पियाजी ने की थी।
- सेरस क्षुद्रग्रह पट्टी में स्थित बौना ग्रह है।
- यम, हॉमिया, माकेमाके और एरिस वरुण से दूर स्थित प्रमुख बौने ग्रह बताए गए हैं।
उपग्रह एवं चन्द्रमा
उपग्रह
किसी ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करने वाले खगोलीय पिण्ड को उस ग्रह का उपग्रह कहा जाता है। अंग्रेजी में उपग्रह को सैटेलाइट कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ साथी अथवा सहचर होता है।
उपग्रह अपने ग्रह के साथ-साथ सूर्य की भी परिक्रमा करते हैं।
उपग्रह के प्रकार
उपग्रह मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—
- प्राकृतिक उपग्रह
- कृत्रिम उपग्रह
1. प्राकृतिक उपग्रह
जो खगोलीय पिण्ड प्राकृतिक रूप से किसी ग्रह की परिक्रमा करता है, उसे प्राकृतिक उपग्रह कहा जाता है।
चन्द्रमा पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है।
2. कृत्रिम उपग्रह
मनुष्य द्वारा निर्मित और अन्तरिक्ष में स्थापित किए गए उपग्रह कृत्रिम उपग्रह कहलाते हैं।
INSAT-B पृथ्वी के कृत्रिम उपग्रह का उदाहरण है।
प्राकृतिक और कृत्रिम उपग्रह में अन्तर
| आधार | प्राकृतिक उपग्रह | कृत्रिम उपग्रह |
|---|---|---|
| निर्माण | प्राकृतिक रूप से विद्यमान होता है। | मनुष्य द्वारा बनाया जाता है। |
| उदाहरण | चन्द्रमा | INSAT-B |
उपग्रह की कक्षीय गति
उपग्रह की कक्षीय चाल उसकी कक्षीय त्रिज्या पर निर्भर करती है।
पृथ्वी के अत्यन्त निकट चक्कर लगाने वाले उपग्रह का परिक्रमण काल लगभग 74 मिनट तक हो सकता है।
यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक ग्रह का कोई उपग्रह हो। इसी प्रकार सभी ग्रहों के उपग्रहों की संख्या भी समान नहीं होती।
चन्द्रमा
चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। यह वायुमण्डल विहीन खगोलीय पिण्ड है।
पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी लगभग 3,84,400 किलोमीटर है।
आकार की दृष्टि से चन्द्रमा सौरमण्डल का पाँचवाँ सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह बताया गया है।
सेलेनोलॉजी
चन्द्रमा की सतह तथा उसकी आन्तरिक सतह का अध्ययन करने वाले विज्ञान को सेलेनोलॉजी कहा जाता है।
चन्द्रमा की परिक्रमण एवं घूर्णन अवधि
चन्द्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा लगभग 27 दिन 8 घंटे में पूरी करता है।
लगभग इतने ही समय में चन्द्रमा अपने अक्ष पर भी एक घूर्णन पूरा करता है।
| चन्द्रमा की गति | समय |
|---|---|
| पृथ्वी की एक परिक्रमा | लगभग 27 दिन 8 घंटे |
| अपने अक्ष पर एक घूर्णन | लगभग 27 दिन 8 घंटे |
चन्द्रमा का एक ही भाग क्यों दिखाई देता है?
चन्द्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा जितने समय में पूरी करता है, लगभग उतने ही समय में वह अपने अक्ष पर भी एक घूर्णन पूरा करता है।
इसी कारण पृथ्वी से हमें चन्द्रमा का सदैव एक ही भाग दिखाई देता है।
चन्द्रमा का पिछला भाग पृथ्वी से दिखाई नहीं देता और इसे अन्धकारमय बताया गया है।
चन्द्रमा पर जल और वायु
चन्द्रमा पर न तो पानी पाया जाता है और न ही वायु।
शांतिसागर
चन्द्रमा पर धूल से ढके मैदान पाए जाते हैं। ऐसे ही एक धूलयुक्त मैदान को शांतिसागर कहा गया है।
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
किसी ग्रह की परिक्रमा करने वाले पिण्ड को उसका उपग्रह कहा जाता है। उपग्रह प्राकृतिक अथवा कृत्रिम हो सकते हैं। चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है, जबकि INSAT-B कृत्रिम उपग्रह का उदाहरण है। चन्द्रमा पृथ्वी से लगभग 3,84,400 किलोमीटर दूर है और लगभग 27 दिन 8 घंटे में पृथ्वी की एक परिक्रमा तथा अपने अक्ष पर एक घूर्णन पूरा करता है। दोनों अवधियाँ लगभग समान होने के कारण पृथ्वी से चन्द्रमा का सदैव एक ही भाग दिखाई देता है।
- किसी ग्रह की परिक्रमा करने वाले पिण्ड को उस ग्रह का उपग्रह कहा जाता है।
- सैटेलाइट का शाब्दिक अर्थ साथी अथवा सहचर है।
- उपग्रह अपने ग्रह के साथ-साथ सूर्य की भी परिक्रमा करते हैं।
- उपग्रह प्राकृतिक और कृत्रिम दो प्रकार के होते हैं।
- चन्द्रमा पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है।
- INSAT-B पृथ्वी के कृत्रिम उपग्रह का उदाहरण है।
- उपग्रह की कक्षीय चाल उसकी कक्षीय त्रिज्या पर निर्भर करती है।
- पृथ्वी के अत्यन्त निकट चक्कर लगाने वाले उपग्रह का परिक्रमण काल लगभग 74 मिनट तक हो सकता है।
- यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक ग्रह का कोई उपग्रह हो अथवा सभी ग्रहों के उपग्रहों की संख्या समान हो।
- चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह और वायुमण्डल विहीन पिण्ड है।
- पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी लगभग 3,84,400 कि.मी. है।
- चन्द्रमा सौरमण्डल का पाँचवाँ सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह बताया गया है।
- चन्द्रमा की सतह एवं आन्तरिक सतह के अध्ययन को सेलेनोलॉजी कहते हैं।
- चन्द्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा लगभग 27 दिन 8 घंटे में पूरी करता है।
- चन्द्रमा लगभग 27 दिन 8 घंटे में अपने अक्ष पर भी एक घूर्णन पूरा करता है।
- घूर्णन और परिक्रमण अवधि लगभग समान होने के कारण हमें चन्द्रमा का सदैव एक ही भाग दिखाई देता है।
- चन्द्रमा पर न पानी है और न वायु।
- चन्द्रमा के धूलयुक्त मैदान को शांतिसागर कहा गया है।
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क्षुद्र ग्रह एवं उल्कापिण्ड
क्षुद्र ग्रह
क्षुद्र ग्रह पथरीले और धातुओं से बने ऐसे छोटे खगोलीय पिण्ड हैं जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं, लेकिन आकार में इतने छोटे होते हैं कि उन्हें ग्रह नहीं कहा जा सकता।
इन्हें अवांतर ग्रह, लघु ग्रह, क्षुद्र ग्रह अथवा ग्रहिका भी कहा जाता है।
क्षुद्र ग्रहों की संख्या
हमारे सौरमण्डल में लगभग 1,00,000 क्षुद्र ग्रह बताए गए हैं। इनमें से अधिकतर इतने छोटे हैं कि उन्हें पृथ्वी से देखा नहीं जा सकता।
प्रत्येक क्षुद्र ग्रह की अपनी अलग कक्षा होती है और वह उसी कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करता रहता है।
सेरस — सबसे बड़ा क्षुद्र ग्रह
सेरस को क्षुद्र ग्रहों में सबसे बड़ा बताया गया है।
इतालवी खगोलशास्त्री पियाजी ने सेरस की खोज 1 जनवरी 1801 को की थी।
वेस्टा
वेस्टा ऐसा क्षुद्र ग्रह है जिसे नंगी आँखों से देखा जा सकता है। इसकी खोज सेरस की खोज के बाद हुई थी।
क्षुद्र ग्रहों का आकार
क्षुद्र ग्रहों के आकार में बहुत अधिक अन्तर पाया जाता है। इनका आकार लगभग 1000 किलोमीटर व्यास वाले पिण्डों से लेकर केवल 1 से 2 इंच के पत्थर के टुकड़ों तक हो सकता है।
क्षुद्र ग्रह कहाँ पाए जाते हैं?
क्षुद्र ग्रहों की कक्षाएँ पृथ्वी की कक्षा के अन्दर से लेकर शनि की कक्षा के बाहर तक फैली हुई बताई गई हैं।
इनमें लगभग दो-तिहाई क्षुद्र ग्रह मंगल और बृहस्पति के बीच एक पट्टी में पाए जाते हैं। इस क्षेत्र को सामान्य रूप से क्षुद्रग्रह पट्टी के रूप में समझा जाता है।
कुछ प्रमुख क्षुद्र ग्रह
हिडाल्गो
हिडाल्गो नामक क्षुद्र ग्रह की कक्षा मंगल और शनि ग्रहों के बीच पड़ती है।
हर्मीस एवं एरोस
हर्मीस और एरोस नामक क्षुद्र ग्रह पृथ्वी से कुछ लाख किलोमीटर की दूरी तक पाए जाते हैं।
कुछ क्षुद्र ग्रहों की कक्षाएँ पृथ्वी की कक्षा को भी काटती हैं।
क्षुद्र ग्रहों की पृथ्वी से टक्कर
कुछ क्षुद्र ग्रहों ने भूतकाल में पृथ्वी से टक्कर भी मारी है। ऐसी टक्कर के उदाहरण के रूप में महाराष्ट्र की लोनार झील का उल्लेख किया गया है।
उल्का और उल्कापिण्ड
आकाश में कभी-कभी अत्यन्त तेज गति से एक ओर से दूसरी ओर जाते हुए अथवा पृथ्वी की ओर गिरते हुए चमकीले पिण्ड दिखाई देते हैं। इन्हें उल्का कहा जाता है।
साधारण बोलचाल में उल्काओं को “टूटते हुए तारे” अथवा “लूका” भी कहा जाता है।
उल्कापिण्ड क्या है?
जब कोई उल्का पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करती है तो उसका अधिकांश भाग जल सकता है। उल्का का जो भाग वायुमण्डल में जलने से बचकर पृथ्वी की सतह तक पहुँच जाता है, उसे उल्कापिण्ड कहा जाता है।
उल्का और उल्कापिण्ड में अन्तर
| आधार | उल्का | उल्कापिण्ड |
|---|---|---|
| अर्थ | आकाश में अत्यन्त तेज गति से दिखाई देने वाला पिण्ड | उल्का का वह भाग जो जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँच जाए |
| सामान्य नाम | टूटता हुआ तारा या लूका | पृथ्वी तक पहुँचने वाला शेष पिण्ड |
| पृथ्वी तक पहुँचना | अधिकांश उल्काएँ पृथ्वी तक नहीं पहुँचतीं | पृथ्वी की सतह तक पहुँचता है |
उल्काओं की संख्या
प्रायः प्रत्येक रात आकाश में अनगिनत उल्काएँ देखी जा सकती हैं, लेकिन इनमें से पृथ्वी पर गिरने वाले उल्कापिण्डों की संख्या अत्यन्त कम होती है।
उल्कापिण्डों का वैज्ञानिक महत्व
वैज्ञानिक दृष्टि से उल्कापिण्डों का बहुत अधिक महत्व है। ये अत्यन्त दुर्लभ पिण्ड हैं और इनके अध्ययन से अन्तरिक्ष में पाए जाने वाले विभिन्न ग्रहों तथा अन्य खगोलीय पिण्डों के संगठन और संरचना के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।
उल्कापिण्डों के अध्ययन से यह भी समझने में सहायता मिलती है कि अन्तरिक्ष से पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करने वाले पदार्थों पर किस प्रकार की प्रतिक्रियाएँ होती हैं।
इस प्रकार उल्कापिण्डों का अध्ययन ब्रह्माण्ड विज्ञान और भू-विज्ञान के बीच सम्बन्ध स्थापित करने में सहायक है।
क्षुद्र ग्रह और उल्कापिण्ड एक नजर में
| खगोलीय पिण्ड | प्रमुख विशेषता |
|---|---|
| क्षुद्र ग्रह | सूर्य की परिक्रमा करने वाले छोटे पथरीले एवं धात्विक पिण्ड |
| सेरस | सबसे बड़ा क्षुद्र ग्रह; खोज 1 जनवरी 1801, पियाजी |
| वेस्टा | नंगी आँखों से दिखाई देने वाला क्षुद्र ग्रह |
| उल्का | आकाश में तेज गति से दिखाई देने वाला पिण्ड |
| उल्कापिण्ड | वायुमण्डल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचने वाला उल्का का भाग |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
क्षुद्र ग्रह सूर्य की परिक्रमा करने वाले छोटे पथरीले और धात्विक पिण्ड हैं। सौरमण्डल में लगभग एक लाख क्षुद्र ग्रह बताए गए हैं और इनमें लगभग दो-तिहाई मंगल तथा बृहस्पति के बीच स्थित पट्टी में पाए जाते हैं। सेरस सबसे बड़ा तथा वेस्टा नंगी आँखों से दिखाई देने वाला क्षुद्र ग्रह है। आकाश में अत्यन्त वेग से दिखाई देने वाले पिण्ड को उल्का कहते हैं, जबकि उसका जो भाग वायुमण्डल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचता है, वह उल्कापिण्ड कहलाता है। उल्कापिण्डों का अध्ययन खगोलीय पिण्डों की संरचना तथा पृथ्वी के वायुमण्डल में होने वाली प्रतिक्रियाओं को समझने में महत्वपूर्ण है।
- क्षुद्र ग्रह पथरीले और धातुओं से बने छोटे पिण्ड हैं जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं।
- क्षुद्र ग्रहों को अवांतर ग्रह, लघु ग्रह अथवा ग्रहिका भी कहा जाता है।
- सौरमण्डल में लगभग 1,00,000 क्षुद्र ग्रह बताए गए हैं।
- प्रत्येक क्षुद्र ग्रह की अपनी अलग कक्षा होती है।
- सेरस सबसे बड़ा क्षुद्र ग्रह बताया गया है।
- सेरस की खोज पियाजी ने 1 जनवरी 1801 को की थी।
- वेस्टा को नंगी आँखों से देखा जा सकता है।
- क्षुद्र ग्रहों का आकार लगभग 1000 कि.मी. व्यास से लेकर 1–2 इंच के पत्थर के टुकड़ों तक हो सकता है।
- लगभग दो-तिहाई क्षुद्र ग्रह मंगल और बृहस्पति के बीच एक पट्टी में पाए जाते हैं।
- हिडाल्गो की कक्षा मंगल और शनि के बीच पड़ती है।
- हर्मीस और एरोस पृथ्वी से कुछ लाख किलोमीटर की दूरी तक पाए जाते हैं।
- कुछ क्षुद्र ग्रह पृथ्वी की कक्षा को काटते हैं और कुछ ने भूतकाल में पृथ्वी से टक्कर भी मारी है।
- महाराष्ट्र की लोनार झील का उल्लेख ऐसी टक्कर के उदाहरण के रूप में किया गया है।
- आकाश में तेज गति से दिखाई देने वाले पिण्ड को उल्का कहते हैं।
- उल्का को सामान्य बोलचाल में टूटता हुआ तारा या लूका भी कहा जाता है।
- उल्का का जो भाग वायुमण्डल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचता है, उसे उल्कापिण्ड कहते हैं।
- प्रत्येक रात अनेक उल्काएँ दिखाई देती हैं, लेकिन पृथ्वी तक पहुँचने वाले उल्कापिण्ड बहुत कम होते हैं।
- उल्कापिण्ड खगोलीय पिण्डों की संरचना का अध्ययन करने में महत्वपूर्ण हैं।
- उल्कापिण्डों का अध्ययन ब्रह्माण्ड विज्ञान और भू-विज्ञान के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है।
आकाशगंगा, तारे एवं तारामण्डल
आकाशगंगा
करोड़ों तारामण्डल मिलकर एक आकाशगंगा का निर्माण करते हैं। हमारा सौरमण्डल भी एक आकाशगंगा में स्थित है, जिसे मन्दाकिनी कहा गया है।
हमारी आकाशगंगा का आकार सर्पिल है। रात के समय आकाश में तारों के समूह की दूधिया और पतली-सी दिखाई देने वाली मेखला को मिल्की वे कहा जाता है।
हमारी आकाशगंगा को मन्दाकिनी, मिल्की वे तथा क्षीरमार्ग के नाम से जाना जाता है।
आकाशगंगा की संरचना
हमारी आकाशगंगा की आकृति सर्पिल है। इसका एक बड़ा केन्द्रीय भाग है और इस केन्द्र से कई चक्राकार अथवा सर्पिल भुजाएँ निकलती हैं।
हमारा सौरमण्डल आकाशगंगा की शिकारी-हंस भुजा, जिसे ओरायन-सिगनस भुजा भी कहा गया है, पर स्थित है।
आकाशगंगा में तारों और ग्रहों की संख्या
आकाशगंगा में लगभग 100 अरब से 400 अरब तक तारे बताए गए हैं।
अनुमान लगाया गया है कि इसमें लगभग 50 अरब ग्रह हो सकते हैं। इनमें लगभग 50 करोड़ ग्रह ऐसे हो सकते हैं जो अपने तारों से जीवन-योग्य तापमान बनाए रखने वाली दूरी पर स्थित हों।
सन् 2011 में किए गए एक सर्वेक्षण में यह सम्भावना व्यक्त की गई कि आकाशगंगा में ग्रहों की संख्या पहले किए गए अनुमान से भी अधिक हो सकती है और संभव है कि ग्रहों की संख्या तारों की संख्या से लगभग दुगुनी हो।
आकाशगंगा के केन्द्र के चारों ओर सौरमण्डल की गति
हमारा सौरमण्डल आकाशगंगा के बाहरी क्षेत्र में स्थित है और आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमा करता रहता है।
सौरमण्डल को आकाशगंगा के केन्द्र की एक पूरी परिक्रमा करने में लगभग 22.5 से 25 करोड़ वर्ष लगते हैं।
आकाशगंगा के प्रकार
आकार के आधार पर आकाशगंगाएँ मुख्यतः तीन प्रकार की बताई गई हैं—
- दीर्घवृत्ताकार
- सर्पिल
- अनियमित
| प्रकार | मुख्य पहचान |
|---|---|
| दीर्घवृत्ताकार | दीर्घवृत्त के समान आकार वाली आकाशगंगा |
| सर्पिल | केन्द्रीय भाग से सर्पिल भुजाओं वाली आकाशगंगा |
| अनियमित | जिसका कोई निश्चित नियमित आकार नहीं होता |
तारे
ऐसे खगोलीय पिण्ड जो लगातार प्रकाश और ऊष्मा उत्सर्जित करते रहते हैं, तारे कहलाते हैं।
सूर्य भी एक तारा है।
अन्य तारे पृथ्वी से बहुत अधिक दूरी पर स्थित होने के कारण हमें आकाश में छोटे चमकीले बिन्दुओं के रूप में दिखाई देते हैं।
क्या तारे दिन में भी आकाश में रहते हैं?
तारे दिन और रात दोनों समय आकाश में उपस्थित रहते हैं। दिन के समय सूर्य के तेज प्रकाश के कारण वे हमें दिखाई नहीं देते।
ध्रुव तारा
ध्रुव तारा सदैव उत्तर दिशा में चमकता हुआ दिखाई देता है।
इसकी किरणें उत्तरी ध्रुव पर लगभग 90° का कोण बनाती हैं।
तारामण्डल
तारों के समूह को तारामण्डल कहा जाता है।
पृथ्वी से देखने पर तारों का कोई समूह किसी विशेष आकृति का आभास देता है। ऐसे समूहों को रात के समय आकाश में पहचाना जा सकता है।
सप्तर्षि तारामण्डल इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
तारा, तारामण्डल और आकाशगंगा का सम्बन्ध
| खगोलीय संरचना | अर्थ |
|---|---|
| तारा | स्वयं प्रकाश और ऊष्मा उत्सर्जित करने वाला खगोलीय पिण्ड |
| तारामण्डल | विशेष आकृति का आभास देने वाला तारों का समूह |
| आकाशगंगा | करोड़ों तारामण्डलों से निर्मित विशाल खगोलीय संरचना |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
करोड़ों तारामण्डलों से आकाशगंगा का निर्माण होता है। हमारा सौरमण्डल मन्दाकिनी या मिल्की वे नामक सर्पिल आकाशगंगा की शिकारी-हंस अथवा ओरायन-सिगनस भुजा पर स्थित है। आकाशगंगाएँ दीर्घवृत्ताकार, सर्पिल और अनियमित तीन प्रकार की होती हैं। स्वयं प्रकाश और ऊष्मा उत्सर्जित करने वाले खगोलीय पिण्ड तारे कहलाते हैं, जबकि तारों के समूह को तारामण्डल कहते हैं। सूर्य एक तारा है तथा सप्तर्षि एक प्रमुख तारामण्डल है।
- करोड़ों तारामण्डल मिलकर एक आकाशगंगा का निर्माण करते हैं।
- हमारा सौरमण्डल मन्दाकिनी अथवा मिल्की वे आकाशगंगा में स्थित है।
- मन्दाकिनी को मिल्की वे तथा क्षीरमार्ग भी कहा जाता है।
- हमारी आकाशगंगा सर्पिल आकार की है।
- सौरमण्डल आकाशगंगा की शिकारी-हंस अथवा ओरायन-सिगनस भुजा पर स्थित है।
- आकाशगंगा में लगभग 100 अरब से 400 अरब तक तारे बताए गए हैं।
- आकाशगंगा में लगभग 50 अरब ग्रह होने का अनुमान लगाया गया है।
- लगभग 50 करोड़ ग्रह अपने तारों से जीवन-योग्य तापमान बनाए रखने वाली दूरी पर हो सकते हैं।
- सौरमण्डल को आकाशगंगा के केन्द्र की एक परिक्रमा करने में लगभग 22.5 से 25 करोड़ वर्ष लगते हैं।
- आकाशगंगाएँ आकार के आधार पर दीर्घवृत्ताकार, सर्पिल और अनियमित तीन प्रकार की होती हैं।
- लगातार प्रकाश और ऊष्मा उत्सर्जित करने वाले खगोलीय पिण्ड तारे कहलाते हैं।
- सूर्य भी एक तारा है।
- तारे दिन और रात दोनों समय आकाश में उपस्थित रहते हैं, लेकिन सूर्य के प्रकाश के कारण दिन में दिखाई नहीं देते।
- ध्रुव तारा सदैव उत्तर दिशा में चमकता दिखाई देता है।
- ध्रुव तारे की किरणें उत्तरी ध्रुव पर लगभग 90° का कोण बनाती हैं।
- तारों के समूह को तारामण्डल कहते हैं।
- सप्तर्षि एक प्रमुख तारामण्डल है।
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धूमकेतु या पुच्छल तारा
धूमकेतु या पुच्छल तारा
सौरमण्डल के छोर पर बहुत छोटे-छोटे असंख्य खगोलीय पिण्ड पाए जाते हैं, जिन्हें धूमकेतु या पुच्छल तारा कहा जाता है।
धूमकेतु सामान्यतः आकाश में दिखाई नहीं देते, लेकिन जब वे सूर्य के समीप आते हैं तो चमकीले होकर दिखाई देने लगते हैं।
धूमकेतु शब्द का अर्थ
धूमकेतु के लिए प्रयुक्त शब्द Comet ग्रीक शब्द Kometes से बना है, जिसका अर्थ “बालों वाला” है।
धूमकेतु सूर्य के निकट आने पर चमकीले सिर और लम्बी पूँछ वाले पिण्ड के रूप में दिखाई देते हैं। इसी कारण इनका स्वरूप बालों वाले पिण्ड जैसा प्रतीत होता है।
धूमकेतु किन पदार्थों से बने होते हैं?
धूमकेतु मुख्य रूप से निम्न पदार्थों से बने होते हैं—
- चट्टान
- धूल
- जमी हुई गैसें
सूर्य के निकट आने पर धूमकेतु में क्या होता है?
जब कोई धूमकेतु सूर्य के समीप आता है तो सूर्य की गर्मी के कारण उसमें उपस्थित जमी हुई गैसें और धूल सक्रिय होने लगती हैं।
गैस और धूल के कण सूर्य से विपरीत दिशा में फैल जाते हैं। इन कणों पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है और वह परावर्तित होकर चमकने लगता है। इसी कारण सूर्य के निकट आने पर धूमकेतु स्पष्ट दिखाई देता है।
धूमकेतु के प्रमुख भाग
सूर्य के समीप आने पर धूमकेतु के पाँच प्रमुख भाग स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं—
- केन्द्रक
- कोमा
- हाइड्रोजन बादल
- धूल भरी पूँछ
- आयन पूँछ
1. केन्द्रक
केन्द्रक धूमकेतु का ठोस और स्थायी भाग होता है। यह मुख्यतः बर्फ, धूल तथा अन्य ठोस पदार्थों से बना होता है।
2. कोमा
केन्द्रक के चारों ओर स्थित जल, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य गैसों के घने बादल को कोमा कहा जाता है।
ये गैसें केन्द्रक से लगातार उत्सर्जित होती रहती हैं।
3. हाइड्रोजन बादल
धूमकेतु के आसपास लाखों किलोमीटर चौड़ा विशाल हाइड्रोजन का बादल पाया जाता है। इसे हाइड्रोजन बादल कहा जाता है।
4. धूल भरी पूँछ
धूमकेतु की धूल भरी पूँछ लगभग 100 लाख किलोमीटर लम्बी हो सकती है।
यह धुएँ के समान दिखाई देने वाले धूलकणों से बनी पूँछनुमा संरचना है और धूमकेतु का सबसे अधिक दर्शनीय भाग होती है।
5. आयन पूँछ
आयन पूँछ सैकड़ों लाख किलोमीटर तक लम्बी हो सकती है। यह प्लाज्मा का प्रवाह है, जिसका निर्माण सौर वायु और धूमकेतु के बीच होने वाली प्रतिक्रिया से होता है।
धूमकेतु की पूँछ की दिशा
धूमकेतु के सूर्य के निकट आने पर उसकी गैस और धूल सूर्य से विपरीत दिशा में फैलती है। इसलिए उसकी पूँछ की दिशा भी सूर्य से दूर की ओर रहती है।
धूमकेतु कब दिखाई देते हैं?
धूमकेतु सामान्यतः दिखाई नहीं देते। जैसे ही वे सूर्य के समीप आते हैं, सूर्य की गर्मी और प्रकाश के प्रभाव से उनका कोमा और पूँछ विकसित होकर चमकने लगते हैं तथा वे दिखाई देने लगते हैं।
धूमकेतुओं की कक्षा
अधिकांश धूमकेतुओं की कक्षा प्लूटो की कक्षा के बाहर से शुरू होकर सौरमण्डल के आन्तरिक भाग तक आती है।
अनेक धूमकेतुओं का परिक्रमण काल लाखों वर्ष का होता है।
कुछ कम परिक्रमण काल वाले धूमकेतु अपना अधिकांश समय प्लूटो की कक्षा के अन्दर ही व्यतीत करते हैं।
धूमकेतु का धीरे-धीरे समाप्त होना
सूर्य के पास बार-बार आने से धूमकेतु में उपस्थित बर्फ और गैस धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
लगभग 500 बार या उसके आसपास सूर्य की परिक्रमा करने के बाद अधिकांश धूमकेतुओं की बर्फ और गैस समाप्त हो सकती है। इसके बाद क्षुद्र ग्रह के समान चट्टानी अवशेष शेष रह जाता है।
पृथ्वी के निकट पाए जाने वाले अनेक क्षुद्र ग्रहों को ऐसे मृत धूमकेतुओं के अवशेष से सम्बन्धित माना गया है।
धूमकेतुओं का भविष्य
जिन धूमकेतुओं की कक्षाएँ सूर्य के बहुत निकट पहुँच जाती हैं, उनके सूर्य से टकराने की सम्भावना रहती है।
बृहस्पति जैसे विशाल ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण भी धूमकेतुओं को प्रभावित कर सकता है और उन्हें सुदूर अन्तरिक्ष की ओर फेंक सकता है।
प्रसिद्ध धूमकेतु
हैली धूमकेतु
हैली धूमकेतु सबसे अधिक प्रसिद्ध धूमकेतुओं में से एक है।
शूमेकर-लेवी धूमकेतु
1994 में शूमेकर-लेवी धूमकेतु विशेष रूप से चर्चा में रहा। यह टुकड़ों में टूट गया और उसके टुकड़े बृहस्पति से जा टकराए।
धूमकेतु की संरचना एक नजर में
| भाग | प्रमुख विशेषता |
|---|---|
| केन्द्रक | बर्फ, धूल और अन्य ठोस पदार्थों से बना ठोस भाग |
| कोमा | जल, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों का घना बादल |
| हाइड्रोजन बादल | लाखों किलोमीटर चौड़ा विशाल हाइड्रोजन बादल |
| धूल भरी पूँछ | लगभग 100 लाख कि.मी. लम्बी, धूलकणों से बनी दर्शनीय पूँछ |
| आयन पूँछ | सौर वायु की प्रतिक्रिया से बना सैकड़ों लाख कि.मी. लम्बा प्लाज्मा प्रवाह |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
धूमकेतु चट्टान, धूल और जमी हुई गैसों से बने छोटे खगोलीय पिण्ड हैं। सूर्य के निकट आने पर गर्मी के प्रभाव से इनमें गैस और धूल उत्सर्जित होने लगती है और चमकीली पूँछ बनती है, जिसकी दिशा सूर्य से विपरीत होती है। धूमकेतु के प्रमुख भाग केन्द्रक, कोमा, हाइड्रोजन बादल, धूल भरी पूँछ और आयन पूँछ हैं। अनेक धूमकेतुओं का परिक्रमण काल लाखों वर्ष होता है। हैली सबसे प्रसिद्ध धूमकेतुओं में से एक है, जबकि 1994 में शूमेकर-लेवी धूमकेतु के टुकड़े बृहस्पति से टकराए थे।
- धूमकेतु को पुच्छल तारा भी कहा जाता है।
- धूमकेतु चट्टान, धूल और जमी हुई गैसों से बने होते हैं।
- Comet शब्द ग्रीक शब्द Kometes से बना है, जिसका अर्थ “बालों वाला” है।
- धूमकेतु सामान्यतः दिखाई नहीं देते, लेकिन सूर्य के निकट आने पर स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं।
- सूर्य की गर्मी से जमी हुई गैसें और धूल सक्रिय होकर सूर्य से विपरीत दिशा में फैलती हैं।
- धूमकेतु के पाँच प्रमुख भाग हैं—केन्द्रक, कोमा, हाइड्रोजन बादल, धूल भरी पूँछ और आयन पूँछ।
- केन्द्रक मुख्यतः बर्फ, धूल और अन्य ठोस पदार्थों से बना होता है।
- कोमा जल, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य गैसों का घना बादल है।
- हाइड्रोजन बादल लाखों किलोमीटर चौड़ा हो सकता है।
- धूल भरी पूँछ लगभग 100 लाख कि.मी. लम्बी हो सकती है और धूमकेतु का सबसे दर्शनीय भाग है।
- आयन पूँछ सौर वायु की प्रतिक्रिया से निर्मित प्लाज्मा का प्रवाह है।
- धूमकेतु की पूँछ सूर्य से विपरीत दिशा में रहती है।
- अधिकांश धूमकेतुओं की कक्षाएँ प्लूटो की कक्षा के बाहर से सौरमण्डल के अन्दर तक आती हैं।
- अनेक धूमकेतुओं का परिक्रमण काल लाखों वर्ष का होता है।
- सूर्य के निकट बार-बार आने से धूमकेतु की बर्फ और गैस धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है।
- लगभग 500 बार सूर्य के निकट आने के बाद अधिकांश बर्फ और गैस समाप्त होकर क्षुद्र ग्रह जैसा अवशेष बच सकता है।
- हैली धूमकेतु सबसे प्रसिद्ध धूमकेतुओं में से एक है।
- 1994 में शूमेकर-लेवी धूमकेतु के टुकड़े बृहस्पति से टकराए थे।