Home
App Install Updates
Home Study Material Semester 1 सामाजिक अध्ययन मानव की उत्पत्ति एवं विकास तथा नदी घाटी सभ्यताएँ
Chapter 2 • सामाजिक अध्ययन

मानव की उत्पत्ति एवं विकास तथा नदी घाटी सभ्यताएँ

UP DELED Semester 1 सामाजिक अध्ययन विषय के इस अध्याय में पृथ्वी पर जीवों एवं मानव की उत्पत्ति और विकास, पुरापाषाण, मध्यपाषाण एवं नवपाषाण काल, ताम्र-कांस्य एवं लौह युग तथा सिंधु घाटी, मेसोपोटामिया, मिस्र और चीन की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं की प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

8
Topics
15
MCQs
10+
PYQs
PDF
Notes
Topic 1 जीवों की उत्पत्ति एवं मानव का विकास

जीवों की उत्पत्ति एवं मानव का विकास

पृथ्वी का प्रारम्भिक स्वरूप

लगभग 450 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों का वर्तमान स्वरूप अस्तित्व में नहीं था। उस समय अन्तरिक्ष में एक विशाल पिण्ड अत्यन्त तीव्र गति से घूम रहा था।

एक प्राकृतिक घटना के परिणामस्वरूप यह पिण्ड किसी दूसरे पिण्ड से टकरा गया। टक्कर के कारण इसके अनेक टुकड़े हो गए और इनसे विभिन्न ग्रहों का निर्माण हुआ। सूर्य, पृथ्वी और मंगल आदि को इसी पिण्ड के टुकड़ों के रूप में बताया गया है।

प्रारम्भ में पृथ्वी आग के गोले के समान अत्यन्त गर्म थी। दीर्घकाल तक भारी वर्षा, तूफान और बर्फबारी जैसी प्राकृतिक घटनाओं के कारण पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी हुई और उसका वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ।

जीवों की उत्पत्ति

पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति कब और किस प्रकार हुई, इसका निश्चित उत्तर देना कठिन है। जीव-जगत के विकास को विभिन्न अवस्थाओं में समझाया गया है।

1. सूक्ष्म तथा रीढ़-विहीन जीवों की उत्पत्ति

लगभग 50 करोड़ वर्ष पूर्व सर्वप्रथम जल में रहने वाले अत्यन्त सूक्ष्म जीवों का जन्म माना गया है।

ये जीव जेली के समान बहुत छोटे थे और एक कोशिकीय थे। इनमें वनस्पतियों तथा पशुओं दोनों के सूक्ष्म लक्षण पाए जाते थे। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य प्रकार के जीवों का विकास होता गया।

2. उभयचर जीवों की उत्पत्ति

करोड़ों वर्षों के बाद उभयचर जीवों का विकास प्रारम्भ हुआ। इन जीवों का बाहरी आवरण अपेक्षाकृत कठोर था।

इस अवस्था में घोंघे, केकड़े, मेढक तथा मछलियों जैसे जीवों का उल्लेख मिलता है। इसी समय दलदली भागों में वनस्पतियों का विकास भी प्रारम्भ हुआ।

कुछ रेंगने वाले सरीसृपों का भी विकास हुआ। ऐसे जीव स्थल और जल दोनों स्थानों पर रह सकते थे, इसलिए उन्हें उभयचर जीवों की श्रेणी में रखा गया है।

3. अण्डज जीवों की उत्पत्ति

वायुमण्डल में लगातार परिवर्तन होने के साथ ऐसे जीवों की उत्पत्ति हुई जिनका जन्म अण्डों अथवा बीजों से होता था।

इस अवस्था में मगरमच्छ और सर्प जैसे जीव प्रमुख थे।

4. नभचर एवं स्तनपायी जीवों की उत्पत्ति

समय चक्र और ऋतु परिवर्तन के साथ नभचर तथा स्तनपायी जीवों का विकास हुआ।

नभचर जीवों के अन्तर्गत आकाश में उड़ने वाले जीव आते हैं, जबकि स्तनपायी जीवों के विकास में नर-वानर अर्थात प्राइमेट का विशेष महत्व बताया गया है।

प्राइमेट में बन्दर, लंगूर और चिम्पैंजी जैसे जीवों को सम्मिलित किया गया है।

5. मानव की उत्पत्ति

मानव की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। अधिकांश विद्वानों का मत है कि आधुनिक मानव की उत्पत्ति नर-वानर अर्थात प्राइमेट से हुई।

आधुनिक मानव का जन्म लगभग 5 लाख वर्ष पूर्व माना गया है।

प्रारम्भिक मानव सीधा खड़ा होकर नहीं चलता था। वह हाथ और पैर दोनों की सहायता से चलता था तथा उसकी अधिकांश गतिविधियाँ पशुओं जैसी थीं।

जीवों से मानव तक विकास का क्रम

विकास की अवस्था मुख्य विशेषता
सूक्ष्म एवं रीढ़-विहीन जीव जल में रहने वाले अत्यन्त छोटे, एक कोशिकीय जीव
उभयचर जीव स्थल तथा जल दोनों से सम्बन्धित जीवों का विकास
अण्डज जीव अण्डों से जन्म लेने वाले जीवों का विकास
नभचर एवं स्तनपायी उड़ने वाले जीव तथा प्राइमेट जैसे स्तनपायी जीव
मानव प्राइमेट से आधुनिक मानव के विकास का क्रम

मानव का विकास

प्राचीन मानव प्राकृतिक गुफाओं में रहता था। भोजन के लिए वह कच्चे मांस का सेवन करता था और शिकार करने के लिए पत्थर तथा लकड़ी के साधनों का प्रयोग करता था।

धीरे-धीरे समय और विकास के क्रम में मानव ने अनेक कार्य सीखने प्रारम्भ किए। उसने अपने जीवन को अधिक व्यवस्थित बनाना शुरू किया।

होमो सेपियन्स का उद्भव

लगभग 40 हजार वर्ष पूर्व वर्तमान मानव के विकसित रूप का उद्भव माना गया है, जिसे होमो सेपियन्स कहा जाता है।

होमो सेपियन्स एक लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ बुद्धिमान मानव होता है।

इस बुद्धिमान मानव ने आग का प्रयोग करना और घर बनाना भी सीख लिया। इसके साथ ही मानव संस्कृति के विकास की प्रक्रिया तेज हुई।

मानव की उत्पत्ति एवं विकास का क्रम
प्रारम्भिक मानव से विकसित होमो सेपियन्स तक मानव विकास का क्रम

संस्कृति से सभ्यता की ओर

विभिन्न स्थानों पर रहने वाले मानव समुदायों ने अपनी-अपनी संस्कृतियों का विकास किया। जब इन संस्कृतियों का सामूहिक एवं व्यवस्थित विकास हुआ, तब मानव सभ्यता का जन्म हुआ।

मानव विकास की इस प्रक्रिया को आगे मुख्य रूप से तीन कालों में समझा गया है—

  1. पाषाण काल
  2. ताम्र / कांस्य युग
  3. लौह युग

महत्वपूर्ण तथ्य एक नजर में

तथ्य विवरण
पृथ्वी के प्रारम्भिक विकास का उल्लेखित समय लगभग 450 करोड़ वर्ष पूर्व
प्रारम्भिक सूक्ष्म जीव लगभग 50 करोड़ वर्ष पूर्व
मानव की उत्पत्ति लगभग 5 लाख वर्ष पूर्व
वर्तमान विकसित मानव लगभग 40 हजार वर्ष पूर्व
वर्तमान विकसित मानव का नाम होमो सेपियन्स
होमो सेपियन्स का अर्थ बुद्धिमान मानव
मानव विकास के प्रमुख काल पाषाण काल, ताम्र/कांस्य युग एवं लौह युग

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

पृथ्वी के ठंडा होने और प्राकृतिक परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ जीव-जगत का क्रमिक विकास हुआ। प्रारम्भिक सूक्ष्म जीवों से उभयचर, अण्डज, नभचर और स्तनपायी जीव विकसित हुए। प्राइमेट से मानव के विकास का क्रम आगे बढ़ा और लगभग 40 हजार वर्ष पूर्व होमो सेपियन्स अर्थात बुद्धिमान मानव का उद्भव हुआ। आग, आवास और अन्य जीवनोपयोगी कौशल सीखने के साथ मानव संस्कृति तथा बाद में सभ्यता का विकास हुआ।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्रारम्भ में पृथ्वी अत्यन्त गर्म थी और धीरे-धीरे वर्षा, तूफान तथा बर्फबारी के प्रभाव से ठंडी हुई।
  • लगभग 50 करोड़ वर्ष पूर्व जल में अत्यन्त सूक्ष्म एवं एक कोशिकीय जीवों की उत्पत्ति मानी गई है।
  • जीवों के विकास में सूक्ष्म एवं रीढ़-विहीन, उभयचर, अण्डज, नभचर एवं स्तनपायी अवस्थाओं का उल्लेख मिलता है।
  • प्राइमेट में बन्दर, लंगूर और चिम्पैंजी जैसे जीव सम्मिलित हैं।
  • आधुनिक मानव की उत्पत्ति लगभग 5 लाख वर्ष पूर्व मानी गई है।
  • प्रारम्भिक मानव सीधा खड़ा होकर नहीं चलता था तथा हाथ और पैर दोनों का प्रयोग करता था।
  • प्राचीन मानव गुफाओं में रहता, कच्चा मांस खाता तथा पत्थर और लकड़ी से शिकार करता था।
  • लगभग 40 हजार वर्ष पूर्व होमो सेपियन्स का उद्भव माना गया है।
  • होमो सेपियन्स का अर्थ बुद्धिमान मानव है।
  • विकसित मानव ने आग का प्रयोग और घर बनाना सीखा, जिससे मानव संस्कृति का विकास हुआ।
  • मानव विकास को आगे पाषाण काल, ताम्र/कांस्य युग और लौह युग में बाँटकर समझाया गया है।

Advertisement

Topic 2 पाषाण काल: पुरापाषाण, मध्यपाषाण एवं नवपाषाण

पाषाण काल: पुरापाषाण, मध्यपाषाण एवं नवपाषाण

पाषाण काल का परिचय

पाषाण युग इतिहास का वह काल था जब मानव का जीवन मुख्य रूप से पत्थरों पर आश्रित था। पत्थरों से शिकार करना, पशुओं की गुफाओं में शरण लेना तथा पत्थरों से आग उत्पन्न करना मानव जीवन की प्रमुख गतिविधियाँ थीं।

प्रारम्भिक समय में मानव बिखरा हुआ और जंगली जीवन व्यतीत करता था, परन्तु धीरे-धीरे उसने सभ्य और संगठित जीवन की ओर बढ़ना प्रारम्भ किया।

सन् 1863 के आसपास हुए अनुसंधानों के आधार पर रॉबर्ट ब्रूस फूट ने पाषाण काल को पहले पुरापाषाण एवं नवपाषाण काल में विभाजित किया। बाद में बर्किट एवं टॉड ने उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं के आधार पर इन दोनों के बीच एक मध्यवर्ती अवस्था को जोड़ा, जिसे मध्यपाषाण काल कहा गया।

पाषाण काल का वर्गीकरण

काल समय
पुरापाषाण काल 2,50,000 ईसा पूर्व से 1,00,000 ईसा पूर्व तक
मध्यपाषाण काल 1,00,000 ईसा पूर्व से 40,000 ईसा पूर्व तक
नवपाषाण काल 40,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व तक

1. पुरापाषाण काल

पुरापाषाण काल के मानव जीवन की जानकारी मुख्य रूप से पत्थरों से बने उपकरणों और औजारों के आधार पर प्राप्त होती है। मानव सभ्यता के प्रारम्भिक चरण को पुरापाषाण काल कहा गया है।

पुरापाषाण काल की प्रमुख विशेषताएँ

निवास स्थान

इस काल का मानव प्राकृतिक गुफाओं और कन्दराओं में रहता था। ये गुफाएँ प्रायः तालाबों, नदियों और अन्य जल स्रोतों के निकट होती थीं।

मानव का जीवन खानाबदोश था। भोजन की तलाश में वह एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूमता रहता था। कभी-कभी वह वृक्षों की डालियों और झाड़ियों में भी छिपकर रहता था।

जीविका के साधन

पुरापाषाण काल का मानव अपनी जीविका के लिए पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था। वह जंगली जानवरों का शिकार करता, मछलियाँ पकड़ता और कन्दमूल तथा फल-फूल खाकर अपनी भूख मिटाता था।

इस समय मानव स्वयं भोजन पैदा नहीं करता था, बल्कि प्रकृति से भोजन प्राप्त करता था। इसलिए उसे खाद्य-संग्राहक जीवन वाला मानव कहा जा सकता है।

आग की खोज

मानव ने पत्थर से पत्थर टकराकर आग जलाना सीखा। आग की खोज पुरापाषाण काल की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।

आग का प्रयोग ठंड से बचने, मांस पकाने, जंगली जानवरों से रक्षा करने तथा प्रकाश प्राप्त करने में किया जाता था।

वेशभूषा

प्रारम्भ में मानव ठंड से बचने के लिए पेड़ों के पत्तों एवं छाल का प्रयोग करता था। बाद में उसने पशुओं की खाल पहनना भी सीख लिया।

इस काल में हड्डियों की सुइयाँ बनाकर पशुओं की खाल को सिलने के प्रमाण भी मिलते हैं। इससे मानव आवश्यकता के अनुसार वस्त्र तैयार कर सकता था।

औजार

पुरापाषाण काल में मानव ने पत्थर के खुरदरे औजार बनाना सीख लिया था। ये औजार सामान्यतः पत्थर के टुकड़ों से बनाए जाते थे और प्राकृतिक हथियारों जैसे दिखाई देते थे।

पत्थर के मुख्य औजारों में हैण्डऐक्स और खण्डानी प्रमुख थे। पत्थर के टुकड़ों से बने शल्क औजार भी उपयोग में आते थे।

इस काल के औजार सामान्यतः भद्दे, बेडौल एवं अव्यवस्थित थे। कुछ पत्थर के औजारों में लकड़ी अथवा हड्डियों के हत्थे भी लगाए जाते थे।

कला

पुरापाषाण काल के प्रारम्भ में मानव गुफाओं की दीवारों पर साधारण रेखाएँ खींचता था। समय के साथ उसकी चित्रकला विकसित होती गई और पुरापाषाण काल के अन्त तक वह अच्छा चित्रकार बन चुका था।

स्पेन की अल्तमीरा, फ्रांस की लास्को तथा भारत की भीमबेटका की गुफाओं में मिले चित्र इस काल की चित्रकला के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

अन्त्येष्टि प्रथा

उत्खनन से प्राप्त सामग्री के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि पुरापाषाण काल में मानव अपने मृतकों को दफनाता था और उनके साथ भोजन तथा अन्य उपयोगी वस्तुएँ भी रख देता था।

इससे यह संकेत मिलता है कि संभवतः वह पुनर्जन्म में विश्वास करता था।

संगठन एवं सामाजिक जीवन

इस काल में मानव झुण्ड बनाकर शिकार करता था तथा प्राप्त शिकार को आपस में बाँटकर खाता था।

कभी-कभी शिकार के हिस्से को लेकर विवाद भी होता था, परन्तु धीरे-धीरे मानव ने यह समझ लिया कि दूसरों के साथ मिलकर रहने में उसकी सुरक्षा अधिक है।

इस प्रकार सहयोग, समन्वय और सामूहिक जीवन की भावना विकसित हुई और सामाजिक जीवन की प्रारम्भिक अवस्था का विकास हुआ।

2. मध्यपाषाण काल

पुरापाषाण काल के बाद मानव विकास में तेजी आई और मध्यपाषाण काल का आरम्भ हुआ। इस काल में मानव समूह बनाकर रहने लगा और समूह का सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति उसका नेता माना जाता था।

इन्हीं समूहों से परिवार और कबीलों का निर्माण होने लगा। प्रत्येक कबीले का अपना सरदार होता था।

मध्यपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएँ

निवास स्थान

मध्यपाषाण काल का मानव गुफाओं, पेड़ की खोखलों तथा पहाड़ियों आदि स्थानों पर रहता था। वह अभी भी कृषि से अपरिचित था और भोजन की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूमता रहता था।

उपयुक्त स्थान मिलने पर वह कुछ समय के लिए वहीं निवास कर लेता था।

औजारों में सुधार

इस काल के औजार पुरापाषाण काल की तुलना में आकार में छोटे और अधिक सुडौल हो गए थे।

मानव ने एक से दो इंच के छोटे हथियार बनाना सीख लिया था, जिनमें लकड़ी के हत्थे लगाए जाते थे।

ब्लेड, प्वाइंट, स्क्रेपर, इन्ग्रेवर और ट्रायंगल जैसे पत्थर के उपकरण प्राप्त हुए हैं। ये जैस्पर, फ्लिन्ट, चर्ट एवं कैल्सेडोनी जैसे पत्थरों से बनाए जाते थे।

पशुपालन की शुरुआत

मध्यपाषाण काल में मानव ने जानवरों के साथ तालमेल बनाना प्रारम्भ किया। परिणामस्वरूप कुत्ता मानव का प्रथम पालतू पशु बना।

पर्यावरण में परिवर्तन के कारण हिरण, खरगोश, भेड़ और बकरी जैसे जीवों का भी विकास हुआ। इसी काल में मानव खाद्य-संग्राहक जीवन से आगे बढ़कर पशुपालन की दिशा में अग्रसर हुआ।

अन्त्येष्टि प्रथा

मध्यपाषाण काल में मानव ने मृतकों को दफनाना प्रारम्भ कर दिया था।

उत्खनन में कब्रों के साथ अस्थि-पंजर और पत्थर के हथियार प्राप्त हुए हैं, जो पारलौकिक जीवन से सम्बन्धित विश्वासों की ओर संकेत करते हैं।

3. नवपाषाण काल

नवपाषाण काल में मानव जीवन में अत्यधिक परिवर्तन हुआ। इस काल में कृषि, पशुपालन, स्थायी बस्तियों, बेहतर औजारों और संगठित सामुदायिक जीवन का विकास हुआ।

मानव जीवन में आए व्यापक परिवर्तनों के कारण इस काल को नवपाषाण युगीन क्रान्ति भी कहा गया है।

नवपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएँ

कृषि का आरम्भ

नवपाषाण काल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि कृषि का आरम्भ था।

मानव ने यह अनुभव किया कि पृथ्वी पर उगे पौधों को व्यवस्थित रूप से उगाकर भोजन प्राप्त किया जा सकता है। कृषि के ज्ञान के बाद उसका खानाबदोश जीवन कम हुआ और वह स्थायी जीवन की ओर बढ़ा।

इस काल की प्रमुख फसलों में गेहूँ, जौ, बाजरा, मक्का, फल और साग आदि सम्मिलित थे।

पशुपालन

कृषि के साथ मानव ने पशुओं की उपयोगिता को भी समझा और पशुपालन प्रारम्भ किया।

गाय, भैंस, बकरी, कुत्ता, घोड़ा और बैल प्रमुख पालतू पशु थे। मानव द्वारा सर्वप्रथम पालतू बनाया गया पशु कुत्ता था।

बस्तियों का विकास

कृषि के पूर्ण रूप से अपनाए जाने के साथ मानव का जीवन स्थायी होने लगा। उसने मिट्टी के घर तथा लकड़ी के खम्भों और घास-फूस से बने मकानों में रहना प्रारम्भ किया।

सामान्यतः बस्तियाँ खेतों के पास बसाई जाती थीं। आगे चलकर इन बस्तियों ने गाँवों का रूप लिया और कुछ गाँव छोटे नगरों में विकसित हुए।

इस प्रकार स्थायी और व्यवस्थित जीवन से संगठित सामाजिक जीवन का विकास हुआ।

औजारों की उन्नति

नवपाषाण काल के औजार पुरापाषाण काल की अपेक्षा अधिक सुडौल, उपयोगी और धारदार थे।

इस काल का महत्वपूर्ण औजार पत्थर की चिकनी कुल्हाड़ी थी। कुल्हाड़ी के एक सिरे को गढ़कर और चिकना करके उसका काटने वाला किनारा तेज बनाया जाता था तथा दूसरे सिरे पर डंडा लगाकर उसे प्रयोग किया जाता था।

कुल्हाड़ी का प्रयोग लकड़ी काटने और उसे आवश्यक आकार देने में किया जाता था। इससे काष्ठ-कला का विकास हुआ।

अन्य प्रमुख औजारों में हँसिया, धनुष-बाण, भाला, सूई और काँटेदार बर्छी आदि सम्मिलित थे। हँसिया का प्रयोग फसल काटने और एकत्र करने के लिए किया जाता था।

मिट्टी के बर्तनों का आविष्कार

स्थायी जीवन और कृषि के विकास के बाद मानव को भोजन तथा अनाज सुरक्षित रखने और पकाने के लिए बर्तनों की आवश्यकता हुई।

प्रारम्भ में सींक और टहनियों से टोकरियाँ बनाई जाती थीं तथा तरल पदार्थ रखने के लिए उन्हें मिट्टी से पोता जाता था। बाद में मानव ने मिट्टी के बर्तनों को आग में पकाना सीख लिया, जिससे वे मजबूत और जलरोधी हो गए।

मिट्टी के बर्तनों का आविष्कार नवपाषाण संस्कृति की प्रमुख उपलब्धियों में से एक था।

सामुदायिक जीवन में सुधार

व्यवस्थित कृषि और पशुपालन के कारण मानव के पास भोजन की उपलब्धता बढ़ी और उसे अन्य कार्यों के लिए भी समय मिलने लगा।

कुछ लोग औजार और बर्तन बनाने जैसे विशेष कार्य करने लगे। इससे श्रम-विभाजन का विकास हुआ।

व्यवस्थित सामुदायिक जीवन के लिए नियमों की आवश्यकता हुई। सामुदायिक निर्णय समूह अथवा वृद्धजनों की परिषद द्वारा लिए जाने का संकेत मिलता है।

कुछ समुदायों में गुणों के आधार पर सरदार अथवा मुखिया चुना जाता था। इन पदों का वंशानुगत होना आवश्यक नहीं था।

धार्मिक विश्वास

नवपाषाणकालीन बस्तियों से मिट्टी की बनी स्त्रियों की छोटी मूर्तियाँ मिली हैं, जिन्हें मातृदेवी कहा गया है।

कृषि प्रारम्भ होने के साथ पृथ्वी को माता मानने और अच्छी फसल की कामना से मातृदेवी की पूजा करने का विश्वास विकसित हुआ।

अन्त्येष्टि प्रथा एवं महापाषाण

नवपाषाण काल और उसके बाद के समुदायों की कब्रों पर बड़े-बड़े पत्थर लगाए जाते थे। इन पत्थरों को महापाषाण कहा जाता है।

कहीं बड़े पत्थर अकेले खड़े मिलते हैं और कहीं ऊँचे अथवा गोल पत्थरों को मेज जैसी आकृति में रखा गया है।

कुछ स्थानों पर इनका प्रयोग सूर्य की गति और समय जानने के लिए भी किया जाता था। इंग्लैंड का प्रसिद्ध स्टोनहेंज इसी प्रकार की संरचना का उदाहरण है।

पहिए का आविष्कार

पहिए का आविष्कार नवपाषाण काल की अत्यन्त महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इससे मानव सभ्यता के विकास को नई गति मिली।

पहिए के प्रमुख उपयोग निम्न थे—

  1. चाक की सहायता से मिट्टी के बर्तन बनाना आसान हुआ।
  2. कताई का कार्य सरल हुआ, जिससे आगे चलकर कपड़ा निर्माण में सहायता मिली।
  3. पहिए वाली गाड़ी बनने से यात्रा तथा सामान ढोना सरल हुआ।
पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण काल में मानव जीवन का विकास
पुरापाषाण से नवपाषाण काल तक औजार, भोजन, निवास और जीवन-पद्धति में परिवर्तन

पुरापाषाण एवं नवपाषाण काल के मानव जीवन की तुलना

पुरापाषाण काल नवपाषाण काल
औजार और हथियार भद्दे, बेडौल एवं खुरदरे थे। औजार सुडौल, चिकने, तेज, नुकीले और पॉलिशदार हो गए।
हथौड़ा, कुल्हाड़ी, रंभी या शल्कल तथा चाकू जैसे औजार उपयोग में थे। हैण्डलयुक्त चाकू, छुरी, धारदार कुल्हाड़ी, बर्छी, तीर-कमान आदि का उपयोग हुआ।
मानव मुख्य रूप से शिकारी था। मानव पशुपालन सीखकर पशुपालक भी बन गया।
मानव भोजन एकत्र करता था। मानव स्वयं भोजन पैदा करने लगा।
कन्दमूल और मांस प्रमुख भोजन थे। घी, दूध, दही, गेहूँ, मक्का, शहद और मांस जैसे विविध खाद्य पदार्थ प्रयोग में आने लगे।
मानव ने आग की खोज की। आग के उपयोग के साथ कृषि तथा पहिए जैसी उपलब्धियाँ विकसित हुईं।
वस्त्र के लिए वृक्षों की छाल, पत्ते और पशुओं की खाल का उपयोग होता था। सूती और सन से बने मोटे वस्त्रों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ।
मानव भ्रमणकारी एवं खानाबदोश था। मानव घर बनाकर एक स्थान पर स्थायी रूप से रहने लगा।
पूर्वजों और मृतकों को दफनाने तथा जादू-टोने आदि में विश्वास था। प्राकृतिक शक्तियों की पूजा, जादू-टोना, मानव-पशु बलि तथा मृतकों की समाधियों से जुड़े धार्मिक विश्वास विकसित हुए।
सामुदायिक जीवन की प्रारम्भिक भावना विकसित हुई। पितृप्रधान परिवार, कबीले और विवाह-प्रथा जैसे सामाजिक संगठन विकसित हुए।

पाषाण काल में मानव विकास का क्रम

पक्ष पुरापाषाण मध्यपाषाण नवपाषाण
जीवन खानाबदोश समूह एवं कबीलों की ओर विकास स्थायी बस्तियाँ
भोजन शिकार एवं खाद्य-संग्रह खाद्य-संग्रह तथा पशुपालन की शुरुआत कृषि एवं पशुपालन
औजार खुरदरे एवं बेडौल छोटे एवं अधिक सुडौल चिकने, धारदार एवं उपयोगी
प्रमुख उपलब्धि आग की खोज पशुपालन की दिशा में प्रगति कृषि, बर्तन, बस्तियाँ एवं पहिया

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

पाषाण काल मानव सभ्यता के क्रमिक विकास का महत्वपूर्ण चरण था। पुरापाषाण काल में मानव शिकारी, खाद्य-संग्राहक और खानाबदोश था। मध्यपाषाण काल में औजार छोटे एवं अधिक विकसित हुए तथा समूह, कबीले और पशुपालन की दिशा में प्रगति हुई। नवपाषाण काल में कृषि, पशुपालन, स्थायी बस्तियाँ, उन्नत औजार, मिट्टी के बर्तन और पहिए जैसी उपलब्धियों ने मानव जीवन को व्यवस्थित तथा स्थायी बना दिया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पाषाण काल को पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण काल में विभाजित किया गया है।
  • पुरापाषाण काल में मानव प्राकृतिक गुफाओं में रहता और खानाबदोश जीवन व्यतीत करता था।
  • पुरापाषाण मानव शिकार, मछली, कन्दमूल और फल-फूल पर निर्भर था।
  • आग की खोज पुरापाषाण काल की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी गई है।
  • पुरापाषाण चित्रकला के प्रमुख उदाहरण अल्तमीरा, लास्को और भीमबेटका में मिलते हैं।
  • मध्यपाषाण काल में छोटे एवं अधिक सुडौल पत्थर के औजार विकसित हुए।
  • मध्यपाषाण काल में कुत्ता मानव का प्रथम पालतू पशु बना।
  • नवपाषाण काल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि कृषि का आरम्भ था।
  • नवपाषाण काल में कृषि के साथ पशुपालन और स्थायी बस्तियों का विकास हुआ।
  • नवपाषाण काल के औजार चिकने, धारदार एवं अधिक उपयोगी थे।
  • मिट्टी के बर्तनों का आविष्कार नवपाषाण संस्कृति की प्रमुख विशेषता थी।
  • सामुदायिक जीवन के विकास के साथ श्रम-विभाजन और मुखिया जैसी व्यवस्थाएँ विकसित हुईं।
  • मातृदेवी की पूजा कृषि एवं पृथ्वी की उर्वरता से सम्बन्धित धार्मिक विश्वास का संकेत देती है।
  • कब्रों पर लगाए गए बड़े पत्थरों को महापाषाण कहा जाता है।
  • पहिए के आविष्कार से मिट्टी के बर्तन बनाना, कताई और परिवहन अधिक सरल हुआ।
UP DELED Study App

Semester 1 की Complete तैयारी

  • Official Syllabus
  • Comprehensive Notes
  • Quick Revision Notes
  • Visual Revision Notes
  • Audio Revision
  • Solved MCQs
  • MCQ Tests
  • 2015–2025 Previous Year Papers
  • Repeated Exam Questions
  • 10 Model Papers
App में पढ़ाई शुरू करें
Topic 3 ताम्र-कांस्य युग एवं लौह युग

ताम्र-कांस्य युग एवं लौह युग

ताम्र-कांस्य युग का परिचय

ताम्र-कांस्य युग मानव सभ्यता के विकास का वह चरण था जिसमें मनुष्य ने पत्थर के साथ-साथ धातुओं का उपयोग करना प्रारम्भ किया। यह युग पाषाण युग और लौह युग के बीच का काल माना जाता है।

इस काल में मनुष्य ने सबसे पहले ताँबे का प्रयोग किया और बाद में ताँबे के साथ टिन मिलाकर काँसा नामक अधिक कठोर मिश्रधातु तैयार की। धातुओं के प्रयोग ने औजारों, कृषि, नगर-निर्माण, व्यापार और शासन व्यवस्था के विकास को नई गति प्रदान की।

ताँबे का प्रयोग

नवपाषाण काल के अन्तिम चरण में मानव को धातुओं का ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी कारण इस अवस्था को ताम्र-पाषाण युग भी कहा गया।

प्रारम्भ में मनुष्य को ताँबे के अयस्क के विषय में जानकारी नहीं थी। वह नदियों के किनारे जमा प्राकृतिक ताँबे का प्रयोग करता था।

बाद में उसने खदानों से ताँबे का अयस्क निकालना सीख लिया। ताँबे के प्रारम्भिक प्रयोग का समय लगभग 5000 ईसा पूर्व बताया गया है तथा लगभग 4500 ईसा पूर्व दक्षिणी इराक के सुमेर क्षेत्र में ताँबे का प्रयोग प्रारम्भ होने का उल्लेख मिलता है।

काँसे का निर्माण

आगे चलकर मनुष्य ने ताँबे में टिन अथवा जस्ता मिलाकर मिश्रित धातु बनाना प्रारम्भ किया। ताँबे और टिन के मिश्रण से बनी धातु को काँसा कहा गया।

काँसा बनाने के लिए लगभग 10 भाग ताँबा और 1 भाग टिन मिलाया जाता था।

काँसा ताँबे की अपेक्षा अधिक उपयोगी और कठोर सिद्ध हुआ। इससे बने उपकरण, औजार और हथियार अधिक मजबूत तथा टिकाऊ होते थे।

मजबूत औजार उपलब्ध होने के कारण बढ़ईगिरी जैसे कार्यों का विकास हुआ और आगे चलकर धातु-अयस्क निकालने तथा औजार बनाने की व्यवस्थित तकनीक विकसित हुई।

कांस्य युगीन सभ्यताओं का विकास

विश्व के विभिन्न भागों में कांस्य युगीन सभ्यताओं का विकास हुआ। इनमें सिंधु घाटी की सभ्यता, दजला-फरात नदियों के मध्य विकसित सुमेरिया की सभ्यता तथा नील नदी के किनारे विकसित मिस्र की सभ्यता प्रमुख थीं।

इन प्रारम्भिक सभ्यताओं का विकास मुख्यतः नदियों के किनारे हुआ। इसके प्रमुख कारण थे—

  1. नदियों के किनारे की भूमि मुलायम एवं उपजाऊ थी।
  2. पीने और सिंचाई के लिए जल आसानी से उपलब्ध था।
  3. नदियाँ यातायात का महत्वपूर्ण साधन थीं।
  4. प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ भूमि को उपजाऊ बनाए रखती थी।
  5. बुवाई, जुताई और निराई जैसे कृषि कार्य अपेक्षाकृत सरल थे।

कांस्य युग की प्रमुख विशेषताएँ

1. नगरों एवं शहरों का उदय

कांस्य युग के प्रारम्भ से नगरों और शहरों के विकास के प्रमाण मिलने लगते हैं। कृषि उत्पादन बढ़ने और खाद्य पदार्थों की नियमित उपलब्धता के कारण लोगों को स्थायी रूप से बसने का अवसर मिला।

सिंचाई और कृषि कार्यों को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए संस्थाओं की आवश्यकता हुई। नगरों के विकास के साथ उनमें अलग-अलग कार्य करने वाले लोगों की संख्या बढ़ी और श्रम-विभाजन का विकास हुआ।

नगरों में पक्के मकान, चौड़ी सड़कें तथा ढकी हुई नालियाँ बनाई जाने लगीं।

2. कृषि में सुधार

प्रारम्भ में मनुष्य लकड़ी के हल का प्रयोग करता था, परन्तु बाद में कृषि कार्यों में पशुओं का उपयोग होने लगा।

अनाज की बढ़ती आवश्यकता के कारण नदी किनारे के वनों को काटकर भूमि को कृषि योग्य बनाया गया। सिंचाई के लिए नहरों और बाँधों का निर्माण भी प्रारम्भ हुआ।

कृषि और बस्तियों की सुरक्षा के लिए सिंचाई व्यवस्था उपयोगी सिद्ध हुई। अधिक अनाज उत्पादन के कारण कुछ लोग कृषि कार्य से मुक्त होकर अन्य व्यवसायों में लगने लगे। ऐसे लोगों के निवास स्थान आगे चलकर नगरों के रूप में विकसित हुए।

3. व्यापार एवं आर्थिक विकास

कृषि की उन्नति, अतिरिक्त अनाज उत्पादन तथा कला और वास्तुकला के विकास के साथ व्यापार-वाणिज्य का भी विकास हुआ।

नगरों में रहने वाले लोगों को अनेक प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता होती थी। इसलिए विभिन्न व्यवसायों और कार्यों में विशेषज्ञ व्यक्तियों का विकास हुआ।

इस प्रकार समाज में कार्य के आधार पर अलग-अलग वर्ग बनने लगे और व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ीं।

4. सामाजिक जीवन का संगठन

कांस्य युग में मानव का सामाजिक जीवन अधिक संगठित हो गया। कृषि के विकास के कारण स्थायी जीवन की प्रवृत्ति मजबूत हुई।

परिवार में सबसे अधिक आयु वाला व्यक्ति परिवार का मुखिया होता था और परिवार के अन्य सदस्य उसकी आज्ञा का पालन करते थे।

अनेक परिवारों के मिलकर रहने से कबीलों की अवधारणा विकसित हुई। प्रत्येक कबीले का एक मुखिया होता था। आगे चलकर इन्हीं कबीलों से राज्यों के निर्माण की दिशा में विकास हुआ।

5. शासन व्यवस्था का उदय

नगरों और व्यापार के विकास के साथ सामाजिक जीवन अधिक जटिल हो गया। इसलिए सार्वजनिक जीवन को व्यवस्थित रखने के लिए शासन व्यवस्था की आवश्यकता अनुभव की गई।

ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता थी जो कानून बनाए, लोगों की सुरक्षा करे, शान्ति स्थापित करे और आपसी विवादों का निपटारा करे।

समय के साथ समाज में शासकों और राजाओं का उदय हुआ तथा शासन को व्यवस्थित रखने के लिए शासक और योद्धा अथवा सैनिक वर्ग का विकास हुआ।

6. धार्मिक स्थिति

भारत में सबसे पहले प्रयोग में आने वाली धातुओं में ताँबा और काँसा प्रमुख थे। इन धातुओं को पवित्र माना जाने लगा।

प्रकृति के निकट जीवन बिताने के कारण लोग सूर्य, चन्द्रमा और विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करते थे। ये देवी-देवता विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक माने जाते थे।

इस समय तक धर्म का स्पष्ट रूप से अलग और व्यवस्थित स्वरूप विकसित नहीं हुआ था।

7. भाषा एवं लेखन कला का विकास

कांस्य युग में भाषा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण विकास हुआ। मानव ने अपने विचारों को लिखित रूप में व्यक्त करना सीख लिया।

लगभग 3000 ईसा पूर्व कांस्य युगीन लिपि का आविष्कार हुआ, जिसे कीलाक्षर लिपि कहा गया है।

इस लिपि में 250 से भी अधिक अक्षर बताए गए हैं। प्रारम्भ में यह लिपि चित्रों पर आधारित थी, परन्तु आगे चलकर इसका स्वरूप ध्वनि पर आधारित हो गया।

ताम्र-कांस्य युग का महत्व

क्षेत्र प्रमुख परिवर्तन
धातु ताँबे तथा काँसे के औजार और हथियार
कृषि पशुओं से हल चलाना, नहर और बाँध का निर्माण
निवास स्थायी नगरों और शहरों का विकास
व्यापार अतिरिक्त उत्पादन और विभिन्न व्यवसायों का विकास
समाज परिवार, कबीले एवं श्रम-विभाजन का विकास
शासन शासक, राजा एवं सैनिक वर्ग का उदय
धर्म प्राकृतिक शक्तियों एवं देवी-देवताओं की पूजा
लेखन कीलाक्षर लिपि का विकास

लौह युग

लौह युग उस काल को कहा जाता है जिसमें मानव ने लोहे का उपयोग प्रारम्भ किया। यह युग पाषाण काल तथा ताम्र-कांस्य युग के बाद आता है।

पाषाण काल में मानव धातुओं के खनन से परिचित नहीं था और कांस्य युग में भी लोहे की खोज नहीं हुई थी। ताम्र एवं कांस्य युग के पश्चात लौह युग का आरम्भ हुआ।

भारत में लोहे का प्रयोग

भारत में लौह युग का प्रारम्भ उत्तर और दक्षिण भारत में एक ही समय पर नहीं हुआ।

उत्तर भारत में ताम्र काल के तुरन्त बाद लोहे का प्रयोग आरम्भ हुआ, जबकि दक्षिण भारत में उत्तर-पाषाण काल के बाद लोहे के प्रयोग का उल्लेख मिलता है।

भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे का प्रयोग लगभग 1000 ईसा पूर्व आरम्भ हुआ माना गया है।

भारत में पामीर के पठार से होते हुए महाराष्ट्र के क्षेत्र तक इसके विकास का उल्लेख मिलता है और आगे चलकर मध्य प्रदेश से बंगाल की ओर इसका प्रयोग फैलता गया।

लौह के प्रयोग से मानव जीवन में परिवर्तन

लोहे की खोज और प्रयोग से मानव के जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन आए। लोहे के औजार ताँबे और काँसे की अपेक्षा अधिक उपयोगी सिद्ध हुए।

लोहे के प्रयोग से कृषि-कार्य अधिक प्रभावी हुआ, जंगलों को साफ करना सरल हुआ और नई कृषि भूमि तैयार की जा सकी। इससे कृषि तथा स्थायी बस्तियों के विकास को और गति मिली।

लोहे के मजबूत औजारों और हथियारों के कारण नए नगरों का विकास हुआ तथा मानव के कलात्मक जीवन में भी परिवर्तन आया।

इस युग में विभिन्न भाषाओं की वर्णमालाओं का विकास हुआ, जिसके कारण साहित्य और इतिहास लिखना सम्भव हुआ। संस्कृत और चीनी भाषाओं का साहित्य इस काल में विकसित हुआ तथा ऋग्वेद और आवेस्ता की गाथाओं का भी उल्लेख इसी संदर्भ में किया गया है।

ताम्र, कांस्य एवं लौह युग में मानव सभ्यता का विकास
ताँबे से काँसे और फिर लोहे के प्रयोग तक औजार, कृषि, नगर और सामाजिक जीवन का विकास

ताम्र-कांस्य युग एवं लौह युग का तुलनात्मक सार

ताम्र-कांस्य युग लौह युग
ताँबे तथा काँसे का प्रमुख प्रयोग हुआ। लोहे का प्रयोग प्रारम्भ हुआ।
काँसा ताँबे और टिन को मिलाकर बनाया गया। लोहे के अधिक मजबूत औजार बनाए गए।
नगरों, कृषि और व्यापार का विकास हुआ। कृषि और नगरों के विकास को और गति मिली।
नहर और बाँध बनाकर सिंचाई में सुधार हुआ। लोहे के औजारों से भूमि साफ करना और कृषि करना सरल हुआ।
शासन, सामाजिक संगठन और लेखन कला विकसित हुई। साहित्य, इतिहास तथा वर्णमालाओं के विकास को बढ़ावा मिला।

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

ताम्र-कांस्य युग में मानव ने पत्थर से आगे बढ़कर धातुओं का प्रयोग प्रारम्भ किया। ताँबे और काँसे के मजबूत औजारों से कृषि, नगर, व्यापार, शासन और लेखन कला का विकास हुआ। आगे लौह के प्रयोग ने मानव जीवन में और व्यापक परिवर्तन किए। मजबूत लोहे के औजारों ने कृषि और नगरों के विस्तार को गति दी तथा भाषा, साहित्य और इतिहास लेखन के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • ताम्र-कांस्य युग पाषाण युग और लौह युग के बीच का काल है।
  • ताँबे का प्रारम्भिक प्रयोग लगभग 5000 ईसा पूर्व बताया गया है।
  • लगभग 4500 ईसा पूर्व दक्षिणी इराक के सुमेर क्षेत्र में ताँबे के प्रयोग का उल्लेख मिलता है।
  • काँसा ताँबे और टिन से बनी मिश्रधातु है; लगभग 10 भाग ताँबा और 1 भाग टिन मिलाया जाता था।
  • काँसे के उपकरण ताँबे की तुलना में अधिक मजबूत और टिकाऊ थे।
  • प्रारम्भिक कांस्य युगीन सभ्यताओं का विकास मुख्य रूप से नदियों के किनारे हुआ।
  • कांस्य युग में नगरों एवं शहरों, कृषि, सिंचाई, व्यापार और श्रम-विभाजन का विकास हुआ।
  • परिवारों से कबीलों और कबीलों से आगे राज्यों की अवधारणा विकसित हुई।
  • शासन व्यवस्था के विकास के साथ शासक और सैनिक वर्ग का उदय हुआ।
  • लगभग 3000 ईसा पूर्व कीलाक्षर लिपि का आविष्कार बताया गया है।
  • कीलाक्षर लिपि में 250 से अधिक अक्षर थे और प्रारम्भ में यह चित्रों पर आधारित थी।
  • लौह युग ताम्र-कांस्य युग के पश्चात प्रारम्भ हुआ।
  • भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे का प्रयोग लगभग 1000 ईसा पूर्व आरम्भ माना गया है।
  • लोहे के औजारों से कृषि, जंगलों की सफाई, नई बस्तियों और नगरों के विकास को गति मिली।
  • लौह युग में वर्णमालाओं, साहित्य और इतिहास लेखन के विकास को भी बढ़ावा मिला।

Advertisement

Topic 4 सिंधु घाटी सभ्यता: परिचय एवं प्रमुख विशेषताएँ

सिंधु घाटी सभ्यता: परिचय एवं प्रमुख विशेषताएँ

सिंधु घाटी सभ्यता का परिचय

सिंधु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में एक प्रमुख सभ्यता थी। इसे हड़प्पा सभ्यता तथा सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है।

इस अज्ञात सभ्यता की खोज का श्रेय रायबहादुर दयाराम साहनी को दिया जाता है। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में सन् 1921 में हड़प्पा स्थल की खुदाई कराई गई।

लगभग एक वर्ष बाद सन् 1922 में राखाल दास बनर्जी के नेतृत्व में वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के लरकाना जिले में मोहनजोदड़ो की खुदाई के दौरान एक अन्य प्राचीन नगर का पता चला।

प्रारम्भ में माना गया कि इस सभ्यता का विस्तार मुख्यतः सिंधु नदी की घाटी तक था, इसलिए इसका नाम सिंधु घाटी सभ्यता पड़ा। हड़प्पा में सर्वप्रथम उत्खनन होने के कारण इसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा गया। बाद में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को एक ही विस्तृत सभ्यता के प्रमुख नगर माना गया।

सिंधु सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ

सिंधु सभ्यता का स्वरूप मुख्य रूप से नगरीय था। इसकी नगर योजना, भवन निर्माण, जल निकासी, विशाल स्नानागार, अन्नागार, कला, व्यापार और सामाजिक व्यवस्था इसके विकसित स्वरूप को स्पष्ट करते हैं।

1. नगर निर्माण योजना

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के नगर सुव्यवस्थित योजना के अनुसार बनाए गए थे। इन नगरों की सड़कें सीधी और चौड़ी थीं तथा एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।

मोहनजोदड़ो की मुख्य सड़क लगभग 10 मीटर से 33 मीटर तक चौड़ी बताई गई है। मकान सड़कों के किनारे बनाए गए थे और उनके निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया था।

कुछ मकान अनेक मंजिलों वाले थे। प्रत्येक मकान में कुआँ और स्नानागार जैसी सुविधाएँ मिलती हैं।

जल निकासी व्यवस्था

मोहनजोदड़ो की जल निकासी व्यवस्था अत्यन्त व्यवस्थित थी। घरों से निकलने वाला गन्दा पानी छोटी नालियों से होकर बड़ी नाली में पहुँचता था।

इस प्रकार विकसित नालियों की व्यवस्था सिंधु नगरों की स्वच्छता और उन्नत नगर-योजना का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

2. भवन निर्माण

सिंधु सभ्यता के निवासी उच्चकोटि के भवन निर्माता थे। उत्खनन से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर भवनों को सामान्य रूप से दो वर्गों में समझा जा सकता है—

  1. राजकीय एवं सार्वजनिक भवन
  2. साधारण भवन
राजकीय एवं सार्वजनिक भवन

मोहनजोदड़ो से एक विशाल भवन के अवशेष मिले हैं। इसकी लम्बाई लगभग 71 मीटर थी और इसकी चौड़ाई भी लगभग इतनी ही मानी गई है।

इसमें एक विशाल कक्ष था जिसकी छत 20 स्तम्भों पर टिकी हुई थी। इसका फर्श पक्की ईंटों से बनाया गया था। इसका उपयोग सम्भवतः सभा अथवा बैठक के लिए किया जाता था।

दुर्ग

नगर के पश्चिमी टीले पर सुरक्षा की दृष्टि से एक दुर्ग का निर्माण किया गया था। ह्वीलर ने इस टीले को माउण्ट ए-बी नाम दिया।

दुर्ग उत्तर-दक्षिण दिशा में लगभग 460 गज तथा पूर्व-पश्चिम दिशा में लगभग 215 गज विस्तृत था। इसके चारों ओर लगभग 45 फीट चौड़ी सुरक्षा प्राचीर थी, जिसमें फाटक और रक्षक गृह बनाए गए थे।

दुर्ग के बाहर श्रमिकों के आवास के प्रमाण भी मिले हैं। इन आवासों में आँगन और कमरों की व्यवस्था थी।

साधारण भवन

साधारण लोगों के मकान आवश्यकता के अनुसार छोटे या बड़े तथा एक या दो मंजिल के बनाए जाते थे। ऊपरी मंजिल पर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनाई जाती थीं।

भवनों में खिड़कियाँ, रोशनदान, दरवाजे, रसोईघर, कुएँ और स्नानागार होते थे। फर्श ईंट, खड़िया और गारे से बनाया जाता था।

जल निकास की समुचित व्यवस्था थी। घरों के दरवाजे सामान्यतः मुख्य सड़क की ओर न खुलकर गलियों की ओर खुलते थे।

3. विशाल स्नानागार

मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल स्नानागार सिंधु सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण स्थापत्य उपलब्धियों में से एक है।

इसकी कुल लम्बाई लगभग 55 मीटर, चौड़ाई 33 मीटर तथा बाहरी दीवारों की मोटाई लगभग 3 मीटर थी।

इसके आँगन के मध्य में एक स्नानकुण्ड था, जिसकी लम्बाई लगभग 12 मीटर, चौड़ाई 7 मीटर और गहराई 2.4 मीटर थी।

स्नानकुण्ड में जल की सतह तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनी थीं। इसके चारों ओर बरामदे, गलियाँ और कमरे थे।

स्नानकुण्ड को जल से भरने के लिए पास में एक कुआँ था। जल निकासी की व्यवस्था भी अच्छी थी। इसके दक्षिण-पश्चिम की ओर आठ छोटे स्नानागार बने होने का उल्लेख मिलता है।

4. अन्नागार

सिंधु सभ्यता का अन्नागार भी उसकी महत्वपूर्ण उपलब्धि था। इसकी लम्बाई लगभग 18 मीटर और चौड़ाई लगभग 7 मीटर बताई गई है।

यहाँ सम्भवतः गाँवों से लाया गया अनाज एकत्र किया जाता था। इस संग्रहीत अनाज का उपयोग शहरी तथा ग्रामीण जनता द्वारा आपातकालीन परिस्थितियों में किया जा सकता था।

सिंधु घाटी सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ
सुव्यवस्थित नगर, जल निकासी, विशाल स्नानागार, अन्नागार और प्रमुख सांस्कृतिक साक्ष्य

5. धार्मिक जीवन

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से बड़ी संख्या में देवी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इन्हें मातृदेवी अथवा प्रकृति देवी से सम्बन्धित माना गया है।

एक मुहर पर ऐसी नारी का चित्र मिलता है जिसके पेट से पौधा निकलता हुआ दिखाया गया है। इससे मातृदेवी तथा उर्वरता से सम्बन्धित धार्मिक विश्वासों का संकेत मिलता है।

एक अन्य चित्र में चाकू लिए पुरुष तथा हाथ ऊपर उठाए नारी का चित्र मिलता है, जिसे सम्भावित बलि-प्रथा से जोड़ा गया है।

मोहनजोदड़ो की एक मुहर पर योगी जैसी आकृति प्राप्त हुई है, जिसे पशुपतिनाथ शिव के अनुरूप माना गया है। लिंग-प्रस्तरों और मातृदेवी की मृण्मूर्तियों के प्रमाण भी मिले हैं।

इसके अतिरिक्त नाग पूजा, वृक्ष पूजा, सूर्य पूजा तथा जल पूजा के संकेत भी प्राप्त हुए हैं।

6. सामाजिक जीवन

सिंधु सभ्यता के समाज में विभिन्न प्रकार के कार्य करने वाले लोग रहते थे। पुरोहित, व्यापारी, शिल्पकार और श्रमिक जैसे वर्ग समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

आहार

सिंधु सभ्यता के निवासी शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन करते थे।

गेहूँ, जौ, चावल, दूध, सब्जियाँ और फल उनके प्रमुख खाद्य पदार्थ थे। इसके अतिरिक्त गाय, भेड़, मछली, कछुआ और मुर्गे आदि के मांस का भी उपयोग किया जाता था।

वेशभूषा एवं आभूषण

सिंधु सभ्यता के निवासी सूती और ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। सोना, चाँदी, ताँबा और हाथी-दाँत से बने आभूषण भी मिले हैं।

मनके, सीप और मिट्टी के आभूषणों का भी प्रयोग किया जाता था। स्त्री और पुरुष दोनों अंगूठी, कड़े, कान के आभूषण और कुण्डल पहनते थे। स्त्रियाँ चूड़ियाँ, कर्णफूल, हार और भुजबन्द आदि पहनती थीं।

गृहस्थी के उपकरण

घड़े, कलश, थाली, गिलास, चम्मच, मिट्टी के कुल्हड़ और विभिन्न धातुओं के बर्तन घरेलू जीवन में प्रयोग किए जाते थे।

मनोरंजन के साधन

नृत्य, आखेट, संगीत, पासे का खेल तथा मुर्गों की लड़ाई जैसे मनोरंजन के साधनों का प्रचलन था।

औषधियाँ एवं शल्य चिकित्सा

सिंधु सभ्यता के निवासी विभिन्न औषधियों का प्रयोग करते थे। कालीबंगा और लोथल से खोपड़ी की शल्य चिकित्सा से सम्बन्धित प्रमाण बताए गए हैं।

प्रसाधन सामग्री

सिंधु सभ्यता की स्त्रियाँ प्रसाधन सामग्री का प्रयोग करती थीं। चन्हूदड़ो से लिपस्टिक के प्रयोग के प्रमाण मिलने का उल्लेख किया गया है।

7. आर्थिक जीवन

कृषि

सिंधु सभ्यता की अधिकांश जनता कृषि कार्य करती थी और नगरों के बाहरी क्षेत्रों में निवास करती थी। गेहूँ, जौ और मटर की खेती प्रमुख थी। कपास की खेती भी की जाती थी।

पशुपालन

कूबड़ वाले और बिना कूबड़ वाले पशु, बकरियाँ और भैंसें पाली जाती थीं। हाथी पालने के भी संकेत मिलते हैं। घोड़े का विशेष उपयोग किए जाने के स्पष्ट प्रमाण नहीं बताए गए हैं।

वस्त्र निर्माण

सिंधु निवासी कपास की खेती करते थे और सूत कातने तथा कपड़ा बुनने की कला से परिचित थे।

बन्दरगाह

लोथल और सुरकोटड़ा को प्रमुख बन्दरगाहों के रूप में बताया गया है। इनके माध्यम से जल तथा स्थल दोनों मार्गों से सम्पर्क स्थापित होता था।

व्यापार-वाणिज्य

सिंधु सभ्यता का व्यापार दूर-दूर के क्षेत्रों से था। मेसोपोटामिया में प्राप्त सिंधु संस्कृति की वस्तुएँ दोनों सभ्यताओं के बीच समुद्री व्यापार का संकेत देती हैं।

दिलमुन दोनों क्षेत्रों के व्यापार का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था। हड़प्पा से मिट्टी के बर्तन, अनाज, सूती कपड़े, मसाले, पत्थर से बनी वस्तुएँ, हाथी-दाँत और अन्य सामग्री भेजी जाती थी तथा धातु सम्बन्धी वस्तुएँ बाहर से भारत लाई जाती थीं।

8. कला

सिंधु सभ्यता में भवन निर्माण, धातुकला, चित्रकला, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला और मुहर निर्माण जैसी कलाएँ विकसित थीं।

भवन निर्माण कला

विशाल अन्नागार, विशाल स्नानागार तथा सुव्यवस्थित नगर इसकी उन्नत भवन निर्माण कला के प्रमाण हैं।

धातुकला

सिंधु निवासी सोना, चाँदी और ताँबे से आभूषण बनाते थे। मोहनजोदड़ो से प्राप्त काँसे की प्रसिद्ध नर्तकी की मूर्ति धातुकला का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

चित्रकला

बर्तनों और मुहरों पर बने चित्रों से चित्रकला की जानकारी प्राप्त होती है।

संगीत एवं नृत्यकला

सिंधु सभ्यता के लोगों की संगीत और नृत्य में रुचि थी। ढोल, तबला तथा नर्तकी की आकृति जैसी वस्तुएँ इसके प्रमाण के रूप में दी गई हैं।

मूर्तिकला

मोहनजोदड़ो से काँसे की नर्तकी की मूर्ति तथा पत्थर की मानव आकृतियाँ मिली हैं। हड़प्पा से लाल पत्थर में बनी सिरविहीन मानव प्रतिमाएँ और विभिन्न पशुओं की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं।

मुहरें एवं चित्रांकन

हड़प्पा से प्राप्त मुहरें इस सभ्यता की विशिष्ट कला का प्रमाण हैं। इन पर अनेक प्रकार की आकृतियाँ बनाई गई थीं।

कुछ मुहरों पर चोटी बाँधकर बैठी स्त्री और सामने झण्डा या पूजा-सामग्री जैसी आकृति दिखाई देती है। अन्य मुहरों पर जंगली हाथी और मगर जैसे पशुओं के चित्र भी मिलते हैं।

9. लेखन कला एवं लिपि

हड़प्पा लिपि का सबसे पुराना नमूना सन् 1853 में मिलने का उल्लेख है, जबकि सन् 1923 तक इसका स्वरूप स्पष्ट रूप से सामने आया।

सिंधु लिपि में लगभग 64 मूल चिन्ह तथा कुल मिलाकर लगभग 205 से 400 तक संकेत बताए गए हैं। ये संकेत सेलखड़ी की आयताकार मुहरों तथा ताँबे की गुटिकाओं आदि पर मिलते हैं।

सिंधु लिपि चित्रात्मक थी और अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। प्राप्त सबसे बड़े लेख में लगभग 17 चिन्ह बताए गए हैं।

कालीबंगा से प्राप्त मिट्टी के एक टुकड़े पर चिन्हों की स्थिति के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि सिंधु लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी।

10. मुहरें

सिंधु सभ्यता में मुहरों का महत्वपूर्ण स्थान था। अब तक लगभग 5000 मुहरें प्राप्त होने का उल्लेख है, जिनमें लगभग 1200 मुहरें मोहनजोदड़ो से मिली थीं।

ये मुहरें बेलनाकार, वर्गाकार, आयताकार और वृत्ताकार रूपों में मिलती हैं। अधिकांश मुहरें सेलखड़ी से बनाई गई थीं।

मुहरों पर संक्षिप्त लेख और अनेक पशुओं की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। एक-श्रृंगी साँड की आकृति सबसे अधिक मिलने वाली आकृतियों में प्रमुख है। इसके अतिरिक्त भैंस, बाघ, गैंडा, हिरन, बकरी और हाथी आदि के चित्र भी प्राप्त हुए हैं।

लोथल और देशलपुर से ताँबे की मुहरें मिलने का भी उल्लेख है।

11. मृतक संस्कार

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त प्रमाणों से ज्ञात होता है कि मृतकों के अन्तिम संस्कार की तीन प्रमुख विधियाँ प्रचलित थीं—

पूर्ण समाधि

इसमें मृतक के पूरे शरीर को जमीन के अन्दर गाड़कर समाधि बनाई जाती थी। लोथल में एक ही कब्र में दो कंकाल मिलने का उल्लेख है।

आंशिक समाधि

इस विधि में मृत शरीर को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के लिए छोड़ दिया जाता था। बाद में बची हुई अस्थियों को किसी पात्र में रखकर जमीन में गाड़ दिया जाता था।

दाहकरण

इसमें शव को जलाने के बाद राख और अस्थियों को किसी पात्र या कलश में रखकर भूमि में गाड़ दिया जाता था। मोहनजोदड़ो से कलश-शवाधान के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

सिंधु सभ्यता का अन्त

सिंधु सभ्यता के विनाश का निश्चित कारण ज्ञात नहीं है। महामारी, सूखा, बाढ़, भूकम्प और विदेशी आक्रमण आदि को इसके पतन के सम्भावित कारणों में माना गया है।

ये सभी कारण आंशिक रूप से इस सभ्यता के अन्त के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं। कुछ विद्वानों ने आर्यों के आक्रमण को भी सिंधु सभ्यता के पतन का कारण माना है, किन्तु किसी एक कारण को निश्चित रूप से स्वीकार नहीं किया गया है।

सिंधु सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ एक नजर में

क्षेत्र प्रमुख विशेषता
नगर योजना सीधी और चौड़ी सड़कें, समकोण पर काटती सड़कें तथा विकसित जल निकासी
भवन पक्की ईंटों के एक एवं बहुमंजिला मकान, कुएँ और स्नानागार
विशाल स्नानागार मोहनजोदड़ो का 12 × 7 × 2.4 मीटर का स्नानकुण्ड
अन्नागार अनाज के संग्रह एवं आपातकालीन उपयोग की व्यवस्था
धर्म मातृदेवी, पशुपति, नाग, वृक्ष, सूर्य एवं जल पूजा
अर्थव्यवस्था कृषि, पशुपालन, वस्त्र निर्माण और दूरस्थ व्यापार
कला भवन निर्माण, धातुकला, मूर्तिकला, चित्रकला एवं नृत्य-संगीत
लिपि चित्रात्मक और अपठित; दाएँ से बाएँ लिखे जाने का संकेत
मुहरें लगभग 5000; पशु आकृतियाँ और संक्षिप्त लेख
मृतक संस्कार पूर्ण समाधि, आंशिक समाधि एवं दाहकरण

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

सिंधु घाटी सभ्यता एक विकसित नगरीय सभ्यता थी। इसकी सुव्यवस्थित नगर योजना, पक्के भवन, उन्नत जल निकासी, विशाल स्नानागार और अन्नागार इसके स्थापत्य विकास को दर्शाते हैं। कृषि, पशुपालन, वस्त्र निर्माण और दूरस्थ व्यापार इसकी समृद्ध अर्थव्यवस्था के आधार थे। मातृदेवी और पशुपति से सम्बन्धित धार्मिक संकेत, विकसित कला, मूर्तियाँ, मुहरें तथा चित्रात्मक लिपि इसके समृद्ध सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को स्पष्ट करते हैं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सिंधु सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता तथा सिंधु-सरस्वती सभ्यता भी कहा जाता है।
  • हड़प्पा की खोज का श्रेय रायबहादुर दयाराम साहनी को दिया जाता है; सन् 1921 में खुदाई हुई।
  • मोहनजोदड़ो की खुदाई सन् 1922 में राखाल दास बनर्जी के नेतृत्व में हुई।
  • सिंधु नगरों की सड़कें सीधी, चौड़ी और एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
  • पक्की ईंटों के मकान, कुएँ, स्नानागार और विकसित नालियाँ नगर योजना की प्रमुख विशेषताएँ थीं।
  • मोहनजोदड़ो के विशाल स्नानागार का स्नानकुण्ड लगभग 12 मीटर लम्बा, 7 मीटर चौड़ा और 2.4 मीटर गहरा था।
  • अन्नागार में सम्भवतः गाँवों से लाया गया अनाज एकत्र किया जाता था।
  • मातृदेवी, पशुपति, नाग, वृक्ष, सूर्य और जल पूजा के प्रमाण मिलते हैं।
  • सिंधु निवासियों का प्रमुख आर्थिक आधार कृषि, पशुपालन, वस्त्र निर्माण और व्यापार था।
  • लोथल और सुरकोटड़ा को प्रमुख बन्दरगाह बताया गया है।
  • काँसे की नर्तकी सिंधु सभ्यता की धातुकला का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
  • सिंधु लिपि चित्रात्मक और अभी तक अपठित है।
  • सिंधु लिपि के लगभग 64 मूल चिन्ह और 205 से 400 तक संकेत बताए गए हैं।
  • लगभग 5000 मुहरें प्राप्त होने का उल्लेख है, जिनमें लगभग 1200 मोहनजोदड़ो से मिली हैं।
  • मृतक संस्कार की तीन विधियाँ थीं—पूर्ण समाधि, आंशिक समाधि और दाहकरण।
  • सिंधु सभ्यता के अन्त का कोई एक निश्चित कारण ज्ञात नहीं है।
Topic 5 सिंधु सभ्यता: काल, विस्तार एवं प्रमुख स्थल

सिंधु सभ्यता: काल, विस्तार एवं प्रमुख स्थल

सिंधु सभ्यता का काल निर्धारण

सिंधु सभ्यता का निश्चित काल निर्धारित करना कठिन रहा है। विभिन्न विद्वानों ने पुरातात्विक प्रमाणों, मेसोपोटामिया से प्राप्त हड़प्पाई मुहरों तथा बाद में विकसित कार्बन डेटिंग जैसी वैज्ञानिक विधियों के आधार पर इसके काल के विषय में अलग-अलग मत प्रस्तुत किए।

जॉन मार्शल का मत

सिंधु सभ्यता के काल निर्धारण का प्रारम्भिक प्रयास जॉन मार्शल ने किया। उन्होंने मेसोपोटामिया के उर और किश नामक स्थलों से प्राप्त हड़प्पाई मुहरों के आधार पर सन् 1931 में इस सभ्यता का काल लगभग 3250 ईसा पूर्व से 2750 ईसा पूर्व माना।

ह्वीलर का मत

ह्वीलर ने सिंधु सभ्यता का काल लगभग 2500 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व माना।

कार्बन डेटिंग के आधार पर काल विभाजन

कार्बन डेटिंग के विकास के बाद सिंधु सभ्यता के काल को तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया गया—

चरण अनुमानित काल
प्राक् हड़प्पा चरण लगभग 3500–2600 ईसा पूर्व
परिपक्व हड़प्पा चरण लगभग 2600–1900 ईसा पूर्व
उत्तर हड़प्पा चरण लगभग 1900–1300 ईसा पूर्व

रेडियो कार्बन C-14 जैसी वैज्ञानिक विश्लेषण पद्धतियों के आधार पर सिंधु सभ्यता का सामान्य काल लगभग 2500 ईसा पूर्व से 1750 ईसा पूर्व भी माना गया है।

विभिन्न विद्वानों द्वारा सिंधु सभ्यता का काल निर्धारण

विद्वान अनुमानित काल
माधोस्वरूप वत्स 3500–2700 ईसा पूर्व
जॉन मार्शल 3250–2750 ईसा पूर्व
डेल्स 2900–1900 ईसा पूर्व
अर्नेस्ट मैके 2800–1500 ईसा पूर्व
मॉर्टिमर ह्वीलर 2500–1500 ईसा पूर्व
सी. जे. गैड 2350–1700 ईसा पूर्व
डी. पी. अग्रवाल 2350–1750 ईसा पूर्व
फेयर सर्विस 2000–1500 ईसा पूर्व

सिंधु सभ्यता के प्रमुख स्थल एवं खोजकर्ता

स्थल खोजकर्ता / उत्खननकर्ता वर्ष
हड़प्पा दयाराम साहनी, माधोस्वरूप वत्स 1921
मोहनजोदड़ो राखाल दास बनर्जी 1922
रोपड़ यज्ञदत्त शर्मा 1953
कालीबंगा ब्रजवासी लाल, अमलानन्द घोष 1953
लोथल एस. रंगनाथ राव 1954
चन्हूदड़ो एन. गोपाल मजूमदार 1931
सुरकोटड़ा जगपति जोशी 1964
बनावली रवीन्द्र सिंह बिष्ट 1973
आलमगीरपुर यज्ञदत्त शर्मा 1958
रंगपुर माधोस्वरूप वत्स, रंगनाथ राव 1931–1953
कोटदीजी फजल अहमद 1953
सुत्कागेनडोर ऑरेल स्टाइन, जार्ज एफ. डेल्स 1927

सिंधु सभ्यता का विस्तार

सिंधु सभ्यता के अवशेष वर्तमान पाकिस्तान और भारत के विस्तृत क्षेत्र में प्राप्त हुए हैं। इसके प्रमुख अवशेष पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर तक मिले हैं।

सभ्यता के विस्तार की प्रमुख सीमाएँ निम्न प्रकार बताई गई हैं—

  • पूर्व में — आलमगीरपुर तक
  • पश्चिम में — मकरान तट पर सुत्कागेनडोर तक
  • उत्तर में — जम्मू क्षेत्र के माण्डा तक
  • दक्षिण में — दायमाबाद तक

इसका विस्तार लगभग त्रिभुजाकार था और लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ बताया गया है।

पूर्व से पश्चिम इसकी लम्बाई लगभग 1600 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण लगभग 1400 किलोमीटर थी। इस प्रकार यह समकालीन मिस्र और सुमेरियन सभ्यताओं की तुलना में अधिक विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई थी।

प्रमुख हड़प्पाई स्थलों का संक्षिप्त परिचय

1. हड़प्पा

हड़प्पा वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र में स्थित था। इसकी खोज सन् 1921 में हुई। सन् 1857 में लाहौर-मुल्तान रेलवे निर्माण के समय हड़प्पा की प्राचीन ईंटों का उपयोग किया गया, जिससे इस स्थल को काफी नुकसान पहुँचा।

2. मोहनजोदड़ो

मोहनजोदड़ो का अर्थ मृतकों का टीला बताया गया है। यह पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के लरकाना जिले में सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर स्थित था।

सन् 1922 में इसकी खोज का श्रेय राखाल दास बनर्जी को दिया गया। यह नगर लगभग 5 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ बताया गया है।

3. चन्हूदड़ो

चन्हूदड़ो मोहनजोदड़ो के दक्षिण में स्थित था। यहाँ मुहरें, मनके और हड्डियों से बनी अनेक वस्तुएँ तैयार की जाती थीं।

इस स्थल की खोज सन् 1931 में एन. गोपाल मजूमदार ने की। यहाँ से झूकर और झांगर संस्कृतियों के प्रमाण भी प्राप्त हुए।

4. लोथल

लोथल गुजरात के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के किनारे सरगवाला नामक ग्राम के समीप स्थित था।

सन् 1954–55 में रंगनाथ राव के नेतृत्व में यहाँ उत्खनन हुआ। इस स्थल से समकालीन सभ्यता के पाँच स्तर मिलने का उल्लेख है।

5. कालीबंगा

कालीबंगा राजस्थान के गंगानगर क्षेत्र में घग्घर नदी के बाएँ तट पर स्थित था। सन् 1953 में बी. बी. लाल और बी. के. थापड़ द्वारा यहाँ उत्खनन कराया गया।

यहाँ प्राक्-हड़प्पा तथा हड़प्पाकालीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

6. बनावली

बनावली हरियाणा के हिसार जिले में स्थित है। यहाँ हड़प्पा-पूर्व और हड़प्पाकालीन दोनों सांस्कृतिक अवस्थाओं के अवशेष मिले हैं।

सन् 1973–74 में रवीन्द्र सिंह बिष्ट के नेतृत्व में यहाँ खुदाई की गई।

7. रोपड़

रोपड़ पंजाब में सतलज नदी के बाएँ तट पर स्थित था। इसकी खोज सन् 1950 में बी. बी. लाल द्वारा किए जाने का उल्लेख है। स्वतंत्रता के बाद यहाँ सर्वप्रथम उत्खनन किया गया।

8. सुरकोटड़ा

सुरकोटड़ा गुजरात के कच्छ क्षेत्र में स्थित है। इसकी खोज सन् 1964 में जगपति जोशी ने की। यहाँ सिंधु सभ्यता के पतनकालीन अवशेष सुरक्षित मिलने का उल्लेख है।

9. आलमगीरपुर

आलमगीरपुर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में यमुना की सहायक हिंडन नदी के किनारे स्थित है। इसकी खोज सन् 1958 में यज्ञदत्त शर्मा द्वारा की गई।

10. रंगपुर

रंगपुर गुजरात क्षेत्र में भादर नदी के समीप स्थित था। यहाँ पूर्व हड़प्पाकालीन तथा उत्तर हड़प्पाकालीन दोनों प्रकार के प्रमाण मिले हैं।

यहाँ कच्ची ईंटों का दुर्ग, नालियाँ, मृद्भाण्ड, बाँट और पत्थर के फलक आदि प्राप्त हुए हैं। धान की भूसी के ढेर मिलने का भी उल्लेख है।

अन्य क्षेत्रों में प्राप्त हड़प्पाई स्थल

सिंधु सभ्यता केवल हड़प्पा और मोहनजोदड़ो तक सीमित नहीं थी। इसके अवशेष कई अन्य क्षेत्रों में भी प्राप्त हुए—

  • अली मुराद — सिंध क्षेत्र; कुएँ, मिट्टी के बर्तन, दुर्ग, बैल की लघु मूर्ति और काँसे की कुल्हाड़ी।
  • बलूचिस्तान — मकरान तट क्षेत्र में सुत्कागेनडोर, सुत्काकोह, बालाकोट तथा डावरकोट जैसे स्थल।
  • उत्तर-पश्चिमी सीमांत — गोमल घाटी तथा गुमला जैसे स्थान।
  • पश्चिमी पंजाब — डेरा इस्माइलखान, जलीलपुर, रहमानढेरी, गुमला और चक-पुरबानस्याल आदि।
  • पूर्वी पंजाब — रोपड़ प्रमुख; कोटलानिहंग खान, चक 86 वाड़ा और ढेर-मजरा जैसे स्थल।
  • बहावलपुर — सूखी सरस्वती नदी के मार्ग, जिसे स्थानीय रूप से हकरा कहा गया है, के किनारे अनेक हड़प्पाई स्थल।
  • गंगा-यमुना दोआब — आलमगीरपुर तथा हुलास और बाड़गाँव जैसे स्थल।
  • जम्मू — माण्डा प्रमुख स्थल।
  • महाराष्ट्र — दायमाबाद से सिंधु सभ्यता से सम्बन्धित सामग्री प्राप्त हुई।
  • अफगानिस्तान — मुंडीगाक और शोरतुगई प्रमुख पुरास्थल।

हड़प्पाकालीन नदियों के किनारे बसे प्रमुख नगर

नगर नदी / समुद्र तट
मोहनजोदड़ो सिंधु नदी
हड़प्पा रावी नदी
रोपड़ सतलज नदी
कालीबंगा घग्घर नदी
लोथल भोगवा नदी
सुत्कागेनडोर दाश्क नदी
बालाकोट अरब सागर
सोत्काकोह अरब सागर
आलमगीरपुर हिंडन नदी
रंगपुर भादर नदी
कोटदीजी सिंधु नदी
सिंधु सभ्यता का विस्तार एवं प्रमुख स्थल
सिंधु सभ्यता का विस्तृत क्षेत्र तथा हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल और अन्य प्रमुख स्थल

सिंधु सभ्यता के निर्माता एवं निवासी

सिंधु सभ्यता के वास्तविक निर्माता और निवासी कौन थे, इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। प्रमुख मत निम्नलिखित हैं—

  1. डॉ. लक्ष्मण स्वरूप और रामचन्द्र सिंधु सभ्यता तथा वैदिक सभ्यता दोनों के निर्माता आर्यों को मानते हैं।
  2. गार्डन चाइल्ड सिंधु सभ्यता के निर्माताओं को सुमेरियन मानते हैं।
  3. राखाल दास बनर्जी ने इसके निर्माताओं को द्रविड़ माना।
  4. ह्वीलर का मत था कि ऋग्वेद में वर्णित दस्यु और दास सिंधु सभ्यता के निर्माता थे।
  5. इन मतों की समीक्षा करते हुए डॉ. रमा शंकर त्रिपाठी ने कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक ज्ञान की सीमा को देखते हुए इस विषय में निश्चित निर्णय देने की अपेक्षा मौन रहना अधिक उचित है।

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

सिंधु सभ्यता अत्यन्त विस्तृत प्राचीन नगरीय सभ्यता थी। इसके अवशेष पाकिस्तान से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा जम्मू से दायमाबाद तक फैले क्षेत्र में मिले हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, बनावली और रोपड़ इसके महत्वपूर्ण केन्द्र थे। विभिन्न विद्वानों ने इसके काल और निर्माताओं के विषय में अलग-अलग मत दिए हैं, इसलिए इन दोनों प्रश्नों पर पूर्ण एकमतता नहीं है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सिंधु सभ्यता के काल के विषय में विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग मत दिए हैं।
  • जॉन मार्शल ने इसका काल 3250–2750 ईसा पूर्व माना।
  • ह्वीलर ने इसका काल 2500–1500 ईसा पूर्व माना।
  • कार्बन डेटिंग के अनुसार इसे प्राक् हड़प्पा, परिपक्व हड़प्पा और उत्तर हड़प्पा चरणों में बाँटा गया है।
  • हड़प्पा की खुदाई 1921 में दयाराम साहनी तथा मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में राखाल दास बनर्जी से सम्बन्धित है।
  • सिंधु सभ्यता लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई बताई गई है।
  • इसका पूर्व-पश्चिम विस्तार लगभग 1600 किमी तथा उत्तर-दक्षिण विस्तार लगभग 1400 किमी था।
  • इसके प्रमुख स्थल हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल, कालीबंगा, रोपड़, बनावली, सुरकोटड़ा और आलमगीरपुर थे।
  • मोहनजोदड़ो सिंधु, हड़प्पा रावी, रोपड़ सतलज और कालीबंगा घग्घर नदी के किनारे स्थित थे।
  • लोथल भोगवा नदी और आलमगीरपुर हिंडन नदी से सम्बन्धित था।
  • सिंधु सभ्यता के निर्माता कौन थे, इस विषय में आर्य, सुमेरियन, द्रविड़ और दस्यु-दास सम्बन्धी विभिन्न मत दिए गए हैं।
  • निर्माताओं के विषय में कोई एक मत सर्वमान्य नहीं माना गया है।

Advertisement

Topic 6 मेसोपोटामिया की सभ्यता

मेसोपोटामिया की सभ्यता

मेसोपोटामिया की सभ्यता का परिचय

मेसोपोटामिया प्राचीन सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था। इसका विकास दजला और फरात नदियों के बीच के क्षेत्र में हुआ। इस क्षेत्र में वर्तमान इराक, उत्तर-पूर्वी सीरिया, दक्षिण-पूर्वी तुर्की तथा ईरान के कुर्दिस्तान के कुछ भाग सम्मिलित थे।

मेसोपोटामिया यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ दो नदियों के बीच का क्षेत्र होता है। यह क्षेत्र दजला और फरात नदियों के बीच स्थित था।

मेसोपोटामिया में मुख्य रूप से तीन सभ्यताओं का विकास हुआ—

  1. सुमेरिया की सभ्यता
  2. बेबीलोनिया की सभ्यता
  3. असीरिया की सभ्यता

1. सुमेरिया की सभ्यता

मेसोपोटामिया क्षेत्र में सबसे पहले सुमेरिया की सभ्यता का विकास हुआ। यह क्षेत्र अत्यन्त उपजाऊ था, इसलिए इसे उपजाऊ क्रिसेन्ट की संज्ञा दी गई है।

इस सभ्यता की राजधानी सुमेर थी। इसी कारण इसे सुमेरिया की सभ्यता कहा गया।

राजनीतिक स्थिति

सुमेरियन सभ्यता का विकास दजला और फरात नदियों के मध्य हुआ। इस क्षेत्र में अनेक छोटे-छोटे द्वीप या क्षेत्र बने हुए थे और प्रत्येक पर अलग राज्य स्थापित था।

उर, किश, नेपुर और इरिदु इसके प्रमुख राज्य थे।

सुमेरिया की शासन व्यवस्था का आधार धर्म था। राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। सारगोन प्रथम को इस सभ्यता का संस्थापक बताया गया है। राजा के बाद पुरोहित का महत्वपूर्ण स्थान था।

आर्थिक जीवन

सुमेरियन लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। कृषि को विकसित करने के लिए बाँधों और नहरों का निर्माण कराया गया, जिससे सिंचाई की व्यवस्था मजबूत हुई।

किसानों को अपनी उपज का लगभग एक-तिहाई भाग राज्य को कर के रूप में देना पड़ता था।

सुमेरिया में व्यापार की स्थिति भी अच्छी थी। दूर-दूर के देशों से व्यापार किया जाता था। यहाँ के लोग अनाज, खजूर और ऊनी वस्त्र आदि मिस्र तथा भारत भेजते थे और वहाँ से सोना, चाँदी, मूल्यवान पत्थर तथा हीरा आदि प्राप्त करते थे।

सामाजिक जीवन

सुमेरियन समाज मुख्य रूप से तीन वर्गों में विभाजित था—

  1. उच्च वर्ग — शासक, सामन्त, पुरोहित और उच्चाधिकारी।
  2. मध्यम वर्ग — कृषक, शिल्पी और व्यापारी।
  3. निम्न वर्ग — दास।

समाज में दहेज प्रथा का उल्लेख मिलता है, परन्तु स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।

धार्मिक जीवन

सुमेरिया की सभ्यता में धर्म का अत्यधिक महत्व था। प्रारम्भ में लोग एक ही देवता की पूजा करते थे, परन्तु आगे चलकर अनेक देवी-देवताओं की उपासना होने लगी।

प्राकृतिक शक्तियों में विश्वास के कारण सूर्य और चन्द्रमा की भी पूजा की जाती थी।

लेखन कला

सुमेरियन लोगों को लेखन कला का ज्ञान था। उनकी लिपि को कीलाक्षर लिपि कहा जाता था।

इस लिपि का आविष्कार लगभग 3000 ईसा पूर्व माना गया है। इसमें लगभग 300 अक्षर थे। विचारों को विशेष चिन्हों, चित्रों और संकेतों के माध्यम से व्यक्त किया जाता था।

लेखन के लिए चिकनी मिट्टी की गीली तख्तियों पर नुकीली वस्तु से चिन्ह बनाए जाते थे। इस प्रकार की अनेक तख्तियाँ प्राप्त हुई हैं।

विज्ञान का ज्ञान

सुमेरियन लोगों ने पंचांग का आविष्कार किया था। उनका पंचांग चन्द्रमा की गति पर आधारित था।

वे सूर्य और चन्द्रमा की गति का अध्ययन करते थे तथा दिन-रात का हिसाब लगा सकते थे। सूर्य ग्रहण, सूर्यास्त और चन्द्रोदय के समय का भी अनुमान लगाया जाता था।

उन्होंने आकाश को 12 भागों में बाँटा और प्रत्येक भाग को अलग नाम दिया। भारत में इन्हें राशियों के नाम से जाना जाता है।

2. बेबीलोनिया की सभ्यता

सुमेरिया की सभ्यता के पतन के बाद इस क्षेत्र में बेबीलोनिया की सभ्यता का उदय हुआ। बेबीलोनिया के लोगों ने सुमेरियन सभ्यता के अनेक गुणों को अपनाया और उनमें सुधार किया।

बेबीलोनिया के लोग सम्भवतः अरब के रेगिस्तान से आए घुमक्कड़ समूह थे। उन्होंने लगभग 2000 ईसा पूर्व सुमेर पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की और बेबीलोन को अपनी राजधानी बनाया।

आगे चलकर उन्होंने सम्पूर्ण मेसोपोटामिया पर अधिकार करके एक विशाल राज्य की स्थापना की।

राजनीतिक जीवन

बेबीलोनिया का प्रमुख शासक हम्मूराबी था। उसने लगभग 2123 ईसा पूर्व से 2080 ईसा पूर्व तक शासन किया।

राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था और सम्पूर्ण भूमि पर उसका अधिकार स्वीकार किया जाता था। हम्मूराबी एक शक्तिशाली तथा योग्य शासक था।

हम्मूराबी की विधि-संहिता

हम्मूराबी ने अपनी प्रजा के लिए एक व्यवस्थित विधि-संहिता तैयार कराई। इसी कारण उसे विश्व का प्रथम कानून बनाने वाला राजा भी कहा गया है।

इस विधि-संहिता को एक काले रंग के पत्थर पर खुदवाया गया था। इस पत्थर की ऊँचाई लगभग 2.44 मीटर थी और इसे बेबीलोन के प्रमुख जिगुरत अर्थात मंदिर में स्थापित किया गया था।

हम्मूराबी की विधि-संहिता में 282 धाराएँ थीं। इनमें चोरी, डकैती, हत्या, विवाह, व्यापार और कृषि आदि विषयों से सम्बन्धित नियम सम्मिलित थे।

इस संहिता की प्रमुख बातें थीं—

  1. कोई व्यक्ति कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता था।
  2. अपराधी को दण्ड देने का अधिकार राजा को था।
  3. अपराधी को उसके अपराध के अनुसार दण्ड दिया जाना आवश्यक था।
  4. कानून की दृष्टि में अमीर और गरीब को समान माना गया।
  5. दास द्वारा किए गए कार्य का वेतन दिए जाने की व्यवस्था थी।
  6. पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है।
सामाजिक जीवन

बेबीलोनिया का समाज तीन वर्गों में विभाजित था—

  1. उच्च वर्ग
  2. मध्यम वर्ग
  3. दास वर्ग

उच्च वर्ग में पुरोहित और अन्य सम्मानित व्यक्ति आते थे। मध्यम वर्ग में कृषक और व्यापारी सम्मिलित थे तथा निम्न वर्ग में दास आते थे।

समाज में स्त्रियों को कार्य करने का अधिकार प्राप्त था। एक-पत्नी प्रथा का भी प्रचलन था।

आर्थिक जीवन

भूमि उपजाऊ होने के कारण बेबीलोनिया का कृषक वर्ग सम्पन्न था। किसानों को कुल उपज का लगभग एक-तिहाई भाग सरकार को देना पड़ता था।

व्यापार अपने चरम पर था और जल तथा थल दोनों मार्गों से किया जाता था। बेबीलोनिया के व्यापारिक सम्बन्ध मिस्र और भारत से भी थे।

धार्मिक जीवन

बेबीलोनिया में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान था। मंदिरों को जिगुरत कहा जाता था और इन्हें राज्य की सम्पत्ति माना जाता था।

लोग अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे तथा पशु-बलि की प्रथा भी प्रचलित थी। प्राकृतिक शक्तियों के रूप में सूर्य और चन्द्रमा की भी पूजा की जाती थी।

भवन निर्माण कला

बेबीलोनिया के लोग भवन निर्माण में दक्ष थे। उन्होंने अनेक नगर स्थापित किए, परन्तु सबसे अधिक ध्यान बेबीलोन नगर के विकास पर दिया।

नगर के चारों ओर एक दीवार अथवा परकोटा बनाया गया था। अनेक नहरें और बाँध भी बनाए गए।

बेबीलोन में फरात नदी के किनारे हम्मूराबी ने एक किला और बाँध बनवाया था। इस सभ्यता से मूर्तिकला तथा मंदिरों में चित्रकला के नमूने भी प्राप्त हुए हैं।

3. असीरिया की सभ्यता

हम्मूराबी की मृत्यु के बाद बेबीलोनिया का साम्राज्य कमजोर हो गया। इस स्थिति का लाभ उठाकर असीरियाई लोगों ने बेबीलोन पर आक्रमण किया और उस पर अधिकार स्थापित कर लिया।

असीरियाई बाहर से आए हुए लोग नहीं थे, बल्कि मेसोपोटामिया के ही निवासी थे। जिस नगर में वे रहते थे उसका नाम असुर था। इसी नाम के कारण उन्हें असीरियाई कहा गया।

असीरिया का सबसे प्रसिद्ध शासक असुर बेनीपाल था। उसे विद्वान शासक माना गया है।

राजनीतिक स्थिति

असीरियाई लोगों ने दजला नदी के किनारे स्थित निनवेह को अपनी राजधानी बनाया।

यहाँ की शासन व्यवस्था सुव्यवस्थित थी। राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था और वह अत्यन्त शक्तिशाली होता था।

प्रशासन को व्यवस्थित रखने के लिए साम्राज्य को विभिन्न इकाइयों में बाँटा गया। प्रत्येक इकाई के प्रशासक को राज्यपाल कहा जाता था।

राज्यपाल कर वसूल करता, प्रशासन की देखरेख करता तथा जनता की सुरक्षा का प्रबन्ध करता था। अपराधियों को कठोर दण्ड देने की व्यवस्था थी।

आर्थिक जीवन

असीरिया के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। इसके अतिरिक्त उद्योगों का भी विकास हुआ।

असीरिया की एक महत्वपूर्ण विशेषता लोहे का प्रयोग थी। यहाँ के लोगों ने लोहे का उपयोग करना प्रारम्भ किया और लोहे के उपकरण बनाने में दक्षता प्राप्त की।

सामाजिक जीवन

असीरियाई समाज भी तीन वर्गों में विभाजित था।

  • उच्च वर्ग में पुरोहित और सामन्त आते थे।
  • मध्यम वर्ग में व्यापारी और कृषक सम्मिलित थे।
  • निम्न वर्ग में दास आते थे।

असीरियाई समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी और पर्दा प्रथा का प्रचलन था।

धार्मिक जीवन

असीरिया में भी धर्म का महत्व था, किन्तु पूर्ववर्ती सभ्यताओं की तुलना में इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम था।

यहाँ के लोग असुर, मर्दुक और ईश्वर की पूजा करते थे।

असीरिया सभ्यता का अन्त

असीरियाई शासकों ने मुख्य रूप से शक्ति और सैन्य बल के आधार पर शासन स्थापित किया था। इसलिए वे अधिक समय तक अपनी सत्ता को स्थिर नहीं रख सके और अन्ततः असीरिया की सभ्यता का पतन हो गया।

सुमेरिया, बेबीलोनिया और असीरिया सभ्यताओं की प्रमुख विशेषताएँ
मेसोपोटामिया की तीन प्रमुख सभ्यताएँ—सुमेरिया, बेबीलोनिया और असीरिया

मेसोपोटामिया की तीन प्रमुख सभ्यताओं का तुलनात्मक सार

सभ्यता प्रमुख विशेषता
सुमेरिया कृषि, नहरें, कीलाक्षर लिपि, पंचांग और खगोल ज्ञान
बेबीलोनिया हम्मूराबी की विधि-संहिता, व्यापार, जिगुरत और विकसित भवन निर्माण
असीरिया शक्तिशाली शासन, राज्यपाल व्यवस्था, कृषि, उद्योग और लोहे का प्रयोग

महत्वपूर्ण तथ्य एक नजर में

तथ्य विवरण
मेसोपोटामिया का अर्थ दो नदियों के बीच का क्षेत्र
प्रमुख नदियाँ दजला और फरात
प्रमुख सभ्यताएँ सुमेरिया, बेबीलोनिया और असीरिया
सुमेरियन लिपि कीलाक्षर लिपि
कीलाक्षर लिपि का समय लगभग 3000 ईसा पूर्व
हम्मूराबी की विधि-संहिता 282 धाराएँ
बेबीलोनिया के मंदिर जिगुरत
असीरिया की राजधानी निनवेह
असीरिया का प्रसिद्ध शासक असुर बेनीपाल

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

मेसोपोटामिया की सभ्यता दजला और फरात नदियों के बीच विकसित हुई तथा इसमें सुमेरिया, बेबीलोनिया और असीरिया की सभ्यताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा। सुमेरियों ने कृषि, सिंचाई, लेखन और विज्ञान में प्रगति की। बेबीलोनिया ने हम्मूराबी की विधि-संहिता और विकसित व्यापारिक व्यवस्था के कारण विशेष स्थान प्राप्त किया। असीरिया अपनी शक्तिशाली शासन व्यवस्था, लोहे के प्रयोग और संगठित प्रशासन के लिए प्रसिद्ध हुआ।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मेसोपोटामिया का अर्थ दो नदियों के बीच का क्षेत्र है।
  • मेसोपोटामिया का विकास दजला और फरात नदियों के बीच हुआ।
  • इस क्षेत्र की तीन प्रमुख सभ्यताएँ सुमेरिया, बेबीलोनिया और असीरिया थीं।
  • सुमेरिया मेसोपोटामिया की सबसे प्रारम्भिक सभ्यता थी।
  • सुमेरियन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था तथा बाँध और नहरें बनाई गईं।
  • सुमेरियन समाज उच्च, मध्यम और निम्न—तीन वर्गों में विभाजित था।
  • सुमेरियों की लिपि कीलाक्षर लिपि कहलाती थी और इसका आविष्कार लगभग 3000 ईसा पूर्व माना गया है।
  • सुमेरियों ने चन्द्रमा की गति पर आधारित पंचांग बनाया और आकाश को 12 भागों में विभाजित किया।
  • सुमेरिया के पतन के बाद बेबीलोनिया की सभ्यता का उदय हुआ।
  • हम्मूराबी बेबीलोनिया का प्रमुख शासक था।
  • हम्मूराबी की विधि-संहिता में 282 धाराएँ थीं।
  • बेबीलोनिया के मंदिरों को जिगुरत कहा जाता था।
  • असीरिया की राजधानी निनवेह थी और उसका प्रसिद्ध शासक असुर बेनीपाल था।
  • असीरियाई लोगों ने लोहे का प्रयोग करना तथा लोहे के उपकरण बनाना प्रारम्भ किया।
  • असीरिया का शासन मुख्यतः शक्ति और सैन्य बल पर आधारित था, इसलिए वह अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सका।
Topic 7 मिस्र की सभ्यता

मिस्र की सभ्यता

मिस्र की सभ्यता का परिचय

मिस्र की प्राचीन सभ्यता का विकास नील नदी के किनारे हुआ। मिस्र अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित है। इसके उत्तर में भूमध्य सागर, पूर्व में लाल सागर और दक्षिण-पश्चिम में रेगिस्तान है।

नील नदी मिस्र के मध्य भाग से होकर बहती है। मिस्र की सभ्यता के विकास में इस नदी का अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान था, क्योंकि इससे लोगों को पीने का पानी और कृषि के लिए सिंचाई का जल प्राप्त होता था।

नील नदी न होती तो मिस्र का अधिकांश क्षेत्र रेगिस्तान होता। इसी कारण मिस्रवासी नील नदी की पूजा करते थे और इसे नील नदी का वरदान कहा गया।

मिस्र के इतिहास का विभाजन

मिस्र के इतिहास को मुख्य रूप से तीन कालों में विभाजित किया गया है—

  1. पिरामिड काल
  2. सामन्ती काल
  3. साम्राज्यवादी काल

1. पिरामिड काल

प्राचीन मिस्र की सभ्यता में पिरामिडों का विशेष महत्व था। मिस्र के शासकों की मृत्यु के बाद उनके शरीर पर विशेष लेप लगाकर विभिन्न वस्तुओं के साथ दफनाया जाता था।

इस प्रकार सुरक्षित किए गए शव को ममी कहा जाता था। ममी को दफनाने के स्थान पर ऊँची एवं विशाल संरचनाएँ बनाई जाती थीं, जिन्हें पिरामिड कहा गया।

इसी कारण मिस्र के इतिहास के इस चरण को पिरामिड काल कहा जाता है।

गीजा का महान पिरामिड

मिस्र का प्रसिद्ध गीजा पिरामिड प्राचीन विश्व के महान स्मारकों में गिना जाता है। यह मिस्र की राजधानी काहिरा के उपनगर गीजा में स्थित है।

इसका निर्माण मिस्र के फराओ कुफू ने लगभग 2558 ईसा पूर्व से 2532 ईसा पूर्व के बीच कराया था। इसके निर्माण में लगभग 10 से 20 वर्ष का समय लगने का उल्लेख मिलता है।

कुफू की मृत्यु के बाद उसके शव को इसी पिरामिड में दफनाया गया। बाद के शासकों के शव और उनके साथ आभूषण तथा अन्य सामग्री भी पिरामिडों में रखी जाती थी।

2. सामन्ती काल

मिस्र के इतिहास में लगभग 2400 ईसा पूर्व से 1800 ईसा पूर्व तक के काल को सामन्ती काल कहा गया है। इस समय सामन्त अत्यन्त शक्तिशाली हो गए थे।

3. साम्राज्यवादी काल

लगभग 1800 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व तक के काल को साम्राज्यवादी काल कहा गया है।

इस काल में मिस्र का प्रभाव और विस्तार नील नदी के क्षेत्र से आगे बढ़कर फरात नदी तक पहुँच गया था।

मिस्र की सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ

1. शासन व्यवस्था

प्राचीन मिस्र का सम्राट निरंकुश शासक था। उसे फराओ कहा जाता था। देश और उसके संसाधनों पर उसका व्यापक नियंत्रण था।

फराओ सर्वोच्च सेनानायक और शासन का प्रधान था। प्रशासन चलाने के लिए वह अधिकारियों की व्यवस्था पर निर्भर रहता था।

राजा के बाद प्रशासन में सबसे महत्वपूर्ण पद वजीर का था। वजीर राजा के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता था और भूमि सर्वेक्षण, खजाना, निर्माण कार्य, कानून तथा अभिलेखों जैसी व्यवस्थाओं की देखरेख करता था।

देश को लगभग 42 प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक क्षेत्र का प्रशासन एक सामन्त द्वारा चलाया जाता था, जो अपने क्षेत्र के लिए वजीर के प्रति उत्तरदायी था।

मंदिरों की भूमिका

मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं थे, बल्कि आर्थिक गतिविधियों के भी महत्वपूर्ण केन्द्र थे।

मंदिरों में अनाज भण्डारण की व्यवस्था होती थी। राज्य की सम्पत्ति तथा अनाज को एकत्र करने और पुनः वितरित करने में भी उनका महत्वपूर्ण स्थान था।

2. सामाजिक जीवन

मिस्र का समाज उच्च रूप से स्तरीकृत था और व्यक्ति की सामाजिक स्थिति स्पष्ट रूप से निर्धारित होती थी।

जनसंख्या का सबसे बड़ा वर्ग किसानों का था। कृषि भूमि पर सामान्यतः राजा, मंदिर या कुलीन परिवारों का अधिकार होता था।

किसानों को श्रम-कर देना पड़ता था और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें सिंचाई अथवा निर्माण सम्बन्धी कार्यों में लगाया जाता था।

कलाकार और कारीगर किसानों से ऊपर माने जाते थे, परन्तु वे भी राज्य के नियंत्रण में कार्य करते थे। मंदिरों से जुड़े कारीगरों को राज्य के खजाने से भुगतान किए जाने का उल्लेख मिलता है।

लेखक और अधिकारी उच्च वर्ग में गिने जाते थे। वे सन से बने विशेष सफेद वस्त्र पहनते थे, इसलिए उन्हें सफेद किल्ट वर्ग भी कहा गया।

पुरोहितों, चिकित्सकों और इंजीनियरों को विशेष प्रशिक्षण प्राप्त होता था और समाज में उनका स्थान महत्वपूर्ण था।

मिस्र में गुलामी का अस्तित्व भी था, यद्यपि इसके व्यापक प्रसार की सीमा स्पष्ट नहीं है।

3. धार्मिक जीवन

प्राचीन मिस्र में परलोक और पुनर्जन्म के प्रति गहरा विश्वास था। प्रत्येक नगर का अपना प्रमुख देवता होता था।

मिस्र में देवी-देवताओं की संख्या लगभग 2200 बताई गई है। सूर्य उनके प्रमुख देवताओं में से था, जिसे रे, रा और होरस आदि नामों से जाना जाता था।

फराओ का शासन भी उसके दैवी अधिकारों पर आधारित माना जाता था। मिस्रवासी देवताओं को अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न मानते थे और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए पूजा-अर्चना करते थे।

4. कृषि

मिस्र की अर्थव्यवस्था में कृषि का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान था। भूमि के आधार पर करों का निर्धारण किया जाता था।

मिस्र की कृषि पूरी तरह नील नदी के वार्षिक चक्र से प्रभावित थी। मिस्रवासियों ने कृषि वर्ष को तीन मुख्य ऋतुओं में बाँटा था—

ऋतु अर्थ / प्रमुख कार्य
आखेट बाढ़ का समय
पेरेट रोपण एवं फसल उगाने का समय
शेमु कटाई का समय

नील नदी में बाढ़ का समय लगभग जून से सितम्बर तक रहता था। बाढ़ के कारण नदी के किनारे खनिजों से समृद्ध उपजाऊ मिट्टी जमा हो जाती थी।

बाढ़ का पानी कम होने के बाद अक्टूबर से फरवरी तक फसल उगाई जाती थी। खेतों की जुताई करके बीज डाले जाते थे तथा नालों और नहरों से सिंचाई की जाती थी।

मार्च से मई के बीच फसल काटने के लिए हँसिए का प्रयोग किया जाता था। अनाज को पौधों से अलग करने के लिए बैलों द्वारा उसकी मड़ाई कराई जाती थी और बाद में हवा की सहायता से भूसी को अनाज से अलग किया जाता था।

5. पशुपालन

मिस्रवासी मनुष्य, पशु और पौधों को एक परस्पर सम्बन्धित प्राकृतिक व्यवस्था का अंग मानते थे। पशुपालन उनके जीवन और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

भेड़, बकरी और सूअर पाले जाते थे। मवेशी विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे। उनका उपयोग खेतों में कार्य करने के साथ-साथ दूध और मांस प्राप्त करने के लिए भी किया जाता था।

हिरन, पक्षियों और अन्य जंगली जीवों का भी शिकार किया जाता था। नील नदी से मछलियाँ बड़ी मात्रा में प्राप्त होती थीं।

मिस्र में प्राचीन समय से मधुमक्खी पालन भी किया जाता था और शहद प्राप्त किया जाता था।

6. व्यवसाय एवं व्यापार

मिस्र में उपलब्ध न होने वाली दुर्लभ और विदेशी वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए दूसरे देशों के साथ व्यापार किया जाता था।

प्राचीन मिस्र के व्यापारिक सम्बन्ध अन्य क्षेत्रों से थे और वस्तुओं का आदान-प्रदान जल तथा स्थल दोनों मार्गों से होता था।

दक्षिणी कनान से मिस्र को मिट्टी के बर्तन प्राप्त होने तथा मिस्र से भी अनेक वस्तुओं के निर्यात के प्रमाण मिलते हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत से इन्द्र, रंग और मसाले जैसी वस्तुएँ भेजे जाने का उल्लेख मिलता है।

7. दण्ड प्रथा

मिस्र की शासन व्यवस्था में फराओ कानून लागू करने, न्याय प्रदान करने और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने का प्रमुख अधिकारी था।

प्राचीन मिस्र की कोई पूर्ण कानूनी संहिता उपलब्ध नहीं है। न्याय व्यवस्था व्यवहारिक ज्ञान और विवादों के समाधान पर आधारित थी।

छोटे अपराधों के लिए जुर्माना, मार, चेहरे की विकृति अथवा निर्वासन जैसी सजाएँ दी जा सकती थीं।

हत्या और डकैती जैसे गंभीर अपराधों के लिए मृत्युदण्ड दिया जाता था। शिरच्छेदन, पानी में डुबोना अथवा सूली पर लटकाना जैसी विधियों का उल्लेख मिलता है।

कुछ परिस्थितियों में अपराधी के परिवार तक दण्ड का प्रभाव पहुँच सकता था।

8. विज्ञान एवं गणित

प्राचीन मिस्रवासियों ने विज्ञान और गणित के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की थी।

उन्होंने अंकों की दशमलव प्रणाली विकसित की। अलग-अलग संख्याओं के लिए निश्चित संकेत बनाए गए थे।

उदाहरण के लिए 1, 10 और 100 के लिए अलग संकेतों का प्रयोग किया जाता था। किसी संख्या को लिखने के लिए इन संकेतों को आवश्यकतानुसार बार-बार दोहराया जाता था।

मिस्रवासी त्रिभुज और आयत का क्षेत्रफल निकालना जानते थे।

मृत शरीर को सुरक्षित रखने की परम्परा के कारण उन्हें मानव शरीर की संरचना का भी ज्ञान प्राप्त हुआ। इस प्रक्रिया ने चिकित्सा विज्ञान और शल्यक्रिया सम्बन्धी कौशल के विकास को प्रोत्साहित किया।

9. अन्त्येष्टि प्रथा एवं ममीकरण

मिस्रवासी मृत्यु के बाद अमरत्व में विश्वास करते थे। इसी कारण उन्होंने मृत शरीर को सुरक्षित रखने की विस्तृत परम्परा विकसित की।

इस प्रक्रिया में शरीर का परीक्षण किया जाता था, अन्तिम संस्कार सम्पन्न किए जाते थे और मृतक के साथ ऐसी वस्तुएँ रखी जाती थीं जिनका उपयोग उसके द्वारा मृत्यु के बाद किए जाने की कल्पना की जाती थी।

प्राचीन समय में रेगिस्तानी क्षेत्रों में दफनाए गए शव प्राकृतिक रूप से सूखकर सुरक्षित हो जाते थे। बाद में मिस्रवासियों ने कृत्रिम ममीकरण की तकनीक विकसित कर ली।

ममीकरण में शरीर से आन्तरिक अंग निकालकर उसे सूखने दिया जाता था। इसके बाद शरीर को सन की पट्टियों में लपेटा जाता और एक आयताकार पत्थर की पेटी में रखकर कब्र में दफन किया जाता था।

कुछ आन्तरिक अंगों को अलग से विशेष पात्रों में सुरक्षित रखने की परम्परा भी विकसित हुई।

मिस्र की सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ
नील नदी, पिरामिड, कृषि चक्र, ममीकरण और प्राचीन मिस्र की प्रमुख उपलब्धियाँ

मिस्र की सभ्यता का अन्त

लगभग 1000 ईसा पूर्व तक मिस्र की उन्नति का प्रमुख काल समाप्त होने लगा।

फराओ शासकों को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अफ्रीका के रेगिस्तानी क्षेत्रों से आने वाली खानाबदोश जातियों तथा भूमध्य सागर के निकट विकसित नई शक्तियों के विरुद्ध युद्ध करने पड़े।

इन लगातार संघर्षों के कारण मिस्र की शक्ति कमजोर होती गई और उसकी प्राचीन सभ्यता का प्रभाव घटने लगा।

महत्वपूर्ण तथ्य एक नजर में

तथ्य विवरण
सभ्यता का प्रमुख आधार नील नदी
मिस्र के शासक फराओ
इतिहास के प्रमुख काल पिरामिड, सामन्ती एवं साम्राज्यवादी काल
प्रसिद्ध पिरामिड गीजा का महान पिरामिड
गीजा पिरामिड का निर्माता फराओ कुफू
प्रशासनिक क्षेत्र लगभग 42
प्रमुख देवताओं की संख्या लगभग 2200
कृषि ऋतुएँ आखेट, पेरेट और शेमु
प्रमुख धार्मिक विश्वास परलोक एवं पुनर्जन्म
मृत शरीर संरक्षण ममीकरण

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

मिस्र की सभ्यता का विकास नील नदी के किनारे हुआ और कृषि, सिंचाई तथा आर्थिक जीवन का आधार भी यही नदी थी। फराओ के नेतृत्व में केंद्रीकृत शासन, विशाल पिरामिड, विकसित सामाजिक व्यवस्था, बहुदेववादी धार्मिक विश्वास तथा ममीकरण इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं। मिस्रवासियों ने कृषि, पशुपालन, व्यापार, गणित, चिकित्सा और स्थापत्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति की।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मिस्र की सभ्यता का विकास नील नदी के किनारे हुआ।
  • नील नदी को मिस्र का वरदान कहा गया।
  • मिस्र के इतिहास को पिरामिड काल, सामन्ती काल और साम्राज्यवादी काल में विभाजित किया गया है।
  • ममी मृत शरीर का सुरक्षित रूप था और उसे पिरामिडों में दफनाया जाता था।
  • गीजा का महान पिरामिड फराओ कुफू से सम्बन्धित है।
  • सामन्ती काल लगभग 2400–1800 ईसा पूर्व तथा साम्राज्यवादी काल लगभग 1800–1000 ईसा पूर्व माना गया है।
  • मिस्र के शासक को फराओ कहा जाता था और वजीर उसके बाद प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी था।
  • देश को लगभग 42 प्रशासनिक क्षेत्रों में बाँटा गया था।
  • मिस्र में लगभग 2200 देवी-देवताओं का उल्लेख मिलता है तथा सूर्य प्रमुख देवताओं में था।
  • मिस्र की कृषि नील नदी की बाढ़ पर निर्भर थी।
  • कृषि वर्ष को आखेट, पेरेट और शेमु तीन ऋतुओं में बाँटा गया था।
  • भेड़, बकरी, सूअर और मवेशियों का पालन किया जाता था तथा नील नदी से मछलियाँ प्राप्त होती थीं।
  • मिस्रवासियों ने दशमलव अंक प्रणाली तथा क्षेत्रफल गणना का ज्ञान विकसित किया था।
  • परलोक और पुनर्जन्म में विश्वास के कारण ममीकरण की प्रथा विकसित हुई।
  • लगभग 1000 ईसा पूर्व के बाद निरन्तर बाहरी संघर्षों से मिस्र की शक्ति कमजोर होने लगी।

Advertisement

Topic 8 चीन की सभ्यता

चीन की सभ्यता

चीन की सभ्यता का परिचय

चीन की सभ्यता विश्व की अत्यन्त प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। इसका विकास मुख्य रूप से ह्वांगहो तथा यांग्त्सीक्यांग नदियों की घाटियों में हुआ।

ह्वांगहो नदी को चीन का शोक कहा गया है, क्योंकि बाढ़ के समय यह प्रायः अपना मार्ग बदल देती थी और बड़े भू-भाग में विनाश उत्पन्न करती थी। दूसरी ओर बाढ़ के साथ लाई गई उपजाऊ मिट्टी कृषि के लिए लाभदायक भी सिद्ध होती थी।

चीन की राजधानी बीजिंग थी। चीन के निवासी अपनी भाषा में अपने देश को चुंगकुओ कहते थे। भारत तथा फारस के प्राचीन निवासियों द्वारा इस देश को चीन नाम से पुकारे जाने का उल्लेख मिलता है।

चीन का उल्लेख महाभारत, मनुस्मृति और ललितविस्तार जैसे ग्रन्थों में भी मिलता है। प्राचीन भारत में चीन के रेशमी वस्त्र इतने प्रसिद्ध थे कि रेशमी कपड़े के लिए चीनीशुक शब्द का प्रयोग होने लगा।

चीन के प्रमुख दार्शनिक

लाओत्से और कन्फ्यूशियस चीन के महान दार्शनिक थे। उन्होंने पुरानी रूढ़ियों की आलोचना की और समाज को नए धार्मिक एवं दार्शनिक विचार दिए।

उन्होंने लोगों को निस्वार्थ और नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा दी। लाओत्से ने ताओ-ते-चिंग नामक ग्रन्थ की रचना की।

चीन का राजनीतिक इतिहास

1. शांग वंश

चीन में शांग वंश का शासन लगभग 1765 ईसा पूर्व से 1122 ईसा पूर्व तक रहा।

शांग शासकों ने चीन की सभ्यता को विकसित संस्कृति प्रदान की। इस काल में धार्मिक कार्य भी सम्राट की देखरेख में होते थे और इन कार्यों में सहायता के लिए अनेक पुरोहित नियुक्त किए जाते थे।

2. चाऊ वंश

चाऊ वंश ने लगभग 1122 ईसा पूर्व से 249 ईसा पूर्व तक शासन किया।

पूर्ववर्ती काल की तुलना में इस समय चीन का अधिक विकास हुआ। इसी कारण इस काल को चीनी इतिहास का स्वर्ण युग कहा गया है।

3. चिन वंश

चाऊ वंश के पश्चात चिन वंश के शासकों ने चीन पर शासन किया। इस वंश के राजा सीहवांगटी ने राज्य का सफलतापूर्वक संचालन किया।

चीन का नामकरण भी इसी वंश के नाम से सम्बन्धित बताया गया है।

चिन वंश के शासनकाल में पक्की सड़कों का निर्माण हुआ। देश की सुरक्षा के उद्देश्य से शासक शी ह्वांग टी ने चीन की प्रसिद्ध दीवार का निर्माण कराया।

लगभग 202 ईसा पूर्व में हान नामक वंश ने चीन पर अधिकार स्थापित किया। हान वंश का शासन लगभग 400 वर्षों तक रहा। इस काल में जीवन के अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण विकास हुआ।

हान वंश के बाद चीन में हूणों का प्रभाव स्थापित हुआ।

चीनी सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ

1. शासन व्यवस्था

चीन की शासन व्यवस्था में सम्राट का अधिकार अत्यन्त व्यापक था। सम्राट शासन और धर्म दोनों का प्रधान माना जाता था।

वह राज्य का प्रथम सेनापति, प्रमुख पुरोहित और सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। उसके अधिकार निरंकुश तथा दैवी माने जाते थे।

इसके बावजूद शासन कार्यों में वह मंत्रियों से परामर्श करता था तथा देश, रीति-रिवाज और जनता के हित का ध्यान रखता था।

सम्राट की सहायता के लिए एक परिषद होती थी। प्रशासन सेना, धर्म, न्याय और शिक्षा जैसे विभिन्न विभागों में विभाजित था।

सामन्त सम्राट के अधीन छोटे-छोटे क्षेत्रों पर शासन करते थे और अपने पास सेना भी रखते थे। इस समय तक रथ का आविष्कार हो चुका था।

2. नियुक्ति व्यवस्था

चीन में प्रमुख राजकीय पदों पर नियुक्तियाँ प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर की जाती थीं।

इन राजकीय अधिकारियों को मन्दारिन कहा जाता था। अधिकारी बनने से पहले उम्मीदवार को विभिन्न परीक्षाओं से गुजरना पड़ता था।

इसी कारण चीन को प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था का जन्मदाता कहा गया है।

3. सामाजिक जीवन

चीनी समाज में संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। परिवार का मुखिया पिता होता था।

परिवार के मुखिया के बाद उसके छोटे भाई को प्रमुखता मिलती थी और छोटे भाई के अभाव में परिवार का बड़ा पुत्र जिम्मेदारी सँभालता था।

परिवार में माता को भी सम्मानजनक स्थान प्राप्त था।

चीनी समाज अनेक वर्गों में विभाजित था। समाज में सबसे ऊँचा स्थान सम्राट का था। इसके बाद साहित्यकार और बुद्धिजीवी सम्मानित वर्ग में आते थे। इसके बाद व्यापारी, शिल्पकार, किसान तथा दासों का स्थान था।

समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता के आधार पर उच्च पद प्राप्त करने की स्वतंत्रता भी थी।

4. आर्थिक जीवन

चीन का आर्थिक जीवन अत्यन्त समृद्ध था। अधिकांश लोग कृषि कार्य करते थे।

ज्वार, बाजरा, मक्का और गेहूँ प्रमुख फसलें थीं। सन और चाय का भी अच्छा उत्पादन होता था।

सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध थे और बाढ़ से सुरक्षा के लिए बाँध बनाए जाते थे।

चीन में उद्योग-धन्धों का भी पर्याप्त विकास हुआ। बढ़ईगिरी और शिल्पकला के उत्कृष्ट नमूने मिलते हैं। दैनिक उपयोग की वस्तुओं को भी आकर्षक और कलात्मक रूप दिया जाता था।

सोने-चाँदी के आभूषण तथा हाथी-दाँत की कलात्मक वस्तुएँ भी बनाई जाती थीं।

व्यापार

चीन के व्यापारिक सम्बन्ध ईरान, मेसोपोटामिया और रोम जैसे दूरस्थ क्षेत्रों से थे।

व्यापार जल और थल दोनों मार्गों से किया जाता था। रेशम, चीनी मिट्टी के बर्तन तथा सोने-चाँदी की वस्तुएँ व्यापार की प्रमुख सामग्री थीं।

5. धार्मिक जीवन

चीनी समाज में धर्म की जड़ें बहुत गहरी थीं। प्रकृति को ईश्वरीय शक्ति मानकर उसकी उपासना की जाती थी।

चीनी लोग अनेक देवी-देवताओं में विश्वास करते थे। इनमें प्रमुख देवता शांगति था, जिसका अर्थ स्वर्ग का देवता बताया गया है।

राजा को शांगति का पुत्र माना जाता था, इसलिए राजा की भी पूजा की जाती थी।

पूर्वजों की उपासना चीनी धार्मिक जीवन की महत्वपूर्ण विशेषता थी। चीन में अनेक मंदिर थे तथा धार्मिक अनुष्ठानों में सम्राट और सामान्य नागरिक दोनों भाग लेते थे।

देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अनाज, मांस और शराब आदि की भेंट चढ़ाई जाती थी।

6. प्रमुख आविष्कार एवं खोजें

लिपि का आविष्कार

चीनी भाषा और लिपि चित्रलिपि का ही परिवर्तित रूप थी। लगभग 1400 ईसा पूर्व के इस लिपि के नमूने हड्डियों पर प्राप्त हुए हैं।

चीनी लिपि में लगभग 40 हजार संकेत-चिह्न बताए गए हैं। यह लिपि ऊपर से नीचे की ओर लिखी जाती थी।

कागज की खोज

कागज बनाने की कला का आविष्कार सबसे पहले चीन में हुआ।

लगभग 1900 वर्ष पूर्व काई लून नामक व्यक्ति ने पौधों के रेशों, पेड़ों की छाल, पुराने कपड़ों और रस्सियों को पीटकर उनकी लुगदी तैयार की।

इस लुगदी को पानी में भिगोकर, निचोड़कर तथा सुखाकर कागज तैयार किया जाता था।

कागज का सबसे प्रारम्भिक उपयोग चीन में हुआ और मुद्रण का प्रयोग भी सर्वप्रथम चीन में प्रारम्भ होने का उल्लेख मिलता है।

7. वास्तुकला

चीन में भवन निर्माण कला अत्यन्त विकसित थी। मकान लकड़ी, चूने और पत्थर से बनाए जाते थे तथा निर्माण में सुंदरता और कलात्मकता पर विशेष ध्यान दिया जाता था।

चीन की महान दीवार उसकी वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके अतिरिक्त बड़े राजमहल और मंदिर भी बनाए गए।

पैगोडा

पैगोडा मंदिर चीन की प्रसिद्ध वास्तुकला का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

पैगोडा की संरचना पिरामिडनुमा मीनार या शंकु जैसी दिखाई देती है। यह बहुमंजिला टावर के समान होता है और इसकी प्रत्येक मंजिल की छत बाहर की ओर मुड़ी हुई दिखाई देती है।

पैगोडा का निर्माण गौतम बुद्ध के सम्मान में विहारों के निकट स्तूप के रूप में किया जाता था।

इस प्रकार की संरचनाओं का निर्माण नेपाल, भारत, बर्मा, इंडोनेशिया, थाईलैंड, चीन और जापान में भी हुआ।

8. मूर्तिकला एवं चित्रकला

चीनी मूर्तियाँ वहाँ के मूर्तिकारों की दक्षता को प्रदर्शित करती हैं। महात्मा बुद्ध तथा उनके जीवन से सम्बन्धित अनेक मूर्तियाँ बनाई गईं।

प्राकृतिक और मानव जीवन से सम्बन्धित प्रतिमाओं का भी निर्माण होता था।

चीनी चित्रकला में प्राकृतिक दृश्यों तथा ऐतिहासिक घटनाओं को चित्रित किया जाता था। चीनी लिपि भी चित्रकला के स्वरूप से निकट सम्बन्ध रखती थी।

उत्खनन से प्राप्त बर्तनों और फर्नीचर पर सुंदर चित्र मिले हैं। मंदिरों की दीवारों पर भी बड़े और आकर्षक चित्र बनाए जाते थे।

9. विज्ञान का विकास

चीन में विज्ञान का भी पर्याप्त विकास हुआ था। चीनी ज्योतिषाचार्यों ने पंचांग तैयार किया था और ग्रहों तथा नक्षत्रों से सम्बन्धित भविष्यवाणियाँ करते थे।

उन्हें गणित की दशमलव प्रणाली का ज्ञान था तथा वे पाई (π) का मान निकालने में सक्षम थे।

चीनी चिकित्सा विज्ञान भी उन्नत था। अनेक रोगों और मानव शरीर की विभिन्न क्रियाओं का ज्ञान था तथा उपचार के लिए औषधियों और जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता था।

भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में भी अनेक आविष्कार हुए।

कुतुबनुमा

दिशाओं का ज्ञान कराने वाले कुतुबनुमा का आविष्कार चीनी वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण देन माना गया है।

कुतुबनुमा का आविष्कार चीन के हुनान क्षेत्र में लगभग 1200 ईस्वी में हुआ बताया गया है।

अन्य वैज्ञानिक उपलब्धियाँ

भूकम्पमापक यंत्र, पनचक्की तथा सौर घड़ी के आविष्कार भी चीन से सम्बन्धित बताए गए हैं।

कागज बनाने और मुद्रण कला के प्रारम्भिक विकास के कारण चीन को मुद्रण कला का आविष्कारक भी कहा गया है।

चीनी सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ
ह्वांगहो नदी, महान दीवार, लिपि, कागज, पैगोडा और प्राचीन चीन की प्रमुख उपलब्धियाँ

10. कन्फ्यूशियस एवं लाओत्से

कन्फ्यूशियस

कन्फ्यूशियस चीन के महान विद्वान और दार्शनिक थे। उनका वास्तविक नाम कुंगफू बताया गया है।

उन्होंने अपने दार्शनिक और धार्मिक विचारों से चीनी समाज में अनेक सुधार करने का प्रयास किया।

कन्फ्यूशियस से सम्बन्धित पाँच प्रमुख ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है—

  1. ली चिंग — कर्मकाण्ड एवं शिष्टाचार से सम्बन्धित ग्रन्थ
  2. आई चिंग — परिवर्तन का ग्रन्थ
  3. शू चिंग — इतिहास से सम्बन्धित लेख
  4. शि चिंग — काव्य ग्रन्थ
  5. चुन चिउ चिंग — बसन्त और शरद का इतिहास

कन्फ्यूशियस ने समाज में फैली कुरीतियों और बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया तथा इसके लिए राज्य शक्ति के उपयोग का भी समर्थन किया।

लाओत्से

लाओत्से कन्फ्यूशियस के समकालीन दार्शनिक थे। कन्फ्यूशियस के बाद उनके विचारों ने चीन की सभ्यता और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया।

उन्होंने ताओ-ते-चिंग ग्रन्थ की रचना की और ईश्वर तथा मनुष्य के बीच सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया।

चीनी सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ एक नजर में

क्षेत्र प्रमुख विशेषता
प्रमुख नदियाँ ह्वांगहो एवं यांग्त्सीक्यांग
प्रमुख राजवंश शांग, चाऊ, चिन एवं हान
शासन सम्राट सर्वोच्च शासक, सेनापति, पुरोहित एवं न्यायाधीश
नियुक्तियाँ प्रतियोगी परीक्षाओं से मन्दारिन अधिकारियों की नियुक्ति
समाज संयुक्त परिवार और विभिन्न सामाजिक वर्ग
अर्थव्यवस्था कृषि, शिल्प एवं दूरस्थ व्यापार
धर्म प्रकृति पूजा, शांगति तथा पूर्वजों की उपासना
लिपि चित्रात्मक स्वरूप; ऊपर से नीचे लिखी जाती थी
प्रमुख आविष्कार कागज, कुतुबनुमा, भूकम्पमापक, पनचक्की एवं सौर घड़ी
वास्तुकला चीन की महान दीवार और पैगोडा
प्रमुख दार्शनिक कन्फ्यूशियस एवं लाओत्से

परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष

चीनी सभ्यता का विकास ह्वांगहो और यांग्त्सीक्यांग नदियों की घाटियों में हुआ। शांग, चाऊ, चिन और हान जैसे राजवंशों ने इसके राजनीतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विकसित शासन व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाएँ, संयुक्त परिवार, समृद्ध कृषि और व्यापार, प्रकृति एवं पूर्वजों की पूजा, चित्रात्मक लिपि तथा कागज, कुतुबनुमा और मुद्रण जैसी उपलब्धियाँ इस सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ थीं। कन्फ्यूशियस और लाओत्से के विचारों ने चीनी समाज और संस्कृति को विशेष रूप से प्रभावित किया।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • चीन की सभ्यता का विकास ह्वांगहो और यांग्त्सीक्यांग नदी घाटियों में हुआ।
  • ह्वांगहो नदी को चीन का शोक कहा गया है।
  • चीन के निवासी अपने देश को चुंगकुओ कहते थे।
  • शांग वंश का शासन लगभग 1765–1122 ईसा पूर्व तक रहा।
  • चाऊ वंश का काल लगभग 1122–249 ईसा पूर्व था और इसे चीनी इतिहास का स्वर्ण युग कहा गया।
  • चिन वंश में पक्की सड़कों तथा चीन की प्रसिद्ध दीवार का निर्माण हुआ।
  • लगभग 202 ईसा पूर्व हान वंश ने चीन पर अधिकार स्थापित किया और उसका शासन लगभग 400 वर्ष रहा।
  • सम्राट शासन और धर्म दोनों का प्रधान तथा सर्वोच्च सेनापति और न्यायाधीश था।
  • राजकीय अधिकारियों को मन्दारिन कहा जाता था और उनकी नियुक्ति प्रतियोगी परीक्षाओं से होती थी।
  • चीनी समाज में संयुक्त परिवार प्रथा तथा माता के सम्मान का विशेष महत्व था।
  • चीन की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था तथा दूरस्थ देशों से व्यापार भी होता था।
  • शांगति प्रमुख देवता था और पूर्वजों की पूजा का विशेष महत्व था।
  • लगभग 1400 ईसा पूर्व के चीनी लिपि के नमूने हड्डियों पर मिले हैं; इसमें लगभग 40 हजार संकेत बताए गए हैं।
  • कागज बनाने का आविष्कार चीन में हुआ और काई लून से इसका विशेष सम्बन्ध है।
  • चीन की महान दीवार और पैगोडा उसकी प्रमुख वास्तुकला उपलब्धियाँ थीं।
  • चीनी विज्ञान में पंचांग, दशमलव प्रणाली, पाई का मान, औषधि एवं जड़ी-बूटियों का ज्ञान विकसित था।
  • कुतुबनुमा, भूकम्पमापक यंत्र, पनचक्की और सौर घड़ी महत्वपूर्ण चीनी आविष्कारों में गिने गए हैं।
  • कन्फ्यूशियस और लाओत्से चीन के प्रमुख दार्शनिक एवं समाज सुधारक थे।
  • लाओत्से ने ताओ-ते-चिंग की रचना की।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

पत्थरों से बने उपकरणों तथा औजारों का उपयोग किया जाता था—

व्याख्या: पुरापाषाण काल में मानव पत्थरों से बने खुरदरे उपकरणों और औजारों का प्रयोग करता था।
Q 2

मुद्रण कला के आविष्कारक थे—

व्याख्या: मुद्रण कला का प्रारम्भ सर्वप्रथम चीन में हुआ माना गया है, इसलिए चीनी मुद्रण कला के आविष्कारक माने जाते हैं।
Q 3

विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यता है—

व्याख्या: सिन्धु घाटी सभ्यता को विश्व की प्रमुख प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक माना गया है।
Q 4

सिन्धु सभ्यता की विशेषता है—

व्याख्या: विशाल स्नानागार, अन्नागार तथा विकसित धार्मिक जीवन—ये सभी सिन्धु सभ्यता की महत्वपूर्ण विशेषताएँ थीं।
Q 5

कांस्य युग किस धातु से सम्बन्धित है—

व्याख्या: कांस्य युग में ताँबे का विशेष महत्व था। ताँबे के साथ टिन मिलाकर काँसा नामक मिश्रधातु बनाई जाती थी।
Q 6

मोहनजोदड़ो से प्राप्त स्नानागार की लम्बाई है—

व्याख्या: मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल स्नानागार की कुल लम्बाई लगभग 55 मीटर और चौड़ाई लगभग 33 मीटर थी।
Q 7

मेसोपोटामिया की सभ्यता का जन्म कहाँ हुआ—

व्याख्या: मेसोपोटामिया की सभ्यता का विकास दजला और फरात नदियों के बीच के उपजाऊ क्षेत्र में हुआ।
Q 8

पिरामिड सम्बन्धित हैं—

व्याख्या: पिरामिड प्राचीन मिस्र की सभ्यता के प्रमुख स्मारक थे, जिनमें शासकों के ममीकृत शव सुरक्षित रखे जाते थे।
Q 9

सिन्धु सभ्यता में वृहत्त स्नानागार पाया गया है—

व्याख्या: सिन्धु सभ्यता का प्रसिद्ध विशाल स्नानागार मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुआ है।
Q 10

किस हड़प्पा सभ्यता स्थल से ‘कांस्य नर्तकी की मूर्ति’ प्राप्त हुई थी—

व्याख्या: काँसे से निर्मित प्रसिद्ध नर्तकी की मूर्ति मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई है और यह सिन्धु सभ्यता की धातुकला का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
Q 11

संसार का पहला पालतू पशु था—

व्याख्या: मानव द्वारा सबसे पहले पालतू बनाए गए पशु के रूप में कुत्ते का उल्लेख मिलता है।
Q 12

पहिए का आविष्कार हुआ—

व्याख्या: पहिए का आविष्कार नवपाषाण काल की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इससे बर्तन बनाने, कताई तथा परिवहन में सुविधा हुई।
Q 13

पुरा पाषाणकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी—

व्याख्या: आग की खोज पुरापाषाण काल की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इसका उपयोग गर्मी, भोजन पकाने, प्रकाश और जंगली पशुओं से सुरक्षा के लिए किया गया।
Q 14

कुतुबनुमा का आविष्कार किस देश में हुआ?

व्याख्या: दिशाओं का ज्ञान कराने वाले कुतुबनुमा का आविष्कार चीन की महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियों में गिना गया है।
Q 15

कन्फ्यूशियस किस देश का रहने वाला था—

व्याख्या: कन्फ्यूशियस चीन का प्रसिद्ध दार्शनिक और समाज सुधारक था, जिसने चीनी समाज एवं संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया।

Advertisement

पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय सामाजिक अध्ययन के अध्याय मानव की उत्पत्ति एवं विकास तथा नदी घाटी सभ्यताएँ से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1 2016

नव पाषाण कालीन औजारों की क्या विशेषताएँ थीं?

Q 2 2017

हड़प्पा संस्कृति के आर्थिक एवं धार्मिक जीवन का वर्णन कीजिए।

Q 3

सिंधु सभ्यता के भवन निर्माण पर प्रकाश डालिए।

Q 4

बेबीलोनिया की सभ्यता का उदय कैसे हुआ? स्पष्ट कीजिए।

Q 5

मिस्र सभ्यता में अन्त्येष्टि प्रथा की व्याख्या कीजिए।

Q 6

पुरा पाषाण काल की वेशभूषा कैसी थी?

Q 7

पुरा पाषाण तथा नव पाषाण काल का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।

Q 8

पृथ्वी पर मानव की उत्पत्ति एवं विकास कैसे हुआ? स्पष्ट कीजिए।

Q 9

प्राचीन सभ्यता के क्रमिक विकास को कितने भागों में विभक्त किया गया है? पाषाण काल की विस्तृत जानकारी दीजिए।

Q 10

कांस्य युग के बारे में आप क्या जानते हैं? कांस्य युग में कृषि के क्षेत्र में हुए सुधारों पर प्रकाश डालिए।

Q 11

कांस्य युग में भाषा के विकास के बारे में आप क्या जानते हैं? स्पष्ट कीजिए।

Q 12

मानव द्वारा धातुओं के प्रयोग के विषय में आप क्या जानते हैं? विस्तृत विवेचना कीजिए।

Q 13

सिंधु सभ्यता की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Q 14

मेसोपोटामिया की सभ्यता की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

Q 15

मिस्र की सभ्यता के सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक जीवन पर प्रकाश डालिए।

Q 16 2016

चीन की सभ्यता की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करिए।

Q 17 2016

पुरा पाषाण काल, मध्य पाषाण काल एवं नव पाषाण कालीन पत्थर के औजारों की क्या विशेषताएँ थीं?

Q 18 2018

सिंधु घाटी सभ्यता की आर्थिक, धार्मिक तथा नगरीय व्यवस्थाओं के विषय में तीन-तीन पंक्तियाँ लिखिए।

Q 19

आदिमानव से आधुनिक मानव तक की विकास प्रक्रिया में क्या-क्या शारीरिक परिवर्तन हुए? लिखिए।

Q 20

चीन के दो प्रमुख दार्शनिक एवं धर्म सुधारकों के बारे में संक्षेप में लिखिए।

Q 21 2019

पुरापाषाण काल व नव पाषाण काल के औजारों में क्या अन्तर है? स्पष्ट कीजिए।

Q 22 2019

गीजा का पिरामिड संसार के आश्चर्यजनक स्मारकों में क्यों गिना जाता है?

Q 23 2022

पुरापाषाण कालीन चित्रकला पर प्रकाश डालिए।

Q 24 2022

विश्व को सिन्धु सभ्यता की क्या देन है?

Advertisement

Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

PDF Store Join Telegram