Advertisement
Semester 1 की Complete तैयारी
- Official Syllabus
- Comprehensive Notes
- Quick Revision Notes
- Visual Revision Notes
- Audio Revision
- Solved MCQs
- MCQ Tests
- 2015–2025 Previous Year Papers
- Repeated Exam Questions
- 10 Model Papers
ताम्र-कांस्य युग एवं लौह युग
ताम्र-कांस्य युग का परिचय
ताम्र-कांस्य युग मानव सभ्यता के विकास का वह चरण था जिसमें मनुष्य ने पत्थर के साथ-साथ धातुओं का उपयोग करना प्रारम्भ किया। यह युग पाषाण युग और लौह युग के बीच का काल माना जाता है।
इस काल में मनुष्य ने सबसे पहले ताँबे का प्रयोग किया और बाद में ताँबे के साथ टिन मिलाकर काँसा नामक अधिक कठोर मिश्रधातु तैयार की। धातुओं के प्रयोग ने औजारों, कृषि, नगर-निर्माण, व्यापार और शासन व्यवस्था के विकास को नई गति प्रदान की।
ताँबे का प्रयोग
नवपाषाण काल के अन्तिम चरण में मानव को धातुओं का ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी कारण इस अवस्था को ताम्र-पाषाण युग भी कहा गया।
प्रारम्भ में मनुष्य को ताँबे के अयस्क के विषय में जानकारी नहीं थी। वह नदियों के किनारे जमा प्राकृतिक ताँबे का प्रयोग करता था।
बाद में उसने खदानों से ताँबे का अयस्क निकालना सीख लिया। ताँबे के प्रारम्भिक प्रयोग का समय लगभग 5000 ईसा पूर्व बताया गया है तथा लगभग 4500 ईसा पूर्व दक्षिणी इराक के सुमेर क्षेत्र में ताँबे का प्रयोग प्रारम्भ होने का उल्लेख मिलता है।
काँसे का निर्माण
आगे चलकर मनुष्य ने ताँबे में टिन अथवा जस्ता मिलाकर मिश्रित धातु बनाना प्रारम्भ किया। ताँबे और टिन के मिश्रण से बनी धातु को काँसा कहा गया।
काँसा बनाने के लिए लगभग 10 भाग ताँबा और 1 भाग टिन मिलाया जाता था।
काँसा ताँबे की अपेक्षा अधिक उपयोगी और कठोर सिद्ध हुआ। इससे बने उपकरण, औजार और हथियार अधिक मजबूत तथा टिकाऊ होते थे।
मजबूत औजार उपलब्ध होने के कारण बढ़ईगिरी जैसे कार्यों का विकास हुआ और आगे चलकर धातु-अयस्क निकालने तथा औजार बनाने की व्यवस्थित तकनीक विकसित हुई।
कांस्य युगीन सभ्यताओं का विकास
विश्व के विभिन्न भागों में कांस्य युगीन सभ्यताओं का विकास हुआ। इनमें सिंधु घाटी की सभ्यता, दजला-फरात नदियों के मध्य विकसित सुमेरिया की सभ्यता तथा नील नदी के किनारे विकसित मिस्र की सभ्यता प्रमुख थीं।
इन प्रारम्भिक सभ्यताओं का विकास मुख्यतः नदियों के किनारे हुआ। इसके प्रमुख कारण थे—
- नदियों के किनारे की भूमि मुलायम एवं उपजाऊ थी।
- पीने और सिंचाई के लिए जल आसानी से उपलब्ध था।
- नदियाँ यातायात का महत्वपूर्ण साधन थीं।
- प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ भूमि को उपजाऊ बनाए रखती थी।
- बुवाई, जुताई और निराई जैसे कृषि कार्य अपेक्षाकृत सरल थे।
कांस्य युग की प्रमुख विशेषताएँ
1. नगरों एवं शहरों का उदय
कांस्य युग के प्रारम्भ से नगरों और शहरों के विकास के प्रमाण मिलने लगते हैं। कृषि उत्पादन बढ़ने और खाद्य पदार्थों की नियमित उपलब्धता के कारण लोगों को स्थायी रूप से बसने का अवसर मिला।
सिंचाई और कृषि कार्यों को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए संस्थाओं की आवश्यकता हुई। नगरों के विकास के साथ उनमें अलग-अलग कार्य करने वाले लोगों की संख्या बढ़ी और श्रम-विभाजन का विकास हुआ।
नगरों में पक्के मकान, चौड़ी सड़कें तथा ढकी हुई नालियाँ बनाई जाने लगीं।
2. कृषि में सुधार
प्रारम्भ में मनुष्य लकड़ी के हल का प्रयोग करता था, परन्तु बाद में कृषि कार्यों में पशुओं का उपयोग होने लगा।
अनाज की बढ़ती आवश्यकता के कारण नदी किनारे के वनों को काटकर भूमि को कृषि योग्य बनाया गया। सिंचाई के लिए नहरों और बाँधों का निर्माण भी प्रारम्भ हुआ।
कृषि और बस्तियों की सुरक्षा के लिए सिंचाई व्यवस्था उपयोगी सिद्ध हुई। अधिक अनाज उत्पादन के कारण कुछ लोग कृषि कार्य से मुक्त होकर अन्य व्यवसायों में लगने लगे। ऐसे लोगों के निवास स्थान आगे चलकर नगरों के रूप में विकसित हुए।
3. व्यापार एवं आर्थिक विकास
कृषि की उन्नति, अतिरिक्त अनाज उत्पादन तथा कला और वास्तुकला के विकास के साथ व्यापार-वाणिज्य का भी विकास हुआ।
नगरों में रहने वाले लोगों को अनेक प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता होती थी। इसलिए विभिन्न व्यवसायों और कार्यों में विशेषज्ञ व्यक्तियों का विकास हुआ।
इस प्रकार समाज में कार्य के आधार पर अलग-अलग वर्ग बनने लगे और व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ीं।
4. सामाजिक जीवन का संगठन
कांस्य युग में मानव का सामाजिक जीवन अधिक संगठित हो गया। कृषि के विकास के कारण स्थायी जीवन की प्रवृत्ति मजबूत हुई।
परिवार में सबसे अधिक आयु वाला व्यक्ति परिवार का मुखिया होता था और परिवार के अन्य सदस्य उसकी आज्ञा का पालन करते थे।
अनेक परिवारों के मिलकर रहने से कबीलों की अवधारणा विकसित हुई। प्रत्येक कबीले का एक मुखिया होता था। आगे चलकर इन्हीं कबीलों से राज्यों के निर्माण की दिशा में विकास हुआ।
5. शासन व्यवस्था का उदय
नगरों और व्यापार के विकास के साथ सामाजिक जीवन अधिक जटिल हो गया। इसलिए सार्वजनिक जीवन को व्यवस्थित रखने के लिए शासन व्यवस्था की आवश्यकता अनुभव की गई।
ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता थी जो कानून बनाए, लोगों की सुरक्षा करे, शान्ति स्थापित करे और आपसी विवादों का निपटारा करे।
समय के साथ समाज में शासकों और राजाओं का उदय हुआ तथा शासन को व्यवस्थित रखने के लिए शासक और योद्धा अथवा सैनिक वर्ग का विकास हुआ।
6. धार्मिक स्थिति
भारत में सबसे पहले प्रयोग में आने वाली धातुओं में ताँबा और काँसा प्रमुख थे। इन धातुओं को पवित्र माना जाने लगा।
प्रकृति के निकट जीवन बिताने के कारण लोग सूर्य, चन्द्रमा और विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करते थे। ये देवी-देवता विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक माने जाते थे।
इस समय तक धर्म का स्पष्ट रूप से अलग और व्यवस्थित स्वरूप विकसित नहीं हुआ था।
7. भाषा एवं लेखन कला का विकास
कांस्य युग में भाषा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण विकास हुआ। मानव ने अपने विचारों को लिखित रूप में व्यक्त करना सीख लिया।
लगभग 3000 ईसा पूर्व कांस्य युगीन लिपि का आविष्कार हुआ, जिसे कीलाक्षर लिपि कहा गया है।
इस लिपि में 250 से भी अधिक अक्षर बताए गए हैं। प्रारम्भ में यह लिपि चित्रों पर आधारित थी, परन्तु आगे चलकर इसका स्वरूप ध्वनि पर आधारित हो गया।
ताम्र-कांस्य युग का महत्व
| क्षेत्र | प्रमुख परिवर्तन |
|---|---|
| धातु | ताँबे तथा काँसे के औजार और हथियार |
| कृषि | पशुओं से हल चलाना, नहर और बाँध का निर्माण |
| निवास | स्थायी नगरों और शहरों का विकास |
| व्यापार | अतिरिक्त उत्पादन और विभिन्न व्यवसायों का विकास |
| समाज | परिवार, कबीले एवं श्रम-विभाजन का विकास |
| शासन | शासक, राजा एवं सैनिक वर्ग का उदय |
| धर्म | प्राकृतिक शक्तियों एवं देवी-देवताओं की पूजा |
| लेखन | कीलाक्षर लिपि का विकास |
लौह युग
लौह युग उस काल को कहा जाता है जिसमें मानव ने लोहे का उपयोग प्रारम्भ किया। यह युग पाषाण काल तथा ताम्र-कांस्य युग के बाद आता है।
पाषाण काल में मानव धातुओं के खनन से परिचित नहीं था और कांस्य युग में भी लोहे की खोज नहीं हुई थी। ताम्र एवं कांस्य युग के पश्चात लौह युग का आरम्भ हुआ।
भारत में लोहे का प्रयोग
भारत में लौह युग का प्रारम्भ उत्तर और दक्षिण भारत में एक ही समय पर नहीं हुआ।
उत्तर भारत में ताम्र काल के तुरन्त बाद लोहे का प्रयोग आरम्भ हुआ, जबकि दक्षिण भारत में उत्तर-पाषाण काल के बाद लोहे के प्रयोग का उल्लेख मिलता है।
भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे का प्रयोग लगभग 1000 ईसा पूर्व आरम्भ हुआ माना गया है।
भारत में पामीर के पठार से होते हुए महाराष्ट्र के क्षेत्र तक इसके विकास का उल्लेख मिलता है और आगे चलकर मध्य प्रदेश से बंगाल की ओर इसका प्रयोग फैलता गया।
लौह के प्रयोग से मानव जीवन में परिवर्तन
लोहे की खोज और प्रयोग से मानव के जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन आए। लोहे के औजार ताँबे और काँसे की अपेक्षा अधिक उपयोगी सिद्ध हुए।
लोहे के प्रयोग से कृषि-कार्य अधिक प्रभावी हुआ, जंगलों को साफ करना सरल हुआ और नई कृषि भूमि तैयार की जा सकी। इससे कृषि तथा स्थायी बस्तियों के विकास को और गति मिली।
लोहे के मजबूत औजारों और हथियारों के कारण नए नगरों का विकास हुआ तथा मानव के कलात्मक जीवन में भी परिवर्तन आया।
इस युग में विभिन्न भाषाओं की वर्णमालाओं का विकास हुआ, जिसके कारण साहित्य और इतिहास लिखना सम्भव हुआ। संस्कृत और चीनी भाषाओं का साहित्य इस काल में विकसित हुआ तथा ऋग्वेद और आवेस्ता की गाथाओं का भी उल्लेख इसी संदर्भ में किया गया है।
ताम्र-कांस्य युग एवं लौह युग का तुलनात्मक सार
| ताम्र-कांस्य युग | लौह युग |
|---|---|
| ताँबे तथा काँसे का प्रमुख प्रयोग हुआ। | लोहे का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। |
| काँसा ताँबे और टिन को मिलाकर बनाया गया। | लोहे के अधिक मजबूत औजार बनाए गए। |
| नगरों, कृषि और व्यापार का विकास हुआ। | कृषि और नगरों के विकास को और गति मिली। |
| नहर और बाँध बनाकर सिंचाई में सुधार हुआ। | लोहे के औजारों से भूमि साफ करना और कृषि करना सरल हुआ। |
| शासन, सामाजिक संगठन और लेखन कला विकसित हुई। | साहित्य, इतिहास तथा वर्णमालाओं के विकास को बढ़ावा मिला। |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
ताम्र-कांस्य युग में मानव ने पत्थर से आगे बढ़कर धातुओं का प्रयोग प्रारम्भ किया। ताँबे और काँसे के मजबूत औजारों से कृषि, नगर, व्यापार, शासन और लेखन कला का विकास हुआ। आगे लौह के प्रयोग ने मानव जीवन में और व्यापक परिवर्तन किए। मजबूत लोहे के औजारों ने कृषि और नगरों के विस्तार को गति दी तथा भाषा, साहित्य और इतिहास लेखन के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- ताम्र-कांस्य युग पाषाण युग और लौह युग के बीच का काल है।
- ताँबे का प्रारम्भिक प्रयोग लगभग 5000 ईसा पूर्व बताया गया है।
- लगभग 4500 ईसा पूर्व दक्षिणी इराक के सुमेर क्षेत्र में ताँबे के प्रयोग का उल्लेख मिलता है।
- काँसा ताँबे और टिन से बनी मिश्रधातु है; लगभग 10 भाग ताँबा और 1 भाग टिन मिलाया जाता था।
- काँसे के उपकरण ताँबे की तुलना में अधिक मजबूत और टिकाऊ थे।
- प्रारम्भिक कांस्य युगीन सभ्यताओं का विकास मुख्य रूप से नदियों के किनारे हुआ।
- कांस्य युग में नगरों एवं शहरों, कृषि, सिंचाई, व्यापार और श्रम-विभाजन का विकास हुआ।
- परिवारों से कबीलों और कबीलों से आगे राज्यों की अवधारणा विकसित हुई।
- शासन व्यवस्था के विकास के साथ शासक और सैनिक वर्ग का उदय हुआ।
- लगभग 3000 ईसा पूर्व कीलाक्षर लिपि का आविष्कार बताया गया है।
- कीलाक्षर लिपि में 250 से अधिक अक्षर थे और प्रारम्भ में यह चित्रों पर आधारित थी।
- लौह युग ताम्र-कांस्य युग के पश्चात प्रारम्भ हुआ।
- भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे का प्रयोग लगभग 1000 ईसा पूर्व आरम्भ माना गया है।
- लोहे के औजारों से कृषि, जंगलों की सफाई, नई बस्तियों और नगरों के विकास को गति मिली।
- लौह युग में वर्णमालाओं, साहित्य और इतिहास लेखन के विकास को भी बढ़ावा मिला।
Advertisement
सिंधु घाटी सभ्यता: परिचय एवं प्रमुख विशेषताएँ
सिंधु घाटी सभ्यता का परिचय
सिंधु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में एक प्रमुख सभ्यता थी। इसे हड़प्पा सभ्यता तथा सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है।
इस अज्ञात सभ्यता की खोज का श्रेय रायबहादुर दयाराम साहनी को दिया जाता है। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में सन् 1921 में हड़प्पा स्थल की खुदाई कराई गई।
लगभग एक वर्ष बाद सन् 1922 में राखाल दास बनर्जी के नेतृत्व में वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के लरकाना जिले में मोहनजोदड़ो की खुदाई के दौरान एक अन्य प्राचीन नगर का पता चला।
प्रारम्भ में माना गया कि इस सभ्यता का विस्तार मुख्यतः सिंधु नदी की घाटी तक था, इसलिए इसका नाम सिंधु घाटी सभ्यता पड़ा। हड़प्पा में सर्वप्रथम उत्खनन होने के कारण इसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा गया। बाद में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को एक ही विस्तृत सभ्यता के प्रमुख नगर माना गया।
सिंधु सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ
सिंधु सभ्यता का स्वरूप मुख्य रूप से नगरीय था। इसकी नगर योजना, भवन निर्माण, जल निकासी, विशाल स्नानागार, अन्नागार, कला, व्यापार और सामाजिक व्यवस्था इसके विकसित स्वरूप को स्पष्ट करते हैं।
1. नगर निर्माण योजना
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के नगर सुव्यवस्थित योजना के अनुसार बनाए गए थे। इन नगरों की सड़कें सीधी और चौड़ी थीं तथा एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
मोहनजोदड़ो की मुख्य सड़क लगभग 10 मीटर से 33 मीटर तक चौड़ी बताई गई है। मकान सड़कों के किनारे बनाए गए थे और उनके निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया था।
कुछ मकान अनेक मंजिलों वाले थे। प्रत्येक मकान में कुआँ और स्नानागार जैसी सुविधाएँ मिलती हैं।
जल निकासी व्यवस्था
मोहनजोदड़ो की जल निकासी व्यवस्था अत्यन्त व्यवस्थित थी। घरों से निकलने वाला गन्दा पानी छोटी नालियों से होकर बड़ी नाली में पहुँचता था।
इस प्रकार विकसित नालियों की व्यवस्था सिंधु नगरों की स्वच्छता और उन्नत नगर-योजना का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
2. भवन निर्माण
सिंधु सभ्यता के निवासी उच्चकोटि के भवन निर्माता थे। उत्खनन से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर भवनों को सामान्य रूप से दो वर्गों में समझा जा सकता है—
- राजकीय एवं सार्वजनिक भवन
- साधारण भवन
राजकीय एवं सार्वजनिक भवन
मोहनजोदड़ो से एक विशाल भवन के अवशेष मिले हैं। इसकी लम्बाई लगभग 71 मीटर थी और इसकी चौड़ाई भी लगभग इतनी ही मानी गई है।
इसमें एक विशाल कक्ष था जिसकी छत 20 स्तम्भों पर टिकी हुई थी। इसका फर्श पक्की ईंटों से बनाया गया था। इसका उपयोग सम्भवतः सभा अथवा बैठक के लिए किया जाता था।
दुर्ग
नगर के पश्चिमी टीले पर सुरक्षा की दृष्टि से एक दुर्ग का निर्माण किया गया था। ह्वीलर ने इस टीले को माउण्ट ए-बी नाम दिया।
दुर्ग उत्तर-दक्षिण दिशा में लगभग 460 गज तथा पूर्व-पश्चिम दिशा में लगभग 215 गज विस्तृत था। इसके चारों ओर लगभग 45 फीट चौड़ी सुरक्षा प्राचीर थी, जिसमें फाटक और रक्षक गृह बनाए गए थे।
दुर्ग के बाहर श्रमिकों के आवास के प्रमाण भी मिले हैं। इन आवासों में आँगन और कमरों की व्यवस्था थी।
साधारण भवन
साधारण लोगों के मकान आवश्यकता के अनुसार छोटे या बड़े तथा एक या दो मंजिल के बनाए जाते थे। ऊपरी मंजिल पर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनाई जाती थीं।
भवनों में खिड़कियाँ, रोशनदान, दरवाजे, रसोईघर, कुएँ और स्नानागार होते थे। फर्श ईंट, खड़िया और गारे से बनाया जाता था।
जल निकास की समुचित व्यवस्था थी। घरों के दरवाजे सामान्यतः मुख्य सड़क की ओर न खुलकर गलियों की ओर खुलते थे।
3. विशाल स्नानागार
मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल स्नानागार सिंधु सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण स्थापत्य उपलब्धियों में से एक है।
इसकी कुल लम्बाई लगभग 55 मीटर, चौड़ाई 33 मीटर तथा बाहरी दीवारों की मोटाई लगभग 3 मीटर थी।
इसके आँगन के मध्य में एक स्नानकुण्ड था, जिसकी लम्बाई लगभग 12 मीटर, चौड़ाई 7 मीटर और गहराई 2.4 मीटर थी।
स्नानकुण्ड में जल की सतह तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनी थीं। इसके चारों ओर बरामदे, गलियाँ और कमरे थे।
स्नानकुण्ड को जल से भरने के लिए पास में एक कुआँ था। जल निकासी की व्यवस्था भी अच्छी थी। इसके दक्षिण-पश्चिम की ओर आठ छोटे स्नानागार बने होने का उल्लेख मिलता है।
4. अन्नागार
सिंधु सभ्यता का अन्नागार भी उसकी महत्वपूर्ण उपलब्धि था। इसकी लम्बाई लगभग 18 मीटर और चौड़ाई लगभग 7 मीटर बताई गई है।
यहाँ सम्भवतः गाँवों से लाया गया अनाज एकत्र किया जाता था। इस संग्रहीत अनाज का उपयोग शहरी तथा ग्रामीण जनता द्वारा आपातकालीन परिस्थितियों में किया जा सकता था।
5. धार्मिक जीवन
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से बड़ी संख्या में देवी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इन्हें मातृदेवी अथवा प्रकृति देवी से सम्बन्धित माना गया है।
एक मुहर पर ऐसी नारी का चित्र मिलता है जिसके पेट से पौधा निकलता हुआ दिखाया गया है। इससे मातृदेवी तथा उर्वरता से सम्बन्धित धार्मिक विश्वासों का संकेत मिलता है।
एक अन्य चित्र में चाकू लिए पुरुष तथा हाथ ऊपर उठाए नारी का चित्र मिलता है, जिसे सम्भावित बलि-प्रथा से जोड़ा गया है।
मोहनजोदड़ो की एक मुहर पर योगी जैसी आकृति प्राप्त हुई है, जिसे पशुपतिनाथ शिव के अनुरूप माना गया है। लिंग-प्रस्तरों और मातृदेवी की मृण्मूर्तियों के प्रमाण भी मिले हैं।
इसके अतिरिक्त नाग पूजा, वृक्ष पूजा, सूर्य पूजा तथा जल पूजा के संकेत भी प्राप्त हुए हैं।
6. सामाजिक जीवन
सिंधु सभ्यता के समाज में विभिन्न प्रकार के कार्य करने वाले लोग रहते थे। पुरोहित, व्यापारी, शिल्पकार और श्रमिक जैसे वर्ग समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
आहार
सिंधु सभ्यता के निवासी शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन करते थे।
गेहूँ, जौ, चावल, दूध, सब्जियाँ और फल उनके प्रमुख खाद्य पदार्थ थे। इसके अतिरिक्त गाय, भेड़, मछली, कछुआ और मुर्गे आदि के मांस का भी उपयोग किया जाता था।
वेशभूषा एवं आभूषण
सिंधु सभ्यता के निवासी सूती और ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। सोना, चाँदी, ताँबा और हाथी-दाँत से बने आभूषण भी मिले हैं।
मनके, सीप और मिट्टी के आभूषणों का भी प्रयोग किया जाता था। स्त्री और पुरुष दोनों अंगूठी, कड़े, कान के आभूषण और कुण्डल पहनते थे। स्त्रियाँ चूड़ियाँ, कर्णफूल, हार और भुजबन्द आदि पहनती थीं।
गृहस्थी के उपकरण
घड़े, कलश, थाली, गिलास, चम्मच, मिट्टी के कुल्हड़ और विभिन्न धातुओं के बर्तन घरेलू जीवन में प्रयोग किए जाते थे।
मनोरंजन के साधन
नृत्य, आखेट, संगीत, पासे का खेल तथा मुर्गों की लड़ाई जैसे मनोरंजन के साधनों का प्रचलन था।
औषधियाँ एवं शल्य चिकित्सा
सिंधु सभ्यता के निवासी विभिन्न औषधियों का प्रयोग करते थे। कालीबंगा और लोथल से खोपड़ी की शल्य चिकित्सा से सम्बन्धित प्रमाण बताए गए हैं।
प्रसाधन सामग्री
सिंधु सभ्यता की स्त्रियाँ प्रसाधन सामग्री का प्रयोग करती थीं। चन्हूदड़ो से लिपस्टिक के प्रयोग के प्रमाण मिलने का उल्लेख किया गया है।
7. आर्थिक जीवन
कृषि
सिंधु सभ्यता की अधिकांश जनता कृषि कार्य करती थी और नगरों के बाहरी क्षेत्रों में निवास करती थी। गेहूँ, जौ और मटर की खेती प्रमुख थी। कपास की खेती भी की जाती थी।
पशुपालन
कूबड़ वाले और बिना कूबड़ वाले पशु, बकरियाँ और भैंसें पाली जाती थीं। हाथी पालने के भी संकेत मिलते हैं। घोड़े का विशेष उपयोग किए जाने के स्पष्ट प्रमाण नहीं बताए गए हैं।
वस्त्र निर्माण
सिंधु निवासी कपास की खेती करते थे और सूत कातने तथा कपड़ा बुनने की कला से परिचित थे।
बन्दरगाह
लोथल और सुरकोटड़ा को प्रमुख बन्दरगाहों के रूप में बताया गया है। इनके माध्यम से जल तथा स्थल दोनों मार्गों से सम्पर्क स्थापित होता था।
व्यापार-वाणिज्य
सिंधु सभ्यता का व्यापार दूर-दूर के क्षेत्रों से था। मेसोपोटामिया में प्राप्त सिंधु संस्कृति की वस्तुएँ दोनों सभ्यताओं के बीच समुद्री व्यापार का संकेत देती हैं।
दिलमुन दोनों क्षेत्रों के व्यापार का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था। हड़प्पा से मिट्टी के बर्तन, अनाज, सूती कपड़े, मसाले, पत्थर से बनी वस्तुएँ, हाथी-दाँत और अन्य सामग्री भेजी जाती थी तथा धातु सम्बन्धी वस्तुएँ बाहर से भारत लाई जाती थीं।
8. कला
सिंधु सभ्यता में भवन निर्माण, धातुकला, चित्रकला, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला और मुहर निर्माण जैसी कलाएँ विकसित थीं।
भवन निर्माण कला
विशाल अन्नागार, विशाल स्नानागार तथा सुव्यवस्थित नगर इसकी उन्नत भवन निर्माण कला के प्रमाण हैं।
धातुकला
सिंधु निवासी सोना, चाँदी और ताँबे से आभूषण बनाते थे। मोहनजोदड़ो से प्राप्त काँसे की प्रसिद्ध नर्तकी की मूर्ति धातुकला का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
चित्रकला
बर्तनों और मुहरों पर बने चित्रों से चित्रकला की जानकारी प्राप्त होती है।
संगीत एवं नृत्यकला
सिंधु सभ्यता के लोगों की संगीत और नृत्य में रुचि थी। ढोल, तबला तथा नर्तकी की आकृति जैसी वस्तुएँ इसके प्रमाण के रूप में दी गई हैं।
मूर्तिकला
मोहनजोदड़ो से काँसे की नर्तकी की मूर्ति तथा पत्थर की मानव आकृतियाँ मिली हैं। हड़प्पा से लाल पत्थर में बनी सिरविहीन मानव प्रतिमाएँ और विभिन्न पशुओं की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं।
मुहरें एवं चित्रांकन
हड़प्पा से प्राप्त मुहरें इस सभ्यता की विशिष्ट कला का प्रमाण हैं। इन पर अनेक प्रकार की आकृतियाँ बनाई गई थीं।
कुछ मुहरों पर चोटी बाँधकर बैठी स्त्री और सामने झण्डा या पूजा-सामग्री जैसी आकृति दिखाई देती है। अन्य मुहरों पर जंगली हाथी और मगर जैसे पशुओं के चित्र भी मिलते हैं।
9. लेखन कला एवं लिपि
हड़प्पा लिपि का सबसे पुराना नमूना सन् 1853 में मिलने का उल्लेख है, जबकि सन् 1923 तक इसका स्वरूप स्पष्ट रूप से सामने आया।
सिंधु लिपि में लगभग 64 मूल चिन्ह तथा कुल मिलाकर लगभग 205 से 400 तक संकेत बताए गए हैं। ये संकेत सेलखड़ी की आयताकार मुहरों तथा ताँबे की गुटिकाओं आदि पर मिलते हैं।
सिंधु लिपि चित्रात्मक थी और अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। प्राप्त सबसे बड़े लेख में लगभग 17 चिन्ह बताए गए हैं।
कालीबंगा से प्राप्त मिट्टी के एक टुकड़े पर चिन्हों की स्थिति के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि सिंधु लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी।
10. मुहरें
सिंधु सभ्यता में मुहरों का महत्वपूर्ण स्थान था। अब तक लगभग 5000 मुहरें प्राप्त होने का उल्लेख है, जिनमें लगभग 1200 मुहरें मोहनजोदड़ो से मिली थीं।
ये मुहरें बेलनाकार, वर्गाकार, आयताकार और वृत्ताकार रूपों में मिलती हैं। अधिकांश मुहरें सेलखड़ी से बनाई गई थीं।
मुहरों पर संक्षिप्त लेख और अनेक पशुओं की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। एक-श्रृंगी साँड की आकृति सबसे अधिक मिलने वाली आकृतियों में प्रमुख है। इसके अतिरिक्त भैंस, बाघ, गैंडा, हिरन, बकरी और हाथी आदि के चित्र भी प्राप्त हुए हैं।
लोथल और देशलपुर से ताँबे की मुहरें मिलने का भी उल्लेख है।
11. मृतक संस्कार
मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त प्रमाणों से ज्ञात होता है कि मृतकों के अन्तिम संस्कार की तीन प्रमुख विधियाँ प्रचलित थीं—
पूर्ण समाधि
इसमें मृतक के पूरे शरीर को जमीन के अन्दर गाड़कर समाधि बनाई जाती थी। लोथल में एक ही कब्र में दो कंकाल मिलने का उल्लेख है।
आंशिक समाधि
इस विधि में मृत शरीर को खुले स्थान पर पशु-पक्षियों के लिए छोड़ दिया जाता था। बाद में बची हुई अस्थियों को किसी पात्र में रखकर जमीन में गाड़ दिया जाता था।
दाहकरण
इसमें शव को जलाने के बाद राख और अस्थियों को किसी पात्र या कलश में रखकर भूमि में गाड़ दिया जाता था। मोहनजोदड़ो से कलश-शवाधान के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
सिंधु सभ्यता का अन्त
सिंधु सभ्यता के विनाश का निश्चित कारण ज्ञात नहीं है। महामारी, सूखा, बाढ़, भूकम्प और विदेशी आक्रमण आदि को इसके पतन के सम्भावित कारणों में माना गया है।
ये सभी कारण आंशिक रूप से इस सभ्यता के अन्त के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं। कुछ विद्वानों ने आर्यों के आक्रमण को भी सिंधु सभ्यता के पतन का कारण माना है, किन्तु किसी एक कारण को निश्चित रूप से स्वीकार नहीं किया गया है।
सिंधु सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ एक नजर में
| क्षेत्र | प्रमुख विशेषता |
|---|---|
| नगर योजना | सीधी और चौड़ी सड़कें, समकोण पर काटती सड़कें तथा विकसित जल निकासी |
| भवन | पक्की ईंटों के एक एवं बहुमंजिला मकान, कुएँ और स्नानागार |
| विशाल स्नानागार | मोहनजोदड़ो का 12 × 7 × 2.4 मीटर का स्नानकुण्ड |
| अन्नागार | अनाज के संग्रह एवं आपातकालीन उपयोग की व्यवस्था |
| धर्म | मातृदेवी, पशुपति, नाग, वृक्ष, सूर्य एवं जल पूजा |
| अर्थव्यवस्था | कृषि, पशुपालन, वस्त्र निर्माण और दूरस्थ व्यापार |
| कला | भवन निर्माण, धातुकला, मूर्तिकला, चित्रकला एवं नृत्य-संगीत |
| लिपि | चित्रात्मक और अपठित; दाएँ से बाएँ लिखे जाने का संकेत |
| मुहरें | लगभग 5000; पशु आकृतियाँ और संक्षिप्त लेख |
| मृतक संस्कार | पूर्ण समाधि, आंशिक समाधि एवं दाहकरण |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
सिंधु घाटी सभ्यता एक विकसित नगरीय सभ्यता थी। इसकी सुव्यवस्थित नगर योजना, पक्के भवन, उन्नत जल निकासी, विशाल स्नानागार और अन्नागार इसके स्थापत्य विकास को दर्शाते हैं। कृषि, पशुपालन, वस्त्र निर्माण और दूरस्थ व्यापार इसकी समृद्ध अर्थव्यवस्था के आधार थे। मातृदेवी और पशुपति से सम्बन्धित धार्मिक संकेत, विकसित कला, मूर्तियाँ, मुहरें तथा चित्रात्मक लिपि इसके समृद्ध सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को स्पष्ट करते हैं।
- सिंधु सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता तथा सिंधु-सरस्वती सभ्यता भी कहा जाता है।
- हड़प्पा की खोज का श्रेय रायबहादुर दयाराम साहनी को दिया जाता है; सन् 1921 में खुदाई हुई।
- मोहनजोदड़ो की खुदाई सन् 1922 में राखाल दास बनर्जी के नेतृत्व में हुई।
- सिंधु नगरों की सड़कें सीधी, चौड़ी और एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
- पक्की ईंटों के मकान, कुएँ, स्नानागार और विकसित नालियाँ नगर योजना की प्रमुख विशेषताएँ थीं।
- मोहनजोदड़ो के विशाल स्नानागार का स्नानकुण्ड लगभग 12 मीटर लम्बा, 7 मीटर चौड़ा और 2.4 मीटर गहरा था।
- अन्नागार में सम्भवतः गाँवों से लाया गया अनाज एकत्र किया जाता था।
- मातृदेवी, पशुपति, नाग, वृक्ष, सूर्य और जल पूजा के प्रमाण मिलते हैं।
- सिंधु निवासियों का प्रमुख आर्थिक आधार कृषि, पशुपालन, वस्त्र निर्माण और व्यापार था।
- लोथल और सुरकोटड़ा को प्रमुख बन्दरगाह बताया गया है।
- काँसे की नर्तकी सिंधु सभ्यता की धातुकला का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
- सिंधु लिपि चित्रात्मक और अभी तक अपठित है।
- सिंधु लिपि के लगभग 64 मूल चिन्ह और 205 से 400 तक संकेत बताए गए हैं।
- लगभग 5000 मुहरें प्राप्त होने का उल्लेख है, जिनमें लगभग 1200 मोहनजोदड़ो से मिली हैं।
- मृतक संस्कार की तीन विधियाँ थीं—पूर्ण समाधि, आंशिक समाधि और दाहकरण।
- सिंधु सभ्यता के अन्त का कोई एक निश्चित कारण ज्ञात नहीं है।
सिंधु सभ्यता: काल, विस्तार एवं प्रमुख स्थल
सिंधु सभ्यता का काल निर्धारण
सिंधु सभ्यता का निश्चित काल निर्धारित करना कठिन रहा है। विभिन्न विद्वानों ने पुरातात्विक प्रमाणों, मेसोपोटामिया से प्राप्त हड़प्पाई मुहरों तथा बाद में विकसित कार्बन डेटिंग जैसी वैज्ञानिक विधियों के आधार पर इसके काल के विषय में अलग-अलग मत प्रस्तुत किए।
जॉन मार्शल का मत
सिंधु सभ्यता के काल निर्धारण का प्रारम्भिक प्रयास जॉन मार्शल ने किया। उन्होंने मेसोपोटामिया के उर और किश नामक स्थलों से प्राप्त हड़प्पाई मुहरों के आधार पर सन् 1931 में इस सभ्यता का काल लगभग 3250 ईसा पूर्व से 2750 ईसा पूर्व माना।
ह्वीलर का मत
ह्वीलर ने सिंधु सभ्यता का काल लगभग 2500 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व माना।
कार्बन डेटिंग के आधार पर काल विभाजन
कार्बन डेटिंग के विकास के बाद सिंधु सभ्यता के काल को तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया गया—
| चरण | अनुमानित काल |
|---|---|
| प्राक् हड़प्पा चरण | लगभग 3500–2600 ईसा पूर्व |
| परिपक्व हड़प्पा चरण | लगभग 2600–1900 ईसा पूर्व |
| उत्तर हड़प्पा चरण | लगभग 1900–1300 ईसा पूर्व |
रेडियो कार्बन C-14 जैसी वैज्ञानिक विश्लेषण पद्धतियों के आधार पर सिंधु सभ्यता का सामान्य काल लगभग 2500 ईसा पूर्व से 1750 ईसा पूर्व भी माना गया है।
विभिन्न विद्वानों द्वारा सिंधु सभ्यता का काल निर्धारण
| विद्वान | अनुमानित काल |
|---|---|
| माधोस्वरूप वत्स | 3500–2700 ईसा पूर्व |
| जॉन मार्शल | 3250–2750 ईसा पूर्व |
| डेल्स | 2900–1900 ईसा पूर्व |
| अर्नेस्ट मैके | 2800–1500 ईसा पूर्व |
| मॉर्टिमर ह्वीलर | 2500–1500 ईसा पूर्व |
| सी. जे. गैड | 2350–1700 ईसा पूर्व |
| डी. पी. अग्रवाल | 2350–1750 ईसा पूर्व |
| फेयर सर्विस | 2000–1500 ईसा पूर्व |
सिंधु सभ्यता के प्रमुख स्थल एवं खोजकर्ता
| स्थल | खोजकर्ता / उत्खननकर्ता | वर्ष |
|---|---|---|
| हड़प्पा | दयाराम साहनी, माधोस्वरूप वत्स | 1921 |
| मोहनजोदड़ो | राखाल दास बनर्जी | 1922 |
| रोपड़ | यज्ञदत्त शर्मा | 1953 |
| कालीबंगा | ब्रजवासी लाल, अमलानन्द घोष | 1953 |
| लोथल | एस. रंगनाथ राव | 1954 |
| चन्हूदड़ो | एन. गोपाल मजूमदार | 1931 |
| सुरकोटड़ा | जगपति जोशी | 1964 |
| बनावली | रवीन्द्र सिंह बिष्ट | 1973 |
| आलमगीरपुर | यज्ञदत्त शर्मा | 1958 |
| रंगपुर | माधोस्वरूप वत्स, रंगनाथ राव | 1931–1953 |
| कोटदीजी | फजल अहमद | 1953 |
| सुत्कागेनडोर | ऑरेल स्टाइन, जार्ज एफ. डेल्स | 1927 |
सिंधु सभ्यता का विस्तार
सिंधु सभ्यता के अवशेष वर्तमान पाकिस्तान और भारत के विस्तृत क्षेत्र में प्राप्त हुए हैं। इसके प्रमुख अवशेष पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर तक मिले हैं।
सभ्यता के विस्तार की प्रमुख सीमाएँ निम्न प्रकार बताई गई हैं—
- पूर्व में — आलमगीरपुर तक
- पश्चिम में — मकरान तट पर सुत्कागेनडोर तक
- उत्तर में — जम्मू क्षेत्र के माण्डा तक
- दक्षिण में — दायमाबाद तक
इसका विस्तार लगभग त्रिभुजाकार था और लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ बताया गया है।
पूर्व से पश्चिम इसकी लम्बाई लगभग 1600 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण लगभग 1400 किलोमीटर थी। इस प्रकार यह समकालीन मिस्र और सुमेरियन सभ्यताओं की तुलना में अधिक विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई थी।
प्रमुख हड़प्पाई स्थलों का संक्षिप्त परिचय
1. हड़प्पा
हड़प्पा वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र में स्थित था। इसकी खोज सन् 1921 में हुई। सन् 1857 में लाहौर-मुल्तान रेलवे निर्माण के समय हड़प्पा की प्राचीन ईंटों का उपयोग किया गया, जिससे इस स्थल को काफी नुकसान पहुँचा।
2. मोहनजोदड़ो
मोहनजोदड़ो का अर्थ मृतकों का टीला बताया गया है। यह पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के लरकाना जिले में सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर स्थित था।
सन् 1922 में इसकी खोज का श्रेय राखाल दास बनर्जी को दिया गया। यह नगर लगभग 5 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ बताया गया है।
3. चन्हूदड़ो
चन्हूदड़ो मोहनजोदड़ो के दक्षिण में स्थित था। यहाँ मुहरें, मनके और हड्डियों से बनी अनेक वस्तुएँ तैयार की जाती थीं।
इस स्थल की खोज सन् 1931 में एन. गोपाल मजूमदार ने की। यहाँ से झूकर और झांगर संस्कृतियों के प्रमाण भी प्राप्त हुए।
4. लोथल
लोथल गुजरात के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के किनारे सरगवाला नामक ग्राम के समीप स्थित था।
सन् 1954–55 में रंगनाथ राव के नेतृत्व में यहाँ उत्खनन हुआ। इस स्थल से समकालीन सभ्यता के पाँच स्तर मिलने का उल्लेख है।
5. कालीबंगा
कालीबंगा राजस्थान के गंगानगर क्षेत्र में घग्घर नदी के बाएँ तट पर स्थित था। सन् 1953 में बी. बी. लाल और बी. के. थापड़ द्वारा यहाँ उत्खनन कराया गया।
यहाँ प्राक्-हड़प्पा तथा हड़प्पाकालीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
6. बनावली
बनावली हरियाणा के हिसार जिले में स्थित है। यहाँ हड़प्पा-पूर्व और हड़प्पाकालीन दोनों सांस्कृतिक अवस्थाओं के अवशेष मिले हैं।
सन् 1973–74 में रवीन्द्र सिंह बिष्ट के नेतृत्व में यहाँ खुदाई की गई।
7. रोपड़
रोपड़ पंजाब में सतलज नदी के बाएँ तट पर स्थित था। इसकी खोज सन् 1950 में बी. बी. लाल द्वारा किए जाने का उल्लेख है। स्वतंत्रता के बाद यहाँ सर्वप्रथम उत्खनन किया गया।
8. सुरकोटड़ा
सुरकोटड़ा गुजरात के कच्छ क्षेत्र में स्थित है। इसकी खोज सन् 1964 में जगपति जोशी ने की। यहाँ सिंधु सभ्यता के पतनकालीन अवशेष सुरक्षित मिलने का उल्लेख है।
9. आलमगीरपुर
आलमगीरपुर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में यमुना की सहायक हिंडन नदी के किनारे स्थित है। इसकी खोज सन् 1958 में यज्ञदत्त शर्मा द्वारा की गई।
10. रंगपुर
रंगपुर गुजरात क्षेत्र में भादर नदी के समीप स्थित था। यहाँ पूर्व हड़प्पाकालीन तथा उत्तर हड़प्पाकालीन दोनों प्रकार के प्रमाण मिले हैं।
यहाँ कच्ची ईंटों का दुर्ग, नालियाँ, मृद्भाण्ड, बाँट और पत्थर के फलक आदि प्राप्त हुए हैं। धान की भूसी के ढेर मिलने का भी उल्लेख है।
अन्य क्षेत्रों में प्राप्त हड़प्पाई स्थल
सिंधु सभ्यता केवल हड़प्पा और मोहनजोदड़ो तक सीमित नहीं थी। इसके अवशेष कई अन्य क्षेत्रों में भी प्राप्त हुए—
- अली मुराद — सिंध क्षेत्र; कुएँ, मिट्टी के बर्तन, दुर्ग, बैल की लघु मूर्ति और काँसे की कुल्हाड़ी।
- बलूचिस्तान — मकरान तट क्षेत्र में सुत्कागेनडोर, सुत्काकोह, बालाकोट तथा डावरकोट जैसे स्थल।
- उत्तर-पश्चिमी सीमांत — गोमल घाटी तथा गुमला जैसे स्थान।
- पश्चिमी पंजाब — डेरा इस्माइलखान, जलीलपुर, रहमानढेरी, गुमला और चक-पुरबानस्याल आदि।
- पूर्वी पंजाब — रोपड़ प्रमुख; कोटलानिहंग खान, चक 86 वाड़ा और ढेर-मजरा जैसे स्थल।
- बहावलपुर — सूखी सरस्वती नदी के मार्ग, जिसे स्थानीय रूप से हकरा कहा गया है, के किनारे अनेक हड़प्पाई स्थल।
- गंगा-यमुना दोआब — आलमगीरपुर तथा हुलास और बाड़गाँव जैसे स्थल।
- जम्मू — माण्डा प्रमुख स्थल।
- महाराष्ट्र — दायमाबाद से सिंधु सभ्यता से सम्बन्धित सामग्री प्राप्त हुई।
- अफगानिस्तान — मुंडीगाक और शोरतुगई प्रमुख पुरास्थल।
हड़प्पाकालीन नदियों के किनारे बसे प्रमुख नगर
| नगर | नदी / समुद्र तट |
|---|---|
| मोहनजोदड़ो | सिंधु नदी |
| हड़प्पा | रावी नदी |
| रोपड़ | सतलज नदी |
| कालीबंगा | घग्घर नदी |
| लोथल | भोगवा नदी |
| सुत्कागेनडोर | दाश्क नदी |
| बालाकोट | अरब सागर |
| सोत्काकोह | अरब सागर |
| आलमगीरपुर | हिंडन नदी |
| रंगपुर | भादर नदी |
| कोटदीजी | सिंधु नदी |
सिंधु सभ्यता के निर्माता एवं निवासी
सिंधु सभ्यता के वास्तविक निर्माता और निवासी कौन थे, इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। प्रमुख मत निम्नलिखित हैं—
- डॉ. लक्ष्मण स्वरूप और रामचन्द्र सिंधु सभ्यता तथा वैदिक सभ्यता दोनों के निर्माता आर्यों को मानते हैं।
- गार्डन चाइल्ड सिंधु सभ्यता के निर्माताओं को सुमेरियन मानते हैं।
- राखाल दास बनर्जी ने इसके निर्माताओं को द्रविड़ माना।
- ह्वीलर का मत था कि ऋग्वेद में वर्णित दस्यु और दास सिंधु सभ्यता के निर्माता थे।
- इन मतों की समीक्षा करते हुए डॉ. रमा शंकर त्रिपाठी ने कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक ज्ञान की सीमा को देखते हुए इस विषय में निश्चित निर्णय देने की अपेक्षा मौन रहना अधिक उचित है।
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
सिंधु सभ्यता अत्यन्त विस्तृत प्राचीन नगरीय सभ्यता थी। इसके अवशेष पाकिस्तान से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा जम्मू से दायमाबाद तक फैले क्षेत्र में मिले हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, बनावली और रोपड़ इसके महत्वपूर्ण केन्द्र थे। विभिन्न विद्वानों ने इसके काल और निर्माताओं के विषय में अलग-अलग मत दिए हैं, इसलिए इन दोनों प्रश्नों पर पूर्ण एकमतता नहीं है।
- सिंधु सभ्यता के काल के विषय में विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग मत दिए हैं।
- जॉन मार्शल ने इसका काल 3250–2750 ईसा पूर्व माना।
- ह्वीलर ने इसका काल 2500–1500 ईसा पूर्व माना।
- कार्बन डेटिंग के अनुसार इसे प्राक् हड़प्पा, परिपक्व हड़प्पा और उत्तर हड़प्पा चरणों में बाँटा गया है।
- हड़प्पा की खुदाई 1921 में दयाराम साहनी तथा मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में राखाल दास बनर्जी से सम्बन्धित है।
- सिंधु सभ्यता लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई बताई गई है।
- इसका पूर्व-पश्चिम विस्तार लगभग 1600 किमी तथा उत्तर-दक्षिण विस्तार लगभग 1400 किमी था।
- इसके प्रमुख स्थल हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल, कालीबंगा, रोपड़, बनावली, सुरकोटड़ा और आलमगीरपुर थे।
- मोहनजोदड़ो सिंधु, हड़प्पा रावी, रोपड़ सतलज और कालीबंगा घग्घर नदी के किनारे स्थित थे।
- लोथल भोगवा नदी और आलमगीरपुर हिंडन नदी से सम्बन्धित था।
- सिंधु सभ्यता के निर्माता कौन थे, इस विषय में आर्य, सुमेरियन, द्रविड़ और दस्यु-दास सम्बन्धी विभिन्न मत दिए गए हैं।
- निर्माताओं के विषय में कोई एक मत सर्वमान्य नहीं माना गया है।
Advertisement
मेसोपोटामिया की सभ्यता
मेसोपोटामिया की सभ्यता का परिचय
मेसोपोटामिया प्राचीन सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था। इसका विकास दजला और फरात नदियों के बीच के क्षेत्र में हुआ। इस क्षेत्र में वर्तमान इराक, उत्तर-पूर्वी सीरिया, दक्षिण-पूर्वी तुर्की तथा ईरान के कुर्दिस्तान के कुछ भाग सम्मिलित थे।
मेसोपोटामिया यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ दो नदियों के बीच का क्षेत्र होता है। यह क्षेत्र दजला और फरात नदियों के बीच स्थित था।
मेसोपोटामिया में मुख्य रूप से तीन सभ्यताओं का विकास हुआ—
- सुमेरिया की सभ्यता
- बेबीलोनिया की सभ्यता
- असीरिया की सभ्यता
1. सुमेरिया की सभ्यता
मेसोपोटामिया क्षेत्र में सबसे पहले सुमेरिया की सभ्यता का विकास हुआ। यह क्षेत्र अत्यन्त उपजाऊ था, इसलिए इसे उपजाऊ क्रिसेन्ट की संज्ञा दी गई है।
इस सभ्यता की राजधानी सुमेर थी। इसी कारण इसे सुमेरिया की सभ्यता कहा गया।
राजनीतिक स्थिति
सुमेरियन सभ्यता का विकास दजला और फरात नदियों के मध्य हुआ। इस क्षेत्र में अनेक छोटे-छोटे द्वीप या क्षेत्र बने हुए थे और प्रत्येक पर अलग राज्य स्थापित था।
उर, किश, नेपुर और इरिदु इसके प्रमुख राज्य थे।
सुमेरिया की शासन व्यवस्था का आधार धर्म था। राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। सारगोन प्रथम को इस सभ्यता का संस्थापक बताया गया है। राजा के बाद पुरोहित का महत्वपूर्ण स्थान था।
आर्थिक जीवन
सुमेरियन लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। कृषि को विकसित करने के लिए बाँधों और नहरों का निर्माण कराया गया, जिससे सिंचाई की व्यवस्था मजबूत हुई।
किसानों को अपनी उपज का लगभग एक-तिहाई भाग राज्य को कर के रूप में देना पड़ता था।
सुमेरिया में व्यापार की स्थिति भी अच्छी थी। दूर-दूर के देशों से व्यापार किया जाता था। यहाँ के लोग अनाज, खजूर और ऊनी वस्त्र आदि मिस्र तथा भारत भेजते थे और वहाँ से सोना, चाँदी, मूल्यवान पत्थर तथा हीरा आदि प्राप्त करते थे।
सामाजिक जीवन
सुमेरियन समाज मुख्य रूप से तीन वर्गों में विभाजित था—
- उच्च वर्ग — शासक, सामन्त, पुरोहित और उच्चाधिकारी।
- मध्यम वर्ग — कृषक, शिल्पी और व्यापारी।
- निम्न वर्ग — दास।
समाज में दहेज प्रथा का उल्लेख मिलता है, परन्तु स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।
धार्मिक जीवन
सुमेरिया की सभ्यता में धर्म का अत्यधिक महत्व था। प्रारम्भ में लोग एक ही देवता की पूजा करते थे, परन्तु आगे चलकर अनेक देवी-देवताओं की उपासना होने लगी।
प्राकृतिक शक्तियों में विश्वास के कारण सूर्य और चन्द्रमा की भी पूजा की जाती थी।
लेखन कला
सुमेरियन लोगों को लेखन कला का ज्ञान था। उनकी लिपि को कीलाक्षर लिपि कहा जाता था।
इस लिपि का आविष्कार लगभग 3000 ईसा पूर्व माना गया है। इसमें लगभग 300 अक्षर थे। विचारों को विशेष चिन्हों, चित्रों और संकेतों के माध्यम से व्यक्त किया जाता था।
लेखन के लिए चिकनी मिट्टी की गीली तख्तियों पर नुकीली वस्तु से चिन्ह बनाए जाते थे। इस प्रकार की अनेक तख्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
विज्ञान का ज्ञान
सुमेरियन लोगों ने पंचांग का आविष्कार किया था। उनका पंचांग चन्द्रमा की गति पर आधारित था।
वे सूर्य और चन्द्रमा की गति का अध्ययन करते थे तथा दिन-रात का हिसाब लगा सकते थे। सूर्य ग्रहण, सूर्यास्त और चन्द्रोदय के समय का भी अनुमान लगाया जाता था।
उन्होंने आकाश को 12 भागों में बाँटा और प्रत्येक भाग को अलग नाम दिया। भारत में इन्हें राशियों के नाम से जाना जाता है।
2. बेबीलोनिया की सभ्यता
सुमेरिया की सभ्यता के पतन के बाद इस क्षेत्र में बेबीलोनिया की सभ्यता का उदय हुआ। बेबीलोनिया के लोगों ने सुमेरियन सभ्यता के अनेक गुणों को अपनाया और उनमें सुधार किया।
बेबीलोनिया के लोग सम्भवतः अरब के रेगिस्तान से आए घुमक्कड़ समूह थे। उन्होंने लगभग 2000 ईसा पूर्व सुमेर पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की और बेबीलोन को अपनी राजधानी बनाया।
आगे चलकर उन्होंने सम्पूर्ण मेसोपोटामिया पर अधिकार करके एक विशाल राज्य की स्थापना की।
राजनीतिक जीवन
बेबीलोनिया का प्रमुख शासक हम्मूराबी था। उसने लगभग 2123 ईसा पूर्व से 2080 ईसा पूर्व तक शासन किया।
राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था और सम्पूर्ण भूमि पर उसका अधिकार स्वीकार किया जाता था। हम्मूराबी एक शक्तिशाली तथा योग्य शासक था।
हम्मूराबी की विधि-संहिता
हम्मूराबी ने अपनी प्रजा के लिए एक व्यवस्थित विधि-संहिता तैयार कराई। इसी कारण उसे विश्व का प्रथम कानून बनाने वाला राजा भी कहा गया है।
इस विधि-संहिता को एक काले रंग के पत्थर पर खुदवाया गया था। इस पत्थर की ऊँचाई लगभग 2.44 मीटर थी और इसे बेबीलोन के प्रमुख जिगुरत अर्थात मंदिर में स्थापित किया गया था।
हम्मूराबी की विधि-संहिता में 282 धाराएँ थीं। इनमें चोरी, डकैती, हत्या, विवाह, व्यापार और कृषि आदि विषयों से सम्बन्धित नियम सम्मिलित थे।
इस संहिता की प्रमुख बातें थीं—
- कोई व्यक्ति कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता था।
- अपराधी को दण्ड देने का अधिकार राजा को था।
- अपराधी को उसके अपराध के अनुसार दण्ड दिया जाना आवश्यक था।
- कानून की दृष्टि में अमीर और गरीब को समान माना गया।
- दास द्वारा किए गए कार्य का वेतन दिए जाने की व्यवस्था थी।
- पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है।
सामाजिक जीवन
बेबीलोनिया का समाज तीन वर्गों में विभाजित था—
- उच्च वर्ग
- मध्यम वर्ग
- दास वर्ग
उच्च वर्ग में पुरोहित और अन्य सम्मानित व्यक्ति आते थे। मध्यम वर्ग में कृषक और व्यापारी सम्मिलित थे तथा निम्न वर्ग में दास आते थे।
समाज में स्त्रियों को कार्य करने का अधिकार प्राप्त था। एक-पत्नी प्रथा का भी प्रचलन था।
आर्थिक जीवन
भूमि उपजाऊ होने के कारण बेबीलोनिया का कृषक वर्ग सम्पन्न था। किसानों को कुल उपज का लगभग एक-तिहाई भाग सरकार को देना पड़ता था।
व्यापार अपने चरम पर था और जल तथा थल दोनों मार्गों से किया जाता था। बेबीलोनिया के व्यापारिक सम्बन्ध मिस्र और भारत से भी थे।
धार्मिक जीवन
बेबीलोनिया में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान था। मंदिरों को जिगुरत कहा जाता था और इन्हें राज्य की सम्पत्ति माना जाता था।
लोग अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे तथा पशु-बलि की प्रथा भी प्रचलित थी। प्राकृतिक शक्तियों के रूप में सूर्य और चन्द्रमा की भी पूजा की जाती थी।
भवन निर्माण कला
बेबीलोनिया के लोग भवन निर्माण में दक्ष थे। उन्होंने अनेक नगर स्थापित किए, परन्तु सबसे अधिक ध्यान बेबीलोन नगर के विकास पर दिया।
नगर के चारों ओर एक दीवार अथवा परकोटा बनाया गया था। अनेक नहरें और बाँध भी बनाए गए।
बेबीलोन में फरात नदी के किनारे हम्मूराबी ने एक किला और बाँध बनवाया था। इस सभ्यता से मूर्तिकला तथा मंदिरों में चित्रकला के नमूने भी प्राप्त हुए हैं।
3. असीरिया की सभ्यता
हम्मूराबी की मृत्यु के बाद बेबीलोनिया का साम्राज्य कमजोर हो गया। इस स्थिति का लाभ उठाकर असीरियाई लोगों ने बेबीलोन पर आक्रमण किया और उस पर अधिकार स्थापित कर लिया।
असीरियाई बाहर से आए हुए लोग नहीं थे, बल्कि मेसोपोटामिया के ही निवासी थे। जिस नगर में वे रहते थे उसका नाम असुर था। इसी नाम के कारण उन्हें असीरियाई कहा गया।
असीरिया का सबसे प्रसिद्ध शासक असुर बेनीपाल था। उसे विद्वान शासक माना गया है।
राजनीतिक स्थिति
असीरियाई लोगों ने दजला नदी के किनारे स्थित निनवेह को अपनी राजधानी बनाया।
यहाँ की शासन व्यवस्था सुव्यवस्थित थी। राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था और वह अत्यन्त शक्तिशाली होता था।
प्रशासन को व्यवस्थित रखने के लिए साम्राज्य को विभिन्न इकाइयों में बाँटा गया। प्रत्येक इकाई के प्रशासक को राज्यपाल कहा जाता था।
राज्यपाल कर वसूल करता, प्रशासन की देखरेख करता तथा जनता की सुरक्षा का प्रबन्ध करता था। अपराधियों को कठोर दण्ड देने की व्यवस्था थी।
आर्थिक जीवन
असीरिया के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। इसके अतिरिक्त उद्योगों का भी विकास हुआ।
असीरिया की एक महत्वपूर्ण विशेषता लोहे का प्रयोग थी। यहाँ के लोगों ने लोहे का उपयोग करना प्रारम्भ किया और लोहे के उपकरण बनाने में दक्षता प्राप्त की।
सामाजिक जीवन
असीरियाई समाज भी तीन वर्गों में विभाजित था।
- उच्च वर्ग में पुरोहित और सामन्त आते थे।
- मध्यम वर्ग में व्यापारी और कृषक सम्मिलित थे।
- निम्न वर्ग में दास आते थे।
असीरियाई समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी और पर्दा प्रथा का प्रचलन था।
धार्मिक जीवन
असीरिया में भी धर्म का महत्व था, किन्तु पूर्ववर्ती सभ्यताओं की तुलना में इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम था।
यहाँ के लोग असुर, मर्दुक और ईश्वर की पूजा करते थे।
असीरिया सभ्यता का अन्त
असीरियाई शासकों ने मुख्य रूप से शक्ति और सैन्य बल के आधार पर शासन स्थापित किया था। इसलिए वे अधिक समय तक अपनी सत्ता को स्थिर नहीं रख सके और अन्ततः असीरिया की सभ्यता का पतन हो गया।
मेसोपोटामिया की तीन प्रमुख सभ्यताओं का तुलनात्मक सार
| सभ्यता | प्रमुख विशेषता |
|---|---|
| सुमेरिया | कृषि, नहरें, कीलाक्षर लिपि, पंचांग और खगोल ज्ञान |
| बेबीलोनिया | हम्मूराबी की विधि-संहिता, व्यापार, जिगुरत और विकसित भवन निर्माण |
| असीरिया | शक्तिशाली शासन, राज्यपाल व्यवस्था, कृषि, उद्योग और लोहे का प्रयोग |
महत्वपूर्ण तथ्य एक नजर में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| मेसोपोटामिया का अर्थ | दो नदियों के बीच का क्षेत्र |
| प्रमुख नदियाँ | दजला और फरात |
| प्रमुख सभ्यताएँ | सुमेरिया, बेबीलोनिया और असीरिया |
| सुमेरियन लिपि | कीलाक्षर लिपि |
| कीलाक्षर लिपि का समय | लगभग 3000 ईसा पूर्व |
| हम्मूराबी की विधि-संहिता | 282 धाराएँ |
| बेबीलोनिया के मंदिर | जिगुरत |
| असीरिया की राजधानी | निनवेह |
| असीरिया का प्रसिद्ध शासक | असुर बेनीपाल |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
मेसोपोटामिया की सभ्यता दजला और फरात नदियों के बीच विकसित हुई तथा इसमें सुमेरिया, बेबीलोनिया और असीरिया की सभ्यताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा। सुमेरियों ने कृषि, सिंचाई, लेखन और विज्ञान में प्रगति की। बेबीलोनिया ने हम्मूराबी की विधि-संहिता और विकसित व्यापारिक व्यवस्था के कारण विशेष स्थान प्राप्त किया। असीरिया अपनी शक्तिशाली शासन व्यवस्था, लोहे के प्रयोग और संगठित प्रशासन के लिए प्रसिद्ध हुआ।
- मेसोपोटामिया का अर्थ दो नदियों के बीच का क्षेत्र है।
- मेसोपोटामिया का विकास दजला और फरात नदियों के बीच हुआ।
- इस क्षेत्र की तीन प्रमुख सभ्यताएँ सुमेरिया, बेबीलोनिया और असीरिया थीं।
- सुमेरिया मेसोपोटामिया की सबसे प्रारम्भिक सभ्यता थी।
- सुमेरियन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था तथा बाँध और नहरें बनाई गईं।
- सुमेरियन समाज उच्च, मध्यम और निम्न—तीन वर्गों में विभाजित था।
- सुमेरियों की लिपि कीलाक्षर लिपि कहलाती थी और इसका आविष्कार लगभग 3000 ईसा पूर्व माना गया है।
- सुमेरियों ने चन्द्रमा की गति पर आधारित पंचांग बनाया और आकाश को 12 भागों में विभाजित किया।
- सुमेरिया के पतन के बाद बेबीलोनिया की सभ्यता का उदय हुआ।
- हम्मूराबी बेबीलोनिया का प्रमुख शासक था।
- हम्मूराबी की विधि-संहिता में 282 धाराएँ थीं।
- बेबीलोनिया के मंदिरों को जिगुरत कहा जाता था।
- असीरिया की राजधानी निनवेह थी और उसका प्रसिद्ध शासक असुर बेनीपाल था।
- असीरियाई लोगों ने लोहे का प्रयोग करना तथा लोहे के उपकरण बनाना प्रारम्भ किया।
- असीरिया का शासन मुख्यतः शक्ति और सैन्य बल पर आधारित था, इसलिए वह अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सका।
मिस्र की सभ्यता
मिस्र की सभ्यता का परिचय
मिस्र की प्राचीन सभ्यता का विकास नील नदी के किनारे हुआ। मिस्र अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित है। इसके उत्तर में भूमध्य सागर, पूर्व में लाल सागर और दक्षिण-पश्चिम में रेगिस्तान है।
नील नदी मिस्र के मध्य भाग से होकर बहती है। मिस्र की सभ्यता के विकास में इस नदी का अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान था, क्योंकि इससे लोगों को पीने का पानी और कृषि के लिए सिंचाई का जल प्राप्त होता था।
नील नदी न होती तो मिस्र का अधिकांश क्षेत्र रेगिस्तान होता। इसी कारण मिस्रवासी नील नदी की पूजा करते थे और इसे नील नदी का वरदान कहा गया।
मिस्र के इतिहास का विभाजन
मिस्र के इतिहास को मुख्य रूप से तीन कालों में विभाजित किया गया है—
- पिरामिड काल
- सामन्ती काल
- साम्राज्यवादी काल
1. पिरामिड काल
प्राचीन मिस्र की सभ्यता में पिरामिडों का विशेष महत्व था। मिस्र के शासकों की मृत्यु के बाद उनके शरीर पर विशेष लेप लगाकर विभिन्न वस्तुओं के साथ दफनाया जाता था।
इस प्रकार सुरक्षित किए गए शव को ममी कहा जाता था। ममी को दफनाने के स्थान पर ऊँची एवं विशाल संरचनाएँ बनाई जाती थीं, जिन्हें पिरामिड कहा गया।
इसी कारण मिस्र के इतिहास के इस चरण को पिरामिड काल कहा जाता है।
गीजा का महान पिरामिड
मिस्र का प्रसिद्ध गीजा पिरामिड प्राचीन विश्व के महान स्मारकों में गिना जाता है। यह मिस्र की राजधानी काहिरा के उपनगर गीजा में स्थित है।
इसका निर्माण मिस्र के फराओ कुफू ने लगभग 2558 ईसा पूर्व से 2532 ईसा पूर्व के बीच कराया था। इसके निर्माण में लगभग 10 से 20 वर्ष का समय लगने का उल्लेख मिलता है।
कुफू की मृत्यु के बाद उसके शव को इसी पिरामिड में दफनाया गया। बाद के शासकों के शव और उनके साथ आभूषण तथा अन्य सामग्री भी पिरामिडों में रखी जाती थी।
2. सामन्ती काल
मिस्र के इतिहास में लगभग 2400 ईसा पूर्व से 1800 ईसा पूर्व तक के काल को सामन्ती काल कहा गया है। इस समय सामन्त अत्यन्त शक्तिशाली हो गए थे।
3. साम्राज्यवादी काल
लगभग 1800 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व तक के काल को साम्राज्यवादी काल कहा गया है।
इस काल में मिस्र का प्रभाव और विस्तार नील नदी के क्षेत्र से आगे बढ़कर फरात नदी तक पहुँच गया था।
मिस्र की सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ
1. शासन व्यवस्था
प्राचीन मिस्र का सम्राट निरंकुश शासक था। उसे फराओ कहा जाता था। देश और उसके संसाधनों पर उसका व्यापक नियंत्रण था।
फराओ सर्वोच्च सेनानायक और शासन का प्रधान था। प्रशासन चलाने के लिए वह अधिकारियों की व्यवस्था पर निर्भर रहता था।
राजा के बाद प्रशासन में सबसे महत्वपूर्ण पद वजीर का था। वजीर राजा के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता था और भूमि सर्वेक्षण, खजाना, निर्माण कार्य, कानून तथा अभिलेखों जैसी व्यवस्थाओं की देखरेख करता था।
देश को लगभग 42 प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक क्षेत्र का प्रशासन एक सामन्त द्वारा चलाया जाता था, जो अपने क्षेत्र के लिए वजीर के प्रति उत्तरदायी था।
मंदिरों की भूमिका
मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं थे, बल्कि आर्थिक गतिविधियों के भी महत्वपूर्ण केन्द्र थे।
मंदिरों में अनाज भण्डारण की व्यवस्था होती थी। राज्य की सम्पत्ति तथा अनाज को एकत्र करने और पुनः वितरित करने में भी उनका महत्वपूर्ण स्थान था।
2. सामाजिक जीवन
मिस्र का समाज उच्च रूप से स्तरीकृत था और व्यक्ति की सामाजिक स्थिति स्पष्ट रूप से निर्धारित होती थी।
जनसंख्या का सबसे बड़ा वर्ग किसानों का था। कृषि भूमि पर सामान्यतः राजा, मंदिर या कुलीन परिवारों का अधिकार होता था।
किसानों को श्रम-कर देना पड़ता था और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें सिंचाई अथवा निर्माण सम्बन्धी कार्यों में लगाया जाता था।
कलाकार और कारीगर किसानों से ऊपर माने जाते थे, परन्तु वे भी राज्य के नियंत्रण में कार्य करते थे। मंदिरों से जुड़े कारीगरों को राज्य के खजाने से भुगतान किए जाने का उल्लेख मिलता है।
लेखक और अधिकारी उच्च वर्ग में गिने जाते थे। वे सन से बने विशेष सफेद वस्त्र पहनते थे, इसलिए उन्हें सफेद किल्ट वर्ग भी कहा गया।
पुरोहितों, चिकित्सकों और इंजीनियरों को विशेष प्रशिक्षण प्राप्त होता था और समाज में उनका स्थान महत्वपूर्ण था।
मिस्र में गुलामी का अस्तित्व भी था, यद्यपि इसके व्यापक प्रसार की सीमा स्पष्ट नहीं है।
3. धार्मिक जीवन
प्राचीन मिस्र में परलोक और पुनर्जन्म के प्रति गहरा विश्वास था। प्रत्येक नगर का अपना प्रमुख देवता होता था।
मिस्र में देवी-देवताओं की संख्या लगभग 2200 बताई गई है। सूर्य उनके प्रमुख देवताओं में से था, जिसे रे, रा और होरस आदि नामों से जाना जाता था।
फराओ का शासन भी उसके दैवी अधिकारों पर आधारित माना जाता था। मिस्रवासी देवताओं को अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न मानते थे और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए पूजा-अर्चना करते थे।
4. कृषि
मिस्र की अर्थव्यवस्था में कृषि का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान था। भूमि के आधार पर करों का निर्धारण किया जाता था।
मिस्र की कृषि पूरी तरह नील नदी के वार्षिक चक्र से प्रभावित थी। मिस्रवासियों ने कृषि वर्ष को तीन मुख्य ऋतुओं में बाँटा था—
| ऋतु | अर्थ / प्रमुख कार्य |
|---|---|
| आखेट | बाढ़ का समय |
| पेरेट | रोपण एवं फसल उगाने का समय |
| शेमु | कटाई का समय |
नील नदी में बाढ़ का समय लगभग जून से सितम्बर तक रहता था। बाढ़ के कारण नदी के किनारे खनिजों से समृद्ध उपजाऊ मिट्टी जमा हो जाती थी।
बाढ़ का पानी कम होने के बाद अक्टूबर से फरवरी तक फसल उगाई जाती थी। खेतों की जुताई करके बीज डाले जाते थे तथा नालों और नहरों से सिंचाई की जाती थी।
मार्च से मई के बीच फसल काटने के लिए हँसिए का प्रयोग किया जाता था। अनाज को पौधों से अलग करने के लिए बैलों द्वारा उसकी मड़ाई कराई जाती थी और बाद में हवा की सहायता से भूसी को अनाज से अलग किया जाता था।
5. पशुपालन
मिस्रवासी मनुष्य, पशु और पौधों को एक परस्पर सम्बन्धित प्राकृतिक व्यवस्था का अंग मानते थे। पशुपालन उनके जीवन और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
भेड़, बकरी और सूअर पाले जाते थे। मवेशी विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे। उनका उपयोग खेतों में कार्य करने के साथ-साथ दूध और मांस प्राप्त करने के लिए भी किया जाता था।
हिरन, पक्षियों और अन्य जंगली जीवों का भी शिकार किया जाता था। नील नदी से मछलियाँ बड़ी मात्रा में प्राप्त होती थीं।
मिस्र में प्राचीन समय से मधुमक्खी पालन भी किया जाता था और शहद प्राप्त किया जाता था।
6. व्यवसाय एवं व्यापार
मिस्र में उपलब्ध न होने वाली दुर्लभ और विदेशी वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए दूसरे देशों के साथ व्यापार किया जाता था।
प्राचीन मिस्र के व्यापारिक सम्बन्ध अन्य क्षेत्रों से थे और वस्तुओं का आदान-प्रदान जल तथा स्थल दोनों मार्गों से होता था।
दक्षिणी कनान से मिस्र को मिट्टी के बर्तन प्राप्त होने तथा मिस्र से भी अनेक वस्तुओं के निर्यात के प्रमाण मिलते हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत से इन्द्र, रंग और मसाले जैसी वस्तुएँ भेजे जाने का उल्लेख मिलता है।
7. दण्ड प्रथा
मिस्र की शासन व्यवस्था में फराओ कानून लागू करने, न्याय प्रदान करने और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने का प्रमुख अधिकारी था।
प्राचीन मिस्र की कोई पूर्ण कानूनी संहिता उपलब्ध नहीं है। न्याय व्यवस्था व्यवहारिक ज्ञान और विवादों के समाधान पर आधारित थी।
छोटे अपराधों के लिए जुर्माना, मार, चेहरे की विकृति अथवा निर्वासन जैसी सजाएँ दी जा सकती थीं।
हत्या और डकैती जैसे गंभीर अपराधों के लिए मृत्युदण्ड दिया जाता था। शिरच्छेदन, पानी में डुबोना अथवा सूली पर लटकाना जैसी विधियों का उल्लेख मिलता है।
कुछ परिस्थितियों में अपराधी के परिवार तक दण्ड का प्रभाव पहुँच सकता था।
8. विज्ञान एवं गणित
प्राचीन मिस्रवासियों ने विज्ञान और गणित के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की थी।
उन्होंने अंकों की दशमलव प्रणाली विकसित की। अलग-अलग संख्याओं के लिए निश्चित संकेत बनाए गए थे।
उदाहरण के लिए 1, 10 और 100 के लिए अलग संकेतों का प्रयोग किया जाता था। किसी संख्या को लिखने के लिए इन संकेतों को आवश्यकतानुसार बार-बार दोहराया जाता था।
मिस्रवासी त्रिभुज और आयत का क्षेत्रफल निकालना जानते थे।
मृत शरीर को सुरक्षित रखने की परम्परा के कारण उन्हें मानव शरीर की संरचना का भी ज्ञान प्राप्त हुआ। इस प्रक्रिया ने चिकित्सा विज्ञान और शल्यक्रिया सम्बन्धी कौशल के विकास को प्रोत्साहित किया।
9. अन्त्येष्टि प्रथा एवं ममीकरण
मिस्रवासी मृत्यु के बाद अमरत्व में विश्वास करते थे। इसी कारण उन्होंने मृत शरीर को सुरक्षित रखने की विस्तृत परम्परा विकसित की।
इस प्रक्रिया में शरीर का परीक्षण किया जाता था, अन्तिम संस्कार सम्पन्न किए जाते थे और मृतक के साथ ऐसी वस्तुएँ रखी जाती थीं जिनका उपयोग उसके द्वारा मृत्यु के बाद किए जाने की कल्पना की जाती थी।
प्राचीन समय में रेगिस्तानी क्षेत्रों में दफनाए गए शव प्राकृतिक रूप से सूखकर सुरक्षित हो जाते थे। बाद में मिस्रवासियों ने कृत्रिम ममीकरण की तकनीक विकसित कर ली।
ममीकरण में शरीर से आन्तरिक अंग निकालकर उसे सूखने दिया जाता था। इसके बाद शरीर को सन की पट्टियों में लपेटा जाता और एक आयताकार पत्थर की पेटी में रखकर कब्र में दफन किया जाता था।
कुछ आन्तरिक अंगों को अलग से विशेष पात्रों में सुरक्षित रखने की परम्परा भी विकसित हुई।
मिस्र की सभ्यता का अन्त
लगभग 1000 ईसा पूर्व तक मिस्र की उन्नति का प्रमुख काल समाप्त होने लगा।
फराओ शासकों को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अफ्रीका के रेगिस्तानी क्षेत्रों से आने वाली खानाबदोश जातियों तथा भूमध्य सागर के निकट विकसित नई शक्तियों के विरुद्ध युद्ध करने पड़े।
इन लगातार संघर्षों के कारण मिस्र की शक्ति कमजोर होती गई और उसकी प्राचीन सभ्यता का प्रभाव घटने लगा।
महत्वपूर्ण तथ्य एक नजर में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| सभ्यता का प्रमुख आधार | नील नदी |
| मिस्र के शासक | फराओ |
| इतिहास के प्रमुख काल | पिरामिड, सामन्ती एवं साम्राज्यवादी काल |
| प्रसिद्ध पिरामिड | गीजा का महान पिरामिड |
| गीजा पिरामिड का निर्माता | फराओ कुफू |
| प्रशासनिक क्षेत्र | लगभग 42 |
| प्रमुख देवताओं की संख्या | लगभग 2200 |
| कृषि ऋतुएँ | आखेट, पेरेट और शेमु |
| प्रमुख धार्मिक विश्वास | परलोक एवं पुनर्जन्म |
| मृत शरीर संरक्षण | ममीकरण |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
मिस्र की सभ्यता का विकास नील नदी के किनारे हुआ और कृषि, सिंचाई तथा आर्थिक जीवन का आधार भी यही नदी थी। फराओ के नेतृत्व में केंद्रीकृत शासन, विशाल पिरामिड, विकसित सामाजिक व्यवस्था, बहुदेववादी धार्मिक विश्वास तथा ममीकरण इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं। मिस्रवासियों ने कृषि, पशुपालन, व्यापार, गणित, चिकित्सा और स्थापत्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति की।
- मिस्र की सभ्यता का विकास नील नदी के किनारे हुआ।
- नील नदी को मिस्र का वरदान कहा गया।
- मिस्र के इतिहास को पिरामिड काल, सामन्ती काल और साम्राज्यवादी काल में विभाजित किया गया है।
- ममी मृत शरीर का सुरक्षित रूप था और उसे पिरामिडों में दफनाया जाता था।
- गीजा का महान पिरामिड फराओ कुफू से सम्बन्धित है।
- सामन्ती काल लगभग 2400–1800 ईसा पूर्व तथा साम्राज्यवादी काल लगभग 1800–1000 ईसा पूर्व माना गया है।
- मिस्र के शासक को फराओ कहा जाता था और वजीर उसके बाद प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी था।
- देश को लगभग 42 प्रशासनिक क्षेत्रों में बाँटा गया था।
- मिस्र में लगभग 2200 देवी-देवताओं का उल्लेख मिलता है तथा सूर्य प्रमुख देवताओं में था।
- मिस्र की कृषि नील नदी की बाढ़ पर निर्भर थी।
- कृषि वर्ष को आखेट, पेरेट और शेमु तीन ऋतुओं में बाँटा गया था।
- भेड़, बकरी, सूअर और मवेशियों का पालन किया जाता था तथा नील नदी से मछलियाँ प्राप्त होती थीं।
- मिस्रवासियों ने दशमलव अंक प्रणाली तथा क्षेत्रफल गणना का ज्ञान विकसित किया था।
- परलोक और पुनर्जन्म में विश्वास के कारण ममीकरण की प्रथा विकसित हुई।
- लगभग 1000 ईसा पूर्व के बाद निरन्तर बाहरी संघर्षों से मिस्र की शक्ति कमजोर होने लगी।
Advertisement
चीन की सभ्यता
चीन की सभ्यता का परिचय
चीन की सभ्यता विश्व की अत्यन्त प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। इसका विकास मुख्य रूप से ह्वांगहो तथा यांग्त्सीक्यांग नदियों की घाटियों में हुआ।
ह्वांगहो नदी को चीन का शोक कहा गया है, क्योंकि बाढ़ के समय यह प्रायः अपना मार्ग बदल देती थी और बड़े भू-भाग में विनाश उत्पन्न करती थी। दूसरी ओर बाढ़ के साथ लाई गई उपजाऊ मिट्टी कृषि के लिए लाभदायक भी सिद्ध होती थी।
चीन की राजधानी बीजिंग थी। चीन के निवासी अपनी भाषा में अपने देश को चुंगकुओ कहते थे। भारत तथा फारस के प्राचीन निवासियों द्वारा इस देश को चीन नाम से पुकारे जाने का उल्लेख मिलता है।
चीन का उल्लेख महाभारत, मनुस्मृति और ललितविस्तार जैसे ग्रन्थों में भी मिलता है। प्राचीन भारत में चीन के रेशमी वस्त्र इतने प्रसिद्ध थे कि रेशमी कपड़े के लिए चीनीशुक शब्द का प्रयोग होने लगा।
चीन के प्रमुख दार्शनिक
लाओत्से और कन्फ्यूशियस चीन के महान दार्शनिक थे। उन्होंने पुरानी रूढ़ियों की आलोचना की और समाज को नए धार्मिक एवं दार्शनिक विचार दिए।
उन्होंने लोगों को निस्वार्थ और नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा दी। लाओत्से ने ताओ-ते-चिंग नामक ग्रन्थ की रचना की।
चीन का राजनीतिक इतिहास
1. शांग वंश
चीन में शांग वंश का शासन लगभग 1765 ईसा पूर्व से 1122 ईसा पूर्व तक रहा।
शांग शासकों ने चीन की सभ्यता को विकसित संस्कृति प्रदान की। इस काल में धार्मिक कार्य भी सम्राट की देखरेख में होते थे और इन कार्यों में सहायता के लिए अनेक पुरोहित नियुक्त किए जाते थे।
2. चाऊ वंश
चाऊ वंश ने लगभग 1122 ईसा पूर्व से 249 ईसा पूर्व तक शासन किया।
पूर्ववर्ती काल की तुलना में इस समय चीन का अधिक विकास हुआ। इसी कारण इस काल को चीनी इतिहास का स्वर्ण युग कहा गया है।
3. चिन वंश
चाऊ वंश के पश्चात चिन वंश के शासकों ने चीन पर शासन किया। इस वंश के राजा सीहवांगटी ने राज्य का सफलतापूर्वक संचालन किया।
चीन का नामकरण भी इसी वंश के नाम से सम्बन्धित बताया गया है।
चिन वंश के शासनकाल में पक्की सड़कों का निर्माण हुआ। देश की सुरक्षा के उद्देश्य से शासक शी ह्वांग टी ने चीन की प्रसिद्ध दीवार का निर्माण कराया।
लगभग 202 ईसा पूर्व में हान नामक वंश ने चीन पर अधिकार स्थापित किया। हान वंश का शासन लगभग 400 वर्षों तक रहा। इस काल में जीवन के अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण विकास हुआ।
हान वंश के बाद चीन में हूणों का प्रभाव स्थापित हुआ।
चीनी सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ
1. शासन व्यवस्था
चीन की शासन व्यवस्था में सम्राट का अधिकार अत्यन्त व्यापक था। सम्राट शासन और धर्म दोनों का प्रधान माना जाता था।
वह राज्य का प्रथम सेनापति, प्रमुख पुरोहित और सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। उसके अधिकार निरंकुश तथा दैवी माने जाते थे।
इसके बावजूद शासन कार्यों में वह मंत्रियों से परामर्श करता था तथा देश, रीति-रिवाज और जनता के हित का ध्यान रखता था।
सम्राट की सहायता के लिए एक परिषद होती थी। प्रशासन सेना, धर्म, न्याय और शिक्षा जैसे विभिन्न विभागों में विभाजित था।
सामन्त सम्राट के अधीन छोटे-छोटे क्षेत्रों पर शासन करते थे और अपने पास सेना भी रखते थे। इस समय तक रथ का आविष्कार हो चुका था।
2. नियुक्ति व्यवस्था
चीन में प्रमुख राजकीय पदों पर नियुक्तियाँ प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर की जाती थीं।
इन राजकीय अधिकारियों को मन्दारिन कहा जाता था। अधिकारी बनने से पहले उम्मीदवार को विभिन्न परीक्षाओं से गुजरना पड़ता था।
इसी कारण चीन को प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था का जन्मदाता कहा गया है।
3. सामाजिक जीवन
चीनी समाज में संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। परिवार का मुखिया पिता होता था।
परिवार के मुखिया के बाद उसके छोटे भाई को प्रमुखता मिलती थी और छोटे भाई के अभाव में परिवार का बड़ा पुत्र जिम्मेदारी सँभालता था।
परिवार में माता को भी सम्मानजनक स्थान प्राप्त था।
चीनी समाज अनेक वर्गों में विभाजित था। समाज में सबसे ऊँचा स्थान सम्राट का था। इसके बाद साहित्यकार और बुद्धिजीवी सम्मानित वर्ग में आते थे। इसके बाद व्यापारी, शिल्पकार, किसान तथा दासों का स्थान था।
समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता के आधार पर उच्च पद प्राप्त करने की स्वतंत्रता भी थी।
4. आर्थिक जीवन
चीन का आर्थिक जीवन अत्यन्त समृद्ध था। अधिकांश लोग कृषि कार्य करते थे।
ज्वार, बाजरा, मक्का और गेहूँ प्रमुख फसलें थीं। सन और चाय का भी अच्छा उत्पादन होता था।
सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध थे और बाढ़ से सुरक्षा के लिए बाँध बनाए जाते थे।
चीन में उद्योग-धन्धों का भी पर्याप्त विकास हुआ। बढ़ईगिरी और शिल्पकला के उत्कृष्ट नमूने मिलते हैं। दैनिक उपयोग की वस्तुओं को भी आकर्षक और कलात्मक रूप दिया जाता था।
सोने-चाँदी के आभूषण तथा हाथी-दाँत की कलात्मक वस्तुएँ भी बनाई जाती थीं।
व्यापार
चीन के व्यापारिक सम्बन्ध ईरान, मेसोपोटामिया और रोम जैसे दूरस्थ क्षेत्रों से थे।
व्यापार जल और थल दोनों मार्गों से किया जाता था। रेशम, चीनी मिट्टी के बर्तन तथा सोने-चाँदी की वस्तुएँ व्यापार की प्रमुख सामग्री थीं।
5. धार्मिक जीवन
चीनी समाज में धर्म की जड़ें बहुत गहरी थीं। प्रकृति को ईश्वरीय शक्ति मानकर उसकी उपासना की जाती थी।
चीनी लोग अनेक देवी-देवताओं में विश्वास करते थे। इनमें प्रमुख देवता शांगति था, जिसका अर्थ स्वर्ग का देवता बताया गया है।
राजा को शांगति का पुत्र माना जाता था, इसलिए राजा की भी पूजा की जाती थी।
पूर्वजों की उपासना चीनी धार्मिक जीवन की महत्वपूर्ण विशेषता थी। चीन में अनेक मंदिर थे तथा धार्मिक अनुष्ठानों में सम्राट और सामान्य नागरिक दोनों भाग लेते थे।
देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अनाज, मांस और शराब आदि की भेंट चढ़ाई जाती थी।
6. प्रमुख आविष्कार एवं खोजें
लिपि का आविष्कार
चीनी भाषा और लिपि चित्रलिपि का ही परिवर्तित रूप थी। लगभग 1400 ईसा पूर्व के इस लिपि के नमूने हड्डियों पर प्राप्त हुए हैं।
चीनी लिपि में लगभग 40 हजार संकेत-चिह्न बताए गए हैं। यह लिपि ऊपर से नीचे की ओर लिखी जाती थी।
कागज की खोज
कागज बनाने की कला का आविष्कार सबसे पहले चीन में हुआ।
लगभग 1900 वर्ष पूर्व काई लून नामक व्यक्ति ने पौधों के रेशों, पेड़ों की छाल, पुराने कपड़ों और रस्सियों को पीटकर उनकी लुगदी तैयार की।
इस लुगदी को पानी में भिगोकर, निचोड़कर तथा सुखाकर कागज तैयार किया जाता था।
कागज का सबसे प्रारम्भिक उपयोग चीन में हुआ और मुद्रण का प्रयोग भी सर्वप्रथम चीन में प्रारम्भ होने का उल्लेख मिलता है।
7. वास्तुकला
चीन में भवन निर्माण कला अत्यन्त विकसित थी। मकान लकड़ी, चूने और पत्थर से बनाए जाते थे तथा निर्माण में सुंदरता और कलात्मकता पर विशेष ध्यान दिया जाता था।
चीन की महान दीवार उसकी वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके अतिरिक्त बड़े राजमहल और मंदिर भी बनाए गए।
पैगोडा
पैगोडा मंदिर चीन की प्रसिद्ध वास्तुकला का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
पैगोडा की संरचना पिरामिडनुमा मीनार या शंकु जैसी दिखाई देती है। यह बहुमंजिला टावर के समान होता है और इसकी प्रत्येक मंजिल की छत बाहर की ओर मुड़ी हुई दिखाई देती है।
पैगोडा का निर्माण गौतम बुद्ध के सम्मान में विहारों के निकट स्तूप के रूप में किया जाता था।
इस प्रकार की संरचनाओं का निर्माण नेपाल, भारत, बर्मा, इंडोनेशिया, थाईलैंड, चीन और जापान में भी हुआ।
8. मूर्तिकला एवं चित्रकला
चीनी मूर्तियाँ वहाँ के मूर्तिकारों की दक्षता को प्रदर्शित करती हैं। महात्मा बुद्ध तथा उनके जीवन से सम्बन्धित अनेक मूर्तियाँ बनाई गईं।
प्राकृतिक और मानव जीवन से सम्बन्धित प्रतिमाओं का भी निर्माण होता था।
चीनी चित्रकला में प्राकृतिक दृश्यों तथा ऐतिहासिक घटनाओं को चित्रित किया जाता था। चीनी लिपि भी चित्रकला के स्वरूप से निकट सम्बन्ध रखती थी।
उत्खनन से प्राप्त बर्तनों और फर्नीचर पर सुंदर चित्र मिले हैं। मंदिरों की दीवारों पर भी बड़े और आकर्षक चित्र बनाए जाते थे।
9. विज्ञान का विकास
चीन में विज्ञान का भी पर्याप्त विकास हुआ था। चीनी ज्योतिषाचार्यों ने पंचांग तैयार किया था और ग्रहों तथा नक्षत्रों से सम्बन्धित भविष्यवाणियाँ करते थे।
उन्हें गणित की दशमलव प्रणाली का ज्ञान था तथा वे पाई (π) का मान निकालने में सक्षम थे।
चीनी चिकित्सा विज्ञान भी उन्नत था। अनेक रोगों और मानव शरीर की विभिन्न क्रियाओं का ज्ञान था तथा उपचार के लिए औषधियों और जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता था।
भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में भी अनेक आविष्कार हुए।
कुतुबनुमा
दिशाओं का ज्ञान कराने वाले कुतुबनुमा का आविष्कार चीनी वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण देन माना गया है।
कुतुबनुमा का आविष्कार चीन के हुनान क्षेत्र में लगभग 1200 ईस्वी में हुआ बताया गया है।
अन्य वैज्ञानिक उपलब्धियाँ
भूकम्पमापक यंत्र, पनचक्की तथा सौर घड़ी के आविष्कार भी चीन से सम्बन्धित बताए गए हैं।
कागज बनाने और मुद्रण कला के प्रारम्भिक विकास के कारण चीन को मुद्रण कला का आविष्कारक भी कहा गया है।
10. कन्फ्यूशियस एवं लाओत्से
कन्फ्यूशियस
कन्फ्यूशियस चीन के महान विद्वान और दार्शनिक थे। उनका वास्तविक नाम कुंगफू बताया गया है।
उन्होंने अपने दार्शनिक और धार्मिक विचारों से चीनी समाज में अनेक सुधार करने का प्रयास किया।
कन्फ्यूशियस से सम्बन्धित पाँच प्रमुख ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है—
- ली चिंग — कर्मकाण्ड एवं शिष्टाचार से सम्बन्धित ग्रन्थ
- आई चिंग — परिवर्तन का ग्रन्थ
- शू चिंग — इतिहास से सम्बन्धित लेख
- शि चिंग — काव्य ग्रन्थ
- चुन चिउ चिंग — बसन्त और शरद का इतिहास
कन्फ्यूशियस ने समाज में फैली कुरीतियों और बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया तथा इसके लिए राज्य शक्ति के उपयोग का भी समर्थन किया।
लाओत्से
लाओत्से कन्फ्यूशियस के समकालीन दार्शनिक थे। कन्फ्यूशियस के बाद उनके विचारों ने चीन की सभ्यता और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया।
उन्होंने ताओ-ते-चिंग ग्रन्थ की रचना की और ईश्वर तथा मनुष्य के बीच सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया।
चीनी सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ एक नजर में
| क्षेत्र | प्रमुख विशेषता |
|---|---|
| प्रमुख नदियाँ | ह्वांगहो एवं यांग्त्सीक्यांग |
| प्रमुख राजवंश | शांग, चाऊ, चिन एवं हान |
| शासन | सम्राट सर्वोच्च शासक, सेनापति, पुरोहित एवं न्यायाधीश |
| नियुक्तियाँ | प्रतियोगी परीक्षाओं से मन्दारिन अधिकारियों की नियुक्ति |
| समाज | संयुक्त परिवार और विभिन्न सामाजिक वर्ग |
| अर्थव्यवस्था | कृषि, शिल्प एवं दूरस्थ व्यापार |
| धर्म | प्रकृति पूजा, शांगति तथा पूर्वजों की उपासना |
| लिपि | चित्रात्मक स्वरूप; ऊपर से नीचे लिखी जाती थी |
| प्रमुख आविष्कार | कागज, कुतुबनुमा, भूकम्पमापक, पनचक्की एवं सौर घड़ी |
| वास्तुकला | चीन की महान दीवार और पैगोडा |
| प्रमुख दार्शनिक | कन्फ्यूशियस एवं लाओत्से |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
चीनी सभ्यता का विकास ह्वांगहो और यांग्त्सीक्यांग नदियों की घाटियों में हुआ। शांग, चाऊ, चिन और हान जैसे राजवंशों ने इसके राजनीतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विकसित शासन व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाएँ, संयुक्त परिवार, समृद्ध कृषि और व्यापार, प्रकृति एवं पूर्वजों की पूजा, चित्रात्मक लिपि तथा कागज, कुतुबनुमा और मुद्रण जैसी उपलब्धियाँ इस सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ थीं। कन्फ्यूशियस और लाओत्से के विचारों ने चीनी समाज और संस्कृति को विशेष रूप से प्रभावित किया।
- चीन की सभ्यता का विकास ह्वांगहो और यांग्त्सीक्यांग नदी घाटियों में हुआ।
- ह्वांगहो नदी को चीन का शोक कहा गया है।
- चीन के निवासी अपने देश को चुंगकुओ कहते थे।
- शांग वंश का शासन लगभग 1765–1122 ईसा पूर्व तक रहा।
- चाऊ वंश का काल लगभग 1122–249 ईसा पूर्व था और इसे चीनी इतिहास का स्वर्ण युग कहा गया।
- चिन वंश में पक्की सड़कों तथा चीन की प्रसिद्ध दीवार का निर्माण हुआ।
- लगभग 202 ईसा पूर्व हान वंश ने चीन पर अधिकार स्थापित किया और उसका शासन लगभग 400 वर्ष रहा।
- सम्राट शासन और धर्म दोनों का प्रधान तथा सर्वोच्च सेनापति और न्यायाधीश था।
- राजकीय अधिकारियों को मन्दारिन कहा जाता था और उनकी नियुक्ति प्रतियोगी परीक्षाओं से होती थी।
- चीनी समाज में संयुक्त परिवार प्रथा तथा माता के सम्मान का विशेष महत्व था।
- चीन की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था तथा दूरस्थ देशों से व्यापार भी होता था।
- शांगति प्रमुख देवता था और पूर्वजों की पूजा का विशेष महत्व था।
- लगभग 1400 ईसा पूर्व के चीनी लिपि के नमूने हड्डियों पर मिले हैं; इसमें लगभग 40 हजार संकेत बताए गए हैं।
- कागज बनाने का आविष्कार चीन में हुआ और काई लून से इसका विशेष सम्बन्ध है।
- चीन की महान दीवार और पैगोडा उसकी प्रमुख वास्तुकला उपलब्धियाँ थीं।
- चीनी विज्ञान में पंचांग, दशमलव प्रणाली, पाई का मान, औषधि एवं जड़ी-बूटियों का ज्ञान विकसित था।
- कुतुबनुमा, भूकम्पमापक यंत्र, पनचक्की और सौर घड़ी महत्वपूर्ण चीनी आविष्कारों में गिने गए हैं।
- कन्फ्यूशियस और लाओत्से चीन के प्रमुख दार्शनिक एवं समाज सुधारक थे।
- लाओत्से ने ताओ-ते-चिंग की रचना की।