इतिहास का अर्थ एवं परिभाषाएँ
इतिहास का परिचय
इतिहास का उद्भव प्राचीन काल में ही हो चुका था। मनुष्य ने अपने कार्यों, विचारों और उससे सम्बन्धित घटनाओं को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास बहुत पहले से प्रारम्भ कर दिया था।
लगभग 500 ईसा पूर्व हेरोडोटस ने मनुष्य के कार्यों एवं विचारों को क्रमबद्ध रूप प्रदान करने का प्रयास किया। इसी कारण हेरोडोटस को इतिहास का पिता कहा जाता है। उन्होंने विश्व में घटित होने वाली घटनाओं को वर्णनात्मक रूप में प्रस्तुत किया। कुछ विद्वान उन्हें कथात्मक इतिहास का जन्मदाता भी मानते हैं।
411 ईसा पूर्व थ्यूसीडाइड्स ने ऐतिहासिक तथ्यों की उपयोगिता को मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया।
इसके बाद जर्मन विद्वान निबुर ने ऐतिहासिक परम्परा को आगे बढ़ाया। 19वीं शताब्दी में रैंक ने इतिहास को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया और उसके आगे के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
इन विद्वानों के प्रयासों से इतिहास का अध्ययन अधिक व्यवस्थित हुआ। इतिहास में अतीत की घटनाओं का वर्णन किया जाता है, परन्तु इसका महत्व केवल भूतकाल तक सीमित नहीं है। इतिहास अतीत से वर्तमान तक मानव को ज्ञान प्रदान करता है और वर्तमान परिस्थितियों को समझने में सहायता करता है।
इतिहास का अर्थ
इतिहास सामाजिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। समाज की रचना एवं उसके विकास को समझने में इतिहास का महत्वपूर्ण योगदान है। मनुष्य के पृथ्वी पर प्रादुर्भाव के समय से ही इतिहास का जन्म माना जाता है।
अंग्रेजी का शब्द History यूनानी शब्द हिस्टोरिया से लिया गया है। हिस्टोरिया का अर्थ सत्य का अन्वेषण है, अर्थात वास्तविक रूप में क्या घटित हुआ, इसकी खोज करना।
अतः इतिहास में भूतकाल की घटनाओं, मानव के कार्यों और विचारों को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे सम्पूर्ण घटनाक्रम को स्पष्ट रूप से समझा जा सके।
इतिहास की प्रमुख विशेषताएँ
इतिहास के क्रमबद्ध विवरण में तीन प्रमुख विशेषताएँ दिखाई देती हैं—
- इसमें सार्वजनिक घटनाओं का लेखा-जोखा रहता है।
- ऐतिहासिक घटनाएँ निरन्तर घटित होती रहती हैं।
- घटनाओं का वर्णन इस प्रकार किया जाता है कि सम्पूर्ण घटनाक्रम का चित्र स्पष्ट हो जाए।
इतिहास की प्रमुख परिभाषाएँ
| विद्वान | परिभाषा |
|---|---|
| हेनरी जॉनसन | भूतकालीन घटनाओं का उल्लेख ही इतिहास है। |
| रेयसन | इतिहास घटनाओं या विचारों का सुसम्बद्ध विवरण है। |
| मैटलैण्ड | मानव ने जो कुछ किया और कहा है, यहाँ तक कि जो उसने सोचा है, वह इतिहास है। |
| प्रो. घाटे | इतिहास हमारे सम्पूर्ण भूतकाल का वैज्ञानिक अध्ययन तथा लेखा-जोखा है। |
| टायनबी | इतिहास गतिशील मानव व्यवहार की खोज है। |
परिभाषाओं का आशय
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि इतिहास केवल घटनाओं की सूची या तिथियों का संग्रह नहीं है। इसमें मानव के भूतकालीन कार्यों, विचारों और व्यवहार का अध्ययन किया जाता है तथा उन्हें क्रमबद्ध एवं सुसम्बद्ध रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
इस प्रकार इतिहास मनुष्य और समाज के भूतकाल को समझने का माध्यम है तथा अतीत की घटनाओं के आधार पर वर्तमान को समझने में भी सहायता करता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| इतिहास के पिता | हेरोडोटस |
| हेरोडोटस का उल्लेखित समय | लगभग 500 ईसा पूर्व |
| थ्यूसीडाइड्स | 411 ईसा पूर्व ऐतिहासिक तथ्यों की उपयोगिता को मार्गदर्शक रूप में प्रस्तुत किया |
| 19वीं शताब्दी | रैंक ने इतिहास को वैज्ञानिक स्वरूप देने की दिशा में मार्ग प्रशस्त किया |
| History शब्द | यूनानी शब्द हिस्टोरिया से लिया गया है |
| हिस्टोरिया का अर्थ | सत्य का अन्वेषण |
- इतिहास का उद्भव प्राचीन काल में ही हो चुका था।
- लगभग 500 ईसा पूर्व हेरोडोटस ने मानव के कार्यों एवं विचारों को क्रमबद्ध रूप देने का प्रयास किया।
- हेरोडोटस को इतिहास का पिता कहा जाता है और कुछ विद्वान उन्हें कथात्मक इतिहास का जन्मदाता भी मानते हैं।
- 411 ईसा पूर्व थ्यूसीडाइड्स ने ऐतिहासिक तथ्यों की उपयोगिता पर बल दिया।
- निबुर ने ऐतिहासिक परम्परा को आगे बढ़ाया तथा 19वीं शताब्दी में रैंक ने इसके वैज्ञानिक स्वरूप के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
- History शब्द यूनानी शब्द हिस्टोरिया से बना है, जिसका अर्थ सत्य का अन्वेषण है।
- इतिहास सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग है और समाज की रचना एवं विकास को समझने में सहायक है।
- हेनरी जॉनसन ने इतिहास को भूतकालीन घटनाओं का उल्लेख माना है।
- रेयसन के अनुसार इतिहास घटनाओं या विचारों का सुसम्बद्ध विवरण है।
- प्रो. घाटे के अनुसार इतिहास सम्पूर्ण भूतकाल का वैज्ञानिक अध्ययन एवं लेखा-जोखा है।
- टायनबी के अनुसार इतिहास गतिशील मानव व्यवहार की खोज है।
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इतिहास की प्रकृति, क्षेत्र एवं महत्व
इतिहास की प्रकृति
प्रारम्भिक अवस्था में इतिहास का स्वरूप मुख्य रूप से कथा के समान था। उस समय लेखन कला आज की तरह विकसित नहीं थी और पर्याप्त लेखन सामग्री भी उपलब्ध नहीं थी। इसलिए इतिहास का ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से पहुँचता था।
प्राचीन काल में महाकाव्यों की रचना का प्रमुख उद्देश्य वीर पुरुषों की गाथाओं का वर्णन करना था। मध्यकाल में भी यह परम्परा बनी रही। राजाओं के दरबार में भाट और चारण वीरगाथाएँ सुनाया करते थे। उनका कार्य सेना का उत्साह बढ़ाना, अपने आश्रयदाताओं की प्रशंसा करना तथा जनता का मनोरंजन करना था।
वैज्ञानिक युग के आगमन के साथ मनुष्य में नवीन चेतना, जिज्ञासा और तार्किक शक्ति का विकास हुआ। इसके परिणामस्वरूप ऐतिहासिक घटनाओं को केवल कथाओं के रूप में स्वीकार करने के बजाय उनके प्रमाणों और तथ्यों की जाँच पर बल दिया जाने लगा।
उन्नीसवीं शताब्दी में ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं, प्राचीन शिलालेखों आदि का पुरातत्व विभाग द्वारा संग्रह किया जाने लगा। इनके आधार पर सत्य निष्कर्ष खोजने का प्रयास हुआ। प्रामाणिक इतिहास लेखन के विकास में स्टब्स, टी. एफ. टाउट तथा एस. आर. गार्डिनर जैसे विद्वानों का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
इतिहास का वर्तमान स्वरूप मानव जीवन की क्रियाओं और गतिविधियों का वैज्ञानिक अध्ययन है। यह पृथ्वी पर मानव के प्रादुर्भाव से प्रारम्भ होकर मानव के विकास से सम्बन्धित तथ्यों का अध्ययन करता है।
इतिहास कला के रूप में
कुछ विद्वान इतिहास को कला मानते हैं। उनका विचार है कि विज्ञान केवल तथ्यों का आधार प्रदान करता है, जबकि कला के माध्यम से ऐतिहासिक घटनाओं और तथ्यों को सजीव, सरल और प्रभावपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
साहित्यिक कला में मनोरंजक भाषा, सरल रचना तथा भावपूर्ण शैली के माध्यम से विषय को समझने योग्य बनाया जाता है। इसी प्रकार इतिहासकार भी ऐतिहासिक तथ्यों को ऐसी शैली में प्रस्तुत करता है जिससे पाठक घटनाओं को सरलता से समझ सके।
इस प्रकार इतिहास के कुछ अंशों में कला का स्वरूप स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। ऐतिहासिक तथ्यों को रोचक, सरल और सजीव बनाने के लिए कलात्मक प्रस्तुति आवश्यक होती है।
इतिहास विज्ञान के रूप में
विज्ञान ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन है। यह कारण और परिणाम के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है तथा सत्य एवं तथ्यों पर आधारित होता है।
विज्ञान की प्रमुख विशेषताएँ
- विज्ञान ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन है।
- वैज्ञानिक ज्ञान अर्जित किया जा सकता है।
- वैज्ञानिक ज्ञान सार्वभौमिक होता है।
- इसे अवलोकन एवं परीक्षण द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है।
- इसमें कारण एवं परिणाम का सम्बन्ध पाया जाता है।
- यह सत्य, तथ्यों तथा निष्कर्षों पर आधारित होता है।
इतिहास में भी घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। किसी ऐतिहासिक तथ्य की सत्यता की जाँच निरीक्षण, तुलना और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर की जाती है।
प्रो. जे. बी. ब्यूरी ने इतिहास के वैज्ञानिक स्वरूप पर बल दिया। इतिहास को भौतिक विज्ञान की तरह प्रयोगशाला में प्रयोग नहीं किया जा सकता, फिर भी इसमें घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण मिलता है और यह जानने का प्रयास किया जाता है कि घटनाएँ कब, किस प्रकार और क्यों हुईं।
इतिहास कला एवं विज्ञान दोनों है
इतिहास में कला और विज्ञान दोनों के गुण विद्यमान हैं। विज्ञान ऐतिहासिक तथ्यों की सत्यता और प्रमाणिकता स्थापित करने में सहायता करता है, जबकि कला उन्हीं तथ्यों को सरल, रोचक और प्रभावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है।
इसलिए इतिहास को केवल कला या केवल विज्ञान नहीं माना जा सकता। इतिहास कला एवं विज्ञान दोनों का संगम है। इतिहास सामाजिक विज्ञान भी है।
| इतिहास कला के रूप में | इतिहास विज्ञान के रूप में |
|---|---|
| ऐतिहासिक घटनाओं को सरल और सजीव बनाता है। | ऐतिहासिक तथ्यों की सत्यता की जाँच करता है। |
| भाषा एवं प्रस्तुति शैली महत्वपूर्ण होती है। | तथ्य, प्रमाण, निरीक्षण और तुलना महत्वपूर्ण होते हैं। |
| विषय को रोचक और समझने योग्य बनाता है। | घटनाओं को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है। |
| घटनाओं का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। | घटना कब, कैसे और क्यों हुई, इसका अध्ययन करता है। |
इतिहास का क्षेत्र
इतिहास का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। यह आदिकाल से आधुनिक काल तक देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित और विकसित होता रहा है।
इतिहास में किसी समाज की ऐतिहासिक स्थिति, वातावरण, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक दशाओं के साथ-साथ संवैधानिक व्यवस्था, कानून, न्याय तथा सुरक्षा व्यवस्था आदि का भी अध्ययन किया जाता है।
अध्ययन की सुविधा के लिए इतिहास को विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित किया गया है।
1. प्राचीन इतिहास
प्राचीन इतिहास को प्रारम्भिक इतिहास भी कहा जाता है। इसमें प्राचीन घटनाओं और मानव सभ्यताओं के क्रमिक विकास का वर्णन मिलता है।
इसकी अवधि सामान्यतः प्रथम लिखित अभिलेखों के समय से रोमन साम्राज्य के पतन तक मानी जाती है।
2. आधुनिक इतिहास
आधुनिक इतिहास में आधुनिक काल की ऐतिहासिक घटनाओं, तथ्यों और विवरणों का अध्ययन किया जाता है। सामान्यतः इसकी अवधि पुनर्जागरण काल से वर्तमान समय तक मानी जाती है।
3. मध्यकालीन इतिहास
मध्यकालीन इतिहास प्राचीन और आधुनिक इतिहास के मध्य की अवधि का अध्ययन करता है। इसमें लगभग 5वीं से 15वीं शताब्दी तक की घटनाओं का विवरण मिलता है।
रोमन साम्राज्य का पतन और 15वीं शताब्दी इसकी प्रमुख सीमाएँ मानी जाती हैं।
4. सामाजिक इतिहास
20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में इतिहासकारों का ध्यान सामाजिक इतिहास की ओर अधिक आकर्षित हुआ।
इसमें मानव समूहों तथा उनकी सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। सामाजिक इतिहास को लोकप्रिय बनाने का श्रेय जी. एम. ट्रेवेलियन को दिया जाता है।
5. सांस्कृतिक इतिहास
सांस्कृतिक इतिहास में किसी समाज अथवा देश की शिक्षा, साहित्य, चित्रकला, संगीत और परम्पराओं का अध्ययन किया जाता है।
इतिहासकारों ने वैदिक काल, मौर्य काल और गुप्त काल के सांस्कृतिक विकास का अध्ययन भी इसी क्षेत्र के अन्तर्गत किया है।
6. विश्व इतिहास
विश्व इतिहास इतिहास का व्यापक स्वरूप है। इसमें मानव इतिहास तथा विभिन्न राष्ट्रों की एक-दूसरे पर निर्भरता का अध्ययन किया जाता है।
विश्व इतिहास लिखने का श्रेय सर वाल्टर रैले को दिया जाता है।
इतिहास के प्रमुख क्षेत्रों का सार
| क्षेत्र | मुख्य विशेषता |
|---|---|
| प्राचीन इतिहास | प्राचीन घटनाएँ एवं मानव सभ्यताओं का क्रमिक विकास |
| मध्यकालीन इतिहास | लगभग 5वीं से 15वीं शताब्दी तक का इतिहास |
| आधुनिक इतिहास | पुनर्जागरण काल से वर्तमान समय तक का इतिहास |
| सामाजिक इतिहास | मानव समूहों तथा सामाजिक-सांस्कृतिक क्रियाओं का अध्ययन |
| सांस्कृतिक इतिहास | शिक्षा, साहित्य, चित्रकला, संगीत एवं परम्पराओं का अध्ययन |
| विश्व इतिहास | मानव इतिहास एवं राष्ट्रों की पारस्परिक निर्भरता का अध्ययन |
इतिहास का महत्व
इतिहास का महत्व केवल विद्यालयी शिक्षा या परीक्षाओं तक सीमित नहीं है। इतिहास हमें अतीत की घटनाओं का ज्ञान देता है, जिससे वर्तमान को समझने और भविष्य के सम्बन्ध में उचित निर्णय लेने में सहायता मिलती है।
इतिहास मानव के अनुभव क्षेत्र में वृद्धि करता है। इसकी उपयोगिता नैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और सूचनात्मक सभी क्षेत्रों में है। यह मानव मस्तिष्क तथा आचरण को विकसित करने का प्रभावशाली साधन है।
1. जीवन में सहायक
इतिहास सामाजिक वातावरण पर प्रकाश डालता है। इसके अध्ययन से वर्तमान को समझने, भविष्य के सम्बन्ध में निर्णय लेने और सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहायता मिलती है।
2. ज्ञान वृद्धि का साधन
इतिहास के अध्ययन से विद्यार्थी विभिन्न राष्ट्रों, समाजों, संस्कृतियों, परम्पराओं तथा संस्थाओं का ज्ञान प्राप्त करता है। इससे उसके ज्ञान में वृद्धि होती है।
3. व्यावहारिक जीवन में उपयोगिता
इतिहास का अध्ययन जीवन की समस्याओं को समझने और उनके समाधान में सहायता करता है। अध्यापन कार्य को सुगमतापूर्वक संचालित करने में भी इतिहास का ज्ञान उपयोगी है।
प्रशासनिक कार्यों, पत्रकारिता तथा विदेश विभाग जैसे क्षेत्रों में भी इतिहास का ज्ञान आवश्यक माना गया है। यह विभिन्न देशों, लोगों और संस्कृतियों के बीच तालमेल तथा सम्बन्ध स्थापित करने में सहायक होता है।
4. व्यापक दृष्टिकोण का विकास
इतिहास शिक्षण द्वारा विद्यार्थियों में भावात्मक और राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास किया जा सकता है।
इतिहास से यह ज्ञात होता है कि विभिन्न जातियों और समुदायों के पारस्परिक सहयोग से देश की उन्नति हुई है। राष्ट्रीय संस्कृति और सभ्यता के विकास में विभिन्न समुदायों के योगदान को समझने से उनके प्रति समान सम्मान का भाव विकसित होता है।
5. मानसिकता का बोध
इतिहास का ज्ञान बालक की स्मरण शक्ति को मजबूत बनाता है और उसे मानसिक प्रशिक्षण प्रदान करता है।
अतीत की घटनाओं के अध्ययन से बालक वर्तमान और भविष्य के विषय में सोचने की क्षमता विकसित करता है। इससे घटनाओं का अध्ययन करने की योग्यता तथा स्मृति स्तर में भी वृद्धि होती है।
6. देश-प्रेम की भावना जागृत करना
इतिहास के माध्यम से विद्यार्थियों में देश-प्रेम की भावना जागृत होती है। जब वे अपने देश की गौरवपूर्ण घटनाओं और महान व्यक्तियों के विषय में पढ़ते हैं, तब उनके हृदय में देश के प्रति सम्मान उत्पन्न होता है।
उन्हें यह भी ज्ञात होता है कि उनके पूर्वजों ने किस प्रकार मातृभूमि की सेवा की थी।
7. वर्तमान को समझने में सहायक
इतिहास राष्ट्र की अतीतकालीन घटनाओं पर प्रकाश डालता है। अतीत को ठीक प्रकार से समझे बिना वर्तमान को पूरी तरह समझना कठिन है। इसलिए इतिहास वर्तमान को समझने में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है।
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
इतिहास का स्वरूप कला और विज्ञान दोनों से जुड़ा हुआ है। इसका क्षेत्र मानव जीवन के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पक्षों तक विस्तृत है। इतिहास अतीत का ज्ञान देकर वर्तमान को समझने, ज्ञान और मानसिक क्षमता बढ़ाने, व्यावहारिक जीवन में सहायता देने तथा देश-प्रेम और व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- प्रारम्भिक काल में इतिहास का स्वरूप कथात्मक और मौखिक था।
- वैज्ञानिक युग के साथ इतिहास में तथ्य, प्रमाण, जिज्ञासा और तार्किक अध्ययन का महत्व बढ़ा।
- स्टब्स, टी. एफ. टाउट तथा एस. आर. गार्डिनर ने प्रामाणिक इतिहास लेखन के विकास में योगदान दिया।
- इतिहास में कला ऐतिहासिक तथ्यों को सरल और सजीव बनाती है, जबकि विज्ञान उनकी सत्यता की जाँच करता है।
- प्रो. जे. बी. ब्यूरी ने इतिहास के वैज्ञानिक स्वरूप पर बल दिया।
- इतिहास कला एवं विज्ञान दोनों का संगम है और इसे सामाजिक विज्ञान माना जाता है।
- इतिहास के प्रमुख क्षेत्र प्राचीन, आधुनिक, मध्यकालीन, सामाजिक, सांस्कृतिक और विश्व इतिहास हैं।
- सामाजिक इतिहास को लोकप्रिय बनाने का श्रेय जी. एम. ट्रेवेलियन को दिया जाता है।
- विश्व इतिहास लिखने का श्रेय सर वाल्टर रैले को दिया जाता है।
- इतिहास जीवन, ज्ञान वृद्धि, व्यावहारिक जीवन और व्यापक दृष्टिकोण के विकास में सहायक है।
- इतिहास मानसिक प्रशिक्षण और स्मरण शक्ति को विकसित करता है।
- इतिहास देश-प्रेम की भावना जागृत करता है तथा अतीत के आधार पर वर्तमान को समझने में सहायता करता है।
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भारतीय इतिहास के साहित्यिक स्रोत
भारतीय इतिहास के स्रोत
प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी अनेक प्रकार के स्रोतों से प्राप्त होती है। प्राचीन घटनाओं के निश्चित काल और उनकी प्रमाणिकता को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं, फिर भी इतिहासकारों ने विभिन्न साहित्यिक तथा पुरातात्विक साधनों के अध्ययन से प्राचीन भारत के इतिहास का पुनर्निर्माण किया है।
भारतीय इतिहास के अध्ययन के प्रमुख साधनों को निम्न प्रकार से बाँटा गया है—
- अनैतिहासिक अथवा धार्मिक ग्रन्थ
- ऐतिहासिक ग्रन्थ
- विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण
- पुरातत्व सम्बन्धी सामग्री
इनमें साहित्यिक स्रोतों के अन्तर्गत धार्मिक ग्रन्थ और ऐतिहासिक ग्रन्थ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
धार्मिक अथवा अनैतिहासिक ग्रन्थ
भारत के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों में अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं, सामाजिक दशाओं और सांस्कृतिक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। धार्मिक साहित्य को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जाता है—
- वैदिक साहित्य
- बौद्ध साहित्य
- जैन साहित्य
धार्मिक साहित्य का वर्गीकरण
| वैदिक साहित्य | बौद्ध साहित्य | जैन साहित्य |
|---|---|---|
|
वेद—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद वेदांग पुराण स्मृतियाँ |
जातक पिटक मिलिन्दपन्हो दीपवंश महावंश महावस्तु ललित विस्तार बुद्ध-चरित्र सौन्दरानन्द दिव्यावदान मंजुश्री मूलकल्प लंकावतार |
परिशिष्ट पर्व भद्रबाहु चरित आचारांग सूत्र कालिका पुराण भगवती सूत्र कथा कोश त्रिलोक प्रज्ञप्ति लोक विभाग पुण्याश्रव कथाकोश आराधना कथाकोश आवश्यक सूत्र स्थविरावली |
1. वैदिक साहित्य
वेद
वेद प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रन्थ हैं। वेद शब्द का शाब्दिक अर्थ ज्ञान है। यह संस्कृत की “विद्” धातु से बना है, जिसका अर्थ जानना है।
वेदों के संकलनकर्ता कृष्ण द्वैपायन माने जाते हैं। वेदों के पृथक्करण के कारण उन्हें वेदव्यास की संज्ञा प्राप्त हुई।
वेदों से आर्यों के विषय में प्रारम्भिक जानकारी प्राप्त होती है। वेदों की कुल संख्या चार है—
| वेद | मुख्य विषय |
|---|---|
| ऋग्वेद | ऋचाओं का संग्रह |
| सामवेद | गायन सम्बन्धी ऋचाओं का संग्रह |
| यजुर्वेद | यज्ञ एवं पूजा के लिए विनियमों का समावेश |
| अथर्ववेद | तन्त्र-मन्त्र का संग्रह |
ब्राह्मण ग्रन्थ
यज्ञों, कर्मकाण्डों और उनसे सम्बन्धित क्रियाओं को भली-भाँति समझाने के लिए ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना हुई। इनमें यज्ञों की दार्शनिक, आध्यात्मिक और कर्मकाण्डीय मीमांसा प्रस्तुत की गई है।
ये ग्रन्थ अधिकतर गद्य में लिखे गए हैं। ब्राह्मण एवं उपनिषद ग्रन्थों से उत्तर वैदिक कालीन समाज और संस्कृति की जानकारी प्राप्त होती है।
शतपथ ब्राह्मण अत्यन्त विशाल एवं महत्वपूर्ण ब्राह्मण ग्रन्थ माना गया है। प्रत्येक वेद की संहिता से सम्बन्धित अपने-अपने ब्राह्मण ग्रन्थ हैं।
आरण्यक
आरण्यक ग्रन्थों में आत्मा, मृत्यु और जीवन जैसे दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विषयों का वर्णन मिलता है। इन ग्रन्थों का अध्ययन वन में किया जाता था, इसलिए इन्हें आरण्यक कहा गया।
इनका उद्देश्य अरण्यों में निवास करने वाले वानप्रस्थियों को मार्गदर्शन देना था।
- ऐतरेय और शांखायन आरण्यक ऋग्वेद से सम्बन्धित हैं।
- बृहदारण्यक शुक्ल यजुर्वेद से सम्बन्धित है।
- मैत्रायणी आरण्यक कृष्ण यजुर्वेद से सम्बन्धित है।
- तवलकार आरण्यक सामवेद से सम्बन्धित है।
- अथर्ववेद का कोई आरण्यक उपलब्ध नहीं है।
आरण्यक ग्रन्थों में ऐतिहासिक जानकारी भी मिलती है। ऐतरेय आरण्यक में कुरु, पांचाल, काशी और विदेह आदि महाजनपदों का उल्लेख मिलता है।
उपनिषद
उपनिषदों की कुल संख्या 108 बताई गई है। इनमें ईश, केन, कठ, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक, कौषीतकी, मुण्डक और प्रश्न आदि प्रमुख हैं।
शंकराचार्य ने जिन 10 उपनिषदों पर भाष्य लिखा, उन्हें विशेष रूप से प्रमाणिक माना गया है। कुल 108 उपनिषदों में से 13 उपनिषदों को प्रमाणिक माना गया है।
भारत का प्रसिद्ध आदर्श वाक्य “सत्यमेव जयते” मुण्डकोपनिषद से लिया गया है।
उपनिषद गद्य और पद्य दोनों रूपों में उपलब्ध हैं।
वेदांग
वेदों के अर्थ को अच्छी तरह समझने में वेदांग सहायक होते हैं। वेदांगों की कुल संख्या छह है—
- शिक्षा
- कल्प
- व्याकरण
- निरुक्त
- छन्द
- ज्योतिष
सूत्र साहित्य
उपनिषदों के उपरान्त सूत्र साहित्य का प्रारम्भ हुआ। सूत्र साहित्य को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है—
- कल्प सूत्र—वैदिक यज्ञों के नियमों का वर्णन।
- गृह सूत्र—गृहस्थ जीवन से सम्बन्धित संस्कारों एवं कर्मकाण्डों का वर्णन।
- धर्म सूत्र—सामाजिक, राजनीतिक एवं वैधानिक व्यवस्था का वर्णन।
स्मृतियाँ
स्मृतियों को धर्मशास्त्र भी कहा जाता है। इनमें मनुष्य के जीवन से सम्बन्धित विभिन्न क्रिया-कलापों और विधि-निषेधों की जानकारी मिलती है।
मनुस्मृति को लगभग 200 ईसा पूर्व से 100 ईस्वी के मध्य की सबसे प्राचीन स्मृतियों में माना गया है। नारद, पराशर, बृहस्पति, कात्यायन, गौतम, संवर्त, हारीत और अंगिरा आदि अन्य महत्वपूर्ण स्मृतिकार थे।
मनुस्मृति से तत्कालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक दशाओं की जानकारी प्राप्त होती है। नारद स्मृति से गुप्त वंश के सम्बन्ध में जानकारी मिलती है।
मनुस्मृति पर मेधातिथि, भारुचि, कुल्लूक भट्ट और गोविन्दराज आदि टीकाकारों ने टीकाएँ लिखीं। याज्ञवल्क्य स्मृति पर विश्वरूप, अपरार्क और विज्ञानेश्वर आदि ने भाष्य लिखे।
2. बौद्ध साहित्य
बौद्ध साहित्य को त्रिपिटक कहा जाता है। महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद आयोजित विभिन्न बौद्ध संगीतियों में त्रिपिटकों का संकलन किया गया।
त्रिपिटक तीन हैं—
- सुत्तपिटक
- विनयपिटक
- अभिधम्मपिटक
बौद्ध साहित्य में जातक, मिलिन्दपन्हो, दीपवंश, महावंश, महावस्तु, ललित विस्तार, बुद्ध-चरित्र, सौन्दरानन्द और दिव्यावदान जैसे ग्रन्थ भी महत्वपूर्ण हैं। इनसे धार्मिक जीवन के साथ-साथ प्राचीन समाज और इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है।
3. जैन साहित्य
जैन साहित्य प्राकृत एवं संस्कृत दोनों भाषाओं में उपलब्ध है। जैन साहित्य के प्रमुख ग्रन्थ आगम कहलाते हैं। आगमों की संख्या 12 बताई गई है और बाद में इनके उपांग भी लिखे गए।
आगमों के साथ जैन साहित्य में 10 प्रकीर्ण, 6 छेद सूत्र, एक नन्दी सूत्र, एक अनुयोगद्वार और चार मूलसूत्रों का भी उल्लेख मिलता है।
आगम ग्रन्थों की रचना सम्भवतः श्वेताम्बर सम्प्रदाय के आचार्यों द्वारा महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद की गई।
ऐतिहासिक ग्रन्थ
धार्मिक साहित्य के अतिरिक्त अनेक ग्रन्थ ऐसे हैं जिनसे तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इनमें रामायण, महाभारत, पुराण तथा धर्मेतर साहित्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
1. रामायण
रामायण और महाभारत भारत के दो सर्वाधिक प्राचीन महाकाव्य हैं। इनके रचनाकाल के विषय में मतभेद है, फिर भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इनका रचनाकाल लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी ईस्वी के मध्य माना गया है।
रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में की। वाल्मीकि कृत रामायण में मूलतः 6,000 श्लोक थे, जो बाद में 12,000 और फिर 24,000 हो गए। इसी कारण इसे चतुर्विंशति साहस्री संहिता भी कहा गया।
रामायण सात काण्डों में क्रमबद्ध है—
- बालकाण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- अरण्यकाण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- लंकाकाण्ड अथवा युद्धकाण्ड
- उत्तरकाण्ड
रामायण से तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त होती है। रामकथा पर आधारित ग्रन्थों का अनुवाद सर्वप्रथम भारत से बाहर चीन में किया गया।
2. महाभारत
महर्षि व्यास द्वारा रचित महाभारत रामायण से अधिक विशाल महाकाव्य है। इसका मूल रचनाकाल लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व माना गया है।
महाभारत में प्रारम्भ में लगभग 8,800 श्लोक थे और इसका नाम जयसंहिता था। बाद में श्लोकों की संख्या लगभग 24,000 होने पर यह वैदिक जन भरत के वंशजों की कथा होने के कारण भारत कहलाया।
गुप्त काल में श्लोकों की संख्या बढ़कर लगभग एक लाख हो गई और इसे शतसहस्री संहिता अथवा महाभारत कहा जाने लगा।
महाभारत वर्तमान रूप में लगभग एक लाख श्लोकों का विशाल महाकाव्य है और इसे 18 पर्वों में विभाजित किया गया है—
आदि, सभा, वन, विराट, उद्योग, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक, स्त्री, शान्ति, अनुशासन, अश्वमेध, आश्रमवासी, मौसल, महाप्रस्थानिक एवं स्वर्गारोहण।
महाभारत में हरिवंश नाम का परिशिष्ट भी है। इससे तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त होती है।
3. पुराण
प्राचीन आर्य जनों से सम्बन्धित आख्यानों वाले ग्रन्थों को पुराण कहा गया है। पुराणों में सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित पाँच प्रमुख लक्षण बताए गए हैं।
पुराणों की कुल संख्या 18 बताई गई है—
- ब्रह्म पुराण
- पद्म पुराण
- विष्णु पुराण
- वायु पुराण
- भागवत पुराण
- नारद पुराण
- मार्कण्डेय पुराण
- अग्नि पुराण
- भविष्य पुराण
- ब्रह्म वैवर्त पुराण
- लिंग पुराण
- वराह पुराण
- स्कन्द पुराण
- वामन पुराण
- कूर्म पुराण
- मत्स्य पुराण
- गरुड़ पुराण
- ब्रह्माण्ड पुराण
धर्मेतर साहित्य
महाकाव्यों और धार्मिक ग्रन्थों के अतिरिक्त अर्थशास्त्र, राजतरंगिणी और हर्षचरित जैसे धर्मेतर ग्रन्थ भी भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत हैं।
अर्थशास्त्र
कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र में मौर्य काल से सम्बन्धित विवरण मिलता है। इससे तत्कालीन भारत के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
हर्षचरित
बाणभट्ट ने हर्षचरित की रचना 620 ईस्वी में की। इसमें तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक दशाओं की जानकारी मिलती है और कन्नौज के शासक हर्ष का चरित्र-चित्रण किया गया है।
विक्रमांकदेव चरित
बारहवीं शताब्दी के कवि बिल्हण ने विक्रमांकदेव चरित की रचना की। इसमें सम्राट विक्रमांक के शासन का वर्णन मिलता है।
राजतरंगिणी
कश्मीर के विद्वान कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना की। इसमें कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध वर्णन मिलता है।
इसकी रचना 1148 ईस्वी में प्रारम्भ हुई और महाराजा जयसिंह के काल में पूर्ण हुई।
तमिल ग्रन्थ
तमिल साहित्य में दक्षिण भारत के शासकों तथा तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। इतिहासकार स्मिथ ने तमिल साहित्य की प्रशंसा की है।
दीपवंश एवं महावंश
दीपवंश और महावंश बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। इनमें सिंहल द्वीप अर्थात श्रीलंका के प्राचीन इतिहास का वर्णन मिलता है। मौर्य सम्राट अशोक और उसके वंश के सम्बन्ध में भी इन ग्रन्थों से पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है।
चरक संहिता
चरक संहिता आयुर्वेद अथवा चिकित्सा विषय से सम्बन्धित ग्रन्थ है। इसके रचयिता आचार्य चरक थे। यह संस्कृत भाषा में गद्य एवं पद्य दोनों रूपों में वर्णित है।
इसका विभाजन 8 भागों और 120 अध्यायों में किया गया है। चिकित्सा सम्बन्धी विषयों के अतिरिक्त इसमें दर्शन और अर्थशास्त्र से सम्बन्धित विषयों का भी उल्लेख मिलता है।
अष्टाध्यायी
संस्कृत भाषा के प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य पाणिनि अष्टाध्यायी के रचनाकार हैं। यह प्राचीन संस्कृत व्याकरण का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है।
इसमें आठ अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं, अर्थात कुल 32 पाद हैं। इस ग्रन्थ से मौर्यकाल से पूर्व भारत के सम्बन्ध में भी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
पद्मावत
पद्मावत की रचना मलिक मुहम्मद जायसी ने की। इस रचना से जायसी के समय के अनेक स्थानों और राजवंशों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।
पद्मावत में चित्तौड़गढ़, सिंहलगढ़, दिल्ली, उड़ीसा और चंदेरी आदि स्थानों तथा कुछ राजवंशों का उल्लेख मिलता है।
पद्मावत में राजा रत्नसेन, रानी पद्मावती, बादशाह अलाउद्दीन, राघवचेतन और नागमती जैसे पात्रों का वर्णन मिलता है।
साहित्यिक स्रोतों का महत्व
भारतीय इतिहास के साहित्यिक स्रोत केवल धार्मिक विचारों तक सीमित नहीं हैं। इनके माध्यम से विभिन्न कालों की राजनीतिक व्यवस्था, सामाजिक जीवन, धार्मिक विश्वास, आर्थिक दशा, संस्कृति, राजवंशों, प्रशासन और महत्वपूर्ण घटनाओं के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।
| साहित्यिक स्रोत | प्रमुख ऐतिहासिक उपयोगिता |
|---|---|
| वैदिक साहित्य | आर्यों, वैदिक एवं उत्तर वैदिक समाज और संस्कृति की जानकारी |
| बौद्ध साहित्य | बौद्ध धर्म के साथ प्राचीन समाज और ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी |
| जैन साहित्य | धार्मिक एवं ऐतिहासिक जानकारी |
| रामायण एवं महाभारत | राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक दशाओं का ज्ञान |
| पुराण | प्राचीन आख्यान, वंश एवं परम्पराओं की जानकारी |
| धर्मेतर साहित्य | राजनीति, प्रशासन, समाज, अर्थव्यवस्था और राजवंशों की जानकारी |
- भारतीय इतिहास के प्रमुख साधनों में धार्मिक ग्रन्थ, ऐतिहासिक ग्रन्थ, विदेशी विवरण और पुरातात्विक सामग्री सम्मिलित हैं।
- धार्मिक साहित्य के तीन प्रमुख वर्ग वैदिक, बौद्ध और जैन साहित्य हैं।
- वेदों की संख्या चार है—ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद।
- वेदों के संकलनकर्ता कृष्ण द्वैपायन माने जाते हैं, जिन्हें वेदव्यास कहा गया।
- आरण्यकों में दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विषयों के साथ कुछ ऐतिहासिक तथ्य भी मिलते हैं।
- उपनिषदों की कुल संख्या 108 बताई गई है तथा “सत्यमेव जयते” मुण्डकोपनिषद से लिया गया है।
- वेदांग छह हैं—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष।
- बौद्ध साहित्य को त्रिपिटक कहा जाता है—सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक।
- जैन साहित्य के प्रमुख ग्रन्थ आगम कहलाते हैं और उनकी संख्या 12 बताई गई है।
- वाल्मीकि कृत रामायण सात काण्डों में विभाजित है और इसका विकसित रूप लगभग 24,000 श्लोकों का है।
- महाभारत के रचयिता महर्षि व्यास हैं और यह 18 पर्वों में विभाजित है।
- पुराणों की संख्या 18 बताई गई है तथा इनके पाँच लक्षण—सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित हैं।
- कौटिल्य का अर्थशास्त्र मौर्यकालीन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन की जानकारी देता है।
- कल्हण की राजतरंगिणी से कश्मीर के राजाओं के इतिहास की जानकारी मिलती है।
- मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत भी ऐतिहासिक जानकारी प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण साहित्यिक ग्रन्थ है।
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विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण
विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण
भारतीय इतिहास के निर्माण में विदेशी यात्रियों और लेखकों के विवरणों का महत्वपूर्ण स्थान है। विभिन्न समयों में भारत आने वाले विदेशी यात्रियों तथा भारत के विषय में लिखने वाले लेखकों ने यहाँ की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और प्रशासनिक स्थितियों का वर्णन किया है।
विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरणों को मुख्य रूप से चार भागों में बाँटा जा सकता है—
- यूनानी-रोमन लेखक
- चीनी लेखक
- तिब्बती लेखक
- मुस्लिम / अरब लेखक
1. यूनानी-रोमन लेखक
यूनानी और रोमन लेखकों के विवरणों से प्राचीन भारत के इतिहास, समाज, प्रशासन, व्यापार और भौगोलिक स्थिति के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
हेरोडोटस एवं टेसियस
हेरोडोटस तथा टेसियस सबसे पुराने यूनानी इतिहासकारों में माने गए हैं। उनकी रचनाओं में कल्पित कथाओं का भी उल्लेख मिलता है।
हेरोडोटस को इतिहास का पिता कहा जाता है। उन्होंने 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में हिस्टोरिका नामक पुस्तक की रचना की, जिसमें भारत और फारस के सम्बन्धों का वर्णन मिलता है।
टेसियस एक डॉक्टर था। उसे यात्रियों से प्राप्त आश्चर्यजनक कथाओं को एकत्र करने का विशेष शौक था।
नियार्कस, ओनासिक्रिटस एवं अरिस्टोबुलस
नियार्कस, ओनासिक्रिटस और अरिस्टोबुलस सिकन्दर के साथ भारत आए थे। इनके विवरण सिकन्दर के भारतीय अभियान से सम्बन्धित जानकारी प्रदान करते हैं।
मेगस्थनीज
मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी शासक सेल्यूकस का राजदूत था। उसने इण्डिका नामक ग्रन्थ की रचना की।
इण्डिका से मौर्यकालीन समाज और प्रशासनिक व्यवस्था के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी
पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी एक अज्ञात यूनानी लेखक की रचना है, जो मिस्र में आकर बस गया था।
उसने लगभग 80 ईस्वी में भारतीय समुद्री तट की यात्रा की। उसके विवरण में भारतीय बन्दरगाहों के साथ-साथ आयात और निर्यात की वस्तुओं का वर्णन मिलता है।
टॉलमी
टॉलमी ने जियोग्राफी की रचना की। इस ग्रन्थ में भारत के भौगोलिक परिचय का वर्णन मिलता है।
प्लिनी
प्लिनी नेचुरल हिस्ट्री का रचनाकार था। इस रचना में भारत के विभिन्न पक्षों का उपयोगी विवरण मिलता है। उसकी रचना पहली शताब्दी की मानी गई है।
स्ट्रैबो
स्ट्रैबो एक प्रसिद्ध यूनानी रचनाकार था। उसने मेगस्थनीज के विवरण को काल्पनिक माना।
2. चीनी लेखक
चीनी यात्रियों के विवरण विशेष रूप से भारत की धार्मिक स्थिति, बौद्ध धर्म, शिक्षा, समाज और संस्कृति को समझने में महत्वपूर्ण हैं।
फाह्यान
फाह्यान 5वीं शताब्दी में चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में भारत आया था।
उसने भारत में बौद्ध धर्म की स्थिति के साथ-साथ तत्कालीन समाज और संस्कृति का वर्णन किया। उसकी रचना फो-क्यो-की कहलाती है।
फाह्यान लगभग 15 वर्षों तक भारत में रहा।
ह्वेनसांग
ह्वेनसांग हर्षवर्धन के समय लगभग 629 ईस्वी में भारत आया था और लगभग 16 वर्षों तक भारत में रहा।
उसके यात्रा-वृत्तान्त से तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के साथ-साथ भारतीय रीति-रिवाज और शिक्षा-पद्धति की जानकारी प्राप्त होती है।
उसका यात्रा-वृत्तान्त सी-यू-की नाम से प्रसिद्ध है।
इत्सिंग
इत्सिंग 7वीं शताब्दी में भारत आया था। उसने विक्रमशिला तथा नालन्दा विश्वविद्यालय में रहकर बौद्ध धर्म का अध्ययन किया।
उसने बौद्ध शिक्षा संस्थाओं तथा भारतीय समाज के विषय में विस्तार से लिखा।
3. तिब्बती लेखक
तिब्बती लेखक लामा तारानाथ के ग्रन्थों से मौर्यकाल के पश्चात के शासकों के विषय में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है।
तिब्बती ग्रन्थों के बिना शक, पार्थियन और कुषाण राजाओं तथा बौद्ध धर्म के इतिहास की पूरी जानकारी प्राप्त करना कठिन माना गया है।
4. मुस्लिम / अरब लेखक
अरब और मुस्लिम लेखकों की रचनाओं से मध्यकालीन भारत की राजनीति, समाज, धर्म, शासन व्यवस्था और दक्षिण भारत की परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त होती है।
सुलेमान
सुलेमान 9वीं शताब्दी में भारत आया था। उसने पाल तथा प्रतिहार शासकों के विषय में लिखा।
अल मसूदी
अल मसूदी 914 ईस्वी से 943 ईस्वी तक भारत में रहा। उसने राष्ट्रकूट शासकों के साम्राज्यवादी विस्तार का वर्णन किया।
अलबरूनी
अलबरूनी का वास्तविक नाम अबू रेहान था। उसने तहकीक-ए-हिन्द की रचना की।
वह महमूद गजनवी का समकालीन था। अलबरूनी ने संस्कृत भाषा का अध्ययन किया तथा अपनी रचना में भारतीय समाज का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया।
अन्य मुस्लिम लेखकों में हसन निजामी, फरिश्ता और निजामुद्दीन आदि के नाम भी महत्वपूर्ण हैं। उनकी रचनाएँ भारतीय राजनीति, धर्म, समाज और शासन-प्रणाली पर प्रकाश डालती हैं।
मार्कोपोलो
मार्कोपोलो वेनिस का प्रसिद्ध यात्री था। वह लगभग 1294–95 ईस्वी में दक्षिण भारत आया।
उसके विवरण से दक्षिण भारत की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक दशाओं का ज्ञान प्राप्त होता है। उसके विवरण में तिथियों की क्रमबद्धता भी मिलती है।
प्रमुख विदेशी यात्रियों एवं लेखकों का सार
| यात्री / लेखक | सम्बन्ध / रचना | प्रमुख ऐतिहासिक जानकारी |
|---|---|---|
| हेरोडोटस | हिस्टोरिका | भारत एवं फारस के सम्बन्ध |
| मेगस्थनीज | इण्डिका | मौर्यकालीन समाज एवं प्रशासन |
| पेरिप्लस का लेखक | पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी | बन्दरगाह, आयात एवं निर्यात |
| टॉलमी | जियोग्राफी | भारत का भौगोलिक परिचय |
| प्लिनी | नेचुरल हिस्ट्री | भारत के विभिन्न पक्षों का विवरण |
| फाह्यान | फो-क्यो-की | बौद्ध धर्म, समाज एवं संस्कृति |
| ह्वेनसांग | सी-यू-की | राजनीतिक दशा, रीति-रिवाज एवं शिक्षा |
| इत्सिंग | भारत में बौद्ध अध्ययन | बौद्ध शिक्षा संस्थाएँ एवं भारतीय समाज |
| लामा तारानाथ | तिब्बती ग्रन्थ | मौर्योत्तर शासक एवं बौद्ध इतिहास |
| सुलेमान | 9वीं शताब्दी | पाल एवं प्रतिहार शासक |
| अल मसूदी | 914–943 ईस्वी | राष्ट्रकूटों का साम्राज्यवादी विस्तार |
| अलबरूनी | तहकीक-ए-हिन्द | भारतीय समाज, राजनीति, धर्म एवं संस्कृति |
| मार्कोपोलो | लगभग 1294–95 ईस्वी | दक्षिण भारत की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक दशाएँ |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत हैं। यूनानी-रोमन लेखकों से प्राचीन भारत के समाज, प्रशासन, व्यापार और भूगोल की जानकारी मिलती है, चीनी यात्रियों से बौद्ध धर्म, शिक्षा और सामाजिक जीवन का ज्ञान प्राप्त होता है तथा तिब्बती और अरब लेखकों की रचनाएँ विभिन्न राजवंशों, राजनीतिक परिस्थितियों और भारतीय समाज को समझने में सहायता करती हैं।
- विदेशी विवरणों को यूनानी-रोमन, चीनी, तिब्बती और मुस्लिम/अरब लेखकों में बाँटा गया है।
- हेरोडोटस ने हिस्टोरिका में भारत और फारस के सम्बन्धों का वर्णन किया।
- नियार्कस, ओनासिक्रिटस और अरिस्टोबुलस सिकन्दर के साथ भारत आए थे।
- मेगस्थनीज सेल्यूकस का राजदूत था और उसने इण्डिका की रचना की।
- पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी से भारतीय बन्दरगाहों और आयात-निर्यात की जानकारी मिलती है।
- टॉलमी की जियोग्राफी से भारत का भौगोलिक विवरण मिलता है।
- फाह्यान चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय भारत आया और उसकी रचना फो-क्यो-की है।
- ह्वेनसांग हर्षवर्धन के समय लगभग 629 ईस्वी में भारत आया और उसका यात्रा-वृत्तान्त सी-यू-की कहलाता है।
- इत्सिंग ने विक्रमशिला और नालन्दा में बौद्ध धर्म का अध्ययन किया।
- लामा तारानाथ के तिब्बती ग्रन्थ मौर्योत्तर इतिहास और बौद्ध धर्म के अध्ययन में उपयोगी हैं।
- सुलेमान ने पाल एवं प्रतिहार शासकों के विषय में लिखा।
- अल मसूदी ने राष्ट्रकूटों के साम्राज्यवादी विस्तार का वर्णन किया।
- अलबरूनी का वास्तविक नाम अबू रेहान था और उसकी प्रसिद्ध रचना तहकीक-ए-हिन्द है।
- मार्कोपोलो के विवरण से दक्षिण भारत की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक स्थितियों की जानकारी मिलती है।
पुरातात्विक साक्ष्य एवं अभिलेख
पुरातात्विक साक्ष्य
प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में पुरातात्विक साक्ष्यों का विशेष महत्व है। ये ऐसे प्रमाण हैं जो घटनाओं और कालक्रम के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।
पुरातात्विक साक्ष्यों में मुख्य रूप से अभिलेख, सिक्के, स्मारक, भवन, मूर्तियाँ तथा चित्रकला आदि सम्मिलित हैं। इनमें से अनेक सामग्री खुदाई और अन्वेषण से प्राप्त होती हैं।
इन साक्ष्यों का अध्ययन करने वाले विद्वानों को पुरातत्वविद् कहा जाता है। पुरातात्विक साक्ष्यों के अध्ययन से प्राचीन समाज, शासन, धर्म, अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण तथ्य प्राप्त होते हैं।
पुरातात्विक साक्ष्यों के प्रमुख प्रकार
- अभिलेख या शिलालेख
- मुद्राएँ
- स्मारक
अभिलेखों का विस्तृत अध्ययन इसी Topic में किया गया है, जबकि मुद्राओं एवं स्मारकों का अध्ययन अगले Topic में किया जाएगा।
अभिलेख या शिलालेख
इतिहास निर्माण में अभिलेखों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। अभिलेख प्रायः स्तम्भों, शिलाओं, ताम्रपत्रों, मुद्राओं, पात्रों, मूर्तियों और गुफाओं आदि की कठोर सतहों पर खुदे हुए मिलते हैं।
प्राचीनतम अभिलेखों में मध्य एशिया के बोगाजकोई नामक स्थान से लगभग 1400 ईसा पूर्व का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है, जिसमें वैदिक देवताओं इन्द्र, मित्र, वरुण और नासत्य आदि का उल्लेख मिलता है।
अभिलेख पत्थर अथवा धातु जैसी अपेक्षाकृत कठोर सतहों पर उत्कीर्ण किए गए लिखित प्रमाण होते हैं। प्राचीन काल से शासक अपने आदेशों और घोषणाओं को इस प्रकार खुदवाते थे, जिससे लोग उन्हें देख, पढ़ और उनका पालन कर सकें।
अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेख शास्त्र कहा जाता है।
अभिलेख और हस्तलेख में अन्तर
किसी विशेष उद्देश्य से पत्थर, धातु अथवा अन्य कठोर और स्थायी पदार्थ पर विज्ञप्ति, प्रचार, स्मृति आदि के लिए उत्कीर्ण लेख अभिलेख कहलाते हैं।
इसके विपरीत कागज, कपड़े या पत्तों जैसी कोमल सामग्री पर स्याही या अन्य रंग से लिखे गए लेख हस्तलेख के अन्तर्गत आते हैं।
ताड़पत्र आदि कठोर पत्तों पर लौहशलाका से खचित लेख अभिलेख और हस्तलेख के बीच की श्रेणी में माने जा सकते हैं। सामान्यतः अभिलेख की मुख्य पहचान उसका उद्देश्य, महत्व तथा स्थायी माध्यम होता है।
अभिलेखों के प्रकार
अध्ययन की सुविधा के लिए अभिलेखों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है—
- देशी अभिलेख
- विदेशी अभिलेख
देशी अभिलेखों को पुनः दो भागों में बाँटा जाता है—
- अशोक के अभिलेख
- अशोक के पश्चात के अभिलेख
अशोक के अभिलेख
मौर्य वंश के सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात युद्ध न करने की घोषणा की और अपने साम्राज्य में शान्ति, समन्वय तथा सुख-शान्ति के लिए अनेक अभिलेख एवं शिलालेख लिखवाए।
अशोक के अभिलेख ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि में लिखवाए गए। इन अभिलेखों से अशोक के व्यक्तित्व तथा तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक दशाओं की जानकारी प्राप्त होती है।
1. वृहत स्तम्भ लेख
अशोक के सात प्रमुख स्तम्भ लेखों का उल्लेख मिलता है—
प्रथम स्तम्भ लेख
यह हल्के गुलाबी रंग के बलुआ पत्थर से निर्मित था और सहारनपुर जिले के टोपरा नामक गाँव में स्थित था।
द्वितीय स्तम्भ लेख
यह स्तम्भ उत्तर प्रदेश के मेरठ नगर में स्थित था। शम्स-ए-सिराज के अनुसार इस स्तम्भ को फिरोजशाह तुगलक द्वारा मेहरौली, दिल्ली लाया गया था।
तृतीय स्तम्भ लेख
यह बिहार के चम्पारण जिले के लौरिया अरेराज में स्थित है।
चतुर्थ स्तम्भ लेख
यह बिहार के चम्पारण जिले के लौरिया नन्दनगढ़ में स्थित है। इसे अशोक के शासनकाल के 26वें वर्ष में उत्कीर्ण कराया गया था। इसमें रज्जुक द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन मिलता है।
पंचम स्तम्भ लेख
इस स्तम्भ लेख की खोज कलाइल द्वारा की गई थी। यह बिहार के चम्पारण जिले में बेतिया से लगभग 32 मील दूर रामपुरवा से प्राप्त हुआ। इस स्तम्भ पर सिंह शीर्ष था।
षष्ठ स्तम्भ लेख
यह स्तम्भ वर्तमान प्रयाग क्षेत्र में स्थित है। पहले इसे भीमसेन की गदा के नाम से जाना जाता था।
कुछ विद्वानों के अनुसार यह पहले कौशाम्बी में था। इस स्तम्भ पर अशोक की रानी से सम्बन्धित अभिलेख भी मिलता है, इसलिए इसे रानी का अभिलेख भी कहा जाता है।
सप्तम स्तम्भ लेख
इस स्तम्भ लेख में धम्म के प्रचार-प्रसार के लिए किए गए कार्यों का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह स्तम्भ लेख मेरठ से सम्बन्धित बताया गया है और इसे धर्म श्रवण भी कहा गया है।
2. लघु स्तम्भ लेख
अशोक की राजकीय घोषणाएँ जिन स्तम्भों पर उत्कीर्ण की गईं, उन्हें सामान्यतः लघु स्तम्भ लेख कहा जाता है। प्रमुख लघु स्तम्भ लेख निम्न हैं—
निगालीसागर स्तम्भ लेख
यह नेपाल की तराई में निगलीवा से लगभग एक मील दक्षिण की ओर निगाली के तट पर स्थित है। वर्तमान में इसे भीमसेन की निगाली कहा जाता है।
इसमें अशोक के राज्यकाल के 15वें वर्ष में कनकमुनि के स्तूप के दर्शन से सम्बन्धित विवरण मिलता है।
सारनाथ स्तम्भ लेख
सारनाथ वाराणसी से लगभग चार मील उत्तर की ओर स्थित प्रसिद्ध बौद्ध स्थल है। यहाँ अशोक का भग्न स्तम्भ और सिंह शीर्ष प्राप्त हुआ है। इसका व्याख्यान ऑर्टेल ने किया था।
साँची स्तम्भ लेख
यह मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध बौद्ध स्थल साँची से लगभग पाँच मील दूर स्थित था। यहाँ से अशोक का एक स्तम्भ खण्डित अवस्था में प्राप्त हुआ।
इसी स्थान पर अशोक ने प्रसिद्ध बौद्ध स्तूप का निर्माण करवाया था, जिसे साँची का स्तूप कहा जाता है।
रुम्मिनदेई स्तम्भ लेख
यह नेपाल की तराई में स्थित है। इसकी खोज फ्यूहरर द्वारा की गई थी।
इस अभिलेख में अशोक की लुम्बिनी यात्रा का वर्णन मिलता है। अशोक ने लुम्बिनी को बुद्ध का जन्मस्थान घोषित किया तथा वहाँ एक पाषाण स्तम्भ स्थापित कराया।
इस यात्रा के समय लुम्बिनी ग्राम से लिए जाने वाले कर को घटाकर कुल उत्पादन का 1/8 भाग करने का आदेश दिया गया।
कौशाम्बी अभिलेख
यह इलाहाबाद के समीप उत्तर प्रदेश में स्थित है। इसमें अशोक की रानी द्वारा दिए गए दान का उल्लेख मिलता है। इसे रानी का अभिलेख भी कहा जाता है।
गुहा लेख
अशोक के गुहा लेख दक्षिण बिहार के गया जिले में स्थित बराबर नामक पहाड़ी की तीन गुफाओं पर उत्कीर्ण मिले हैं।
इनका समय लगभग 257 ईसा पूर्व से 250 ईसा पूर्व माना गया है। इनमें अशोक द्वारा अपने राज्याभिषेक के पश्चात 12वें वर्ष में आजीवक सम्प्रदाय के साधुओं के रहने के लिए गुफाएँ दान करने और धार्मिक सहिष्णुता का वर्णन मिलता है।
इन अभिलेखों को सर्वप्रथम कीटो महोदय ने स्तम्भ से ऊपर का भाग मुद्रित किया और बाद में बनार तथा ब्यूहलर ने सम्पादित किया।
अशोक के पश्चात के अभिलेख
अशोक के पश्चात प्राप्त अभिलेख मुख्य रूप से दो प्रकार के माने गए हैं—
- राजकीय अभिलेख
- गैर-राजकीय अभिलेख
राजकीय अभिलेखों में प्रशस्तियाँ तथा भवनों से सम्बन्धित लेख प्रमुख हैं। गैर-राजकीय अभिलेख तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक गतिविधियों की जानकारी प्रदान करते हैं।
गैर-राजकीय अभिलेखों के प्रमुख प्रकार
- व्यापारिक तथा व्यावहारिक अभिलेख
- आभिचारिक अभिलेख
- उपदेशात्मक अथवा नैतिक अभिलेख
- समर्पण तथा चढ़ावा सम्बन्धी अभिलेख
- दान सम्बन्धी अभिलेख
- प्रशासकीय अभिलेख
- प्रशस्तिपरक अभिलेख
- तिथिक्रम और संवत् सम्बन्धी अभिलेख
- ऐतिहासिक अभिलेख
- स्मारक
- मूर्तियाँ तथा चित्रकला
विदेशी अभिलेख
विदेशी अभिलेख भी भारतीय इतिहास की जानकारी के महत्वपूर्ण साधन हैं।
एशिया माइनर के बोगाजकोई अभिलेख में वैदिक कालीन देवताओं का वर्णन मिलता है और इससे आर्यों से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त होती है।
इसके अतिरिक्त ईरान के पारसी-पोलिस तथा नक्श-ए-रुस्तम अभिलेखों से भारत और ईरान के सम्बन्धों के विषय में जानकारी मिलती है।
अभिलेखों का ऐतिहासिक महत्व
- अभिलेखों से शासकों के आदेशों एवं घोषणाओं की जानकारी मिलती है।
- इनसे तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक दशाओं का अध्ययन किया जा सकता है।
- अभिलेख घटनाओं के कालक्रम और शासकों के कार्यों के निर्धारण में सहायक होते हैं।
- अशोक के अभिलेख उसके धम्म, प्रशासन और राजकीय नीतियों को समझने में उपयोगी हैं।
- विदेशी अभिलेख भारत के अन्य देशों के साथ सम्बन्धों की जानकारी देते हैं।
प्रमुख अभिलेख एक नजर में
| अभिलेख | स्थान / विशेषता |
|---|---|
| टोपरा स्तम्भ | सहारनपुर के टोपरा गाँव से सम्बन्धित |
| मेरठ स्तम्भ | फिरोजशाह तुगलक द्वारा दिल्ली लाए जाने का उल्लेख |
| लौरिया अरेराज | चम्पारण, बिहार |
| लौरिया नन्दनगढ़ | अशोक के 26वें शासन वर्ष तथा रज्जुकों का उल्लेख |
| रामपुरवा | सिंह शीर्ष वाला स्तम्भ |
| निगालीसागर | कनकमुनि स्तूप के दर्शन से सम्बन्धित |
| सारनाथ | भग्न स्तम्भ एवं प्रसिद्ध सिंह शीर्ष |
| साँची | अशोक से सम्बन्धित बौद्ध स्तूप एवं स्तम्भ |
| रुम्मिनदेई | लुम्बिनी यात्रा एवं बुद्ध जन्मस्थान का उल्लेख |
| कौशाम्बी | रानी द्वारा दिए गए दान का उल्लेख |
| बराबर गुफा लेख | आजीवक साधुओं को गुफा दान एवं धार्मिक सहिष्णुता |
- पुरातात्विक साक्ष्यों में अभिलेख, मुद्राएँ और स्मारक प्रमुख हैं।
- अभिलेख कठोर एवं स्थायी सतहों पर उत्कीर्ण लिखित प्रमाण होते हैं।
- अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेख शास्त्र कहा जाता है।
- बोगाजकोई से लगभग 1400 ईसा पूर्व का अभिलेख मिला, जिसमें इन्द्र, मित्र, वरुण और नासत्य का उल्लेख है।
- अभिलेखों को देशी और विदेशी दो मुख्य भागों में बाँटा जाता है।
- देशी अभिलेख अशोक के अभिलेख और अशोक के पश्चात के अभिलेखों में विभाजित हैं।
- अशोक के अभिलेखों से तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक दशाओं का ज्ञान मिलता है।
- अशोक के प्रमुख स्तम्भ लेखों में टोपरा, मेरठ, लौरिया अरेराज, लौरिया नन्दनगढ़, रामपुरवा आदि महत्वपूर्ण हैं।
- निगालीसागर, सारनाथ, साँची, रुम्मिनदेई और कौशाम्बी प्रमुख लघु स्तम्भ लेख हैं।
- बराबर पहाड़ी के गुहा लेख आजीवक साधुओं को गुफा दान एवं धार्मिक सहिष्णुता की जानकारी देते हैं।
- अशोक के पश्चात अभिलेख राजकीय और गैर-राजकीय दो प्रकार के माने गए हैं।
- बोगाजकोई, पारसी-पोलिस और नक्श-ए-रुस्तम जैसे विदेशी अभिलेख भारत के बाहरी सम्बन्धों की जानकारी देते हैं।
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मुद्राएँ एवं स्मारक: इतिहास के पुरातात्विक स्रोत
मुद्राएँ: इतिहास का महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्रोत
प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी प्राप्त करने में मुद्राओं का महत्वपूर्ण स्थान है। सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहा जाता है।
प्राचीन काल के सिक्के सोना, चाँदी, ताँबा, काँसा, सीसा और पोटिन जैसी विभिन्न धातुओं से बनाए जाते थे। पकाई हुई मिट्टी से बने सिक्कों के साँचे भी प्राप्त हुए हैं, जिनमें से अधिकांश कुषाण काल से सम्बन्धित बताए गए हैं।
प्राचीन भारतीय सिक्कों पर अनेक प्रकार के चिह्न उत्कीर्ण होते थे। ऐसे सिक्कों को पंचमार्क अथवा आहत सिक्के कहा गया है। आहत सिक्के ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी के माने गए हैं।
प्राचीन मुद्राओं से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य
- सर्वप्रथम हिन्द-यवन अथवा यूनानी शासकों ने स्वर्ण मुद्राएँ जारी कीं।
- यूनानी शासकों ने सिक्कों पर लेख अंकित करने की परम्परा प्रारम्भ की।
- सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण मुद्राएँ कुषाणों ने जारी कीं।
- सबसे अधिक स्वर्ण मुद्राएँ गुप्त शासकों ने जारी कीं।
- सातवाहनों ने शीशे की मुद्राएँ जारी की थीं।
- समुद्रगुप्त के एक सिक्के में उसे वीणा बजाते हुए दिखाया गया है।
- कुछ गुप्तकालीन सिक्कों पर “अश्वमेध पराक्रम” शब्द उत्कीर्ण मिलता है।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों पर विजय के उपलक्ष्य में चाँदी के सिक्के चलाए।
- चाँदी के सिक्के मुख्यतः पश्चिमी भारत में प्रचलित थे।
मुद्राओं का वर्गीकरण
ऐतिहासिक अध्ययन की दृष्टि से प्राचीन मुद्राओं को मुख्य रूप से तीन वर्गों में समझा जा सकता है—
- यूनानियों की मुद्राएँ
- सिथियन तथा पार्थियन मुद्राएँ
- भारतीय शासकों की मुद्राएँ
1. यूनानियों की मुद्राएँ
भारत पर यूनानियों के आक्रमण के पश्चात उन्होंने अपने अधिकार वाले क्षेत्रों में मुद्राएँ जारी कीं। इन सिक्कों पर यूनानी शासकों के नाम अंकित मिलते हैं।
इन मुद्राओं का कलात्मक दृष्टि से भी विशेष महत्व है। लगभग 30 यूनानी सम्राटों एवं सम्राज्ञियों के विषय में जानकारी इन सिक्कों के माध्यम से प्राप्त होती है।
2. सिथियन तथा पार्थियन मुद्राएँ
मौर्य साम्राज्य के पश्चात भारत के जिन क्षेत्रों पर विदेशी शक्तियों ने आक्रमण और शासन किया, उनके इतिहास की जानकारी सिथियन तथा पार्थियन मुद्राओं से प्राप्त होती है।
इन सिक्कों पर मुख्य रूप से यूनानी, शक और पार्थियन शासकों के नाम मिलते हैं। कलात्मक दृष्टि से ये सिक्के बहुत उच्चकोटि के नहीं माने गए, किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से इनका विशेष महत्व है।
3. भारतीय शासकों की मुद्राएँ
भारतीय शासकों ने भी अपने शासनकाल में अनेक प्रकार की मुद्राएँ जारी कीं। मौर्य, शुंग, सातवाहन, मालव, यौधेय, पांचाल, गुप्त और वर्धन काल की मुद्राएँ ऐतिहासिक अध्ययन के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
विशेषकर छोटे राजवंशों और स्थानीय शासकों के इतिहास की जानकारी कई बार सिक्कों के माध्यम से ही प्राप्त होती है।
इतिहास लेखन में मुद्राओं का महत्व
- सिक्कों से शासकों और राजवंशों के नाम ज्ञात होते हैं।
- इनसे किसी शासक के शासन-क्षेत्र और राजनीतिक प्रभाव के विषय में जानकारी मिलती है।
- धातु और सिक्कों की संख्या से तत्कालीन आर्थिक दशा का अनुमान लगाया जा सकता है।
- सिक्कों पर अंकित चिह्न, लेख और चित्र तत्कालीन धर्म, कला एवं संस्कृति की जानकारी देते हैं।
- जिन छोटे राजवंशों के लिखित विवरण कम उपलब्ध हैं, उनके इतिहास को समझने में सिक्के विशेष रूप से सहायक होते हैं।
स्मारक: इतिहास का पुरातात्विक स्रोत
प्राचीन भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोतों में स्मारकों का भी विशेष स्थान है। प्राचीन भवनों, मंदिरों, मूर्तियों, चित्रों तथा उत्खनन से प्राप्त अवशेषों के अध्ययन से तत्कालीन कला, संस्कृति, धर्म और समाज के विषय में जानकारी मिलती है।
स्मारकों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है—
- देशी स्मारक
- विदेशी स्मारक
1. देशी स्मारक
भारत में उत्खनन और पुरातात्विक खोजों से विभिन्न कालों के अनेक महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए हैं। ये भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो: यहाँ की खुदाई से प्राप्त अवशेष प्राचीन सभ्यता के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।
- तक्षशिला: यहाँ की खुदाई से कुषाणकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- देवगढ़ का मंदिर: झाँसी क्षेत्र से गुप्तकालीन देवगढ़ मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- भीतरगाँव का मंदिर: कानपुर जिले के भीतरगाँव से ईंटों से निर्मित प्राचीन मंदिर का प्रमाण मिलता है।
- अजन्ता की गुफाएँ: अजन्ता की गुफाओं की चित्रकारी प्राचीन भारतीय कला के अध्ययन में महत्वपूर्ण है।
- नालन्दा: यहाँ से ताँबे की बुद्ध प्रतिमा प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है।
2. विदेशी स्मारक
भारत के बाहर जावा, कम्बोडिया और मलाया जैसे क्षेत्रों में प्राप्त मंदिरों एवं मूर्तियों से यह ज्ञात होता है कि प्राचीन भारतीय धर्म और संस्कृति का प्रभाव भारत की सीमाओं से बाहर भी फैला हुआ था।
जावा
जावा में स्थित मंदिर और मूर्तियाँ भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार की जानकारी प्रदान करते हैं। वहाँ के निवासियों में हिन्दू धार्मिक परम्पराओं का प्रभाव दिखाई देता है।
कम्बोडिया
कम्बोडिया में भगवान विष्णु का मंदिर प्राचीन कला और संस्कृति का उत्कृष्ट उदाहरण बताया गया है। इससे भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव की जानकारी प्राप्त होती है।
इण्डोनेशिया
इण्डोनेशिया के अनेक स्थानों के नाम आज भी हिन्दू परम्पराओं के अनुसार पाए जाते हैं। वहाँ के निवासियों द्वारा रामायण को आदर्श मानने का उल्लेख मिलता है।
मलाया
मलाया में प्राप्त एक देवालय से शिव, पार्वती, गणेश और नन्दी की मूर्तियाँ मिली हैं। ये मूर्तियाँ प्राचीन भारतीय धर्म एवं संस्कृति के विदेशी प्रसार का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।
देशी एवं विदेशी स्मारकों का तुलनात्मक सार
| प्रकार | प्रमुख उदाहरण | ऐतिहासिक महत्व |
|---|---|---|
| देशी स्मारक | हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, तक्षशिला, देवगढ़, भीतरगाँव, अजन्ता, नालन्दा | भारत की प्राचीन सभ्यता, कला, स्थापत्य और संस्कृति की जानकारी |
| विदेशी स्मारक | जावा, कम्बोडिया, इण्डोनेशिया और मलाया के मंदिर एवं मूर्तियाँ | भारत के बाहर भारतीय धर्म एवं संस्कृति के प्रसार की जानकारी |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
मुद्राएँ और स्मारक प्राचीन इतिहास के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्रोत हैं। मुद्राओं से शासकों, राजवंशों, आर्थिक दशा और कला-संस्कृति की जानकारी प्राप्त होती है, जबकि स्मारक प्राचीन सभ्यता, स्थापत्य, धर्म और सांस्कृतिक जीवन का परिचय देते हैं। विदेशों में प्राप्त भारतीय प्रभाव वाले मंदिर और मूर्तियाँ भारतीय संस्कृति के व्यापक प्रसार को भी स्पष्ट करती हैं।
- सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहा जाता है।
- प्राचीन सिक्के सोना, चाँदी, ताँबा, काँसा, सीसा और पोटिन आदि से बनाए जाते थे।
- चिह्नों से युक्त प्राचीन सिक्के पंचमार्क अथवा आहत सिक्के कहलाते हैं।
- हिन्द-यवनों ने स्वर्ण मुद्राएँ जारी कीं और सिक्कों पर लेख लिखने की परम्परा आरम्भ की।
- सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण मुद्राएँ कुषाणों और सबसे अधिक स्वर्ण मुद्राएँ गुप्तों ने जारी कीं।
- सातवाहनों ने शीशे की मुद्राएँ जारी कीं।
- समुद्रगुप्त के एक सिक्के में उसे वीणा बजाते हुए दिखाया गया है।
- मुद्राओं के तीन प्रमुख वर्ग—यूनानी, सिथियन-पार्थियन तथा भारतीय शासकों की मुद्राएँ हैं।
- लगभग 30 यूनानी सम्राटों एवं सम्राज्ञियों की जानकारी सिक्कों से प्राप्त होती है।
- मौर्य, शुंग, सातवाहन, मालव, यौधेय, पांचाल, गुप्त एवं वर्धन शासकों की मुद्राएँ महत्वपूर्ण हैं।
- स्मारक दो प्रकार के हैं—देशी एवं विदेशी।
- हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, तक्षशिला, देवगढ़, भीतरगाँव, अजन्ता और नालन्दा प्रमुख देशी उदाहरण हैं।
- जावा, कम्बोडिया, इण्डोनेशिया और मलाया में प्राप्त स्मारक भारतीय संस्कृति के विदेशी प्रसार का प्रमाण देते हैं।
सापेक्ष काल निर्धारण की विधियाँ
काल निर्धारण का परिचय
प्रागैतिहासिक काल की अनेक घटनाओं और उनसे सम्बन्धित अवशेषों के विषय में निश्चित तिथि ज्ञात करना आसान नहीं होता। अनेक प्राचीन वस्तुएँ, जीवाश्म तथा अन्य अवशेष भूमि, समुद्र या बर्फ में सुरक्षित मिलते हैं।
पुरातत्वविद् इन अवशेषों की आयु या काल का पता लगाने के लिए विभिन्न काल निर्धारण विधियों का प्रयोग करते हैं। काल अथवा आयु निर्धारण की विधियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं—
- सापेक्ष काल निर्धारण
- निरपेक्ष काल निर्धारण
सापेक्ष काल निर्धारण का अर्थ
वे विधियाँ जिनके द्वारा किसी घटना, वस्तु या पुरावशेष की निश्चित आयु वर्षों में न बताकर केवल उसका तुलनात्मक काल निर्धारित किया जाता है, सापेक्ष काल निर्धारण की विधियाँ कहलाती हैं।
इस विधि से यह ज्ञात किया जा सकता है कि कोई वस्तु दूसरी वस्तु की अपेक्षा पुरानी है या नई, लेकिन उसकी निश्चित आयु कितने वर्ष है, यह नहीं बताया जाता।
सापेक्ष काल निर्धारण में किसी पुरावशेष अथवा घटना को उससे सम्बन्धित अन्य पुरावशेषों या घटनाओं के साथ जोड़कर उनका कालक्रम निर्धारित किया जाता है।
सापेक्ष काल निर्धारण की प्रमुख विधियाँ
- स्तरीकरण विधि
- प्रारूप विधि
- पराग परीक्षण विधि
- फौना-फ्लोरा विधि
- जीवाश्म विधि
- फ्लोरीन विधि
1. स्तरीकरण विधि
स्तरीकरण काल निर्धारण की सरलतम विधियों में से एक है। इसमें भूमि की विभिन्न परतों के आधार पर पुरावशेषों की सापेक्ष आयु निर्धारित की जाती है।
सामान्यतः सबसे नीचे की परत को सबसे पुरानी और उसके ऊपर की परतों को क्रमशः नई माना जाता है। इस प्रकार किसी वस्तु के प्राप्त होने वाली परत के आधार पर उसका तुलनात्मक काल ज्ञात किया जा सकता है।
स्तरीकरण विधि में इन्डेक्स फॉसिल अथवा मार्कर फॉसिल का भी उपयोग किया जाता है। ये ऐसे जीवाश्म होते हैं जो प्राकृतिक अवस्था में किसी निश्चित स्तर से प्राप्त होते हैं।
इन जीवाश्मों से यह अनुमान लगाया जाता है कि जिस समय वह परत बनी थी, उस समय वे जीव वहाँ विद्यमान थे।
2. प्रारूप विधि
प्रारूप विधि में किसी पुरावशेष की आकार-संरचना और उसके निर्माण में प्रयुक्त विशेष शैली का अध्ययन किया जाता है।
उदाहरण के लिए यदि एक ही स्थान से अलग-अलग प्रकार के पत्थरों से बने औजार प्राप्त होते हैं, तो उनकी आकृति, निर्माण शैली और अन्य विशेषताओं की तुलना करके उनमें समानता या असमानता का पता लगाया जाता है।
इस विधि का प्रयोग सीमित रूप से किया जाता है। पत्थर के औजार, मिट्टी के बर्तन, मूर्तियाँ तथा अन्य पुरावशेष इसके अध्ययन में उपयोगी होते हैं।
इस विधि द्वारा वस्तुओं को निश्चित वर्ष देने के स्थान पर उन्हें प्राचीन से नवीन क्रम में व्यवस्थित किया जा सकता है।
3. पराग परीक्षण विधि
पराग परीक्षण विधि में वनस्पतियों के पराग कणों के आधार पर काल निर्धारण किया जाता है। इस विधि की खोज लेनर वॉन पोस्ट ने की थी।
पौधों द्वारा पराग कणों का बिखराव एक सामान्य एवं आवश्यक प्रक्रिया है। पराग कण बहुत छोटे, हल्के, चिपचिपे तथा वनस्पति-विशेष से सम्बन्धित होते हैं।
पुरातात्विक स्थलों की मिट्टी से प्राप्त पराग कणों के आधार पर उस समय की वनस्पतियों और पर्यावरण के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
4. फौना-फ्लोरा विधि
इस विधि में वनस्पतियों और प्राणियों में समय के साथ होने वाले विकासात्मक परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है।
पुराने अवशेषों और जीवाश्म प्रमाणों की तुलना वर्तमान में पाए जाने वाले जीवों तथा वनस्पतियों से की जाती है। इस तुलना के आधार पर पुरावशेषों के सापेक्ष काल का अनुमान लगाया जाता है।
5. जीवाश्म विधि
जीवाश्म विधि में विशिष्ट विलुप्त जीवों के जीवाश्मों के आधार पर किसी स्थान अथवा स्तर की प्राचीनता का अनुमान लगाया जाता है।
जहाँ विशेष विलुप्त जीवों के जीवाश्म प्राप्त होते हैं, ऐसे स्थान सामान्यतः अधिक पुराने माने जाते हैं। जिन स्थानों पर ऐसे जीवाश्म नहीं मिलते, उन्हें सामान्यतः अपेक्षाकृत नवीन माना जाता है।
6. फ्लोरीन विधि
फ्लोरीन विधि मुख्य रूप से हड्डी वाले प्राणियों अर्थात कशेरुकी जीवों के अवशेषों के लिए उपयोगी है।
इस विधि का आधार यह है कि एक ही स्थान पर प्राप्त और लगभग एक ही समय के अस्थि-अवशेषों में फ्लोरीन की मात्रा लगभग समान होती है।
इसलिए अलग-अलग अस्थियों में फ्लोरीन की मात्रा की तुलना करके यह पता लगाया जा सकता है कि वे जीव एक ही परत अथवा एक ही काल के हैं या नहीं।
सापेक्ष काल निर्धारण की विधियाँ एक नजर में
| विधि | मुख्य आधार | क्या पता चलता है? |
|---|---|---|
| स्तरीकरण | भूमि की परतें | कौन-सी वस्तु अपेक्षाकृत पुरानी या नई है |
| प्रारूप | आकार, संरचना एवं निर्माण शैली | वस्तुओं का तुलनात्मक कालक्रम |
| पराग परीक्षण | वनस्पतियों के पराग कण | तत्कालीन वनस्पति एवं पर्यावरण |
| फौना-फ्लोरा | जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों के परिवर्तन | पुराने और वर्तमान जीवों की तुलना से सापेक्ष काल |
| जीवाश्म | विलुप्त जीवों के जीवाश्म | स्थान अथवा स्तर की प्राचीनता |
| फ्लोरीन | अस्थियों में फ्लोरीन की मात्रा | अस्थियाँ एक ही काल की हैं या नहीं |
सापेक्ष काल निर्धारण की मुख्य विशेषता
सापेक्ष काल निर्धारण किसी वस्तु की निश्चित आयु वर्षों में नहीं बताता। इसका प्रमुख उद्देश्य विभिन्न पुरावशेषों को उनके तुलनात्मक काल के अनुसार पुराना या नया निर्धारित करना और उनका क्रम स्थापित करना है।
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
सापेक्ष काल निर्धारण पुरातात्विक वस्तुओं और घटनाओं की निश्चित आयु बताने के बजाय उनकी आपसी प्राचीनता निर्धारित करता है। स्तरीकरण, प्रारूप, पराग परीक्षण, फौना-फ्लोरा, जीवाश्म और फ्लोरीन विधियों के माध्यम से विभिन्न पुरावशेषों को पुराने से नए क्रम में व्यवस्थित किया जा सकता है।
- काल निर्धारण की दो प्रमुख विधियाँ सापेक्ष और निरपेक्ष हैं।
- सापेक्ष काल निर्धारण किसी वस्तु की निश्चित आयु वर्षों में नहीं बताता, बल्कि उसकी तुलनात्मक आयु बताता है।
- स्तरीकरण में सामान्यतः सबसे नीचे की परत सबसे पुरानी मानी जाती है।
- स्तरीकरण में इन्डेक्स फॉसिल अथवा मार्कर फॉसिल का भी उपयोग किया जाता है।
- प्रारूप विधि में वस्तु की आकृति, संरचना और निर्माण शैली का अध्ययन होता है।
- पराग परीक्षण विधि की खोज लेनर वॉन पोस्ट ने की थी।
- पराग कणों से तत्कालीन वनस्पतियों और पर्यावरण के विषय में जानकारी मिलती है।
- फौना-फ्लोरा विधि में प्राचीन जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की वर्तमान जीवों से तुलना की जाती है।
- जीवाश्म विधि विलुप्त जीवों के जीवाश्मों के आधार पर प्राचीनता का अनुमान लगाती है।
- फ्लोरीन विधि हड्डी वाले प्राणियों के अवशेषों के लिए उपयोगी है।
- एक ही समय और स्थान की अस्थियों में फ्लोरीन की मात्रा लगभग समान होने के सिद्धान्त पर फ्लोरीन विधि आधारित है।
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निरपेक्ष काल निर्धारण की विधियाँ
निरपेक्ष काल निर्धारण का अर्थ
वे विधियाँ जिनके द्वारा किसी पुरावशेष, जीवाश्म अथवा चट्टान की आयु निश्चित वर्षों में ज्ञात की जाती है, निरपेक्ष काल निर्धारण की विधियाँ कहलाती हैं।
इन विधियों में मुख्य रूप से रेडियोएक्टिव तत्वों का उपयोग किया जाता है। रेडियोएक्टिव तत्व समय के साथ निश्चित दर से विखण्डित होते रहते हैं। इसी गुण के आधार पर किसी वस्तु या चट्टान की आयु का अनुमान लगाया जाता है।
रेडियोएक्टिव तत्व एवं रेडियो एक्टिविटी
1896 ईस्वी में फ्रांसीसी भौतिकशास्त्री एंटोनी बेकरेल ने कुछ प्राकृतिक अयस्कों से अदृश्य किरणें निकलने का पता लगाया।
अदृश्य किरणों के स्वतः उत्सर्जन की इस प्रक्रिया को रेडियो एक्टिविटी कहा गया और जिन पदार्थों से ऐसी किरणें निकलती हैं, उन्हें रेडियोएक्टिव पदार्थ कहा जाता है।
रेडियोएक्टिव तत्व लगातार विखण्डित होते रहते हैं और समय के साथ उनकी मात्रा कम होती जाती है। यह विखण्डन एक निश्चित दर से होता है, इसलिए इन तत्वों का उपयोग काल निर्धारण में किया जाता है।
अर्द्धजीवनकाल
किसी रेडियोएक्टिव तत्व के परमाणुओं की संख्या जितने समय में अपनी प्रारम्भिक संख्या की आधी रह जाती है, उस समय को उस तत्व का अर्द्धजीवनकाल कहा जाता है।
अर्थात यदि किसी रेडियोएक्टिव तत्व की प्रारम्भिक मात्रा 100 प्रतिशत है, तो एक अर्द्धजीवनकाल के बाद वह 50 प्रतिशत रह जाएगी। अगले अर्द्धजीवनकाल के बाद शेष मात्रा फिर आधी होकर 25 प्रतिशत रह जाएगी।
प्रमुख रेडियोएक्टिव तत्वों के अर्द्धजीवनकाल
| रेडियोएक्टिव तत्व | अर्द्धजीवनकाल |
|---|---|
| पोटैशियम-40 | 1.25 अरब साल |
| रूबीडियम-87 | 48.8 अरब साल |
| थोरियम-232 | 14.0 अरब साल |
| यूरेनियम-235 | 70.4 करोड़ साल |
| यूरेनियम-238 | 4.47 अरब साल |
| कार्बन-14 | 5730 साल |
जिन रेडियोएक्टिव तत्वों का अर्द्धजीवनकाल बहुत अधिक होता है, वे पृथ्वी पर बहुत कम मात्रा में विखण्डित हुए हैं और अत्यन्त प्राचीन पदार्थों के काल निर्धारण में उपयोगी होते हैं।
निरपेक्ष काल निर्धारण की प्रमुख विधियाँ
- कार्बन-14 विधि
- पोटैशियम-आर्गन विधि
- रूबीडियम-स्ट्रॉन्शियम विधि
- लेड विधि
1. कार्बन-14 विधि
भूगर्भशास्त्री, मौसम विज्ञानी, मानवशास्त्री तथा पुरातत्ववेत्ता अनेक घटनाओं और जैविक अवशेषों की आयु ज्ञात करने के लिए रेडियोकार्बन अथवा कार्बन-14 विधि का उपयोग करते हैं।
सामान्य कार्बन को कार्बन-12 (C-12) कहा जाता है। इसके प्रत्येक परमाणु के केन्द्रक में छह प्रोटॉन और छह न्यूट्रॉन होते हैं।
कार्बन का एक अन्य समस्थानिक कार्बन-14 (C-14) है। इसमें सामान्य कार्बन की तुलना में दो अतिरिक्त न्यूट्रॉन होते हैं और यह रेडियोएक्टिव होता है।
कार्बन-14 का निर्माण
कार्बन-14 का निर्माण वायुमण्डलीय नाइट्रोजन पर ब्रह्माण्डीय किरणों की बौछार के कारण होता है।
निर्मित कार्बन-14 वायुमण्डल की ऑक्सीजन के साथ मिलकर कार्बन डाइऑक्साइड बनाता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में पौधे वायुमण्डल की कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करते हैं और भोजन के माध्यम से कार्बनिक यौगिक जीवों में पहुँच जाते हैं।
जीवित जीवों में C-14 और C-12
वायुमण्डल में C-14 और C-12 का एक निश्चित अनुपात पाया जाता है। यही अनुपात जीवित प्राणियों और पौधों में भी बना रहता है।
जब तक कोई जीव जीवित रहता है, तब तक उसके शरीर में कार्बन-14 का आदान-प्रदान होता रहता है।
मृत्यु के बाद परिवर्तन
जीव की मृत्यु के बाद बाहर से कार्बन-14 का प्रवेश बन्द हो जाता है। उसके शरीर में पहले से उपस्थित कार्बन-14 धीरे-धीरे विखण्डित होने लगता है।
फलस्वरूप कार्बन-14 और कार्बन-12 का अनुपात समय के साथ घटता जाता है। किसी जीवाश्म में कार्बन-14 की मात्रा जितनी कम होगी, वह उतना ही अधिक पुराना माना जाएगा।
कार्बन-14 का अर्द्धजीवनकाल 5730 वर्ष है। प्रत्येक अर्द्धजीवनकाल के बाद इसकी शेष मात्रा आधी होती जाती है।
लगभग 50,000 वर्ष पुराने जीवाश्मों में कार्बन-14 की मात्रा इतनी कम हो जाती है कि इस विधि का प्रयोग उपयुक्त नहीं रह जाता।
2. पोटैशियम-आर्गन विधि
जब 50,000 वर्ष से अधिक पुराने जीवाश्मों या चट्टानों की आयु ज्ञात करनी हो, तब कार्बन-14 विधि अनुपयोगी हो जाती है। ऐसी स्थिति में पोटैशियम-आर्गन विधि का उपयोग किया जाता है।
इस विधि की खोज सन् 1948 में हुई थी।
पोटैशियम सामान्यतः चट्टान बनाने वाले खनिजों में पाया जाता है। सामान्य पोटैशियम के साथ रेडियोएक्टिव पोटैशियम-40 (K-40) भी पाया जाता है।
विखण्डन के दौरान पोटैशियम-40 का लगभग 89 प्रतिशत भाग कैल्शियम-40 में तथा शेष लगभग 11 प्रतिशत भाग आर्गन-40 में परिवर्तित हो जाता है।
आर्गन-40 एक अक्रिय गैस है। पोटैशियम-आर्गन विधि में चट्टान में संचित आर्गन गैस की मात्रा मापी जाती है।
चट्टानों की आयु कैसे ज्ञात होती है?
यह विधि विशेष रूप से उन चट्टानों की आयु ज्ञात करने में उपयोगी है जो ज्वालामुखी से निकले लावे के ठण्डा होने से बनी हैं।
जब कोई नई चट्टान बनती है, तब उसमें आर्गन की मात्रा लगभग शून्य होती है। समय बीतने के साथ पोटैशियम-40 के विखण्डन से आर्गन-40 बनता और चट्टान के भीतर एकत्र होता जाता है।
अतः चट्टान में उपस्थित आर्गन-40 की मात्रा के आधार पर उसकी आयु का अनुमान लगाया जाता है।
3. रूबीडियम-स्ट्रॉन्शियम विधि
रूबीडियम-87 प्रकृति में पाया जाने वाला एक रेडियोएक्टिव तत्व है। विखण्डन के बाद यह स्ट्रॉन्शियम का निर्माण करता है।
इसका अर्द्धजीवनकाल लगभग 49 अरब वर्ष है। इतने लम्बे अर्द्धजीवनकाल के कारण यह विधि अत्यन्त प्राचीन चट्टानों और पदार्थों के काल निर्धारण में उपयोगी होती है।
सन् 1969 में पृथ्वी पर गिरे एलेन्जे मिटीओराइट तथा 1996 में मंगल से आए उल्का पिण्ड की आयु ज्ञात करने में इस विधि के उपयोग का उल्लेख मिलता है।
4. लेड विधि
कुछ आग्नेय चट्टानों या शैलों में लेड अर्थात सीसे का आइसोटोप Pb-206 पाया जाता है।
इस विधि का आधार यह है कि यूरेनियम-238 धीरे-धीरे विखण्डित होकर लेड-206 में बदलता जाता है।
इस परिवर्तन में लगभग 447 करोड़ वर्ष लगते हैं।
यदि प्रारम्भ में एक ग्राम यूरेनियम हो, तो लगभग 4 अरब 47 करोड़ वर्ष के बाद उसका लगभग आधा भाग यूरेनियम रह जाएगा और शेष भाग लेड में परिवर्तित हो चुका होगा।
इस प्रकार किसी चट्टान या पदार्थ में उपस्थित यूरेनियम और लेड की मात्रा का अनुपात ज्ञात करके उसकी आयु निर्धारित की जाती है।
निरपेक्ष काल निर्धारण की विधियाँ एक नजर में
| विधि | मुख्य आधार | उपयोग |
|---|---|---|
| कार्बन-14 | C-14 की मात्रा एवं C-14 : C-12 अनुपात | जैविक अवशेषों की आयु |
| पोटैशियम-आर्गन | K-40 के विखण्डन से बने Ar-40 की मात्रा | बहुत पुरानी ज्वालामुखीय चट्टानों की आयु |
| रूबीडियम-स्ट्रॉन्शियम | Rb-87 के विखण्डन से बने स्ट्रॉन्शियम | अत्यन्त प्राचीन चट्टानों एवं उल्का पिण्डों की आयु |
| लेड विधि | U-238 और Pb-206 का अनुपात | अत्यन्त प्राचीन आग्नेय चट्टानों की आयु |
सापेक्ष एवं निरपेक्ष काल निर्धारण में मुख्य अन्तर
| सापेक्ष काल निर्धारण | निरपेक्ष काल निर्धारण |
|---|---|
| निश्चित वर्ष नहीं बताता। | आयु को निश्चित वर्षों में बताने का प्रयास करता है। |
| वस्तुओं का पुराना-नया क्रम निर्धारित करता है। | रेडियोएक्टिव तत्वों के विखण्डन पर आधारित होता है। |
| तुलनात्मक काल ज्ञात होता है। | संख्यात्मक आयु ज्ञात की जाती है। |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
निरपेक्ष काल निर्धारण की विधियाँ रेडियोएक्टिव तत्वों के निश्चित विखण्डन और अर्द्धजीवनकाल पर आधारित होती हैं। कार्बन-14 जैविक अवशेषों, पोटैशियम-आर्गन प्राचीन ज्वालामुखीय चट्टानों, रूबीडियम-स्ट्रॉन्शियम अत्यन्त प्राचीन चट्टानों तथा लेड विधि यूरेनियम और लेड के अनुपात के आधार पर आयु निर्धारण में उपयोगी है।
- निरपेक्ष काल निर्धारण द्वारा आयु को निश्चित वर्षों में ज्ञात किया जाता है।
- निरपेक्ष विधियों का प्रमुख आधार रेडियोएक्टिव तत्वों का निश्चित दर से विखण्डन है।
- 1896 ईस्वी में एंटोनी बेकरेल ने प्राकृतिक अयस्कों से निकलने वाली अदृश्य किरणों का पता लगाया।
- रेडियोएक्टिव तत्व की मात्रा आधी होने में लगने वाला समय उसका अर्द्धजीवनकाल कहलाता है।
- कार्बन-14 का अर्द्धजीवनकाल 5730 वर्ष है।
- कार्बन-14 का निर्माण वायुमण्डलीय नाइट्रोजन पर ब्रह्माण्डीय किरणों की बौछार से होता है।
- जीव की मृत्यु के बाद बाहर से C-14 का प्रवेश बन्द हो जाता है और उसकी मात्रा धीरे-धीरे घटती जाती है।
- लगभग 50,000 वर्ष से अधिक पुराने अवशेषों के लिए कार्बन-14 विधि अनुपयुक्त हो जाती है।
- पोटैशियम-आर्गन विधि की खोज सन् 1948 में हुई थी।
- K-40 के विखण्डन का लगभग 89% भाग कैल्शियम-40 तथा 11% भाग आर्गन-40 में बदलता है।
- पोटैशियम-आर्गन विधि ज्वालामुखीय लावे से बनी पुरानी चट्टानों के लिए उपयोगी है।
- रूबीडियम-87 का अर्द्धजीवनकाल लगभग 49 अरब वर्ष है।
- लेड विधि में यूरेनियम-238 के लेड-206 में परिवर्तन का उपयोग किया जाता है।
- यूरेनियम-238 के आधे भाग को लेड में बदलने में लगभग 447 करोड़ वर्ष लगते हैं।