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Home Study Material Semester 1 सामाजिक अध्ययन ग्रामीण एवं नगरीय निकायों का गठन
Chapter 8 • सामाजिक अध्ययन

ग्रामीण एवं नगरीय निकायों का गठन

UP DELED Semester 1 सामाजिक अध्ययन विषय के इस अध्याय में ग्रामीण एवं नगरीय जीवन शैली, पंचायती राज व्यवस्था, ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, नगरीय प्रशासन, नगर पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम, जिला प्रशासन, जिलाधिकारी, कानून व्यवस्था, राजस्व प्रशासन, भूमि व्यवस्था तथा नागरिक सुविधाओं का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

8
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Topic 1 ग्रामीण एवं नगरीय जीवन शैली

ग्रामीण एवं नगरीय जीवन शैली

ग्राम एवं ग्रामीण जीवन शैली

ग्राम या गाँव छोटी मानव बस्तियों को कहा जाता है, जिनकी जनसंख्या कुछ सौ से लेकर कुछ हजार तक हो सकती है। गाँव को मरवाड़ी भाषा में “गामण” भी कहा जाता है।

गाँवों में रहने वाले लोगों का प्रमुख व्यवसाय सामान्यतः कृषि या उससे संबंधित कार्य होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रायः शहरों की अपेक्षा शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएँ कम उपलब्ध होती हैं।

ग्रामीण क्षेत्र सामान्यतः शहरों और कस्बों के बाहर स्थित होते हैं। पूर्णतः ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व कम तथा बस्तियाँ छोटी होती हैं। कृषि क्षेत्र सामान्यतः ग्रामीण होते हैं और इनमें से अधिकांश क्षेत्र वनाच्छादित भी हो सकते हैं।

कई गाँवों को किसानों की बस्ती के रूप में भी देखा जाता है, जहाँ लोगों के पारस्परिक संबंध सामान्यतः प्राथमिक होते हैं और उनकी आजीविका का प्रमुख आधार खेती होती है।

गाँव की अवधारणा

रेडफील्ड के विचार के अनुसार गाँव का अर्थ केवल किसी विशेष स्थानीय क्षेत्र से नहीं है, बल्कि गाँव एक जीवन-विधि है।

कुछ विद्वानों ने जनसंख्या घनत्व के आधार पर गाँव को परिभाषित करने का प्रयास किया और 3000 अथवा इससे कम जनसंख्या वाले क्षेत्र को गाँव माना, परन्तु यह मानदण्ड पूर्णतः उपयुक्त नहीं माना जा सकता क्योंकि अनेक गाँवों की जनसंख्या 5000 से भी अधिक होती है।

गाँव को ऐसे समुदाय के रूप में समझा जा सकता है जिसमें लोगों के संबंध सरल, प्राथमिक और परम्परागत होते हैं तथा उत्पादन का मुख्य उद्देश्य लोगों की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करना होता है।

महात्मा गांधी भारत के गाँवों में ग्राम पंचायतों को पुनर्जीवित कर ग्राम स्वराज स्थापित करने पर बल देते थे। उनका विश्वास था कि देश के गाँव स्वतंत्र, शक्तिशाली और स्वावलंबी बनकर राष्ट्रीय जीवन में सक्रिय भाग लें।

भारतीय ग्रामीण समुदाय की प्रमुख विशेषताएँ

आधुनिक भारतीय गाँव प्रारम्भिक कृषक गाँवों से अनेक दृष्टियों से भिन्न हैं। आज ग्रामीण समुदाय प्राकृतिक परिस्थितियों से प्रभावित होने के साथ सिंचाई, उर्वरक, कृषि की नई तकनीक, औद्योगिक साधन तथा सामाजिक संगठनों का भी उपयोग करता है।

वर्तमान ग्रामीण समुदाय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1. छोटा आकार

ग्रामीण समुदाय आकार की दृष्टि से सामान्यतः छोटा होता है। प्रारम्भ में ग्रामीण समुदाय का निर्माण केवल कुछ परिवारों के समूह से होता था।

कृषि और अन्य सुविधाओं में विकास होने के बाद भी अधिकांश गाँव आकार की दृष्टि से छोटे बने हुए हैं। भारत के लगभग 6 लाख गाँवों में से 4 लाख से अधिक गाँवों की जनसंख्या 1000 से भी कम बताई गई है।

2. प्रकृति पर निर्भरता

ग्रामीण जीवन में प्राकृतिक परिस्थितियों का विशेष महत्व है। बीज बोने से लेकर फसल को बाजार तक पहुँचाने की प्रक्रिया में ग्रामीण जीवन काफी हद तक प्रकृति पर निर्भर रहता है।

भूमि की बनावट, मौसम तथा जल की उपलब्धता जैसे प्राकृतिक तत्व ग्रामीण जीवन को प्रभावित करते हैं।

3. स्थायी आवास

ग्रामीण समुदाय का जीवन कृषि और अन्य स्थानीय व्यवसायों पर निर्भर होने के कारण एक निश्चित भू-भाग से जुड़ा रहता है। इसलिए ग्रामीण जीवन में स्थायी निवास की प्रवृत्ति अधिक होती है।

ग्रामीण बस्तियाँ छोटे-छोटे मकानों या झोपड़ियों के रूप में मिलती हैं। कभी-कभी अनेक परिवारों के मकानों के छोटे समूह पाए जाते हैं, जिन्हें हैमलेट ग्राम कहा जाता है।

4. गतिशीलता का अभाव

ग्रामीण समुदाय में परिवर्तन या गतिशीलता को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया जाता है। ग्रामीण जीवन परम्परागत होने के कारण व्यक्ति प्रायः परिवर्तन से बचता है और अपने निवास स्थान, व्यवसाय अथवा सामाजिक स्थिति में परिवर्तन करने का प्रयास कम करता है।

5. कृषि मुख्य व्यवसाय

विश्व के ग्रामीण समुदायों में कृषि को आजीविका का प्रमुख साधन माना जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक लोग चटाई बुनने, टोकरी बनाने, सूत कातने तथा हथकरघे से कपड़ा बुनने जैसे कुटीर उद्योगों से भी आजीविका प्राप्त करते हैं, फिर भी उनका मुख्य लगाव कृषि से बना रहता है।

भारत की कुल जनसंख्या का 68.84 प्रतिशत से अधिक भाग गाँवों में निवास करने तथा लगभग 67 प्रतिशत जनसंख्या खेती द्वारा आजीविका प्राप्त करने का उल्लेख किया गया है।

6. श्रम के विशेषीकरण का अभाव

ग्रामीण समुदाय की आर्थिक क्रियाओं में श्रम का विशेषीकरण अपेक्षाकृत कम होता है। एक सामान्य ग्रामीण व्यक्ति जीवन से संबंधित अनेक कार्य स्वयं करना जानता है।

उदाहरण के रूप में एक व्यक्ति फसल बोना और काटना, हल चलाना, सिंचाई करना, कुआँ खोदना, खाद बनाना, कृषि उपकरणों की मरम्मत करना और बाजार में फसल बेचना जैसे अनेक कार्य स्वयं कर सकता है।

ग्रामीण जीवन में स्त्री और पुरुष के बीच भी कठोर श्रम-विभाजन नहीं पाया जाता। महिलाएँ घरेलू कार्यों के साथ खेती, पशुओं की देखभाल तथा खलिहान से संबंधित कार्यों में भी सहयोग करती हैं।

7. परम्परागत नियंत्रण

ग्रामीण समुदाय में सामाजिक नियंत्रण का स्वरूप मुख्यतः प्राथमिक और परम्परागत होता है।

परिवार का मुखिया, जाति-पंचायत, धार्मिक विश्वास, प्रथाएँ और परम्पराएँ व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करने वाले प्रमुख माध्यम होते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में लोकतांत्रिक पंचायतों की स्थापना हो चुकी है, फिर भी सामाजिक नियंत्रण के क्षेत्र में परम्परागत संस्थाओं का प्रभाव महत्वपूर्ण बना रहता है।

नगर एवं नगरीय जीवन शैली

नगरीय जीवन ग्रामीण जीवन से अनेक आधारों पर अलग होता है। नगरों में पारस्परिक संबंधों, आर्थिक क्रियाओं, सामाजिक संगठन, जनसंख्या, व्यवसाय, प्रौद्योगिकी और आवास के स्वरूप में विशेष परिवर्तन दिखाई देता है।

नगर की प्रमुख अवधारणाएँ

डब्ल्यू. एफ. विलकॉक्स ने ऐसे क्षेत्र को नगर माना है जहाँ प्रति वर्ग मील जनसंख्या का घनत्व 1000 व्यक्तियों से अधिक हो और जहाँ व्यावहारिक रूप से कृषि का कार्य न होता हो।

बर्गेल के अनुसार शहर वह समुदाय है जिसके अधिकांश निवासी कृषि के अतिरिक्त अन्य व्यवसायों में लगे होते हैं।

क्वीन ने नगर को ऐसे क्षेत्र के रूप में समझाया है जिसकी सीमा कानून द्वारा निर्धारित होती है, जिसमें बड़ी जनसंख्या निवास करती है और जहाँ व्यवस्था तथा नियंत्रण स्थापित करने के लिए राज्य द्वारा अधिकृत प्रशासनिक सत्ता कार्य करती है।

सी. पी. लूमिस ने जनसंख्या के आकार और घनत्व, व्यवसाय की प्रकृति तथा सामाजिक संबंधों की भिन्नता को नगर की महत्वपूर्ण विशेषताएँ माना है।

एल. विर्थ ने समाजशास्त्रीय दृष्टि से नगर को सामाजिक विविधता वाले व्यक्तियों की एक बड़ी, घनी और स्थायी बस्ती माना है।

मैकाइवर के अनुसार नगर केवल भौगोलिक क्षेत्र ही नहीं, बल्कि विशेष आर्थिक संगठन और संस्थागत प्रक्रिया भी है।

इस प्रकार नगरीय पर्यावास एक विशेष जीवन-विधि है जिसमें विविधता, परिवर्तनशीलता तथा हित-प्रधान संबंध पाए जाते हैं। नगरीय समुदाय विकसित प्रौद्योगिकी और आर्थिक गतिविधियों पर आधारित होता है तथा घनी आबादी और व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा के कारण व्यक्तियों के व्यवहार को औपचारिक साधनों द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

नगरों की प्रमुख विशेषताएँ

1. जनसंख्या का आधिक्य

नगरों की एक प्रमुख विशेषता उनका बड़ा आकार तथा जनसंख्या का अधिक घनत्व है।

दिल्ली और मुंबई जैसे नगरों में जनसंख्या घनत्व 10,000 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से भी अधिक बताया गया है तथा इनके कुछ भागों में यह 15,000 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से भी अधिक हो सकता है।

10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरों में कुल नगरीय जनसंख्या के आधे से अधिक भाग के निवास करने का उल्लेख किया गया है।

2. जनसंख्या में विभिन्नता

नगरों में केवल जनसंख्या का आकार बड़ा नहीं होता, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता भी अधिक होती है।

यहाँ विभिन्न भाषाओं, धर्मों, सम्प्रदायों, विचारों, जातियों, वर्गों और प्रान्तों के लोग एक साथ रहते और काम करते हैं।

नगरों में व्यक्तियों की वेशभूषा, जीवन-स्तर और आदर्शों में भी पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है।

3. आर्थिक क्रियाओं के केन्द्र

नगर आर्थिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण केन्द्र होते हैं। यहाँ बड़ी संख्या में लोग उत्पादन, व्यापार, प्रशासन तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों में कार्य करते हैं।

यातायात, संचार, सुरक्षा और न्याय जैसी सुविधाएँ उपलब्ध होने के कारण उद्यमी व्यक्ति नगरों में स्थायी रूप से रहना पसंद करते हैं।

आर्थिक गतिविधियों के केंद्रीकरण के कारण नगरों की जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि होती रहती है।

4. विभिन्न आर्थिक वर्ग

नगरीय समाज में विभिन्न आर्थिक वर्ग पाए जाते हैं। व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों को आर्थिक स्थिति भी प्रभावित करती है।

नगरीय समाज में एक महत्वपूर्ण मध्यम वर्ग भी पाया जाता है, जो नगरीय सामाजिक और आर्थिक संरचना के विकास से जुड़ा है।

5. स्थानीय पृथक्करण

नगरों में श्रम-विभाजन और विशेषीकरण के कारण अलग-अलग कार्यों के लिए अलग क्षेत्र विकसित हो जाते हैं।

नगर के मध्य भाग में कार्यालय, व्यापारिक संस्थान, होटल, रेस्टोरेंट तथा मनोरंजन के साधन पाए जाते हैं। घनी बस्तियों वाले क्षेत्रों में श्रमिक और कम आय वाले वर्ग निवास करते हैं, जबकि बाहरी क्षेत्रों में धनी और प्रतिष्ठित वर्ग के निवास तथा विलासिता संबंधी संस्थान पाए जा सकते हैं।

6. द्वितीयक संबंधों की प्रधानता

नगरों में व्यक्तियों के संबंध मुख्यतः अपने हितों और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्थापित होते हैं, जिन्हें द्वितीयक संबंध कहा जाता है।

अधिक जनसंख्या तथा विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों के कारण पारस्परिक संबंध अपेक्षाकृत औपचारिक होते हैं।

नगरों में सामाजिक नियंत्रण भी औपचारिक होता है। पुलिस, न्यायालय और कानून जैसे साधनों द्वारा व्यक्तियों के व्यवहार पर नियंत्रण रखा जाता है।

7. व्यक्तिवादिता और प्रतिस्पर्धा

नगरीय जीवन में व्यक्तिगत लाभ और व्यक्तिवादी प्रवृत्तियों का विशेष प्रभाव दिखाई देता है।

नगरों में व्यक्ति अपने क्षेत्र में स्वयं को अधिक सक्षम और साधन-संपन्न सिद्ध करके अधिकतम लाभ प्राप्त करने का प्रयास करता है। इसी स्थिति के कारण प्रतिस्पर्धा का विकास होता है।

नगरीय प्रतिस्पर्धा केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक जीवन में भी दिखाई देती है।

ग्रामीण और नगरीय जीवन शैली की प्रमुख विशेषताओं की तुलना
ग्रामीण एवं नगरीय जीवन शैली की प्रमुख विशेषताओं की तुलना

ग्रामीण एवं नगरीय जीवन शैली में प्रमुख अन्तर

आधार ग्रामीण जीवन नगरीय जीवन
बस्ती का आकार सामान्यतः छोटा बड़ा एवं घनी आबादी वाला
मुख्य व्यवसाय कृषि एवं कृषि से जुड़े कार्य विविध आर्थिक एवं गैर-कृषि कार्य
प्रकृति पर निर्भरता अधिक अपेक्षाकृत कम
श्रम विशेषीकरण का अभाव श्रम-विभाजन एवं विशेषीकरण
सामाजिक संबंध प्राथमिक एवं परम्परागत द्वितीयक एवं औपचारिक
सामाजिक नियंत्रण परिवार, प्रथा, परम्परा, जाति-पंचायत आदि पुलिस, न्यायालय और कानून जैसे औपचारिक साधन
गतिशीलता अपेक्षाकृत कम अधिक परिवर्तनशील
सामाजिक विविधता अपेक्षाकृत कम अधिक
प्रमुख प्रवृत्ति परम्परागत सामुदायिक जीवन व्यक्तिवादिता एवं प्रतिस्पर्धा
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • ग्राम छोटी मानव बस्ती है और ग्रामीण क्षेत्रों का प्रमुख व्यवसाय सामान्यतः कृषि होता है।
  • रेडफील्ड के अनुसार गाँव केवल स्थानीय क्षेत्र नहीं, बल्कि एक जीवन-विधि है।
  • महात्मा गांधी गाँवों को स्वतंत्र, शक्तिशाली और स्वावलंबी बनाकर ग्राम स्वराज की स्थापना पर बल देते थे।
  • ग्रामीण समुदाय की प्रमुख विशेषताएँ—छोटा आकार, प्रकृति पर निर्भरता, स्थायी आवास, गतिशीलता का अभाव, कृषि मुख्य व्यवसाय, श्रम विशेषीकरण का अभाव और परम्परागत नियंत्रण हैं।
  • भारत के लगभग 6 लाख गाँवों में से 4 लाख से अधिक गाँवों की जनसंख्या 1000 से कम बताई गई है।
  • ग्रामीण जीवन भूमि, मौसम और जल की उपलब्धता जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है।
  • ग्रामीण समाज में सामाजिक संबंध प्रायः प्राथमिक और परम्परागत होते हैं।
  • ग्रामीण समाज में परिवार, जाति-पंचायत, धार्मिक विश्वास, प्रथाएँ और परम्पराएँ सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख माध्यम हैं।
  • नगरों में कृषि के अतिरिक्त विविध आर्थिक क्रियाओं की प्रधानता होती है।
  • नगरीय समाज की प्रमुख विशेषताएँ—जनसंख्या का आधिक्य, सामाजिक विविधता, आर्थिक गतिविधियों का केंद्रीकरण, विभिन्न आर्थिक वर्ग, स्थानीय पृथक्करण, द्वितीयक संबंध तथा व्यक्तिवादिता और प्रतिस्पर्धा हैं।
  • नगरों में विभिन्न धर्म, भाषा, जाति, वर्ग और प्रान्तों के लोग साथ रहते हैं।
  • नगरीय जीवन में श्रम-विभाजन और कार्यों का विशेषीकरण अधिक पाया जाता है।
  • नगरों में पारस्परिक संबंध मुख्यतः द्वितीयक और औपचारिक होते हैं।
  • नगरीय समाज में पुलिस, न्यायालय और कानून सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख औपचारिक साधन हैं।
  • व्यक्तिवादिता और प्रतिस्पर्धा नगरीय जीवन की महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं।

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Topic 2 पंचायती राज व्यवस्था—परिचय एवं संवैधानिक प्रावधान

पंचायती राज व्यवस्था—परिचय एवं संवैधानिक प्रावधान

पंचायती राज व्यवस्था

ग्रामीण स्थानीय स्वशासन के अन्तर्गत पंचायती राज व्यवस्था आती है। इसके माध्यम से गाँव, तहसील, तालुका, प्रखण्ड तथा जिला स्तर पर स्थानीय प्रशासन और विकास से सम्बन्धित कार्य किए जाते हैं।

भारत में पंचायती राज व्यवस्था प्राचीन काल से किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है। मुगल काल तथा ब्रिटिश शासन के समय भी स्थानीय संस्थाओं का अस्तित्व बना रहा।

स्थानीय स्वशासन का अर्थ

स्थानीय स्वशासन ऐसी व्यवस्था है जिसमें किसी निश्चित क्षेत्र या छोटे समुदाय के प्रशासन से सम्बन्धित कार्य स्थानीय लोगों की भागीदारी से संचालित किए जाते हैं।

इसका मुख्य उद्देश्य शासन को स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक बनाना और स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय लोगों की सहभागिता से करना है।

स्थानीय स्वशासन का कार्यक्षेत्र सीमित भौगोलिक क्षेत्र तक होता है और इसकी संस्थाएँ मुख्यतः उसी क्षेत्र के निवासियों के लिए कार्य करती हैं।

ये संस्थाएँ राज्य सरकार के अधीन रहती हैं तथा राज्य सरकार इनके कार्यों का नियंत्रण और पर्यवेक्षण करती है।

स्थानीय स्वशासन का महत्व

  • यह शासन को सामान्य नागरिकों के अधिक निकट लाता है।
  • स्थानीय लोगों को प्रशासन में भाग लेने का अवसर देता है।
  • स्थानीय समस्याओं के समाधान में जनता की भागीदारी बढ़ाता है।
  • लोकतांत्रिक व्यवस्था को निचले स्तर तक पहुँचाता है।

लॉर्ड रिपन और स्थानीय स्वशासन

ब्रिटिश शासन के दौरान वर्ष 1882 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रिपन ने स्थानीय स्वायत्त शासन की स्थापना का प्रयास किया।

यद्यपि यह प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो सका, फिर भी भारत में स्थानीय स्वशासन के विकास में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। इसी कारण लॉर्ड रिपन को भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक माना जाता है।

ब्रिटिश शासन ने स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं की स्थिति की जाँच और सुझाव देने के लिए 1882 तथा 1907 में शाही आयोगों का गठन किया।

इन प्रयासों के बाद वर्ष 1920 में संयुक्त प्रान्त, असम, बंगाल, बिहार, मद्रास और पंजाब में पंचायतों की स्थापना के लिए कानून बनाए गए।

संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान में पंचायती राज व्यवस्था को विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं।

अनुच्छेद 40

संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों को ग्राम पंचायतों के संगठन का निर्देश दिया गया है।

सातवीं अनुसूची

संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 5 में ग्राम पंचायतों को सम्मिलित किया गया है। इनके सम्बन्ध में कानून बनाने का अधिकार राज्यों को दिया गया है।

स्वतंत्रता के बाद पंचायती राज के विकास के प्रयास

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महात्मा गांधी के विचारों के प्रभाव से पंचायती राज व्यवस्था को विशेष महत्व दिया गया।

इसके लिए केन्द्र में पंचायती राज एवं सामुदायिक विकास मंत्रालय की स्थापना की गई और एस. के. डे को इसका मंत्री बनाया गया।

सामुदायिक विकास कार्यक्रम—1952

2 अक्टूबर 1952 को सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। इसका उद्देश्य सामान्य जनता को विकास प्रक्रिया से अधिक से अधिक जोड़ना था।

इस कार्यक्रम में खण्ड को विकास की इकाई माना गया और सरकारी कर्मचारियों के साथ स्थानीय जनता को विकास कार्यों से जोड़ने का प्रयास किया गया।

लेकिन जनता को पर्याप्त अधिकार नहीं मिलने के कारण यह कार्यक्रम मुख्यतः सरकारी अधिकारियों तक सीमित रह गया और अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका।

राष्ट्रीय प्रसार सेवा—1953

इसके बाद 2 अक्टूबर 1953 को राष्ट्रीय प्रसार सेवा प्रारम्भ की गई, लेकिन यह प्रयास भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका।

बलवंत राय मेहता समिति और त्रिस्तरीय व्यवस्था

पंचायती राज को प्रभावी स्वरूप देने में बलवंत राय मेहता समिति की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस समिति ने पंचायती राज व्यवस्था को त्रिस्तरीय बनाने का सुझाव दिया।

आगे चलकर इसी दिशा में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक आधार प्रदान किया गया।

73वाँ संविधान संशोधन, 1993

वर्ष 1993 में 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई।

इस संशोधन द्वारा संविधान में नया भाग IX जोड़ा गया तथा पंचायती राज से सम्बन्धित नए अनुच्छेदों का प्रावधान किया गया।

इसके साथ संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी गई।

73वें संविधान संशोधन में पंचायती राज संस्थाओं के गठन, सदस्यों के निर्वाचन, आरक्षण तथा पंचायतों के कार्यों से सम्बन्धित व्यापक प्रावधान किए गए।

पंचायती राज से सम्बन्धित प्रमुख समितियाँ एवं अध्ययन दल

समिति / अध्ययन दल वर्ष मुख्य अध्ययन / कार्य
बलवंत राय मेहता समिति 1957 सामुदायिक विकास कार्यक्रम के कार्यान्वयन की समीक्षा
वी. ईश्वरन अध्ययन दल 1961 पंचायती राज प्रशासन का अध्ययन
जी. आर. राजगोपाल अध्ययन दल 1962 न्याय पंचायत के गठन का अध्ययन
दिवाकर समिति 1963 ग्राम सभा की स्थिति की समीक्षा
एम. रामाकृष्णैया अध्ययन दल 1963 पंचायती राज संस्थाओं की आय-व्यय गणना का अध्ययन
के. संथानम समिति 1963 पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय व्यवस्था एवं स्थिति की समीक्षा
जी. रामचन्द्रन समिति 1966 पंचायतों के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों की आवश्यकता का अध्ययन
अशोक मेहता समिति 1977 पंचायती राज के मूल एवं प्रशासनिक ढाँचे से सम्बन्धित तत्वों का अध्ययन
दांतवाला समिति 1978 खण्ड स्तर पर योजना के स्वरूप का अध्ययन
हनुमंत राव समिति 1984 जिला स्तरीय योजना के स्वरूप का अध्ययन
एल. एम. सिंघवी समिति 1986 लोकतंत्र और विकास के लिए पंचायती राज संस्थाओं के पुनर्शक्तीकरण पर बल
पी. के. थुंगन समिति 1989 स्थानीय निकायों को संवैधानिक मान्यता देने की अनुशंसा
भारत में पंचायती राज व्यवस्था के विकास और प्रमुख समितियों की समयरेखा
पंचायती राज व्यवस्था का विकास और प्रमुख समितियाँ

पंचायतों की त्रिस्तरीय संरचना

73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1993 के अंतर्गत पंचायती राज व्यवस्था को सामान्यतः तीन स्तरों में संगठित किया गया है—

  1. ग्राम स्तर
  2. खण्ड या मध्यवर्ती स्तर
  3. जिला स्तर
1. ग्राम स्तर

सबसे निचले स्तर पर ग्राम सभा और ग्राम पंचायत का गठन किया जाता है।

ग्राम पंचायत के प्रमुख को विभिन्न स्थानों पर प्रधान, मुखिया या सरपंच कहा जाता है। इसका निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से होता है।

2. खण्ड या मध्यवर्ती स्तर

मध्यवर्ती स्तर पर क्षेत्र पंचायत का गठन किया जाता है। इसे खण्ड स्तर की पंचायत भी कहा जाता है।

इसका प्रमुख प्रमुख कहलाता है और उसका निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है।

3. जिला स्तर

सबसे ऊँचे स्तर पर जिला पंचायत का गठन किया जाता है।

इसका प्रमुख अध्यक्ष या चेयरमैन कहलाता है और उसका निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है।

जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है, वहाँ मध्यवर्ती स्तर की पंचायत का गठन करना आवश्यक नहीं है।

भारत की त्रिस्तरीय पंचायती राज संरचना ग्राम पंचायत क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत
त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था—ग्राम, खण्ड और जिला स्तर

त्रिस्तरीय पंचायती राज—एक नजर में

स्तर संस्था मुख्य पदाधिकारी निर्वाचन
ग्राम स्तर ग्राम पंचायत प्रधान / मुखिया / सरपंच प्रत्यक्ष
खण्ड स्तर क्षेत्र पंचायत प्रमुख अप्रत्यक्ष
जिला स्तर जिला पंचायत अध्यक्ष / चेयरमैन अप्रत्यक्ष
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पंचायती राज ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था है।
  • स्थानीय स्वशासन में स्थानीय लोगों की भागीदारी से स्थानीय प्रशासन संचालित किया जाता है।
  • भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक लॉर्ड रिपन को माना जाता है।
  • लॉर्ड रिपन ने 1882 में स्थानीय स्वायत्त शासन स्थापित करने का प्रयास किया।
  • 1920 में संयुक्त प्रान्त, असम, बंगाल, बिहार, मद्रास और पंजाब में पंचायतों की स्थापना के लिए कानून बनाए गए।
  • संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों को ग्राम पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया है।
  • सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 5 में ग्राम पंचायतों से सम्बन्धित विषय रखा गया है।
  • 2 अक्टूबर 1952 को सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया।
  • 2 अक्टूबर 1953 को राष्ट्रीय प्रसार सेवा प्रारम्भ की गई।
  • बलवंत राय मेहता समिति का गठन 1957 में हुआ और इसने पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था पर बल दिया।
  • 73वें संविधान संशोधन द्वारा 1993 में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई।
  • 73वें संशोधन द्वारा संविधान में भाग IX और 11वीं अनुसूची जोड़ी गई।
  • एल. एम. सिंघवी समिति 1986 ने पंचायती राज संस्थाओं के पुनर्शक्तीकरण पर बल दिया।
  • पी. के. थुंगन समिति 1989 ने स्थानीय निकायों को संवैधानिक मान्यता देने की अनुशंसा की।
  • त्रिस्तरीय पंचायती राज में ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर क्षेत्र पंचायत और जिला स्तर पर जिला पंचायत होती है।
  • 20 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्यों में मध्यवर्ती स्तर की पंचायत का गठन अनिवार्य नहीं है।
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Topic 3 ग्राम पंचायत—गठन, निर्वाचन, कार्य एवं आय के स्रोत

ग्राम पंचायत—गठन, निर्वाचन, कार्य एवं आय के स्रोत

ग्राम पंचायत का गठन

पंचायती राज व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायत का गठन किया जाता है। प्रत्येक ग्राम सभा क्षेत्र में ग्राम पंचायत की व्यवस्था होती है।

ग्राम पंचायत, ग्राम सभा की निर्वाचित कार्यपालिका होती है। ग्राम पंचायत के सदस्यों का निर्वाचन गाँव के मतदाताओं द्वारा किया जाता है।

जनसंख्या के आधार पर ग्राम पंचायत समिति के सदस्य

ग्राम सभा की जनसंख्या ग्राम पंचायत समिति के सदस्य
1000 तक 9 सदस्य
2000 तक 11 सदस्य
3000 तक 13 सदस्य
3000 से अधिक 15 सदस्य

ग्राम पंचायतों का निर्वाचन

पंचायतों के सदस्यों का निर्वाचन वयस्क मतदाताओं द्वारा किया जाता है। पंचायतों का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष होता है।

ग्राम पंचायत के किसी पद के लिए चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति की न्यूनतम आयु 21 वर्ष होनी चाहिए।

पंचायत चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति के लिए निम्न बातों का ध्यान रखा गया है—

  • वह सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर न हो।
  • उसे किसी सेवा से भ्रष्टाचार के कारण पदच्युत न किया गया हो।
  • वह पंचायत से सम्बन्धित किसी अपराध के लिए दोषी न हो।

जिला परिषद, जिला पंचायत, पंचायत समिति तथा ग्राम पंचायत के चुनाव कराने का अधिकार 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1993 के अन्तर्गत प्रत्येक राज्य या संघ राज्य क्षेत्र में गठित राज्य निर्वाचन आयोग को दिया गया है।

राज्य निर्वाचन आयोग, भारत निर्वाचन आयोग से स्वतंत्र संस्था है।

ग्राम पंचायत का कार्यकाल

प्रत्येक ग्राम पंचायत का गठन उसकी पहली बैठक की तारीख से 5 वर्ष के लिए किया जाता है।

पंचायत को कानून के अनुसार निर्धारित अवधि से पहले भी भंग किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में आवश्यकतानुसार पुनः निर्वाचन कराया जाता है।

यदि नई पंचायत शेष अवधि के लिए गठित होती है, तो उसका कार्यकाल केवल बची हुई अवधि तक रहता है।

ग्राम पंचायत की बैठक

ग्राम पंचायत की प्रत्येक माह कम से कम एक बैठक होना आवश्यक है।

बैठक की सूचना सभी सदस्यों को कम से कम 5 दिन पूर्व दी जाती है।

ग्राम प्रधान तथा उसकी अनुपस्थिति में उपप्रधान पंचायत की बैठक बुला सकता है।

यदि पंचायत के एक-तिहाई सदस्य हस्ताक्षर करके लिखित रूप से बैठक बुलाने की माँग करें, तो प्रधान को 15 दिनों के भीतर बैठक आयोजित करनी होती है।

यदि प्रधान बैठक आयोजित नहीं करता है, तो निर्धारित अधिकारी अथवा सहायक अधिकारी पंचायत की बैठक बुला सकता है।

गणपूर्ति या कोरम

ग्राम पंचायत की बैठक के लिए कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई सदस्यों की उपस्थिति गणपूर्ति या कोरम के लिए आवश्यक होती है।

यदि गणपूर्ति के अभाव में बैठक नहीं हो पाती है, तो दोबारा सूचना देकर बैठक बुलाई जा सकती है। ऐसी पुनः बुलाई गई बैठक के लिए गणपूर्ति की आवश्यकता नहीं रहती।

बैठक की अध्यक्षता

ग्राम पंचायत की बैठक की अध्यक्षता सामान्यतः ग्राम प्रधान करता है तथा उसकी अनुपस्थिति में उपप्रधान अध्यक्षता करता है।

यदि दोनों अनुपस्थित हों, तो प्रधान द्वारा लिखित रूप से मनोनीत सदस्य बैठक की अध्यक्षता कर सकता है। यदि प्रधान ने किसी सदस्य को मनोनीत न किया हो, तो उपस्थित सदस्य आपस में किसी सदस्य को अध्यक्षता के लिए चुन सकते हैं।

ग्राम प्रधान

गाँव का मुखिया ग्राम प्रधान होता है। ग्राम प्रधान गाँव के नागरिकों द्वारा चुना जाता है।

ग्राम प्रधान गाँव की जनता का प्रतिनिधि होता है और गाँव की मूलभूत सुख-सुविधाओं से जुड़े कार्यों की देखरेख करता है।

ग्राम प्रधान ग्राम शिक्षा समिति का अध्यक्ष भी होता है।

उसका सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष होता है। यदि ग्राम प्रधान अपने कार्यों का ठीक प्रकार से निर्वहन नहीं करता है तो पंचायत समिति द्वारा उसे पद से हटाया भी जा सकता है।

ग्राम पंचायत समिति

ग्राम पंचायत समिति का सदस्य वही व्यक्ति हो सकता है जो उस गाँव का निवासी और भारत का नागरिक हो।

सदस्य की आयु कम से कम 21 वर्ष होनी चाहिए।

ग्राम पंचायत समिति के सदस्यों का चुनाव गाँव के 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के मतदाताओं द्वारा किया जाता है।

समिति के सदस्यों की संख्या गाँव की जनसंख्या के आधार पर निर्धारित होती है।

ग्राम पंचायत के प्रमुख कार्य

ग्राम पंचायत ग्रामीण क्षेत्र के प्रशासन और विकास से सम्बन्धित अनेक कार्य करती है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—

  1. कृषि सम्बन्धी कार्य।
  2. ग्राम विकास सम्बन्धी कार्य।
  3. प्राथमिक विद्यालय, उच्च प्राथमिक विद्यालय तथा अनौपचारिक शिक्षा से सम्बन्धित कार्य।
  4. युवा कल्याण सम्बन्धी कार्य।
  5. राजकीय नलकूपों की मरम्मत और रख-रखाव।
  6. हैंडपम्पों की मरम्मत और रख-रखाव।
  7. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्य।
  8. महिला एवं बाल विकास सम्बन्धी कार्य।
  9. पशुधन विकास सम्बन्धी कार्य।
  10. विभिन्न प्रकार की पेंशन को स्वीकृत करने और उसके वितरण का कार्य।
  11. विभिन्न प्रकार की छात्रवृत्तियों को स्वीकृत करने और उनके वितरण का कार्य।
  12. राशन की दुकान के आवंटन और निरस्तीकरण की सिफारिश करना।
  13. पंचायती राज से सम्बन्धित अन्य ग्राम स्तरीय कार्य करना।

ग्राम पंचायत की आय के स्रोत

ग्राम पंचायत अपने कार्यों को पूरा करने के लिए विभिन्न प्रकार के कर, शुल्क, अनुदान तथा स्थानीय संसाधनों से आय प्राप्त करती है।

इसके प्रमुख आय-स्रोत निम्नलिखित हैं—

  1. भू-राजस्व की धनराशि के अनुसार 25% से 50% तक पंचायत कर
  2. प्रान्तीय सरकार अथवा स्थानीय अधिकारियों द्वारा दिया गया अनुदान।
  3. मनोरंजन कर।
  4. गाँव के मेलों और बाजारों आदि पर कर।
  5. पशुओं तथा वाहनों आदि पर कर।
  6. मछली तालाब से प्राप्त आय।
  7. नालियों और सड़कों की सफाई तथा रोशनी की व्यवस्था के लिए कर।
  8. कूड़ा-कर्कट तथा मृत पशुओं की बिक्री से आय।
  9. व्यापार तथा रोजगार पर कर।
  10. सम्पत्ति के क्रय-विक्रय पर कर।
  11. पशुओं का रजिस्ट्रेशन शुल्क।
  12. दुग्ध उत्पादन कर आदि।

ग्राम पंचायत—एक नजर में

आधार मुख्य तथ्य
स्तर पंचायती राज का ग्राम स्तर
स्वरूप ग्राम सभा की निर्वाचित कार्यपालिका
मुख्य पदाधिकारी ग्राम प्रधान
कार्यकाल 5 वर्ष
चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष
मतदाता की न्यूनतम आयु 18 वर्ष
बैठक माह में कम से कम एक बार
बैठक की सूचना कम से कम 5 दिन पहले
गणपूर्ति कुल सदस्यों का 1/3
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • ग्राम पंचायत ग्राम सभा की निर्वाचित कार्यपालिका है।
  • ग्राम पंचायत का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
  • पंचायत चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है।
  • ग्राम पंचायत समिति के सदस्यों का चुनाव 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के मतदाता करते हैं।
  • पंचायत चुनावों का संचालन राज्य निर्वाचन आयोग करता है।
  • ग्राम पंचायत की प्रत्येक माह कम से कम एक बैठक आवश्यक है।
  • बैठक की सूचना कम से कम 5 दिन पहले दी जाती है।
  • ग्राम पंचायत की बैठक का कोरम कुल सदस्यों का एक-तिहाई है।
  • एक-तिहाई सदस्यों की लिखित माँग पर प्रधान को 15 दिनों के भीतर बैठक बुलानी होती है।
  • ग्राम प्रधान गाँव का मुखिया और ग्राम शिक्षा समिति का अध्यक्ष होता है।
  • 1000 तक की जनसंख्या पर 9, 2000 तक 11, 3000 तक 13 तथा 3000 से अधिक जनसंख्या पर 15 सदस्य होते हैं।
  • ग्राम पंचायत कृषि, ग्राम विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास तथा पशुधन विकास से सम्बन्धित कार्य करती है।
  • पेंशन और छात्रवृत्ति की स्वीकृति तथा वितरण भी ग्राम पंचायत के कार्यों में शामिल है।
  • ग्राम पंचायत को कर, शुल्क, सरकारी अनुदान, बाजार-मेला, तालाब और अन्य स्थानीय स्रोतों से आय प्राप्त होती है।

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Topic 4 क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत

क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत

क्षेत्र पंचायत

पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम स्तर और जिला स्तर के बीच प्रखण्ड या विकासखण्ड स्तर पर गठित निकाय को क्षेत्र पंचायत कहा जाता है।

प्रखण्ड स्तर पर गठित इस निकाय को पंचायत समिति भी कहते हैं। प्रत्येक विकासखण्ड में एक पंचायत समिति स्थापित की जाती है और उसका नाम सामान्यतः उसी प्रखण्ड के नाम पर होता है।

कई गाँवों को मिलाकर एक विकासखण्ड बनाया जाता है। इसे विकास क्षेत्र या ब्लॉक भी कहा जाता है।

राज्य सरकार को पंचायत समिति के क्षेत्र को घटाने या बढ़ाने का अधिकार होता है।

क्षेत्र पंचायत ग्राम और जिला स्तर के बीच संपर्क स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। क्षेत्र पंचायत के सदस्यों को बी.डी.सी. सदस्य कहा जाता है।

प्रमुख और उपप्रमुख

प्रत्येक पंचायत समिति में एक प्रमुख और एक उपप्रमुख होता है।

इन दोनों का निर्वाचन पंचायत समिति के सदस्यों द्वारा किया जाता है। सह-सदस्य इन पदों के लिए उम्मीदवार नहीं हो सकता।

निर्वाचित प्रमुख पंचायत समिति का अध्यक्ष होता है। उसका कार्यकाल 5 वर्ष होता है।

पंचायत समिति अविश्वास प्रस्ताव पारित कर तथा राज्य सरकार आदेश जारी करके प्रमुख और उपप्रमुख को पद से हटा सकती है।

प्रमुख के कार्य

क्षेत्र पंचायत का प्रमुख पंचायत समिति के संचालन का मुख्य पदाधिकारी होता है। उसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—

  • पंचायत समिति की बैठक बुलाना।
  • बैठक की अध्यक्षता करना।
  • पंचायत समिति के कार्यों का संचालन करना।
  • पदाधिकारियों के कार्यों की निगरानी करना।
  • समिति के कार्यों की रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
  • संकटकाल में प्रखण्ड पदाधिकारी के परामर्श से आवश्यक कार्यवाही करना।

प्रमुख की अनुपस्थिति में उसके कार्यों का सम्पादन उपप्रमुख द्वारा किया जाता है।

क्षेत्र पंचायत समिति के प्रमुख कार्य

पंचायत समिति पंचायती राज व्यवस्था की महत्वपूर्ण कार्यकारी इकाई है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—

1. सामुदायिक विकास

पंचायत समिति अधिक रोजगार और आवश्यक सुख-सुविधाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ग्राम समुदायों के विकास को प्रोत्साहित करती है।

इसके माध्यम से ग्रामीण जनता को स्वावलंबी बनाने तथा लोक-कल्याणकारी गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाता है।

2. पशुपालन

क्षेत्र पंचायत पशुधन सुधार से सम्बन्धित अनेक कार्य करती है, जैसे—

  • स्थानीय पशुओं की नस्ल सुधारना।
  • कृत्रिम गर्भाधान केन्द्र स्थापित करना।
  • संतुलित पशु आहार उपलब्ध कराना।
  • संक्रामक पशु रोगों की रोकथाम करना।
  • पशु चिकित्सालयों की स्थापना करना।
  • दुग्धशालाओं की स्थापना और दूध भेजने की व्यवस्था करना।
  • तालाबों में मत्स्य पालन को प्रोत्साहित करना।

3. कृषि सम्बन्धी कार्य

क्षेत्र पंचायत कृषि उत्पादन बढ़ाने और कृषि विकास के लिए योजनाएँ बनाती और उनका क्रियान्वयन करती है।

इसके प्रमुख कृषि सम्बन्धी कार्य हैं—

  • भूमि और जल-साधनों का उचित उपयोग।
  • नवीन शोध पर आधारित उन्नत कृषि पद्धतियों का प्रसार।
  • लघु सिंचाई कार्यों का निर्माण।
  • सिंचाई के कुओं और बाँधों के निर्माण में सहायता।
  • मेड़ बनाने में ग्रामीणों की सहायता।
  • भूमि को कृषि योग्य बनाना।
  • कृषि भूमि का संरक्षण।
  • उन्नत बीजों का वितरण।
  • स्थानीय खाद से सम्बन्धित साधनों का विकास।
  • उन्नत कृषि उपकरणों के प्रयोग और निर्माण को प्रोत्साहन।
  • पौध संरक्षण।
  • व्यापारिक फसलों का विकास।
  • सिंचाई और कृषि विकास के लिए ऋण तथा अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना।

4. स्वास्थ्य एवं सफाई

क्षेत्र पंचायत ग्रामीण स्वास्थ्य और स्वच्छता से सम्बन्धित कार्य भी करती है।

  • टीकाकरण की व्यवस्था करना।
  • स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना।
  • रोगों की रोकथाम करना।
  • शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना।
  • परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करना।
  • औषधालयों और प्रसूति केन्द्रों का निरीक्षण करना।
  • स्वच्छता और स्वास्थ्य अभियान चलाना।
  • पोषक आहार और संक्रामक रोगों के सम्बन्ध में ग्रामीणों को जागरूक करना।

5. सहकारिता से सम्बन्धित कार्य

पंचायत समिति ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारिता को बढ़ावा देती है।

यह ग्राम सेवा सहकारी समितियों तथा औद्योगिक, सिंचाई, कृषि और अन्य सहकारी संस्थाओं की स्थापना में सहायता करती है।

6. शिक्षा एवं समाज शिक्षा

क्षेत्र पंचायत शिक्षा और समाज शिक्षा के क्षेत्र में निम्न कार्य करती है—

  • प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना।
  • माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति और आर्थिक सहायता।
  • लड़कियों में शिक्षा का प्रसार।
  • प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था।
  • अध्यापकों के लिए आवास का निर्माण।
  • पुस्तकालयों की स्थापना।
  • युवा संगठन, सामुदायिक एवं मनोरंजन केन्द्रों की स्थापना।

7. यातायात सम्बन्धी कार्य

पंचायत समिति अपने क्षेत्र में पंचायत सड़कों और उन पर पुलों के निर्माण तथा उनके रख-रखाव का कार्य करती है।

8. कुटीर उद्योग

ग्रामीण रोजगार और आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए क्षेत्र पंचायत कुटीर एवं छोटे उद्योगों के विकास को प्रोत्साहित करती है।

इसके अन्तर्गत उद्योग और नियोजन से सम्बन्धित साधनों का सर्वेक्षण, उत्पादन और प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना, कारीगरों तथा शिल्पकारों की कुशलता बढ़ाना और सुधरे हुए बाजारों को लोकप्रिय बनाना शामिल है।

9. पिछड़े वर्गों के लिए कार्य

क्षेत्र पंचायत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण से सम्बन्धित कार्य भी करती है।

इसके अन्तर्गत विद्यार्थियों के लिए छात्रावासों की व्यवस्था, स्वयंसेवी संगठनों को मजबूत करना, समाज कल्याण, मद्य-निषेध तथा समाज सुधार सम्बन्धी गतिविधियाँ शामिल हैं।

जिला पंचायत / परिषद

पंचायती राज व्यवस्था के पद-सोपान में जिला पंचायत या जिला परिषद शीर्षस्थ संस्था है।

जिले की सभी क्षेत्र पंचायतों को मिलाकर जिला पंचायत का गठन किया जाता है।

जिला पंचायत के सदस्यों का निर्वाचन जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।

इसके अतिरिक्त जिले के विधायक, सांसद, राज्य विधान परिषद के सदस्य तथा महिलाओं एवं अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधियों को भी इसकी सदस्यता में स्थान दिया जाता है।

महिलाओं के लिए जिला परिषद में एक-तिहाई स्थान आरक्षित बताए गए हैं।

जिला पंचायत का अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष

प्रत्येक जिला पंचायत में एक निर्वाचित अध्यक्ष होता है, जिसे जिला प्रमुख कहा जाता है।

जिला पंचायत का अध्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होता है।

इसके अतिरिक्त एक उपाध्यक्ष भी होता है, जिसे उप-जिला प्रमुख कहा जाता है।

जिला पंचायत का कार्यकाल उसकी प्रथम बैठक की निर्धारित तिथि से अगली 5 वर्ष की अवधि तक होता है।

जिला पंचायत के प्रमुख अधिकारी

1. सचिव

सचिव जिला पंचायत का प्रमुख अधिकारी होता है। जिला पंचायत की माँग पर सरकार द्वारा उसकी नियुक्ति की जाती है।

सचिव के प्रमुख कार्य हैं—

  • जिला पंचायत का बजट तैयार करना।
  • बजट को जिला पंचायत के समक्ष प्रस्तुत करना।
  • जिला पंचायत की ओर से सरकारी अनुदान और धन प्राप्त करना।
  • जिला पंचायत के आय-व्यय की अदायगी कराना।

2. मुख्य कार्यपालक अधिकारी

जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालक अधिकारी की नियुक्ति प्रान्तीय सरकार द्वारा भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों में से की जाती है।

जिला पंचायत के प्रमुख कार्य

जिला पंचायत जिले में पंचायती राज संस्थाओं के समन्वय और पर्यवेक्षण की महत्वपूर्ण संस्था है।

  1. क्षेत्र पंचायतों और पंचायतों के कार्यों में तालमेल स्थापित करना।
  2. क्षेत्र पंचायतों को आवश्यक परामर्श देना।
  3. उनके कार्यों की देखरेख करना।
  4. स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यकारी कार्य करना।
  5. शिक्षा सम्बन्धी कार्य करना।
  6. समाज कल्याण से सम्बन्धित कार्य करना।

जिला पंचायत की प्रमुख समितियाँ

जिला पंचायत के विभिन्न कार्यों को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए प्रमुख समितियाँ गठित की जाती हैं—

  1. कार्यकारी समिति।
  2. नियोजन एवं वित्त समिति।
  3. उद्योग एवं निर्माण कार्य समिति।
  4. शिक्षा समिति।
  5. स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति।
  6. जल प्रबन्धन समिति।
क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत की संरचना पदाधिकारी तथा प्रमुख कार्य
क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत—संरचना, पदाधिकारी और प्रमुख कार्य

क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत में अन्तर

आधार क्षेत्र पंचायत जिला पंचायत
स्तर प्रखण्ड / विकासखण्ड जिला
स्थिति ग्राम और जिला के मध्य पंचायती राज की शीर्षस्थ संस्था
अन्य नाम पंचायत समिति जिला परिषद
मुख्य पदाधिकारी प्रमुख अध्यक्ष / जिला प्रमुख
सहायक पदाधिकारी उपप्रमुख उपाध्यक्ष / उप-जिला प्रमुख
कार्यकाल 5 वर्ष 5 वर्ष
मुख्य भूमिका ग्राम और जिला के बीच सम्पर्क एवं विकास कार्य क्षेत्र पंचायतों में तालमेल, परामर्श और पर्यवेक्षण
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्रखण्ड या विकासखण्ड स्तर की पंचायत को क्षेत्र पंचायत या पंचायत समिति कहा जाता है।
  • कई गाँवों को मिलाकर एक विकासखण्ड बनाया जाता है।
  • क्षेत्र पंचायत ग्राम और जिला के मध्य सम्पर्क स्थापित करती है।
  • क्षेत्र पंचायत के सदस्यों को बी.डी.सी. सदस्य कहा जाता है।
  • पंचायत समिति में एक प्रमुख और एक उपप्रमुख होता है।
  • प्रमुख और उपप्रमुख का निर्वाचन पंचायत समिति के सदस्य करते हैं।
  • प्रमुख का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
  • क्षेत्र पंचायत सामुदायिक विकास, पशुपालन, कृषि, स्वास्थ्य, सहकारिता, शिक्षा, यातायात, कुटीर उद्योग और पिछड़े वर्गों के कल्याण से सम्बन्धित कार्य करती है।
  • जिला पंचायत पंचायती राज व्यवस्था की शीर्षस्थ संस्था है।
  • जिले की सभी क्षेत्र पंचायतों को मिलाकर जिला पंचायत बनती है।
  • जिला पंचायत के सदस्यों का निर्वाचन जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।
  • जिला पंचायत के अध्यक्ष को जिला प्रमुख कहा जाता है और उसका निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है।
  • जिला पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
  • सचिव जिला पंचायत का प्रमुख अधिकारी होता है और बजट तथा आय-व्यय से सम्बन्धित कार्य करता है।
  • जिला पंचायत क्षेत्र पंचायतों के कार्यों में तालमेल, परामर्श और देखरेख करती है।
  • कार्यकारी, नियोजन एवं वित्त, उद्योग एवं निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कल्याण तथा जल प्रबन्धन जिला पंचायत की प्रमुख समितियाँ हैं।
Topic 5 नगरीय प्रशासन एवं स्थानीय निकाय

नगरीय प्रशासन एवं स्थानीय निकाय

नगरीय प्रशासन

भारत में नगरीय शासन व्यवस्था का इतिहास काफी पुराना है। आधुनिक नगरीय प्रशासन को कानूनी स्वरूप देने की दिशा में ब्रिटिश शासन के समय महत्वपूर्ण प्रयास किए गए।

भारत में सर्वप्रथम 1687 ई. में ब्रिटिश सरकार द्वारा मद्रास नगर के लिए नगर निगम संस्था की स्थापना की गई।

इसके बाद 1793 के चार्टर अधिनियम के अन्तर्गत मद्रास, कलकत्ता और मुंबई जैसे महानगरों में नगर निगमों की स्थापना की गई।

बंगाल में नगरीय शासन व्यवस्था प्रारम्भ करने के उद्देश्य से 1842 में बंगाल अधिनियम पारित किया गया।

लॉर्ड रिपन और नगरीय प्रशासन

वर्ष 1882 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रिपन ने नगरीय शासन व्यवस्था में सुधार करने का प्रयास किया। राजनीतिक कारणों से उनका प्रयास पूर्णतः सफल नहीं हो सका।

नगरीय प्रशासन के विकेन्द्रीकरण का अध्ययन करने के लिए 1909 में शाही विकेन्द्रीकरण आयोग का गठन किया गया।

इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर भारत सरकार अधिनियम, 1919 में नगरीय प्रशासन से सम्बन्धित स्पष्ट प्रावधान किए गए।

नगरीय शासन से सम्बन्धित संवैधानिक प्रावधान

मूल संविधान में नगरीय शासन व्यवस्था के लिए अलग से विस्तृत प्रावधान नहीं किया गया था। इसे सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में शामिल किया गया और इससे सम्बन्धित कानून बनाने का अधिकार राज्यों को दिया गया।

वर्ष 1993 में 74वें संविधान संशोधन द्वारा नगरीय शासन व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई।

इस व्यवस्था के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के नगरीय निकायों के गठन का प्रावधान किया गया—

  1. नगर पंचायत
  2. नगर पालिका
  3. नगर निगम
  4. नगर क्षेत्र समितियाँ
  5. अधिसूचित क्षेत्र समिति
  6. छावनी परिषद
भारत में नगरीय प्रशासन का विकास और 74वाँ संविधान संशोधन
भारत में नगरीय प्रशासन का विकास और संवैधानिक मान्यता

स्थानीय निकायों का निर्वाचन

स्थानीय निकायों के सदस्यों का निर्वाचन वयस्क मतदाताओं द्वारा सामान्यतः प्रत्येक 5 वर्ष के लिए किया जाता है।

स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ने के लिए व्यक्ति की न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई है।

चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति के लिए यह भी आवश्यक है कि वह सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर न हो, भ्रष्टाचार के कारण किसी सेवा से पदच्युत न किया गया हो तथा स्थानीय शासन से सम्बन्धित अपराध का दोषी न हो।

नगर पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम और अन्य स्थानीय निकायों के निर्वाचन की शक्तियाँ 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1993 के अन्तर्गत प्रत्येक राज्य एवं संघ राज्य क्षेत्र में गठित राज्य निर्वाचन आयोग में निहित हैं।

राज्य निर्वाचन आयोग, भारत निर्वाचन आयोग से स्वतंत्र होता है।

नगर पंचायत

नगरीय स्थानीय स्वशासन में नगर पंचायत सबसे निचले स्तर पर कार्य करती है।

नगर पंचायत ऐसे संक्रमणशील क्षेत्र के लिए बनाई जाती है जो ग्रामीण क्षेत्र से नगरीय क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा हो।

इन क्षेत्रों की जनसंख्या सामान्यतः 5,000 से 1 लाख के बीच होती है।

नगर पंचायत में जनसंख्या के आधार पर लगभग 10 से 24 सदस्य हो सकते हैं। इन सदस्यों का निर्वाचन नगर पंचायत के नागरिकों द्वारा 5 वर्ष के लिए किया जाता है।

जनसंख्या के आधार पर नगरीय निकाय

जनसंख्या नगरीय निकाय सदस्यों की संख्या
5,000 से 1 लाख नगर पंचायत — छोटे नगर 10 से 24
1 लाख से 5 लाख नगर पालिका परिषद — बड़े नगर 25 से 55
5 लाख से अधिक नगर निगम — अति वृहद नगर 60 से 110
नगर पंचायत नगर पालिका परिषद और नगर निगम का जनसंख्या के आधार पर वर्गीकरण
जनसंख्या के आधार पर प्रमुख नगरीय स्थानीय निकाय

नगर पालिका परिषद

नगर पालिका परिषद नगर पंचायत और नगर निगम के बीच की कड़ी होती है। कुछ राज्यों में इसे नगर पालिका या नगर बोर्ड भी कहा जाता है।

नगर पालिका के सदस्यों का निर्वाचन नगर की जनता द्वारा किया जाता है।

नगर पालिका में सामान्यतः 1 लाख से 5 लाख तक की जनसंख्या निवास करती है।

नगर पालिका परिषद कई वार्डों अथवा खण्डों में विभाजित होती है। नगर के प्रत्येक वार्ड से कितने सदस्य चुने जाएँगे, इसका निर्णय राज्य सरकार करती है।

सभापति एवं उपसभापति

नगर पालिका में एक सभापति तथा एक उपसभापति होता है।

सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति उसके पद का कार्य करता है।

सभापति नगर पालिका परिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा नगर पालिका के वित्तीय एवं प्रशासनिक कार्यों पर निगरानी रखता है।

इन पदाधिकारियों का पद अवैतनिक बताया गया है।

नगरपालिका आयुक्त

नगर पालिका एक प्रशासनिक इकाई होती है। इसमें सामान्यतः एक नगरपालिका आयुक्त प्रशासनिक अधिकारी होता है।

नगरपालिका आयुक्त का पद वैतनिक होता है। वह नगर पालिका के कार्यवाही विभाग का प्रमुख होता है तथा नगर परिषद या नगरपालिका परिषद के नियंत्रण में कार्य करता है।

नगर पालिका के प्रमुख कार्य

नगर पालिका नागरिकों को आवश्यक स्थानीय सुविधाएँ उपलब्ध कराने तथा नगर को स्वच्छ और व्यवस्थित रखने से सम्बन्धित अनेक कार्य करती है।

  1. सार्वजनिक सड़कों और नालियों की सफाई।
  2. सार्वजनिक शौचालयों और मूत्रालयों की सफाई एवं रख-रखाव।
  3. कूड़े का एकत्रीकरण, परिवहन एवं निस्तारण।
  4. मृत पशुओं के शवों का निस्तारण।
  5. नगर को स्वच्छ रखने के अन्य आवश्यक उपाय।
  6. गन्दे जल के निस्तारण की व्यवस्था।
  7. जन्म-मृत्यु का पंजीकरण।
  8. शवों के निस्तारण के लिए निर्धारित स्थानों का विनियमन।
  9. संक्रामक रोगों की रोकथाम के उपाय।
  10. स्वास्थ्य के लिए हानिकारक व्यवसायों पर नियंत्रण।
  11. आवारा पशुओं को पकड़ना।
  12. पालतू कुत्तों की लाइसेंसिंग।
  13. उपविधियों के अधीन तथा अन्य आवश्यक लाइसेंस जारी करना।

नगर पंचायत और नगर पालिका परिषद में अन्तर

आधार नगर पंचायत नगर पालिका परिषद
स्थिति नगरीय स्थानीय स्वशासन का निम्न स्तर नगर पंचायत और नगर निगम के मध्य
क्षेत्र ग्रामीण से नगरीय क्षेत्र में बदलता क्षेत्र विकसित बड़ा नगर
जनसंख्या 5,000 से 1 लाख 1 लाख से 5 लाख
सदस्य 10 से 24 25 से 55
निर्वाचन नगर के नागरिकों द्वारा नगर की जनता द्वारा
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • भारत में आधुनिक नगर निगम की स्थापना सर्वप्रथम 1687 ई. में मद्रास में की गई।
  • 1793 के चार्टर अधिनियम के अन्तर्गत मद्रास, कलकत्ता और मुंबई में नगर निगम स्थापित किए गए।
  • 1842 में बंगाल अधिनियम पारित किया गया।
  • लॉर्ड रिपन ने 1882 में नगरीय शासन व्यवस्था में सुधार का प्रयास किया।
  • 1909 में शाही विकेन्द्रीकरण आयोग का गठन हुआ।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1919 में नगरीय प्रशासन से सम्बन्धित स्पष्ट प्रावधान किए गए।
  • 74वें संविधान संशोधन, 1993 द्वारा नगरीय स्थानीय निकायों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई।
  • नगर पंचायत, नगर पालिका और नगर निगम प्रमुख नगरीय स्थानीय निकाय हैं।
  • स्थानीय निकायों के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा कराए जाते हैं।
  • स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है।
  • नगर पंचायत ग्रामीण क्षेत्र से नगरीय क्षेत्र में परिवर्तित हो रहे संक्रमणशील क्षेत्र में गठित की जाती है।
  • 5,000 से 1 लाख जनसंख्या पर नगर पंचायत और इसके 10 से 24 सदस्य हो सकते हैं।
  • 1 लाख से 5 लाख जनसंख्या पर नगर पालिका परिषद और इसके 25 से 55 सदस्य हो सकते हैं।
  • नगर पालिका परिषद, नगर पंचायत और नगर निगम के बीच की कड़ी है।
  • नगर पालिका के सदस्यों का निर्वाचन नगर की जनता करती है।
  • नगर पालिका में सभापति और उपसभापति होते हैं।
  • नगरपालिका आयुक्त प्रशासनिक एवं वैतनिक अधिकारी होता है।
  • नगर पालिका सफाई, कूड़ा निस्तारण, जल निकासी, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, रोग नियंत्रण और लाइसेंस जैसे नागरिक कार्य करती है।

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Topic 6 नगर निगम—गठन, संगठन एवं कार्य

नगर निगम—गठन, संगठन एवं कार्य

नगर निगम

नगर निगम को सिटी कॉरपोरेशन, महानगर पालिका अथवा महानगर निगम भी कहा जाता है। यह नगरीय स्थानीय स्वशासन की सर्वोच्च संस्था है।

भारत में सर्वप्रथम 1687 ई. में मद्रास, वर्तमान चेन्नई में नगर निगम की स्थापना की गई थी। इसके बाद मुंबई और कलकत्ता में भी नगर निगम स्थापित किए गए।

नगर निगम का गठन सामान्यतः बड़े नगरों के प्रशासन के लिए किया जाता है। इसकी स्थापना राज्य विधानमण्डल द्वारा बनाए गए अधिनियम के आधार पर होती है और इसके अधिकार तथा शक्तियाँ राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की जाती हैं।

सामान्यतः 5 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरों में नगर निगम बनाया जाता है। नगर निगम की स्थापना के लिए जनसंख्या, क्षेत्र तथा उपलब्ध साधनों को भी ध्यान में रखा जाता है।

नगर निगम में सदस्यों की संख्या लगभग 60 से 110 तक हो सकती है।

नगर निगम का कार्यकाल

नगर निगम का गठन सामान्यतः 5 वर्ष के लिए किया जाता है।

नगर निगम का संगठन

नगर निगम में नागरिकों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि होते हैं। इन प्रतिनिधियों का निर्वाचन मताधिकार के आधार पर किया जाता है।

नगर निगम की प्रशासनिक एवं प्रतिनिधिक व्यवस्था के प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं—

  • नगर निगम परिषद
  • महापौर
  • उपमहापौर
  • सभासद
  • विशिष्ट सभासद
  • स्थायी समितियाँ
  • नगर निगम आयुक्त / नगर आयुक्त

सभासद

नगर निगम के प्रतिनिधियों को सभासद कहा जाता है। इनका निर्वाचन नगर के मतदाताओं द्वारा किया जाता है।

नगर निगम के लिए सभासदों की संख्या सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है। कुछ स्थान विशिष्ट जातियों के लिए सुरक्षित भी रखे जाते हैं।

विशिष्ट सभासदों का चुनाव जनता द्वारा चुने गए सभासदों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक 9 सभासदों पर एक विशिष्ट सभासद का प्रावधान बताया गया है।

सभासद बनने के लिए व्यक्ति का पागल या दिवालिया न होना तथा महानगर पालिका के किसी लाभ के पद या सरकारी नौकरी में न होना आवश्यक है।

महापौर

नगर निगम परिषद का प्रधान महापौर या मेयर होता है। महापौर का पद अत्यन्त सम्मानजनक माना जाता है।

महापौर का चुनाव नगर निगम के सदस्यों में से किया जाता है। वह नगर का प्रथम नागरिक माना जाता है।

महापौर नगर निगम की सभाओं की अध्यक्षता करता है और निगम का औपचारिक प्रमुख होता है।

महापौर, नगर आयुक्त और राज्य सरकार के बीच सम्प्रेषण एवं समन्वय का कार्य भी करता है।

महापौर के कार्यों में सहायता के लिए उपमहापौर का चुनाव किया जाता है।

नगर निगम परिषद

नगर निगम की प्रशासनिक शक्तियाँ परिषद में निहित होती हैं। परिषद नगर निगम की एक महत्वपूर्ण संस्था है और स्थानीय स्तर पर विधान संस्था की तरह कार्य करती है।

परिषद में निर्वाचित सदस्यों के अतिरिक्त कुछ चयनित सदस्य भी होते हैं, जिन्हें विशिष्ट सभासद के रूप में शामिल किया जाता है।

नगर निगम आयुक्त / नगर आयुक्त

नगर आयुक्त नगर निगम का मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी होता है।

नगर आयुक्त की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है और वह सामान्यतः भारतीय अथवा राज्य प्रशासनिक सेवा का अधिकारी होता है।

नगर आयुक्त स्थायी समितियों तथा नगर निगम परिषद द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू कराने की जिम्मेदारी निभाता है।

इस प्रकार निर्वाचित परिषद नीतिगत निर्णय लेती है, जबकि नगर आयुक्त प्रशासनिक स्तर पर उन निर्णयों को क्रियान्वित करता है।

नगर निगम की स्थायी समितियाँ

नगर निगम के कार्य अत्यधिक विस्तृत होते हैं। इन कार्यों को सुचारु रूप से संचालित करने और नगर निगम के दैनिक कार्यभार को कम करने के लिए विभिन्न स्थायी समितियों का गठन किया जाता है।

ये समितियाँ सार्वजनिक कार्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, काराधान और वित्त आदि विषयों से सम्बन्धित मामलों पर कार्य करती हैं।

स्थायी समितियाँ सामान्यतः दो प्रकार की बताई गई हैं—

  • संवैधानिक समितियाँ
  • गैर-संवैधानिक समितियाँ

1. कार्यकारिणी समिति

कार्यकारिणी समिति में 12 सदस्य होते हैं। इनका निर्वाचन महानगर पालिका अपने सभासदों एवं विशिष्ट सभासदों में से करती है।

इस समिति का अध्यक्ष उप-नगरप्रमुख होता है। यह समिति महानगर पालिका के कार्यों को सुचारु रूप से चलाने में सहायता करती है।

2. विकास समिति

विकास समिति में भी 12 सदस्य होते हैं। इसके सदस्य नगर निगम के सभासदों तथा विशिष्ट सभासदों में से चुने जाते हैं।

विकास समिति नगर के विकास सम्बन्धी कार्यों में सहायता करती है।

नगर निगम का संगठन महापौर नगर आयुक्त समितियाँ और प्रमुख कार्य
नगर निगम—संगठन, प्रमुख पदाधिकारी, समितियाँ और कार्य

नगर निगम के प्रमुख कार्य

नगर निगम के कार्यों को मुख्य रूप से चार प्रमुख वर्गों में रखा गया है—

1. सार्वजनिक निर्माण

नगर निगम नगर के भौतिक विकास और नागरिक सुविधाओं से सम्बन्धित निर्माण कार्य करता है। इनमें प्रमुख हैं—

  • सड़कों और गलियों का निर्माण तथा मरम्मत।
  • नगर में रोशनी की व्यवस्था।
  • जल की व्यवस्था।
  • आग से बचाव की व्यवस्था।

2. सार्वजनिक स्वास्थ्य

नगर की जनता के स्वास्थ्य की रक्षा करना नगर निगम का महत्वपूर्ण कार्य है।

  • संक्रामक रोगों की रोकथाम।
  • दवाखानों की व्यवस्था।
  • चिकित्सालयों का प्रबन्ध।
  • जनता के स्वास्थ्य से सम्बन्धित आवश्यक व्यवस्थाएँ करना।

3. सार्वजनिक शिक्षा

नगर निगम सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था और प्रबन्ध से सम्बन्धित कार्य भी करता है।

4. सार्वजनिक सुविधाएँ

नगर निगम नागरिकों के सामाजिक और सार्वजनिक जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए अनेक व्यवस्थाएँ करता है।

  • पार्कों की व्यवस्था।
  • वाचनालयों की व्यवस्था।
  • मेलों का प्रबन्ध।
  • गुजर तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाओं की व्यवस्था।

नगर निगम की प्रशासनिक संरचना—एक नजर में

घटक मुख्य भूमिका
नगर निगम परिषद नगर निगम की प्रतिनिधिक एवं महत्वपूर्ण निर्णयकारी संस्था
महापौर निगम का औपचारिक प्रमुख एवं नगर का प्रथम नागरिक
उपमहापौर महापौर के कार्यों में सहायता
सभासद नागरिकों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि
नगर आयुक्त नगर निगम का मुख्य कार्यकारी अधिकारी
स्थायी समितियाँ विशिष्ट विषयों से सम्बन्धित कार्यों में सहायता

नगर निगम के चार प्रमुख कार्य-क्षेत्र

कार्य-क्षेत्र प्रमुख कार्य
सार्वजनिक निर्माण सड़क, गली, रोशनी, जल एवं अग्नि सुरक्षा
सार्वजनिक स्वास्थ्य रोगों की रोकथाम, दवाखाने एवं चिकित्सालय
सार्वजनिक शिक्षा सार्वजनिक शिक्षा का प्रबन्ध
सार्वजनिक सुविधाएँ पार्क, वाचनालय, मेला एवं अन्य नागरिक सुविधाएँ
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • नगर निगम नगरीय स्थानीय स्वशासन की सर्वोच्च संस्था है।
  • नगर निगम को सिटी कॉरपोरेशन, महानगर पालिका या महानगर निगम भी कहा जाता है।
  • भारत में सर्वप्रथम 1687 ई. में मद्रास में नगर निगम स्थापित किया गया।
  • सामान्यतः 5 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरों में नगर निगम बनाया जाता है।
  • नगर निगम में सदस्यों की संख्या लगभग 60 से 110 तक हो सकती है।
  • नगर निगम का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
  • महापौर नगर निगम का औपचारिक प्रमुख तथा नगर का प्रथम नागरिक होता है।
  • महापौर का चुनाव नगर निगम के सदस्यों में से किया जाता है।
  • उपमहापौर महापौर के कार्यों में सहायता करता है।
  • नगर आयुक्त नगर निगम का मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी होता है और उसकी नियुक्ति राज्य सरकार करती है।
  • नगर निगम में परिषद, महापौर, समितियाँ और नगर आयुक्त प्रमुख घटक हैं।
  • नगर निगम के विस्तृत कार्यों को संचालित करने के लिए स्थायी समितियाँ गठित की जाती हैं।
  • कार्यकारिणी समिति में 12 सदस्य होते हैं और उसका अध्यक्ष उप-नगरप्रमुख होता है।
  • विकास समिति में भी 12 सदस्य होते हैं।
  • नगर निगम के कार्यों को सार्वजनिक निर्माण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक शिक्षा और सार्वजनिक सुविधाएँ—चार प्रमुख वर्गों में रखा गया है।
  • सड़क, रोशनी, जल और अग्नि सुरक्षा सार्वजनिक निर्माण से सम्बन्धित प्रमुख कार्य हैं।
  • संक्रामक रोगों की रोकथाम, दवाखाने और चिकित्सालय सार्वजनिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित कार्य हैं।
  • पार्क, वाचनालय और मेला प्रबन्ध सार्वजनिक सुविधाओं से सम्बन्धित प्रमुख कार्य हैं।
Topic 7 जिला प्रशासन, जिलाधिकारी एवं कानून व्यवस्था

जिला प्रशासन, जिलाधिकारी एवं कानून व्यवस्था

जनपद / जिला स्तरीय प्रशासन

भारत राज्यों और केन्द्रशासित क्षेत्रों में विभाजित है। प्रशासन की सुविधा के लिए राज्यों को आगे जिलों में बाँटा गया है। उत्तर प्रदेश में 75 जिले बताए गए हैं।

जिला प्रशासन प्राचीन काल से प्रशासन की महत्वपूर्ण इकाई रहा है और वर्तमान समय में भी शासन की नीतियों तथा योजनाओं को व्यावहारिक रूप से लागू करने में इसकी विशेष भूमिका है।

स्वतंत्रता के बाद शासन व्यवस्था में दो प्रकार की प्रशासनिक गतिविधियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं—

  • शासन द्वारा नीति-निर्माण।
  • प्रशासन द्वारा उन नीतियों को व्यावहारिक स्तर पर लागू करना।

जनता द्वारा निर्वाचित सरकार सामान्यतः पाँच वर्ष के लिए चुनी जाती है और जनकल्याण से सम्बन्धित नीतियाँ बनाती है। इन नीतियों के क्रियान्वयन का कार्य सरकारी विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा किया जाता है।

अच्छे नागरिक के गुण

जिला प्रशासन का उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि नागरिकों को सुव्यवस्थित और सुरक्षित जीवन प्रदान करना भी है। एक आदर्श नागरिक के प्रमुख गुण निम्नलिखित बताए गए हैं—

  1. वह अपने अधिकारों और कर्तव्यों दोनों के प्रति सचेत रहता है तथा अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों के प्रति अधिक जागरूक होता है।
  2. वह गृहस्थ, सरकारी कर्मचारी, व्यवसायी अथवा किसी अन्य स्थिति में रहते हुए अपने कर्तव्यों का ध्यान रखता है।
  3. वह चुनाव में भाग लेकर अपने मत का उचित प्रयोग करता है।
  4. वह सहनशील, आत्म-सम्मानी, सत्य बोलने वाला, परिश्रमी और स्वावलम्बी होता है।

जिलाधिकारी

जिला प्रशासन के मुख्य अधिकारी को जिलाधिकारी कहा जाता है। कुछ राज्यों में उसे डिप्टी कमिश्नर, कलेक्टर या जिलाधीश भी कहा जाता है।

जिलाधिकारी भारतीय प्रशासनिक सेवा का महत्वपूर्ण अधिकारी होता है। उसका चयन अखिल भारतीय प्रतियोगिता परीक्षा के माध्यम से किया जाता है।

संविधान के अनुच्छेद 311 के अन्तर्गत उसे विभिन्न प्रकार की सेवा-सुरक्षाएँ प्रदान की गई हैं, जिससे वह दबाव और भय से मुक्त होकर कार्य कर सके।

राज्य शासन किसी अधिकारी को नियुक्ति देकर जिलाधिकारी बनाता है। जिलाधिकारी का वेतन राज्य के राजकोष से दिया जाता है। जिलाधिकारी के रूप में कार्य करते समय उसे सरकारी आवास, वाहन और सुरक्षा कर्मचारियों जैसी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं।

जिलाधिकारी की प्रमुख प्रशासनिक भूमिकाएँ

जिलाधिकारी अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन विभिन्न रूपों में करता है—

  1. जिला प्रशासक के रूप में।
  2. जिला मजिस्ट्रेट / दण्डाधिकारी के रूप में।
  3. जिला विकास अधिकारी के रूप में।
  4. राजस्व अधिकारी के रूप में।
  5. सरकार के प्रतिनिधि के रूप में।

इन कार्यों को पूरा करने के लिए जिलाधिकारी जिले के विभिन्न अधिकारियों और कर्मचारियों की सहायता लेता है।

वह दौरे और बैठकों के माध्यम से जनता से सम्पर्क स्थापित करता है। समय-समय पर तहसील दिवस तथा अन्य बैठकों का आयोजन करके जनसमस्याओं का निराकरण भी करता है।

जिलाधिकारी जिले के विभिन्न विभागों के अधिकारियों के कार्यों की समीक्षा भी करता है।

जिला प्रशासन की प्रमुख कार्य-व्यवस्थाएँ

जिला प्रशासन में जिलाधिकारी या जिला कलेक्टर के अधीन कार्यों को मुख्यतः शान्ति एवं व्यवस्था, भूमि-अभिलेख एवं भू-राजस्व तथा नागरिक सुविधाएँ एवं विकास जैसे क्षेत्रों में संगठित किया गया है।

1. शान्ति और व्यवस्था से जुड़े अधिकारी
  • तहसीलदार
  • पुलिस उपाधीक्षक
  • इंस्पेक्टर
  • सब इंस्पेक्टर
  • सहायक सब इंस्पेक्टर
  • हेड कॉन्स्टेबल
  • सिपाही
  • चौकीदार
  • जेलर
  • उप जेलर
2. भूमि का ब्यौरा एवं भू-राजस्व

भूमि अभिलेख और भू-राजस्व व्यवस्था में निम्न अधिकारी प्रमुख रूप से कार्य करते हैं—

तहसीलदार → नायब तहसीलदार → कानूनगो → पटवारी / लेखपाल

3. नागरिक सुविधाएँ एवं विकास

नागरिक सुविधाओं और विकास से सम्बन्धित प्रमुख अधिकारियों एवं संस्थाओं में निम्न शामिल हैं—

  • जिला सिविल सर्जन / मुख्य चिकित्सा अधिकारी
  • जिला विद्यालय निरीक्षक
  • जिला नियोजन अधिकारी
  • कार्यकारी अभियन्ता
  • शहरी स्थानीय संस्थाएँ तथा पंचायती राज संस्थाएँ

जिलाधिकारी की शक्तियाँ एवं कार्य

जिलाधिकारी जिले में प्रशासन, कानून व्यवस्था, नागरिक सुविधाओं और शासन से सम्बन्धित अनेक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों का निर्वहन करता है।

  1. जिला कार्यान्वयन समिति की अध्यक्षता करना।
  2. जिले का मुख्य प्रोटोकॉल अधिकारी होना।
  3. प्रशासन और नागरिकों के बीच समन्वयकारी तत्व के रूप में कार्य करना।
  4. जिले में नगरपालिका प्रशासन की निगरानी करना।
  5. सरकार के जनसम्पर्क अधिकारी के रूप में कार्य करना।
  6. जिले में समारोहों के समय राज्य सरकार के आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में कार्य करना।
  7. प्राकृतिक आपदाओं और अन्य आपातकालीन परिस्थितियों में मुख्य आपदा प्रशासक के रूप में कार्य करना।
  8. जिले के स्टाफ के आधिकारिक मामलों का निपटारा करना।
  9. नागरिक आपूर्ति के लिए उत्तरदायी होना।
  10. नागरिक सुरक्षा से सम्बन्धित कार्यों की देखरेख करना।
  11. सैन्य अधिकारियों से सम्बन्ध बनाए रखना तथा सशस्त्र सेनाओं के कार्यरत और सेवानिवृत्त सदस्यों के कल्याण का ध्यान रखना।
  12. संसद और विधानसभा के चुनावों में निर्वाचन अधिकारी के रूप में कार्य करना।
  13. जिला स्तर पर निर्वाचन कार्यों की व्यवस्था करना।
  14. जिला जनगणना अधिकारी के रूप में कार्य करना।

कानून व्यवस्था

जिले में कानून और व्यवस्था बनाए रखना जिलाधिकारी / जिलाधीश की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले जिलाधीश को कार्यपालिका मजिस्ट्रेट और न्यायिक मजिस्ट्रेट दोनों प्रकार के कार्य करने होते थे।

कार्यपालिका मजिस्ट्रेट के रूप में वह जिले में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी था, जबकि न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में आपराधिक और सिविल मामलों में कानून के अनुसार मुकदमों का संचालन करता था।

स्वतंत्रता के बाद न्यायिक और कार्यपालिका शक्तियों का पृथक्करण

स्वतंत्रता के बाद संविधान के अनुच्छेद 50 के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुसार न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग किया गया।

इसके फलस्वरूप जिलाधीश की न्यायिक मजिस्ट्रेट वाली भूमिका समाप्त कर दी गई।

न्यायिक मामलों का कार्य जिला न्यायाधीश को दिया गया, जो राज्य के उच्च न्यायालय के प्रत्यक्ष नियंत्रण में कार्य करता है।

जिला मजिस्ट्रेट के रूप में कानून व्यवस्था सम्बन्धी कार्य

  1. जिले में कानून और व्यवस्था बनाए रखना जिलाधीश का प्रमुख कर्तव्य है।
  2. जिला पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में जिला पुलिस जिलाधीश के नियंत्रण और निर्देशन में कानून व्यवस्था से सम्बन्धित कार्य करती है।
  3. स्वतंत्रता से पहले जिलाधीश कार्यपालिका और न्यायिक दोनों प्रकार के मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य करता था।
  4. कार्यपालिका मजिस्ट्रेट के रूप में वह कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी था।
  5. न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में वह आपराधिक और सिविल मामलों की सुनवाई से सम्बन्धित कार्य करता था।
  6. स्वतंत्रता के बाद अनुच्छेद 50 के अनुसार न्यायपालिका और कार्यपालिका को पृथक किया गया।
  7. इसके बाद जिलाधीश की न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका समाप्त हो गई।
  8. अधीनस्थ न्यायिक निकायों का नियंत्रण तथा निगरानी करना।
  9. लोक-शान्ति और व्यवस्था को खतरा होने पर दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के अन्तर्गत आदेश जारी करना।
  10. सरकार तथा अन्य संस्थाओं या व्यक्तियों से प्राप्त याचिकाओं का निपटारा करना।
  11. सरकार को वार्षिक अपराध प्रतिवेदन प्रस्तुत करना।
  12. कैदियों को सजा समाप्त होने पर अथवा विशेष उद्देश्य के लिए तत्काल मुक्त करना।
  13. जेलों का निरीक्षण करना।

कानून व्यवस्था से सम्बन्धित प्रमुख अधिकारी

जिला प्रशासन में कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों की श्रृंखला निम्न प्रकार बताई गई है—

पुलिस अधीक्षक → पुलिस उपाधीक्षक → इंस्पेक्टर → सब इंस्पेक्टर → अन्य अधिकारी / कर्मचारी

जिले के प्रमुख विभाग एवं अधिकारी

जिला प्रशासन अनेक विभागों के माध्यम से कार्य करता है। जिले के प्रमुख विभाग और उनके प्रमुख अधिकारियों का विवरण निम्नलिखित है—

विभाग जिला प्रमुख अधिकारी
राजस्व और सामान्य प्रशासन जिला कलेक्टर / उपायुक्त / जिला मजिस्ट्रेट
पंजीकरण जिला कलेक्टर / उपायुक्त / जिला मजिस्ट्रेट
पुलिस पुलिस अधीक्षक
एक्साइज एक्साइज अधीक्षक / जिला आबकारी अधिकारी
चिकित्सा सिविल सर्जन / जिला चिकित्सा अधिकारी
जन-स्वास्थ्य जिला स्वास्थ्य अधिकारी
वन जिला वन अधिकारी
शिक्षा जिला विद्यालय निरीक्षक / जिला शिक्षा अधिकारी
सहकारिता सहकारी समितियों का सहायक पंजीयक
कृषि सहायक निदेशक / जिला कृषि अधिकारी
उद्योग सहायक निदेशक उद्योग / जिला उद्योग अधिकारी
न्यायिक जिला जज / जिला एवं सत्र न्यायाधीश
सामाजिक कल्याण समाज कल्याण अधिकारी / पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारी
कारागार कारागार अधीक्षक
श्रम सहायक श्रम आयुक्त / जिला श्रम अधिकारी
सार्वजनिक कार्य अधिशासी अभियन्ता
नागरिक आपूर्ति / राशनिंग जिला खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति अधिकारी
पशु चिकित्सा जिला वेटरनरी अधिकारी / सहायक निदेशक वेटरनरी सेवा
सूचना / प्रचार जिला सूचना अधिकारी / सहायक निदेशक प्रचार
सांख्यिकी जिला सांख्यिकी अधिकारी
रोजगार जिला रोजगार अधिकारी
पंचायत जिला पंचायत अधिकारी
कोषागार और लेखा जिला कोषागार अधिकारी / जिला लेखा अधिकारी
नियोजन जिला योजना अधिकारी
बिक्री कर जिला बिक्री कर अधिकारी
जिला प्रशासन में जिलाधिकारी की भूमिका कानून व्यवस्था राजस्व और नागरिक सुविधाओं की संरचना
जिला प्रशासन—जिलाधिकारी की भूमिका, कानून व्यवस्था, राजस्व और नागरिक सुविधाएँ
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जिला प्रशासन शासन की नीतियों और योजनाओं को व्यावहारिक रूप से लागू करने वाली महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई है।
  • जिला प्रशासन का मुख्य अधिकारी जिलाधिकारी कहलाता है।
  • कुछ राज्यों में जिलाधिकारी को डिप्टी कमिश्नर, कलेक्टर या जिलाधीश भी कहा जाता है।
  • जिलाधिकारी भारतीय प्रशासनिक सेवा का महत्वपूर्ण अधिकारी होता है।
  • जिलाधिकारी जिला प्रशासक, जिला मजिस्ट्रेट, जिला विकास अधिकारी, राजस्व अधिकारी तथा सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है।
  • वह जनता से सम्पर्क, जनसमस्याओं का निराकरण और विभिन्न विभागों के कार्यों की समीक्षा करता है।
  • जिलाधिकारी जिला कार्यान्वयन समिति का अध्यक्ष और जिले का मुख्य प्रोटोकॉल अधिकारी होता है।
  • प्राकृतिक आपदा या अन्य आपातकाल में वह मुख्य आपदा प्रशासक के रूप में कार्य करता है।
  • वह संसद और विधानसभा चुनावों में निर्वाचन अधिकारी तथा जिला जनगणना अधिकारी के रूप में भी कार्य करता है।
  • जिले में कानून और व्यवस्था बनाए रखना जिलाधिकारी का प्रमुख कर्तव्य है।
  • स्वतंत्रता से पहले जिलाधीश कार्यपालिका और न्यायिक दोनों प्रकार के मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य करता था।
  • संविधान के अनुच्छेद 50 के अनुसार स्वतंत्रता के बाद न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग किया गया।
  • इसके बाद जिलाधीश की न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका समाप्त कर न्यायिक मामलों का कार्य जिला न्यायाधीश को दिया गया।
  • लोक-शान्ति और व्यवस्था को खतरा होने पर जिलाधिकारी धारा 144 के अन्तर्गत आदेश जारी कर सकता है।
  • पुलिस अधीक्षक जिले की पुलिस व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी होता है।
  • जिला प्रशासन में राजस्व, पुलिस, चिकित्सा, स्वास्थ्य, वन, शिक्षा, कृषि, उद्योग, न्याय, सामाजिक कल्याण, श्रम, नागरिक आपूर्ति और अन्य अनेक विभाग कार्य करते हैं।

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Topic 8 राजस्व प्रशासन, भूमि व्यवस्था एवं नागरिक सुविधाएँ

राजस्व प्रशासन, भूमि व्यवस्था एवं नागरिक सुविधाएँ

राजस्व प्रशासन

जिला प्रशासन के महत्वपूर्ण कार्यों में राजस्व प्रशासन का विशेष स्थान है। पहले जिलाधीश का प्रमुख कार्य राजस्व संग्रह करना था। इसी कारण उसे कलेक्टर कहा गया, जिसका अर्थ संग्रहकर्ता होता है।

आज भी जिलाधीश जिले में राजस्व प्रशासन का प्रमुख अधिकारी होता है और भूमि-राजस्व तथा उससे सम्बन्धित विभिन्न प्रशासनिक कार्यों की देखरेख करता है।

कुछ राज्यों में राजस्व संग्रह की व्यवस्था अलग-अलग संस्थाओं के माध्यम से संचालित होती है। महाराष्ट्र और गुजरात में राजस्व बोर्ड अथवा राजस्व अधिकरण तथा पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में वित्त आयुक्त के माध्यम से राजस्व संग्रह की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।

राजस्व प्रशासन के प्रमुख कार्य

जिले में राजस्व प्रशासन के प्रमुख के रूप में जिलाधीश निम्नलिखित कार्यों के लिए उत्तरदायी होता है—

  1. भूमि-राजस्व संग्रह करना।
  2. अन्य सरकारी बकायों की वसूली करना।
  3. ऋणों का वितरण और उनकी वसूली करना।
  4. भूमि अभिलेखों का रख-रखाव करना।
  5. ग्रामीण आँकड़े एकत्र करना।
  6. आबादी के बसाव के प्रयोजन से भूमि अधिग्रहित करना।
  7. भूमि सुधार से सम्बन्धित कार्यक्रम लागू करना।
  8. कृषि कार्य से जुड़े लोगों के हितों की देखभाल करना।
  9. बाढ़, सूखा और आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत कार्यों की निगरानी तथा फसलों की क्षति का आकलन करना।
  10. कोषागार तथा कोषागार के पर्यवेक्षण का कार्य करना।
  11. स्टाम्प अधिनियम लागू करना।
  12. पुनर्वास अनुदान का भुगतान करना।
  13. सरकारी सम्पत्तियों का प्रबन्ध करना।
  14. निचले प्राधिकरणों के आदेशों के विरुद्ध राजस्व से सम्बन्धित अपीलों की सुनवाई करना।
  15. जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के कारण क्षतिपूर्ति का भुगतान करना।

भूमि व्यवस्था

स्वतंत्रता से पहले भारत की कृषि व्यवस्था में भूमि का स्वामित्व कुछ व्यक्तियों के हाथों में केन्द्रित था। इससे किसानों का शोषण होता था और ग्रामीण जनसंख्या के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न होती थी।

स्वतंत्रता के बाद भूमि के समान वितरण और ग्रामीण विकास की दिशा में भूमि सुधार को महत्वपूर्ण साधन माना गया।

ग्रामीण विकास मंत्रालय के अन्तर्गत भूमि संसाधन विभाग भूमि सुधार से सम्बन्धित मामलों के लिए महत्वपूर्ण संस्था है। इसके कार्यों में अधिशेष भूमि का वितरण, भूमि अभिलेखों का कम्प्यूटरीकरण तथा भू-अभिलेखों का नवीनीकरण शामिल है।

भूमि व्यवस्था से सम्बन्धित प्रशासनिक अधिकारी

जिला स्तर पर भूमि व्यवस्था और लगान वसूली से जुड़े अधिकारियों की प्रशासनिक श्रृंखला निम्न प्रकार है—

क्रम अधिकारी
1 जिलाधिकारी / जिलाधीश
2 उप-संभागीय अधिकारी
3 तहसीलदार
4 राजस्व निरीक्षक / कानूनगो
5 पटवारी / लेखपाल

इन अधिकारियों द्वारा भूमि की माप, खतौनी का रख-रखाव तथा राहत से सम्बन्धित कार्य किए जाते हैं।

भूमि अभिलेख व्यवस्था

भूमि अभिलेखों का प्रबन्ध अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रकार से किया जाता है। नागरिकों को पूर्ण भूमि रिकॉर्ड प्राप्त करने के लिए कई विभागों अथवा संस्थाओं से सम्पर्क करना पड़ सकता है।

भूमि के स्वामित्व में परिवर्तन का रिकॉर्ड राजस्व विभाग द्वारा रखा जाता है। नक्शों के लिए सर्वेक्षण तथा निपटान विभाग और बन्धन के पंजीयन के लिए पंजीयन विभाग से सम्बन्धित कार्य किए जाते हैं।

शहरी भूमि रिकॉर्ड नगर निगम के अधिकारियों से सम्बन्धित होते हैं।

भूमि अभिलेखों के कम्प्यूटरीकरण तथा राजस्व प्रशासन के सुदृढ़ीकरण से सम्बन्धित केन्द्र प्रायोजित योजनाओं को वर्ष 2008 में एक साथ मिलाकर देश में भूमि अभिलेख व्यवस्था को अधिक सुव्यवस्थित बनाने की दिशा में प्रयास किया गया।

राजस्व प्रशासन और भूमि व्यवस्था में जिलाधिकारी से लेखपाल तक प्रशासनिक संरचना
राजस्व एवं भूमि प्रशासन—जिलाधिकारी से पटवारी या लेखपाल तक प्रशासनिक संरचना

नागरिक सुविधाएँ एवं विकास

जिला प्रशासन के प्रमुख कार्यों में नागरिकों को विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ प्रदान करना और इन सुविधाओं का विकास करना भी शामिल है।

शासन-प्रशासन नागरिकों की समस्याओं के समाधान के लिए एक ऐसी व्यवस्था विकसित करता है जिसके माध्यम से आवश्यक सार्वजनिक सेवाएँ लोगों तक पहुँचाई जा सकें।

इन नागरिक सुविधाओं में प्रमुख रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सड़क, पानी, बिजली और मकान शामिल हैं।

जिला स्तर पर नागरिक सुविधाओं के अन्तर्गत मुख्य रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा व्यवस्था का विशेष महत्व है।

शिक्षा व्यवस्था

शिक्षा प्रशासन का प्रमुख उद्देश्य शिक्षा को मानवीय स्वरूप प्रदान करना तथा जनता को लोकतांत्रिक विधियों और संस्थाओं के अनुरूप प्रशिक्षित करना है।

शिक्षा व्यवस्था में केन्द्र और राज्य दोनों की भूमिका होती है। केन्द्र के स्तर पर विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय महत्व की वैज्ञानिक एवं प्राविधिक शिक्षण संस्थाओं, उच्च शिक्षा, अनुसंधान और शिक्षा के मानकों से सम्बन्धित समन्वय किया जाता है।

व्यावसायिक और श्रमिकों से सम्बन्धित प्राविधिक प्रशिक्षण को केन्द्र तथा राज्यों की समवर्ती भूमिका से जोड़ा गया है।

राज्य और जिला स्तर पर शिक्षा प्रशासन

राज्यों में शिक्षा व्यवस्था सामान्यतः राज्य के शिक्षा निदेशक की अध्यक्षता में संचालित होती है। उसके अधीन अनेक उपनिदेशक और सहायक अधिकारी कार्य करते हैं।

राज्य को विभिन्न मण्डलों अथवा अंचलों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक मण्डल एक निरीक्षक के अधीन तथा प्रत्येक जिला स्कूल निरीक्षक के अधीन होता है।

निचले स्तर पर नागरिक और ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था प्रायः स्थानीय निकायों द्वारा की जाती है। पंचायती राज और प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण के कारण इन संस्थाओं का विशेष महत्व है।

शिक्षा का महत्व

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यक्ति में आत्मविश्वास विकसित करती है तथा उसके व्यक्तित्व के निर्माण में सहायता करती है।

सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है—

  1. प्राथमिक शिक्षा
  2. माध्यमिक शिक्षा
  3. उच्च शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा विद्यार्थी को आधार प्रदान करती है, माध्यमिक शिक्षा आगे की पढ़ाई का मार्ग खोलती है और उच्च शिक्षा व्यक्ति को भविष्य में आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करती है।

जिला स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था

भारत में केन्द्र और राज्य सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं के विकास में मिलकर कार्य करती हैं। केन्द्र सरकार समय-समय पर राज्यों को स्वास्थ्य सम्बन्धी सुझाव और वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

राज्य सरकार का दायित्व अपने राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था करना है। इसके लिए राज्य सरकार जिला स्तर से लेकर मण्डल स्तर तक स्वास्थ्य प्रशासन की व्यवस्था करती है।

जिला स्वास्थ्य प्रशासन की संरचना

जिला स्तर की स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी मुख्य चिकित्सा अधिकारी होता है।

संस्था सम्बन्धित अधिकारी
जिला स्वास्थ्य व्यवस्था मुख्य चिकित्सा अधिकारी
जिला अस्पताल मुख्य चिकित्सा अधीक्षक
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र चिकित्साधिकारी
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र प्रभारी चिकित्साधिकारी
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के अधीन उपकेन्द्र

इन स्वास्थ्य संस्थाओं के माध्यम से परिवार कल्याण, रोगों के उपचार तथा बीमारियों की रोकथाम से सम्बन्धित कार्य किए जाते हैं।

स्वास्थ्य योजनाएँ एवं सेवाएँ

स्वास्थ्य सुविधाओं को प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाने के उद्देश्य से वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन प्रारम्भ किया गया।

इसके माध्यम से सरकारी खर्च पर अस्पतालों में उपचार की व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया। राज्य और जिला स्तर पर भी स्वास्थ्य सम्बन्धी विभिन्न योजनाएँ संचालित की जाती हैं।

नागरिकों के लिए एम्बुलेंस सुविधा का भी प्रावधान किया गया है। दुर्घटना की स्थिति में 108 नम्बर तथा गर्भवती महिलाओं के लिए 102 नम्बर पर सम्पर्क कर एम्बुलेंस सुविधा प्राप्त करने का उल्लेख किया गया है।

सुरक्षा व्यवस्था

प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा प्रदान करना राज्य सरकार का महत्वपूर्ण दायित्व है। इसके लिए राज्य सरकार केन्द्र सरकार के साथ समन्वय करके कार्य करती है।

सामान्यतः कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है, जबकि विशेष परिस्थितियों में केन्द्र सरकार आवश्यक सहायता प्रदान करती है।

राज्य सरकार अपने राज्य में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिला स्तर से लेकर ग्रामीण स्तर तक पुलिस तथा चौकीदारों की व्यवस्था करती है।

पुलिस प्रशासन के प्रमुख कार्य

सुरक्षा व्यवस्था का मुख्य दायित्व पुलिस प्रशासन पर होता है। पुलिस प्रशासन निम्नलिखित क्षेत्रों में नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास करता है—

  • मेले
  • बाजार
  • यातायात
  • शहर
  • कस्बे
  • गाँव

प्रत्येक नागरिक का भी दायित्व है कि वह सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करे, जिससे समाज में शान्ति बनी रहे और प्रत्येक व्यक्ति अपना समुचित विकास कर सके।

जिला स्तर पर शिक्षा स्वास्थ्य और सुरक्षा से सम्बन्धित नागरिक सुविधाओं की व्यवस्था
जिला स्तर की प्रमुख नागरिक सुविधाएँ—शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा

जिला स्तर की नागरिक सुविधाएँ—एक नजर में

क्षेत्र मुख्य व्यवस्था
शिक्षा राज्य शिक्षा प्रशासन, मण्डलीय व्यवस्था, जिला स्कूल निरीक्षण तथा स्थानीय निकायों द्वारा प्राथमिक शिक्षा
स्वास्थ्य मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं उपकेन्द्र
सुरक्षा जिला से ग्राम स्तर तक पुलिस एवं चौकीदार व्यवस्था
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जिलाधीश जिले के राजस्व प्रशासन का प्रमुख अधिकारी होता है।
  • कलेक्टर शब्द का अर्थ संग्रहकर्ता होता है और यह राजस्व संग्रह से जुड़ा पद है।
  • भूमि-राजस्व संग्रह, सरकारी बकायों की वसूली, भूमि अभिलेखों का रख-रखाव और भूमि सुधार राजस्व प्रशासन के प्रमुख कार्य हैं।
  • प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत कार्य और फसल क्षति का आकलन भी राजस्व प्रशासन से जुड़ा है।
  • भूमि प्रशासन की श्रृंखला में जिलाधिकारी, उप-संभागीय अधिकारी, तहसीलदार, कानूनगो और पटवारी/लेखपाल प्रमुख हैं।
  • भूमि की माप और खतौनी के रख-रखाव में राजस्व प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
  • भूमि अभिलेखों के कम्प्यूटरीकरण और नवीनीकरण को भूमि सुधार का महत्वपूर्ण भाग माना गया है।
  • जिला प्रशासन नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सड़क, पानी, बिजली और मकान जैसी सुविधाएँ प्रदान करने का कार्य करता है।
  • शिक्षा व्यवस्था को प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा—तीन प्रमुख भागों में बाँटा गया है।
  • निचले स्तर पर प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था में स्थानीय निकायों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
  • जिला स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी मुख्य चिकित्सा अधिकारी होता है।
  • जिला स्तर पर जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और उपकेन्द्र स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रमुख भाग हैं।
  • राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन वर्ष 2005 में प्रारम्भ किया गया।
  • दुर्घटना के लिए 108 और गर्भवती महिलाओं के लिए 102 नम्बर की एम्बुलेंस सुविधा का उल्लेख किया गया है।
  • कानून और व्यवस्था बनाए रखना सामान्यतः राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।
  • सुरक्षा व्यवस्था के लिए जिला से ग्रामीण स्तर तक पुलिस और चौकीदारों की व्यवस्था की जाती है।
  • नागरिकों का भी कर्तव्य है कि वे सुरक्षा व्यवस्था में सहयोग करें।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

‘नगर-निगम’ का अध्यक्ष होता है—

व्याख्या: नगर निगम का अध्यक्ष महापौर या मेयर होता है। वह नगर का प्रथम नागरिक भी माना जाता है।
Q 2

‘क्षेत्र-पंचायत’ का प्रमुख होता है—

व्याख्या: क्षेत्र पंचायत प्रखण्ड या ब्लॉक स्तर पर गठित होती है और इसका निर्वाचित प्रमुख ब्लॉक प्रमुख कहलाता है।
Q 3

ग्राम पंचायत के सदस्य चुने जाते हैं—

व्याख्या: ग्राम पंचायत का सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष होता है।
Q 4

मतदान करने की न्यूनतम आयु निर्धारित है—

व्याख्या: भारत में मतदान करने की न्यूनतम आयु 18 वर्ष है।
Q 5

पंचायती राज व्यवस्था में ‘पंचायत समिति’ किस स्तर पर गठित है—

व्याख्या: पंचायत समिति प्रखण्ड या ब्लॉक स्तर पर गठित होती है और इसे क्षेत्र पंचायत भी कहा जाता है।
Q 6

नगर पंचायत का कार्यकाल होता है—

व्याख्या: नगर पंचायत के सदस्यों का निर्वाचन सामान्यतः पाँच वर्ष के लिए किया जाता है।
Q 7

नगर निगम का सर्वोच्च निर्वाचित पदाधिकारी कहलाता है—

व्याख्या: नगर निगम का सर्वोच्च निर्वाचित पदाधिकारी महापौर या मेयर कहलाता है।
Q 8

संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष थे—

व्याख्या: संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे।
Q 9

भारत में किस प्रकार की दलीय व्यवस्था है—

व्याख्या: भारत में अनेक राजनीतिक दल सक्रिय हैं, इसलिए यहाँ बहुदलीय व्यवस्था है।
Q 10

भारतीय लोकतंत्र के समक्ष चुनौती है—

व्याख्या: दिए गए विकल्पों में साम्प्रदायिकता भारतीय लोकतंत्र के समक्ष एक चुनौती है।
Q 11

ग्राम पंचायतों का गठन किस उपबन्ध में सम्मिलित है—

व्याख्या: अध्याय के अभ्यास प्रश्न की उत्तर-सूची के अनुसार सही उत्तर अनुच्छेद 243 (ख) है।
Q 12

पंचायती राज की संरचना है—

व्याख्या: पंचायती राज व्यवस्था ग्राम, खण्ड और जिला—तीन स्तरों पर आधारित त्रिस्तरीय व्यवस्था है।
Q 13

ग्राम पंचायत में गणपूर्ति (कोरम) के लिए आवश्यक संख्या होती है—

व्याख्या: ग्राम पंचायत की बैठक के लिए कुल सदस्यों के एक-तिहाई सदस्यों की उपस्थिति गणपूर्ति के लिए आवश्यक है।
Q 14

पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए आरक्षण है—

व्याख्या: अध्याय के अभ्यास प्रश्न के अनुसार पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण है।
Q 15

पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है—

व्याख्या: वर्ष 1993 में 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दी गई।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय सामाजिक अध्ययन के अध्याय ग्रामीण एवं नगरीय निकायों का गठन से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

नगरों की पाँच विशेषताएँ बताइए।

Q 2

पंचायती राज व्यवस्था का संवैधानिक प्रावधान बताइए।

Q 3

ग्राम पंचायत के कार्य लिखिए।

Q 4

स्थानीय निकायों के निर्वाचन पर टिप्पणी कीजिए।

Q 5 2023

जिलाधिकारी के मुख्य कार्य बताइए।

Q 6

स्वास्थ्य व्यवस्था से आप क्या समझते हैं?

Q 7

नगर पंचायत के गठन को बताइए।

Q 8

महापौर का चुनाव कौन करता है?

Q 9

नगर पालिका के कार्यों को बताइए।

Q 10 2016

ग्राम पंचायत के चुनाव की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

Q 11 2017, 2022

नगर निगम के कार्यों का वर्णन कीजिए।

Q 12 2018

ग्रामीण एवं नगरीय जीवन शैली की अवधारणा लिखिए।

Q 13 2019

जिले का सर्वोच्च अधिकारी कौन होता है? जिले के प्रशासन में उसकी भूमिका का वर्णन कीजिए।

Q 14 2022

जिला पंचायत के कार्यों का उल्लेख कीजिए।

Q 15 2023

नगर निगम की संरचना एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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