भारत—स्थिति, विस्तार एवं पृथ्वी के प्रमुख मण्डल
भारत की भौगोलिक स्थिति
भारत एशिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित एक विशाल देश है। इसकी भौगोलिक स्थिति पृथ्वी के उत्तरी-पूर्वी गोलार्द्ध में है।
भारत का अक्षांशीय विस्तार 8°4′ उत्तरी अक्षांश से 37°6′ उत्तरी अक्षांश तक तथा देशांतरीय विस्तार 68°7′ पूर्वी देशांतर से 97°25′ पूर्वी देशांतर तक है।
भारतीय मानक समय
भारत के लगभग मध्य से 82½° पूर्वी देशांतर गुजरता है। इसी देशांतर के स्थानीय समय को भारत का मानक समय माना गया है।
यह देशांतर इलाहाबाद के निकट नैनी से होकर गुजरता है। भारतीय मानक समय ग्रीनविच समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे है।
82½° पूर्वी देशांतर निम्न पाँच राज्यों से होकर गुजरता है—
- उत्तर प्रदेश
- मध्य प्रदेश
- छत्तीसगढ़
- ओडिशा
- आन्ध्र प्रदेश
कर्क रेखा और भारत
23½° उत्तरी अक्षांश अर्थात कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य भाग से होकर गुजरती है। यह भारत को उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय भागों में बाँटती है।
कर्क रेखा भारत के आठ राज्यों से होकर गुजरती है—
- गुजरात
- राजस्थान
- मध्य प्रदेश
- छत्तीसगढ़
- झारखंड
- पश्चिम बंगाल
- त्रिपुरा
- मिजोरम
भारत की लंबाई और चौड़ाई
| विस्तार | लंबाई |
|---|---|
| उत्तर से दक्षिण | लगभग 3,214 कि.मी. |
| पूर्व से पश्चिम | लगभग 2,933 कि.मी. |
इस प्रकार भारत की आकृति लगभग चतुर्भुजाकार दिखाई देती है। भारत का प्रायद्वीपीय भाग त्रिभुजाकार है।
भारतीय प्रायद्वीप हिन्द महासागर को दो प्रमुख शाखाओं—अरब सागर और बंगाल की खाड़ी—में विभाजित करता है।
भारत की सीमाएँ
भारत की स्थलीय सीमा की कुल लंबाई लगभग 15,200 कि.मी. है।
भारत की मुख्य भूमि की तटीय सीमा लगभग 6,100 कि.मी. तथा द्वीपों सहित कुल तटीय सीमा लगभग 7,515.5 कि.मी. है।
इस प्रकार स्थलीय और तटीय सीमाओं को मिलाकर भारत की कुल सीमा लगभग 22,716.5 कि.मी. बताई गई है।
भारत के चरम बिंदु
दक्षिणतम बिंदु—इन्दिरा पॉइंट
भारत का दक्षिणतम बिंदु इन्दिरा पॉइंट है। यह ग्रेट निकोबार द्वीप में लगभग 6°45′ उत्तरी अक्षांश पर स्थित है।
यह भूमध्य रेखा से लगभग 876 कि.मी. दूर है। इसका पुराना नाम पिग्मेलियन पॉइंट था। वर्ष 2004 में हिन्द महासागर में आए भूकम्प और सुनामी के कारण इसका बड़ा भाग समुद्र में डूब गया।
उत्तरी बिंदु—इन्दिरा कोल
भारत का सबसे उत्तरी बिंदु इन्दिरा कोल जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में स्थित बताया गया है।
भारत की प्रमुख सीमा रेखाएँ
भारत की उत्तरी सीमा के संदर्भ में मैकमोहन रेखा तथा भारत-पाकिस्तान सीमा के संदर्भ में रेडक्लिफ रेखा महत्वपूर्ण हैं।
भारत का क्षेत्रफल और विश्व में स्थान
भारत का भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 32,87,263 वर्ग कि.मी. है। यह विश्व के कुल क्षेत्रफल का लगभग 2.43% है।
क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में सातवाँ स्थान बताया गया है।
जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में दूसरा स्थान बताया गया है तथा विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 17.5% भाग भारत में निवास करता है।
पृथ्वी के आयाम एवं जीवन
सम्पूर्ण सौरमण्डल में पृथ्वी ऐसा ग्रह है जहाँ जीवन संभव है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और सूर्य से लगभग 15 करोड़ कि.मी. की दूरी पर स्थित है।
पृथ्वी का व्यास लगभग 13,000 कि.मी. है और इसे सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 365¼ दिन लगते हैं।
पृथ्वी पर जीवन संभव होने में पर्यावरण के चार प्रमुख घटकों की महत्वपूर्ण भूमिका है—
- स्थलमण्डल
- जलमण्डल
- वायुमण्डल
- जीवमण्डल या जैवमण्डल
1. स्थलमण्डल
पृथ्वी के धरातलीय या ठोस भाग को स्थलमण्डल कहा जाता है। पृथ्वी की ऊपरी सतह भूपर्पटी कहलाती है।
स्थलमण्डल विभिन्न प्रकार की चट्टानों से मिलकर बना है। इस पर पर्वत, पठार, मैदान, ज्वालामुखी, खनिज और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं।
स्थलमण्डल पर ही सभी महाद्वीप स्थित हैं। पृथ्वी के लगभग 29% भाग पर स्थल पाया जाता है।
पृथ्वी के स्थलमण्डल में ऊर्जा के अचानक मुक्त होने से भूकम्पीय तरंगें उत्पन्न होती हैं। पृथ्वी की सतह के हिलने को भूकम्प या भूचाल कहा जाता है।
2. जलमण्डल
पृथ्वी के सभी जलीय भागों को मिलाकर जलमण्डल कहा जाता है।
इसके अन्तर्गत—
- महासागर और सागर
- नदियाँ
- झीलें और तालाब
- हिमानी
- भूमिगत जल
आते हैं।
पृथ्वी के कुल क्षेत्रफल का लगभग 71% भाग जल और लगभग 29% भाग स्थल से घिरा है।
पृथ्वी के जल का लगभग 3% भाग पीने योग्य बताया गया है, जबकि लगभग 97% जल महासागरों में पाया जाता है और अधिक लवणता के कारण पीने के लिए उपयुक्त नहीं होता।
जल की अधिकता के कारण पृथ्वी को जल ग्रह या नीला ग्रह भी कहा जाता है।
3. वायुमण्डल
पृथ्वी के चारों ओर फैले हुए वायु के विशाल आवरण को वायुमण्डल कहा जाता है।
वायुमण्डल सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी तक पहुँचने से रोकने में सहायता करता है और पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 15°C बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वायुमण्डल पृथ्वी से लगभग 1600 कि.मी. की ऊँचाई तक विस्तृत बताया गया है। लगभग 97% वायु धरातल के निकट पाई जाती है।
वायुमण्डल में प्रमुख गैसें
| गैस | मात्रा |
|---|---|
| नाइट्रोजन | लगभग 78% |
| ऑक्सीजन | लगभग 21% |
| आर्गन | लगभग 0.93% |
| कार्बन डाइऑक्साइड | लगभग 0.03% |
इसके अतिरिक्त वायुमण्डल में जलवाष्प, धूल के कण तथा अन्य गैसें अल्प मात्रा में पाई जाती हैं।
वायुमण्डल की प्रमुख परतें
- क्षोभमण्डल
- समतापमण्डल
- मध्य मण्डल
- आयन मण्डल
- बाह्य मण्डल
4. जीवमण्डल या जैवमण्डल
पृथ्वी का वह क्षेत्र जहाँ जल, स्थल और वायु परस्पर मिलते या सम्पर्क में आते हैं, जीवमण्डल कहलाता है।
जीवमण्डल की मोटाई लगभग 28 कि.मी. बताई गई है। इसका विस्तार धरातल के ऊपर लगभग 17 कि.मी. और समुद्र तल के नीचे लगभग 11 कि.मी. तक है।
सभी प्रकार के छोटे-बड़े जीव और वनस्पतियाँ जीवमण्डल में पाए जाते हैं। पृथ्वी का प्रत्येक वह भाग जहाँ जीवन की उत्पत्ति और अस्तित्व संभव है, जीवमण्डल के अन्तर्गत आता है।
जीवमण्डल की परत पतली होने के बावजूद अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी क्षेत्र में जीवन संभव है।
पृथ्वी के चार प्रमुख मण्डल—एक नजर में
| मण्डल | मुख्य अर्थ |
|---|---|
| स्थलमण्डल | पृथ्वी का ठोस एवं धरातलीय भाग |
| जलमण्डल | पृथ्वी पर पाया जाने वाला सम्पूर्ण जल |
| वायुमण्डल | पृथ्वी को चारों ओर से घेरे वायु का आवरण |
| जीवमण्डल | जल, स्थल और वायु के सम्पर्क वाला जीवन क्षेत्र |
- भारत उत्तरी-पूर्वी गोलार्द्ध में स्थित है।
- भारत का अक्षांशीय विस्तार 8°4′ उ. से 37°6′ उ. तक है।
- भारत का देशांतरीय विस्तार 68°7′ पू. से 97°25′ पू. तक है।
- 82½° पूर्वी देशांतर भारत का मानक देशांतर है।
- भारतीय मानक समय ग्रीनविच समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे है।
- कर्क रेखा भारत के आठ राज्यों से होकर गुजरती है।
- भारत की उत्तर-दक्षिण लंबाई लगभग 3,214 कि.मी. तथा पूर्व-पश्चिम चौड़ाई लगभग 2,933 कि.मी. है।
- भारत की स्थलीय सीमा लगभग 15,200 कि.मी. है।
- द्वीपों सहित भारत की कुल तटीय सीमा लगभग 7,515.5 कि.मी. है।
- भारत का दक्षिणतम बिंदु इन्दिरा पॉइंट है।
- भारत का क्षेत्रफल लगभग 32,87,263 वर्ग कि.मी. है।
- क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में सातवाँ स्थान बताया गया है।
- पृथ्वी सूर्य से लगभग 15 करोड़ कि.मी. दूर स्थित है।
- पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 365¼ दिन लगते हैं।
- पृथ्वी के चार प्रमुख मण्डल स्थलमण्डल, जलमण्डल, वायुमण्डल और जीवमण्डल हैं।
- पृथ्वी के लगभग 29% भाग पर स्थल और 71% भाग पर जल है।
- वायुमण्डल में नाइट्रोजन लगभग 78% और ऑक्सीजन लगभग 21% है।
- वायुमण्डल की पाँच प्रमुख परतें क्षोभमण्डल, समतापमण्डल, मध्य मण्डल, आयन मण्डल और बाह्य मण्डल हैं।
- जीवमण्डल वह क्षेत्र है जहाँ जल, स्थल और वायु परस्पर सम्पर्क में आते हैं।
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भारत का उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र एवं प्रायद्वीपीय पठार
भारत का उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र
भारत की उत्तरी सीमा पर विश्व की सबसे ऊँची तथा पूर्व-पश्चिम दिशा में विस्तृत विशाल पर्वतमाला स्थित है। यह विश्व की नवीनतम मोड़दार पर्वत-श्रेणियों में से एक है।
इसके पश्चिमी भाग में नंगा पर्वत के निकट तथा पूर्वी भाग में हेयरपिन टर्न जैसी आकृति मिलती है। इस पर्वत-क्षेत्र का निर्माण प्रायद्वीपीय पठार की ओर से पड़े दबाव के कारण हुआ माना गया है।
हिमालय की पर्वत-श्रेणियाँ प्रायद्वीपीय पठार की ओर उत्तल तथा तिब्बत की ओर अवतल होती गई हैं।
पश्चिम से पूर्व की ओर पर्वतीय क्षेत्र की चौड़ाई घटती है, जबकि ऊँचाई बढ़ती जाती है और ढाल अधिक तीव्र हो जाती है।
उत्तर भारत की अनेक प्रमुख नदियाँ भी इसी पर्वतीय क्षेत्र से निकलती हैं। ये नदियाँ पर्वतीय क्षेत्र को काटते हुए उत्तर भारत के विशाल मैदानी भाग को सिंचित करती हैं।
उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र की प्रमुख श्रेणियाँ
उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र को चार प्रमुख समानान्तर पर्वत-श्रेणियों में बाँटा जा सकता है—
- ट्रांस हिमालय क्षेत्र
- हिमाद्रि अथवा सर्वोच्च या वृहद हिमालय
- हिमाचल श्रेणी अथवा लघु या मध्य हिमालय
- शिवालिक अथवा निम्न या बाह्य हिमालय
1. ट्रांस हिमालय क्षेत्र
ट्रांस हिमालय क्षेत्र में काराकोरम, लद्दाख और जास्कर आदि पर्वत श्रेणियाँ आती हैं।
इनका निर्माण हिमालय से भी पहले हो चुका था तथा ये मुख्यतः पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में मिलती हैं।
K2 या गॉडविन ऑस्टिन की ऊँचाई लगभग 8611 मीटर है। यह काराकोरम श्रेणी की सर्वोच्च चोटी है और इसे भारत की सबसे ऊँची चोटी बताया गया है।
ट्रांस हिमालय को वृहद हिमालय से इंडो-सांगपो शचर जोन अलग करता है।
2. हिमाद्रि अथवा सर्वोच्च या वृहद हिमालय
हिमाद्रि हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 6000 मीटर है तथा इसकी चौड़ाई लगभग 120 से 190 कि.मी. तक है।
विश्व के लगभग सभी महत्वपूर्ण ऊँचे पर्वत शिखर इसी श्रेणी में पाए जाते हैं।
इसके प्रमुख शिखरों में—
- माउण्ट एवरेस्ट — 8848 मीटर
- कंचनजंगा — 8558 मीटर
- नंगा पर्वत
- नंदा देवी
- कामेट
- नमचाबरवा
शामिल हैं।
विश्व की सबसे ऊँची चोटी माउण्ट एवरेस्ट नेपाल में इसी पर्वत श्रेणी में स्थित है।
वृहद हिमालय को लघु हिमालय से मेन सेंट्रल ट्रस्ट द्वारा अलग बताया गया है।
3. हिमाचल श्रेणी अथवा लघु या मध्य हिमालय
हिमाचल श्रेणी की औसत चौड़ाई लगभग 80 से 100 कि.मी. तथा सामान्य ऊँचाई लगभग 3700 से 4500 मीटर है।
इस श्रेणी में प्रमुख रूप से—
- पीरपंजाल
- धौलाधार
- मसूरी
- नागटीबा
- महाभारत श्रेणी
शामिल हैं।
वृहद और लघु हिमालय के बीच कश्मीर घाटी, लाहुल-स्पीति, कुल्लू तथा कांगड़ा घाटियाँ मिलती हैं।
यहाँ मिलने वाले अल्पाइन चारागाहों को कश्मीर घाटी में मर्ग तथा उत्तराखंड में दुग्याल या पयार कहा जाता है।
लघु हिमालय स्वास्थ्यवर्धक पर्यटन स्थलों के लिए भी प्रसिद्ध है।
4. शिवालिक अथवा निम्न या बाह्य हिमालय
शिवालिक हिमालय की सबसे बाहरी और नवीनतम पर्वत श्रेणी है। इसकी चौड़ाई लगभग 10 से 50 कि.मी. तथा ऊँचाई लगभग 900 से 1200 मीटर है।
अन्य हिमालयी श्रेणियों के विपरीत यह खंडित रूप में मिलती है।
शिवालिक और लघु हिमालय के बीच कई घाटियाँ पाई जाती हैं। पश्चिमी भाग में इन्हें दून या द्वार कहा जाता है। देहरादून और हरिद्वार इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
शिवालिक के निचले भाग को तराई कहते हैं। यह दलदली तथा वनाच्छादित क्षेत्र है।
तराई के दक्षिणी भाग में वृहद सीमावर्ती भ्रंश मिलता है, जो कश्मीर से असम तक विस्तृत बताया गया है।
हिमालय पर्वत के लाभ
हिमालय भारत के लिए प्राकृतिक, आर्थिक और सामरिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
- मानसूनी वर्षा में सहायक— हिमालय मानसूनी पवनों के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करता है, जिससे पर्वतीय वर्षा होती है। इस वर्षा पर क्षेत्र का पर्यावरण और अर्थव्यवस्था काफी हद तक निर्भर करती है।
- चारागाहों की उपलब्धता— हिमालयी घाटियों में गर्मियों के समय घास वाले चारागाह पाए जाते हैं। पश्चिमी हिमालय में इन्हें मर्ग तथा कुमाऊँ क्षेत्र में बुग्याल और पयाल कहा जाता है।
- जैव विविधता— हिमालय जैवविविधता का महत्वपूर्ण भण्डार है। फूलों की घाटी तथा अरुणाचल का पूर्वी हिमालय इसके प्रमुख जैव विविधता क्षेत्रों में आते हैं।
- सामरिक महत्व— हिमालय दक्षिण एशिया के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक अवरोध है। यह उत्तर की ओर से होने वाले बाहरी आक्रमणों को कठिन बनाता है।
प्रायद्वीपीय पठार
प्रायद्वीपीय पठार भारत की प्राचीन गोंडवाना भूमि का भाग है और इसकी आकृति लगभग त्रिभुजाकार है।
इसकी औसत ऊँचाई लगभग 600 से 900 मीटर है।
भारत के दक्षिणी भाग में स्थित होने के कारण इसे दक्षिणी पठार भी कहा जाता है। इसके तीन ओर समुद्र होने के कारण इसे प्रायद्वीपीय पठार कहा गया है।
प्रायद्वीपीय पठार की सीमाएँ
इसके पश्चिम में पश्चिमी घाट पर्वत तथा पूर्व में पूर्वी घाट पर्वत स्थित हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट सुदूर दक्षिण में एक-दूसरे से मिलते हुए दिखाई देते हैं। इनका मिलन स्थल नीलगिरि पर्वत पर स्थित है।
इसके उत्तरी भाग में विन्ध्य तथा सतपुड़ा पर्वत श्रेणियाँ स्थित हैं।
प्रायद्वीपीय पठार की प्रमुख नदियाँ
नर्मदा और ताप्ती नदियाँ भ्रंश घाटियों में पश्चिम दिशा की ओर बहते हुए अरब सागर में गिरती हैं।
प्रायद्वीपीय पठार की अन्य पर्वत श्रेणियाँ
प्रायद्वीपीय पठार पर कई अन्य पर्वत श्रेणियाँ भी पाई जाती हैं, जिनमें—
- रत्नागिरि
- जवाडी
- अजन्ता
प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं।
प्रमुख पर्यटन स्थल
प्रसिद्ध पर्यटन स्थल ऊटी या उदगमण्डलम इसी पठार पर स्थित है।
इसके अतिरिक्त अरावली, राजमहल तथा शिलांग की पहाड़ियाँ इस पठार की उत्तरी सीमा पर स्थित बताई गई हैं।
राजमहल-गारो गैप
राजमहल और मेघालय की पहाड़ियों के बीच का भाग जलोढ़ निक्षेपों से ढक जाने के कारण अलग दिखाई देता है। इस क्षेत्र को राजमहल-गारो गैप कहा गया है।
प्रायद्वीपीय पठार की ढाल
प्रायद्वीपीय पठार की सामान्य ढाल अलग-अलग भागों में अलग दिशा में है।
- उत्तरी और पूर्वी भाग की ढाल सोन, चम्बल और दामोदर नदियों की दिशा से स्पष्ट होती है।
- दक्षिणी भाग की सामान्य ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है, जो महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों की दिशा से स्पष्ट होती है।
भारत के प्रमुख पठारी क्षेत्र
भारत का दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार कई छोटे-बड़े पठारी भागों में विभक्त है। प्रमुख पठार हैं—
- मालवा का पठार
- बैतूल एवं बघेलखण्ड का पठार — मध्य प्रदेश
- बुन्देलखण्ड का पठार — मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश
- दण्डकारण्य पठार — ओडिशा, छत्तीसगढ़ एवं आन्ध्र प्रदेश
- रायलसीमा का पठार — कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश
- तेलंगाना का पठार — आन्ध्र प्रदेश
- शिलांग का पठार — मेघालय
- हजारीबाग एवं छोटानागपुर पठार — झारखंड
उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र एवं प्रायद्वीपीय पठार—मुख्य अन्तर
| आधार | उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र | प्रायद्वीपीय पठार |
|---|---|---|
| प्रकृति | नवीन मोड़दार पर्वतीय क्षेत्र | प्राचीन गोंडवाना भूमि का भाग |
| स्थिति | भारत की उत्तरी सीमा | भारत का दक्षिणी भाग |
| प्रमुख भाग | ट्रांस हिमालय, हिमाद्रि, हिमाचल, शिवालिक | पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट तथा विभिन्न पठारी क्षेत्र |
| प्रमुख विशेषता | ऊँची पर्वत श्रेणियाँ एवं घाटियाँ | त्रिभुजाकार प्राचीन पठारी भू-भाग |
- भारत का उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र विश्व की नवीनतम मोड़दार पर्वत-श्रेणियों में शामिल है।
- उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र को ट्रांस हिमालय, हिमाद्रि, हिमाचल और शिवालिक चार प्रमुख श्रेणियों में बाँटा गया है।
- ट्रांस हिमालय में काराकोरम, लद्दाख और जास्कर पर्वत श्रेणियाँ आती हैं।
- K2 या गॉडविन ऑस्टिन की ऊँचाई लगभग 8611 मीटर है।
- हिमाद्रि हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है और इसकी औसत ऊँचाई लगभग 6000 मीटर है।
- एवरेस्ट, कंचनजंगा, नंगा पर्वत, नंदा देवी, कामेट और नमचाबरवा वृहद हिमालय के प्रमुख शिखर हैं।
- हिमाचल की सामान्य ऊँचाई लगभग 3700 से 4500 मीटर है।
- पीरपंजाल, धौलाधार, मसूरी, नागटीबा और महाभारत मध्य हिमालय की प्रमुख श्रेणियाँ हैं।
- शिवालिक हिमालय की नवीनतम एवं बाहरी श्रेणी है।
- शिवालिक और लघु हिमालय के बीच की घाटियों को पश्चिम में दून या द्वार कहा जाता है।
- हिमालय मानसूनी वर्षा, चारागाह, जैव विविधता और सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
- प्रायद्वीपीय पठार प्राचीन गोंडवाना भूमि का त्रिभुजाकार भाग है।
- प्रायद्वीपीय पठार की औसत ऊँचाई लगभग 600 से 900 मीटर है।
- इसके पश्चिम में पश्चिमी घाट तथा पूर्व में पूर्वी घाट स्थित हैं।
- पूर्वी और पश्चिमी घाट नीलगिरि पर्वत पर मिलते हैं।
- नर्मदा और ताप्ती भ्रंश घाटियों से होकर पश्चिम की ओर अरब सागर में गिरती हैं।
- प्रायद्वीपीय पठार के दक्षिणी भाग की सामान्य ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है।
- मालवा, बुन्देलखण्ड, दण्डकारण्य, रायलसीमा, तेलंगाना, शिलांग और छोटानागपुर इसके प्रमुख पठारी भाग हैं।
Semester 1 की Complete तैयारी
- Official Syllabus
- Comprehensive Notes
- Quick Revision Notes
- Visual Revision Notes
- Audio Revision
- Solved MCQs
- MCQ Tests
- 2015–2025 Previous Year Papers
- Repeated Exam Questions
- 10 Model Papers
उत्तर भारत का विशाल मैदान
उत्तर भारत का विशाल मैदान
उत्तर के विशाल पर्वतीय भाग के ठीक दक्षिण तथा दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार के ठीक उत्तर के मध्य भाग में एक विस्तृत मैदानी क्षेत्र पाया जाता है, जिसे “महान मैदान” कहा जाता है।
इसे “सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान” भी कहा जाता है।
यह मैदान पश्चिम में सतलज से पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक लगभग 2500 कि.मी. से अधिक लंबाई में विस्तृत है।
इसका विस्तार लगभग 3200 कि.मी. तक माना गया है तथा इसकी चौड़ाई लगभग 150 से 300 कि.मी. तक है।
यह मैदान जलोढ़ अवसादों से निर्मित है। इसमें जलोढ़ निक्षेप लगभग 2000 मीटर तक की गहराई में मिलते हैं।
विशिष्ट धरातलीय स्वरूप के आधार पर इस विशाल मैदान को चार भागों में बाँटा जाता है—
- भावर प्रदेश
- तराई प्रदेश
- बाँगर प्रदेश
- खादर प्रदेश
1. भावर प्रदेश
भावर प्रदेश शिवालिक की तलहटी में सिंधु से लेकर तिस्ता तक अधिविस्तृत रूप में मिलता है।
इसकी चौड़ाई लगभग 8 से 16 कि.मी. है।
कंकड़-पत्थरों (बजरी) की अधिकता के कारण इसमें जल का अवशोषण बहुत अधिक होता है।
इसी कारण नदियाँ यहाँ आकर प्रायः विलीन हो जाती हैं।
2. तराई प्रदेश
तराई प्रदेश, भावर प्रदेश के दक्षिणी भाग में पाया जाता है।
अत्यधिक आर्द्रता के कारण यह प्रायः दलदली क्षेत्र होता है।
भावर प्रदेश की लुप्त नदियाँ यहाँ पुनः सतह पर प्रकट हो जाती हैं, परन्तु उनकी गति धीमी रहती है।
तराई प्रदेश घने वनों का प्रदेश है तथा यह जैव विविधता का विशाल भण्डार माना जाता है।
3. बाँगर प्रदेश
बाँगर प्रदेश मैदानी भागों का वह ऊँचा भाग है, जहाँ सामान्यतः बाढ़ का पानी नहीं पहुँच पाता।
इसका निर्माण पुराने जलोढ़ से हुआ है।
इस प्रदेश में कंकड़ तथा रेत की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक पाई जाती है।
जहाँ इस क्षेत्र में कंकड़-पत्थरों की अधिकता के कारण असमतल व ऊँची भूमि बन गई है, उसे स्थानीय रूप से “भूड़” कहा गया है।
उदाहरण के रूप में गंगा-यमुना दोआब के ऊपरी भाग में यह प्रदेश मृदु निक्षेपों के रूप में मिलता है।
4. खादर प्रदेश
खादर प्रदेश नवीन जलोढ़ से निर्मित होता है।
यहाँ बाढ़ का जल हर वर्ष नई उर्वर मिट्टी लाता रहता है।
इसी कारण इस प्रदेश को “कछारी प्रदेश” अथवा “बाढ़ का मैदान” भी कहा जाता है।
खादर प्रदेश का ही विस्तृत रूप डेल्टा प्रदेश के रूप में विकसित होता है।
उदाहरण के लिए गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में फैला हुआ है।
उत्तर भारत के विशाल मैदान की प्रमुख विशेषताएँ
- यह मैदान हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार के बीच स्थित है।
- इसे सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान भी कहा जाता है।
- यह जलोढ़ अवसादों से निर्मित अत्यन्त उपजाऊ मैदान है।
- यह मैदान कृषि, बसावट और जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
- इस मैदान में नदियों द्वारा निरन्तर निक्षेपण होता रहता है।
भावर, तराई, बाँगर और खादर में अन्तर
| आधार | भावर | तराई | बाँगर | खादर |
|---|---|---|---|---|
| स्थिति | शिवालिक की तलहटी में | भावर के दक्षिण में | मैदान का ऊँचा भाग | नदी के निकट निम्न भाग |
| मिट्टी / निक्षेप | कंकड़-पत्थर प्रधान | आर्द्र एवं दलदली | पुराना जलोढ़ | नवीन जलोढ़ |
| जल की दशा | नदियाँ विलीन हो जाती हैं | नदियाँ पुनः प्रकट होती हैं | बाढ़ का जल सामान्यतः नहीं पहुँचता | बाढ़ का जल पहुँचता है |
| उर्वरता | कम | वनस्पति प्रधान | मध्यम | अत्यधिक उपजाऊ |
- उत्तर भारत का विशाल मैदान हिमालय के दक्षिण और प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर के बीच स्थित है।
- इसे महान मैदान अथवा सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान कहा जाता है।
- यह मैदान पश्चिम में सतलज से पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक फैला है।
- इसकी लंबाई लगभग 2500 कि.मी. से अधिक तथा चौड़ाई 150 से 300 कि.मी. तक है।
- यह मैदान जलोढ़ अवसादों से बना है और इसमें निक्षेप लगभग 2000 मीटर गहराई तक मिलते हैं।
- विशिष्ट धरातलीय स्वरूप के आधार पर इसे भावर, तराई, बाँगर और खादर प्रदेशों में बाँटा जाता है।
- भावर प्रदेश शिवालिक की तलहटी में पाया जाता है और इसकी चौड़ाई 8 से 16 कि.मी. है।
- कंकड़-पत्थरों की अधिकता के कारण भावर में नदियाँ विलीन हो जाती हैं।
- तराई प्रदेश भावर के दक्षिण में स्थित आर्द्र, दलदली और वनाच्छादित क्षेत्र है।
- बाँगर मैदान का ऊँचा भाग है, जहाँ सामान्यतः बाढ़ का पानी नहीं पहुँचता।
- बाँगर का निर्माण पुराने जलोढ़ से हुआ है।
- खादर नवीन जलोढ़ से निर्मित उपजाऊ बाढ़ मैदान है।
- खादर प्रदेश को कछारी प्रदेश या बाढ़ का मैदान भी कहा जाता है।
- गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा खादर प्रदेश का प्रमुख उदाहरण है।
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भारत में खनिज एवं जनसंख्या वितरण
भारत में खनिज
प्राकृतिक संसाधनों में खनिज सम्पदा का महत्वपूर्ण स्थान है। पृथ्वी के भीतर से खोदकर निकाले जाने वाले उपयोगी पदार्थों को खनिज कहा जाता है। देश के आर्थिक तथा औद्योगिक विकास में खनिजों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
मानव सभ्यता के विकास में खनिजों का प्रयोग प्राचीन काल से होता रहा है। ताँबे और काँसे का उपयोग आरम्भ होने के कारण मानव इतिहास में ताम्र युग और काँस्य युग जैसे काल भी प्रसिद्ध हुए।
खानों से प्राप्त अशोधित खनिज को अयस्क कहा जाता है तथा धरातल के जिस स्थान से खनिज निकालने के लिए खुदाई की जाती है, उसे खान या खदान कहते हैं।
खनिजों के प्रकार
भारत में खनिजों को मुख्य रूप से दो प्रकारों में बाँटा गया है—
1. धात्विक खनिज
जिन खनिजों से धातुओं की प्राप्ति होती है, उन्हें धात्विक खनिज कहते हैं।
प्रमुख धात्विक खनिज हैं—
- लोहा
- ताँबा
- सोना
- चाँदी
- बॉक्साइट
- सीसा
- जस्ता
- टिन
- मैंगनीज
- वेनेडियम
- प्लेटिनम
- जिरकॉन
- एल्युमीनियम
2. अधात्विक खनिज
जिन खनिजों से धातुओं की प्राप्ति नहीं होती, उन्हें अधात्विक खनिज कहा जाता है।
प्रमुख अधात्विक खनिज हैं—
- कोयला
- खनिज तेल
- अभ्रक
- गन्धक
- पोटाश
- संगमरमर
- नमक
- सल्फर
- ग्रेनाइट
भारत के प्रमुख धात्विक खनिज
| खनिज | प्रमुख प्राप्ति क्षेत्र | मुख्य उपयोग |
|---|---|---|
| लोहा | झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं गोवा | मशीनों तथा कल-कारखानों के निर्माण में |
| ताँबा | सिंहभूम, खेतड़ी तथा आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, कर्नाटक, गुजरात और महाराष्ट्र के क्षेत्र | बिजली के तार, मशीनों के कल-पुर्जे एवं बर्तन बनाने में |
| एल्युमीनियम / बॉक्साइट | आन्ध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, गोवा, गुजरात, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, केरल, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, राजस्थान, ओडिशा, तमिलनाडु एवं उत्तर प्रदेश | वायुयान तथा बिजली के तार आदि बनाने में |
| मैंगनीज | मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, गोवा, कर्नाटक, बिहार, ओडिशा, झारखंड एवं राजस्थान | इस्पात, ब्लीचिंग पाउडर, कीटाणुनाशक पदार्थ, शुष्क बैटरी तथा काँच के सामान में |
| सोना | लगभग 80% उत्पादन कर्नाटक के कोलार क्षेत्र में | आभूषण तथा मुद्रा के रूप में |
| चाँदी | राजस्थान के उदयपुर क्षेत्र में खदान | आभूषण बनाने में |
भारत के प्रमुख प्राकृतिक खनिज संसाधन
भारत के महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में कोयला, खनिज तेल और प्राकृतिक गैस विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
1. कोयला
पृथ्वी के धरातल में परतों या शैलों के रूप में पाया जाने वाला कोयला एक प्रमुख खनिज संसाधन है। इसका रंग भूरा अथवा काला होता है और इसका उपयोग ईंधन तथा ऊर्जा के स्रोत के रूप में किया जाता है।
भारत में कोयले का वितरण
| राज्य | प्रमुख तथ्य / क्षेत्र |
|---|---|
| झारखंड | कोयला भण्डार एवं उत्पादन की दृष्टि से प्रथम; झरिया, बोकारो, गिरिडीह, डाल्टनगंज, कर्णपुरा एवं रामगढ़ प्रमुख क्षेत्र हैं। |
| ओडिशा | कोयला उत्पादन में दूसरा स्थान; सुन्दरगढ़, ढेंकानाल एवं सम्बलपुर प्रमुख क्षेत्र हैं। |
| पश्चिम बंगाल | कोयला उत्पादन में तीसरा स्थान; रानीगंज प्रमुख क्षेत्र है और लगभग 21% कोयला प्राप्त होने का उल्लेख है। |
| आन्ध्र प्रदेश | कोयला उत्पादन में चौथा स्थान; लगभग 10% कोयला उत्पादन तथा गोदावरी घाटी के सिंगरेनी, तन्दूर और सरस्ती प्रमुख क्षेत्र हैं। |
| महाराष्ट्र | कोयला उत्पादन में पाँचवाँ स्थान बताया गया है। |
इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और राजस्थान में भी कोयले का उत्पादन किया जाता है।
2. खनिज तेल या पेट्रोलियम
खनिज तेल या पेट्रोलियम एक महत्वपूर्ण ऊर्जा संसाधन है। इसका उपयोग वाहनों तथा मशीनों में चालक-शक्ति के रूप में किया जाता है।
भारत में पेट्रोलियम का वितरण
असम
असम भारत का सबसे प्राचीन खनिज तेल उत्पादक राज्य है। यहाँ डिगबोई, सुरमा घाटी और ब्रह्मपुत्र घाटी प्रमुख तेल क्षेत्र हैं।
यह तेल क्षेत्र लगभग 60,000 वर्ग कि.मी. की पट्टी में फैला हुआ बताया गया है।
गुजरात
गुजरात भारत का एक महत्वपूर्ण खनिज तेल उत्पादक राज्य है। यहाँ तेल उत्पादन 1958 ई. से प्रारम्भ हुआ।
तेल की पट्टी लगभग 1,39,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैली हुई बताई गई है। अंकलेश्वर, लूनेज या खम्भात तथा कलोल इसके प्रमुख तेल क्षेत्र हैं।
अरब सागर का अपतटीय क्षेत्र
अरब सागर में मुंबई से लगभग 176 कि.मी. उत्तर-पश्चिम में बॉम्बे हाई तेल क्षेत्र स्थित है।
यहाँ से 1976 ई. से तेल का उत्पादन किया जा रहा है।
3. प्राकृतिक गैस
खनिज तेल वाले क्षेत्रों के साथ प्रायः प्राकृतिक गैस के भण्डार भी पाए जाते हैं। इसका उपयोग ऊर्जा संसाधन के रूप में किया जाता है।
भारत में प्राकृतिक गैस का पता तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग तथा ऑयल इंडिया लिमिटेड द्वारा लगाए जाने का उल्लेख है।
प्राकृतिक गैस का वितरण
प्राकृतिक गैस के भण्डार मुख्य रूप से—
- त्रिपुरा
- राजस्थान
में बताए गए हैं।
इसके अतिरिक्त गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश तथा ओडिशा के तटों से दूर गहरे समुद्री क्षेत्रों में भी प्राकृतिक गैस के भण्डार पाए गए हैं।
भारत में जनसंख्या वितरण
विश्व के सभी महाद्वीपों, देशों और क्षेत्रों में जनसंख्या का वितरण समान नहीं है। कुछ क्षेत्रों में जनसंख्या बहुत अधिक होती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में बहुत कम जनसंख्या निवास करती है।
जनसंख्या वितरण की इस असमानता के लिए अनेक प्राकृतिक, सांस्कृतिक तथा जनांकिकीय कारक उत्तरदायी होते हैं।
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 1,21,01,93,422 बताई गई है।
2011 में कुछ प्रमुख राज्यों की जनसंख्या
| राज्य | जनसंख्या | कुल जनसंख्या का प्रतिशत |
|---|---|---|
| उत्तर प्रदेश | 19,95,81,477 | 16.49% |
| महाराष्ट्र | 11,23,72,972 | 9.28% |
| बिहार | 10,38,04,637 | 8.58% |
| पश्चिम बंगाल | 9,13,47,736 | 7.55% |
| मध्य प्रदेश | 7,25,97,565 | 6.00% |
भारत में जनसंख्या वितरण में काफी भिन्नता पाई जाती है। इसके प्रमुख कारणों को निम्न प्रकार समझा जा सकता है।
1. भौगोलिक कारक
किसी स्थान की जलवायु, जल की उपलब्धता, भूमि और भू-आकृति वहाँ की जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करती है।
जहाँ जलवायु अनुकूल हो, पर्याप्त जल उपलब्ध हो तथा भूमि रहने और कृषि के लिए उपयुक्त हो, वहाँ जनसंख्या का विस्तार अधिक होता है।
2. आर्थिक कारक
खनिज एवं अन्य संसाधनों की उपलब्धता, शहरीकरण और औद्योगीकरण भी जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करते हैं।
जहाँ रोजगार और आर्थिक अवसर अधिक होते हैं, वहाँ लोग अधिक संख्या में बसते हैं और जनसंख्या घनत्व बढ़ जाता है।
3. सामाजिक कारक
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ भी उसके निवास स्थान के चयन को प्रभावित करती हैं।
राजनीतिक स्थिति, धर्म, जाति, समुदाय तथा सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराएँ जनसंख्या वितरण को प्रभावित करती हैं।
जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले कारक—एक नजर में
| कारक | प्रमुख तत्व |
|---|---|
| भौगोलिक | जलवायु, जल की उपलब्धता, भूमि एवं भू-आकृति |
| आर्थिक | खनिज एवं संसाधन, शहरीकरण, औद्योगीकरण और रोजगार |
| सामाजिक | सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था, राजनीतिक स्थिति, धर्म, जाति एवं समुदाय |
- पृथ्वी के भीतर से खोदकर निकाले जाने वाले उपयोगी पदार्थों को खनिज कहा जाता है।
- खदान से प्राप्त अशोधित खनिज को अयस्क कहा जाता है।
- खनिज मुख्यतः धात्विक और अधात्विक दो प्रकार के होते हैं।
- लोहा, ताँबा, सोना, चाँदी, बॉक्साइट और मैंगनीज प्रमुख धात्विक खनिज हैं।
- कोयला, खनिज तेल, अभ्रक, गन्धक और नमक प्रमुख अधात्विक खनिज हैं।
- सोने का लगभग 80% उत्पादन कर्नाटक के कोलार क्षेत्र में बताया गया है।
- झारखंड कोयला भण्डार एवं उत्पादन की दृष्टि से प्रमुख राज्य है तथा झरिया इसका प्रमुख कोयला क्षेत्र है।
- ओडिशा कोयला उत्पादन में दूसरा तथा पश्चिम बंगाल तीसरा स्थान रखता है।
- असम भारत का सबसे प्राचीन खनिज तेल उत्पादक राज्य है।
- डिगबोई, सुरमा घाटी और ब्रह्मपुत्र घाटी असम के प्रमुख तेल क्षेत्र हैं।
- गुजरात में तेल उत्पादन 1958 ई. में प्रारम्भ हुआ तथा अंकलेश्वर, खम्भात और कलोल प्रमुख तेल क्षेत्र हैं।
- बॉम्बे हाई मुंबई से लगभग 176 कि.मी. उत्तर-पश्चिम में अरब सागर में स्थित है।
- बॉम्बे हाई से 1976 ई. से तेल उत्पादन किया जा रहा है।
- प्राकृतिक गैस का उपयोग ऊर्जा संसाधन के रूप में किया जाता है।
- 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 1,21,01,93,422 थी।
- 2011 में उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 19,95,81,477 अर्थात कुल जनसंख्या का 16.49% थी।
- जनसंख्या वितरण को भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक कारक प्रमुख रूप से प्रभावित करते हैं।
- अनुकूल जलवायु, जल, उपजाऊ भूमि और उचित भू-आकृति वाले क्षेत्रों में जनसंख्या अधिक होती है।
- खनिज संसाधन, शहरीकरण, औद्योगीकरण और रोजगार के अवसर जनसंख्या घनत्व बढ़ाते हैं।
- राजनीतिक स्थिति, धर्म, जाति और सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियाँ भी जनसंख्या वितरण को प्रभावित करती हैं।
भारत की जलवायु एवं उसे प्रभावित करने वाले कारक
भारत की जलवायु
भारत की जलवायु में काफी क्षेत्रीय विविधता पाई जाती है। इसका प्रमुख कारण भारत का विशाल विस्तार, कर्क रेखा पर स्थिति तथा विभिन्न प्रकार के स्थलरूप हैं।
भारत के उत्तर में विशाल हिमालय पर्वत तथा दक्षिण में हिन्द महासागर स्थित है। ये दोनों भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण प्राकृतिक तत्व हैं।
हिमालय तथा हिन्दुकुश पर्वत उत्तर और उत्तर-पश्चिम से आने वाली अत्यधिक ठंडी हवाओं को भारत में प्रवेश करने से रोकते हैं। इसी कारण कर्क रेखा के उत्तर में स्थित क्षेत्रों तक भी उष्णकटिबंधीय जलवायु का प्रभाव दिखाई देता है।
दूसरी ओर, ग्रीष्म ऋतु में थार का मरुस्थल अत्यधिक गर्म होकर निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनाता है। यह दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं को अपनी ओर आकर्षित करता है, जिससे भारत के बड़े भाग में वर्षा होती है।
भारत की जलवायु मुख्य रूप से मानसूनी है। कोपेन के जलवायु वर्गीकरण के अनुसार भारत में छह जलवायु प्रदेश बताए गए हैं।
जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक
वायुमण्डल की दशाओं में समय-समय पर परिवर्तन होता रहता है। तापमान, वर्षा, आर्द्रता, पवन तथा वायुदाब की मात्रा और वितरण में होने वाले अन्तर से किसी स्थान की जलवायु निर्धारित होती है।
भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं—
- अक्षांशीय स्थिति
- समुद्रतल से ऊँचाई
- पर्वतों की दिशा
- सागरीय प्रभाव
- पवनों की दिशा
- वायुमण्डलीय दबाव
- जल-स्थल वितरण
- धरातलीय बनावट
1. अक्षांशीय स्थिति
धरातल पर ताप का वितरण मुख्य रूप से अक्षांश के अनुसार होता है। पृथ्वी पर प्राप्त होने वाली सूर्य की ऊष्मा सूर्य किरणों के कोण पर निर्भर करती है।
विषुवत रेखा के निकट सूर्य की किरणें लगभग लम्बवत पड़ती हैं, इसलिए वहाँ अधिक ऊष्मा प्राप्त होती है और तापमान अधिक रहता है।
ध्रुवों की ओर जाने पर सूर्य की किरणें अधिक तिरछी पड़ती हैं। इन किरणों को धरातल तक पहुँचने से पहले वायुमण्डल के अधिक भाग से होकर गुजरना पड़ता है, इसलिए वहाँ सूर्यताप की मात्रा कम होती जाती है।
इस प्रकार अक्षांशीय स्थिति किसी स्थान के तापमान और जलवायु को सीधे प्रभावित करती है।
2. समुद्रतल से ऊँचाई
किसी स्थान की समुद्रतल से ऊँचाई उसके तापमान और वर्षा को प्रभावित करती है।
जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती जाती है, वायु हल्की होती जाती है और सामान्यतः तापमान कम होता जाता है। इसलिए अधिक ऊँचाई वाले पर्वतीय भाग मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक ठंडे रहते हैं।
ऊँचाई पर वायु का दबाव भी कम होता है। धरातल के निकट की वायु ऊपर की वायु की अपेक्षा अधिक गर्म रहती है।
इसी कारण अधिक ऊँचाई वाले पर्वतीय भागों में लम्बे समय तक बर्फ जमी रह सकती है।
3. पर्वतों की दिशा
पर्वतों की दिशा हवाओं के मार्ग को प्रभावित करती है और इसके माध्यम से तापमान तथा वर्षा में परिवर्तन लाती है।
हिमालय पर्वत शीत ऋतु में मध्य एशिया की ओर से आने वाली अत्यधिक ठंडी हवाओं को भारत में प्रवेश करने से रोकता है। इससे भारत में शीत ऋतु का तापमान उतना नीचे नहीं गिरता जितना पर्वतों के उत्तर में स्थित क्षेत्रों में गिरता है।
पर्वतीय अवरोध मानसूनी हवाओं को भी रोकते हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा होती है।
4. सागरीय प्रभाव
समुद्रों की निकटता अथवा दूरी भी किसी क्षेत्र की जलवायु को प्रभावित करती है।
समुद्र के निकट स्थित क्षेत्रों की जलवायु सामान्यतः सम रहती है, क्योंकि समुद्र तापमान में अत्यधिक परिवर्तन को कम करता है।
समुद्र से दूर स्थित आन्तरिक क्षेत्रों में तापमान का अन्तर अधिक पाया जाता है।
सागरीय धाराएँ भी निकटवर्ती स्थलीय भागों के तापमान को प्रभावित करती हैं। ठंडी धाराओं के निकट के भाग अपेक्षाकृत ठंडे तथा गर्म धाराओं के निकट के तट अपेक्षाकृत गर्म रहते हैं।
5. पवनों की दिशा
पवनें जिस क्षेत्र से होकर आती हैं, वहाँ के तापमान और आर्द्रता के गुण अपने साथ लेकर आती हैं।
ठंडे क्षेत्रों से आने वाली हवाएँ किसी स्थान का तापमान कम कर देती हैं, जबकि गर्म क्षेत्रों से आने वाली हवाएँ तापमान बढ़ा देती हैं।
इसी प्रकार समुद्र से आने वाली आर्द्र हवाएँ वर्षा में सहायक होती हैं, जबकि शुष्क स्थलीय हवाएँ अपेक्षाकृत कम नमी लाती हैं।
6. वायुमण्डलीय दबाव
वायुमण्डलीय दबाव जलवायु का एक प्रमुख नियंत्रक कारक है।
जिन क्षेत्रों में तापमान अधिक होता है, वहाँ सामान्यतः निम्न वायुदाब विकसित होता है। इसके विपरीत कम तापमान वाले भागों में अपेक्षाकृत उच्च वायुदाब पाया जाता है।
निम्न और उच्च वायुदाब क्षेत्रों के अन्तर के कारण हवाओं की गति और दिशा निर्धारित होती है। इसलिए वायुदाब का मौसम तथा जलवायु पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
7. जल-स्थल वितरण
स्थलीय और जलीय भागों के गर्म तथा ठंडे होने की गति समान नहीं होती।
महाद्वीपीय भागों में दैनिक और वार्षिक तापान्तर जलीय भागों की अपेक्षा अधिक पाया जाता है। इसके विपरीत समुद्री क्षेत्रों में तापमान का अन्तर अपेक्षाकृत कम रहता है।
स्थलीय भागों में आर्द्रता कम तथा समुद्री क्षेत्रों में आर्द्रता अधिक पाई जाती है। इस कारण जल और स्थल का वितरण जलवायु को सीधे प्रभावित करता है।
8. धरातलीय बनावट
पृथ्वी के धरातल की बनावट प्रत्येक स्थान पर समान नहीं होती। कहीं पर्वत, कहीं पठार, कहीं मैदान तथा कहीं ढालदार भूमि मिलती है।
धरातल की बनावट के साथ-साथ मिट्टी का प्रकार और संरचना भी स्थानीय जलवायु को प्रभावित करते हैं।
काली मिट्टी ऊष्मा को अधिक तीव्रता से अवशोषित करती है, जबकि बलुई मिट्टी में तापमान का अवशोषण और निःसरण अपेक्षाकृत शीघ्र होता है।
जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक—एक नजर में
| कारक | जलवायु पर मुख्य प्रभाव |
|---|---|
| अक्षांशीय स्थिति | सूर्य किरणों के कोण के अनुसार तापमान में अन्तर |
| समुद्रतल से ऊँचाई | ऊँचाई बढ़ने पर सामान्यतः तापमान कम होता है |
| पर्वतों की दिशा | हवाओं को रोककर तापमान और वर्षा को प्रभावित करती है |
| सागरीय प्रभाव | तटीय क्षेत्रों के तापमान को अधिक सम बनाए रखता है |
| पवनों की दिशा | गर्मी, ठंडक और नमी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाती है |
| वायुमण्डलीय दबाव | पवनों की उत्पत्ति, गति और दिशा को प्रभावित करता है |
| जल-स्थल वितरण | तापान्तर और आर्द्रता में अन्तर उत्पन्न करता है |
| धरातलीय बनावट | स्थानीय तापमान तथा अन्य जलवायवीय दशाओं को प्रभावित करती है |
- भारत की जलवायु में व्यापक क्षेत्रीय विविधता पाई जाती है।
- भारत की जलवायु मुख्य रूप से मानसूनी है।
- हिमालय और हिन्दुकुश उत्तर से आने वाली अत्यधिक ठंडी हवाओं को भारत में प्रवेश करने से रोकते हैं।
- ग्रीष्म ऋतु में थार का मरुस्थल गर्म होकर निम्न वायुदाब क्षेत्र बनाता है और दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं को आकर्षित करता है।
- कोपेन के वर्गीकरण के अनुसार भारत में छह जलवायु प्रदेश बताए गए हैं।
- भारत की जलवायु को आठ प्रमुख कारक प्रभावित करते हैं।
- अक्षांशीय स्थिति सूर्य किरणों के कोण और प्राप्त ऊष्मा को प्रभावित करती है।
- समुद्रतल से ऊँचाई बढ़ने पर सामान्यतः तापमान कम होता जाता है।
- पर्वतों की दिशा हवाओं, तापमान और वर्षा को प्रभावित करती है।
- समुद्र के निकट स्थित क्षेत्रों की जलवायु अपेक्षाकृत सम रहती है।
- पवनों की दिशा तापमान और आर्द्रता को प्रभावित करती है।
- अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में निम्न वायुदाब तथा कम तापमान वाले क्षेत्रों में उच्च वायुदाब पाया जाता है।
- महाद्वीपीय क्षेत्रों में दैनिक और वार्षिक तापान्तर समुद्री क्षेत्रों से अधिक होता है।
- जल-स्थल वितरण का तापमान और आर्द्रता पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
- धरातलीय बनावट और मिट्टी का प्रकार भी स्थानीय जलवायु को प्रभावित करते हैं।
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भारत के मौसम एवं ऋतुएँ
मौसम और जलवायु
किसी स्थान की दिन-प्रतिदिन की वायुमण्डलीय दशा को मौसम कहते हैं। इसके विपरीत मौसम की दीर्घकालिक औसत दशा को जलवायु कहा जाता है।
इस प्रकार मौसम अल्प समय में बदल सकता है, जबकि जलवायु में परिवर्तन लम्बे समय में दिखाई देता है। मौसम और जलवायु दोनों के प्रमुख तत्व लगभग समान होते हैं, जैसे—तापमान, वायुदाब और आर्द्रता आदि।
मानसून का अर्थ
भारत में मुख्य रूप से मानसूनी जलवायु पाई जाती है।
“मानसून” शब्द अरबी भाषा के “मौसिम” शब्द से बना है, जिसका अर्थ है—हवा की दिशा में मौसमी परिवर्तन।
वर्षण क्या है?
वायुमण्डल में संघनित जल का किसी भी रूप में पृथ्वी की सतह पर वापस आना वर्षण कहलाता है।
वर्षण के विभिन्न रूप हो सकते हैं—
- वर्षा
- फुहार
- हिमवर्षा
- हिमपात
- ओलावृष्टि
अतः वर्षा, वर्षण का एक प्रकार है।
भारत की प्रमुख ऋतुएँ
भारत का मौसम मुख्य रूप से अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी से आने वाली हवाओं से प्रभावित होता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने भारत की जलवायु को मुख्य रूप से चार ऋतुओं में बाँटा है—
- शीत ऋतु
- ग्रीष्म ऋतु
- वर्षा ऋतु
- शरद ऋतु
1. शीत ऋतु
उत्तरी भारत में शीत ऋतु लगभग नवम्बर के मध्य से फरवरी तक रहती है।
इस ऋतु में दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ने पर तापमान क्रमशः कम होता जाता है।
- पूर्वी तट पर औसत तापमान लगभग 24° से 25°C रहता है।
- उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में तापमान लगभग 10° से 15°C के बीच रहता है।
शीत ऋतु में दिन अपेक्षाकृत गर्म तथा रातें अधिक ठंडी होती हैं। उत्तरी क्षेत्रों में कोहरा तथा हिमालय की ऊपरी ढालों पर बर्फबारी सामान्य घटना है।
शीत ऋतु की पवनें
इस समय देश में उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें प्रभावी रहती हैं। ये पवनें सामान्यतः भूमि से समुद्र की ओर बहती हैं, इसलिए भारत के अधिकांश भागों में यह शुष्क मौसम होता है।
लेकिन तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में इन हवाओं के कारण शीत ऋतु में कुछ वर्षा होती है।
देश के उत्तरी भाग में इस समय उच्च वायुदाब का क्षेत्र विकसित होता है। सामान्यतः आकाश साफ रहता है, तापमान तथा आर्द्रता कम होती है और हल्की हवाएँ चलती हैं।
2. ग्रीष्म ऋतु
ग्रीष्म ऋतु लगभग मार्च से मई-जून तक रहती है। इस समय सूर्य के उत्तरायण होने के कारण भारत के तापमान में तेजी से वृद्धि होने लगती है।
उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में दिन के समय अत्यधिक गर्म तथा शुष्क हवाएँ चलती हैं, जिन्हें “लू” कहा जाता है।
ग्रीष्म ऋतु में उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र उत्तर की ओर बढ़ता है और जुलाई तक लगभग 25° उत्तरी अक्षांश के ऊपर पहुँच जाता है।
ग्रीष्म ऋतु की प्रमुख स्थानीय वर्षाएँ
आम्र-वर्षा
मानसून आने से पहले केरल तथा पश्चिमी तटीय मैदानों में होने वाली वर्षा को आम्र-वर्षा कहा जाता है।
काल-बैसाखी या नॉर्वेस्टर
ग्रीष्म ऋतु में पश्चिम बंगाल और असम में गर्जन के साथ होने वाली वर्षा को काल-बैसाखी अथवा नॉर्वेस्टर कहा जाता है।
चेरी ब्लॉसम
कर्नाटक तथा केरल के तटवर्ती क्षेत्रों में मानसून से पहले होने वाली वर्षा को चेरी ब्लॉसम कहा गया है। इससे कॉफी उत्पादक क्षेत्रों को लाभ होता है।
मानसून का फटना
दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी पवनें जब स्थल भाग में प्रवेश करती हैं, तब कभी-कभी तेज गर्जन, बिजली और तीव्र वर्षा के साथ अचानक वर्षा प्रारम्भ होती है। इस घटना को मानसून का फटना कहा जाता है।
3. वर्षा ऋतु
वर्षा ऋतु लगभग मध्य जून से सितम्बर तक रहती है। इस ऋतु में होने वाली वर्षा का प्रमुख कारण भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून का प्रवेश है।
ग्रीष्म ऋतु में उत्तरी मैदानी क्षेत्रों के ऊपर निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है। यह दक्षिणी गोलार्द्ध की दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
ये पवनें भूमध्य रेखा को पार करने के बाद दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहने लगती हैं और भारतीय प्रायद्वीप में दक्षिण-पश्चिम मानसून के रूप में प्रवेश करती हैं।
भारत में वर्षा का वितरण
खासी पहाड़ियों की दक्षिणी पर्वतमाला में स्थित मासिनराम में दुनिया की सबसे अधिक औसत वर्षा होने का उल्लेख किया गया है।
गंगा घाटी में वर्षा की मात्रा सामान्यतः पूर्व से पश्चिम की ओर कम होती जाती है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून की शाखाएँ
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून मुख्य रूप से दो शाखाओं में आगे बढ़ता है—
- अरब सागर शाखा
- बंगाल की खाड़ी शाखा
1. अरब सागर शाखा
अरब सागर शाखा भारत के पश्चिमी तट पर प्रवेश करती है। यह पश्चिमी घाट, महाराष्ट्र, गुजरात तथा मध्य प्रदेश के कुछ भागों में वर्षा का कारण बनती है।
राजस्थान से आगे बढ़ते हुए यह हिमालय से टकराती है और जम्मू-कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय भागों में वर्षा करती है।
हालाँकि यह शाखा राजस्थान से होकर गुजरती है, फिर भी वहाँ वर्षा बहुत कम होती है।
2. बंगाल की खाड़ी शाखा
बंगाल की खाड़ी शाखा भारत के पूर्वी तट तथा उत्तर-पूर्वी भारत की ओर से प्रवेश करती है।
यह बिहार और उत्तर प्रदेश से होती हुई हरियाणा, पंजाब तथा राजस्थान तक पहुँचती है, जहाँ यह अरब सागर शाखा से मिल जाती है।
अधिक वर्षा वाले क्षेत्र
भारत के पश्चिमी तट के कोंकण और मालाबार क्षेत्र, दक्षिणी तटीय भाग तथा हिमालय की दक्षिणवर्ती तलहटी के अनेक क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती है।
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और त्रिपुरा के अनेक भाग भी अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में आते हैं। इन क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा 200 सेमी. से अधिक हो सकती है।
मानसून का प्रत्यावर्तन
जब वर्षा की तीव्रता कम होने लगती है और मानसूनी पवनें लौटने लगती हैं, तो इस प्रक्रिया को मानसून पवनों का प्रत्यावर्तन कहा जाता है।
मानसून का अच्छा प्रदर्शन अल-नीनो की घटना से प्रभावित होता है। जिन वर्षों में अल-नीनो का आगमन होता है, उन वर्षों में मानसून का प्रदर्शन कमजोर हो सकता है।
जेटधाराएँ भी भारतीय मानसून को प्रभावित करती हैं।
मानसून के अत्यधिक प्रभाव के कारण भारत की जलवायु को उष्ण मानसूनी जलवायु कहा गया है।
4. शरद ऋतु अथवा मानसून निवर्तन की ऋतु
उत्तरी भारत में अक्टूबर और नवम्बर के दौरान मौसम सामान्यतः साफ और शांत रहता है। अक्टूबर से मानसून वापस लौटना प्रारम्भ कर देता है।
वर्षा ऋतु के बाद लगभग अक्टूबर से दिसम्बर के प्रारम्भ तक की अवधि को शरद ऋतु कहा गया है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून के धीरे-धीरे भारत से वापस लौटने के कारण इसे मानसून निवर्तन की ऋतु भी कहा जाता है।
उत्तरी भारत में इस समय सामान्यतः वर्षा कम होती है, जबकि बंगाल की खाड़ी में बनने वाले चक्रवात पूर्वी तट की ओर बढ़ते हैं और तमिलनाडु के तट तथा श्रीलंका में वर्षा कराते हैं।
शीतकालीन वर्षा के प्रमुख क्षेत्र
भारत में शीत ऋतु की वर्षा के तीन प्रमुख क्षेत्र बताए गए हैं—
- कोरोमण्डल तट — चक्रवातीय वर्षा
- उत्तर-पूर्वी राज्य — पर्वतीय वर्षा
- पश्चिमोत्तर राज्य — चक्रवातीय वर्षा
भारत की चार ऋतुएँ—एक नजर में
| ऋतु | मुख्य अवधि | प्रमुख विशेषताएँ |
|---|---|---|
| शीत ऋतु | मध्य नवम्बर से फरवरी | कम तापमान, उत्तर-पूर्वी पवनें, सामान्यतः शुष्क मौसम |
| ग्रीष्म ऋतु | मार्च से मई-जून | उच्च तापमान, लू तथा मानसून-पूर्व वर्षा |
| वर्षा ऋतु | मध्य जून से सितम्बर | दक्षिण-पश्चिम मानसून तथा व्यापक वर्षा |
| शरद ऋतु | अक्टूबर से दिसम्बर के प्रारम्भ तक | मानसून का निवर्तन तथा पूर्वी तट पर चक्रवातीय वर्षा |
- किसी स्थान की दिन-प्रतिदिन की वायुमण्डलीय दशा को मौसम कहते हैं।
- मौसम की दीर्घकालिक औसत दशा को जलवायु कहा जाता है।
- भारत में मानसूनी जलवायु पाई जाती है।
- मानसून शब्द अरबी के “मौसिम” शब्द से बना है, जिसका अर्थ हवा की दिशा में मौसमी परिवर्तन है।
- वायुमण्डलीय जल का किसी भी रूप में पृथ्वी पर लौटना वर्षण कहलाता है।
- भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने भारत की जलवायु को शीत, ग्रीष्म, वर्षा और शरद—चार ऋतुओं में बाँटा है।
- शीत ऋतु उत्तरी भारत में लगभग मध्य नवम्बर से फरवरी तक रहती है।
- शीत ऋतु में उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें भूमि से समुद्र की ओर बहती हैं।
- ग्रीष्म ऋतु मार्च से मई-जून तक रहती है।
- उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत की अत्यधिक गर्म तथा शुष्क हवाओं को लू कहा जाता है।
- केरल और पश्चिमी तटीय मैदानों की मानसून-पूर्व वर्षा आम्र-वर्षा कहलाती है।
- पश्चिम बंगाल और असम की गर्जनयुक्त ग्रीष्मकालीन वर्षा काल-बैसाखी या नॉर्वेस्टर कहलाती है।
- कर्नाटक और केरल के तटवर्ती क्षेत्रों की मानसून-पूर्व वर्षा चेरी ब्लॉसम कहलाती है।
- वर्षा ऋतु मध्य जून से सितम्बर तक रहती है।
- दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो प्रमुख शाखाएँ—अरब सागर शाखा और बंगाल की खाड़ी शाखा हैं।
- मासिनराम में विश्व की सर्वाधिक औसत वर्षा होने का उल्लेख है।
- गंगा घाटी में वर्षा पूर्व से पश्चिम की ओर कम होती जाती है।
- मानसूनी पवनों के वापस लौटने की प्रक्रिया को मानसून का प्रत्यावर्तन कहा जाता है।
- अल-नीनो और जेटधाराएँ भारतीय मानसून को प्रभावित करती हैं।
- शरद ऋतु लगभग अक्टूबर से दिसम्बर के प्रारम्भ तक रहती है और इसे मानसून निवर्तन की ऋतु भी कहा जाता है।
- निवर्तित मानसून तमिलनाडु के तट और श्रीलंका में वर्षा कराता है।
भारत की प्राकृतिक वनस्पति, राष्ट्रीय वन नीति एवं सामाजिक वानिकी
प्राकृतिक वनस्पति का अर्थ
ऐसी वनस्पति जिसका विकास मनुष्य द्वारा नहीं किया गया हो तथा जो अपने प्राकृतिक पर्यावरण में स्वयं विकसित होती हो, प्राकृतिक वनस्पति कहलाती है।
प्राकृतिक वनस्पति के विकास और स्वरूप पर जलवायु का गहरा प्रभाव पड़ता है। भूमि की ऊँचाई बदलने के साथ जलवायु बदलती है और उसके अनुसार प्राकृतिक वनस्पति का स्वरूप भी बदल जाता है।
वनस्पति का विकास मुख्य रूप से तापमान और नमी पर निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त मिट्टी की मोटाई और धरातल की ढाल भी वनस्पति को प्रभावित करते हैं।
प्राकृतिक वनस्पति को व्यापक रूप से तीन श्रेणियों में रखा गया है—
- वन
- घास
- झाड़ियाँ
भारत में वन
भारत में जलवायु, मिट्टी, स्थलरूप और ऊँचाई में अत्यधिक विविधता होने के कारण अनेक प्रकार के वन पाए जाते हैं।
दक्षिण में केरल के वर्षा वनों से लेकर उत्तर में लद्दाख के अल्पाइन वनों तथा पश्चिम में राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों से लेकर पूर्वोत्तर भारत के सदाबहार वनों तक वनस्पति में व्यापक विविधता दिखाई देती है।
भारत के प्रमुख वन प्रकार
1. शंकुधारी वन
शंकुधारी वन हिमालय के उन पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ तापमान कम रहता है।
इन वनों के वृक्ष सामान्यतः सीधे और लम्बे होते हैं। इनकी पत्तियाँ नुकीली होती हैं तथा शाखाएँ नीचे की ओर झुकी रहती हैं, जिससे बर्फ वृक्षों पर अधिक समय तक नहीं टिकती।
इन वृक्षों में फूल और फल के स्थान पर शंकु पाए जाते हैं। बीज भी शंकुओं में पाए जाते हैं, इसलिए इन्हें अनावृतबीजी वनस्पति भी कहा जाता है।
2. सदाबहार वन
सदाबहार वन पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर भारत तथा अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
ये वन उन क्षेत्रों में विकसित होते हैं जहाँ मानसूनी वर्षा कई महीनों तक होती है।
इन वनों में वृक्ष एक-दूसरे के बहुत निकट उगते हैं और लगातार छत्र का निर्माण करते हैं। इस कारण सूर्य का प्रकाश धरातल तक बहुत कम पहुँच पाता है।
इन वनों में आर्किड तथा फर्न बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। भूमध्यरेखीय सदाबहार वनों में रबड़ का वृक्ष भी पाया जाता है।
3. आर्द्र सदाबहार वन
आर्द्र सदाबहार वन दक्षिण में पश्चिमी घाट, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तथा पूर्वोत्तर भारत के अनेक भागों में पाए जाते हैं।
इन वनों के वृक्ष लम्बे और सीधे होते हैं तथा उनकी ऊँचाई लगभग 50 मीटर तक हो सकती है।
इनके वृक्ष पूरे वर्ष हरे-भरे रहते हैं। नए पत्ते निकलने के बाद ही पुराने पत्ते धीरे-धीरे गिरते हैं।
इन वनों के प्रमुख वृक्षों में कटहल, सुपारी, ताड़, जामुन, आम और होलक आदि शामिल हैं।
इन वनों में विभिन्न रंगों के फर्न तथा अनेक प्रकार के आर्किड भी पाए जाते हैं।
4. आर्द्र सदाबहार प्रकार
इस प्रकार के वन पश्चिमी घाट, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तथा पूर्वी हिमालय के क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
इन वनों में आर्द्र सदाबहार वृक्षों और आर्द्र पर्णपाती वनों का मिश्रण मिलता है। ये वन घने होते हैं और इनमें अनेक प्रकार के वृक्ष पाए जाते हैं।
5. पर्णपाती वन
पर्णपाती वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ मध्यम स्तर की मौसमी वर्षा केवल कुछ महीनों तक होती है।
इन वनों के वृक्ष सर्दी तथा गर्मी के महीनों में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। मार्च और अप्रैल के दौरान वृक्षों पर नई पत्तियाँ निकलना शुरू होती हैं।
मानसून आने से पहले इन वृक्षों की वृद्धि तेज हो जाती है। पत्तियाँ गिरने और वृक्षों के बीच खाली स्थान बनने के कारण सूर्य का प्रकाश वन के धरातल तक पहुँच सकता है।
6. काँटेदार वन
काँटेदार वन भारत के कम नमी वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
इन क्षेत्रों में वृक्ष दूर-दूर उगते हैं तथा उनके चारों ओर घास पाई जाती है।
इन वृक्षों की पत्तियाँ प्रायः छोटी, मोटी तथा मोमयुक्त होती हैं, जिससे पानी का वाष्पीकरण कम हो सके।
काँटेदार वृक्षों की जड़ें लम्बी और रेशेदार होती हैं, जिससे वे भूमि की अधिक गहराई से पानी प्राप्त कर सकें।
कई वृक्षों में काँटे भी पाए जाते हैं, जो पानी की हानि कम करने तथा पशुओं से सुरक्षा में सहायक होते हैं।
7. मैंग्रोव वन
मैंग्रोव वन नदियों के डेल्टा तथा समुद्री तटों के किनारे पाए जाते हैं।
मैंग्रोव वृक्ष लवणयुक्त और शुद्ध जल दोनों में वृद्धि कर सकते हैं।
राष्ट्रीय वन नीति
वनों की अनियंत्रित कटाई के कारण मृदा अपरदन, मरुस्थल के विस्तार, बंजर भूमि में वृद्धि, जलवायु की विषमता, सूखा, भूमिगत जलस्तर में गिरावट तथा वन्यजीवों की कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
भारत में सर्वप्रथम 1894 ई. में वन नीति बनाई गई थी, लेकिन यह नीति मुख्यतः ब्रिटिश हितों के अनुकूल थी।
स्वतंत्रता के बाद 31 मई 1952 को नई राष्ट्रीय वन नीति घोषित की गई।
राष्ट्रीय वन नीति, 1952
इस नीति के अनुसार देश की कुल भूमि के लगभग 33% भाग पर वन होने चाहिए।
- मैदानी क्षेत्रों में लगभग 20% भूमि पर वन।
- पर्वतीय क्षेत्रों में लगभग 60% भूमि पर वन।
इस नीति में वनों से अधिकतम आय प्राप्त करने पर भी बल दिया गया।
1952 से 1981 के बीच कृषि फसलों के अन्तर्गत क्षेत्र लगभग 1187.5 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 1429.4 लाख हेक्टेयर हो गया। इसमें लगभग 242 लाख हेक्टेयर की वृद्धि ग्रामीण क्षेत्रों की वनाच्छादित भूमि को वृक्षविहीन करके प्राप्त होने का उल्लेख है।
राष्ट्रीय वन नीति, 1988
1952 की वन नीति को वर्ष 1988 में संशोधित किया गया। संशोधित नीति का मुख्य आधार वनों की सुरक्षा, संरक्षण और विकास है।
राष्ट्रीय वन नीति, 1988 के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
- पर्यावरण में स्थिरता लाना।
- वनस्पति एवं जीव-जंतुओं जैसे प्राकृतिक धरोहरों की सुरक्षा करना।
- जनसामान्य की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करना।
- देश की लगभग 33% भूमि पर वन लगाने का लक्ष्य बनाए रखना।
- पारिस्थितिक संतुलन और पर्यावरणीय स्थायित्व बनाए रखना।
- प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण करना।
- नदियों, झीलों और अन्य जलधाराओं के आसपास भूमि कटाव एवं मृदा अपरदन को नियंत्रित करना।
- व्यापक वृक्षारोपण तथा सामाजिक वानिकी द्वारा वन और वृक्ष आच्छादन बढ़ाना।
- ग्रामीण एवं आदिवासी जनसंख्या की ईंधन, चारा तथा अन्य छोटी-मोटी वन उपज की आवश्यकताओं की पूर्ति करना।
- राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वन उत्पादों में वृद्धि करना।
- वन उत्पादों के उचित उपयोग को प्रोत्साहित करना तथा लकड़ी के अनुकूल विकल्प खोजने पर बल देना।
- वन संरक्षण में जन-सहभागिता बढ़ाना।
वन महोत्सव
भारत में प्रत्येक वर्ष जुलाई के प्रथम सप्ताह तक वन महोत्सव मनाया जाता है।
वर्ष 1950 में तत्कालीन कृषि मंत्री के. एम. मुंशी द्वारा “वृक्ष लगाओ आन्दोलन” प्रारम्भ किया गया। बाद में इसका नाम वन महोत्सव रखा गया।
सामाजिक वानिकी
सामाजिक वानिकी शब्द का प्रयोग वर्ष 1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग द्वारा किया गया।
सामाजिक वानिकी समाज, पंचायत और वन विभाग के ऐसे संयुक्त प्रयासों को कहा जाता है, जिनमें रक्षित वनों पर दबाव कम करते हुए मानव-शक्ति को वृक्षारोपण की ओर प्रोत्साहित किया जाता है।
भारत में सामाजिक वानिकी को सर्वप्रथम छठी पंचवर्षीय योजना के दौरान नए बीस सूत्रीय कार्यक्रम के सूत्र संख्या 12 के अन्तर्गत अपनाया गया।
सामाजिक वानिकी के प्रमुख कार्यक्रम
इसके अन्तर्गत तीन प्रमुख कार्यक्रम बताए गए हैं—
- बंजर भूमि में मिश्रित बागान लगाना।
- विनष्ट वनों में पुनः वनारोपण करना।
- सुरक्षा पट्टियाँ बनाना।
सामाजिक वानिकी के प्रमुख उद्देश्य
सामाजिक वानिकी का एक प्रमुख उद्देश्य ईंधन की आवश्यकता को वृक्षों से प्राप्त नवीकरणीय संसाधनों द्वारा पूरा करना है।
इससे गोबर को ईंधन के रूप में जलाने के स्थान पर खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
रक्षित वनों में पशुओं के अनियंत्रित चरने को कम करने के लिए ऐसी वनस्पतियों का विकास करना भी आवश्यक माना गया है जिन्हें पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जा सके।
सामाजिक वानिकी के प्रमुख अंग
सामाजिक वानिकी के तीन मुख्य अंग हैं—
- कृषि वानिकी
- शहर वानिकी
- ग्रामीण वानिकी
1. कृषि वानिकी
कृषि वानिकी में फसल उत्पादन के साथ-साथ वृक्षारोपण भी किया जाता है।
इसमें फलदार वृक्ष, औषधीय पौधे तथा सब्जियों को प्राथमिकता दी जाती है।
फसलों और वृक्षों की सफलता के लिए वृक्ष प्रजातियों का चयन स्थानीय मिट्टी, वर्षा, तापमान और आर्द्रता के अनुसार किया जाना चाहिए।
कृषि वानिकी खेतों की सामान्य उत्पादकता तथा गुणवत्ता को प्रभावित किए बिना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक हो सकती है।
पंचायतों का दायित्व है कि वे किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित करें, योजनाएँ तैयार करें तथा सरकारी सहायता छोटे किसानों तक पहुँचाने में सहायता करें।
2. शहर वानिकी
शहर वानिकी का उद्देश्य शहरों में अधिक से अधिक वृक्ष लगाना है।
इसके अन्तर्गत शहरों, कस्बों, पार्कों, घरों, सार्वजनिक मार्गों तथा खाली पड़ी भूमि पर सजावटी, फलदार और फूलदार पौधे लगाए जाते हैं।
इससे शहरों की सुंदरता बढ़ने के साथ-साथ प्रदूषित वातावरण को स्वच्छ बनाने में भी सहायता मिलती है।
3. ग्रामीण वानिकी
ग्रामीण वानिकी को विस्तार वानिकी भी कहा जाता है।
इसके अन्तर्गत सामुदायिक भूमि, पंचायत भूमि, बंजर भूमि, सड़कों, रेलवे लाइनों और नहरों के किनारे वृक्ष लगाए जाते हैं।
ग्रामीण वानिकी में निम्न कार्य शामिल हैं—
- उत्खनन से विकृत क्षेत्रों को पुनः उपयोगी बनाना।
- ग्रामीण सड़क निर्माण के साथ वृक्षारोपण।
- कुटीर और लघु उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति हेतु वृक्षों का विकास।
कृषि वानिकी से भिन्न, ग्रामीण वानिकी में जिस भूमि पर वृक्षारोपण होता है उसका स्वामित्व सामान्यतः सामुदायिक होता है।
ग्रामीण वानिकी से पर्यावरण में हरियाली और नमी बढ़ती है तथा भविष्य में पंचायतों के लिए वृक्ष आर्थिक निधि के रूप में भी उपयोगी हो सकते हैं।
पंचायत और ग्रामीण वानिकी
73वें संविधान संशोधन के बाद संविधान के अनुच्छेद 243-जी में पंचायतों के सामाजिक तथा विकासात्मक कार्यों की सूची उपलब्ध कराई गई।
राज्यों में ग्रामीण वानिकी को बढ़ावा देने के लिए पंचायत राज अधिनियमों में भी प्रावधान किए गए।
उदाहरण के रूप में बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 22 और 45 में पंचायतों को कृषि तथा ग्राम वानिकी के विकास हेतु योजनाएँ तैयार करने और बंजर भूमि के विकास में सहयोग देने की व्यवस्था का उल्लेख है।
इसी प्रकार धारा 73 में जिला परिषद के संदर्भ में बागवानी को प्रोत्साहित करने, किसानों को प्रशिक्षण देने तथा कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए संसाधन विकसित करने का प्रावधान बताया गया है।
कृषि, शहर और ग्रामीण वानिकी में अन्तर
| प्रकार | मुख्य क्षेत्र | प्रमुख उद्देश्य |
|---|---|---|
| कृषि वानिकी | कृषि भूमि और खेत | फसल उत्पादन के साथ वृक्षारोपण |
| शहर वानिकी | नगर, पार्क, सड़कें एवं सार्वजनिक स्थान | हरियाली, सुंदरता और स्वच्छ वातावरण |
| ग्रामीण वानिकी | सामुदायिक व पंचायत भूमि, सड़क व नहर किनारे | सामुदायिक उपयोग, कच्चा माल और पर्यावरणीय संतुलन |
- मनुष्य के हस्तक्षेप के बिना प्राकृतिक रूप से विकसित वनस्पति को प्राकृतिक वनस्पति कहते हैं।
- वनस्पति का विकास मुख्यतः तापमान और नमी पर निर्भर करता है।
- प्राकृतिक वनस्पति को वन, घास और झाड़ियाँ तीन व्यापक श्रेणियों में बाँटा गया है।
- भारत में शंकुधारी, सदाबहार, आर्द्र सदाबहार, पर्णपाती, काँटेदार और मैंग्रोव जैसे विभिन्न वन पाए जाते हैं।
- शंकुधारी वन मुख्यतः हिमालय के ठंडे पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- सदाबहार वन अधिक वर्षा वाले पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर भारत और अंडमान-निकोबार में पाए जाते हैं।
- आर्द्र सदाबहार वनों के वृक्ष लगभग 50 मीटर तक ऊँचे हो सकते हैं।
- पर्णपाती वृक्ष शुष्क मौसम में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं।
- काँटेदार वन कम नमी वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- मैंग्रोव वन नदी डेल्टा और समुद्री तटों के किनारे उगते हैं।
- भारत की प्रथम वन नीति 1894 ई. में बनाई गई थी।
- स्वतंत्र भारत की नई राष्ट्रीय वन नीति 31 मई 1952 को घोषित की गई।
- 1952 की नीति में देश की 33% भूमि पर वन रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।
- मैदानी क्षेत्रों में 20% तथा पर्वतीय क्षेत्रों में 60% भूमि पर वन रखने की बात कही गई।
- राष्ट्रीय वन नीति को 1988 में संशोधित किया गया और इसमें वन सुरक्षा, संरक्षण तथा विकास पर बल दिया गया।
- वन महोत्सव प्रत्येक वर्ष जुलाई के प्रथम सप्ताह में मनाया जाता है।
- 1950 में के. एम. मुंशी ने “वृक्ष लगाओ आन्दोलन” प्रारम्भ किया, जिसे बाद में वन महोत्सव कहा गया।
- “सामाजिक वानिकी” शब्द का प्रयोग 1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग ने किया।
- सामाजिक वानिकी के तीन प्रमुख अंग कृषि वानिकी, शहर वानिकी और ग्रामीण वानिकी हैं।
- ग्रामीण वानिकी को विस्तार वानिकी भी कहा जाता है।
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भारत के वन्यजीव एवं उनका संरक्षण
भारत में वन्यजीव
भारत में पारिस्थितिक और भौगोलिक दशाओं की अत्यधिक विविधता पाई जाती है। इसी कारण यहाँ अनेक प्रकार के जीव-जंतु पाए जाते हैं।
विश्व में ज्ञात लगभग 15,00,000 जीव-जंतु प्रजातियों में से लगभग 81,000 प्रजातियाँ भारत में पाए जाने का उल्लेख है।
भारत में स्वच्छ तथा समुद्री जल की मछलियों की लगभग 2500 प्रजातियाँ तथा पक्षियों की लगभग 1200 प्रजातियाँ और लगभग 900 उप-प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
भारत की स्थिति अफ्रीकी, यूरोपीय और दक्षिण-पूर्वी एशियाई जैव-तंत्रों के संगम पर होने के कारण यहाँ विभिन्न क्षेत्रों के जीव-जंतु मिलते हैं।
- लकड़बग्घा और चिंकारा — अफ्रीकी मूल
- भेड़िया, हंगुल और जंगली बकरी — यूरोपीय मूल
- हाथी और हूलॉक गिबन — दक्षिण-पूर्वी एशियाई क्षेत्र से सम्बद्ध
भारत के प्रमुख पारिस्थितिक वन्यजीव क्षेत्र
वन्यजीवों के अध्ययन की सुविधा के लिए भारत को कई पारिस्थितिक उप-क्षेत्रों में बाँटा गया है।
1. हिमालय पर्वत श्रृंखला
हिमालयी क्षेत्र को तीन प्रमुख उप-क्षेत्रों में विभाजित किया गया है—
(i) हिमालय की तलहटी
उत्तरी भारत के स्तनपायी जीवों में हाथी, सांभर, दलदली हिरण, चीतल तथा जंगली भैंस प्रमुख हैं।
(ii) पश्चिमी हिमालय के उच्च क्षेत्र
यहाँ जंगली गधा, जंगली बकरी, भेड़, जंगली हिरण तथा कस्तूरी हिरण पाए जाते हैं।
(iii) पूर्वी हिमालय
इस क्षेत्र में लाल पांडा, सूअर तथा रीछ आदि पाए जाते हैं।
2. प्रायद्वीपीय भारतीय उपक्षेत्र
इसे दो प्रमुख भागों में बाँटा गया है—
(i) प्रायद्वीपीय भारत
यहाँ हाथी, जंगली सूअर, दलदली हिरण, सांभर, बारहसिंगा, जंगली कुत्ता तथा जंगली साँड पाए जाते हैं।
(ii) राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र
इस क्षेत्र में रेगिस्तानी बिल्ली तथा जंगली गधा प्रमुख वन्यजीव हैं।
3. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन्य क्षेत्र
अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह
यहाँ बड़ी संख्या में रतनधारी एवं रेंगने वाले जीवों के साथ अनेक समुद्री जीव पाए जाते हैं।
समुद्री जीवों में डॉल्फिन तथा कछुए प्रमुख हैं। इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के दुर्लभ पक्षी भी पाए जाते हैं।
सुन्दरवन का ज्वारीय दलदली क्षेत्र
सुन्दरवन क्षेत्र में मछली, नरभक्षी शेर, बुनकर चीटियाँ, हिरण, सूअर तथा बड़ी छिपकलियाँ पाई जाती हैं।
वन्यजीवों का जलवायु एवं वनस्पति से सम्बन्ध
वन्यजीवों का आवास, उत्पत्ति, विकास और पोषण उस क्षेत्र की जलवायु और वनस्पति पर निर्भर करता है।
जलवायु और वनस्पति में परिवर्तन होने पर वहाँ पाए जाने वाले जीवों का स्वरूप, आकार, प्रकार, रंग और रहन-सहन भी बदलता है।
विषुवतीय जलवायु के जीव-जंतु, भूमध्यसागरीय जलवायु के जीवों और मरुस्थलीय क्षेत्रों के जीवों से अलग होते हैं। इस प्रकार अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार का जैव-जगत विकसित होता है।
वनस्पति वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक आवास प्रदान करती है। विश्व के अधिकांश वन्यजीव वन या वनस्पति क्षेत्रों में ही निवास करते हैं।
वनों के विनाश से वन्यजीवों की संख्या में भी कमी आती है।
वन्यजीवों पर जलवायु एवं वनस्पति का प्रभाव
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों और आर्कटिक क्षेत्रों के जीवों में स्पष्ट अन्तर पाया जाता है।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक ताप और वर्षा के कारण घनी वनस्पति पाई जाती है। यहाँ वनस्पति पर निर्भर शाकाहारी जीवों में हाथी, हिरण, जेब्रा, जिराफ और नीलगाय आदि तथा अन्य वन्यजीवों पर निर्भर मांसाहारी जीवों में शेर और चीते प्रमुख हैं।
सवाना प्रदेशों में घास अधिक होने के कारण शाकाहारी पशुओं की संख्या अधिक होती है।
मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में छोटे पशु, भेड़िया और लोमड़ी आदि मिलते हैं, जबकि उत्तरी अक्षांशों में वनस्पति की कमी के कारण कम जीव पाए जाते हैं।
मरुस्थलीय प्रदेशों में वनस्पति और जल की कमी के कारण ऊँट विशेष रूप से अनुकूलित पशु है।
प्रमुख वन्यजीवों का वितरण
1. उष्णकटिबंधीय आर्द्र प्रदेश
इन प्रदेशों में शाकाहारी पशुओं में हाथी, गैंडा, गोरिल्ला, चिम्पांजी तथा बड़ी गिलहरी आदि पाए जाते हैं।
भूमि पर प्यूमा तथा अन्य जाति के सिंह, अनेक प्रकार की चिड़ियाँ तथा जहरीली मक्खियाँ मिलती हैं। जल में मगर, घड़ियाल और दरियाई घोड़े पाए जाते हैं।
2. मानसूनी प्रदेश
मानसूनी प्रदेशों में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के वन्यजीव पाए जाते हैं।
प्रमुख जीवों में हिरण, बारहसिंगा, नीलगाय, खूंखार हाथी, खरगोश, शेर, चीता, गीदड़, भेड़िया, लोमड़ी, तेंदुआ, साँप और अजगर आदि शामिल हैं।
3. उष्ण मरुस्थलीय प्रदेश
उष्ण और शीतोष्ण मरुस्थलीय क्षेत्रों में ऊँट सबसे महत्वपूर्ण पशु है।
इसके अतिरिक्त हिरण, बिच्छू, दीमक, छिपकली तथा गिद्ध आदि भी पाए जाते हैं।
4. शीतोष्ण प्रदेश
शीतोष्ण पर्णपाती वनों में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के पशु पाए जाते हैं।
इनमें हिरण, उदबिलाव, गिलहरी, वनबिलाव, भालू, लोमड़ी, भेड़िया और खरगोश आदि शामिल हैं।
नदियों में घड़ियाल, मछलियाँ और केकड़े भी पाए जाते हैं।
5. कोणधारी वन
अत्यधिक ठंडे कोणधारी वनों में कई पशुओं के शरीर पर ठंड से बचाव के लिए घने फर पाए जाते हैं।
यहाँ रेनडियर या कैरिबू, लोमड़ी, भेड़िया, सफेद भालू, बीवर, मिंक, गिलहरी, मार्टिन, मस्क और ऑक्स आदि पाए जाते हैं।
मानव और वन्यजीव
मनुष्य ने अपने उपयोग के लिए अनेक वन्य पशुओं को पालतू बनाया है। इनमें गाय, बैल, भेड़, बकरी, घोड़ा और कुत्ता प्रमुख हैं।
मनुष्य द्वारा मांस, खाल, बाल, दूध, मक्खन, पनीर आदि के लिए पशुओं का उपयोग किया जाता है।
अत्यधिक शिकार और मानव गतिविधियों के कारण अनेक वन्यजीवों की संख्या में कमी आई है और कई प्रजातियाँ संकट में पड़ गई हैं।
संकटापन्न जीव-जंतु प्रजातियाँ
मानवीय गतिविधियों के कारण अनेक जीव-जंतु प्रजातियों की संख्या तेजी से घट रही है। ऐसे जीवों के संरक्षण के लिए विश्व स्तर पर प्रयास किए जाते हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा संकटग्रस्त जीवों एवं पौधों का विवरण तैयार किया जाता है, जिसे रेड डाटा बुक कहा जाता है।
भारत के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की 9 मार्च 2011 की रिपोर्ट में 57 जीवों को क्रांतिक संकटग्रस्त घोषित किए जाने का उल्लेख है।
इन जीवों को सात वर्गों में रखा गया है—
- पक्षी
- स्तनधारी
- सरीसृप
- उभयचर
- मछली
- मकड़ी
- कोरल
IUCN द्वारा संकट के आकलन के प्रमुख आधार
किसी जीव पर मंडरा रहे संकट का आकलन निम्न आधारों पर किया जाता है—
- पिछले 10 वर्षों या तीन पीढ़ियों में उसकी आबादी 80% से अधिक कम हो गई हो।
- उसके भौगोलिक परिवेश में बहुत तेजी से परिवर्तन हुआ हो।
- एक ही पीढ़ी में अथवा पिछले तीन वर्षों में उसकी आबादी 25% कम हो गई हो या घटकर 250 रह गई हो।
- वयस्क जीवों की संख्या 50 से भी कम रह गई हो।
- उस जीव के जंगल से विलुप्त होने का खतरा हो।
भारत में वन्यजीव संरक्षण
संकटग्रस्त जीव-जंतु प्रजातियों की संख्या बढ़ने के कारण वन्यजीवों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए अनेक उपाय किए गए हैं।
केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग से संरक्षण केन्द्र स्थापित किए गए हैं।
भारत के प्रमुख जैवमण्डल रिजर्व
| जैवमण्डल रिजर्व | राज्य / क्षेत्र |
|---|---|
| नीलगिरि संरक्षित जैविक क्षेत्र | तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक |
| नन्दा देवी राष्ट्रीय उद्यान एवं बायोस्फीयर रिजर्व | उत्तराखंड |
| मन्नार की खाड़ी | तमिलनाडु |
| नोकरेक | मेघालय |
| सुन्दरवन | पश्चिम बंगाल |
| मानस | असम |
| सिमलीपाल | ओडिशा |
| दिहांग-दिबांग | अरुणाचल प्रदेश |
| पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व | मध्य प्रदेश |
| अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व | मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ |
| कच्छ का रण | गुजरात |
| शीत मरु भूमि | हिमाचल प्रदेश |
| कंचनजंगा | सिक्किम |
| अगस्त्यमलाई बायोस्फीयर रिजर्व | केरल एवं तमिलनाडु |
| बड़ा निकोबार जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह |
| डिब्रू-सैखोवा | असम |
| शेषाचलम पहाड़ियाँ | आन्ध्र प्रदेश |
| पन्ना राष्ट्रीय उद्यान | मध्य प्रदेश |
वर्ष 1973 में यूनेस्को ने मानव एवं जैवमण्डल पर एक कार्यक्रम प्रारम्भ किया। इसके आधार पर भारत में 18 जैवमण्डलीय आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए जाने का उल्लेख है।
इसके अतिरिक्त देश में 53 टाइगर रिजर्व स्थापित किए जाने का उल्लेख भी किया गया है।
वन्यजीव संरक्षण के प्रमुख उद्देश्य
- प्रजातियों के नियंत्रित एवं सीमित उपयोग के लिए उनके प्राकृतिक आवासों का संरक्षण करना।
- राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य तथा बायोस्फीयर रिजर्व जैसे संरक्षित क्षेत्रों में पर्याप्त संख्या में प्रजातियों का रख-रखाव करना।
- वनस्पति एवं जीव प्रजातियों के संरक्षण के लिए बायोस्फीयर रिजर्व स्थापित करना।
- कानून के माध्यम से वन्यजीवों की रक्षा करना।
संरक्षित नेटवर्क क्षेत्र
वन्यजीव संरक्षण के लिए विभिन्न प्रकार के संरक्षित क्षेत्र बनाए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं—
- राष्ट्रीय पार्क
- अभयारण्य
- जैव आरक्षित क्षेत्र
- नेचर रिजर्व
- प्राकृतिक स्मारक
- सांस्कृतिक परिदृश्य
वन्यजीव संरक्षण से सम्बन्धित प्रमुख कानून
- मद्रास वाइल्ड एलिफेंट प्रिजर्वेशन एक्ट, 1873
- ऑल इंडिया एलिफेंट प्रिजर्वेशन एक्ट, 1879
- द वाइल्ड बर्ड्स एंड एनिमल्स प्रोहिबिशन एक्ट, 1912
- बंगाल राइनोसिरस प्रिजर्वेशन एक्ट, 1932
- असम राइनोसिरस प्रिजर्वेशन एक्ट, 1954
- इंडियन बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ, 1952
- वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972
वन्यजीव संरक्षण—एक नजर में
| आधार | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| प्राकृतिक आधार | जलवायु और वनस्पति वन्यजीवों के आवास एवं वितरण को प्रभावित करते हैं। |
| मुख्य संकट | वन विनाश, अत्यधिक शिकार और अन्य मानवीय गतिविधियाँ |
| संकटग्रस्त जीवों का अभिलेख | रेड डाटा बुक |
| प्रमुख संरक्षण क्षेत्र | राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और जैवमण्डल रिजर्व |
| प्रमुख संरक्षण कानून | वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972 |
- भारत में भौगोलिक एवं पारिस्थितिक विविधता के कारण वन्यजीवों की अत्यधिक विविधता पाई जाती है।
- विश्व की लगभग 15,00,000 ज्ञात जीव-जंतु प्रजातियों में से लगभग 81,000 प्रजातियाँ भारत में मिलने का उल्लेख है।
- भारत में लगभग 2500 मछली प्रजातियाँ तथा 1200 पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- हिमालय, प्रायद्वीपीय भारत, मरुस्थलीय क्षेत्र, अंडमान-निकोबार और सुन्दरवन प्रमुख वन्यजीव क्षेत्र हैं।
- वन्यजीवों का आवास, विकास और पोषण जलवायु तथा वनस्पति पर निर्भर करता है।
- वनों के विनाश से वन्यजीवों की संख्या में कमी आती है।
- उष्णकटिबंधीय, मानसूनी, मरुस्थलीय, शीतोष्ण और कोणधारी वन क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार के वन्यजीव पाए जाते हैं।
- अत्यधिक शिकार और मानवीय गतिविधियाँ वन्यजीवों के लिए प्रमुख खतरे हैं।
- IUCN संकटग्रस्त जीवों एवं पौधों का विवरण रेड डाटा बुक में प्रस्तुत करता है।
- 9 मार्च 2011 की रिपोर्ट में 57 जीवों को क्रांतिक संकटग्रस्त घोषित किए जाने का उल्लेख है।
- क्रांतिक संकटग्रस्त जीवों को पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप, उभयचर, मछली, मकड़ी और कोरल सात वर्गों में रखा गया है।
- भारत में 18 जैवमण्डलीय आरक्षित क्षेत्रों का उल्लेख है।
- देश में 53 टाइगर रिजर्व स्थापित किए जाने का उल्लेख है।
- वन्यजीव संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य तथा जैवमण्डल रिजर्व बनाए जाते हैं।
- वन्यजीव संरक्षण का प्रमुख उद्देश्य प्राकृतिक आवास तथा जीव-जंतु प्रजातियों को सुरक्षित रखना है।
- वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972 वन्यजीव संरक्षण से सम्बन्धित प्रमुख कानून है।
भारत के प्रमुख पड़ोसी देश एवं भारत—एक दृष्टि में
भारत के प्रमुख पड़ोसी देश
भारत दक्षिण एशिया में स्थित भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा देश है। इसकी राजधानी नई दिल्ली है। क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में सातवाँ तथा जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा स्थान बताया गया है।
भारत के प्रमुख 10 पड़ोसी देश हैं—
- पाकिस्तान
- अफगानिस्तान
- चीन
- नेपाल
- भूटान
- बांग्लादेश
- म्यांमार
- श्रीलंका
- मालदीव
- इंडोनेशिया
भारत के पड़ोसी देशों की दिशा
- पश्चिम में— पाकिस्तान
- उत्तर-पश्चिम में— अफगानिस्तान
- उत्तर-पूर्व में— चीन, नेपाल और भूटान
- पूर्व में— बांग्लादेश और म्यांमार
- दक्षिण में— श्रीलंका
- दक्षिण-पश्चिम में— मालदीव
- दक्षिण-पूर्व में— इंडोनेशिया
भारत की उत्तरी प्राकृतिक सीमा हिमालय पर्वत से और दक्षिणी सीमा हिन्द महासागर से लगी है। इसके पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में अरब सागर स्थित है।
स्थलीय पड़ोसी देशों के साथ भारत की सीमा
| देश | सीमा की लंबाई |
|---|---|
| बांग्लादेश | 4096 कि.मी. |
| चीन | 3917 कि.मी. |
| पाकिस्तान | 3310 कि.मी. |
| नेपाल | 1752 कि.मी. |
| म्यांमार | 1458 कि.मी. |
| भूटान | 587 कि.मी. |
| अफगानिस्तान | 80 कि.मी. |
| कुल | 15,200 कि.मी. |
1. पाकिस्तान
पाकिस्तान भारत के पश्चिम में स्थित है। इसकी राजधानी इस्लामाबाद है।
लगभग 20 करोड़ की आबादी के साथ पाकिस्तान को विश्व का छठा सबसे अधिक आबादी वाला देश बताया गया है।
यहाँ की प्रमुख भाषाओं में उर्दू, पंजाबी, सिंधी, बलूची और पश्तो शामिल हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच 1947, 1965, 1971 और 1999 में युद्ध हुए। पाकिस्तान भारत के विभाजन का परिणाम है और उसका निर्माण 14 अगस्त 1947 को हुआ।
2. अफगानिस्तान
अफगानिस्तान दक्षिण-मध्य एशिया में स्थित एक स्थलरुद्ध देश है। इसकी राजधानी काबुल है।
इसके पूर्व में पाकिस्तान, उत्तर-पूर्व में भारत और चीन, उत्तर में ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान तथा तुर्कमेनिस्तान और पश्चिम में ईरान स्थित बताए गए हैं।
3. बांग्लादेश
बांग्लादेश भारत का एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है और भारत के साथ सबसे लंबी स्थलीय सीमा साझा करता है।
यह पहले पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था। 16 दिसम्बर 1971 को यह स्वतंत्र देश बना और बांग्लादेश कहलाया।
इसकी राजधानी ढाका है। इसके एक ओर समुद्र और शेष तीन ओर भारत के विभिन्न राज्य स्थित हैं।
यहाँ की प्रमुख भाषा बंगाली तथा प्रमुख धर्म इस्लाम है। स्वतंत्र बांग्लादेश के निर्माण में शेख मुजीबुर्रहमान की प्रमुख भूमिका रही।
रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचना “आमार सोनार बांग्ला” बांग्लादेश का राष्ट्रगीत है।
4. म्यांमार
म्यांमार, जिसे बर्मा भी कहा जाता है, भारत के पूर्व में स्थित पड़ोसी देश है। इसकी राजधानी नायपीयदा है।
यहाँ बर्मी भाषा बोली जाती है और बौद्ध धर्म प्रमुख है।
म्यांमार 4 फरवरी 1948 को अंग्रेजी शासन से मुक्त होकर स्वतंत्र राष्ट्र बना।
यहाँ धान का उत्पादन अधिक होता है। आर्थिक दृष्टि से इसे पिछड़ा हुआ देश बताया गया है।
5. चीन
चीन भारत का सबसे बड़ा पड़ोसी देश है। इसे जनसंख्या की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा तथा क्षेत्रफल की दृष्टि से तीसरा सबसे बड़ा देश बताया गया है।
चीन की राजधानी बीजिंग है तथा इसकी प्रमुख भाषा मंदारिन है।
यह एक गणतंत्र है जहाँ कम्युनिस्ट शासन है। भारत की तरह चीन भी कृषि प्रधान देश है। यहाँ धान, चाय, तम्बाकू और चीनी आदि प्रमुख उत्पाद बताए गए हैं।
चीन को एक शक्तिशाली देश माना गया है।
6. मालदीव
मालदीव हिन्द महासागर में स्थित एक द्वीपीय गणराज्य है। इसका विस्तार भारत के लक्षद्वीप द्वीपों की उत्तर-दक्षिण दिशा में बताया गया है तथा यह लक्षद्वीप सागर में स्थित है।
मालदीव की राजधानी और सबसे बड़ा नगर माले है।
वर्ष 2006 के आँकड़ों के अनुसार इसकी आबादी 1,03,693 बताई गई है। जनसंख्या और क्षेत्रफल दोनों की दृष्टि से इसे एशिया का सबसे छोटा देश बताया गया है।
7. भूटान
भूटान भारत का एक हिमालयी पड़ोसी देश है। यह पूर्वी हिमालय में स्थित एक छोटा देश है।
भूटान की राजधानी थिम्पू है। इसके उत्तर में चीन तथा दक्षिण में भारत स्थित है।
भूटान का अधिकांश भू-भाग पर्वतीय है और यहाँ ऊँची पर्वतीय भूमि अधिक पाई जाती है। प्रमुख धर्म बौद्ध धर्म है।
भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक हैं। आर्थिक दृष्टि से भूटान को गरीब और पिछड़ा देश बताया गया है तथा यहाँ मुख्यतः धान की खेती होती है।
8. नेपाल
नेपाल भारत का हिमालयी एवं स्थलरुद्ध पड़ोसी देश है। इसकी राजधानी काठमांडू तथा प्रमुख भाषा नेपाली है।
नेपाल के उत्तर में चीन का स्वायत्तशासी प्रदेश तिब्बत तथा दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में भारत स्थित है।
प्रतिशत के आधार पर नेपाल को विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू धर्मावलम्बी राष्ट्र बताया गया है।
विश्व की सबसे ऊँची चोटी माउण्ट एवरेस्ट नेपाल में स्थित है। पर्वतीय भू-भाग के कारण नेपाल पर्यटन की दृष्टि से अत्यन्त आकर्षक है।
9. श्रीलंका
श्रीलंका भारत से लगभग 80 कि.मी. दूर हिन्द महासागर में स्थित एक द्वीपीय देश है।
इसकी राजधानी कोलम्बो बताई गई है। वर्ष 1972 तक इसे सीलोन नाम से जाना जाता था।
श्रीलंका 4 फरवरी 1948 को स्वतंत्र हुआ। यहाँ शिक्षा का स्तर उच्च बताया गया है तथा लगभग 90% लोगों को शिक्षित बताया गया है।
यहाँ बौद्ध धर्म प्रमुख है। कोलम्बो समुद्री परिवहन की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण बन्दरगाह है।
10. इंडोनेशिया
इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया और ओशिनिया में स्थित एक गणराज्य है। इसकी राजधानी जकार्ता है।
इसकी जनसंख्या लगभग 23 करोड़ बताई गई है। इसे विश्व का चौथा सर्वाधिक आबादी वाला तथा विश्व की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश बताया गया है।
इसकी जमीनी सीमा पापुआ न्यू गिनी, पूर्वी तिमोर और मलेशिया के साथ मिलती है।
अन्य पड़ोसी क्षेत्रों में सिंगापुर, फिलीपीन्स, ऑस्ट्रेलिया तथा भारत का अंडमान-निकोबार द्वीप समूह क्षेत्र शामिल बताया गया है।
भारत—एक दृष्टि में
भारत के प्रमुख भौगोलिक तथ्य
| देश | भारत / इण्डिया |
|---|---|
| अन्य नाम | आर्यावर्त, जम्बूद्वीप, भारतवर्ष, हिन्दुस्तान, इण्डिया आदि |
| राजधानी | नई दिल्ली |
| भौगोलिक स्थिति | उत्तर-पूर्वी गोलार्द्ध |
| अक्षांशीय विस्तार | 8°4′ उत्तरी अक्षांश से 37°6′ उत्तरी अक्षांश |
| देशांतरीय विस्तार | 68°7′ पूर्वी देशांतर से 97°25′ पूर्वी देशांतर |
| मानक समय | 82°30′ पूर्वी देशांतर, नैनी के समीप; ग्रीनविच समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे |
| उत्तर-दक्षिण लंबाई | 3,214 कि.मी. |
| पूर्व-पश्चिम चौड़ाई | 2,933 कि.मी. |
| स्थलीय सीमा | 15,106.7 कि.मी. |
| जलीय सीमा | 7,516.6 कि.मी. |
| प्रादेशिक जलसीमा | समुद्र तट से 12 समुद्री मील तक |
| संलग्न क्षेत्र | प्रादेशिक जलसीमा से आगे 24 समुद्री मील तक |
| अनन्य आर्थिक क्षेत्र | संलग्न क्षेत्र से आगे 200 समुद्री मील तक |
| जलवायु | मानसूनी जलवायु |
| क्षेत्रफल | 32,87,263 वर्ग कि.मी. |
| विश्व के कुल क्षेत्रफल में भाग | 2.42% |
| क्षेत्रफल की दृष्टि से स्थान | विश्व में सातवाँ |
पड़ोसी देशों की सीमा-सारणी में कुल स्थलीय सीमा 15,200 कि.मी. है, जबकि भारत—एक दृष्टि में स्थलीय सीमा 15,106.7 कि.मी. अंकित है।
भारत के प्रमुख जनसांख्यिकीय तथ्य
| कुल जनसंख्या | 1,21,05,69,573 — विश्व की कुल जनसंख्या का 17.5% (2011) |
|---|---|
| जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में स्थान | द्वितीय |
| पुरुष जनसंख्या | 63,31,21,843 |
| महिला जनसंख्या | 58,74,47,730 |
| ग्रामीण जनसंख्या | 83.34 करोड़ — 68.8% |
| शहरी जनसंख्या | 37.71 करोड़ — 31.2% |
| दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर | 17.7% — 2001 से 2011 |
| लिंगानुपात | 943 प्रति 1000 पुरुष |
| जनसंख्या घनत्व | 382 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. |
| कुल साक्षरता | 73.0% |
| पुरुष साक्षरता | 80.9% |
| महिला साक्षरता | 64.6% |
| अनुसूचित जाति जनसंख्या | 20,13,78,086 — कुल जनसंख्या का 16.6% |
| अनुसूचित जनजाति जनसंख्या | 10,42,81,034 — कुल जनसंख्या का 8.6% |
भारत के अन्य प्रमुख तथ्य
- राज्यों की संख्या— 28
- केन्द्रशासित प्रदेशों की संख्या— 8
- ज्यामितीय आकार— चतुर्भुजीय
- पर्वतीय क्षेत्र का विस्तार— 10.7%
- पहाड़ी क्षेत्र का विस्तार— 18.6%
- पठारी क्षेत्र का विस्तार— 27.7%
- मैदानी क्षेत्र का विस्तार— 43.0%
कर्क रेखा से गुजरने वाले राज्य
कर्क रेखा भारत के आठ राज्यों से होकर गुजरती है—
- गुजरात
- राजस्थान
- मध्य प्रदेश
- छत्तीसगढ़
- झारखंड
- पश्चिम बंगाल
- त्रिपुरा
- मिजोरम
अन्य महत्वपूर्ण आँकड़े
- अंतरराष्ट्रीय सीमा वाले राज्य— 17
- तेल शोधनशालाओं की संख्या— 22
- राष्ट्रीय राजमार्गों की संख्या— 266
- बड़े बंदरगाहों की संख्या— 13
भारत के राष्ट्रीय प्रतीक
| राष्ट्रीय प्रतीक | नाम |
|---|---|
| राष्ट्रीय पशु | बाघ |
| राष्ट्रीय विरासत पशु | हाथी |
| राष्ट्रीय पक्षी | मोर |
| राष्ट्रीय वृक्ष | बरगद |
| राष्ट्रीय पुष्प | कमल |
| राष्ट्रीय चिह्न | अशोक स्तम्भ |
| राष्ट्रीय गान | जन-गण-मन — रवीन्द्रनाथ टैगोर |
| राष्ट्रीय गीत | वंदेमातरम् — बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय |
| राष्ट्रीय भाषा | हिन्दी |
| राष्ट्रीय लिपि | देवनागरी |
| राष्ट्रीय वाक्य | सत्यमेव जयते |
| राष्ट्रीय ध्वज | तिरंगा — केसरिया, सफेद एवं हरा |
| राष्ट्रीय नदी | गंगा |
| राष्ट्रीय जलीय जीव | डॉल्फिन गंगा |
- भारत दक्षिण एशिया में स्थित भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा देश है।
- भारत के प्रमुख 10 पड़ोसी देश हैं—पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव और इंडोनेशिया।
- भारत की सबसे लंबी स्थलीय सीमा बांग्लादेश के साथ 4096 कि.मी. है।
- चीन के साथ सीमा 3917 कि.मी. और पाकिस्तान के साथ 3310 कि.मी. बताई गई है।
- नेपाल के साथ 1752 कि.मी., म्यांमार के साथ 1458 कि.मी., भूटान के साथ 587 कि.मी. और अफगानिस्तान के साथ 80 कि.मी. सीमा है।
- पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद तथा अफगानिस्तान की राजधानी काबुल है।
- बांग्लादेश 16 दिसम्बर 1971 को स्वतंत्र हुआ और इसकी राजधानी ढाका है।
- म्यांमार की राजधानी नायपीयदा और चीन की राजधानी बीजिंग है।
- मालदीव की राजधानी माले और नेपाल की राजधानी काठमांडू है।
- श्रीलंका भारत से लगभग 80 कि.मी. दूर स्थित द्वीपीय देश है।
- इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता है।
- भारत का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग कि.मी. है और क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में सातवाँ स्थान है।
- भारत की उत्तर-दक्षिण लंबाई 3,214 कि.मी. और पूर्व-पश्चिम चौड़ाई 2,933 कि.मी. है।
- भारत की जलवायु मानसूनी है।
- भारत में 28 राज्य और 8 केन्द्रशासित प्रदेश बताए गए हैं।
- 2011 के अनुसार जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. तथा लिंगानुपात 943 है।
- 2011 में कुल साक्षरता 73.0%, पुरुष साक्षरता 80.9% और महिला साक्षरता 64.6% थी।
- भारत के 43% भाग को मैदानी, 27.7% को पठारी, 18.6% को पहाड़ी और 10.7% को पर्वतीय क्षेत्र बताया गया है।
- कर्क रेखा भारत के आठ राज्यों से होकर गुजरती है।
- भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ, पक्षी मोर, वृक्ष बरगद, पुष्प कमल और राष्ट्रीय नदी गंगा है।
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NASA एवं ISRO
खगोलीय संगठन—NASA और ISRO
अंतरिक्ष के अध्ययन, वैज्ञानिक खोज, उपग्रहों के विकास तथा अंतरिक्ष अभियानों के संचालन के लिए विभिन्न देशों ने विशेष अंतरिक्ष संस्थाओं की स्थापना की है। इनमें संयुक्त राज्य अमेरिका की NASA तथा भारत की ISRO प्रमुख संस्थाएँ हैं।
NASA
NASA का पूरा नाम नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन है। यह संयुक्त राज्य अमेरिका सरकार की एक संस्था है, जो देश के सार्वजनिक अंतरिक्ष कार्यक्रमों तथा एरोनॉटिक्स और एयरोस्पेस अनुसंधान के लिए उत्तरदायी है।
NASA की स्थापना
NASA की स्थापना 29 जुलाई 1958 को की गई थी। इसने 1 अक्टूबर 1958 से अपना कार्य प्रारम्भ किया।
NASA का गठन इसकी पूर्ववर्ती संस्था नेशनल एडवाइजरी कमेटी फॉर एरोनॉटिक्स के स्थान पर किया गया था। यह पूर्ववर्ती संस्था वर्ष 1915 से 1958 तक कार्यरत रही।
NASA का उद्देश्य
फरवरी 2006 से NASA के लक्ष्य के रूप में भविष्य में अंतरिक्ष अन्वेषण, वैज्ञानिक खोज और एरोनॉटिक्स अनुसंधान को बढ़ाना बताया गया है।
NASA मानव अंतरिक्ष अन्वेषण, अंतरिक्ष विज्ञान, एरोनॉटिक्स अनुसंधान तथा अंतरिक्ष प्रक्षेपण से जुड़े कार्यक्रमों का संचालन करता है।
NASA के प्रमुख कार्य
- अंतरिक्ष की वैज्ञानिक खोज और अन्वेषण करना।
- मानव अंतरिक्ष अभियानों का संचालन करना।
- एरोनॉटिक्स और एयरोस्पेस अनुसंधान को बढ़ावा देना।
- अंतरिक्ष यात्रियों को अधिक दूर तक अंतरिक्ष यात्रा करने योग्य बनाने वाली प्रणालियों का विकास करना।
- अंतरिक्ष स्टेशन तथा अन्य अंतरिक्ष कार्यक्रमों का संचालन करना।
- बहुउपयोगी अंतरिक्ष वाहनों और चालक दल के वाहनों के निर्माण एवं विकास पर कार्य करना।
- प्रक्षेपण सेवा कार्यक्रमों तथा मानवरहित प्रक्षेपणों की व्यवस्था करना।
NASA की प्रमुख उपलब्धियाँ
NASA के संचालन में अनेक प्रसिद्ध अंतरिक्ष कार्यक्रम चलाए गए हैं। इनमें अपोलो चन्द्रमा अभियान, स्काईलैब अंतरिक्ष स्टेशन तथा बाद में अंतरिक्ष शटल प्रमुख हैं।
NASA अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के कार्यक्रम में भी सहयोग कर रहा है।
NASA—एक नजर में
| पूरा नाम | नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन |
|---|---|
| स्थापना | 29 जुलाई 1958 |
| कार्य प्रारम्भ | 1 अक्टूबर 1958 |
| पूर्ववर्ती संस्था | नेशनल एडवाइजरी कमेटी फॉर एरोनॉटिक्स |
| अधिकार क्षेत्र | अमेरिकी सरकार |
| मुख्यालय | वाशिंगटन डी.सी. |
| कर्मचारी | 18,800 से अधिक |
| वार्षिक बजट | 33.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर (2023) |
| नारा | फॉर द बेनिफिट ऑफ ऑल — सबकी भलाई के लिए |
ISRO
ISRO का पूरा नाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन है। यह भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है।
ISRO का मुख्यालय कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में स्थित है। संस्थान में लगभग 17 हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत बताए गए हैं।
ISRO की स्थापना
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना 15 अगस्त 1969 को की गई थी।
इसरो का मुख्य उद्देश्य भारत के लिए अंतरिक्ष से सम्बन्धित तकनीकी क्षमताओं का विकास और उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
ISRO के प्रमुख उद्देश्य
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्यों में निम्नलिखित का विकास शामिल है—
- उपग्रहों का विकास
- प्रमोचक यानों का विकास
- परिज्ञापी रॉकेटों का विकास
- भू-प्रणालियों का विकास
भारत अपनी अंतरिक्ष क्षमताओं का उपयोग करने के साथ-साथ अनेक देशों को वाणिज्यिक तथा अन्य स्तरों पर सहयोग भी प्रदान करता है।
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र तिरुवनंतपुरम, केरल में स्थित है।
PSLV और GSLV
ISRO कृत्रिम तथा भू-स्थायी कृत्रिम उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए मुख्य रूप से दो प्रकार के प्रक्षेपण यानों का उपयोग करता है—
- PSLV — ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान
- GSLV — भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान
ISRO को इंदिरा गांधी पुरस्कार
वर्ष 2014 में ISRO को शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला
मंगलयान के सफल प्रक्षेपण के लगभग एक वर्ष बाद ISRO ने 29 सितम्बर 2015 को भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला को अंतरिक्ष में स्थापित किया।
चंद्रयान कार्यक्रम
वर्ष 2019 में चंद्रयान मिशन की असफलता के बाद ISRO ने वर्ष 2023 में चंद्रयान-3 का सफल प्रक्षेपण किया।
चंद्रयान-3 की सफलता भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है।
आदित्य-L1 मिशन
ISRO ने सूर्य के विषय में अनुसंधान के लिए आदित्य-L1 मिशन भी प्रक्षेपित किया।
उपग्रह प्रक्षेपण रिकॉर्ड
ISRO ने एक साथ 100 से अधिक उपग्रह प्रक्षेपित करने का रिकॉर्ड भी बनाया।
अध्याय के सारांश में वर्ष 2017 में एक साथ 104 उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने का उल्लेख किया गया है।
ISRO—एक नजर में
| पूरा नाम | भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन |
|---|---|
| स्थापना | 15 अगस्त 1969 |
| मुख्यालय | बेंगलुरु, कर्नाटक |
| कर्मचारी एवं वैज्ञानिक | लगभग 17 हजार |
| विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र | तिरुवनंतपुरम, केरल |
| प्रमुख प्रक्षेपण यान | PSLV और GSLV |
| इंदिरा गांधी पुरस्कार | 2014 |
| भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला | 29 सितम्बर 2015 |
| चंद्रयान-3 | 2023 में सफल प्रक्षेपण |
| सौर अनुसंधान मिशन | आदित्य-L1 |
NASA और ISRO में प्रमुख अन्तर
| आधार | NASA | ISRO |
|---|---|---|
| देश | संयुक्त राज्य अमेरिका | भारत |
| स्थापना | 29 जुलाई 1958 | 15 अगस्त 1969 |
| मुख्यालय | वाशिंगटन डी.सी. | बेंगलुरु |
| मुख्य कार्य | अंतरिक्ष अन्वेषण, वैज्ञानिक खोज एवं एरोनॉटिक्स अनुसंधान | भारत के लिए अंतरिक्ष तकनीक, उपग्रह और प्रक्षेपण यानों का विकास |
| प्रमुख कार्यक्रम / उपलब्धियाँ | अपोलो, स्काईलैब, अंतरिक्ष शटल | मंगलयान, चंद्रयान-3, आदित्य-L1 |
- NASA का पूरा नाम नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन है।
- NASA की स्थापना 29 जुलाई 1958 को हुई और इसने 1 अक्टूबर 1958 से कार्य करना शुरू किया।
- NASA का मुख्यालय वाशिंगटन डी.सी. में स्थित है।
- NASA की पूर्ववर्ती संस्था नेशनल एडवाइजरी कमेटी फॉर एरोनॉटिक्स थी।
- NASA अंतरिक्ष अन्वेषण, वैज्ञानिक खोज और एरोनॉटिक्स अनुसंधान से सम्बन्धित कार्य करता है।
- अपोलो, स्काईलैब और अंतरिक्ष शटल NASA के प्रमुख कार्यक्रमों में शामिल हैं।
- ISRO का पूरा नाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन है।
- ISRO की स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई।
- ISRO का मुख्यालय बेंगलुरु, कर्नाटक में है।
- विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र तिरुवनंतपुरम, केरल में स्थित है।
- ISRO का प्रमुख उद्देश्य भारत के लिए अंतरिक्ष सम्बन्धी तकनीक विकसित करना है।
- PSLV ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान तथा GSLV भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान है।
- ISRO को वर्ष 2014 में शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार दिया गया।
- 29 सितम्बर 2015 को भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला स्थापित की गई।
- 2023 में चंद्रयान-3 का सफल प्रक्षेपण किया गया।
- सूर्य के अध्ययन के लिए आदित्य-L1 मिशन प्रक्षेपित किया गया।
- अध्याय के सारांश में ISRO द्वारा 2017 में एक साथ 104 उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने का उल्लेख है।