अर्थशास्त्र—परिचय, अर्थ एवं परिभाषाएँ
अर्थशास्त्र का परिचय
अर्थशास्त्र एक महत्वपूर्ण सामाजिक विज्ञान है, जो मनुष्य की आर्थिक गतिविधियों का अध्ययन करता है। मनुष्य के पास उपलब्ध साधन सीमित होते हैं, जबकि उसकी आवश्यकताएँ अनेक होती हैं। इसलिए अर्थशास्त्र यह समझने का प्रयास करता है कि उपलब्ध सीमित साधनों का उपयोग किस प्रकार किया जाए, जिससे व्यक्ति और समाज अपने उद्देश्यों की अधिकतम पूर्ति कर सकें।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्राचीन काल से ही अर्थ को मानव जीवन के महत्वपूर्ण साधनों में माना गया है। कौटिल्य को अर्थशास्त्र ग्रंथ का लेखक माना जाता है। उन्हें चाणक्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है। उनका समय लगभग 350–275 ई.पू. माना गया है। वे चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री थे और उन्होंने प्रशासन, अर्थव्यवस्था तथा राजनीतिक कार्यों में अर्थ के महत्व को स्पष्ट किया।
आर्थिक एवं अनार्थिक क्रियाएँ
मानव द्वारा किए जाने वाले कार्यों को आर्थिक दृष्टि से मुख्यतः दो भागों में समझा जा सकता है—
- आर्थिक क्रियाएँ— वे कार्य जिनका प्रत्यक्ष सम्बन्ध धन या आय से होता है। जैसे— उद्योग में उत्पादन करना, व्यापार करना, मोटर चलाना, रिक्शा चलाना आदि।
- अनार्थिक क्रियाएँ— वे कार्य जिनका उद्देश्य धन कमाना नहीं होता। जैसे— साधु द्वारा पूजा करना या माता द्वारा अपने बच्चे की देखभाल करना।
अर्थशास्त्र का अर्थ
अर्थशास्त्र सीमित संसाधनों और असीमित आवश्यकताओं के बीच उचित चुनाव का अध्ययन करता है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि उपभोक्ता अपनी संतुष्टि, उत्पादक अपना लाभ तथा समाज अपने सामाजिक कल्याण को उपलब्ध संसाधनों के उचित प्रयोग द्वारा किस प्रकार अधिकतम कर सकता है।
Economics शब्द की उत्पत्ति प्राचीन यूनानी शब्दों Oikos और Nomos से मानी गई है। Oikos का अर्थ घर तथा Nomos का अर्थ नियम या प्रबंध है। इस प्रकार इसका प्रारम्भिक अर्थ घर या परिवार के प्रबंध से सम्बन्धित था।
अर्थशास्त्र का ऐतिहासिक विकास
16वीं और 17वीं शताब्दी में अर्थशास्त्र को मुख्यतः घरेलू कार्यों और धन के प्रबंध से सम्बन्धित विषय माना जाता था। आधुनिक अर्थशास्त्र के विकास में एडम स्मिथ का महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक An Enquiry into the Nature and Causes of the Wealth of Nations 1776 में प्रकाशित हुई। इसी कारण एडम स्मिथ को आधुनिक अर्थशास्त्र का जनक माना जाता है।
समय के साथ अर्थशास्त्र का क्षेत्र धन के अध्ययन तक सीमित नहीं रहा। विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने इसे मानव कल्याण, संसाधनों की दुर्लभता, आवश्यकता-विहीन अवस्था तथा आर्थिक विकास से जोड़कर परिभाषित किया।
अर्थशास्त्र की परिभाषाओं का वर्गीकरण
अर्थशास्त्र की परिभाषाओं को मुख्यतः पाँच वर्गों में बाँटा गया है—
- धन केन्द्रित परिभाषाएँ
- कल्याण केन्द्रित परिभाषाएँ
- दुर्लभता केन्द्रित परिभाषा
- आवश्यकता-विहीन परिभाषाएँ
- विकास केन्द्रित परिभाषाएँ
1. धन केन्द्रित परिभाषाएँ
धन केन्द्रित दृष्टिकोण में अर्थशास्त्र का मुख्य विषय धन माना गया। इस विचारधारा के प्रमुख अर्थशास्त्री एडम स्मिथ, जे. बी. से और वाकर हैं।
- एडम स्मिथ के अनुसार— अर्थशास्त्र राष्ट्रों के धन की प्रकृति और कारणों का अध्ययन करता है।
- जे. बी. से के अनुसार— अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो धन का अध्ययन करता है।
- वाकर के अनुसार— अर्थशास्त्र ज्ञान की वह शाखा है जो धन से सम्बन्धित है।
इस दृष्टिकोण की मुख्य आलोचना यह हुई कि इसमें मनुष्य और उसके कल्याण की तुलना में धन को अधिक महत्व दिया गया। इससे अर्थशास्त्र का क्षेत्र बहुत सीमित हो जाता है।
2. कल्याण केन्द्रित परिभाषाएँ
धन केन्द्रित विचारधारा की कमियों के बाद अल्फ्रेड मार्शल के नेतृत्व में कल्याण केन्द्रित दृष्टिकोण विकसित हुआ। इसमें धन को स्वयं लक्ष्य न मानकर मानव कल्याण प्राप्त करने का साधन माना गया।
मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र एक ओर धन का अध्ययन करता है और दूसरी ओर, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप में, मानव के अध्ययन का एक भाग है।
केनन ने अर्थशास्त्र का उद्देश्य उन कारणों की व्याख्या करना माना जिन पर मनुष्य का भौतिक कल्याण निर्भर करता है। पीगू ने सामाजिक कल्याण के उस भाग को अर्थशास्त्र के अध्ययन में सम्मिलित किया जिसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मुद्रा के मापदण्ड से सम्बन्धित किया जा सकता है।
इस दृष्टिकोण की आलोचना यह की गई कि कल्याण को स्पष्ट रूप से मापना कठिन है तथा अर्थशास्त्र के क्षेत्र को केवल भौतिक या मौद्रिक कल्याण तक सीमित करना उचित नहीं है।
3. दुर्लभता केन्द्रित परिभाषा
1932 में प्रो. लियोनेल रॉबिन्स ने अपनी पुस्तक An Essay on the Nature and Significance of Economic Science में अर्थशास्त्र की दुर्लभता केन्द्रित परिभाषा प्रस्तुत की।
रॉबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो विभिन्न उपयोगों वाले सीमित साधनों और उद्देश्यों से सम्बन्ध रखने वाले मानवीय व्यवहार का अध्ययन करता है।
रॉबिन्स की परिभाषा के तीन प्रमुख आधार हैं—
- असीमित लक्ष्य या आवश्यकताएँ— मनुष्य की आवश्यकताएँ अनेक होती हैं और समय के साथ बदलती रहती हैं।
- दुर्लभ साधन— आवश्यकताओं की तुलना में उपलब्ध साधन सीमित होते हैं। यही दुर्लभता आर्थिक समस्या को जन्म देती है।
- साधनों के वैकल्पिक उपयोग— सीमित साधनों का अनेक कार्यों में उपयोग किया जा सकता है, इसलिए व्यक्ति को उनके प्रयोग के बीच चुनाव करना पड़ता है।
इस परिभाषा की आलोचना यह है कि यह अत्यधिक व्यापक और जटिल है तथा इसमें मानव कल्याण और आर्थिक समस्याओं के समाधान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
4. आवश्यकता-विहीन परिभाषा
आवश्यकता-विहीन दृष्टिकोण का प्रतिपादन प्रो. जे. के. मेहता ने किया। उनके अनुसार आर्थिक समस्या का अंतिम समाधान आवश्यकताओं को लगातार बढ़ाने में नहीं, बल्कि उन्हें कम करते हुए आवश्यकता-विहीन अवस्था की ओर बढ़ने में है।
प्रो. मेहता के अनुसार, अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो मानवीय आचरण का अध्ययन आवश्यकता-विहीन अवस्था तक पहुँचने के साधन के रूप में करता है। उन्होंने मानव व्यवहार का सर्वव्यापक उद्देश्य आवश्यकताओं का अंत माना।
इस विचार के अनुसार इच्छा-विहीन या आवश्यकता-विहीन अवस्था को श्रेष्ठ अवस्था माना गया है। इसके लिए मानसिक शिक्षा, इच्छाओं पर नियंत्रण और संतोष को महत्व दिया गया है।
इस परिभाषा की आलोचना यह है कि इसका दृष्टिकोण अत्यधिक आदर्शवादी है, इसकी व्यावहारिकता सीमित है और इच्छाओं के पूर्ण अंत की कल्पना सामान्य मानव स्वभाव के अनुकूल नहीं मानी जाती।
5. विकास केन्द्रित परिभाषाएँ
आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को केवल धन, कल्याण या दुर्लभता तक सीमित न रखकर आर्थिक विकास से भी जोड़ा। सैमुअलसन, पीटरसन और फर्ग्यूसन आदि इस दृष्टिकोण से जुड़े प्रमुख अर्थशास्त्री हैं।
इस दृष्टिकोण में यह अध्ययन किया जाता है कि उपलब्ध सीमित संसाधनों का उचित उपयोग करके वर्तमान और भविष्य के लिए वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन किस प्रकार किया जाए और उन्हें समाज के विभिन्न व्यक्तियों तथा वर्गों में किस प्रकार बाँटा जाए।
सैमुअलसन के अनुसार अर्थशास्त्र इस बात का अध्ययन करता है कि व्यक्ति और समाज मुद्रा के प्रयोग के साथ या उसके बिना, विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन के लिए वैकल्पिक उपयोगों वाले दुर्लभ साधनों का चयन किस प्रकार करते हैं तथा इन वस्तुओं को वर्तमान और भविष्य में समाज के विभिन्न लोगों और वर्गों में किस प्रकार वितरित करते हैं।
के. जी. सेठ के अनुसार अर्थशास्त्र उस मानव व्यवहार का अध्ययन करता है जिसका सम्बन्ध साध्यों के संदर्भ में साधनों के परिवर्तन एवं विकास से होता है।
- अर्थशास्त्र सीमित संसाधनों और अनेक आवश्यकताओं के बीच उचित चुनाव का अध्ययन करता है।
- Economics शब्द Oikos और Nomos से बना माना गया है, जिसका मूल अर्थ घर या परिवार का प्रबंध है।
- कौटिल्य को प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्र ग्रंथ का लेखक माना जाता है।
- एडम स्मिथ को आधुनिक अर्थशास्त्र का जनक कहा जाता है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक Wealth of Nations 1776 में प्रकाशित हुई।
- धन केन्द्रित परिभाषा में धन, कल्याण केन्द्रित परिभाषा में मानव कल्याण और रॉबिन्स की परिभाषा में दुर्लभ साधनों को प्रमुख स्थान दिया गया।
- रॉबिन्स की परिभाषा के तीन आधार हैं— असीमित आवश्यकताएँ, सीमित साधन तथा साधनों के वैकल्पिक उपयोग।
- प्रो. जे. के. मेहता ने आवश्यकता-विहीन अवस्था को महत्व दिया।
- विकास केन्द्रित दृष्टिकोण में सीमित साधनों के उचित उपयोग, उत्पादन, वितरण और आर्थिक विकास पर बल दिया जाता है।
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प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों का अर्थशास्त्र में योगदान
प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों का योगदान
अर्थशास्त्र के विकास में विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने अपने-अपने समय में महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। किसी ने धन को अर्थशास्त्र का प्रमुख विषय माना, किसी ने मानव कल्याण को महत्व दिया, किसी ने सीमित साधनों और चुनाव की समस्या पर बल दिया, तो किसी ने आवश्यकता-विहीन अवस्था तथा लोक-कल्याणकारी अर्थव्यवस्था की अवधारणा को आगे बढ़ाया।
इस संदर्भ में एडम स्मिथ, अल्फ्रेड मार्शल, लियोनेल रॉबिन्स, प्रो. जे. के. मेहता और अमर्त्य सेन का विशेष महत्व है।
1. एडम स्मिथ
एडम स्मिथ का जन्म 5 जून 1723 को हुआ और उनकी मृत्यु 17 जुलाई 1790 को हुई। वे स्कॉटलैंड के प्रसिद्ध नीतिवेत्ता, दार्शनिक और राजनीतिक अर्थशास्त्री थे। उन्हें अर्थशास्त्र का पितामह भी कहा जाता है और आधुनिक अर्थव्यवस्था के प्रमुख निर्माताओं में उनका स्थान माना जाता है।
एडम स्मिथ ने अर्थशास्त्र में धन और मानव व्यवहार दोनों से जुड़े विचार प्रस्तुत किए। उनके विचारों से बाद के अनेक अर्थशास्त्रियों और चिंतकों ने प्रेरणा प्राप्त की।
स्मिथ का आर्थिक-सामाजिक चिंतन
स्मिथ के आर्थिक और सामाजिक विचार उनकी प्रमुख पुस्तकों में व्यक्त हुए। उनकी पहली महत्वपूर्ण पुस्तक नैतिक अनुभूतियों का सिद्धांत थी। इसमें उन्होंने मानव व्यवहार, नैतिकता, सद्गुण, व्यक्तिगत अधिकार और स्वतंत्रता जैसे विषयों पर विचार किया।
स्मिथ ने मनुष्य के नैतिक आचरण को दो प्रमुख भागों में देखा—
- नैतिकता की प्रकृति
- नैतिकता का लक्ष्य
उनके विचारों में मानवीय संवेदना, स्वार्थ और सामाजिक सम्बन्ध सभी का महत्व दिखाई देता है। उनके अनुसार व्यक्ति धन अर्जित करने के लिए कार्य करता है, परन्तु धनार्जन की प्रक्रिया में वह अन्य लोगों से भी जुड़ता है, उनका सहयोग प्राप्त करता है तथा उत्पादन के माध्यम से समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति में योगदान देता है।
एडम स्मिथ की प्रमुख रचनाएँ
- The Theory of Moral Sentiments — 1759
- An Enquiry into the Nature and Causes of the Wealth of Nations
उनकी दूसरी प्रसिद्ध रचना में राष्ट्रों की सम्पदा, अर्थव्यवस्था, मानव व्यवहार और आर्थिक गतिविधियों पर विचार किया गया। अर्थशास्त्र के इतिहास में इस पुस्तक का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
2. अल्फ्रेड मार्शल
अल्फ्रेड मार्शल का जन्म 26 जुलाई 1842 को हुआ और उनकी मृत्यु 13 जुलाई 1924 को हुई। वे अपने समय के अत्यंत प्रभावशाली अर्थशास्त्री थे। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक Principles of Economics 1890 में प्रकाशित हुई और कई वर्षों तक इंग्लैंड में अर्थशास्त्र की प्रमुख पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाई जाती रही।
मार्शल ने अर्थशास्त्र में मानव कल्याण को विशेष महत्व दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि धन मनुष्य के लिए है, मनुष्य धन के लिए नहीं। इस प्रकार उन्होंने धन-प्रधान दृष्टिकोण की अपेक्षा मानव के भौतिक कल्याण को अधिक महत्वपूर्ण माना।
मार्शल ने अर्थशास्त्र को विज्ञान के साथ-साथ कला भी माना। उनके अनुसार आर्थिक घटनाओं का क्रमबद्ध अध्ययन अर्थशास्त्र को विज्ञान बनाता है, जबकि मानव कल्याण के लिए आर्थिक सिद्धांतों का व्यावहारिक उपयोग इसे कला का स्वरूप देता है।
मार्शल के प्रमुख आर्थिक योगदान
- मांग और आपूर्ति के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप दिया।
- सीमांत उपयोगिता की अवधारणा को स्पष्ट किया।
- उत्पादन लागत के अध्ययन को महत्व दिया।
- मांग की लोच की अवधारणा को परिभाषित किया।
- सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम की वैज्ञानिक व्याख्या की।
मार्शल के अनुसार किसी वस्तु की लगातार अतिरिक्त इकाइयों का उपयोग करते रहने पर प्रत्येक अगली इकाई से मिलने वाली अतिरिक्त उपयोगिता घटती जाती है। इसे सीमांत उपयोगिता ह्रास का नियम कहा जाता है।
मार्शल के समर्थकों में पीगू और चैपमैन का उल्लेख किया गया है। पीगू ने Economics of Welfare की रचना की।
3. लियोनेल रॉबिन्स
लॉर्ड रॉबिन्स की प्रसिद्ध पुस्तक An Essay on the Nature and Significance of Economic Science 1932 में प्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने मनुष्य की असीमित आवश्यकताओं और सीमित साधनों के बीच चुनाव की समस्या को अर्थशास्त्र के केंद्र में रखा।
रॉबिन्स से पहले अर्थशास्त्र को मुख्यतः धन या भौतिक कल्याण से जोड़कर देखा जाता था। रॉबिन्स ने अर्थशास्त्र की विषय-वस्तु को अधिक व्यापक रूप देते हुए मानव के उस व्यवहार का अध्ययन किया जिसमें सीमित साधनों का उपयोग अनेक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करना पड़ता है।
रॉबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जिसमें साध्यों तथा सीमित और वैकल्पिक प्रयोग वाले साधनों से सम्बन्धित मानव व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
रॉबिन्स की परिभाषा ने अर्थशास्त्र में चयन की समस्या को विशेष महत्व दिया। मनुष्य की आवश्यकताएँ अनेक होती हैं, परन्तु साधन सीमित होते हैं और उनके वैकल्पिक उपयोग होते हैं। इसलिए व्यक्ति को यह निर्णय लेना पड़ता है कि उपलब्ध साधनों का प्रयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाए।
रॉबिन्स की परिभाषा अपेक्षाकृत अधिक वैज्ञानिक और विश्लेषणात्मक मानी गई तथा उन्होंने मानवीय कल्याण को अलग-अलग भागों में विभाजित करके अर्थशास्त्र की सीमा निर्धारित करने की प्रवृत्ति का विरोध किया।
4. प्रो. जे. के. मेहता
प्रो. जे. के. मेहता इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष थे। उनके आर्थिक विचार पश्चिमी अर्थशास्त्रियों के विचारों से अलग भारतीय संस्कृति, धर्म और नैतिकता से प्रभावित थे।
मेहता रॉबिन्स की इस बात से सहमत थे कि अर्थशास्त्र मानव व्यवहार का अध्ययन करता है, परन्तु उन्होंने मानव व्यवहार के अंतिम लक्ष्य को अधिकतम संतुष्टि की अपेक्षा इच्छाओं में कमी से जोड़ा।
उनके अनुसार इच्छाएँ जितनी अधिक होंगी, असंतुष्टि भी उतनी ही अधिक होगी। इसलिए वास्तविक सुख प्राप्त करने के लिए इच्छाओं को कम करना आवश्यक है।
महात्मा गौतम बुद्ध के विचारों का उल्लेख करते हुए इस दृष्टिकोण में शांत और प्रसन्न जीवन के लिए इच्छाओं और अभिलाषाओं को नियंत्रित करने पर बल दिया गया है।
मेहता का आवश्यकता-विहीन दृष्टिकोण
प्रो. मेहता के अनुसार अर्थशास्त्र का वास्तविक उद्देश्य केवल संतुष्टि को अधिकतम करना नहीं, बल्कि वास्तविक सुख प्राप्त करना है। वास्तविक सुख इच्छाओं को लगातार बढ़ाकर नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित और कम करके प्राप्त किया जा सकता है।
इस कारण मेहता ने अर्थशास्त्र को ऐसी मानवीय अवस्था के अध्ययन से जोड़ा जिसमें व्यक्ति इच्छारहित या आवश्यकता-विहीन अवस्था की ओर बढ़ता है।
उनके अनुसार अर्थशास्त्री का कार्य मनुष्य को यह बताना भी है कि अधिकतम आवश्यकताओं की संतुष्टि अंतिम लक्ष्य नहीं है तथा वास्तविक सुख प्राप्त करने के लिए इच्छाओं पर नियंत्रण आवश्यक है।
5. अमर्त्य सेन
अमर्त्य सेन का जन्म कोलकाता के शांति निकेतन में एक कायस्थ परिवार में हुआ। उनके पिता आशुतोष सेन ढाका विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र पढ़ाते थे और उनके नाना क्षिति मोहन सेन शिक्षक थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा ढाका में हुई तथा आगे की शिक्षा शांति निकेतन, प्रेसिडेंसी कॉलेज और कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज से हुई।
अमर्त्य सेन को वर्ष 1998 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ और 1999 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय सहित विभिन्न प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में अध्यापन कार्य किया।
अमर्त्य सेन का आर्थिक चिंतन
अमर्त्य सेन के विचार समाजवाद, समानता, सहयोग और लोककल्याण की भावना से जुड़े हुए हैं। उन्हें कल्याणकारी अर्थव्यवस्था का जनक कहा गया है। उन्होंने लोक-कल्याणकारी अर्थव्यवस्था का स्वरूप विश्व के सामने प्रस्तुत किया।
उनका विशेष ध्यान गरीबी और उसके कारणों पर रहा। उनके अनुसार गरीबी का प्रमुख कारण केवल धन का अभाव नहीं, बल्कि शिक्षा का अभाव और साधनहीनता भी है।
सेन का विचार है कि शिक्षा व्यक्ति को अज्ञान, अंधविश्वास और गलत व्यवहार से बाहर निकालने में सहायता करती है। इसलिए उन्होंने सरकार द्वारा शिक्षा को अनिवार्य बनाए जाने पर बल दिया, जिससे शिक्षित समाज और देश का विकास हो सके।
उन्होंने अपने जीवन में अर्थशास्त्र पर लगभग 215 शोध कार्य किए। उनके विचारों में समाज की उपयोगिता, लोककल्याण और आर्थिक नीतियों के मानवीय प्रभाव का विशेष महत्व है।
अमर्त्य सेन की प्रमुख पुस्तकें
- कलेक्टिव च्वाइस एण्ड सोशल वेलफेयर
- च्वाइस वेलफेयर मेजरमेंट एण्ड रिसोर्सिंग
- पावर्टी एण्ड फैमाइन्स
- ग्रोथ इकोनॉमिक्स इंडिया, इकोनॉमिक एण्ड सोशल अपार्च्युनिटी
- द पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ हंगर
- रिसोर्सेज, वैल्यूज एण्ड डेवलपमेंट
अमर्त्य सेन वैश्वीकरण के अंधानुकरण के समर्थक नहीं माने गए। उनके अनुसार वैश्वीकरण की दिशा में आगे बढ़ने से पहले विकासशील देशों को पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।
प्रमुख अर्थशास्त्रियों के विचारों की तुलना
- एडम स्मिथ— धन, उत्पादन और राष्ट्र की सम्पदा पर बल।
- अल्फ्रेड मार्शल— मानव के भौतिक कल्याण को धन से अधिक महत्व।
- रॉबिन्स— असीमित आवश्यकताओं और सीमित साधनों के बीच चुनाव पर बल।
- जे. के. मेहता— इच्छाओं को कम करके आवश्यकता-विहीन अवस्था और वास्तविक सुख प्राप्त करने पर बल।
- अमर्त्य सेन— लोककल्याण, शिक्षा, गरीबी और समान अवसरों पर विशेष बल।
- एडम स्मिथ को अर्थशास्त्र का पितामह माना जाता है। उनकी प्रमुख रचनाएँ The Theory of Moral Sentiments और Wealth of Nations हैं।
- अल्फ्रेड मार्शल ने मानव कल्याण को धन से अधिक महत्व दिया और मांग, आपूर्ति, सीमांत उपयोगिता तथा मांग की लोच जैसी अवधारणाओं को व्यवस्थित रूप दिया।
- रॉबिन्स ने 1932 में दुर्लभता केन्द्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया और अर्थशास्त्र को सीमित साधनों तथा वैकल्पिक उपयोगों के बीच चुनाव से जोड़ा।
- प्रो. जे. के. मेहता ने आवश्यकता-विहीन अवस्था तथा इच्छाओं में कमी को वास्तविक सुख प्राप्त करने का माध्यम माना।
- अमर्त्य सेन को 1998 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार और 1999 में भारत रत्न मिला।
- अमर्त्य सेन के विचारों में गरीबी, शिक्षा, समानता और लोककल्याण का विशेष स्थान है।
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अर्थव्यवस्था के क्षेत्र एवं भारतीय अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ
अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्र
किसी देश की आर्थिक गतिविधियों को समझने के लिए उसकी अर्थव्यवस्था को विभिन्न क्षेत्रों में बाँटा जाता है। सामान्यतः अर्थव्यवस्था को तीन प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है—
- प्राथमिक क्षेत्र
- द्वितीयक क्षेत्र
- तृतीयक क्षेत्र
1. प्राथमिक क्षेत्र
प्राथमिक क्षेत्र में मुख्य रूप से कृषि, पशुपालन तथा प्रकृति से सीधे संसाधन प्राप्त करने वाली गतिविधियों को शामिल किया जाता है। इस क्षेत्र की गतिविधियाँ प्राकृतिक संसाधनों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती हैं।
प्राथमिक क्षेत्र की प्रमुख गतिविधियाँ हैं—
- कृषि
- वानिकी
- मत्स्य पालन
- खनन
- उत्खनन
- मुर्गीपालन
- पशुपालन
इस प्रकार प्राथमिक क्षेत्र अर्थव्यवस्था को खाद्य पदार्थ, खनिज तथा विभिन्न प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराता है।
2. द्वितीयक क्षेत्र
द्वितीयक क्षेत्र के अंतर्गत मुख्य रूप से उद्योग-धंधों और निर्माण से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों को शामिल किया जाता है। इसमें प्राथमिक क्षेत्र से प्राप्त उत्पादों और कच्चे माल का उपयोग करके नई वस्तुओं का निर्माण किया जाता है।
द्वितीयक क्षेत्र में प्रमुख रूप से निम्न गतिविधियाँ सम्मिलित हैं—
- उद्योग-धंधे
- खाद्य प्रसंस्करण
- तेल शोधन
- ऊर्जा उत्पादन
- विद्युत उपकरणों का उत्पादन
जैसे-जैसे किसी देश की अर्थव्यवस्था का विकास होता है, सामान्यतः प्राथमिक क्षेत्र की तुलना में द्वितीयक क्षेत्र का योगदान बढ़ने लगता है।
भारत में 1991 के उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण की नीति के बाद द्वितीयक क्षेत्र के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया। द्वितीयक क्षेत्र लोगों को रोजगार देने के साथ-साथ उनकी आवश्यकताओं की वस्तुओं का उत्पादन भी करता है।
3. तृतीयक क्षेत्र
तृतीयक क्षेत्र को मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र कहा जाता है। इसमें वस्तुओं के प्रत्यक्ष उत्पादन के स्थान पर विभिन्न प्रकार की सेवाएँ प्रदान की जाती हैं।
तृतीयक क्षेत्र की प्रमुख सेवाएँ हैं—
- बैंकिंग
- बीमा
- संचार
- सुरक्षा
- प्रशासन
- परिवहन
- होटल सेवाएँ
किसी अर्थव्यवस्था के विकास के साथ तृतीयक क्षेत्र का महत्व भी बढ़ता जाता है। यह कृषि, उद्योग और सामान्य नागरिक जीवन को आवश्यक सेवाएँ प्रदान करता है।
अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्वरूप
दूसरे देशों के साथ आर्थिक लेन-देन तथा निजी और सरकारी क्षेत्रों की भूमिका के आधार पर अर्थव्यवस्था के विभिन्न स्वरूप दिखाई देते हैं।
बन्द अर्थव्यवस्था
बन्द अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है जिसमें एक देश की अर्थव्यवस्था का विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ किसी प्रकार का आयात-निर्यात संबंध नहीं होता।
खुली अर्थव्यवस्था
खुली अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है जिसमें एक देश का विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ विभिन्न प्रकार का आर्थिक लेन-देन अथवा व्यापार लगातार होता रहता है। वर्तमान विश्व में देशों की अर्थव्यवस्थाएँ मुख्यतः खुली अर्थव्यवस्था के स्वरूप में कार्य करती हैं।
मिश्रित अर्थव्यवस्था
मिश्रित अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है जिसमें निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों का महत्व होता है। भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था पाई जाती है। यहाँ बड़ी सार्वजनिक कंपनियों के साथ निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी विकास के अवसर उपलब्ध हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना और विकास को समझने के लिए इसकी कुछ प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन आवश्यक है।
1. कृषि पर निर्भरता
भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान है। लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर आधारित बताई गई है तथा कृषि का कुल राष्ट्रीय आय में लगभग 30 प्रतिशत योगदान बताया गया है। विकसित देशों में राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान लगभग 2 से 4 प्रतिशत तक बताया गया है।
भारतीय कृषि में वर्षा का विशेष महत्व है। कृषि के लिए जल एक प्रमुख साधन है और अनेक क्षेत्रों में खेती मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहती है।
2. तकनीकी पिछड़ापन
भारतीय अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख समस्या तकनीकी पिछड़ापन है। अनेक उद्योगों में उत्पादन के लिए पुरानी तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। अनुसंधान और विकास पर अपेक्षाकृत कम व्यय होने के कारण उन्नत तकनीक का प्रयोग केवल कुछ उद्योगों तक सीमित रहता है।
3. अपर्याप्त बुनियादी सुविधाएँ
आर्थिक और औद्योगिक विकास के लिए ऊर्जा, परिवहन तथा संचार जैसी आधारभूत सुविधाएँ आवश्यक होती हैं। ये सुविधाएँ कृषि, उद्योग और सेवा—तीनों क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत में ऐसी सुविधाओं की उपलब्धता को अपर्याप्त बताया गया है।
4. निम्न आय का स्तर
भारत में प्रति व्यक्ति आय का स्तर कम बताया गया है। कम आय का सीधा प्रभाव लोगों के उपभोग, रहन-सहन और जीवन स्तर पर पड़ता है।
उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ जनसंख्या में तेजी से वृद्धि होने पर प्रति व्यक्ति आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाती। आय की असमानता भी निम्न जीवन स्तर की समस्या को गंभीर बनाती है।
5. जनसंख्या की ऊँची वृद्धि दर
भारत में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। 1951 में विकास की प्रक्रिया प्रारंभ होने के बाद मृत्यु दर में तेजी से कमी आई, परन्तु जनसंख्या की ऊँची वृद्धि दर के कारण संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।
यदि राष्ट्रीय आय की वृद्धि की तुलना में जनसंख्या तेजी से बढ़ती है तो प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि कम हो जाती है। इसलिए तीव्र जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती बनती है।
6. पूँजी की कमी
कम आय के कारण बचत कम होती है और कम बचत के कारण पूँजी निर्माण की दर भी कम रहती है। पूँजी की कमी से श्रम और प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता।
भारत में प्राकृतिक संसाधनों का पर्याप्त भंडार है, लेकिन पूँजी की कमी के कारण इन संसाधनों का पूरा उपयोग करना कठिन हो जाता है। इस प्रकार कम आय, कम बचत और कम पूँजी निर्माण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप
भारत एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है, जिसमें सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों की भूमिका है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान है, परन्तु आर्थिक विकास के साथ उद्योग और सेवा क्षेत्रों का महत्व भी बढ़ता जा रहा है।
- अर्थव्यवस्था के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं—प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र।
- प्राथमिक क्षेत्र में कृषि, वानिकी, मत्स्य पालन, खनन, पशुपालन आदि आते हैं।
- द्वितीयक क्षेत्र में उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, तेल शोधन, ऊर्जा और निर्माण संबंधी गतिविधियाँ आती हैं।
- तृतीयक क्षेत्र सेवा क्षेत्र है, जिसमें बैंकिंग, बीमा, संचार, परिवहन, प्रशासन आदि शामिल हैं।
- बन्द अर्थव्यवस्था में अन्य देशों से आर्थिक लेन-देन नहीं होता, जबकि खुली अर्थव्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है।
- भारत मिश्रित अर्थव्यवस्था है, जिसमें निजी तथा सरकारी दोनों क्षेत्रों का महत्व है।
- भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ हैं—कृषि पर निर्भरता, तकनीकी पिछड़ापन, अपर्याप्त बुनियादी सुविधाएँ, निम्न आय, ऊँची जनसंख्या वृद्धि दर और पूँजी की कमी।
- 1991 के उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण के बाद द्वितीयक क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया गया।
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राष्ट्रीय आय—अर्थ, परिभाषाएँ एवं प्रमुख अवधारणाएँ
राष्ट्रीय आय का अर्थ
किसी देश द्वारा एक वर्ष की अवधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को राष्ट्रीय आय कहा जाता है। एक वर्ष के दौरान देश में अनेक प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन होता है। इन सभी को अलग-अलग भौतिक इकाइयों में व्यक्त किया जाता है, इसलिए इन्हें सीधे जोड़ना संभव नहीं होता। इसी कारण इनके मूल्य को मुद्रा में व्यक्त करके राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाया जाता है।
राष्ट्रीय आय को देश की अर्थव्यवस्था द्वारा एक वर्ष में किए गए उत्पादन और उससे उत्पन्न आय के समग्र माप के रूप में समझा जा सकता है। उत्पादन के लिए मुख्य रूप से श्रम और संपत्ति जैसे उत्पादन कारकों का प्रयोग किया जाता है।
राष्ट्रीय आय की प्रमुख परिभाषाएँ
- प्रोफेसर फिशर के अनुसार— राष्ट्रीय लाभांश या आय में उन सेवाओं को शामिल किया जाता है जो अंतिम उपभोक्ताओं को उनकी भौतिक वस्तुओं अथवा मानवीय पर्यावरण से प्राप्त होती हैं।
- पीगू के अनुसार— राष्ट्रीय आय समुदाय की वह आय है जिसमें विदेशों से प्राप्त आय भी सम्मिलित होती है तथा जिसे मुद्रा में मापा जा सकता है।
- मार्शल के अनुसार— किसी देश का श्रम और पूँजी उसके प्राकृतिक संसाधनों पर कार्य करके प्रतिवर्ष भौतिक तथा अभौतिक वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करते हैं। इस शुद्ध उत्पादन को देश का राष्ट्रीय लाभांश अथवा राष्ट्रीय आय कहा जाता है।
सरल रूप में अर्थव्यवस्था का कुल उत्पादन इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है—
अर्थव्यवस्था का कुल उत्पादन = उत्पादित वस्तुएँ + सृजित सेवाएँ
1. सकल घरेलू उत्पाद — GDP
सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product) एक लेखा वर्ष के दौरान किसी देश के घरेलू क्षेत्र में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है। राष्ट्रीय आय के अध्ययन में घरेलू क्षेत्र का विशेष महत्व होता है।
घरेलू क्षेत्र में मुख्यतः निम्न क्षेत्र शामिल किए जाते हैं—
- देश की राजनीतिक सीमाओं के भीतर आने वाला क्षेत्र, जिसमें जल क्षेत्र भी सम्मिलित है।
- देश के निवासियों द्वारा दो या अधिक देशों के बीच चलाए जाने वाले जहाज और विमान।
- अंतरराष्ट्रीय जल सीमा में देश के निवासियों द्वारा संचालित मत्स्य पालन जहाज, तेल एवं प्राकृतिक गैस रिग तथा ऐसे क्षेत्र जिन पर देश को विशेष दोहन अधिकार प्राप्त हों।
- विदेशों में स्थित देश के दूतावास, वाणिज्य दूतावास और सैन्य प्रतिष्ठान।
GDP = GNP − (X − M)
जहाँ X = निर्यात तथा M = आयात।
2. सकल राष्ट्रीय उत्पाद — GNP
सकल राष्ट्रीय उत्पाद (Gross National Product) सकल घरेलू उत्पाद तथा विदेश से प्राप्त शुद्ध कारक आय के योग के रूप में व्यक्त किया जाता है। विदेश से शुद्ध कारक आय के लिए NFIA शब्द का प्रयोग किया जाता है।
NFIA निकालने के लिए विदेशों से भारतीय निवासियों द्वारा अर्जित आय में से भारत में विदेशियों द्वारा अर्जित आय घटाई जाती है।
GNP = GDP + विदेश से शुद्ध कारक आय (NFIA)
3. शुद्ध घरेलू उत्पाद — NDP
उत्पादन के दौरान मशीनों, उपकरणों, भवनों तथा अन्य पूँजीगत वस्तुओं में समय के साथ होने वाली टूट-फूट अथवा मूल्य की कमी को मूल्यह्रास कहते हैं। सकल घरेलू उत्पाद में से मूल्यह्रास घटाने पर शुद्ध घरेलू उत्पाद प्राप्त होता है।
NDP = GDP − मूल्यह्रास
4. शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद — NNP
शुद्ध घरेलू उत्पाद में विदेश से प्राप्त शुद्ध कारक आय जोड़ने पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (Net National Product) प्राप्त होता है।
NNP = NDP + NFIA
यदि विदेश से प्राप्त शुद्ध कारक आय धनात्मक है, तो NNP का मूल्य NDP से अधिक होगा। यदि यह ऋणात्मक है तो NNP का मूल्य NDP से कम होगा।
5. बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
एक वर्ष में बाजार कीमतों पर उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के शुद्ध मूल्य को बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद कहा जाता है। बाजार कीमत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद में से मूल्यह्रास घटाकर इसे प्राप्त किया जाता है।
बाजार कीमत पर NNP = बाजार कीमत पर GNP − मूल्यह्रास
6. कारक लागत पर NNP अथवा राष्ट्रीय आय
कारक लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद को ही राष्ट्रीय आय कहा जाता है। इसमें उत्पादन प्रक्रिया में भाग लेने वाले उत्पादन कारकों द्वारा अर्जित आय—जैसे मजदूरी, वेतन, किराया और मुनाफा आदि शामिल होते हैं।
बाजार कीमत पर NNP से अप्रत्यक्ष कर घटाकर और सरकारी सब्सिडी जोड़कर कारक लागत पर NNP प्राप्त किया जाता है।
कारक लागत पर NNP = बाजार कीमत पर NNP − अप्रत्यक्ष कर + सब्सिडी
= राष्ट्रीय आय
7. कारक लागत पर सकल घरेलू उत्पाद
कारक लागत पर सकल घरेलू उत्पाद देश के भीतर उत्पादकों द्वारा जोड़े गए मूल्यों का योग है। इसमें उत्पादन कारकों को प्राप्त होने वाली आय तथा पूँजी की खपत या मूल्यह्रास सम्मिलित होता है।
इसमें मुख्य रूप से निम्न आय सम्मिलित होती हैं—
- कर्मचारियों का मुआवजा—मजदूरी, वेतन आदि।
- कंपनियों का परिचालन अधिशेष अथवा व्यापारिक लाभ।
- स्वरोजगार से प्राप्त मिश्रित आय।
8. बाजार कीमत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद
किसी देश में एक वर्ष के दौरान बाजार कीमतों पर उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य तथा विदेशों से प्राप्त शुद्ध आय को मिलाकर बाजार कीमत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद प्राप्त होता है।
बाजार कीमत पर GNP = बाजार कीमत पर GDP + विदेशों से प्राप्त शुद्ध आय
9. घरेलू आय
देश के भीतर उत्पादन कारकों द्वारा अर्जित आय को घरेलू आय (Domestic Income) कहा जाता है। इसमें मजदूरी एवं वेतन, किराया, ब्याज, लाभांश, सार्वजनिक उपक्रमों का अधिशेष, निगमों का लाभ, मिश्रित आय, स्वरोजगार से आय आदि शामिल होते हैं।
विदेश से अर्जित आय को घरेलू आय में सम्मिलित नहीं किया जाता।
घरेलू आय = राष्ट्रीय आय − विदेश से अर्जित शुद्ध आय
10. निजी आय
निजी आय (Private Income) वह आय है जो निजी व्यक्तियों तथा कंपनियों को विभिन्न उत्पादक एवं अन्य स्रोतों से प्राप्त होती है। इसमें कारक आय के साथ-साथ कुछ हस्तांतरण भुगतान भी शामिल हो सकते हैं।
हस्तांतरण भुगतानों में पेंशन, बेरोजगारी भत्ता, बीमारी तथा अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ, विदेश से उपहार और प्रेषण आदि शामिल किए जाते हैं।
11. प्रति व्यक्ति आय
किसी विशेष वर्ष में देश के लोगों की औसत आय को प्रति व्यक्ति आय कहते हैं। इसे देश की राष्ट्रीय आय को उस वर्ष की कुल जनसंख्या से विभाजित करके ज्ञात किया जाता है।
प्रति व्यक्ति आय = राष्ट्रीय आय ÷ कुल जनसंख्या
12. व्यक्तिगत आय — P.I.
व्यक्तिगत आय (Personal Income) एक निश्चित वर्ष के दौरान व्यक्तियों अथवा परिवारों द्वारा वास्तव में प्राप्त कुल आय है। यह राष्ट्रीय आय से इसलिए भिन्न हो सकती है क्योंकि राष्ट्रीय आय का कुछ भाग व्यक्तियों को प्राप्त नहीं होता, जबकि कुछ हस्तांतरण भुगतान वर्तमान उत्पादन से अर्जित किए बिना प्राप्त होते हैं।
व्यक्तिगत आय = कारक लागत पर NNP − अवितरित मुनाफा − कॉरपोरेट कर + हस्तांतरण भुगतान
13. व्यय योग्य अथवा प्रयोज्य आय — D.I.
व्यक्तिगत आय में से व्यक्तिगत करों—जैसे आयकर और व्यक्तिगत संपत्ति कर—का भुगतान करने के बाद जो आय बचती है, उसे व्यय योग्य या प्रयोज्य आय (Disposable Income) कहते हैं। व्यक्ति इस आय का उपयोग उपभोग अथवा बचत के लिए कर सकता है।
प्रयोज्य आय = व्यक्तिगत आय − व्यक्तिगत कर
- राष्ट्रीय आय एक वर्ष में देश के अंतिम उत्पादन और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य से संबंधित है।
- GDP घरेलू क्षेत्र में हुए उत्पादन को दर्शाता है।
- GNP = GDP + NFIA।
- NDP = GDP − मूल्यह्रास।
- NNP = NDP + NFIA।
- कारक लागत पर NNP को राष्ट्रीय आय कहा जाता है।
- प्रति व्यक्ति आय = राष्ट्रीय आय ÷ कुल जनसंख्या।
- प्रयोज्य आय = व्यक्तिगत आय − व्यक्तिगत कर।
राष्ट्रीय आय आकलन की पद्धतियाँ
किसी देश की राष्ट्रीय आय ज्ञात करने के लिए अर्थव्यवस्था में एक निश्चित अवधि के दौरान हुए उत्पादन, अर्जित आय अथवा किए गए व्यय का मापन किया जाता है। राष्ट्रीय आय का आकलन मुख्यतः तीन विधियों से किया जा सकता है—
- उत्पादन या उत्पादन विधि
- आय विधि
- व्यय विधि
1. उत्पादन या उत्पादन विधि
उत्पादन विधि को मूल्य संवर्धन विधि (Value Added Method) भी कहा जाता है। इस विधि का दृष्टिकोण अर्थव्यवस्था में होने वाले उत्पादन की ओर होता है। इसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था को विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों में बाँटकर उनके द्वारा उत्पन्न शुद्ध मूल्य का आकलन किया जाता है।
इसके अंतर्गत प्रमुख क्षेत्र हैं—
- कृषि,
- खनन,
- निर्माण,
- लघु उद्योग,
- वाणिज्य,
- परिवहन,
- संचार तथा
- अन्य सेवाएँ।
प्रत्येक उद्योग अथवा क्षेत्र के कुल उत्पादन में से दूसरे उद्योगों या क्षेत्रों से प्राप्त की गई मध्यवर्ती वस्तुओं तथा सेवाओं का मूल्य घटाकर उस उद्योग का शुद्ध उत्पादन अथवा मूल्य संवर्धन ज्ञात किया जाता है। सभी क्षेत्रों के ऐसे शुद्ध मूल्यों को जोड़कर अर्थव्यवस्था का कुल उत्पादन ज्ञात किया जाता है।
इसके बाद विदेशों से प्राप्त शुद्ध आय को जोड़ने पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद प्राप्त होता है। सकल राष्ट्रीय उत्पाद में से मूल्यह्रास घटाने पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद अथवा राष्ट्रीय आय प्राप्त होती है।
सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) = वस्तुओं एवं सेवाओं का मौद्रिक मूल्य + विदेशों से शुद्ध आय
राष्ट्रीय आय (NI) = सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) − मूल्यह्रास
उत्पादन विधि विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों के उत्पादन के आधार पर राष्ट्रीय आय ज्ञात करने में उपयोगी होती है। इसी कारण इसे औद्योगिक उत्पादन से राष्ट्रीय आय ज्ञात करने की विधि भी कहा जाता है।
2. आय विधि
आय विधि का दृष्टिकोण आय के वितरण की ओर होता है। उत्पादन की प्रक्रिया में भूमि, श्रम, पूँजी तथा उद्यम जैसे उत्पादन कारक अपनी सेवाएँ प्रदान करते हैं और बदले में विभिन्न प्रकार की आय प्राप्त करते हैं।
इस विधि में देश के व्यक्तियों और उत्पादन कारकों द्वारा अर्जित आयों को जोड़कर राष्ट्रीय आय ज्ञात की जाती है। इसमें मुख्य रूप से निम्न आय सम्मिलित होती हैं—
- मजदूरी एवं वेतन — श्रम द्वारा अर्जित आय।
- किराया — भूमि अथवा संपत्ति से प्राप्त आय।
- ब्याज — पूँजी से प्राप्त आय।
- लाभ — उद्यम तथा व्यावसायिक गतिविधियों से प्राप्त आय।
- स्वरोजगार की आय — स्वयं कार्य करने वाले लोगों द्वारा अर्जित आय।
कंपनियों के वितरित एवं अवितरित लाभ तथा उद्यमियों के लाभ को भी इस विधि में ध्यान में रखा जाता है।
आय विधि में केवल वर्तमान उत्पादन में उत्पादन कारकों की भागीदारी के बदले प्राप्त आय को शामिल किया जाता है। हस्तांतरण आय को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता।
उदाहरण के लिए मजदूरों की मजदूरी तो राष्ट्रीय आय में सम्मिलित होगी, लेकिन सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन को इस विधि में वर्तमान उत्पादन से प्राप्त आय नहीं माना जाता।
राष्ट्रीय आय उत्पादन कारकों—भूमि, श्रम, पूँजी तथा उद्यम—के बीच आय के वितरण से निकाली जाती है, इसलिए इसे वितरण के हिस्सों से राष्ट्रीय आय भी कहा जाता है।
3. व्यय विधि
व्यय विधि में एक वर्ष के दौरान अंतिम वस्तुओं और सेवाओं पर किए गए विभिन्न प्रकार के व्ययों को जोड़कर राष्ट्रीय आय का आकलन किया जाता है। इस विधि का आधार यह है कि अर्थव्यवस्था में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने पर किया गया कुल व्यय उनके उत्पादन के मूल्य के बराबर होता है।
इस विधि में मुख्य रूप से चार प्रकार के व्यय सम्मिलित किए जाते हैं—
i) निजी उपभोग व्यय (C)
व्यक्तियों द्वारा उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की खरीद पर किए गए खर्च को निजी या व्यक्तिगत उपभोग व्यय कहा जाता है।
ii) सकल घरेलू निजी निवेश (I)
निजी व्यापारिक प्रतिष्ठानों द्वारा नवीनकरण, नई पूँजी तथा नए निवेश पर किए गए व्यय को सकल घरेलू निजी निवेश कहा जाता है।
iii) शुद्ध विदेशी निवेश (X − M)
विदेशी क्षेत्र से संबंधित लेन-देन में निर्यात और आयात के अंतर को ध्यान में रखा जाता है। इसे शुद्ध विदेशी निवेश के रूप में शामिल किया जाता है।
शुद्ध विदेशी निवेश = निर्यात (X) − आयात (M)
iv) सरकारी व्यय (G)
सरकार द्वारा वस्तुओं और सेवाओं की खरीद पर किए गए व्यय को सरकारी व्यय कहा जाता है।
इस प्रकार व्यय विधि में निजी उपभोग, निजी निवेश, शुद्ध विदेशी निवेश तथा सरकारी व्यय को जोड़कर कुल राष्ट्रीय उत्पादन का आकलन किया जाता है।
GNP = C + I + (X − M) + G
तीनों विधियों का आधार
राष्ट्रीय आय को उत्पादन, आय और व्यय—तीनों दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है। उत्पादन की प्रक्रिया में वस्तुएँ और सेवाएँ बनती हैं, उसी उत्पादन से उत्पादन कारकों को आय प्राप्त होती है और अंतिम वस्तुओं तथा सेवाओं की खरीद पर व्यय किया जाता है। इसलिए ये तीनों विधियाँ अर्थव्यवस्था की एक ही आर्थिक प्रक्रिया को अलग-अलग दृष्टिकोण से मापती हैं।
- उत्पादन विधि — कितनी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन हुआ?
- आय विधि — उत्पादन से कितनी आय अर्जित हुई?
- व्यय विधि — अंतिम वस्तुओं और सेवाओं पर कितना व्यय किया गया?
- राष्ट्रीय आय के आकलन की तीन मुख्य विधियाँ—उत्पादन विधि, आय विधि तथा व्यय विधि हैं।
- उत्पादन विधि को मूल्य संवर्धन विधि भी कहा जाता है।
- उत्पादन विधि में प्रत्येक क्षेत्र के शुद्ध उत्पादन या मूल्य संवर्धन को जोड़ा जाता है।
- आय विधि में मजदूरी, वेतन, किराया, ब्याज, लाभ और स्वरोजगार से प्राप्त आय आदि को शामिल किया जाता है।
- हस्तांतरण आय वर्तमान उत्पादन से अर्जित आय नहीं होती, इसलिए इसे राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता।
- व्यय विधि में निजी उपभोग, निजी निवेश, शुद्ध विदेशी निवेश तथा सरकारी व्यय को जोड़ा जाता है।
- GNP = C + I + (X − M) + G।
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राष्ट्रीय आय के मापन का महत्व एवं आर्थिक विकास
किसी देश की आर्थिक स्थिति को समझने के लिए केवल राष्ट्रीय आय की गणना करना ही पर्याप्त नहीं है। राष्ट्रीय आय के आँकड़ों से यह पता चलता है कि देश में कुल उत्पादन कितना हो रहा है, अर्थव्यवस्था की दिशा क्या है, विभिन्न क्षेत्रों का योगदान कितना है और लोगों के बीच आय का वितरण किस प्रकार हो रहा है। इसी कारण आर्थिक नियोजन और विकास में राष्ट्रीय आय के मापन का विशेष महत्व है।
राष्ट्रीय आय के मापन का महत्व
1. कुल उत्पादन प्रदर्शन का पता चलता है
राष्ट्रीय आय का अनुमान अर्थव्यवस्था के समग्र उत्पादन प्रदर्शन को प्रकट करता है। इससे किसी निश्चित वर्ष में देश के उत्पादन स्तर का पता लगाया जा सकता है।
राष्ट्रीय आय को जनसंख्या से विभाजित करके प्रति व्यक्ति आय ज्ञात की जाती है, जिससे लोगों के औसत जीवन-स्तर का अनुमान लगाने में सहायता मिलती है।
2. अर्थव्यवस्था का विश्लेषण
अलग-अलग वर्षों की राष्ट्रीय आय की तुलना करके अर्थव्यवस्था की स्थिति और दिशा समझी जा सकती है।
- यदि राष्ट्रीय आय लगातार बढ़ती है तो अर्थव्यवस्था में वृद्धि का संकेत मिलता है।
- यदि राष्ट्रीय आय लगभग स्थिर रहती है तो अर्थव्यवस्था की स्थिर स्थिति दिखाई देती है।
- यदि राष्ट्रीय आय लगातार गिरती है तो अर्थव्यवस्था की बिगड़ती स्थिति का संकेत मिलता है।
3. विभिन्न क्षेत्रों के योगदान की जानकारी
राष्ट्रीय आय के आँकड़ों से यह ज्ञात किया जा सकता है कि अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों, जैसे—कृषि, विनिर्माण उद्योग और व्यापार आदि का राष्ट्रीय आय में कितना योगदान है।
इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि अर्थव्यवस्था का कौन-सा क्षेत्र अधिक महत्वपूर्ण है और किस क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता है।
4. विभिन्न श्रेणियों में राष्ट्रीय आय का वितरण
राष्ट्रीय आय का अनुमान यह भी बताता है कि उत्पादन से प्राप्त आय विभिन्न वर्गों अथवा उत्पादन के कारकों के बीच किस प्रकार बाँटी जा रही है।
राष्ट्रीय आय में मुख्य रूप से निम्न प्रकार की आय सम्मिलित होती है—
- मजदूरी,
- लाभ,
- किराया तथा
- ब्याज।
राष्ट्रीय आय के वितरण का अध्ययन विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब यह जानना हो कि आय का कितना हिस्सा कामगार वर्ग को मजदूरी के रूप में और संपत्ति के मालिकों को किराया, लाभ तथा ब्याज के रूप में प्राप्त हो रहा है।
5. उपभोग, बचत और निवेश के आँकड़े
राष्ट्रीय आय के अनुमान में अर्थव्यवस्था के उपभोग, बचत और निवेश से संबंधित आँकड़े भी सम्मिलित होते हैं। आर्थिक विकास और नियोजन के लिए इन आँकड़ों की जानकारी अत्यंत आवश्यक होती है।
उपभोग से वस्तुओं और सेवाओं की वर्तमान माँग, बचत से भविष्य में उपलब्ध वित्तीय संसाधन तथा निवेश से उत्पादन क्षमता में होने वाली वृद्धि का अनुमान लगाया जा सकता है।
6. देशों के बीच तुलना में सहायता
विभिन्न देशों की राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय के आँकड़ों की सहायता से उनके जीवन-स्तर और आर्थिक कल्याण की तुलना की जा सकती है।
देशों के बीच तुलना करते समय उत्पादन और कीमतों के स्तर में पाए जाने वाले अंतर को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय आय के आँकड़ों का समायोजन करना आवश्यक होता है।
7. आर्थिक नीति के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन
राष्ट्रीय आय के आँकड़े सरकार को आर्थिक नीति बनाने में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देते हैं। इनके आधार पर सरकार यह निर्णय कर सकती है कि अर्थव्यवस्था या उसके किसी क्षेत्र में प्रोत्साहन, नियंत्रण अथवा अन्य प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता है या नहीं।
विकास योजनाओं का निर्माण और उत्पादन के लक्ष्य निर्धारित करने में भी राष्ट्रीय आय के अनुमान बहुत उपयोगी होते हैं। राष्ट्रीय आय की जानकारी के बिना प्रभावी विकास योजना तैयार करना कठिन होता है।
राष्ट्रीय आय एवं आर्थिक विकास
किसी राष्ट्र के विकास का राष्ट्रीय आय से सीधा संबंध होता है। सामान्यतः राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने से देश के पास विकास कार्यों के लिए अधिक आर्थिक संसाधन उपलब्ध होते हैं। आर्थिक प्रगति को समझने के लिए आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास दोनों की अवधारणाओं को समझना आवश्यक है।
1. आर्थिक संवृद्धि
आर्थिक संवृद्धि का अर्थ किसी निश्चित समयावधि में अर्थव्यवस्था की वास्तविक आय में वृद्धि से है।
यदि किसी अर्थव्यवस्था में सकल राष्ट्रीय उत्पाद, सकल घरेलू उत्पाद तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हो रही है, तो इसे आर्थिक संवृद्धि कहा जाता है।
इस प्रकार आर्थिक संवृद्धि मुख्यतः आय और उत्पादन में होने वाली मात्रात्मक वृद्धि को प्रकट करती है।
2. आर्थिक विकास
आर्थिक विकास की अवधारणा आर्थिक संवृद्धि से अधिक व्यापक है। आर्थिक विकास तब माना जाता है जब लोगों की आय बढ़ने के साथ-साथ उनके जीवन-स्तर में भी गुणात्मक परिवर्तन हो।
आर्थिक विकास में दो प्रकार के परिवर्तन महत्वपूर्ण हैं—
i) संस्थागत परिवर्तन
संस्थागत परिवर्तन से आशय अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को संचालित करने वाले औपचारिक संस्थागत ढाँचे के विकास से है।
इसके उदाहरण हैं—
- मुद्रा एवं बैंकिंग व्यवस्था,
- शिक्षा के लिए विद्यालय और विश्वविद्यालय,
- स्वास्थ्य के लिए कुशल अस्पताल आदि।
ii) गुणात्मक परिवर्तन
गुणात्मक परिवर्तन का संबंध लोगों के जीवन और रहन-सहन की गुणवत्ता में सुधार से है। इनमें प्रमुख रूप से—
- जीवन प्रत्याशा,
- शिक्षा,
- स्वास्थ्य सुविधाएँ,
- प्रति व्यक्ति आय अर्थात क्रय-शक्ति,
- पोषण का स्तर तथा
- सामाजिक न्याय
जैसे तत्वों में होने वाले सुधार को सम्मिलित किया जाता है।
आर्थिक संवृद्धि एवं आर्थिक विकास में अंतर
| आर्थिक संवृद्धि | आर्थिक विकास |
|---|---|
| यह क्रमिक एवं दीर्घकालीन प्रक्रिया है। | इसमें अर्थव्यवस्था में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन होते रहते हैं। |
| यह आर्थिक तथा संस्थागत कारकों में परिवर्तन के साथ स्वतः हो सकती है। | उन्नति और परिवर्तन के लिए विशेष प्रयास आवश्यक होते हैं। |
| इसमें नवाचार का सृजन आवश्यक नहीं माना जाता। | प्रचलित तत्वों में सुधार तथा नए मूल्यों का निर्माण किया जाता है। |
| यह परंपरागत एवं नियमित आर्थिक घटनाओं का परिणाम हो सकती है। | यह उन्नति की प्रबल इच्छा और सृजनात्मक शक्तियों का परिणाम होती है। |
| यह स्थैतिक संतुलन की स्थिति से संबंधित है जिसमें उन्नति की गति धीमी हो सकती है। | यह गतिशील संतुलन की स्थिति है जिसमें देश तेजी से उन्नति की ओर बढ़ता है। |
| इसका अर्थ मुख्यतः उत्पादकता में वृद्धि से होता है। | इसमें उत्पादकता के साथ प्राविधिक और संस्थागत परिवर्तन भी सम्मिलित होते हैं। |
| इसे विकसित देशों के विकास से अधिक संबंधित माना गया है। | इसे अल्पविकसित देशों के विकास से अधिक संबंधित माना गया है। |
| इसमें उपलब्ध साधनों के आदर्श उपयोग पर बल दिया जाता है। | इसमें पूँजीगत और प्राकृतिक साधनों के उपयोग एवं विकास के प्रयास किए जाते हैं। |
संवृद्धि और विकास का मूल अंतर
आर्थिक संवृद्धि मुख्यतः उत्पादन और वास्तविक आय में वृद्धि को दर्शाती है, जबकि आर्थिक विकास में आय की वृद्धि के साथ लोगों के जीवन-स्तर, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्थाओं, तकनीक और सामाजिक परिस्थितियों में सुधार भी सम्मिलित होता है।
इसलिए केवल राष्ट्रीय आय बढ़ना ही पूर्ण आर्थिक विकास नहीं है। वास्तविक आर्थिक विकास के लिए आय में वृद्धि के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार होना आवश्यक है।
- राष्ट्रीय आय का मापन देश के कुल उत्पादन प्रदर्शन की जानकारी देता है।
- राष्ट्रीय आय की तुलना से अर्थव्यवस्था की वृद्धि, स्थिरता या गिरावट का विश्लेषण किया जा सकता है।
- राष्ट्रीय आय के आँकड़े विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों और आय की श्रेणियों के योगदान को बताते हैं।
- राष्ट्रीय आय में उपभोग, बचत और निवेश से संबंधित महत्वपूर्ण आँकड़े प्राप्त होते हैं।
- राष्ट्रीय आय देशों के बीच आर्थिक स्थिति तथा जीवन-स्तर की तुलना करने में सहायक है।
- आर्थिक नीति और विकास योजनाओं के निर्माण में राष्ट्रीय आय के आँकड़े महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देते हैं।
- आर्थिक संवृद्धि का अर्थ निश्चित अवधि में वास्तविक आय और उत्पादन की वृद्धि से है।
- आर्थिक विकास में आय की वृद्धि के साथ संस्थागत और गुणात्मक परिवर्तन भी सम्मिलित होते हैं।
- आर्थिक विकास में शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा, क्रय-शक्ति, पोषण और सामाजिक न्याय जैसे तत्व महत्वपूर्ण हैं।
राष्ट्रीय आय एवं आर्थिक विकास
किसी देश के आर्थिक विकास का उसकी राष्ट्रीय आय से प्रत्यक्ष संबंध होता है। जिस देश की राष्ट्रीय आय अधिक होती है, उसके पास विकास कार्यों के लिए अपेक्षाकृत अधिक आर्थिक संसाधन उपलब्ध होते हैं। इसलिए किसी देश की आर्थिक प्रगति को समझने के लिए राष्ट्रीय आय के साथ-साथ आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास की अवधारणाओं को समझना आवश्यक है।
आर्थिक संवृद्धि का अर्थ
आर्थिक संवृद्धि का अर्थ किसी अर्थव्यवस्था में एक निश्चित समयावधि के दौरान होने वाली वास्तविक आय की वृद्धि से है। जब देश के उत्पादन और आय में लगातार वृद्धि होती है, तो इसे आर्थिक संवृद्धि कहा जाता है।
आर्थिक संवृद्धि को मुख्यतः निम्न आर्थिक सूचकों में वृद्धि से समझा जा सकता है—
- सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) में वृद्धि,
- सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में वृद्धि तथा
- प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि।
इस प्रकार आर्थिक संवृद्धि मुख्यतः अर्थव्यवस्था के मात्रात्मक विस्तार को व्यक्त करती है। इसमें यह देखा जाता है कि उत्पादन तथा वास्तविक आय की मात्रा पहले की तुलना में कितनी बढ़ी है।
आर्थिक विकास का अर्थ
आर्थिक विकास केवल आय और उत्पादन में वृद्धि तक सीमित नहीं है। किसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास तभी माना जाता है जब लोगों की आय बढ़ने के साथ-साथ उनके जीवन-स्तर और रहन-सहन की गुणवत्ता में भी सुधार हो।
अर्थात आर्थिक विकास में मात्रात्मक वृद्धि के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक जीवन में होने वाले गुणात्मक परिवर्तन भी शामिल होते हैं।
आर्थिक विकास के अंतर्गत मुख्यतः दो प्रकार के परिवर्तन होते हैं—
1. संस्थागत परिवर्तन
संस्थागत परिवर्तन का अर्थ अर्थव्यवस्था की विभिन्न गतिविधियों को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए आवश्यक औपचारिक संस्थाओं और व्यवस्थाओं के विकास से है।
इन संस्थागत व्यवस्थाओं के प्रमुख उदाहरण हैं—
- मुद्रा के लिए बैंकिंग व्यवस्था,
- शिक्षा के लिए विद्यालय एवं विश्वविद्यालय,
- स्वास्थ्य के लिए कुशल अस्पताल एवं स्वास्थ्य संस्थाएँ।
इन संस्थाओं के विकास से आर्थिक गतिविधियाँ अधिक व्यवस्थित होती हैं तथा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं।
2. गुणात्मक परिवर्तन
गुणात्मक परिवर्तन का संबंध लोगों के जीवन की वास्तविक गुणवत्ता में सुधार से है। केवल आय बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है; यह भी आवश्यक है कि बढ़ी हुई आय और संसाधनों का प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सामाजिक जीवन पर दिखाई दे।
आर्थिक विकास के प्रमुख गुणात्मक तत्व हैं—
- जीवन प्रत्याशा में सुधार,
- शिक्षा के स्तर में वृद्धि,
- स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार,
- प्रति व्यक्ति आय एवं क्रय-शक्ति में वृद्धि,
- पोषण के स्तर में सुधार तथा
- सामाजिक न्याय की स्थापना।
आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास का संबंध
आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास परस्पर संबंधित हैं, लेकिन दोनों समान नहीं हैं। आर्थिक संवृद्धि मुख्यतः आय और उत्पादन में वृद्धि को दर्शाती है, जबकि आर्थिक विकास उससे अधिक व्यापक अवधारणा है।
आर्थिक विकास में उत्पादन एवं आय की वृद्धि के साथ-साथ संस्थागत सुधार और लोगों के जीवन की गुणवत्ता में परिवर्तन भी आवश्यक होता है। इसलिए केवल GDP, GNP या प्रति व्यक्ति आय बढ़ने को पूर्ण आर्थिक विकास नहीं माना जा सकता।
जब आय में वृद्धि का प्रभाव शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, जीवन प्रत्याशा, क्रय-शक्ति और सामाजिक न्याय में सुधार के रूप में दिखाई देता है, तभी उसे वास्तविक आर्थिक विकास कहा जा सकता है।
- राष्ट्रीय आय का किसी देश के आर्थिक विकास से प्रत्यक्ष संबंध होता है।
- आर्थिक संवृद्धि का अर्थ निश्चित समयावधि में वास्तविक आय की वृद्धि से है।
- GDP, GNP और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि आर्थिक संवृद्धि के प्रमुख संकेत हैं।
- आर्थिक संवृद्धि मुख्यतः मात्रात्मक परिवर्तन को दर्शाती है।
- आर्थिक विकास में आय के साथ जीवन-स्तर में गुणात्मक सुधार भी आवश्यक है।
- आर्थिक विकास में संस्थागत तथा गुणात्मक दोनों प्रकार के परिवर्तन होते हैं।
- बैंक, विद्यालय, विश्वविद्यालय और अस्पताल संस्थागत विकास के प्रमुख उदाहरण हैं।
- शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा, क्रय-शक्ति, पोषण और सामाजिक न्याय आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण तत्व हैं।
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आर्थिक संवृद्धि एवं आर्थिक विकास में अंतर
आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास दोनों किसी देश की आर्थिक प्रगति से संबंधित अवधारणाएँ हैं, लेकिन दोनों का अर्थ समान नहीं है। आर्थिक संवृद्धि मुख्यतः एक निश्चित समयावधि में वास्तविक आय, उत्पादन तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि को व्यक्त करती है, जबकि आर्थिक विकास में आय की वृद्धि के साथ-साथ संस्थागत तथा गुणात्मक परिवर्तन भी सम्मिलित होते हैं।
इस प्रकार आर्थिक संवृद्धि का संबंध मुख्यतः आर्थिक मात्रा में वृद्धि से है, जबकि आर्थिक विकास का संबंध अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन में होने वाले व्यापक परिवर्तन से है।
आर्थिक संवृद्धि एवं आर्थिक विकास में प्रमुख अंतर
| आर्थिक संवृद्धि | आर्थिक विकास |
|---|---|
| 1. यह क्रमिक और दीर्घकाल में स्थिर रहती है। | इसमें आकस्मिक और एक-एक करके परिवर्तन आते रहते हैं। |
| 2. आर्थिक तथा संस्थागत कारकों में परिवर्तन होने पर यह स्वतः होती रहती है। | उन्नति और परिवर्तन के लिए विशेष प्रयत्न करना आवश्यक होता है। |
| 3. इसमें किसी नवीनता का सृजन नहीं होता। | इसमें प्रचलित तत्वों में सुधार किया जाता है तथा नई शक्तियों द्वारा नए मूल्यों का निर्माण किया जाता है। |
| 4. यह परम्परागत तथा नियमित घटनाओं का परिणाम है। | यह उन्नति की प्रबल इच्छा तथा सृजनात्मक शक्तियों का प्रतिफल है। |
| 5. यह स्थैतिक संतुलन की स्थिति है, जिसमें देश उन्नति तो करता है लेकिन उसकी गति अत्यन्त धीमी होती है। | यह गतिशील संतुलन की स्थिति है, जिसमें देश तीव्र गति से उन्नति की ओर अग्रसर होता है। |
| 6. इसका अर्थ मुख्यतः उत्पादकता में वृद्धि से लगाया जाता है। | इसमें उत्पादकता के साथ-साथ प्राविधिक और संस्थागत परिवर्तन भी सम्मिलित होते हैं। |
| 7. यह विकसित देशों के विकास से संबंधित मानी जाती है। | यह अल्पविकसित देशों के विकास से संबंधित मानी जाती है। |
| 8. इसके अंतर्गत उपलब्ध साधनों के आदर्श प्रयोग की पद्धतियों पर बल दिया जाता है। | इसके अंतर्गत पूँजीगत तथा प्राकृतिक साधनों के उपयोग और विकास की गुंजाइश होती है। |
दोनों अवधारणाओं को सरल रूप में समझें
आर्थिक संवृद्धि का केंद्र मुख्यतः आय और उत्पादन में वृद्धि है। यदि किसी अर्थव्यवस्था में सकल घरेलू उत्पाद, सकल राष्ट्रीय उत्पाद या प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है, तो आर्थिक संवृद्धि हो रही है।
इसके विपरीत आर्थिक विकास का क्षेत्र अधिक व्यापक है। इसमें आय और उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था की संस्थाओं, तकनीक और लोगों के जीवन-स्तर में भी परिवर्तन होता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा, प्रति व्यक्ति आय, पोषण और सामाजिक न्याय में सुधार आर्थिक विकास के गुणात्मक पक्ष हैं।
आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास का मूल अंतर
संक्षेप में, आर्थिक संवृद्धि आर्थिक मात्रा में वृद्धि को दर्शाती है, जबकि आर्थिक विकास आर्थिक मात्रा के साथ जीवन और संस्थाओं की गुणवत्ता में परिवर्तन को भी दर्शाता है।
इसलिए केवल उत्पादन या आय में वृद्धि आर्थिक विकास को पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं करती। आर्थिक विकास में उत्पादन की वृद्धि के साथ प्राविधिक, संस्थागत तथा गुणात्मक परिवर्तन भी आवश्यक होते हैं।
- आर्थिक संवृद्धि वास्तविक आय और उत्पादन में वृद्धि से संबंधित है।
- आर्थिक विकास आय में वृद्धि के साथ व्यापक गुणात्मक परिवर्तन को भी सम्मिलित करता है।
- संवृद्धि को स्थैतिक संतुलन जबकि विकास को गतिशील संतुलन से संबंधित बताया गया है।
- आर्थिक संवृद्धि में मुख्य बल उत्पादकता की वृद्धि पर रहता है।
- आर्थिक विकास में उत्पादकता के साथ प्राविधिक एवं संस्थागत परिवर्तन भी सम्मिलित होते हैं।
- संवृद्धि को विकसित देशों तथा विकास को अल्पविकसित देशों के विकास से संबंधित माना गया है।
- आर्थिक विकास में पूँजीगत और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग एवं विकास पर विशेष बल रहता है।