लेखन कौशल—अर्थ, उद्देश्य, महत्त्व एवं उपयोगिता
लेखन कौशल का अर्थ
जब हम अपने विचारों तथा भावों को लिखकर अभिव्यक्त करते हैं, तो इसे लेखन कौशल या लिखित अभिव्यक्ति कहा जाता है। लेखन भाषा का वह रूप है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने विचारों, अनुभवों और भावों को स्थायी रूप प्रदान करता है।
लेखन केवल अक्षर बनाने की क्रिया नहीं है। इसके लिए बालक में मांसपेशियों पर नियंत्रण, हाथ-आँख का समन्वय, निरीक्षण शक्ति, सही आकृति बनाने की क्षमता तथा लेखन-अभ्यास का विकास आवश्यक है।
लेखन की प्रारम्भिक तैयारी
प्रारम्भिक अवस्था में बालक को सीधे वर्ण लिखवाने के बजाय पहले उसके हाथ और उँगलियों को लेखन के लिए तैयार करना चाहिए। इसके लिए श्यामपट्ट पर स्वतंत्र रूप से रेखाएँ खींचने, टेढ़ी-मेढ़ी आकृतियाँ बनाने और छोटे चित्र बनाने जैसे अभ्यास उपयोगी माने गए हैं।
पुस्तक में महात्मा गाँधी के मत का उल्लेख है कि लिखना सिखाने से पहले बालकों को चित्रकला का अभ्यास कराया जाना चाहिए, क्योंकि अक्षर भी एक प्रकार की आकृति ही हैं।
लेखन की तैयारी के लिए ऐसे खेल और गतिविधियाँ भी कराई जानी चाहिए जिनसे बच्चों की मांसपेशियाँ मजबूत हों, स्नायु नियंत्रित हों और हाथों की क्रियात्मक शक्ति बढ़े।
लेखन शिक्षण में लिपि का अर्थ
प्राचीन काल में मनुष्य ने अपने विचारों और भावों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें रेखाओं, चित्रों और विभिन्न चिह्नों के माध्यम से व्यक्त करना प्रारम्भ किया। इन लिखित संकेतों की व्यवस्थित व्यवस्था को आगे चलकर लिपि कहा गया।
इस दृष्टि से लिपि का अर्थ लिखावट या भाषा को लिखित रूप में व्यक्त करने की व्यवस्था है।
लेखन कौशल के उद्देश्य
लेखन कौशल के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
- विद्यार्थियों को सुन्दर, सुडौल तथा स्पष्ट लेख लिखने की शिक्षा देना।
- विद्यार्थियों के शब्दकोश को सक्रिय बनाना।
- विद्यार्थियों को लेखन-कला से परिचित कराना ताकि वे अपने भावों, विचारों और अनुभवों को मूर्त रूप दे सकें तथा दूसरों के भावों को भी लिखित रूप में व्यक्त कर सकें।
- मातृभाषा या हिन्दी के अक्षरों का वास्तविक स्वरूप सही ढंग से लिखने की क्षमता विकसित करना।
- इतना लेखन-अभ्यास कराना कि विद्यार्थी यन्त्रवत् गति और प्रवाह के साथ लिख सकें तथा विराम चिह्नों का उचित प्रयोग कर सकें।
- विद्यार्थियों को अपने विचारों और अनुभवों को अनुच्छेदों में बाँटकर व्यवस्थित रूप से लिखने का अभ्यास कराना।
पढ़ना और लिखना—कौन पहले?
पुस्तक में इस विषय पर मतभेद का उल्लेख किया गया है। मैडम मॉण्टेसरी के मतानुसार बालक को पढ़ने से पहले लिखना सिखाना चाहिए, क्योंकि लिखने में मुख्यतः शारीरिक कौशल की आवश्यकता होती है, जबकि पढ़ने में ज्ञान और शरीर की अनेक जटिल क्रियाओं का समन्वय करना पड़ता है।
दूसरे मत के अनुसार पहले पढ़ना सिखाया जाना चाहिए और लिखना उसके बाद। पुस्तक का निष्कर्ष यह है कि पढ़ना और लिखना दोनों साथ-साथ सिखाने से कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों में समन्वय स्थापित होता है।
लेखन कौशल / शिक्षण का महत्त्व
मानव जीवन में लेखन का विशेष महत्त्व है। मौखिक भाषा क्षणिक हो सकती है, परन्तु लिखित भाषा विचारों और ज्ञान को स्थायी रूप से सुरक्षित रखती है।
- विचारों को सुरक्षित रखने में लेखन आवश्यक है। लिखित रूप में विचारों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
- दैनिक जीवन में विवरण, हिसाब-किताब और अन्य आवश्यक सूचनाएँ लिखित रूप में सुरक्षित रखी जाती हैं।
- आधुनिक शिक्षा-प्रणाली में परीक्षाओं का प्रमुख आधार लिखित अभिव्यक्ति है। शिक्षा-व्यवस्था की कल्पना लेखन के बिना कठिन है।
- साहित्य का संरक्षण और विस्तार लिखित भाषा से ही सम्भव है। यदि लिपि न होती तो साहित्य का विशाल भण्डार सुरक्षित नहीं रह पाता।
- व्यापारिक और औद्योगिक क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के अभिलेख, विवरण और रिकॉर्ड लिखित रूप में रखने पड़ते हैं।
- सरकारी कार्यालयों और न्यायालयों में रिकॉर्ड, निर्णय, नीतियाँ और नियम लिखित भाषा में सुरक्षित रखे जाते हैं।
- लिखित भाषा के माध्यम से ज्ञान का आदान-प्रदान होता है। विद्यार्थी पुस्तकें पढ़ते हैं, सामग्री एकत्र करते हैं और नोट्स बनाते हैं।
- लिखित भाषा ने हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को वर्तमान पीढ़ी तक पहुँचाया है तथा वर्तमान रचनाओं को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाने का माध्यम भी है।
इस प्रकार केवल मौखिक भाषा मानव जीवन की सभी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकती। लेखन कौशल भाषा के कार्य को पूर्णता प्रदान करता है।
लेखन की उपयोगिता
लेखन के माध्यम से मनुष्य अपने अनुभवों और कल्पनाशक्ति के भण्डार को सुरक्षित रखता है और पूर्वजों के अनुभवों तथा विचारों से लाभ प्राप्त करता है।
पुस्तक के अनुसार लिखित अभिव्यक्ति में चार मुख्य गुण होने चाहिए—
- सुस्पष्टता
- शुद्धता
- क्रमबद्धता
- सुसम्बद्धता
लेखन कौशल की उपयोगिता बढ़ाने वाली क्षमताएँ
- शुद्ध वर्तनी और उचित विराम चिह्नों के साथ सुलेख लिखना।
- सरल कहानी, घटना और दृश्य आदि का लिखित वर्णन करना।
- कल्पना के आधार पर कहानी, संवाद या कविता लिखना।
- विशिष्ट शब्दों, मुहावरों और लोकोक्तियों द्वारा भाषा को प्रभावशाली बनाना।
- विभिन्न विषयों पर लघु निबन्ध लिखना।
- लेखन में क्रमबद्धता और सुसम्बद्धता बनाए रखना।
- अभिव्यक्ति में अनावश्यक विस्तार से बचकर संक्षिप्तता लाना।
- अनुलेख, अतिलेख तथा श्रुतलेख लिखने की क्षमता विकसित करना।
- लेखन कार्य को उचित अनुच्छेदों में व्यवस्थित करना।
- विचारों और भावों को लिखित रूप में व्यक्त करना लेखन कौशल या लिखित अभिव्यक्ति कहलाता है।
- लेखन के लिए मांसपेशियों का नियंत्रण, हाथ-आँख समन्वय और पर्याप्त अभ्यास आवश्यक है।
- लेखन कौशल का उद्देश्य सुन्दर और स्पष्ट लेख, सक्रिय शब्दकोश, शुद्ध अक्षर-निर्माण तथा व्यवस्थित अभिव्यक्ति का विकास करना है।
- लेखन विचारों, साहित्य, ज्ञान, संस्कृति और अभिलेखों को स्थायी रूप से सुरक्षित रखने का माध्यम है।
- लिखित अभिव्यक्ति के चार प्रमुख गुण—सुस्पष्टता, शुद्धता, क्रमबद्धता और सुसम्बद्धता हैं।
- लेखन कौशल से ही भाषा का कार्य पूर्णता प्राप्त करता है।
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लेखन की विधियाँ
लेखन की विधियाँ
बालकों को वर्णों और शब्दों का सही लेखन सिखाने के लिए विभिन्न विधियों का प्रयोग किया जाता है। इन विधियों का उद्देश्य बालक को पहले रेखाओं और अक्षरों की आकृति से परिचित कराना तथा धीरे-धीरे उसे शुद्ध, सुन्दर और स्वतंत्र रूप से लिखने योग्य बनाना है।
पुस्तक में लेखन शिक्षण की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित दी गई हैं—
1. सार्थक रेखाएँ खींचने की विधि
इस विधि में बालक को अक्षर लिखाने से पहले उन रेखाओं और आकृतियों का अभ्यास कराया जाता है जिनसे आगे चलकर वर्णों का निर्माण होता है। यह लेखन-योग्यता और अक्षर-विन्यास की शिक्षा के बीच महत्त्वपूर्ण कड़ी का कार्य करती है।
बालक को सीधी, खड़ी, तिरछी, गोल तथा घुमावदार रेखाओं का अभ्यास कराया जाता है। इन रेखाओं के विभिन्न संयोजनों से शिरोरेखा, अनुस्वार, खड़ी पाई, मात्राएँ तथा अनेक वर्णों की आकृतियाँ बनाना सरल हो जाता है।
2. खंडशः-रेखा लेखन विधि
सार्थक रेखाओं का अभ्यास हो जाने के बाद वर्णों को छोटे-छोटे खण्डों में बाँटकर लिखना सिखाया जाता है। पहले वर्ण के विभिन्न भाग अलग-अलग लिखवाए जाते हैं और बाद में उन्हें मिलाकर पूरा वर्ण बनाया जाता है।
इससे बालक वर्ण की बनावट को समझता है और धीरे-धीरे लेखन की गति तथा शुद्धता में सुधार करता है।
3. रेखा अनुसरण विधि
यह एक प्राचीन और उपयोगी विधि है। इसमें अध्यापक तख्ती, स्लेट या कागज पर किसी वर्ण की आकृति पेंसिल, हल्की स्याही या बिन्दुओं द्वारा बना देता है।
बालक उन बिन्दुओं या हल्की रेखाओं का अनुसरण करते हुए उन्हें मिलाता है और पूरा वर्ण बनाता है। इससे अक्षरों के आकार और दिशा का अभ्यास होता है।
4. अनुलेख विधि
अनुलेख विधि, रेखा अनुसरण विधि के बाद की अवस्था है। इसमें शिक्षक किसी वर्ण या शब्द को सुन्दर और स्पष्ट लेख में लिखकर देता है और बालक उसे देखकर उसी प्रकार लिखता है।
इस विधि से बालक को अक्षरों की सही आकृति और सुन्दर लिखावट का अभ्यास प्राप्त होता है।
5. स्वतंत्र लेखन विधि
स्वतंत्र लेखन विधि में बालक को किसी लिखे हुए वर्ण की नकल नहीं करनी पड़ती। वह वर्ण या शब्द की मानसिक आकृति के आधार पर स्वयं लिखता है।
जब बालक अक्षरों की आकृतियों से भली-भाँति परिचित हो जाता है, तब यह विधि उसकी स्वतंत्र लेखन-क्षमता के विकास में सहायक होती है।
6. तुलना विधि
यदि बालक देवनागरी से पहले किसी अन्य लिपि का ज्ञान प्राप्त कर चुका है, तो नई लिपि सिखाते समय दोनों लिपियों के समान वर्णों की तुलना कराई जा सकती है।
पुस्तक में गुजराती, बंगाली और देवनागरी के अनेक वर्णों में समानता का उल्लेख किया गया है। ऐसी समानताओं के आधार पर नई लिपि का लेखन सरल बनाया जा सकता है।
7. अनुकरण विधि
यह लेखन सिखाने की सामान्य और प्रचलित विधि है। शिक्षक स्लेट या श्यामपट्ट पर वर्ण या शब्द लिखता है और विद्यार्थी उसे देखकर उसी प्रकार लिखने का अनुकरण करते हैं।
सुलेख की पुस्तिकाओं में भी प्रथम पंक्ति में नमूना दिया जाता है और शेष पृष्ठ पर विद्यार्थी उसी नमूने का अनुकरण करते हुए लिखते हैं।
8. पेस्टालॉजी की रचनात्मक विधि
इस विधि में वर्णों की रचना को समझाने के लिए उनकी आकृतियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। पुस्तक के अनुसार यह विधि तीन प्रमुख क्रियाओं पर आधारित है—
- पृथक्करण—वर्ण की आकृति को छोटे-छोटे भागों में अलग करके समझना।
- वर्गीकरण—वर्णों को उनकी आकृति या कठिनाई के आधार पर समूहों में रखना।
- एकीकरण—अलग-अलग आकृतियों को मिलाकर पूर्ण वर्ण बनाना।
इस प्रकार बालक पहले वर्ण के विभिन्न भागों को पहचानता है और फिर उन्हें जोड़कर उसकी पूर्ण आकृति बनाना सीखता है।
9. मॉण्टेसरी विधि
मॉण्टेसरी विधि में अक्षरों को समझने के लिए स्पर्श और हाथ की गति का उपयोग किया जाता है। बालक को लकड़ी या गत्ते से बने अक्षरों पर उँगली फेरने के लिए कहा जाता है।
जब बालक उँगलियों से अक्षरों की आकृति पहचानने लगता है, तब उसे लिखने का अभ्यास कराया जाता है। बड़े गत्ते पर अक्षर की आकृति बनाकर उसे काट लिया जाता है और खाली स्थान में पेंसिल चलाकर भी वर्ण बनाने का अभ्यास कराया जाता है।
इस विधि से अक्षर की आकृति समझने के साथ-साथ हाथ की गति का भी अभ्यास होता है।
10. जैकोटॉट विधि
इस विधि में बालक को पहले एक लिखा हुआ वाक्य दिया जाता है। बालक उसका एक शब्द लिखता है और फिर अपने लिखे शब्द की तुलना शिक्षक द्वारा दिए गए मूल शब्द से करता है।
वह अपनी अशुद्धि स्वयं पहचानकर सुधारता है। इसी प्रकार पूरा वाक्य लिखने के बाद उसे स्मृति के आधार पर फिर से लिखवाया जाता है और अन्त में मूल प्रति से मिलाकर अशुद्धियों का संशोधन कराया जाता है।
इस प्रकार यह विधि स्वयं जाँच और स्वयं सुधार पर बल देती है।
11. विश्लेषण विधि
विश्लेषण विधि में लेखन-शिक्षण शब्द और वाक्य के आधार पर कराया जाता है। इसे रोचक बनाने के लिए चित्रों की सहायता भी ली जा सकती है।
पुस्तक में इसके अन्तर्गत शब्द विधि, वाक्य विधि, चित्र-शब्द विधि तथा वाक्य-चित्र विधि का उल्लेख किया गया है।
यह विधि वाचन-शिक्षण में अपेक्षाकृत अधिक उपयोगी मानी गई है। लेखन-शिक्षण में इसकी कठिनाई यह है कि सम्पूर्ण शब्द या वाक्य पर ध्यान देने से कभी-कभी प्रत्येक अक्षर की आकृति पर पर्याप्त ध्यान नहीं रह पाता।
12. संश्लेषण विधि
संश्लेषण विधि में लेखन सिखाने का क्रम वर्ण → शब्द → वाक्य होता है। पहले वर्णों का ज्ञान कराया जाता है, फिर उनसे बनने वाले शब्द और अन्त में वाक्य लिखना सिखाया जाता है।
इस विधि में वर्णों को प्रस्तुत करने के प्रमुख रूप हैं—
- वर्णमाला विधि—वर्णों को निश्चित वर्णक्रम के अनुसार प्रस्तुत करना।
- समूह विधि—समान आकृति वाले वर्णों को एक साथ समूह में सिखाना।
- चित्राक्षर विधि—वर्ण को किसी सार्थक वस्तु के चित्र से जोड़कर सिखाना, जैसे ‘अ’ को अनार और ‘आ’ को आम के चित्र के साथ।
पुस्तक में चित्राक्षर विधि को विशेष रूप से रोचक बताया गया है, क्योंकि इससे वर्ण का सम्बन्ध किसी परिचित वस्तु से स्थापित हो जाता है। लेखन-शिक्षण प्रारम्भ करने की दृष्टि से संश्लेषण विधि को उपयोगी माना गया है।
13. मनोवैज्ञानिक विधि
मनोवैज्ञानिक विधि में प्रारम्भ से केवल अलग-अलग वर्ण और शब्द लिखाने के स्थान पर बालक को पूर्ण वाक्य बोलना और लिखना सिखाने पर बल दिया जाता है।
जब बालक पूर्ण वाक्य बोलने लगे तथा उसकी कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ पर्याप्त रूप से विकसित हो जाएँ, तब उसे पढ़ने और लिखने के लिए तैयार किया जाता है।
- लेखन-शिक्षण में सरल रेखाओं से प्रारम्भ करके धीरे-धीरे वर्ण, शब्द और वाक्य की ओर बढ़ा जाता है।
- सार्थक रेखा, खंडशः-रेखा, रेखा अनुसरण, अनुलेख और अनुकरण विधियाँ अक्षर-रचना के अभ्यास में उपयोगी हैं।
- स्वतंत्र लेखन में बालक मानसिक आकृति के आधार पर बिना नकल किए स्वयं लिखता है।
- पेस्टालॉजी की रचनात्मक विधि पृथक्करण, वर्गीकरण और एकीकरण पर आधारित है।
- मॉण्टेसरी विधि में स्पर्श और उँगलियों की गति द्वारा अक्षर की आकृति का ज्ञान कराया जाता है।
- जैकोटॉट विधि में विद्यार्थी अपने लेख की मूल प्रति से तुलना करके स्वयं अशुद्धियाँ सुधारता है।
- संश्लेषण विधि का क्रम वर्ण → शब्द → वाक्य है और इसमें वर्णमाला, समूह तथा चित्राक्षर विधि का प्रयोग किया जा सकता है।
- मनोवैज्ञानिक विधि पूर्ण वाक्य के माध्यम से लेखन सिखाने पर बल देती है।
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लेखन शिक्षण की सामान्य त्रुटियाँ एवं ध्यान देने योग्य बातें
लेखन शिक्षण की सामान्य त्रुटियाँ
प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों के लिखित कार्य में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ देखने को मिलती हैं। लेखन शिक्षण का उद्देश्य केवल लिखना सिखाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को शुद्ध, स्पष्ट, क्रमबद्ध और सुन्दर लेखन की आदत डालना भी है।
पुस्तक में लेखन शिक्षण की प्रमुख सामान्य त्रुटियाँ निम्नलिखित बताई गई हैं—
- मात्रा एवं वर्ण सम्बन्धी अशुद्धियाँ—वर्णों या मात्राओं को गलत लिखना अथवा उनका अनुचित प्रयोग करना।
- व्याकरण सम्बन्धी दोष—लिंग, वचन, विभक्ति और प्रत्यय आदि के नियमों का गलत प्रयोग।
- वाक्य-रचना सम्बन्धी दोष—वाक्य को अशुद्ध या अव्यवस्थित रूप में लिखना।
- अनुच्छेदों की अनुपयुक्तता—विचारों को उचित अनुच्छेदों में न बाँटना अथवा अनुच्छेदों का गलत विभाजन करना।
- विराम चिह्नों का गलत प्रयोग—उचित स्थान पर सही विराम चिह्न न लगाना।
- विचार-श्रृंखला की कमी—विचारों को तार्किक, क्रमबद्ध और सुसम्बद्ध रूप में प्रस्तुत न कर पाना।
लेखन सिखाने में ध्यान देने योग्य बातें
लेखन शिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षक को केवल अक्षर-निर्माण पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि बालक के बैठने के ढंग, लेखन-सामग्री, लेखनी पकड़ने की विधि, अभ्यास और शुद्ध अभिव्यक्ति जैसे अनेक पक्षों का भी ध्यान रखना चाहिए।
1. बैठने का ढंग
लिखते समय बालक का आसन सही होना चाहिए। रीढ़ की हड्डी सीधी रहे और बालक झुककर न लिखे। कुर्सी पर बैठते समय उसके पैर भूमि पर सीधे रहें तथा घुटनों का कोण लगभग 90° हो।
2. आँखों से कागज की दूरी
लिखते समय आँखों और कॉपी के बीच उचित दूरी रखनी चाहिए। पुस्तक में यह दूरी कम-से-कम 25 सेमी. रखने की बात कही गई है।
3. कलम पकड़ने की विधि
कलम पकड़ने का ढंग लेखन को बहुत प्रभावित करता है। कलम अँगूठे और मध्य अँगुली के बीच हो तथा पहली अँगुली कलम के ऊपर रहे।
कलम को निब या पॉइंट से लगभग 1 इंच ऊपर पकड़ना चाहिए। पकड़ ऐसी हो कि उँगलियाँ वर्णों की आकृति के अनुसार आसानी से घूम सकें।
4. शिरोरेखा का प्रयोग
वर्णों के ऊपर खींची जाने वाली रेखा को शिरोरेखा कहते हैं। देवनागरी लेखन में यह अक्षर का आवश्यक भाग है। शिरोरेखा लगाने के बाद ही वर्ण पर मात्रा का प्रयोग किया जाना चाहिए।
5. लिपि-प्रतीकों का सही प्रयोग
अनुस्वार, विसर्ग, हलन्त और मात्राओं के प्रयोग में विशेष सावधानी रखनी चाहिए। छोटे-छोटे लिपि-प्रतीकों की भूल से शब्द का रूप और अर्थ दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
6. अक्षरों की सुडौलता एवं उचित नमूना
जब विद्यार्थी अक्षरों की रचना सीख लें, तब उन्हें अक्षरों को मिलाकर शब्द और उसके बाद वाक्य लिखना सिखाना चाहिए।
शिक्षक को विद्यार्थियों के सामने सुन्दर, सुडौल और स्पष्ट लेखन का आदर्श नमूना प्रस्तुत करना चाहिए, ताकि वे उसी के अनुसार अभ्यास कर सकें।
7. नियमित अभ्यास
लेखन एक कला है, इसलिए इसमें नियमित अभ्यास आवश्यक है। विद्यार्थियों को उनकी बौद्धिक और मानसिक क्षमता के अनुसार अभ्यास कराया जाना चाहिए।
लेखन-अभ्यास के लिए सुलेख, अनुलेख और श्रुतलेख जैसी विधियों का प्रयोग किया जा सकता है।
8. बाएँ से दाएँ लिखना
हिन्दी लेखन में वर्णों, शब्दों और वाक्यों को बाएँ से दाएँ लिखा जाता है। विद्यार्थियों को प्रारम्भ से ही इस लेखन-क्रम का अभ्यास कराया जाना चाहिए।
9. सीधी लिखाई
अक्षरों की खड़ी रेखाएँ तिरछी न होकर सीधी होनी चाहिए। इससे लिखावट अधिक स्पष्ट और सुन्दर दिखाई देती है।
10. उपयुक्त समय
लेखन सिखाने से पहले बालक को मानसिक रूप से तैयार करना आवश्यक है। शिक्षक को यह भी देखना चाहिए कि उसकी उँगलियाँ और हाथ की मांसपेशियाँ कलम पकड़ने योग्य विकसित हुई हैं या नहीं।
11. उपयुक्त वातावरण
लेखन-अभ्यास के लिए शांत, अनुकूल और सुरुचिपूर्ण वातावरण होना चाहिए। उचित वातावरण से विद्यार्थी एकाग्र होकर लिखने का अभ्यास कर पाते हैं।
12. भावों और विचारों को व्यक्त करने का ढंग
जब विद्यार्थी शब्द और वाक्य लिखना सीख लें, तब उन्हें अपने भावों और विचारों को तार्किक क्रम तथा व्याकरणसम्मत भाषा में व्यक्त करने का अभ्यास कराया जाना चाहिए।
13. पढ़ना और लिखना साथ-साथ
विद्यार्थियों को लेखन के साथ-साथ पढ़ने का अभ्यास भी कराना चाहिए। पुस्तक के अनुसार बोल-बोलकर लिखने से वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ कम होती हैं।
- लेखन शिक्षण की प्रमुख त्रुटियाँ—मात्रा-वर्ण, व्याकरण, वाक्य-रचना, अनुच्छेद, विराम चिह्न और विचार-श्रृंखला से सम्बन्धित होती हैं।
- लिखते समय सही आसन, आँखों से लगभग 25 सेमी. दूरी और कलम पकड़ने की सही विधि आवश्यक है।
- शिरोरेखा, मात्रा, अनुस्वार, विसर्ग और हलन्त आदि का शुद्ध प्रयोग कराया जाना चाहिए।
- विद्यार्थियों को सुन्दर और स्पष्ट लेखन का उचित नमूना दिया जाना चाहिए।
- लेखन कौशल के विकास के लिए नियमित अभ्यास तथा सुलेख, अनुलेख और श्रुतलेख उपयोगी हैं।
- लेखन में बाएँ से दाएँ क्रम, सीधी रेखाएँ और उचित वातावरण का विशेष महत्त्व है।
- विद्यार्थियों को अपने विचारों को तार्किक, क्रमबद्ध और व्याकरणसम्मत भाषा में लिखने का अभ्यास कराना चाहिए।
- पढ़ने और लिखने का अभ्यास साथ-साथ कराने से वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ कम होती हैं।
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सुलेख—अर्थ, उद्देश्य, महत्त्व एवं सावधानियाँ
सुलेख का अर्थ
सुलेख का शाब्दिक अर्थ है—सुन्दर लेख। लेखन में सुन्दरता, स्पष्टता और आकर्षक रूप का होना महत्त्वपूर्ण माना जाता है। सुन्दर लिखावट किसी शिक्षित व्यक्ति की प्रमुख पहचान मानी जाती है।
विद्यार्थियों की लिखावट अच्छी बनाने के लिए उन्हें प्रारम्भ से ही नियमित रूप से लिखने का अभ्यास कराना चाहिए। यदि सुलेख का अभ्यास पाठ्य-पुस्तक से कराया जाए तो इससे पाठ की पुनरावृत्ति भी होती है, सुन्दर लिखने की क्षमता विकसित होती है और विद्यार्थियों को शब्दों की शुद्ध वर्तनी भी याद रहती है।
धीरे-धीरे विद्यार्थी लिखे हुए पाठ का अर्थ भी समझने लगते हैं। इसलिए सुलेख केवल लिखावट सुधारने का माध्यम नहीं, बल्कि पठन, वर्तनी और अर्थबोध में भी सहायक है।
सुलेख में शिक्षक की भूमिका
सुलेख कराते समय शिक्षक को विद्यार्थियों की सक्रिय रूप से सहायता करनी चाहिए। लेखन प्रारम्भ कराने से पहले उनकी लेखन-सामग्री का निरीक्षण करना चाहिए।
यदि कोई विद्यार्थी गलत लिख रहा हो तो उसे हतोत्साहित नहीं करना चाहिए। शिक्षक को अवसर मिलने पर उसे सुधार के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करना चाहिए।
एक सुन्दर लेख के आवश्यक गुण
- वर्णों का आकार और मात्राएँ उचित अनुपात में हों।
- प्रत्येक शब्द की शिरोरेखा बिल्कुल सीधी हो।
- वर्णों, शब्दों, वाक्यों तथा पंक्तियों के बीच उचित दूरी हो।
- लेख को आवश्यकतानुसार अनुच्छेदों में विभाजित किया जाए।
- लिखते समय पृष्ठ के बाईं ओर उचित हाशिया छोड़ा जाए।
- लेखन में उचित गति के साथ सुन्दरता भी बनाए रखी जाए।
सुलेख के उद्देश्य
सुलेख के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
- विद्यार्थियों को सुन्दर, सुडौल और आकर्षक लेखन की ओर उन्मुख करना।
- विद्यार्थियों की प्रमुख इन्द्रियों को प्रशिक्षित करना।
- बालकों में सौन्दर्यानुभूति की भावना का विकास करना।
- बालक के 3H—Head, Heart और Hand अर्थात् मस्तिष्क, हृदय और हाथ का समुचित विकास करना।
- बालक को सुन्दर लिखावट की अवधारणा से परिचित कराना।
- सुलेख लिखते समय विद्यार्थियों को सुन्दर लिखावट की उचित गति से परिचित और प्रशिक्षित करना।
सुलेख का महत्त्व
विद्यार्थियों के लिए सुलेख का विशेष महत्त्व है। सुलेख केवल लिखने का अभ्यास नहीं, बल्कि एक कला भी है।
- सुन्दर लिखावट परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने में सहायक हो सकती है।
- हस्तलेख की सुन्दरता परीक्षक पर अच्छा प्रभाव डालती है।
- सुलेख से लिखावट सुपाठ्य बनती है, जिससे पाठक को पढ़ने में कठिनाई नहीं होती।
- सुन्दर और स्पष्ट लेख मुद्रण के लिए भी उपयोगी माना जाता है।
- सुलेख के प्रति विद्यार्थियों को नियमित रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए।
सुलेख लिखते समय सावधानियाँ
लेख को सुन्दर और स्पष्ट बनाने के लिए शिक्षक को विद्यार्थियों को निम्न सावधानियों का अभ्यास कराना चाहिए—
1. उचित आसन
विद्यार्थी का बैठने का ढंग सही होना चाहिए। कुर्सी इतनी ऊँची हो कि बैठने पर उसके पैर भूमि पर सीधे रहें और घुटनों का कोण लगभग 90° बने। रीढ़ की हड्डी सीधी रहनी चाहिए।
कॉपी और आँखों के बीच लगभग एक फुट की दूरी रखनी चाहिए।
2. लेखनी पकड़ने का सही तरीका
लेखनी अँगूठे और मध्य अँगुली के बीच रखी जानी चाहिए तथा तर्जनी अँगुली लेखनी के ऊपर रहे। पुस्तक के अनुसार लेखनी को लगभग 54° के कोण पर पकड़ना चाहिए।
3. उचित लेखन-सामग्री
स्पष्ट और सुडौल लेखन के लिए उचित लेखन-सामग्री आवश्यक है। प्रारम्भिक स्तर पर विद्यार्थियों को पेंसिल से लिखना सिखाना चाहिए और बाद में पेन का प्रयोग कराया जा सकता है।
4. उपयुक्त समयावधि
प्राथमिक स्तर पर लेखन-अभ्यास की अवधि बहुत लम्बी नहीं होनी चाहिए। बालक से उसी समय लेखन कार्य कराना चाहिए जब वह स्वेच्छा से लिखने के लिए तैयार हो।
5. सरल से कठिन की ओर
प्रारम्भ में विद्यार्थियों से वर्ण बड़े आकार में लिखवाने चाहिए। बाद में धीरे-धीरे उनका आकार छोटा किया जाए।
इसके बाद पहले सरल शब्द और फिर क्रमशः कठिन शब्द लिखवाने चाहिए। इससे विद्यार्थियों में लेखन के प्रति सरलता और आत्मविश्वास विकसित होता है।
- सुलेख का अर्थ सुन्दर लेख है।
- सुलेख से सुन्दर लिखावट, शुद्ध वर्तनी, पाठ की पुनरावृत्ति और अर्थबोध का विकास होता है।
- सुन्दर लेख में उचित अनुपात, सीधी शिरोरेखा, उचित दूरी, अनुच्छेद, हाशिया तथा उचित गति आवश्यक हैं।
- सुलेख का उद्देश्य आकर्षक लेखन, इन्द्रियों का प्रशिक्षण, सौन्दर्यानुभूति तथा मस्तिष्क, हृदय और हाथ का समुचित विकास करना है।
- सुलेख लिखते समय सही आसन, आँखों से उचित दूरी, लेखनी पकड़ने की सही विधि और उचित लेखन-सामग्री का ध्यान रखना चाहिए।
- लेखन-अभ्यास बड़े अक्षरों और सरल शब्दों से प्रारम्भ करके धीरे-धीरे छोटे अक्षरों और कठिन शब्दों की ओर बढ़ाना चाहिए।
अनुलेख
अनुलेख का अर्थ
अनुलेख का अर्थ है किसी दिए गए सुन्दर एवं शुद्ध लेख को देखकर उसी के अनुसार लिखने का अभ्यास करना। इसका प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों में साफ, सुडौल, शुद्ध और व्यवस्थित लिखावट का विकास करना है।
अनुलेख का अभ्यास सामान्यतः तब कराया जाता है जब बालक अक्षरों की मूल आकृति से परिचित हो चुका हो और उन्हें देखकर लिखने में सक्षम हो।
अनुलेख का अभ्यास कैसे कराया जाता है?
प्रारम्भिक अवस्था में सुलेख-अभ्यास पुस्तिकाओं की सहायता ली जा सकती है। ऐसी पुस्तिकाओं में प्रायः पहली पंक्ति में बड़े, स्पष्ट और सुडौल अक्षरों अथवा वाक्यों का नमूना दिया रहता है। उसके बाद की दो-तीन पंक्तियों में हल्की या बिन्दुयुक्त रेखाओं द्वारा वही अक्षर दिए जाते हैं तथा शेष स्थान विद्यार्थी के स्वतंत्र अभ्यास के लिए छोड़ा जाता है।
बालक पहले हल्के लिखे अक्षरों पर पेंसिल चलाकर उनकी आकृति बनाने का अभ्यास करता है। इसके बाद वह शेष स्थान पर उसी नमूने को देखकर स्वयं लिखता है। इस प्रकार लगातार अभ्यास से उसकी लिखावट में स्पष्टता, सुन्दरता और स्थिरता आती है।
अनुलेख के आगे का अभ्यास
सुलेख पुस्तिकाओं में पर्याप्त अभ्यास हो जाने के बाद विद्यार्थियों को पुस्तक, पत्र-पत्रिका आदि में लिखे शुद्ध लेख का अनुकरण करते हुए अपनी कॉपी में लिखने का अभ्यास कराया जाना चाहिए।
इस चरण में शिक्षक को केवल अक्षरों की बनावट पर ही नहीं, बल्कि वर्तनी की शुद्धता और विराम चिह्नों के सही प्रयोग पर भी ध्यान दिलाना चाहिए।
यदि लिपि-अभ्यास पुस्तिकाएँ उपलब्ध न हों, तो शिक्षक तख्ती, स्लेट या श्यामपट्ट पर सुन्दर अक्षर और शब्द लिख सकता है। विद्यार्थी उन्हें देखकर उसी प्रकार लिखने का अभ्यास कर सकते हैं।
अनुलेख अभ्यास में ध्यान देने योग्य बातें
- लेखन-सामग्री जैसे तख्ती, स्लेट, पेंसिल, चौक आदि का निरीक्षण किया जाए, ताकि लेखन साफ और सुडौल हो सके।
- विद्यार्थियों को अक्षर सीधे, सुन्दर और उचित अनुपात में लिखने का अभ्यास कराया जाए।
- दो शब्दों के बीच लगभग एक वर्ण जितनी दूरी रखी जाए। दो वाक्यों के बीच एक शब्द तथा दो पंक्तियों के बीच लगभग एक पंक्ति का उचित अन्तर रखा जाए।
- हिन्दी लिखते समय शब्दों के ऊपर शिरोरेखा सही और सीधी खींचने का अभ्यास कराया जाए।
- विद्यार्थियों के सामने अच्छे अनुलेख के नमूने प्रस्तुत किए जाएँ, ताकि वे अपनी लिखावट सुधारने के लिए प्रेरित हों।
- अनुलेख प्रतियोगिताएँ कराई जा सकती हैं और अच्छे लेखन वाले विद्यार्थियों को प्रोत्साहित या पुरस्कृत किया जा सकता है।
- अभ्यास के बाद विद्यार्थियों का ध्यान उनकी अशुद्धियों और कमियों की ओर आकर्षित किया जाए, ताकि वे अगली बार उन्हें सुधार सकें।
अनुलेख में शिक्षक की भूमिका
शिक्षक को स्वयं आदर्श और शुद्ध लेखन प्रस्तुत करना चाहिए। अनुलेख के लिए दिए जाने वाले वाक्य स्पष्ट, सरल और उपयुक्त होने चाहिए। पुस्तक में यह भी कहा गया है कि ऐसे सत्य एवं आदर्श वाक्यों का प्रयोग किया जा सकता है जिन्हें बार-बार लिखने से विद्यार्थियों के लेखन के साथ उनके नैतिक विकास में भी सहायता मिले।
- अनुलेख में विद्यार्थी दिए गए शुद्ध और सुन्दर लेख को देखकर उसी के अनुसार लिखता है।
- प्रारम्भिक अभ्यास सुलेख पुस्तिकाओं की हल्की या बिन्दुयुक्त पंक्तियों से कराया जा सकता है।
- बाद में पुस्तक और पत्र-पत्रिकाओं के लेख का अनुकरण करके लिखने का अभ्यास कराया जाता है।
- अनुलेख में अक्षरों की सुडौलता, उचित अनुपात, दूरी, शिरोरेखा, शुद्ध वर्तनी और विराम चिह्नों पर ध्यान देना चाहिए।
- अच्छे नमूने, नियमित अभ्यास और शिक्षक के प्रोत्साहन से विद्यार्थियों की लिखावट में सुधार होता है।
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श्रुतलेख—अर्थ, महत्त्व, लाभ, हानि एवं सुधार
श्रुतलेख का अर्थ
श्रुतलेख का अर्थ है—सुनकर लिखना। इसमें अध्यापक किसी गद्यांश, अनुच्छेद, कविता या अन्य उपयुक्त सामग्री को बोलता है और विद्यार्थी उसे सुनकर अपनी कॉपी में लिखते हैं।
श्रुतलेख का अभ्यास तब प्रारम्भ करना चाहिए जब बालक अनुलेख तथा प्रतिलेख में पर्याप्त कुशलता प्राप्त कर ले। पुस्तक के अनुसार इसका अभ्यास सामान्यतः तीसरी कक्षा से प्रारम्भ किया जा सकता है।
आधुनिक समय में श्रुतलेख के लिए ग्रामोफोन, टेपरिकॉर्डर या कम्प्यूटर आदि साधनों का भी प्रयोग किया जा सकता है। रिकॉर्ड की गई शुद्ध आवाज सुनाकर विद्यार्थियों से लिखवाया जा सकता है।
श्रुतलेख की विशेषता
श्रुतलेख में विद्यार्थी को सुनने और लिखने का कार्य एक साथ करना पड़ता है। इससे कान, आँख और हाथ जैसी अनेक इन्द्रियाँ सक्रिय रहती हैं। विद्यार्थी अध्यापक के बोलने की गति के साथ लिखने का अभ्यास करता है, जिससे उसकी लेखन-गति और श्रवण-क्षमता दोनों विकसित होती हैं।
श्रुतलेख द्वारा वर्तनी, विराम चिह्न तथा शब्दों के शुद्ध लेखन का अभ्यास भी होता है। यदि विद्यार्थी बोले गए शब्दों का अर्थ समझता है तो उसकी बोध-शक्ति का भी विकास होता है।
श्रुतलेख के लिए सामग्री का चयन करते समय ध्यान देने योग्य बातें
- सामग्री का चयन विद्यार्थियों की रुचि-अभिरुचि, भाषा-ज्ञान के स्तर और सामान्य ज्ञान के अनुसार होना चाहिए।
- विद्यार्थियों को उचित दूरी पर तथा सही आसन में बैठाया जाए, ताकि वे स्पष्ट रूप से सुन और लिख सकें।
- गद्यांश, अनुच्छेद, कहानी या कविता का केंद्रीय भाव श्रुतलेख प्रारम्भ करने से पहले विद्यार्थियों को बता देना चाहिए। इससे वे सामग्री को समझकर अधिक शुद्धता से लिख सकेंगे।
- अध्यापक को अपेक्षाकृत मंद और स्पष्ट गति से बोलना चाहिए। सामान्यतः शब्द या वाक्य को बार-बार दोहराने से बचना चाहिए; विशेष आवश्यकता होने पर ही दोहराया जाए।
- बोलने की गति विद्यार्थियों के स्तर के अनुकूल हो तथा विराम चिह्नों का ध्यान रखते हुए शुद्ध उच्चारण और उचित स्वराघात के साथ बोला जाए।
- अध्यापक की वाणी स्पष्ट, स्वर पर्याप्त ऊँचा और उच्चारण शुद्ध होना चाहिए।
- श्रुतलेख पूरा होने के बाद अध्यापक उसे पुनः एक बार पढ़े, परन्तु दूसरी बार गति पहले से कुछ अधिक रखी जा सकती है।
- चुने गए शब्दों की रचना तथा उच्चारण यथासम्भव समान और स्पष्ट हों।
- श्रुतलेख का मूल्यांकन करने के बाद हुई अशुद्धियों को ठीक करवाकर विद्यार्थियों से उनका पुनः अभ्यास कराया जाए।
- विद्यार्थियों की त्रुटियों के आधार पर आगामी श्रुतलेख-अभ्यास की योजना बनाई जाए।
श्रुतलेख का महत्त्व एवं लाभ
भाषा-शिक्षण में श्रुतलेख का विशेष महत्त्व है। इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं—
- विद्यार्थियों को सुनकर भाषा समझने और उसे लिखने का अवसर मिलता है।
- लेखन की गति में वृद्धि होती है।
- सावधानीपूर्वक सुनने की आदत विकसित होती है।
- अक्षर-विन्यास और वर्तनी का अभ्यास होता है।
- बोध-शक्ति का विकास होता है।
- विराम चिह्नों का सही प्रयोग सीखने में सहायता मिलती है।
- लेखन में सुन्दरता, स्पष्टता और शुद्धता का अभ्यास होता है।
श्रुतलेख से होने वाली हानियाँ
श्रुतलेख उपयोगी होने के साथ कुछ कठिनाइयाँ भी उत्पन्न कर सकता है, विशेषकर तब जब इसका संचालन ठीक प्रकार से न किया जाए।
- तेज गति से लिखते समय कुछ शब्द छूट सकते हैं।
- विद्यार्थी विराम चिह्नों की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते।
- वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ बढ़ सकती हैं।
- लेखन आकर्षक और सुन्दर नहीं रह पाता।
- वाक्यों का क्रम बिगड़ने की सम्भावना रहती है।
श्रुतलेख के दोषों को दूर करने के उपाय
- श्रुतलेख के लिए चुना गया गद्यांश न बहुत कठिन हो और न अत्यधिक सरल; वह विद्यार्थियों के मानसिक स्तर के अनुकूल होना चाहिए।
- लिखते समय विद्यार्थियों का आसन सही हो और वे झुककर न लिखें।
- लेखनी पकड़ने का ढंग सही होना चाहिए।
- शिक्षक विद्यार्थियों की कॉपी, पेन तथा स्याही आदि लेखन-सामग्री का निरीक्षण करे।
- शिक्षक का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए।
- शिक्षक की बोलने की गति ऐसी हो जिससे अर्द्धविराम, पूर्णविराम आदि का बोध स्पष्ट हो सके।
- उचित समय पर श्रुतलेख की जाँच की जानी चाहिए।
- विद्यार्थियों की गलतियाँ स्पष्ट और व्यक्तिगत रूप से बताकर उनका संशोधन कराया जाए।
अनुलेख एवं श्रुतलेख में अन्तर
| अनुलेख | श्रुतलेख |
|---|---|
| अनुलेख का अर्थ है देखकर या अनुकरण करके लिखना। | श्रुतलेख का अर्थ है सुनकर लिखना। |
| बालक दिए गए लेख को देखकर अक्षरों और शब्दों की नकल करता है। | बालक अध्यापक द्वारा बोले गए शब्दों और वाक्यों को सुनकर लिखता है। |
| अनुलेख प्रारम्भिक स्तर से कराया जा सकता है। | श्रुतलेख का अभ्यास अनुलेख तथा प्रतिलेख में कुशलता प्राप्त करने के बाद कराया जाता है। |
| इससे अक्षरों को सुडौल और उचित अनुपात में लिखने का अभ्यास होता है। | इससे लेखन की गति, श्रवण-क्षमता, वर्तनी और विराम चिह्नों का अभ्यास होता है। |
- श्रुतलेख का अर्थ सुनकर लिखना है।
- इसका अभ्यास अनुलेख और प्रतिलेख में कुशलता प्राप्त करने के बाद कराया जाना चाहिए।
- श्रुतलेख से श्रवण-क्षमता, लेखन-गति, वर्तनी, अक्षर-विन्यास और बोध-शक्ति का विकास होता है।
- सामग्री विद्यार्थियों के स्तर के अनुसार हो तथा शिक्षक का उच्चारण स्पष्ट और गति उपयुक्त होनी चाहिए।
- तेज गति, गलत उच्चारण या अनुचित संचालन से शब्द छूटना, वर्तनी की अशुद्धियाँ और लेखन की असुन्दरता जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
- अनुलेख में देखकर लिखा जाता है, जबकि श्रुतलेख में सुनकर लिखा जाता है।
लिखना सिखाने का अभ्यास
लिखना सिखाने का अभ्यास
भाषा के प्रमुख कौशलों में लेखन अपेक्षाकृत कठिन कौशल है, क्योंकि लिखते समय हाथ की मांसपेशियों और उँगलियों के उचित समन्वय की आवश्यकता होती है। इसलिए बालक को सीधे अक्षर लिखवाने के स्थान पर पहले उसकी मांसपेशियों को लेखन के लिए तैयार करना चाहिए।
बालकों को अक्षरों की आकृति का ध्यानपूर्वक निरीक्षण कराकर धीरे-धीरे उन्हें लिखने का प्रयास कराया जाना चाहिए। प्रत्येक बालक की विकास-गति अलग होती है, इसलिए लेखन की शुरुआत केवल आयु के आधार पर न करके उसकी तैयारी और क्षमता के अनुसार करनी चाहिए।
1. रेखांकन का अभ्यास
लेखन की प्रारम्भिक अवस्था में बच्चों को अक्षर लिखाने से पहले विभिन्न प्रकार की रेखाएँ खींचने का अभ्यास कराया जाता है। सबसे पहले सीधी रेखाएँ, फिर तिरछी रेखाएँ और उसके बाद वृत्त तथा अर्द्धवृत्त जैसी आकृतियाँ बनवाई जाती हैं।
इन मूल आकृतियों का पर्याप्त अभ्यास हो जाने पर बालक उनसे मिलती-जुलती वर्ण-आकृतियाँ आसानी से बनाना सीखता है। इस प्रकार रेखांकन अक्षर-लेखन की आधारभूत तैयारी का कार्य करता है।
2. लेखन क्रिया में अन्य उपकरणों का प्रयोग
आड़ी-तिरछी रेखाओं के अभ्यास के अतिरिक्त विभिन्न वस्तुओं और उपकरणों की सहायता से भी बालकों को अक्षरों की आकृति से परिचित कराया जा सकता है।
- रेशमी कपड़े या रंगीन कागज पर काटे हुए अक्षर।
- अक्षरों के आकार में काटे गए लकड़ी के टुकड़े।
- धातु आदि पर खुदे हुए अक्षर।
- धरती या अन्य सतह पर खुदी हुई अक्षर-आकृतियाँ।
- छोटे श्यामपट्ट तथा वर्गों में विभाजित स्लेट।
बालक इन आकृतियों को देखकर और स्पर्श करके अक्षरों के आकार को पहचानता है। इससे लेखन से पहले अक्षर की मानसिक छवि बनने में सहायता मिलती है।
3. सुडौलता का अभ्यास
लेखन-अभ्यास के प्रारम्भ में गति की अपेक्षा अक्षरों की शुद्धता और सुडौलता पर अधिक ध्यान देना चाहिए। बालक जो भी लिखे, उसे सही आकार और स्पष्ट रूप में लिखने का अभ्यास कराया जाए।
जब सुन्दर और सही लिखने की आदत विकसित हो जाती है, तब अभ्यास के साथ लेखन की गति स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगती है।
4. लेखन चक्र
लेखन-अभ्यास बहुत अधिक समय तक लगातार नहीं कराया जाना चाहिए, क्योंकि इससे बालक थक सकता है और उसकी लिखावट प्रभावित हो सकती है।
लेखन सिखाने का एक निश्चित क्रम होना चाहिए। यह क्रम वर्णमाला के सामान्य क्रम से अलग भी हो सकता है और अक्षरों की बनावट तथा कठिनाई को ध्यान में रखकर निर्धारित किया जा सकता है।
5. सही अक्षर का चुनाव
लेखन प्रारम्भ कराते समय ऐसा अक्षर चुना जाना चाहिए जिसे बालक थोड़े प्रयास से सही लिख सके। एक अक्षर का अभ्यास हो जाने के बाद उससे मिलती-जुलती आकृति वाले अन्य अक्षरों की ओर बढ़ना चाहिए।
इस प्रकार एक ही प्रकार की आकृतियों के आधार पर क्रमशः कई वर्णों का अभ्यास कराया जा सकता है।
6. अक्षरों का आकार और अन्तर
बालकों को प्रारम्भ से ही बहुत छोटे अक्षर लिखने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। पहले अपेक्षाकृत बड़े अक्षर लिखवाने चाहिए और उनके बीच पर्याप्त दूरी रखनी चाहिए।
अभ्यास बढ़ने पर धीरे-धीरे अक्षरों का आकार छोटा किया जा सकता है। अक्षरों और शब्दों के बीच उचित अन्तर रखने से लिखावट स्पष्ट और पठनीय बनती है।
7. पढ़ने की क्षमता का उपयोग
वही बालक अच्छा लिख सकता है जिसे पढ़ने का पर्याप्त अभ्यास हो। इसलिए लेखन-अभ्यास का सम्बन्ध ऐसी सामग्री से होना चाहिए जिसे विद्यार्थी पहले पढ़ चुका हो या जिसके विषय में उससे बातचीत की जा चुकी हो।
पढ़ी और समझी हुई सामग्री से लेखन का अभ्यास कराने पर बालक शब्दों और अक्षरों को अधिक आसानी से पहचानता है तथा लिखने में कम कठिनाई अनुभव करता है।
- लेखन से पहले बालक की उँगलियों और हाथ की मांसपेशियों को अभ्यास द्वारा तैयार करना चाहिए।
- लेखन की शुरुआत सीधी, तिरछी, वृत्ताकार और अर्द्धवृत्ताकार रेखाओं के अभ्यास से की जा सकती है।
- विभिन्न अक्षर-आकृतियों और उपकरणों के प्रयोग से अक्षरों का स्वरूप समझाया जा सकता है।
- प्रारम्भ में लेखन-गति की अपेक्षा शुद्धता और सुडौलता पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
- पहले सरल और बड़े अक्षर लिखवाकर धीरे-धीरे समान आकृति वाले अन्य तथा छोटे अक्षरों की ओर बढ़ना चाहिए।
- लेखन का अभ्यास ऐसी सामग्री से कराना अधिक उपयोगी है जिसे विद्यार्थी पहले पढ़ और समझ चुका हो।
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सुन्दर लेख के गुण एवं सुन्दर लेखन के नियम
सुन्दर लेख का अर्थ
शुद्ध वर्तनी के साथ साफ, सुन्दर, स्पष्ट और उचित गति से लिखा गया लेख सुन्दर लेख माना जाता है। केवल अक्षरों का सही होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके आकार, अनुपात, दूरी, शिरोरेखा, मात्राओं और प्रस्तुति का भी ध्यान रखना आवश्यक है।
सुन्दर लेख के प्रमुख गुण / विशेषताएँ
1. वर्णों का उचित अनुपात
यदि किसी शब्द में कोई वर्ण बहुत बड़ा और कोई बहुत छोटा हो, तो उसकी सुन्दरता कम हो जाती है। इसलिए वर्णों का आकार एक-दूसरे के अनुरूप और समान अनुपात में होना चाहिए।
2. पाई का सही निर्माण
देवनागरी लिपि के अनेक वर्णों में पाई का विशेष स्थान है। पाई को सही स्थान पर तथा उचित आकार में लिखना चाहिए। उसका टेढ़ा-मेढ़ा या असमान होना लेख की सुन्दरता को प्रभावित करता है।
3. शिरोरेखा
वर्ण या अक्षर के ऊपर खींची जाने वाली रेखा को शिरोरेखा कहते हैं। शिरोरेखा सीधी होनी चाहिए और शब्द के प्रारम्भ से अन्त तक उचित रूप से जुड़ी रहनी चाहिए।
4. मात्राओं का शुद्ध प्रयोग
मात्राओं का सही स्थान पर प्रयोग आवश्यक है। मात्रा गलत स्थान पर लगाने से शब्द की सुन्दरता और शुद्धता दोनों प्रभावित होती हैं।
कुछ मात्राएँ वर्ण के अन्त, कुछ मध्य, कुछ नीचे तथा कुछ ऊपर लगती हैं। इसलिए विद्यार्थी को प्रत्येक मात्रा के सही स्थान का अभ्यास होना चाहिए।
5. उचित दूरी
सुन्दर लेख में वर्णों, शब्दों, वाक्यों और पंक्तियों के बीच उचित दूरी रखी जानी चाहिए।
- वर्णों के बीच लगभग एक पाई की दूरी हो।
- वर्ण और मात्रा के बीच भी लगभग एक पाई की दूरी रखी जाए।
- दो शब्दों के बीच लगभग दो पाई के बराबर दूरी हो।
- वाक्यों के बीच विराम चिह्न के बाद उचित अन्तर रखा जाए।
- पंक्तियों के बीच इतना अन्तर हो कि ऊपर और नीचे की मात्राएँ आपस में न मिलें।
6. अनुच्छेद विभाजन
विषय-वस्तु को छोटे-छोटे अनुच्छेदों में बाँटना चाहिए। पुस्तक के अनुसार नए अनुच्छेद की शुरुआत करते समय लगभग 10–12 पाई का स्थान छोड़ना चाहिए।
7. उचित हाशिया
कागज के चारों ओर उचित हाशिया छोड़ने से लेख अधिक व्यवस्थित और सुन्दर दिखाई देता है।
8. उचित गति
लिखावट में उचित प्रवाह और गति होनी चाहिए। गति इतनी तेज न हो कि अक्षर बिगड़ जाएँ और इतनी धीमी भी न हो कि लेखन अनावश्यक रूप से रुक-रुक कर हो।
सुन्दर लेखन के नियम
1. उचित आसन
लेखन करते समय बैठने का ढंग सही होना चाहिए। रीढ़ की हड्डी सीधी रहे और विद्यार्थी झुककर न लिखे। आँखों और कागज के बीच लगभग 25 सेमी. की दूरी रखी जानी चाहिए।
बाएँ हाथ से कागज को स्थिर रखा जाए और दूसरे हाथ से लेखनी पकड़ी जाए।
2. उपयुक्त लेखन-सामग्री
स्लेट, कागज, पेंसिल या पेन की स्थिति अच्छी होनी चाहिए। खराब या टेढ़ी-मेढ़ी लेखन-सामग्री लिखावट को प्रभावित करती है।
कागज के नीचे कठोर आधार होना चाहिए ताकि लिखते समय वह हिले नहीं।
3. लेखनी पकड़ने की सही विधि
लेखनी को अँगूठे और तर्जनी के सहयोग से उचित प्रकार से पकड़ना चाहिए। पुस्तक में लेखनी का अग्रभाग उँगलियों से लगभग 3–4 सेमी. आगे रखने तथा लेखनी को लगभग 60° के कोण पर रखने की बात कही गई है।
लेखनी को बहुत आगे या बहुत पीछे पकड़ने से थकान होती है और लिखावट पर भी प्रभाव पड़ता है।
4. वर्णों की बनावट
प्रत्येक वर्ण को उसकी सही आकृति में लिखना चाहिए। अक्षरों की सुन्दर बनावट किसी भी लेख को साफ, सुपाठ्य और आकर्षक बनाती है।
5. लेखन के समय प्रसन्नचित्त रहना
लेखन के समय मन की स्थिति का भी प्रभाव पड़ता है। यदि लेखक प्रसन्न और एकाग्र है तो लेख अधिक सुन्दर बनता है, जबकि क्रोध, भय या आवेश जैसी स्थिति लिखावट को प्रभावित कर सकती है।
- सुन्दर लेख में वर्णों का अनुपात, पाई, शिरोरेखा और मात्राओं का सही प्रयोग आवश्यक है।
- वर्णों, शब्दों, वाक्यों और पंक्तियों के बीच उचित दूरी लेख को स्पष्ट और आकर्षक बनाती है।
- अनुच्छेद विभाजन, हाशिया और उचित गति भी सुन्दर लेख के महत्त्वपूर्ण गुण हैं।
- सुन्दर लेखन के लिए सही आसन, उचित लेखन-सामग्री और लेखनी पकड़ने की सही विधि आवश्यक है।
- प्रत्येक वर्ण को उसकी सही आकृति में लिखना चाहिए।
- लेखन के समय प्रसन्न और एकाग्र मन लेख की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
लिखना सिखाने की पद्धतियों का विकास
लिखना सिखाने की पद्धतियों का विकास
लेखन-शिक्षण को सरल, रुचिकर और प्रभावी बनाने के लिए समय-समय पर विभिन्न पद्धतियों का विकास हुआ। पुस्तक में लिखना सिखाने की तीन प्रमुख पद्धतियाँ बताई गई हैं—
- वर्ण परिचय
- शब्द द्वारा अक्षर परिचय
- वाक्य द्वारा अक्षर परिचय
1. वर्ण परिचय
यह लेखन सिखाने की परम्परागत पद्धति है। इसमें बालक को पहले वर्णमाला के अक्षर एक निश्चित क्रम में सिखाए जाते हैं। अक्षरों को पहचानने और लिखने का अभ्यास हो जाने के बाद उन्हें मात्राओं का ज्ञान कराया जाता है।
इस प्रकार इस पद्धति में सीखने का क्रम सामान्यतः वर्णों से प्रारम्भ होकर आगे शब्द-निर्माण की ओर बढ़ता है।
2. शब्द द्वारा अक्षर परिचय
सामान्य रूप से केवल अलग-अलग अक्षर सीखने में बालक की रुचि कम हो सकती है, क्योंकि ऐसे अक्षर उसके लिए तत्काल कोई अर्थ प्रस्तुत नहीं करते। इसलिए कुछ शिक्षाशास्त्रियों ने अक्षरों का परिचय सार्थक शब्दों के माध्यम से कराने पर बल दिया।
इस पद्धति में पहले बालक को परिचित और अर्थपूर्ण शब्द दिए जाते हैं और उन्हीं शब्दों के भीतर उपस्थित अक्षरों से उसका परिचय कराया जाता है।
पुस्तक के अनुसार शब्दों को किसी वस्तु या चित्र के साथ प्रस्तुत करना अधिक उपयोगी माना गया है। इससे बालक शब्द, वस्तु और अक्षर के बीच सम्बन्ध स्थापित कर पाता है।
3. वाक्य द्वारा अक्षर परिचय
बालकों की रुचि की दृष्टि से केवल शब्दों की अपेक्षा वाक्य अधिक सार्थक और उपयोगी हो सकते हैं। इसलिए इस पद्धति में अक्षरों का परिचय पूर्ण वाक्यों के माध्यम से कराया जाता है।
बालक पहले अर्थपूर्ण वाक्य को समझता है, फिर उसमें प्रयुक्त शब्दों और अन्ततः अक्षरों की पहचान करता है। पुस्तक में इस पद्धति को पढ़ने की दृष्टि से उपयोगी बताया गया है।
तीनों पद्धतियों का क्रम
इन पद्धतियों में लेखन-शिक्षण की दिशा अलग-अलग होती है। वर्ण परिचय में सीखना छोटे घटक अर्थात् अक्षर से प्रारम्भ होता है, जबकि शब्द और वाक्य आधारित पद्धतियों में बालक को पहले सार्थक भाषा-इकाई से परिचित कराया जाता है।
- वर्ण परिचय — वर्ण → मात्रा → शब्द
- शब्द द्वारा अक्षर परिचय — शब्द → अक्षर
- वाक्य द्वारा अक्षर परिचय — वाक्य → शब्द → अक्षर
- लिखना सिखाने की तीन प्रमुख पद्धतियाँ हैं—वर्ण परिचय, शब्द द्वारा अक्षर परिचय और वाक्य द्वारा अक्षर परिचय।
- वर्ण परिचय पद्धति में पहले अक्षर और बाद में मात्राएँ सिखाई जाती हैं।
- शब्द द्वारा अक्षर परिचय में सार्थक शब्दों के माध्यम से अक्षरों का ज्ञान कराया जाता है।
- शब्दों को वस्तु या चित्र के साथ प्रस्तुत करने से अक्षर-ज्ञान अधिक अर्थपूर्ण बनता है।
- वाक्य द्वारा अक्षर परिचय में पहले वाक्य, फिर शब्द और अन्त में अक्षरों की पहचान कराई जाती है।
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वर्तनी—अर्थ, महत्त्व, अशुद्धियाँ, कारण एवं सुधार
वर्तनी का अर्थ
वर्तनी का अर्थ केवल अक्षरों को सुन्दर लिखना नहीं है, बल्कि वर्णों को शुद्ध रूप में और सही क्रम में लिखना है। भाषा का शुद्ध लिखित रूप वर्तनी पर निर्भर करता है, इसलिए भाषा-शिक्षण में इसका विशेष महत्त्व है।
शुद्ध वर्तनी से आशय मानक वर्तनी से है। क्षेत्रीय स्तर पर अनेक शब्द अलग-अलग रूपों में लिखे या बोले जा सकते हैं, परन्तु भाषा की दृष्टि से सर्वमान्य और मानक रूप को ही शुद्ध वर्तनी माना जाता है।
शुद्ध वर्तनी की आवश्यकता एवं महत्त्व
- भाषा-शिक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति शुद्ध वर्तनी के माध्यम से ही सम्भव होती है।
- अन्य विषयों के अध्ययन के लिए भी शब्दों का शुद्ध ज्ञान आवश्यक है।
- भावों और विचारों की अभिव्यक्ति तथा सम्प्रेषण में वर्तनी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
- भाषा की शुद्धता वर्तनी पर आधारित होती है, क्योंकि भाषा को लिखित रूप में सही ढंग से प्रस्तुत करने के लिए शब्दों का शुद्ध लेखन आवश्यक है।
- हिन्दी रचनाओं को सही और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए भी शुद्ध वर्तनी आवश्यक है।
वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियों के प्रकार
विद्यार्थियों के लेखन में वर्तनी की अशुद्धियाँ कई रूपों में दिखाई देती हैं। पुस्तक में इनके प्रमुख प्रकार निम्नलिखित दिए गए हैं—
1. सामान्य लिपि सम्बन्धी अशुद्धियाँ
जब विद्यार्थी समान या मिलते-जुलते वर्णों को एक-दूसरे के स्थान पर लिख देते हैं, तब इस प्रकार की अशुद्धि होती है। इसमें वर्णों के रूप और ध्वनि की सही पहचान न होना मुख्य कारण होता है।
2. पंचम वर्ण सम्बन्धी अशुद्धियाँ
वर्ण-वर्गों के अनुसार उचित पंचम वर्ण के स्थान पर दूसरे वर्ण या अनुस्वार का अनुचित प्रयोग करने से ऐसी अशुद्धियाँ उत्पन्न होती हैं।
3. अनुस्वार सम्बन्धी अशुद्धियाँ
अनुस्वार को गलत वर्ण पर लगाना या उसके स्थान का सही ज्ञान न होना वर्तनी की सामान्य त्रुटि है।
4. अक्षरों या वर्णों की अशुद्धियाँ
किसी शब्द में एक वर्ण के स्थान पर दूसरा वर्ण लिख देना, आवश्यक वर्ण छोड़ देना या शब्द की मूल वर्ण-रचना बदल देना इस प्रकार की अशुद्धि है।
5. मात्राओं की अशुद्धियाँ
ह्रस्व-दीर्घ मात्राओं का अनुचित प्रयोग, मात्रा को गलत वर्ण पर लगाना या आवश्यक मात्रा छोड़ देना शब्द की वर्तनी को अशुद्ध कर देता है।
6. लिंग तथा वचन सम्बन्धी अशुद्धियाँ
लिंग और वचन का पर्याप्त ज्ञान न होने पर विद्यार्थी शब्दों के रूपों में गलत परिवर्तन कर देते हैं। इससे वाक्य और शब्द दोनों अशुद्ध हो सकते हैं।
7. सन्धि एवं समास सम्बन्धी अशुद्धियाँ
सन्धि और समास के नियमों का सही ज्ञान न होने पर शब्दों के मेल और उनके लिखित रूप में त्रुटियाँ हो जाती हैं।
8. प्रत्यय या उपसर्ग सम्बन्धी अशुद्धियाँ
उपसर्ग अथवा प्रत्यय को मूल शब्द के साथ गलत ढंग से जोड़ने पर शब्द की वर्तनी अशुद्ध हो जाती है।
9. संयुक्त व्यंजनों की ध्वनियों के कारण अशुद्धियाँ
संयुक्त व्यंजनों के उच्चारण और लेखन का सही ज्ञान न होने पर विद्यार्थी स्वर-रहित व्यंजनों या संयुक्त रूपों को गलत लिख देते हैं।
10. संयुक्त व्यंजन वाले शब्दों की अशुद्धियाँ
संयुक्त व्यंजन वाले शब्दों के उच्चारण में कठिनाई होने के कारण विद्यार्थी उनकी ध्वनियों के अनुसार गलत वर्तनी लिख सकते हैं।
11. अक्षरागम सम्बन्धी अशुद्धियाँ
जब शब्द में अनावश्यक रूप से कोई अतिरिक्त अक्षर जोड़ दिया जाता है, तो इसे अक्षरागम सम्बन्धी अशुद्धि माना जाता है।
वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियों के कारण
1. असावधानी
शीघ्रता या लापरवाही से लिखने पर ऐसी अशुद्धियाँ हो जाती हैं जिन्हें विद्यार्थी सामान्य सावधानी से रोक सकता है।
2. अशुद्ध उच्चारण
हिन्दी में प्रायः जिस प्रकार शब्द बोला जाता है, उसी के आधार पर बालक उसे लिखने का प्रयास करता है। यदि उसका उच्चारण अशुद्ध है, तो वर्तनी भी अशुद्ध होने की सम्भावना रहती है।
3. लिपि की अपूर्ण जानकारी
मात्राओं, श, स, ष, अनुस्वार आदि लिपि-चिह्नों का पूरा ज्ञान न होने पर विद्यार्थी उनके प्रयोग में गलतियाँ करते हैं।
4. प्रान्तीय भाषा का प्रभाव
क्षेत्रीय या प्रान्तीय भाषा के उच्चारण और शब्द-प्रयोग का प्रभाव मानक हिन्दी लेखन पर पड़ सकता है। इससे विद्यार्थी बोले जाने वाले स्थानीय रूप के आधार पर शब्द लिख देते हैं।
5. अनुनासिक और अनुस्वार का अपर्याप्त ज्ञान
अनुनासिक और अनुस्वार के अन्तर तथा उनके प्रयोग का स्पष्ट ज्ञान न होने से विद्यार्थी एक के स्थान पर दूसरे का प्रयोग कर देते हैं।
6. चन्द्रबिन्दु तथा अनुस्वार में भ्रम
चन्द्रबिन्दु और अनुस्वार का प्रयोग कहाँ करना है, इसका सही ज्ञान न होने पर वर्तनी सम्बन्धी त्रुटियाँ होती हैं।
7. उर्दू तथा अन्य भाषाओं का प्रभाव
हिन्दी पर अन्य भाषाओं के उच्चारण और शब्द-रूपों का प्रभाव पड़ने से विद्यार्थी कई बार उसी उच्चारण के अनुसार शब्द लिख देते हैं, जिससे मानक हिन्दी वर्तनी प्रभावित होती है।
वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियों को दूर करने के उपाय
1. शुद्ध उच्चारण
विद्यार्थियों को प्रारम्भ से ही शुद्ध उच्चारण की शिक्षा देनी चाहिए। उच्चारण सही होगा तो शब्द को सही रूप में लिखने की सम्भावना भी बढ़ेगी।
2. लिपि सम्बन्धी स्पष्ट ज्ञान
विद्यार्थियों को देवनागरी लिपि और उसके प्रमुख नियमों का स्पष्ट ज्ञान कराया जाना चाहिए। पुस्तक में विशेष रूप से रेफ, ह्रस्व-दीर्घ, स्वर-विहीन व्यंजन, उ-ऊ की मात्राओं तथा योजक चिह्न जैसे प्रयोगों पर ध्यान देने की बात कही गई है।
3. पढ़ने के पर्याप्त अवसर
विद्यार्थियों को अधिक से अधिक शुद्ध सामग्री पढ़ने का अवसर देना चाहिए। निरन्तर पठन से शब्दों के सही रूप उनकी स्मृति में स्थिर होने लगते हैं।
4. शब्दकोश का प्रयोग
यदि किसी शब्द की वर्तनी को लेकर संदेह हो तो विद्यार्थियों को शब्दकोश देखने की आदत डालनी चाहिए। इससे उनका शब्द-भण्डार भी बढ़ता है।
5. लिखित भाषा का संशोधन
विद्यार्थियों के दैनिक लिखित कार्य का शिक्षक द्वारा संशोधन किया जाना चाहिए। गलती का सही रूप समझाने से वही अशुद्धि बार-बार होने की सम्भावना कम होती है।
6. व्याकरण का ज्ञान
लिंग, वचन, वर्ण, प्रत्यय और अन्य व्याकरणिक नियमों का उचित ज्ञान वर्तनी की अनेक अशुद्धियों को दूर करने में सहायक होता है।
7. अनुस्वार, अनुनासिक और चन्द्रबिन्दु का स्पष्ट ज्ञान
इन तीनों के रूप, अन्तर और प्रयोग को स्पष्ट रूप से सिखाना चाहिए, ताकि विद्यार्थी उनमें भ्रम न करें।
8. अनुलेख, प्रतिलेख और श्रुतलेख का अभ्यास
अनुलेख, प्रतिलेख और श्रुतलेख के नियमित अभ्यास से विद्यार्थियों की वर्तनी सुधारी जा सकती है। प्रारम्भ से ही लिखने के साथ सही उच्चारण का भी अभ्यास कराया जाना चाहिए।
9. शब्द-पुस्तिकाएँ
जो शब्द विद्यार्थी बार-बार गलत लिखते हैं, उनकी अलग शब्द-पुस्तिका बनवाई जा सकती है। उन शब्दों का बार-बार अभ्यास कराने से वर्तनी स्थायी रूप से सुधरती है।
10. यांत्रिक अभ्यास
छोटी कक्षाओं में खेल और अभ्यास के माध्यम से वर्तनी सुधारी जा सकती है। जैसे—
- शब्द दिखाकर हटाना और फिर स्मृति से लिखवाना।
- अक्षर-रिक्त शब्द देकर सही अक्षर भरवाना।
- दिए गए अक्षरों से सम्बन्धित शब्द लिखवाना।
- दो समूह बनाकर शुद्ध वर्तनी की प्रतियोगिता कराना।
शुद्ध वर्तनी के कुछ उदाहरण
पुस्तक में अभ्यास के लिए अनेक अशुद्ध और शुद्ध शब्द दिए गए हैं। उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण इस प्रकार हैं—
| अशुद्ध | शुद्ध |
|---|---|
| इतिहासिक | ऐतिहासिक |
| आर्शीवाद | आशीर्वाद |
| कवित्री | कवयित्री |
| अतिथी | अतिथि |
| क्रिडा | क्रीड़ा |
| आकास | आकाश |
| गोश्टी | गोष्ठी |
| मनस्थिती | मनःस्थिति |
| ततकालिक | तात्कालिक |
| बहूव्रीही | बहुव्रीहि |
| अजोध्या | अयोध्या |
| नारायन | नारायण |
| परिनाम | परिणाम |
| पाकिस्तान | पाकिस्तान |
| परिछय | परिचय |
| विकाश | विकास |
| आदर्स | आदर्श |
| रजिस्टर | रजिस्टर |
- वर्णों को शुद्ध रूप और सही क्रम में लिखना वर्तनी कहलाता है।
- शुद्ध वर्तनी से आशय मानक और सर्वमान्य वर्तनी से है।
- वर्तनी की अशुद्धियाँ वर्ण, मात्रा, अनुस्वार, पंचम वर्ण, लिंग-वचन, सन्धि-समास, उपसर्ग-प्रत्यय और संयुक्त व्यंजनों से सम्बन्धित हो सकती हैं।
- अशुद्ध उच्चारण, असावधानी, लिपि का अपूर्ण ज्ञान, क्षेत्रीय भाषाओं का प्रभाव और अनुस्वार-अनुनासिक का भ्रम वर्तनी की प्रमुख त्रुटियों के कारण हैं।
- शुद्ध उच्चारण, नियमित पठन, शब्दकोश, संशोधन, व्याकरण-ज्ञान तथा अनुलेख-श्रुतलेख के अभ्यास से वर्तनी सुधारी जा सकती है।
- बार-बार गलत लिखे जाने वाले शब्दों की शब्द-पुस्तिका बनाकर नियमित अभ्यास कराना विशेष रूप से उपयोगी है।