ध्वनि—परिचय, अर्थ, ध्वनि यंत्र एवं ध्वनियों का वर्गीकरण
ध्वनि का परिचय
हिन्दी एक ध्वन्यात्मक भाषा है। इसमें शब्दों को सामान्यतः उसी प्रकार लिखा जाता है, जिस प्रकार उनके अक्षरों की ध्वनि होती है। शुद्ध भाषा-प्रयोग के लिए ध्वनियों का सही ज्ञान और उनका उचित उच्चारण आवश्यक है।
हिन्दी को संस्कृत की तुलना में वियोगात्मक भाषा माना गया है। संस्कृत में जहाँ अनेक शब्द संयुक्त रूप में प्रयुक्त होते हैं, वहीं हिन्दी में कारक, चिह्न आदि अलग-अलग लगाए जाते हैं। शब्दों का स्थान बदलने से भी वाक्य का अर्थ बदल सकता है।
ध्वनि का अर्थ
मनुष्य अपने भावों, विचारों और अनुभवों के आदान-प्रदान के लिए भाषा का प्रयोग करता है। भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि है, जिसका आगे खण्ड नहीं किया जा सकता।
मनुष्य जब बोलता है तो फेफड़ों से निकलने वाली वायु मुख-विवर के विभिन्न अंगों से होकर बाहर आती है। इस प्रक्रिया में जो श्रव्य प्रभाव उत्पन्न होता है, उसे ध्वनि अथवा आवाज कहते हैं।
ध्वनियों को लिखित रूप में पहचानने के लिए जिन विशेष चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें अक्षर या वर्ण कहा जाता है। हिन्दी में प्रत्येक मूल ध्वनि के लिए अलग वर्ण का प्रयोग किया जाता है।
ध्वनि यंत्र
ध्वनि उत्पन्न करने की प्रक्रिया में जिन शारीरिक अंगों का प्रयोग होता है, उनके समूह को ध्वनि यंत्र कहा जाता है। वायु फेफड़ों से निकलकर श्वास-नलिका, कण्ठ और मुख के विभिन्न भागों से गुजरती है तथा इनके सहयोग से अलग-अलग ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं।
ध्वनि यंत्र के प्रमुख अंग
- श्वास नलिका—फेफड़ों से निकली वायु इसी मार्ग से आगे बढ़ती है।
- भोजन नलिका—भोजन के प्रवेश का मार्ग है। इसके ऊपर स्थित झिल्ली भोजन को श्वास नलिका में जाने से रोकती है।
- कण्ठ पिटक—श्वास नलिका से आने वाली वायु यहाँ प्रवेश करती है। इसमें स्वर-तन्त्रियाँ स्थित होती हैं।
- स्वर तन्त्रियाँ—इनमें कम्पन से ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं।
- अभिकाकल एवं काकल—कण्ठ पिटक से निकलने के बाद ध्वनि तरंगें इनके बीच से गुजरती हैं।
- मुख-विवर—ध्वनि तरंगें मुख-विवर में प्रवेश करके आगे विभिन्न उच्चारण अंगों तक पहुँचती हैं।
- नासिका-विवर—इसके प्रयोग से ध्वनियाँ अनुनासिक रूप ग्रहण करती हैं।
- कण्ठ—अ, आ, क-वर्ग तथा ह आदि ध्वनियों के उच्चारण में इसका प्रयोग होता है।
- कोमल तालु—इ, ई, च-वर्ग, य और श आदि ध्वनियों के उच्चारण में सहायक होता है।
- मूर्धा—ऋ, ॠ, ट-वर्ग, ष तथा र आदि के उच्चारण में इसका प्रयोग होता है।
- वर्त्स एवं दन्त—र तथा दन्त्य ध्वनियों के उच्चारण में इनका महत्त्व है।
- नासिका—ङ, ञ, ण, न और म जैसी अनुनासिक ध्वनियाँ नासिका से उत्पन्न होती हैं।
- ओष्ठ—उ, ऊ तथा प-वर्ग की ध्वनियों के उच्चारण में ओष्ठों का प्रयोग होता है।
- जिह्वा एवं जिह्वामूल—विभिन्न ध्वनियों के उच्चारण में जिह्वा का अग्र, मध्य, पश्च तथा मूल भाग अलग-अलग रूप से कार्य करता है।
ध्वनियों का वर्गीकरण
हिन्दी के ध्वनि-समूह को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है—
1. स्वर
वे वर्ण जिनका उच्चारण बिना किसी अन्य वर्ण की सहायता के स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है, स्वर कहलाते हैं।
2. व्यंजन
वे वर्ण जिनका उच्चारण स्वर की सहायता के बिना नहीं किया जा सकता, व्यंजन कहलाते हैं।
स्वरों का वर्गीकरण प्रकृति, मात्रा एवं काल, अनुनासिकता, जिह्वा की स्थिति, उच्चारण-स्थान तथा आभ्यन्तर प्रयत्न आदि आधारों पर किया जाता है। व्यंजनों का वर्गीकरण मुख्यतः उच्चारण, उच्चारण-स्थान तथा प्रयत्न के आधार पर किया जाता है।
- हिन्दी एक ध्वन्यात्मक तथा वियोगात्मक भाषा है।
- भाषा की सबसे छोटी अविभाज्य इकाई ध्वनि है और उसके लिखित चिह्न को अक्षर या वर्ण कहा जाता है।
- ध्वनि उत्पन्न करने में प्रयुक्त शारीरिक अंगों के समूह को ध्वनि यंत्र कहते हैं।
- श्वास नलिका, कण्ठ पिटक, स्वर तन्त्रियाँ, मुख-विवर, नासिका-विवर, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ और जिह्वा ध्वनि-निर्माण के प्रमुख अंग हैं।
- हिन्दी ध्वनियाँ मुख्यतः दो भागों—स्वर और व्यंजन—में विभाजित की जाती हैं।
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स्वर—अर्थ, विशेषताएँ एवं वर्गीकरण
स्वर का अर्थ
वे वर्ण, जिनका उच्चारण बिना किसी अन्य वर्ण की सहायता के स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है, स्वर कहलाते हैं। स्वरों के उच्चारण में मुख कुछ खुला रहता है और वायु बिना किसी विशेष रुकावट के बाहर निकलती है। इनके उच्चारण में मुख्य रूप से जिह्वा की स्थिति में परिवर्तन होता है।
हिन्दी के प्रमुख स्वर हैं— अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।
स्वरों की प्रमुख विशेषताएँ
- स्वरों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से किया जाता है।
- सभी स्वर आक्षरिक होते हैं।
- सभी स्वर अल्पप्राण होते हैं।
- सभी स्वर घोष वर्ण होते हैं।
स्वरों का वर्गीकरण
स्वरों का वर्गीकरण उनकी प्रकृति, उच्चारण में लगने वाले समय, अनुनासिकता, जिह्वा की स्थिति, उच्चारण-स्थान तथा आभ्यन्तर प्रयत्न के आधार पर किया जाता है।
1. प्रकृति के आधार पर
प्रकृति के आधार पर स्वर दो प्रकार के होते हैं—
मूल स्वर
जिन स्वरों का उच्चारण एक ही स्थान से और एक ही श्वास में होता है, उन्हें मूल स्वर कहते हैं।
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ मूल स्वर हैं।
संयुक्त स्वर
जिन स्वरों के उच्चारण में प्रयत्न एक होता है, किन्तु उच्चारण-स्थान दो होते हैं और जो संधि द्वारा बनते हैं, उन्हें संयुक्त या संधि स्वर कहते हैं।
- अ + इ = ए
- अ + ए = ऐ
- अ + उ = ओ
- अ + ओ = औ
अतः ए, ऐ, ओ और औ संयुक्त स्वर हैं।
2. मात्रा एवं काल के आधार पर
उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर स्वर तीन प्रकार के होते हैं—
ह्रस्व स्वर
जिन स्वरों के उच्चारण में एक मात्रा अर्थात सबसे कम समय लगता है, उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं।
अ, इ, उ, ऋ ह्रस्व स्वर हैं।
दीर्घ स्वर
जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वर की अपेक्षा दुगुना समय लगता है, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं।
आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ दीर्घ स्वर हैं।
प्लुत स्वर
जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वर की तुलना में तीन गुना समय लगता है, उन्हें प्लुत स्वर कहते हैं। इन्हें लिखते समय स्वर के साथ प्रायः ३ का संकेत लगाया जाता है।
3. अनुनासिकता के आधार पर
अनुनासिकता के आधार पर स्वर दो प्रकार के होते हैं—
सानुनासिक स्वर
जिन स्वरों के उच्चारण में मुख के साथ नासिका की भी सहायता ली जाती है, उन्हें सानुनासिक स्वर कहते हैं। इनके लिए सामान्यतः चन्द्रबिन्दु (ँ) का प्रयोग किया जाता है।
जैसे— आँगन, जाँच, चिड़ियाँ, कुआँ, गाँव, मुँह, चाँद आदि।
निरनुनासिक स्वर
जिन स्वरों का उच्चारण नासिका की सहायता के बिना किया जाता है, उन्हें निरनुनासिक स्वर कहते हैं।
अनुनासिक और अनुस्वार में अंतर
- अनुनासिक स्वर है, जबकि अनुस्वार मूल रूप से व्यंजन माना जाता है।
- अनुनासिक के उच्चारण में वायु मुख और नासिका दोनों से निकलती है, जबकि अनुस्वार के उच्चारण में वायु मुख्यतः नासिका से निकलती है।
- अनुनासिक का लिपि-चिह्न चन्द्रबिन्दु (ँ) है, जबकि अनुस्वार का चिह्न बिन्दु (ं) है।
- अनुनासिक स्वर के बाद प्रयुक्त होता है, जबकि अनुस्वार स्वर के साथ प्रयुक्त होता है।
4. जिह्वा के भाग के आधार पर
स्वरों के उच्चारण में जिह्वा का कौन-सा भाग ऊपर उठता है, इस आधार पर इन्हें तीन वर्गों में बाँटा जाता है—
- अग्र स्वर—इ, ई, ए, ऐ। इनके उच्चारण में जिह्वा का अग्र भाग ऊपर उठता है।
- मध्य स्वर—अ। इसके उच्चारण में जिह्वा का न अग्र भाग और न ही पश्च भाग विशेष रूप से ऊपर उठता है।
- पश्च स्वर—आ, उ, ऊ, ओ, औ। इनके उच्चारण में जिह्वा का पिछला भाग ऊपर उठता है।
5. उच्चारण-स्थान के आधार पर
मुख के जिस भाग की सहायता से स्वर का उच्चारण किया जाता है, उसके आधार पर स्वर निम्न प्रकार के होते हैं—
- कण्ठ्य—अ, आ
- तालव्य—इ, ई
- मूर्धन्य—ऋ
- ओष्ठ्य—उ, ऊ
- कण्ठ-तालव्य—ए, ऐ
- कण्ठोष्ठ्य—ओ, औ
6. जिह्वा के आभ्यन्तर प्रयत्न के आधार पर
स्वरों के उच्चारण के समय मुख कितना खुला या बन्द रहता है, इसके आधार पर स्वर चार प्रकार के माने जाते हैं—
विवृत स्वर
जिन स्वरों के उच्चारण में मुख पूर्ण रूप से खुला रहता है, उन्हें विवृत स्वर कहते हैं।
अर्द्ध विवृत स्वर
जिनके उच्चारण में मुख लगभग आधा खुला रहता है, वे अर्द्ध विवृत स्वर कहलाते हैं।
संवृत स्वर
जिनके उच्चारण में मुख लगभग बन्द रहता है, परन्तु इतना बन्द नहीं होता कि उच्चारण रुक जाए, उन्हें संवृत स्वर कहते हैं।
अर्द्ध संवृत स्वर
जिनके उच्चारण में मुख की स्थिति विवृत और संवृत के बीच होती है, उन्हें अर्द्ध संवृत स्वर कहते हैं।
- जो वर्ण बिना किसी अन्य वर्ण की सहायता के स्वतंत्र रूप से बोले जाते हैं, वे स्वर कहलाते हैं।
- सभी स्वर स्वतंत्र उच्चारण वाले, आक्षरिक, अल्पप्राण तथा घोष होते हैं।
- प्रकृति के आधार पर स्वर मूल और संयुक्त दो प्रकार के होते हैं।
- काल के आधार पर स्वर ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत होते हैं।
- अनुनासिकता के आधार पर स्वर सानुनासिक और निरनुनासिक होते हैं।
- जिह्वा की स्थिति के आधार पर स्वर अग्र, मध्य और पश्च स्वर कहलाते हैं।
- उच्चारण-स्थान के आधार पर स्वर कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, ओष्ठ्य, कण्ठ-तालव्य और कण्ठोष्ठ्य होते हैं।
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व्यंजन—अर्थ एवं वर्गीकरण
व्यंजन का अर्थ
जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों की सहायता के बिना नहीं किया जा सकता, उन्हें व्यंजन कहते हैं। इनके उच्चारण में जिह्वा अथवा मुख के किसी भाग द्वारा वायु के मार्ग में कुछ न कुछ अवरोध उत्पन्न होता है।
पतंजलि ने महाभाष्य में कहा है कि स्वर स्वयं उच्चरित होते हैं और उनका अनुसरण करने वाले वर्ण व्यंजन कहलाते हैं। अर्थात् व्यंजन अपने उच्चारण के लिए स्वर पर निर्भर रहते हैं।
हिन्दी के प्रमुख व्यंजन
हिन्दी में पाँच प्रमुख वर्गीय व्यंजन-वर्ग हैं—
- कवर्ग—क, ख, ग, घ, ङ
- चवर्ग—च, छ, ज, झ, ञ
- टवर्ग—ट, ठ, ड, ढ, ण
- तवर्ग—त, थ, द, ध, न
- पवर्ग—प, फ, ब, भ, म
इन पाँच वर्गों के कुल 25 व्यंजन वर्गीय व्यंजन कहलाते हैं। इनके अतिरिक्त य, र, ल, व, श, ष, स, ह तथा संयुक्त एवं अन्य व्यंजनों का भी प्रयोग होता है।
व्यंजनों का वर्गीकरण
व्यंजन ध्वनियों का वर्गीकरण मुख्य रूप से उच्चारण, उच्चारण-स्थान तथा प्रयत्न के आधार पर किया जाता है।
1. उच्चारण के आधार पर
स्पर्श व्यंजन
जिन व्यंजनों के उच्चारण के समय जिह्वा मुख के किसी भाग—कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त अथवा ओष्ठ—का स्पर्श करती है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते हैं। इन्हें वर्गीय व्यंजन भी कहा जाता है।
- कवर्ग—क, ख, ग, घ, ङ
- चवर्ग—च, छ, ज, झ, ञ
- टवर्ग—ट, ठ, ड, ढ, ण
- तवर्ग—त, थ, द, ध, न
- पवर्ग—प, फ, ब, भ, म
अन्तःस्थ व्यंजन
जिन व्यंजनों के उच्चारण के समय जिह्वा मुख के भीतर रहती है और उच्चारण अंगों का पूर्ण स्पर्श नहीं होता, उन्हें अन्तःस्थ व्यंजन कहते हैं। इन्हें अर्द्धस्वर भी कहा जाता है।
अन्तःस्थ व्यंजन हैं— य, र, ल, व।
ऊष्म व्यंजन
जिन व्यंजनों के उच्चारण में वायु मुख के विभिन्न भागों से टकराकर रगड़ उत्पन्न करती है और उससे गर्म वायु निकलती है, उन्हें ऊष्म व्यंजन कहते हैं।
ऊष्म व्यंजन हैं— श, ष, स, ह।
संयुक्त व्यंजन
दो व्यंजनों के मेल से बनने वाले व्यंजनों को संयुक्त व्यंजन कहते हैं। प्रमुख संयुक्त व्यंजन हैं—
- क्ष = क् + ष
- त्र = त् + र
- ज्ञ = ज् + ञ
- श्र = श् + र
2. उच्चारण-स्थान के आधार पर
मुख के जिस स्थान या अंग की सहायता से व्यंजन का उच्चारण होता है, उस आधार पर इनके निम्न वर्ग बनाए जाते हैं—
- कण्ठ्य—क, ख, ग, घ, ङ, ह
- तालव्य—च, छ, ज, झ, ञ, य, श
- मूर्धन्य—ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़, ष
- दन्त्य—त, थ, द, ध
- वर्त्स्य—न, र, ल, स आदि
- ओष्ठ्य—प, फ, ब, भ, म
- नासिक्य—ङ, ञ, ण, न, म आदि
- दन्तोष्ठ्य—व, फ
- जिह्वामूलीय—क, ख, ग
3. प्रयत्न के आधार पर
व्यंजनों के उच्चारण में किए जाने वाले प्रयत्न के आधार पर इन्हें दो प्रमुख भागों में बाँटा जाता है—
बाह्य प्रयत्न
उच्चारण के समय जिह्वा के बाहर होने वाली क्रिया को बाह्य प्रयत्न कहा जाता है। इसके आधार पर व्यंजन ध्वनियों के प्रमुख भेद हैं—
- घोष—जिन ध्वनियों के उच्चारण में घोष उत्पन्न होता है।
- अघोष—जिनके उच्चारण में घोष उत्पन्न नहीं होता।
- अल्पप्राण—जिनके उच्चारण में कम श्वास की आवश्यकता होती है। वर्गों के प्रथम, तृतीय और पंचम वर्ण तथा अन्तःस्थ व्यंजन इस वर्ग में आते हैं।
- महाप्राण—जिनके उच्चारण में अधिक श्वास की आवश्यकता होती है। वर्गों के द्वितीय, चतुर्थ तथा ऊष्म व्यंजन महाप्राण माने जाते हैं।
आभ्यन्तर प्रयत्न
जब किसी ध्वनि के उच्चारण में जिह्वा मुख के भीतर संघर्ष अथवा विशेष क्रिया करती है, तो उसे आभ्यन्तर प्रयत्न कहते हैं। इस आधार पर व्यंजनों के प्रमुख भेद हैं—
- स्पर्श—क, ख, ग, घ, ट, ठ, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, ब, भ आदि।
- स्पर्श-संघर्षी—च, छ, ज, झ।
- संघर्षी—श, स, ह, ख़, ग़, ज़, फ़ आदि।
- अनुनासिक—प्रत्येक वर्ग का पाँचवाँ वर्ण—ङ, ञ, ण, न, म।
- पार्श्विक—ल।
- लुंठित—र।
- उत्क्षिप्त—ड़, ढ़।
- अर्द्ध स्वर—य, व।
- व्यंजन वे वर्ण हैं जिनका उच्चारण स्वर की सहायता के बिना नहीं किया जा सकता।
- कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग के कुल 25 व्यंजन वर्गीय व्यंजन कहलाते हैं।
- उच्चारण के आधार पर स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म और संयुक्त व्यंजन प्रमुख हैं।
- य, र, ल, व अन्तःस्थ तथा श, ष, स, ह ऊष्म व्यंजन हैं।
- क्ष, त्र, ज्ञ और श्र प्रमुख संयुक्त व्यंजन हैं।
- व्यंजनों का वर्गीकरण उच्चारण-स्थान तथा बाह्य एवं आभ्यन्तर प्रयत्न के आधार पर भी किया जाता है।
अयोगवाह, सुर/स्वराघात एवं बलाघात
अयोगवाह
ऐसी ध्वनियाँ जो स्वतंत्र स्वर या व्यंजन के रूप में नहीं मानी जातीं, लेकिन अन्य वर्णों के साथ प्रयोग होती हैं, अयोगवाह कहलाती हैं। पुस्तक में अयोगवाह के अन्तर्गत हलन्त तथा विसर्ग का वर्णन किया गया है।
अयोगवाह का अर्थ है— योग न होने पर भी साथ रहने वाला।
हलन्त (्)
जब किसी व्यंजन का प्रयोग स्वर से रहित रूप में किया जाता है, तब उसके नीचे हलन्त चिह्न (्) लगाया जाता है। हलन्तयुक्त व्यंजन को हलन्त वर्ण कहा जाता है।
जैसे— विद्या में द् स्वर रहित व्यंजन के रूप में प्रयुक्त हुआ है।
विसर्ग (ः)
विसर्ग स्वर के बाद प्रयुक्त होता है। इसका उच्चारण लगभग ‘ह’ के समान होता है। संस्कृत में इसका अधिक प्रयोग मिलता है, जबकि हिन्दी में इसका प्रयोग मुख्यतः तत्सम शब्दों में दिखाई देता है।
जैसे— मनःकामना, पयःपान, अतः, स्वतः, दुःख।
अनुस्वार और विसर्ग स्वतंत्र रूप से प्रयोग न होकर अन्य वर्णों के सहारे चलते हैं, इसी कारण उन्हें अयोगवाह कहा जाता है।
सुर / स्वराघात
बोलते समय हमारी आवाज एक समान ऊँचाई पर नहीं रहती। कभी आवाज ऊँची, कभी नीची और कभी सामान्य होती है। वाणी में उत्पन्न होने वाला यही उतार-चढ़ाव सुर या स्वराघात कहलाता है।
सुर का संबंध स्वर-तन्त्रियों से है। उच्चारण के समय स्वर-तन्त्रियों में अधिक तनाव होने पर ऊँचा सुर तथा कम तनाव होने पर नीचा सुर उत्पन्न होता है।
सुर के प्रमुख स्तर
- उच्च सुर—स्वर-तन्त्रियों में अधिक तनाव होने पर।
- मध्यम सुर—स्वर-तन्त्रियों में सामान्य तनाव होने पर।
- निम्न सुर—स्वर-तन्त्रियों में कम तनाव होने पर।
सुर का संबंध मुख्य रूप से घोष ध्वनियों से होता है। सही उतार-चढ़ाव से वाणी अधिक स्वाभाविक, प्रभावशाली और अर्थपूर्ण बनती है।
बलाघात
जब किसी ध्वनि, अक्षर, शब्द या वाक्य का उच्चारण करते समय उस पर सामान्य से अधिक बल दिया जाता है, तो उसे बलाघात या स्वराघात कहा जाता है।
डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार, बलाघात मूलतः वह शक्ति है जिसके द्वारा ध्वनि, अक्षर, शब्द या वाक्य का उच्चारण किया जाता है। वाक्य के सभी अंशों पर समान बल नहीं दिया जाता; आवश्यकता के अनुसार किसी विशेष अंश पर अधिक बल पड़ता है।
भाषा की कोई भी ध्वनि पूर्णतः बलाघात-रहित नहीं होती, लेकिन अलग-अलग ध्वनियों और शब्दों पर बल की मात्रा भिन्न हो सकती है।
बलाघात के प्रकार
- ध्वनि बलाघात—किसी विशेष ध्वनि पर अधिक बल देना।
- अक्षर बलाघात—किसी शब्द के विशेष अक्षर पर अधिक बल देना।
- शब्द बलाघात—वाक्य में किसी विशेष शब्द को अधिक बल देकर बोलना।
- वाक्य बलाघात—पूरे वाक्य में अर्थ या भाव के अनुसार किसी विशेष भाग पर बल देना।
बलाघात का अर्थ पर प्रभाव
एक ही वाक्य में अलग-अलग शब्दों पर बल देने से अर्थ या भाव में परिवर्तन आ सकता है। उदाहरण—
- हम विद्यालय जा रहे हैं।
- हम विद्यालय जा रहे हैं।
पहले वाक्य में ‘हम’ पर बल देने से कर्ता पर विशेष ध्यान जाता है, जबकि दूसरे में ‘विद्यालय’ पर बल देने से स्थान विशेष महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
- अयोगवाह के अन्तर्गत हलन्त और विसर्ग का वर्णन किया जाता है।
- हलन्त का प्रयोग व्यंजन को स्वर-रहित रूप में दिखाने के लिए किया जाता है।
- विसर्ग का उच्चारण लगभग ‘ह’ के समान होता है और इसका प्रयोग मुख्यतः तत्सम शब्दों में मिलता है।
- वाणी में होने वाला ऊँच-नीच का उतार-चढ़ाव सुर या स्वराघात कहलाता है।
- स्वर-तन्त्रियों के तनाव के अनुसार सुर उच्च, मध्यम और निम्न हो सकता है।
- ध्वनि, अक्षर, शब्द या वाक्य पर विशेष बल देने को बलाघात कहते हैं।
- बलाघात के प्रमुख प्रकार—ध्वनि, अक्षर, शब्द और वाक्य बलाघात हैं।
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शुद्ध उच्चारण—अर्थ, महत्त्व, भेद, उच्चारण स्थान एवं नियम
शुद्ध उच्चारण का अर्थ
किसी भाषा को सही रूप में समझने और अपने विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने के लिए उसका शुद्ध उच्चारण आवश्यक है। अशुद्ध उच्चारण के कारण शब्द का अर्थ बदल सकता है और सुनने वाले को बात समझने में कठिनाई हो सकती है।
शुद्ध उच्चारण से आशय मानक उच्चारण से है। विभिन्न क्षेत्रों और बोलियों के प्रभाव से किसी शब्द के उच्चारण में भिन्नता आ सकती है, परन्तु भाषा तथा लेखन की दृष्टि से उस रूप को शुद्ध माना जाता है जो मानक रूप के अनुरूप हो।
शुद्ध उच्चारण का महत्त्व
- शुद्ध उच्चारण भाषा-ज्ञान का प्रारम्भिक और आवश्यक आधार है।
- मौखिक भाषा में अर्थ को सही रूप से व्यक्त करने के लिए शुद्ध उच्चारण आवश्यक है।
- उच्चारण की अशुद्धि से शब्द या वाक्य का अर्थ बदल सकता है।
- शुद्ध उच्चारण से वक्ता के विचार श्रोता तक स्पष्ट रूप में पहुँचते हैं।
- भाषा सीखते समय विद्यार्थियों को प्रारम्भ से ही सही उच्चारण का अभ्यास कराना आवश्यक है।
उदाहरण के लिए ‘आपत्तिकाल में स्वजनों ने मेरी सहायता की’ के स्थान पर यदि ‘आपत्ति-काल में स्वजनों ने मेरी सहायता की’ का अनुचित उच्चारण किया जाए, तो कथन उपहास का कारण बन सकता है। इससे स्पष्ट है कि उच्चारण की शुद्धता अर्थ-बोध के लिए महत्त्वपूर्ण है।
उच्चारण के भेद
उच्चारण में होने वाली भिन्नताओं को निम्न आधारों पर समझा जा सकता है—
- स्वरकृत भेद—स्वर के ऊँचे या मन्द होने के कारण उत्पन्न भेद।
- कालकृत भेद—उच्चारण में लगने वाले समय के अनुसार उत्पन्न भेद।
- स्थानकृत भेद—मुख के विभिन्न अवयवों की क्रियाशीलता के आधार पर उत्पन्न भेद।
- आभ्यन्तर प्रयत्नकृत भेद—मुख के अवयवों तथा जिह्वा की क्रियाशीलता के अनुसार होने वाला भेद।
- बाह्य प्रयत्न भेद—वर्णों के उच्चारण में श्वास की क्रियाशीलता के आधार पर होने वाला भेद।
वर्णों के उच्चारण-स्थान
वर्णों के उच्चारण में मुख के अलग-अलग अंगों का प्रयोग होता है। जिस स्थान की सहायता से कोई वर्ण बोला जाता है, वही उसका उच्चारण-स्थान कहलाता है।
स्वर वर्णों के उच्चारण-स्थान
- अ—मध्य स्वर; जिह्वा का न अग्र भाग विशेष रूप से ऊपर उठता है और न पश्च भाग।
- आ, उ, ऊ, ओ, औ—पश्च स्वर; इनके उच्चारण में जिह्वा का पिछला भाग ऊपर उठता है।
- इ, ई, ए, ऐ—अग्र स्वर; इनके उच्चारण में जिह्वा का अग्र भाग ऊपर उठता है।
व्यंजन वर्णों के प्रमुख उच्चारण-स्थान
- कण्ठ्य—क, ख, ग, घ, ङ, ह
- जिह्वामूलीय—क, ख, ग
- तालव्य—च, छ, ज, झ, ञ, य, श
- मूर्धन्य—ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़, ष
- दन्त्य—त, थ, द, ध
- वर्त्स्य—न, र, ल, स, ज्ञ
- ओष्ठ्य—प, फ, ब, भ, म
- दन्तोष्ठ्य—व, फ
- नासिक्य—ङ, ञ, ण, न, म तथा अनुनासिक ध्वनियाँ
आक्षरिक उच्चारण के प्रमुख नियम
- विद्यार्थियों को यह ज्ञान होना चाहिए कि कौन-सा अक्षर किस स्थान से उच्चरित होता है। शिक्षक स्वयं शुद्ध उच्चारण करके उसका अभ्यास कराए।
- ष का उच्चारण हिन्दी में प्रायः ‘श’ के समान किया जाता है, ‘ख’ के रूप में नहीं। जैसे—वर्षा।
- ज्ञ का उच्चारण ‘ग्य’ की तरह किया जाता है, ‘ज’ के रूप में नहीं। जैसे—ज्ञान।
- क्ष को ‘क्छ’ अथवा ‘क्ष’ के रूप में बोला जाता है, केवल ‘छ’ के रूप में नहीं। जैसे—क्षत्रिय, रक्षा।
- ऋ का उच्चारण सामान्यतः ‘रि’ के समान किया जाता है। जैसे—ऋतु।
- ञ तत्सम शब्दों में संयुक्त अक्षर बनाने में प्रयुक्त होता है और उसका उच्चारण प्रायः ‘न’ जैसा सुनाई देता है। जैसे—चंचल, अंजन।
- ण स्वर के साथ होने पर ‘ण’ के रूप में उच्चरित होता है, जबकि स्वर-रहित स्थिति में इसका उच्चारण ‘न’ के निकट हो सकता है। जैसे—पण्डित, ठण्डा।
- ङ भी मुख्यतः तत्सम शब्दों में प्रयुक्त होता है और उच्चारण के अनुसार ध्वनि में परिवर्तन सुनाई दे सकता है। जैसे—गंगा, रंग, वाङ्मय।
- दीर्घ स्वरों के साथ आने वाले अनुस्वार का उच्चारण प्रायः चन्द्रबिन्दु अथवा अर्द्ध-अनुस्वार जैसा होता है। जैसे—हैं, मैं, नहीं।
- आकारान्त शब्दों के अन्तिम व्यंजन का उच्चारण प्रायः हलन्त के समान किया जाता है, यद्यपि उसे लिखा सस्वर जाता है। जैसे—प्यार, राम।
- चार अक्षरों वाले आकारान्त शब्दों में दूसरे आकारान्त वर्ण का उच्चारण हलन्त रूप में हो सकता है। जैसे—दलदल, अजगर, मलमल।
- चार अक्षरों वाले शब्दों में तीसरा आकारान्त वर्ण भी कई बार हलन्त के समान उच्चरित होता है।
- तीन अक्षरों वाले आकारान्त शब्द का अन्तिम आकारान्त वर्ण प्रायः हलन्त जैसा बोला जाता है।
- द्य का उच्चारण ‘दय’ के रूप में होता है। जैसे—विद्यार्थी।
- शुद्ध उच्चारण का अर्थ भाषा का मानक और सही उच्चारण करना है।
- अशुद्ध उच्चारण से अर्थ में परिवर्तन हो सकता है, इसलिए भाषा-शिक्षण में प्रारम्भ से शुद्ध उच्चारण आवश्यक है।
- उच्चारण के प्रमुख भेद—स्वरकृत, कालकृत, स्थानकृत, आभ्यन्तर प्रयत्नकृत तथा बाह्य प्रयत्न भेद हैं।
- वर्णों के उच्चारण में कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, वर्त्स, ओष्ठ, नासिका तथा जिह्वा आदि अंग महत्त्वपूर्ण होते हैं।
- शुद्ध उच्चारण के लिए अक्षरों के सही उच्चारण-स्थान और आक्षरिक उच्चारण के नियमों का ज्ञान आवश्यक है।
अशुद्ध उच्चारण—प्रकार, कारण एवं निराकरण के उपाय
अशुद्ध उच्चारण
वाचन और मौखिक अभिव्यक्ति की शुद्धता के लिए शब्दों का सही उच्चारण आवश्यक है। यदि व्याकरण की दृष्टि से वाक्य सही हो, परन्तु उसका उच्चारण अशुद्ध किया जाए, तो श्रोता उसका अर्थ ठीक प्रकार से नहीं समझ पाता। इसलिए भाषा-शिक्षण में उच्चारण सम्बन्धी अशुद्धियों की पहचान और उनका सुधार अत्यन्त आवश्यक है।
अशुद्ध उच्चारण के प्रमुख प्रकार
विद्यार्थियों के उच्चारण में कई प्रकार की त्रुटियाँ देखी जाती हैं। प्रमुख त्रुटियाँ निम्न हैं—
- वर्णमाला के वर्णों का गलत उच्चारण करना, जैसे—क, ख, ग, घ आदि को के, खे, गे, घे के रूप में बोलना।
- स्वर-लोप करना अर्थात् शब्द में उपस्थित स्वर को छोड़कर बोलना।
- शब्द के अन्त में लिखे ह्रस्व स्वर को दीर्घ करके बोलना, जैसे—मुनि को मुनी तथा मनु को मनू कहना।
- स्वरागम करना अर्थात् जहाँ स्वर नहीं है वहाँ अतिरिक्त स्वर जोड़ देना, जैसे—स्कूल को इस्कूल तथा स्टेशन को इस्टेशन कहना।
- स्वरभक्ति करना अर्थात् संयुक्त ध्वनियों के बीच अनावश्यक स्वर जोड़ देना, जैसे—श्री को सिरी तथा प्रताप को परताप कहना।
- ऋ तथा उससे सम्बन्धित ध्वनियों का गलत उच्चारण करना।
- इकार और उकार की मात्रा में परिवर्तन करके शब्द का गलत उच्चारण करना।
- चन्द्रबिन्दु और अनुस्वार के उच्चारण में भ्रम करना।
- ण को न की तरह बोलना, जैसे—गुण को गुन तथा प्रणाम को प्रनाम कहना।
- स को श अथवा श को स के रूप में बोलना।
- क्ष को छ तथा ज्ञ को ग्य के रूप में बोलना।
- शब्द का अशुद्ध वाचन करना, जैसे—राजयोग को राजजोग कहना।
- न और ण के उच्चारण में परस्पर परिवर्तन करना, जैसे—रावण को रावन कहना।
अशुद्ध उच्चारण के कारण
विद्यार्थियों में उच्चारण दोष उत्पन्न होने के अनेक कारण हो सकते हैं। प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—
- भौगोलिक प्रभाव—विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय बोलियों के कारण हिन्दी के उच्चारण में भिन्नता आ जाती है। पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों के उच्चारण में भी अन्तर पाया जाता है।
- शिक्षक का अशुद्ध उच्चारण—बालक शिक्षक का अनुकरण करते हैं। यदि शिक्षक स्वयं अशुद्ध उच्चारण करता है तो विद्यार्थी भी वही उच्चारण सीख लेते हैं।
- शारीरिक दोष—वाणी अथवा उच्चारण अंगों में दोष, हकलाना या वाचन में अन्य शारीरिक कठिनाई शुद्ध उच्चारण में बाधक बन सकती है।
- हीनभावना—हीन भावना से ग्रस्त बालक आत्मविश्वास के अभाव में शब्दों का स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण नहीं कर पाता।
- भय—कठोर अथवा डर पैदा करने वाले वातावरण में बालक संकोच और भय के कारण ठीक से उच्चारण नहीं कर पाता।
- शर्मीला स्वभाव—संकोची और शर्मीले बालकों के वाचन में अवरोध उत्पन्न हो सकता है।
- पुस्तकीय अशुद्धता—यदि पुस्तक के मुद्रण में त्रुटि हो और विद्यार्थी उसी रूप को पढ़े, तो उसके उच्चारण में भी दोष आ सकता है।
- क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव—पंजाबी, बंगाली आदि क्षेत्रीय भाषाओं की उच्चारण-प्रवृत्तियाँ हिन्दी उच्चारण को प्रभावित कर सकती हैं।
- अज्ञानता—यदि विद्यार्थी को सही उच्चारण सुनने और उसका अभ्यास करने का अवसर नहीं मिलता, तो वह शुद्ध उच्चारण नहीं सीख पाता।
उच्चारण दोषों के निराकरण के उपाय
1. ध्वनि-तत्त्व का ज्ञान कराना
बालक को हिन्दी की ध्वनियों का स्पष्ट और विस्तृत ज्ञान कराया जाना चाहिए। उसे ध्वनियों के वर्गीकरण, उच्चारण-स्थान, घोष-अघोष, अल्पप्राण-महाप्राण, ह्रस्व-दीर्घ, अनुनासिक-अनुनासिक रहित आदि का अन्तर समझाया जाए।
- न और ण, व और ब, स और श, ड और ड़ आदि समान या निकट ध्वनियों का अलग-अलग अभ्यास कराया जाए।
- मुख के विभिन्न उच्चारण-स्थानों की जानकारी दी जाए।
- सिर और ग्रीवा के मॉडल तथा ध्वनि-यंत्र के चित्र का प्रयोग किया जा सकता है।
- दर्पण की सहायता से विद्यार्थी अपनी जिह्वा और उच्चारण अंगों की स्थिति देख सकता है।
- ग्रामोफोन, लिंग्वाफोन तथा टेप-रिकॉर्डर जैसे साधनों से शुद्ध उच्चारण सुनाकर अभ्यास कराया जा सकता है।
2. उच्चारण अंगों के दोष की पहचान एवं उपचार
यदि बालक के किसी उच्चारण अंग में शारीरिक दोष हो तो समय रहते उसकी पहचान करनी चाहिए। आवश्यकता होने पर चिकित्सक की सहायता लेकर दोष का उपचार कराया जाए और उसके बाद शुद्ध उच्चारण का नियमित अभ्यास कराया जाए।
3. अच्छी मिश्रण-मण्डली
बालक अनुकरण द्वारा भाषा सीखता है और आसपास के लोगों के उच्चारण का उस पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए उसे ऐसे लोगों के सम्पर्क में रखना चाहिए जो शुद्ध उच्चारण करते हों।
4. अध्यापक का शुद्ध उच्चारण
कक्षा में शिक्षक के बोलने का बालक पर सीधा प्रभाव पड़ता है। विद्यार्थी शिक्षक के वाचन और उच्चारण का अनुकरण करते हैं, इसलिए शिक्षक को स्वयं प्रत्येक शब्द का स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण करना चाहिए।
5. सन्तुलित एवं प्रोत्साहनपूर्ण व्यवहार
बालक के साथ कठोर अथवा असंयमित व्यवहार करने से उसमें भय और संकोच उत्पन्न हो सकता है। शिक्षक को प्रेम, सहानुभूति और प्रोत्साहन का वातावरण देना चाहिए, जिससे बालक आत्मविश्वास के साथ बोल सके।
6. पुस्तक के शुद्ध पाठ पर बल देना
पाठ पढ़ाते समय शिक्षक को विद्यार्थियों के उच्चारण पर ध्यान देना चाहिए। यदि कोई विद्यार्थी गलत उच्चारण करता है तो उसकी त्रुटि का तत्काल सुधार कराकर सही उच्चारण का अभ्यास कराना चाहिए।
- अशुद्ध उच्चारण से शब्द या वाक्य का सही अर्थ समझने में कठिनाई होती है।
- स्वर-लोप, स्वरागम, स्वरभक्ति, अनुस्वार-चन्द्रबिन्दु का भ्रम तथा न-ण, स-श आदि का गलत उच्चारण प्रमुख त्रुटियाँ हैं।
- भौगोलिक एवं क्षेत्रीय प्रभाव, शिक्षक का अशुद्ध उच्चारण, शारीरिक दोष, भय, हीनभावना, शर्मीलापन, पुस्तकीय अशुद्धता और अज्ञानता इसके प्रमुख कारण हैं।
- ध्वनि-तत्त्व और उच्चारण-स्थानों का ज्ञान देकर उच्चारण दोषों को सुधारा जा सकता है।
- शिक्षक का स्वयं शुद्ध उच्चारण करना और विद्यार्थियों को नियमित अभ्यास कराना अत्यन्त आवश्यक है।
- प्रेमपूर्ण, सहानुभूतिपूर्ण और प्रोत्साहन देने वाला वातावरण शुद्ध उच्चारण के विकास में सहायक होता है।
उच्चारण-शिक्षण की विधियाँ
उच्चारण-शिक्षण
भाषा के शुद्ध प्रयोग के लिए विद्यार्थियों को ध्वनियों और शब्दों का सही उच्चारण सिखाना आवश्यक है। उच्चारण-शिक्षण का उद्देश्य विद्यार्थियों को वर्णों, शब्दों तथा वाक्यों का स्पष्ट, शुद्ध और स्वाभाविक उच्चारण करने में सक्षम बनाना है।
हिन्दी में उच्चारण-शिक्षण के लिए निम्न प्रमुख विधियों का प्रयोग किया जाता है—
1. पूर्ण विधि
इस विधि में ध्वनियों को अलग-अलग सिखाने के स्थान पर शब्द को पूर्ण रूप में शुद्ध उच्चारण के साथ बोलने का अभ्यास कराया जाता है। शब्द भाषा की सार्थक इकाई है, इसलिए विद्यार्थी पूरे शब्द को सुनकर और बोलकर सरलता से उसका सही उच्चारण सीखता है।
इस विधि में शिक्षक किसी शब्द का आदर्श उच्चारण करता है और विद्यार्थी उसी पूर्ण रूप का अभ्यास करते हैं।
2. खण्ड विधि
इस विधि में शब्द को उसकी ध्वनियों अथवा छोटे-छोटे खण्डों में बाँटकर उच्चारण का अभ्यास कराया जाता है। विद्यार्थियों को पहले स्वर और व्यंजनों के उच्चारण-स्थान तथा प्रयत्न का अलग-अलग अभ्यास कराया जाता है और बाद में उन्हें मिलाकर शब्द का उच्चारण कराया जाता है।
इससे विद्यार्थियों को प्रत्येक ध्वनि का स्पष्ट ज्ञान होता है और उच्चारण सम्बन्धी त्रुटियों को पहचानना आसान हो जाता है।
3. पूर्ण-खण्ड विधि
यह पूर्ण विधि और खण्ड विधि का समन्वित रूप है। इसमें सबसे पहले किसी शब्द का पूर्ण रूप में शुद्ध उच्चारण कराया जाता है। इसके बाद शब्द को ध्वनियों या खण्डों में बाँटकर उनका अभ्यास कराया जाता है और अन्त में पुनः पूरे शब्द का शुद्ध उच्चारण कराया जाता है।
इस प्रकार क्रम होता है— पूर्ण शब्द → खण्डों का अभ्यास → पुनः पूर्ण शब्द।
4. ध्वन्यात्मक विधि
ध्वन्यात्मक विधि का प्रयोग विशेष रूप से उच्चारण सम्बन्धी त्रुटियों के निराकरण के लिए किया जाता है। इसमें विद्यार्थियों के सामने ऐसी ध्वनियों वाले शब्द रखे जाते हैं जिनमें उच्चारण की समानता या सूक्ष्म अन्तर होता है।
उदाहरण— सरेन्द्र, नरेन्द्र, रवि, कवि आदि। ऐसे शब्दों का अभ्यास कराने से विद्यार्थियों के ध्वनि-यंत्र प्रशिक्षित होते हैं और ध्वनियों का शुद्ध उच्चारण विकसित होता है।
ध्वन्यात्मक विधि में कोमल तालु, जबड़ा, ओष्ठ तथा जिह्वा की उचित स्थितियों के अभ्यास पर भी ध्यान दिया जाता है।
5. अनुकरण विधि
इस विधि में शिक्षक पहले किसी शब्द या वाक्य का आदर्श एवं शुद्ध उच्चारण करता है और विद्यार्थी उसका अनुकरण करते हुए उसी प्रकार बोलते हैं।
एक ही शब्द या वाक्य का बार-बार अनुकरण करने से विद्यार्थियों की उच्चारण सम्बन्धी त्रुटियाँ धीरे-धीरे दूर हो जाती हैं। हिन्दी भाषा-शिक्षण में अनुकरण का विशेष महत्त्व है।
6. उपकरण विधि
इस विधि में शुद्ध उच्चारण सिखाने के लिए विभिन्न उपकरणों और श्रव्य साधनों का प्रयोग किया जाता है। प्रमुख उपकरण हैं—
- ग्रामोफोन
- लिंग्वाफोन
- टेप-रिकॉर्डर
- रेडियो आदि
इन उपकरणों की सहायता से विद्यार्थियों को हिन्दी वर्णमाला, स्वर, व्यंजन, शब्द तथा वाक्य का शुद्ध उच्चारण सुनाया जाता है। बार-बार सही उच्चारण सुनने और उसका अभ्यास करने से विद्यार्थी अपना उच्चारण सुधार सकते हैं।
- हिन्दी में उच्चारण-शिक्षण की छह प्रमुख विधियाँ हैं—पूर्ण, खण्ड, पूर्ण-खण्ड, ध्वन्यात्मक, अनुकरण और उपकरण विधि।
- पूर्ण विधि में पूरे शब्द का तथा खण्ड विधि में ध्वनियों को अलग-अलग करके अभ्यास कराया जाता है।
- पूर्ण-खण्ड विधि में पहले पूरा शब्द, फिर उसके खण्ड और अन्त में पुनः पूरा शब्द उच्चरित कराया जाता है।
- ध्वन्यात्मक विधि उच्चारण सम्बन्धी त्रुटियों को दूर करने में उपयोगी है।
- अनुकरण विधि में विद्यार्थी शिक्षक के आदर्श उच्चारण की नकल करके सीखते हैं।
- उपकरण विधि में ग्रामोफोन, लिंग्वाफोन, टेप-रिकॉर्डर और रेडियो आदि की सहायता से शुद्ध उच्चारण का अभ्यास कराया जाता है।
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श्रवण कौशल—अर्थ, उद्देश्य एवं शिक्षण की विधियाँ
श्रवण कौशल का अर्थ
सुनने तथा सुनकर उसके अर्थ और भाव को समझने की क्रिया को श्रवण कहते हैं। सामान्यतः कानों द्वारा ध्वनियों को ग्रहण करना और मस्तिष्क द्वारा उनकी अनुभूति एवं प्रत्यक्षीकरण करना श्रवण कहलाता है।
मौखिक भाषा द्वारा व्यक्त भावों और विचारों को ध्यानपूर्वक सुनकर समझना भी श्रवण है। किसी व्यक्ति की बात को ध्यान से सुनना, उसे सही रूप में ग्रहण करना और उसके अनुसार प्रतिक्रिया करना श्रवण प्रक्रिया का भाग है।
श्रवण और Hearing में अन्तर
अंग्रेजी में Listening का अर्थ श्रवण है, जबकि Hearing का अर्थ केवल किसी ध्वनि का कानों तक पहुँचना है। इसलिए श्रवण केवल सुन लेना नहीं, बल्कि ध्यानपूर्वक सुनकर अर्थ ग्रहण करना है।
भाषा-शिक्षण में श्रवण का स्थान
श्रवण कौशल का सम्बन्ध मुख्य रूप से कानों से है और भाषा सीखने का यह प्रथम चरण है। विद्यार्थी कहानी, कविता, भाषण और वार्तालाप आदि को सुनकर उनका ज्ञान प्राप्त करता है और अर्थ ग्रहण करता है।
श्रवण कौशल के विकास से विद्यार्थी स्वर और व्यंजन जैसी विभिन्न ध्वनियों को सुनकर पहचानने तथा उनमें स्पष्ट भेद करने की योग्यता विकसित करता है। अन्य भाषायी कौशलों के विकास का आधार भी श्रवण है।
श्रवण कौशल के उद्देश्य
- विद्यार्थियों में श्रवण के प्रति रुचि उत्पन्न करना, जिससे वे दूसरों की बात ध्यानपूर्वक सुन सकें।
- सुनकर अर्थ ग्रहण करने की योग्यता विकसित करना।
- दूसरों द्वारा उच्चारित शब्दों को सुनकर उनका शुद्ध उच्चारण करने की क्षमता विकसित करना।
- श्रुत सामग्री के महत्वपूर्ण अंशों को पहचानने की योग्यता विकसित करना।
- श्रुत सामग्री में से महत्वपूर्ण, आकर्षक और मर्मस्पर्शी विचारों तथा भावों का चयन करने की क्षमता विकसित करना।
- वक्ता के मनोभावों को समझने योग्य बनाना।
- सुनी हुई सामग्री का सारांश ग्रहण करने की योग्यता विकसित करना।
- भाषा एवं साहित्य के प्रति रुचि उत्पन्न करना।
श्रवण कौशल शिक्षण की विधियाँ एवं क्रियाएँ
1. प्रश्नोत्तर
शिक्षक पढ़ाई गई सामग्री के आधार पर विद्यार्थियों से प्रश्न पूछता है। इससे यह ज्ञात होता है कि विद्यार्थियों ने विषय-वस्तु को ध्यान से सुना और समझा है या नहीं। प्रश्न पूछने से विद्यार्थी सावधान रहते हैं और शिक्षक की बात ध्यानपूर्वक सुनते हैं।
2. सस्वर वाचन
शिक्षक आदर्श सस्वर वाचन करता है और विद्यार्थी उसे ध्यान से सुनते हैं। इसके बाद विद्यार्थियों से अनुकरण वाचन कराया जाता है। इससे शुद्ध उच्चारण, गति तथा विराम-चिह्नों के उचित प्रयोग को समझने के साथ श्रवण कौशल का भी विकास होता है।
3. भाषण
भाषण द्वारा विद्यार्थियों की मौखिक भाषा के साथ-साथ श्रवण शक्ति का विकास किया जा सकता है। भाषण से पहले विद्यार्थियों को ध्यानपूर्वक सुनने के लिए कहा जाए और बाद में उससे सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाएँ।
4. कहानी कहना तथा सुनना
विद्यार्थियों को रोचक कथाएँ और कहानियाँ सुनाई जाएँ। उसके बाद उन्हीं से कहानी सुनाने को कहा जाए। इससे यह ज्ञात होता है कि उन्होंने कहानी को कितनी सावधानी से सुना है।
5. श्रुतलेख
शिक्षक किसी गद्यांश आदि को बोलता है और विद्यार्थी सुनकर लिखते हैं। जो विद्यार्थी ध्यानपूर्वक सुनता है, वह सम्पूर्ण सामग्री को शुद्ध रूप से लिख पाता है। इस प्रकार श्रुतलेख श्रवण कौशल के विकास का प्रभावी माध्यम है।
6. वाद-विवाद
वाद-विवाद में विद्यार्थी को दूसरे पक्ष की बात ध्यान से सुननी पड़ती है, क्योंकि उसके आधार पर ही वह उत्तर दे सकता है और अपने तर्क प्रस्तुत कर सकता है। इसलिए वाद-विवाद श्रवण प्रशिक्षण की महत्वपूर्ण क्रिया है।
7. दृश्य-श्रव्य सहायक सामग्री
श्रवण कौशल के विकास के लिए ग्रामोफोन, टेप-रिकॉर्डर, रेडियो, चलचित्र, दूरदर्शन तथा वीडियो आदि साधनों का प्रयोग किया जा सकता है। इनके माध्यम से कहानी, कविता, भाषण, नाटक तथा अन्य शैक्षिक कार्यक्रम सुनाए जा सकते हैं।
- ध्यानपूर्वक सुनकर अर्थ और भाव ग्रहण करने की क्रिया श्रवण कहलाती है।
- Listening श्रवण है, जबकि Hearing केवल ध्वनि का कानों तक पहुँचना है।
- श्रवण भाषा सीखने का प्रथम चरण और अन्य भाषायी कौशलों के विकास का आधार है।
- श्रवण कौशल का उद्देश्य सुनकर अर्थ ग्रहण करना, शुद्ध उच्चारण सीखना, महत्वपूर्ण बातों को पहचानना तथा वक्ता के भावों को समझना है।
- प्रश्नोत्तर, सस्वर वाचन, भाषण, कहानी, श्रुतलेख, वाद-विवाद और दृश्य-श्रव्य सामग्री श्रवण कौशल की प्रमुख शिक्षण विधियाँ हैं।
श्रवण कौशल—महत्त्व एवं ध्यान देने योग्य बातें
श्रवण कौशल का महत्त्व
भाषा सीखने में श्रवण कौशल का अत्यन्त महत्त्व है। बालक सबसे पहले अपने आसपास के लोगों की भाषा सुनता है और उन्हीं ध्वनियों, शब्दों तथा वाक्यों को ग्रहण करके भाषा सीखना प्रारम्भ करता है। इसलिए श्रवण अन्य भाषायी कौशलों के विकास का आधार है।
- बालक के व्यक्तित्व-विकास में श्रवण कौशल की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वह बड़ों की बातों और ध्वनियों को सुनकर उन्हें अपने मन-मस्तिष्क में ग्रहण करता है।
- सुनी हुई ध्वनियाँ बालक के भाषा-ज्ञान का आधार बनती हैं। श्रवण कौशल अन्य भाषायी कौशलों के विकास की प्रमुख आधारशिला है।
- श्रवण कौशल के विकास से बालक ध्यानपूर्वक सुनने की आदत विकसित करता है और उसकी श्रवणेन्द्रियों का उचित उपयोग होता है।
- बालक भाषा को मुख्यतः अनुकरण द्वारा सीखता है। नए शब्दों को सुनकर वह अपने शब्द-भण्डार में वृद्धि करता है।
- परिवार के सदस्यों और अध्यापकों की भाषा सुनकर बालक उच्चारण, हाव-भाव, उतार-चढ़ाव और स्वर-गति का अनुकरण करना सीखता है। इससे उसकी मौखिक अभिव्यक्ति विकसित होती है।
- शान्त रहकर दूसरों की बात सुनने और समझने की आदत से बालक अपने विचारों के समर्थन में उचित तर्क प्रस्तुत करना सीखता है।
- कविता, कहानी तथा साहित्य की अन्य विधाओं को सुनकर बालक उनकी विषय-वस्तु को समझता है और रसास्वादन तथा आनन्द प्राप्त करता है।
श्रवण कौशल में ध्यान देने योग्य बातें
विद्यार्थियों में श्रवण कौशल का उचित विकास तभी सम्भव है जब उनमें सुनने की रुचि, धैर्य, भाव-ग्रहण तथा ध्वनियों की सही पहचान विकसित की जाए। इसके लिए निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए—
- बालक में श्रवण के प्रति रुचि उत्पन्न की जाए।
- बालक में धैर्यपूर्वक सुनने की क्षमता विकसित की जाए।
- बालक में सुनी हुई बात के भाव को ग्रहण करने की क्षमता होनी चाहिए।
- बालक को हिन्दी की ध्वनियों, उनके प्रकार तथा ध्वनियों के वर्गीकरण का उचित ज्ञान कराया जाए।
- बालक की श्रवणेन्द्रियाँ ठीक होनी चाहिए, ताकि वह ध्वनियों को स्पष्ट रूप से ग्रहण कर सके।
- शिक्षक का उच्चारण स्वयं शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिए, क्योंकि विद्यार्थी उसके उच्चारण का अनुकरण करते हैं।
- आदर्श वाचन के बाद शिक्षक को विद्यार्थियों से प्रश्न पूछकर यह जाँचना चाहिए कि उन्होंने सामग्री को ध्यानपूर्वक सुना और समझा है या नहीं।
- श्रवण कौशल भाषा सीखने तथा अन्य भाषायी कौशलों के विकास का आधार है।
- यह शब्द-भण्डार, शुद्ध उच्चारण, मौखिक अभिव्यक्ति और व्यक्तित्व-विकास में सहायक होता है।
- श्रवण द्वारा बालक दूसरों की बात समझना, उचित प्रतिक्रिया देना और तर्क प्रस्तुत करना सीखता है।
- श्रवण कौशल के विकास के लिए रुचि, धैर्य, भाव-ग्रहण और ध्वनियों का सही ज्ञान आवश्यक है।
- शिक्षक का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए तथा प्रश्नों द्वारा विद्यार्थियों के श्रवण-बोध की जाँच करनी चाहिए।
वाचन कौशल/मौखिक अभिव्यक्ति—अर्थ, विशेषताएँ, उद्देश्य एवं महत्त्व
वाचन कौशल / मौखिक अभिव्यक्ति का अर्थ
भाषा सीखने के लिए सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना—चारों कौशलों का विकास आवश्यक है। इनमें वाचन कौशल का सम्बन्ध लिखित या मुद्रित भाषा को पढ़कर उसका अर्थ ग्रहण करने तथा मौखिक रूप से अपने विचार व्यक्त करने से है।
वाचन शब्द ‘वाच्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ शब्द, वाणी अथवा कथन है। वाचन को दो अर्थों में समझा जा सकता है—
- संकुचित अर्थ में—लिखे या छपे हुए शब्दों का उच्चारण करना वाचन कहलाता है।
- व्यापक अर्थ में—ध्वनियों के प्रतीकों अर्थात् लिखित शब्दों को उचित गति से पढ़ते हुए उनका अर्थ ग्रहण करना वाचन कहलाता है।
मौखिक अभिव्यक्ति का आशय अपने भावों, विचारों और अनुभवों को वाणी के माध्यम से स्पष्ट, सरल, क्रमबद्ध और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता से है।
वाचन कौशल की विशेषताएँ / गुण
- सरलता—भाषा ऐसी हो जिसे श्रोता सरलता से समझ सके। कठिन शब्दों का अनावश्यक प्रयोग नहीं करना चाहिए और विचार सहज ढंग से व्यक्त होने चाहिए।
- स्पष्टता या शुद्धता—उच्चारण शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिए। वर्णों तथा मात्राओं का सही उच्चारण आवश्यक है, क्योंकि अशुद्ध उच्चारण से अर्थ बदल सकता है।
- अवसर के अनुकूलता—भाषा, शब्द, वाक्य, मुहावरे और अभिव्यक्ति का चयन अवसर तथा श्रोता के अनुसार होना चाहिए। हर्ष, शोक, आदेश, क्रोध या शान्ति जैसी परिस्थितियों के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया जाए।
- मधुरता—वाणी में मधुरता होने से मौखिक अभिव्यक्ति आकर्षक और प्रभावशाली बनती है। कठोर बात भी उचित और मधुर भाषा में कही जा सकती है।
- गतिशीलता—विचारों को व्यक्त करते समय वाणी में निरन्तरता और स्वाभाविक गति होनी चाहिए। रुक-रुककर बोलने से विचारों की प्रभावशीलता कम हो जाती है।
- क्रमबद्धता—विचारों को उचित क्रम में प्रस्तुत करना चाहिए। यदि विचार क्रमबद्ध न हों तो श्रोता तक संदेश सही ढंग से नहीं पहुँच पाता।
- प्रभावशीलता—अभिव्यक्ति ऐसी हो जो श्रोताओं पर प्रभाव छोड़े। भाषा का रूप परिस्थिति, विषय और श्रोताओं के स्तर के अनुसार होना चाहिए।
- यान्त्रिक गुण—उचित आरोह-अवरोह, मुद्रा, अंग-संचालन, बल तथा सही ढंग से साँस लेने की प्रक्रिया मौखिक अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाती है।
वाचन कौशल के उद्देश्य
- सरल एवं प्रभावशाली ढंग से वार्तालाप करने की क्षमता विकसित करना।
- विद्यार्थियों में स्वाभाविक रूप से बोलने की क्षमता उत्पन्न करना।
- विचारों और तथ्यों को क्रमबद्ध तथा स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने की योग्यता विकसित करना।
- बालकों की झिझक और संकोच को दूर करके व्यक्तित्व का विकास करना।
- व्यक्ति या श्रोता-समुदाय के सामने अपने विचार प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत करने योग्य बनाना।
- प्रश्नों के उत्तर उचित स्वर और भाषा में देने की क्षमता विकसित करना।
- शब्दों के मूल भाव को समझकर उनका उचित स्थान और समय पर प्रयोग करने की योग्यता विकसित करना।
वाचन कौशल / मौखिक अभिव्यक्ति का महत्त्व
मौखिक अभिव्यक्ति सामाजिक जीवन का आवश्यक अंग है। दैनिक व्यवहार से लेकर शिक्षा, व्यवसाय और ज्ञानार्जन तक प्रत्येक क्षेत्र में व्यक्ति को अपने विचारों को बोलकर व्यक्त करने की आवश्यकता पड़ती है।
- दैनिक जीवन में महत्त्व—परिवार, समाज और आसपास के लोगों से विचारों का आदान-प्रदान मुख्य रूप से बोल-चाल द्वारा होता है। आदेश, निर्देश, प्रश्न और सामान्य व्यवहार में मौखिक भाषा आवश्यक है।
- व्यावसायिक क्षेत्र में सहायक—विभिन्न व्यवसायों में पुस्तकीय ज्ञान के साथ प्रभावी बोल-चाल भी आवश्यक है। व्यावसायिक सफलता में स्पष्ट और प्रभावशाली अभिव्यक्ति का विशेष महत्त्व है।
- ज्ञानार्जन का महत्त्वपूर्ण साधन—प्रश्न पूछने, उत्तर प्राप्त करने तथा गुरु और अन्य व्यक्तियों से जानकारी लेने में मौखिक भाषा महत्वपूर्ण साधन है।
- अभिव्यक्ति का सहज साधन—मनुष्य स्वाभाविक रूप से अपने विचार, भाव और अनुभव बोलकर व्यक्त करता है। अभ्यास से मौखिक अभिव्यक्ति को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
- अपने आप में एक व्यवसाय—व्यापार, विज्ञापन, फिल्म, नाटक और अन्य क्षेत्रों में प्रभावशाली मौखिक अभिव्यक्ति व्यावसायिक सफलता का साधन बन सकती है।
- भाषा-शिक्षण में महत्त्व—बालक सबसे पहले बोलना सीखता है, उसके बाद पढ़ना और लिखना सीखता है। इसलिए भाषा-शिक्षण में बोल-चाल और मौखिक अभ्यास का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।
- व्यक्तित्व-विकास में सहायक—स्पष्ट और प्रभावशाली ढंग से बोलने वाला व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ अपने विचार दूसरों के सामने रख सकता है। इससे उसके सामाजिक और मानसिक व्यक्तित्व का विकास होता है।
इस प्रकार मौखिक अभिव्यक्ति केवल भाषा का एक कौशल नहीं, बल्कि दैनिक जीवन, ज्ञानार्जन, व्यवसाय, भाषा-शिक्षण और व्यक्तित्व-विकास का महत्वपूर्ण साधन है।
- लिखित शब्दों को पढ़कर अर्थ ग्रहण करने की प्रक्रिया वाचन कहलाती है।
- मौखिक अभिव्यक्ति में भावों और विचारों को वाणी द्वारा स्पष्ट और प्रभावी रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
- वाचन कौशल के प्रमुख गुण—सरलता, स्पष्टता, अवसरानुकूलता, मधुरता, गतिशीलता, क्रमबद्धता, प्रभावशीलता और यान्त्रिक गुण हैं।
- वाचन कौशल का प्रमुख उद्देश्य स्पष्ट, स्वाभाविक, क्रमबद्ध और प्रभावशाली अभिव्यक्ति का विकास करना है।
- मौखिक अभिव्यक्ति दैनिक जीवन, ज्ञानार्जन, व्यवसाय, भाषा-शिक्षण तथा व्यक्तित्व-विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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वाचन कौशल की शिक्षण विधियाँ तथा मौन एवं सस्वर वाचन
वाचन कौशल की शिक्षण विधियाँ
वाचन तथा मौखिक अभिव्यक्ति के शिक्षण का उद्देश्य विद्यार्थियों की झिझक दूर करके उनमें शुद्ध, सरल, स्पष्ट, मधुर, स्वाभाविक और प्रवाहपूर्ण अभिव्यक्ति विकसित करना है। इसके लिए शिक्षक विभिन्न शिक्षण विधियों और गतिविधियों का प्रयोग कर सकता है।
1. प्रश्नोत्तर
किसी विषय या पाठ को पढ़ाते समय शिक्षक बीच-बीच में विद्यार्थियों से प्रश्न पूछे। विद्यार्थियों को शुद्ध और स्पष्ट भाषा में पूर्ण वाक्यों में उत्तर देने के लिए प्रेरित किया जाए तथा अशुद्ध उत्तरों का सुधार कराया जाए।
2. वार्तालाप
वार्तालाप मौखिक अभिव्यक्ति के विकास का प्रभावी साधन है। प्रारम्भ में विद्यार्थियों का आपस में तथा शिक्षक के साथ बातचीत कराई जाए। वार्तालाप का विषय उनके ज्ञान और अनुभव के दायरे में होना चाहिए। प्रश्न पूछकर विद्यार्थियों से अपने विचार व्यक्त करवाए जा सकते हैं।
3. सस्वर वाचन
पाठ्यपुस्तक पढ़ाते समय सबसे पहले शिक्षक स्वयं प्रस्तुत अनुच्छेद का आदर्श वाचन करे और उसके बाद विद्यार्थियों से सस्वर वाचन कराए। वाचन में स्पष्ट एवं शुद्ध उच्चारण, उचित गति, शब्दों पर उचित बल और विराम-चिह्नों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
सस्वर वाचन से विद्यार्थियों की मौखिक अभिव्यक्ति सम्बन्धी झिझक और संकोच दूर करने में सहायता मिलती है।
4. वाद-विवाद
वाद-विवाद मौखिक भाव-प्रकाशन का अच्छा साधन है। इसमें विद्यार्थी किसी पूर्व निर्धारित विषय के पक्ष और विपक्ष में अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। इससे उनमें निर्भीकता, उत्साह और अपने विचारों को क्रमबद्ध रूप से व्यक्त करने की क्षमता विकसित होती है।
5. भाषण
विद्यार्थियों को उनकी मानसिक अवस्था के अनुकूल विषय देकर भाषण करने का अवसर दिया जाना चाहिए। छोटे बच्चे भी तैयारी करके प्रसन्नतापूर्वक बोल सकते हैं। आवश्यकता के अनुसार शिक्षक उचित मार्गदर्शन प्रदान करे।
6. चित्र-वर्णन
बालकों की चित्रों में स्वाभाविक रुचि होती है। इसलिए उन्हें उपयुक्त चित्र दिखाकर उसका वर्णन करने के लिए कहा जा सकता है। चित्रों से सम्बन्धित प्रश्न पूछकर भी बच्चों को मौखिक रूप से अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया जाता है।
7. कहानी सुनाना और सुनना
छोटे बच्चों को परियों, पशु-पक्षियों तथा रोचक घटनाओं से सम्बन्धित कहानियाँ सुनाई जानी चाहिए। पहले शिक्षक स्वयं कहानी सुनाए और बाद में विद्यार्थियों से वही अथवा अन्य कहानी सुनाने को कहे। इससे श्रवण कौशल और मौखिक अभिव्यक्ति दोनों का विकास होता है।
8. कविता-पाठ
बालकों में संगीत और कविता के प्रति स्वाभाविक रुचि होती है। छोटी कक्षाओं में बच्चों की अवस्था के अनुकूल छोटे-छोटे गीत एवं कविताएँ सम्मिलित की जाएँ। पहले सामूहिक पाठ कराया जाए और बाद में व्यक्तिगत कविता-पाठ के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
9. सत्संग
सत्संग से बालक अच्छी बातें सीखता है। जिस वातावरण में बालक रहता है, उसी का प्रभाव उसकी भाषा, व्यवहार और मौखिक अभिव्यक्ति पर पड़ता है। इसलिए अच्छे वातावरण और उत्तम संगति का मौखिक भाषा-विकास में महत्त्व है।
इसके अतिरिक्त नाटक, पाठ्यक्रम-सहगामी क्रियाएँ, कवि-सम्मेलन, अन्त्याक्षरी, अनुच्छेद-सार लेखन, शब्द-प्रयोग तथा टेलीफोन पर सम्भाषण आदि साधनों का भी प्रयोग किया जा सकता है।
वाचन के प्रकार
मुख्य रूप से वाचन के दो प्रकार होते हैं—
- मौन वाचन
- सस्वर वाचन
मौन वाचन
लिखित भाषा को बिना उच्चारण किए, शान्तिपूर्वक पढ़कर उसका अर्थ समझने की क्रिया को मौन वाचन कहते हैं। इसमें पाठक के होंठ नहीं हिलते और वह पाठ के भावों तथा विचारों पर अधिक ध्यान देता है।
मौन वाचन के लिए अर्थ-बोध और भावानुभूति आवश्यक हैं। इस प्रकार मौन वाचन अध्ययन की एक महत्त्वपूर्ण विधि है।
सस्वर वाचन
स्वर सहित पढ़ते हुए अर्थ ग्रहण करने को सस्वर वाचन कहा जाता है। इसमें वर्णों को पहचानना, उनका शुद्ध उच्चारण करना और उचित गति से पढ़ना प्रमुख क्रियाएँ हैं।
सस्वर वाचन पठन की प्रारम्भिक अवस्था है। जब बालक बोलना सीखना प्रारम्भ करता है, तब उसे बोल-बोलकर पढ़ने का अभ्यास कराया जाता है।
सस्वर वाचन तथा मौन वाचन में अन्तर
- सस्वर वाचन बोलकर किया जाता है, जबकि मौन वाचन चुपचाप और बिना होंठ हिलाए किया जाता है।
- सस्वर वाचन छोटी कक्षाओं, जैसे 4, 5, 6, 7 और 8 में अधिक उपयोगी माना गया है, जबकि मौन वाचन उच्च कक्षाओं, जैसे 9, 10, 11 और 12 में अधिक उपयोगी होता है।
- सस्वर वाचन में ध्यानपूर्वक सुनना भी आवश्यक होता है, जबकि मौन वाचन में पाठ के गहन विचारों को समझना आवश्यक होता है।
- सस्वर वाचन में उच्चारण के माध्यम से अर्थ ग्रहण किया जाता है, जबकि मौन वाचन में बिना उच्चारण किए अर्थ ग्रहण किया जाता है।
- सस्वर वाचन में बालक अपेक्षाकृत कम सीख पाता है, जबकि मौन वाचन में अधिक सामग्री ग्रहण कर सकता है।
- सस्वर वाचन में स्थूल एवं सूक्ष्म अध्ययन सम्भव होता है, जबकि मौन वाचन में सूक्ष्म एवं व्यापक अध्ययन सम्भव होता है।
- सस्वर वाचन में पढ़ने और समझने की गति अपेक्षाकृत धीमी होती है, जबकि मौन वाचन में समझने की गति तीव्र होती है।
- सस्वर वाचन मुख्यतः उच्चारण की शुद्धता के लिए किया जाता है, जबकि मौन वाचन विषय-वस्तु को ग्रहण करने के लिए किया जाता है।
- वाचन कौशल के विकास के लिए प्रश्नोत्तर, वार्तालाप, सस्वर वाचन, वाद-विवाद, भाषण, चित्र-वर्णन, कहानी और कविता-पाठ जैसी विधियों का प्रयोग किया जाता है।
- बिना उच्चारण किए शान्तिपूर्वक पढ़कर अर्थ ग्रहण करना मौन वाचन कहलाता है।
- स्वर सहित पढ़ते हुए अर्थ ग्रहण करना सस्वर वाचन कहलाता है।
- सस्वर वाचन उच्चारण की शुद्धता एवं प्रारम्भिक पठन-अभ्यास के लिए उपयोगी है।
- मौन वाचन में पाठक विषय-वस्तु, भाव और विचारों को अधिक गहराई से ग्रहण करता है।
- सस्वर वाचन में पढ़ने की गति अपेक्षाकृत धीमी, जबकि मौन वाचन में समझने की गति अधिक होती है।