रेखागणित की मूल अवधारणाएँ — बिन्दु, रेखा एवं रेखाखण्ड
रेखागणित का अर्थ
ज्यामिति या रेखागणित गणित की वह शाखा है जिसमें विभिन्न आकृतियों, उनके आकार, स्थिति और माप का अध्ययन किया जाता है।
ज्यामिति शब्द संस्कृत के दो शब्दों— ज्या और मिति से बना है। ज्या का अर्थ पृथ्वी तथा मिति का अर्थ मापन है। इस प्रकार ज्यामिति का शाब्दिक अर्थ पृथ्वी का मापन है।
रेखागणित की मूल रचनाएँ बिन्दु और रेखा से प्रारम्भ होती हैं। इन्हीं से आगे रेखाखण्ड, तल, किरण, वक्र और कोण जैसी आकृतियों की अवधारणा विकसित होती है।
बिन्दु क्या है?
बिन्दु ज्यामिति की सबसे आधारभूत अवधारणा है। इसका उपयोग किसी स्थान या स्थिति को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।
कागज पर बारीक पेंसिल से बनाया गया छोटा-सा चिह्न (•) बिन्दु को प्रदर्शित करता है।
बिन्दु की केवल स्थिति होती है। इसकी कोई लंबाई, चौड़ाई या मोटाई नहीं मानी जाती।
बिन्दु का नामकरण
बिन्दुओं को सामान्यतः बड़े अंग्रेजी अक्षरों से प्रदर्शित किया जाता है, जैसे—
यहाँ A, B, P और Q अलग-अलग बिन्दुओं के नाम हैं।
बिन्दु के दैनिक जीवन के उदाहरण
- कम्पास की नोक
- सुई की नोक
- कागज पर बनाया गया सूक्ष्म चिह्न
- आकाश में बहुत दूर दिखाई देने वाला तारा
इन उदाहरणों से बिन्दु की स्थिति का आभास होता है, जबकि ज्यामिति में बिन्दु की लंबाई, चौड़ाई और मोटाई नहीं मानी जाती।
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा — बिन्दु
ज्यामिति में किसी निश्चित स्थान या स्थिति को प्रदर्शित करने वाले आकारहीन सूक्ष्म चिह्न को बिन्दु कहते हैं। बिन्दु की लंबाई, चौड़ाई और मोटाई नहीं होती।
रेखा क्या है?
किसी समतल पर दो बिन्दुओं को मिलाने पर प्राप्त सीधी आकृति को रेखा कहा जाता है।
रेखा की केवल लंबाई मानी जाती है। इसकी चौड़ाई और मोटाई नहीं होती।
रेखा का कोई निश्चित प्रारम्भिक या अन्तिम बिन्दु नहीं होता। इसे दोनों दिशाओं में अनन्त तक बढ़ाया जा सकता है।
रेखा की मुख्य विशेषताएँ
- रेखा की लंबाई होती है, पर चौड़ाई और मोटाई नहीं होती।
- रेखा का कोई निश्चित प्रारम्भिक बिन्दु नहीं होता।
- रेखा का कोई निश्चित अन्तिम बिन्दु नहीं होता।
- रेखा को दोनों दिशाओं में अनन्त तक बढ़ाया जा सकता है।
- एक रेखा पर अनन्त बिन्दु हो सकते हैं।
दो बिन्दुओं से रेखा
यदि किसी रेखा पर दो बिन्दु A और B स्थित हों, तो उस रेखा को A और B की सहायता से प्रदर्शित किया जा सकता है।
अर्थात A और B उस रेखा पर स्थित दो बिन्दु हैं, जबकि रेखा दोनों ओर आगे बढ़ती रहती है।
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा — रेखा
दो बिन्दुओं को मिलाकर प्राप्त वह सीधी आकृति जो दोनों दिशाओं में अनन्त तक बढ़ाई जा सके, रेखा कहलाती है। इसकी चौड़ाई और मोटाई नहीं होती।
रेखाखण्ड क्या है?
दो निश्चित बिन्दुओं के बीच की सीधी तथा न्यूनतम दूरी को रेखाखण्ड कहते हैं।
रेखाखण्ड के दोनों सिरों पर निश्चित बिन्दु होते हैं, जिन्हें उसके अन्त बिन्दु कहते हैं।
यदि रेखाखण्ड के अन्त बिन्दु A और B हों, तो इसे रेखाखण्ड AB कहा जाता है।
यहाँ A और B रेखाखण्ड के दोनों अन्त बिन्दु हैं।
रेखाखण्ड की मुख्य विशेषताएँ
- रेखाखण्ड के दो निश्चित अन्त बिन्दु होते हैं।
- इसकी लंबाई निश्चित होती है।
- दो बिन्दुओं के बीच की न्यूनतम सीधी दूरी रेखाखण्ड होती है।
- रेखाखण्ड को मापा जा सकता है।
रेखाखण्ड के दैनिक जीवन के उदाहरण
पाठ्यपुस्तक में रेखाखण्ड के उदाहरण के रूप में निम्न वस्तुओं के सीधे किनारों का उल्लेख किया गया है—
- बॉक्स का किनारा
- ट्यूब लाइट का किनारा
- पोस्टकार्ड का किनारा
इनके दोनों सिरे निश्चित होते हैं, इसलिए इनके सीधे किनारे रेखाखण्ड की अवधारणा को समझने में सहायता करते हैं।
आकृति में रेखाखण्ड की पहचान
यदि किसी आयत के शीर्ष A, B, C और D हों, तो उसकी चार भुजाएँ—
AB, BC, CD और DA
रेखाखण्ड हैं।
यदि उसी आकृति में विकर्ण खींचे जाएँ और वे O पर मिलें, तो—
AO, OC, BO और OD
भी रेखाखण्ड होंगे।
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा — रेखाखण्ड
दो निश्चित बिन्दुओं के बीच की न्यूनतम सीधी दूरी को रेखाखण्ड कहते हैं। इसके दोनों सिरे निश्चित होते हैं जिन्हें अन्त बिन्दु कहा जाता है।
बिन्दु, रेखा और रेखाखण्ड में अंतर
| बिन्दु | रेखा | रेखाखण्ड |
|---|---|---|
| केवल स्थिति दर्शाता है | दोनों दिशाओं में अनन्त | दो निश्चित बिन्दुओं के बीच सीमित |
| कोई लंबाई नहीं | लंबाई अनन्त मानी जाती है | लंबाई निश्चित होती है |
| अन्त बिन्दु का प्रश्न नहीं | कोई अन्त बिन्दु नहीं | दो अन्त बिन्दु |
| बिन्दु A | A और B से होकर जाने वाली रेखा | रेखाखण्ड AB |
एक ही उदाहरण से तीनों को समझें
याद रखने की सरल विधि
बिन्दु = केवल स्थान रेखा = दोनों ओर अनन्त रेखाखण्ड = दो निश्चित अन्त बिन्दु
- रेखागणित में आकृतियों, उनके आकार, स्थिति और माप का अध्ययन किया जाता है।
- ज्यामिति का शाब्दिक अर्थ पृथ्वी का मापन है।
- बिन्दु ज्यामिति की सबसे आधारभूत अवधारणा है।
- बिन्दु की केवल स्थिति होती है; इसकी लंबाई, चौड़ाई और मोटाई नहीं होती।
- बिन्दुओं को सामान्यतः A, B, P, Q आदि बड़े अक्षरों से प्रदर्शित किया जाता है।
- रेखा का कोई प्रारम्भिक अथवा अन्तिम बिन्दु नहीं होता।
- रेखा दोनों दिशाओं में अनन्त तक बढ़ाई जा सकती है।
- एक रेखा पर अनन्त बिन्दु हो सकते हैं।
- दो निश्चित बिन्दुओं के बीच की न्यूनतम सीधी दूरी रेखाखण्ड कहलाती है।
- रेखाखण्ड के दो निश्चित अन्त बिन्दु होते हैं और इसकी लंबाई मापी जा सकती है।
Advertisement
तल एवं तलखण्ड
तल का अर्थ
तल किसी आकृति या संरचना की ऐसी समतल सतह है जिसकी मोटाई नहीं मानी जाती।
तल की अवधारणा को कागज की सतह तथा विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों की सपाट सतहों की सहायता से समझा जा सकता है।
घन, घनाभ आदि ठोस आकृतियों की सपाट सतहें तल की अवधारणा को स्पष्ट करती हैं।
तल की मुख्य विशेषताएँ
- तल एक समतल सतह की अवधारणा है।
- तल की मोटाई नहीं मानी जाती।
- तल में लंबाई और चौड़ाई की कल्पना की जाती है।
- तल पर अनेक बिन्दु और रेखाएँ स्थित हो सकती हैं।
- एक ही तल पर स्थित रेखाएँ समान्तर हो सकती हैं अथवा एक-दूसरे को प्रतिच्छेद कर सकती हैं।
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा — तल
किसी संरचना की वह समतल सतह जिसकी मोटाई नहीं मानी जाती, तल कहलाती है। तल पर अनेक बिन्दु तथा रेखाएँ स्थित हो सकती हैं।
तल के उदाहरण
तल की अवधारणा को निम्न उदाहरणों से समझा जा सकता है—
- कागज की समतल सतह
- घन का कोई एक फलक
- घनाभ की सपाट सतह
- वर्ग या आयत द्वारा घिरा समतल भाग
दो बिन्दु और तल
यदि किसी तल पर दो निश्चित बिन्दु दिए गए हों, तो उन दोनों बिन्दुओं से होकर केवल एक सीधी रेखा खींची जा सकती है।
वह पूरी रेखा उसी तल में स्थित होती है जिसमें दोनों बिन्दु स्थित हैं।
यदि दो बिन्दु X और Y एक ही तल में स्थित हों, तो—
X और Y से होकर जाने वाली केवल एक सीधी रेखा होगी।
महत्वपूर्ण तथ्य
तल से संबंधित पाठ्यपुस्तक में निम्न तथ्य दिए गए हैं—
- दो बिन्दुओं से होकर अनेक तल बनाए जा सकते हैं।
- किसी समतल में दिए गए एक बिन्दु से असंख्य रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
- एक ही तल के दो निश्चित बिन्दुओं से केवल एक सीधी रेखा खींची जा सकती है।
एक बिन्दु से अनेक रेखाएँ
किसी एक बिन्दु से अलग-अलग दिशाओं में अनेक रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
इससे स्पष्ट है कि एक ही बिन्दु से होकर अनेक रेखाएँ गुजर सकती हैं।
एक तल पर दो रेखाओं की स्थिति
एक ही तल पर स्थित दो सीधी रेखाएँ मुख्यतः दो प्रकार की स्थिति में हो सकती हैं—
- समान्तर रेखाएँ
- प्रतिच्छेदी रेखाएँ
समान्तर रेखाएँ
एक ही तल पर स्थित ऐसी दो रेखाएँ जो आगे बढ़ाने पर भी एक-दूसरे को नहीं काटतीं, समान्तर रेखाएँ कहलाती हैं।
यहाँ AB और CD समान्तर रेखाएँ हैं।
प्रतिच्छेदी रेखाएँ
एक ही तल में स्थित ऐसी दो रेखाएँ जो किसी एक बिन्दु पर एक-दूसरे को काटती हैं, प्रतिच्छेदी रेखाएँ कहलाती हैं।
यहाँ AB और CD एक बिन्दु पर एक-दूसरे को प्रतिच्छेद करती हैं।
समान्तर और प्रतिच्छेदी रेखाओं में अंतर
| समान्तर रेखाएँ | प्रतिच्छेदी रेखाएँ |
|---|---|
| एक-दूसरे को नहीं काटतीं | एक बिन्दु पर एक-दूसरे को काटती हैं |
| दोनों एक ही तल में स्थित होती हैं | दोनों एक ही तल में स्थित होती हैं |
| जैसे AB ∥ CD | जैसे AB और CD का एक बिन्दु पर मिलना |
तलखण्ड का अर्थ
किसी तल के एक निश्चित भाग को तलखण्ड कहते हैं।
ठोस आकृतियों के प्रत्येक सपाट फलक को तलखण्ड की सहायता से समझा जा सकता है।
घन और तलखण्ड
घन के कुल 6 फलक होते हैं। प्रत्येक फलक एक समतल भाग है और उसे तलखण्ड के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।
घन ↓ 6 फलक ↓ प्रत्येक फलक = एक तलखण्ड
इसी प्रकार चॉक के डिब्बे या किसी घनाभाकार बॉक्स की प्रत्येक सपाट सतह तलखण्ड का उदाहरण है।
तल और तलखण्ड में अंतर
| तल | तलखण्ड |
|---|---|
| समतल सतह की व्यापक अवधारणा | तल का निश्चित भाग |
| इसकी मोटाई नहीं मानी जाती | यह भी समतल भाग होता है |
| इस पर अनेक बिन्दु और रेखाएँ हो सकती हैं | जैसे घन का एक फलक |
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा — तलखण्ड
किसी तल के निश्चित भाग को तलखण्ड कहते हैं। घन अथवा घनाभ का प्रत्येक सपाट फलक तलखण्ड का उदाहरण है।
याद रखने की सरल विधि
समतल सतह = तल तल का निश्चित भाग = तलखण्ड एक तल की दो रेखाएँ → समान्तर या प्रतिच्छेदी
- तल एक ऐसी समतल सतह है जिसकी मोटाई नहीं मानी जाती।
- तल पर अनेक बिन्दु और रेखाएँ स्थित हो सकती हैं।
- एक बिन्दु से होकर असंख्य रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
- एक ही तल में स्थित दो निश्चित बिन्दुओं से होकर केवल एक सीधी रेखा खींची जा सकती है।
- एक ही तल की दो रेखाएँ समान्तर अथवा प्रतिच्छेदी हो सकती हैं।
- समान्तर रेखाएँ एक-दूसरे को नहीं काटतीं।
- प्रतिच्छेदी रेखाएँ एक बिन्दु पर एक-दूसरे को काटती हैं।
- किसी तल के निश्चित भाग को तलखण्ड कहते हैं।
- घन के कुल 6 फलक होते हैं और प्रत्येक फलक तलखण्ड का उदाहरण है।
Semester 1 की Complete तैयारी
- Official Syllabus
- Comprehensive Notes
- Quick Revision Notes
- Visual Revision Notes
- Audio Revision
- Solved MCQs
- MCQ Tests
- 2015–2025 Previous Year Papers
- Repeated Exam Questions
- 10 Model Papers
वक्र एवं बन्द वक्र में स्थिति
वक्र का अर्थ
ऐसी रेखा जो स्वतंत्र अथवा अबाधित प्रवाह के रूप में आगे बढ़ती है, उसे वक्र कहा जाता है।
वक्र का आकार आवश्यक नहीं कि सीधा हो। वह अलग-अलग दिशाओं में मुड़ सकता है और विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ बना सकता है।
सरल वक्र
ऐसा वक्र जो चलते हुए स्वयं को प्रतिच्छेदित नहीं करता, सरल वक्र कहलाता है।
अर्थात सरल वक्र में कोई भाग दूसरे भाग को काटता नहीं है।
स्वयं को न काटने वाला वक्र = सरल वक्र
बन्द वक्र
जब किसी वक्र के दोनों अन्तिम बिन्दु आपस में मिल जाते हैं और उससे एक घिरा हुआ भाग बनता है, तो ऐसा वक्र बन्द वक्र कहलाता है।
बन्द वक्र अपने भीतर एक निश्चित क्षेत्र को घेरता है।
वक्र के अन्तिम बिन्दु मिलें ↓ घिरा हुआ भाग बने ↓ बन्द वक्र
दैनिक जीवन में वक्र के उदाहरण
पाठ्यपुस्तक में वक्र सतह को समझने के लिए गेंद और बाल्टी के उदाहरण दिए गए हैं।
1. गेंद
गेंद को देखने पर उसमें कोई स्पष्ट सपाट फलक दिखाई नहीं देता। उसकी बाहरी सतह चारों ओर मुड़ी हुई होती है।
इसलिए गेंद की सतह वक्र पृष्ठ का उदाहरण है।
2. बाल्टी
बाल्टी का आधार वृत्ताकार तथा सपाट हो सकता है, जबकि उसके चारों ओर की पार्श्व सतह मुड़ी हुई होती है।
इसलिए बाल्टी की पार्श्व सतह भी वक्र सतह का उदाहरण है।
बन्द वक्र में बिन्दु की स्थिति
किसी बन्द वक्र के सापेक्ष किसी बिन्दु की स्थिति मुख्यतः तीन प्रकार की हो सकती है—
- वक्र का अन्तः भाग
- वक्र की परिधि
- वक्र का बाह्य भाग
1. वक्र का अन्तः भाग
यदि कोई बिन्दु बन्द वक्र से घिरे हुए भाग के अन्दर स्थित हो, तो वह बिन्दु वक्र के अन्तः भाग में माना जाता है।
अतः बिन्दु P वक्र के अन्तः भाग में है।
2. वक्र की परिधि
यदि कोई बिन्दु बन्द वक्र की रेखा पर ही स्थित हो, तो वह बिन्दु वक्र की परिधि पर माना जाता है।
3. वक्र का बाह्य भाग
यदि कोई बिन्दु बन्द वक्र के घिरे हुए भाग के बाहर स्थित हो, तो वह वक्र के बाह्य भाग में माना जाता है।
क्षेत्र (Region)
बन्द वक्र का अन्तः भाग और उसकी परिधि दोनों को एक साथ क्षेत्र कहा जाता है।
अन्तः भाग + परिधि = क्षेत्र
इसलिए किसी बन्द वक्र का क्षेत्र केवल उसके अन्दर का भाग नहीं, बल्कि उसकी सीमा अर्थात परिधि को भी सम्मिलित करता है।
तीनों स्थितियों में अंतर
| स्थिति | बिन्दु कहाँ होगा? |
|---|---|
| अन्तः भाग | बन्द वक्र के अन्दर |
| परिधि | वक्र की सीमा पर |
| बाह्य भाग | बन्द वक्र के बाहर |
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा — वक्र
अबाधित प्रवाह के रूप में खींची गई मुड़ी हुई रेखा को वक्र कहते हैं। जो वक्र स्वयं को प्रतिच्छेदित नहीं करता, उसे सरल वक्र कहते हैं।
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा — बन्द वक्र
जिस वक्र के दोनों अन्तिम बिन्दु आपस में मिलकर एक घिरा हुआ भाग बनाते हैं, उसे बन्द वक्र कहते हैं।
परीक्षा में लिखने योग्य उत्तर — बन्द वक्र में स्थितियाँ
बन्द वक्र के सापेक्ष किसी बिन्दु की तीन स्थितियाँ होती हैं— वक्र का अन्तः भाग, वक्र की परिधि और वक्र का बाह्य भाग।
याद रखने की सरल विधि
बिन्दु अन्दर = अन्तः भाग बिन्दु सीमा पर = परिधि बिन्दु बाहर = बाह्य भाग
- वक्र को अबाधित प्रवाह के रूप में समझा जा सकता है।
- जो वक्र स्वयं को प्रतिच्छेदित नहीं करता, वह सरल वक्र कहलाता है।
- जिस वक्र के अन्तिम बिन्दु मिलकर घिरा हुआ भाग बनाते हैं, वह बन्द वक्र कहलाता है।
- गेंद की बाहरी सतह वक्र पृष्ठ का उदाहरण है।
- बाल्टी की पार्श्व सतह वक्र सतह का उदाहरण है।
- बन्द वक्र के सापेक्ष बिन्दु अन्दर, परिधि पर या बाहर हो सकता है।
- बन्द वक्र के अन्दर स्थित बिन्दु उसके अन्तः भाग में होता है।
- वक्र की सीमा पर स्थित बिन्दु उसकी परिधि पर होता है।
- वक्र के बाहर स्थित बिन्दु उसके बाह्य भाग में होता है।
- अन्तः भाग + परिधि = क्षेत्र।
Advertisement
किरण — अवधारणा एवं गुण
किरण का अर्थ
किरण, रेखा का एक भाग होती है। यह किसी एक निश्चित बिन्दु से प्रारम्भ होकर एक दिशा में अनन्त तक आगे बढ़ती है।
जिस बिन्दु से किरण प्रारम्भ होती है, उसे उसका प्रारम्भ बिन्दु कहते हैं।
तीर का चिन्ह यह बताता है कि किरण किस दिशा में अनन्त तक आगे बढ़ रही है।
किरण की मुख्य विशेषताएँ
- किरण रेखा का एक भाग होती है।
- किरण का एक निश्चित प्रारम्भ बिन्दु होता है।
- यह केवल एक दिशा में अनन्त तक बढ़ती है।
- किरण की दिशा को तीर के चिन्ह द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
- किसी एक बिन्दु से अनेक किरणें खींची जा सकती हैं।
किरण का निरूपण
किरण को सामान्यतः दो बिन्दुओं की सहायता से नाम दिया जाता है। पहला अक्ष उसके प्रारम्भ बिन्दु को तथा दूसरा अक्ष उसकी दिशा में स्थित किसी अन्य बिन्दु को दर्शाता है।
जैसे—
इस किरण का प्रारम्भ बिन्दु A है और यह B की दिशा में आगे बढ़ रही है।
अतः इसे किरण AB कहा जा सकता है।
महत्वपूर्ण सावधानी
किरण का केवल एक प्रारम्भ बिन्दु होता है। इसकी दूसरी ओर कोई निश्चित अन्त बिन्दु नहीं होता, क्योंकि यह उस दिशा में अनन्त तक बढ़ती रहती है।
किरण के दैनिक जीवन के उदाहरण
पाठ्यपुस्तक में किरण के उदाहरण के रूप में प्रकाश से संबंधित स्थितियाँ दी गई हैं—
- प्रकाश की किरण
- टॉर्च से निकलने वाला प्रकाश
- सूर्य से आने वाला प्रकाश
इन उदाहरणों में प्रकाश किसी स्रोत से निकलकर एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ता हुआ दिखाई देता है।
एक बिन्दु से अनेक किरणें
किसी एक बिन्दु से अलग-अलग दिशाओं में अनेक किरणें खींची जा सकती हैं।
यहाँ सभी किरणों का प्रारम्भ बिन्दु Z है, लेकिन उनकी दिशाएँ अलग-अलग हैं।
एक ही बिन्दु से विपरीत दिशाओं में किरणें
यदि किसी सीधी रेखा पर A, D और B तीन बिन्दु इस प्रकार हों कि D बीच में हो—
तो D से दो विपरीत दिशाओं में दो किरणें प्राप्त होती हैं—
दोनों किरणों का प्रारम्भ बिन्दु D समान है, परन्तु उनकी दिशाएँ विपरीत हैं।
रेखा और किरण में अंतर
| रेखा | किरण |
|---|---|
| दोनों दिशाओं में अनन्त तक बढ़ती है | एक दिशा में अनन्त तक बढ़ती है |
| कोई निश्चित प्रारम्भ बिन्दु नहीं | एक निश्चित प्रारम्भ बिन्दु होता है |
रेखाखण्ड और किरण में अंतर
| रेखाखण्ड | किरण |
|---|---|
| दो निश्चित अन्त बिन्दु होते हैं | एक निश्चित प्रारम्भ बिन्दु होता है |
| लंबाई निश्चित होती है | एक दिशा में अनन्त तक जाती है |
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा
रेखा का वह भाग जो एक निश्चित बिन्दु से प्रारम्भ होकर एक दिशा में अनन्त तक बढ़ता है, किरण कहलाता है। किरण के प्रारम्भ बिन्दु को आरम्भ बिन्दु कहते हैं तथा उसकी दिशा तीर के चिन्ह से प्रदर्शित की जाती है।
याद रखने की सरल विधि
रेखाखण्ड = दोनों ओर निश्चित किरण = एक ओर निश्चित + एक ओर अनन्त रेखा = दोनों ओर अनन्त
- किरण रेखा का एक भाग होती है।
- किरण का एक निश्चित प्रारम्भ बिन्दु होता है।
- यह एक दिशा में अनन्त तक बढ़ती है।
- तीर का चिन्ह किरण की दिशा बताता है।
- प्रकाश की किरण, टॉर्च का प्रकाश और सूर्य का प्रकाश इसके उदाहरण हैं।
- किसी एक बिन्दु से अनेक किरणें खींची जा सकती हैं।
- D से विपरीत दिशाओं में किरण DA तथा किरण DB बनाई जा सकती हैं।
कोण — अवधारणा, नामकरण एवं मापन
कोण का अर्थ
एक ही बिन्दु से निकलने वाली दो किरणों के बीच का भाग कोण का निर्माण करता है।
दोनों किरणों का जो बिन्दु समान होता है, उसे कोण का शीर्ष कहते हैं।
जैसे यदि OA और OB दो किरणें बिन्दु O से निकलती हैं, तो इनके बीच बनने वाला कोण—
इस प्रकार बिन्दु O कोण का शीर्ष तथा OA और OB उसकी भुजाएँ हैं।
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा — कोण
एक ही बिन्दु से निकलने वाली दो किरणों के बीच बनने वाली आकृति को कोण कहते हैं। दोनों किरणों का उभयनिष्ठ बिन्दु कोण का शीर्ष कहलाता है।
कोण के मुख्य भाग
कोण की रचना में मुख्यतः तीन बातें महत्वपूर्ण होती हैं—
- शीर्ष — वह समान बिन्दु जहाँ से दोनों किरणें निकलती हैं।
- प्रारम्भिक भुजा — वह किरण जहाँ से कोण का घूर्णन प्रारम्भ माना जाता है।
- अन्तिम भुजा — वह किरण जहाँ घूर्णन समाप्त माना जाता है।
प्रारम्भिक और अन्तिम भुजा
कोण की दिशा को समझने के लिए एक किरण को प्रारम्भिक भुजा तथा दूसरी को अन्तिम भुजा माना जाता है।
प्रारम्भिक भुजा ↓ घूर्णन ↓ अन्तिम भुजा
कोण की दिशा प्रारम्भिक भुजा से अन्तिम भुजा की ओर मानी जाती है।
कोण के घूर्णन की दिशा
पाठ्यपुस्तक के अनुसार कोण का घूर्णन दो दिशाओं में हो सकता है—
- वामावर्त घूर्णन
- दक्षिणावर्त घूर्णन
वामावर्त घूर्णन
यदि कोण का घूर्णन घड़ी की सुइयों की विपरीत दिशा में हो, तो उसे वामावर्त घूर्णन कहते हैं।
ऐसे कोण को धनात्मक कोण माना जाता है।
वामावर्त घूर्णन = धनात्मक कोण
दक्षिणावर्त घूर्णन
यदि कोण का घूर्णन घड़ी की सुइयों की दिशा में हो, तो उसे दक्षिणावर्त घूर्णन कहते हैं।
ऐसे कोण को ऋणात्मक कोण माना जाता है।
दक्षिणावर्त घूर्णन = ऋणात्मक कोण
वामावर्त और दक्षिणावर्त में अंतर
| वामावर्त | दक्षिणावर्त |
|---|---|
| घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा | घड़ी की सुइयों की दिशा |
| धनात्मक कोण | ऋणात्मक कोण |
कोण को प्रदर्शित करने का चिन्ह
कोण को सामान्यतः ∠ चिन्ह द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
कोण को ग्रीक अक्षर θ (थीटा) द्वारा भी प्रदर्शित किया जा सकता है।
कोण का चिन्ह = ∠ कोण का मान = θ
कोण का नामकरण
किसी कोण का नाम एक अक्षर या तीन अक्षरों की सहायता से लिखा जा सकता है।
1. एक अक्षर से नामकरण
यदि कोण के शीर्ष की पहचान स्पष्ट हो, तो केवल शीर्ष के अक्षर से कोण लिखा जा सकता है।
जैसे यदि शीर्ष B हो, तो—
∠B
2. तीन अक्षरों से नामकरण
कोण का नाम तीन अक्षरों से लिखते समय शीर्ष वाले अक्षर को हमेशा बीच में रखा जाता है।
यदि BA और BC दो किरणें बिन्दु B से निकलती हैं, तो कोण का नाम होगा—
यहाँ बीच का अक्षर B कोण का शीर्ष है।
नामकरण का सबसे महत्वपूर्ण नियम
तीन अक्षरों से कोण का नाम ↓ शीर्ष वाला अक्षर बीच में
उदाहरण — चतुर्भुज ABCD के कोण
यदि किसी आकृति के शीर्ष A, B, C और D हों, तो उसके कोणों को इस प्रकार लिखा जा सकता है—
∠ABC ∠BCD ∠CDA ∠DAB
प्रत्येक नाम में बीच का अक्षर उस कोण के शीर्ष को बताता है।
कोण का मापन
कोण को मापने की इकाई अंश होती है, जिसे ° चिन्ह द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
जैसे—
30° 60° 90° 120°
इनका अर्थ क्रमशः 30 अंश, 60 अंश, 90 अंश और 120 अंश है।
समकोण का उदाहरण
पाठ्यपुस्तक के अनुसार समकोण का माप—
90°
होता है।
अर्थात यदि किसी कोण का माप 90° है, तो उसे समकोण कहा जाता है।
चाँदा क्या है?
कोण बनाने तथा कोण का माप ज्ञात करने के लिए जिस उपकरण का उपयोग किया जाता है, उसे चाँदा (Protractor) कहते हैं।
चाँदे से कोण मापने की सामान्य प्रक्रिया
- चाँदे के केन्द्र को कोण के शीर्ष पर रखें।
- चाँदे की आधार रेखा को कोण की एक भुजा के साथ मिलाएँ।
- दूसरी भुजा जिस अंश पर मिले, वही उस कोण का माप होगा।
कोण बनाते समय ध्यान रखें
- दोनों किरणों का प्रारम्भ बिन्दु समान होना चाहिए।
- समान बिन्दु कोण का शीर्ष होगा।
- कोण का नाम तीन अक्षरों में लिखते समय शीर्ष बीच में रखें।
- कोण का माप अंश में लिखा जाता है।
- मापन और निर्माण के लिए चाँदे का प्रयोग किया जाता है।
कोण की अवधारणा एक नज़र में
दो किरणें + एक समान प्रारम्भ बिन्दु ↓ कोण समान बिन्दु = शीर्ष कोण का माप = अंश (°)
परीक्षा में लिखने योग्य उत्तर — कोण का नामकरण
कोण को एक या तीन अक्षरों से लिखा जा सकता है। तीन अक्षरों से कोण का नाम लिखते समय कोण के शीर्ष को दर्शाने वाला अक्षर हमेशा बीच में लिखा जाता है। जैसे ∠ABC में B कोण का शीर्ष है।
परीक्षा में लिखने योग्य उत्तर — कोण का मापन
कोण के मापन की इकाई अंश (°) है। कोण को बनाने तथा उसका माप ज्ञात करने के लिए चाँदे का प्रयोग किया जाता है।
याद रखने की सरल विधि
दो किरणें + समान बिन्दु = कोण बीच का अक्षर = शीर्ष कोण की इकाई = अंश (°) मापने का उपकरण = चाँदा
- एक ही बिन्दु से निकलने वाली दो किरणों के बीच का भाग कोण बनाता है।
- दोनों किरणों का समान बिन्दु कोण का शीर्ष कहलाता है।
- कोण की दो भुजाएँ प्रारम्भिक तथा अन्तिम भुजा के रूप में समझी जाती हैं।
- वामावर्त घूर्णन को धनात्मक तथा दक्षिणावर्त घूर्णन को ऋणात्मक माना जाता है।
- कोण को ∠ तथा उसके मान को θ से प्रदर्शित किया जा सकता है।
- तीन अक्षरों से कोण का नाम लिखते समय शीर्ष का अक्षर बीच में रखा जाता है।
- ∠ABC में B कोण का शीर्ष है।
- कोण मापने की इकाई अंश (°) है।
- समकोण का माप 90° होता है।
- कोण बनाने तथा मापने के लिए चाँदे का प्रयोग किया जाता है।
Advertisement
कोणों के प्रकार एवं संबंधित तथ्य
कोणों के प्रकार
कोणों को उनके माप के आधार पर विभिन्न प्रकारों में बाँटा जाता है। पाठ्यपुस्तक में मुख्यतः पाँच प्रकार के कोण बताए गए हैं—
- न्यूनकोण
- समकोण
- अधिककोण
- ऋजुकोण / सरल कोण
- वृहत कोण
1. न्यूनकोण
जिस कोण का माप 90° से कम होता है, उसे न्यूनकोण कहते हैं।
0° < कोण < 90°
जैसे—
30°, 60°, 74°
ये सभी 90° से कम हैं, इसलिए न्यूनकोण हैं।
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा
90° से कम माप वाले कोण को न्यूनकोण कहते हैं।
2. समकोण
जिस कोण का माप ठीक 90° होता है, उसे समकोण कहते हैं।
समकोण = 90°
चित्र में समकोण को प्रायः कोण के अन्दर बने छोटे वर्ग के चिन्ह से प्रदर्शित किया जाता है।
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा
90° माप वाले कोण को समकोण कहते हैं।
3. अधिककोण
जिस कोण का माप 90° से अधिक तथा 180° से कम होता है, उसे अधिककोण कहते हैं।
90° < कोण < 180°
जैसे—
120°, 135°, 150°
ये कोण 90° से अधिक और 180° से कम हैं, इसलिए अधिककोण हैं।
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा
90° से अधिक तथा 180° से कम माप वाले कोण को अधिककोण कहते हैं।
4. ऋजुकोण / सरल कोण
जिस कोण का माप ठीक 180° होता है, उसे ऋजुकोण अथवा सरल कोण कहते हैं।
ऋजुकोण / सरल कोण = 180°
इसमें दोनों भुजाएँ विपरीत दिशाओं में होती हैं और एक सीधी रेखा बनाती हैं।
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा
180° के कोण को ऋजुकोण या सरल कोण कहते हैं।
5. वृहत कोण
जिस कोण का माप 180° से अधिक तथा 360° से कम होता है, उसे वृहत कोण कहते हैं।
180° < कोण < 360°
जैसे—
185°, 270°, 305°
पाठ्यपुस्तक के वस्तुनिष्ठ प्रश्न में 305° को वृहत कोण के रूप में पूछा गया है।
परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा
180° से अधिक तथा 360° से कम माप वाले कोण को वृहत कोण कहते हैं।
पाँचों प्रकार के कोण एक साथ
| कोण | माप | उदाहरण |
|---|---|---|
| न्यूनकोण | 90° से कम | 60° |
| समकोण | 90° | 90° |
| अधिककोण | 90° से अधिक, 180° से कम | 135° |
| ऋजुकोण / सरल कोण | 180° | 180° |
| वृहत कोण | 180° से अधिक, 360° से कम | 305° |
कोण की पहचान कैसे करें?
90° से कम → न्यूनकोण 90° → समकोण 90° से अधिक और 180° से कम → अधिककोण 180° → सरल कोण 180° से अधिक और 360° से कम → वृहत कोण
उदाहरण — 185°, 12° तथा 74° में न्यूनकोण पहचानिए
न्यूनकोण का माप 90° से कम होता है।
185° > 90° → न्यूनकोण नहीं 12° < 90° → न्यूनकोण 74° < 90° → न्यूनकोण
अतः 12° तथा 74° न्यूनकोण हैं।
कोटिपूरक कोण
यदि दो कोणों का योगफल 90° हो, तो उन कोणों को कोटिपूरक अथवा पूरककोण (Complementary Angles) कहते हैं।
कोण 1 + कोण 2 = 90°
उदाहरण — 30° और 60°
पाठ्यपुस्तक के उदाहरण में दो कोणों का माप 30° तथा 60° दिया गया है।
30° + 60° = 90°
30° + 60° = 90°
अतः 30° और 60° एक-दूसरे के कोटिपूरक कोण हैं।
कोटिपूरक कोण का दूसरा कोण कैसे ज्ञात करें?
यदि एक कोण ज्ञात हो, तो उसका कोटिपूरक कोण 90° में से उस कोण को घटाकर प्राप्त किया जा सकता है।
कोटिपूरक कोण = 90° − दिया गया कोण
जैसे यदि एक कोण 30° है—
दूसरा कोण = 90° − 30° = 60°
अतः 30° का कोटिपूरक कोण 60° है।
कोटिपूरक कोण की परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा
ऐसे दो कोण जिनके मापों का योग 90° हो, कोटिपूरक कोण कहलाते हैं। जैसे 30° और 60° कोटिपूरक कोण हैं क्योंकि 30° + 60° = 90°।
कोणों से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
- कोण के मापन की इकाई अंश (°) है।
- 90° का कोण समकोण होता है।
- कोण को बनाने तथा मापने के लिए चाँदे का प्रयोग किया जाता है।
- दो कोणों का योग 90° होने पर वे कोटिपूरक कोण कहलाते हैं।
महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ तथ्य
90° → समकोण 135° → अधिककोण 180° → सरल कोण 305° → वृहत कोण
एक नज़र में पूरा वर्गीकरण
0° से 90° के बीच → न्यूनकोण 90° → समकोण 90° से 180° के बीच → अधिककोण 180° → सरल कोण 180° से 360° के बीच → वृहत कोण
परीक्षा में लिखने योग्य उत्तर — कोणों के प्रकार
माप के आधार पर कोण मुख्यतः पाँच प्रकार के होते हैं— न्यूनकोण, समकोण, अधिककोण, ऋजुकोण या सरल कोण तथा वृहत कोण। 90° से कम कोण न्यूनकोण, 90° का कोण समकोण, 90° से अधिक तथा 180° से कम कोण अधिककोण, 180° का कोण सरल कोण तथा 180° से अधिक और 360° से कम कोण वृहत कोण कहलाता है।
याद रखने की सरल विधि
< 90° = न्यूनकोण 90° = समकोण 90° से 180° के बीच = अधिककोण 180° = सरल कोण 180° से 360° के बीच = वृहत कोण दो कोणों का योग 90° = कोटिपूरक कोण
- 90° से कम कोण को न्यूनकोण कहते हैं।
- 90° के कोण को समकोण कहते हैं।
- 90° से अधिक तथा 180° से कम कोण को अधिककोण कहते हैं।
- 180° के कोण को ऋजुकोण या सरल कोण कहते हैं।
- 180° से अधिक तथा 360° से कम कोण को वृहत कोण कहते हैं।
- 12° और 74° न्यूनकोण हैं।
- 305° वृहत कोण है।
- दो कोणों का योग 90° होने पर वे कोटिपूरक कोण कहलाते हैं।
- 30° + 60° = 90°, अतः 30° और 60° कोटिपूरक कोण हैं।
- किसी कोण का कोटिपूरक कोण = 90° − दिया गया कोण।
- कोण की इकाई अंश (°) है तथा इसे मापने के लिए चाँदे का प्रयोग किया जाता है।