व्यक्तित्व का अर्थ, परिभाषाएँ एवं विशेषताएँ
व्यक्तित्व का अर्थ
व्यक्तित्व अंग्रेजी के Personality शब्द का हिन्दी रूप है। Personality शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के Persona शब्द से हुई है, जिसका अर्थ नकाब या मुखौटा होता है। प्राचीन समय में यूनानी नाटककार अभिनय करते समय मुखौटा पहनते थे।
प्रारम्भ में व्यक्तित्व का अर्थ व्यक्ति के बाहरी रूप-रंग से लगाया जाता था, परन्तु यह धारणा वैज्ञानिक नहीं मानी गई। आधुनिक मनोविज्ञान में व्यक्तित्व का अर्थ व्यक्ति के केवल बाहरी रूप से नहीं, बल्कि उसके शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक तथा व्यवहारगत गुणों के समग्र संगठन से है।
अतः व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यवहार-प्रतिमान तथा उसकी सभी विशेषताओं के संगठित रूप को व्यक्तित्व कहा जाता है। व्यक्तित्व बाहरी एवं आन्तरिक गुणों का गत्यात्मक संगठन है, जो व्यक्ति के वातावरण के साथ समायोजन करने के ढंग को निर्धारित करता है।
व्यक्तित्व की प्रमुख परिभाषाएँ
वैलेन्टाइन के अनुसार
“व्यक्तित्व जन्मजात और अर्जित प्रवृत्तियों का योग है।”
गिलफोर्ड के अनुसार
“व्यक्तित्व गुणों का समन्वित रूप है।”
बिग एवं हंट के अनुसार
“व्यक्तित्व व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यवहार-प्रतिमान तथा उसकी समस्त विशेषताओं के योग को व्यक्त करता है।”
ऑलपोर्ट के अनुसार
ऑलपोर्ट ने व्यक्तित्व से सम्बन्धित लगभग 49 परिभाषाओं का अध्ययन करने के बाद वर्ष 1937 में व्यक्तित्व की विस्तृत परिभाषा प्रस्तुत की।
“व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर स्थित उन मनो-शारीरिक तंत्रों का गत्यात्मक संगठन है, जो वातावरण के प्रति उसके विशिष्ट समायोजन को निर्धारित करता है।”
ऑलपोर्ट की परिभाषा से स्पष्ट होता है कि व्यक्तित्व स्थिर नहीं होता। व्यक्ति के अनुभवों, विचारों, कार्यों और वातावरण में परिवर्तन के साथ उसका व्यक्तित्व भी विकसित और परिवर्तित होता रहता है।
व्यक्तित्व की विशेषताएँ
1. आत्मचेतना
आत्मचेतना व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता है। इसके द्वारा व्यक्ति स्वयं के गुणों, क्षमताओं, विचारों तथा समाज में अपनी स्थिति को पहचानता है। बालकों और पशुओं में विकसित आत्मचेतना का अभाव होने के कारण उनके व्यक्तित्व के विषय में निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
2. निरन्तर निर्माण की प्रक्रिया
व्यक्तित्व का निर्माण निरन्तर चलता रहता है। व्यक्ति के विचारों, अनुभवों और कार्यों में परिवर्तन होने के साथ उसके व्यक्तित्व में भी परिवर्तन होता है। व्यक्तित्व-विकास की यह प्रक्रिया शैशवावस्था से जीवनपर्यन्त चलती रहती है।
3. शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य
अच्छे व्यक्तित्व के विकास के लिए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आवश्यक है। अस्वस्थ शरीर या असंतुलित मानसिक स्थिति व्यक्ति के व्यक्तित्व-विकास में बाधा उत्पन्न कर सकती है।
4. दृढ़ इच्छाशक्ति
दृढ़ इच्छाशक्ति व्यक्ति को कठिनाइयों का सामना करने और अपने कार्यों को पूरा करने की क्षमता प्रदान करती है। कमजोर इच्छाशक्ति व्यक्तित्व को विघटित कर सकती है।
5. निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति
मनुष्य का व्यवहार किसी-न-किसी उद्देश्य से प्रेरित होता है। व्यक्ति के लक्ष्यों और उन लक्ष्यों के प्रति उसकी समझ के आधार पर उसके व्यक्तित्व का अनुमान लगाया जा सकता है।
6. सामाजिकता
व्यक्तित्व का विकास समाज से अलग रहकर नहीं हो सकता। अन्य व्यक्तियों के साथ सम्पर्क, क्रिया और अन्तःक्रिया द्वारा आत्मचेतना तथा सामाजिक गुणों का विकास होता है।
7. सामंजस्य
व्यक्ति को बाहरी वातावरण के साथ-साथ अपने आन्तरिक जीवन से भी सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है। परिस्थितियों के अनुरूप व्यवहार में परिवर्तन करने की क्षमता व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण गुण है।
8. एकीकरण
व्यक्तित्व व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और संवेगात्मक शक्तियों का संगठित एवं एकीकृत रूप है। जिस प्रकार शरीर का प्रत्येक अंग मिलकर कार्य करता है, उसी प्रकार व्यक्तित्व के सभी तत्व भी एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
- Personality शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के Persona शब्द से हुई है।
- Persona का अर्थ नकाब या मुखौटा होता है।
- व्यक्तित्व व्यक्ति के समस्त शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक और व्यवहारगत गुणों का संगठित रूप है।
- वैलेन्टाइन ने व्यक्तित्व को जन्मजात तथा अर्जित प्रवृत्तियों का योग माना है।
- गिलफोर्ड ने व्यक्तित्व को गुणों का समन्वित रूप कहा है।
- ऑलपोर्ट ने वर्ष 1937 में व्यक्तित्व की विस्तृत एवं वैज्ञानिक परिभाषा दी।
- ऑलपोर्ट के अनुसार व्यक्तित्व मनो-शारीरिक तंत्रों का गत्यात्मक संगठन है।
- व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ हैं— आत्मचेतना, निरन्तर निर्माण, स्वास्थ्य, दृढ़ इच्छाशक्ति, लक्ष्य, सामाजिकता, सामंजस्य और एकीकरण।
- व्यक्तित्व स्थिर नहीं होता; यह जीवनपर्यन्त विकसित होता रहता है।
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व्यक्तित्व के प्रकार
मनोवैज्ञानिक गुणों के आधार पर कार्ल युंग ने व्यक्तित्व को तीन प्रकारों में विभाजित किया—
- बहिर्मुखी व्यक्तित्व
- अन्तर्मुखी व्यक्तित्व
- उभयमुखी व्यक्तित्व
1. बहिर्मुखी व्यक्तित्व
जिस व्यक्ति की रुचि बाहरी संसार, सामाजिक गतिविधियों और अन्य व्यक्तियों के साथ सम्पर्क स्थापित करने में अधिक होती है, उसे बहिर्मुखी कहा जाता है। बहिर्मुखी व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है।
बहिर्मुखी व्यक्ति की विशेषताएँ
- समाज और सामाजिक कार्यों में विशेष रुचि रखता है।
- लोगों से मिलना-जुलना पसंद करता है।
- खेल-कूद और बाहरी गतिविधियों में अधिक रुचि रखता है।
- उत्साही, आशावादी और यथार्थवादी होता है।
- परिस्थितियों के साथ शीघ्र अनुकूलन कर लेता है।
- अन्तर्मुखी व्यक्ति की अपेक्षा अधिक कार्यकुशल होता है।
- प्रशंसा प्राप्त करने की इच्छा रखता है।
- व्यवहार-कुशल तथा विचार प्रधान होता है।
- अपने विचारों को दूसरों के सामने आसानी से व्यक्त करता है।
- बाहरी क्रियाओं और घटनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होता है।
- प्रायः प्रसन्न, चिन्तामुक्त और मिलनसार होता है।
2. अन्तर्मुखी व्यक्तित्व
जिस व्यक्ति की रुचि बाहरी संसार की अपेक्षा अपने विचारों, भावनाओं और आन्तरिक जीवन में अधिक होती है, उसे अन्तर्मुखी कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति अपने स्वभाव, भावनाओं और विचारों को सरलता से प्रकट नहीं करते।
युंग ने अन्तर्मुखी व्यक्तियों को विचार प्रधान, भाव प्रधान, तर्क प्रधान तथा दिव्यदृष्टि प्रधान रूपों में भी विभाजित किया है।
अन्तर्मुखी व्यक्ति की विशेषताएँ
- लोगों से अधिक मिलना-जुलना पसंद नहीं करता।
- मित्रों की संख्या सीमित होती है।
- आत्मकेन्द्रित होता है और परम्पराओं का पालन करता है।
- बाहरी संसार की वस्तुओं और घटनाओं में कम रुचि रखता है।
- एकान्तप्रिय, कर्तव्यपरायण और समय का ध्यान रखने वाला होता है।
- हँसी-मजाक, उत्सव और अधिक सामाजिक गतिविधियों में कम रुचि रखता है।
- चिन्ताग्रस्त तथा अपने कष्टों के प्रति अधिक सजग हो सकता है।
- भाव प्रधान और आत्मचिन्तनशील होता है।
- शान्त रहकर स्वयं के विषय में विचार करता है।
- अच्छा लेखक हो सकता है, परन्तु प्रभावशाली वक्ता होना आवश्यक नहीं है।
- प्रायः प्रतिक्रियावादी होता है और परिस्थितियों को अपने स्वभाव के अनुकूल बनाने का प्रयास करता है।
3. उभयमुखी व्यक्तित्व
जिस व्यक्ति में बहिर्मुखी और अन्तर्मुखी दोनों प्रकार के गुण पाए जाते हैं, उसे उभयमुखी कहा जाता है। इसे विकासोन्मुखी व्यक्तित्व भी कहा गया है।
उभयमुखी व्यक्ति परिस्थिति के अनुसार कभी सामाजिक और मिलनसार व्यवहार करता है तथा कभी शान्त और आत्मचिन्तनशील रहता है। व्यवहार में संतुलन होने के कारण अधिकांश व्यक्तियों में उभयमुखी प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं।
बहिर्मुखी और अन्तर्मुखी व्यक्तित्व में अन्तर
- बहिर्मुखी व्यक्ति की रुचि बाहरी संसार में होती है, जबकि अन्तर्मुखी व्यक्ति की रुचि अपने आन्तरिक जीवन में होती है।
- बहिर्मुखी व्यक्ति मिलनसार होता है, जबकि अन्तर्मुखी व्यक्ति एकान्तप्रिय होता है।
- बहिर्मुखी व्यक्ति अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है, जबकि अन्तर्मुखी व्यक्ति अपने विचारों को प्रकट करने में संकोच करता है।
- बहिर्मुखी व्यक्ति बाहरी गतिविधियों में सक्रिय रहता है, जबकि अन्तर्मुखी व्यक्ति चिन्तन और आत्मविश्लेषण में अधिक रुचि रखता है।
- बहिर्मुखी व्यक्ति परिस्थितियों से शीघ्र अनुकूलन करता है, जबकि अन्तर्मुखी व्यक्ति परिस्थितियों को अपने स्वभाव के अनुकूल बनाने का प्रयास करता है।
- कार्ल युंग ने व्यक्तित्व को तीन प्रकारों में बाँटा है।
- तीन प्रकार हैं— बहिर्मुखी, अन्तर्मुखी और उभयमुखी।
- बहिर्मुखी व्यक्ति की रुचि बाहरी संसार और सामाजिक गतिविधियों में होती है।
- अन्तर्मुखी व्यक्ति की रुचि अपने विचारों और आन्तरिक जीवन में होती है।
- अन्तर्मुखी व्यक्ति प्रायः एकान्तप्रिय, आत्मचिन्तनशील और सीमित मित्रों वाला होता है।
- उभयमुखी व्यक्ति में बहिर्मुखी तथा अन्तर्मुखी दोनों के गुण पाए जाते हैं।
- उभयमुखी व्यक्ति परिस्थिति के अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन करता है।
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व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करने वाले कारक
व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करने वाले कारकों को मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जाता है—
- जैविक अथवा वंशानुक्रम सम्बन्धी कारक
- मनोवैज्ञानिक कारक
- वातावरण सम्बन्धी कारक
1. जैविक अथवा वंशानुक्रम सम्बन्धी कारक
जैविक कारक व्यक्ति को जन्म से अथवा वंशानुक्रम द्वारा प्राप्त होते हैं। ये व्यक्ति के शारीरिक विकास, स्वभाव, मानसिक क्षमताओं तथा व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसके प्रमुख पक्ष निम्नलिखित हैं—
अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ
अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ हार्मोन उत्पन्न करती हैं। हार्मोन की अधिकता या कमी से व्यक्ति के शारीरिक विकास, संवेगों और व्यवहार में परिवर्तन हो सकता है।
1. पीयूष ग्रन्थि
- पीयूष ग्रन्थि मस्तिष्क में स्थित होती है।
- इसके हार्मोन की अधिकता या कमी से शरीर की लम्बाई प्रभावित होती है।
- यह शरीर की अन्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के कार्यों को नियंत्रित करती है।
- इसी कारण इसे अधिनायक ग्रन्थि भी कहा जाता है।
2. अधिवृक्क ग्रन्थि
- यह ग्रन्थि वृक्क के ऊपर स्थित होती है।
- यह भय, क्रोध और संकट की स्थिति में शरीर को सक्रिय करती है।
- इसके हार्मोन को आपातकालीन हार्मोन भी कहा जाता है।
- यह व्यक्ति की संवेगात्मक दशा और व्यवहार को प्रभावित करती है।
3. गलग्रन्थि
गलग्रन्थि अथवा थायरॉइड ग्रन्थि का शारीरिक और मानसिक विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
- इसकी अल्पक्रियाशीलता से शारीरिक शिथिलता, स्मृति की कमजोरी, ध्यान की कमी और चिन्तन में कठिनाई हो सकती है।
- इसके नष्ट हो जाने पर माइक्सीडिमा रोग हो सकता है।
- जन्म से इसकी कमी होने पर बालक की बुद्धि और शरीर का सामान्य विकास बाधित हो सकता है।
- इससे बौनापन, क्रेटिनिज्म तथा बुद्धि की न्यूनता जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- इसकी अधिक सक्रियता से तनाव, अशान्ति, चिड़चिड़ापन, चिन्ता और अस्थिरता दिखाई दे सकती है।
- वृद्धि की अवस्था में इसकी अधिक सक्रियता से शारीरिक विकास, विशेषकर लम्बाई, तेजी से बढ़ सकती है।
4. यौन ग्रन्थियाँ
यौन ग्रन्थियों के विकास से स्त्रियों में स्त्रियोचित तथा पुरुषों में पुरुषोचित शारीरिक एवं व्यवहारगत विशेषताओं का विकास होता है।
शरीर-रचना
व्यक्ति की लम्बाई, भार, बनावट, स्वास्थ्य और बाहरी रूप उसके प्रति दूसरों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। इसी सामाजिक प्रतिक्रिया के कारण शरीर-रचना का व्यक्तित्व पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
- मोटे व्यक्ति को प्रायः हँसमुख और सामाजिक माना जाता है।
- दुबले-पतले व्यक्ति को प्रायः संकोची, तेज अथवा चिड़चिड़ा समझा जाता है।
- शरीर-रचना और व्यक्तित्व के बीच निश्चित सम्बन्ध स्थापित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
शारीरिक रसायन
प्राचीन शरीर-रसायन सिद्धान्त के अनुसार शरीर में पाए जाने वाले विभिन्न द्रव व्यक्ति के स्वभाव को प्रभावित करते हैं—
- आशावादी स्वभाव — रक्त की अधिकता
- चिड़चिड़ा स्वभाव — पित्त की अधिकता
- शान्त स्वभाव — कफ की अधिकता
- परेशान या स्नायविक स्वभाव — स्नायु-द्रव की अधिकता
आधुनिक मनोविज्ञान इस प्राचीन सिद्धान्त को पूर्णतः स्वीकार नहीं करता, फिर भी शरीर के रासायनिक तत्व, औषधियाँ तथा मादक पदार्थ व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व को प्रभावित कर सकते हैं।
2. मनोवैज्ञानिक कारक
व्यक्ति की बुद्धि, रुचियाँ, दृष्टिकोण, अभिप्रेरणा और संवेग उसके व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
1. बुद्धि और मानसिक विकास
- बुद्धि व्यक्ति के सीखने, ज्ञान प्राप्त करने, निर्णय लेने और समस्याओं के समाधान की क्षमता को प्रभावित करती है।
- बौद्धिक विकास के आधार पर व्यक्ति विषम परिस्थितियों में उचित समायोजन करता है।
- व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व पर उसकी मानसिक क्षमता का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है।
2. रुचियाँ और दृष्टिकोण
व्यक्ति जिन वस्तुओं, कार्यों और विचारों में रुचि रखता है, उनका प्रभाव उसके व्यवहार पर पड़ता है। सकारात्मक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति दूसरों को स्वीकार करता है, जबकि नकारात्मक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति उनसे दूरी बना सकता है।
3. उपलब्धि-अभिप्रेरणा और महत्वाकांक्षा का स्तर
- कम महत्वाकांक्षा वाला व्यक्ति प्रायः कम प्रयास करता है।
- उच्च महत्वाकांक्षा वाला व्यक्ति संघर्षशील, परिश्रमी और सक्रिय होता है।
- उपलब्धि-अभिप्रेरणा व्यक्ति में आत्मविश्वास तथा लक्ष्य प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न करती है।
- व्यक्ति की महत्वाकांक्षा के स्तर के अनुसार उसका व्यवहार और व्यक्तित्व विकसित होता है।
4. संवेगात्मक एवं स्वभावगत विशेषताएँ
व्यक्ति के संवेग और स्वभाव उसके व्यवहार को दिशा देते हैं। सकारात्मक संवेग वाला व्यक्ति सहयोगी और शान्त होता है, जबकि नकारात्मक संवेगों की अधिकता से क्रोध, विरोध, चिन्ता और अस्थिरता विकसित हो सकती है।
3. वातावरण सम्बन्धी कारक
व्यक्ति का पालन-पोषण जिस सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण में होता है, उसका प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर पड़ता है। वातावरण सम्बन्धी कारकों को दो भागों में बाँटा जाता है—
- सामाजिक कारक
- सांस्कृतिक कारक
सामाजिक कारक
परिवार, पास-पड़ोस, विद्यालय, मित्र-समूह तथा अन्य सामाजिक संस्थाएँ व्यक्ति को सामाजिक नियम, व्यवहार और मूल्य सिखाती हैं।
1. पास-पड़ोस का प्रभाव
बालक अपने पास-पड़ोस के व्यक्तियों के व्यवहार का अनुकरण करता है। इसी कारण कहा जाता है— “जैसा पड़ोस, वैसा बालक।”
- अच्छे पड़ोस में ईमानदारी, दयालुता, आत्मसम्मान और अनुशासन जैसे गुण विकसित होते हैं।
- अपराधी अथवा असामाजिक वातावरण में बालक असामाजिक व्यवहार का अनुकरण कर सकता है।
2. विद्यालय का प्रभाव
- विद्यालय में शिक्षक और सहपाठी बालक के व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं।
- शिक्षक का व्यवहार, अनुशासन और दृष्टिकोण बालक के विचारों तथा चरित्र पर प्रभाव डालता है।
- बालक पर सहपाठियों और खेल-समूहों का प्रभाव विशेष रूप से अधिक पड़ता है।
- विद्यालय बालक को सहयोग, नेतृत्व, अनुशासन, उत्तरदायित्व और सामाजिक समायोजन सीखने का अवसर देता है।
सांस्कृतिक कारक
संस्कृति में समाज के रीति-रिवाज, परम्पराएँ, रहन-सहन, खान-पान, धर्म, विवाह, भाषा, साहित्य, मनोरंजन और व्यवहार के तरीके सम्मिलित होते हैं।
मैकाइवर और पेज के अनुसार संस्कृति हमारे रहने, सोचने, दैनिक कार्यों, कला, साहित्य, धर्म और मनोरंजन में हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति है।
- विभिन्न संस्कृतियों में पले व्यक्तियों के व्यवहार और व्यक्तित्व में अन्तर पाया जाता है।
- परिवार, धर्म, परम्परा, भाषा और सामाजिक मान्यताएँ व्यक्ति के दृष्टिकोण को प्रभावित करती हैं।
- एक ही देश के विभिन्न क्षेत्रों में सांस्कृतिक भिन्नता के कारण व्यक्तित्व और व्यवहार में अन्तर दिखाई देता है।
- व्यक्तित्व के निर्धारक तीन हैं— जैविक, मनोवैज्ञानिक और वातावरण सम्बन्धी कारक।
- जैविक कारकों में अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ, शरीर-रचना और शारीरिक रसायन सम्मिलित हैं।
- पीयूष ग्रन्थि को अधिनायक ग्रन्थि कहा जाता है।
- अधिवृक्क ग्रन्थि के हार्मोन को आपातकालीन हार्मोन कहा जाता है।
- गलग्रन्थि शरीर और बुद्धि के विकास को प्रभावित करती है।
- मनोवैज्ञानिक कारकों में बुद्धि, रुचि, दृष्टिकोण, उपलब्धि-अभिप्रेरणा, महत्वाकांक्षा और संवेग सम्मिलित हैं।
- सामाजिक कारकों में परिवार, पास-पड़ोस, विद्यालय, शिक्षक और सहपाठी प्रमुख हैं।
- “जैसा पड़ोस, वैसा बालक” पास-पड़ोस के प्रभाव को स्पष्ट करता है।
- संस्कृति व्यक्ति के रहन-सहन, विचार, मूल्य और व्यवहार को प्रभावित करती है।
- व्यक्तित्व का विकास वंशानुक्रम और वातावरण दोनों के संयुक्त प्रभाव से होता है।
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व्यक्तित्व मापन की विधियाँ
व्यक्तित्व मापन का अर्थ
व्यक्तित्व अनेक शीलगुणों का संगठित रूप है। व्यक्तित्व मापन द्वारा यह ज्ञात किया जाता है कि व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और संवेगात्मक गुण किस प्रकार संगठित हैं तथा उसका व्यवहार सामान्य है या असामान्य।
व्यक्तित्व का सही ज्ञान शिक्षा, व्यवसाय, निर्देशन, चयन, अपराध-अध्ययन तथा मानसिक समस्याओं के निदान और उपचार में आवश्यक होता है।
व्यक्तित्व मापन का विकास
- 1880 में फ्रांसिस गाल्टन ने व्यक्तित्व मापन के लिए प्रश्नावली विधि का निर्माण एवं प्रयोग किया।
- 1918 में वुडवर्थ ने पहली व्यक्तित्व परिसूची तैयार की। इसका उद्देश्य सैनिकों में मनोविकृति सम्बन्धी लक्षणों का पता लगाना था।
- रेमण्ड कैटेल ने व्यक्तित्व मापन के लिए 16 व्यक्तित्व कारक अर्थात 16PF प्रस्तुत किए।
- भारत में व्यक्तित्व मापन के क्षेत्र में सीमित कार्य हुआ है। अधिकांश विदेशी परीक्षणों का भारतीय परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलन किया गया है।
व्यक्तित्व मापन की आवश्यकता
- व्यक्ति के प्रमुख शीलगुणों एवं व्यवहारगत विशेषताओं का ज्ञान प्राप्त करना।
- व्यक्ति के समायोजन तथा मानसिक स्वास्थ्य का आकलन करना।
- शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन प्रदान करना।
- कर्मचारियों और अभ्यर्थियों के चयन में सहायता प्राप्त करना।
- असामान्य व्यवहार तथा मानसिक समस्याओं की पहचान करना।
- अपराधी व्यवहार के कारणों के अध्ययन में सहायता प्राप्त करना।
- व्यक्ति की रुचियों, दृष्टिकोण, सामाजिकता और संवेगात्मक दशा को समझना।
व्यक्तित्व मापन की विधियों का वर्गीकरण
व्यक्तित्व मापन की विधियों को मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जाता है—
- आत्मनिष्ठ विधियाँ — व्यक्ति या उसके परिचितों द्वारा दी गई सूचनाओं के आधार पर मापन।
- वस्तुनिष्ठ विधियाँ — प्रत्यक्ष व्यवहार, शारीरिक प्रतिक्रियाओं और निश्चित मापदण्डों के आधार पर मापन।
- प्रक्षेपी विधियाँ — अस्पष्ट उद्दीपकों के प्रति व्यक्ति की प्रतिक्रियाओं के आधार पर उसके अचेतन व्यक्तित्व का अध्ययन।
- व्यक्तित्व अनेक शीलगुणों का संगठित रूप है।
- व्यक्तित्व मापन द्वारा व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्वगत विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।
- फ्रांसिस गाल्टन ने 1880 में प्रश्नावली विधि का प्रयोग किया।
- वुडवर्थ ने 1918 में पहली व्यक्तित्व परिसूची बनाई।
- रेमण्ड कैटेल ने 16PF प्रस्तुत किया।
- व्यक्तित्व मापन की तीन प्रमुख विधियाँ हैं— आत्मनिष्ठ, वस्तुनिष्ठ और प्रक्षेपी।
व्यक्तित्व परीक्षणों का वर्गीकरण
व्यक्तित्व मापन की विधियों को तीन प्रमुख वर्गों में रखा जाता है— आत्मनिष्ठ विधि, वस्तुनिष्ठ विधि और प्रक्षेपी विधि।
1. आत्मनिष्ठ विधि
आत्मनिष्ठ विधि में व्यक्ति के व्यक्तित्व का अध्ययन स्वयं व्यक्ति द्वारा दी गई सूचनाओं अथवा उसके परिचितों से प्राप्त जानकारी के आधार पर किया जाता है।
1. जीवन-इतिहास विधि
इस विधि में व्यक्ति के व्यवहार को समझने के लिए उसके जन्म से लेकर वर्तमान अवस्था तक का इतिहास तैयार किया जाता है। जानकारी प्राप्त करने के लिए व्यक्ति, उसके परिवार, साक्षात्कार, प्रश्नावली तथा उपलब्ध अभिलेखों का प्रयोग किया जाता है।
इसमें मुख्यतः प्रारम्भिक सूचनाएँ, बीता हुआ जीवन-इतिहास और वर्तमान अवस्था का अध्ययन किया जाता है।
2. साक्षात्कार विधि
साक्षात्कार व्यक्तित्व परीक्षण की एक सामान्य विधि है। इसमें परीक्षक और परीक्षार्थी आमने-सामने बैठते हैं। परीक्षक प्रश्न पूछता है और परीक्षार्थी मौखिक उत्तर देता है।
- उत्तर के साथ हाव-भाव, बोलने का ढंग और व्यवहार भी देखा जाता है।
- परीक्षक ऐसे प्रश्न पूछता है जिनसे परीक्षार्थी स्वयं को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सके।
- इस विधि का प्रयोग सरकारी तथा अन्य सेवाओं में चयन के लिए किया जाता है।
3. प्रश्नावली विधि
प्रश्नावली में व्यक्ति को उसके व्यवहार और व्यक्तित्व से सम्बन्धित प्रश्नों की सूची दी जाती है। वह प्रश्नों के उत्तर लिखित रूप में देता है।
- प्रश्नों के उत्तर प्रायः “हाँ” अथवा “नहीं” में दिए जाते हैं।
- इससे आत्मविश्वास, सामाजिकता, अन्तर्मुखता और बहिर्मुखता जैसी विशेषताओं का ज्ञान होता है।
- इस विधि द्वारा एक साथ अनेक व्यक्तियों का परीक्षण किया जा सकता है।
4. आत्मकथा विधि
इस विधि में व्यक्ति स्वयं अपने जीवन, अनुभवों और विचारों का वर्णन करता है। आत्मकथा तीन प्रकार की होती है—
- निर्देशित आत्मकथा — निश्चित रूपरेखा अथवा दिए गए निर्देशों के अनुसार लिखी जाती है।
- अनिर्देशित आत्मकथा — व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार स्वतन्त्र रूप से लिखता है।
- मिश्रित आत्मकथा — इसमें निर्देश और स्वतन्त्रता दोनों का समावेश होता है।
5. अवलोकन अथवा निरीक्षण विधि
इस विधि में व्यक्ति के स्वाभाविक व्यवहार, क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया जाता है।
- निरीक्षण प्राकृतिक परिस्थितियों में किया जाता है।
- परीक्षक प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रह सकता है अथवा अपनी उपस्थिति छिपा सकता है।
- विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए निरीक्षण को समान परिस्थितियों में दोहराया जा सकता है।
- एक ही व्यक्ति का निरीक्षण विभिन्न निरीक्षकों द्वारा भी कराया जा सकता है।
- आवश्यकता पड़ने पर कैमरा, रिकॉर्डर और दूरदर्शक जैसे उपकरणों का प्रयोग किया जा सकता है।
2. वस्तुनिष्ठ विधि
वस्तुनिष्ठ विधियों में व्यक्ति के प्रत्यक्ष व्यवहार, शारीरिक प्रतिक्रियाओं तथा निश्चित मापदण्डों के आधार पर व्यक्तित्व का अध्ययन किया जाता है।
1. निर्धारण मापनी विधि
इस विधि में व्यक्ति के किसी विशेष गुण का मूल्यांकन उसके सम्पर्क में रहने वाले व्यक्तियों से कराया जाता है। गुण को पाँच अथवा सात श्रेणियों में विभाजित करके अंक दिए जाते हैं।
निर्धारण मापनी के प्रमुख प्रकार हैं—
- संचयी अंक मापदण्ड
- संख्यात्मक मापदण्ड
- रेखांकित मापदण्ड
- मानक मापदण्ड
उदाहरण के लिए किसी गुण की उपस्थिति को 5 से 1 अंक तक इस प्रकार मापा जा सकता है— सदा उपस्थित, अधिक उपस्थित, कम उपस्थित, बहुत कम उपस्थित और लगभग अनुपस्थित।
2. समाजमिति विधि
समाजमिति विधि द्वारा किसी समूह के सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। इसमें ज्ञात किया जाता है कि व्यक्ति समूह के किन सदस्यों को पसंद अथवा नापसंद करता है।
यह विधि सामाजिक स्वीकृति, अस्वीकृति, समूह-संरचना और सामाजिक समायोजन के अध्ययन में उपयोगी है।
3. शारीरिक परीक्षण
इस विधि में विभिन्न उपकरणों की सहायता से व्यक्ति की शारीरिक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। प्रमुख उपकरण हैं—
- प्लेथिस्मोग्राफ
- इलेक्ट्रो-कार्डियोग्राफ
- स्फिग्मोग्राफ
- न्यूमोग्राफ
- साइको-गैल्वेनोमीटर
4. परिस्थिति-परीक्षण विधि
इस विधि में कृत्रिम रूप से विशेष परिस्थिति उत्पन्न करके व्यक्ति के वास्तविक व्यवहार अथवा किसी निश्चित गुण की जाँच की जाती है।
मे एवं हार्टशोर्न ने अपनी पुस्तक Studies in Deceit में परिस्थिति-परीक्षण के अनेक उदाहरण दिए। उन्होंने बालकों की ईमानदारी की जाँच के लिए उन्हें सिक्के देकर सन्दूक में डालने को कहा और बाद में सिक्कों की गणना करके उनके व्यवहार का अध्ययन किया।
5. व्यक्तित्व सूचियाँ
व्यक्तित्व सूची प्रश्नावली का एक व्यवस्थित रूप है। इसमें व्यक्ति स्वयं अपने व्यवहार से सम्बन्धित कथनों अथवा प्रश्नों के उत्तर देता है। प्राप्त उत्तरों की तुलना मानक अंकों से करके व्यक्तित्व का मापन किया जाता है।
व्यक्तित्व सूचियों से संवेगात्मक समायोजन, अन्तर्मुखता, बहिर्मुखता तथा अन्य व्यक्तित्वगत विशेषताओं का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।
6. संचयी अभिलेख
संचयी अभिलेख में विद्यार्थी की शैक्षिक प्रगति, व्यवहार, रुचि, स्वास्थ्य, उपस्थिति, सामाजिक सहभागिता तथा अन्य विशेषताओं का क्रमिक विवरण सुरक्षित रखा जाता है। इससे समय के साथ उसके व्यक्तित्व-विकास का अध्ययन किया जाता है।
3. प्रक्षेपी विधियाँ
प्रक्षेपी विधियों में व्यक्ति के सामने अस्पष्ट और असंगठित उद्दीपक प्रस्तुत किए जाते हैं। व्यक्ति इन उद्दीपकों का अर्थ अपने अनुभवों, इच्छाओं, संवेगों और अचेतन प्रवृत्तियों के आधार पर बताता है।
प्रक्षेपण का अर्थ है— व्यक्ति द्वारा अपनी दबी हुई इच्छाओं, भावनाओं अथवा दोषों को किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु पर आरोपित करना।
- 1911 में फ्रायड ने प्रक्षेपण शब्द का प्रयोग भ्रान्ति की व्याख्या करते हुए किया।
- लॉरेन्स फ्रैंक को प्रक्षेपी विधि का प्रारम्भिक प्रतिपादक माना जाता है।
- ब्राउन ने प्रक्षेपण को अन्तःक्षेपण का विलोम माना।
- जेम्स डी. पेज के अनुसार प्रक्षेपण द्वारा व्यक्ति अपने व्यक्तिगत दोषों को दूसरों पर आरोपित करता है।
प्रक्षेपी परीक्षणों की विशेषताएँ
- प्रस्तुत उद्दीपक अस्पष्ट होते हैं।
- व्यक्ति अपनी प्रतिक्रियाओं के वास्तविक अर्थ से अनभिज्ञ रहता है।
- इनसे व्यक्तित्व की संगठित तस्वीर प्राप्त होती है।
- व्यक्तित्व के अनेक महत्वपूर्ण पक्षों का मापन सम्भव होता है।
- प्राप्त प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण जटिल होता है।
1. रोर्शा स्याही-धब्बा परीक्षण
इस परीक्षण का निर्माण स्विट्जरलैंड के मनोचिकित्सक हरमन रोर्शा ने 1921 में किया।
- इसमें कुल दस कार्ड होते हैं।
- पाँच कार्ड काले-सफेद तथा पाँच रंगीन होते हैं।
- व्यक्ति से पूछा जाता है कि धब्बे उसे किस वस्तु अथवा आकृति के समान दिखाई देते हैं।
- प्रतिक्रियाओं के आधार पर उसके व्यक्तित्व का विश्लेषण किया जाता है।
2. प्रासंगिक अन्तर्बोध परीक्षण
प्रासंगिक अन्तर्बोध परीक्षण अर्थात TAT का निर्माण हेनरी ए. मुरे ने 1935 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय में किया।
बाद में 1938 में मुरे और क्रिस्टिना डी. मॉर्गन ने इसका संशोधन किया। इसलिए इसे मुरे-मॉर्गन परीक्षण भी कहा जाता है।
3. बालकों का अन्तर्बोध परीक्षण
बालकों का अन्तर्बोध परीक्षण अर्थात CAT छोटे बच्चों के व्यक्तित्व के अध्ययन के लिए बनाया गया। इसे डॉ. लियोपोल्ड बेलक ने 1948 में प्रस्तुत किया।
इसका प्रयोग सामान्यतः 3 से 11 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए किया जाता है।
4. शब्द-साहचर्य परीक्षण
शब्द-साहचर्य परीक्षण का प्रयोग फ्रायड और उनके शिष्य युंग द्वारा प्रारम्भ किया गया। इसमें व्यक्ति के सामने एक-एक करके निश्चित शब्द बोले जाते हैं और उसे मन में आने वाला पहला शब्द बताना होता है।
प्राप्त उत्तरों के आधार पर व्यक्ति के संवेगात्मक संघर्षों और मानसिक दशा का अध्ययन किया जाता है।
5. चित्र-पूर्ति परीक्षण
चित्र-पूर्ति परीक्षण का निर्माण रोहड़े तथा हाइडरेथ ने 1940 में किया। इसमें अधूरी सामग्री को व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार पूरा करता है।
रोटर ने 1950 में 40 वाक्यों वाला वाक्य-पूर्ति परीक्षण विकसित किया। प्रत्येक वाक्य का एक भाग दिया जाता है और दूसरा भाग व्यक्ति अपनी इच्छा से पूरा करता है।
- व्यक्तित्व मापन की तीन विधियाँ हैं— आत्मनिष्ठ, वस्तुनिष्ठ और प्रक्षेपी।
- आत्मनिष्ठ विधियों में जीवन-इतिहास, साक्षात्कार, प्रश्नावली, आत्मकथा और निरीक्षण सम्मिलित हैं।
- आत्मकथा तीन प्रकार की होती है— निर्देशित, अनिर्देशित और मिश्रित।
- वस्तुनिष्ठ विधियों में निर्धारण मापनी, समाजमिति, शारीरिक परीक्षण, परिस्थिति-परीक्षण और व्यक्तित्व सूचियाँ प्रमुख हैं।
- मे एवं हार्टशोर्न ने परिस्थिति-परीक्षण द्वारा बालकों की ईमानदारी का अध्ययन किया।
- फ्रायड ने 1911 में प्रक्षेपण शब्द का प्रयोग किया।
- हरमन रोर्शा ने 1921 में स्याही-धब्बा परीक्षण बनाया।
- हेनरी ए. मुरे ने 1935 में TAT का निर्माण किया।
- लियोपोल्ड बेलक ने 1948 में 3 से 11 वर्ष के बच्चों के लिए CAT प्रस्तुत किया।
- शब्द-साहचर्य परीक्षण का प्रारम्भ फ्रायड और युंग ने किया।
- रोहड़े तथा हाइडरेथ ने 1940 में चित्र-पूर्ति परीक्षण बनाया।
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समायोजन
समायोजन का अर्थ
समायोजन शब्द सम + आयोजन से बना है। ‘सम’ का अर्थ भली-भाँति या समान रूप से तथा ‘आयोजन’ का अर्थ व्यवस्था करना है। अतः समायोजन वह प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और वातावरण की परिस्थितियों के बीच संतुलन स्थापित करता है।
समायोजन को सामंजस्य, व्यवस्थापन अथवा अनुकूलन भी कहा जाता है। अच्छा समायोजन व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने, समस्याओं का समाधान खोजने तथा मानसिक तनाव से बचने में सहायता देता है।
समायोजन की प्रमुख परिभाषाएँ
- स्किनर के अनुसार — समायोजन अधिगम की एक प्रक्रिया है।
- आइजनेक के अनुसार — किन्हीं दो अवस्थाओं के बीच सामंजस्य की स्थिति को समायोजन कहते हैं।
- बोरिंग, वेल्ड और लैंगफील्ड के अनुसार — समायोजन वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा प्राणी अपनी आवश्यकताओं तथा उनकी पूर्ति को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों के बीच संतुलन स्थापित करता है।
- कोलमैन के अनुसार — समायोजन अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति और समस्याओं के समाधान के लिए व्यक्ति द्वारा किए गए प्रयासों का परिणाम है।
समायोजन की विधियाँ अथवा रक्षा-युक्तियाँ
तनाव, संघर्ष, असफलता या निराशा की स्थिति में व्यक्ति मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए कुछ मनोवैज्ञानिक युक्तियों का प्रयोग करता है। इन्हें समायोजन की विधियाँ अथवा रक्षा-युक्तियाँ कहा जाता है।
1. दमन
संघर्षपूर्ण स्थिति में अहम् द्वारा अप्रिय, दुखद या कष्टदायक विचारों और इच्छाओं को अचेतन मन में दबा देना दमन कहलाता है।
फ्रायड ने सर्वप्रथम इस रक्षा-युक्ति का उल्लेख किया। दमन में व्यक्ति को दबाई गई इच्छा या घटना का स्पष्ट ज्ञान नहीं रहता।
2. शमन
किसी अप्रिय घटना, विचार या इच्छा को जानबूझकर चेतन मन से हटाने का प्रयास शमन कहलाता है।
दमन में व्यक्ति को दबे हुए विचार का ज्ञान नहीं रहता, जबकि शमन में वह उस विचार या घटना से परिचित होता है और उसे स्वयं मन से निकालने का प्रयास करता है।
3. प्रतिगमन
कठिनाई, दबाव या असफलता की स्थिति में व्यक्ति का अपने पूर्व विकास-स्तर के व्यवहार की ओर लौटना प्रतिगमन कहलाता है।
उदाहरण — प्रौढ़ावस्था में असफल होने पर बच्चे की तरह माँ की गोद में छिप जाना।
4. रूपान्तरण
मानसिक संघर्ष या कुंठा से उत्पन्न नकारात्मक ऊर्जा का शारीरिक लक्षणों अथवा रोग के रूप में प्रकट होना रूपान्तरण कहलाता है।
इसमें व्यक्ति अपनी असफलता से बचने के लिए अचेतन रूप से शारीरिक समस्या उत्पन्न कर सकता है।
उदाहरण — परीक्षा से पहले बुखार आने का बहाना या अनुभव होना।
5. उन्नयन अथवा उदात्तीकरण
अस्वीकार्य या समाज-विरोधी इच्छाओं को सामाजिक रूप से स्वीकृत तथा उपयोगी कार्यों में बदल देना उन्नयन या उदात्तीकरण कहलाता है।
ऑलपोर्ट ने इसे ऐसी प्रक्रिया माना है, जिसमें व्यक्ति अपनी मूल प्रवृत्ति को आंशिक रूप से स्वीकार कर उसे उपयोगी क्रिया में परिवर्तित कर देता है।
उदाहरण — प्रेम में असफल व्यक्ति का कवि या साहित्यकार बनकर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना।
6. युक्तिकरण
अपनी असफलता, अनुचित व्यवहार या गलत निर्णय के वास्तविक कारण को छिपाकर उसके पक्ष में तर्कसंगत कारण प्रस्तुत करना युक्तिकरण कहलाता है।
कोलमैन के अनुसार दोषपूर्ण तर्क द्वारा गलत व्यवहार को सही ठहराना युक्तिकरण है।
उदाहरण — परीक्षा में असफल होने पर अपनी तैयारी की कमी स्वीकार न करके शिक्षक को दोष देना।
7. प्रतिक्रिया-निर्माण
अपनी वास्तविक या दबी हुई इच्छा के ठीक विपरीत व्यवहार प्रदर्शित करना प्रतिक्रिया-निर्माण कहलाता है।
इस विधि में व्यक्ति अचेतन मन की इच्छा को छिपाने के लिए उसके विपरीत गुण या व्यवहार प्रदर्शित करता है।
उदाहरण — धन न मिलने पर धनवान लोगों की निन्दा करना, जबकि भीतर से धन पाने की तीव्र इच्छा होना।
8. आत्मीकरण
किसी प्रतिष्ठित, सफल या आदर्श व्यक्ति के गुणों को अपने व्यक्तित्व में ग्रहण करने की प्रक्रिया आत्मीकरण कहलाती है।
इसमें व्यक्ति स्वयं को किसी आदर्श व्यक्ति, समूह या संस्था से जोड़कर आत्मसन्तोष और मानसिक सुरक्षा प्राप्त करता है।
उदाहरण — परीक्षा में असफल छात्र का यह सोचकर सन्तोष करना कि उसे बहुत योग्य शिक्षक ने पढ़ाया था।
9. क्षतिपूर्ति
एक क्षेत्र की कमी या असफलता की पूर्ति दूसरे क्षेत्र में श्रेष्ठता प्राप्त करके करना क्षतिपूर्ति कहलाता है।
इसके द्वारा व्यक्ति अपनी हीन भावना तथा निराशा को कम करने का प्रयास करता है।
उदाहरण — पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी का खेल-कूद में अच्छा प्रदर्शन करना।
10. नकारना
कष्टदायक अथवा अप्रिय वास्तविकता को स्वीकार करने से इनकार करना नकारना कहलाता है।
व्यक्ति अप्रिय परिस्थिति की उपेक्षा करके या उसके अस्तित्व को अस्वीकार करके मानसिक तनाव से स्वयं को बचाने का प्रयास करता है।
उदाहरण — खेल में व्यस्त बालक का माता-पिता की आवाज सुनकर भी अनसुना कर देना।
11. प्रक्षेपण
अपने दोषों, इच्छाओं, असफलताओं या अनुचित भावनाओं को किसी अन्य व्यक्ति पर आरोपित करना प्रक्षेपण कहलाता है।
इसमें व्यक्ति अपनी कमी को स्वीकार करने के स्थान पर उसके लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराता है।
उदाहरण — परीक्षा में असफल होने पर शिक्षक को तथा चुनाव में हारने पर विरोधियों को दोष देना।
12. दिवास्वप्न
वास्तविक जीवन में पूरी न हो सकने वाली इच्छाओं को कल्पना के माध्यम से पूरा करना दिवास्वप्न कहलाता है।
हेबर और फ्रायड के अनुसार व्यक्ति कल्पना-जगत में अपनी व्यक्तिगत दुनिया बनाकर आवश्यकताओं की काल्पनिक पूर्ति करता है और तनाव कम करता है।
उदाहरण — प्रेम में असफल व्यक्ति का कल्पना में अपने प्रिय के साथ रहने का सुख अनुभव करना।
13. विस्थापन
किसी शक्तिशाली व्यक्ति या वास्तविक कारण के प्रति उत्पन्न संवेग को उससे कमजोर अथवा सुरक्षित व्यक्ति या वस्तु पर व्यक्त करना विस्थापन कहलाता है।
उदाहरण — अधिकारी की डाँट का क्रोध घर आकर बच्चों पर निकालना।
14. आक्रामकता
निराशा, बाधा या संघर्ष की स्थिति में दूसरों को हानि पहुँचाने, अपमानित करने अथवा उन पर क्रोध प्रकट करने वाला व्यवहार आक्रामकता कहलाता है।
- समायोजन व्यक्ति की आवश्यकताओं और वातावरण के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया है।
- समायोजन को सामंजस्य, व्यवस्थापन तथा अनुकूलन भी कहा जाता है।
- स्किनर ने समायोजन को अधिगम की प्रक्रिया माना है।
- दमन में अप्रिय विचार अचेतन मन में दब जाते हैं, जबकि शमन में व्यक्ति उन्हें जानबूझकर हटाता है।
- पूर्व विकास-स्तर के व्यवहार की ओर लौटना प्रतिगमन कहलाता है।
- मानसिक संघर्ष का शारीरिक लक्षण के रूप में प्रकट होना रूपान्तरण है।
- अस्वीकार्य इच्छाओं को उपयोगी कार्य में बदलना उदात्तीकरण कहलाता है।
- गलत व्यवहार के पक्ष में तर्क देना युक्तिकरण है।
- वास्तविक इच्छा के विपरीत व्यवहार करना प्रतिक्रिया-निर्माण कहलाता है।
- आदर्श व्यक्ति के गुणों को अपनाना आत्मीकरण है।
- एक क्षेत्र की कमी को दूसरे क्षेत्र की सफलता से पूरा करना क्षतिपूर्ति है।
- अप्रिय वास्तविकता को स्वीकार न करना नकारना कहलाता है।
- अपने दोषों को दूसरों पर आरोपित करना प्रक्षेपण है।
- कल्पना द्वारा अधूरी इच्छाओं की पूर्ति करना दिवास्वप्न कहलाता है।
वैयक्तिक भिन्नता का अर्थ, प्रकृति एवं विशेषताएँ
वैयक्तिक भिन्नता का अर्थ
वैयक्तिक भिन्नता एक स्वाभाविक तथ्य है। कोई भी दो व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और व्यवहारगत दृष्टि से पूर्णतः समान नहीं होते। व्यक्तियों के विकास का क्रम समान हो सकता है, परन्तु विकास की गति और प्राप्त क्षमताओं में अन्तर पाया जाता है।
व्यक्तियों के रंग, रूप, आकार, शारीरिक बनावट, बुद्धि, रुचि, संवेग, सीखने की गति, मानसिक क्षमता तथा व्यक्तित्व में पाई जाने वाली मापनीय असमानताओं को वैयक्तिक भिन्नता कहा जाता है।
वैयक्तिक भिन्नताओं के कारण व्यक्तियों के शारीरिक एवं मानसिक विकास, उपलब्धि और व्यवहार में अन्तर दिखाई देता है। टायलर ने वैयक्तिक भिन्नता को सार्वभौमिक तथ्य माना है।
वैयक्तिक भिन्नता के अध्ययन का विकास
- 19वीं शताब्दी में गाल्टन ने सर्वप्रथम वैयक्तिक भिन्नताओं का व्यवस्थित अध्ययन प्रारम्भ किया।
- 20वीं शताब्दी में कैटेल ने इस अध्ययन को आगे बढ़ाया तथा सांख्यिकीय प्रविधियों के विकास में योगदान दिया।
- अल्फ्रेड बिने ने वैयक्तिक भिन्नताओं के मापन के लिए बुद्धि-परीक्षण का निर्माण किया।
वैयक्तिक भिन्नता की प्रमुख परिभाषाएँ
ऐकरमैन के अनुसार
“किसी विशेष प्रजाति के सदस्यों के व्यवहार की संरचना में पाई जाने वाली असमानताएँ वैयक्तिक भिन्नताएँ कहलाती हैं।”
टायलर के अनुसार
“शारीरिक आकार एवं संरचना, शारीरिक क्रियाओं, बुद्धि, रुचि, मानसिक क्षमताओं तथा व्यक्तित्व के लक्षणों में पाई जाने वाली मापनीय भिन्नताएँ वैयक्तिक भिन्नता हैं।”
जेम्स ड्रेवर के अनुसार
“किसी समूह के सदस्यों की मानसिक और शारीरिक विशेषताओं में औसत से अधिक विचलन को वैयक्तिक भिन्नता कहा जाता है।”
स्किनर के अनुसार
“वैयक्तिक भिन्नताओं के अध्ययन में सम्पूर्ण व्यक्तित्व के प्रत्येक मापनीय पक्ष को सम्मिलित किया जा सकता है।”
वैयक्तिक भिन्नता की प्रकृति एवं विशेषताएँ
1. अन्तःवैयक्तिक भिन्नता
एक ही व्यक्ति की विभिन्न योग्यताओं अथवा शीलगुणों में पाया जाने वाला अन्तर अन्तःवैयक्तिक भिन्नता कहलाता है।
उदाहरण के लिए किसी बालक में अमूर्त बुद्धि अधिक हो सकती है, जबकि उसकी मूर्त अथवा सामाजिक बुद्धि अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
2. अन्तर-वैयक्तिक भिन्नता
एक व्यक्ति की योग्यता, क्षमता अथवा गुणों का दूसरे व्यक्ति से भिन्न होना अन्तर-वैयक्तिक भिन्नता कहलाता है।
उदाहरण के लिए एक बालक तीव्र बुद्धि वाला, दूसरा औसत बुद्धि वाला तथा तीसरा मन्द बुद्धि वाला हो सकता है।
3. शीलगुणों में पारस्परिक सम्बन्ध
व्यक्ति के विभिन्न शीलगुण एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। किसी एक गुण में अन्तर का प्रभाव दूसरे गुण पर भी पड़ सकता है।
उदाहरण के लिए तीव्र बुद्धि वाले बालक की शैक्षिक उपलब्धि सामान्यतः अधिक होती है। इसी प्रकार बुद्धि, रुचि, अभिप्रेरणा, आकांक्षा और आवश्यकता के बीच भी सम्बन्ध पाया जाता है।
4. विभिन्नता
किसी समूह के सभी व्यक्तियों में शारीरिक और मानसिक गुण समान मात्रा में नहीं पाए जाते। कोई भी एक शीलगुण दो व्यक्तियों में पूर्णतः समान नहीं होता।
5. सीखने की भिन्न दर
समान आयु के बालकों की सीखने की क्षमता और गति एक जैसी नहीं होती। शारीरिक विकास, सामाजिक परिस्थितियों तथा मानसिक योग्यताओं के कारण अधिगम की गति में अन्तर पाया जाता है।
6. सामान्यता
किसी समूह में बहुत कम व्यक्तियों की योग्यता अत्यधिक अधिक अथवा अत्यधिक कम होती है। समूह के अधिकांश व्यक्तियों में वह योग्यता औसत के आसपास पाई जाती है।
7. धारण करने की भिन्न दर
यदि दो व्यक्ति एक ही विषय को समान समय और समान विधि से सीखते हैं, तब भी उनकी सीखी हुई सामग्री को याद रखने की क्षमता अलग-अलग हो सकती है।
8. विकास की भिन्न दर
सभी व्यक्तियों का शारीरिक और मानसिक विकास एक ही समय पर तथा समान गति से नहीं होता। समान आयु के बालकों में भी विकास और परिपक्वता की मात्रा अलग-अलग होती है।
9. वंशानुक्रम और वातावरण का प्रभाव
वंशानुक्रम तथा वातावरण वैयक्तिक भिन्नताओं के प्रमुख आधार हैं। बालक के कुछ शीलगुण वंशानुगत होते हैं, जबकि शेष गुण परिवार, विद्यालय, समाज और अन्य अनुभवों से अर्जित होते हैं।
स्किनर के अनुसार, “वैयक्तिक भिन्नता की प्रकृति अत्यन्त जटिल और बहुआयामी है।”
- कोई भी दो व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और व्यवहारगत दृष्टि से पूर्णतः समान नहीं होते।
- व्यक्तियों के मापनीय गुणों में पाई जाने वाली असमानता वैयक्तिक भिन्नता कहलाती है।
- टायलर ने वैयक्तिक भिन्नता को सार्वभौमिक तथ्य माना है।
- गाल्टन ने 19वीं शताब्दी में वैयक्तिक भिन्नताओं का व्यवस्थित अध्ययन प्रारम्भ किया।
- कैटेल ने वैयक्तिक भिन्नताओं के अध्ययन को आगे बढ़ाया।
- बिने ने बुद्धि-परीक्षण का निर्माण किया।
- एक ही व्यक्ति की विभिन्न योग्यताओं में अन्तर को अन्तःवैयक्तिक भिन्नता कहते हैं।
- दो व्यक्तियों की योग्यताओं में अन्तर को अन्तर-वैयक्तिक भिन्नता कहते हैं।
- समान आयु के बालकों की सीखने, धारण करने और विकास की गति भिन्न हो सकती है।
- किसी समूह में अधिकांश व्यक्ति औसत के आसपास होते हैं तथा अत्यधिक उच्च या निम्न योग्यता वाले व्यक्तियों की संख्या कम होती है।
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वैयक्तिक भिन्नता के प्रकार, कारक एवं शैक्षिक महत्त्व
वैयक्तिक भिन्नताओं के प्रकार
1. शारीरिक भिन्नता
व्यक्तियों के रंग, रूप, लम्बाई, भार, शारीरिक गठन, स्वास्थ्य और परिपक्वता में पाया जाने वाला अन्तर शारीरिक भिन्नता कहलाता है।
- स्त्री और पुरुष की शारीरिक बनावट में अन्तर पाया जाता है।
- शारीरिक गठन व्यक्ति के स्वभाव और व्यवहार को भी प्रभावित कर सकता है।
2. मानसिक भिन्नता
व्यक्तियों की बुद्धि, तर्क, चिन्तन, कल्पना, स्मृति और अन्य मानसिक क्षमताओं में पाया जाने वाला अन्तर मानसिक भिन्नता कहलाता है।
- समाज में प्रतिभाशाली, औसत तथा मन्दबुद्धि व्यक्ति पाए जाते हैं।
- मानसिक भिन्नता शैक्षिक उपलब्धि और समस्या-समाधान क्षमता को प्रभावित करती है।
3. संवेगात्मक भिन्नता
प्रेम, क्रोध, भय, प्रसन्नता और चिन्ता जैसे संवेगों की मात्रा तथा अभिव्यक्ति में पाया जाने वाला अन्तर संवेगात्मक भिन्नता कहलाता है।
कुछ व्यक्ति अपने संवेगों पर शीघ्र नियन्त्रण कर लेते हैं, जबकि कुछ व्यक्ति छोटी परिस्थितियों में भी तीव्र प्रतिक्रिया करते हैं।
4. रुचि में भिन्नता
किसी भी दो व्यक्तियों की रुचियाँ पूर्णतः समान नहीं होतीं। रुचि भोजन, शिक्षा, खेल, संगीत, मनोरंजन, व्यवसाय अथवा अन्य क्षेत्रों से सम्बन्धित हो सकती है।
- आयु बढ़ने के साथ रुचियों में परिवर्तन होता रहता है।
- डी. एन. श्रीवास्तव के अध्ययन के अनुसार छात्राओं की अपेक्षा छात्रों में रुचियों का विस्तार अधिक पाया गया।
- क्रो एवं क्रो के अनुसार रुचि वह अभिप्रेरक शक्ति है, जो व्यक्ति को किसी वस्तु, व्यक्ति या क्रिया की ओर ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।
5. व्यक्तित्व सम्बन्धी भिन्नता
व्यक्तियों के स्वभाव, आदतों, व्यवहार, सामाजिकता और व्यक्तित्वगत विशेषताओं में पाया जाने वाला अन्तर व्यक्तित्व सम्बन्धी भिन्नता कहलाता है।
व्यक्तियों को व्यक्तित्व के आधार पर बहिर्मुखी, अन्तर्मुखी और उभयमुखी रूपों में विभाजित किया जाता है।
6. क्रियात्मक भिन्नता
व्यक्तियों की कार्य करने की गति, क्षमता और कौशल में पाया जाने वाला अन्तर क्रियात्मक भिन्नता कहलाता है।
कुछ व्यक्ति अधिक सक्रिय और कार्यकुशल होते हैं, जबकि कुछ व्यक्ति धीमी गति से कार्य करते हैं। क्रो एवं क्रो ने क्रियात्मक भिन्नता को विशेष महत्त्व दिया है।
7. विचारों में भिन्नता
व्यक्तियों के विचार, मान्यताएँ और दृष्टिकोण पूर्णतः समान नहीं होते। विचारधारा पर सामाजिक वातावरण, आयु, शिक्षा तथा अनुभवों का प्रभाव पड़ता है।
8. अधिगम में भिन्नता
बालकों की सीखने की गति और सीखने की क्षमता एक-दूसरे से भिन्न होती है। समान आयु के सभी बालकों के लिए समान अधिगम-दर निर्धारित नहीं की जा सकती।
- कुछ बालक शीघ्र सीखते हैं।
- कुछ बालक ज्ञान ग्रहण करने में अधिक समय लेते हैं।
- सीखने पर शारीरिक, मानसिक और आयु सम्बन्धी विशेषताओं का प्रभाव पड़ता है।
वैयक्तिक भिन्नता को प्रभावित करने वाले कारक
1. वंशानुक्रम
वंशानुक्रम वैयक्तिक भिन्नता का आधारभूत कारक है। व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक विशेषताएँ माता-पिता तथा पूर्वजों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरित होती हैं।
गाल्टन, रूसो और पियरसन ने वंशानुक्रम के महत्त्व का समर्थन किया। मन के अनुसार सभी व्यक्तियों का जीवन एक समान आरम्भ होता है, परन्तु वंशानुक्रम के कारण बढ़ती आयु के साथ उनमें अन्तर स्पष्ट होने लगता है।
2. वातावरण
भौतिक तथा सामाजिक वातावरण व्यक्ति के विकास और व्यवहार को प्रभावित करता है। जलवायु, परिवार, समाज, विद्यालय और रहन-सहन की परिस्थितियाँ वैयक्तिक भिन्नताओं को जन्म देती हैं।
- ठण्डे प्रदेश के व्यक्तियों को प्रायः अधिक परिश्रमी और सक्रिय बताया गया है।
- सामाजिक वातावरण व्यक्ति के व्यवहार, आदतों और विचारों को प्रभावित करता है।
3. आयु और बुद्धि
आयु बढ़ने के साथ बालक का शारीरिक, मानसिक और संवेगात्मक विकास होता है। बुद्धि के आधार पर बालकों को प्रतिभाशाली, औसत और मन्दबुद्धि वर्गों में रखा जाता है।
4. प्रजाति और देश
प्रत्येक जाति, देश और समाज की अपनी सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक मूल्य, रहन-सहन और खान-पान की आदतें होती हैं। इनका प्रभाव वहाँ के व्यक्तियों के शारीरिक और व्यवहारगत गुणों पर पड़ता है।
5. शैक्षिक तत्त्व
शिक्षा का स्तर और स्वरूप व्यक्ति के मानसिक विकास, व्यवहार और उपलब्धियों को प्रभावित करता है। शिक्षा व्यक्ति को विचारशील और व्यवहारकुशल बनाती है।
6. आर्थिक दशा
आर्थिक स्थिति व्यक्ति की आवश्यकताओं, अवसरों, रहन-सहन और व्यवहार को प्रभावित करती है। गरीबी, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी से व्यक्तियों के विकास में अन्तर उत्पन्न हो सकता है।
7. लिंग-भेद
लिंग-भेद के कारण बालक और बालिकाओं की शारीरिक बनावट, संवेगात्मक विकास तथा कार्यक्षमता में अन्तर देखा जा सकता है।
पुस्तक के अनुसार स्त्रियों में सौन्दर्य, स्मरण-शक्ति और गुणगान की प्रवृत्ति, जबकि पुरुषों में बल, साहस और परिश्रम की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत अधिक मानी गई है।
शिक्षा में वैयक्तिक भिन्नता का महत्त्व
1. पाठ्यचर्या के निर्माण में
विभिन्न क्षमताओं और रुचियों वाले बालकों के लिए एक ही कठोर पाठ्यचर्या उपयुक्त नहीं होती। पाठ्यचर्या लचीली होनी चाहिए और उसमें आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन किया जा सके।
2. शिक्षा के उद्देश्यों के निर्धारण में
शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित करते समय विद्यार्थियों की आयु, क्षमता, आवश्यकता और मानसिक स्तर को ध्यान में रखना चाहिए।
3. छात्रों के वर्गीकरण में
विद्यार्थियों को उनकी मानसिक, शारीरिक और शैक्षिक क्षमताओं के आधार पर श्रेष्ठ, सामान्य और निम्न स्तर जैसे समूहों में व्यवस्थित किया जा सकता है।
4. शिक्षण-विधियों के चयन में
शिक्षण-विधि विद्यार्थियों की आयु, रुचि और क्षमता के अनुकूल होनी चाहिए। शिशु स्तर पर मॉन्टेसरी और किंडरगार्टन तथा उच्च स्तर पर योजना-विधि और अभिक्रमित अनुदेशन उपयोगी माने गए हैं।
5. शिक्षण-साधनों के चयन में
सभी विद्यार्थी एक ही शिक्षण-साधन में समान रुचि नहीं लेते। इसलिए आयु और स्तर के अनुसार चित्र, मॉडल, प्रोजेक्टर, टेलीविजन, कम्प्यूटर तथा अन्य साधनों का चयन करना चाहिए।
6. कक्षा के आकार के निर्धारण में
बड़ी कक्षा में शिक्षक प्रत्येक विद्यार्थी पर व्यक्तिगत ध्यान नहीं दे पाता। पुस्तक में मनोवैज्ञानिकों के मत के अनुसार कक्षा में लगभग 20 से 25 विद्यार्थी होने चाहिए।
रॉस के अनुसार प्रत्येक शिक्षक के संरक्षण में विद्यार्थियों की संख्या इतनी कम होनी चाहिए कि वह प्रत्येक विद्यार्थी को व्यक्तिगत रूप से जान सके।
7. गृहकार्य की मात्रा निर्धारित करने में
सभी विद्यार्थियों को समान मात्रा और समान कठिनाई का गृहकार्य देना उचित नहीं है। गृहकार्य उनकी आयु, क्षमता और योग्यता के अनुसार होना चाहिए।
- निम्न स्तर के विद्यार्थियों को अपेक्षाकृत कम गृहकार्य दिया जाए।
- औसत विद्यार्थियों को सामान्य मात्रा में गृहकार्य दिया जाए।
- उच्च क्षमता वाले विद्यार्थियों को अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य दिया जा सकता है।
8. वैयक्तिक सहायता प्रदान करने में
शिक्षक को कमजोर विद्यार्थियों की कठिनाइयों की पहचान करके उन्हें अतिरिक्त समय और व्यक्तिगत सहायता देनी चाहिए। प्रश्नों की कठिनाई भी विद्यार्थियों के स्तर के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए।
9. शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन में
विद्यार्थियों की शारीरिक और मानसिक क्षमता, रुचि तथा अभिक्षमता के आधार पर उन्हें विषय, प्रशिक्षण और व्यवसाय चुनने में सहायता दी जानी चाहिए।
10. लिंग-भेद के अनुसार शिक्षा में
प्राथमिक स्तर तक बालक और बालिकाओं के लिए समान पाठ्यक्रम रखा जा सकता है। माध्यमिक स्तर पर उनकी रुचियों, आवश्यकताओं और योग्यताओं को ध्यान में रखकर विषयों में विविधता दी जा सकती है।
- वैयक्तिक भिन्नताओं के प्रमुख प्रकार हैं— शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, रुचि, व्यक्तित्व, क्रियात्मक, विचार और अधिगम सम्बन्धी भिन्नता।
- वंशानुक्रम और वातावरण वैयक्तिक भिन्नता के मूल आधार हैं।
- अन्य कारक हैं— आयु, बुद्धि, प्रजाति, देश, शिक्षा, आर्थिक दशा और लिंग-भेद।
- शिक्षा में वैयक्तिक भिन्नता का उपयोग पाठ्यचर्या, उद्देश्य, वर्गीकरण, शिक्षण-विधि और शिक्षण-साधनों के चयन में किया जाता है।
- कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या लगभग 20 से 25 रखना उपयोगी माना गया है।
- गृहकार्य और वैयक्तिक सहायता विद्यार्थियों की क्षमता के अनुसार दी जानी चाहिए।
- शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन में विद्यार्थी की रुचि, क्षमता और अभिक्षमता का ध्यान रखना चाहिए।
कल्पना का विकास
कल्पना का अर्थ
कल्पना एक मानसिक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने पूर्व अनुभवों और स्मृतियों को नए रूप में संगठित करके किसी नवीन वस्तु, विचार या रचना का निर्माण करता है।
कल्पना संवेदना, प्रत्यक्षीकरण और स्मृति पर आधारित होती है, परन्तु यह उनसे भिन्न एक स्वतन्त्र तथा उद्देश्यपूर्ण मानसिक प्रक्रिया है। नवीन आविष्कार, साहित्य, कला और रचनात्मक कार्यों में कल्पना का विशेष महत्त्व होता है।
कल्पना की प्रमुख परिभाषाएँ
वुडवर्थ के अनुसार
जब व्यक्ति पूर्व अनुभवों को स्मरण करके उन्हें नए क्रम या नए स्वरूप में व्यवस्थित करता है, तो यह कल्पना कहलाती है।
मैकडूगल के अनुसार
“दूरस्थ अथवा परोक्ष वस्तुओं के सम्बन्ध में चिन्तन करना कल्पना है।”
बोआज के अनुसार
वास्तविक ऐन्द्रिय उद्दीपन की अनुपस्थिति में पूर्व प्रत्यक्षों से सम्बन्धित ज्ञानात्मक अनुभव को कल्पना कहते हैं।
कल्पना के प्रकार
मैकडूगल ने कल्पना को मुख्यतः दो प्रकारों में विभाजित किया है—
- पुनरुत्पादक कल्पना
- उत्पादक कल्पना
1. पुनरुत्पादक कल्पना
पूर्व अनुभवों या घटनाओं को लगभग उसी रूप में स्मरण करके मन में पुनः उपस्थित करना पुनरुत्पादक कल्पना कहलाता है।
उदाहरण — सुनी हुई कहानी को उसी क्रम में मन में दोहराना अथवा उसका वर्णन करना।
2. उत्पादक कल्पना
पूर्व अनुभवों और मानसिक प्रतिमाओं को नए क्रम में व्यवस्थित करके नवीन रूप प्रस्तुत करना उत्पादक कल्पना कहलाता है।
उत्पादक कल्पना के दो प्रकार हैं—
क. रचनात्मक कल्पना
भौतिक वस्तुओं या उपयोगी संरचनाओं के निर्माण से सम्बन्धित कल्पना को रचनात्मक कल्पना कहते हैं।
उदाहरण — भवन का निर्माण करने से पहले अभियन्ता द्वारा उसकी रूपरेखा तैयार करना।
ख. सृजनात्मक कल्पना
अभौतिक तथा कलात्मक रचनाओं के निर्माण में प्रयुक्त कल्पना को सृजनात्मक कल्पना कहते हैं।
उदाहरण — कविता, कहानी, संगीत अथवा अन्य साहित्यिक रचना तैयार करना।
बालकों में कल्पना के विकास के उपाय
- बालकों के सामने उत्सुकता और जिज्ञासा उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ प्रस्तुत करनी चाहिए।
- कल्पनात्मक खेलों तथा रचनात्मक क्रियाओं के अवसर देने चाहिए।
- भाषा-विकास पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि भाषा कल्पना को अभिव्यक्त करने का प्रमुख माध्यम है।
- छोटे नाटक तथा अभिनय में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
- रोचक और मनोहर कहानियाँ सुनानी चाहिए।
- साहित्य, कला, संगीत और विज्ञान में रुचि विकसित करनी चाहिए।
- चित्रकारी, रंग-सज्जा तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति के अवसर देने चाहिए।
- अनावश्यक, भयपूर्ण अथवा अवास्तविक कल्पनाओं से बचाते हुए कल्पना को उचित दिशा देनी चाहिए।
शिक्षा में कल्पना की उपयोगिता
बी. एन. झा के अनुसार विद्यालय का उद्देश्य केवल बालकों की कल्पना का विकास करना नहीं, बल्कि उसे उचित दिशा देना भी होना चाहिए।
- कल्पना बालक को वर्तमान अनुभवों की सीमा से आगे सोचने की क्षमता देती है।
- दूरस्थ देशों, ऐतिहासिक घटनाओं तथा अनुपस्थित वस्तुओं को समझने में सहायता करती है।
- ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा और मानसिक विकास को प्रोत्साहित करती है।
- बालक को अपनी इच्छाओं और अभिलाषाओं को रचनात्मक रूप देने का अवसर प्रदान करती है।
- सृजनात्मक शक्ति तथा मौलिकता का विकास करती है।
- दुःख और निराशा की स्थिति में सुखद विचारों द्वारा मानसिक सन्तुलन बनाए रखने में सहायता करती है।
- किसी कार्य के सम्भावित परिणाम की कल्पना करके उचित निर्णय लेने में सहायता करती है।
- श्रेष्ठ व्यक्तियों के आदर्श प्रस्तुत करके नैतिक तथा चारित्रिक विकास में सहायक होती है।
- दूसरों की परिस्थितियों में स्वयं को रखकर उनके सुख-दुःख को समझने की क्षमता विकसित करती है।
- बालक की रुचियों, प्रवृत्तियों, इच्छाओं और योग्यताओं को प्रकट करती है।
- भावी जीवन की परिस्थितियों के लिए मानसिक तैयारी कराती है।
- सामूहिक तथा सामाजिक योजनाओं को पूरा करने में सहायता देकर सामाजिक विकास करती है।
- पूर्व अनुभवों को नए रूप में व्यवस्थित करने की मानसिक प्रक्रिया कल्पना कहलाती है।
- कल्पना संवेदना, प्रत्यक्षीकरण और स्मृति पर आधारित होती है।
- मैकडूगल ने कल्पना को पुनरुत्पादक और उत्पादक कल्पना में बाँटा है।
- उत्पादक कल्पना के दो प्रकार हैं— रचनात्मक और सृजनात्मक कल्पना।
- भौतिक वस्तुओं के निर्माण से सम्बन्धित कल्पना रचनात्मक कल्पना है।
- कविता, कहानी और संगीत जैसी अभौतिक रचनाओं से सम्बन्धित कल्पना सृजनात्मक कल्पना है।
- खेल, अभिनय, कहानी, कला और भाषा-विकास द्वारा बालकों की कल्पना विकसित की जा सकती है।
- बी. एन. झा ने कल्पना के विकास के साथ उसे उचित दिशा देने पर बल दिया है।
- कल्पना सृजनात्मक, नैतिक, सामाजिक और मानसिक विकास में सहायक होती है।
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चिन्तन एवं तर्क का विकास
चिन्तन का अर्थ
चिन्तन एक संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति किसी वस्तु, घटना या समस्या के विषय में विचार करता है, सही-गलत का निर्णय लेता है तथा समाधान खोजता है।
स्मृति, प्रत्यक्षीकरण, कल्पना, विश्लेषण और तर्क चिन्तन में सहायक होते हैं। वैज्ञानिक आविष्कार, साहित्य-सृजन तथा कठिन समस्याओं का समाधान विकसित चिन्तन-शक्ति के परिणाम हैं।
चिन्तन की प्रमुख परिभाषाएँ
- रॉस के अनुसार — चिन्तन ज्ञानात्मक पक्ष से सम्बन्धित मानसिक प्रक्रिया है।
- वुडवर्थ के अनुसार — चिन्तन कठिनाई को दूर करने का एक साधन है।
- गैरेट के अनुसार — चिन्तन एक अन्तर्निहित व्यवहार है, जिसमें प्रतिमाओं, विचारों और प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है।
- वैलेन्टाइन के अनुसार — किसी लक्ष्य की प्राप्ति की ओर निर्देशित विचारों की क्रमबद्ध शृंखला चिन्तन कहलाती है।
- कॉलसनिक के अनुसार — चिन्तन संकल्पनाओं और अवधारणाओं का पुनर्गठन है।
- जॉन ड्यूवी के अनुसार — चिन्तन विचारों की सक्रिय प्रक्रिया है, जिसके द्वारा किसी विश्वास या अनुभव को परिणाम तक पहुँचाया जाता है।
चिन्तन की प्रकृति एवं विशेषताएँ
- चिन्तन सदैव किसी उद्देश्य या समस्या के समाधान की ओर निर्देशित होता है।
- यह विचारों की क्रमबद्ध एवं शृंखलाबद्ध मानसिक प्रक्रिया है।
- चिन्तन-शक्ति जन्मजात होती है, परन्तु उसका विकास वंशानुक्रम और वातावरण से प्रभावित होता है।
- भाषा चिन्तन का प्रमुख आधार है; भाषा के बिना स्पष्ट चिन्तन कठिन है।
- चिन्तन में अवलोकन, स्मृति, कल्पना, विश्लेषण, संश्लेषण और तर्क जैसी मानसिक शक्तियाँ कार्य करती हैं।
- चिन्तन का विकास आयु और मानसिक परिपक्वता के साथ क्रमशः होता है।
चिन्तन-विकास का क्रम
- 3 से 5 वर्ष — बालक नई वस्तु या क्रिया के विषय में मुख्यतः “क्या” पूछता है।
- लगभग 6 वर्ष — उसके प्रश्नों में “क्यों” जुड़ जाता है और वह कारण जानने लगता है।
- लगभग 12 वर्ष — बालक समस्या का विश्लेषण, संश्लेषण और तर्क द्वारा समाधान खोजने लगता है।
चिन्तन के प्रकार
1. प्रत्यक्षीकरण अथवा मूर्त चिन्तन
प्रत्यक्ष वस्तुओं, घटनाओं और अनुभवों के आधार पर किया गया चिन्तन मूर्त चिन्तन कहलाता है। यह चिन्तन का सरलतम रूप है और छोटे बालकों में अधिक पाया जाता है।
उदाहरण — वास्तविक वस्तु या चित्र देखकर उसके गुणों का वर्णन करना।
2. अमूर्त चिन्तन
शब्दों, प्रतीकों, चिह्नों और अवधारणाओं के आधार पर किया गया चिन्तन अमूर्त चिन्तन कहलाता है। इसमें वस्तु का सामने उपस्थित होना आवश्यक नहीं होता।
उदाहरण — लाल रंग देखकर खतरे का अनुमान लगाना।
3. सृजनात्मक चिन्तन
नवीन विचार, समाधान, नियम या रचना प्रस्तुत करने वाला चिन्तन सृजनात्मक चिन्तन कहलाता है। वैज्ञानिक आविष्कार और नवीन रचनाएँ इसी चिन्तन के परिणाम हैं।
4. तार्किक अथवा विचारात्मक चिन्तन
किसी लक्ष्य की प्राप्ति या समस्या के समाधान के लिए क्रमबद्ध, नियंत्रित और तर्कपूर्ण ढंग से किया गया चिन्तन तार्किक चिन्तन कहलाता है। इसे चिन्तन का उच्चतम रूप माना जाता है।
चिन्तन के प्रमुख साधन
1. प्रतिमा
पूर्व में देखी, सुनी या अनुभव की गई वस्तुओं के मानसिक चित्र को प्रतिमा कहते हैं। स्पष्ट प्रतिमाएँ व्यक्ति को प्रभावी चिन्तन में सहायता देती हैं।
2. भाषा
भाषा विचारों को संगठित और व्यक्त करने का प्रमुख साधन है। अधिक शब्द-ज्ञान वाला व्यक्ति अपने विचारों को अधिक स्पष्टता से समझ और व्यक्त कर सकता है।
3. सम्प्रत्यय
वस्तुओं या घटनाओं के सामान्य गुणों के आधार पर निर्मित मानसिक धारणा को सम्प्रत्यय कहते हैं।
उदाहरण — चार पैर, एक पूँछ और भौंकने जैसे सामान्य गुणों के आधार पर “कुत्ता” सम्प्रत्यय बनता है।
4. प्रतीक एवं संकेत
प्रतीक और संकेत वास्तविक वस्तुओं, अनुभूतियों या क्रियाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। यातायात संकेत, विद्यालय की घंटी, ध्वज और गणितीय चिह्न चिन्तन को दिशा देते हैं।
बालकों में चिन्तन के विकास के उपाय
- बालकों के शब्द-भण्डार और भाषा-विकास पर ध्यान देना चाहिए।
- रटने के स्थान पर समझकर सीखने की आदत विकसित करनी चाहिए।
- वस्तुओं और घटनाओं का स्पष्ट तथा प्रत्यक्ष ज्ञान देना चाहिए।
- बालकों को अपने विचार स्वतन्त्र रूप से व्यक्त करने के अवसर देने चाहिए।
- जिज्ञासा उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ और प्रश्न प्रस्तुत करने चाहिए।
- आयु एवं क्षमता के अनुसार उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य सौंपने चाहिए।
- वाद-विवाद, विचार-विमर्श और अन्य सह-पाठ्यगामी गतिविधियाँ आयोजित करनी चाहिए।
- प्रेरणा, रुचि और अवधान का विकास करना चाहिए।
- ऐसी शिक्षण-विधियाँ अपनानी चाहिए जिनमें विचारात्मक प्रश्न और समस्या-समाधान सम्मिलित हों।
तर्क का अर्थ
तर्क चिन्तन का सर्वोच्च और उद्देश्यपूर्ण रूप है। इसमें पूर्व ज्ञान, अनुभव, प्रमाण और तथ्यों को क्रमबद्ध करके किसी समस्या का समाधान या निश्चित निष्कर्ष प्राप्त किया जाता है।
तर्क एक नियंत्रित मानसिक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति उपलब्ध आधारों से निष्कर्ष निकालता है। इसका प्रयोग तब किया जाता है जब साधारण प्रयासों से समस्या का समाधान नहीं हो पाता।
तर्क की प्रमुख परिभाषाएँ
- इरविंग के अनुसार — तर्क वह विशेष चिन्तन है, जिसमें आधार-वाक्यों से निष्कर्ष निकाले जाते हैं।
- गैरेट के अनुसार — तर्क किसी उद्देश्य की ओर बढ़ने वाली चरणबद्ध चिन्तन-प्रक्रिया है।
- मन के अनुसार — पूर्व अनुभवों को व्यवस्थित करके ऐसी समस्या का समाधान करना तर्क है, जिसका समाधान पुराने उपायों से सम्भव न हो।
- क्रूज के अनुसार — तर्क एक अन्तर्निहित व्यवहार है, जिसमें अनेक प्रतीकों का प्रयोग होता है।
तर्क की विशेषताएँ
- तर्क एक उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।
- इसका प्रयोग समस्या-समाधान के लिए किया जाता है।
- तर्क में पूर्व ज्ञान और अनुभव का सहारा लिया जाता है।
- यह अमूर्त चिन्तन का एक विकसित रूप है।
- इसमें प्रतीकों, सम्प्रत्ययों और मानसिक योग्यताओं का प्रयोग होता है।
- तर्क में मस्तिष्क व्यवस्थित और संगठित रूप से कार्य करता है।
- तर्क द्वारा निश्चित निष्कर्ष प्राप्त किया जाता है।
- यह नियंत्रित, चयनित और चरणबद्ध चिन्तन-प्रक्रिया है।
तर्क के प्रकार
1. आगमन तर्क
विशिष्ट तथ्यों, घटनाओं और उदाहरणों के आधार पर सामान्य नियम या निष्कर्ष तक पहुँचना आगमन तर्क कहलाता है।
इसमें पहले अनेक उदाहरणों का अध्ययन किया जाता है और उनके सामान्य गुणों के आधार पर नियम बनाया जाता है। वैज्ञानिक खोजों में इसका अधिक प्रयोग होता है।
उदाहरण — कई धातुओं को गर्म करने पर फैलते देखकर निष्कर्ष निकालना कि धातुएँ गर्म करने पर फैलती हैं।
2. निगमन तर्क
पहले से ज्ञात सामान्य नियम के आधार पर किसी विशेष घटना या समस्या के विषय में निष्कर्ष निकालना निगमन तर्क कहलाता है।
यह आगमन के विपरीत सामान्य से विशेष की ओर चलता है।
उदाहरण — सभी मनुष्य नश्वर हैं; राम मनुष्य है; अतः राम नश्वर है।
बालकों में तर्क-शक्ति के विकास के उपाय
- विषयों का गहन और अर्थपूर्ण अध्ययन कराया जाना चाहिए।
- बालकों की आयु, अनुभव और बौद्धिक स्तर के अनुसार समस्याएँ प्रस्तुत करनी चाहिए।
- शिक्षण में आगमन विधि का प्रयोग करना चाहिए और समाधान बालकों से निकलवाना चाहिए।
- नवीन तथा जीवन से सम्बन्धित समस्याओं द्वारा जिज्ञासा उत्पन्न करनी चाहिए।
- एकाग्रता, संलग्नता और अन्वेषण की प्रवृत्ति विकसित करनी चाहिए।
- तर्क और समस्या-समाधान की वैज्ञानिक विधि का अभ्यास कराना चाहिए।
- चिन्तन किसी उद्देश्य या समस्या के समाधान की ओर निर्देशित संज्ञानात्मक प्रक्रिया है।
- भाषा चिन्तन का प्रमुख आधार है।
- 3 से 5 वर्ष का बालक “क्या”, लगभग 6 वर्ष में “क्यों” और लगभग 12 वर्ष में विश्लेषण तथा तर्क का प्रयोग करने लगता है।
- चिन्तन के प्रमुख प्रकार हैं— मूर्त, अमूर्त, सृजनात्मक और तार्किक चिन्तन।
- चिन्तन के साधन हैं— प्रतिमा, भाषा, सम्प्रत्यय तथा प्रतीक एवं संकेत।
- तर्क चिन्तन का सर्वोच्च एवं उद्देश्यपूर्ण रूप है।
- विशेष तथ्यों से सामान्य नियम निकालना आगमन तर्क है।
- सामान्य नियम से विशेष निष्कर्ष निकालना निगमन तर्क है।
- तर्क में पूर्व ज्ञान, अनुभव, प्रमाण और क्रमबद्ध विचार का प्रयोग किया जाता है।
- समस्या-समाधान, आगमन विधि, जिज्ञासा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण द्वारा तर्क-शक्ति विकसित की जा सकती है।