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Home Study Material Semester 2 वर्तमान भारतीय समाज और प्रारम्भिक शिक्षा शिक्षा की संकल्पना
Chapter 1 • वर्तमान भारतीय समाज और प्रारम्भिक शिक्षा

शिक्षा की संकल्पना

इस अध्याय में शिक्षा की संकल्पना, शिक्षा का अर्थ, परिभाषाएँ, संकुचित एवं व्यापक अर्थ तथा शिक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण परीक्षा उपयोगी तथ्यों का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

10
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15
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10+
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Notes
Topic 1 शिक्षा

शिक्षा

शिक्षा मनुष्य के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया है। इसके माध्यम से व्यक्ति के ज्ञान, चरित्र, व्यवहार तथा व्यक्तित्व का विकास होता है। शिक्षा मनुष्य को योग्य, संस्कारित एवं समाजोपयोगी नागरिक बनाती है। साथ ही यह समाज की सांस्कृतिक परम्पराओं एवं मूल्यों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

शिक्षा व्यक्ति को समाज के साथ समायोजन स्थापित करने, जीवन की समस्याओं का समाधान करने तथा एक आदर्श नागरिक बनने की क्षमता प्रदान करती है। यही कारण है कि शिक्षा को मानव विकास, सामाजिक प्रगति एवं राष्ट्रीय उन्नति का सबसे प्रभावी साधन माना जाता है।

Topic 2 शिक्षा का अर्थ

शिक्षा का अर्थ

‘शिक्षा’ शब्द संस्कृत की ‘शिक्ष’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है — सीखना एवं सिखाना। अंग्रेजी शब्द Education लैटिन भाषा के Educatum, Educare तथा Educere शब्दों से बना है। इन शब्दों का अर्थ है — मनुष्य की आंतरिक शक्तियों का विकास करना तथा उन्हें बाहर प्रकट करना। अतः शिक्षा का अर्थ है — मनुष्य की जन्मजात शक्तियों एवं गुणों का विकास करना।

शिक्षा का संकुचित अर्थ

संकुचित अर्थ में शिक्षा से अभिप्राय विद्यालय में दी जाने वाली योजनाबद्ध शिक्षा से है। इसमें निश्चित पाठ्यक्रम, निश्चित समय, निश्चित पद्धति तथा शिक्षक द्वारा ज्ञान प्रदान किया जाता है। यह शिक्षा मुख्यतः पुस्तक ज्ञान तक सीमित रहती है।

शिक्षा का व्यापक अर्थ

व्यापक अर्थ में शिक्षा जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है। मनुष्य परिवार, समाज, वातावरण तथा अनुभवों से निरंतर सीखता रहता है। इस शिक्षा पर किसी स्थान, समय या संस्था का बंधन नहीं होता। इसका उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास तथा वातावरण के साथ समायोजन स्थापित करना है।

महत्वपूर्ण
Topic 3 शिक्षा की परिभाषा

शिक्षा की परिभाषा

शिक्षा एक सतत प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति के ज्ञान, कौशल, व्यवहार, मूल्यों एवं व्यक्तित्व का विकास होता है। यह केवल विद्यालय में प्राप्त होने वाला ज्ञान नहीं है, बल्कि जन्म से मृत्यु तक चलने वाली जीवनपर्यन्त प्रक्रिया है।

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार

"मनुष्य में निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति ही शिक्षा है।"

महात्मा गाँधी के अनुसार

"शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक और मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा के सर्वांगीण विकास से है।"

जॉन ड्यूवी के अनुसार

"शिक्षा व्यक्ति की उन क्षमताओं का विकास है जिससे वह अपने वातावरण पर नियंत्रण रख सके।"

रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार

"शिक्षा वह है जो मनुष्य को सत्य की खोज करने तथा उसे व्यक्त करने योग्य बनाती है।"

अरस्तु के अनुसार

"शिक्षा स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण करती है।"

परीक्षा उपयोगी

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास को सुनिश्चित करना है।

Topic 4 शिक्षा की प्रकृति

शिक्षा की प्रकृति

शिक्षा की प्रकृति से अभिप्राय शिक्षा के वास्तविक स्वरूप एवं उसकी मूल विशेषताओं से है। शिक्षा केवल ज्ञान प्रदान करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, सामाजिक समायोजन तथा जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम है।

1. शिक्षा एक सोद्देश्य एवं सचेतन प्रक्रिया है

शिक्षा किसी निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दी जाती है। यह स्वतः होने वाली प्रक्रिया नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध रूप से संचालित की जाती है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति तथा समाज दोनों के हितों को ध्यान में रखा जाता है।

2. शिक्षा अन्तःशक्तियों का सर्वांगीण विकास है

शिक्षा का कार्य बालक में निहित जन्मजात शक्तियों एवं क्षमताओं का विकास करना है। यह केवल ज्ञान प्रदान नहीं करती, बल्कि शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक एवं भावनात्मक विकास भी सुनिश्चित करती है।

3. शिक्षा विकास की प्रक्रिया है

प्रत्येक बालक जन्म से अनेक संभावनाएँ लेकर आता है। शिक्षा इन संभावनाओं को विकसित कर उसके व्यक्तित्व का निर्माण करती है। अनुभवों एवं वातावरण के प्रभाव से व्यक्ति निरंतर विकसित होता रहता है।

4. शिक्षा विद्यालयी ज्ञान तक सीमित नहीं है

शिक्षा केवल विद्यालय में प्राप्त होने वाले ज्ञान तक सीमित नहीं होती। परिवार, समाज, प्रकृति, अनुभव तथा दैनिक जीवन की घटनाएँ भी शिक्षा के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। व्यापक अर्थ में शिक्षा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से प्राप्त होती है।

5. शिक्षा एक प्रगतिशील परिवर्तन है

शिक्षा व्यक्ति के व्यवहार, विचार, दृष्टिकोण एवं व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन लाती है। सीखने की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्ति निरंतर प्रगति करता है तथा समाज के लिए उपयोगी नागरिक बनता है।

6. शिक्षा एक द्विध्रुवीय प्रक्रिया है

एडम्स के अनुसार शिक्षा एक द्विध्रुवीय प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों सक्रिय भूमिका निभाते हैं। शिक्षण तभी प्रभावी होता है जब दोनों के बीच पारस्परिक सहयोग एवं संवाद स्थापित हो।

7. शिक्षा एक त्रिध्रुवीय प्रक्रिया है

आधुनिक शिक्षा शास्त्रियों के अनुसार शिक्षा के तीन प्रमुख अंग — शिक्षक, शिक्षार्थी एवं पाठ्यक्रम हैं। इन तीनों के समन्वय से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया सफल एवं प्रभावी बनती है।

8. शिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है

शिक्षा जन्म से लेकर मृत्यु तक चलने वाली सतत प्रक्रिया है। व्यक्ति अपने जीवन के प्रत्येक अनुभव से कुछ न कुछ सीखता रहता है। इसलिए शिक्षा का संबंध केवल विद्यालयी जीवन तक सीमित नहीं माना जाता।

9. शिक्षा समायोजन की प्रक्रिया है

शिक्षा व्यक्ति को अपने वातावरण, समाज तथा परिस्थितियों के साथ समायोजन स्थापित करना सिखाती है। उचित समायोजन के माध्यम से व्यक्ति मानसिक संतुलन बनाए रखता है तथा जीवन की समस्याओं का सफलतापूर्वक सामना कर पाता है।

परीक्षा उपयोगी

महत्वपूर्ण तथ्य : एडम्स ने शिक्षा को द्विध्रुवीय प्रक्रिया माना है, जबकि आधुनिक शिक्षा शास्त्रियों ने इसे त्रिध्रुवीय प्रक्रिया माना है, जिसके तीन अंग हैं — शिक्षक, शिक्षार्थी एवं पाठ्यक्रम।

सारांश : शिक्षा एक सोद्देश्य, सचेतन, विकासात्मक, प्रगतिशील एवं आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य व्यक्ति की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करना, उसे समाज के साथ समायोजित करना तथा उसके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है।

Topic 5 शिक्षा का विषय-विस्तार या क्षेत्र

शिक्षा का विषय-विस्तार या क्षेत्र

शिक्षा का संबंध मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष से है। इसलिए शिक्षा का विषय-विस्तार अत्यंत व्यापक माना जाता है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति को उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक तथा बौद्धिक जीवन से संबंधित ज्ञान प्रदान किया जाता है। मानव जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं एवं समस्याओं के अध्ययन हेतु शिक्षा के क्षेत्र को अनेक भागों में विभाजित किया गया है।

1. शिक्षा दर्शन

शिक्षा दर्शन के अंतर्गत जीवन, समाज एवं शिक्षा से संबंधित विभिन्न दार्शनिक विचारों का अध्ययन किया जाता है। इसमें शिक्षा के उद्देश्य, स्वरूप, आदर्श, मूल्य तथा पाठ्यचर्या के आधारों का विवेचन किया जाता है।

2. शैक्षिक समाजशास्त्र

शैक्षिक समाजशास्त्र में समाज एवं शिक्षा के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है। इसमें समाजीकरण, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक आवश्यकताओं तथा शिक्षा की सामाजिक भूमिका का विश्लेषण किया जाता है।

3. शिक्षा मनोविज्ञान

शिक्षा मनोविज्ञान के अंतर्गत बालक की प्रकृति, रुचियाँ, क्षमताएँ, अभिरुचियाँ, स्मृति, कल्पना, चिंतन तथा अधिगम प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है। यह शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता करता है।

4. शिक्षा का इतिहास

इस क्षेत्र में प्राचीन काल से वर्तमान तक शिक्षा के विकास, उसकी व्यवस्थाओं तथा विभिन्न शिक्षा प्रणालियों का अध्ययन किया जाता है। इससे वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को समझने में सहायता मिलती है।

5. तुलनात्मक शिक्षा

तुलनात्मक शिक्षा में विभिन्न देशों की शिक्षा प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। इसके माध्यम से अन्य देशों की श्रेष्ठ व्यवस्थाओं को समझकर अपनी शिक्षा प्रणाली में सुधार किया जा सकता है।

6. शैक्षिक समस्याएँ

इस क्षेत्र में शिक्षा से संबंधित वर्तमान समस्याओं एवं उनके समाधान का अध्ययन किया जाता है। अनुशासनहीनता, अपव्यय एवं अवरोधन, जनसंख्या शिक्षा तथा शिक्षा के राष्ट्रीयकरण जैसी समस्याएँ इसके अंतर्गत आती हैं।

7. शैक्षिक प्रशासन एवं संगठन

शैक्षिक प्रशासन एवं संगठन के अंतर्गत शिक्षा संस्थाओं के संचालन, प्रबंधन, नियंत्रण, शिक्षकों के कार्य, विद्यार्थियों के प्रवेश एवं वर्गीकरण आदि का अध्ययन किया जाता है।

8. शिक्षण कला एवं तकनीकी

इस क्षेत्र में शिक्षण विधियों, शिक्षण तकनीकों, शिक्षण सामग्री तथा अधिगम को प्रभावी बनाने वाले उपायों का अध्ययन किया जाता है। इसका उद्देश्य शिक्षण प्रक्रिया को अधिक सरल, रोचक एवं प्रभावी बनाना है।

परीक्षा उपयोगी

महत्वपूर्ण तथ्य : शिक्षा का क्षेत्र केवल विद्यालयी शिक्षा तक सीमित नहीं है। इसमें दर्शन, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, इतिहास, तुलनात्मक शिक्षा, शैक्षिक समस्याएँ, प्रशासन एवं शिक्षण तकनीकी जैसे अनेक विषय शामिल हैं।

सारांश : शिक्षा का विषय-विस्तार अत्यंत व्यापक है। मानव जीवन से संबंधित विभिन्न पक्षों के अध्ययन हेतु शिक्षा के क्षेत्र को अनेक भागों में विभाजित किया गया है, जिनमें शिक्षा दर्शन, शैक्षिक समाजशास्त्र, शिक्षा मनोविज्ञान, शिक्षा का इतिहास, तुलनात्मक शिक्षा, शैक्षिक समस्याएँ, शैक्षिक प्रशासन एवं संगठन तथा शिक्षण कला एवं तकनीकी प्रमुख हैं।

Topic 6 शिक्षा के उद्देश्य

शिक्षा के उद्देश्य

शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं है, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है। शिक्षा के माध्यम से मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का विकास किया जाता है तथा उसे समाज का उपयोगी एवं उत्तरदायी नागरिक बनाया जाता है। शिक्षा के उद्देश्यों को मुख्यतः सामान्य उद्देश्य एवं विशिष्ट उद्देश्य के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

1. सामान्य उद्देश्य

सामान्य उद्देश्य वे उद्देश्य हैं जो प्रत्येक व्यक्ति के विकास से संबंधित होते हैं तथा सभी स्तरों की शिक्षा पर समान रूप से लागू होते हैं।

  • सर्वांगीण विकास : शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक एवं भावनात्मक विकास को सुनिश्चित करना है।
  • चरित्र निर्माण : शिक्षा सत्य, ईमानदारी, अनुशासन, सहिष्णुता एवं कर्तव्यनिष्ठा जैसे गुणों का विकास करती है।
  • ज्ञान एवं विवेक का विकास : शिक्षा व्यक्ति की सोचने, समझने, तर्क करने एवं उचित निर्णय लेने की क्षमता का विकास करती है।
  • सामाजिक विकास : शिक्षा सहयोग, सहानुभूति, सामाजिक समायोजन एवं उत्तरदायित्व की भावना विकसित करती है।
  • राष्ट्रीय एकता : शिक्षा राष्ट्रीय चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों एवं देशभक्ति की भावना को सुदृढ़ बनाती है।
  • आत्मनिर्भरता : शिक्षा व्यक्ति को जीवनोपयोगी कौशल प्रदान कर उसे आत्मनिर्भर बनने में सहायता करती है।
2. विशिष्ट उद्देश्य

विशिष्ट उद्देश्य समय, समाज, विषय एवं शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं के अनुसार निर्धारित किए जाते हैं। ये परिवर्तनशील होते हैं तथा विशेष परिस्थितियों में निर्धारित किए जाते हैं।

  • किसी विशेष विषय का ज्ञान एवं दक्षता प्रदान करना।
  • व्यावसायिक एवं तकनीकी कौशलों का विकास करना।
  • समाज की वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करना।
  • विशेष प्रतिभाओं एवं रुचियों को विकसित करना।
  • रोजगार एवं आजीविका के लिए आवश्यक योग्यता प्रदान करना।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं नवाचार की भावना का विकास करना।
परीक्षा उपयोगी

निष्कर्ष : सामान्य उद्देश्य स्थायी एवं व्यापक होते हैं, जबकि विशिष्ट उद्देश्य समय, स्थान एवं परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं। दोनों का अंतिम लक्ष्य व्यक्ति एवं समाज का सर्वांगीण विकास करना है।

Topic 7 वर्तमान भारत में शिक्षा के उद्देश्यों को प्रभावित करने वाले कारक

वर्तमान भारत में शिक्षा के उद्देश्यों को प्रभावित करने वाले कारक

वर्तमान भारत में शिक्षा के उद्देश्य स्थिर नहीं होते, बल्कि देश, काल एवं परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं। शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण समाज की आवश्यकताओं, राष्ट्रीय विकास तथा समय की मांग को ध्यान में रखकर किया जाता है। वर्तमान भारत में शिक्षा के उद्देश्यों को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं।

1. दर्शन

शिक्षा के उद्देश्यों पर दर्शन का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। विभिन्न दार्शनिक विचारधाराएँ शिक्षा के अलग-अलग उद्देश्यों का निर्धारण करती हैं। प्रकृतिवाद आत्म-अभिव्यक्ति एवं स्वाभाविक विकास पर बल देता है, जबकि आदर्शवाद चरित्र निर्माण एवं आध्यात्मिक विकास को महत्व देता है।

2. जीवन दर्शन

समाज में प्रचलित जीवन जीने के ढंग तथा जीवन मूल्यों का शिक्षा के उद्देश्यों पर प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति जिस प्रकार का जीवन अपनाना चाहता है, शिक्षा के उद्देश्य भी उसी दिशा में निर्धारित किए जाते हैं। महात्मा गाँधी के जीवन दर्शन का भारतीय शिक्षा पर विशेष प्रभाव रहा है।

3. राजनीतिक विचारधारा

किसी देश की शासन व्यवस्था शिक्षा के उद्देश्यों को प्रभावित करती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा का उद्देश्य स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व एवं नागरिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना होता है।

4. सामाजिक विचारधारा

समाज की आवश्यकताएँ एवं परिस्थितियाँ शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण करती हैं। शिक्षा का उद्देश्य समाज को शिक्षित करना, सामाजिक समस्याओं का समाधान करना तथा समाजोपयोगी नागरिक तैयार करना है।

5. आर्थिक दशाएँ

किसी देश की आर्थिक स्थिति शिक्षा के उद्देश्यों को प्रभावित करती है। आर्थिक रूप से विकसित राष्ट्रों में शिक्षा का उद्देश्य तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास को बढ़ावा देना होता है, जबकि विकासशील देशों में शिक्षा रोजगार एवं आर्थिक उन्नति पर अधिक बल देती है।

6. तकनीकी उन्नति

विज्ञान एवं तकनीक के विकास का शिक्षा के उद्देश्यों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। आधुनिक युग में शिक्षा का उद्देश्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तकनीकी दक्षता तथा नवाचार की भावना का विकास करना भी है।

7. प्राकृतिक दशाएँ

देश की जलवायु, प्राकृतिक संसाधन एवं भौगोलिक परिस्थितियाँ भी शिक्षा के उद्देश्यों को प्रभावित करती हैं। शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को अपने प्राकृतिक वातावरण एवं संसाधनों के संरक्षण तथा उचित उपयोग का ज्ञान दिया जाता है।

8. सांस्कृतिक एवं धार्मिक परम्पराएँ

किसी देश की संस्कृति, सभ्यता, परम्पराएँ एवं धार्मिक मान्यताएँ शिक्षा के उद्देश्यों को प्रभावित करती हैं। शिक्षा का उद्देश्य सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, नैतिक मूल्यों का विकास तथा सामाजिक समरसता स्थापित करना भी है।

परीक्षा उपयोगी

महत्वपूर्ण तथ्य : वर्तमान भारत में शिक्षा के उद्देश्यों को मुख्य रूप से दर्शन, जीवन दर्शन, राजनीतिक विचारधारा, सामाजिक विचारधारा, आर्थिक दशाएँ, तकनीकी उन्नति, प्राकृतिक दशाएँ तथा सांस्कृतिक एवं धार्मिक परम्पराएँ प्रभावित करती हैं।

Topic 8 शिक्षा का महत्व

शिक्षा का महत्व

शिक्षा मानव जीवन की आधारशिला है। यह व्यक्ति के ज्ञान, कौशल, व्यवहार एवं व्यक्तित्व का विकास करती है। शिक्षा मनुष्य को सही और गलत में अंतर समझने की क्षमता प्रदान करती है तथा उसे समाज का जिम्मेदार नागरिक बनाती है।

1. व्यक्तित्व के विकास में सहायक

शिक्षा व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक एवं भावनात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके माध्यम से व्यक्ति की जन्मजात शक्तियों का विकास होता है।

2. ज्ञान एवं विवेक का विकास

शिक्षा व्यक्ति को विभिन्न विषयों का ज्ञान प्रदान करती है तथा उसकी सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करती है।

3. सामाजिक विकास में सहायक

शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक नियमों, परंपराओं एवं मूल्यों से परिचित कराती है। इससे सामाजिक समायोजन तथा सहयोग की भावना विकसित होती है।

4. नैतिक मूल्यों का विकास

शिक्षा सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, अनुशासन, सहिष्णुता तथा कर्तव्यनिष्ठा जैसे नैतिक गुणों का विकास करती है।

5. राष्ट्रीय विकास में योगदान

शिक्षित नागरिक किसी भी राष्ट्र की प्रगति का आधार होते हैं। शिक्षा राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक मूल्यों तथा आर्थिक विकास को मजबूत बनाती है।

6. आत्मनिर्भरता का विकास

शिक्षा व्यक्ति को रोजगार प्राप्त करने, जीवन-यापन करने तथा आत्मनिर्भर बनने योग्य बनाती है।

7. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास

शिक्षा अंधविश्वासों एवं रूढ़ियों को दूर कर तार्किक एवं वैज्ञानिक सोच विकसित करती है।

परीक्षा उपयोगी

निष्कर्ष : शिक्षा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का प्रमुख साधन है। यह मनुष्य को योग्य, जागरूक, संस्कारित एवं आत्मनिर्भर बनाकर जीवन को सफल बनाने में सहायता करती है।

Topic 9 शिक्षा के प्रकार

शिक्षा के प्रकार

शिक्षा एक व्यापक प्रक्रिया है जो विभिन्न माध्यमों से प्राप्त होती है। शिक्षा के स्वरूप एवं व्यवस्था के आधार पर शिक्षा को मुख्यतः औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षा में विभाजित किया जाता है।

1. औपचारिक शिक्षा (Formal Education)

औपचारिक शिक्षा वह शिक्षा है जो विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं में निश्चित पाठ्यक्रम, निर्धारित समय-सारिणी तथा नियोजित शिक्षण प्रक्रिया के माध्यम से प्रदान की जाती है।

विशेषताएँ :

  • निश्चित पाठ्यक्रम एवं निर्धारित उद्देश्य होते हैं।
  • प्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा शिक्षा प्रदान की जाती है।
  • निश्चित समय एवं स्थान पर संचालित होती है।
  • परीक्षा एवं प्रमाणपत्र की व्यवस्था होती है।

उदाहरण : विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय की शिक्षा।

2. अनौपचारिक शिक्षा (Informal Education)

अनौपचारिक शिक्षा वह शिक्षा है जो व्यक्ति को परिवार, समाज, मित्रों, वातावरण तथा दैनिक अनुभवों से स्वतः प्राप्त होती है। यह जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है।

विशेषताएँ :

  • इसका कोई निश्चित पाठ्यक्रम नहीं होता।
  • यह स्वतः एवं निरंतर प्राप्त होती है।
  • किसी विशेष संस्था या शिक्षक की आवश्यकता नहीं होती।
  • जीवन के अनुभवों से सीखने पर आधारित होती है।

उदाहरण : परिवार से संस्कार सीखना, सामाजिक व्यवहार सीखना, समाचार पत्र एवं मीडिया से जानकारी प्राप्त करना।

अतिरिक्त जानकारी

निरौपचारिक शिक्षा : यह औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा के मध्य का स्वरूप है। इसमें समय, आयु एवं स्थान की बाध्यता कम होती है। प्रौढ़ शिक्षा, मुक्त विश्वविद्यालय एवं दूरस्थ शिक्षा इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा में अंतर
  • क्षेत्र : औपचारिक शिक्षा का क्षेत्र अपेक्षाकृत संकीर्ण एवं संस्थागत होता है, जबकि अनौपचारिक शिक्षा का क्षेत्र व्यापक होता है और सम्पूर्ण जीवन को समाहित करता है।
  • योजना : औपचारिक शिक्षा सुनियोजित एवं व्यवस्थित रूप से प्रदान की जाती है, जबकि अनौपचारिक शिक्षा के लिए कोई पूर्व निर्धारित योजना नहीं होती और यह स्वाभाविक रूप से प्राप्त होती है।
  • अभिकरण : औपचारिक शिक्षा के प्रमुख अभिकरण विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय होते हैं, जबकि अनौपचारिक शिक्षा परिवार, मित्र, पड़ोसी, समुदाय, धार्मिक संस्थाएँ तथा समाज से प्राप्त होती है।
  • उद्देश्य : औपचारिक शिक्षा मुख्यतः बौद्धिक विकास एवं विषयगत ज्ञान पर बल देती है, जबकि अनौपचारिक शिक्षा बालक के सर्वांगीण विकास में सहायक होती है।
  • शिक्षण-विधियाँ : औपचारिक शिक्षा में शिक्षण-विधियाँ पूर्व निर्धारित होती हैं, जबकि अनौपचारिक शिक्षा में सीखना अनुभवों एवं दैनिक जीवन की परिस्थितियों के माध्यम से होता है।
  • पाठ्यचर्या : औपचारिक शिक्षा में निश्चित एवं पूर्व निर्धारित पाठ्यचर्या होती है, जबकि अनौपचारिक शिक्षा में कोई निश्चित पाठ्यचर्या नहीं होती और सम्पूर्ण जीवन ही इसकी पाठ्यचर्या माना जाता है।
  • अवधि : औपचारिक शिक्षा एक निश्चित अवधि एवं स्तर के अनुसार संचालित होती है, जबकि अनौपचारिक शिक्षा जन्म से जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है।
  • शिक्षक : औपचारिक शिक्षा प्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा प्रदान की जाती है, जबकि अनौपचारिक शिक्षा में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में शिक्षक की भूमिका निभा सकता है।
  • स्थान : औपचारिक शिक्षा मुख्यतः विद्यालय एवं शिक्षण संस्थानों में दी जाती है, जबकि अनौपचारिक शिक्षा का कोई निश्चित स्थान नहीं होता।
  • प्रमाण-पत्र : औपचारिक शिक्षा में परीक्षा उत्तीर्ण करने पर प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाता है, जबकि अनौपचारिक शिक्षा में किसी प्रकार का प्रमाण-पत्र नहीं दिया जाता।
परीक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण
Topic 10 दूरस्थ शिक्षा

दूरस्थ शिक्षा

दूरस्थ शिक्षा मुख्यतः निरौपचारिक शिक्षा का आधुनिक स्वरूप मानी जाती है। इसमें शिक्षक तथा शिक्षार्थी के बीच प्रत्यक्ष संपर्क नहीं होता, फिर भी विभिन्न संचार माध्यमों की सहायता से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया संचालित की जाती है। इसे पत्राचार शिक्षा, मुक्त शिक्षा (Open Education) अथवा मुक्त अधिगम (Open Learning) भी कहा जाता है।

दूरस्थ शिक्षा उन बालकों, युवाओं एवं प्रौढ़ों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो किसी कारणवश नियमित विद्यालय या महाविद्यालय में अध्ययन नहीं कर पाते, किन्तु अपनी शिक्षा जारी रखना चाहते हैं। वर्तमान समय में यह शिक्षा प्रणाली शिक्षा के लोकतंत्रीकरण एवं आजीवन शिक्षा की अवधारणा को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

दूरस्थ शिक्षा का अर्थ

दूरस्थ शिक्षा का शाब्दिक अर्थ है — दूरी पर रहते हुए शिक्षा प्राप्त करना। इसमें शिक्षक एवं शिक्षार्थी के बीच स्थान तथा समय की दूरी होती है, जिसे मुद्रित अध्ययन सामग्री, डाक, रेडियो, दूरदर्शन, मोबाइल, कंप्यूटर एवं इंटरनेट जैसे माध्यमों द्वारा कम किया जाता है।

दूरस्थ शिक्षा की प्रमुख परिभाषाएँ
  • जैक फॉक्स के अनुसार : "दूरस्थ शिक्षा अधिगम विधि की कुछ ऐसी विशेषताओं को प्रकट करती है जो शिक्षा संस्थाओं की अधिगम-विधि से भिन्न हैं।"
  • मूरे के अनुसार : "दूरस्थ शिक्षा अनुदेशन विधियों का ऐसा परिवार है जिसमें शिक्षण व्यवहार एवं अधिगम व्यवहार अलग-अलग सम्पन्न होते हैं तथा संचार माध्यमों द्वारा दोनों के बीच संबंध स्थापित किया जाता है।"
  • पीटर्स के अनुसार : "दूरस्थ शिक्षा अप्रत्यक्ष अनुदेशन की ऐसी विधि है जिसमें शिक्षक एवं शिक्षार्थी के मध्य भौगोलिक दूरी होती है तथा सम्पर्क तकनीकी माध्यमों द्वारा स्थापित किया जाता है।"
दूरस्थ शिक्षा की विशेषताएँ
  • यह अनौपचारिक एवं लचीली शिक्षा प्रणाली है।
  • शिक्षा जनसामान्य तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम है।
  • यह स्थान एवं समय की सीमाओं से मुक्त होती है।
  • शिक्षार्थी के स्व-अध्ययन एवं स्व-गति से सीखने पर बल देती है।
  • प्रवेश के अवसर अपेक्षाकृत अधिक खुले होते हैं।
  • बहु-माध्यमीय शिक्षण सामग्री का उपयोग किया जाता है।
  • शिक्षक एवं शिक्षार्थी का प्रत्यक्ष संपर्क आवश्यक नहीं होता।
  • रेडियो, दूरदर्शन, वीडियो, कंप्यूटर एवं इंटरनेट का उपयोग किया जाता है।
  • मुक्त अधिगम की परिस्थितियाँ उपलब्ध कराती है।
  • सभी आयु वर्गों के लिए शिक्षा के अवसर प्रदान करती है।
भारत में दूरस्थ शिक्षा

भारत में दूरस्थ शिक्षा का विकास शिक्षा के प्रसार तथा सभी वर्गों तक शिक्षण सुविधाएँ पहुँचाने के उद्देश्य से किया गया। पत्राचार शिक्षा से प्रारम्भ होकर आज यह मुक्त विश्वविद्यालयों, ऑनलाइन शिक्षण तथा डिजिटल माध्यमों तक विस्तृत हो चुकी है।

  • 1961 : केंद्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद् ने पत्राचार शिक्षा प्रारम्भ करने की संस्तुति की।
  • 1962 : दिल्ली विश्वविद्यालय ने उच्च शिक्षा स्तर पर पत्राचार पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया।
  • 1965 : माध्यमिक स्तर पर पत्राचार शिक्षा कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया।
  • 1979 : नई दिल्ली में प्रथम मुक्त विद्यालय (Open School) की स्थापना की गई।
  • 1982 : दूरस्थ शिक्षा शब्द का व्यापक प्रयोग प्रारम्भ हुआ।
महत्वपूर्ण वर्ष
दूरस्थ शिक्षा के उद्देश्य
  • कम आय, अधिक आयु अथवा अन्य कारणों से शिक्षा से वंचित व्यक्तियों को अधिगम के अवसर प्रदान करना।
  • कार्यरत व्यक्तियों को रोजगार प्रभावित किए बिना शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा देना।
  • सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को शिक्षा से जोड़कर उन्हें समाज का उपयोगी नागरिक बनाना।
  • उच्च शिक्षा के अवसरों का विस्तार करना तथा शिक्षा को अधिक सुलभ बनाना।
  • व्यक्तियों को उनकी रुचियों एवं आवश्यकताओं के अनुसार ज्ञान एवं कौशल विकास के अवसर प्रदान करना।
दूरस्थ शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्व
  • ग्रामीण, पर्वतीय एवं दूरस्थ क्षेत्रों तक शिक्षा पहुँचाने का प्रभावी माध्यम है।
  • कार्यरत व्यक्तियों को कमाई के साथ पढ़ाई जारी रखने का अवसर प्रदान करती है।
  • शिक्षा की बढ़ती मांग को पूरा करने में सहायक होती है।
  • नवीन ज्ञान, तकनीक एवं शैक्षिक परिवर्तनों को व्यापक स्तर पर पहुँचाने में सहायता करती है।
  • शैक्षिक अवसरों के लोकतंत्रीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
दूरस्थ शिक्षा की सीमाएँ
  • विज्ञान एवं व्यावसायिक विषयों के शिक्षण के लिए पूर्णतः उपयुक्त नहीं मानी जाती।
  • प्रयोगात्मक कार्य एवं प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण की व्यवस्था सीमित होती है।
  • स्वाध्याय पर अत्यधिक निर्भरता होने के कारण सभी विद्यार्थी समान रूप से लाभान्वित नहीं हो पाते।
  • शिक्षक एवं शिक्षार्थी के प्रत्यक्ष संपर्क का अभाव रहता है।
  • निगरानी एवं मार्गदर्शन सीमित होने के कारण गुणवत्तापूर्ण अधिगम में कठिनाई आ सकती है।
परीक्षा उपयोगी

सारांश : दूरस्थ शिक्षा आधुनिक शिक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण स्वरूप है, जो स्थान एवं समय की बाधाओं को समाप्त कर शिक्षा को अधिक सुलभ बनाती है। भारत में इसका विकास पत्राचार शिक्षा से प्रारम्भ होकर मुक्त विद्यालयों, मुक्त विश्वविद्यालयों तथा डिजिटल शिक्षण तक विस्तृत हो चुका है। शिक्षा के प्रसार, आजीवन अधिगम तथा शैक्षिक अवसरों के लोकतंत्रीकरण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

‘शिक्षा’ शब्द किस धातु से बना है?

व्याख्या: शिक्षा शब्द संस्कृत की "शिक्ष" धातु से बना है जिसका अर्थ सीखना एवं सिखाना है।
Q 2

Education शब्द किस भाषा से लिया गया है?

व्याख्या: Education शब्द लैटिन भाषा के Educatum, Educare तथा Educere शब्दों से बना है।
Q 3

संकुचित अर्थ में शिक्षा मुख्यतः कहाँ प्राप्त होती है?

व्याख्या: संकुचित अर्थ में शिक्षा विद्यालय द्वारा दी जाने वाली योजनाबद्ध शिक्षा है।
Q 4

व्यापक अर्थ में शिक्षा कैसी प्रक्रिया है?

व्याख्या: व्यापक अर्थ में शिक्षा जन्म से मृत्यु तक चलने वाली प्रक्रिया है।
Q 5

“मनुष्य में निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति ही शिक्षा है” यह कथन किसका है?

व्याख्या: यह परिभाषा स्वामी विवेकानन्द ने दी थी।
Q 6

शिक्षा को द्विध्रुवीय प्रक्रिया किसने माना है?

व्याख्या: एडम्स ने शिक्षा को द्विध्रुवीय प्रक्रिया माना है।
Q 7

त्रिध्रुवीय शिक्षा प्रक्रिया का तीसरा अंग कौन-सा है?

व्याख्या: त्रिध्रुवीय प्रक्रिया के अंग हैं— शिक्षक, शिक्षार्थी एवं पाठ्यक्रम।
Q 8

शिक्षा के विषय-विस्तार का कौन-सा क्षेत्र बालक के व्यवहार एवं अधिगम का अध्ययन करता है?

व्याख्या: शिक्षा मनोविज्ञान बालक की प्रकृति, रुचि एवं अधिगम का अध्ययन करता है।
Q 9

शिक्षा का कौन-सा उद्देश्य स्थायी एवं व्यापक होता है?

व्याख्या: सामान्य उद्देश्य स्थायी एवं व्यापक होते हैं।
Q 10

वर्तमान भारत में शिक्षा के उद्देश्यों को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक कौन-सा है?

व्याख्या: शिक्षा के उद्देश्यों पर दर्शन का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है।
Q 11

शिक्षा का कौन-सा महत्व अंधविश्वासों को दूर करने से संबंधित है?

व्याख्या: शिक्षा तार्किक एवं वैज्ञानिक सोच का विकास करती है।
Q 12

औपचारिक शिक्षा की प्रमुख विशेषता क्या है?

व्याख्या: औपचारिक शिक्षा निश्चित पाठ्यक्रम एवं निर्धारित व्यवस्था पर आधारित होती है।
Q 13

अनौपचारिक शिक्षा का प्रमुख स्रोत कौन है?

व्याख्या: अनौपचारिक शिक्षा परिवार, समाज एवं अनुभवों से प्राप्त होती है।
Q 14

भारत में उच्च शिक्षा स्तर पर पत्राचार शिक्षा किस विश्वविद्यालय ने प्रारम्भ की?

व्याख्या: 1962 में दिल्ली विश्वविद्यालय ने पत्राचार पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया।
Q 15

नई दिल्ली में प्रथम मुक्त विद्यालय की स्थापना कब हुई?

व्याख्या: 1979 में नई दिल्ली में प्रथम मुक्त विद्यालय की स्थापना हुई थी।

पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

इस अध्याय से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न जो पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे जा चुके हैं।

Q 1 2023, 2019

शिक्षा का संकुचित एवं व्यापक अर्थ स्पष्ट कीजिए।

Q 2 2024

शिक्षा की प्रकृति की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।