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Home Study Material Semester 1 बाल विकास एवं सीखने की प्रक्रिया विभिन्न अवस्थाओं में विकास
Chapter 2 • बाल विकास एवं सीखने की प्रक्रिया

विभिन्न अवस्थाओं में विकास

इस अध्याय में शारीरिक विकास, मानसिक विकास, संवेगात्मक विकास, सामाजिक विकास, भाषा विकास, पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त, बुद्धि, बुद्धिलब्धि एवं बुद्धि परीक्षण तथा सृजनात्मकता का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

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Topic 1 शारीरिक विकास

शारीरिक विकास

मानव शरीर के विभिन्न अंगों, इन्द्रियों, मांसपेशियों, हड्डियों तथा उनकी कार्यक्षमता में होने वाले क्रमिक परिवर्तनों को शारीरिक विकास कहा जाता है।

सरल शब्दों में, बालक की आयु के साथ उसके शरीर की लम्बाई, वजन, आकार, अनुपात, मांसपेशियों तथा शारीरिक क्षमताओं में होने वाली वृद्धि एवं परिवर्तन ही शारीरिक विकास कहलाता है।

शारीरिक विकास की परिभाषाएँ

हरबर्ट सोरेन्सन के अनुसार

"शारीरिक विकास उत्तरोत्तर परिवर्तन एवं परिपक्वता की ओर संकेत करता है।"

मेरेडिथ के अनुसार

"अभिवृद्धि, विकास एवं परिपक्वता एक-दूसरे के पर्याय हैं। गर्भावस्था के आरम्भ से लेकर परिपक्वता तक शारीरिक संरचना में होने वाले परिवर्तनों के समूह को शारीरिक विकास कहा जाता है।"

कोल एवं मार्टिन के अनुसार

"विकास ही परिवर्तन का आधार है। यदि बालक का शारीरिक विकास नहीं होता, तो वह कभी भी प्रौढ़ नहीं हो सकता।

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शारीरिक विकास केवल शरीर की वृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर के विभिन्न अंगों की संरचना, कार्यक्षमता तथा परिपक्वता में होने वाले परिवर्तनों की सतत प्रक्रिया है।

शारीरिक विकास की विशेषताएँ

  • शारीरिक विकास दृष्टिगोचर होता है तथा इसे प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है।
  • शारीरिक विकास गर्भावस्था से ही प्रारम्भ हो जाता है।
  • शारीरिक विकास की गति सभी अवस्थाओं में समान नहीं होती।
  • शारीरिक विकास एक निश्चित एवं क्रमबद्ध प्रक्रिया है।
  • शारीरिक विकास सामान्यतः सिर से पैर तथा केन्द्र से बाहरी अंगों की ओर होता है।
  • शारीरिक विकास के साथ शरीर के आकार, स्वरूप एवं बनावट में परिवर्तन होता है।
  • विकास के दौरान शरीर के विभिन्न अंगों के अनुपात में परिवर्तन होता है।
  • शारीरिक विकास में बाह्य अंगों के साथ-साथ आन्तरिक अंगों का भी विकास होता है।
  • शारीरिक विकास पर वंशानुक्रम एवं वातावरण दोनों का प्रभाव पड़ता है।
  • शारीरिक विकास बालक के सर्वांगीण विकास का आधार होता है।

विभिन्न अवस्थाओं में शारीरिक विकास

बालक का शारीरिक विकास विभिन्न अवस्थाओं में अलग-अलग गति से होता है। प्रत्येक अवस्था में शरीर की संरचना, आकार, वजन तथा अंगों के विकास में परिवर्तन दिखाई देता है।

1. शैशवावस्था में शारीरिक विकास
  • लम्बाई – जन्म के समय शिशु की लम्बाई लगभग 20 इंच होती है। 6 वर्ष की आयु तक बालक की लम्बाई लगभग 40–42 इंच (लगभग साढ़े तीन फीट) हो जाती है।
  • वजन – जन्म के समय शिशु का वजन लगभग 6–8 पाउंड (ढाई से तीन किलोग्राम) होता है। जन्म के समय बालकों का वजन बालिकाओं से अधिक होता है। लगभग 6 माह में वजन दोगुना तथा 1 वर्ष में तीन गुना हो जाता है।
  • बालक एवं बालिका में तुलना – शैशवावस्था में सामान्यतः बालकों का वजन एवं लम्बाई दोनों बालिकाओं की अपेक्षा अधिक होते हैं। जन्म के समय बालक का औसत भार लगभग 7.15 पाउंड तथा बालिका का लगभग 7.13 पाउंड माना गया है।
  • सिर एवं मस्तिष्क – जन्म के समय शिशु का सिर शरीर की तुलना में बड़ा होता है तथा सिर की लम्बाई सम्पूर्ण शरीर की लम्बाई का लगभग 1/4 भाग होती है। मस्तिष्क का भार जन्म के समय लगभग 350 ग्राम होता है, जो 6 वर्ष की आयु तक लगभग 1260 ग्राम तथा वयस्क अवस्था में लगभग 1400 ग्राम हो जाता है।
  • मस्तिष्कीय विकास – नाड़ी संस्थान का विकास गर्भकाल से ही प्रारम्भ हो जाता है। हरलॉक के अनुसार प्रारम्भिक वर्षों में मुख के आकार में बहुत कम परिवर्तन होते हैं।
  • मांसपेशियों का विकास – जन्म के समय मांसपेशियाँ शरीर के कुल भार का लगभग 23% होती हैं। आयु बढ़ने के साथ इनका विकास होता है तथा लगभग 2 वर्ष की आयु तक हाथ-पैर जन्म की अपेक्षा लगभग दो गुना विकसित हो जाते हैं। 6 वर्ष की आयु तक मांसपेशियों में पर्याप्त लचीलापन आ जाता है।
  • हड्डियों का विकास – नवजात शिशु में लगभग 300 हड्डियाँ होती हैं। ये हड्डियाँ छोटी, कोमल एवं लचीली होती हैं। आयु बढ़ने के साथ हड्डियाँ मजबूत होती जाती हैं। इनके विकास के लिए कैल्शियम, फॉस्फोरस तथा अन्य खनिज लवण आवश्यक होते हैं।
  • आन्तरिक अंगों का विकास – शैशवावस्था में पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, परिवहन तंत्र तथा अन्य आन्तरिक अंगों का तीव्र गति से विकास होता है।
  • दाँतों का विकास – जन्म के समय शिशु के दाँत नहीं होते। लगभग 7–8 माह की आयु में दूध के दाँत निकलना प्रारम्भ होते हैं। 1 वर्ष की आयु तक लगभग 8 दाँत निकल आते हैं तथा 4 वर्ष की आयु तक सभी अस्थायी (दूध के) दाँत निकल आते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे अस्थायी दाँत गिरते हैं और स्थायी दाँत निकलने लगते हैं।
  • शारीरिक संतुलन – सिर अपेक्षाकृत बड़ा होने के कारण प्रारम्भिक अवस्था में शिशु शारीरिक संतुलन ठीक प्रकार से स्थापित नहीं कर पाता, परन्तु आयु बढ़ने के साथ संतुलन एवं नियंत्रण विकसित हो जाता है।
2. बाल्यावस्था में शारीरिक विकास
  • लम्बाई – बाल्यावस्था (6–12 वर्ष) में लम्बाई प्रतिवर्ष लगभग 2–3 इंच बढ़ती है। 6–9 वर्ष तक सामान्यतः बालकों की लम्बाई बालिकाओं से अधिक होती है, किन्तु बाल्यावस्था के अन्त तक बालिकाएँ लम्बाई में बालकों से आगे निकल जाती हैं।
  • वजन – इस अवस्था में वजन में निरन्तर वृद्धि होती है। 6–9 वर्ष तक बालिकाओं का वजन सामान्यतः बालकों से कम होता है, किन्तु 12 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते बालिकाओं का वजन बालकों से अधिक हो जाता है।
  • बालक एवं बालिका में तुलना – बाल्यावस्था के प्रारम्भ में बालक लम्बाई एवं वजन में आगे रहते हैं, परन्तु अन्तिम वर्षों में बालिकाओं का विकास अधिक तीव्र हो जाता है और वे लम्बाई एवं वजन दोनों में आगे निकल सकती हैं।
  • सिर एवं मस्तिष्क – इस अवस्था में सिर एवं मस्तिष्क का अनुपात धीरे-धीरे वयस्कों के समान होने लगता है। लगभग 12 वर्ष की आयु तक मस्तिष्क का लगभग 95% विकास पूर्ण हो जाता है।
  • मांसपेशियाँ – मांसपेशियों का विकास पर्याप्त रूप से हो जाता है तथा बालक अपने शरीर पर बेहतर नियंत्रण स्थापित कर लेता है। इस अवस्था में मांसपेशियों का भार शरीर के कुल भार का लगभग 27% हो जाता है।
  • हड्डियाँ – हड्डियाँ पहले की अपेक्षा अधिक मजबूत हो जाती हैं। शारीरिक दृढ़ता बढ़ती है तथा बालक खेलकूद एवं अन्य शारीरिक कार्यों में अधिक सक्षम हो जाता है।
  • शारीरिक गठन – बाल्यावस्था के अन्त तक लड़कों के कंधे अपेक्षाकृत चौड़े होने लगते हैं जबकि लड़कियों के कूल्हे (Hip Bone) अधिक चौड़े होने लगते हैं। यही परिवर्तन आगे किशोरावस्था में और स्पष्ट दिखाई देता है।
  • दाँत – बाल्यावस्था के अन्त तक लगभग सभी स्थायी दाँत निकल आते हैं। स्थायी दाँतों की संख्या लगभग 28 होती है। शेष 4 दाँत बुद्धि दाँत (Wisdom Teeth) कहलाते हैं जो बाद में निकलते हैं। सामान्यतः बालकों में दाँत बालिकाओं की अपेक्षा कुछ देर से निकलते हैं।
  • यौन अंगों का विकास – बाल्यावस्था में यौन अंगों का विकास तीव्र गति से होता है। बालिकाओं में यह विकास सामान्यतः बालकों की अपेक्षा पहले प्रारम्भ होता है।
  • द्वितीयक लैंगिक लक्षण – बाल्यावस्था के अन्तिम वर्षों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों की प्रारम्भिक झलक दिखाई देने लगती है। ये लक्षण बालिकाओं में बालकों की अपेक्षा पहले प्रकट होते हैं।
  • आन्तरिक अंगों का विकास – शरीर के विभिन्न आन्तरिक अंगों का विकास लगभग पूर्णता की ओर बढ़ता है। पाचन, श्वसन एवं अन्य शारीरिक प्रणालियाँ अधिक सक्षम हो जाती हैं।
  • स्वावलम्बन एवं नियंत्रण – बालक अपने अधिकांश कार्य स्वयं करने लगता है। शारीरिक समन्वय, संतुलन एवं कार्यकुशलता में पर्याप्त वृद्धि होती है।
  • Consolidation Stage – क्रो एवं क्रो के अनुसार 6–9 वर्ष तक विकास की गति अपेक्षाकृत तीव्र रहती है, जबकि बाद के वर्षों में गति कुछ मन्द हो जाती है और शरीर में अधिक दृढ़ता आने लगती है। इसी कारण इस अवस्था को Consolidation Stage कहा जाता है।
3. किशोरावस्था में शारीरिक विकास
  • लम्बाई एवं वजन – इस अवस्था में लम्बाई और वजन दोनों में तीव्र वृद्धि (Growth Spurt) होती है। प्रारम्भिक किशोरावस्था में बालिकाओं का विकास बालकों की अपेक्षा पहले और अधिक तीव्र होता है, जबकि उत्तर किशोरावस्था में बालक सामान्यतः अधिक लम्बे एवं भारी हो जाते हैं।
  • मस्तिष्क एवं सिर – मस्तिष्क का भार लगभग 1200–1400 ग्राम तक पहुँच जाता है, जो वयस्क स्तर के निकट होता है। मानसिक एवं बौद्धिक क्षमता में भी तीव्र वृद्धि होती है।
  • हड्डियाँ – हड्डियाँ अत्यन्त मजबूत हो जाती हैं। किशोरावस्था के अन्त तक अस्थिकरण (Ossification) की प्रक्रिया लगभग पूर्ण हो जाती है तथा शारीरिक विकास लगभग परिपक्वता प्राप्त कर लेता है।
  • मांसपेशियाँ – मांसपेशियों का विकास तीव्र गति से होता है। शरीर अधिक सुदृढ़, शक्तिशाली एवं सुगठित बनता है। लड़कों में मांसपेशियों का विकास लड़कियों की अपेक्षा अधिक दिखाई देता है।
  • दाँत – इस अवस्था तक लगभग सभी स्थायी दाँत निकल आते हैं। किशोरावस्था के अन्तिम वर्षों में तीसरे मोलर दाँत (बुद्धि दाँत) निकलने प्रारम्भ हो सकते हैं।
  • लड़के एवं लड़कियों में शारीरिक अन्तर – इस अवस्था में दोनों के शरीर में स्पष्ट अन्तर दिखाई देने लगता है।
    • लड़कों के कंधे चौड़े तथा मांसपेशियाँ अधिक विकसित होती हैं।
    • लड़कियों के कूल्हे चौड़े हो जाते हैं तथा शरीर में स्त्री-सुलभ गठन विकसित होता है।
  • आवाज़ में परिवर्तन – लड़कों की आवाज भारी एवं गम्भीर हो जाती है, जबकि लड़कियों की आवाज अपेक्षाकृत कोमल रहती है।
  • यौन अंगों का विकास – लड़के एवं लड़कियों दोनों के प्रजनन अंगों का विकास लगभग पूर्ण हो जाता है तथा वे लैंगिक परिपक्वता प्राप्त करने लगते हैं।
  • द्वितीयक लैंगिक लक्षण – इस अवस्था में द्वितीयक लैंगिक लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं।
    • लड़कों में मूँछ-दाढ़ी, शरीर पर बाल तथा स्वर परिवर्तन।
    • लड़कियों में स्तनों का विकास तथा शरीर में स्त्री-सुलभ परिवर्तन।
  • विशेष परिवर्तन
    • लड़कियों में रजोदर्शन (Menstruation) प्रारम्भ हो जाता है।
    • लड़कों में स्वप्नदोष (Nocturnal Emission) प्रारम्भ हो सकता है।
  • शारीरिक परिपक्वता – किशोरावस्था के अन्त तक शरीर लगभग पूर्ण विकसित हो जाता है तथा व्यक्ति वयस्क जीवन के लिए शारीरिक रूप से तैयार हो जाता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • शैशवावस्था में शारीरिक विकास की गति सर्वाधिक तीव्र होती है।
  • जन्म के समय शिशु में लगभग 300 हड्डियाँ तथा मस्तिष्क का भार लगभग 350 ग्राम होता है।
  • 7–8 माह की आयु में दूध के दाँत निकलना प्रारम्भ होते हैं।
  • बाल्यावस्था (6–12 वर्ष) को Consolidation Stage कहा जाता है।
  • 12 वर्ष की आयु तक मस्तिष्क का लगभग 95% विकास पूर्ण हो जाता है।
  • बाल्यावस्था के अन्त तक लगभग 28 स्थायी दाँत निकल आते हैं।
  • बाल्यावस्था के अन्तिम वर्षों में बालिकाओं की लम्बाई एवं वजन बालकों से अधिक हो सकते हैं।
  • किशोरावस्था में Growth Spurt अर्थात् तीव्र शारीरिक वृद्धि होती है।
  • किशोरावस्था के अन्त तक अस्थिकरण (Ossification) की प्रक्रिया लगभग पूर्ण हो जाती है।
  • किशोरावस्था में द्वितीयक लैंगिक लक्षण स्पष्ट रूप से विकसित होते हैं।
  • लड़कियों में रजोदर्शन तथा लड़कों में स्वप्नदोष किशोरावस्था के प्रमुख परिवर्तन हैं।
  • किशोरावस्था के अन्त तक शरीर लगभग पूर्ण शारीरिक परिपक्वता प्राप्त कर लेता है।
Topic 2 मानसिक विकास

मानसिक विकास

मानसिक विकास से तात्पर्य बालक की मानसिक शक्तियों एवं बौद्धिक क्षमताओं के क्रमिक विकास से है। इसमें स्मृति, कल्पना, चिन्तन, तर्क, निर्णय क्षमता, समस्या समाधान, प्रत्यक्षण तथा अवधारण जैसी मानसिक प्रक्रियाओं का विकास सम्मिलित होता है। मानसिक विकास जन्म से प्रारम्भ होकर जीवनपर्यन्त चलता रहता है तथा आयु बढ़ने के साथ-साथ बालक की मानसिक योग्यताओं में निरन्तर वृद्धि होती है।

मानसिक विकास की परिभाषाएँ

रेबर (1995) के अनुसार

"मानसिक विकास से तात्पर्य संज्ञानात्मक विकास में होने वाले उन प्रगतिशील परिवर्तनों से है जो समय बीतने के साथ-साथ व्यक्ति में घटित होते हैं।"

ड्रेवर (1984) के अनुसार

"व्यक्ति के जन्म से परिपक्वता तक की मानसिक क्षमताओं एवं मानसिक कार्यों के उत्तरोत्तर प्रकटन एवं संगठन की प्रक्रिया को मानसिक विकास कहा जाता है।"

क्रो एवं क्रो के अनुसार

"नाड़ी-मण्डल की संरचना, व्यक्ति की भौतिक दशाएँ तथा सामाजिक वातावरण मानसिक विकास को प्रभावित करते हैं।"

शिक्षा शब्दकोश के अनुसार

"मानसिक विकास जन्मपूर्व अवस्था से प्रौढ़ता तक व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं एवं मनोवैज्ञानिक व्यवहार का उत्तरोत्तर विकास एवं संगठन है।"

मानसिक विकास की विशेषताएँ

  • मानसिक विकास क्रमबद्ध होता है।
  • बालकों में मानसिक विकास आयु के साथ-साथ विकसित होता रहता है।
  • मानसिक विकास सरल से जटिल के सिद्धान्त पर आधारित होता है।
  • मानसिक विकास में वैयक्तिक भिन्नताएँ पाई जाती हैं, इसलिए सभी बालकों का विकास समान गति से नहीं होता।
  • मानसिक विकास के साथ बालकों की आवश्यकताओं, रुचियों एवं जिज्ञासाओं में विस्तार होता है।
  • मानसिक विकास, शारीरिक विकास से प्रभावित होता है।
  • मानसिक विकास के साथ सृजनात्मकता, कल्पनाशक्ति एवं नवाचार की क्षमता विकसित होती है।
  • मानसिक विकास से समायोजन की क्षमता का विकास होता है।
  • मानसिक विकास का बालक के सर्वांगीण विकास से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।

शैशवावस्था एवं बचपनावस्था में मानसिक विकास

शैशवावस्था एवं बचपनावस्था में बालक के मानसिक विकास में तीव्र परिवर्तन होते हैं। इस अवधि में उसकी भाषा, स्मृति, कल्पना, चिन्तन, तर्क, पहचान तथा समस्या समाधान की क्षमताओं का क्रमिक विकास होता है। इस अवस्था के मानसिक विकास को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है—

  • जन्म के समय शिशु का मानसिक विकास अत्यन्त सीमित होता है।
  • प्रारम्भ में शिशु केवल भूख, पीड़ा, ठंड एवं गर्मी जैसी संवेदनाओं का अनुभव करता है।
  • कुछ महीनों में ध्वनियों एवं प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया देना प्रारम्भ कर देता है।
  • माँ तथा परिवार के सदस्यों को पहचानने लगता है।
  • वस्तुओं को ध्यान से देखना एवं पकड़ने का प्रयास करता है।
  • ध्वनियों का अनुकरण करना तथा विभिन्न स्वर निकालना प्रारम्भ करता है।
  • संकेतों एवं सरल निर्देशों का अर्थ समझने लगता है।
  • एक वर्ष की आयु तक छोटे-छोटे शब्द बोलना प्रारम्भ कर देता है।
  • दूसरे वर्ष में चित्रों एवं वस्तुओं की पहचान करने लगता है।
  • दैनिक कार्यों को स्वयं करने का प्रयास करता है।
  • तीसरे वर्ष तक शब्दों को जोड़कर छोटे वाक्य बोलने लगता है।
  • संख्याओं, आकारों तथा दिशाओं का प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है।
  • कल्पनाशक्ति एवं जिज्ञासा में वृद्धि होने लगती है।
  • छोटे-बड़े, भारी-हल्के तथा समानता-असमानता का भेद समझने लगता है।
  • रंगों की पहचान करना सीख जाता है।
  • वस्तुओं का वर्गीकरण एवं तुलना करने की क्षमता विकसित होने लगती है।
  • घटनाओं का वर्णन करने तथा अपने विचार व्यक्त करने लगता है।
  • गिनती याद कर लेता है तथा सरल मानसिक क्रियाएँ सीखने लगता है।
  • कल्पना, स्मृति, भाषा एवं चिन्तन शक्ति का तीव्र विकास होता है।

बाल्यावस्था में मानसिक विकास (संज्ञानात्मक विकास)

बाल्यावस्था (6–12 वर्ष) में बालक की मानसिक क्षमताओं का तीव्र विकास होता है। इस अवस्था में स्मृति, तर्क, कल्पना, भाषा, समस्या-समाधान, निरीक्षण तथा निर्णय क्षमता में वृद्धि होती है। बालक पढ़ना-लिखना सीखता है, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों को समझने लगता है तथा सही-गलत में भेद करने की क्षमता विकसित हो जाती है। बाल्यावस्था के मानसिक विकास को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है—

  • दैनिक जीवन की वस्तुओं में समानता एवं भिन्नता पहचानने लगता है।
  • छोटी-छोटी घटनाओं का वर्णन करने में सक्षम हो जाता है।
  • कल्पना शक्ति, स्मरण शक्ति तथा तर्क शक्ति का विकास होता है।
  • आदेशों एवं नियमों का पालन करना सीख जाता है।
  • विद्यालयी जीवन के प्रति रुचि विकसित होने लगती है।
  • अंकों की गिनती, संख्याओं का योग तथा सरल गणनाएँ सीख लेता है।
  • कहानियाँ, कविताएँ एवं अन्य शिक्षण सामग्री याद रखने लगता है।
  • घड़ी देखकर समय का ज्ञान प्राप्त कर लेता है।
  • पढ़ना एवं लिखना सीख जाता है।
  • कार्य-कारण सम्बन्ध (Cause and Effect) को समझने लगता है।
  • छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान करना सीख जाता है।
  • चित्रों एवं वस्तुओं की पहचान कर उनके उपयोग बता सकता है।
  • विद्यालय तथा सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में रुचि लेने लगता है।
  • प्रतीकों एवं चिन्हों का प्रयोग समझने लगता है।
  • स्मरण शक्ति एवं निरीक्षण शक्ति में वृद्धि होती है।
  • मित्र बनाने तथा समूह में कार्य करने की प्रवृत्ति विकसित होती है।
  • नायक-पूजा (Hero Worship) की भावना विकसित होने लगती है।
  • समुचित लैंगिक भूमिकाओं के प्रति जागरूक होने लगता है।
  • अमूर्त चिन्तन (Abstract Thinking) एवं निगमनात्मक तर्क (Deductive Reasoning) का प्रारम्भिक विकास होने लगता है।
  • समस्या समाधान की क्षमता अधिक विकसित हो जाती है।
  • सही एवं गलत के बीच अन्तर करना सीख जाता है।
  • ‘क्यों’ और ‘कैसे’ जैसे प्रश्नों में विशेष रुचि लेने लगता है।
  • शब्दकोश का उपयोग कर शब्दों के अर्थ समझने लगता है।
  • पहेलियाँ बुझाने एवं बौद्धिक खेलों में रुचि लेने लगता है।
  • परिवार एवं समाज के आदर्शों तथा मूल्यों के अनुसार व्यवहार करना सीख जाता है।
  • उत्तर बाल्यावस्था (10–12 वर्ष) तक बालक का लगभग 95% मानसिक विकास हो जाता है।

किशोरावस्था में मानसिक विकास (संज्ञानात्मक विकास)

किशोरावस्था में मानसिक विकास अपने उच्च स्तर पर पहुँचने लगता है। इस अवस्था में तर्क, चिन्तन, कल्पना, स्मृति, निर्णय क्षमता तथा समस्या-समाधान की योग्यता का तीव्र विकास होता है। किशोर सामाजिक, शैक्षिक तथा व्यावसायिक विषयों में रुचि लेने लगता है और भविष्य के प्रति अधिक जागरूक हो जाता है। किशोरावस्था के मानसिक विकास को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है—

  • बौद्धिक विकास अपने उच्चतम स्तर की ओर बढ़ता है।
  • कल्पना, चिन्तन, स्मरण तथा निर्णय क्षमता में तीव्र वृद्धि होती है।
  • तार्किक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होने लगता है।
  • समस्याओं का विश्लेषण कर उनके समाधान प्रस्तुत करने की क्षमता विकसित होती है।
  • स्मृति शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि होती है तथा तथ्यों को लम्बे समय तक याद रख सकता है।
  • शब्द भण्डार एवं भाषा ज्ञान में तीव्र वृद्धि होती है।
  • एक से अधिक विषयों पर तर्क एवं विचार करने की क्षमता विकसित हो जाती है।
  • अमूर्त चिन्तन (Abstract Thinking) एवं औपचारिक संक्रियात्मक चिन्तन (Formal Thinking) का विकास होता है।
  • निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है तथा विभिन्न विकल्पों में उचित चयन कर सकता है।
  • सही एवं गलत, आदर्श एवं वास्तविकता में अन्तर समझने लगता है।
  • एकाग्रता एवं ध्यान की क्षमता में वृद्धि होती है।
  • रुचियों में विविधता आती है तथा विभिन्न क्षेत्रों में विशेष अभिरुचियाँ विकसित होती हैं।
  • साहित्य, लेखन, अभिनय, संगीत, खेल तथा अन्य रचनात्मक गतिविधियों में रुचि बढ़ती है।
  • सामाजिक भावना अधिक प्रबल हो जाती है तथा सामूहिक गतिविधियों में भाग लेने लगता है।
  • मानसिक स्वतंत्रता की भावना विकसित होती है।
  • समाज में प्रचलित कुरीतियों, अन्धविश्वासों एवं परम्पराओं पर प्रश्न उठाने लगता है।
  • मित्रता एवं सामाजिक सम्बन्धों का महत्व बढ़ जाता है।
  • विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण एवं प्रेम भावना का विकास होने लगता है।
  • भविष्य, शिक्षा तथा व्यवसाय के प्रति सजगता विकसित हो जाती है।
  • जीवन के लक्ष्यों एवं योजनाओं के निर्माण की क्षमता विकसित होने लगती है।
  • उत्तर किशोरावस्था तक बौद्धिक एवं मानसिक क्षमताएँ लगभग परिपक्व हो जाती हैं।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मानसिक विकास से तात्पर्य स्मृति, कल्पना, चिन्तन, तर्क, निर्णय एवं समस्या-समाधान जैसी मानसिक क्षमताओं के विकास से है।
  • रेबर (1995) के अनुसार मानसिक विकास संज्ञानात्मक विकास में होने वाले प्रगतिशील परिवर्तनों की प्रक्रिया है।
  • ड्रेवर (1984) के अनुसार जन्म से परिपक्वता तक मानसिक क्षमताओं एवं मानसिक कार्यों के संगठन की प्रक्रिया मानसिक विकास कहलाती है।
  • मानसिक विकास क्रमबद्ध, सतत तथा सरल से जटिल की ओर होने वाली प्रक्रिया है।
  • मानसिक विकास में वैयक्तिक भिन्नताएँ पाई जाती हैं तथा यह शारीरिक विकास से प्रभावित होता है।
  • शैशवावस्था में भाषा, स्मृति, पहचान एवं प्रारम्भिक चिन्तन का विकास होता है।
  • बाल्यावस्था में तर्क, स्मरण शक्ति, समस्या-समाधान तथा सही-गलत की पहचान विकसित होती है।
  • उत्तर बाल्यावस्था (10–12 वर्ष) तक लगभग 95% मानसिक विकास हो जाता है।
  • किशोरावस्था में बौद्धिक विकास अपने उच्च स्तर पर पहुँचता है।
  • किशोरावस्था में अमूर्त चिन्तन, निर्णय क्षमता, तार्किक सोच तथा भविष्य के प्रति जागरूकता विकसित होती है।
  • मानसिक विकास का बालक के सर्वांगीण विकास एवं समायोजन क्षमता से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।
Topic 3 संवेगात्मक विकास

संवेगात्मक विकास

संवेगात्मक विकास (Emotional Development) से तात्पर्य बालक के संवेगों, भावनाओं तथा उनकी अभिव्यक्ति के क्रमिक विकास से है। संवेग व्यक्ति की आन्तरिक भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम होते हैं। बालक के विकास के साथ-साथ उसके भय, क्रोध, प्रेम, प्रसन्नता, ईर्ष्या, सहानुभूति तथा अन्य संवेगों में परिवर्तन एवं परिपक्वता आती है। संवेगात्मक विकास व्यक्तित्व निर्माण, सामाजिक समायोजन तथा व्यवहार नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

संवेगात्मक विकास का अर्थ

संवेग शब्द अंग्रेजी के Emotion शब्द से बना है। Emotion लैटिन भाषा के Emovere शब्द से बना है, जिसका अर्थ है – उत्तेजित करना, प्रेरित करना तथा गति प्रदान करना। संवेग व्यक्ति की उत्तेजित एवं भावनात्मक अवस्था को व्यक्त करता है तथा संवेगों पर आधारित विकास को संवेगात्मक विकास कहा जाता है।

वाटसन के अनुसार जन्म के समय शिशु में मुख्य रूप से भय, क्रोध तथा स्नेह जैसे मूल संवेग पाए जाते हैं। विकास के साथ इन संवेगों का विस्तार एवं परिष्कार होता जाता है।

संवेगात्मक विकास की परिभाषाएँ

जरशील्ड (1946) के अनुसार

"संवेग शब्द आवेश में आने, भड़क उठने अथवा उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है।"

ब्रिजेज के अनुसार

"शिशु के जन्म के समय केवल उत्तेजना होती है, संवेगों का विकास बाद के वर्षों में होता है।"

वुडवर्थ के अनुसार

"संवेग व्यक्ति की उत्तेजित दशा है।"

गेलडार्ड के अनुसार

"संवेग क्रियाओं के उत्तेजक हैं।" (Emotions are inciters to action)

संवेगों की विशेषताएँ

संवेग व्यक्ति के व्यवहार, विचार एवं शारीरिक क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। संवेगों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  • संवेग एक मनो-शारीरिक (Psycho-Physical) प्रक्रिया है।
  • संवेग एक प्रकार की अनुभूति अथवा भाव है।
  • संवेगों की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है।
  • संवेग की अवस्था में व्यक्ति के व्यवहार एवं आन्तरिक प्रक्रियाओं में परिवर्तन दिखाई देता है।
  • संवेग सार्वभौमिक होते हैं तथा सभी व्यक्तियों में किसी न किसी रूप में पाए जाते हैं।
  • संवेग व्यक्ति को सुरक्षा एवं आत्मरक्षा के लिए प्रेरित करते हैं।
  • संवेग प्रायः अचानक या आकस्मिक रूप से उत्पन्न होते हैं।
  • संवेग तीव्र उत्तेजना, गति एवं उपद्रव की अवस्था को व्यक्त करते हैं।
  • संवेगों के प्रभाव से शरीर में विभिन्न शारीरिक परिवर्तन होते हैं।

संवेगात्मक विकास का शैक्षिक महत्व

संवेगात्मक विकास बालक के व्यक्तित्व, व्यवहार तथा अधिगम को प्रभावित करता है। शिक्षा के क्षेत्र में संवेगात्मक विकास का महत्व निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है—

  • समुचित संवेगात्मक विकास वाले बालक शिक्षण-अधिगम में अधिक रुचि लेते हैं।
  • संवेगात्मक रूप से विकसित बालकों में उत्तम चरित्र, आचरण एवं आदर्शों का विकास होता है।
  • ऐसे बालक पाठ्यक्रम एवं पाठ्यवस्तु को अधिक अच्छी तरह समझ पाते हैं तथा उनकी शैक्षिक उपलब्धि बेहतर होती है।
  • गृहकार्य, विद्यालय कार्य एवं अभ्यास कार्यों को अधिक कुशलता एवं तत्परता से पूरा करते हैं।
  • संवेग बालक को क्रियाशील बनाते हैं तथा उसकी कार्यक्षमता में वृद्धि करते हैं।
  • जिज्ञासा, स्नेह, हर्ष आदि सकारात्मक संवेग अधिगम को प्रोत्साहित करते हैं, जबकि भय एवं क्रोध जैसे नकारात्मक संवेग शैक्षिक उपलब्धि को प्रभावित कर सकते हैं।
  • संवेगात्मक विकास से आत्म-मूल्यांकन एवं सामाजिक मूल्यांकन की क्षमता विकसित होती है।
  • बालक भविष्य की शैक्षिक योजनाओं एवं लक्ष्यों का बेहतर निर्धारण कर पाता है।
  • संवेगों के उचित विकास से सामाजिक समायोजन एवं सामंजस्य स्थापित करने में सहायता मिलती है।
  • संवेगात्मक संतुलन बालक के सर्वांगीण विकास एवं सफल अधिगम के लिए आवश्यक है।

शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास

शैशवावस्था में संवेगों का विकास प्रारम्भिक अवस्था में होता है। जन्म के समय बालक में संवेग पूर्ण रूप से विकसित नहीं होते, बल्कि आयु बढ़ने के साथ उनका क्रमिक विकास होता है। इस अवस्था में बालक भय, क्रोध, स्नेह, हर्ष तथा आनंद जैसे मूल संवेगों को व्यक्त करना प्रारम्भ करता है। शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है—

  • जन्म के समय संवेग पूर्ण विकसित नहीं होते, उनका विकास धीरे-धीरे होता है।
  • प्रारम्भिक संवेगों में भय, क्रोध, स्नेह, हर्ष एवं आनंद प्रमुख होते हैं।
  • बालक में संवेगात्मक अस्थिरता अधिक पाई जाती है।
  • आयु बढ़ने के साथ संवेगों की अभिव्यक्ति अधिक स्पष्ट होने लगती है।
  • व्यवहार में निश्चितता एवं स्पष्टता आने लगती है।
  • माता-पिता एवं परिवार के सदस्यों के प्रति स्नेह का विकास होता है।
  • साथ खेलने एवं सामाजिक सम्पर्क के माध्यम से सहयोग एवं प्रेम की भावना विकसित होती है।

बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास

बाल्यावस्था में बालक विद्यालय तथा व्यापक सामाजिक वातावरण के सम्पर्क में आता है। इस अवस्था में वह अपने संवेगों को नियंत्रित करना सीखता है तथा सामाजिक मान्यताओं के अनुसार व्यवहार करने का प्रयास करता है। बाल्यावस्था के संवेगात्मक विकास को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है—

  • बालक भय एवं क्रोध जैसे संवेगों पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास करता है।
  • समूह में सहभागिता एवं सामाजिक व्यवहार का विकास होता है।
  • संवेगों की अभिव्यक्ति एवं नियंत्रण की क्षमता बढ़ती है।
  • संवेगों में धीरे-धीरे परिपक्वता आने लगती है।
  • नए वातावरण में समायोजन के कारण कभी-कभी संवेगात्मक असंतुलन उत्पन्न हो सकता है।
  • खुशी, दुःख, क्रोध, भय, उत्सुकता, ईर्ष्या, जलन तथा अनुराग जैसे प्रमुख संवेग विकसित होते हैं।
  • विद्यालय, परिवार एवं मित्रों का संवेगात्मक विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
  • बालक अपने संवेगों को दबाने या नियंत्रित करने का प्रयास करने लगता है।
  • संवेगात्मक तनाव (Emotional Stress) की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
  • भावशान्ति (Emotional Catharsis) के माध्यम से बालक तनाव एवं संवेगों को कम करने का प्रयास करता है।
  • माता-पिता, शिक्षक एवं मित्रों का मार्गदर्शन संवेगात्मक संतुलन स्थापित करने में सहायक होता है।

किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास

किशोरावस्था संवेगात्मक विकास की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण अवस्था है। इस अवधि में संवेग तीव्र, परिवर्तनशील एवं अस्थिर होते हैं। शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक परिवर्तनों के कारण किशोर अनेक प्रकार के संवेगात्मक अनुभवों से गुजरता है। किशोरावस्था के संवेगात्मक विकास को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है—

  • संवेगों की तीव्रता एवं अस्थिरता अधिक होती है।
  • परिस्थितियों के अनुसार संवेगों में तीव्र परिवर्तन होता रहता है।
  • कल्पनाशक्ति एवं भावनात्मक संवेदनशीलता में वृद्धि होती है।
  • संवेगों पर नियंत्रण स्थापित करना प्रारम्भिक अवस्था में कठिन होता है।
  • सामाजिक समायोजन की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • परोपकार, समाज सेवा एवं देशभक्ति जैसी भावनाओं का विकास होता है।
  • मित्रता एवं सामाजिक सम्बन्धों का महत्व बढ़ जाता है।
  • विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण एवं प्रेम भावनाएँ विकसित होने लगती हैं।
  • आत्मसम्मान एवं आत्मचेतना की भावना प्रबल हो जाती है।
  • तनाव, निराशा, क्रोध एवं कुंठा की स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • जी. एस. हॉल ने किशोरावस्था को "तनाव एवं तूफान (Stress and Storm)" की अवस्था कहा है।
  • किशोर सामाजिक कुरीतियों, परम्पराओं एवं अन्धविश्वासों पर प्रश्न उठाने लगते हैं।
  • उत्तर किशोरावस्था तक संवेगों की तीव्रता कम होने लगती है तथा उन पर नियंत्रण बढ़ जाता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • Emotion शब्द लैटिन भाषा के Emovere से बना है।
  • वाटसन के अनुसार जन्म के समय शिशु में भय, क्रोध एवं स्नेह जैसे मूल संवेग पाए जाते हैं।
  • संवेग एक मनो-शारीरिक (Psycho-Physical) प्रक्रिया है।
  • संवेगात्मक विकास व्यक्तित्व निर्माण एवं सामाजिक समायोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • शैशवावस्था में भय, क्रोध, स्नेह, हर्ष एवं आनंद जैसे मूल संवेग विकसित होते हैं।
  • बाल्यावस्था में बालक संवेगों को नियंत्रित करना सीखता है।
  • किशोरावस्था में संवेग तीव्र, अस्थिर एवं परिवर्तनशील होते हैं।
  • जी. एस. हॉल ने किशोरावस्था को "तनाव एवं तूफान" (Stress and Storm) की अवस्था कहा है।
  • उत्तर किशोरावस्था तक संवेगों पर नियंत्रण एवं भावनात्मक परिपक्वता विकसित हो जाती है।
Topic 4 सामाजिक विकास

सामाजिक विकास

सामाजिक विकास से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा बालक समाज के मानदण्डों, मूल्यों, रीति-रिवाजों तथा सामाजिक व्यवहारों को सीखता है और समाज के साथ समायोजन स्थापित करता है। सामाजिक विकास के माध्यम से बालक में सहयोग, सहानुभूति, अनुशासन, उत्तरदायित्व तथा सामाजिक सहभागिता जैसी गुणों का विकास होता है।

सामाजिक विकास की परिभाषाएँ

ड्यूवी के अनुसार

"जिस प्रकार शारीरिक विकास के लिए भोजन का महत्व है, उसी प्रकार सामाजिक विकास के लिए शिक्षा का।"

सोरेन्सन के अनुसार

"सामाजिक वृद्धि एवं विकास से हमारा तात्पर्य अपने साथ और दूसरों के साथ भली-भाँति चलने की बढ़ती हुई योग्यता है।"

हरलॉक के अनुसार

"सामाजिक विकास से तात्पर्य सामाजिक प्रत्याशाओं के अनुकूल व्यवहार करने की क्षमता सीखने से होता है।"

दास के अनुसार

"सामाजिक विकास से तात्पर्य सामाजिक व्यवहारों के विकास से है।"

सामाजिक विकास की विशेषताएँ

  • सामाजिक विकास के अनुसार बालक समाज में स्वीकृत सामाजिक भूमिकाओं का निर्वहन करना सीखता है।
  • बालक सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करने की योग्यता प्राप्त करता है।
  • समाज के नियमों एवं मानदण्डों के अनुसार व्यवहार करने की क्षमता विकसित होती है।
  • समाज के लोगों एवं सामाजिक गतिविधियों के प्रति सकारात्मक मनोवृत्ति विकसित होती है।

शैशवावस्था में सामाजिक विकास

शैशवावस्था में सामाजिक विकास का प्रारम्भ परिवार एवं निकटवर्ती व्यक्तियों के सम्पर्क से होता है। जन्म के समय शिशु सामाजिक व्यवहार नहीं जानता, किन्तु धीरे-धीरे वह दूसरों को पहचानना, प्रतिक्रिया देना तथा सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करना सीखता है। शैशवावस्था में सामाजिक विकास को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है—

  • प्रारम्भ में शिशु ध्वनियों एवं परिचित आवाजों में अन्तर पहचानना सीखता है।
  • माता एवं परिवार के सदस्यों को पहचानकर मुस्कुराने लगता है।
  • दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए रोना एवं विभिन्न प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करता है।
  • परिवार के सदस्यों को देखकर प्रसन्नता व्यक्त करता है।
  • परिचित एवं अपरिचित व्यक्तियों में अन्तर समझने लगता है।
  • माता-पिता के प्रति विशेष लगाव विकसित होता है।
  • अपरिचित व्यक्तियों को देखकर संकोच या भय व्यक्त कर सकता है।
  • दूसरों के स्नेह एवं प्यार का प्रत्युत्तर देना सीखता है।
  • देखभाल करने वाले व्यक्तियों के प्रति अनुराग विकसित होता है।
  • माता-पिता के व्यवहार का अनुकरण करना प्रारम्भ करता है।
  • अकेले तथा दूसरों के साथ खेलना सीखता है।
  • बड़ों के कार्यों में रुचि लेकर उनकी सहायता करने का प्रयास करता है।
  • सहानुभूति एवं सहयोग की प्रारम्भिक भावना विकसित होने लगती है।
  • त्योहारों, उत्सवों एवं पारिवारिक गतिविधियों में रुचि लेने लगता है।
  • आयु बढ़ने के साथ सामाजिक व्यवहार एवं सामाजिक सम्बन्धों का विकास होता जाता है।

बाल्यावस्था में सामाजिक विकास

बाल्यावस्था सामाजिक विकास की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण अवस्था है। इस अवस्था में बालक परिवार के सीमित वातावरण से निकलकर विद्यालय, मित्रों एवं समाज के सम्पर्क में आता है। परिणामस्वरूप उसमें सहयोग, मित्रता, उत्तरदायित्व, सामाजिक स्वीकृति तथा सामाजिक समायोजन जैसे गुणों का विकास होता है। बाल्यावस्था में सामाजिक विकास को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है—

  • बालक सामाजिक नियमों एवं मानदण्डों के अनुसार व्यवहार करना सीखता है।
  • बड़ों के व्यवहार एवं कार्यों का अनुकरण करता है।
  • सामाजिक स्वीकृति एवं प्रशंसा प्राप्त करने की इच्छा विकसित होती है।
  • साथियों के साथ सहयोग एवं समूह में कार्य करने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
  • मित्रता का विकास होता है तथा सामाजिक सम्बन्धों का विस्तार होता है।
  • परिवार से बाहर अन्य व्यक्तियों के साथ भी आत्मीय सम्बन्ध स्थापित करता है।
  • समूह एवं टोली का सदस्य बनकर सामाजिक कार्यों में भाग लेने लगता है।
  • न्याय, साहस, आत्म-नियन्त्रण, सहनशीलता एवं सद्भाव जैसे गुण विकसित होते हैं।
  • अच्छे-बुरे तथा उचित-अनुचित व्यवहार में भेद करना सीखता है।
  • प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होती है तथा श्रेष्ठ प्रदर्शन का प्रयास करता है।
  • उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है और अपने कार्यों को पूरा करना सीखता है।
  • सामाजिक अन्तर्दृष्टि एवं सामाजिक समायोजन की क्षमता बढ़ती है।
  • खेल-कूद एवं सामूहिक गतिविधियों में रुचि बढ़ती है।
  • दूसरों के सुझावों को ग्रहण करने तथा अपने विचार व्यक्त करने की क्षमता विकसित होती है।
  • परिवार, विद्यालय एवं मित्र-मण्डली सामाजिक विकास के प्रमुख आधार बनते हैं।

किशोरावस्था में सामाजिक विकास

किशोरावस्था सामाजिक विकास की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण अवस्था है। इस अवस्था में किशोर परिवार, मित्रों, विद्यालय तथा समाज के साथ व्यापक सम्पर्क स्थापित करता है। सामाजिक सम्बन्धों का विस्तार होता है तथा व्यक्तित्व, नेतृत्व, उत्तरदायित्व एवं सामाजिक समायोजन की क्षमता विकसित होती है। किशोरावस्था में सामाजिक विकास को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है—

  • विभिन्न सामाजिक समूहों एवं मित्र-मण्डलियों का निर्माण करता है।
  • मित्रों एवं साथियों का प्रभाव (Peer Pressure) अधिक पड़ता है।
  • सहयोग, सहानुभूति एवं प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होती है।
  • नेतृत्व क्षमता का विकास होने लगता है।
  • सामाजिक स्वीकृति एवं सम्मान प्राप्त करने की इच्छा बढ़ती है।
  • विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण एवं सामाजिक सम्बन्धों का विस्तार होता है।
  • लिंग सम्बन्धी चेतना एवं सामाजिक भूमिकाओं की समझ विकसित होती है।
  • आदर्श व्यक्तियों एवं नायकों का अनुकरण करने की प्रवृत्ति विकसित होती है।
  • नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक आदर्शों के प्रति रुचि बढ़ती है।
  • स्वतन्त्रता की भावना प्रबल होती है तथा कभी-कभी विद्रोही व्यवहार भी दिखाई देता है।
  • समाज में समायोजन एवं अनुकूलन की क्षमता विकसित होती है।
  • सामाजिक समारोहों, कार्यक्रमों एवं सामुदायिक गतिविधियों में भाग लेने लगता है।
  • भविष्य, शिक्षा एवं व्यवसाय के प्रति जागरूकता विकसित होती है।
  • जीवन-दर्शन एवं सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित होने लगती है।
  • विद्यालय, शिक्षक एवं मित्र सामाजिक विकास के प्रमुख प्रभावकारी कारक बन जाते हैं।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सामाजिक विकास के माध्यम से बालक समाज के मानदण्डों, मूल्यों एवं व्यवहारों को सीखता है।
  • सामाजिक विकास से सहयोग, सहानुभूति, अनुशासन एवं उत्तरदायित्व जैसे गुण विकसित होते हैं।
  • बालक सामाजिक भूमिकाओं का निर्वहन तथा सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करना सीखता है।
  • शैशवावस्था में सामाजिक विकास परिवार एवं माता-पिता के सम्पर्क से प्रारम्भ होता है।
  • बाल्यावस्था में मित्रता, सहयोग, सामाजिक स्वीकृति एवं सामाजिक समायोजन का विकास होता है।
  • किशोरावस्था में नेतृत्व, सामाजिक चेतना एवं सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है।
  • किशोरावस्था में मित्रों एवं साथियों का प्रभाव अधिक होता है।
  • परिवार, विद्यालय एवं मित्र-मण्डली सामाजिक विकास के प्रमुख आधार हैं।
Topic 5 भाषा विकास

भाषा विकास

भाषा विकास से तात्पर्य बालक की विचारों, भावनाओं, इच्छाओं तथा अनुभवों को व्यक्त करने और दूसरों के विचारों को समझने की क्षमता के क्रमिक विकास से है। भाषा संचार का प्रमुख माध्यम है तथा इसके द्वारा बालक सामाजिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास की दिशा में आगे बढ़ता है। भाषा विकास सुनने, बोलने, पढ़ने तथा लिखने की क्षमताओं के विकास से सम्बन्धित है।

भाषा विकास की परिभाषाएँ

स्टाउट के अनुसार

"व्यापक अर्थ में भाषा का आशय ऐसे साधन से है जिसके द्वारा अर्थ एवं भाव का लोगों के बीच सम्प्रेषण होता है।"

हरलॉक के अनुसार

"भाषा दूसरों के साथ विचारों का आदान-प्रदान करने (बातचीत) की योग्यता है।"

भाषा विकास के चरण

भाषा विकास एक क्रमिक प्रक्रिया है जो जन्म से प्रारम्भ होकर आयु के साथ विकसित होती है। बालक पहले ध्वनियाँ निकालता है, फिर शब्द बोलना सीखता है और बाद में वाक्य बनाकर अपने विचार व्यक्त करने लगता है। भाषा विकास के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं—

  • जन्म के समय बालक क्रन्दन (रोने) द्वारा अपनी आवश्यकताएँ व्यक्त करता है।
  • लगभग 1 माह की आयु में कूजन (Cooing) प्रारम्भ होता है।
  • 2 से 4 माह की आयु में विभिन्न स्वर एवं ध्वनियाँ निकालना प्रारम्भ करता है।
  • 6 माह की आयु में बलबलाना (Babbling) प्रारम्भ करता है।
  • 8 माह के आसपास सरल शब्दों एवं ध्वनियों का अर्थ समझने लगता है।
  • 1 वर्ष की आयु तक कुछ परिचित शब्द बोलना एवं ध्वनियों का अनुकरण करना सीख जाता है।
  • लगभग 18 माह की आयु में दो अक्षरों वाले शब्द बोलने लगता है।
  • 2 वर्ष की आयु तक शरीर के अंगों के नाम पहचानने एवं सरल वाक्य बोलने लगता है।
  • आयु बढ़ने के साथ शब्द भण्डार, वाक्य निर्माण तथा अभिव्यक्ति क्षमता का विकास होता जाता है।

शैशवावस्था में भाषा विकास

  • जन्म के समय भाषा विकास का प्रमुख माध्यम रुदन (Crying) होता है।
  • 1 माह की आयु में कूजन (Cooing) प्रारम्भ होता है।
  • 4–6 माह की आयु में विभिन्न ध्वनियाँ निकालना एवं नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया देना प्रारम्भ करता है।
  • 9 माह की आयु तक सरल शब्दों एवं निर्देशों को समझने लगता है।
  • 1 वर्ष की आयु में कुछ परिचित शब्द बोलना तथा ध्वनियों का अनुकरण करता है।
  • डेढ़ वर्ष की आयु में शब्द-भण्डार का विकास होने लगता है तथा संकेतों द्वारा अपनी बात व्यक्त करता है।
  • 2 वर्ष की आयु में अपना नाम, शरीर के अंगों के नाम तथा सरल वाक्य बोलने लगता है।
  • 3 वर्ष की आयु में छोटे वाक्य बनाता है, रंग पहचानता है तथा प्रश्न पूछना प्रारम्भ करता है।
  • 4–5 वर्ष की आयु में कहानी सुनाना, कविताएँ कहना, पहेलियाँ बुझाना तथा शब्द-भण्डार में तीव्र वृद्धि होती है।

बाल्यावस्था में भाषा विकास

  • बाल्यावस्था में भाषा विकास तीव्र गति से होता है।
  • वाक्य निर्माण एवं वार्तालाप की क्षमता विकसित हो जाती है।
  • शब्द-भण्डार में तीव्र वृद्धि होती है।
  • पढ़ने, लिखने तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति का विकास होता है।
  • परिवार, विद्यालय एवं सामाजिक वातावरण भाषा विकास को प्रभावित करते हैं।
  • बाल्यावस्था के अन्त तक भाषा अपेक्षाकृत परिपक्व हो जाती है।

किशोरावस्था में भाषा विकास

  • भाषा अधिक परिष्कृत, परिमार्जित एवं प्रभावशाली हो जाती है।
  • व्याकरण एवं उच्चारण में शुद्धता आती है।
  • अमूर्त विचारों एवं भावनाओं को व्यक्त करने की क्षमता विकसित होती है।
  • सृजनात्मक लेखन एवं साहित्यिक रुचि का विकास होता है।
  • भाषा सामाजिक समायोजन एवं व्यक्तित्व विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बनती है।
  • किशोर अपनी भाषा के माध्यम से बौद्धिक एवं सामाजिक परिपक्वता प्रदर्शित करते हैं।

भाषा विकास को प्रभावित करने वाले कारक

  • पारिवारिक परिवेश – परिवार में संवाद, प्रोत्साहन एवं भाषा के प्रयोग का स्तर बालक के भाषा विकास को प्रभावित करता है।
  • सामाजिक परिवेश – समाज, मित्रों, विद्यालय तथा सामाजिक-आर्थिक स्थिति का भाषा विकास पर प्रभाव पड़ता है।
  • स्वास्थ्य – शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य अच्छा होने पर भाषा विकास सुचारु रूप से होता है।
  • लैंगिक भिन्नता – सामान्यतः बालिकाओं का भाषा विकास बालकों की अपेक्षा कुछ अधिक शीघ्र होता है।
  • जन्मक्रम – प्रायः प्रथम सन्तान को अधिक पारिवारिक ध्यान मिलने से उसका भाषा विकास बेहतर हो सकता है।
  • परिपक्वता – भाषा विकास के लिए तंत्रिका तंत्र एवं वाक्-अंगों की परिपक्वता आवश्यक होती है।
  • अभिप्रेरणा एवं प्रोत्साहन – प्रशंसा, प्रोत्साहन एवं सीखने की प्रेरणा भाषा विकास की गति को बढ़ाते हैं।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • भाषा विकास विचारों, भावनाओं एवं अनुभवों के आदान-प्रदान की क्षमता का विकास है।
  • स्टाउट के अनुसार भाषा अर्थ एवं भावों के सम्प्रेषण का साधन है।
  • हरलॉक के अनुसार भाषा विचारों के आदान-प्रदान की योग्यता है।
  • भाषा विकास के प्रमुख चरण हैं – क्रन्दन, कूजन, बलबलाना, शब्द बोलना एवं वाक्य निर्माण।
  • शैशवावस्था में भाषा विकास रुदन से प्रारम्भ होकर शब्द एवं सरल वाक्य बोलने तक पहुँचता है।
  • बाल्यावस्था में शब्द-भण्डार, वाक्य निर्माण तथा पढ़ने-लिखने की क्षमता का तीव्र विकास होता है।
  • किशोरावस्था में भाषा अधिक परिष्कृत, प्रभावशाली एवं व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध हो जाती है।
  • भाषा विकास मानसिक, सामाजिक एवं बौद्धिक विकास का महत्वपूर्ण आधार है।
Topic 6 पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त

पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त

Topic 7 बुद्धि एवं बुद्धिलब्धि

बुद्धि एवं बुद्धिलब्धि

बुद्धि का अर्थ

बुद्धि (Intelligence) एक महत्वपूर्ण मानसिक क्षमता है, जिसके माध्यम से व्यक्ति सीखता है, समझता है, तर्क करता है, समस्याओं का समाधान करता है तथा नई परिस्थितियों के साथ समायोजन स्थापित करता है। सामान्यतः बुद्धि का संबंध व्यक्ति की सोचने, निर्णय लेने, अनुभवों से लाभ उठाने एवं प्रभावी व्यवहार करने की क्षमता से होता है। मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि को विभिन्न दृष्टिकोणों से परिभाषित किया है, इसलिए इसकी कोई एक सर्वमान्य परिभाषा नहीं है।

बुद्धि की परिभाषाएँ

  • बोरिंग के अनुसार – "बुद्धि परीक्षण जो मापता है, वही बुद्धि है।"
  • वैशलर (Wechsler) के अनुसार – "अभिप्रयुक्त करने, तर्कयुक्त चिंतन करने तथा पर्यावरण के साथ प्रभावपूर्ण ढंग से व्यवहार करने की शक्ति व्यक्ति की समग्र अथवा सार्वभौम क्षमता ही बुद्धि है।"
  • वुडवर्थ के अनुसार – "बुद्धि कार्य करने की एक विधि है।"
  • टरमन के अनुसार – "बुद्धि अमूर्त विचारों के बारे में सोचने की योग्यता है।"
  • रॉस के अनुसार – "नई परिस्थितियों के प्रति चेतन अनुकूलन ही बुद्धि है।"
  • थार्नडाइक के अनुसार – "गत अनुभवों से लाभ उठाने की योग्यता ही बुद्धि है।"

बुद्धि का स्वरूप

बुद्धि का स्वरूप बहुआयामी है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने बुद्धि को सीखने, समस्या-समाधान, अमूर्त चिंतन तथा पर्यावरण के साथ समायोजन स्थापित करने की क्षमता के रूप में समझाया है। बुद्धि व्यक्ति की संपूर्ण मानसिक योग्यता का द्योतक है, जिसके माध्यम से वह नई परिस्थितियों को समझता, अनुभवों से लाभ उठाता तथा प्रभावी व्यवहार करता है।

1. सीखने की योग्यता

इस दृष्टिकोण के अनुसार बुद्धि सीखने तथा अनुभवों से लाभ प्राप्त करने की क्षमता है। जो व्यक्ति अधिक प्रभावी ढंग से सीखता है और अर्जित ज्ञान का उचित उपयोग करता है, उसे अधिक बुद्धिमान माना जाता है।

2. समस्या-समाधान की योग्यता

बुद्धि व्यक्ति को विभिन्न समस्याओं का समाधान खोजने तथा अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता प्रदान करती है। जो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों का सफलतापूर्वक समाधान कर लेता है, उसे बुद्धिमान माना जाता है।

3. अमूर्त चिंतन की योग्यता

अमूर्त चिंतन से आशय उन विचारों एवं अवधारणाओं के बारे में सोचने की क्षमता से है जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देतीं। व्यक्ति जितना अधिक अमूर्त चिंतन करने में सक्षम होता है, उसकी बुद्धि उतनी ही विकसित मानी जाती है।

  • मूर्त वस्तुओं एवं अनुभवों के आधार पर ज्ञान प्राप्त करना।
  • कल्पना, स्मृति एवं अमूर्त विचारों के आधार पर चिंतन करना।
4. पर्यावरण से सामंजस्य की योग्यता

इस दृष्टिकोण के अनुसार बुद्धि जीवन की परिस्थितियों एवं नई समस्याओं के साथ सफलतापूर्वक समायोजन स्थापित करने की क्षमता है। बुद्धिमान व्यक्ति बदलते वातावरण के अनुसार स्वयं को शीघ्रता से अनुकूलित कर लेता है।

इस प्रकार बुद्धि केवल किसी एक क्षमता का नाम नहीं है, बल्कि सीखने, समस्या-समाधान, अमूर्त चिंतन तथा पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने जैसी अनेक मानसिक योग्यताओं का समन्वित रूप है।

बुद्धि की विशेषताएँ

बुद्धि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  • बुद्धि जन्मजात शक्ति मानी जाती है। अनेक मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्ति की बुद्धि पर वंशानुक्रम का प्रभाव पड़ता है और यह जन्म से ही कुछ सीमा तक निर्धारित होती है।
  • बुद्धि के विकास में पर्यावरण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अनुकूल शैक्षिक एवं सामाजिक वातावरण व्यक्ति की मानसिक क्षमताओं को विकसित करने में सहायता करता है।
  • योग एवं मानसिक अभ्यासों द्वारा बुद्धि का विकास संभव माना जाता है। नियमित अभ्यास व्यक्ति की एकाग्रता, स्मरण शक्ति तथा चिंतन क्षमता को बढ़ाता है।
  • बुद्धि सीखने की योग्यता है। व्यक्ति अपने अनुभवों से सीखकर व्यवहार में आवश्यक परिवर्तन करता है और नए ज्ञान को ग्रहण करता है।
  • बुद्धि वातावरण के साथ समायोजन स्थापित करने की क्षमता प्रदान करती है। बुद्धिमान व्यक्ति बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को आसानी से अनुकूलित कर लेता है।
  • बुद्धि अमूर्त चिंतन की योग्यता प्रदान करती है। इसके माध्यम से व्यक्ति ऐसे विचारों एवं अवधारणाओं पर विचार कर सकता है जिनका प्रत्यक्ष रूप से अस्तित्व दिखाई नहीं देता।
  • बुद्धि पूर्व अनुभवों एवं अर्जित ज्ञान से लाभ उठाने की क्षमता है। व्यक्ति अपने पुराने अनुभवों का उपयोग नई परिस्थितियों में करके बेहतर निर्णय लेता है।
  • बुद्धि और ज्ञान में अंतर होता है। बुद्धि जन्मजात क्षमता मानी जाती है जबकि ज्ञान अध्ययन एवं अनुभव के माध्यम से अर्जित किया जाता है।
  • बुद्धि समस्या-समाधान की योग्यता है। इसके द्वारा व्यक्ति कठिन परिस्थितियों का विश्लेषण कर उचित समाधान खोजने में सफल होता है।
  • बुद्धि का विकास क्रमिक रूप से होता है। बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक बुद्धि का विकास तीव्र गति से होता है तथा इसके बाद अपेक्षाकृत स्थिरता आने लगती है।

बुद्धि के प्रकार

मनोवैज्ञानिक ई. ए. थार्नडाइक ने बुद्धि को मुख्यतः तीन प्रकारों में विभाजित किया है। प्रत्येक प्रकार की बुद्धि व्यक्ति की अलग-अलग क्षमताओं एवं व्यवहारों को प्रभावित करती है।

1. सामाजिक बुद्धि

सामाजिक बुद्धि से तात्पर्य ऐसी मानसिक क्षमता से है जिसके द्वारा व्यक्ति अन्य लोगों को समझता है, उनके साथ प्रभावी व्यवहार करता है तथा सामाजिक संबंधों को सफलतापूर्वक बनाए रखता है।

  • अन्य व्यक्तियों की भावनाओं एवं व्यवहार को समझने की क्षमता विकसित करती है।
  • सामाजिक संबंधों को मजबूत एवं प्रभावी बनाती है।
  • समूह में कार्य करने तथा नेतृत्व करने में सहायता करती है।
  • व्यावहारिक एवं सामाजिक सफलता प्राप्त करने में सहायक होती है।
2. अमूर्त बुद्धि

अमूर्त बुद्धि का संबंध विचारों, अवधारणाओं, प्रतीकों तथा सैद्धांतिक ज्ञान से होता है। इस प्रकार की बुद्धि वाले व्यक्ति चिंतन, तर्क एवं कल्पना के क्षेत्र में अधिक दक्ष होते हैं।

  • अमूर्त एवं जटिल विचारों को समझने की क्षमता प्रदान करती है।
  • तर्क, चिंतन तथा कल्पनाशक्ति के विकास में सहायक होती है।
  • दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, गणितज्ञों एवं साहित्यकारों में अधिक पाई जाती है।
  • समस्याओं के वैचारिक एवं सैद्धांतिक समाधान खोजने में सहायता करती है।
3. मूर्त बुद्धि

मूर्त बुद्धि का संबंध वास्तविक, प्रत्यक्ष एवं भौतिक वस्तुओं को समझने तथा उनका व्यावहारिक उपयोग करने की क्षमता से होता है। इसे व्यावहारिक बुद्धि भी कहा जाता है।

  • वास्तविक परिस्थितियों एवं वस्तुओं के साथ कार्य करने की क्षमता प्रदान करती है।
  • हस्तकला, तकनीकी कार्यों एवं व्यावहारिक समस्याओं के समाधान में सहायक होती है।
  • वस्तुओं में आवश्यक परिवर्तन कर उन्हें उपयोगी बनाने की योग्यता विकसित करती है।
  • इंजीनियर, तकनीशियन एवं कुशल कारीगरों में यह बुद्धि अधिक पाई जाती है।

बुद्धि के सिद्धांत

बुद्धि की प्रकृति एवं संरचना को समझाने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। बुद्धि के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं—

1. एक कारक सिद्धांत

इस सिद्धांत का प्रतिपादन अल्फ्रेड बिने ने किया। इसके अनुसार बुद्धि एक ही सामान्य मानसिक शक्ति है जो व्यक्ति की सभी प्रकार की मानसिक क्रियाओं में समान रूप से कार्य करती है।

  • बुद्धि को एकीकृत एवं अविभाज्य शक्ति माना गया है।
  • एक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने वाला व्यक्ति अन्य क्षेत्रों में भी सफल हो सकता है।
  • यह सिद्धांत बुद्धि के विभिन्न पक्षों की पर्याप्त व्याख्या नहीं कर पाता।
2. द्वि-कारक सिद्धांत

इस सिद्धांत का प्रतिपादन स्पीयरमैन ने किया। उन्होंने बुद्धि को दो प्रमुख कारकों का परिणाम माना।

  • सामान्य कारक (G-Factor) – सभी मानसिक कार्यों में प्रयुक्त होने वाली सामान्य क्षमता।
  • विशिष्ट कारक (S-Factor) – किसी विशेष कार्य या विषय से संबंधित क्षमता।
  • किसी भी कार्य में सफलता सामान्य एवं विशिष्ट दोनों कारकों पर निर्भर करती है।
2. बहुकारक सिद्धांत

इस सिद्धांत का प्रतिपादन थार्नडाइक ने किया। उनके अनुसार बुद्धि एक शक्ति नहीं बल्कि अनेक स्वतंत्र मानसिक योग्यताओं का समूह है।

  • बुद्धि अनेक मानसिक क्षमताओं से मिलकर बनती है।
  • प्रत्येक क्षमता स्वतंत्र रूप से कार्य करती है।
  • तर्क, स्मृति, भाषा एवं संख्यात्मक योग्यता जैसी विभिन्न क्षमताएँ बुद्धि का निर्माण करती हैं।
  • सामान्य बुद्धि की अवधारणा को कम महत्व दिया गया है।
4. समूह कारक सिद्धांत

इस सिद्धांत का प्रतिपादन थर्स्टन ने किया। उन्होंने बुद्धि को कुछ प्राथमिक मानसिक योग्यताओं के समूह के रूप में समझाया।

  • शाब्दिक योग्यता (Verbal Ability)
  • स्थानिक योग्यता (Spatial Ability)
  • संख्यात्मक योग्यता (Numerical Ability)
  • स्मृति शक्ति (Memory)
  • शब्द प्रवाह (Word Fluency)
  • आगमन एवं निगमन तर्क क्षमता (Reasoning Ability)
  • प्रत्यक्षीकरण क्षमता (Perceptual Ability)
  • समस्या समाधान क्षमता (Problem Solving Ability)

थर्स्टन के अनुसार इन सभी प्राथमिक मानसिक योग्यताओं के संयुक्त प्रभाव से व्यक्ति की बुद्धि का निर्माण होता है।

बुद्धिलब्धि

बुद्धिलब्धि (IQ) से तात्पर्य व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता के मापन से है। इसके माध्यम से यह ज्ञात किया जाता है कि किसी व्यक्ति का मानसिक विकास उसकी वास्तविक आयु की तुलना में किस स्तर पर है।

बुद्धिलब्धि निकालने की विधि

बुद्धिलब्धि ज्ञात करने के लिए मानसिक आयु (MA) तथा वास्तविक आयु (CA) का उपयोग किया जाता है।

बुद्धिलब्धि (IQ) = मानसिक आयु (MA) वास्तविक आयु (CA) × 100

  • IQ = बुद्धिलब्धि
  • MA = मानसिक आयु
  • CA = वास्तविक आयु

उदाहरण: यदि किसी बालक की मानसिक आयु 14 वर्ष तथा वास्तविक आयु 13 वर्ष है, तो उसकी बुद्धिलब्धि लगभग 108 होगी।

बुद्धिलब्धि का वर्गीकरण

टर्मन ने बुद्धिलब्धि (IQ) का वर्गीकरण विभिन्न स्तरों के आधार पर किया है। इसके माध्यम से व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का अनुमान लगाया जाता है।

  • 140 या उससे अधिक — प्रतिभाशाली
  • 120–140 — बहुत अधिक बुद्धिमान
  • 110–120 — औसत से अधिक बुद्धिमान
  • 90–110 — सामान्य बुद्धिमान
  • 75–90 — सीमांत बुद्धि
  • 50–75 — मंदबुद्धि
  • 25–50 — गंभीर मंदबुद्धि
  • 25 से कम — अत्यंत गंभीर मंदबुद्धि

बुद्धिलब्धि की स्थिरता

बुद्धिलब्धि पूर्णतः स्थिर नहीं होती, फिर भी सामान्य परिस्थितियों में इसमें अपेक्षाकृत कम परिवर्तन होता है। इसकी स्थिरता से संबंधित प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं—

  • एक ही व्यक्ति की बुद्धिलब्धि विभिन्न परीक्षणों में थोड़ी भिन्न हो सकती है।
  • सभी बालकों की बुद्धिलब्धि समान रूप से स्थिर नहीं रहती।
  • वंशानुक्रम एवं पर्यावरण दोनों बुद्धिलब्धि को प्रभावित करते हैं।
  • अनुकूल अथवा प्रतिकूल वातावरण के कारण बुद्धिलब्धि में कुछ परिवर्तन संभव है।

बुद्धिलब्धि की सीमाएँ

यद्यपि बुद्धिलब्धि व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का महत्वपूर्ण संकेतक है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ हैं—

  • बुद्धिलब्धि किसी व्यक्ति की संपूर्ण बुद्धि का माप नहीं है।
  • विभिन्न परीक्षणों से प्राप्त बुद्धिलब्धि अंक समान नहीं हो सकते।
  • कोई भी व्यक्ति पूर्णतः शून्य बुद्धिलब्धि वाला नहीं होता।
  • बाल्यावस्था में बुद्धिलब्धि समय के साथ कुछ हद तक परिवर्तित हो सकती है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • बुद्धि व्यक्ति की सीखने, तर्क करने, समस्या-समाधान करने तथा नई परिस्थितियों में समायोजन स्थापित करने की क्षमता है।
  • बुद्धि के प्रमुख स्वरूप हैं— सीखने की योग्यता, समस्या-समाधान की योग्यता, अमूर्त चिंतन तथा पर्यावरण से सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता।
  • बुद्धि की प्रमुख विशेषताओं में जन्मजातता, सीखने की क्षमता, अमूर्त चिंतन, समायोजन तथा पूर्व अनुभवों से लाभ उठाने की योग्यता शामिल हैं।
  • थार्नडाइक ने बुद्धि के तीन प्रकार बताए— सामाजिक बुद्धि, अमूर्त बुद्धि तथा मूर्त बुद्धि।
  • बुद्धि के प्रमुख सिद्धांत हैं— एक कारक सिद्धांत (बिने), द्वि-कारक सिद्धांत (स्पीयरमैन), बहुकारक सिद्धांत (थार्नडाइक) तथा समूह कारक सिद्धांत (थर्स्टन)।
  • बुद्धिलब्धि (IQ) व्यक्ति की मानसिक आयु एवं वास्तविक आयु के अनुपात के आधार पर ज्ञात की जाती है।
  • बुद्धिलब्धि का सूत्र है— (मानसिक आयु ÷ वास्तविक आयु) × 100
  • टर्मन ने बुद्धिलब्धि का वर्गीकरण विभिन्न स्तरों में किया तथा 90–110 IQ को सामान्य बुद्धि माना।
  • बुद्धिलब्धि पूर्णतः स्थिर नहीं होती तथा वंशानुक्रम एवं पर्यावरण दोनों से प्रभावित होती है।
  • बुद्धिलब्धि व्यक्ति की संपूर्ण बुद्धि का माप नहीं है, इसलिए इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं।
Topic 8 बुद्धि परीक्षण

बुद्धि परीक्षण

बुद्धि परीक्षण (Intelligence Test) ऐसे मानकीकृत परीक्षण हैं जिनके माध्यम से व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता, तर्क शक्ति, सीखने की योग्यता, स्मरण शक्ति तथा समस्या-समाधान क्षमता का मापन किया जाता है। इन परीक्षणों का उपयोग यह जानने के लिए किया जाता है कि व्यक्ति की मानसिक योग्यता अन्य व्यक्तियों की तुलना में किस स्तर की है। शिक्षा, मनोविज्ञान, परामर्श तथा व्यावसायिक निर्देशन के क्षेत्रों में बुद्धि परीक्षणों का व्यापक उपयोग किया जाता है।

बुद्धि परीक्षण का वर्गीकरण

बुद्धि परीक्षणों को मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है— व्यक्तिगत बुद्धि परीक्षण तथा सामूहिक बुद्धि परीक्षण।

1. व्यक्तिगत बुद्धि परीक्षण

इस प्रकार के परीक्षण में एक समय में केवल एक व्यक्ति का परीक्षण किया जाता है। परीक्षक और परीक्षार्थी आमने-सामने होते हैं।

शाब्दिक या भाषात्मक परीक्षण

  • बिने-साइमन बुद्धि परीक्षण
  • स्टैनफोर्ड-बिने स्केल
  • वैक्सलर-बेलेव्यू बुद्धि परीक्षण

अशाब्दिक या क्रियात्मक परीक्षण

  • पोर्टियस भूलभुलैया परीक्षण
  • भाटिया क्रियात्मक परीक्षण
  • आकार फलक परीक्षण
  • मेरिल-पामर ब्लॉक बिल्डिंग परीक्षण
2. सामूहिक बुद्धि परीक्षण

इस प्रकार के परीक्षण में एक साथ अनेक व्यक्तियों का परीक्षण किया जाता है।

सामूहिक शाब्दिक परीक्षण

  • आर्मी अल्फा परीक्षण
  • आर्मी जनरल वर्गीकरण परीक्षण
  • डॉ. सोहन लाल बुद्धि परीक्षण
  • टर्मन मानसिक योग्यता समूह परीक्षण

सामूहिक अशाब्दिक परीक्षण

  • आर्मी बीटा परीक्षण
  • पिजन अशाब्दिक परीक्षण
  • शिकागो अशाब्दिक परीक्षण
  • गुडइनफ ड्रॉ-अ-मैन परीक्षण
  • रेवन्स प्रोग्रेसिव मैट्रिसेस टेस्ट
  • कैटल संस्कृति-मुक्त बुद्धि परीक्षण
1. बिने-साइमन बुद्धि परीक्षण

इस परीक्षण का निर्माण अल्फ्रेड बिने एवं साइमन ने 1905 में किया था। इसका उद्देश्य बालकों की मानसिक क्षमता का मापन करना तथा विशेष सहायता की आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान करना था। यह व्यक्तिगत शाब्दिक बुद्धि परीक्षणों में सबसे प्रारम्भिक एवं प्रसिद्ध परीक्षण माना जाता है।

2. स्टैनफोर्ड-बिने स्केल

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में टर्मन द्वारा बिने-साइमन परीक्षण का संशोधित रूप विकसित किया गया, जिसे स्टैनफोर्ड-बिने स्केल कहा जाता है। इसमें मानसिक आयु एवं बुद्धिलब्धि की अवधारणा को अधिक व्यवस्थित रूप से शामिल किया गया। यह बुद्धि मापन के सबसे लोकप्रिय परीक्षणों में से एक है।

3. वैक्सलर-बेलेव्यू बुद्धि परीक्षण

इस परीक्षण का निर्माण डेविड वैक्सलर ने 1939 में किया। इसमें शाब्दिक एवं क्रियात्मक दोनों प्रकार के उप-परीक्षण सम्मिलित हैं। यह परीक्षण बच्चों एवं वयस्कों दोनों की बुद्धि का आकलन करने में उपयोगी माना जाता है तथा आधुनिक बुद्धि परीक्षणों का महत्वपूर्ण आधार है।

Topic 9 सृजनात्मकता

सृजनात्मकता

सृजनात्मकता (Creativity) से आशय व्यक्ति की उस क्षमता से है जिसके द्वारा वह नए, मौलिक तथा उपयोगी विचारों, वस्तुओं या कार्यों का सृजन करता है। यह रचनात्मक चिंतन की प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपनी कल्पना, अनुभव एवं ज्ञान का प्रयोग करके नवीन समाधान या रचनाएँ प्रस्तुत करता है।

सृजनात्मकता केवल नई वस्तु बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि किसी समस्या का नया समाधान खोजने, नए विचार प्रस्तुत करने तथा किसी कार्य को अलग एवं प्रभावी ढंग से करने की क्षमता भी है। शिक्षा के क्षेत्र में सृजनात्मकता बालक के स्वतंत्र चिंतन, कल्पनाशक्ति तथा नवाचार को प्रोत्साहित करती है।

सृजनात्मकता की परिभाषाएँ

  • कोल एवं ब्रूस के अनुसार – "सृजनात्मकता मौलिक उत्पाद के रूप में मानव मस्तिष्क को समझने, व्यक्त करने तथा सराहना करने की योग्यता एवं क्रिया है।"
  • क्रो एवं क्रो के अनुसार – "सृजनात्मकता मौलिक परिणामों को अभिव्यक्त करने की मानसिक प्रक्रिया है।"
  • स्टेन के अनुसार – "जब किसी कार्य का परिणाम नवीन हो तथा किसी समय समूह द्वारा उपयोगी एवं मान्य माना जाए, तब वह सृजनात्मकता कहलाता है।"

सृजनात्मकता की विशेषताएँ

सृजनात्मकता की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  • सृजनात्मकता में नवीनता का गुण पाया जाता है। व्यक्ति नई एवं अनोखी रचनाओं या विचारों का निर्माण करता है।
  • सृजनात्मक कार्य उपयोगी एवं सार्थक होते हैं। नई रचना का किसी न किसी रूप में व्यावहारिक महत्व होता है।
  • सृजनात्मकता लक्ष्य-उन्मुख प्रक्रिया है। व्यक्ति की रचनात्मक गतिविधियों के पीछे कोई निश्चित उद्देश्य होता है।
  • सृजनात्मक व्यक्ति में अपसारी (Divergent) चिंतन पाया जाता है, जिसके कारण वह एक समस्या के अनेक संभावित समाधान खोज सकता है।
  • सृजनात्मकता पूर्व अनुभवों एवं अर्जित ज्ञान पर आधारित होती है। अनुभव जितने समृद्ध होते हैं, सृजनात्मकता उतनी अधिक विकसित होती है।
  • सृजनात्मकता बुद्धि से संबंधित होते हुए भी उससे भिन्न अवधारणा है। दोनों में घनिष्ठ संबंध होता है, परंतु दोनों समान नहीं हैं।
  • सृजनात्मकता का परिणाम नवीन उत्पादन, विचार या रचना के रूप में प्रकट होता है, जिससे व्यक्ति की प्रतिभा का विकास होता है।

सृजनात्मकता के प्रमुख सिद्धांत

सृजनात्मकता के स्वरूप को समझाने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिकों एवं शिक्षाविदों ने अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। ये सिद्धांत सृजनात्मकता की उत्पत्ति, विकास तथा उसके आधारभूत कारणों की व्याख्या करते हैं। सृजनात्मकता के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं—

1. सृजनात्मकता का वंशानुक्रम सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार सृजनात्मकता जन्मजात होती है तथा व्यक्ति को अपने पूर्वजों से प्राप्त होती है। इस मत के समर्थकों का मानना है कि कुछ व्यक्तियों में रचनात्मक क्षमता जन्म से ही विद्यमान रहती है।

2. पर्यावरण संबंधित सृजनात्मकता सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार सृजनात्मकता का विकास व्यक्ति के वातावरण एवं अनुभवों से होता है। स्वतंत्र, प्रोत्साहनपूर्ण तथा अनुकूल वातावरण व्यक्ति में नए विचारों और नवाचार को बढ़ावा देता है।

3. अर्द्धगोलाकार सिद्धांत

इस सिद्धांत का प्रतिपादन बलॉक तथा किटनों ने किया। इसके अनुसार मानव मस्तिष्क दाएँ एवं बाएँ दो अर्द्धगोलों में विभाजित होता है तथा सृजनशीलता का संबंध मुख्य रूप से दाएँ अर्द्धगोल की सक्रियता से माना जाता है।

4. मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत

इस सिद्धांत का प्रतिपादन फ्रायड ने किया। उनके अनुसार व्यक्ति की सृजनात्मकता उसकी दमित इच्छाओं एवं आंतरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति का परिणाम होती है।

5. सृजनात्मकता का स्तर सिद्धांत

इस सिद्धांत का प्रतिपादन आई. ए. टेलर ने किया। उन्होंने सृजनात्मकता को विभिन्न स्तरों में विभाजित किया तथा बताया कि जैसे-जैसे व्यक्ति की सृजनात्मक क्षमता विकसित होती है, उसका सृजनात्मक स्तर भी बढ़ता जाता है।

सृजनात्मकता के प्रमुख तत्व

सृजनात्मकता अनेक मानसिक क्षमताओं का समन्वित रूप है। सृजनात्मकता के प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं—

1. प्रवाह (Fluency)

प्रवाह से तात्पर्य किसी विषय पर अधिक संख्या में विचार प्रस्तुत करने की क्षमता से है। यह व्यक्ति की विचारों को सहज एवं तीव्र गति से व्यक्त करने की योग्यता को दर्शाता है।

  • विचार प्रवाह (Ideational Fluency) – किसी विषय पर अधिक से अधिक विचार प्रस्तुत करने की क्षमता।
  • शब्द प्रवाह (Word Fluency) – शब्दों का शीघ्र एवं उचित प्रयोग करने की क्षमता।
  • साहचर्य प्रवाह (Association Fluency) – किसी विचार या शब्द से संबंधित अन्य विचारों को जोड़ने की क्षमता।
  • अभिव्यक्ति प्रवाह (Expressional Fluency) – विचारों को स्पष्ट एवं प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने की क्षमता।
2. लचीलापन (Flexibility)

लचीलेपन से आशय विभिन्न परिस्थितियों में नए दृष्टिकोण अपनाने तथा किसी समस्या के अनेक समाधान खोजने की क्षमता से है। यह व्यक्ति के विचारों की विविधता को दर्शाता है।

2. मौलिकता (Originality)

मौलिकता का अर्थ नवीन, अनोखे एवं दूसरों से भिन्न विचार प्रस्तुत करने की क्षमता से है। जब व्यक्ति किसी समस्या का ऐसा समाधान प्रस्तुत करता है जो सामान्य उत्तरों से अलग हो, तब उसमें मौलिकता का गुण माना जाता है।

4. विस्तारण (Elaboration)

विस्तारण से तात्पर्य किसी विचार को विस्तारपूर्वक विकसित एवं व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता से है। इसके द्वारा व्यक्ति अपने विचारों को अधिक स्पष्ट, उपयोगी एवं प्रभावशाली बनाता है।

  • शाब्दिक विस्तारण (Semantic Elaboration) – शब्दों एवं विचारों का विस्तारपूर्वक वर्णन करना।
  • आकृतिक विस्तारण (Figural Elaboration) – चित्रों, आकृतियों अथवा प्रतीकों के माध्यम से विचारों का विस्तार करना।

शैशवावस्था में सृजनात्मक विकास

शैशवावस्था में बालक की कल्पनाशक्ति तीव्र गति से विकसित होती है। इस अवस्था में वह अपनी कल्पना एवं अनुभवों के आधार पर नई वस्तुओं, चित्रों तथा गतिविधियों का सृजन करने का प्रयास करता है। सृजनात्मकता का विकास बालक के व्यक्तित्व, सोचने की क्षमता तथा भविष्य के विकास की आधारशिला रखता है।

  • शिशु अपनी कल्पना के आधार पर नई वस्तुओं एवं गतिविधियों का निर्माण करने का प्रयास करता है।
  • कागज की नाव, पतंग अथवा अन्य सरल वस्तुएँ बनाना सृजनात्मकता के प्रारंभिक उदाहरण हैं।
  • चित्र बनाना तथा उनमें अपनी कल्पना के अनुसार रंग भरना सृजनात्मक अभिव्यक्ति को दर्शाता है।
  • इस अवस्था में कल्पनाशक्ति के विकास पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होता है।
  • सृजनात्मक गतिविधियाँ बालक के व्यक्तित्व एवं भावी जीवन के निर्माण में सहायक होती हैं।

बाल्यावस्था में सृजनात्मक विकास

बाल्यावस्था में सृजनात्मक क्षमता अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती है। बालक खेल, कला तथा विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से सीखता है और अपनी कल्पना, निरीक्षण तथा अनुभवों का उपयोग करके नए विचार विकसित करता है।

  • प्रत्येक बालक में सृजनात्मक क्षमता जन्मजात रूप से विद्यमान होती है।
  • खेल एवं रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से सृजनात्मक शक्ति का विकास होता है।
  • बालकों को स्वयं कार्य करने एवं अनुभव प्राप्त करने के अवसर मिलने चाहिए।
  • कल्पना, निरीक्षण एवं स्मरण शक्ति के विकास से सृजनात्मकता बढ़ती है।
  • कला, नृत्य, अभिनय तथा हस्तकला जैसी गतिविधियाँ सृजनात्मक विकास में सहायक होती हैं।
  • बेकार या अनुपयोगी वस्तुओं से नई सामग्री बनाना रचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करता है।

किशोरावस्था में सृजनात्मक विकास

किशोरावस्था परिवर्तन एवं विकास की महत्वपूर्ण अवस्था है। इस समय किशोरों में कल्पनाशक्ति, स्वतंत्र चिंतन तथा नवीन कार्य करने की प्रवृत्ति अधिक विकसित होती है। उचित मार्गदर्शन एवं अनुकूल वातावरण मिलने पर उनकी सृजनात्मक क्षमता का प्रभावी विकास किया जा सकता है।

  • किशोरावस्था में शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक एवं सामाजिक परिवर्तन तीव्र गति से होते हैं।
  • किशोर अपनी कल्पनाओं को वास्तविक रूप देने का प्रयास करते हैं।
  • उचित वातावरण एवं प्रोत्साहन से सृजनात्मक क्षमता का अधिकतम विकास संभव होता है।
  • सृजनात्मक गतिविधियाँ किशोरों को कुंठा एवं निराशा से दूर रखने में सहायता करती हैं।
  • वाद-विवाद, साहित्यिक गोष्ठियाँ, नाटक एवं संगीत जैसी गतिविधियाँ सृजनात्मकता को बढ़ावा देती हैं।
  • सृजनात्मक विकास भविष्य में विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने में सहायक होता है।

बालकों में सृजनात्मकता बढ़ाने के उपाय

सृजनात्मकता जन्मजात क्षमता होने के साथ-साथ ऐसी योग्यता भी है जिसका विकास उचित शिक्षण, प्रोत्साहन तथा अनुकूल वातावरण द्वारा किया जा सकता है। शिक्षक विभिन्न गतिविधियों एवं शिक्षण विधियों का प्रयोग करके बालकों में सृजनात्मक सोच, कल्पनाशक्ति तथा मौलिक अभिव्यक्ति का विकास कर सकते हैं।

  • शिक्षक स्वयं सृजनात्मक प्रवृत्ति के हों तथा नवीन प्रयोगों द्वारा विद्यार्थियों को प्रेरित करें।
  • वाद-विवाद, प्रश्नोत्तर एवं विचारोत्तेजक चर्चाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को स्वतंत्र सोचने के लिए प्रोत्साहित करें।
  • सृजनात्मक कार्यों पर सकारात्मक पुनर्बलन एवं उचित प्रशंसा प्रदान करें।
  • विद्यार्थियों के नवीन कार्यों की सराहना करें तथा उन्हें रचनात्मक गतिविधियों के पर्याप्त अवसर दें।
  • अभिव्यक्ति के अधिकाधिक अवसर प्रदान करें ताकि विद्यार्थी अपने विचारों एवं खोजों को प्रस्तुत कर सकें।
  • प्रोजेक्ट कार्य एवं समस्या-आधारित गतिविधियों के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित करें।
  • मस्तिष्क उद्वेलन (Brainstorming) विधि का उपयोग करके विद्यार्थियों में नवीन विचार उत्पन्न करने की क्षमता विकसित करें।
  • समस्याओं के समाधान हेतु परंपरागत तरीकों के स्थान पर नए एवं मौलिक उपाय खोजने के लिए प्रोत्साहित करें।
  • विद्यार्थियों में आलोचनात्मक दृष्टिकोण तथा नवीन विचारों का मूल्यांकन करने की क्षमता विकसित करें।
  • नकारात्मक भावनाओं एवं भय को दूर कर आशावादी एवं उत्साहवर्धक वातावरण प्रदान करें।
  • नई सूचनाओं के संग्रह एवं अध्ययन की आदत विकसित करने के लिए प्रेरित करें।
  • जीवन से संबंधित समस्याओं का प्रत्यक्ष अनुभव कराकर उनके विविध समाधान प्रस्तुत करने के अवसर प्रदान करें।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सृजनात्मकता व्यक्ति की नई, मौलिक एवं उपयोगी विचारों या रचनाओं को उत्पन्न करने की क्षमता है।
  • कोल एवं ब्रूस, क्रो एवं क्रो तथा स्टेन ने सृजनात्मकता को मौलिक एवं उपयोगी परिणामों से संबंधित मानसिक प्रक्रिया माना है।
  • सृजनात्मकता की प्रमुख विशेषताएँ नवीनता, उपयोगिता, लक्ष्य-उन्मुखता, अपसारी चिंतन तथा मौलिक उत्पादन हैं।
  • सृजनात्मकता के प्रमुख सिद्धांत हैं— वंशानुक्रम सिद्धांत, पर्यावरण सिद्धांत, अर्द्धगोलाकार सिद्धांत, मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत तथा स्तर सिद्धांत।
  • सृजनात्मकता के प्रमुख तत्व प्रवाह, लचीलापन, मौलिकता तथा विस्तारण हैं।
  • शैशवावस्था, बाल्यावस्था एवं किशोरावस्था में सृजनात्मक क्षमता का क्रमिक विकास होता है।
  • मस्तिष्क उद्वेलन (Brainstorming), प्रोत्साहन, स्वतंत्र अभिव्यक्ति एवं अनुकूल वातावरण सृजनात्मकता के विकास के प्रमुख साधन हैं।