बाल विकास
बाल विकास का अर्थ बालक में गर्भावस्था से लेकर परिपक्वता तक होने वाले शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक तथा व्यवहारगत परिवर्तनों से है। यह एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके द्वारा बालक की क्षमताओं, योग्यताओं एवं व्यक्तित्व का क्रमिक विकास होता है।
बाल विकास केवल वृद्धि (Growth) तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बालक के व्यवहार, विचार, भावनाओं, रुचियों तथा सामाजिक समायोजन में होने वाले गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन भी सम्मिलित होते हैं।
बाल विकास की परिभाषाएँ
हरलॉक के अनुसार
"बाल विकास मनोविज्ञान की वह शाखा है जो गर्भाधान से लेकर परिपक्वता तक होने वाले मानव विकास के विभिन्न परिवर्तनों का अध्ययन करती है।"
जेम्स ड्रेवर के अनुसार
"बाल विकास मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें जन्म से परिपक्वता तक विकसित होने वाले मानव का अध्ययन किया जाता है।"
क्रो एवं क्रो के अनुसार
"बाल मनोविज्ञान वह वैज्ञानिक अध्ययन है जो व्यक्ति के विकास का अध्ययन गर्भकाल के प्रारम्भ से किशोरावस्था की प्रारम्भिक अवस्था तक करता है।"
थाम्पसन के अनुसार
"बाल मनोविज्ञान बालक के व्यवहार तथा उसके मनोवैज्ञानिक विकास का विभिन्न परिस्थितियों में अध्ययन करता है।"
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि बाल विकास बालक के जन्म से परिपक्वता तक होने वाले सभी विकासात्मक परिवर्तनों का वैज्ञानिक अध्ययन है।
बाल विकास की विशेषताएँ
बाल विकास की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
- बाल विकास, मनोविज्ञान की एक शाखा है।
- यह एक वैज्ञानिक विषय है।
- यह वर्णनात्मक एवं नियामक विज्ञान है।
- यह बालक के व्यवहार के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करता है।
- इसके अंतर्गत संज्ञानात्मक, संवेगात्मक एवं क्रियात्मक पक्षों का अध्ययन किया जाता है।
- इसका केन्द्र बिन्दु बालक होता है।
- यह शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं के मनोवैज्ञानिक समाधान खोजता है।
- यह अधिगम एवं सीखने के अनुभवों का अध्ययन करता है।
- इसके अंतर्गत बालक की प्रतिक्रियाओं एवं उनके परिणामों का अध्ययन किया जाता है।
- यह बालकों के व्यवहार को वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।
बाल विकास के क्षेत्र
बाल विकास का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसके अंतर्गत बालक के विकास, व्यवहार, रुचियों, व्यक्तित्व तथा विकास को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का अध्ययन किया जाता है। बाल विकास के प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं—
- बाल विकास की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन : गर्भकाल, शैशवावस्था, बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था आदि विभिन्न विकास अवस्थाओं का अध्ययन किया जाता है।
- बाल विकास के विभिन्न पक्षों का अध्ययन : शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक, भाषाई, नैतिक तथा व्यक्तित्व विकास का अध्ययन किया जाता है।
- बाल विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन : वंशानुक्रम, वातावरण, परिपक्वता तथा शिक्षा जैसे कारकों का अध्ययन किया जाता है।
- बाल व्यवहार एवं अन्तःक्रियाओं का अध्ययन : बालकों के व्यवहार, सामाजिक सम्बन्धों तथा विभिन्न परिस्थितियों में उनकी प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
- मानसिक स्वास्थ्य का अध्ययन : बालकों के मानसिक स्वास्थ्य, मानसिक समस्याओं तथा उनके समाधान का अध्ययन किया जाता है।
- बालकों की असामान्यताओं का अध्ययन : बालकों में पाई जाने वाली विभिन्न शारीरिक, मानसिक एवं व्यवहारगत असामान्यताओं का अध्ययन किया जाता है।
- बालकों की रुचियों का अध्ययन : बालकों की रुचियों, अभिरुचियों एवं प्रेरणाओं का अध्ययन किया जाता है।
- वैयक्तिक भिन्नताओं का अध्ययन : बालकों की क्षमताओं, योग्यताओं एवं व्यक्तित्व में पाए जाने वाले व्यक्तिगत अन्तरों का अध्ययन किया जाता है।
- बालकों के व्यक्तित्व का मूल्यांकन : विभिन्न परीक्षणों एवं मापन विधियों द्वारा बालकों के व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाता है।
- विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन : स्मृति, चिंतन, कल्पना, तर्क, अधिगम तथा अन्य मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
बाल विकास की आवश्यकता एवं महत्व
बाल विकास का अध्ययन वर्तमान समय में अत्यंत आवश्यक एवं महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके माध्यम से बालकों की आवश्यकताओं, क्षमताओं, रुचियों तथा विकास की विभिन्न अवस्थाओं को समझा जा सकता है। यह शिक्षक, अभिभावक एवं शिक्षा योजनाकारों को बालकों के समुचित विकास में सहायता प्रदान करता है।
- बालकों की वृद्धि एवं विकास को समझने में सहायता मिलती है।
- शिक्षा के उद्देश्यों एवं पाठ्यक्रम निर्माण में सहायक है।
- शिक्षकों को बालकों के प्रति उचित दृष्टिकोण प्रदान करता है।
- उपयुक्त शिक्षण विधियों एवं वातावरण के चयन में सहायता करता है।
- बालकों की रुचियों, योग्यताओं एवं क्षमताओं की पहचान करने में सहायक है।
- विभिन्न आयु अवस्थाओं की विशेषताओं को समझने में सहायता करता है।
- वैयक्तिक भिन्नताओं के अनुसार शिक्षण की योजना बनाने में सहायक है।
- बालकों के व्यवहार एवं समस्याओं को समझने में सहायता प्रदान करता है।
- बालकों के समुचित व्यक्तित्व विकास में सहायक है।
- भविष्य के विकास एवं व्यवहार का अनुमान लगाने में सहायता करता है।
- मार्गदर्शन एवं परामर्श कार्य को प्रभावी बनाता है।
- विद्यालय एवं परिवार में अनुकूल वातावरण निर्माण में सहायक है।
बाल विकास की अवस्थाएँ
मानव विकास एक सतत एवं क्रमिक प्रक्रिया है, जो जन्म से पूर्व से लेकर जीवन के अंतिम चरण तक चलती रहती है। विकास की प्रत्येक अवस्था की अपनी विशेषताएँ, आवश्यकताएँ एवं विकासात्मक कार्य होते हैं। बाल विकास के अध्ययन को सरल बनाने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने इसे विभिन्न अवस्थाओं में विभाजित किया है।
रॉस के अनुसार विकास की अवस्थाएँ
- शैशवावस्था — 1 से 3 वर्ष तक
- पूर्व बाल्यावस्था — 3 से 6 वर्ष तक
- उत्तर बाल्यावस्था — 6 से 12 वर्ष तक
- किशोरावस्था — 12 से 18 वर्ष तक
सेले के अनुसार विकास की अवस्थाएँ
- शैशवावस्था — 0 से 5 वर्ष तक
- बाल्यावस्था — 6 से 12 वर्ष तक
- किशोरावस्था — 13 से 18 वर्ष तक
अर्नेस्ट जोन्स के अनुसार विकास की अवस्थाएँ
- शैशवकाल — जन्म से 5 या 6 वर्ष तक
- बाल्यकाल — 6 से 12 वर्ष तक
- किशोरावस्था — 12 से 18 वर्ष तक
- प्रौढ़ावस्था — 18 वर्ष के बाद
भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार विकास की अवस्थाएँ
- गर्भावस्था — गर्भधारण से जन्म तक
- शैशवावस्था — जन्म से 5 वर्ष तक
- बाल्यावस्था — 5 से 12 वर्ष तक
- किशोरावस्था — 12 से 18 वर्ष तक
- युवावस्था — 18 से 25 वर्ष तक
- प्रौढ़ावस्था — 25 से 55 वर्ष तक
- वृद्धावस्था — 55 वर्ष से मृत्यु तक
सारांश : बाल विकास विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरने वाली निरन्तर प्रक्रिया है। प्रत्येक अवस्था की अपनी विशेषताएँ एवं विकासात्मक आवश्यकताएँ होती हैं। शैशवावस्था, बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था बाल विकास की प्रमुख अवस्थाएँ मानी जाती हैं।
शैशवावस्था
शैशवावस्था बाल विकास की प्रारम्भिक अवस्था है, जो सामान्यतः जन्म से लगभग 5 या 6 वर्ष की आयु तक मानी जाती है। यह बालक के जीवन का आधारभूत एवं अत्यंत महत्वपूर्ण काल होता है, क्योंकि इसी अवस्था में शारीरिक, मानसिक, भाषाई तथा सामाजिक विकास तीव्र गति से होता है।
इस अवस्था में बालक चलना, बोलना, परिवार के सदस्यों को पहचानना तथा अपने वातावरण के साथ समायोजन करना सीखता है। इसलिए शैशवावस्था को जीवन की नींव रखने वाली अवस्था भी कहा जाता है।
शैशवावस्था की परिभाषाएँ
क्रो एवं क्रो के अनुसार
"शैशवावस्था औसतन जन्म से पाँच या छह वर्ष तक चलती है, जिसमें इन्द्रियाँ सक्रिय होने लगती हैं तथा बालक रेंगना, चलना और बोलना सीखता है।"
फ्रायड के अनुसार
"मनुष्य को जो कुछ बनना होता है, वह प्रारम्भ के चार-पाँच वर्षों में ही बन जाता है।"
वैलेन्टाइन के अनुसार
"शैशवावस्था सीखने का आदर्शकाल है।"
न्यूमैन के अनुसार
"शैशवावस्था जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काल है।"
उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शैशवावस्था जीवन की आधारभूत अवस्था है, जिसमें बालक के भावी व्यक्तित्व, व्यवहार तथा विकास की नींव रखी जाती है।
शैशवावस्था की विशेषताएँ
शैशवावस्था बालक के जीवन की आधारभूत अवस्था है। इस अवस्था में विकास की गति तीव्र होती है तथा बालक के व्यक्तित्व की नींव रखी जाती है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
- शारीरिक विकास तीव्र गति से होता है।
- मानसिक विकास एवं बौद्धिक क्षमताओं का तेजी से विकास होता है।
- बालक में कल्पनाशीलता की प्रबलता पाई जाती है।
- सीखने की प्रक्रिया अत्यंत तीव्र होती है।
- बालक प्रारम्भिक वर्षों में दूसरों पर निर्भर रहता है।
- जिज्ञासा की भावना अधिक विकसित होती है।
- अनुकरण एवं दोहराने की प्रवृत्ति पाई जाती है।
- नैतिकता का स्पष्ट विकास नहीं होता।
- आत्मप्रेम एवं आत्मकेन्द्रितता की भावना पाई जाती है।
- संवेगों का तीव्र प्रदर्शन दिखाई देता है।
- अकेले तथा समूह में खेलने की प्रवृत्ति विकसित होती है।
- अन्य बालकों के प्रति रुचि या अरुचि का भाव उत्पन्न होता है।
- आत्मगौरव एवं प्रशंसा प्राप्त करने की इच्छा रहती है।
- व्यवहार मुख्यतः मूल प्रवृत्तियों से प्रभावित होता है।
- सामाजिक भावना का क्रमिक विकास होने लगता है।
शैशवावस्था में शिक्षा का स्वरूप
शैशवावस्था में सीखने की गति अत्यंत तीव्र होती है। इसलिए इस अवस्था में बालक को उसकी आयु, रुचि एवं विकास स्तर के अनुसार शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। शिक्षा का स्वरूप निम्नलिखित होना चाहिए—
- बालक के उचित पालन-पोषण एवं स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
- शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए स्वच्छ एवं अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
- बालक के प्रति प्रेमपूर्ण, सहानुभूतिपूर्ण एवं स्नेहपूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए।
- बालक की जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए उसके प्रश्नों का उचित उत्तर दिया जाना चाहिए।
- शिक्षा में वैयक्तिक भिन्नताओं का ध्यान रखा जाना चाहिए।
- बालक में अच्छी आदतों के विकास के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
- सामाजिक भावना एवं सहयोग की प्रवृत्ति के विकास पर बल दिया जाना चाहिए।
- ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों के विकास हेतु क्रियात्मक एवं खेल आधारित शिक्षण अपनाया जाना चाहिए।
- शिक्षण में चित्रों, कहानियों तथा रोचक शिक्षण सामग्री का उपयोग किया जाना चाहिए।
- बालक को आत्म-अभिव्यक्ति एवं रचनात्मक गतिविधियों के पर्याप्त अवसर दिए जाने चाहिए।
बाल्यावस्था
बाल्यावस्था शैशवावस्था और किशोरावस्था के मध्य की अवस्था है। सामान्यतः यह अवस्था लगभग 6 वर्ष से 12 वर्ष तक मानी जाती है। इस काल में बालक का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा भावनात्मक विकास अधिक व्यवस्थित रूप से होता है।
बाल्यावस्था की परिभाषाएँ
कोल एवं ब्रूस के अनुसार
"बाल्यावस्था जीवन का अनोखा काल है, क्योंकि इस अवस्था में बालक के व्यक्तित्व तथा व्यवहार में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देते हैं।"
रॉस के अनुसार
"बाल्यावस्था मिथ्या परिपक्वता का काल है, जिसमें बालक स्वयं को वास्तविकता से अधिक परिपक्व समझने लगता है।"
किलपैट्रिक के अनुसार
"बाल्यावस्था प्रतिस्पर्धा का काल है, जिसमें बालक दूसरों से आगे बढ़ने तथा अपनी योग्यता प्रदर्शित करने का प्रयास करता है।"
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि बाल्यावस्था विकास, सामाजिक समायोजन, शिक्षा तथा व्यक्तित्व निर्माण की महत्वपूर्ण अवस्था है।
बाल्यावस्था की विशेषताएँ
बाल्यावस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
- इस अवस्था में शारीरिक एवं मानसिक विकास अपेक्षाकृत स्थिर एवं संतुलित होता है।
- बालक का दृष्टिकोण अधिक यथार्थवादी हो जाता है तथा वह वास्तविक परिस्थितियों को समझने लगता है।
- बालकों में जिज्ञासा की भावना प्रबल होती है और वे नई बातों को जानने का प्रयास करते हैं।
- तर्क, चिंतन, स्मृति एवं अन्य मानसिक योग्यताओं का विकास होता है।
- सहयोग, मित्रता एवं सामूहिक भावना का विकास होने लगता है।
- बालकों में चित्रकला, हस्तकला तथा अन्य रचनात्मक कार्यों के प्रति रुचि बढ़ती है।
- वे अपनी भावनाओं एवं संवेगों पर नियंत्रण रखना सीखने लगते हैं।
- विभिन्न वस्तुओं को एकत्रित करने या संग्रह करने की प्रवृत्ति विकसित होती है।
- प्रतिस्पर्धा की भावना उत्पन्न होती है तथा बालक दूसरों से आगे बढ़ने का प्रयास करता है।
- इस अवस्था में औपचारिक विद्यालयी शिक्षा का व्यवस्थित रूप से प्रारम्भ होता है।
बाल्यावस्था में शिक्षा का स्वरूप
बाल्यावस्था में शिक्षा प्रदान करते समय बालकों की रुचियों, क्षमताओं तथा विकासात्मक आवश्यकताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। इस अवस्था में शिक्षा का स्वरूप निम्नलिखित होना चाहिए—
- बालकों की जिज्ञासा को संतुष्ट करने वाली रोचक एवं गतिविधि-आधारित शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
- भाषा विकास पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि बालक अपने विचारों को प्रभावी ढंग से व्यक्त कर सके।
- इन्द्रियों के समुचित विकास हेतु खेल, प्रयोग तथा अनुभवात्मक अधिगम को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- रचनात्मक प्रवृत्तियों के विकास के लिए चित्रकला, हस्तकला तथा अन्य सृजनात्मक गतिविधियों को स्थान दिया जाना चाहिए।
- नैतिक मूल्यों के विकास के लिए सत्य, सहयोग, अनुशासन एवं जिम्मेदारी जैसे गुणों का विकास किया जाना चाहिए।
- संग्रह एवं संरक्षण की अच्छी आदतों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से समूह भावना एवं सहयोग की प्रवृत्ति का विकास किया जाना चाहिए।
- संवेगात्मक विकास को ध्यान में रखते हुए बालकों को अपनी भावनाओं की उचित अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
- सामाजिक गुणों जैसे सहयोग, सहिष्णुता, नेतृत्व तथा स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का विकास किया जाना चाहिए।
- बाल्यावस्था सामान्यतः 6 से 12 वर्ष की आयु का काल है।
- कोल एवं ब्रूस ने बाल्यावस्था को ‘अनोखा काल’ कहा है।
- रॉस ने बाल्यावस्था को ‘मिथ्या परिपक्वता का काल’ कहा है।
- किलपैट्रिक ने बाल्यावस्था को ‘प्रतिद्वन्द्विता का काल’ कहा है।
- बाल्यावस्था को ‘प्रारम्भिक विद्यालयी आयु’ कहा जाता है।
- बाल्यावस्था को ‘टोली की आयु’ (Gang Age) भी कहा जाता है।
- इस अवस्था में औपचारिक शिक्षा का प्रारम्भ होता है।
किशोरावस्था
किशोरावस्था बाल्यावस्था और प्रौढ़ावस्था के मध्य की संक्रमणकालीन अवस्था है। सामान्यतः यह अवस्था 12 से 18 वर्ष की आयु तक मानी जाती है। इस काल में बालक के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक विकास में तीव्र परिवर्तन होते हैं और वह परिपक्वता की ओर अग्रसर होता है।
किशोरावस्था का अर्थ
किशोरावस्था अंग्रेजी शब्द Adolescence का हिन्दी रूप है, जो लैटिन भाषा के शब्द Adolescere से बना है, जिसका अर्थ है— परिपक्वता की ओर बढ़ना। इस अवस्था में बालक में आत्मचेतना, स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व तथा व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है।
किशोरावस्था की परिभाषाएँ
स्टेनले हॉल के अनुसार
"किशोरावस्था बड़े तनाव, संघर्ष, तूफान तथा विरोध की अवस्था है।"
क्राउ एवं क्राउ के अनुसार
"किशोर वर्तमान की शक्ति तथा भविष्य की आशा का प्रतिनिधित्व करता है।"
एस. ए. कोर्टिस के अनुसार
"किशोरावस्था औसतन 12 से 18 वर्ष की आयु तक की अवस्था है, जिसमें यौन अंगों के विकास के साथ शारीरिक लैंगिक विशेषताएँ प्रकट होती हैं।"
कारमाइकल के अनुसार
"किशोरावस्था जीवन का वह काल है जिसमें अपरिपक्व व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक परिपक्वता की ओर बढ़ता है।"
उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि किशोरावस्था तीव्र परिवर्तन, विकास एवं परिपक्वता की अवस्था है, जिसमें बालक बाल्यावस्था से प्रौढ़ावस्था की ओर अग्रसर होता है।
किशोरावस्था की विशेषताएँ
- किशोरावस्था में शारीरिक विकास तीव्र गति से होता है। ऊँचाई, भार तथा शरीर की संरचना में तेजी से परिवर्तन दिखाई देते हैं।
- इस अवस्था में बौद्धिक विकास अधिक होता है। किशोर तर्क करना, चिंतन करना तथा समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास करते हैं।
- समाज सेवा, राष्ट्रप्रेम एवं सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित होने लगती है। किशोर समाज में अपनी भूमिका को समझने लगते हैं।
- कल्पनाशीलता की प्रबलता पाई जाती है। किशोर अपने भविष्य, सफलता तथा आदर्श जीवन के बारे में अनेक कल्पनाएँ करते हैं।
- स्वतंत्र विचारों के कारण विद्रोह की प्रवृत्ति दिखाई देती है। वे परम्पराओं एवं नियमों को बिना समझे स्वीकार करना पसंद नहीं करते।
- इस अवस्था में लैंगिक जागरूकता विकसित होती है। विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण तथा अपने व्यक्तित्व के प्रति सजगता बढ़ जाती है।
- तीव्र परिवर्तनों के कारण समायोजन की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। कई बार किशोर अस्थिरता, तनाव या उलझन का अनुभव करते हैं।
- आदर्श व्यक्तियों के प्रति आकर्षण बढ़ जाता है। किशोर अपने प्रिय नेताओं, खिलाड़ियों, कलाकारों या अन्य व्यक्तियों का अनुकरण करने लगते हैं।
- धर्म एवं ईश्वर के प्रति जिज्ञासा विकसित होती है। वे धार्मिक मान्यताओं एवं जीवन के मूल प्रश्नों पर विचार करने लगते हैं।
- व्यवहार एवं संवेगों में परिवर्तन देखने को मिलता है। खुशी, क्रोध, उत्साह तथा निराशा जैसी भावनाएँ तीव्र रूप से व्यक्त होती हैं।
- आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान की भावना प्रबल हो जाती है। किशोर अपनी पहचान स्थापित करना चाहते हैं तथा दूसरों से सम्मान की अपेक्षा रखते हैं।
किशोरावस्था में शिक्षा का स्वरूप
- किशोरावस्था में शारीरिक विकास तीव्र गति से होता है। इसलिए स्वास्थ्य, व्यायाम, खेलकूद तथा शारीरिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
- इस अवस्था में नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का विकास आवश्यक होता है। इसलिए धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
- किशोर आत्मनिर्भर बनने की इच्छा रखते हैं। इसलिए उन्हें जीवनोपयोगी एवं व्यवसायिक शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
- प्रत्येक किशोर की रुचि, क्षमता एवं विकास की गति भिन्न होती है। इसलिए शिक्षा उनकी आवश्यकताओं के अनुसार दी जानी चाहिए।
- किशोरों में भावनाएँ तीव्र होती हैं। इसलिए उन्हें संवेगों पर नियंत्रण एवं संतुलित व्यवहार का मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए।
- इस अवस्था में रचनात्मक क्षमता का विकास होता है। इसलिए कला, साहित्य, विज्ञान एवं अन्य सृजनात्मक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- किशोरावस्था जीवन का संवेदनशील काल है। इसलिए शिक्षकों एवं अभिभावकों द्वारा उचित निर्देशन एवं परामर्श प्रदान किया जाना चाहिए।
- सकारात्मक व्यवहार का विकास किशोरों के व्यक्तित्व निर्माण में सहायक होता है। इसलिए उन्हें अच्छे आचरण एवं सकारात्मक सोच के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
- किशोरावस्था सामान्यतः 12 से 18 वर्ष की आयु का काल माना जाता है।
- किशोरावस्था को परिवर्तनकाल, संक्रमणकाल तथा वसन्तकाल कहा जाता है।
- स्टेनले हॉल ने किशोरावस्था को ‘तनाव, संघर्ष एवं तूफान की अवस्था’ (Storm and Stress) कहा है।
- कुल्हेन के अनुसार किशोरावस्था बाल्यावस्था और प्रौढ़ावस्था के बीच का संक्रमण काल है।
- इस अवस्था में तीव्र शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं संवेगात्मक परिवर्तन होते हैं।
वंशानुक्रम
वंशानुक्रम वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा माता-पिता की शारीरिक, मानसिक तथा अन्य जन्मजात विशेषताएँ संतानों में स्थानांतरित होती हैं।इसके कारण संतान में कई गुण अपने माता-पिता एवं पूर्वजों के समान दिखाई देते हैं।
सरल शब्दों में, माता-पिता से प्राप्त जन्मजात गुणों का हस्तांतरण ही वंशानुक्रम कहलाता है।
वंशानुक्रम की परिभाषाएँ
बी. एन. झा के अनुसार
"वंशानुक्रम व्यक्ति की जन्मजात विशेषताओं का पूर्ण योग है।"
जे. ए. थॉम्पसन के अनुसार
"वंशानुक्रम क्रमबद्ध पीढ़ियों के बीच उत्पत्ति सम्बन्धी सम्बन्ध के लिए सुविधाजनक शब्द है।"
एच. ए. पीटरसन के अनुसार
"व्यक्ति अपने माता-पिता के माध्यम से पूर्वजों से जो गुण प्राप्त करता है, वही वंशानुक्रम कहलाता है।"
जेम्स ड्रेवर के अनुसार
"माता-पिता की शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं का संतानों में संक्रामित होना ही वंशानुक्रम है।"
उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि वंशानुक्रम वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा माता-पिता एवं पूर्वजों के गुण संतानों में स्थानांतरित होते हैं और उनके विकास को प्रभावित करते हैं।
वंशानुक्रम की प्रक्रिया
वंशानुक्रम की प्रक्रिया माता-पिता से संतानों में गुणों के स्थानांतरण की प्रक्रिया है। वंशानुक्रम की प्रक्रिया को निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं:
- पिता का शुक्राणु (Sperm) और माता का अण्डाणु (Ovum) मिलकर युग्मज (Zygote) का निर्माण करते हैं।
- युग्मज से ही भ्रूण तथा नए जीवन का विकास प्रारम्भ होता है।
- माता और पिता की जनन कोशिकाओं में 23-23 गुणसूत्र (Chromosomes) होते हैं।
- निषेचन के बाद युग्मज में कुल 46 गुणसूत्र बनते हैं।
- गुणसूत्रों में जीन (Gene) पाए जाते हैं, जो विभिन्न गुणों का निर्धारण करते हैं।
- जीन शारीरिक, मानसिक तथा व्यवहारगत विशेषताओं के वाहक होते हैं।
- इन्हीं जीनों के माध्यम से वंशानुगत गुण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित होते हैं।
वंशानुक्रम की प्रक्रिया के प्रमुख घटक
- युग्मज (Zygote) – शुक्राणु एवं अण्डाणु के संयोग से बनने वाली प्रथम कोशिका, जिससे नए जीवन का विकास प्रारम्भ होता है।
- गुणसूत्र (Chromosomes) – कोशिका के नाभिक में पाए जाने वाले सूक्ष्म संरचनात्मक तत्त्व, जो आनुवंशिक सूचनाओं को वहन करते हैं।
- जीन (Gene) – गुणसूत्रों में स्थित आनुवंशिक इकाइयाँ, जो विभिन्न शारीरिक एवं मानसिक गुणों का निर्धारण करती हैं।
वंशानुक्रम के नियम
वंशानुक्रम के अध्ययन के आधार पर विभिन्न वैज्ञानिकों ने कुछ नियम प्रस्तुत किए हैं। ये नियम बताते हैं कि माता-पिता के गुण संतानों तक कैसे पहुँचते हैं तथा संतानों में समानता और भिन्नता क्यों दिखाई देती है। वंशानुक्रम के प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं—
1. बीजकोषों की निरन्तरता का नियम
इस नियम का प्रतिपादन वीजमैन ने किया था। उनके अनुसार वंशानुगत गुण बीजकोषों (जनन कोशिकाओं) के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते हैं। बीजकोष निरन्तर बने रहते हैं और वंशानुगत विशेषताओं का संचार करते हैं।
2. समानता का नियम
इस नियम के अनुसार संतान सामान्यतः अपने माता-पिता के समान गुण प्राप्त करती है। जैसे माता-पिता के शारीरिक, मानसिक तथा व्यवहारगत गुण किसी न किसी रूप में बच्चों में दिखाई देते हैं। इसी कारण संतान अपने माता-पिता से मिलती-जुलती प्रतीत होती है।
3. भिन्नता का नियम
इस नियम के अनुसार एक ही माता-पिता की सभी संतानें पूर्णतः समान नहीं होतीं। प्रत्येक बालक में कुछ विशेष गुण और भिन्नताएँ पाई जाती हैं। यही भिन्नता व्यक्तियों को एक-दूसरे से अलग बनाती है।
4. प्रत्यागमन का नियम
इस नियम के अनुसार कभी-कभी संतानों में ऐसे गुण दिखाई देते हैं जो उनके माता-पिता में नहीं होते, बल्कि पूर्वजों में पाए जाते थे। अर्थात कई पीढ़ियों बाद भी पूर्वजों के गुण पुनः प्रकट हो सकते हैं।
5. अर्जित गुणों के संक्रमण का नियम
इस नियम का समर्थन लैमार्क ने किया था। उनके अनुसार जीवनकाल में अर्जित किए गए कुछ गुण संतानों तक पहुँच सकते हैं। यद्यपि आधुनिक विज्ञान इस सिद्धान्त को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं करता, फिर भी वंशानुक्रम के इतिहास में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।
6. मेंडल का नियम
ग्रेगर मेंडल को आनुवंशिकी का जनक माना जाता है। उन्होंने मटर के पौधों पर प्रयोग करके वंशानुक्रम के वैज्ञानिक नियमों का प्रतिपादन किया। उनके सिद्धान्तों ने यह स्पष्ट किया कि गुण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में किस प्रकार स्थानांतरित होते हैं।
बाल विकास को प्रभावित करने वाले वंशानुक्रमीय कारक
बाल विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख वंशानुक्रमीय कारक निम्नलिखित हैं—
1. तंत्रिका तंत्र की बनावट
बालक का तंत्रिका तंत्र वंशानुगत रूप से प्राप्त होता है। सीखने की क्षमता, सोचने की शक्ति, आदतें तथा व्यवहार काफी हद तक तंत्रिका तंत्र के विकास पर निर्भर करते हैं।
2. शारीरिक विकास पर प्रभाव
वंशानुक्रम का प्रभाव बालक के रंग, रूप, कद, शारीरिक बनावट तथा स्वास्थ्य पर पड़ता है। कई शारीरिक विशेषताएँ एवं कुछ रोग भी माता-पिता से संतानों में स्थानांतरित हो सकते हैं।
3. मानसिक विकास पर प्रभाव
बुद्धि, स्मरण शक्ति, तर्क क्षमता तथा मानसिक योग्यता पर वंशानुक्रम का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। सामान्यतः बुद्धिमान माता-पिता की संतानों में भी अच्छे मानसिक गुण देखने को मिलते हैं।
4. संवेगात्मक विकास पर प्रभाव
बालक की भावनाएँ, संवेदनशीलता तथा संवेगों की अभिव्यक्ति भी वंशानुगत गुणों से प्रभावित होती है। कुछ बच्चे स्वभाव से अधिक भावुक या संवेदनशील होते हैं।
5. सामाजिक विकास पर प्रभाव
सामाजिक व्यवहार, समूह में रहने की प्रवृत्ति तथा दूसरों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता पर भी वंशानुक्रम का प्रभाव देखा जाता है।
6. स्वभाव पर प्रभाव
बालक का स्वभाव जैसे शांत, चंचल, साहसी, संकोची अथवा मिलनसार होना आंशिक रूप से वंशानुगत गुणों पर आधारित होता है।
7. चरित्र के विकास पर प्रभाव
चरित्र निर्माण में वातावरण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, फिर भी ईमानदारी, आत्मविश्वास तथा अनुशासन जैसे गुणों के विकास में वंशानुक्रम का भी योगदान माना जाता है।
8. बुद्धि पर प्रभाव
बुद्धि बाल विकास का महत्वपूर्ण आधार है। वंशानुगत गुण बालक की सीखने, समझने तथा समस्याओं का समाधान करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं।
9. व्यावसायिक योग्यता पर प्रभाव
कुछ विशेष प्रतिभाएँ और कौशल परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी देखने को मिलते हैं। इसी कारण संगीत, कला, खेल अथवा अन्य व्यवसायों के प्रति विशेष रुचि एवं योग्यता का विकास हो सकता है।
- वंशानुक्रम वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा माता-पिता एवं पूर्वजों के गुण संतानों में स्थानांतरित होते हैं।
- वंशानुक्रम का अर्थ ‘समान के समान’ (Like Begets Like) माना जाता है।
- वंशानुक्रम की प्रक्रिया में शुक्राणु (Sperm) एवं अण्डाणु (Ovum) मिलकर युग्मज (Zygote) का निर्माण करते हैं।
- मानव की जनन कोशिकाओं में 23-23 गुणसूत्र होते हैं तथा निषेचन के बाद 46 गुणसूत्र बनते हैं।
- जीन (Gene) वंशानुगत गुणों के वाहक होते हैं तथा विभिन्न शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं का निर्धारण करते हैं।
- वंशानुक्रम के प्रमुख नियम हैं— बीजकोषों की निरन्तरता, समानता, भिन्नता, प्रत्यागमन, अर्जित गुणों का संक्रमण तथा मेंडल का नियम।
- बीजकोषों की निरन्तरता का नियम वीजमैन द्वारा प्रतिपादित किया गया था।
- अर्जित गुणों के संक्रमण के नियम का समर्थन लैमार्क ने किया था।
- ग्रेगर मेंडल को ‘आनुवंशिकी का जनक’ कहा जाता है।
- बाल विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख वंशानुक्रमीय कारकों में तंत्रिका तंत्र, शारीरिक विकास, मानसिक विकास, स्वभाव, बुद्धि एवं व्यावसायिक योग्यता शामिल हैं।
वातावरण
वातावरण से आशय उन सभी बाह्य परिस्थितियों, वस्तुओं, व्यक्तियों तथा प्रभावों से है जो बालक को जन्म के बाद प्राप्त होते हैं और उसके विकास को प्रभावित करते हैं। परिवार, विद्यालय, समाज, मित्र, संस्कृति तथा भौतिक परिवेश सभी वातावरण के अंग हैं।
सरल शब्दों में, बालक के चारों ओर उपस्थित सभी बाहरी प्रभावों का समष्टि रूप वातावरण कहलाता है।
वातावरण की परिभाषाएँ
वुडवर्थ के अनुसार
"वातावरण उन सभी बाह्य शक्तियों एवं तत्वों का समूह है जो व्यक्ति को जीवनभर प्रभावित करते हैं।"
बोरिंग, लैंगफील्ड एवं वेल्ड के अनुसार
"व्यक्ति को जन्म से मृत्यु तक प्रभावित करने वाली सभी बाहरी परिस्थितियाँ वातावरण कहलाती हैं।"
एनास्टासी के अनुसार
"वंशानुक्रम को छोड़कर व्यक्ति को प्रभावित करने वाले सभी कारक वातावरण के अंतर्गत आते हैं।"
रॉस के अनुसार
"वातावरण वह बाहरी शक्ति है जो व्यक्ति के विकास तथा व्यवहार को प्रभावित करती है।"
उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि वातावरण बालक के विकास का महत्वपूर्ण आधार है। यह बालक के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक विकास को प्रभावित करता है और उसके व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वातावरण के प्रकार
बालक का विकास विभिन्न प्रकार के वातावरण से प्रभावित होता है। सामान्यतः वातावरण को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है— आन्तरिक वातावरण तथा बाह्य वातावरण। दोनों प्रकार के वातावरण बालक के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
1. आन्तरिक वातावरण (Internal Environment)
आन्तरिक वातावरण से आशय जन्म से पूर्व गर्भाशय में उपलब्ध परिस्थितियों से है। गर्भावस्था के दौरान माता का स्वास्थ्य, पोषण, मानसिक स्थिति तथा गर्भस्थ शिशु को मिलने वाले पोषक तत्व उसके विकास को प्रभावित करते हैं। यदि गर्भकालीन वातावरण अनुकूल हो तो बालक का विकास स्वस्थ रूप से होता है, जबकि प्रतिकूल परिस्थितियाँ विकास में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।
2. बाह्य वातावरण (External Environment)
बाह्य वातावरण से आशय उन सभी परिस्थितियों से है जो जन्म के बाद बालक को प्रभावित करती हैं। परिवार, विद्यालय, समाज, संस्कृति तथा भौतिक परिवेश इसके प्रमुख अंग हैं। बाह्य वातावरण को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है—
(i) भौतिक वातावरण (Physical Environment)
भौतिक वातावरण में प्रकृति एवं आसपास की भौतिक परिस्थितियाँ सम्मिलित होती हैं। जलवायु, सूर्य, वायु, जल, पर्वत, वनस्पति तथा अन्य प्राकृतिक संसाधन बालक के विकास को प्रभावित करते हैं।
(ii) सामाजिक वातावरण (Social Environment)
सामाजिक वातावरण में परिवार, पड़ोस, विद्यालय, मित्र समूह तथा समाज की परम्पराएँ और रीति-रिवाज सम्मिलित होते हैं। यह बालक के व्यवहार, सामाजिक गुणों तथा व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करता है।
(a) आर्थिक वातावरण (Economic Environment)
आर्थिक वातावरण का सम्बन्ध परिवार एवं समाज की आर्थिक स्थिति से होता है। आय, संसाधन, जीवन स्तर तथा सुविधाएँ बालक के विकास और अवसरों को प्रभावित करती हैं।
(b) सांस्कृतिक वातावरण (Cultural Environment)
सांस्कृतिक वातावरण में भाषा, परम्पराएँ, रीति-रिवाज, मूल्य, कला तथा सामाजिक मान्यताएँ शामिल होती हैं। यह बालक के विचारों, व्यवहार और जीवन शैली को प्रभावित करता है।
(c) मनो-सामाजिक वातावरण (Psycho-Social Environment)
मनो-सामाजिक वातावरण से आशय व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों तथा उनके मनोवैज्ञानिक प्रभावों से है। परिवार का प्रेम, स्नेह, सहयोग, सुरक्षा तथा सामाजिक स्वीकृति बालक के संवेगात्मक एवं व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बाल विकास को प्रभावित करने वाले वातावरणीय कारक
बालक का विकास केवल वंशानुक्रम से ही नहीं, बल्कि उसके आसपास के वातावरण से भी प्रभावित होता है। बाल विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख वातावरणीय कारक निम्नलिखित हैं—
1. मूलभूत आवश्यकताएँ
भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ बालक के विकास का आधार होती हैं। इन आवश्यकताओं की उचित पूर्ति होने पर बालक का विकास बेहतर ढंग से होता है।
2. पारिवारिक परिवेश
परिवार बालक का पहला सामाजिक वातावरण होता है। परिवार का प्रेम, स्नेह, अनुशासन, आर्थिक स्थिति तथा पारिवारिक संबंध बालक के व्यक्तित्व और व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
3. रोग तथा दुर्घटनाएँ
रोग, चोट अथवा दुर्घटनाएँ बालक के शारीरिक एवं मानसिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं। दीर्घकालीन बीमारी का प्रभाव उसके सीखने और विकास की गति पर भी पड़ता है।
4. विद्यालय
विद्यालय का वातावरण, शिक्षकों का व्यवहार, शिक्षण पद्धति तथा उपलब्ध सुविधाएँ बालक के सर्वांगीण विकास को प्रभावित करती हैं। विद्यालय बालक में ज्ञान, कौशल एवं सामाजिक गुणों का विकास करता है।
5. समाज एवं संस्कृति
समाज की परम्पराएँ, रीति-रिवाज, मूल्य एवं सांस्कृतिक मान्यताएँ बालक के विचारों, व्यवहार और जीवन-दृष्टि को प्रभावित करती हैं। बालक सामाजिक वातावरण से अनेक आदर्श एवं व्यवहार सीखता है।
6. संचार माध्यमों का प्रभाव
रेडियो, टेलीविजन, समाचार-पत्र, इंटरनेट तथा अन्य जनसंचार माध्यम बालक के ज्ञान, सोच और दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं। उचित उपयोग से ये शिक्षा एवं जागरूकता बढ़ाते हैं, जबकि अनुचित उपयोग नकारात्मक प्रभाव भी डाल सकता है।
- वातावरण से आशय उन सभी बाह्य परिस्थितियों, व्यक्तियों एवं प्रभावों से है जो बालक के विकास को प्रभावित करते हैं।
- वातावरण के दो प्रमुख प्रकार हैं— आन्तरिक वातावरण तथा बाह्य वातावरण।
- आन्तरिक वातावरण का सम्बन्ध गर्भावस्था के दौरान गर्भस्थ शिशु को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों से होता है।
- बाह्य वातावरण में भौतिक वातावरण एवं सामाजिक वातावरण सम्मिलित होते हैं।
- सामाजिक वातावरण के प्रमुख घटक आर्थिक, सांस्कृतिक तथा मनो-सामाजिक वातावरण हैं।
- बाल विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख वातावरणीय कारक हैं— मूलभूत आवश्यकताएँ, पारिवारिक परिवेश, रोग एवं दुर्घटनाएँ, विद्यालय, समाज एवं संस्कृति तथा संचार माध्यम।
- परिवार बालक का प्रथम सामाजिक वातावरण होता है तथा बालक के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- विद्यालय बालक के ज्ञान, कौशल, व्यवहार एवं सामाजिक विकास को प्रभावित करता है।
- समाज एवं संस्कृति बालक के मूल्यों, आदर्शों एवं व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
- संचार माध्यम बालक के ज्ञान, दृष्टिकोण एवं सामाजिक जागरूकता के विकास में सहायक होते हैं।